शब्दखोज

अकविता - आधुनिक भावबोध के समग्र साहित्य की एक प्रमुख विशेषता उसका स्वचेतन होना है।रचना में भाषिक विधान की आधुनिक चिंता इस स्वचेतना का परिणाम है।युवा लेखन में नयी कविता या नव लेखन की इस स्वचेतना के प्रति विरोधी प्रतिक्रिया के परिणाम स्वरूप कई प्रकार के रचना आन्दोलन उभर कर आते हैं-- भूखी-विद्रोही पीढ़ी, अन्यथावाद, अनर्थक अभिव्यक्ति के विभिन्न प्रकार तथा अकहानी और अकविता।

अकहानी - 1960 के दशक में 'नई कहानी' के प्रतिक्रिया स्वरूप 'अकहानी आंदोलन' की शुरूआत हुई।  फ्राँस के ‘एन्टी स्टोरी मूवमेंट’ से प्रभावित इस आन्दोलन में जीवन के प्रति अस्वीकार का भाव देखने को मिलता है। अकहानी आंदोलन के प्रमुख कहानिकरों में गंगा प्रसाद विमल की ‘प्रश्नचिन्ह’, दूधनाथ सिंह की ‘रीछ’, रवींद्र कालिया की ‘नौ साल छोटी पत्नी’, आदि प्रमुख है।

अष्टछाप - वल्लभाचार्य के बाद उनके सुयोग्य पुत्र स्वामी विट्ठलनाथ ने कुछ अपने पिता तथा कुछ अपने शिष्यों को लेकर एक ‘अष्टछाप’ नामक कवि समूह की स्थापना की। इन आठ भक्त-कवियों के हाथों कृष्ण की ललित भक्ति आध्यात्मिकता के साथ ही उच्चकोटि की साहित्यिकता से भी मंडित हो गयी। अष्टछाप के अंतर्गत आनेवाले कवियों के नाम हैं- सूरदास, कुम्भनदास, परमानन्ददास, कृष्णदास, नन्ददास, छीतस्वामी, गोविंदस्वामी तथा चतुर्भुजदास। इन आठ कवियों में सूरदास और नन्ददास उच्चकोटि के काव्यग्रंथो के प्रणयन तथा पुष्टिमार्गी भक्ति-सिद्धांतों के अनुसरण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

अस्तित्ववाद -

वैयक्तिक अस्मिता को लेकर सबसे पहले अस्तित्ववाद में ही गहराई से विचार मिलता है। अस्तित्ववाद मूलतः आधुनिक जीवनशैली एवं मार्क्सवाद के विरोध में पैदा हुआ दर्शन है। यह विचारधारा यह मानती है कि व्यक्ति के विकास एवं निर्माण को समाज विभिन्न वर्जनाओं एवं निषेधों से अवरुद्ध करता है।अस्तित्ववाद के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के सामने विभिन्न संभावनाएँ या रास्ते हैं। मनुष्य इन संभावनाओं या रास्तों में से एक या अधिक का चयन करता है। इस चयन की स्वतंत्रता के परिणास्वरूप ही मनुष्य अपने अस्तित्व को न केवल प्रमाणित करता है बल्कि उसे प्रामाणिक भी बनाता है। अस्तित्ववाद के अनुसार मनुष्य अपनी विषम और पीड़ादायक स्थितियों के लिए स्वयं उत्तरदायी है। अस्तित्ववाद इस जीवन को निस्सार मानता है। कीर्केगार्ड, नीत्शे, सार्त्र और हाइडेगर ने अस्तिववाद के प्रमुख चिंतक हैं।

अनास्था, अजनबीपन, अलगाव, एकाकीपन, संत्रास, चिंता आदि जैसे शब्द अस्तित्ववाद से ही निकले हैं। साहित्य पर भी अस्तित्ववाद का गहरा प्रभाव पड़ा है। हिंदी साहित्य में प्रयोगवादनई कविता और नई कहानी आंदोलन से जुड़े कई लेखकों पर अस्तित्ववाद का सीधा-सीधा प्रभाव देखा जा सकता है। अज्ञेय हिंदी साहित्य में अस्तित्ववाद के प्रतिनिधि साहित्यकार कहे जा सकते हैं। शेखर एक जीवनीनदी के द्वीपअपने अपने अजनबीअंधा युगआधे-अधूरे आदि रचनाओं पर अस्तित्ववादी चिंतन का स्पष्ट प्रभाव है। नई कविता के दौर में अनुभूति की प्रामाणिकता पर दिया जाने वाला बल इसी अस्तिववादी चिंतन का प्रतिफल था। अलग-अलग प्रकार के अस्मिता-विमर्श में भी अनुभूति की प्रामाणिकता को महत्त्वपूर्ण माना गया है। चाहे वह अस्तित्वादी चिंतन से प्रभावित वैयक्तिक अस्मिता हो या दलित, स्त्री, आदिवासी आदि जैसी सामूहिक अस्मिता दोनों जगहों पर भोगे हुए यथार्थ एवं स्वानुभूति को प्रमुखता दी जाती है। यानी इन विमर्शों पर भी अस्तित्ववादी चिंतन के प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता। भले ही यह प्रभाव छाया मात्र ही क्यों न हो।

अस्मिता - हिंदी शब्दकोशों के अनुसार अस्मिता का अर्थ आत्मश्लाघा, अहंकार, मोह, अपनी सत्ता का भाव, आपा इत्यादि है। अस्मिता का सीधा संबंध पहचान है। इस पहचान के कई रूप हो सकते हैं। इसमें राष्ट्र, जाति, नाम, क्षेत्र, धर्म, वंश, लिंग, वर्ग, व्यवसाय आदि शामिल होते हैं। यानी अस्मिता व्यक्तिगत भी हो सकती है और सामूहिक भी। अस्मिता-बोध की तभी आवश्यकता पड़ती है, जब हमारी पहचान पर खतरा हो। तात्पर्य यह कि अगर किसी व्यक्ति या समुदाय के जाति, धर्म, कुल, वंश, राष्ट्र, भाषा, लिंग आदि पहचानों को मिटाने या हीन साबित करने की कोशिश की जाती है तो वह अमुक व्यक्ति या समुदाय इन पहचानों को बचाने की चेष्टा करता है। यह चेष्टा आंदोलन, साहित्य, विचारधारा, कला, इतिहास-लेखन आदि अनेक रूपों में अभिव्यक्त होती है।

अस्मितामूलक-विमर्श - ‘अस्मितामूलक-विमर्श एक नवीन विमर्श है। इस विमर्श पर कई विचारधाराओं का प्रभाव देखा जाता है। इस पर अस्तित्वाद, मार्क्सवाद, आधुनिकतावाद, संरचनावाद, उत्तर-संरचनावाद, उत्तर-आधुनिकतावाद, उत्तर-औपनिवेशवाद, नव-मार्क्सवाद या सबाल्टर्न दृष्टि जैसे कई विचारधाराओं एवं सिद्धांतों का प्रभाव है। परन्तु मुख्य रूप से उत्तर-आधुनिकतावाद, उत्तर-औपनिवेशवाद और सबाल्टर्न दृष्टि ही अस्मितामूलक-विमर्श संबंधी अवधारणाओं एवं सिद्धांतों का निर्माण करती है।

आदिवासी दर्शन - आदिवासियों के जीवन व समाज से संबंधित प्रत्येक विशेषता, परम्पराएँ जैसे-प्रकृति के सान्निध्य में रहना, मानवेतर प्राणाी जगत के साथ सह-अस्तित्व, अपने आप में खुलापन, सामूहिकता, सहभागिता, आदिवासी संस्कृति, जीवन-शैली, उनकी अपनी समस्याएँ, स्वतंत्रता, जल, जंगल, जमीन, अपनी मातृभाषा, अपना इतिहास, लोककथाएँ, मुहावरें, मिथक, विकास की अपनी परिभाषा इत्यादि सब आदिवासी दर्शन के अंतर्गत निहित है। जल, जंगल, जमीन आदिवासियों के मूल आधार है और आदिवासी साहित्य के मूल तत्त्व भी यहीं होने चाहिए। आदिवासी दर्शन सहानुभूति या स्वानुभूति की बजाय सामूहिक अनुभूति में विश्वास करता है। उनके जीवन दर्शन में श्रम की महत्ता है, नैतिकता है, न्याय है, सामुदायिक एकता है। चूँकि आदिवासियों का प्राचीन साहित्य अलिखित है जो मौखिक परंपरा के अंतर्गत आता है। इसी साहित्य में उनका जीवन दर्शन निहित है जिसे लिखित होने के अभाव में कभी देखने का प्रयास नहीं किया गया। इसी मौखिक परंपरा का पुनर्पाठ करने की जरूरत है। आदिवासी दर्शन यह बतलाता है कि प्रकृति का उतना ही उपभोग करो जितना जीवन के लिए जरूरी है, विकासात्मक प्रक्रिया की होड़ में और अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के लिए प्रकृति को नष्ट मत करो। यदि इसी प्रकार प्रकृति का अंधाधुंध दोहन होता रहा तो शीघ्र ही मानव सभ्यता अपने विनाश के कगार पर पहुँच जायेगी और इस संकट से संपूर्ण विश्व को आदिवासी दर्शन ही बचा सकता है।

आदिवासी साहित्य - आदिवासी साहित्य वन संस्कृति से संबंधित साहित्य है। आदिवासी साहित्य वन जंगलों में रहने वाले उन वंचितों का साहित्य है, जिनके प्रश्नों का अतीत में कभी उत्तर ही नहीं दिया गया। यह ऐसे दुर्लक्षितों का साहित्य है, जिनके आक्रोश पर मुख्यधारा की समाज-व्यवस्था ने कान ही नहीं धरे। यह गिरि-कन्दराओं में रहने वाले अन्याय ग्रस्तों का क्रांति साहित्य है। सदियों से जारी क्रुर और कठोर न्याय-व्यवस्था ने जिनकी सैंकड़ो पीढ़ियों को आजीवन वनवास दिया, उस आदिम समूह का मुक्ति-साहित्य है आदिवासी साहित्य। वनवासियों का क्षत जीवन, जिस संस्कृति की गोद में छुपा रहा, उसी संस्कृति के प्राचीन इतिहास की खोज है यह साहित्य। आदिवासी साहित्य इस भूमि से प्रसूत आदिम-वेदना तथा अनुभव का शब्दरूप है।’

आधुनिक - आधुनिक शब्द का प्रयोग विशेषण के रूप में परंपरा से विद्रोह या प्राचीन के विपरीत नवीन रुझानों के लिए होता है। आधुनिकीकरण का संबंध पूँजीवादी व्यवस्था के तहत किए जा रहे यंत्रीकरण तथा औद्योगीकरण से है। आधुनिकता का संबंध आधुनिकीकरण के फलस्वरूप प्राचीन तथा पारंपरिक विचारों एवं मूल्यों, धार्मिक विश्वासों और रूढ़िगत रीति-रिवाजों के विरुद्ध नवीन आविष्कारों, विचारों, मूल्यों और व्यवहारों से है। यही नवीन विचार, मूल्य और व्यवहारों ने जब आंदोलन एवं विचारधारा का स्वरूप ले लिया तो उसे आधुनिकतावाद कहा जाने लगा।

उत्तर-आधुनिकतावाद - आधुनिकतावाद और मार्क्सवाद के विरोध में पैदा हुई विचारधारा है। इस विचारधारा का जन्म बीसवीं शताब्दी के 50 और 60 के दशक में हुआ। यह आधुनिकतावाद के तर्क पद्धति का विखण्डन करती है। यह आधुनिकता एवं आधुनिकतावाद पर प्रश्नचिह्न लगाती है। यह मार्क्सवाद के व्यापक सर्वहारा वर्ग की एकता के विरुद्ध सर्वहारा के भीतर विद्यमान अलग-अलग अस्मिताओं की पहचान करती है। इसके अनुसार कुछ भी संपूर्ण नहीं है। यह संपूर्णता का खंडन करती है। इस कारण यह केंद्रीयता के स्थान पर विकेंद्रीयता, स्थानीयता या क्षेत्रीयता, विभिन्नता आदि पर जोर देती है। यह बहुलतावाद या बहु-संस्कृतिवाद पर आधारित है।

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