कविता- नींद

0
77
grayscale photo of womans face
Photo by engin akyurt on Unsplash

नींद आयी

मेरी पलकों पर बैठ

मुझसे बोली

सुनो!

मैंने कहा-बोलो

आज तो ख्वाब आने से रहे

मैंने कहा क्यों?

वह बोली

कॉफी बनाओ

मैंने कहा- आधी रात

वह बोली

मेरा मन कर रहा है

रात नापते नापते

कदम बोझिल हो गये हैं

फिर मैंने मुस्कुराकर

दो प्याली कॉफी बनायी

हमने साथ साथ पी

तब तक लाली छा गई

वह बोली

अब मैं सूरज की छाती पर

सिर रखकर सोने जा रही!

   डॉ. ऋचा द्विवेदी
Sending
User Review
( votes)
यह भी पढ़ें -  कविता संग्रह 'युद्ध अभी जारी है': अरविंद भारती

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.