संपर्क भाषा के रूप में भारत में हिंदी

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रश्मि रानी, पीएच.डी. (भाषा प्रौद्योगिकी)
भाषा प्रौद्योगिकी विभाग, भाषा विद्यापीठ
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)

किसी भी भाषा को संपर्क भाषा का दर्जा मिलना बहुत बड़ी बात होती है क्योंकि संपर्क भाषा जोड़ने का कार्य करती है। परस्पर संपर्क बनाए रखने के लिए संपर्क भाषा का होना बहुत आवश्यक है। एक व्यक्ति को दूसरे भाषा समुदाय के व्यक्ति से, एक प्रांत को दूसरे प्रांत से, एक देश को दूसरे देश से संपर्क स्थापित करने के लिए जिस भाषा का प्रयोग किया जाता है वही संपर्क भाषा कहलाती है। संपर्क भाषा मातृभाषा से अलग भाषा होती है जो हमें अपने भाषा समुदाय से भिन्न भाषा समुदाय से संपर्क स्थापित करने में मदद करती है। जिस प्रकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेजी को संपर्क भाषा का दर्जा प्राप्त है उसी प्रकार राष्ट्रीय स्तर पर भारत में हिंदी को संपर्क भाषा का दर्जा दिया गया है। बोधगम्यता को भाषा-बोली के निर्धारण का आधार माना जाए तो हिंदी को संपूर्ण उत्तर भारत की संपर्क भाषा माना जा सकता है। दक्षिण भारत में भले ही हिंदी को लेकर विरोध की स्थिति बनी रहती है तत्पश्चात भी कुछ हद तक हिंदी संपर्क भाषा का कार्य कर रही है। हालाँकि अंग्रेजी भी एक संपर्क भाषा के रूप में कार्य कर रही है। किंतु एक आम शिक्षित भारतीय यदि पूरे देश की यात्रा पर निकलता है तो संपर्क भाषा के रूप में हिंदी ही उसकी लाठी बनती है। इसीलिए सही मायने में हिंदी ही भारत की संपर्क भाषा है अंग्रेजी ने तो भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर रखी है। अंग्रेजी सिर्फ पढ़े लिखे उच्च वर्ग के लिए संपर्क भाषा का कार्य कर सकती है। कुछ लोगों के द्वारा फैलाया गया ये मायाजाल से मुक्ति हिंदी के भले के लिए बहुत आवश्यक है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के दौरान भी हिंदी भिन्न भाषा-भाषी लोगों के बीच संपर्क स्थापित करने का साधन रही और उसने देशवासियों को एकता के सूत्र में पिरोया। हिंदी के इसी महत्त्व के कारण महामा गाँधी ने कहा था- “प्रांतीय भाषा या भाषाओँ के बदले में नहीं बल्कि उनके अलावा एक प्रांत से दूसरे प्रांत का संबंध जोड़ने के लिए सर्वमान्य भाषा की आवश्यकता है और ऐसी भाषा तो एकमात्र हिंदी या हिन्दुस्तानी ही हो सकती है।”

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कोई भाषा तभी तक चहुंमुखी विकास कर पाती है जब तक उसका संपर्क आम जनता से रहता है। जीवित भाषा निरंतर विकास की ओर अग्रसर रहती है। हिंदी अपने उद्भव काल से ही विभिन्न प्रदेशों की संपर्क भाषा रही है। डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार अकबर के महल में बोलचाल की भाषा हिंदी ही थी। अंग्रेजी शासन स्थापित हो जाने के बाद अंग्रेज़ अफसर भारत की आम जनता से संपर्क साधने के लिए हिंदी भाषा सीखते थे। हिंदी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों का प्रमुख हथियार भी थी।

मध्य देश की हिंदी जो दसवीं सदी के आसपास एक सीमित क्षेत्र सूरसेन प्रदेश (मथुरा के आस पास) में बोली जाती थी वह विकसित होते-होते इतनी सक्षम हो गई की भारत के विभिन्न प्रदेशों की संपर्क भाषा के रूप में सहर्ष स्वीकार कर ली गई।

हिंदी भाषियों की संख्या व हिंदी भाषा का सामर्थ्य हिंदी को राष्ट्र व संपर्क भाषा का दर्जा देने के लिए उपयुक्त है किंतु हिंदीतर प्रदेश का हिंदी के प्रति विरोध हिंदी को संपर्क भाषा का दर्जा देने का विरोध करता आ रहा है। उन्हें अपनी भाषा न्यून होती नज़र आने लगती है जो सत्य नहीं है। विश्व में अंग्रेजी के ज्ञान का महत्व सब जानते हैं किंतु हिंदी को स्वीकार करने का आशय अंग्रेजी का विरोध करना बिल्कुल नहीं है। भारत में बोली जाने वाली अन्य भाषाओँ की अपेक्षा हिंदी का फलक इतना बड़ा है कि दिन-प्रतिदिन हिंदी बोलने वाले भारतीयों की संख्या बढ़ती जा रही है। भारत की अन्य किसी भाषा की अपेक्षा हिंदी में ये योग्यता अधिक है कि वो दो समुदायों की बात समझ व समझा पाए।

हिंदी के बढ़ते प्रयोग का अंदाजा प्रस्तुत आंकड़ों पर नज़र डालकर लगा सकते हैं जो ये बताते हैं कि किस प्रकार हिंदी ने संपर्क भाषा के रूप में अपनी जड़ें जमाई हैं-

वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार भारत के लगभग ४१.३ % लोगों द्वारा हिंदी भाषा का प्रयोग किया जाता है। times of india अख़बार के 19 जून 2014 के अंक के अनुसार 1971 से मातृभाषा के रूप में हिंदी बोलने वाले लोगों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। कुल जनसंख्या में हिंदी बोलने वालों की संख्या 1971 में 36.99 % थी जो 1981 में बढ़कर 38.74% और 1991 में 39.29% हो गई।

हिंदी को जनभाषा और संपर्क भाषा बनाने में इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। हिंदी फिल्मों और फ़िल्मी गीतों ने हिंदी को लोकप्रिय बनाने में महती भूमिका निभाई है। अहिंदी भाषी राज्यों में हिंदी फिल्में और गीत्त बहुत लोकप्रिय हैं। प्राचीन समय की बात की जाए तो हिंदी साहित्यकारों ने भी हिंदी को प्रचारित करने में मुख्य भूमिका निभाई है। हिंदी के प्रारंभिक उपन्यासकार देवकीनंदन खत्री ऐसे उपन्यासकार रहे हैं जिनके उपन्यासों को पढ़ने के लिए लोग हिंदी सीखते थे। उनके कुछ उपन्यास जैसे चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति तो पूरे भारत में लोकप्रिय हुए। हिंदी को संपर्क भाषा बनाने में हिंदी साहित्यकारों का भी मुख्य योगदान रहा है। दक्षिण भारतीय हिंदी साहित्यकार भी हिंदी को दक्षिण में मज़बूत स्थिति प्रदान करने के कार्य में लगे हुए हैं। श्री आरिगपुडि रमेश चौधरी, श्री बालशौरि रेड्डी, के नारायण, डॉ. एन चंद्रशेखरन नायर, डॉ. रामन नायर, डॉ. पी आदेश्वर राव, डॉ. रामन नायर, आनंद शंकर माधवन, जी. सीतारामय्या, पि. नारायण “नरन” आदि प्रमुख दक्षिण भारतीय हिंदी साहित्यकार हैं। इन साहित्यकारों ने अपनी मातृभाषा के साथ-साथ हिंदी लेखन के क्षेत्र में भी नाम कमाया। इनकी हिंदी रचनाएं भी हिंदी को दक्षिण भारत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

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दक्षिण भारत में हिंदी को भले ही विरोध का सामना करना पड़े किंतु सच्चाई यही है कि यदि एक उत्तर भारतीय को दक्षिण भारत में जाना पड़े तो उसे हिंदी का ही सहारा मिलेगा। अंग्रेजी कम “पढ़े लिखे भारतीयों के लिए संपर्क भाषा का कार्य नहीं कर सकती। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कहा था कि “हिंदी इसलिए बड़ी नहीं है कि हममें से कुछ इस भाषा में कहानी या कविता लिख लेते हैं या सभा मंचों पर बोल लेते हैं। वह इसलिए बड़ी है कि कोटि-कोटि जनता के हृदय और मस्तिष्क की भूख मिटाने में यह भाषा इस देश का सबसे बड़ा साधन हो सकती है। यदि देश में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को हमें जन-साधारण तक पहुँचाना है तो इसी भाषा का सहारा लेकर हम काम कर सकते हैं।”

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अनुसार देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को भारत संघ की राजभाषा घोषित किया गया है । हिंदी को राजभाषा इसलिए बनाया गया क्योंकि यह भारत की अधिकांश जनता द्वारा बोली तथा समझी जाने वाली भाषा थी। हिंदी भाषी क्षेत्र के अधिकांश व्यक्ति सीमित एवं व्यापक तथा औपचारिक संदर्भों के लिए हिंदी का प्रयोग करते हैं। जबकि अन्य भाषाओँ के बोलने वालों के लिए देश से खुद को जोड़ने के लिए हिंदी एक संपर्क भाषा का कार्य करती है। ब्रिटिश काल में अंतर-भाषाई संपर्क के लिए अंग्रेजी को संपर्क भाषा के रूप में विकसित किया गया था। यह दायित्व अंग्रेजी निभाती तो रही लेकिन अत्यंत सीमित क्षेत्र में। अंग्रेजी की अपेक्षा हिंदी संपर्क भाषा के रूप में कहीं अधिक सक्षम है। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में कोई भी भाषा किसी पर अनचाहे रूप से थोपी नहीं जा सकती।

भारतीय भाषा नियोजन की यह विशेषता रही है कि हिंदी को किसी अन्य भारतीय भाषा या अंग्रेजी के प्रतिस्पर्धी के रूप में नहीं रखा गया है। यह सर्वविदित है कि कोई भी भाषा अभिव्यक्ति-माध्यम के रूप में अक्षम या कम क्षमता रखने वाली नहीं होती, विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोग के अवसर मिलने पर ही भाषा सक्षम बनती चली जाती है। हिंदी को वो अवसर प्राप्त होता चला गया जिसे वो अन्य किसी भारतीय भाषा की अपेक्षा अधिक सक्षम रूप में सामने आई। हिंदी भारत में ही नहीं भारत के बहार भी विश्व के अनेक देशों में बोली, समझी और पढाई जाती है। आज विश्व के लगभग 150 विश्वविद्यालयों में हिंदी के पठन–पाठन की व्यवस्था है। विदेशों में बसे करोड़ों की संख्या में प्रवासी भारतीयों औरर भारतीय मूल के लोगों के बीच आत्मीयता के संबंध सूत्र स्थापित करने और उन्हें भारत, भारतीयता, और भारतीय संस्कृति से निरंतर जोड़े रखने में हिंदी एक सशक्त माध्यम का काम कर रही है और इसी में वे अपनी अस्मिता की पहचान भी देख रहे हैं।

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भारत के प्रथम लोकसभा स्पीकर अनंतशयनम आयंगार के अनुसार – “अहिंदी भाषा-भाषी प्रांतों के लोग भी सरलता से टूटी –फूटी हिंदी बोलकर अपना काम चला लेते हैं”।
पंडित नेहरु ने हिंदी की सशक्तता का वर्णन करते हुए कहा था कि “हिंदी स्वयं अपनी ताकत से बढ़ेगी”।

हिंदी में रोज़गार के बढ़ते अवसर भी हिंदी के प्रसार में महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ है। बढ़ते रोज़गार अवसरों ने भी हिंदी सीखने के प्रति लोगों की रुचि को बढ़ाया है। हिंदी का क्षेत्र किसी अन्य भारतीय भाषा की तुलना में अधिक व्यापक है। इस प्रकार भारत में एक राज्य को दुसरे राज्य से यदि कोई भाषा जोड़ सकती है तो वो मात्र हिंदी ही है। अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भले ही देशों को जोड़ने वाली भाषा हो किंतु भारत में संपर्क भाषा के रूप में हिंदी अधिक सशक्त साबित हुई है। यहां तक कि विदेशी कंपनियों को भी भारत में अपनी पहचान बनाने के लिए अंग्रेजी से अधित हिंदी का सहारा लेना पड़ता है। संचार माध्यम भी हिंदी के द्वारा सूचनाओं को प्रसारित करना अधिक उपयोगी समझते हैं। यही कारण है कि अंग्रेजी समाचार चैनलों द्वारा अपने हिंदी चैनल भी शुरू किए जा रहे हैं। इस प्रकार हिंदी कितनी सशक्त और विकास की ओर अग्रसर है इसका अनुमान संपूर्ण भारत में हिंदी की लोकप्रियता और मौजूदगी देखकर लगाया जा सकता है। अंग्रेजी के मायाजाल से निकलना हमारे लिए आवश्यक है।

निम्नलिखित विद्वानों की के ये हिंदी के संपर्क भाषा रूप की भूमिका को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है –

देवव्रत शास्त्री के अनुसार “ हिंदी जानने वाला व्यक्ति देश के किसी भी कोने में जाकर अपना काम चला लेता

है।”

अंतरराष्ट्रीय ख्याती के एक विद्वान राजनयिक डा. स्मेकल ने कहा था कि “भारतवासियों से बातें करते हुए हिंदी निरंतर मेरे समीप रही संपर्क भाषा के रूप में।“

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1 टिप्पणी

  1. हिन्दी के संबंध में जो बात विश्व हिंदी में आती है, वह बिल्कुल सही है। लेकिन दक्षिण भारत के सिर्फ दोराज्य अपने अपस्वर करते हैं। मैं भी दक्षिण भारतीय हूँ। हमारे राज्य में हिंदी पढ़ते हैं और गौरव भी देते हैं
    मैं सभी हिंदीवासियों से निवेदन करता हूँ कि कर्नाटक को हिंदी विरोधी न कहें। हिंदी संपर्क भाषा को स्वीकारते हैं। राजनीति में इसका गलत लाभ उठाने वाले हैं। इसे हम महाराष्ट्र्र में भी देख सकते हैं।

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