भाषा की बदलती पहचान

डॉ० कमल कुमार
असिस्टेंट प्रोफेसर(हिंदी)
उमेशचंद्र कॉलेज
13,सूर्य सेन स्ट्रीट,कोलकाता-12
मो.09883778805

‘निज भाषा उन्नति अहै,सब उन्नति को मूल.बिन निज भाषा ज्ञान के,मिटत न हिय को शूल’ का विचार रखते समय भारतेंदु जी के मन मष्तिष्क में अपनी भाषा के प्रति समर्पित जागरूकता दिखाई दे रही थी.उन्हें इस बात का एहसास हो चुका था अगर हमें देश को एक सूत्र में पिरोना हैं तो हमें सबसे पहले भाषाई स्तर पर संगठित होना होगा.जब तक विचारों का उचित स्तर पर आदान प्रदान नहीं होगा तब तक समाज में जन जागृति का स्वर मजबूती से नहीं उभरेगा.आगे चल कर देश के कई विद्वान विचारक,राजनीतिज्ञ और साहित्यकारों ने इस मुहिम को अंजाम तक पहुचने में महती भूमिका अदा की और इसे देश की आजादी की भाषा के रूप में पहुचा दिया. वक्त के बदलाव के साथ ही भाषा के स्वरूप में भी बदलाव दिखने लगा.भाषा के प्रारंभिक स्वरूप में हुए बदलाव को क्रमबद्ध तरीके से देखना है तो हमें भारतेंदु युग के रचनाकारों के अलावा हरिऔध जी की रचनाओं की भाषा को देखना चाहिये,जहाँ हिंदी भाषा का विकास क्रमबद्ध तरीके से होता है.उन्नीसवीं सदी के आस पास जब खड़ी बोली गद्य के भाषा के रूप में साँसे ले रही थी उसी समय हरिऔध जी ने हिंदी भाषा में कविता के विकास को ब्रज भाषा से शुरू करते हुए बोलचाल की भाषा और ठेठ हिंदी के प्रयोग करते हुए ,संस्कृतनिष्ठ हिंदी से होते हुए तद्भव,उर्दू से युक्त खड़ी हिंदी का प्रयोग किया.जो आगे आने वाले रचनाकारों भाषाई स्तर पर उनके लिए पथ प्रदर्शन का कार्य करती हैं.

मैकाले की शिक्षा नीति अपने रूप का विस्तार कर चुकी थी.समाज में एक ऐसे वर्ग का उदय होता है जो अपनी भाषा से परे दूसरी भाषा में जीवकोपार्जन का विकल्प खोजता है,साथ ही वह अपने दैनिक जीवन में भी उसका प्रयोग करना शुरू करता है. संस्कृति,रीति रिवाज़ आदि को आत्मसात करने लगते हैं. हम किसी भी भाषा को सीखने-बोलने के खिलाफ नहीं पर यह अपने मातृभाषा के बलिदान पर हो यह उचित नहीं. अब हम अपने बच्चें के मुंह से ‘जाँनी-जाँनी यस पापा’ या ‘हम्पी-डम्पी’ जैसी अंग्रेजी की कविता सुनकर अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं.वहीं पहले के हिंदी माध्यम की पाठशालाओं के प्राथमिक कक्षाओं में हिंदी की बारहखड़ी सिखाई जाती थी.जिससे हिंदी भाषा,मात्राओं और शुद्द उच्चारण का सही ज्ञान होता था.लेकिन हमारी अब भाषा के प्रति हीनता बोध के कारण इसे स्वीकार करने में संकोच करती है.अंग्रेजी का विरोध करना हमारे पिछड़ेपन की निशानी मानी जाती है,कहाँ जाता है कि पढ़ने-लिखने में कमजोर और पिछड़े इलाकों के लोग ही ऐसे सवाल उठाते हैं,जबकि यह प्रश्न इससे कही बड़ी हैं.

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भारत एक बहुभाषा-भाषी देश हैं और इसकी अपनी प्रतिबद्धताएँ है. कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और पूर्वोत्तर से लेकर कच्छ तक हमारी विचारधाराएँ,खान-पान,रहन-सहनऔर लोककथाएं सब एक दूसरे से अलग है लेकिन जब प्रश्न सम्पूर्ण देश को एकता के सूत्र में पिरोने की बात होती है तो ‘हिंदी’ हमें एक मिट्टी के बने होनें का एहसास कराती है. हमें अगर हिन्दी को सच में विश्व भाषा बनाने की ओर बढ़ना हैं तो भारत में बोली जाने वाली मातृभाषाओं अवधी,भोजपुरी,मैथिली,ब्रज,मगही जैसी अनेक बोलिओं के विकास और इनके व्याकरण को भी मजबूत करना होगा,अन्यथा नींव कमजोर होने पर भाषा रूपी महल भरभरा कर गिर जायेगा.हमें इस सच्चाई को स्वीकार करना होंगा कि बोलचाल के शब्द,देशी शब्द,तद्भव,अरबी-फारसी,उर्दू,अंग्रेजी के शब्द भाषा के विकास में बाधा नहीं डालते बल्कि विकास के पथ को और मजबूत करती है.हिन्दी को सुगम और सहज बनाने की दिशा में यह परिवर्तन स्वीकार करना होगा लेकिन अपनी पहचान को बरक़रार रखकर तभी हम अपने दरकते नींव को बचा पाएंगे. समय की धार को समझाना होगा और बदलते भाषिक स्वरुप को स्वीकार करना होगा. सामजस्य की भावना ही भाषा के विस्तार का मूल है इसीलिए तो कहा जाता है-‘कोस-कोस पर पानी बदले,आठ कोस पर बानी’.

आज हिंदी का प्रभाव ग्लोबल रूप में बढ़ रहा है तो उसका सबसे बड़ा कारण हमारा उत्तर आधुनिक होता समाज,औद्योगिक क्रांति और संचार माध्यमों का बढ़ता प्रयोग.इनके अलावा हिंदी आज मीडिया,मनोरंजन,राजनीति और विज्ञापन की भाषा के रूप में तब्दील होती जा रही है. मीडिया और मनोरंजन की पूरी दुनिया हिंदी के इसी विस्तारवाद का फायदा उठा रही है, किन्तु जब हिंदी को देने की बारी आती है तो यह उससे दोयम दर्जे का व्यवहार करते है. न्यूज़ चैनल पर दिखने वाले हेडिंग,अखबारों में प्रयोग किये जा रहे शीर्षक,फिल्मों के नाम एवं गीतों में हिंदी भाषा का अतार्किक प्रयोग केवल भाषा को मसालेदार और लोगों को लुभाने के लिए किया जा रहा है. भाषा का विस्तार करना अलग चीज है लेकिन भाषा के साथ खिलवाड़ करना चिंता का विषय हैं. भाषा हमारी सोच और दृष्टिकोण को भी प्रभावित करती है,वह हमारे ख्यालात को बदलने का माद्दा रखती है. आज की मीडिया और मनोरंजन की दुनिया जिस भाषा का प्रयोग कर रहा है वह भाषा के लिए चिंता का विषय है.भाषा का सम्बन्ध जातीय चेतना से जुड़ी होती है,हमें इस तथ्य को ध्यान रखना होगा. बेशक हिंदी भाषा के प्रचार और प्रसार में टी.वी.और फिल्मों का अमूल्य योगदान है.अहिंदी भाषा भाषी क्षेत्रों में भी आपको हिंदी फिल्मों के गीत संगीत गाते और सुनते लोग आप को मिल जायेगें. अब तो मोबाईल क्रांति ने लोगों को अपनी भाषा के और नजदीक लाया है. गूगल और फेसबुक जैसे संचार माध्यम अब हिंदी में भी अपने पेज से लोगो को और नजदीक ला रहे है.यह हिंदी का बढ़ता कद वैश्विक बाज़ार के बढ़ते प्रभाव का फल है. तक़रीबन विश्व के १३० विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ी और पढाई जा रही हैं.भारत के अलावा कई अन्य देशों में हिंदी बोली जा रही है. यह बेशक हमें गौरवान्वित होने का अवसर दे लेकिन मंजिल अभी दूर है,अपनी भाषा के प्रति हमें और सजग होना होगा तभी मुकम्मल मंजिल मिलेगी.

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सम्पूर्ण विश्व में भाषा का संकट गहराता जा रहा है कारण हैं संचार माध्यम,संचार में भाषा का बढ़ता प्रयोग भाषा के विकास के लिए फायदेमंद है तो दूसरी ओर वह चिंता का विषय भी बनता जा रहा है.भाषा अब संकेतों में सिमटती जा रही हैं, ईमोजी (सांकेतिक् भाषा) का बढ़ता चलन भावों के अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनती जा रही हैं, ईमोजी में जहाँ आप अपने विचारों को महज कुछ संकेतों में प्रकट कर रहे है वहीं भाषा के द्वारा कुछ शब्दों में. युवाओं में इसका बढ़ता चलन इसकी लोकप्रियता का प्रमाण है. भारत में स्मार्टफ़ोन का प्रयोग करने वालों की संख्या करीब साठ करोड़ के आस पास है इसी से इसकी महत्ता को समझा जा सकता हैं. हिंदी से जुड़ी अनेक पत्र-पत्रिकाएं और ब्लॉग इंटरनेट पर अपनी सशक्त मौजूदगी से भाषा के प्रसार में अहम् भूमिका निभा रही हैं.अब तो आधुनिकता भी हिंदी के समर्थन में है कई ऐसे सॉफ्टवेयर आ गए हैं जिनमे आप अपनी बात किसी भी भाषा में लिखे और हिंदी में अनुवाद सामने आ जा रहा है. युवाओं ने दिल खोलकर इस तकनीक का स्वागत किया है.अब सरकार ने भी अपनी कई योजनाओं के प्रसार में इस तकनीक से लोगों को जोड़ना शुरू किया है. यह तो इन संशाधनों के प्रयोग का एक सकारात्मक पहलू हैं,हमें भाषा के स्तर पर हिंदी के विकास में इनका प्रयोग करना होगा तभी हम इसके नींव को मजबूत कर पाएंगे. हिंदी को ज्ञान-विज्ञान की भाषा बनाने के लिए हमें उदारता का परिचय देना होगा तब हम हिंदी को मुकम्मल रूप में देख पाएंगे. भारत के सन्दर्भ में भाषा की समस्या थोड़ी जटिल अवश्य है पर हल किया जा सकता हैं.बस जरुरत है बेहतर कार्य योजना और तालमेल की.

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