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हिंदी व्याकरण

सर्वनाम। sarvnam

जिन शब्दों का प्रयोग संज्ञा के स्थान पर किया जाता है, उन्हें सर्वनाम कहते है।

तत्सम और तद्भव शब्द । tatsam aur tadbhav shabd

हिंदी भाषा में उत्पत्ति की दृष्टि से शब्द चार प्रकार ( तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी ) के होते हैं।

संपर्क भाषा के रूप में भारत में हिंदी

संपर्क भाषा मातृभाषा से अलग भाषा होती है जो हमें अपने भाषा समुदाय से भिन्न भाषा समुदाय से संपर्क स्थापित करने में मदद करती है। जिस प्रकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेजी को संपर्क भाषा का दर्जा प्राप्त है उसी प्रकार राष्ट्रीय स्तर पर भारत में हिंदी को संपर्क भाषा का दर्जा दिया गया है।

राजभाषा हिन्दी : समृद्ध इतिहास और भावी चुनौतियाँ

घ का कर्तव्य होगा कि वह हिन्दी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे , जिससे भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्त्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके

राष्ट्रभाषा हिन्दी और जनपदीय बोलियाँ

राष्ट्रभाषा हिन्दी व उनकी सभी बोलियों का मूल स्रोत संस्कृत भाषा है।वैदिक साहित्य की भाषा के विश्लेषण से ये संकेत तो स्पष्ट मिलते हैं कि उस काल में बोलचाल में तीन प्रकार की बोलियां थीं-पश्चिमोत्तरी, मध्यवर्ती तथा पूर्वी

हिंदी भाषा शिक्षण हेतु वेब आधारित सामग्री का मूल्यांकन

पिछले दो दशक में प्रौद्योगिकी का विकास हुआ है वह बेशक असाधारण और आश्चर्यजनक रूप से निरंतर आगे बढ़ रही है। आज इंटरनेट का व्यापक उपयोग भाषा शिक्षण के लिए हो रहा है। अनेक अन्य भाषाओं के लिए नए-नए वेबसाइट डिजाइन किए जा रहे है।

शैली की उपयोगिता एवं महत्ता

एक भाषा - भाषी व्यक्तियों की भाषा, ध्वनि, शब्द, रूप तथा वाक्य -रचना आदि की दृष्टि से पूर्णतः समान नहीं होती । इसी प्रकार एक ही भाषा में लिखने वाले लेखकों एवं कवियों की भाषा में उनकी कुछ शैलीगत विशेषताए होती हैं

हिंदी और मराठी की समान रूपी भिन्‍नार्थी शब्‍दावली

हिंदी और मराठी दोनों भाषाओं की शब्‍दावली विभिन्‍न स्रोतों से आई है । आर्य परिवार की भाषाएं होने के कारण दोनों पर संस्‍कृत का अधिक प्रभाव है ।

भाषा की बदलती पहचान

आज हिंदी का प्रभाव ग्लोबल रूप में बढ़ रहा है तो उसका सबसे बड़ा कारण हमारा उत्तर आधुनिक होता समाज,औद्योगिक क्रांति और संचार माध्यमों का बढ़ता प्रयोग.इनके अलावा हिंदी आज मीडिया,मनोरंजन,राजनीति और विज्ञापन की भाषा के रूप में तब्दील होती जा रही है.

भाषा और जनविसर्जन के संदर्भ में हिंदी के व्यावहारिक और मानक रूपों की सीमाएं और संभावनाएं

हिंदी मानक वस्तुत: भाषा का व्याकरण सम्मत, शुद्ध, परिनिष्ठित, परिमार्जित रूप होता है। इस स्थान पर पहुंचने केलिए भाषा को कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। पहले स्तर पर भाषा का मूल रूप बोली होता है। इसका क्षेत्र सीमित होता है।
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