दलित विमर्श और हिन्दी की दलित आत्मकथाएँ: एक समीक्षा

भारती*

“चूल्हा मिट्टी का

मिट्टी तालाब की

तालाब ठाकुर का ………..”1

(ओमप्रकाश वाल्मीकि)

दलित शब्द का अर्थ किसी भी समाज में दमित, कुचलित और पिछड़े से लगाया जाता है। दलित साहित्य की एक निश्चित विचारधारा है, जो समता, स्वतंत्रता और बंधुता को स्थापित करती है। दलित साहित्य अम्बेडकरवादी और फूले (ज्योतिबा फूले) की विचारधारा पर आधारित है। अक्सर यह सवाल उठाया जाता है कि दलित संवेदन क्या है? क्या जो गैर-दलित लेखक है उनमें दलित संवेदना है? इसको लेकर आलोचकों में काफी विवाद है। दलित आलोचकों का मानना है कि जो गैर-दलित लेखक है, उनका साहित्य मात्र एक सहानुभूति का साहित्य है। इस प्रकार सहानुभूति और स्वानुभूति का सवाल उठाया जाता है। श्यौराज सिंह बेचैन के अनुसार-

‘‘दलित वह है जिसे भारतीय संविधान में अनुसूचित

जति का दर्जा दिया गया है।“ 2

दलित चेतना क्या है? दलित आलोचकों का मानना है कि दलित चेतना उन साहित्यकारों में है जो अम्बेडकरवादी और फूले की विचारधारा पर अपने साहित्य को लिखते है। अक्सर सवाल उठाया जाता है कि क्या प्रेमचंद के साहित्य में दलित चेतना है? यदि हाँ तो दलित आलोचक उन्हे गैर-दलित चेतना का साहित्यकार क्यों मानते है?

हिन्दी आलोचकों का मानना है कि दलित साहित्य अस्मितावादी साहित्य है। डा० मैनेजर पाण्डेय के अनुसार – दलित साहित्य हिन्दी साहित्य का लोकतंत्रीकरण कर रहा है। लेकिन दलित आलोचकों का मानना है कि यह अस्मितावादी साहित्य न होकर समाज में समता, स्वतंत्रता तथा बंधुता को स्थापित करने वाला साहित्य है। ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते है –

‘‘दलित चेतना का सीधा सरोकार मैं कौन हूँ?

से है जो दलितों की सामाजिक, सांस्कृतिक

तथा ऐतिहासिक भूमिका की छवि तिलिस्म

को तोड़ती है। वही दलित चेतना है।‘‘3

‘दलित साहित्य’ के अंतर्गत क्या आना चाहिए और क्या नहीं इस विषय में विद्वानों में मतभेद है। प्रेम कुमार मणि के अनुसार –

‘‘दलितों के लिए दलितों के द्वारा लिखा जा

रहा साहित्य दलित साहित्य है।‘‘4

गैर दलित साहित्य की तुलना दलित साहित्य से करते हुए कंवल भारती इस बात को ठीक ही रेखांकित करते हैं कि उसमें व्यक्ति की अपेक्षा समुदाय केन्द्र में है।

हिन्दी क्षेत्र में काफी समय से ही इस विषय पर बहस चल रही है कि दलित साहित्य किसे माना जाए, परंतु लंबी बहसों के बाद अब यह माना जाने लगा है कि दलित ही दलित की पीड़ा को अपने भोगे हुए आयतित की अनुभूति द्वारा साहित्य में बदल सकता है। इसको परिभाषित करते हुए कई विद्वानों ने मत प्रकट किए है। डॉ.शरण कुमार लिम्बाले के अनुसार –

‘‘दलित केवल हरिजन और नव बौद्ध नहीं। गाँव की सीमा के बाहर रहने वाली सभी अछूत जातियाँ, आदिवासी, भूमिहीन खेत मज़दूर, श्रमिक कष्टकारी जनता और यायावर जातियाँ सभी की सभी ‘दलित’ शब्द से व्याख्याथित होती है।“5

समाज में व्याप्त संकीर्णता और विसंगतियों से मानव को मुक्त करना एवं पीड़ित मानवता को सम्मानीय जीवन प्रदान करना ही दलित साहित्य का एकमात्र उद्देश्य है-

‘”यह साहित्य दुखों, वेदनाओं और संघर्षों तक ही सीमित नहीं है। उसमें परिवर्तन की अटूट आस्था है और जीवन के उदात्त भावों जैसे प्रेम, भाईचारा आदि का भी संदेश है, जो समस्त मानव जाति को एक माला में पिरोकर रखना चाहता है।“6

नवें दशक में दलित साहित्य की अनेक विधाएँ सामने आई। इन विधाओं में दलित आत्मकथाओं नें दलित साहित्य को एक पहचान दी। आत्मकथा विधा के कारण ही दलितों का यथार्थ वास्तविक रूप में अंकित हुआ। दलित आत्मकथाओं में लेखको ने अपने समाज की यातनाओं, पीड़ाओं व शोषण की विभीषिका का तीखा और यथार्थ चित्रण किया है। डॉ. विमल घारोत ने लिखा है –

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‘‘दलित आत्मकथाएं आज दलित समुदाय के विभिन्न आयामों को अपने अंदर समेट कर शोषण के उस हर एक पहलू की, एक समाज शास्त्रीय चिकित्सक की दृष्टि से चीरफाड़ करके सामाजिक व्यवस्था और अन्तर्सम्बन्धों की पड़ताल करता हुआ दिखाई पड़ता है।‘‘7

दलित आत्मकथाकारों नें अपनी आत्मकथाओं के माध्यम से दलित समुदाय की गरीबी, गुलामी और यातना की दिल दहलाने वाली जो तस्वीरें प्रस्तुत की है, वें वास्तव में सराहनीय है। दलित आत्मकथाकारों में ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहन दास नेमिशराय, कौशल्या बैसंत्री, सूरजपाल – चैहान – अनिता भारती, तुलसीराम, जय प्रकाश कर्दम, श्यौराज सिंह बेचैन आदि का नाम प्रसिद्ध है।

दलित साहित्य में स्त्री शोषण की या कहें कि उसके तिहरे शोषण की समस्या को भी उठाया गया है। महिला दलित साहित्यकारों में कौशल्या बैसन्त्री नें अपनी आत्मकथा ‘दोहारा अभिशाप‘ में अपने जीवन के यथार्थ को, शिक्षकों के क्रूर व्यवहार को और सामाजिक जातिय अत्याचारों को उजागर करते हुए लिखा है-

‘‘जब मैने कन्या पाठशाला में पाँचवी कक्षा में प्रवेश लिया तब स्कूल की फीस ज्यादा थी, एक रूपये बारह आने। बच्चों की फीस देना माँ – बाप के सामथ्र्य के बाहर था। बाबा ने हैडमिस्ट्रेस से बड़ी विनती की कि वे फीस नहीं दे सकते। बहुत मुश्किल से वह मान गई और कहा पढ़ाई अच्छी न करने पर निकाल देगी। बाबा ने हैडमिस्टेªस के चरणों के पास अपना सिर झुकाया दूर से क्योंकि वे अछूत थे स्पर्श नहीं कर सकते थे।‘‘8

ब्राहमणवादी मानसिकता, शिक्षकों के मन में इस प्रकार से रच बस गई कि जिस प्रकार सवर्णों के मन में दलितों के प्रति जो घृणापूर्ण धारणाएँ व व्यवहार है ठीक यही स्थिति शिक्षकों की है वहीं शिक्षक होते हुए भी दलितों के साथ घृणित व्यवहार करते थे।

‘अक्करमाशी” में शरण कुमार लिम्बाले ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है –

‘‘हम महार जाति के थे, इसलिए प्रति शनिवार पूरे स्कूल की जमीन को गोबर से लीपने का कार्य हमें दिया जाता था। गोबर इकट्ठा करके पूरा स्कूल लीपने के बाद शिक्षक मेरी सराहना करते। घर पर मैं किसी प्रकार का काम नहीं करता था पर स्कूल का यह काम मुझे चुपचाप करना पड़ता था।‘‘9

इस प्रकार शिक्षक का यह व्यवहार शिक्षक पद की गरिमा के एकदम विपरीत है।

सूरजपाल चैहान ने अपनी आत्मकथा ‘तिरस्कृत‘ में संस्कृत के अध्यापक वेदपाल शर्मा के विषय में लिखा है कि वह शिक्षक होते हुए भी जाति का ओछापन किस तरह याद दिलाते रहते थे। एक दिन उन्होंने सूरजपाल की ओर संकेत करते हुए कहा था –

‘‘यदि देश के सारे चूडहे चमार पढ़ लिख गए तो गली-मौहल्लों की सफाई और जूते बनाने का कार्य कौन करेगा। ‘’10

इस कथन से स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षक चाहे, शहर का हो या गाँव का लेकिन उसकी सोच विकृत सवर्णवादी मानसिकता से पूरी तरह से ग्रस्त है। बस अंतर इतना है कि एक ओर शहर का शिक्षक दलितों को गली मौहल्लों की सफाई और जूते बनाने के लिए अनपढ़ रखना चाहता हैं वहीं दूसरी ओर गाँव का शिक्षक गाँव से जुड़े कार्यों को करने के लिए।

डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन ने अपनी आत्मकथा ‘चमार‘ में दलितों के साथ सवर्णों का जो व्यवहार रहा है उसके विषय में लिखा हैं –

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‘‘धन्य है मेरा देश भारत। किस वर्ग से बढ़कर है यह देश जहाँ मेरी माँ – बहनों की तुलना पशुओं से की जाती है और उनसे पशु जैसा आचरण किया जाता है स्वीकार हो हुज़ूर। दलित लौटाना चाहता है आपको आपकी भाषा, आपका व्यवहार।‘‘11

इससे स्पष्ट होता है कि लेखक के मन में व्यवस्था के प्रति आक्रोश है।

वही दूसरी ओर नैमिशराय जी ने अपनी आत्मकथा ‘अपने-अपने पिंजरे‘ में लिखा है कि उन्हें इस बात पर गर्व है कि वे ऐसे समुदाय से ताल्लुक नहीं रखतें जिसने शोषण किया, निर्दोषों को सताया और धर्म के नाम पर अमानवीय परंपराओं को वैधता प्रदान की। वे लिखते है –

‘‘हम गरीब जरूर थे पर हमने न देश बेचा था न अपना ज़मीर। न हम डंडीमार थे और न ही सूदखोर। चोर लुटेरों की श्रेणी में हम नहीं आते थे। ……….. सवर्णों की तरह हमने न मुगलों से समझौता किया न ही अंगे्रजों से सौदेबाज़ी की।“12

गरीबी, बेरोज़गारी और अर्थाभाव की अर्थी पर फेंके जाने वाले पैसों को इकट्ठा करने में हम दलितों को कोई हिचकिचाहट नहीं होती थी मोहनदास नैमिशराय ने यह सब दरिद्रता के कारण किया –

‘‘अर्थी के ऊपर फेंके गये पैसे उठाने के लिए बा और ताई ने कभी मना नहीं किया था।‘‘13

अपनी आत्मकथा की भूमिका में वे लिखते हैं –

‘‘व्यक्ति हो या समाज उसे अपने अधिकार स्वयं ही लेने होते हैं। बैसाखियों पर जीवन नहीं चलता। चलेगा भी कितने दिन।“14

समाज में व्यक्ति की हैसियत व दर्जा जाति के आधार पर तय किया जाता है जातिवादी समाज में सर्वप्रथम व्यक्ति की जाति के बारे में जानने की जिज्ञासा रहती है और जाति के आधार पर ही संवाद की स्थिति तय की जाती है।

दलित लेखकों नें संपूर्ण व्यवस्था के प्रति अपना आक्रोश प्रकट किया है। इस आक्रोश का कारण समाज में व्यवस्थित व्यवस्था है, जन्म से पहले ही जिस समाज में जाति निर्धारित कर दी जाती है। व अछूत का लेबल माथे पर चिपका दिया जाता है ऐसे कुंठित समाज में किसी भी मनुष्य का छटपटाना सामान्य है। जाति व अस्पृश्यता का सहारा लेकर सवर्णों द्वारा दलित समाज को नियंत्रित किया जाता है जो दर्जा समाज में दलितों के लिए निर्धारित था, वहीं दर्जा स्कूल में भी लागू होता है। विडंबनापूर्ण स्थिति तब होती है जब ‘अक्करमाशी‘ में लिम्बाले ने दिखाया है –

‘‘बनियों और ब्राहमणों के लड़के कबड्डी खेल रहे थे। हम अछूत बच्चे उनसे अलग थलग ही बैठे थे………… दलितों का खेल अलग। दो-दो खेल दो-दो आँधियों की तरह।‘‘15

इस प्रकार कहा जा सकता है कि जिन शिक्षण संस्थाओं का कार्य विषमता को समाप्त तथा बराबरी का अहसास पैदा करना है लेकिन वहीं गैर बराबरी और विषमता की भावना को बढ़ावा दे रहें है तो इससे बड़ी समाज की विडंबनापूर्ण स्थिति क्या होगी ?

‘जूठन‘ की भूमिका में ओमप्रकाश वाल्मीकि ने लिखा है –

‘‘दलित जीवन की पीड़ाएँ असहनीय और अनुभव दग्ध है। ऐसे अनुभव जो साहित्यिक अभिव्यक्तियों में स्थान नहीं पा सके। एक ऐसी ही समाज व्यवस्था में हमने सांसे ली है, जो बेहद क्रूर और अमानवीय है।“16

‘जूठन’ मे वाल्मीकि जी ने हिन्दू समाज की विकृतियों का पर्दाफाश किया है। वर्ण व्यवस्था नें दलितों को ऐसे घाव दिए हैं जो असहनीय है। ‘जूठन‘ में गाँव के भीतर जीवन की तस्वीर दिखाते हुए वाल्मीकि जी लिखतें है –

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‘‘अस्पृश्यता का ऐसा माहौल कि कुत्ते-बिल्ली, गाय भैंस को छूना बुरा नहीं था, लेकिन यदि चूहडे का स्पर्श हो जाए तो पाप लग जाता था। सामाजिक स्तर पर इंसानी दर्जा नहीं था। वे सिर्फ ज़रूरत की वस्तु थे काम पूरा होते ही उपयोग खत्म, इस्तेमाल करो, दूर फेंकों।“17

दलित आत्मकथा दलित के जीवन का अतीत और वर्तमान के संदर्भ में एक ऐसा प्रयास है जिसमें लेखक अपने जीवन को नहीं, अपने चारों तरफ फैले समाज को भी समझता है। वस्तुतः दलित आत्मकथा आत्मपहचान का संघर्ष है जिसके साथ एक दमनात्मक समाज भी उद्घाटित होता है।

दलित साहित्य के सौंदर्य शास्त्र पर भी काफी सवाल उठाए गए है। कुछ आलोचकांे का मानना है कि दलित साहित्य की भाषा बहुत खराब है, लेकिन दलित आलोचकों का मानना है कि साहित्य की भाषा समाज से निर्मित होती है, उन्हें जिस तरह का समाज मिला है उसका चित्रण ऐसी ही भाषा में हो सकता है। दलित साहित्य का सबसे अधिक विरोध छायावाद से है। दुर्भाग्य की बात है कि विकसित होते हुए दलित साहित्य में भी अंतर्विरोध की नींव पड़ चुकी है, जो साहित्य के विकास के दृष्टिकोण से उचित नहीं जान पड़ती है या यों कहें कि यह रचनाकारों को एक सीमा में बांधती है। यह कहना गलत न होगा की दलित विमर्श, स्त्री विमर्श तथा आदिवासी विमर्श द्वारा साहित्य के विभिन्न गंभीर मुद्दों पर विचार किया जा रहा है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भारतीय वर्ण व्यवस्था नें दलित समाज को समस्त अधिकारों से हज़ारों वर्षों तक वंचित रखा। आत्मकथाओं में लेखक समूची व्यवस्था के प्रति दलित समाज को दुरूस्त करने का कार्य कर रहे है। अर्थात् दलितों को सचेत करते हुए संघर्षरत होने का आह्वाहन भी दलित लेखकों ने किया है दलित आत्मकथाकारों ने अपनी आत्मकथाओं के माध्यम से जहाँ दलितों की सभी समस्याओं को समस्त समाज से परिचित कराया है,वहीं साथ ही व्यवस्था के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए दलितों के विकास के लिए मार्गा भी प्रशस्त किया है।

संदर्भ – ग्रंथ

  1. ओमप्रकाश वाल्मीकि – (ठाकुर का कुआँ)

  2. हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, प्रकाशन – (राधाकृष्ण प्रकाशन) पृष्ठ संख्या – 18

  3. ओमप्रकाश वाल्मीकि, जूठन, प्रकाशन – (राजकमल प्रकाशन)

  4. प्रेम कुमार मणि: दलित साहित्य: एक परिचय (लेख) दलित साहित्य चिन्तन विविध आयाम, सं डा० एन० सिंह पृष्ठ संख्या – 57

  5. डॉ. शरण कुमार लिम्बाले, दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र पृष्ठ संख्या – 38

  6. दलित चिन्तन, 2011, डॉ० प्रकाश कुमार, पृष्ठ संख्या – 41

  7. दलित साहित्य में विविध विधाएँ, माता प्रसाद, डाॅ० विमल थारोत, पृष्ठ संख्या – 56

  8. दोहरा अभिशाप, कौशल्या बैसंत्री, पृष्ठ संख्या – 21

  9. अक्करमाशी, शरण कुमार लिम्बाले, पृष्ठ संख्या – 61

  10. तिरस्कृत, सूरजपाल चैहान, पृष्ठ संख्या – 58

  11. चमार, श्यौराज सिंह बैचेन, पृष्ठ संख्या – 44

  12. अपने – अपने पिंजरे, मोहानदास नैमिशराय, पृष्ठ संख्या – 12

  13. वही पृष्ठ संख्या – 12-13

  14. वही पृष्ठ संख्या – 13

  15. अक्करमाशी, शरण कुमार लिम्बाहे, पृष्ठ संख्या – 48

  16. जूठन, ओमप्रकाश वाल्मीकि, पृष्ठ संख्या – 32

  17. वही पृष्ठ संख्या – 32

(सहायक ग्रंथ)

  1. दलित साहित्य की अवधारणा – कंवल भारती
  2. दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र (लेख) – निरंजन कुमार

*शोधार्थी, एम.फिल. हिंदी

दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

ईमेल: mebharti19bharti@gmail.com

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