पर्यावरण चेतना के मुखर और प्रखर स्तंभ , गाँधीवादी डा. सुंदरलाल बहुगुणा का जन्म 9 जनवरी 1927 को उत्तराखण्ड के टिहरी जिले में मरोडा नामक स्थान पर हुआ था । शुक्रवार 21 मई 2021 को दोपहर लगभग 12 बजे  एम्स ऋषिकेश में , जहाँ वह कोरोना संक्रमित होकर 8 मई को भर्ती हुए थे , उन्होंने  94 वर्ष की आयु में इस नश्वर देह को त्याग दिया ।
उनके जीवन का प्रमुख लक्ष्य पर्यावरण सुरक्षा रहा जिसके लिए वह आजीवन प्रयत्नशील रहे । वृक्षों की सुरक्षा के लिए चलाया गया उनका 
’चिपको आंदोलन ’ वृक्ष संरक्षण की दिशा में एक अद्वितीय मुहीम के रूप में विश्व भर में जाना और सराहा गया । इस आंदोलन में पर्वतीय महिलाएं उनकी विशेष सहयोगी रही । यह आंदोलन उन्होंने 1970  में गौरा देवी और अन्य महिलाओं के सहयोग से आरंभ किया गया था । 27  मार्च 1974 को चमोली जिले के गाँवों की महिलाएं ठेकेदार के आदमियों से वृक्ष कटान बचाने के लिए वृक्षों पर चिपक कर खड़ी हो गई । वृक्ष बचाने का यह आंदोलन बहुत जल्दी ही पूरे देश ,यहाँ तक की विश्व भर में , एक प्रभावी आंदोलन के रूप में फैल गया । प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी से मिलकर उन्होंने पंद्रह वर्ष के लिए वृक्षों के कटने पर रोक लगवा दी ।
डा. बहुगुणा प्रांरंभिक शिक्षा के पश्चात लाहौर चले गए थे जहाँ से वह स्नातक होने के पश्चात वापस लौटे । किशोर अवस्था में उन्होंने अपना राजनीतिक जीवन शुरू कर दिया था ,वह गाँधी जी के परम अनुयायी थे । 1949 में मीरा बेन और ठक्कर बाबा से मुलाकात के पश्चात वह दलित वर्ग के विद्यार्थियों की अनेकों समस्याओं को लेकर तथा मंदिर में दलितों के प्रवेश को लेकर आंदोलनरत हुए । 1956 में उनका विवाह विमला नौटियाल जी से हुआ जो जीवन भर उनके कामों में भरपूर सहयोग देती रही ।विमला जी  ने सामाजिक कार्य हेतु स्वयं भी कई संस्थाओं का सफल और प्रभावी संचालन किया । विवाह के पश्चात बहुगुणा जी ने राजनीति से सन्यास लिया और स्वयं को पूरी तरह पर्यावरण सुरक्षा और पर्वतीय लोगों के हित में समर्पित कर दिया । 1971 में उन्होंने पत्नी के सहयोग से नवजीवन मण्डल की स्थापना की तथा पर्वतीय क्षेत्रों में शराब की दुकाने खोलने के विरोध में सोलह दिन का अनशन किया ।
1980 के प्रारंभिक वर्षों मे उन्होने पर्वतीय लोगों के मध्य पर्यावरण का संदेश देने के लिए पाँच हजार किलोमीटर की यात्रा की । उन्होंने टिहरी बाँध निर्माण के विरोध में 84 दिन का लम्बा उपवास रक्खा । वह पर्वतीय  क्षेत्रों मे अंधाधुंध हो रहे निर्माण और लक्जरी टूरिज्म के भी विरोधी थे । कालान्तर में जब उतराखणड में  जल प्रलय , भूकंप ,बाढ ,बादल फटने जैसी घटनाओं की आवृति बढ गयी जिनके अनेक कारणों में पर्यावरण से घातक छेड़ छाड़ प्रमुख कारण था तब लगा कि बहुगुणा जी जैसे पर्यावरणविदों की दूरगामी द्दष्टि की अवहेलना करना कितना घातक हुआ है ।
बहुगुणा जी को 1980 में अमेरिका की फ्रैंड्स आफ नेचर संस्था ने सम्मानित किया । 1986 में उन्हें रचनात्मक कार्यों के लिए जमनालाल पुरस्कार मिला ,1987 में चिपको आंदोलन के लिए राइट टू लाइवलीहुड सम्मान मिला । 1989 में उन्हें IIT रूरकी विश्वविद्यालय ने डाक्टर आफ सोशल साइन्सेस की मानक उपाधि से तथा 2009 में भारत सरकार ने पद्म विभूषण से सम्मानित किया ।
विश्व में पर्वावरण के सच्चे हितैषियों को जब जब याद किया जाएगा ,देवभूमि पुत्र , देश के गौरव डा. सुन्दर लाल बहुगुणा का नाम सर्वोपरि रहेगा । ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे । और अंत में चिपको आंदोलन का यह प्रेरक घोष युग्म :
क्या हैं जंगल के उपकार , मिट्टी पानी और बयार 
मिट्टी पानी और बयार ,जिंदा रहने के आधार !
डा . सुंदर लाल बहुगुणा जी को कोटि कोटि नमन  !!
-ओम प्रकाश नौटियाल
बडौदा ,गुजरात
(तथ्य -अंतर्जाल के सौजन्य से )
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