आँगन के पार द्वार- अज्ञेय

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    Aangan Ke Par Dwar Agyeya

    आँगन के पार द्वार– अज्ञेय

    अन्तःसलिला

    1. सरस्वती पुत्र

    मन्दिर के भीतर वे सब धुले-पुँछे उघड़े-अवलिप्त,
    खुले गले से
    मुखर स्वरों में
    अति-प्रगल्भ
    गाते जाते थे राम-नाम।
    भीतर सब गूँगे, बहरे, अर्थहीन, जल्पक,
    निर्बोध, अयाने, नाटे,
    पर बाहर जितने बच्चे उतने ही बड़बोले।

    बाहर वह
    खोया-पाया, मैला-उजला
    दिन-दिन होता जाता वयस्क,
    दिन-दिन धुँधलाती आँखों से
    सुस्पष्ट देखता जाता था;
    पहचान रहा था रूप,
    पा रहा वाणी और बूझता शब्द,
    पर दिन-दिन अधिकाधिक हकलाता था:
    दिन-दिन पर उसकी घिग्घी बँधती जाती थी।

    2. बना दे, चितेरे

    बना दे चितेरे,
    मेरे लिए एक चित्र बना दे।

    पहले सागर आँक:
    विस्तीर्ण प्रगाढ़ नीला,
    ऊपर हलचल से भरा,
    पवन के थपेड़ों से आहत,
    शत-शत तरंगों से उद्वेलित,
    फेनोर्मियों से टूटा हुआ,
    किन्तु प्रत्येक टूटन में
    अपार शोभा लिये हुए,
    चंचल उत्कृष्ट,
    -जैसे जीवन।
    हाँ, पहले सागर आँक:
    नीचे अगाध, अथाह,
    असंख्य दबावों, तनावों,
    खींचों और मरोड़ों को
    अपनी द्रव एकरूपता में समेटे हुए,
    असंख्य गतियों और प्रवाहों को
    अपने अखण्ड स्थैर्य में समाहित किये हुए
    स्वायत्त,
    अचंचल
    -जैसे जीवन….

    सागर आँक कर फिर आँक एक उछली हुई मछली:
    ऊपर अधर में
    जहाँ ऊपर भी अगाध नीलिमा है
    तरंगोर्मियाँ हैं, हलचल और टूटन है,
    द्रव है, दबाव है
    और उसे घेरे हुए वह अविकल सूक्ष्मता है
    जिस में सब आन्दोलन स्थिर और समाहित होते हैं;
    ऊपर अधर में
    हवा का एक बुलबुला-भर पीने को
    उछली हुई मछली
    जिसकी मरोड़ी हुई देह-वल्ली में
    उसकी जिजीविषा की उत्कट आतुरता मुखर है।
    जैसे तडिल्लता में दो बादलों के बीच के खिंचाव सब कौंध जाते हैं-
    वज्र अनजाने, अप्रसूत, असन्धीत सब
    गल जाते हैं।

    उस प्राणों का एक बुलबुला-भर पी लेने को-
    उस अनन्त नीलिमा पर छाये रहते ही
    जिस में वह जनमी है, जियी है, पली है, जियेगी,
    उस दूसरी अनन्त प्रगाढ़ नीलिमा की ओर
    विद्युल्लता की कौंध की तरह
    अपनी इयत्ता की सारी आकुल तड़प के साथ उछली हुई
    एक अकेली मछली।

    बना दे, चितेरे,
    यह चित्र मेरे लिए आँक दे।
    मिट्टी की बनी, पानी से सिंची, प्राणाकाश की प्यासी
    उस अन्तहीन उदीषा को
    तू अन्तहीन काल के लिए फलक पर टाँक दे-
    क्योंकि यह माँग मेरी, मेरी, मेरी है कि प्राणों के
    एक जिस बुलबुले की ओर मैं हुआ हूँ उदग्र, वह
    अन्तहीन काल तक मुझे खींचता रहे:
    मैं उदग्र ही बना रहूँ कि
    -जाने कब-
    वह मुझे सोख ले

    3. भीतर जागा दाता

    मतियाया
    सागर लहराया ।
    तरंग की पंखयुक्त वीणा पर
    पवन से भर उमंग से गाया ।
    फेन-झालरदार मखमली चादर पर मचलती
    किरण-अप्सराएँ भारहीन पैरों से थिरकीं—

    जल पर आलते की छाप छोड़ पल-पल बदलती ।
    दूर धुँधला किनारा
    झूम-झूम आया, डगमगाया किया ।
    मेरे भीतर जागा
    दाता
    बोला:
    लो, यह सागर मैंने तुम्हें दिया ।

    हरियाली बिछ गई तराई पर,
    घाटी की पगडण्डी
    लजाई और ओट हुई-
    पर चंचला रह न सकी, फिर उझकी और झाँक गई ।
    छरहरे पेड़ की नई रंगीली फुनगी
    आकाश के भाल पर जय-तिलक आँक गई ।
    गेहूँ की हरी बालियों में से
    कभी राई की उजली, कभी सरसों की पीली फूल-ज्योत्स्ना दिप गई,
    कभी लाली पोस्ते की सहसा चौंका गई—
    कभी लघु नीलिमा तीसी की चमकी और छिप गई ।
    मेरे भीतर फिर जागा
    दाता
    और मैंने फिर नीरव संकल्प किया:
    लो, यह हरी-भरी धरती—यह सवत्सा कामधेनु—मैंने तुम्हें दी
    आकाश भी तुम्हें दिया
    यह बौर, यह अंकुर, ये रंग, ये फूल, ये कोंपलें,
    ये दूधिया कनी से भरी बालियाँ,
    ये मैंने तुम्हें दीं ।
    आँकी-बाँकी रेखा यह,
    मेड़ों पर छाग-छौने ये किलोलते,
    यह तलैया, गलियारा यह
    सारसों के जोड़े, मौन खड़े पर तोलते—
    यह रूप जो केवल मैंने देखा है,
    यह अनुभव अद्वितीय, जो केवल मैंने जिया,
    सब तुम्हें दिया।
    एक स्मृति से मन पूत हो आया ।
    एक श्रद्धा से आहूत प्राणों ने गाया ।
    एक प्यार की ज्वार दुर्निवार बढ़ आया ।
    मैं डूबा नहीं उमड़ा-उतराया,
    फिर भीतर
    दाता खिल आया।
    हँसा, हँस कर तुम्हें बुलाया:
    लो, यह स्मृति, यह श्रद्धा, यह हँसी,
    यह आहूत, स्पर्श-पूत भाव
    यह मैं, यह तुम, यह खिलना,
    यह ज्वार, यह प्लवन,
    यह प्यार, यह अडूब उमड़ना—
    सब तुम्हें दिया ।
    सब
    तुम्हें
    दिया ।

    4. अन्धकार में दीप

    अन्धकार था:
    सब-कुछ जाना-
    पहचाना था
    हुआ कभी न गया हो, फिर भी
    सब-कुछ की संयति थी,
    संहति थी,
    स्वीकृति थी।

    दिया जलाया:
    अर्थहीन आकारों की यह
    अर्थहीनतर भीड़-
    निरर्थकता का संकुल-
    निर्जल पारावार न-कारों का
    यह उमड़ा आया।

    कहाँ गया वह
    जिस ने सब-कुछ को
    ऋत के ढाँचे में बैठाया?

    5. पास और दूर

    जो पास रहे
    वे ही तो सबसे दूर रहे:
    प्यार से बार-बार
    जिन सब ने उठ-उठ हाथ और झुक-झुक कर पैर गहे,
    वे ही दयालु, वत्सल स्नेही तो
    सब से क्रूर रहे।

    जो चले गये
    ठुकरा कर हड्डी-पसली तोड़ गये
    पर जो मिट्टी
    उन के पग रोष-भरे खूँदते रहे,
    फिर अवहेला से रौंद गये:
    उसको वे ही एक अनजाने नयी खाद दे गाड़ गये:
    उसमें ही वे एक अनोखा अंकुर रोप गये।
    -जो चले गये, जो छोड़ गये,
    जो जड़े काट, मिट्टी उपाट,
    चुन-चुन कर डाल मरोड़ गये
    वे नहर खोद कर अनायास
    सागर से सागर जोड़ गये
    मिटा गये अस्तित्व,
    किन्तु वे
    जीवन मुझको सौंप गये।

    देहरादून, 24 अगस्त, 1959

    6. पहचान

    तुम
    वही थीं:
    किन्तु ढलती धूप का कुछ खेल था-
    ढलती उमर के दाग़ उसने धो दिये थे।
    भूल थी
    पर
    बन गयी पहचान-
    मैं भी स्मरण से
    नहा आया।

    7. झील का किनारा

    झील का निर्जन किनारा
    और वह सहसा छाए सन्नाटे का
    एक क्षण हमारा ।
    वैसा सूर्यास्त फिर नहीं दिखा
    वैसी क्षितिज पर सहमी-सी बिजली
    वैसी कोई उत्ताल लहर और नहीं आई
    न वैसी मदिर बयार कभी चली ।

    वैसी कोई शक्ति अकल्पित और अयाचित
    फिर हम पर नहीं छाई ।
    वैसा कुछ और छली काल ने
    हमारे सटे हुए लिलारों पर नहीं लिखा ।

    वैसा अभिसंचित, अभिमंत्रित,
    सघनतम संगोपन कल्पान्त
    दूसरा हमने नहीं जिया ।
    वैसी शीतल अनल-शिखा
    न फिर जली, न चिर-काल पली,
    न हमसे सँभली ।
    या कि अपने को उतना वैसा
    हमीं ने दुबारा फिर नहीं दिया?

    ढाकुरिया झील, कलकत्ता (मोटर में जाते हुए), 29 नवम्बर, 1959

    8. अंतरंग चेहरा

    अरे ये उपस्थित
    घेरते,घूरते, टेरते
    लोग-लोग-लोग-लोग
    जिन्हें पर विधाता ने
    मेरे लिए दिया नहीं
    निजी एक अंतरंग चेहरा ।

    अनुपस्थित केवल वे
    हेरते, अगोरते
    लोचन दो
    निहित निजीपन जिन में
    सब चेहरों का,
    ठहरा ।

    वातायन
    संसृति से मेरे राग-बंध के ।
    लोचन दो-
    सम्पृक्ति निविड़ की
    स्फटिक-विमल वापियाँ
    अचंचल:
    जल
    गहरा-गहरा-गहरा!

    शिक्षायतन, कलकत्ता, 29 नवम्बर, 1959

    9. पराई राहें

    दूर सागर पार
    पराए देश की अनजानी राहें।
    पर शीलवान तरुओं की
    गुरु, उदार
    पहचानी हुई छाँहें।
    छनी हुई धूप की सुनहली कनी को बीन,
    तिनके की लघु अनी मनके-सी बींध, गूँथ, फेरती
    सुमिरनी,
    पूछ बैठी:
    कहाँ, पर कहाँ वे ममतामयी बाँहें?

    ब्रुसेल्स (एक कहवाघर के बाहर खड़े), 15 मई, 1960

    10. पलकों का कँपना

    तुम्हारी पलकों का कँपना ।
    तनिक-सा चमक खुलना, फिर झँपना ।
    तुम्हारी पलकों का कँपना ।
    मानो दीखा तुम्हें लजीली किसी कली के
    खिलने का सपना ।
    तुम्हारी पलकों का कँपना ।

    सपने की एक किरण मुझ को दो ना,
    है मेरा इष्ट तुम्हारे उस सपने का कण होना ।
    और सब समय पराया है ।
    बस उतना क्षण अपना ।
    तुम्हारी पलकों का कँपना ।

    11. एक उदास साँझ

    सूने गलियारों की उदासी ।
    गोखों में पीली मन्द उजास
    स्वयं मूर्च्छा-सी ।
    थकी हारी साँसे, बासी ।

    चिमटी से जकड़ी-सी नभ की थिगली में
    तारों की बिसरी सुइयाँ-सी
    यादें: अपने को टटोलतीं
    सहमीं, ठिठकी, प्यासी ।

    हाँ, कोई आकर निश्चय दिया जलाएगा
    दिपता-झपता लुब्धक सूने में कभी उभर आएगा ।
    नंगी काली डाली पर नीरव
    धुँधला उजला पंछी मँडराएगा ।
    हाँ, साँसों ही साँसों में रीत गया
    अंतर भी भर आएगा ।
    पर वह जो बीत गया- जो नही रहा-
    वह कैसे फिर आएगा?

    12. अनुभव-परिपक्व

    माँ हम नहीं मानते–
    अगली दीवाली पर मेले से
    हम वह गाने वाला टीन का लट्टू
    लेंगे हॊ लेंगे–
    नहीं, हम नहीं जानते–
    हम कुछ नहीं सुनेंगे।

    –कल गुड़ियों का मेला है, माँ।
    मुझे एक दो पैसे वाली
    काग़ज़ की फिरकी तो ले देना।
    अच्छा मैं लट्टू नहीं मांगता–
    तुम बस दो पैसे दे देना।

    –अच्छा, माँ मुझे खाली मिट्टी दे दो–
    मैं कुछ नहीं मांगूंगा:
    मेले जाने का हठ नहीं ठानूंगा।
    जो कहोगी मानूंगा।

    13. सूनी-सी साँझ एक

    सूनी-सी साँझ एक
    दबे-पाँव मेरे कमरे में आई थी ।
    मुझ को भी वहाँ देख
    थोड़ा सकुचायी थी ।
    तभी मेरे मन में यह बात आई थी
    कि ठीक है, यह अच्छी है,
    उदास है, पर सच्ची है:
    इसी की साँवली छाँह में कुछ देर रहूँगा
    इसी की साँस की लहर पर बहूँगा
    चुपचाप इसी के नीरव तलुवों की
    लाल छाप देखता
    कुछ नहीं कहूँगा ।

    पर उस सलोनी के पीछे-पीछे
    घुस आईं बिजली की बत्तियाँ
    बेहया धड़-धड़ गाड़ियों की:
    मानुषों की खड़ी-खड़ी बोलियाँ ।
    वह रुकी तो नहीं, आई तो आ गई;
    पर साथ-साथ मुरझा गई ।
    उस की पहले ही मद्धिम अरुणाली पर
    घुटन की एक स्याही-सी छा गई ।

    -सोचा था कुछ नहीं कहूँगा:
    कुछ नहीं कहा:
    पर मेरे उस भाव का, संकल्प का
    बस, इतना ही रहा ।
    यह नहीं वह न कहना था
    जो कि उस की उदास पर सच्ची लुनाई में बहना था
    जो अपने ही अपने न्रहने को
    तद‍गत हो सहना था ।
    यह तो बस रुँध कर चुप रहना था ।

    यों न जाने कब कहाँ
    वह साँझ
    ओझल हो गई ।
    और मेरे लिए यह
    सूने न रहने की
    रीते न होने की
    बाँझ अनुकम्पा समाज की
    कितनी बोझल हो गई!

    14. एक प्रश्न

    जिन आँखों को तुम ने गहरा बतलाया था
    उन से भर-भर मैंने
    रूप तुम्हारा पिया ।
    जिस काया को तुम रहस्यार्थ से भरी बताते थे
    उस के रोम-रोम से मैंने
    गान तुम्हारा किया ।

    जो प्यार- कहा था तुम ने ही- है सार-तत्त्व जीवन का,
    वही अनामय, निर्विकार, चिर सत्त्व
    मैंने तुम्हें दिया ।

    यों
    तुम से पायी ज्योति-शिखा के शुभ्र वृत्त में
    मैंने अपना
    पल-पल जलता जीवन जिया:
    पर तुम ने- तुम, गुरु, सखा, देवता!-
    तुम ने क्या किया!

    15. अँधेरे अकेले घर में

    अँधेरे अकेले घर में
    अँधेरी अकेली रात ।
    तुम्हीं से लुक-छिप कर
    आज न जाने कितने दिन बाद
    तुम से मेरी मुलाक़ात ।

    और इस अकेले सन्नाटे में
    उठती है रह-रह कर
    एक टीस-सी अकस्मात‍
    कि कहने को तुम्हें इस
    इतने घने अकेले में
    मेरे पास कुछ भी नहीं है बात।

    क्यों नहीं पहले कभी मैं इतना गूँगा हुआ?
    क्यों नहीं प्यार के सुध-भूले क्षणों में
    मुझे इस तीखे ज्ञान ने छुआ
    कि खो देना तो देना नहीं होता-
    भूल जाना और, उत्सर्ग है और बात:
    कि जब तक वाणी हारी नहीं
    और वह हार मैंने अपने में पूरी स्वीकारी नहीं,
    अपनी भावना, संवेदना भी वारी नहीं-
    तब तक वह प्यार भी
    निरा संस्कार है,संस्कारी नहीं।

    हाय, कितनी झीनी ओट में
    झरते रहे आलोक के सोते अवदात-
    और मुझे घेरे रही
    अँधेरे अकेले घर में
    अँधेरी अकेली रात।

    16. चिड़िया ने ही कहा

    मैंने कहा
    कि ‘चिड़िया’:
    मैं देखता रहा-
    चिड़िया चिड़िया ही रही ।
    फिर-फिर देखा
    फिर-फिर बोला,
    ‘चिड़िया’ ।
    चिड़िया चिड़िया ही रही ।

    फिर-जाने कब-
    मैंने देखा नहीं:
    भूल गया था मैं क्षण-भर को तकना!-
    मैं कुछ बोला नहीं-
    खो गई थी क्षण-भर को स्तब्ध चकित-सी वाणी,
    शब्द गए थे बिखर, फटी छीमी से जैसे
    फट कर खो जाते हैं बीज
    अनयना रवहीना धरती में
    होने को अंकुरित अजाने-
    तब-जाने कब-
    चिड़िया ने ही कहा
    कि ‘चिड़िया’ ।
    चिड़िया ने ही देखा
    वह चिड़िया थी ।
    चिड़िया
    चिड़िया नहीं रही है तब से:
    मैं भी नहीं रहा मैं ।

    कवि हूँ!
    कहना सब सुनना है,स्वर केवल सन्नाटा ।

    कहीं बड़े गहरे में
    सभी स्वैर हैं नियम,
    सभी सर्जन केवल
    आँचल पसार कर लेना ।

    देहरादून, 18 अगस्त, 1959

    17. अन्तःसलिला

    रेत का विस्तार
    नदी जिस में खो गई
    कृश-धार ।
    झरा मेरे आँसुओं का भार
    -मेरा दुःख-घन,
    मेरे समीप अगाध पारावार-
    उस ने सोख सहसा लिया
    जैसे लूट ले बटमार ।
    और फिर आक्षितिज
    लहरीला मगर बेटूट
    सूखी रेत का विस्तार-
    नदी जिस में खो गई
    कृश-धार ।

    किंतु जब-जब जहाँ भी जिस ने कुरेदा
    नमी पाई: और खोदा-
    हुआ रस-संचार:
    रिसता हुआ गड्ढा भर गया ।
    यों अजाना पांथ
    जो भी क्लांत आया, रुका ले कर आस,
    स्वल्पायास से ही शांत
    अपनी प्यास
    इसे ले कर गया:
    खींच लम्बी साँस
    पार उतर गया ।

    अरे, अन्तःसलिल है रेत:
    अनगिनत पैरों तले रौंदी हुई अविराम
    फिर भी घाव अपने आप भरती,
    पड़ी सज्जाहीन,
    घूसर-गौर
    निरीह और उदार!

    18. साँस का पुतला

    वासना को बाँधने को
    तूमड़ी जो स्वर-तार बिछाती है-
    आह! उसी में कैसी एकांत निविड़
    वासना थरथराती है!
    तभी तो साँप की कुण्डली हिलती नहीं-
    फन डोलता है ।

    कभी रात मुझे घेरती है,
    कभी मैं दिन को टेरता हूँ,
    कभी एक प्रभा मुझे हेरती है,
    कभी मैं प्रकाश-कण बिखेरता हूँ।
    कैसे पहचानूँ कब प्राण-स्वर मुखर है,
    कब मन बोलता है?

    साँस का पुतला हूँ मैं:
    जरा से बँधा हूँ और
    मरण को दे दिया गया हूँ:
    पर एक जो प्यार है न, उसी के द्वारा
    जीवनमुक्त मैं किया गया हूँ ।
    काल की दुर्वह गदा को एक
    कौतुक-भरा बाल क्षण तोलता है!

    चक्रांत शिला

    19. यह महाशून्य का शिविर

    यह महाशून्य का शिविर,
    असीम, छा रहा ऊपर:
    नीचे यह महामौन की सरिता
    दिग्विहीन बहती है ।

    यह बीच-अधर, मन रहा टटोल
    प्रतीकों की परिभाषा
    आत्मा में जो अपने ही से
    खुलती रहती है ।

    रूपों में एक अरूप सदा खिलता है,
    गोचर में एक अगोचर, अप्रमेय,
    अनुभव में एक अतीन्द्रिय,
    पुरुषों के हर वैभव में ओझल
    अपौरुषेय मिलता है ।

    मैं एक, शिविर का प्रहरी, भोर जगा
    अपने को मौन नदी के खड़ा किनारे पाता हूँ:
    मैं, मौन-मुखर, सब छंदों में
    उस एक निर्वच, छ्म्द-मुक्त को
    #160;गाता हूँ ।

    20. वन में एक झरना बहता है

    वन में एक झरना बहता है
    एक नर कोकिल गाता है
    वृक्षों में एक मर्मर
    कोंपलों को सिहराता है,
    एक अदृश्य क्रम नीचे ही नीचे
    झरे पत्तों को पचाता है
    अंकुर उगाता है ।

    मैं सोते के साथ बहता हूँ,
    पक्षी के साथ गाता हूँ,
    वृक्षों के, कोंपलों के साथ थरथराता हूँ,
    और उसी अदृश्य क्रम में, भीतर ही भीतर
    झरे पत्तों के साथ गलता और जीर्ण होता रहता हूँ
    नए प्राण पाता हूँ ।

    पर सबसे अधिक मैं
    वन के सन्नाटे के साथ मौन हूँ, मौन हूँ-
    क्योंकि वही मुझे बतलाता है कि मैं कौन हूँ,
    जोड़ता है मुझ को विराट‍ से
    जो मौन, अपरिवर्त है, अपौरुषेय है
    जो सब को समोता है ।

    मौन का ही सूत्र
    किसी अर्थ को मिटाए बिना
    सारे शब्द क्रमागत
    सुमिरनी में पिरोता है ।

    21. सुनता हूँ गान के स्वर

    सुनता हूँ गान के स्वर ।
    बहुत से द्रुत, बाल-चपल, तार,
    एक भव्य, मन्द्र गंभीर, बलवती तान के स्वर ।

    मैं वन में हूँ
    सब ओर घना सन्नाटा छाया है
    तब क्वचित‍
    कहीं मेरे भीतर ही यह कोई संगीत-वृन्द आया है ।
    वन-खण्डी की दिशा-दिशा से
    गूँज-गूँज कर आते हैं आह्वान के स्वर ।
    भीतर अपनी शिरा-शिरा से
    उठते हैं आह्लाद और सम्मान के स्वर,
    पीछे, अध-डूबे, अवसान के स्वर ।
    फिर सब से नीचे, पीछे, भीतर, ऊपर,
    एक सहस आलोक-विद्ध उन्मेष,
    चिरन्तन प्राण के स्वर ।

    सुनता हूँ गान के स्वर
    बहुत से द्रुत, बाल-चपल, तार;
    एक भव्य, मन्द्र गम्भीर, बलवती तान के स्वर ।

    22. किरण अब मुझ पर झरी

    किरण अब मुझ पर झरी
    मैंने कहा:
    मैं वज्र कठोर हूँ-
    पत्थर सनातन ।

    किरण बोली:
    भला? ऐसा!
    तुम्हीं को तो खोजती थी मैं:
    तुम्हीं से मंदिर गढूँगी
    तुम्हारे अन्तःकरण से
    तेज की प्रतिमा उकेरूँगी ।

    स्तब्ध मुझ को
    किरण ने
    अनुराग से दुलरा लिया ।

    23. एक चिकना मौन

    एक चिकना मौन
    जिस में मुखर-तपती वासनाएँ
    दाह खोती
    लीन होती हैं ।
    उसी में रवहीन
    तेरा
    गूँजता है छंद:
    ऋत विज्ञप्त होता है ।

    एक काले घोल की-सी रात
    जिस में रूप, प्रतिमा, मूर्त्तियाँ
    सब पिघल जातीं
    ओट पातीं
    एक स्वप्नातीत, रूपातीत
    पुनीत
    गहरी नींद की ।
    उसी में से तू
    बढ़ा कर हाथ
    सहसा खींच लेता-
    गले मिलता है ।

    24. रात में जागा

    रात में जागा
    अंधकार की सिरकी के पीछे से
    मुझे लगा, मैं सहसा
    सुन पाया सन्नाटे की कनबतियाँ
    धीमी, रहस, सुरीली,
    परम गीतिमय ।

    और गीत वह मुझ से बोला, दुर्निवार,
    अरे, तुम अभी तक नहीं जागे,
    और यह मुक्त स्रोत-सा सभी ओर वह चला उजाला!
    अरे, अभागे-
    कितनी बार भरा, अनदेखे,
    छलक-छलक बह गया तुम्हारा प्याला!

    मैंने उठ कर खोल दिया वातायन-
    और दुबारा चौंका:
    वह सन्नाटा नहीं-
    झरोखे से बाहर
    ईश्वर गाता था ।
    इसी बीच फिर
    बाढ़ उषा की आई ।

    25. हवा कहीं से उठी, बही

    (1)
    हवा कहीं से उठी, बही-
    ऊपर ही ऊपर चली गई ।
    पथ सोया ही रहा:
    किनारे के क्षुप चौंके नहीं
    न काँपी डाल, न पत्ती कोई दरकी
    अंग लगी लघु ओस-बूँद भी एक न ढरकी ।

    वन-खण्डी में सधे खड़े पर
    अपनी ऊँचाई में खोए-से
    चीड़
    जाग कर सिहर उठे
    सनसना गए ।
    एकस्वर नाम वही अनजाना
    साथ हवा के
    गा गए ।

    (2)
    ऊपर ही ऊपर
    जो हवा ने गाया,
    देवदारु ने दोहराया,
    जो हिम-चोटियों पर झलका,
    जो साँझ के आकाश से छलका-
    वह किस ने पाया
    जिस ने आयत्त करने की आकाँक्षा का हाथ बढ़ाया?

    आह! वह तो मेरे
    दे दिए गए हृदय में उतरा,
    मेरे स्वीकारी आँसू में ढलका:
    वह अनजाना अनपहचाना ही आया ।
    वह इन सब के- और मेरे- माध्यम से
    अपने को अपने में लाया,
    अपने में समाया ।

    26. जितनी स्फीति इयत्ता मेरी झलकाती है

    जितनी स्फीति इयत्ता मेरी झलकाती है
    उतना ही मैं प्रेत हूँ ।
    जितना रूपाकार-सारमय दिख रहा हूँ
    रेत हूँ ।

    फोड़-फोड़ कर जितने को तेरी प्रतिभा
    मेरे अनजाने, अनपहचाने
    अपने ही मनमाने
    अंकुर उपजाती है-
    बस, उतना मैं खेत हूँ ।

    27. जो बहुत तरसा-तरसा कर

    जो बहुत तरसा-तरसा कर
    मेघ से बरसा
    हमें हरसाता हुआ,
    -माटी में रीत गया ।

    आह! जो हमें सरसाता है
    वह छिपा हुआ पानी है हमारा
    इस जानी-पहचानी
    माटी के नीचे का ।
    -रीतता नहीं
    बीतता नहीं ।

    28. धुँध से ढँकी हुई

    धुँध से ढँकी हुई
    कितनी गहरी वापिका तुम्हारी
    कितनी लघु अंजली हमारी ।

    कुहरे में जहाँ-तहाँ लहराती-सी कोई
    छाया जब-तब दिख जाती है,
    उत्कण्ठा की ओक वही द्रव भर ओठों तक लाती है-
    बिजली की जलती रेखा-सी
    कण्ठ चीरती छाती तक खिंच जाती है ।
    फिर और प्यास तरसाती है,
    फिर दीठ
    धुँध में फाँक खोजने को टकटकी लगाती है ।
    आतुरता हमें भुलाती है
    कितनी लघु अंजली हमारी,
    कितनी गहरी यह धुँध-ढँकी वापिका तुम्हारी ।

    फिर भरते हैं ओक,
    लहर का वृत्त फैल कर हो जाता है ओझल,
    इसी भाँति युग-कल्प शिलित कर गए हमारे पल-पल
    -वापी को जो धुँध ढँके है, छा लेती है
    गिरि-गह्वर भी अविरल ।
    किंतु एक दिन खुल जाएगा
    स्फटिक-मुकुर-सा निर्मल वापी का तल,
    आशा का आग्रह हमेम किए है बेकल-
    धुँध-ढँकी
    कितनी गहरी वापिका तुम्हारी,
    कितनी लघु अंजली हमारी ।

    किन्तु नहीं क्या यही धुँध है सदावर्त
    जिस में नीरन्ध्र तुम्हारी करुणा
    बँटती रहती है दिन-याम?
    कभी झाँक जाने वाली छाया ही
    अन्तिम भाषा-सम्भव-नाम?
    करुणा-धाम!
    बीज-मन्त्र यह, सार-सूत्र यह, गहराई का एक यही परिमाण
    हमारा यही प्रणाम!

    धुँध-ढँकी
    कितनी गहरी वापिका तुम्हारी-
    लघु अंजली हमारी ।

    29. तू नहीं कहेगा ?

    तू नहीं कहेगा?
    मैं फिर भी सुन ही लूँगा ।

    किरण भोर की पहली भोलेपन से बतलावेगी,
    झरना शिशु-सा अनजान उसे दुहरावेगा,
    घोंघा गीली पीली रेती पर धीरे-धीरे आँकेगा,
    पत्तों का मर्मर कनबतियों में जहाँ-तहाँ फ़ैलावेगा,
    पंछी की तीखी कूक फरहरे-मढ़े शल्य-सी आसमान पर
    टाँकेगी,
    फिर दिन सहसा खुल कर उस को सब पर प्रकटावेगा,
    निर्मम प्रकाश से सब कुछ पर सुलझा सब कुछ लिख जावेगा ।

    मैं गुन लूँगा ।
    तू नहीं कहेगा?
    आस्था है,
    नहीं अनमना हूँगा तब-
    मैं सुन लूँगा ।

    30. अरी ओ आत्मा री

    अरी ओ आत्मा री,
    कन्या भोली क्वाँरी
    महाशून्य के साथ भाँवरें तेरी रची गईं ।

    अब से तेरा कर एक वही गह पाएगा-
    सम्भ्रम-अवगुण्ठित अंगों को
    उस का ही मृदुतर कौतूहल
    प्रकाश की किरण छुआएगा ।
    तुझ से रहस्य की बात निभृत मे
    एक वही कर पाएगा ।
    तू उतना, वैसा समझेगी वह जैसा जो समझाएगा ।

    तेरा वह प्राप्य, वरद कर उस का तुझ पर जो बरसाएगा
    उद्देश्य, उसे जो भावे; लक्ष्य, वही जिस ओर मोड़ दे वह-
    तेरा पथ मुड़-मुड़ कर सीधा उस तक ही जाएगा ।
    तू अपनी भी उतनी ही होगी जितना वह अपनाएगा ।
    ओ आत्मा री,
    तू गयी वरी
    महाशून्य के साथ भाँवरें तेरी रची गईं ।

    हाँ छूट चला यह घर, उपवन,
    परिचित-परिगण, मैं भी, आत्मीय सभी,
    पर खेद न कर, हम थे इतने तक के अपने-
    हम रचे ही गए थे यथार्थ आधे, आधे सपने-
    आँखें भर कर ले फेर, और भर अंजलि दे बिखेर
    पीछे को फूल:
    -स्मरण के, श्रद्धा के, कृतज्ञता के, सब के-
    हम नहीं पूछते, जो हो, बस, मत हो परिताप कभी ।

    जा आत्मा, जा
    कन्या-वधुका-
    उस की अनुगा,
    वह महाशून्य ही अब तेरा पथ,
    लक्ष्य, अन्न-जल, पालक, पति,
    आलोक,धर्म:
    तुझ को वह एकमात्र सरसाएगा ।

    ओ आत्मा री
    तू गई वरी,
    ओ सम्पृक्ता,
    ओ परिणीता,
    महाशून्य के साथ भाँवरें तेरी रची गईं ।

    31. अकेली और अकेली

    अकेली और अकेली ।
    प्रियतम धीर, समुद सब सहने वाला;
    मनचली सहेली ।

    अकेला:
    वह तेजोमय है जहाँ,
    दीठ बेबस झुक जाती है;
    वाणी तो क्या, सन्नाटे तक की गूँज
    वहाँ चुक जाती है ।
    शीतलता उस की एक छुअन-भर से
    सारे रोमांच शिलित कर देती है,
    मन के द्रुत रथ की अविश्रान्त गति
    कभी नहीं उस का पदनख तक परिक्रान्त कर पाती है ।
    वह
    इस लिए
    अकेला ।

    अकेली:
    जो कहना है, वह भाषा नहीं माँगता ।
    इस लिए किसी को साक्षी नहीं माँगता,
    जो सुनना है, वह जहाँ झरेगा तेज-भस्म कर डालेगा-
    तब कैसे कोई उसे झेलने के हित पर से साझा पालेगा?
    वह
    इस लिए निरस्र, निर्वसन, निस्साधन, निरीह,
    इस लिए
    अकेली ।

    32. वह धीरे-धीरे आया

    वह धीरे-धीरे आया
    सधे पैरों से चला गया ।

    किसी ने उसको छुआ नहीं ।
    उस असंग को अटकाने को
    कोई कर न उठा ।

    उस की आँखें रहीं देखती सब-कुछ
    सब-कुछ को वात्सल्य-भाव से सहलाती, असीसती,
    पर ऐसे, कि अयाना है सब-कुछ, शिशुवत अबोध ।
    अटकी नहीं दीठ वह,
    जैसे तृण-तरु को छूती प्रभात की धूप
    दीठ भी आगे चली गई ।

    आगे, दूर, पार, आगे को,
    जहाँ और भी एक असंग सधा बैठा है,
    जिस की दीठ देखती सब-कुछ,
    सब-कुछ को सहलाती, दुलराती, असीसती,
    -उस को भी, शिशुवत‍ अबोध को मानो-
    किंतु अटकती नहीं, चली जाती है और आगे ।

    आगे?
    हाँ, आगे, पर
    उस से आगे सब आयाम
    घूम-घूम जाते हैं चक्राकार,
    उसी तक लौट
    समाहित हो जाते हैं ।

    33. जो कुछ सुन्दर था, प्रेम, काम्य

    जो कुछ सुन्दर था, प्रेय, काम्य,
    जो अच्छा, मँजा नया था, सत्य-सार,
    मैं बीन-बीन कर लाया
    नैवेद्य चढ़ाया ।
    पर यह क्या हुआ?
    सब पड़ा-पड़ा कुम्हलाया, सूख गया मुरझाया:
    कुछ भी तो उसने हाथ बढ़ा कर नहीं लिया ।

    गोपन लज्जा में लिपटा, सहमा स्वर भीतर से आया:
    यह सब मन ने किया,
    हृदय ने कुछ नहीं दिया,
    थाती का नहीं, अपना हो जिया ।
    इस लिए आत्मा ने कुछ नहीं छुआ ।

    केवल जो अस्पृश्य, गर्ह्य कह
    तज आई मेरे अस्तित्त्व मात्र की सत्ता,
    जिस के भय से त्रस्त, ओढ़ती काली घृणा इयत्ता,
    उतना ही, वही हलाहल उस ने लिया ।
    और मुझ को वात्सल्य-भरा आशिष दे कर-
    ओक भर पिया ।

    34. मैं कवि हूँ

    मैं कवि हूँ
    दृष्टा, उन्मेष्टा,
    संधाता,
    अर्थवाह,
    मैं कृतव्यय ।

    मैं सच लिखता हूँ:
    लिख-लिख कर सब
    झूठा करता जाता हूँ ।

    तू काव्य:
    सदा-वेष्टित यथार्थ
    चिर-तनित,
    भारहीन, गुरु,
    अव्यय ।

    तू छलता है
    पर हर छल में
    तू और विशद, अभ्रान्त,
    अनूठा होता जाता है ।

    35. न कुछ में से वृत्त यह निकला

    न कुछ में से वृत्त यह निकला कि जो फिर
    शून्य में जा विलय होगा:
    किंतु वह जिस शून्य को बाँधे हुए है-
    उस में एक रूपातीत ठण्डी ज्योति है ।

    तब फिर शून्य कैसे हैं-कहाँ हैं?
    मुझे फिर आतंक किस का है?

    शून्य को भजता हुआ भी मैं
    पराजय को बरजता हूँ ।
    चेतना मेरी बिना जाने
    प्रभा में निमजती है:
    मैं स्वयं
    उस ज्योति से अभिषिक्त
    सजता हूँ ।

    36. अंधकार में चली गई है

    अँधकार में चली गई है
    काली रेखा
    दूर-दूर पार तक ।

    इसी लीक को थामे मैं
    बढ़ता आया हूँ
    बार-बार द्वार तक ।

    ठिठक गया हूँ वहाँ:
    खोज यह दे सकती है मार तक ।

    चलने की है यही प्रतिज्ञा
    पहुँच सकूँगा मैं
    प्रकाश के पारावार तक;

    क्यों चलना यदि पथ है केवल
    मेरे अंधकार से
    सब के अंधकार तक?
    -या कि लाँघ कर ही उस को
    पहुँचा जावेगा
    सब-कुछ धारण करने वाली पारमिता करुणा तक-
    निर्वैयक्तिक प्यार तक?

    37. उस बीहड़ काली एक शिला पर बैठा दत्तचित्त

    उस बीहड़ काली एक शिला पर बैठा दत्तचित्त-
    वह काक चोंच से लिखता ही जाता है अविश्राम
    पल-छिन, दिन-युग, भय-त्रास, व्याधि-ज्वर,
    जरा-मृत्यु,
    बनने-मिटने के कल्प, मिलन-बिछुड़न,
    गति-निगति-विलय के
    अन्तहीन चक्रान्त ।

    इस धवल शिला पर यह आलोक-स्नात,
    उजला ईश्वर-योगी, अक्लान्त शांत,
    अपनी स्थिर, धीर, मंद स्मिति से वह सारी लिखत
    मिटाता जाता है ।

    योगी!
    वह स्मिति मेरे भीतर लिख दे:
    मिट जाए सभी जो मिटता है ।
    वह अलम‍ होगी ।

    38. ढूह की ओट बैठे

    ढूह की ओट बैठे
    बूढ़े से मैंने कहा:
    मुझे मोती चाहिए ।

    उसने इशारा किया:
    पानी में कूदो!
    मैंने कहा: मोती मिलेगा ही, इस का भरोसा क्या?
    उस ने एक मूँठ बालू उठा मेरी ओर कर दी ।
    मैंने कहा: इस में से मिलेगा मुझे मोती?
    उस ने एक कंकड़ उठाया और
    अनमने भाव से मुझे दे पारा ।

    मैंने बड़ा जतन दिखाते हुए उसे बीन लिया
    और कहा: यही क्या मोती है-
    आप का?

    धीरे-धीरे झुका माथा ऊँचा हुआ,
    मुड़ा वह मेरी ओर ।
    सागर-सी उसकी आँखें थीं
    सदियों की रेती पर
    इतिहास की हवाओं की लिखतों-सी
    नैन-कोरों की झुर्रियाँ ।
    बोला वह:
    (कैसी एक खोई हुई हवा उन
    बालूओं के ढूहों में से, घासों में से
    सर्पिल-सी फिसली चली गई)

    हाँ:
    या कि नहीं क्यों?
    मिट्टी के भीतर
    पत्थर था
    पत्थर के भीतर
    पानी था
    पानी के भीतर
    मेंढक था
    मेंढक के भीतर

    अस्थियाँ थीं यानी मिट्टी-पत्थर था,
    लहू की धार थी यानी पानी था,
    श्वास था यानी हवा थी,
    जीव था-यानी मेंढक था ।

    मोती जो चाहते हो
    उस की पहचान अगर यह नही
    तो और क्या है?

    39. यही, हाँ, यही

    यही, हाँ, यही-
    कि और कोई बची नहीं रही
    उस मेरी मधु-मद-भरी
    रात की निशानी:
    एक यह ठीकरे हुआ प्याला
    कहता है-
    जिसे चाहो तो मान लो कहानी ।

    और दे भी क्या सकता हूँ हवाला
    उस रात का:
    या प्रमाण अपनी बात का?
    उस धूमयुक्त कम्पहीन
    अपने ही ज्वलन के हुताशन के
    ताप-शुभ्र केन्द्र-वृत्त में
    उस युग साक्षात का?

    यों कहीं तो था लेखा:
    पर मैंने जो दिया, जो पाया,
    जो पिया, जो गिराया,
    जो ढाला, जो छलकाया,
    जो नितारा, जो छाना,
    जो उतारा, जो चढ़ाया,
    जो जोड़ा, जो तोड़ा, जो छोड़ा-
    सब का जो कुछ हिसाब रहा, मैंने देखा
    कि उसी यज्ञ-ज्वाला में गिर गया ।
    और उसी क्षण मुझे लगा कि अरे, मैं तिर गया
    -ठीक है मेरा सिर फिर गया ।

    मैं अवाक हूँ, अपलक हूँ ।
    मेरे पास और कुछ नहीं है
    तुम भी यदि चाहो
    तो ठुकरा दो:
    जानता हूँ कि मैं भी तो ठीकरा हूँ ।
    और मुझे कहने को क्या हो
    जब अपने तईं खरा हूँ?

    40. ओ मूर्त्ति !

    ओ मूर्त्ति!
    वासनाओं के विलय,
    अदम आकांक्षा के विश्राम!
    वस्तु-तत्त्व के बंधन से छुटकारे के
    ओ शिलाभूत संकेत,
    ओ आत्म-साक्षय के मुकुर,
    प्रतीकों के निहितार्थ!
    सत्ता-करुणा, युगनद्ध!
    ओ मंत्रों के शक्ति-स्रोत,
    साधनाके फल के उत्सर्ग,
    ओ उद्गतियों के आयाम!

    ओ निश्छाय, अरूप
    अप्रतिम प्रतिमा,
    ओ निःश्रेयस‍
    स्वयंसिद्ध!

    41. व्यथा सब की

    व्यथा सब की,
    निविड़तम एकांत
    मेरा ।

    कलुष सब का
    स्वेच्छया आहूत;
    सद्यःधौत अन्तःपूत
    बलि मेरी ।

    ध्वांत इस अनसुलझ संसृति के
    सकल दौर्बल्य का,
    शक्ति तेरे तीक्ष्णतम, निर्मम, अमोघ
    प्रकाश-सायक की!

    42. उसी एकांत में घर दो

    उसी एकांत में घर दो
    जहाँ पर सभी आवें:
    वही एकांत सच्चा है
    जिसे सब छू सकें
    मुझ को यही वर दो

    उसी एकांत में घर दो
    कि जिस में सभी आवें-
    -मैं न आऊँ ।
    नहीं मैं छू भी सकूँ जिस को
    मुझे ही जो छुए, घेरे, समो ले ।
    क्योंकि जो मुझ से छुआ जा सका-
    मेरे स्पर्श से चटका-
    नहीं है आसरा, वह छत्र कच्चा है:
    वही एकांत सच्चा है
    जिसे छूने मैं चलूँ तो पलट कर टूट जाऊँ ।
    लौट कर फिर वहीं आऊँ
    किंतु पाऊँ
    जो उसे छू रहा है वह मैं नहीं हूँ:
    सभी हैं वे । सभी: वह भी जो कि इस का बोध
    मुझ तक ला सका ।
    उसी एकांत में घर दो-
    यही वर दो ।

    43. सागर और धरा मिलते थे जहाँ

    सागर और धरा मिलते थे जहाँ
    सन्धि-रेख पर
    मैं बैठा था ।

    नहीं जानता
    क्यों सागर था मौन
    क्यों धरा मुखर थी ।

    सन्धि-रेख पर बैठा मैं अनमना
    देखता था सागर को
    किंतु धरा को सुनता था ।
    सागर की लहरों में जो कुछ पढ़ता था
    रेती की लहरों पर लिखता जाता था ।

    मैं नहीं जानता
    क्यों
    मैं बैठा था ।

    पर वह सब तब था
    जब दिन था ।
    फिर जब
    धरती से उठा हुआ सूरज
    तपते-तपते हो जीर्ण
    गिरा सागर में-
    तब संध्या की तीखी किरण एक
    उठ
    मुझे विद्ध करती सायक-सी
    उसी सन्धि-रेख से बाँध
    अचानक डूब गई ।
    फिर धीरे-धीरे
    रात घेरती आई, फैल गई ।
    फिर अंधकार में
    मौन हो गई धरा,
    मुखर हो सागर गाने लगा गान ।

    मुझे और कुछ लखने-सुनने
    पढ़ने-लिखने को नहीं रहा:
    अपने भीतर
    गहरे में मैंने पहचान लिया
    है यही ठीक । सागर ही गाता रहे,
    धरा हो मौन,
    यही सम्यक‍ स्थिति है ।

    यद्यपि क्यों
    मैं नहीं जानता ।

    फिर मैं सपने से जाग गया ।

    हाँ, जाग गया ।
    पर क्या यह जगा हुआ मैं
    अब से युग-युग
    उसी संधि-रेख पर वैसा
    किरण-विद्ध ही बँधा रहूँगा?

    44. आँगन के पार

    आँगन के पार
    द्वार खुले
    द्वार के पार आँगन ।
    भवन के ओर-छोर
    सभी मिले-
    उन्हीं में कहीं खो गया भवन ।

    कौन द्वारी
    कौन आगारी, न जाने,
    पर द्वार के प्रतिहारी को
    भीतर के देवता ने
    किया बार-बार पा-लागन ।

    45. दूज का चाँद

    दूज का चाँद-

    मेरे छोटे घर-कुटीर का दिया
    तुम्हारे मंदिर के विस्तृत आँगन में
    सहमा-सा रख दिया गया ।

    असाध्य वीणा

    आ गये प्रियंवद! केशकम्बली! गुफा-गेह!
    राजा ने आसन दिया। कहा:
    “कृतकृत्य हुआ मैं तात! पधारे आप।
    भरोसा है अब मुझ को
    साध आज मेरे जीवन की पूरी होगी!”

    लघु संकेत समझ राजा का
    गण दौड़े! लाये असाध्य वीणा,
    साधक के आगे रख उसको, हट गये।
    सभा की उत्सुक आँखें
    एक बार वीणा को लख, टिक गयीं
    प्रियंवद के चेहरे पर।

    “यह वीणा उत्तराखंड के गिरि-प्रान्तर से
    –घने वनों में जहाँ व्रत करते हैं व्रतचारी —
    बहुत समय पहले आयी थी।
    पूरा तो इतिहास न जान सके हम:
    किन्तु सुना है
    वज्रकीर्ति ने मंत्रपूत जिस
    अति प्राचीन किरीटी-तरु से इसे गढा़ था —
    उसके कानों में हिम-शिखर रहस्य कहा करते थे अपने,
    कंधों पर बादल सोते थे,
    उसकी करि-शुंडों सी डालें

    हिम-वर्षा से पूरे वन-यूथों का कर लेती थीं परित्राण,
    कोटर में भालू बसते थे,
    केहरि उसके वल्कल से कंधे खुजलाने आते थे।
    और –सुना है– जड़ उसकी जा पँहुची थी पाताल-लोक,
    उसकी गंध-प्रवण शीतलता से फण टिका नाग वासुकि सोता था।
    उसी किरीटी-तरु से वज्रकीर्ति ने
    सारा जीवन इसे गढा़:
    हठ-साधना यही थी उस साधक की —
    वीणा पूरी हुई, साथ साधना, साथ ही जीवन-लीला।”

    राजा रुके साँस लम्बी लेकर फिर बोले:
    “मेरे हार गये सब जाने-माने कलावन्त,
    सबकी विद्या हो गई अकारथ, दर्प चूर,
    कोई ज्ञानी गुणी आज तक इसे न साध सका।
    अब यह असाध्य वीणा ही ख्यात हो गयी।
    पर मेरा अब भी है विश्वास
    कृच्छ-तप वज्रकीर्ति का व्यर्थ नहीं था।
    वीणा बोलेगी अवश्य, पर तभी।
    इसे जब सच्चा स्वर-सिद्ध गोद में लेगा।
    तात! प्रियंवद! लो, यह सम्मुख रही तुम्हारे
    वज्रकीर्ति की वीणा,
    यह मैं, यह रानी, भरी सभा यह:
    सब उदग्र, पर्युत्सुक,
    जन मात्र प्रतीक्षमाण!”

    केश-कम्बली गुफा-गेह ने खोला कम्बल।
    धरती पर चुपचाप बिछाया।
    वीणा उस पर रख, पलक मूँद कर प्राण खींच,
    करके प्रणाम,
    अस्पर्श छुअन से छुए तार।

    धीरे बोला: “राजन! पर मैं तो
    कलावन्त हूँ नहीं, शिष्य, साधक हूँ–
    जीवन के अनकहे सत्य का साक्षी।
    वज्रकीर्ति!
    प्राचीन किरीटी-तरु!
    अभिमन्त्रित वीणा!
    ध्यान-मात्र इनका तो गदगद कर देने वाला है।”

    चुप हो गया प्रियंवद।
    सभा भी मौन हो रही।

    वाद्य उठा साधक ने गोद रख लिया।
    धीरे-धीरे झुक उस पर, तारों पर मस्तक टेक दिया।
    सभा चकित थी — अरे, प्रियंवद क्या सोता है?
    केशकम्बली अथवा होकर पराभूत
    झुक गया तार पर?
    वीणा सचमुच क्या है असाध्य?
    पर उस स्पन्दित सन्नाटे में
    मौन प्रियंवद साध रहा था वीणा–
    नहीं, अपने को शोध रहा था।
    सघन निविड़ में वह अपने को

    सौंप रहा था उसी किरीटी-तरु को
    कौन प्रियंवद है कि दंभ कर
    इस अभिमन्त्रित कारुवाद्य के सम्मुख आवे?
    कौन बजावे
    यह वीणा जो स्वंय एक जीवन-भर की साधना रही?
    भूल गया था केश-कम्बली राज-सभा को:

    कम्बल पर अभिमन्त्रित एक अकेलेपन में डूब गया था
    जिसमें साक्षी के आगे था
    जीवित रही किरीटी-तरु
    जिसकी जड़ वासुकि के फण पर थी आधारित,
    जिसके कन्धों पर बादल सोते थे
    और कान में जिसके हिमगिरी कहते थे अपने रहस्य।
    सम्बोधित कर उस तरु को, करता था
    नीरव एकालाप प्रियंवद।

    “ओ विशाल तरु!
    शत सहस्र पल्लवन-पतझरों ने जिसका नित रूप सँवारा,
    कितनी बरसातों कितने खद्योतों ने आरती उतारी,
    दिन भौंरे कर गये गुंजरित,
    रातों में झिल्ली ने
    अनथक मंगल-गान सुनाये,
    साँझ सवेरे अनगिन
    अनचीन्हे खग-कुल की मोद-भरी क्रीड़ा काकलि
    डाली-डाली को कँपा गयी–

    ओ दीर्घकाय!
    ओ पूरे झारखंड के अग्रज,
    तात, सखा, गुरु, आश्रय,
    त्राता महच्छाय,
    ओ व्याकुल मुखरित वन-ध्वनियों के
    वृन्दगान के मूर्त रूप,
    मैं तुझे सुनूँ,
    देखूँ, ध्याऊँ
    अनिमेष, स्तब्ध, संयत, संयुत, निर्वाक:
    कहाँ साहस पाऊँ
    छू सकूँ तुझे!
    तेरी काया को छेद, बाँध कर रची गयी वीणा को

    किस स्पर्धा से
    हाथ करें आघात
    छीनने को तारों से
    एक चोट में वह संचित संगीत जिसे रचने में
    स्वंय न जाने कितनों के स्पन्दित प्राण रचे गये।

    “नहीं, नहीं! वीणा यह मेरी गोद रही है, रहे,
    किन्तु मैं ही तो
    तेरी गोदी बैठा मोद-भरा बालक हूँ,
    तो तरु-तात! सँभाल मुझे,
    मेरी हर किलक
    पुलक में डूब जाय:

    मैं सुनूँ,
    गुनूँ,
    विस्मय से भर आँकू
    तेरे अनुभव का एक-एक अन्त:स्वर
    तेरे दोलन की लोरी पर झूमूँ मैं तन्मय–
    गा तू:
    तेरी लय पर मेरी साँसें
    भरें, पुरें, रीतें, विश्रान्ति पायें।
    “गा तू!
    यह वीणा रखी है: तेरा अंग — अपंग।
    किन्तु अंगी, तू अक्षत, आत्म-भरित,
    रस-विद,
    तू गा:
    मेरे अंधियारे अंतस में आलोक जगा
    स्मृति का
    श्रुति का —

    तू गा, तू गा, तू गा, तू गा!

    ” हाँ मुझे स्मरण है:
    बदली — कौंध — पत्तियों पर वर्षा बूँदों की पटापट।
    घनी रात में महुए का चुपचाप टपकना।
    चौंके खग-शावक की चिहुँक।
    शिलाओं को दुलारते वन-झरने के
    द्रुत लहरीले जल का कल-निनाद।
    कुहरें में छन कर आती
    पर्वती गाँव के उत्सव-ढोलक की थाप।
    गड़रिये की अनमनी बाँसुरी।
    कठफोड़े का ठेका। फुलसुँघनी की आतुर फुरकन:
    ओस-बूँद की ढरकन-इतनी कोमल, तरल, कि झरते-झरते

    मानो हरसिंगार का फूल बन गयी।
    भरे शरद के ताल, लहरियों की सरसर-ध्वनि।
    कूँजो की क्रेंकार। काँद लम्बी टिट्टिभ की।
    पंख-युक्त सायक-सी हंस-बलाका।
    चीड़-वनो में गन्ध-अन्ध उन्मद मतंग की जहाँ-तहाँ टकराहट
    जल-प्रपात का प्लुत एकस्वर।
    झिल्ली-दादुर, कोकिल-चातक की झंकार पुकारों की यति में
    संसृति की साँय-साँय।

    “हाँ मुझे स्मरण है:
    दूर पहाड़ों-से काले मेघों की बाढ़
    हाथियों का मानों चिंघाड़ रहा हो यूथ।
    घरघराहट चढ़ती बहिया की।
    रेतीले कगार का गिरना छ्प-छपाड़।
    झंझा की फुफकार, तप्त,
    पेड़ों का अररा कर टूट-टूट कर गिरना।

    ओले की कर्री चपत।
    जमे पाले-ले तनी कटारी-सी सूखी घासों की टूटन।
    ऐंठी मिट्टी का स्निग्ध घास में धीरे-धीरे रिसना।
    हिम-तुषार के फाहे धरती के घावों को सहलाते चुपचाप।
    घाटियों में भरती
    गिरती चट्टानों की गूंज —
    काँपती मन्द्र — अनुगूँज — साँस खोयी-सी,
    धीरे-धीरे नीरव।

    “मुझे स्मरण है
    हरी तलहटी में, छोटे पेडो़ की ओट ताल पर
    बँधे समय वन-पशुओं की नानाबिध आतुर-तृप्त पुकारें:
    गर्जन, घुर्घुर, चीख, भूख, हुक्का, चिचियाहट।
    कमल-कुमुद-पत्रों पर चोर-पैर द्रुत धावित
    जल-पंछी की चाप।
    थाप दादुर की चकित छलांगों की।
    पन्थी के घोडे़ की टाप धीर।
    अचंचल धीर थाप भैंसो के भारी खुर की।

    “मुझे स्मरण है
    उझक क्षितिज से
    किरण भोर की पहली
    जब तकती है ओस-बूँद को
    उस क्षण की सहसा चौंकी-सी सिहरन।
    और दुपहरी में जब
    घास-फूल अनदेखे खिल जाते हैं
    मौमाखियाँ असंख्य झूमती करती हैं गुंजार —
    उस लम्बे विलमे क्षण का तन्द्रालस ठहराव।
    और साँझ को
    जब तारों की तरल कँपकँपी

    स्पर्शहीन झरती है —
    मानो नभ में तरल नयन ठिठकी
    नि:संख्य सवत्सा युवती माताओं के आशिर्वाद —
    उस सन्धि-निमिष की पुलकन लीयमान।

    “मुझे स्मरण है
    और चित्र प्रत्येक
    स्तब्ध, विजड़ित करता है मुझको।
    सुनता हूँ मैं
    पर हर स्वर-कम्पन लेता है मुझको मुझसे सोख —
    वायु-सा नाद-भरा मैं उड़ जाता हूँ। …
    मुझे स्मरण है —
    पर मुझको मैं भूल गया हूँ:
    सुनता हूँ मैं —
    पर मैं मुझसे परे, शब्द में लीयमान।

    “मैं नहीं, नहीं! मैं कहीं नहीं!
    ओ रे तरु! ओ वन!
    ओ स्वर-सँभार!
    नाद-मय संसृति!
    ओ रस-प्लावन!
    मुझे क्षमा कर — भूल अकिंचनता को मेरी —
    मुझे ओट दे — ढँक ले — छा ले —
    ओ शरण्य!
    मेरे गूँगेपन को तेरे सोये स्वर-सागर का ज्वार डुबा ले!
    आ, मुझे भला,
    तू उतर बीन के तारों में
    अपने से गा
    अपने को गा —
    अपने खग-कुल को मुखरित कर

    अपनी छाया में पले मृगों की चौकड़ियों को ताल बाँध,
    अपने छायातप, वृष्टि-पवन, पल्लव-कुसुमन की लय पर
    अपने जीवन-संचय को कर छंदयुक्त,
    अपनी प्रज्ञा को वाणी दे!
    तू गा, तू गा —
    तू सन्निधि पा — तू खो
    तू आ — तू हो — तू गा! तू गा!”

    राजा आगे
    समाधिस्थ संगीतकार का हाथ उठा था —
    काँपी थी उँगलियाँ।
    अलस अँगड़ाई ले कर मानो जाग उठी थी वीणा:
    किलक उठे थे स्वर-शिशु।
    नीरव पद रखता जालिक मायावी
    सधे करों से धीरे धीरे धीरे
    डाल रहा था जाल हेम तारों-का ।

    सहसा वीणा झनझना उठी —
    संगीतकार की आँखों में ठंडी पिघली ज्वाला-सी झलक गयी —
    रोमांच एक बिजली-सा सबके तन में दौड़ गया ।
    अवतरित हुआ संगीत
    स्वयम्भू
    जिसमें सीत है अखंड
    ब्रह्मा का मौन
    अशेष प्रभामय ।

    डूब गये सब एक साथ ।
    सब अलग-अलग एकाकी पार तिरे ।

    राजा ने अलग सुना:

    “जय देवी यश:काय
    वरमाल लिये
    गाती थी मंगल-गीत,
    दुन्दुभी दूर कहीं बजती थी,
    राज-मुकुट सहसा हलका हो आया था, मानो हो फल सिरिस का
    ईर्ष्या, महदाकांक्षा, द्वेष, चाटुता
    सभी पुराने लुगड़े-से झड़ गये, निखर आया था जीवन-कांचन
    धर्म-भाव से जिसे निछावर वह कर देगा ।

    रानी ने अलग सुना:
    छँटती बदली में एक कौंध कह गयी —
    तुम्हारे ये मणि-माणिक, कंठहार, पट-वस्त्र,
    मेखला किंकिणि —
    सब अंधकार के कण हैं ये! आलोक एक है
    प्यार अनन्य! उसी की
    विद्युल्लता घेरती रहती है रस-भार मेघ को,
    थिरक उसी की छाती पर उसमें छिपकर सो जाती है
    आश्वस्त, सहज विश्वास भरी ।
    रानी
    उस एक प्यार को साधेगी ।

    सबने भी अलग-अलग संगीत सुना ।
    इसको
    वह कृपा-वाक्य था प्रभुओं का —
    उसकी
    आतंक-मुक्ति का आश्वासन:
    इसको
    वह भरी तिजोरी में सोने की खनक —
    उसे
    बटुली में बहुत दिनों के बाद अन्न की सोंधी खुशबू ।
    किसी एक को नयी वधू की सहमी-सी पायल-ध्वनि ।
    किसी दूसरे को शिशु की किलकारी ।
    एक किसी को जाल-फँसी मछली की तड़पन —
    एक अपर को चहक मुक्त नभ में उड़ती चिड़िया की ।
    एक तीसरे को मंडी की ठेलमेल, गाहकों की अस्पर्धा-भरी बोलियाँ

    चौथे को मन्दिर मी ताल-युक्त घंटा-ध्वनि ।
    और पाँचवें को लोहे पर सधे हथौड़े की सम चोटें
    और छठें को लंगर पर कसमसा रही नौका पर लहरों की अविराम थपक ।
    बटिया पर चमरौधे की रूँधी चाप सातवें के लिये —
    और आठवें को कुलिया की कटी मेंड़ से बहते जल की छुल-छुल
    इसे गमक नट्टिन की एड़ी के घुँघरू की
    उसे युद्ध का ढाल:
    इसे सझा-गोधूली की लघु टुन-टुन —
    उसे प्रलय का डमरू-नाद ।
    इसको जीवन की पहली अँगड़ाई
    पर उसको महाजृम्भ विकराल काल!
    सब डूबे, तिरे, झिपे, जागे —
    ओ रहे वशंवद, स्तब्ध:
    इयत्ता सबकी अलग-अलग जागी,
    संघीत हुई,
    पा गयी विलय ।

    वीणा फिर मूक हो गयी ।
    साधु! साधु! ”
    उसने
    राजा सिंहासन से उतरे —
    “रानी ने अर्पित की सतलड़ी माल,

    हे स्वरजित! धन्य! धन्य! ”

    संगीतकार
    वीणा को धीरे से नीचे रख, ढँक — मानो
    गोदी में सोये शिशु को पालने डाल कर मुग्धा माँ
    हट जाय, दीठ से दुलारती —
    उठ खड़ा हुआ ।
    बढ़ते राजा का हाथ उठा करता आवर्जन,
    बोला:
    “श्रेय नहीं कुछ मेरा:
    मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में
    वीणा के माध्यम से अपने को मैंने
    सब कुछ को सौंप दिया था —
    सुना आपने जो वह मेरा नहीं,
    न वीणा का था:
    वह तो सब कुछ की तथता थी
    महाशून्य
    वह महामौन
    अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय
    जो शब्दहीन
    सबमें गाता है ।”

    नमस्कार कर मुड़ा प्रियंवद केशकम्बली। लेकर कम्बल गेह-गुफा को चला गया ।

    उठ गयी सभा । सब अपने-अपने काम लगे ।
    युग पलट गया ।

    प्रिय पाठक! यों मेरी वाणी भी
    मौन हुई ।