विद्रोह के बीज: थेरीगाथा

आरती रानी प्रजापति

पी.एच.डी हिंदी

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

8447121829

भारतीय समाज में व्याप्त पितृसत्ता ने स्त्री के व्यक्तित्व विकास के सारे दरवाजों को बंद किया है। उसे लगातार खुद को साबित करना पड़ता है। घर के कामों में उसकी दक्षता ही उसके जीवन का सही लक्ष्य मानी जाती है। ऐसे में स्त्री पढ़ाई-लिखाई करे यह एक गैर-जरूरी बात लगती है। कारण यह है कि पढ़ी हुई औरत अपने लिए लड़ना जानती है। समाज बदलने की ताकत रखती है। समाज बदलेगा तो स्त्री-पुरुष बराबर आ जाएगें। वह पद भेद खत्म हो जाएगा जो पुरुष को मिला हुआ है। स्त्री का घर, परिवार समाज के हर छोटे-बड़े निर्णय में योगदान होगा। स्त्री घर चला सकती है पर कलम नहीं इस सोच ने स्त्री को पढ़ने-पढ़ाने से रोका।

जैसे-जैसे समाज ने प्रगति करनी शुरु की उसने शारीरिक संबंधों को घर में कैद करना शुरु कर दिया। वज़ह वह सम्पत्ति जो वह कमा सकता था, उसकी ही संतति को जाना। अर्थात् जब समाज में स्वतंत्रता थी तब संतानें माँ के नाम से जानी जाती थी। पुरुष का कर्तव्य वहाँ उस संतति की रक्षा करना नहीं बल्कि भोजन का प्रबंध करना होता था। अविष्कारों ने मनुष्य की उस थोड़ी बहुत सम्पत्ति में इज़ाफा किया अब वह न सिर्फ पेट भर सकता था बल्कि उसके पास उस पदार्थ को (जो उसकी निजी सम्पत्ति होता था) संभाल कर रखने और उसे अपनी आने वाली पीढ़ी को देने की प्रव्रत्ति पैदा हुई| उन्मुक्त समाज में पुरुष का ये जान पाना की उसका बच्चा कौन है संभव नहीं था| इसी सोच के तहत परिवार की स्थापना हुई जिसमें घर में स्त्री को रखा गया उसे एकनिष्ठता का सबक घोंट-घोंट कर सिखाया गया। सभ्यता के विकास क्रम में आरम्भिक समाज, सिंधु सभ्यता, फिर वैदिक सभ्यता आती है। वैदिक काल में एक तरफ कबीलों की स्त्रियों को जीता जाता था। दूसरी तरफ आर्यों संस्कृति की स्त्रियों की दशा बेहतर थी। वहाँ स्त्रियों को सम्मान था। भारत इतिहास और संस्कृति में मुक्तिबोध लिखते हैं-

‘इनके परिवार पितृ-सत्तात्मक थे। स्त्रियों का उचित सम्मान था। ऋषियों की श्रेणी में गार्गी, मैत्रियी, लोपामुद्रा जैसी शिक्षिता नारियां भी थीं। बाल-विवाह का नाम नहीं था। विधवा-विवाह खूब होते थे। पुरुष एक से अधिक पत्नियाँ रख सकता था। किन्तु स्त्री का एक ही पति होता था। ‘स्त्रियों और शुद्रों को शिक्षा नहीं देना चाहिए यह विचार वैदिक युग में विद्यमान नहीं था। स्वयंवर प्रचलित थे। लड़कियों का उपनयन संस्कार होता था, वे जनेऊ पहनती और ब्रह्मचर्य का पालन करती थीं’।[1]

सबसे पहला महिला लेखन हमें वैदिक काल में मिलता है। वेद की कई ऋचाओं की रचयिता महिलायें थीं। यह लेखन स्त्री लेखन की शुरुआत के लिए महत्वपूर्ण है। वैदिक काल की स्त्री लिख रही थी। लेकिन अधिकतर उन्होंने उसी चीज को लिखा है जिसे समाज स्वीकार कर ले। वहाँ विद्रोह देखने को प्राय: नही मिलता। कारण वह एक वर्ग़ है, एक जाति है। ऐसा नहीं है कि उस समाज में स्त्री शिक्षा बिलकुल नहीं थी पर यह शिक्षा कुछ स्त्रियों तक सीमित थी। उनमें उनका वर्ग, जाति महत्वपूर्ण था। सभी महिलाओं को पढ़ने का अधिकार नहीं था। लेकिन जिन्हें यह अधिकार प्राप्त था उनका नाम भी इतिहास में कहीं नहीं मिलता है। महिला लेखन पर हिंदी साहित्य का आधा इतिहास में सुमन राजे कहती हैं-

‘महिला लेखन की एक अविछिन्न धारा रही है, आवश्यकता उसे खोज निकालने की है और उसे एक आकार देने की’।[2]

बौद्धकाल तक आते-आते समाज में परिवर्तन आता है। बौद्धकाल में वह स्त्री-पुरुष जो बुद्ध की शरण में गए उनके लेखन को थेरगाथा (पुरुष रचना), थेरीगाथा (स्त्री रचना) कहा गया| बौद्धकालीन समय से ही स्त्री रचनाकार अपनी उपस्थिति साहित्य में दर्ज कराने लगी थीं| थेरीगाथा 75 बौद्ध भिखुणियों का लेखन है जिसमें उन्होंने अपने जीवन के सत्य, अनुभव, बौद्धधर्म में दीक्षित होने से पहले और बाद के जीवन को बताया है। ‘थेरीगाथा बौद्ध-धर्म और बौद्ध दर्श की एक पूर्ण पुस्तक है। यह उनका पूरा और सच्चा प्रतिनिधित्व करती है।[3] वैदिककाल में स्त्रियां भले ही रचना कर रही थीं पर आम घर की महिलायें वे नहीं थीं। साधारण स्त्री दु:खपूर्ण जीवन को व्यतीत कर रही थी। उसका पूरा दिन घर के काम में बीत जाता था। थेरीगाथा के संग्रह कर्ता विमलकीर्ति लिखते हैं-

‘थेरीगाथा भगवान बुद्ध की समकालीन भिक्खुणियों के जीवनानुभव उन्हीं की वाणी में व्यक्त अभिव्यक्ति का अनुपम संग्रह हैं| थेरीगाथा काल के पहले भारतीय इतिहास में नारी को अपनी व्यथा को इतनी स्वतंत्रता के साथ प्रकट करते नहीं देखा जा सकता| वास्तव में थेरीगाथा नारी स्वतंत्रता को प्रकट करने वाला प्रथम ग्रन्थ है|”[4]

थेरी गाथाओं के विद्रोह को शोध पत्र में तीन भागों में बांटा गया है-

  1. इच्छाओं से विद्रोह
  2. परिवार से विद्रोह
  3. सामाजिक स्थिति से विद्रोह

इच्छाओं से विद्रोह

भारतीय समाज में प्रचलित है कि नारी कामी होती है। उसमें काम की इच्छायें पुरुष से अधिक होती है। वह काम, क्रोध, मोह के वशीभूत होकर कुछ भी कर सकती है। वात्सायन ने औरत में 8 गुना काम इच्छा का वर्णन किया है और इसलिए स्त्री पर लांछन या कहूं ऊंगली उठाना सरल बना दिया गया। औरत है तो गलत ही होगी यह धारणा आम है। औरत अपने मन को काबू नहीं रख सकती और संन्यासी पुरुष तक को पथभ्रष्ट कर दे। ऐसी मानसिकता वाले समाज में थेरीगाथा अलग ही उदाहरण पेश करती है। वहाँ किसी अन्य से पहले खुद के मनोभावों से विद्रोह वह नारियां करती हैं। उत्तराथेरी लिखती हैं-

कायेन संवुता आसिं, वाचाय उद चेतसा।

समूल तण्हमब्बुय्ह, सीतिभूताम्हि निब्बुता “ति॥15॥[5]

अर्थात एकनिष्ठ होकर मैंने अपनी काया, मन और वाणी को संयत किया है। फिर मैंने अपनी तृष्णा को समूल उखाड़ कर फेंक दिया। आज मैं पूरी तरह शांत हूँ। निर्वाण प्राप्त हूँ। निर्वाण की परम शांति को मैंने अनुभव किया है।

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बुद्ध की शरण में जाने वाली महिलाओं ने अपने जीवन में एक बड़ा परिवर्तन देखा। वह सुख जो आज तक पुरुषों को प्राप्त था अब महिलायें महसूस कर रही थीं। निवृत्ति, मोक्ष का सुख बुद्ध काल में महिलाओं को भी मिलने लगा था। अभयाथेरी कहती हैं-

बहुहि दुक्खधम्मेहि, अप्पमादरताय मे।

तण्हक्खयो अनुप्पतो, कतं बुद्धस्स सासन “ति॥36॥[6]

बहुत गम्भीर दुक्खों से लड़ती हुई मैं अप्रमादिनी हुई। मैंने वासना की जड़ को उखाड़ डाला है और मैंने बुद्ध के शासन को पूरा कर लिया है।

बुद्ध मुक्ति के मार्ग में अकेले गए थे। अपनी पत्नी यशोधरा को संतान की जिम्मेदारी बुद्ध ने अनायास ही दे डाली। कहीं न कहीं उस समय उनके जहन में भी नारी की वही परम्परा ग्रस्त छवि रही होगी। लेकिन इस चीज को वह आगे पूरा कर देते हैं। संघ में स्त्रियों का प्रवेश उनकी बदली हुई मानसिकता का परिचायक है। स्त्री जिसे वह यह सोच कर छोड़ देते हैं कि वह निवृत्ति की शायद हकदार नहीं है या वह घर सम्भालने की ही अधिकारिणी है उसका जन्म घर, बच्चे के लिए हुआ है, उसी स्त्री समाज को उन्होंने निवृत्ति का मार्ग़ दिखाया।

स्त्री पुरुष का भेद विषमता पैदा करता है। ईश्वर के सामने सभी एक हैं। वहाँ कोई लिंग भेद नहीं। स्त्री की मुक्ति नहीं हो सकती या पुरुष की नहीं यह भेद ही गलत है। जिसका चित्त शांत है वह उस शांति मोक्ष का अधिकारी है। वासना को जिसने खुद से समाप्त किया वही उस परमशांति को पा सकता है। थेरी लिखती हैं-

सब्बत्थ विहता नंदी, तमोखोंधो पदालितो।

एवं जानहि पापिम, निहतो त्वमसि अन्तका “ति॥62॥[7]

देख!, मैंने सभी जगह से अपनी काम-वासना का सम्पूर्ण विनाश कर दिया है। अज्ञानांधकार को नष्ट कर दिया है। पापी मार! प्राणियों का अंत करने वाले तू समझ ले। आज तेरा ही अंत कर दिया गया है। दुष्ट! तुझे पूरी तरह नष्ट कर दिया गया।

थेरीगाथा स्त्री के जीवन में संघ नें जाने से पहले और उसके बाद के जीवनानुभव का संग्रह है। नारी को घर गृहस्थी से इतना बांध दिया गया कि वह कुछ अन्य नहीं सोच पाती। मुक्ति तो नारी के लिए सम्भव ही नहीं थी लेकिन थेरियां इस असम्भव को सम्भव करती हैं। अपनी दशा को व्यक्त करती हुई थेरी लिखती हैं-

अयोनिसो मनसिकारा, कामारागेन अट्टिता।

अहोसिं उदव्ता पुब्बे, चित्ते अवसवत्तिनी॥77॥[8]

मेरे मन में असंगत विचार उत्पन्न होने के कारण मैं पहले काम वासना से सदा ही पीड़ित रहती थी। मैं अविनीत, विद्रोही वश में न हुए चित्त से सदा ही बैचेन रहती थी। संघ में जाने के बाद मन की शांति किस प्रकार स्त्री मन को एक आत्मिक संतुष्टि देती है इस पर सुंदरी नन्दा थेरी लिखती हैं-

अथ निब्बिन्दहं काये अज्झत्तच्च विरज्जहं।

अप्पमत्ता विसंयुत्ता, उपसंताम्हि निब्बुता “ति॥86॥[9]

तब मुझे इस देह में वैराग्य उत्पन्न हुआ। मै अंदर से राग-मुक्त हो गई, मैंने इस देह से अपनापन तोड़ दिया है पुरुषार्थ में लीन, अनासक्त, उपशांत होकर, आज मैं निर्वाण की परमशन्ति का अनुभव करती हूँ। आज मै परम शांत हूँ।

थेरियों का मन शांत है। उनके मन की आसक्ति दूर हो चुकी है। वह भाव की महिला इंद्रियों के वश में होती है इसपर थेरियों ने विजय पा ली थी। वह मन से शांत हैं। नंदुत्तरा थेरी लिखती हैं।

सब्बे भवा समुच्छिन्ना इच्छा च पत्थनापि च।

सब्ब योगविसंयुता, संति पापुनि चेतसो” ति॥ 91॥[10]

मेरे सभी भाव अर्थात जीवन की आसक्तियां पूरी तरह से नष्ट हो गई हैं, मेरी इच्छाएं भी और अभिलाषाएं भी, सब नष्ट हो गई हैं, सब बंधनों से विमुक्त हो कर अब मुझे चित्त की शांति प्राप्त हुई है।

बुद्ध ने अपने समय में स्त्रियों के साथ भेदभाव नहीं किया। संघ में स्त्रियों को भी जगह दी गई और परमशांति का अनुभव उन्होंने भी किया। थेरीगाथा में थेरी संधा लिखती हैं।

हित्वा घरे पब्बजित्वा, हित्वा पुत्तं पसुं पियं।

हित्वा रागच्य दोसच्य, अविज्जच्य विराजिय।

समूल तण्हमब्बुरह, उपसंताम्हि निब्बुता”ति॥[11]

प्रव्रज्या लेकर मैंने घर छोड़ा, अपनी प्रिय संतान को छोड़ा, प्रिय पशुओं को छोड़ा। राग और द्वेष को छोड़ा, अविद्या को छोडकर विरक्त हुई। तृष्णा को समूल नष्ट कर अब मैंने निवाण की परम शांति का अनुभव किया है। निर्वाण का अनुभव करके मैं परम शांत हो गई हूँ।

परिवार से विद्रोह

स्त्री को बांधने वाला यदि कोई है तो उसमें सबसे पहला स्थान परिवार का है। परिवार के बंधन ही स्त्री को सबसे पहले शोषित करते हैं। वह इन बंधनों से अलग होना नहीं चाहती है उसके लिए परिवार एक महत्त्वपूर्ण संस्था बना दी गई है। परिवार से स्त्री का अस्तित्व है। परिवार, संरक्षण का काम करता है।

इन थेरियों ने स्त्री जीवन के अनुभवों को लिखा। क्या जीया? कैसे जीया? अब क्या महसूस करती हैं यह सब थेरीगाथा में मिलता है। संघ में शामिल होने के बाद थेरियों ने एक आजादी महसूस की। उस जीवन से जो उन्होंने आज तक जीया था। जो वास्तव में जीवन न होकर एक यात्रा थी। दु:ख की यात्रा। इसी स्थिति को चित्रित करती हुईं थेरी मुक्ता लिखती हैं-

सुमुत्ता साधुमुत्ताम्हि, नीहि स्वुज्जेहि मुत्तिया।

उदुक्खलेन मुसलेन, पतिना खुज्जकेन च।

मुत्ताम्हि जातिमरणा, भवनेत्ति समूहता”ति॥[12]

अर्थ-मैं अच्छी तरह मुक्त हो गई हूँ। अच्छी विमुक्त हो गई हूँ। तीन टेढी चीजों से मैं अच्छी तरह विमुक्त हो गई हूँ। ओखली से, मुसल से और अपने कुबड़े पति से, मैं अच्छी तरह मुक्त हो गई हूँ।

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यह वह शांति है जो अब तक इस भारतीय समाज में मर्दों को लिखी थी। लेकिन बौद्ध धर्म ने यह सबके लिए सुलभ करवा दी। थेरीगाथा भारतीय नारी की दशा को बताता है। वह नारी के अतीत के ही बारे में नहीं बताता बल्कि उसकी वर्तमान मनोदशा भी इसमें चित्रित हुई है। किस प्रकार नारी बुद्धकाल में मानसिक, शारीरिक शोषण को जी रही थी, यह हमें थेरियों के अनुभव बताते हैं। पूरे बुद्ध काल में स्त्रियों की दशा को सुमंगलमाता थेरी ही बता देती है-

सुमुत्तिका सुमुत्तिका, साधुमुत्तिकान्हि मुसलस्स।

अहिरिको मे छ्त्तक वा पि, उक्खलिका मे देड्डुभंवाति॥[13]

अहो! मैं मुक्त नारी हूँ; मेरी मुक्ति कितनी धन्य है। पहले मैं मूसल लेकर धान कूटा करती थी, आज मैं उससे मुक्त हुई। मेरी दरिद्रावस्था के वे छोटे-छोटे (खाने पकाने के) भांडे-बर्तन, जिनमें बीच मैं मैली-कुचैली बैठती थी और मेरा निर्लज्ज पति मुझे उन छातों (छतरी) से भी तुच्छ समझता था, जिनको वह अपनी जीविका के लिए बनाता था।

एक पुरुष जो बेचने के लिए समान बनाता है, उससे भी तुच्छ अपनी पत्नी को समझता है। कैसी विडम्बना है यह समाज की जिसमें एक औरत को किसी वस्तु से भी कम आंका जा रहा है। जहाँ औरत की कीमत एक बेचने योग्य वस्तु भी नहीं है। थेरियों के बेबाक चित्रण पर अनिता भारती लिखती हैं

थेरियों ने तथाकथित समाज के खिलाफ जिस ईमानदारी से अपने आप को व्यक्त किया वैसी स्वतंत्र वाणी आज भी मुश्किल से मिलती है।[14]

यहां स्त्री खुश है वह अपने बंधनों से मुक्त होने की खुशी व्यक्त कर रही है। पति को परमेश्वर मानने की धारणा। ‘भला है बुरा है जैसा भी है’, वाली सोच को वहाँ त्यागा जा रहा है। स्त्री ऐसे पति को त्याग कर खुशी का अनुभव कर रही है। यहाँ उसकी वाणी में अपनी अस्मिता की तलाश है वह अब अपने को तुच्छ समझने वाले इंसान से अलग हो चुकी है। चीज जिसे वह बेचने के लिए बनाता है उससे भी कम मूल्य वह उस नारी का मानता है। ऐसे घर बंधन से वह थेरी बनाने के बाद आज़ाद हुई।

उब्बिरी थेरी अपनी कन्या की मृत्यु शोक से व्याकुल थी। वह उस शमशान में जाकर अपना शोक व्यक्त करती है जहाँ उसकी बच्ची को जलाया गया था। इस मानसिक संताप ने उसको लगातार भटकने के लिए मजबूर किया। बुद्ध के वचन ने उब्बिरी का शोक नष्ट किया। वह लिखती हैं

अब्बही वत में सल्ल, दुहसं हदयस्सित।

यं में सोकपरेताय, धीतुसोकं ब्यपानुदि॥52॥[15]

मेरे ह्रदय में अदृश्य रूप से बिंधा तीर निकल गया। मेरी प्यारी पुत्री का शोक मेरे सम्पूर्ण जीवन को विषयुक्त बनाए हुए था और वह मेरे प्राणों का हरण कर रहा था।

भिखुणी पटाचार ने भी इसी संतान शोक को झेला था लेकिन बुद्ध ने उन्हें भी इस शोक से मुक्त किया। मुक्ति की राह स्त्री के लिए नहीं थी ऐसे में वह लगातार इस जन्म-मरण के फेर में घूमती है। प्रजापति गौतमी लिखती हैं-

माता पुत्रो पिता भाता, अच्चका च पुरे अहुं।

यथा भुक्यजानंती, संसरिह अनिब्बिस॥ 159॥[16]

मै पूर्वजन्मों में अनेक बार माता, पुत्र, पिता, भाई, मातामही बनती रही वस्तुओं को उनके यथार्थ रूप में न जानती हुई मैं संसार में घूमती रही और मुझे यह वस्तु वहां कभी नहीं मिली, जिसकी मुझे चाह थी।

यह पद स्त्री के मन की व्यथा को बताता है। संबंधों से औरत को बांध कर रखा जाता है। वह लगातार उन्हीं में उलझी रहती है ऐसे में वह जानती है कि उसका शोषण भी इन्हीं बंधनों के कारण होता है लेकिन वह कुछ नहीं कर पाती उसके लिए कोई विकल्प रखा ही नहीं गया था। ऐसे में बुद्ध की शरण उसको एक सहारा देती है इन बंधनों से मुक्ति का।

इसिदासी की कथा भी दु:खों से भरी हुई है वह लगातार एक दूसरे घर भेजी गई लेकिन कहीं भी स्वीकार्य नहीं हुई। अपनी दशा पर वह लिखती हैं।

तस्सेतं कम्मफलं यं मं अपकीरितून गच्छन्ति।

दासीव उपट्ठहंति, तस्सपि अंतो कतो मया”ति॥449॥[17]

यह किस कर्म का फल था कि दासी के समान तन्मय होकर भी जिस-जिस पुरुष की मैंनें सेवा की, उसी ने मुझसे नफरत की, मुझे अपमान पूर्वक त्याग दिया, किंतु आज मैंने उसका भी अंत कर दिया।

वह स्त्री अपने अपमान को त्यागती हैं। बार बार अपमान होने की पीड़ा से मुक्ति पाती है। वह मोक्ष प्राप्त करती है। निर्वाण को धारण करती है।

सामाजिक स्थिति से विद्रोह

स्त्री की सामाजिक स्थिति पितृसत्ता के आरम्भ के बाद से कम होती गई। ऐसे में उसे दोयम दर्जे पर रखा गया। इन सब स्थितियों से बौद्धकाल की स्त्री जुझ रही थी। सबसे ज्यादा दशा वेश्या की खराब थी। हमारे समाज में पतिव्रता स्त्री एक ताड़न की अधिकारी बन जाती है ऐसे में वेश्या हाशिए पर जीती एक स्त्री। लेकिन वेश्या को भी अपने इस पेशे से मुक्ति चाहिए। यह समाज घर से बाहर एक रात रह कर आई औरत को माफ नहीं करता वेश्या को सम्मान देना तो बहुत बड़ी चीज है। बुद्ध ने कोई ऊंच नीच का भाव किसी के लिए नहीं रखा, वेश्या को भी प्रव्रजित किया। अड्ढकासि थेरी अपनी स्थिति पर लिखती है:-

अथ निब्बिंदह रूपे, निब्बिअंच्च विरज्जह।

मा पुन जातिसंसार, संधावेच्च पुनघुन॥26॥

तिस्सो विज्जा सच्छिकता, कतं बुद्धस्स सासन” ति॥[18]

किंतु मेरा सारा सौंदर्य आज मेरे लिए घृणा का कारण हुआ है ग्लानि पैदा करने वाला हुआ है। मैं उसके मोह से मुक्त होकर अब विरक्त हो गई हूँ। मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्कर में मुझे अब और घूमना नहीं है। मैंने तीनों विद्याओं का साक्षात्कार कर लिया है। मैंने भगवान सम्यक सम्बुद्ध के शासन को पूरा कर दिया है।

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अपने रूप- यौवन पर मोहित वेश्या के लिए बुद्ध की वाणी शांत पानी का काम करते है। वेश्या की स्थिति विमला थेरी स्पष्ट करती हैं।

पिलंघन विंदसेंती, गुयहं पकासिक बहुं।

अकासि विविध मायं, उज्जग्घंती बहुं जनं॥74॥[19]

मै लज्जा शर्म को त्याग कर अपने आभूषणों को उधाड कर दिखाती थी और अपने गुप्त अंगों तक को दिखा देती थी। मनुष्यों के पतन के लिए मै कई प्रकार के मायाजाल फैलाती थी।

यहां देखने की बात यह है कि स्त्री अपनी मर्जी से वेश्या नहीं बनती। पुरुष की कामावासना एक स्त्री को वेश्या बनाती है। लेकिन थेरी इस तरह व्याकुल हैं कि सारा दोष उसी का है। जबकि वह पुरुष को फंसाने के लिए नहीं अपनी अजीविका के लिए सब करती है, तब भी यहां स्त्री का चरित्र गलत बना दिया गया है और पुरुष को सीधा स्थापित किया है। इस स्त्री के मन में अपने लिए जो धारणा है समाज भी उसे ऐसी ही नजर से देखता है और इस स्थिति से उसे मुक्ति दिलाई बुद्ध ने।

बुद्ध काल में नारियों की दशा शोचनीय थी उनकी हैसियत तुच्छ थी। एक थेरी अपनी दशा कहती हैं-

उभो माता च धीता च. मयं आसुं सपत्तियो।

तस्सा मे अहु संवेगों, अब्मुतो लोह हंसनो॥224॥[20]

माता एवं पुत्री, हम दोनों सपत्नी का दूषित जीवन बिता रही थीं, बाद में इस दूषित जीवन के प्रति अद्भूत, रोमांचकारी उदासीनता मुझे प्राप्त हुई।

माता और पुत्री को सपत्नी बना देना उस समाज में औरत की स्थिति को पूर्णत: स्पष्ट करता है। अपनी इस स्थिति से वह स्त्रियां विद्रोह करती हैं और बुद्ध की शरण में जाती हैं।

आम्रपाली का नाम बुद्ध के समकालीन समय से लेकर आज तक प्रचलित है। वह अद्वितीय सुन्दर स्त्री थी और वेश्या का जीवन जी रही थी। बुद्ध की शरण में आकर वे अपने जीवन की वास्तविकता को पहचानती है तथा अपने सौंदर्य का एक अन्य रूप देखती है। वह लिखती है-

तूलपुण्ण सदिसोपमा अभो, सोभरे सु पादा पुरे गम।

जे जराय फुटिता वलीमता, सच्चवादिवचनं अनच्चथा॥269॥[21]

कभी मेरे दोनों सुकोमल पैर रूई की पिच्छी के समान (या रूई से जैसे भरे हुए) हलके थे। वही आज बुढ़ापे में दाने जैसे होकर (पिचक कर) झुर्रियों से भरे हुए हैं। सत्यवादी (बुद्ध) के वचन कभी मिथ्या नहीं होते।

इसके अतिरिक्त यह थेरियाँ तर्क में भी निपुर्ण थी। तत्कालीन प्रचलित आड्म्बर प्रहार इन्होंने अपने माध्यम से किया है। पुण्णा थेरी कहती हैं।

सग्गं नून गामिस्सन्ति, सण्णे मण्डूककच्छपा।

नागा च सुसुमारा च, चे चच्ये उदके चरा॥241॥[22]

यदि गंगा जल से ही शुद्धि होती है, तब तो मेढ़क, कछुए जल के सर्प, मगर और अन्य जलचरों का स्वर्ग में जाना तय है। पानी में नहाने से पाप घुल जाएगें यह तर्क वास्तव में कुतर्क है। थेरी आगे कहती हैं-

सचे इमा नदियो ते, पापं पुण्बे कतं वहु।

पुच्चम्पिपा वहेच्तु तें तेन त्वं परिबाहिरो॥243॥[23]

फिर यदि इस नदी में नहाने से पूर्व के पाप कर्म धुल जाते हैं तो क्या फिर उनके साथ ही तेरे पुण्य कर्म भी न धुल जाएंगे? अरे मुर्ख ब्राह्मण। फिर तेरे पास क्या शेष रहेगा?

आज की स्त्री भी इस तर्क को नहीं कर पायेगी। इन धार्मिक कर्मकांडों को करने में स्त्री समुदाय ही सबसे आगे रहता है। वही बुद्धकाल की स्त्री इस चेतना से सम्पन्न है कि यह मात्र दिखावा है। बांधने का एक तरीका। एक जाति की श्रेष्ठता व उससे जुडे कर्मकांड को महत्व देने का माध्यम।

स्त्री का बोलना जिस समाज में बंद किया जाए वह जब बोलती है तो उसका हर शब्द व्यवस्था के प्रति विद्रोह माना जाना चाहिए। यह विद्रोह हमें थेरीगाथा में मिलता है। ये थेरी वैदिक साहित्य की तरह धार्मिक रचना नहीं करती बल्कि मन व बाहर के अनुभवों को लिखती हैं। प्रश्न करती हैं अपनी दशा पर विचार करती हैं। अपनी सामाजिक पारिवारिक हैसियत के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों से दो-चार होती हैं। ये साधारण परिवार की महिलायें हैं कुछ समाज से बहिष्कृत वेश्याएं। कुल मिलाकर थेरीगाथा सामान्य घर-परिवार की स्त्रियों का लेखा-जोखा है। वेदना के स्वर, विद्रोह की भावना, इच्छाओं से मुक्ति और एक शांति का अनुभव थेरी गाथा में मिलता है। ‘थेरीगाथाएं नवीनता के साथ-साथ आधुनिकता की मशाल जलाए मनुष्यमात्र को परतंत्रता के खिलाफ उठ खड़े होने की प्रेरणा जगाती है’।[24] निश्चय ही यह ग्रंथ विद्रोह का बीज है जिसका विकास बाद के स्त्री साहित्य में मिलता है।

  1. गजानन माधव मुक्तिबोध, भारत: इतिहास और संस्कृति, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पहला संस्करण 2009, पहली आवृत्ति 2014, पृष्ठ-33
  2. सुमन राजे, हिंदी साहित्य का आधा इतिहास, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, दूसरा संस्करण-2004, पृष्ठ-18
  3. डॉ.धर्मवीर, थेरीगाथा की स्त्रियां और डॉ.अम्बेडकर, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2005
  4. डॉ. विमलकीर्ति (अनुवादक और सम्पादक), थेरीगाथा, बौद्ध भिक्खुणियों के जीवनानुभव और भावनापूर्ण उद्गार, सम्यक प्रकाशन, तृतीय संस्करण-2008, पृष्ठ-3
  5. डॉ. विमलकीर्ति, वही, पृष्ठ-50
  6. डॉ. विमलकीर्ति, वही, पृष्ठ-75
  7. डॉ. विमलकीर्ति, वही, पृष्ठ-94
  8. डॉ. विमलकीर्ति, वही, पृष्ठ-105
  9. डॉ. विमलकीर्ति, वही, पृष्ठ-109
  10. डॉ. विमलकीर्ति, वही, पृष्ठ-111
  11. डॉ. विमलकीर्ति, वही, पृष्ठ-56
  12. डॉ. विमलकीर्ति, वही, पृष्ठ-43
  13. डॉ. विमलकीर्ति, वही, पृष्ठ-63
  14. अनीता भारती, स्त्री मुक्ति का स्वर है थेरीगाथाए, अपेक्षा, अप्रैल-जून, 2005, पृष्ठ-62
  15. डॉ. विमलकीर्ति, वही, पृष्ठ-88
  16. डॉ. विमलकीर्ति, वही, पृष्ठ-162
  17. डॉ. विमलकीर्ति, वही, पृष्ठ-268
  18. डॉ. विमलकीर्ति, वही, पृष्ठ-65
  19. डॉ. विमलकीर्ति, वही, पृष्ठ-103
  20. डॉ. विमलकीर्ति, वही, पृष्ठ-197
  21. डॉ. विमलकीर्ति, वही, पृष्ठ-214
  22. डॉ. विमलकीर्ति, वही, पृष्ठ-203
  23. डॉ. विमलकीर्ति, वही, पृष्ठ-204
  24. अनीता भारती, स्त्री मुक्ति का स्वर है थेरीगाथाए, अपेक्षा, अप्रैल-जून, 2005, पृष्ठ-62
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