प्रवासी साहित्यकार उषा प्रियंवदा कृत ‘नदी’ उपन्यास : प्रवासी स्त्री जीवन का संत्रास

सपना दास

शोध सारांश:

प्रवासी चर्चित महिला साहित्यकारों में उषा प्रियंवदा का नाम अग्रणी है | उन्होंने अबतक 6 उपन्यासों की रचना की हैं | 2007 में प्रकाशित उपन्यास ‘भया कबीर उदास के बाद 2016 में प्रकाशित ‘नदी’ उपन्यास प्रवासी स्त्री जीवन के दस्तावेज को चित्रित करने वाला उपन्यास है | प्रवासी साहित्यकार उषा प्रियंवदा कृत ‘नदी’ उपन्यास में प्रवासी स्त्री जीवन की गाथा को प्रस्तुत करने वाला उपन्यास है | यह उपन्यास प्रवासी स्त्री जीवन के मानवीय मूल्यों, नैतिक विचारों से लेकर प्रवासी स्त्री जीवन के विविध स्वरूप को एवं उनके अधिकारों की गाथा कहने वाली उपन्यास कहलाएगी | प्रवास में गए लोगों विशेषकर स्त्रियों के संघर्ष, मानसिकता का विखराव, दाम्पत्य जीवन में विखंडन, परिवार में अलगावबोध, घुटन, संत्रास, अकेलापन आदि जीवन की विविध परिस्थितियों का वर्णन लेखिका ने किया है | प्रस्तुत शोधालेख शोधार्थियों के लिए अति लाभदायक सिद्ध होगा |

इस उपन्यास में प्रवासी स्त्री जीवन के विविध पक्षों को सामने उजागर किया गया है चाहे वह विस्थापन की समस्या हो, या परिवार से दूर कुंठा की समस्या, एकांकीपन की समस्या, प्रवासी स्त्री जीवन का संघर्ष हो, चाहे मानसिक अंतर्द्वद्व की समस्या ही क्यों न हो? और मानसिकता की टकराहट पीढ़ीगत भी निहित है, जिसके भीतर नयी पीढ़ी के साथ साथ द्वितीय पीढ़ी यानी स्वयं इस उपन्यास की नायिका आकाशगंगा और उसके पति गगनेंद्र को झेलना पड़ता है | साथ ही इसकी चपेट में बूढ़े माँ-बाप और दोनों बेटियाँ भी आ घिरते हैं |

मूल शब्द: प्रवासी, डायस्पोरा, प्रवासन, अप्रवासी, उत्प्रवासी, वासी, मूल निवासी, एन. आर. आई. आदि

अन्य नाम: प्रवासी साहित्य लगभग 80 के बाद आया जबकि 1834 में गिरमिटिया प्रथा, उससे पहले दास प्रथा या गुलामी प्रथा के नाम से जाना गया |

भाव: जीवन मूल्य, मानवीय मूल्यबोध, आधुनिकता उत्तर आधुनिकताबोध, संस्कृति बोध

उषा प्रियंवदा कृत ‘नदी’ उपन्यास में प्रवासी स्त्री जीवन का यथार्थ

उषा प्रियंवदा कृत ‘नदी’ उपन्यास में भारत और अमेरिकी पृष्ठभूमि स्वतंत्रता का ताना-बाना अत्यंत व्यापक रूप से दिखाया गया है | इस उपन्यास में उपन्याकार मध्यवर्गीय परिवार से जुड़ी आधुनिकता की दौड़ में भागती नारी के अंतर्द्वंद्व, वैचारिक वैमनस्य के कारण पारिवारिक, सामाजिक, दाम्पत्य संबंधों की टूटन को रेखांकित करती हैं | यह विघटन पात्रों की मानसिकता को भी प्रभावित करता है और तनाव और अकेलेपन से ग्रस्त हो जाते हैं | लेखिका ने अन्य परम्परागत रिश्तों की गढ़न को नकारते हुए वर्तमान संदर्भ में विभाजित किया है | स्वतंत्रता बाद के उपन्यासों में अनेकों बदलाव परांगत होती हुई नज़र आती है | यह बदलाव बदलता हुआ परिवेश व दृष्टि की ही देन है | मूलरूप से इसका आभास प्रेमचंद के गोदान से ही मिलने लगता है | “गोदान ही हिंदी का वह पहला उपन्यास है, जिसने सभी परंपरागत, भ्रष्टाचार, तिलिस्म और मनोरंजन के सस्ते नुस्खे के चौखट को उखाड़ फेका है और सामाजिक यथार्थ को उसके समस्त कोणों से उद्घाटित कर एक नवीन औपन्यासिक धर्म का सूत्रपात किया है |”1

आधुनिक उपन्यासकार के लिए कथानक, चरित्र-चित्रण, कथोपकथन आदि परंपरागत बातें महत्वपूर्ण नहीं रह गई | वह इन्हें नकार कर नवीनता और आधुनिकता बोध के नये आयाम खोजता है | साथ ही परिवेश को चरित्र में एवं चरित्र को मनोविज्ञान में खोजता है जबकि मनोविज्ञान को व्यक्तित्व में खंगालता है | उषा प्रियम्वदा ने अपने उपन्यासों में विविध परिस्थितियों के आधार पर सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक, यथार्थवादी आदि विविध विषयों पर उपन्यास में केन्द्रित किया | “आज का उपन्यासकार ऐतिहासिक, सामाजिक या राजनीतिक उपन्यास नहीं लिखता, वह उनके माध्यम से आधुनिक व्यक्ति चेतना को परखता है, प्रतिस्थित करता और उनका मुल्यांकन करता है |”2

मानव मन बहुत ही चंचल होता है कभी यहाँ तो कभी वहाँ | जीवन के विविध क्षेत्र में उतार चढ़ाव लगे रहते हैं ऐसे में व्यक्ति का जीवन परिस्थियों से होकर यथार्थ रूप में मानस पटल पर विचरित करता रहता है | ‘नदी’ उपन्यास आधुनिक जीवन के यथार्थ को प्रस्तुत करने का स्पष्ट दस्तावेज़ है | जिसका संबंध मानव के आम जीवन से जुड़ा हुआ है | उषा प्रियंवदा ने ‘नदी’ उपन्यास में प्रवासी जीवन के यथार्थ को विविध समस्याओं व् परिस्थितयों के माध्यम से मुखरित किया है –

परिवार से दूर विस्थापन की समस्या

परिवार से दूर जाकर प्रावासी व्यक्ति वियोग का शिकार हो जाता है | अपनी मातृभूमि का मोह प्रत्येक व्यक्ति के मन में वियोग की स्थिति उत्त्पन्न कर देता है | जैसे-जैसे पुरानी स्मृतियाँ मन-मस्तिष्क पर छाने लगती है व्यक्ति पूरी तरह से अतीत में चला जाता है ऐसे में उसकी वेदना की गति तीव्र होने लगती है | वह चाह कर भी प्रवास में अपने परिवार और अपने रिश्तों को भुला नहीं सकता | अच्छी जिंदगी व्यतीत करने की लालसा और अपनी मिट्टी से जुड़कर अपनी पहचान बनाए रखने की आकांक्षाओं के कारण ही विदेश में रहते हुए भी व्यक्ति की मानसिकता को कुरेदती है |

शिक्षा अथवा रोजगार के उद्देश्य से व्यक्ति भले ही प्रवाश में जाकर नयी गृहस्थी शुरू करता है परन्तु पाश्चात्य समाज में व्यक्ति को फिट होने में समय लग जाता है | विदेशी चकाचौंध सदैव भारतीयों को अपनी ओर आकर्षित करती है परन्तु वास्तविकता तब नजर आती है जब व्यक्ति उस समाज में उस मानसिकता के साथ फिट नहीं बैठता | ऐसे में आर्थिक रूप से सम्पन्नता भी कमी होने लगती है | यहाँ सबसे ज्यादा जो जरुरी चीज है वह है निश्चित आवास का होना | परन्तु पराये देश में पहले पहले किसी न किसी व्यक्ति का आश्रय लेना पड़ता है फ़िर जाकर फ्लेट या अपार्टमेन्ट में रहना पड़ता है | यह स्थिति अनेक दिक्कते उत्पन्न करती है| आकाशगंगा के शब्दों में- दूर देश में न कोई सगा सम्बन्धी है, न रहने का ठिकाना |”3 बहुत बार ऐसा देखा गया है कि विदेश में अपनी इच्छाओं की ललक को पूरा करने के लिए अनेक भारतवंशी जाकर वहाँ बस जाते है | यानी कभी इच्छा वश तो कभी बेसहाय वश परन्तु भारतीय परिवार को अनेक समस्याओं से जूझना पड़ता है, जो कि एक प्रवासी के लिए बड़ा सपना बन कर रह जाता है |

 

अपनत्व का अभाव

प्रत्येक क्रिया-कलाप, मान्यताएं, मूल्य-बोध, संस्कृति आदि समस्त गतिविधियाँ सामाज द्वारा संचालित होता है | यही कारण है कि प्रत्येक सामाजिक जीवन मूल्यों को समाज ही गतिशीलता प्रदान करती है, उसे विकसित है | प्रवासी जीवन शैली भारतीय जीवन शैली से कई अधिक भिन्न है | भारतीय समाज में पाश्चात्य की लहर आधुनिकता का ही मापदंड है | प्रवास के दौरान व्यक्ति में परिवर्तन आना एवं उनकी मानसिकता में बदलाव का आना स्वभाविक है | साथ ही विविध प्रकार की समस्यायों का यथार्थ रूप में सामना करना, चाहे वह रंगभेद की दृष्टि से हो या भाषागत दृष्टि से ही क्यों न हो | बदलते परिवेश में दूरियों का आना आम बात जान पड़ता है | इससे व्यक्ति परिवार से परिवार समाज से कटता जाता है और एक नए समाज में अपने को सामंजस्य बैठाने की कोशिश में लग जाता है, परन्तु इसका विखंडित स्वरूप परिवार में खलन पैदा करता है | यही कारण है कि प्रवासी जीवन जीने के दौरान व्यक्ति को जीवन के तमान कठिनाईयों से होकर गुजरना पड़ता है | साथ ही अपनत्व अभाव खलता रहता है | इस संदर्भ में गोविन्द मिश्र कथन बहुत ही प्रासंगिक है | उनका कहना है- “विचारों की आंधियां आती जाती रहती है | थोडा बहुत संवेदना को मोड़ती है | लेकिन मूलतः उसका विकास जमीन के साथ जो-जो हो रहा है उसी के साथ चलता है | छलांग लगाकर कलाहीन और नहीं पहुँच सकता… जैसा की वैचारिक स्तर पर अक्सर संभव होता है |”4 गंगा का जीवन एक ऐसे छोर पर जा अटकी थी जिसमें कोई सगा सम्बन्धी था ही नहीं | एक ऐसे पराए देश में जहाँ न कोई परिवार न कोई रिश्ता | वह कहती है- “ क्या लौटना पडेगा ? यह सब छोड़कर, उस दूर देश में, जहाँ कोई सगा सम्बन्धी नहीं |”5

व्यक्ति शिक्षा के क्षेत्र में, रोजगार की खोज में या नई जीवन यापन की खोज में व आर्थिक विवशता के कारण आदि चाहे जिन परिस्थितियों में प्रवास में निवास करता है | उस दैनिक जीवन में अपनी मिट्टी की खुसबू उसे सताती है | जिसके चलते व्यक्ति पराए देश में रहकर वह न वहां का हो पाता है और न ही यहाँ का | क्योंकि प्रवासी व्यक्ति का मन पेंडुलम की तरह डोलते रहता है जिससे की एकाग्र नहीं हो पाता | भले ही थोड़े समय के लिए अपने को फिट परिस्थितियों के अनुसार फिट कर लें परन्तु कुछ समय बाद जब उसे अपने घर और परिवार का बोध होता है तो कहीं न कहीं अपने आप को अकेला ही पाता है जिसके चलते वह व्यक्ति प्रवास में रहकर भी अपनी मिट्टी से जुड़ा रहता है | आकाशगंगा के शब्दों में- “अपनी संस्कृति और सभ्यता से अपने को उखाड़ कर न यहाँ के पूर्णत: हो पाते हैं, न वहाँ के |”6 प्रवासी मनुष्य की मानसिकता अनिश्चित होती है | जब उस पर पुरानी स्मृतियाँ हावी होती है तब वह न अपने देश को भुला पाता है और न ही पाश्चात्य संस्कृति को अपने में फिट बैठा पता है | यही कारण है कि वह अपनी जमीन व मातृभूमि के प्रति खिचाव बढ़ता चला जाता है |

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अकेलापन एवं अजनबीपन

मूल्यों की विसंगति ही अकेलापन है | व्यक्ति के भीतर सामाजिक मूल्यों एवं निजी मूल्यों की स्वीकृति का जो संघर्ष उत्पन्न होता है उससे अलगाव की समस्या उत्पन्न होती है | अलगाव का मतलब है दूर हो जाना या अलग हो जाना | ऐसे में व्यक्ति अकेलापन का शिकार हो जाता है | अर्थात् इसका मूल अभिप्राय हुआ अलग या अजनबीपन होने की अनुभूति | अमृतराय ने लिखा है- “यह अजनबीपन और संवेदनहीनता मूलतः एक ही चीज है | आदमी-आदमी के बीच संवाद नहीं है और न होने की संभावना | इसलिए सब के सब एक दूसरे के लिए अजनबी है |”7 यह दूर होने की प्रक्रिया के पीछे कई कारण भी हो सकते हैं जैसे आपसी अनबन के कारण अपनों से दूर हो जाना, दाम्पत्य जीवन में प्रेम की माधुर्यता की कमी के कारण दूर हो जाना इत्यादि | जबकि अकेलापन आज की सबसे विकत समस्या है | देवी शंकर अवस्थी के शब्दों में- “आधुनिक मानव का अकेलापन ही इसकी त्रासदी और विडम्बना है |”8

पुत्र भविष्य के अंतिम संस्कार कर लौटने के बाद पति डॉ. सिन्हा का कटु वचन उसे न केवल पति से बेगाना बना देता है बल्कि पूरे परिवार में रहकर भी अपने आप को अलगाव का बोध करने लगती है | ऐसे समय में उसे उसे जिसका साथ चाहिए था वही उस पर लांछन लगाता है- “तुमसे शादी करने की गलती की मैंने, गोर चेहरे को देख कर माता जी धुल गई थीं, पर तुम्हारा रक्त ही दूषित है, तुम्हारे दो भाई ल्यूकीमिया से मरे-और मेरा भविष्य भी तुम्हारे जहर भरे रक्त की भेंट चढ़ गया | अब मुझे तुमसे लेना-देना नहीं | जो चाहो करो, जहाँ चाहो जाओ |”9 ऐसे में आकाशगंगा के पास उसकी अपनी पीड़ा, आत्मलांछना और अपराध भावना का तो कोई छोर ही न था |

व्यक्ति जब समाज से या परिवार से अपने आप को अजनबी महसूस करने लगता है तब ऐसी स्थिति में उसके विश्वास और आस्था के सारे सहारे टूट कर बिखर जाते हैं तथा जब वह महसूस करता है कि स्वयं परिवार में उसका कोई आदर नहीं हो रहा है तो उसमें अपने आप ही अजनबीपन की भावना का उत्पन्न होना स्वाभाविक है | औद्योगिकीकरण के इस चकाचौंध ने व्यक्ति को अपनी ओर इस कदर आकर्षित कर रखा है कि दिनोंदिन वह काल के गाल में समाता चला जा रहा है |

वैज्ञानिक प्रगति के कारण परंपरागत जीवन मूल्यों के आगे आज प्रश्न चिह्न लगाये जा रहे हैं | मौलिक चिंतन शक्ति के विकास के कारण परंपरागत मूल्य आज निरर्थक मानकर छोड़े जा रहे हैं | समकालीन सामाजिक जीवन में मूल्यों का विघटन एक ओर व्याप्त है तो दूसरी ओर यांत्रिकी | मुख्यत: भूमंडलीकरण के प्रभाव के कारण मानवीय संबंध भयंकर तनाव के बीच गुजर रहे हैं | वास्तव में मूल्यों के साथ हमारा मानसिक संबंध स्थापित हो जाता है | चूँकि युगीन परिस्थितियों में परिवर्तन होने के साथ जीवन मूल्यों में भी परिवर्तन होना सहज है |

प्रवास में जीवन यापन कर रहे एक भारतीय महिला की सारी संवेदनाएँ विघटित हो जाने के लिए विवश है | उसे येसा लग रहा है कि अब उसका इस दुनिया में कोई नहीं | आकाशगंगा समुन्द्र के किनारे जा रेत पर लेट जाती है उसे न सुध है लहरों की न ही मृत्यु की | समुद्र की यह लहरे आती और पैरों को भिगोकर चली जाती है | लेखिका के शब्दों में- “यह शरीर कितना अतृप्त है, कितना वंचित है किसी के स्नेहिल स्पर्श का, जैसे सारी त्वचा में धीरे-धीरे आँच सुलग रही है |”10 अकेलेपन की छटपटाहट उसे अंदर से व्याकुल कर देती है | दूर प्रदेश में उसका कोई अपनानहीं रहता है सिवाय एकाकीपन के | क्योंकि जो अपना था वह भी उसे अकेले छोड़ गया | वह बुदबुदाती है, “सभी कोई क्यों मुझे छोड़कर चले जाते हैं- तुम आओ न माँ-मुझे उठकर अपनी बाँहों में भर लो | मुझे दुलराओ माँ- मुझे उठाकर बैठाओ-अरे कोई तो हो जो…”11 अत: उसे न सांस की परवाह है और ना ही मृत्यु की | प्रवास का यह अकेलापन विछोह की स्थिति वाला अकेलापन नहीं है | “वरन व्यक्ति और घटनाओं के बीच असम्प्रेरणा से युक्त अद्भुत छटपटाहट का क्षण है जिसका उत्तर दर्शन के पास नहीं है |”12

इस उपन्यास में नायिका आकशगंगा के जीवन में द्वंद्वात्मक परिस्थितियाँ तब उभर कर सामने आती है जब एक ओर प्रवास में पति छोड़कर चला जाता है | वहीँ दूसरी ओर अर्जुन सिंह का आश्रय पाती है परन्तु गैर क़ानूनी कम करवाने के जुर्म में रातों-रात उसकी गिरफ्तारी हो जाती है | ऐसे में उसके पास न वीजा है न भारत लौटने का दूसरा मार्ग | आकाशगंगा के शब्दों में- “इस ठंडे पराए देश में, जहाँ आकर लोग इतना बदल जाते हैं कि उन्हें सही गलत का आभास भी नहीं रहता ?”13 प्रवासी समाज में सांस ले रहा भारतीय समाज व परिवार जब भी परायेपन का शिकार होता है तब वह अतीत में खो जाता है और वर्तमान में अपने उन पुरानी यादों के बीच छोटी-छोटी खुशियों को तलाशने की कोशिश करने लगता है | अतीत के प्रति मोह व्यक्ति को नए परिवेश में सामंजस्य स्थापित करने में बाधा उत्पन्न करता है |

अकुलाहट

एकांत जीवन का यह भयावह सच है कि व्यक्ति का मन मश्तिष्क, चेतना शून्य हो जाता है | जीवन में सब चीज उसे बिखरता हुआ ही नज़र आता है जहाँ केवल अँधेरा ही अँधेरा है | समुन्द्र के किनारे, रेत पर बैठी-बैठी आकाशगंगा जान रही थी कि “यह जिन्दगी ऐसे टूट गई है, टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गई है कि नर्सरी गीत के ह्म्पटी – डम्पटी की तरह कभी जुड़ नहीं पाएगी |”14

आधुनिक प्रेम की विडम्बना का प्रस्तुतीकरण भी इनके साहित्य में हैं कि आज का मनुष्य अपने भीतर अलगाव, अभाव एवं शून्य आदि जैसी विविध परिस्थितियों का अनुभव कर रहा है | उसके इस अभाव की पूर्ति प्रेम से ही हो सकती है | किन्तु मानव जीवन यह है कि वह प्रेम करने में असमर्थ है | पति गगनेंद्र अपने बेटे के मृत्यु का आक्षेप अपनी पत्नी को मानता है यही कारण है कि वह अपनी पत्नी एवं उसके प्रेम को भूलकर सदैव के लिया छोड़ कर भारत चला जाता है | बिना बताए चले जाने से आकाशगंगा को यकीन नहीं होता | यही कारण है कि वह वर्तमान में जीते हुए भी अतीत के गर्त में चली जाती है | घर वही रहता है बशर्ते उसमें रहने वाला व्यक्ति कोई नहीं रहता है | यह जानते हुए भी की उसका पति अपनी बेटियों को लेकर चला गया है बावजूद इसके भी उसे येसा लगता है कि मानों यह स्वप्न है | बेटियाँ झरना और सपना उसे आकर पुकारेगी | अत: अपने पति के प्रेम से वंचित होकर वह काल्पनिक जगत में यहाँ से वहाँ विचरती रहती है |

बेरोजगारी की समस्या

पति से विलगाल हो जाने के बाद आकाशगंगा प्रवास में स्थाई रूप से नौकरी करके रहने का मार्ग अपनाती है | वास्तविकता से परिचित है कि डॉ. सिन्हा उसे अपनाएंगें नहीं इसलिए वह विदेश में ही रहकर काम करना चाहती है | एरिक से कहती है- “मैं सम्मान से जीना चाहती हूँ बहले ही मुझे झाड़ू लगाने का काम करना पड़े |”15

मूल्यों की टकराहट

“मूल्य शब्द मूल्य+यात से निष्पन्न है, जिसका अभिप्राय है- किसी वस्तु के विनिमय में दिया जाने वाला धन, दाम, बाजार भाव आदि | परन्तु क्रमशः मूल्य शब्द के अर्थ में विस्तार हुआ है और यह शब्द मानदण्ड के अर्थ की भी अभिव्यक्ति करने लगा है | यही नहीं संस्कृति जैसे सूक्ष्म भाव के आधारभूत तत्वों को जिनसे किसी समाज की सांस्कृतिक अवस्था का ज्ञान होता है इसे भी मूल्य कहा जाने लगा है |”16 आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परस्पर विरोधी मूल्य एक दूसरे से टकराकर टूट रहे हैं | आज का व्यक्ति परंपरागत जीवन मूल्यों को आत्मसात करने लगा है | इस नव मूल्य की प्रक्रिया में व्यक्ति के लिए संघर्ष एक आवश्यकता बन गया है| इस उपन्यास में प्रवास में जीवन यापन कर रहे भारतीय परिवार के जीवन मूल्यों की टकराहट को स्पष्टत: देखा जा सकता है |

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मूल्य जन समाज की वह रीढ़ है, जिसके सहारे समाज पूर्णत: अस्तित्ववान होता है | किसी समाज की संस्कृति का अध्ययन उस समाज में प्रचलित मानव मूल्यों के आधार पर ही संभव है | मानव की तानित सी त्रुटि संसार की अशांति का कारण बन सकती है | वस्तुतः मूल्य विघटन आधुनिक काल की उपज है | यह उपन्यास आपसी रिश्तों में आये खलन, नैतिक जीवन मूल्यों में विघटन पर बल देता है | शक के बुनियाद पर टिकी यह पति-पत्नी का संबंध अधूरे मानसिकता, आडम्बरों से पैदा हुए चकाचौंध जैसे मन:स्थिति को उजाकर कर पाठको के समक्ष प्रस्तुत करता है | बदले परिवेश में पुरानी मायताओं को लेकर जूझती रहती है | इस भाग दौड़ की जिंदगी में गंगा अपने को अशांत पाती है | महेंद्र भल्ला कृत ‘दूसरी तरफ’ उपन्यास में वे विदेशी आक्रान्ताओं को स्पष्ट करते हुए कहते हैं- “हिन्दुस्तान में बिल्कुल विपरीत जहाँ लोगों की आवाज़े बोलती थी, बेचने की आवाज़े चिल्लाती थी, सबसे ऊपर होती थी | शायद यही फर्क है पश्चिम और पूरब में |”17 देखा जाए तो मूल्य संघर्ष का संत्रास गंगा के जीवन में कही-न-कही किसी न किसी रूप में चलता रहता है | जिसके चलते जीवन मूल्यों के बीच सघर्ष करती हुई दिखाई देती है | मूल्य विघटन का प्रमुख कारण निरंतर होने वाला परिवर्तन ही है | डॉ. गणेश दास के अनुसार- “जन व्यक्ति के जीवन मूल्यों के बीच संक्रमण आती है | तब मनुष्य उसे स्पष्ट रूप से विभाजित नहीं कर पाता |”18 मानसिक और बाहरी द्वंद्व के कारण व्यक्ति उलझन से भरा रहता है | इससे उसका चरित्र किसी भी ढांचे में ढल नहीं पाता है यही कारण है कि व्यक्ति के जीवन मूल्यों में टकराहट की स्थिति दिखाई देती है |

वर्तमानयुगीन जीवन मूल्यों के संक्रमण के कारण उत्पन्न मानव जीवन की कटुता, परिवार विघटन आदि के परिप्रेक्ष्य में नवमूल्यों की स्थापना ही इस उपन्यास का उद्देश्य है | मूल्य विघटन की स्थिति में स्त्री जीवन असंगत बनाता जा रहा है | विद्रूपता, भावहीनता आदि अनेक असंगत प्रवृतियाँ उसमें दिखाई देने लगी है |

भारतीय सामजिक जीवन में दाम्पत्य संबंध या विवाह वासनापूर्ति का साधन नहीं हैं | वह जीवन का पवित्र बंधन है, त्याग एवं समर्पण का चिह्न है | पति पत्नी के बिना पारिवारिक रथ नहीं चल सकता | भारतीय समाज में पारिवारिक जीवन की सफलता का मुख्य कारण पारम्परिक प्रेम एवं त्याग है | वर्तमान सांचा आज खोखला हो चुका है | इस उपन्यास में पति डॉ. सिन्हा अपनी पत्नी को अमेरिका में छोड़ कर भारत केवल इसलिए चला जाता है क्योंकि उसके पुत्र भविष्य के मृत्यु का कारण अपनी पत्नी को मानता है | इसलिए वह बिना बताए वीजा लेकर चला जाता है | यही कारण है कि परित्यक्ता होकर जीवन बिताती है | “परित्यक्ता होना आखिर कोई ऐसी अनहोनी बात तो नहीं है , हमारे देश में तो न जाने कितने लोग अपनी पत्नी को छोड़ देते हैं |”19

स्त्री-पुरुष के वार्तालाप से ही कटुता का अहसास होता है कि दाम्पत्य जीवन से सुखी नहीं है | जहाँ तक स्त्री की बात है पति के स्वभाव के साथ उसका स्वभाव मेल नहीं खाता | पाश्चात्य संस्कृति में निवास करने के कारण पत्नी की विचारधारा स्वतंत्र होती है परन्तु भारतीय पति को यह पसंद न था | जबकि पत्नी अपने पति का प्यार चाहती है परन्तु बदलें में उसे आत्मलांछना का शिकार होना पड़ता है | कई बार उसे अपने पति के कटु वचन का शिकार होना पड़ता है | “तुमसे शादी करने की गलती की मैंने, तुम्हारा रक्त ही दूषित है |”20 उनकी यही बात उनके बीच कटुता बनकर उभरती है | यहाँ एक प्रश्न है क्या यह जरुरी है कि दाम्पत्य जीवन की पीड़ा का दोष स्त्री के माथे मढ दिया जाए | यदि किसी भी रिश्ते में कटुता व् कड़वाहट उत्पन्न हो रही है तो इसमें दोनों भागीदारी है न कि कोई एक |

प्रवास में रह रहे भारतीय परिवार की मानसिकता वहीँ धरी की धरी है | आधुनिक होकर भी उसकी मानसिकता दबी कुची है | परन्तु यह भी सत्य है कि आधुनिकता की इस चकाचौंध में व्यक्ति अपनी गरिमा को न पार करे | पति का यह बदलाव तब देखा जाता है जब स्वयं के परिवार को ही संदेह की दृष्टि से देखने लगता है | पति डॉ. सिन्हा अपनी माँ से कहता है- “अम्माँ- तुम उसे पहचानती नहीं, वह बड़ी चालाक है, उसका भरोसा मत करो-अच्छा, रात को उसके कमरे में बाहर से ताला लगा दिया करो |”21

नारी के स्वतंत्र सामाजिक जीवन में पुरुष वर्ग द्वारा अपने परंपरागत संस्कारों एवं अधिकारों को छोड़ नहीं पाना तथा आर्थिक दृष्टि से नारी की आत्मनिर्भरता, अविश्वास बनावट आदि ही के कारण है जिनसे समकालीन दाम्पत्य संबंधों में कटुता आ रही है | डॉ. सुरेश सिन्हा का कथन दृष्टव्य है- “इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक तरफ आज की नारी की वेदना को बड़ी मार्मिकता से रूपायित करता है, दूसरी तरफ आधुनिक जीवन सन्दर्भों की कृत्रिमता और खोखलेपन को बड़ी सूक्ष्मता से उजागर किया गया है |”22 गौरतलब यह है कि दाम्पत्य संबंधों की विषमता एवं विघटन का प्रभाव वर्तमान समय में न केवल पति और पत्नी पर पड़ रहा है अपितु उनकी संतान एवं परिवार पर भी पड़ रहा है

यौन संबंध

यौन प्रवृति मनुष्य की जन्मजात प्रवृतियों में से एक है | वर्तमान समय में आधुनिक नारी की यौन सम्बन्धी दृष्टि बदली है | डॉ. रामेश्वर नारायण ‘रमेश’ के मतानुसार- “आधुनिक नारियाँ बौधिक आदर्शवादी है तो यथार्थवादी भी | आधुनिक बौधिक नारियाँ सत्यानुभूति से प्रेरित होकर तथ्यों पर बल देती है | वे आधुनिक है, शिक्षिता है | संभवत: इसलिए वे आदर्शवादिता का विरोध करती है | वे पूर्णरूपेण विकासवादी सिद्धांत की समर्थिका है इसलिए वह यथार्थवादी है|”23 स्त्री पुरुष का पारस्परिक आकर्षण एक नैसर्गिक मनोवृति है | इस उपन्यास में अर्जुन सिंह का सान्निध्य आकाशगंगा को बुरा नहीं लगा | अर्जुन सिंह ने उसे सब सुविधाओं से पाट दिया था , काम-काज या सारी जिम्मेंदारियों से मुक्त कर रखा था | अर्जुन सिंह केवल उसे सज-सँवारकर बैठे देखना चाहता था | अर्जुन सिंह आकाशगंगा से कहता है- “तुझसे कभी जी नहीं भरेगा मेरी डार्लिंग-तेरा चाहे भर जाए |”24 आकाशगंगा का संबंध पहले अर्जुन सिंह से होता है फ़िर एरिक से तत्पश्चात प्रवीन से | परन्तु इन संबंधों में कहीं मजबूरीवश, शारीरिक जरूरतों की माँग है, तो कहीं, तो कहीं असहाय वश एकाकी जीवन का सहारा मात्र |

वास्तविकता तो यह है कि औरत पुरुष को अपनी जिंदगी का अंतिम पुरुष मानती है | पर पुरुष अपने चाहे जितनी औरतों के संपर्क में आया हो, औरत से जानना कभी नहीं भूलता कि उसके पहले उसकी जिंदगी में कोई आया तो नहीं, शायद इससे उसका अहम् सन्तुष्ट होता होगा | समकालीन समय में स्त्री स्वछंद विचार धारा रखती है | इस संदर्भ में डॉ. राजरानी शर्मा का कहना है- “अब नारी सेक्स के संदर्भ में न ग्लानी अनुभव करती है और न उसके लिए मात्र पुरुष को जिम्मेदार मानती है | वह अपने कर्म और स्वयं के फल के प्रति अपने को जिम्मेदार मानती है | यह नारी की रुढ़िमुक्तता का ही एक आयाम है |”25

‘यौन विकृति’ की चर्चा भी इस उपन्यास में मिलती है | आज आधुनिक समाज में रिश्ते और नामों का कोई सार्थक अर्थ नहीं रह गया है | सच में संबोधन जितने सच्चे होते है, उतना सच्चा प्यार नहीं होता | अर्जुन सिंह उसे सहलाता, थपकियाँ देता, पहले-पहल आकाशगंगा को यह सब अजीब सा लगा | परन्तु पति द्वारा अपमान मिलने रहने के कारण इस प्रकार से पुरुष का स्पर्श वह भूल चुकी थी | लेखिका कहती है- “इस रिश्ते में अगर कुछ रिश्ता था-तो वह केवल शरीर का- उसे तृप्ति तो मिल रही थी, पर वांछनीय नहीं था, वह जानती थी यह उसकी मज़बूरी नहीं थी, वह बंधी नहीं थी, किसी भी दिन दरवाज़ा खोलकर होटल से बाहर जा सकती थी पर उसे लगा कि वह जाना नहीं चाहती, एकदम निष्क्रिय रहने, होटल में रहने की सुविधा और एक पुरुष का हर वक़्त उसकी इच्छा पूर्ति करना एक सुखद अनुभव था |”26 इस रिश्ते का न कोई नाम है न ही इस रिश्तें में प्यार बल्कि यह एक-दूसरे की इच्छापूर्ति का माध्यम है | डॉ.त्रिभुवन सिंह के मतानुसार- “समय ऐसा आ गया है, जिसमें नाम और संबंध एक दूसरे की पर्यायवाचिता खो बैठे हैं, यहाँ तक कि उसके उल्लंघन में अब पश्चाताप और मानसिक क्लेश भी नहीं रह गया है |”27

पारस्परिक रूप में स्त्री-पुरुष के काम रूप को अभिन्न अंग माना गया है “यौन भावना प्राकृतिक आवश्यकता या शारीरिक भूख है जिसकी तृप्ति चाहे किसी भी स्थिति में होनी चाहिए |”28 फ्रायड ने काम को समस्त चेतन जगत एवं क्रिया-कलापों का मूल माना है | अत: यह आवश्यक नहीं है कि जिसके साथ यौन संबंध हो उसके साथ प्रेम हो या किसी भी प्रकार का संबंध हो | यौन प्रवृति के संस्कारपूर्ण रोप का विकास है प्रेम | प्रेम मानव चरित्र का प्रेरक तत्व है | “शारीरिक और संवेगात्मक आकर्षक के मिलन बिंदु पर प्रेम का आविर्भाव होता है | प्रेम केवल अध्यात्म की अनुभूति नहीं है, शरीर से उसका दृढ़ संबंध होता है | मांस में उसकी चेतना है, रक्त में उसका उष्ण | या वासना चाहे अछि हो या बुरी, जीवन का नेवारी अंग है |”29

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नर नारी का आकर्षण स्वाभाविक एवं सहज है | इस दृष्टि से वह सम्पूर्ण जीवन प्रसंगों से जुड़ी हुई परिपक्व जटिल प्रक्रिया है | अपने व्यापक अर्थ में प्रेम भावना मूलतः एक मानवीय जुड़ाव का भाव है | “नर नारी के बीच सम्बन्धों की समस्या सदैव रही है | इसमें भावात्मक, रागात्मक, सेक्स-मूलक सम्बन्धों के व्यस्था की समस्या अपने आप में काफी जटिल है |”30 किन्तु आधुनिक मानवीय संबंधों के प्रभाव से समकालीन प्रेम भावना को भी धक्के लगे है | एक ओर जहाँ गंगा को पति का प्रेम नहीं मिल पाता है | वहीँ दूसरी ओर अर्जुन सिंह से नैसर्गिक संबंध का बनना कहाँ तक सही है ? साथ ही उसका साथ थोड़े ही दिन का रहता है कि आगे एरिकसन का साथ सहानुभूति का साथ है जिसमें प्रेम का नाम नहीं परन्तु संबंध स्थापित जरुर होता है |

सौन्दर्य का ख्याल रखना , प्लास्टिक सर्जरी करवाना, मसाज करवाना आदि जिअसी विविध गतिविधियाँ कहीं न कहीं पाश्चात्य की ही दें है | लोग विज्ञापन की चकाचौंध में पूरी तरह समाहित होता चला जा रहा है | इस विज्ञापन पद्धति को व्यक्ति दिनोंदिन अपनी निजी जीवन में भी लागू करता जा रहा है | चुकी किसी भी आकर्षक चीज क्षणभंगुर मात्र है | बशर्ते जरुरत है कि उन चीजों का हम उपयोग करते हैं या दुरपयोग | पाश्चात्य परिवेश में देखा गया है कि “वे जवानी में में खूबसूरती का दीवाना हुआ करते हैं | इसलिए हजारों स्त्री-पुरुष प्लास्टिक सर्जरी करवाकर अपने को जवान रखतेहैं |”31 चूँकि गंगा अपने आप को साज-सँवारकर महज अर्जुन सिंह के लिए रखती जिसने उसे हर प्रकार की सुविधाओं से भरपूर कर रखा था | न उसे अशार का बोध होता और न ही एकाकीपन का | ऐसे में उसे क्या चाहिए केवल यही कि जिस पुरुष ने उसे हर बंधनों से मुक्त रखा उसकी इच्छापूर्ति का ख्याल रखे | “खाली समय में वह पलंग पर पड़ी-पड़ी छत को ताका करती थी, न टेलीविजन देखती थी, न ही पढ़ती-लिखती थी | हर दो-तीन दिन में होटल की ब्यूटी शॉप में जाकर हाथ, पाँव, चेहरा सब सँवरवा लेती थी, पुरे शरीर की मालिश हो जाती थी | फ़िर तैयार होकर यानी साड़ी या चमकदार सलवार-कुरता पहनकर बैठी रहती थी |”32 यह साज-सजा स्वयं के लिए नहीं था बल्कि अपने को जवान रख कर अर्जुन सिंह को रिझाने के लिए था |

यह संबंध स्पर्श का, एहसास का, आत्मीयता का, सहानुभूति का होता है | चूँकि गंगा जानती है कि एरिक का साथ साथ महज़ कुछ ही क्षण के लिए है इसके बाद वह स्वीटजरलैंड चला जाएगा | बावजूद इसके भी वह उसके द्वारा प्राप्त सहानुभूति सरे ग़मों को भुला देती है | यह भी एक प्रकार से उत्कृष्ट प्रेम की चरम सीमा है | एरिक आकाशगंगा से कहता है- “अभी तो हम संग है न- बस यही काफी नहीं है ?”33 विघटन की प्रक्रिया से गुजर रहे आधुनिक प्रेम भावना पर यंत्र युग के आत्मनिर्वसन का प्रभाव पड़ा है |

उषा प्रियंवदा का ‘नदी’ उपन्यास प्रेम और नैतिकता के परंपरागत प्रतिमानों पर न केवल प्रश्न चिह्न लगता है, अपितु मानवीय संबंधों के यथार्थ को भी प्रस्तुत करता है | भारतीय संस्कृति के अनुसार शादी के पूर्व या बाद एक स्त्री किसी गैर पुरुष से संबंध रखती है तो उसे गलत माना जाता है | परन्तु जब एक पुरुष पत्नी के रहते किसी एनी स्त्री से संबंध रखे तो उसे मर्दानगी कहा जाता है | गंगा नए देश, नए परिवेश में है, अर्जुन के साथ संबंध हर दृष्टि से गलत है, वह विवाहिता हैं , चार बेटियों और एक बेटे का पिता है | यह जानते हुए भी गंगा उसके साथ नैसर्गिक संबंध बनती है | यहाँ तक कि अर्जुन सिंह भी केवल अपनी इच्छाओं की ही पूर्ति मात्र गंगा से करता है जो कि उसे अपनी पत्नी से नहीं प्राप्त हो पता | अर्जुन सिंह कहता है- “मैं किसी का हक़ छीनकर किसी और से नहीं बाँट रहा हूँ- यह मेरी ख़ुशी है | मुझे भी कुछ ख़ुशी पाने का अधिकार है कि नहीं |”34 यौन संबंध को घृणा एवं अश्लील की की एवं अश्लील की से देखा जाता था परन्तु आज उसकी सहज अभिव्यक्ति अपेक्षित है |

निष्कर्ष

आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी जटिल व् प्रमुख समस्या आजीविका, प्रेम, विवाह और सेक्स की कमी है | कमजोरियाँ हर व्यक्ति में होती हैं, कोई भी पूर्ण नहीं | स्त्री भी अपनी कमजोरियों को जानती है, पर कुछ कमजोरियाँ आदत और बेसहाय व् लाचारीपन में शामिल हो जाती हैं | कभी-कभी यह भी एक कारण बन जाती है, कटुता का, अलगाव, विखरापन का, संबंध विखंडन का आदि | व्यक्ति इस क्षेत्र में समाज की रूढ़ सनातन धारणाओं एवं मान्यताओं में अनास्था रखता हुआ मानसिक संघर्षों से ग्रस्त रहता है | सामाजिक मान्यताओं को प्रधानता देने पर जिस आत्मिक कष्ट और अंतर्द्वंद्व को लेकर वह जीता है वह उसके व्यक्तिगत क्षेत्र में हानिकारक सिद्ध होता है | अतृप्त वासनाएँ व्यक्ति के जीवन को कुंठित कर पूर्ण रूप से उसे मानसिक रोगी बना देती है | भारतीय समाज प्राचीन संस्कृति एवं आदर्शों में इतना आस्थावान है कि उनके विपरीत संस्कृति, मनोभाव, आचरण वालो को उचित मान्यता नहीं देता |

मुख्यरूप से देखा जाए तो इस उपन्यास में कलात्मक परिपक्वता, संवेदनशीलता और उत्तर आधुनिक बोध की परिपूर्णता दिखाई देती है | साथ ही इसमें प्रवासी भारतीय स्त्री के जीवन के संत्रास और अकेलेपन से उत्पन्न छटपटाहट और मानसिकता यंत्रणा, अर्थाभाव के कारण चाहते हुए भी कुछ ना कर पाने की विवशता अपने पूर्ण यथार्थ के साथ अभिव्यक्त हुई है| लेखिका ने व्यक्ति, परिवार तथा स्त्री-पुरुष के संबंधों, नारी की स्थिति आदि को अत्यंत प्रभावशाली रूप में चित्रित किया है |

उपन्यास के केंद्र में स्त्री की सुख-दुखात्मक स्थितियाँ, अंतर्द्वंद्व, आकांक्षा तथा पुरुष से उसका संबंध आदि विषय है | साथ ही उससे जूझती समस्याओं का एवं सवेद्नाओं का मार्मिक विस्तारपूर्वक वर्णन है | इसके साथ ही साथ द्विभाषीय राष्ट्र जैसे भारत और अमेरिकीय जीवन शैली की विरोधी संस्कृतियों की टकराहट भी इनमें स्पष्ट रूप से उभर कर आती है | जिसके चलते पारिवारिक जीवन शैली में तनाव व टकराहट की स्थितियाँ आ जाती है | जिसका परिणाम यह होता है कि स्त्री-पुरुष के संबंध में विखराव के साथ- साथ मानव जीवन में उत्पन्न परिस्थियों से रु-ब-रु करवाया गया है |

संदर्भ ग्रन्थ सूची

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उषा प्रियंवदा का रचना संसार,

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-29

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-42

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-33

सपना दास
एम.फिल (शोधार्थी)
हिंदी विभाग
गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय
दूरभाष संख्या-7044355873
ईमेल पता-sapna070295@gmail.com

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