आदिवासी कथा साहित्य में स्त्री

लीना कुमारी मीना
शोधार्थी , जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय
नई दिल्ली ११००६७

वर्तमान दौर में आदिवासी साहित्य अस्मितावादी विमर्शों की कड़ी में अपनी पहचान के लिए दस्तक दे चुका है दलित व स्त्री साहित्य के बाद, अब आदिवासी साहित्य अपनी प्रखर आवाज में सदियों से शोषित-पीड़ित आदिवासी समाज के संघर्षों को वाणी दे रहा है|

“भारत के लोग अधिकतर जनजातियों(एस.टी.)को आदिवासी कहते हैं|…..संस्कृत में आदिवासी शब्द का अर्थ है, किसी क्षेत्र के मूल निवासी जो आदिकाल से किसी स्थान विशेष में रहते चले आ रहे हैं| माना जाता है कि आदिवासी भारतीय प्रायद्वीप के सबसे प्राचीन बाशिंदे या मूल निवासी हैं|”[1] इसके अलावा यह भी मान्यता है कि “आर्यों के अतिक्रमण के समय आदिवासी पहले से ही भारतीय उपमहाद्वीप में रह रहे थे|”[2] अर्थात् प्राचीनकाल में आर्यों ने भारतवर्ष पर आक्रमण के दौरान यहाँ के मूल निवासियों में से कुछ को बंदी बना लिया व कुछ घने जंगलों में पलायन कर गये| बंदी बनाये जाने वाले लोगों को अछूत कहा जाने लगा एवं जो व्यक्ति समूह बनाकर घने जंगलों में पलायन कर गये; वे सभ्यता, संस्कृति, आचार–विचार से मुख्यधारा के समाज से बिल्कुल कट गये| ये लोग समूहों के रूप में रहने लगे, ऐसे लोगों को ही आदिवासी कहा जाने लगा|

अंग्रेज सरकार की औपनिवेशिक नीति में विकास के तहत जंगलों की कटाई शुरू हुई जिससे आदिवासियों के पारम्परिक रोजगार के साधन समाप्त हो गये और इन्हें आजीविका के लिए मजदूरी का विकल्प तलाशना पड़ा| अंग्रेजी प्रशासक प्रारम्भ में इन्हें बहादुर, मेहनती और सरल स्वभाव का मानते थे परन्तु जब इन आदिवासियों ने अंग्रेजों की स्वार्थपूर्ण नीतियों का विरोध किया तो उन्होंने इनकी अर्थव्यवस्था, धर्म, संस्कृति एवं रीति-रिवाजों का कोई सम्मान न करते हुए इन्हें घुमन्तू, असभ्य एवं जंगली घोषित कर दिया|

यद्यपि आदिवासी साहित्य की मौखिक रूप में एक लम्बी परम्परा रही है परन्तु अशिक्षा की वजह से उसका कोई लिखित इतिहास नहीं रहा| आजादी के बाद से ही आदिवासी समाज को साहित्य का विषय बनाया जाने लगा परन्तु उसमें उन्हें प्रकृति पर निर्भर, कमर पर बित्तेभर चिंदी लपेटने वाला अर्थात् एक अजूबे के रूप में पेश किया गया| स्वतंत्रता के पश्चात् ‘राष्ट्र निर्माण’ के लिए बनाई गयी नीतियों ने आदिवासी समाज के सामने व्यापक समस्याएं खड़ी कर दी| उन नीतियों की वजह से उनके जंगलों पर रहे परम्परागत अधिकार खत्म होते चले| औद्योगीकरण की नीतियों ने उनको अपने जल, जंगल, जमीन से बेदखल कर दिया, इसके तहत जो समाज अब तक आत्मनिर्भर था वही अब भूखा मरने लगा| ऐसे समय में योगेन्द्रनाथ सिन्हा, राजेन्द्र अवस्थी, शानी, मेहरुनिशा परवेज आदि लेखक-लेखिकाओं ने इस समाज को लेखनी का विषय बनाया| बंगला लेखिका महाश्वेता देवी के आदिवासी लेखन और उड़िया लेखक गोपीनाथ महंती ने आदिवासी लेखन के हिंदी अनुवादों से भी आदिवासी समाज की तरफ पाठक वर्ग का ध्यान खींचा,लेकिन आदिवासी समाज तथाकथित मुख्यधारा के साहित्य में हाशिये पर ही बना रहा|

आदिवासी समुदाय के हाशियेकरण की कोशिश 90 के दशक में सर्वाधिक हुई| 90 के दशक में भारत सरकार की वैश्वीकरण, उदारीकरण की नीतियों ने आदिवासी समाज को सर्वाधिक प्रभावित किया| उदारीकरण की नीतियों ने मुक्त व्यापार और मुक्त बाजार की व्यवस्था को स्थापित किया जिससे सीधे तौर पर आदिवासी समुदाय प्रभावित हुआ क्योंकि देश की सबसे अधिक वन एवं अन्य प्राकृतिक सम्पदा, खनिज सम्पदा आदिवासी क्षेत्रों में है| इस प्राकृतिक सम्पदा की लूट-खसोट के लिए नित्य नई वैश्विक कम्पनियां आदिवासी इलाकों में पहुँचने लगी है जिसके कारण आदिवासी समाज के जल, जंगल, जमीन उनसे छीने जाने लगे| सरकार उनकी स्थितियों पर गौर किए बिना उनके शोषण में उद्यमियों का साथ दे रही है- “छत्तीसगढ़, झारखण्ड और उड़ीसा में हाल के दिनों में वहाँ की सरकारों ने खनिज सम्पदा के अंधाधुंध दोहन में जुटी देश-विदेश की बड़ी कम्पनियों के इशारे पर जिस तरह से सूबे की गरीब, आदिवासी और पिछड़ी आबादी को विकास के ‘शत्रु-खेमे’ में डालकर उनके खिलाफ अभियान चलाया है, वह भारतीय लोकतंत्र के अब तक के इतिहास का सबसे शर्मनाक कारनामा है| लाखों को बेदखल किया गया है और असंख्य भूमि हड़पी गयी है| इस तरह के उद्योग-विस्तार के नाम पर जहाँ-जहाँ राज्य प्रशासन ने भूमि-हड़प अभियान को सफलतापूर्वक चलाया, सत्ताधारी खेमे और मीडिया के बड़े हिस्से ने उन सरकारों को ‘विकासवादी’ बताकर महिमामंडित किया है|” [3]इसी तरह के भूमि-हड़प के चक्कर में सिंगूर और नंदीग्राम में जिस तरह से सरकार ने गरीबों पर अत्याचार किए हैं वह रोंगटे खड़े करने वाले हैं| इससे विस्थापन की समस्या प्रमुख रूप से सामने आयी है| इस विस्थापन एवं पलायन की सर्वाधिक मार आदिवासी महिलाओं को झेलनी पड़ी है| जंगलों के उजड़ने व औद्योगिक शहरों के विकास के कारण आदिवासी महिलायें पहले से अधिक असुरक्षित हो गई हैं| शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाओं के प्रचार–प्रसार से आदिवासियों का मुख्यधारा के समाज से सम्पर्क स्थापित हुआ हैं| इससे इस समाज की स्त्रियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा| पितृसत्तात्मक व्यवस्था का प्रभाव आदिवासियों पर मुख्यधारा के समाज से ही आया है वरन् आदिवासी समाज में स्त्री एवं पुरुष की स्वतन्त्रता व समानता में विशेष अंतर नहीं है| इस समाज में स्त्रियों के सम्मान एवं स्वतन्त्रता में जब कोई दखल देता है तो वे इसका खुलकर विरोध करती हैं परन्तु गैर आदिवासी रचनाकारों ने मुख्यधारा के देखा-देखी आदिवासी साहित्य में भी स्त्री पर बाहरी संस्कृति लाद दी है इस सन्दर्भ में डॉ. रोज केरकेट्टा लिखती है- “आदिवासी शिष्ट साहित्य में स्त्री श्रम, सहिष्णुता, ममत्व से पूर्ण तो मिलती है, लेकिन अपने लिए और परिवार के लिए निर्णय लेती हुई कम मिलती है| वह जीने के लिए कठिन परिश्रम करती है, देस-परदेस जाती है, सेवा करती है, दूसरों को प्रसन्न रखने के लिए|”[4] परन्तु वास्तविकता में ऐसा नहीं है यह केवल सामन्ती समाज की सोच है| आदिवासी कविता व लोककथाओं में यह स्त्री बराबरी की माँग करती हुई इस तरह नजर आती है-

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“मैं जानती हूँ कि तुम क्या सोच रहे हो मेरे बारे में

वही जो एक पुरुष, एक स्त्री के बारे में सोचता है|

पर याद रखो

तुम्हारी मानसिकता की पेचीदा गलियों से गुजरती

मैं तलाश रही हूँ तुम्हारी कमजोर नसें

ताकि ठीक समय पर

ठीक तरह से कर सकूं हमला

और बता सकूं सरेआम गिरेबान पकड़

कि मैं वो नहीं हूँ जो तुम समझते हो|”

आदिवासी समाज में स्त्री अपनी आजादी में किसी की रोक-टोक स्वीकार नहीं करती है| यदि उसकी मान्यताएं इसमें उसके आड़े आती है तो वह इनका विरोध करती है| ‘शाम की सुबह’ उपन्यास में वाल्टर भेंगरा ‘तरुण’ ने संध्या नामक युवती को कथा नायिका बनाया है जो जीवन में आने वाली कई समस्याओं से जूझते हुए समाजसेवा के निहितार्थ नर्स के व्यवसाय को अपनाती है| इस उपन्यास में स्त्री का आत्मसम्मान सर्वोपरि है| उसके जीवन में कई उलझने आती है परन्तु वह कुंठाग्रस्तता से बचते हुए अपने स्वाभिमान एवं नारीत्व को बनाए रखती है|

‘लौटते हुए’ उपन्यास में लेखक ने आदिवासी युवतियों के काम के लिए महानगरों की ओर तेजी से बढ़ते पलायन की समस्या को कथावस्तु का आधार बनाया है| इस उपन्यास में आदिवासी युवती ‘सलोमी’ कथा की नायिका है| महानगरों में इन युवतियों को विविध समस्याओं का सामना करना पड़ता है| वहाँ सभी लोग इनका अधिक से अधिक शोषण करना चाहते हैं, जिसमें देह शोषण भी शामिल है| पिछड़े हुए आदिवासी इलाकों में लोग सुधारवाद से प्रभावित होकर ईसाई धर्म में धर्मान्तरित हो गये परन्तु इससे उनकी सामाजिक स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है|

इसके अलावा इस उपन्यास में एक मुद्दा यह भी उठाया गया है कि माता-पिता एवं परिवार की देखभाल के एवज में आदिवासी स्त्रियों को पैतृक सम्पति में हिस्सा नहीं मिलता| माता-पिता के जीवित रहते हुए एवं उनकी सेवा करने के उपरांत भी, उनकी जमीन की उपज का उपभोग तक वे नहीं कर पाती हैं| उनकी विडम्बना है कि कमाकर कर लाए गए पैसों का उपभोग पूरा परिवार करता है, परन्तु उनके भविष्य के लिए तनिक भी चिंता नहीं करता|

‘छैला सन्दू’ मंगल सिंह मुंडा द्वारा रचित उपन्यास है| आदिवासी समाज स्त्री-पुरुष के प्राकृतिक प्रेम को सहजता से स्वीकार करने वाला समाज रहा है| कुल-जाति-गोत्र-पूंजी की दीवारें यहाँ प्रेम के रास्ते में खड़ी नहीं की जाती| लेकिन अपने स्वाभिमान को गिरवी रखकर प्रेम के आगे बिक जाना भी यहाँ स्वीकार्य नहीं है| इस उपन्यास का नायक छैला सांवले रंग का, छरहरे शरीर का, आकर्षक व्यक्तित्व और मानवीय गुणों से युक्त अपने समाज का चहेता पात्र है| सन्दू इलाके के सूबेदार की बेटी बुंदी से प्यार करता है लेकिन एक दिन इस बेमेल प्रीति की बात उजागर हो जाती है| ऊँची जाति और ऊँचे पद का गुमान अपनी बेटी के आदिवासी प्रेमी को स्वीकार कैसे सकता था? इस कारण सूबेदार सन्दू के गाँव पर अपनी फौज के साथ चढ़ाई करता है| मुंडा आदिवासी भी अपने प्रेम और स्वाभिमान की खातिर सन्दू का साथ देते हुए हाकिम से युद्ध करते हैं| किन्तु आदिवासियों की संयुक्त ताकत के सामने हाकिम को झुकना पड़ता है| लेकिन अपने स्वाभिमान की लड़ाई में वह सन्दू और बुंदी के प्रेम और विवाह के साथ एक प्रतियोगिता की शर्त जोड़ देता हैं परन्तु शर्त जीतकर अपने प्रेम को उपहार में एक वस्तु की तरह पाना, स्त्री-पुरुष समता में विश्वास करने वाली आदिवासी संस्कृति का रिवाज नहीं होता| अत: शर्त में मिले दान को नकारकर सन्दू अपने गाँव लौट आता है| लोगों की साजिश के तहत सन्दू की मौत हो जाती है एवं सन्दू की मौत से उसका इंतजार कर रही बुंदी के भी प्राण पखेरू उड़ जाते है| इस उपन्यास के माध्यम से ज्ञात होता है कि स्त्री-पुरुष की सहज मैत्री आदिवासी समाज में उदारता की द्योतक है|

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‘शव काटने वाला आदमी’ उपन्यास येसे दरजे थोंगछी द्वारा लिखित है| अरुणाचल प्रदेश की एक जनजाति है मनपा| बौद्ध धर्मावलम्बी इस जनजाति के लोग मृतकों को एक सौ आठ टुकड़ों में काटकर नदी में बहा देते हैं| इसी रीति के आधार पर इस उपन्यास की कहानी केन्द्रित है| मनपा जनजाति में स्त्री–पुरुषों के मध्य समानता है| स्त्रियाँ भी पुरुषों के प्रत्येक कार्य में बराबर की भागीदारी निभाती है| इस उपन्यास में स्त्री बेटी, पत्नी, माँ, प्रेमिका व दोस्त के रूप में उपस्थित है| वह अपने प्रत्येक रिश्ते को बखूबी निभाती है|

फादर पीटर पौल एक्का ने भी ‘मौन घाटी’, ‘जंगल के गीत’, ‘पलाश के फूल’ एवं ‘सोनपहाड़ी’ में आदिवासी जनजीवन को अपने उपन्यासों की विषयवस्तु बनाया है| ‘मौनघाटी’ उपन्यास में रांची के निकट ‘अम्बाघाट’ नामक आदिवासी इलाका केंद्रबिंदु के रूप में है| उपन्यास में सरोज, सरस्वती, सुधारानी आदि स्त्रीपात्र है; ये सभी इस इलाके के सुधार हेतु प्रयासरत हैं, परन्तु अस्पताल का कर्मचारी हरिया, फोरेस्टर व कुछ लोग अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए यहाँ के लोगों का भरपूर शोषण करते हैं तथा औरतों को वे केवल भोग की वस्तु समझते हैं|

‘जंगल के गीत’ उपन्यास में लेखक ने आदिवासियों के एक गाँव को केंद्रबिंदु बनाया है जो दुनिया के नियमों से बेखबर अपने अलग संसार में खुश है| दिकु समाज का शोषणतन्त्र यहाँ भी अपना शिकंजा फैलाये हुए है जो तरह- तरह के हथकंडे अपनाकर इन आदिवासियों का शोषण करने में कोई कसर नहीं छोड़ता| इन आदिवासियों के मध्य पितृसत्तात्मक व्यवस्था हावी नहीं है| समाज के नियमों-उपनियमों को बनाने में यहाँ स्त्री व पुरुष अपनी समान भागीदारी निभाते हैं एवं सभी मिलकर शोषक वर्ग का प्रतिरोध करते हैं|

‘पलास के फूल’ एवं ‘सोनपहाड़ी’ उपन्यासों में भी फादर पीटरपौल एक्का ने आदिवासी समुदायों के रहन-सहन, संस्कृति एवं सामाजिक जीवन को बखूबी उकेरा है| इस समुदाय में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को लेखक ने बेहतर ढंग से पेश किया है एवं दिखाया है कि औरतें किस तरह से सामाजिक व्यवस्था में अपनी भागीदारी भलीभांति निभाती हैं|

‘पूर्वोत्तर की आदिवासी कहानियाँ’ कहानी संकलन ‘रमणिका गुप्ता’ द्वारा सम्पादित है| पूर्वोत्तर की कहानियाँ अपनी संस्कृति, भाषा, भूगोल आदि कई मायनों में शेष भारत से अलग है| बीस कहानियों के संग्रह में दस भाषा की कहानियाँ शामिल है| असम से बोडो, कार्बी और तीवा भाषा की तेरह कहानियाँ हैं| मिजो और खासी की तीन-तीन और तैनिडे, लेपचा और शेरदुकपेन की दो-दो और कोकबोरोक व मैतेई भाषा की एक-एक कहानी है| आदिवासी महिला की स्थिति सामाजिक परम्पराओं रीति-नीतियों और सामाजिक नियमों के कम बंधन के चलते आजाद रहती है पर आर्थिक बदहाली और पुरुष की सोच कई बार वैसी क्रूर रही है जितनी कि मुख्यधारा में देखने को मिलती है| वह उतनी ही प्रताडना की शिकार है जितनी भारतीय औरत रही है| ‘बाँझ’ कहानी में पुरुष से औरत की कमजोर स्थिति व त्रासदी को उजागर किया है| रोबांसी हमेशा अपने पति द्वारा पीटी जाती है| उसकी पिटाई में सास-ससुर की मूक सहमति रहती है क्योंकि वह बाँझ है| वह उनके आरोपों और पति की पिटाई से तंग आकर अपने पूर्व प्रेमी गजोम की झोपड़ी में एक अंधेरी रात में दस्तक देकर उसे पत्नी बनाने का खुला प्रस्ताव देती है| परन्तु गजोम की चुप्पी का अर्थ ना समझकर वह रात में ही घर लौट आती है| पति दूसरे का बच्चा पत्नी की कोख में पलता देख कर उसे बुरी तरह से पीटता है| इस कहानी से पता चलता है कि कई बार आदिवासी औरत भी अन्य औरतों की भांति पति की ज्यादतियाँ सहती है| पूर्वोत्तर आदिवासी समाज की सांस्कृतिक झांकी इस कहानी संग्रह में संकलित कहानियों के माध्यम से मिलती है|

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‘पगहा जोरी-जोरी रे घाटों’ में आदिवासी लेखिका रोज केरकेट्टा द्वारा लिखित कहानियाँ संकलित है| इन कहानियों में झारखण्ड के ग्रामीण समाज के प्रति उनका गहरा जुड़ाव दिखाई देता है| भंवर, घाना लोहार का, कोंपलों को रहने दो, केराबांझी इत्यादि कहानियों में लेखिका स्त्री अधिकारों व उनकी प्राप्ति को लेकर प्रतिबद्ध है| भंवर एक आदिवासी विधवा महिला की कहानी है जिसे कानूनी रूप से अधिकार मिलने पर भी सामाजिक कमजोरी के कारण वह इनका उपयोग नहीं कर पाती है इससे समाज में स्त्री की वास्तविक स्थिति का बोध होता है| ‘केराबांझी’ पुरातन परम्परा का पालन करने वाले एक किसान कालीचरण की कहानी है जो परिवार नियोजन को एक बुराई के रूप में देखता है परन्तु उसके दो बेटे व बहू इसका विरोध करते हैं| उसकी बहू सिर्फ एक बेटी पैदा करती है एवं स्वयं को केराबांझी कहने पर कोई शर्म महसूस नहीं करती| इस कहानी में स्त्री-चेतना की झलक देखने को मिलती है|

‘अपना-अपना युद्ध’, ‘जंगल की ललकार’ व ‘देने का सुख’ कहानी संकलन वाल्टर भेंगरा ‘तरुण’ द्वारा रचित है| इन कहानी संकलनों में उन्होंने आदिवासी समाज में विद्यमान पितृसत्तात्मक व्यवस्था एवं आदिवासी स्त्रियों की स्थिति का जिक्र किया है|

‘राजकुमारों के देश में’ एवं ‘क्षितिज की तलाश’ फादर पीटर पाल एक्का द्वारा रचित कहानी संग्रह है| इन कहानियों में भी लेखक ने आदिवासी समाज की विसंगतियों को उजागर किया है|

‘सिसकियाँ’ कहानी संग्रह विजय सिंह मीणा द्वारा रचित है| विगत दशकों में गाँव की दशा-दुर्दशा में भारी बदलाव आया है| आधुनिकता के संसाधन शहरों-कस्बों से होते हुए गाँव तक पहुंच गये हैं एवं गाँव भी छल-कपट और राजनीतिक कुचेष्टाओं के शिकार हो रहे हैं| अधिकांश गाँव का जीवन आज भी अभाव और उत्पीड़न का जीवन है| नारी जीवन तो और भी दुखद है क्योंकि इन्हें दोहरी मार झेलनी पड़ रही है, जहाँ सामाजिक बन्धनों ने इन्हें कठोर बेड़ियों में जकड़ रखा है, वहीं वे अपने परिवार में ही घुट-घुट कर जीवन बिताने को विवश हो जाती हैं| इनकी लगभग सारी कहानियाँ राजस्थान के ग्रामीण समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं|

मंगल सिंह मुंडा की कहानियाँ ‘महुआ का फूल’ नामक कहानी संग्रह में संकलित हैं| इनकी कहानियाँ समयानुकूल है| इन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से समाज के नग्न और कठोर यथार्थ को बड़े खुले और स्पष्ट ढंग से उजागर करने का प्रयत्न किया है| कहानियों में स्वाभाविकता एवं मनोवैज्ञानिकता है| ‘महुआ का फूल’ शीर्षक कहानी में लेखक ने पुरुषों के अत्याचारों का विरोध करती हुई नारी को दर्शाया है| आदिवासी स्त्री राधिकाबाई करमु सरपंच के आदमी बिरजू को छुरा मारकर हत्या कर देती है और इस प्रकार वह स्त्रियों के ऊपर होने वाले पुरुषों के अत्याचारों का विरोध करती है जिससे समाज में स्त्रियों का सिर ऊँचा उठता है| ‘सिंदूर की डिबिया’ शीर्षक कहानी दहेज विरोधी एक लड़की के त्याग की कहानी है| दहेज के कारण सुनीता की शादी भूपति बाबू नहीं कर पाते| सुनीता पिता के दर्द को पहचान जाती है और अचानक एक दिन घर से चुपचाप निकल पडती है|

  1. पृष्ठ स. 29,आदिवासी कौन-रत्नाकर भेंगरा,सी.आर बिजोय,सम्पादिका- रमणिका गुप्ता
  2. पृष्ठ स.37भारत का इतिहास,रोमिला थापर- भाग 1 ,पेंग्विन प्रकाशन, नई दिल्ली
  3. पृष्ठ स.13,उदारीकरण और विकास का सच, सम्पादक- उर्मिलेश, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स(प्रा.)लिमिटेड ,नई दिल्ली-2010
  4. पृष्ठ संख्या197, आदिवासी साहित्य विमर्श- लेखिका-वंदना टेटे (सम्पादक- गंगा सहाय मीणा)
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