पितृसत्ता: अर्थ, उत्पत्ति एवं व्यापकता

*पूजा मिश्रा

सारांश:

प्रस्तुत आलेख द्वारा वैश्विक स्तर पर स्त्री की दोयम स्थिति के आधारभूत और महत्वपूर्ण कारक के रूप में पितृसत्ता को परिभाषित किया गया है। पितृसत्ता को मूलरूप से समझने के लिए इसके उत्पत्ति संबंधित मतों पर ध्यान देना आवश्यक है अतः पितृसत्ता को सार्वभौमिक और सार्वकालिक घोषित करने वाले विभिन्न मतों के साथ ही मानवविज्ञानी, सैली स्लोकम, इतिहासकार गर्डा लर्नर तथा मार्क्सवादी फ्रेडरिक एंगल्स इत्यादि द्वारा इन मतों का खंडन करने वाले तर्क भी प्रस्तुत किए गए हैं जिससे यह सत्यापित हो सके कि पितृसत्ता, सार्वभौमिक और सार्वकालिक नहीं है। पितृसत्ता की व्यापकता का अनुभव विश्व की लगभग प्रत्येक संस्कृति और समाज में किया जा सकता है परंतु यदि सम्मिलित प्रयास किए जाएं तो निश्चय ही पितृसत्ता और मातृसत्ता से परे एक समतामूलक समाज की स्थापना की जा सकती है।

बीज शब्द:

पितृसत्ता, मातृसत्ता, स्त्रीविमर्श, सामाजिक संरचना, शिकारी पुरुष, आदिम समाज

भूमिका:

पितृसत्ता अंग्रेजी के शब्द ‘पैट्रिआर्की’ का हिंदी अनुवाद है तथा ‘पैटर’ और ‘आर्के’ शब्दों से मिल कर बना है अर्थात ‘पिता का शासन’। पितृसत्ता एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जिसमें परिवार की संपूर्ण बागडोर घर के वृद्ध अथवा प्रभावशाली पुरुष के हाथ में होती है। परिवार में वंश पिता के पूर्वजों के अनुसार चलता है। ऐसी पारिवारिक व्यवस्था में सत्ता का हस्तानांतरण पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक पुरुष से दूसरे पुरुष के हाथों होता रहता है। भारत ही नहीं वरन विश्व के अधिकांश भागों में पितृसत्तात्मक व्यवस्था का ही अनुसरण किया जाता है। स्त्रीवादी विशेषज्ञों ने स्त्री की सामाजिक दोयम स्थिति का मूलभूत कारण पितृसत्ता को ही घोषित किया है। केट मिलेट ने अपनी पुस्तक ‘सेक्सुअल पॉलिटिक्स’ में स्त्री के ऊपर पुरुष वर्चस्व की स्थिति के लिए ‘पितृसत्ता’ शब्द का प्रयोग किया था। विभिन्न स्त्रीवादी विद्वानों द्वारा पितृसत्ता व्यवस्था की व्याख्या की गई है। प्रसिद्ध समाज शास्त्री सिल्विया वाल्बे के अनुसार “पितृसत्ता सामाजिक संरचना की एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें पुरुष महिला पर अपना प्रभुत्व जमाता है, उसका दमन करता है और शोषण करता है।”[1] स्त्रीविमर्श के विभिन्न संप्रदायों में से एक ‘उग्र स्त्रीवाद’ पितृसत्ता की जिस प्रकार से व्याख्या करता है , वह अनेक स्त्रीवादी विद्वानों को संतुष्ट नही करती है। ‘उग्र स्त्रीवाद’ स्त्रियों की प्रजनन क्षमता को उसकी अधीनता के मुख्य कारकों में गिनता है। ‘उग्र स्त्रीवाद’ यह मानता है कि यदि स्त्री प्रजनन की अनिवार्यता को हटा दिया जाए तो पुरुषों पर निर्भर रहने की उनकी विवशता स्वतः ही समाप्त हो जाएगी। शुल्मिथ फायरस्टोन अपनी पुस्तक ‘द डायलेक्टिक ऑफ़ सेक्स’ द्वारा इसी विचारधारा का समर्थन करती हैं परंतु अन्य स्त्रीवादी विद्वान मानते हैं कि हमारा समाज जाति, जेंडर, नस्ल, वर्ग और धर्म इत्यादि के आधार पर बंटा हुआ है अतः पितृसत्ता के अनुभव प्रत्येक स्त्री के लिए एक से ही नहीं हैं। उदाहरंणस्वरूप देखा जा सकता है कि निम्न जातियों की स्त्री का शोषण मात्र पितृसत्ता ही नहीं वरन जाति व्यवस्था द्वारा भी किया जाता है। वह पुरुषों की अधीनता के साथ ही उच्च वर्ग की स्त्रियों द्वारा भी शोषण का शिकार होती है। इसी प्रकार निम्न जाति के पुरुष भी उच्च जाति की स्त्रियों द्वारा शोषित होते हैं। तात्पर्य यह है कि अन्य स्त्रीवादियों ने उग्र स्त्रीवादियों के पितृसत्ता संबंधी विचारों पर अपना मत रखते हुए कहा कि सामाजिक संरचना एक जटिल संरचना है और इसका विभाजन मात्र स्त्री और पुरुष को दो भिन्न खेमों में रख कर नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार ‘बैरेट’ और ‘शीला रोबोथम’ जैसे स्त्रीवादी विद्वान पितृसत्ता की अवधारणा को अनुपयोगी करार देते हैं। इस संदर्भ में सिल्विया वाल्बी कहती हैं कि, “इस सिद्धांत को अनुपयोगी मानने की अपेक्षा इसे एक संकल्पना और सिद्धांत के रूप में इस तरह से विकसित किया जा सकता है कि स्त्री अधीनता की देश, काल, जाति, नस्ल, वर्ग तथा धर्म इत्यादि पर आधारित भिन्नताएं नजरअंदाज ना होने पाएं।”[2]

इसप्रकार पितृसत्ता को लेकर विभिन्न विद्वानों के विभिन्न मत हैं परंतु ध्यान देने वाली बात यह है कि पितृसत्ता एक व्यवस्था है, पितृसत्ता एक मानसिकता है। यह जरुरी नहीं है कि सभी पुरुष पितृसत्तात्मक मानसिकता का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। बहुत सारी स्त्रियाँ भी पुरुषवादी सोच का प्रतिनिधित्व करती हैं। पितृसत्ता, सामाजिक संरचना का महत्वपूर्ण अंग कैसे बनी या पितृसत्ता कब से विद्यमान है इस संबंध में विभिन्न मत हैं। पितृसत्ता के पक्षधर इसे मानव सभ्यता का एक स्वाभाविक अंग मानते हुए इसे सार्वभौमिक और सार्वकालिक घोषित करते हैं परंतु इस संबंध में हुए गहन शोध के उपरांत विभिन्न इतिहासकारों, स्त्रीवादी विद्वानों तथा मानव विज्ञानियों इत्यादि द्वारा इस तथ्य की पुष्टि की गई है कि पितृसत्ता , मानव सभ्यता के विकास का एक स्वाभाविक अंग न होने के साथ ही सार्वभौमिक और सार्वकालिक भी नहीं है। “समाज और संस्कृति निर्माण की प्रक्रिया में महिलाएं सदैव ही केंद्रीय भूमिका में रही हैं न कि हाशिए पर।”[3]

पितृसत्ता उत्पत्ति संबंधी मत:

पितृसत्ता की सार्वभौमिकता और सार्वकालिकता के संबंध में धार्मिक तर्क दिए जाते हैं जिनके अनुसार संपूर्ण विश्व का निर्माण ईश्वर द्वारा किया गया है और ईश्वर द्वारा ही स्त्री और पुरुष के लिए अलग- अलग भूमिकाओं का निर्धारण किया गया है। स्त्री का जन्म घर सँभालने और बच्चों की देखभाल करने के लिए ही हुआ है। आज भी इन धार्मिक तर्कों पर विश्वास रखने वाले परिवार का वंश आगे बढ़ाने के लिए पुत्र जन्म अनिवार्य मानते हैं। पुत्रवधुओं को पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया जाता है। पितृसत्ता के पक्षधरों द्वारा पितृसत्ता की सार्वभौमिकता के लिए ‘शिकारी पुरुष’ का तर्क दिया जाता है। मानव विज्ञानी शेरवुड वाशबर्न और सी. लैंकैस्टर ने पितृसत्ता के संबंध में डार्विन के उद्विकास सिद्धांत( थ्योरी ऑफ़ इवोल्यूशन) के आधार पर ‘शिकारी पुरुष’ का तर्क प्रस्तुत किया। यह तर्क डार्विन की कृतियों ‘ओरिजिन ऑफ़ स्पेशीज’ और ‘द डिस्टेंट ऑफ़ मैन’ में उद्धृत मानव विकास की लंबी शृंखला पर आधारित है। इस अवधारणा के अनुसार आदिम समाज में पुरुष शिकार पर जाया करते थे और स्त्रियाँ घर पर बच्चों की देखभाल करती थीं तथा भोजन की व्यवस्था करती थीं। ‘शिकारी पुरुष’ का तर्क पुरुष को स्त्री के आश्रयदाता के रूप में स्वीकार करता है। मानव विज्ञानी सैली स्लोकम ‘शिकारी पुरुष’ की अवधारणा को मानवशास्त्रियों की पुरुषवादी दृष्टि की उपज बताती हैं।[4] वह शिकारी पुरुष की अपेक्षा स्त्री और पुरुष दोनों को ही आहारसंग्रहकर्ता की भूमिका में देखती हैं। स्लोकम मानती हैं कि यदि पुरुष शिकार पर जाते थे तो इस समय को स्त्रियों ने बच्चों के पालन-पोषण के साथ ही कुछ रचनात्मक गतिविधियों में लगाया होगा यथा कंदमूल एकत्र करना और आरंभिक काल की कृषि की ओर अग्रसर होना। इतिहासकार गर्डा लर्नर भी मानती हैं कि आदिम समाज, भोजन के लिए पुरुषों द्वारा जुटाए गए बड़े शिकारों की अपेक्षा स्त्रियों द्वारा जुटाए गए छोटे शिकारों तथा कंदमूल पर अधिक निर्भर था।[5] इस प्रकार के तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि शिकार संग्रह अवस्था में भले ही स्त्री और पुरुष के बीच श्रम विभाजन रहा हो परंतु आदिम समाज में पुरुष, स्त्री के आश्रयदाता की अपेक्षा उसके पूरक के रूप में देखे जाते थे। भारतीय इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने मध्य भारत की भीमबेटका की गुफाओं के भित्तिचित्र का उदाहरण दिया है। इन भित्तिचित्रों में स्त्रियाँ एक साथ विभिन्न भूमिकाओं में नजर आती हैं। स्त्रियों के हाथ में फल- फूल बटोरने की टोकरी के साथ मछली पकड़ने का जाल भी नजर आता है। इन भित्तिचित्रों से यह स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ माँ होने के साथ ही आहार संग्रहकर्ता की भूमिका भी निभाती थीं।[6] पितृसत्ता के पक्षधरों में नाम जीव-विज्ञानी ई. ओ. विल्सन का भी आता है। विल्सन, स्त्री और पुरुष के बीच की असमानता को उचित ठहराने के लिए डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत का सहारा लेते हैं। विल्सन का मत है कि जिस समूह में मादाएं बच्चों को पालने पोसने का काम करती हैं और नर भोजन जुटाने का काम करते हैं वह समूह विकास की राह पर आगे निकल आता है।[7] इतिहासकार गर्डा लर्नर, विल्सन के इस मत का खंडन करती हैं कि आज के आधुनिक समाज में जहाँ बच्चों का पालन- पोषण मात्र माँ पर ही निर्भर नहीं करता है तथा जहाँ स्त्रियाँ भी बाहर जाकर आत्मनिर्भर बन रही हैं वहां इस तरह की धारणा निर्मूल हो जाती हैं। लर्नर, प्राचीन और आधुनिक समाज दोनों में ही ऐसे कबीलों का उदाहरण देती हैं जहाँ शिशु के पालन- पोषण का दायित्व कबीले के वृद्ध पुरुष, युवक अथवा अपेक्षाकृत बड़े बच्चे निभाते हैं। नारीवादी आलोचकों द्वारा भी विल्सन के इस मत को अप्रमाणिक एवं अवैज्ञानिक घोषित किया गया है। पितृसत्ता की उत्पत्ति उसकी सार्वभौमिकता तथा सार्वकालिकता को लेकर उसे सामाजिक व्यवस्था का एक स्वाभाविक अंग घोषित करने वाले विद्वानों की स्त्रीवादी विद्वानों द्वारा कड़ी आलोचना की गई है। गर्डा लर्नर ने अपनी पुस्तक ‘क्रिएशन ऑफ़ पैट्रीआर्की’ में लिखती हैं कि, “पितृसत्ता की स्थापना को मात्र किसी एक घटना से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। बल्कि इसे एक प्रक्रिया की भांति समझा जा सकता है जिसे बनने में लगभग 2500 वर्ष( 3100 से 600 ईसा पूर्व) लगे हैं।”[8] गर्डा लर्नर से पूर्व यह मत फ्रेडरिक एंगल्स द्वारा भी दिया जा चुका है कि पितृसत्ता का निर्माण एतिहासिक घटनाक्रमों में कुछ निश्चित कारणों से हुआ है। फ्रेडरिक एंगल्स ने 1884 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्यों की उत्पत्ति’ में स्त्री पराधीनता के मुख्य कारकों के संबंध में विस्तार से चर्चा की है। एंगल्स ने अपनी इस पुस्तक द्वारा परिवार के इतिहास को समझाने के लिए 1861 में प्रकाशित बखोफेन की पुस्तक ‘मदर राईट’ तथा 1870 में प्रकाशित हेनरी मार्गन की पुस्तक ‘प्राचीन समाज’ की सहायता ली है। पितृसत्ता पारिवारिक संरचना से जुड़ा हुआ शब्द है अतः पितृसत्ता की व्याख्या के लिए एंगल्स आदिम समाज में पारिवारिक संरचना की व्याख्या करते हैं। एंगल्स के अनुसार 1861 में बखोफेन की पुस्तक के प्रकाशन के बाद से परिवार के इतिहास का अध्ययन आरंभ हुआ। बखोफेन की पुस्तक मूलरूप से जर्मन में ‘Das Mutterrecht’ के नाम से लिखी गई थी जिसमें ‘मातृ अधिकार’ नाम से एक अध्याय है। यह पुस्तक आदिम सामाजिक व्यवस्था के कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर प्रकाश डालती है। बखोफेन के अनुसार आदिम समाज ‘यौन स्वछंदता’ या हैटेरिज्म की स्थिति में था जिसमें एक स्त्री के विभिन्न पुरुषों से संबंध होते थे। इस अवस्था में किसी नवजात शिशु के पिता का निर्धारण नहीं किया जा सकता था। अतः शिशुओं की पहचान माँ द्वारा ही होती थी और वंश भी मातृ पूर्वजों के नाम से ही चलता था। बखोफेन के अनुसार यह वह समय था जब स्त्रियों को समाज में बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। बखोफेन के मातृ अधिकार की अवधारणा से ही मातृसत्ता की अवधारणा विकसित होती है। बखोफेन हैटेरिज्म से एकनिष्ठ विवाह में परिवर्तन और मातृसत्ता से पितृसत्ता में परिवर्तन के पीछे यूनानी सभ्यता में हुए धार्मिक परिवर्तनों का आधार देते हैं। इसके लिए उन्होंने इस्खिलिस के नाटक ‘ओरेस्टिया’ की नई व्याख्या दी। इस नाटक के अनुसार ‘ओरेस्टस’ को अपनी माता ‘क्लिटेमिस्ट्रा’ की हत्या के आरोप से बरी कराने के लिए देवता अपोलो तथा देवी ऐथना ओरेस्टस का साथ देते हैं। बखोफेन रोमन सभ्यता में आए इस पौराणिक बदलाव को ही मातृसत्ता के विनाश का आरंभ मानते हैं। “बखोफेन द्वारा प्रस्तुत आदिम समाज में उपस्थित मातृसत्ता की अवधारणा से बीसवीं सदी के अधिकाँश नारीवादी विचारक सहमत हैं। फ्रेडरिक एंगल्स, चार्लोट पर्किंसन, गिलमैन तथा एलिजाबेथ कैंडी स्टैंटन इत्यादि विचारकों ने बखोफेन की अवधारणा के अनुसार स्त्री- पराधीनता पर अपने मत प्रस्तुत किए हैं।”[9] फ्रेडरिक एंगल्स निजी संपत्ति के आविर्भाव को मातृसत्ता के विनाश का कारण मानते हैं। एंगल्स ने परिवार शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा कि परिवार या फेमिली शब्द फेम्युलस (famulus) शब्द से बना है जहाँ फेम्युलस शब्द का अर्थ ‘घरेलू दास’ होता है। फेमेलिया शब्द का अर्थ एक व्यक्ति के सारे दासों का समूह होता है। रोमन लोगों द्वारा निर्मित इस सामाजिक संगठन फेमेलिया में उसके मुखिया के अधीन उसकी पत्नी, उसके बच्चे और कुछ दास होते थे। और रोमन पितृसत्ता के अंतर्गत उसके हाथों में इन लोगों की जिंदगी और मौत का अधिकार होता था। एंगल्स ने घर के मुखिया की निरंकुश सत्ता को इंगित करते हुए लिखा, “पत्नी के सतीत्व की रक्षा करने के लिए यानि बच्चों के पितृत्व की रक्षा करने के लिए नारी को पुरुष की निरंकुश सत्ता के अधीन बना दिया जाता है। वह यदि उसे मार भी डालता है तो वह अपने अधिकार का ही प्रयोग करता है।”[10] फ्रेडरिक एंगल्स ने निजी संपत्ति की अवधारणा के साथ ही स्त्री अधीनता के लिए स्त्रियों की उत्पादन में भागेदारी न होने को भी दोषी ठहराया। घरेलू श्रम के दायरे में सीमित हो जाने के कारण स्त्रियाँ सामाजिक उत्पादन के क्षेत्रों से दूर होती जाती हैं। एंगल्स मानते हैं कि, “जब तक स्त्रियों को सामाजिक उत्पादन के काम से अलग और केवल घर के कामों तक ही, जो निजी काम होते हैं, सीमित रखा जाएगा तब तक स्त्रियों का स्वतंत्रता प्राप्त करना और पुरुषों के साथ बराबरी का हक़ पाना असंभव है और असंभव ही बना रहेगा।”[11] परंतु एंगल्स के तर्कों की भी स्त्रीवादी विद्वानों द्वारा आलोचना की गई। लर्नर ने यह स्पष्ट किया कि ऐसा नहीं है कि विश्व की हर संस्कृति में घरेलू कार्यों की जिम्मेदारी मात्र स्त्री की ही होती है। क्रिश हर्मन मानती हैं कि स्त्री के इन्हीं घरेलू कार्यों की जिम्मेदारी उठाने से ही कृषि का विकास हुआ। स्त्रीवादी विद्वानों द्वारा एंगल्स की इसलिए भी आलोचना की गई क्यों कि उन्होंने मातृसत्ता और मातृवंशीयता को एक दूसरे का पर्याय समझा। इसके अतिरिक्त एंगल्स की निजी संपत्ति के आविर्भाव से स्त्री अधीनता के पथ पर अग्रसर हुई इस तथ्य को प्रायः सभी स्त्रीवादी विद्वानों द्वारा गलत साबित किया गया जिसमें मुख्यतः संरचनावादी मानवविज्ञानी क्लाउड मेलेसा, इतिहासकार गर्डा लर्नर तथा मानव विज्ञानी पीटर आबी प्रमुख हैं। इस प्रकार “आधुनिक मानवविज्ञानियों द्वारा बखोफेन और एंगल्स की आदिम समाज में मातृसत्ता के अस्तित्व की अवधारणा को निरस्त किया गया है। आधुनिक मानवविज्ञानी ‘मातृसत्ता’ की अपेक्षा ‘मातृस्थानिकता’ तथा ‘मातृवंशीयता’ शब्द को अधिक उपयुक्त मानते हैं।”[12] गर्डा लर्नर लिखती हैं कि, “मैं मातृसत्ता को पितृसत्ता के विलोम के रूप में परिभाषित कर सकती हूँ और इस परिभाषा के अनुसार मैं निष्कर्षतः यह कह सकती हूँ कि मातृसत्तात्मक समाज कभी भी अस्तित्व में नहीं रहे हैं।”[13] लर्नर की इस पुष्टि के साथ ही यह भी तथ्यात्मक सत्य है कि भारत में केरल के नायर संप्रदाय और पूर्वोत्तर भारत के गारो, खासी और जयंतिया समुदाय में ‘मातृस्थानिकता’ और ‘मातृवंशीयता’ के साथ ही ‘मातृसत्तात्मक व्यवस्था’ का प्रभाव भी देखा जा सकता है। गर्डा लर्नर ने अपनी पुस्तक ‘क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की’ में पितृसत्ता के विविध पक्षों पर गंभीर विचार किया है। लर्नर का मानना है कि पितृसत्ता को एक घटना के रूप में नहीं वरन प्रक्रिया के रूप में देखने की आवश्यकता है। पितृसत्ता उत्पन्न नहीं हुई वरन मानव सभ्यता के विकास के पथ पर ग्रसर होने के साथ क्रमशः निर्मित होती चली आई है। इसके पीछे किसी एक कारक की भूमिका न होकर विविध कारकों का हाथ है। लर्नर यह नहीं मानती कि पितृसत्ता एक सोची समझी साजिश का परिणाम है। लर्नर कहती हैं कि स्त्री- पुरुष के बीच का श्रम विभाजन आगे के वर्षों में स्त्री को अधीनता के पथ पर अग्रसर कर देगा इसका स्त्रिओं को जरा सा भी भान नहीं था। ‘सेपियंस’ पुस्तक के लेखक युवाल नोआह हरारी मानते हैं कि स्त्री और पुरुष को दो भिन्न- भिन्न खेमों में बाँटना यह ज्यादा कुछ सांस्कृतिक और काल्पनिक सत्य पर निर्भर करता है न कि जैव वैज्ञानिक सत्य पर। स्त्रीत्व और पुरुषत्व सामाजिक भिन्नताओं के साथ बदलता रहता है। किसी जीव के सेक्स का निर्धारण जीव विज्ञान के आधार पर किया जाता है किन्तु जेंडर या लिंग का निर्धारण सांस्कृतिक आधार पर किया जाता है। हरारी मानते हैं कि मानव विकास की प्रक्रिया में लगभग सभी समाज कृषि क्रांति के बाद से पितृसत्तात्मक ही रहे हैं। अतः हरारी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि “पितृसत्तात्मक व्यवस्था जैववैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित न होकर मिथकों पर आधारित है।”[14] संरचनावादी मानवविज्ञानी क्लाउड लेवी स्त्रास संस्कृति के निर्माण के लिए स्त्री- पराधीनता की आवश्यकता पर पर एक सैद्धांतिक व्याख्या देते हैं। “स्त्रास के अनुसार आदिम और खानाबदोश जनजातियों में स्त्रियों की अदला- बदली ही स्त्री- पराधीनता का मूल है।”[15] शेरी ऑटनर ने पितृसत्तात्मक व्यवस्था की उत्पत्ति और स्त्री पराधीनता पर अपना मत प्रस्तुत करते हुए 1974 के एक निबंध में लिखा था कि “अभी तक के सभी ज्ञात आदिम समाज में स्त्रियों का संबंध संस्कृति की अपेक्षा प्रकृति से ज्यादा प्रगाढ़ रहा है। लगभग प्रत्येक समाज एवं संस्कृति में मानव द्वारा विकास पथ पर अग्रसर होने में प्रकृति की उपेक्षा की गई है। जिसका सीधा असर स्त्रियों पर भी पड़ा है।[16]

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इस प्रकार स्त्री- पराधीनता के मूल तथा पितृसत्तात्मक व्यवस्था की उत्पत्ति के संबंध में विभिन्न मत हैं। जिनका एक संक्षिप्त विवरण यहाँ प्रस्तुत किया गया है।

पितृसत्ता: व्यापकता

जब से स्त्री विमर्श के विद्वानों द्वारा स्त्री की दोयम स्थिति और उसके अधीनता के कारकों के रूप में पितृसत्ता को परिभाषित किया गया है तब से यदि देखा जाए तो पितृसत्ता की व्यापकता हमें जीवन के हर मोड़ पर दिखाई देगी। “ स्त्री का अपना होना और उस होने की प्रक्रिया की सारी अर्थवत्ता अब तक पितृसत्ता निर्धारित करती आई है। चूँकि कोई ‘दूसरा’ यानी पुरुष जाति उसका निर्धारण करती है इसलिए स्त्री की अपनी स्वायत्तता नहीं रहती। उसका वस्तुकरण हो जाता है। स्त्री के संदर्भ में यह एक ऐतिहासिक सच है।”[17] विश्व की प्रत्येक संस्कृति में इस सत्ता के पोषकों द्वारा स्त्रियों को हमेशा दब कर रहने की हिदायत दी जाती। धार्मिक रूप से भी इस सत्ता का सदैव समर्थन किया गया है। भारतीय धर्मशास्त्र की आधारशिला कही जाने वाली मनुस्मृति में पतिसेवा को ही स्त्रियों के अग्निहोत्र कर्म के तुल्य बताया गया है।[18] पति यदि सदाचारहीन, कामी या विधादि गुणों से हीन भी हो तो वह पूज्य है।[19] मुस्लिम धर्म ग्रंथ ‘सुरा बकारा’ की आयत 223 में स्त्री को उसके पति द्वारा चरने के लिए तैयार अनाज का खेत कहा गया है।[20] यह पितृसत्ता की व्यापकता ही है कि स्त्री चेतना के शुरूआती दौर में स्त्रियों को अपने मौलिक नागरिक अधिकारों के लिए भी संघर्ष करना पड़ा। चाहे वह वोट देने का अधिकार हो, चाहे वह संपत्ति में हिस्से का अधिकार हो या फिर तलाक लेने का अधिकार हो। 1929 में अपनी पुस्तक ‘ए रूम ऑफ वंस ओन’ में वर्जीनिया वूल्फ इस दोयम स्थिति के संदर्भ में एक प्रश्न पूछती हैं कि यदि शेक्सपियर की कोई बहन होती तो क्या उसे भी अपने कौशल को विकसित करने के वही समान अवसर मिलते जो शेक्सपियर को मिले थे?[21] स्त्री शिक्षा के सीमित अवसरों और संसाधनों की ओर इंगित करते हुए वर्जीनिया लिखती हैं कि, “आप (पितृसत्तात्मक समाज) चाहें तो अपने पुस्तकालयों पर ताला लगा सकते हैं। पर कोई दरवाजा, कोई ताला ऐसा नहीं है जिससे आप मेरी मानसिक स्वतंत्रता को अवरुद्ध कर सकें।”[22] वर्जीनिया वुल्फ के प्रश्न और कथन तब और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं जब स्वयं वर्जीनिया और उनकी बहन की शिक्षा- दीक्षा घर में ही संपन्न हुई जबकि उनके भाइयों को प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ने का अवसर मिला। सीमंतनी उपदेश की अज्ञात लेखिका 1882 में स्त्री- पुरुष की तुलना करते हुए महिलाओं पर थोपे गए धार्मिक पाखंडो, रीति- रिवाजों पर प्रश्न उठाती हैं।[23] बीसवीं सदी के शुरूआती दौर में महादेवी वर्मा अपने निबंधों के संग्रह ‘शृंखला की कड़ियाँ’ में स्त्रियों के मूल नागरिक अधिकारों की मांग करते हुए लिखती हैं कि “हमें न किसी पर जय चाहिए, न किसी से पराजय, न किसी पर प्रभुता चाहिए, न किसी का प्रभुत्व। केवल अपना वह स्थान, वे स्वत्व चाहिए जिनका पुरुषों के निकट कोई उपयोग नहीं है, परंतु जिनके बिना हम समाज का उपयोगी अंग बन नहीं सकेंगी। हमारी जागृत और साधन संपन्न बहनें इस दिशा में विशेष महत्वपूर्ण कार्य कर सकेंगी इसमें संदेह नहीं।”[24] स्त्री चेतना के फलस्वरूप स्त्री की सामाजिक दोयम स्थिति के विरोध में विभिन्न प्रयास किए जा रहे हैं। लिंग समानता के पुरजोर प्रयास किए जा रहे हैं परंतु इन लक्ष्यों में सबसे बड़ी बाधा पितृसत्तात्मक व्यवस्था की व्यापकता ही है। आज स्त्रियों के विरुद्ध होने वाले अधिकांश अपराधों के मूल में पितृसत्तात्मक व्यवस्था की वह मानसिकता ही है जो विभिन्न अपराधों द्वारा पुरुषों की स्त्रियों पर श्रेष्ठता साबित करना चाहती है।

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निष्कर्ष:

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि पितृसत्ता पर हुए गहन अध्ययन के उपरान्त इसे सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक कहना उचित नहीं है और न ही इसे मानव सभ्यता के विकास का स्वाभाविक अंग समझना चाहिए। स्त्रीवादी विद्वानों ने मातृसत्ता के अस्तित्व को नकारने के साथ ही स्त्रियों के सदैव पराधीन रहने के तथ्य को भी नकारा है। स्त्रीवादी दृष्टिकोण से पितृसत्तात्मक व्यवस्था की जांच- पड़ताल का मुख्य उद्देश्य लिंग- समानता की स्थापना तथा किसी भी लिंग विशेष के आधिपत्य से मुक्ति है। इस दिशा में यदि सकारात्मक प्रयास किए जाएँ तो निश्चित रूप से एक ऐसी व्यवस्था उभर कर आएगी जो मातृसत्तात्मक अथवा पितृसत्तात्मक होने की अपेक्षा मानव संभावनाओं के सभी द्वारों को सभी के लिए समान रूप से खुला रखेगी।

*शोधार्थी

प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी, कोलकाता

9674380830

pooja.shukla2607@gmail.com

  1. फरहत खान एवं डॉ. अरुणा सेठी द्वारा लिखित आलेख, भारत में लिंग असमानता, Indian Streams Research Journal
  2. विजय झा द्वारा लिखित आलेख, पितृसत्ता: विमर्श के भीतर, कथादेश, मार्च 2019, पृ. सं.- 64
  3. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, भूमिका
  4. सैली स्लोकम का आलेख, आहार संग्रहकर्ता की भूमिका में स्त्री: मानवशास्त्र की पुरुषवादी दृष्टि, अनुवाद- रंजना श्रीवास्तव, कथादेश, मार्च 2019, पृ. सं.- 13
  5. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 22
  6. विजय झा द्वारा लिखित आलेख, पितृसत्ता: विमर्श के भीतर, कथादेश, मार्च 2019, पृ. सं.- 66
  7. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 19
  8. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, भूमिका
  9. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 26
  10. एंगल्स फ्रेडरिक, परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति, प्रगति प्रकाशन, मास्को, पृ. सं.- 73
  11. एंगल्स फ्रेडरिक, परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति, प्रगति प्रकाशन, मास्को, पृ. सं.- 208
  12. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 29
  13. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 31
  14. युवाल नोआह हरारी, सेपियंस, विंटेज प्रकाशन, लंदन, पृ. सं.- 178
  15. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 24
  16. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 26
  17. पितृसत्ता के नए रूप, संपादक: राजेंद्र यादव, प्रभा खेतान, अभय कुमार दूबे, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. सं.- 16
  18. मनुस्मृति, संपादक- पंडित हरिशंकर शास्त्री, साक्षी प्रकाशन, दिल्ली, पृ. सं.- 38
  19. मनुस्मृति, संपादक- पंडित हरिशंकर शास्त्री, साक्षी प्रकाशन, दिल्ली, पृ. सं.- 16
  20. अग्रवाल रोहिणी, साहित्य का स्त्री स्वर, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, पृ. सं.- 08
  21. वुल्फ वर्जीनिया , ए रूम ऑफ वंस ओन’, फिंगर प्रिंट क्लासिक, (प्रकाश बुक्स इंडिया)
  22. वुल्फ वर्जीनिया , ए रूम ऑफ वंस ओन’, फिंगर प्रिंट क्लासिक, (प्रकाश बुक्स इंडिया), पृ. सं.- 81
  23. सीमंतनी उपदेश, संपादक: डॉ. धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
  24. वर्मा महादेवी, शृंखला की कड़ियाँ, लोकभारती पेपरबैक्स, इलाहबाद, पृ. सं.- 23-24
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