(हिन्दी उपन्यासों के विशेष संदर्भ में)

21 वीं सदी में हिन्दी भाषा का सवाल- एक वाजिब सवाल

(हिन्दी उपन्यासों के विशेष संदर्भ में)

डॉ. मंजू कुमारी

सहायक प्रोफेसर, हिन्दी विभाग

राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय ढलियारा, काँगड़ा

हिमाचल-प्रदेश

भाषा ही वह माध्यम है जिसके द्वारा हम अपने भावों एवं विचारों को एक-दूसरे तक आसानी से पहुंचाने में सफल हो पाते हैं। समाज की निर्मित किसी भाषा के माध्यम से ही संभव है, भारतीय समाज में हिन्दी भाषा और उसका साहित्य बहुत विस्तृत स्तर पर मौजूद है। साहित्य ही वह जरिया है जिसके माध्यम से तत्कालीन समय एवं समाज की स्थिति को समझा जा सकता है। वैश्वीकृत दौर में समाज के बदलने के साथ साहित्य की भी रूपरेखा में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। “भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी समाहार की संस्कृति। जो भी यहाँ आता है वह इस देश के तीज-त्योहार से, मूल चेतना से, व्यक्तियों के स्वाभिमान से इतना प्रभावित होता है और यहीं का बनकर रह जाता है इस समाहार की संस्कृति के कारण हिन्दी भाषा का बहुत विकास हुआ है। हिन्दी भाषा ने अन्य किसी भी कारण से कोई गुरेज नहीं किया कि- उसे अन्य भाषाओँ के शब्दों को भी अपनाना है। अंग्रेजी, उर्दू, पुर्तगाली आदि भाषाओँ के शब्दों को सहजता से आत्मसात किया है। हिन्दी ने सदैव ही शरणागत की रक्षा की है। विविधता में एकता इसकी विशेषता रही है।”1

भारत एक बहु आयामी तथा बहुभाषी समाज है। प्रत्येक समाज की अपनी-अपनी स्थिति, अपना परिवेश और अपनी संस्कृति होती है। भाषिक संरचना की दृष्टि से देखा जाय तो प्रत्येक प्रान्त की अपनी एक विशेष ‘भाषा’ या बोली होती है। कहीं पंजाबी, कहीं तमिल, तेलगु तो कहीं बांग्ला, मराठी और गुजरती। इस सभी जगहों पर लोगों द्वारा जो भाषा समझी बोली जाती है या जिसके माध्यम से जहाँ हिंदी प्रचलन में नहीं है वहाँ भी हिन्दी भाषा के द्वारा संवाद स्थापित किया जा सकता है। इसकी यह वजह भी हो सकती है कि हिंदी भाषा मात्र एक भाषा न होकर राष्ट्रभाषा है। जहाँ तक भाषा का प्रश्न है। ‘भाषा भावों की अनुगामिनी होती है।’ भाषा के माध्यम से हम अपनी बात एक-दूसरे तक पहुँचाने में सफल हो पाते हैं। किसी भी भाषा का एक सामाजिक और सांस्कृतिक परिदृश्य होता है। जिसके माध्यम से भाषा अपने क्षेत्र विशेष का निर्माण करने में भी सफल होती है। भारत एक विशाल देश है। यहाँ पर हिन्दी भाषा के साथ अन्य भाषा और बोलियाँ भी विद्यमान हैं। जिनमें से 22 मुख्य भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में भी शामिल किया गया है।

हिन्दी भाषा की उत्पति ‘सिन्धु’ शब्द से मानी जाती है। प्राचीन समय में ‘सिन्धु नदी’ के आस-पास का क्षेत्र ‘सिन्धु क्षेत्र’ कहलाता था। ‘सिन्धु’ शब्द की ‘स’ ध्वनि को आक्रमणकारियों द्वारा ‘ह’ ध्वनि कहा गया और उस पर ईरानी (फारसी) का प्रभाव बताया जाता है। इस प्रकार ‘सिन्धु’ शब्द ‘हिन्दु’ शब्द बना और ‘सिन्धी’ शब्द से ‘हिन्दी’ रूप सामने आया है। यही आगे चलकर ‘खड़ी बोली’ हिन्दी के रूप में व्यवहृत होने लगी। ‘हिन्दी नयी चाल में ढली- भारतेंदु’ कथानक को सार्थक करती हुई हिन्दी भाषा का परिष्कृत रूप सामने आया। “हिन्दी की यह शक्ति पहली बार दिखी हो, ऐसा नहीं है, हिन्दी ‘नई चाल में ढलने’ के बाद पहला आकस्मिक परिवर्तन छायावाद के दौर में दिखता है जब भाषा में एक गुणात्मक परिवर्तन हुआ। हजारों नये शब्दों के प्रवेश के साथ ही खड़ी बोली हिन्दी सहसा अवयस्क से वयस्क हो गई। भाषा में होने वाले दूसरे आकस्मिक परिवर्तनों का दौर संभवत: 1980 के आस-पास का रहा होगा जब वैश्वीकरण, मुक्त बाजार, उदार नीति, नयी प्रौद्योगिकी और सूचना क्रांति ने संक्रमणकालीन समाजों को जन्म दिया। इस समय हम फिर से एक बार हिन्दी में बहुत से नये शब्दों के प्रवेश को देख सकते हैं। इन परिवर्तनों ने हिन्दी की एक नयी संरचना निर्मित की और उसकी शुद्धता को दरकिनार करते हुए संप्रेषणीयता पर बल दिया।”2

आज हिन्दी पूरे भारत में ‘राजभाषा’ के रूप में विराजमान है। भारतीय भाषा परम्परा में आज हिन्दी का वहीं स्थान है जो प्राचीनकाल में संस्कृत भाषा का था। भारत का आधा हिस्सा ‘हिन्दी भाषी’ है। जहाँ सहज भाव से हिन्दी बोली और समझी जाती है। साहित्यिक दृष्टि से देखा जाय तो हिन्दी में सृजनशीलता की अद्भुत क्षमता है। ‘हिन्दी’ भाषा साहित्यिक दृष्टि से भी समृद्ध भाषा है। हिन्दी भाषा एक ऐसी भाषा है जिसमें भाषा समाहार की अद्भुत शक्ति विद्यमान है। इसलिए भी हिन्दी अपनी शुरूआती दौर से ही अनेक भाषाओं के आक्रमण और संक्रमण के बावजूद अपनी पहचान को परिष्कृत कर सहज एवं जीवंत रूप को प्राप्त करती हुई, आज समकालीन दौर में भी हिन्दी भाषा अपनी अनोखी पहचान और सार्थकता बनाये हुए है, जिसे हिन्दी भाषा के विकास का सूचक कहा जा सकता है। भाषा एक समाज सापेक्ष क्रिया है जैसे-जैसे समाज बदलता रहता है वैसे-वैसे भाषा में भी बदलाव आता रहता है। इस परिवर्तनशील समय में भाषा का स्वरूप भी विकसित हो रहा है। “लोक जीवन में भाषा का उद्देश्य भले ही एक-दूसरे के बीच संवाद तक सीमित हो या कहे की सूचना विचार अपनी भावनाओं को एक-दूसरे तक पहुँचाने का ही माध्यम रहा हो लेकिन जब हम व्यापक दृष्टि से इस पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि “विभिन्न संस्कृतियों के संवर्धन और सामुदायिक मेलजोल बनाये रखने में इनकी बेजोड़ भूमिका होती है।”3

आज 21वीं सदी में हिन्दी अब किसी एक क्षेत्र-विशेष की भाषा नहीं रही। वह वैश्विक हो तकनीकी कार्यों में भी प्रवेश कर रोजगार की भाषा बन रही है। हिन्दी भाषा विदेशों में भारतीय और उनकी भाषा हिन्दी एक रूप ग्रहण कर भारत की राष्ट्र भाषा के रूप में पूरे विश्व में स्वीकार की जा रही है। वैश्वीकरण के इस दौर में भारत में व्यापर और बाजार को बढ़ावा देने के लिए, हिन्दी भाषा के ज्ञान के बिना यहाँ के अधिकतम लोगों से संवाद करना संभव नहीं होगा। आज भाषा का दृश्य और श्रव्य दोनों रूप कंप्यूटर, इंटरनेट और सूचना-प्रौद्योगिकी द्वारा एक व्यापक रूप ग्रहण करने में सफल हो रही है। यह सब मीडिया की ही देन है। मीडिया के माध्यम से आज हिन्दी वैश्विक स्तर पर विराजमान हो रही है। जिसमें पत्रकारिता, जनसंचार जनमाध्यम और प्रिंट इलेक्ट्रोनिक मीडिया, सिनेमा, विज्ञापन, न्यू मीडिया आदि शामिल हैं।

“इक्कीसवीं शती बीसवीं शताब्दी से भी ज्यादा तीव्र परिवर्तनों वाली तथा चमत्कारिक उपलब्धियों वाली शताब्दी सिद्ध हो रही है। विज्ञान एवं तकनीक के सहारे पूरी दुनिया एक वैश्विक गाँव में तब्दील हो रहा है और स्थलीय व भौगिलिक दूरियाँ अपनी अर्थव्यवस्था खो रही हैं। वर्तमान विश्व व्यवस्था आर्थिक और व्यापारिक आधार पर ध्रुवीकरण तथा पुनर्संगठन की प्रक्रिया से गुजर रही है। ऐसी स्थित में विश्व की शक्तिशाली राष्ट्रों के महत्त्व का क्रम भी बदल रहा है। यदि अठारहवीं शताब्दी आस्ट्रिया और हंगरी के वर्चस्व की रही है तो उन्नीसवीं सदी ब्रिटेन और जर्मनी के वर्चस्व का प्रमाण देती हैं और बीसवीं सदी अमेरिका और सोवियत संघ के प्रभुत्व के रूप में विश्व विख्यात है। आज स्थित यह है कि इक्कीसवीं सदी, विश्व समुदाय की मानें तो भारत और चीन की है। क्योकिं भारत और चीन विश्व की सबसे तेजी से उठने वाली अर्थव्यवस्था में से है। इन दोनों देशो के पास अकूत प्राकृतिक सम्पदा है तथा युवा मानव संसाधन है। जब किसी राष्ट्र को विश्व समुदाय में अपेक्षाकृत अधिक महत्त्व और स्वीकृति मिलती है तो उसके प्रति अपनी निर्भरता महत्त्वपूर्ण हो जाती है और वह राष्ट्र भी स्वयं महत्त्वपूर्ण बन जाता है। भारत की विकासमान अंतर्राष्ट्रीय स्थिति हिन्दी के लिए वरदान है।”4

पिछले दो तीन सालों में समाचार की भाषा में भारी बदलाव हुआ है। सूचना क्रांति ने भारतीय जीवन शैली पर भारी प्रभाव डाला। समाज बदला तो भाषा बदली और मीडिया का रूप भी बदल गया है। वर्तमान समय सूचना-प्रौद्योगिकी के माध्यम से वास्तविक दुनिया को आभासी दुनिया में तीव्र गति से बदल रहा है। मीडिया जगत में तरंगों की क्रांति के रूप में सूचनाओं का स्वरूप भाषा के माध्यम से ही संप्रेषित हो रहा है। जिसमें भाषा अहम भूमिका अदा कर रही है। लेकिन इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है कि इस बढ़ते मीडिया के दौर में एक क्षेत्र-विशेष की भाषा अर्थात क्षेत्रीय बोलियों का या तो खात्मा होगा या वह वैश्विक स्तर पर विकसित हो संप्रेषण का माध्यम बनेगी। मातृभाषाओं के संरक्षण के लिए विश्व स्तर पर काम शुरू कर दिया गया है। “मातृभाषाओं के लिए विश्व स्तर पर यूनेस्को वर्ष-2000 से हर साल अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाता है और विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए देशी भाषाओं और संस्कृतियों का संरक्षण तथा बहुभाषिकता को प्रोत्साहित करता है। बहुभाषिकता राष्ट्रों-समुदायों के बीच उपजी भ्रांतियों, मदभेदों को पाटने में सेतु का कार्य मिथकों-लोकोक्तियों से गुथें होने के कारण मातृभाषा के जरिये सीखने समझने की पर्याप्त, निर्बाध व सहज गुंजाइश रहती है।”5 वैश्वीकरण के इस दौर में हिन्दी भाषा और साहित्य का भविष्य उज्ज्वल है। भारत जैसे विशाल देश जो कि बाजार का सबसे बड़ा हब है, जहाँ पर व्यापार-प्रवाह के लिए हिन्दी भाषा ही एक माध्यम है जिससे आपसी संप्रेषण जमीनी स्तर तक सम्भव हो सकेगा। समकालीन मीडिया में हिन्दी भाषा की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने हिन्दी भाषा को रोजगार से जोड़ा है। हिन्दी भाषा को व्यावसायिक जगत की भाषा से जोड़ने में विज्ञापनों का काफी बड़ा हाथ है। भारत में आर्थिक उदारीकरण, अर्थव्यवस्था के कारण आयी बहु-राष्ट्रीय कम्पनियाँ ने पाया की हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है जो भारत में एक बड़ा बाजार उपलब्ध करा सकती है। इसका एक कारण यह भी है कि भारतीय किसी भी भाषा का सम्बन्ध केवल भाषा तक सीमित न होकर पूरे भाषा-भाषी समाज से हैं जहाँ तक यह भाषा आसानी से बोली समझी जाती है। जब हम एक भाषा को केंद्र में रखकर बात करते हैं तो साथ ही साथ उससे सम्बन्धित समाज और संस्कृति का भी एक इतिहास जुड़ा होता है। जिसके बिना किसी भाषा पर बहस की नहीं जा सकती है। वर्तमान दुनिया बदलते भाषिक संप्रेषण के साथ विचारधारा, समाज और संस्कृति का तेवर भी बदल रहा है। टेक्नोलॉजी, बाजार और मीडिया के प्रवेश ने समाज और संस्कृति की संरचना को परिवर्तित कर दिया है। जिसके साथ ही भाषा की संवेदना भी शून्य होती चली जा रही है। बाजारीकरण ने समाज और संस्कृति के बाह्य जगत को बदलने में सफल रही तो मानवीय संवेदना को भी सुखानें से भी पीछे नहीं रही। बदलते समय और समाज के साथ मानवीय सम्वेदना शून्य हो सारे रिश्ते बाजार से खरीद कर लायी गई वस्तु के समान आकर्षण समाप्त होने के बाद व्यर्थ हो जाती है। ‘कुंवरनारायण’ अपनी कविता के माध्यम से मानवीय संवेदना की बदलती झांकी प्रस्तुत करते हैं-

“जब भी एक कहता है कि भावनाओं का रिश्ता तिजारत से बड़ा है

दूसरा जवाब देता है कि हर रिश्ता,

आर्थिक-बुनियाद पर खड़ा है।”

भाषा की मानवीय सम्वेदना दिन-प्रतिदिन घट रही है। सनसनी फ़ैलाने हेतु ‘मीडिया भाषा’ का बोलबाला बढ़ता ही जा रहा है। भाषिक संवेदना की शून्यता मात्र खबर बनकर रह गई हैं। बाजारीकृत संस्कृति ने शब्द से उसकी जीवन्तता ख़त्म कर उसे बेजान बना दिया है। कवि ‘निलय उपाध्याय’ की कविता में अभिव्यक्ति समाज और संस्कृति की बेचैनी का एक दृश्य इस प्रकार है।

“बेचते-बेचते

खरीद लेने वालों पर टिका था बाजार

खरीदते-खरीदते बिक जाने वालों पर टिकी थी,

यह दुनिया”

वैश्वीकरण के दौर मैं भाषा समाज और संस्कृति का नया रूप मीडिया की ही देन है। आधुनिकता की भाषा में कहे तो बिना मीडिया क्रांति के कथाकथित ‘पिछड़े समाज और रूढ़िवादी संस्कृति से मुक्त पाना संभव न था। भारतीय समाज और संस्कृति में जहाँ ‘वैसुधेव कुटुम्बकम’ की भावना का तात्पर्य ‘पूरा विश्व परिवार है’ था। वहीं दूसरा तरफ आज ‘वैश्वीकरण’ का मतलब- ‘पूरा विश्व बाजार’ है। जहाँ वस्तु बनायीं जाती है, वस्तु बेची जाती है। जहाँ समाज बाजार है, लोग उपभोक्ता हैं और बाकी जो बचे उत्पादक या व्यापारी। मानवीय सम्वेदना मात्र छल है और कुछ भी नहीं। आज के समाज की यह नई सोच है। इसलिए भी समाज की हर-एक वस्तु का वजूद उसके बाजारी मूल्यों पर आधारित होता है। भाषा का अस्तित्व भी नई सोच को आत्मसात कर लेने मात्र से बचा रह सकता है। मीडिया सूचनाओं का जंजाल है। मीडिया जब उद्योग बन जाती है तो उसका बाजार लाभ कमाना मुख्य उद्देश्य हो जाता है। ‘इसी लाभ का शिकार कहीं न कहीं हमारी भाषाएँ भी हो रही हैं। जिससे भाषा तो व्यावसायिक हो रही है लेकिन भाषा की जीवन्तता पर खतरा बढ़ता जा रहा है। इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है।

जहाँ तक भाषा या हिन्दी भाषा की ‘लिपि’ का प्रश्न है, जिसका सम्बन्ध मुख्य रूप से हिन्दी भाषा के अस्तित्व और पहचान से जुड़ा है। शुरूआती दौर में जब हिन्दी ‘फॉण्ट’ का विकास नहीं हुआ था उस समय हिन्दी ‘रोमन लिपि’ में लिखी जाती थी और रोमन में ही हिन्दी सामग्री भी ‘इंटरनेट’ पर डाली जाती थी। उस समय तक ‘देवनागरी लिपि’ में हिन्दी के लिए फॉण्ट की समस्या थी। लेकिन देखते ही देखते ‘न्यू मीडिया की क्रांति’ ने शीध्र ही इस समस्या को भी दूर कर दिया। ‘गूगल ट्रांसलेशन साफ्टवेयर’ के आ जाने से ‘यूनिकोड फॉण्ट’ ने हिन्दी भाषा और दूसरे अन्य भाषाओं की दुनिया में क्रांति ला दी। जिसने न्यू मिडिया के विकास का रास्ता भी खोल दिया है। वर्तमान समय में हिन्दी भाषा के विकास के लिए ‘एम. एच. आर. डी.’ और ‘यू.जी.सी.’ जैसी संस्था द्वारा ‘ई.पी.जी.पाठशाला प्रोजेक्ट’ के माध्यम से हिन्दी के पाठ्यक्रम को ऑनलाइन विश्व स्तर पर उपलब्ध करवाने और हिन्दी भाषा के वैश्विक विकास के लिए सराहनीय प्रयास किया जा रहा है। जिसके माध्यम से हिन्दी भाषा और साहित्य का परिष्कृत रूप विश्व स्तर पर सबको उपलब्ध कराया जाएगा। एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा बहुत पहले ही अपनी सारी किताबें हिन्दी, अंग्रेजी दोनों भाषाओं में ऑनलाइन भी उपलब्ध करवा दी गई हैं। भूमण्डलीकरण और हिन्दी पुस्तक की सम्पादक कल्पना वर्मा के अनुसार “जो नई तकनीक है चाहे इंटरनेट हो, ई-मेल, ई-बुक, ई-कामर्स, सभी में हिन्दी का सफल प्रयोग हो रहा है। इंटरनेट पर हिन्दी की पुस्तकें, अखबार, पत्र-पत्रिकाएँ दूसरे देशों के विविध साइट्स पर उपलब्ध हैं। नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित बारह हजार पृष्ठों का ‘विश्व हिन्दी कोश’ इन्टरनेट पर उपलब्ध है। हिन्दी साहित्य के लगभग दो लाख पृष्ठ महात्मा गांधी अंतर्राष्टीय विश्वविद्यालय द्वारा इंटरनेट पर डाले गए हैं। डिस्कवरी चैनल, दो कार्टून चैलन आदि द्वारा हिन्दी में ज्ञानवर्धक सूचनाएँ प्रसारित होती हैं। टेलीविजन तथा रेडियों ने भी हिन्दी ने अपना वैश्विक स्थान बना लिया है।”6 जिसमें सामाजिक विज्ञान के साथ विज्ञान की भी किताबें हिन्दी भाषा में उपलब्ध हैं। समकालीन समाज पूर्ण रूप से टेलीविजन, इंटरनेट, मोबाइल, फेसबुक, ट्विटर, व्हाटऐप आदि तकनीकी परिवेश को ‘साइबर वर्ल्ड’ के रूप में जाना जा रहा है, जो कि किसी भी देश काल सीमा से परे है, व्यापक है और विस्तृत है। इस हद तक कि मानव मन की भावनाएं पूर्ण रूप से स्वच्छंद होकर विचरण कर रही हैं। यहाँ पर न किसी को कोई बंधन है और न ही किसी तरह का कोई अवरोध। हर कोई अपनी स्थिति के अनुसार स्वतंत्र है और स्वच्छंद भी। लेकिन युवा पीढ़ी आज के अस्त-व्यस्त जीवन में भी एहसास को सहेजना चाहती है। ‘कुंवर नारायण’ कविता-‘नई किताबें’ में इसी तरह के अहसास को रेखांकित किया गया है।

यह भी पढ़ें -  अंतरविषयी, बहुविषयी और परा विषयी अध्ययन का विश्लेषण

“अपने लिए हमेशा खोजता रहता हूँ।

किताबों की इतनी बड़ी दुनिया में,

एक जीवन संगिनी

थोड़ी अल्हड़, चुलबुली, सुन्दर आत्मीय किताब

जिसके सामने मैं भी खुल सकूं

एक किताब की तरह पन्ना पन्ना

और वह मुझे भी

प्यार से मन लगा कर पढ़े।।”

वर्तमान समय में भाषा पर पड़ रहे अंग्रेजी भाषा के प्रभाव से इन्कार नहीं किया जा सकता है लेकिन पुन: हिन्दी अपना एक रूप बदलकर वैश्विक दौर में विकास के पथ पर अग्रसर हो रही है। भाषा विकास की दृष्टि से यह संक्रमण का काल है। लेकिन धीरे-धीरे इस काल में भी ठहराव आएगा और हिन्दी भाषा का विश्वव्यापी रूप सभी पर राज करेगा। हिन्दी भाषा के विकास में भाषा का मीडियाकृत होना एक ऐतिहासिक घटना है। इसने हिन्दी का एक बहुत बड़ा जन-क्षेत्र तैयार किया है, जिसकी कल्पना नहीं की गई थी।

समकालीन मीडिया के दौर में हिन्दी भाषा ‘हिन्दी संस्कृति’ में अन्तर्निहित अस्मिताबोध को नये सिरे से समझने की जरुरत है तो दूसरी तरफ हिन्दी की अन्य बोलियों से सम्बन्ध दृढ़ करने की भी जरुरत है। इतना ही नहीं हमें ‘उपभोक्तावादी संस्कृति’ की बोली ‘हिंग्लिश’ के साथ संवाद करने और ‘शुद्ध हिन्दी’ भाषा रूपी मिथक को भी तोड़ने की जरुरत है। हिन्दी भाषा का प्रारम्भ से ही समाहार रूप रहा है न कि शुद्धता जैसी बेड़ियों से जकड़ी रही है संस्कृत भाषा की तरह। हिन्दी भाषा अपनी प्रकृति के अनुसार अन्य भाषाओं से आये शब्दों का परिष्कार कर समायोजन करती और विकसित होती रही है। कोई भी भाषा अपने समय में जितनी उदार और सहज होती है वह समय के साथ-साथ बदलती रहती है। समय के साथ वह उतनी ही लोक प्रिय भाषा के रूप में विराजमान होती है। संस्कृत और लैटिन भाषा का उदाहरण हमारे सामने है। यह कहना गलत न होगा कि इन दोनों भाषा के अनुयायियों ने इसे लोगों के सामने सीमित किया।

इन भाषाओं ने अपने आपको व्याकरण के साथ जितना शुद्धतावादी रवैया अपनाया उतनी ज्यादा ये भाषाएँ सिमट कर रह गईं। 21वीं सदी सूचना-प्रौद्योगिकी और मीडिया के माध्यम से संस्कृत भाषा को भी पुन: जीवनदान देने हेतु इसके भाषायी ज्ञान के भंडार को विश्व स्तर पर पहुँचाने हेतु का काम शुरू हो गया है। यह बदलते समय और भाषा के प्रति बदलती मानसिकता की ही मांग है। “प्रख्यात आलोचक-विचारक डॉ. नामवर सिंह ने भी कहा है कि इक्कीसवीं सदी में भाषा और साहित्य का भविष्य बाजार तय करेगा। भाषा के विकास और उसके बदलाव के अध्येता डॉ.रामविलास शर्मा ने भी खडी बोली की उत्पत्ति का श्रेय बाजार को दिया है। बाजार ने खड़ी बोली के साथ-साथ अवधी, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी आदि क्षेत्रीय बोलियों को भी लोकप्रियता प्रदान की है। ‘मैडोना’ जैसी ‘पॉप स्टार सिंगर’ को भी कबीर के पदों को गाने के लिए बाजार ने ही विवश या प्रेरित किया। इंडियन ओशेन ग्रुप ने गोरख पाण्डेय के ‘हिलेला झकझोर दुनिया’(भोजपुरी) गीत को गाया। अस्सी करोड़ की लोगों की भाषा का आश्रय लिए बिना आज विश्व की व्यावहारिक और व्यावसायिक गतिविधियों का संचालन सम्भव नहीं।”7 इस प्रकार हिन्दी व्यावहारिकता के साथ-साथ व्यावसायिक दुनिया में तीव्रता से अपना परचम लहराने के लिए सफल हो चुकी है। अब वह समय दूर नहीं है जब समाज में बनी हिन्दी भाषा के प्रति लोगों की उदासीनता स्वत: समाप्त हो जाएगीं। “हिन्दी समकालीन भूमण्डलीकरण के दौर में तेजी से एक सशक्त, सर्वत्र उपस्थित विश्व भाषा बन चली है। उसके अनेक स्तर अनेक रूप, अनेक शैलियाँ हैं और एक नयी अन्तरंग किस्म की बहुलता है। मुक्त बाजार, ग्लोबल जनसंचार, तकनीकी क्रान्ति और हिन्दी क्षेत्रों के विराट उपभोक्ता बाजार ने हिन्दी हिन्दी को एक नयी शिनाख्त और ताकत दी है। संस्कृतवाद का दामन छोड़ बोलियों को अपने में समाकर उर्दू से दोस्ती स्थापित कर अंग्रेजी से सहवर्ती भाव में विकास पाती हिन्दी अपना ‘ग्लोबल ग्लोकुल’ बना रही है।-सुधीश चौधरी”8 हिन्दी भाषा बदलते समय और समाज के साथ अपने आपको हमेशा आत्मसात की भावना से सहजता से बदलती और विकसित होती रही है। “जब सन 2000 में हिन्दी का पहला ‘वेव पोर्टल’ अस्तित्त्व में आया तभी से इंटरनेट पर हिन्दी ने अपनी छाप छोड़नी प्रारम्भ कर रही, जो अब रफ़्तार पकड़ चुकी है। नई पीढ़ी के साथ-साथ पुरानी पीढ़ी ने भी इसकी उपयोगिता समझ ली है। मुक्तिबोध, त्रिलोचन जैसे हिन्दी के महत्त्वपूर्ण कवि प्रकाशकों द्वारा उपेक्षित रहे। इंटरनेट ने हिन्दी को प्रकाशकों के चंगुल से मुक्त कराने का भी भरसक प्रयास किया है। इंटरनेट पर हिन्दी का सफर ‘रोमन लिपि’ से प्रारम्भ होता है। और ‘फॉण्ट’ जैसी समस्याओं से जूझते हुए धीरे-धीरे यह ‘देवनागरी लिपि’ तक पहुँच जाता है। ‘यूनिकोड, मंगल, जैसे ‘युनिवर्सल फोंट्स’ ने देवनागरी लिपि को कंप्यूटर पर नया जीवन प्रदान किया है। आज इंटरनेट पर हिन्दी साहित्य से सम्बन्धित लगभग सत्तर ई-पत्रिकाएँ देवनागरी लिपि में उपलब्ध है।”9 टेक्नोलॉजी ने भारतीय भाषाओं और बोलियों को इंटरनेट के माध्यम से प्रगति पथ पर अग्रसर किया है।

“अभिव्यक्ति” हिन्दी की पहली ई-पत्रिका है जिसने आज तीस हजार से भी अधिक पाठक हैं। अभिव्यक्ति के बाद अनुभूति रचनाकार हिन्दी नेस्ट, कविताकोश संवाद आदि ई-पत्रिकाएँ इंटरनेट पर अपनी छटा बिखेर रही हैं।”10

वैश्वीकृत दौर में हिन्दी भाषा पर अंग्रेजी भाषा के शब्दों का प्रयोग बढ़ रहा है। हिन्दी भाषा और साहित्य वैश्विक स्तर पर लगातार लोकप्रिय हो रही है। यह कहना सही है कि “अगला दौर नवउदारवाद के बाद की हिन्दी का है, जो पिछले पंद्रह-बीस वर्षों से चल रहा है। इस दौर में दैनिक-साप्ताहिक अखबारों की संख्या में भारी इजाफा हुआ। इससे भी आगे बढ़कर हिन्दी भाषा पर मिडिया, टीवी चैनलों का असर पड़ा। इस नये मीडिया पर एक तरह की खिचडी हिन्दी चल रही है, जिसमें अंग्रेजी के शब्दों का धुआंधार प्रयोग चल रहा है। इसी का असर दैनिक अखबारों की हिन्दी पर भी पड़ा है। जिन अंग्रेजी शब्दों के लिए हिन्दी शब्द सुलभ हैं, उनका भी प्रयोग किया जा रहा है। भूमण्डलीकरण का सबसे गहरा प्रभाव मिलावट का चलन है। यह मिलावट खानपान से लेकर भाषा तक में है। –नामवर सिंह”11 हिन्दी भाषा और साहित्य का प्रभाव दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है । बदलते समय और समाज में सूचना-प्रौद्योगिकी के आ जाने से भारतीय परिवेश में हिन्दी भाषा सभी के द्वारा बोली-समझी जाने वाली भाषा के रूप में विकसित हो रही है। वैश्विक दौर में टेक्नोलॉजी और ‘सूचना प्रौद्योगिकी’ से अनभिज्ञ लोगों का विकास असम्भव है इसलिए टेक्नोलॉजी के इस दौर में टेक्निकल यंत्रों के माध्यम से जुड़कर ही हम विश्व स्तर पर अपना परचम लहरा सकते हैं। इसलिए हिन्दी भाषा और साहित्य भी बाजार और ‘सूचना प्रौद्योगिकी’ के माध्यम से विश्व स्तर पर अपनी महत्ता का ज्ञान का गुणगान करती हुई विकसित हो रही है।

हिन्दी भाषा की संप्रेषणीयता और वैश्विक समाज

वैश्वीकृत दौर में हिन्दी भाषा का वैश्विक स्वरूप देखा जा सकता है। हिन्दी भाषा अब किसी क्षेत्र विशेष की भाषा न रहकर विश्व स्तर की भाषा हो गई है। वैसे देखा जाय तो ‘अंग्रेजी’ और ‘चाइनीज’ भाषा को छोड़कर तीसरे स्थान पर ‘हिन्दी’ भाषा के बोलने समझने वाले विश्व के हर कोने में मिल जाएंगे। वैश्विक स्तर पर हिन्दी का प्रचार-प्रसार भारत से दूसरे देशों को गए भारतीय मजदूरों अर्थात गिरमिटिया मजदूरों द्वारा ज्यादा हुआ है। जिसके माध्यम से वर्तमान समय में हिन्दी भाषा विश्व के कई देशों में फ़ैल चुकी है और एक संप्रेषणीय भाषा के रूप में सहज रूप से बोली समझी जा रही है। वैश्वीकरण के दौर में बाजार और सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से देश के कोने-कोने तक हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार करने का मुख्य कारण यह भी है कि कम्पनियों को अपना सामान बेचने खरीदने के लिए ज्यादातर ग्राहक मध्यवर्गीय समाज के लोग थे ऐसे में उनसे संवाद के लिए उसकी सम्पर्क भाषा हिन्दी में अपनी सूचनाएं प्रसारित करने और उनके द्वारा संवाद स्थापित करने हेतु इंटरनेट की भाषा के रूप ने हिन्दी का विकास और टेक्नोलॉजी के माध्यम से हिन्दी भाषा के साथ-साथ हिन्दी से सम्बंधित अन्य क्षेत्रीय बोलियों की लिपि को भी कम्प्यूटर की-बोर्ड पर उतारा गया।

वर्तमान समय में हिन्दी इंटरनेट की भाषा के रूप में पूरे विश्व में फ़ैल चुकी है। अंग्रेजी की भांति हिन्दी विश्व प्रसिद्ध भाषा के रूप में विराजमान हो चुकी है। वैश्विक दौर में हिन्दी की बोलियों पर स्थानीयता का प्रभाव देखा जा सकता है। बहुत ही रोचक और जीवंत रूप में साहित्य के माध्यम से बोलियों का प्रयोग किया जा रहा है। “आज पूरे संसार में करीब 2800 भाषाएँ बोली जाती हैं जिनमें से 12 भाषाएँ मात्र साहित्यिक महत्त्व की हैं। यदि बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से देखें तो सारे संसार में पहला स्थान चीनी भाषा का, दूसरा स्थान अंग्रेजी का और तीसरा स्थान हिन्दी का है। हिन्दी भाषा का प्रचलन भारत, नेपाल, मलेशिया, इंडोनेशिया, सूरीनाम, फिजी, गुयाना, मोरिशस ट्रिनिडाड एवं टोबैगों जैसे करीब पचास देशों में हैं।”12 आभासी दुनिया के विश्व पटल पर हिन्दी भाषा और साहित्य विकसित हो दुनिया के कोने-कोने तक पहुँच रहा है और साथ ही साथ हिन्दी भाषा बोल-चाल सम्वाद स्थापित करने के एक भाषायी माध्यम के रूप में विकसित हो रही है।

“भाषा वैज्ञानिकों का मत है कि व्यक्ति भाषा का प्रयोग अपने परिवेश, स्थिति तथा संदर्भ के अनुसार करता है’ आज के परिवेश एवं संदर्भ के अनुसार हिन्दी भाषा केवल साहित्यिक या सम्प्रेषण की भाषा नहीं रही। वह तो कामकाज, कार्य पद्धति, विज्ञान, तकनीक, प्रौद्योगिकी, विधि चिकित्सा वाणिज्य के साथ-साथ संगणक, सेल्युलर, इंटरनेट, सैटेलाईट सूचना सुपर हाइवे की भाषा बनने लगी है। संचार माध्यमों की समाज सापेक्ष सेवा माध्यम(सर्विस टूल्स) के रूप में प्रयुक्त हो रही है। सामाजिक सन्दर्भ के गतिशील प्रवाह में अपने-अपने गुणों को बढ़ा रही है। वह संचार की भाषा बन भाषाई क्षमता तथा भाषा व्यवहार को गति प्रदान कर रही है। संचार भाषा के सभी गुण हिन्दी में है। जिसके कारण वह आज विश्व भाषा बन रही है।”13 हिन्दी भाषा ही भारतीय समाज में राष्ट्र भाषा बनने के योग है। क्योंकि हिन्दी भाषा की सहजता मानव मन की गहराई अपनी सहज मातृभाषा में ही सम्भव होती है। हिन्दी भाषा की महत्ता को बताते हुए “सरदार बल्लभ भाई पटेल ने कहा है कि- हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि राष्ट्रभाषा की उन्नति बढ़ाने और उसकी सेवा करे, जिससे कि सारे भारत में वह बिना किसी संकोच या संदेह के स्वीकृत हो। हिन्दी भाषा का पट महासागर की तरह विस्तृत होना चाहिए जिसमें मिलकर और भाषाएँ अपना बहुमूल्य भाग ले सके। राष्ट्रभाषा न तो किसी प्रान्त न किसी जाति की है। वह सारे भारत की भाषा है।”14 हिन्दी ही वह भाषा है जिसके माध्यम से पूरे भारत वर्ष के लोगों को एकता के सूत्र में बाधा जा सकता है। “व्यावहारिक दृष्टि से हिन्दी में सरलता, बोध सुलभता सुचारुता अधिक है। उसका लचीला रूप केवल भारतीय भाषाओं को ही नहीं अपनाता बल्कि विदेशी भाषाओँ को भी वह सहजता से अपनाता है। हिन्दी की देवनागरी लिपि और वैज्ञानिकता को देख बाजार क्रांति ने उसे अधिक अपनाया है । आज के संचार युग के दौर में भाषा वैज्ञानिकों तथा विशेषज्ञों ने भविष्य वाणी करते हुए कहा है कि सूचना-संचार में केवल 14 भाषाएँ जीवित रहेंगी। उसमें हिन्दी भाषा का नाम है।”15

21वीं सदी के हिन्दी उपन्यासों में अन्य भाषा बोलियों की शब्दावली और वैश्विक समाज की कुछ झांकियां इस प्रकार हैं- वैश्विक समाज और संस्कृति से जुड़े कुछ उदाहरण- भ्रष्टाचार लोकतंत्र के लिए आक्सीजन है, है कोई ऐसा राष्ट्र जहाँ लोकतंत्र हो और भ्रष्टाचार न हो ? जरा नजर दौड़ाइए, पूरी दुनिया पर, ये छोटी बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ क्या हैं? अलग-अलग छोटे-छोटे संस्थान, भ्रष्टाचार के प्रशिक्षण केन्द्र, सिद्धांत मुखौटे हैं जिनके पीछे ट्रेनिंग दी जाती है।” 16

‘उपन्यास: एक ब्रेक के बाद- अलका सरावगी-भारत में कम्पनियों के प्रवेश ने भौतिक रूप से जहां देश समाज का विकासदर को आगे बढा रहा है वहीँ दूसरी तरफ हम देखते हैं कि भारतीय मानवता और सम्वेदना के गुण शून्य होती जा रही है। “इण्डिया की ‘इकोनॉमिक बूम’ या आर्थिक उछाल के साथ-साथ इण्डिया में धीरज और सहनशीलता के गुण डूब गए। अब साफगोई का जमाना भी गया कि आप किसी चुभते हुए सच को बेझिझक कह डालें।”17

भारत यानी “इण्डिया के लोग दुनिया भर की फैक्टारियां खरीदते घूम रहे हैं। टाटा ने इंग्लैण्ड में स्टील फैक्टरी खरीद ली और बिडला ने अमेरिका में अलमूनियम की। के.वी. अपने अंदाज में हँसकर कहते हैं-चीन का ड्रैगन 2007 में 9 प्रतिशत जीडीपी में बढ़ोतरी दिखाए तो क्या, इण्डिया का हाथी उससे एक सूता ऊपर 9.1 प्रतिशत तक पहुँचने वाला है।”18

“भारतीय कला और संस्कृति का बदलता स्वरूप और भारतीय कलाओं का विदेशीकरण गुरु की डायरी में लिखी बात की वास्तविकता “मैं-जो सब कुछ जानता हूँ, आनेवाले कल को भी और गुजरे हुए कल को भी तो खैर जानता ही हूँ। खरीद लो, खरीद लो, इसके पहले कि भारतीय कला ‘इनफ़ोसिस’ बन जाए और सारा माल विदेश जाने लग जाय। अब ‘आर्ट’ और ‘ब्लू चिप में कोई अंतर नहीं बचा है।”19

उपन्यास: ग्लोबल गाँव का देवता-रणेन्द्र “पीजीटी गर्ल्स रेजिडेंशियल स्कूल। प्रिमिटिव ट्राइव्स आदिम जनजाति परिवार की बच्चियों के लिए आवासीय विद्यालय में विज्ञान शिक्षक।”20 इस नौकरी से ख़ुशी के साथ-साथ यह दुःख भी था की आदिवासी इलाके के स्कूल है जहाँ का जीवन कठिन है। “ग्लोबल गाँव का बड़ा देवता है ‘वेदांग’। यह ऊँगली पकड़कर बाँह पकड़ने वाली बात लगती है। यह कम्पनी है विदेशी और नाम रखा है ‘वेदांग’, जैसे प्योर देशी हो। कितना चालू-पूर्जा है इसी से पता चलता है।”21 ग्लोबल गाँव के देवता खुश थे। जो लड़ाई वैदिक युग में शुरू हुई थी, हजार-हजार इन्द्र जिसे अंजाम नहीं दे सके थे, ग्लोबल गाँव के देवताओं ने वह मुकाम पा लिया था। असुर-बिरिजिया, बिरहोर-कोरबा, आदिम जाति-आदिवासी सब मुख्यधारा में शामिल होने ही वाले थे।”22 यही नियत है। वर्तमान आदिवासी समाज की इस वैश्विक दौर में उनका जीवन हमेशा संकटग्रस्त बना रहेगा अगर वे मुख्यधारा में शामिल नहीं होते हैं। क्योंकि अब उनके लिए पहले जैसा जीवनयापन संभव नहीं रहा।

उपन्यास: दौड़- अलका सरावगी- “प्रतिस्पर्धा से प्रतिस्पर्धा की तरफ जाती इस अंधी दौड़ में रिश्ते-नाते, मानवीयता, संवेदना शहर, सपना, लगाव, परम्परा सबका सब अर्थहीन, दकियानूस और बीता हुआ उच्छ्वास भर है। यहाँ रिश्ते बहुत व्यावहारिक, रस्मी और सतही हैं। यहाँ शहर का अर्थ केवल रोजगार में खुलता है। यहाँ स्मृतिया एकदम व्यर्थ हैं और सपने सिर्फ तरक्की से जुड़े हैं। इस बाजार ने वह सबकुछ लील लिया है जो मनुष्य को मनुष्य बने रहने की ताकत देता है।”23

वैश्विक समाज की शिक्षा व्यवस्था – “समाज की तरह शिक्षा में भी वर्गीकरण आता जा रहा था। एम्.बी.ए में लड़के वर्ष भर पढ़ते, प्रोजेक्ट बनाते, रिपोर्ट पेश करते और हर सत्र की परीक्षा में उत्तीर्ण होने को जी तोड़ मेहनत करते। एम्.एम्.एस. में रईस उद्योगपतियों, सेठों के बिगड़े शहजादे एक.आर.आई. कोटे से प्रवेश लेते, जमकर वक्त बरबाद करते और दो की जगह तीन साल में डिग्री लेकर अपने पिता का व्यवसाय सभालने या बिगाड़ने वापस चले जाते।”24

यह भी पढ़ें -  नारी-विमर्श की दृष्टि से 'कौन नहीं अपराधी' उपन्यास में नारी संघर्ष: प्रो. राजिन्द्र पाल सिंह जोश, अनुराधा कुमारी

अखिलेश अपने उपन्यास निर्वासन में कहते हैं- “देश इक्कीसवीं सदी की ओर ले जाया जा रहा था और संसार भूमण्डलीकरण की तरफ। दुनिया एक गाँव बनने के लिए फुदक रही थी। इसी घनचक्कर में हमारे बड़े-बड़े शहरों को रेलों के मार्फत परस्पर सुबह शाम के लिए जोड़ा जा रहा था। ट्रेन राजधानी से राजधानी को, बड़े नगर को बड़े नगर से वाबस्ता कर रही थीं।”25 प्रस्तुत उदाहरणों के माध्यम से हिन्दी भाषा की संप्रेषणीयता और उसके वैश्विक संदर्भ को समझा जा सकता है। हिन्दी भाषा में देश-विदेश में घटित होने वाली घटनाओं अर्थशास्त्र, बाजार, राजनीति और यहाँ तक की 21वीं सदी की धरोहर ‘सूचना प्रौद्योगिकी और बाजार’ से सम्बन्धित शब्दावलियों को हिन्दी भाषा बहुत ही सहजता से स्वीकार कर संप्रेषणीय भाषा के रूप में विकसित हो रही है। बदलते समय, समाज और संस्कृति अर्थात वैश्वीकृत उपभोक्तावादी संस्कृति तथा बाजारीकृत समाज में वैश्विक स्तर पर भारतीय परिवेश में हिन्दी भाषा एक समृद्ध राष्ट्र-भाषा के रूप में विश्व स्तर पर पहुँच रही है। “भूमण्डलीकरण के वर्तमान दौर में बाजार ने हिन्दी का स्वरूप अखिल भारतीय कर दिया है। चेन्नै में कभी हिन्दी-विरोधी और हिन्दी-ओडिगे (हिन्दी भागाओं) का दौर था। इन प्रदेशों में विरोध के फलस्वरूप हिन्दी समाचार का प्रसारण बंद करना पड़ा था, परन्तु आज चेन्नै के अतिरिक्त बंगलूर और हैदराबाद उन शहरों में शामिल हैं जहाँ हिन्दी फ़िल्में अधिक कारोबार कर रही हैं। ‘हिन्दुस्तान’ की सम्पादक मृणाल पांडे कहती हैं- ‘यह परिवर्तन संस्कृति-प्रेरित नहीं है बल्कि ‘बाजार’ इसके लिए जोर लगा रही है।”26 बदलते समय के साथ हिन्दी भाषा में अन्य कई भाषाओँ के शब्द शामिल हुए हैं जिसका स्वरूप हम उपन्यास के उदाहरणों के माध्यम से देख चुके हैं। इन भाषाओ के मिश्रण से हिन्दी भाषा दिन-प्रतिदिन समृद्ध हो रही है। जिस वजह से वह हर भाषा-भाषी लोगों के बीच संप्रेषण का माध्यम बनती जा रही है। हिन्दी भाषा बोलने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढती जा रही है जिसकी वजह वैश्वीकरण है। जिसकी वजह से वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में हिन्दी का स्वरूप बदला है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाषा केवल साहित्य का विषय नहीं है वरन वह हमारी संस्कृति, राष्ट्रीय सद्भाव, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक समता और नैतिक मूल्यों की संवाहक भी है। हमारे देश में हिन्दी एक भाषा ही नहीं, यह एक पूरी संस्कृति की सूचक है, हमारी पहचान है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि वैश्वीकरण के युग में हिन्दी के वैश्विक रूप में बढ़ावा देना हिन्दी भाषा और साहित्य का विकास ही है।

“भारत की सभ्यता संस्कृति और धर्म को देखते हुए अन्य भाषाओँ की भांति हिन्दी में भी कई कोर्स शुरू किये गए हैं। भूमण्डलीकरण के बाद से इसमें तेजी से बदलाव देखने को मिला। खुद अमेरिका में हिन्दी का 45 वर्ष पुराना इतिहास है। आज स्थिति यह है कि वहाँ पर 100 से भी ज्यादा संस्थानों में हिन्दी की पढ़ाई होती है, जो हिन्दी की उपयोगिता में चार चाँद लगा रहे हैं।”27 इस वैश्वीकरण के दौर में ‘बाजार और सूचना प्रौद्योगिकी’ अर्थात ‘इंटरनेट टेक्नोलॉजी’ के विकास के साथ-साथ हिन्दी भाषा जो कि वर्तमान समय में भारतीय समाज की राज्यभाषा के रूप में प्रतिष्ठित है, पूरे विश्व में लोगों के बीच संपर्क भाषा तथा सम्प्रेषण भाषा के रूप में अपना स्थान बना पाने में सफल हो रही है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वतर्मान वैश्विक दुनिया में हिन्दी भाषा के साथ-साथ अन्य भाषा और क्षेत्रीय बोलियों को बढ़ावा मिल रहा है। इंटरनेट के माध्यम से किसी भी भाषा बोली की लिपि में आसानी से लिखा जा सकता है। टेक्नॉलोजी के युग में भारतीय भाषा हिन्दी के अलावा अन्य भाषा के बारे में तो नहीं कह सकते लेकिन यह कहना सोलह आना सच है कि हिन्दी वैश्विक स्तर पर सम्पर्क भाषा के रूप में सर्वत्र व्याप्त हो रही है। आने वाले समय में हिन्दी भाषा-भाषी के बिना विकास की राह अवरुद्ध है।

उपन्यासों में अंग्रेजी और स्थानीय बोलियों का हस्तक्षेप

हिन्दी भाषा प्राचीनकाल से अर्थात जब से अस्तित्व में आयी है। अपनी समाहार शक्ति के कारण कभी भी, कहीं भी कमजोर भाषा के रूप में चरितार्थ नहीं हुई है। बदलते समय, समाज और संस्कृति के बीच होने वाले बदलाव या विकास के साथ हिन्दी भाषा ने अन्य भाषा बोलियों से आने वालें शब्दों को सहजता से हिन्दी रंग में रंग लिया । हिन्दी भाषा अपने इसी गुण के कारण विकसित होती हुई, हिन्दी खडी बोली के रूप में अपना सफर शुरू करके आज भारत राष्ट्र की एक समृद्ध और विश्व स्तर पर ज्यादा से ज्यादा लोगों द्वारा बोली समझी जाने वाली भाषा बन गई है। “सोवियत संघ रूस के विघटन के बाद विश्व में तेजी से अमेरिकी साम्राज्यवाद ने विश्व बाजार के नाम पर पूँजीवाद के नये रूप की परिकल्पना की। दरअसल भूमण्डलीकरण, उदारीकरण के नाम पर पूँजीवाद का विश्व बाजार बनाने का लक्ष्य था जो कि अब पूरा होता नज़र आ रहा है। जिसके चलते नव विकसित, अर्थविकसित और पूर्णत: विकसित बाजार में पूँजीवाद का व्यापार-प्रवाह किया जा सके। उदारीकरण की यह छद्म तानाशाही हमसे न केवल हमारी मनुष्यता छीनती है बल्कि हमारी संवेदना का अपहरण करके हमें कुण्ठित बना रही है। बाजार में आज हर चीजें या तो बिक रही है या तो जीवित रहने के लिए बदल रही है। उन्हीं बदलती चीजों में से है एक हमारी मातृभाषा हिन्दी भी है। हिन्दी को बदलना था क्योंकि उसे जीवित रहना था। वरिष्ठ साहित्यकार राजेन्द्र यादव का कहना है कि “भाषा कभी बनती-बिगडती नहीं बल्कि विकसित होती है अर्थात हमारी हिन्दी विकसित हो रही है। उसमें आत्मसात करने की भावना व्याप्त है।”28 वैश्वीकृत समाज में हिन्दी भाषा और साहित्य वैश्विक स्तर पर अपना परचम लहराने में सफल हुई है।

21वीं सदी बाजार और सूचना प्रौद्योगिकी के यंत्रों के माध्यम में सूचनाओं का संसार बन गया है। ऐसे समाज में तीसरी दुनिया के देशों पर अपना साम्राज्य स्थापित करने के लिए किसी भी देश की भाषा को जानना समझना आवश्यक हो जाता है। क्योंकि भाषा ही वह शक्ति है किसी देश को मुकम्मल रूप से जानने और समझने के लिए। भाषा के माध्यम से हम किसी देश के समाज और उसकी संस्कृति को गहराई से जान समझ सकते हैं। हिंदी भाषा में आत्मसात करने की अद्भुत शक्ति है जिसकारण आरम्भ से लेकर वर्तमान समय तक लगातार विकसित तथा समृद्ध होती रही है। वैश्वीकरण की घटना भारतीय समाज में घटित होने वाली एक ऐतिहासिक घटना है जिसने पूरे भारतीय समाज को ‘ग्लोबल’ बना दिया है। वैश्वीकरण के माध्यम से पूरे विश्व में बिना किसी रुकावट के पूँजी, श्रम, ज्ञान, वस्तु एवं विचारों का भी आवागमन सहज हो पाया है। इंटरनेट और सूचना यंत्रो के माध्यम से वास्तविक समाज आभासी दुनिया का निर्माण कर रहा है। इंटरनेट की भाषा मुख्यत: अंग्रेजी है। अंग्रेजी भाषा को आधार बनाकर इन सूचना यंत्रो का विकास सम्भव हो पाया है लेकिन धीरे-धीरे बाजार और सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से भारतीय भाषा हिन्दी के साथ-साथ उसकी क्षेत्रीय बोलियों को भी महत्त्व मिलने लगा है। भारतीय भाषा हिन्दी और हिन्दी की बोलियों के आधार पर कम्प्यूटर देवनागरी लिपि की ‘स्क्रिप्ट’ विकसित कर ‘की-बोर्ड’ तैयार हो चुके हैं। बाजार और व्यापार को अत्यधिक बढ़ावा देने हेतु भारतीय भाषाओँ को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। रही बात हिन्दी के वैश्विक स्वरूप का तो वह बिना किसी व्यवधान के एक समृद्ध भाषा बन रही है। हिन्दी विदेशी भाषा के शब्दों को बहुत ही प्रेम के साथ आत्मसात करती हुई विकसित हो रही है।

कोई भी भाषा अपने समाज और संस्कृति की पहचान होती है। जिसके माध्यम से कोई भी उस देश के समाज और संस्कृति के साथ उस देश की वास्तविकता के सच से वाकिफ हो सकता है क्योंकि भाषा का अस्तित्व और उसकी अस्मिता उस देश के अस्तित्व और अस्मिता की पहचान होती है। अपनी भाषा के बिना कोई भी देश अपने सहज अस्तित्व को खो सकता है, जिससे वैश्विक दौर में कोई पहचान कायम नहीं हो पाएगा। “भाषायी अस्मिता का तात्पर्य है- भाषा बोलने वालों की अपनी पहचान। भाषा की इसी पहचान का सम्बन्ध सत्ता से है जो हमें ताकत देता है। यह भी कहा गया है कि भाषा की पहचान का गहरा सम्बन्ध ‘लिपि’ की पहचान से जुड़ा है क्योंकि वे एक संस्कृति के दौरान विकसित हुई हैं।”29 इस प्रकार हम देखते हैं कि वैश्वीकरण का सकारात्मक पक्ष शक्ति देता है। “भूमण्डलीकरण के मूल में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का उदात्त भारतीय दर्शन तमाम विश्व को एक परिवार के रूप में रहने की प्रेरणा देता है मगर ये दर्शन यह कहीं नहीं कहता कि अपनी पहचान को विलीन कर दो, अपनी जड़ों को खो दो या अपनी संस्कृति की मर्यादा को भूल जाओ। इसमें सीधे-सीधे अपने स्वाभाविक स्वरूप को सहज रूप से बाकी दुनिया से जोड़ने का सन्देश निहित है।”30

वैश्वीकरण के इस दौर में विश्व की लगभग सारी भाषाएँ टेक्नोलॉजी से जुड़ रही हैं। वर्तमान समय में किसी भी भाषा को जानने समझने के लिए किसी स्थानीय लोगों से सम्पर्क करने की जरूरत नहीं है, इंटरनेट के माध्यम से सारी भाषाएँ और उससे सम्बंधित बोलियाँ सूचना प्रौद्योगिकी यंत्रों के माध्यम से विश्व स्तर पर सहज रूप से उपलब्ध हैं किसी भाषा को जानने और समझने के लिए देश के किसी भी कोने से सूचना आसानी से प्राप्त की जा सकती है। “इक्कीसवीं सदी बीसवीं सदी से भी ज्यादा तीव्र परिवर्तनों वाली तथा चमत्कारिक उपलब्धियों वाली सदी सिद्ध हो रही है। ‘विज्ञान एवं तकनीक’ के सहारे पूरी दुनिया एक वैश्विक गाँव में तब्दील हो रही है और स्थलीय व भौगिलिक दूरियाँ अपनी अर्थव्यवस्था खो रही हैं। वर्तमान विश्व व्यवस्था आर्थिक और व्यापारिक आधार पर ध्रुवीकरण तथा पुनर्संगठन की प्रक्रिया से गुजर रही है। ऐसी स्थित में विश्व की शक्तिशाली राष्ट्रों के महत्त्व का क्रम भी बदल रहा है। यदि अठारहवीं शताब्दी आस्ट्रिया और हंगरी के वर्चस्व की रही है तो उन्नीसवीं सदी ब्रिटेन और जर्मनी के वर्चस्व का प्रमाण देती हैं और बीसवीं सदी में अमेरिका और सोवियत संघ के प्रभुत्व के रूप में विश्व विख्यात है। आज स्थित यह है कि इक्कीसवीं सदी, विश्व समुदाय की मानें तो भारत और चीन की है। भारत और चीन विश्व की सबसे तेजी से उठने वाली अर्थव्यवस्था में से है। क्योंकि इन दोनों देशो के पास अकूत प्राकृतिक सम्पदा है तथा युवा मानव संसाधन है। जब किसी राष्ट्र को विश्व समुदाय में अपेक्षाकृत अधिक महत्त्व और स्वीकृति मिलती है तो उसके प्रति अपनी निर्भरता महत्त्वपूर्ण हो जाती है और वह राष्ट्र भी स्वयं महत्त्वपूर्ण बन जाता है। भारत की विकाशमान अंतर्राष्ट्रीय स्थिति हिन्दी के लिए वरदान है।”31

भूमण्डलीकरण के दौर में भारत का आर्थिक माहौल बदलने के साथ ही यहाँ के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को भी प्रभावित किया है। विदेशी फिल्में भारतीय परिवेश में और भारतीय फ़िल्में विदेशी परिवेश में भाषा और साहित्य खानपान वेशभूषा आचार-व्यवहार सब आपस में घुलने मिलने लगे, लेकिन भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी और उसके साहित्य इस माहौल का क्या असर हुआ है? किस तरह वैश्वीकृत समाज उसे प्रभावित कर रहा है आदि प्रश्नों की परताल करते हुए आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल का कहना है कि-“भूमण्डलीकरण ने भारतीय जीवन को गहरे में जाकर प्रभावित किया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हिन्दी ख़त्म हो जाएगी और अंग्रेज़ी उसका स्थान ग्रहण कर लेगी।”32

हिन्दी उपन्यासों में समाज में व्याप्त अग्रेंजी और अन्य हिन्दी की क्षेत्रीय बोलियों का प्रभाव को निम्न उदाहारणों के माध्यम से समझ सकते हैं। अलका सरावगी का उपन्यास ‘एक ब्रेक के बाद’ का एक उदाहरण है“अब यह दुनिया असली रही कहाँ? कंप्यूटर की ‘वर्चुअल रियेलिटी’ ही जिन्दगी की सच्चाई है।”33 अंग्रेजी भाषा का सहज प्रयोग।

सत्यनारायन पटेल के उपन्यास-‘गाँव भीतर गाँव’ में स्थानीयता की झलक- “कुछ धनपाशु, सफेद हाथी, और लोकतंत्र के गिद्ध या उनकी आज्ञा के पालन में उनके गुलाम, मातहत उन्हें खरीदेंगे। चक्की में पिसवायेंगे। थाली में रैंदेंगे-गूंथेंगे। तवे पर, चुल्हे पर और गैस की आंच पर सकेंगे। खौलते तेल में तलेंगे। मालिक की थाली में परोसेंगे। मालिक अपने गंदे-संदे दांतों से चबायेंगा। लेकिन मुक्ति वहाँ भी नहीं मिलेगी। खवखड़ी आंतें कतरा-कतरा रस, ऊर्जा और सारा सत्व लेंगी। दानों को आम-अवाम की तरह निचोड़ लेंगी। आम-अवाम से दाने लोकतंत्र के गिद्धों की हगार बन जायेंगे। हगार फिर खाद का दाना, फिर अनाज का दाना, फिर वही पूरा चक्र। उफ़! इस चक्र-कुचक्र से मुक्ति चाहिए।”34 प्रस्तुत उदाहरण में ग्रामीण भाषा का ठेठपन का प्रयोग दृष्टव्य है।

21वीं सदी की उपन्यास लेखिका ‘महुआ मांझी’ का उपन्यास-‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ में वैज्ञानिक शब्दावली का उदाहरण- “विकिरण जीवित प्राणी के जीन के साथ तो छेड़छाड़ करता ही है, यह स्त्री पुरुष की जनन क्षमता को भी प्रभावित करके उन्हें बाँझ बना देने की ताकत रखता है। जो प्राणी विकिरण या रेडियोंधार्मिता या रेडिएशन के जितना निकट सम्पर्क में आता है, वह उतना अधिक प्रभावित होता है। विकिरण एक ही सेल में लाखों म्यूटेशन पैदा कर सकता है। मनुष्य के सेल में करीब 3.5 खरब (बिलियन) डी.एन.ए. के जोड़े होते हैं।”35 प्रस्तुत उदाहरण में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग दृष्टव्य है।

इसी क्रम में संजीव के वैज्ञानिक उपन्यास- ‘रह गई दिशाए इसी पार’ में अंग्रेंजी शब्दों का प्रभाव व्यापार और बाजार की तुलना को भारतीय और विदेशी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है “इंसान के बनने की वैज्ञानिक प्रक्रिया- “हाइड्रोजन और आक्सीजन मिलकर बनता है पानी। नाइट्रोजन, कार्बन से मिलकर बना ‘एमीनो एसिड।’ माने केमिस्ट्री की भाषा में आदिम है ‘इलेक्ट्रान।’ अमीनो एसिड का विकसिततम रूप हुआ इंसान। और इस आदमी की लिप्सा का कोई अंत नहीं। वह लड़ाईयां मोल लेता है, पैंतरे चलता है, छल करता है। उसे जीत चाहिए। पूरे ब्रह्माण्ड पर जीत। ब्रह्माण्ड का अंत है पर इस मनुष्य की लिप्सा का कोई अंत नहीं।”36 प्रस्तुत उपन्यास में वैज्ञानिक शब्दावली का प्रयोग दृष्टव्य है।

काशीनाथ सिंह का उपन्यास ‘काशी का अस्सी– स्थानीयता और भाषा के देशीपन की जीवन्तता की अद्भुत झांकी प्रस्तुत की गई है। उदाहरण दृष्टव्य है- “खडाऊं पहनकर पाँव लटकाए पान की दुकान पर बैठे तन्नी गुरु से एक आदमी बोला-‘किस दुनिया में हो गुरु! अमरीका रोज-रोज आदमी को चन्द्रमा पर भेज रहा है और तुम घंटे-भर से पान घुला रहे हो?’ मोरी में ‘पिच’ से पान की पीक थूककर गुरु बोले- देखौ! एक बात नोट कर लो ! चन्द्रमा हो या सूरज- भोसड़ी के जिसको गरज होगी, खुदै यहाँ आएगा।37 प्रस्तुत उदाहरण में ठेठ देशीपन बनारसी संवाद दृष्टव्य है।

“ग्लोबल गाँव का बड़ा देवता है ‘वेदांग’। यह ऊँगली पकड़कर बाँह पकड़ने वाली बात लगती है। यह कम्पनी है विदेशी और नाम रखा है ‘वेदांग’, जैसे प्योर देशी हो। कितना चालू-पूर्जा है इसी से पता चलता है।”38

प्रस्तुत उदाहरणों में एक ही संवाद में अंग्रेजी, हिन्दी और देशी भाषा के मुहावरे का प्रयोग बहुत ही सहजता से किया गया है। उदाहरण है- “आपको पता नहीं दुनिया कितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, अब घर्म,दर्शन और अध्यात्म जीवन में हर समय रिसने वाले फोड़े नहीं हैं| आप सरल मार्ग के शिविर में कभी जा कर देखिए|”39 आदिवासी समाज की झलक -“जाम्बीरा और मेन्जारी दोनों एक-दूसरे को पसंद करते हैं लेकिन मेन्जारी के पिता ने बेटी की शादी का वधू मूल्य इतना ज्यादा रखा है जिसे अभी जाम्बीरा अदा करने में अपने आपको समर्थ नहीं पाता है । वह सोचता है कि लड़की को भगा कर शादी कर लेना ही ज्यादा ठीक रहता है। लेकिन “जाम्बीरा ऐसा नहीं करेगा। समाज में बड़ी बदनामी होगी। उम्र भर सुनने पड़ेंगे लोगों के ताने । कहेंगे- हट्टा कट्टा मर्द और गोनोंग तक जुटा नहीं पाया। भाग गया लड़की को लेकर । ढेरों नुकसान करा दिया बेचारे लड़की के बाप का…”40

यह भी पढ़ें -  इक्कीसवीं सदी की पहले दशक की कहानियाँ और मुस्लिम जीवन

शरद सिंह का उपन्यास कस्बाई सिमोन का उदाहरण दृष्टव्य है- “शिवा भी गया था ? मुझ पर घड़ों पानी पड़ गया । शिवा रितिक का लंगोटिया मित्र है लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि उसके सामने लंगोट लगाकर ही घूमो। क्या आवश्यकता थी उसे साथ ले जाने की? अब मैं उसका सामना कैसे करुँगी? उफ़ ! इट्स डिस्गस्टिंग !”41 हिन्दी लेखिका अलका सारावगी का कहना है –“यह सच है की अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है। लेकिन साथ ही भाषा के स्तर पर एक नयी शब्दावली का भी गठन हो रहा है। जो आज के जीवन यथार्थ को पकड़ने में मददगार हो रही है और इस तरह हिन्दी एक समृद्ध भाषा बन रही है।”42

वैश्वीकरण के इस युग में यह कहना गलत नहीं होगा कि हिन्दी भाषा को रोजगार से जोड़कर ही हिन्दी भाषा की उन्नति के साथ-साथ हिन्दी के प्रति लोगों की मानसिकता को सहजता से बदला जा सकता है। वैश्वीकृत उपन्यासों का शिल्प पक्ष भाषा की गुणवत्ता के सन्दर्भ में- “भाषा पर किसी भी बहस की शुरुआत करने से पहले यह जान लेना जरुरी है कि वह एक सामाजिक वस्तु है। मानसिक संकल्पना के साथ-साथ वह एक सामाजिक यथार्थ भी है; व्याकरणिक इकाई होने के साथ-साथ वह संस्थागत प्रतीक भी है और सम्प्रेषण का अन्यतम उपकरण होने के साथ-साथ वह हमारी सामाजिक अस्मिता का एक सशक्त माध्यम भी है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि हर भाषा एक निश्चित समुदाय के व्यक्तियों को भावना, चिन्तन और जीवन-दृष्टि के धरातल पर एक दूसरे के नजदीक लाती है और उन्हें आपस में जोड़ती और बांधती है।”43

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि समय बदला, समाज बदला और समाज की झांकी प्रस्तुत करने वाला साहित्य और साहित्य की मान्यताएं भी बदली। बदलते समय और समाज के साथ साहित्य का भी विकास होता रहा है जिसके माध्यम से समाज का सच यथार्थ के धरातल पर अवतरित हुआ । किसी भी समाज की मुकम्मल जानकारी प्राप्त करने के लिए तथ्यों के संकलन से कहीं ज्यादा उस समय का साहित्य समाज की सच्चाई का बहुत ही संवेदनशील तरीके से गहराई से हमारे सामने दिखाने में सफल होता है।

21 सदी के हिन्दी उपन्यासों में चित्रित समाज बाजार और सूचना प्रौद्योगिकी से निर्मित समाज की देन है। जिसकी झलक हमें साहित्य के माध्यम से प्राप्त होती है। 21 सदी के उपन्यासों में बाजार और उपभोक्तावादी संस्कृति के प्रभाव की वजह से ‘हिंग्लिश भाषा’के शब्दों का प्रयोग अत्यंत तीव्र गति से हो रहा है। हिन्दी भाषा और साहित्य आने वाले समय में अपना परचम लहराएगा।

इंटरनेट की दुनिया में हिन्दी भाषा और साहित्य

21वीं सदी के दौर में वैश्वीकरण के मुख्य वाहक के रूप में ‘बाजार और सूचना प्रौद्योगिकी’ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ‘सूचना-प्रौद्योगिकी’ का सीधा सम्बन्ध भाषा से है। बिना किसी भाषा के माध्यम से ‘सूचना प्रौद्योगिकी’ के यंत्रों का प्रयोग नहीं किया जा सकता है। क्योंकि सूचना का जंजाल भाषा की ही देन है। भाषा के माध्यम से ही संवाद स्थापित किए जा सकते हैं। वर्तमान दुनिया वर्चुअल रिअलिटी सूचना के आधार पर गतिशील हो संचालित हो रही है। बिना सूचना के वर्तमान दुनिया में गतिशीलता नहीं आ सकती है। किसी भी देश की गतिशीलता के लिए अर्थात विकसित होने के लिए आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक दृष्टि से सक्रिय भूमिका अदा करने का काम वह सूचना और भाषा के माध्यम से ही सम्भव है। वर्तमान दुनिया शारीरिक कम मानसिक कार्य ज्यादा मात्रा में करने के प्रति सक्रिय हो रही है जिसका एक मात्र आधार भाषा का ज्ञान है। हिन्दी भाषा और साहित्य इंटरनेट और कंप्यूटर के माध्यम से विश्व के कोने-कोने पहुँचकर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। भारतीय साहित्य हो या किसी भी देश या भाषा का साहित्य हो, अब वह किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित न रहकर पूरे विश्व स्तर पर ‘वर्चुअल दुनिया’ में उपलब्ध हो रहा हैं । जिसे कहीं से भी ऑनलाइन प्राप्त किया जा सकता है। इंटरनेट की दुनिया में ‘हिन्दी भाषा और साहित्य’ का भविष्य उज्ज्वल है। “इक्कीसवीं सदी कई अर्थों में विकास की सदी है। सूचना-प्रौद्योगिकी ने तो इस सदी में सबसे अधिक विकास किया है। आज विश्व को जितना सबल, सुलभ, समुन्नत और सशक्त बनाने में अन्य संसाधनों का महत्त्व है, उससे कहीं अधिक ‘सूचना प्रौद्योगिकी’ का महत्त्व है। उसके माध्यम से ही मानव को एक-दूसरे के निकट लाने का काम किया है। जिससे उसकी भौगोलिक दूरियां ही समाप्त नहीं हुई, बल्कि उसकी मानसिकता में भी परिवर्तन आया है। अब पहले से भी अधिक उदार, ज्ञानसम्पन्न, सहयोगी, सभ्य, समन्वयी, संकीर्णता से मुक्त, सुविधा सम्पन्न और रचनाशील प्रवृत्ति से युक्त है। ‘सूचना प्रौद्योगिकी’ भाषा आधारित होती है, इसलिए भाषा और सूचना प्रौद्योगिकी का अधिक घनिष्ठ सम्बन्ध है।”44 वर्तमान दुनिया में सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से भाषा का विकास तीव्र गति से हो रहा है। इंटरनेट की दुनिया में हिन्दी भाषा वैश्विक स्तर पर संवाद स्थापित करती हुई सम्प्रेषणीय बन रही है। “हिन्दी समकालीन भूमण्डलीकरण के दौर में तेजी से एक सशक्त, सर्वत्र उपस्थित विश्वभाषा बन चली है। उसके अनेक स्तर, अनेक रूप, अनेक शैलियाँ हैं और एक नयी अन्तरंग किस्म की बहुलता है। मुक्त बाजार, ग्लोबल, जनसंचार, तकनीकी क्रांति और हिन्दी क्षेत्रों के विराट उपभोक्ता बाजार ने हिन्दी को एक नयी शिनाख्त और ताकत दी है। संस्कृतवाद का दामन छोड़ बोलियों को अपने में समाकर उर्दू से दोस्ती स्थापित कर अंग्रेजी से सहवर्ती भाव में विकास पाती हिन्दी अपना ‘ग्लोबल ग्लोकुल’ बना रही है।”45 वर्तमान दुनिया में हिन्दी कथा-कहानी या कहे कि कविता तक ही सीमित होकर नहीं रह गई है वह विश्व स्तर पर संवाद स्थापित कर चहुमुखी अपने समाज और संस्कृति को हिन्दी भाषा में व्याप्त आकंठ ज्ञान का प्रसार-प्रचार कर रही है। “जब हम हिन्दी साहित्य की आज बात करते हैं, तब उसे खड़ी बोली में रचित काव्य-कृतियों तक ही सीमित नहीं करते। इसमें प्रसाद, पन्त, निराला, प्रेमचन्द, अज्ञेय, मुक्तिबोध, आदि की रचनाओं के साथ-साथ अवधी, ब्रज, मैथिली आदि बोलियों के साहित्यकार यथा जायसी, सूर, तुलसी, विद्यापति, आदि की कृतियों को भी समाहित करने में संकोच नहीं करते। इन विभिन्न बोलियों के माध्यम से अभिव्यक्ति होने वाला साहित्य एक है क्योंकि इनकी रचना करने वाले हिन्दी भाषाई समाज की जातीय अस्मिता एवं साहित्यिक चेतना एक है।”46 हिन्दी भाषा,समाज और साहित्य का यही सामंजस्य अन्य किसी भाषा, समाज और साहित्य से उसे श्रेष्ठ बनाता है| “वैश्वीकरण की इस प्रक्रिया में सम्पूर्ण विश्व एक परिवार के रूप में निकट आया है। ‘बहु राष्ट्रीय’ कम्पनियों का निर्माण हुआ है। इन कम्पनियों से वस्तुओं का उत्पादन बड़ी तेजी के साथ हो रहा है। इन वस्तुओं को बेचने के लिए बहुत बड़ा उपभोक्ता वर्ग चाहिए। यह उपभोक्ता वर्ग भारत में दिखाई दे रहा है। इसीलिए वे भारत में आकर अपने माल की खपत के लिए विज्ञापनों द्वारा वस्तुओं का प्रचार-प्रसार करना चाहते हैं। तब उनके सामने यह प्रश्न उपस्थित हो रहा है कि विज्ञापन किस भाषा में दें। अब वे हिन्दी भाषा की अनिवार्यता को महसूस कर रहे हैं, क्योंकि भारत के 80 फीसदी से भी अधिक लोग हिन्दी भाषा बोलते और समझते हैं। इसलिए बहु राष्ट्रीय कम्पनियों ने विज्ञापन के लिए हिन्दी भाषा को चुना है। इसका और भी एक कारण यह है कि हिन्दी दुनिया की सबसे अधिक सहज, सरल, एवं लचीली भाषा है।”47 जिस कारण ‘वर्चुअल दुनिया’ में आने वाले तकनीकी शब्दों को आत्मसात करती हुई आगे बढ़ रही है। अन्य भाषा बोलियों से आने वाले शब्दों को भी अपने आपमें सहजता से स्वीकार करती हुई समृद्ध हो रही है। “भूमण्डलीकरण के औजार बाजार और मीडिया ने न सिर्फ हिन्दी को बल्कि अपनी देहरी तक सीमित अन्य भाषाओँ को भी विस्तार दिया है। प्रौद्योगिकी ने इसे आसान बनाया है। एक-बार फिर भाषा निर्णायक रूप में बदल रही है। हम एक ऐसे ‘संक्रमण बिन्दु’ पर खड़े हैं, जहाँ से हमें भाषा की ताकत और कमजोरियों के सवाल से भी दो चार होना होगा। मीडिया में हिन्दी के बढ़ावें को देखकर जो लोग खुश हो रहे हैं, उन्होंने स्थिति पर गहराई से विचार ही नहीं किया है। इसका अर्थ है, जनता को लगातार एक ऐसी भाषा में बनाएं रखना, जिसमें ज्ञान नहीं, दैनिक सूचनाएँ ही अधिक हो, ज्ञान का केन्द्रीयकरण इस मायने में अंग्रेजी भाषा के पक्ष में और अधिक हुआ है।”48

निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि “भूमण्डलीकरण के सन्दर्भ में यह भ्रम फैलाया जाता है कि यह मात्र आर्थिक प्रक्रिया है। दरअसल यह बाजार और संचार की मिली-जुली प्रक्रिया से निर्मित है। इसलिए भूमण्डलीकरण के परिणाम भी मिले-जुले ही रहेंगे। बाजार की जरूरतों ने यातायात और संचार साधन में क्रांतिकारी परिवर्तन किए और भौगोलिक दूरियां समेट दीं। दूसरी तरफ संचार माध्यम ने ग्लोबल विलेज, ग्लोबल संस्कृति की संकल्पना को जन्म दिया। यह नया साइबर संसार बस एक क्लिक से जुड़ गया है। भाषा इस साइबर क्रांति का अभिन्न अंग है।”49 सामान्य रूप से भाषा, साहित्य और संस्कृति– ये तीनों अपने आप में स्वतन्त्र स्वायत्त संस्थान के रूप में जाने जाते हैं।

समकालीन समय में अब हिन्दी केवल साहित्य की भाषा नहीं रही, बल्कि उसका चौमुखी विकास हो रहा है। हिन्दी भाषा अंग्रेजी भाषा की भांति अपना विस्तार कर रही है। हिन्दी भाषा आज साहित्य और विचार की भाषा मात्र का माध्यम न होकर सांस्कृतिक और सामाजिक विकास की भी भाषा है। हिन्दी अगर आज देश के विकास की गति के साथ विकासशील से विकसित होने की ओर तीव्र गति से बढ़ रही है, तो वह सूचना क्रांति रूपी मीडिया की ही देन है। जिसके माध्यम से हिन्दी भाषा का तेवर काफी हद तक बदला है। इस बात को स्वीकार करने में किसी को कोई गुरेज नहीं होनी चाहिए कि हिन्दी भाषा को वैश्विक स्तर पर लाने में समकालीन मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका रही है। अंतत: भाषा समाज और संस्कृति की महत्ता को नेल्सन मंडेला के शब्दों में कहें तो ‘जब किसी को कोई बात उस भाषा में बताते हैं जिसे वह जानता है तो कथन उसके मस्तिष्क तक पहुँचता है और जब उसकी अपनी भाषा में बताते हैं तो संवाद दिल को छू जाता है।’ वर्तमान दुनिया में हिन्दी भाषा बहुत ही समृद्ध हो रही है लेकिन मानवीय संवेदना और सहजता की भांति भाषा की भी सहजता और उसकी संवेदना दिन प्रतिदिन घटती जा रही है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है। वैश्वीकृत समाज की बाजारूभाषा में मरती सम्वेदना को ‘कुँवर नारायण’ की कविता “भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में कविता” में रेखांकित बिम्ब!

एक भाषा जब सूखती

शब्द खोने लगते अपना कवित्त

भावों की ताजगी

विचारों की सत्यता

बढ़ने लगते लोगों के बीच

अपरिचय के उजाड़ और खाइयाँ”50

इस प्रकार हिन्दी भाषा मात्र एक भाषा या एक संवाद का माध्यम ही नहीं है बल्कि वह हम भारतीयों की पहचान है, हमारा अस्तित्व और हमारी शान है। वैश्वीकरण के इस दौर में बाजार और सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से इंटरनेट की दुनिया में हिन्दी भाषा का प्रवेश उसके उज्ज्वल भविष्य का सूचक है। स्वदेश सिंह का कथन सही प्रतीत होता है कि “इंटरनेट और मोबाइल के दौर में हिन्दी और भी तेजी से उभर कर सामने आई है, क्योंकि अब तो तकनीक और भी सस्ती हुई है, साक्षरता दर और शहरीकरण भी पहले के मुकाबले काफी बढ़ा है। बाजार तो ‘सप्लाई और डिमांड’ पर चलता है। हिन्दी की डिमांड तेजी से बढ़ी है तो विभिन्न माध्यमों से हिन्दी का प्रसार भी तेजी से बढ़ा है।”51 इस प्रकार इंटरनेट की दुनिया में हिन्दी भाषा और साहित्य विश्व स्तर पर पहुँच देश के विकास में अपना योगदान दे रहा है।

संदर्भ-सूची:

  1. संपादक, वर्मा कल्पना,भूमण्डलीकरण और हिन्दी,लोकभारती,प्रकाशन-इलाहाबाद-पृ. सं.142
  2. संपादक, वर्मा कल्पना,भूमण्डलीकरण और हिन्दी,लोकभारती,प्रकाशन-इलाहाबाद-पृ. सं.154
  3. दैनिक जागरण समाचार पत्र (23फरवरी2018)-हरीश बडथ्वाल-लेख-‘स्वदेशी भाषाओं की अनदेखी’ पेज-8)
  4. संपादक, वर्मा कल्पना,भूमण्डलीकरण और हिन्दी,लोकभारती,प्रकाशन-इलाहाबाद-पृ. सं.168
  5. दैनिक जागरण समाचार पत्र (23फरवरी2018)-हरीश बडथ्वाल-लेख-‘स्वदेशी भाषाओं की अनदेखी’ पेज-8)
  6. संपादक, वर्मा कल्पना,भूमण्डलीकरण और हिन्दी,लोकभारती,प्रकाशन-इलाहाबाद-पृ. सं.42
  7. वहीं पृष्ठ सं.148
  8. संपादक, वर्मा कल्पना,भूमण्डलीकरण और हिन्दी,लोकभारती,प्रकाशन-इलाहाबाद-पृ. सं. 151
  9. लेख-‘इन्टरनेट की दुनिया में हिन्दी’-घर्मेन्द्र प्रताप सिंह -जनसत्ता-25 अगस्त 2015)
  10. लेख-‘इन्टरनेट की दुनिया में हिन्दी’-घर्मेन्द्र प्रताप सिंह -जनसत्ता-25 अगस्त 2015)
  11. लेख-‘हिन्दी हैं हम, परिशिष्ट, दैनिक भास्कर, 14 सितम्बर-2011
  12. महिपाल सिंह, देवेन्द्र मिश्र, विश्व बाजार में हिन्दी- पृ. सं.190)
  13. डॉ शैलजा पाटील, वैश्विकता के संदर्भ में हिन्दी- पृ.सं.30
  14. डॉ.शैलजा पाटील, वैश्विकता के सन्दर्भ में हिन्दी- पृ.सं.51
  15. डॉ.शैलजा पाटील, वैश्विकता के सन्दर्भ में हिन्दी- पृ.52
  16. काशीनाथ सिंह, काशी का अस्सी, पृ.सं.34
  17. अलका सरावगी, एक ब्रेक के बाद पृ.सं. 10
  18. अलका सरावगी, एक ब्रेक के बाद पृ.सं. 13
  19. अलका सरावगी, एक ब्रेक के बाद पृ.सं. 209
  20. रणेन्द्र, ग्लोबल गाँव का देवता पृ. सं. 7
  21. रणेन्द्र, ग्लोबल गाँव का देवता पृ. सं.80
  22. रणेन्द्र, ग्लोबल गाँव का देवता पृ. सं.100
  23. धीरेन्द्र अस्थाना-लेख-बाजार में खड़े रिश्ते, दौड़ उपन्यास के परिशिष्ट से,
  24. ममता कालिया, दौड़, पृ. सं. 22
  25. अखिलेश, निर्वासन, पृ. सं. 100
  26. अमित कुमार सिंह, भूमण्डलीकरण और भारत, पृ. सं. 99
  27. सम्पादक-कल्पना वर्मा, भूमण्डलीकरण और हिन्दी, पृ. सं.135-36
  28. (ग्लोबलाइजेशन के दौर में ग्लोबल होती हिंदी ऑनलाइन)
  29. सम्पादक-विमलेश कान्ति वर्मा, भाषा साहित्य और संस्कृति, मालतीओरियंट ब्लैकस्वान प्राइवेट लिमिटेड नई- दिल्ली, पृ. सं. 45-46
  30. सम्पादक-विमलेश कान्ति वर्मा, भाषा साहित्य और संस्कृति, मालतीओरियंट ब्लैकस्वान प्राइवेट लिमिटेड नई- दिल्ली, पृ. सं.433
  31. सम्पादक-कल्पना वर्मा, भूमण्डलीकरण और हिन्दी, पृ. सं.168
  32. http://www.bbc.com/hindi/india/2012/120912globlisation_hindi_akd
  33. अलका सरावगी, एक ब्रेक के बाद पृ.सं.15
  34. सत्य नारायण पटेल, गाँव भीतर गाँव पृ.सं. 9-10
  35. महुआ मांझी, मरण गोड़ा नीलकंठ हुआ पृ. सं. 160
  36. संजीव, रह गई दिशाए इसी पार, पृ.सं.114
  37. काशीनाथ सिंह, काशी का अस्सी, पृ. सं. 11
  38. रणेंद्र,ग्लोबल गाँव के देवता पृ.सं. 80
  39. ममता कालिया दौड़ पृ. सं. 48
  40. महुआ माझी, मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ पृ. सं. 29
  41. शरद सिंह, कस्बाई सिमोन पृ सं. 128
  42. http://www.bbc.com/hindi/india/2012/120912globlisation_hindi_akd
  43. डॉ.रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव,भाषाई अस्मिता और हिन्दी, वाणी प्रकाशन- दिल्ली-32 प्रथम संस्करण-1992 पृ. सं. 17
  44. सम्पादक-कल्पना वर्मा, भूमण्डलीकरण और हिन्दी, पृ. सं. 331
  45. सम्पादक-कल्पना वर्मा, भूमण्डलीकरण और हिन्दी, पृ. सं.151
  46. डॉ.रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव,भाषाई अस्मिता और हिन्दी, वाणी प्रकाशन- दिल्ली-32 प्रथम संस्करण-1992 पृ. सं. 18
  47. प्रो. डॉ.अम्बादास देशमुख, वैश्वीकरण के परिप्रेक्ष्य में भाषा और साहित्य, पृ.सं.201
  48. www.Abhivyakti-hindi.org- इन्टरनेट की दुनिया में हिन्दी का भविष्य- भास्कर जुयाल-
  49. सम्पादक-कल्पना वर्मा, भूमण्डलीकरण और हिन्दी, पृ. सं. 159
  50. http://www.hindisamay.com/content/3047/1/कुँवर-नारायण-कविताएँ-भाषा-की-ध्वस्त-पारिस्थितिकी-में
  51. दैनिक जागरण,23 अक्टूबर-2018, पृ.सं.09

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.