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hindi kavita

वसुंधरा वंदन: विश्वरुप साह ‘परीक्षित’

हिमालय बन रक्षक प्रहरी, सागर निशदिन चरण पखारे।

सावन की प्रथम फुहार

सुनी आज पपिहे की बोली , कहां चली मंडुकों की टोली? क्यों हुआ चातक भाव विह्वल, क्यों मुसकाई वसुंधरा मंद- मंद?

‘अवगत’ अवार्ड 2021

अकादमिक/शोध/साहित्य के क्षेत्र में यदि आपने कार्य किया है, अर्थात उक्त संदर्भित क्षेत्र में आपके कोई भी प्रकाशन हुए हैं, तब आप इस ‘‘अवगत‘‘ अवार्ड 2021 हेतु पंजीयन कर सकते हैं।

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कविता- नींद

कविता- नींद - डॉ. ऋचा त्रिवेदी

स्त्रियों पर कविताएँ: सुशांत सुप्रिय

कविता- स्त्रियों पर कविताएँ: सुशांत सुप्रिय

कहानी- इंडियन काफ़्का: सुशांत सुप्रिय

एक मुरझाई मुस्कान चेहरे पर आ कर सट जाती है । चेहरे की स्लेट से उसे पोंछ कर मैं खिड़की से बाहर झाँकता हूँ । एक और सिमसिमी शाम ढल चुकी है । रोशनी एक अंतिम कराह के साथ बुझ चुकी है । एक और पसीजी रात मटमैले आसमान की छत से उतर कर मेरे सलेटी कमरे में घुसपैठ कर चुकी है । उसी कमरे में जहाँ मैं हूँ , दीवारें हैं , छत है , सीलन है , घुटन है , सन्नाटा है और मेरा अंतहीन अकेलापन है । हाँ , अकेलापन । मेरा एकमात्र शत्रु-मित्र ।

अनूदित लातिन अमेरिकी कहानी-एक पीला फूल

दरअसल मुझे वह फूल बेहद सुंदर लगा और तब यह अहसास मुझ पर शिद्दत से हावी हुआ कि एक दिन मैं मर कर सदा के लिए ख़त्म हो जाने वाला था । वह फूल बेहद सुंदर था और भविष्य में आने वाले लोगों के लिए फूल हमेशा मौजूद होंगे और तभी मैं अनस्तित्व और नगण्यता के बारे में सब कुछ जान गया ।

मरघट लाशों से पट गया-प्रियंका पांडेय त्रिपाठी

kavita- जो कल तक थे अपने, वे लावारिश लाश हो गए। कुछ नदी के किनारे पड़े, तो कुछ नदी में तैर रहे।।

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