‘भूमंडलीकरण और स्त्रीविमर्श’

 पूजा तिवारी 
शोधार्थी
हिंदी विभाग
हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय

”स्त्री के अधिकारों की चर्चा करने पर पूछा जाता है कि वह किस राष्ट्र की नागरिक है? उसका धर्म, उसकी जाति, उसका सम्प्रदाय क्या है? इन सवालों का जवाब यह है कि नारीवाद को राष्ट्रीय सीमा में बंद नहीं किया जा सकता.”[1]

– प्रभा खेतान

प्रभा खेतान के उपरोक्त कथन से स्पष्ट है कि नारीवाद या स्त्री विमर्श किसी एक देश विशेष की पूँजी नहीं है बल्कि यह सम्पूर्ण विश्व की स्त्रियों की मुक्ति का दस्तावेज है. यह मुक्ति है पितृसत्तात्मक सोच से मुक्ति, परम्परा से मुक्ति और उस बने-बनाये ढांचे से मुक्ति जिसमें स्त्रियों को सदैव पुरुषों की दासी के रूप में देखा गया है.

भूमंडलीकरण बीसवीं शताब्दी की ऐसी घटना है जिसने समस्त विश्व को आर्थिक दृष्टिकोण प्रदान किया. प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक विमर्श यहाँ तक कि मनुष्य को भी आर्थिक दृष्टि से देखा जाने लगा. कह सकते हैं भूमंडलीकरण ने दुनिया को ‘अर्थ’ नामक चश्मा दिया जिससे सभी को यह विश्व बाज़ार जैसा दिखने लगा. इसी बीच भूमंडलीकरण के साथ-साथ ‘उदारीकरण’ और ‘निजीकरण’ की अवधारणा ने भी जन्म लिया. इस तिकड़ी ने विश्व के विभिन्न देशों के पारस्परिक सम्बन्ध को व्यापक रूप में प्रभावित किया. व्यापार और आर्थिक आदान-प्रदान ने संस्कृतियों, भाषाओँ, समाजों, कलाओं आदि के आदान-प्रदान का भी मार्ग प्रशस्त किया. किन्तु इस सत्य से मुंह नहीं फेरा जा सकता कि विकसित देशों की अपेक्षा भूमंडलीकरण से विकासशील देश अधिक प्रभावित हुए. इस प्रभाव के साथ विकासशील देशों में विकसित देशों की विचारधारा भी आयातित हुई.

तीन शब्द उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण आपस में जुड़कर आधुनिक समाज के प्रतीक ही बन बैठे हैं. किन्तु जिस आर्थिक सन्दर्भ में इन तीन शब्दों विशेषकर भूमंडलीकरण को देखा जाता है उससे भिन्न भी इसके कई आयाम हैं. 90 के दशकों में भूमंडलीकरण केवल ‘अर्थव्यवस्था’ का ही नहीं हुआ बल्कि विचारों, समाजों, साहित्यों और संस्कृतियों का भी हुआ. भूमंडलीकरण की प्रक्रिया विश्व के विभिन्न समाजों से रिसती परिवर्तित और विकसित सोच का परिणाम रही है. इस प्रक्रिया को विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न चरणों में विकसित होते हुए देखा है. वस्तुतः इसकी प्राचीनता ग्रीक और रोमन सभ्यताओं के दौरान व्यापार के लिए निर्मित ‘सिल्क रूट’ तक देखी जाती है. यह भूमंडलीकरण का प्रथम दौर था जिसमें एक-दूसरे देश को जानने की प्रक्रिया चल रही थी. दूसरा दौर, औद्योगीकरण और तकनीकी विकास का है. इस दौर में, विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय कम्पनियों की स्थापना और उनके स्थापित होते आपसी आर्थिक सम्बन्ध को देखा जा सकता है. तीसरा और समकालिक दौर ‘व्यक्तिगत भूमंडलीकरण’ का है जिसने विश्व के व्यक्ति विशेष के विचार को प्रभावित किया. इस चरण में मानव किसी एक स्थान, गाँव, शहर या देश या प्रदेश का नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व का हो गया और समस्त विश्व उसके लिए एक घर की तरह है. इस तरह ‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा ने जन्म लिया. यह ‘ग्लोबल’ अब ‘लोकल’ हो गया और जो कुछ भी ‘लोकल’ था वह ‘ग्लोबल’ हो गया.

भूमंडलीकरण के सन्दर्भ में प्रभा खेतान का मानना है,”भूमंडलीकरण तो वह बिजली है जिससे आपका घर रौशन भी हो सकता है और आपके घर में आग भी लग सकती है.”[2] यह वाक्य भूमंडलीकरण के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों को दिखाता है. भूमंडलीकरण को किसी एक दृष्टिकोण विशेष से देखने पर उसके अन्य पक्षों से वंचित रह जाने की समस्या बनी रहती है. थॉमस फ्रीडमेन ने भूमंडलीकरण शब्द का स्पष्टीकरण करने के लिए ‘ल्क्सेस’ यानी कीमती गाड़ी और ‘ऑलिव ट्री’ अर्थात् परम्परा और उसके मूल्य की उपमा दी.[3] प्रत्येक व्यक्ति भूमंडलीकरण के दौर में ल्क्सेस यानी विलासिता चाहता है और विलासिता रुपी गाड़ी चलाने के लिए नये रास्ते बनाने के लिए परम्परा रुपी ऑलिव ट्री को काटना पड़ता है. इस परम्परा का त्याग ही भूमंडलीकरण की सबसे बड़ी विशिष्टता है.

भूमंडलीकरण ने स्त्री विमर्श को भी इसी परम्परा के त्याग का मार्ग दिखाया. 1960-70 के दौरान स्त्रियों को एक जुट करने के उद्देश्य से ‘सिस्टरहुड इज पावरफुल’ का नारा दिया गया. यह सिस्टरहुड की भावना भूमंडलीकरण के साथ-साथ बढ़कर ‘स्त्रीविमर्श’ का रूप लेती चली गयी. स्त्रियों के अस्तित्व या यों कहें पुरुष के साथ सहस्तित्व की अवधारणा की स्थापना करने वाला स्त्री विमर्श अब स्त्री की स्वतंत्र आर्थिक सत्ता की मांग करने लगा. हालाकि ममता कालिया का मानना है,”संसार में जब से स्त्री के जीवन और संघर्ष पर विचार प्रारभ हुआ, तब से नारी विमर्श आरम्भ हुआ.”[4] किन्तु विश्व के विभिन्न स्थानों पर स्त्री के हित में किये जा रहे आन्दोलनो ने विचारधारा के स्तर पर उतरकर धीरे-धीरे ‘स्त्री विमर्श’ का रूप बहुत बाद में धारण किया. स्त्री विमर्श की अवधारणा को रोहिणी अग्रवाल कुछ इस तरह से स्पष्ट करती हैं, ”हिंदी में विमर्श शब्द अंग्रेजी के discourse शब्द से आया है जिसका अर्थ है वर्ण्य विषय पर सुदीर्घ एवं गंभीर चिंतन. इस प्रकार स्त्री विमर्श का अर्थ है स्त्री को केंद्र में रखकर समाज, संस्कृति, परम्पराएँ और इतिहास का पुनरीक्षण करते हुए स्त्री की स्तिथि पर मानवीय दृष्टि से अनवरत विचार प्रक्रिया…स्त्री विमर्श स्त्री चेतना के प्रसार का आख्यान है.”[5]

स्त्री विमर्श का स्वरूप इस भूमंडलीकरण के दौर में काफी परिवर्तित हुआ है. जहाँ पहले यह स्त्री के अधिकारों, उसे एक मानव का दर्जा दिए जाने, उसे पुरुष के समान मानने के लक्ष्य को लेकर चल रहा था, वहीँ भूमंडलीकरण के विभिन्न चरणों से गुजरते हुए इसके उद्देश्यों में परवर्तन हुआ. संवैधानिक समानता के लक्ष्य को तो प्राप्त कर लिया गया किन्तु व्यवहारिक समानता से स्त्रियाँ अभी भी वंचित हैं. तसलीमा इस सम्बन्ध में लिखती हैं,” नारी वाद एक राजनीतिक थ्योरी और प्रेक्टिस है जो औरत को मुक्त करने के संग्राम में लिप्त है…नारीवाद की एक आसान संज्ञा है,”औरत भी इन्सान है’ यह बात जोर देकर कहना. ‘फेमेनिजम इज अ रेडिकल नोशन दैट विमेन आर ह्यूमन बीइंग.”[6]

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नव उदारतावाद, उत्तर आधुनिकतावाद, अंतर्राष्ट्रीयकरण से बहु- राष्ट्रीयकरण की ओर बढ़ते समाज में स्त्रियों की स्तिथि में परिवर्तन तो हुआ है किन्तु यह अभी भी संतोषजनक स्तिथि तक नही पहुँच सका है. 1995 में स्त्रियों पर आयोजित पेइचिंग कॉन्फ्रेस में यूनिसेफ के निदेशक नालिन हाइज़र ने कहा कि दुनिया के 1.3 अरब लोग नितांत गरीब हैं. इसमें स्त्रियों की संख्या 70 प्रतिशत है. जबकि स्त्री दुनिया के कामकाज के घंटों में दो-तिहाई समय काम करती है. लेकिन दुनिया की आय से उसे केवल एक बटे दसवां भाग ही मिलता है. दुनिया की सारी संम्पत्ति के एक बटे दसवें भाग की ही वह मालकिन है.”[7] 10 वर्ष बाद यह तो कहा जा सकता है कि इन आंकड़ों में परिवर्तन हुआ है किन्तु यह परिवर्तन विश्व की आधी आबादी को उसके आधे हिस्से तक पहुँचाने में अभी भी सफल नही हो सका है. संयुक्त राष्ट्र संघ की स्त्रियों की स्तिथि पर आधारित 2015 की रिपोर्ट के अध्ययन करने पर यह साफ़ पता चलता है कि अभी भी इस सन्दर्भ में बहुत सी खामियां और बहुत कुछ किया जाना बाकी है. तभी निर्धारित ‘मिलेनियम डेवलपमेंट गोल’ को प्राप्त किया जा सकता है. इस सर्वे आधारित रिपोर्ट के अनुसार अभी भी विश्व में औरतों की आमदनी पुरुषों से 24 प्रतिशत कम हैं जबकि औरतें पुरुषों से दो तिहाई अधिक काम करती हैं. उनके काम करने का क्षेत्र पुरुषों की अपेक्षा असंगठित है जिसके कारण उनको कोई नियमित आय भी नहीं प्राप्त होती. दूसरी ओर, यद्यपि विश्व की विभिन्न संसद में महिलाओं की भागीदारी 22 प्रतिशत तक पहुँच गयी है किन्तु यह एक तिहाई से अधिक कहीं भी नहीं है. स्पष्ट है, राजनीतिक निर्णय में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाने से समाज कतरा रहा है. स्त्री शिक्षा का स्तर भी सुधरा है किन्तु अंतर अभी भी बाकी है. जहाँ युवाओं (स्त्री एवं पुरुष) की शिक्षा 1990 में 83 प्रतिशत थी वहीँ 2010 तक यह 89 प्रतिशत पहुँच चुकी है. किन्तु यह प्रश्न बार-बार उठता है कि यह अंतराल क्यों रह जा रहा है? वर्त्तमान स्त्री विमर्श ने इस अंतराल की तह में जाने और उसके लिए पर्याप्त विचार और चिंतन करने का मार्ग प्रशस्त किया है. और अनुराधा बेनिवाल के शब्दों में देखें तो पुरुष सबसे पहले सहूलियत प्राप्त करने का माहौल अपने लिए बनाता है इसलिए स्त्रियाँ सदैव पीछे रह जाती हैं.अनुराधा बेनीवाल के शब्दों में, ”सहूलियत के अनुसार सबसे पहले आदमी ढलता है, संस्कृति का बोझ औरतों को सौंपकर. फिर धीरे-धीरे महिलाएं भी बदलती हैं, लड़-झगड़कर.”[8]

वैश्वीकरण के स्त्री के सन्दर्भ में कुछ सकारात्मक तो कुछ नकारात्मक पक्ष नजर आते हैं. वैश्वीकरण ने भौतिकतावादी समाज का प्रचार किया. इस भौतिकतावादी समाज, ने स्त्री को वस्तु और बाज़ार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. स्त्री विमर्श स्त्री समता के जिस उद्देश्य को लेकर चला था वह अभी भी बना हुआ है क्योंकि समाज का स्वरूप तो बदला है किन्तु उसमें रहने वालों की मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं हो सका है. स्त्रियों को लेकर अभी भी कहीं न कहीं भेदभाव की भावना काम कर रही है. यद्यपि भूमंडलीकरण ने स्त्रियों के लिये कई संभावनाओं के द्वार खोले हैं किन्तु इससे कई जोखिम भी बढ़ गये हैं. औरतों की तस्करी, किराये की कोख, बाज़ार की रौनक आदि के रूप में स्त्रियों का शोषण बढ़ रहा है. ‘सेक्स’ को लेकर समाज में जो खुलापन भूमंडलीकरण के कारण आया है उसने स्त्रियों को एक सेक्स का खिलौना बना दिया है. उसकी देह का इस्तेमाल पुरुषवादी मानसिकता वाला समाज तरह-तरह से कर रहा है.

वर्तमान स्त्री विमर्श समाजवादी, मार्क्सवादी और उग्र उन्मूलनवादी, उदारवादी और मनोविश्लेषणवादी स्त्री विमर्श आदि में बंटा हुआ है किन्तु सभी के मूल में एक उद्देश्य है और वह है स्त्री देह की मुक्ति. उसका उद्देश्य स्त्री को स्त्रीत्व से बाहर लाना है. उसे रूढ़ छवि से निकालना है. उसे अन्या के कलंक से उबारना है. वर्तमान स्त्री विमर्श का मूल स्वर प्रतिरोध का है. स्त्री विमर्श का उद्देश्य देह मुक्ति हो गया है. इस देह के कारण ही समस्त शुचिताएं और नैतिकताओं के ढकोसले बने हैं. किन्तु यह देह मुक्ति औरत को बाज़ार का शिकार बना देती है. बाज़ार की चकाचौंध में डूबी स्त्री आगे चलकर परित्यक्त किये जाने पर दोहरी सामाजिक और मानसिक प्रताड़ना झेलती हैं. इसका चित्रण लता शर्मा के उपन्यास ‘सही नाप के जूते’ में बहुत ही सटीक ढंग से किया गया है. स्त्री विमर्श का मूल उदेश्य स्त्री को ‘मेसोकिज्म’ (आत्म त्याग) की प्रवृत्ति से बाहर लाना है. वर्तमान स्त्री विमर्श इस देह के इस्तेमाल किये जाने से मुक्ति की मांग करता है. स्त्री अपनी देह की स्वामी है अतः उसे यह अधिकार होना ही चाहिए कि वह अपनी देह, अपनी कोख का प्रयोग किस तरह से करे. इसमें किसी का, किसी भी प्रकार का, हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है. इस सन्दर्भ में तसलीमा नसरीन का मत है,” स्त्री अपने शरीर में बच्चेदानी धारण करती है, लेकिन बच्चेदानी की स्वतंत्रता धारण नहीं करती. बच्चेदानी में संतान धारण करने या न करने की स्वतंत्रता स्त्री को नहीं है. स्त्री के लिए कहा जाता है ‘मातृत्व में ही स्त्री की सार्थकता है.’ स्त्री भी यही मानती है. एक झूठ को स्त्री ज़िन्दगी भर अपने अन्दर पाल कर जीती है.”[9]

किन्तु जिन समाजों ने स्त्री को अपनी कोख का इस्तेमाल करने की छूट दी, वहां भी किराये की कोख के रूप में स्त्री का बार-बार शोषण किया जाता है. जहाँ स्त्री को छूट मिली उसने अपने शरीर को अपनी मजबूरी में बेचना शुरू किया किन्तु वहां भी पुरुष दलाल के रूप में सामने आ खड़ा हुआ. हर जगह पुरुष किसी न किसी रूप में स्त्रियों के लिए रोड़ा बनकर खड़ा होता रहा है. अब प्रश्न यह उठता है कि देह मुक्ति प्राप्त हो जाने पर भी क्या स्त्री वास्तव में स्वतंत्र हो जायेगी ? इसका उत्तर देना बहुत कठिन नहीं है. जब तक पुरुषों को ‘पुरुषोचित मनोवृत्ति’ से बाहर नहीं लाया जाएगा तब तक किसी भी तरह से स्त्री विमर्श अपने अंतिम लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकता. शेक्सपियर ने पुरुष की प्रवृत्ति को भली-भांति समझते हुए कहा भी है,”मेन आर अप्रैल वेन दे वू, दिसम्बर वेन दे वेड’ (मुहब्बत के वक्त पुरुष अप्रैल की तरह तपता है और शादी के बाद दिसम्बर की तरह सर्द हो जाता है).”

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स्त्री विमर्श अब ‘उत्तर स्त्रीवाद’ के चरण में प्रवेश कर चुका है. उत्तर स्त्रीवाद के दो ध्रुव् हैं पहला जहाँ स्त्री स्वतंत्र दिखती है और दूसरा जहाँ स्त्री अभी भी जमीनी समस्याओं से ही नही उबर पायी है. एक तरफ सम्भ्रांत वर्ग की महिलायें हैं जो शिक्षा प्राप्त कर आत्मनिर्भर हैं और दूसरी ओर हैं निम्न और दलित वर्ग की महिलाएं जिनके लिए चूल्हे-चौके की दुनिया से आगे कोई दुनिया नहीं है. ऐसे दौर में स्वतंत्रता के मानदंडों को प्राप्त करने वाली स्त्रियों ने लेखिकाओं, समाज सेविकाओं आदि के रूप में अन्य स्त्रियों को स्वतंत्र करने या यों कहें अपनी स्वतंत्रता के प्रति जागरूक करने का बीड़ा उठाया है. अपने लेखन से स्त्री को विमर्श तक पहुंचा दिया है और विमर्श से आगे वास्तविक स्वतंत्रता तक पहुँचाने के प्रयास में लगी हुई हैं. उदहारण के लिये :- यूरोपीय देशों में सीमोन द बोउआर, बैटी फ्राइडेन, वर्जिनिया वोल्फ, रेबेका वेस्ट, डेलस्पेंडर, एलिज़ाबेथ फिशर, शुलमिथ फायस्टोन, नैंसी चोदोरोव, इरिगरे, सिक्सू, जूलिया क्रिस्टोवा, जर्मन ग्रीयर, ग्लोरिया स्टाईनेम, मेरी वोल्स्टनक्राफ्ट आदि भारत में राजा राममोहन राय, विद्यासागर, महर्षि कर्वे, स्वामी दयानान्द सरस्वती, ज्योतिबा फूले, पेरियार, बाबा साहेब अम्बेडकर, सरोजिनी नायडू, हंस मेहता, राजकुमारी अमृत कौर, कमलादेवी चट्टोपाध्याय आदि के प्रयास उल्लेखनीय हैं. सूर्यबाला, चन्द्रकान्ता, प्रभा खेतान, मंजुल भगत, राजी सेठ, मैत्रेयी पुष्पा, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल, नासिरा शर्मा, मन्नू भंडारी, दीप्ति खंडेलवाल, शिवानी, निरुपमा सेवती, मेहरुन्निसा परवेज़, आनामिका, राजेंद्र यादव, उषा प्रियंवदा, मंजुला भगत, नीलिमा सिंह, मृणाल पाण्डेय, कात्यायनी, क्षमा शर्मा, जया जादवानी, अलका सरावगी, गगन गिल आदि हिंदी की लेखिकाएं अपनी रचनाओं के माध्यम से स्त्री विमर्श की परम्परा को नये सन्दर्भों के साथ निरंतर आगे बढ़ा रही हैं. आनामिका स्त्री विमर्श के व्यापक होते पटल के संदर्भ में लिखती हैं,”आधुनिक विमर्शों पर मुख्य अभियोग यह है कि ये प्रत्याख्यान्मूलक हैं, पलटकर जवाब देते हैं, विचार या मेटानैरेटिव्स या वैचारिक आग्रहों या दूसरे बने-बनाये खांचों से भी अपना पल्ला ये झाड़ चुके हैं….बारिश-तूफ़ान में दोनों हांथों से ‘अस्मिता’ की छतरी ताने खड़ा हर ‘विमर्श’ सड़क के उस पार होने की कोशिश तो कर ही रहा है, कोशिश तो कर ही रहा है छतरी का घेरा बड़ा करने की.”[10]

भूमंडलीकरण के दौर का स्त्री विमर्श स्त्री के साथ-साथ समलैंगिकता, एकल अभिभावक, अविवाहित स्त्री, सहवासी समाज (लिव इन रिलेशन), आदि मुद्दों पर विचार कर रहा है. नव नारीवाद ‘बुद्धि के लिंग’ जैसी किसी अवधारणा में विश्वास नही करता. भूमंडलीकरण ने निश्चय ही स्त्री विमर्श और स्त्री लेखन की दिशा और दशा को बदला है. वर्त्तमान स्त्री विमर्श फ्रायड की मान्यता है कि ‘पुरुष को अपने मातृत्वबोध से अलग होकर कड़ा स्वाभाव बनाना होता है जबकि स्त्रियों को ऐसा नहीं करना पड़ता’ का विरोध करता है. देरिदा के संरचनावाद और लाका के मनोविश्लेषणवाद को आधार बानकर यह स्वीकार करता है कि स्त्रियों की स्थिति के लिए सबसे अधिक उत्तरदायी उनकी भाषा है जो पितृसत्ता द्वरा गढ़ी गयी है अतः स्त्रियों को अपनी मुक्ति के लिए अपनी भाषा स्वयं गढ़नी चाहिए. तात्पर्य यह है कि वर्तमान स्त्री विमर्श केवल संभ्रांत स्त्रियों का विमर्श नहीं है बल्कि यह हर वर्ग, जाति और क्षेत्र की स्त्री का संघर्ष है जिसके लिए प्रयास का स्तर भले ही अलग-अलग हो सकता है किन्तु उसके उद्देश्य सभी जगह एक ही हैं. स्त्री को समाज के प्रतिरोध के लिए स्वयं अपनी भाषा गढ़नी चाहिए न कि पुरुषों द्वारा निर्धारित भाषा का प्रयोग करना चाहिए.

स्त्री विमर्श के लिए धर्म अभी भी रोड़ा बना हुआ है. यद्यपि समाज ‘नैनोटेक्नोलोजी’ के युग में जी रहा है और उसका निरंतर उपयोग भी कर रहा है किन्तु धर्म के सन्दर्भ में उसकी सोच अभी भी पुरातनपंथी ही है जिसके कारण वह अपनी दुरुह्ताओं को नहीं त्याग नहीं पा रहा है. कुरान, हिन्दू धर्म के ग्रन्थ आदि में आस्था और स्त्री उद्धार की बात साथ-साथ नहीं चल पा रही है. क्योंकि ये धर्म स्त्री को बार-बार संयमित और पुरुष के अधीन होने का निर्देश देते हैं जो स्त्री विमर्श के विरुद्ध है. उदहारण के लिए कुरान का सूरा : बकर, आयत : 223 में स्त्री को उसके पति द्वारा चरने वाला अनाज कहा गया है. हिन्दू धर्म के आपस्तम्ब धर्म सूत्र, ऐतरेय ब्राह्मण, तैतरीय ब्राह्मण सभी में स्त्रियों के उत्तरदायित्व गिनाये गये हैं जिसमें से सर्वोपरि है पति की इच्छाओं की तुष्टि और उसकी आज्ञा का पालन करना. यह उत्तरदायित्व गिनाना या नियमों का व्याख्यान केवल स्त्रियों के सन्दर्भ में ही है. यह समाज की बर्बरता का प्रतीक है जो स्त्री को मानव न मानकर उसे गुलाम की श्रेणी में रखना चाहता है और आवश्यकता पड़ने पर उसका उपयोग करने से भी नहीं कतराता. कब उसे देवी के स्तर पर बैठा दिया जाय और कब पैरों की जूती घोषित कर दिया जाय, यह अवसर और जरूरत पर निर्भर करता है. इसी कारण ममता कालिया मानती हैं, ‘वर्त्तमान समय प्रागैतिहासिक काल से भी ज्यादा पिछड़ा तथा स्त्री के प्रति आक्रामक है.’[11] समाज की बर्बरता और स्त्री विमर्श के बदलते पहलुओं को सुधा अरोड़ा की कहानी ‘रहोगी तुम वही’, चित्रा मुद्गल के उपन्यास ‘आंवा’, नासिरा शर्मा की कहानियों ‘कुंइया जान’, ‘सरहद के इस पार’, ‘तारीखी सनद’, प्रभा खेतान की कहानी ‘छिन्नमस्ता’, मैत्रेयी पुष्पा की ‘फैसला’ कहानी और ‘चाक’ उपन्यास आदि स्त्री रचनाकारों की रचनाओं में देखा जा सकता है. हालाकि स्त्री विमर्श के सन्दर्भ में बहुत से पुरुष रचनाकारों और विचारकों जिनमें जॉन स्टुअर्ट मिल और राजेन्द्र यादव का नाम लिया जा सकता है, लेखन किया है किन्तु स्त्री समस्या का वास्तविक धरातल स्त्री लेखिकाओं की रचनाओं में ही महसूस किया जा सकता है. इसका कारण शायद यही है कि स्त्री इस त्रासदी की स्वयं भोक्ता रही है. और इस सन्दर्भ में हम सीमोन द बोउआर का वह कथन कैसे भूल सकते हैं जिसमें उन्होंने कहा है कि ‘अब तक लिखे गये सम्पूर्ण साहित्य पर शक किया जाना चाहिए क्योंकि लेखक और निर्णायक दोनों पुरुष ही है.’

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यद्यपि वैश्वीकरण ने स्त्री समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया है किन्तु स्थानीय समस्याओं से स्थानीय तरीके से ही निपटा जा सकता है. उनका समाधान किसी अन्य देश से आयातित सोच के आधार पर नहीं किया जा सकता है. वस्तुतः कह सकते हैं कि स्त्री विमर्श को सही रूप में केवल स्त्रियाँ ही प्रस्तुत कर सकती हैं क्योंकि वे उस समस्या की स्वयं भोग्या हैं. किन्तु इसके लिए उन्हें किसी एकांगी दृष्टिकोण से बचकर चलना होगा. इसी सन्दर्भ में अनामिका का मत है,”विचारों का, श्रम का, रिवायतों का और पूँजी का विश्वायन अपने आप में अमंगलकारी नहीं ! अमंगलकारी है इसकी एक ध्रुवीय, एकांगी, एक पक्षीय प्रवृत्ति.”[12]. इस एक पक्षीयता से बचते बचाते स्त्री को अपने को बहुआयामी बनाना होगा. उसे अपने बीच से ही उन महान व्यक्तित्व को सामने लाना होगा जो पुरुषों के बीच से अब तक आते रहे हैं. तभी जाकर स्त्रियों की मानसिक प्रतिभा से भी यह संसार परिचित होगा जो अब तक इस भ्रम में रहा है कि केवल पुरुष ही अच्छा सोच और लिख सकता है. डॉ. सुधा बालाकृष्णन के अनुसार, ”स्त्री को अब जागरूक और व्यावहारिक होना ही है. श्रद्धा बनकर विश्वास रजत पग तल में बहते रहने से कुछ होने वाला नहीं है. अतः उसे श्रद्धा से इड़ा बनना है. अपनी व्यथा को गोपनीयता से नहीं खुल कर व्यक्त करना है. अथ अन्ना केरेनिना और शकुन्तला की व्यथा कथा टालस्टॉय या कालिदास नहीं स्वयं अन्ना और शकुन्तला को लिखनी है.”[13] यह स्त्री जीवन की विडंबना ही तो है कि वह मानव की श्रेणी में न होकर विमर्श के दायरे में फंसी है. वस्तुतः ज़रुरत तो अब यह आ पहुंची है कि स्त्री अब विमर्श के खांचे से बाहर आकर स्वयं अन्य विमर्शों के सम्बन्ध में निर्णय करे. इसी मंशा को नीलेश रघुवंशी अपनी कविता स्त्री विमर्श में कुछ इस तरह व्यक्त करती हैं,” मिल जानी चाहिये अब मुक्ति स्त्रियों को/ आखिर कब तक विमर्श में रहेगी मुक्ति?’

सन्दर्भ सूची

पुस्तकें

  • प्रभा खेतान : बाज़ार के बीच और बाज़ार के खिलाफ (भूमंडलीकरण और स्त्री प्रश्न), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली : 2004.
  • ममता कालिया : भविष्य का स्त्री विमर्श, वाणी प्रकाशन : नई दिल्ली, 2015.
  • मैत्रेयी पुष्पा : सुनों मालिक सुनो, वाणी प्रकाशन : नई दिल्ली, 2006.
  • रोहिणी अग्रवाल : साहित्य की ज़मीन और स्त्री मन के उच्छ्वास, वाणी प्रकाशन : नई दिल्ली, 2014.
  • डॉ. सुधा बालकृष्णन : नारी अस्तित्व की पहचान, वाणी प्रकाशन : नई दिल्ली, 2013.
  • मन्मथनाथ गुप्त: स्त्री पुरुष संबंधों का रोमांचकारी इतिहास, वाणी प्रकाशन :नई दिल्ली, 2005.
  • प्रभा खेतान : स्त्री उपेक्षिता, हिंदी पॉकेट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड : नई दिल्ली, 2002.
  • अनामिका : स्त्री विमर्श के लोकपक्ष, वाणी प्रकाशन : नई दिल्ली, 2012.
  • तसलीमा नसरीन : औरत का कोई देश नहीं, वाणी प्रकाशन : नई दिल्ली, 2009.
  • तसलीमा नसरीन : औरत के हक़ में, वाणी प्रकाशन : नई दिल्ली, 19 वां संस्करण, 2008.
  • अनुराधा बेनीवाल : आजादी मेरा ब्रांड, राजकमल प्रकाशन : नई दिल्ली, 2016.
  • प्रभा खेतान : उपनिवेश में स्त्री : मुक्ति कामना की दस वार्ताएं, राजकमल प्रकाशन : नई दिल्ली, 2003.
  • पत्रिकाएं :-
  • हंस, सम्पादक – राजेन्द्र यादव, वर्ष 24, अंक-4, अक्षर प्रकाशन : नयी दिल्ली, नवम्बर 2009.
  • हंस, संपादक – राजेन्द्र यादव, वर्ष 14, अंक 6-7, अक्षर प्रकाशन :नई दिल्ली, जनवरी-फ़रवरी 2000

अंतर्जालिक स्त्रोत :

  • http://www.unwomen.org/en/digital-library/publications/2016/2/gender-chart-2015
  1. प्रभा खेतान : उपनिवेश में स्त्री :मुक्ति कामना की दस वार्ताएं, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2003.

  2. प्रभा खेतान : बाजार के बीच बाज़ार के खिलाफ़, पृष्ठ-24.

  3. प्रभा खेतान : बाजार के बीच बाज़ार के खिलाफ़, पृष्ठ-14

  4. ममता कालिया : भविष्य का स्त्री विमर्श, वाणी प्रकशन :नई दिल्ली, संस्करण :2015, पृष्ठ -7.

  5. रोहिणी अग्रवाल : साहित्य की जमीन और स्त्री मन के उच्छ्वास, वाणी प्रकाशन : नई दिल्ली, 2014, पृष्ठ – 11.

  6. तसलीमा नसरीन : औरत का कोई देश नहीं : वाणी प्रकाशन : नई दिल्ली, 2009, पृष्ठ -94.

  7. प्रभा खेतान :बाजार के बीच बाज़ार के खिलाफ़ पृष्ठ-50

  8. अनुराधा बेनीवाल : आजादी मेरा ब्रांड, राजकमल प्रकाशन :नई दिल्ली, 2016, पृष्ठ-177.

  9. तसलीमा नसरीन :औरत के हक़ में, वाणी प्रकाशन :नई दिल्ली : 19 वां संस्करण, 2008, पृष्ठ-191.

  10. अनामिका : स्त्री विमर्श के लोकपक्ष, वाणी प्रकाशन :नई दिल्ली, 2012, पृष्ठ-22.

  11. ममता कालिया : भविष्य का स्त्री विमर्श, वाणी प्रकशन :नई दिल्ली, संस्करण :2015, पृष्ठ- 10

  12. अनामिका : स्त्री विमर्श के लोकपक्ष, वाणी प्रकाशन :नई दिल्ली, 2012, पृष्ठ -18.

  13. डॉ सुधा बालाकृष्णन: नारी : अस्तित्व की पहचान, वाणी प्रकाशन : नई दिल्ली, 2013, भूमिका.

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