आधुनिक महिला उपन्यासों में नारी चेतना के विविध आयाम

उर्मिला कुमारी, सहायक प्राध्यापक
अन्नदा कॉलेज, हजारीबाग – झारखंड
पिन – ८२५३०१
मोबाइल -८०९२४६९०३३.

 

स्वतंत्रता पूर्व महिलाओं की स्थिति शिक्षा के अभाव में चिंतनीय थी। आर्थिक रूप से परतंत्र वे घर, परिवार और समाज में उपेक्षित और प्रताड़ित थीं। स्त्री केवल उपभोग की वस्तु समझी जाती थी। यही वह धरती थी जहां दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती जैसी देवियां, गार्गी, मैत्रेयी, अपाला, लोपामुद्रा जैसी विदुषी नारियां जन्मी थीं। ” यत्र नार्यस्ते पूज्यंते रमंते तत्र देवता” का उदघोष कहीं गुम हो चुका था। इस संबंध में अरविंद जैन का कहना है –“सामंती व्यवस्था में नारी एक वस्तु है, संपत्ति है, संभोग और संतान की इच्छा पूरी करने वाली मादा है।” –१ अरविंद जैन, औरत होने की सजा, पृष्ठ – २०.

किन्तु स्वतंत्रता पश्चात स्त्री की स्थिति में परिवर्तन दिखने लगा। समाज में यह परिवर्तन लगातार हो ही रहा है। भले ही यह न्यून और धीमी है, किन्तु दिखाई पड़ तो रहा है। आज स्त्री प्रत्येक क्षेत्र में अपनी पहचान बना चुकी है। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक या ज्ञान – विज्ञान हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज़ का चुकी है। शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता ने नारी का दृष्टिकोण बदलकर उसके भीतर अस्तित्व चेतना को जन्म दिया है।

इस चेतना को विकसित करने में अपनी सजग भागीदारी आधुनिक महिला उपन्यासकारों ने भी निभाई। हमारी सामाजिक संरचना में महिलाओं को अपनी पहचान बनाने में एक तरफ तो पित्रृसत्ता से संघर्ष करना पड़ता है तो दुसरी ओर परंपरा वादी स्त्रियों से भी। कुछ सामाजिक परंपराएं स्त्रियों के सामूहिक अवचेतन में इस कदर जड़ जमा चुकीं हैं कि उनसे बाहर निकलना उनके लिए दुष्कर होता है। तभी तो सिमोन द बूवा ने कहा था- “स्त्री पैदा नहीं होती, बना दी जाती है।”

स्त्री चेतना के विविध रूप हैं। इतिहास साक्षी है कि नारी देश, समाज, जाति, परिवार के मान सम्मान की रक्षा के लिए हर प्रकार का त्याग करती है। स्त्री का यह रूप बड़ा ही भव्य और सम्मोहक दिखता है। किन्तु इस सबके बीच स्वयं स्त्री कहां है। सामाजिक परम्पराओं और रूढ़ियों के आगे स्त्री आकांक्षा घुटकर दम तोड़ देती है। अर्धांगिनी होकर भी समता और समानता से दूर रख उन्हें पितृसत्तात्मक के अधीन रहना पड़ता है। “स्त्री का दुर्भाग्य है कि औरत अपनी भूमिका स्वयं नहीं कर पाती। चूंकि सामाजिक संहिता का निर्माता पुरुष है, अतः विज्ञप्ति की स्त्री पुरुष से हीन है, अब तक संस्कारों से पुष्ट होती रही है।”- २ स्त्री उपेक्षित, प्रभा खेतान,पृष्ठ – १२१, नवीन संस्करण दूसरा रीप्रिंट २००८.

प्रमुख महिला उपन्यासकार मन्नू भंडारी, उषा प्रियंबदा, मैत्रेई पुष्पा, मंजुल भगत, कृष्णा सोबती, प्रभा खेतान आदि के स्त्री पात्र कहीं परंपरावादी दिखाई पड़ती हैं तो कहीं ये परम्परा का विरोध करते हुए पुरुष द्रोह पर उतर आती दिखाई पड़ती हैं। मंजुल भगत की ‘अनारो ‘ की नायिका अनारो, ‘ इदन्नमम ‘ की बऊ, पचपन खंभे लाल दीवारें की ‘सुषमा ‘ आदि सभी पात्र परंपरावादी हैं। परिवार के लिए अपनी इच्छा का दमन सुषमा करती है। कहीं सामाजिक धार्मिक रूढ़ियों में जकड़ी नारियां सहज ही सामाजिक बंधनों को स्वीकार करती हैं। मित्रो मरजानी की धनवंती के शब्दों में-” सुमित्रावती इस जिद चढ़ी है, तो तू ही आंखें नीची कर ले। बेटी मर्द मालिक का समाना हम बेचारियों को क्या सोहे।”- ३ मित्रो मरजानी, कृष्णा सोबती, पृष्ठ-१२ राजकमल प्रकाशन, १९८४. छिन्नमस्ता की प्रिया की मां परंपरावादी नारी है जो सामाजिक धार्मिक रूढ़ियों में जकड़ी अपने कमाऊ बेटे की हर गलती नजरअंदाज करती है। कृष्णा सोबती के ‘डार से बिछुड़ी ‘ की नानी और मामियां परंपरावादी स्वरूप में ही सामने आती हैं।

दिलो दानिश की कुटुंब प्यारी भी ऐसी स्त्री है जो अपने पति के विवाहेत्तर संबंध को जानने के बाद भी पारिवारिक मर्यादा के बंधन में बंधी रहती है। मंजुल भगत की अनारो भी ऐसी परंपरावादी नारी है जो पति के अत्याचारों को सहती हुई उसकी पत्नी कहलाने से ही गर्वित है। मैत्रेई पुष्पा की ‘अल्मा कबूतरी ‘ की आनंदी की भूमिका भी एक परंपरावादी नारी की है जो पति और परिवार के प्रति समर्पित है। लेकिन बदलते समय के साथ स्त्री अपनी अस्मिता के प्रति सजग होती दिख रही है।

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स्त्री चेतना के विविध आयाम हैं जिन्हें हम निम्न प्रकार से विश्लेषित कर सकते हैं:

१. मातृत्व के प्रति नवीन दृष्टिकोण:- समाज में ऐसी धारणा है कि मातृत्व ही स्त्री को पूर्ण बनाता है। किन्तु यह दृष्टिकोण अब बदल रहा है। अब नारी बंद आंखों के बजाय खुली आंखों से अपने लिए मार्ग तलाश पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है।

‘ छिन्नमस्ता ‘ की नायिका प्रिया मातृत्व ही उपेक्षा कर अपने अस्तित्व की रक्षा करती है। वह साफ तौर पर कहती है -” हो सकता है कि संजू के मन में तल्खी हो कि मै एक अच्छी मां नहीं बन सकी। नहीं बन सकी तो क्या करूं। क्या मां मुझे जन्म देकर अपने मातृत्व की भूमिका ठीक से निभाई थी? उनमें तो मैंने कभी कचोट नहीं देखी।”-४ छिन्नमस्ता, प्रभा खेतान, पृष्ठ-९१, राज प्रकाशन, चौथी आवृत्ति २००४. मन्नू भंडारी के ‘ आपका बंटी ‘ में भी एक मां का मातृत्व और स्त्रीत्व के बीच दोहरा संघर्ष दिखाया गया है।

२. विवाह संस्था और पुरुष के प्रति पारंपरिक दृष्टिकोण का विरोध :- स्त्री मुक्ति का आंदोलन स्त्री को मानवीय रूप में स्थापित करने और करवाने का आंदोलन है। महिला लेखिकाओं ने अपने उपन्यासों में पुरुष की प्रभुता को चुनौती दी है। वैवाहिक संबंधों में भी पुरूषों की भूमिका अहंवादी होने की वजह से विवाह संस्था का पारंपरिक स्वरूप बिखर रहा है। इस संबध में आधुनिक लेखिकाओं

की रचना में अभिव्यक्ति की तिक्तता कहीं ज्यादा कहीं कम है। कृष्णा सोबती के ‘दिलो दानिश’ में दोनों स्त्री पात्रों में वकील साहब के प्रति तीव्र आक्रोश दिखाई पड़ता है। ‘ दिलो दानिश ‘ में पति से प्रतिशोध के रूप में एक बाबा से शारीरिक संबंध बनाती है। दूसरी तरफ महक बानो भी वकील साहब से विद्रोह के नाम पर परपुरुष से संबंध रखती है। इसी प्रकार ‘ मित्रो मरजानी ‘ की मित्रो परंपरावादी स्वरूप को नकारते हुए पितृ सत्ता का नकार करते हुए कहती है -” अम्मा तुम्हारे इस बेटे के यहां कुछ होगा तो मित्रो चूड़ी के पैरों का धोवन पी अपना जन्म सुफल कर लेगी।”-५ मित्रो मरजानी, कृष्णा सोबती, पृष्ठ- ६४, राज कमल प्रकाशन १९८४. अब नारियां पुरुष को अपना भाग्य विधाता और स्वामी नहीं मानती। छिन्नमस्ता की नायिका कहती है- ” सच कहूं तो पुरुष की कोई भूमिका मुझे जीवन में नहीं लगती। नहीं वह क्या दे देगा… आज मै चाहे जो खर्च करूं मुझे उसका हिसाब नहीं देना पड़ता… पेट में दो फुल्के ही समाएंगे, फिर खाने के लिए इतना तामझाम क्यों?”- ६ छिन्नमस्ता, प्रभा खेतान, पृष्ठ- २२२, राज कमल पेपरबैक २००६.

बचपन से ही परिवार में लड़के -लड़की के बीच भेदभाव नारी के जीवन में कुंठा और असुरक्षा की भावना को जन्म देता है। छिन्नमस्ता की प्रिया परिवार एवं समाज में कदम- कदम पर शोषित होती है। उसका यह आक्रोश उचित दिखता है-” क्या समाज स्त्री की रक्षा करता है? क्या पुरुष की कामुक हवस का शिकार होने से मासूम लड़कियां बच पाती हैं? कब और कहां नहीं मुझपर आक्रमण हुआ? वह कैसा बचपन था? न केवल भाई ने बल्कि एक दिन नौकर ने भी गोद में बिठाया था।”-७ छिन्नमस्ता, प्रभा खेतान, राजकमल प्रकाशन , २००६. आज की नारी पुरुष की क्षुद्र मानसिकता को सहन करने को तैयार नहीं है। अब स्त्रियां विवाह और पति को ही अपने जीवन का केंद्रबिंदु और अंतिम लक्ष्य नहीं मानती। विवाह एक ऐसी संस्था के रूप में साबित हो रही है जो व्यक्ति की स्वाधीनता को बाधित करती है। ममता कालिया के ‘नरक दर नरक ‘ की नायिका की ज़िंदगी नरक सदृश हो जाती है क्योंकि उसका पति उसे अपनी एक जरूरत कि वस्तु के रूप में देखता है। ठीक यही स्थिति ‘ छिन्नमस्ता ‘ की प्रिया की भी है।

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३:- पारिवारिक संरचना और आधुनिक दृष्टिकोण के प्रति- समाज में हमेशा से नारी के प्रति रूढ़िवादी नज़रिया ही उसके शोषण का कारण रहा है और इसका पोषण परिवार नामक संस्था के द्वारा होता है। अतः लेखिकाओं ने परिवार के भीतर चल रहे नारी के संघर्ष को अपने उपन्यासों में प्रकट किया है। मैत्रेई पुष्पा ने ‘ इदन्नमम्’ में मंदाकिनी का परम्परा के प्रति घोर विद्रोह दिखाई पड़ता है। उपन्यास में मंदाकिनी की अम्मा पति की मृत्यु पश्चात परिवार और बेटी को छोड़ परम्परा और मर्यादा को मुंह चिढ़ाती हुई अपने लिए नया जीवन साथी की तलाश करती है।

कृष्णा सोबती का ‘ डार से बिछुड़ी ‘, ‘ दिलो दानिश ‘ और ‘ मित्रो मरजानी ‘ आदि में पारंपरिक रूढ़ियों तथा बंधनों के प्रति विद्रोह का भाव स्पष्ट दिखता है। मित्रो उस पारंपरिक दृष्टिकोण को नकारती है जहां स्त्री को अपनी कामेच्छा प्रकट करने का हक नहीं है। वह व्यक्तिवादी नहीं है। परिवार को नहीं तोड़ती बल्कि उसके भीतर ही अपनी इच्छाएं पूर्ण करना चाहती है। कृष्णा जी की रचनाओं में न केवल पुरुष बल्कि पूरी सामाजिक संरचना के प्रति विद्रोह दिखता है। ” परिवेश सघन समूचा दबाव अपने व्यक्तित्व के लिए जूझती नारी की पीड़ा उसके संकल्प उसकी इच्छाओं और समाज के प्रति पूरे संघर्ष में प्रतिबिंबित होता है।”- ८ डा. सुरेश बत्रा , नारी अस्मिता हिंदी उपन्यासों में, पृष्ठ – ५०. इसी तरह उषा प्रियवंदा के उपन्यास ‘ रुकोगी नहीं राधिका ‘ की राधिका भी पारिवारिक रूढ़ियों के प्रति अनास्था व्यक्त करते हुए गृह का त्याग करती है।

मंजुल भगत के ‘ अनारो ‘ की टीचर अनारो जो समाज और बिरादरी की रूढ़ियों के गिरप्त में है , उसे कहती है ” देखो भई मुझे ब्लड प्रेशर की बीमारी है और तुम्हारी बातें सुनकर वह हमेशा बढ़ जाती है। यह निकम्मी रूढ़ियां दीमक की तरह तुम्हारे दिमाग को चाट चुकी हैं। जर्जर खुरखुर हो गए हो पर इन कुरीतियों को नहीं छोड़ोगे।”- ९ अनारो, मंजुल भगत, राजकमल पेपर बैग्स, २००६.’ छिन्नमस्ता ‘ की प्रिया भी समस्त रूढ़ियों को नकारते हुए स्त्री के एक सजावटी वस्तु मात्र होने को नकारती हुई स्वयं को आत्मनिर्भर बनाते हुए स्वयं को अंतर राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करती है। वह अपनी अम्मा, जीजी और भाभी की तरह घुट – घुट कर जीना नहीं चाहती। इस प्रकार स्वातंत्रयोत्तर नारी परम्परा और आधुनिकता के अंधेरे- उजाले में स्वयं को तलाशती नज़र आती है। ” सामान्य नारी पति और विवाह नामक संस्थाओं के इर्द – गिर्द अपनी सारी ऊर्जा खर्च करती है, किन्तु विद्रोह की तड़प भी सबसे पहले परिवार और उसकी रूढ़ियों के प्रति उत्पन्न होती है और यह चेतना पति या पुरुष की अधिकार सत्ता के प्रति विद्रोह में बदल जाती है।”- १० डा. सुरेश बत्रा, नारी अस्मिता हिंदी उपन्यासों में, पृष्ठ -६. आधुनिक नारी धर्म, समाज व परम्परा को नकारते हुए अपने लिए भी मानवीय स्तर पर स्थापित करने के लिए संघर्षरत है।

४:- प्रणय और काम भावना के प्रति – नारी अब अस्तित्व चेतना से पूर्ण होने लगी है।वह पुरुष की अनुगामिनी बनने के बजाय सहचरी बनना पसंद करती है। अब उसे प्रेम के नाम शारीरिक व मानसिक रूप से छलना आसान नहीं। मृदुला गर्ग के उपन्यास ‘ उसके हिस्से का धूप ‘ की नायिका के जीवन में दो पुरुष आते हैं किन्तु उनमें से कोई यह नहीं समझना चाहता कि उसे क्या चाहिए। मृदुला जी प्रेम के संबंध में अलग ही नज़रिया रखती हैं- ” मुझे मेरा नाम चाहिए। उसका अस्तित्व भले कुछ ना हो, फिर भी मुझे चाहिए। समर्पण का अधिकार मुझे चाहिए।”- ११ उसके हिस्से की धूप, मृदुला गर्ग, राजकमल प्रकाशन,पहला संस्करण – २००७. मैत्रेई पुष्पा ने ‘ इदन्नमम्’ में विधवा होने के बाद जिन सांसारिक सुखों का त्याग इच्छा या अनिच्छा से करती हैं वहीं उनकी बहू अपनी आकांक्षाओं को महत्व देती है। उसी प्रकार उनके दूसरे उपन्यास ‘ अल्मा कबूतरी’ में कदम बाई भी अपने शारीरिक जरूरतों को महत्व देती है।

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प्रभा खेतान कृत ‘ पीली आंधी ‘ में परिस्थितिवश पति को छोड़ सुजीत नामक व्यक्ति से संबंध बनाती है। ” पति – पत्नी के संबंध जन्म – जन्मांतर के होते हैं, लेकिन सुजीत परंपरा भी तो वहीं ज्यादा गूंजी है जहां ज़िंदगी खंडहर होती है परम्परा पर बहस तो बस सोच हैं एक स्टेट ऑफ माइंड। प्यार इससे ज्यादा गहरा है। मन पर वश नहीं रहता, लेकिन शरीर? शरीर बहुत कुछ ऐसा चाहता है।” – १२ पीली आंधी, प्रभा खेतान, पृष्ठ- २४१, राजकमल पेपर बैग्स, २००४. कृष्णा सोबती के ‘ सूरजमुखी अंधेरे के ‘ में रत्ती अपने जीवन में उन सभी पुरूषों को त्याग देती है जो उसे अपने अहंवादी के अनुसार नियंत्रित करना चाहते हैं। वह रोहित से कह उठती है-” तुम मेरे गार्जियन नहीं हो। हम एक दूसरे को नापसंद नहीं करते… बस इतना ही हक हमारा एक दूसरे पर है।” १३ सूरजमुखी अंधेरे के, कृष्णा सोबती, पृष्ठ- ७२, राजकमल प्रकाशन- १९९४. ‘ पचपन खंभें लाल दीवारें ‘ की सुषमा उस सामाजिक धारणा को झुठलाती है जो यह मानती है कि परिवार का पालन – पोषण केवल पुरुष ही कर सकते हैं। यही वह कारण है जो पुरुषों को अहंवादी बनाता है। अतः वह अविवाहित रहने का निर्णय लेती है।

५ धर्म और परम्परा के प्रति:- किसी भी समाज में स्त्रियों पर धर्म और परम्परा की आड़ में ही शोषण और अंकुश लगाया जाता है। कार्ल मार्क्स ने ठीक ही धर्म को अफीम माना है। इन धार्मिक ग्रथों की रचना किसने की है? अपने मन मुताबिक इन पुरूषों ने ही ना। तभी तो गुप्त जी ने कहा है-

नरकृत शास्त्रों का बंधन सब ही है नारी को लेकर।

अपने लिए सभी सुविधाएं पहले ही कर बैठे नर।।

आधुनिक उपन्यासों में नारी एक नूतन छवि लेकर उपस्थित होती है। ‘इदन्नमम’ की नायिका मंदाकिनी

बऊ के कथन से असहमति व्यक्त करते हुए कहती है-” वे सब पुरुष प्रधान समाज के अवसरवादी प्रसंग हैं। एक ओर पतिव्रत्य धर्म की परिभाषा करता राम के साथ सीता का वनगमन दूसरी ओर उसकी निष्ठा को तोड़ता मर्यादा पुरुषोत्तम राम का सीता की अग्नि परीक्षा लेना। सीता ने क्यों नहीं मांगा कोई सबूत कि हे भगवान जाने जानेवाले राम, तुम भी तो उस अवधि में मुझसे अलग रहे हो। अपने पवित्र रहने के साक्ष्य दो।”- १४ इदन्नमम, मैत्रेई पुष्पा, पृष्ठ- २७०, राजकमल पेपर बैक्स-२००४.

इस प्रकार स्वतंत्रयोत्तर लेखिकाओं ने स्त्री को भी एक मानवी के रूप में देखे जाने और उनकी भी स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने की कोशिश की।उन्होंने पारंपरिक समाज में व्याप्त पितृ सत्तात्मक खोखली मनोवृत्ति को उजागर करते हुए विवाह संस्था की कमजोरियों को भी उजागर किया। साथ ही उन्होंने समस्त नारी जाति को पुरुषवादी पहचान से मुक्त कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अद्यतन नारी मुक्ति का प्रश्न नारी को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त करा उनकी स्वतंत्र पहचान बनाने से है। स्त्री – विमर्श का फलक बड़ा ही विस्तृत है। इसमें एक तरफ पितृ सत्ता का विरोध है तो दूसरी तरफ वैसे भारतीय सांस्कृतिक परम्परा का स्वीकार भी है जो सही अर्थों में मानवता के लिए श्रेयस्कर है।

 

 

परिचय: उर्मिला कुमारी, सहायक प्राध्यापक, अन्नदा कॉलेज, पी – एच.डी.(जारी), नेट – उत्तीर्ण, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों में आलेख प्रस्तुति, आकाशवाणी से समय – समय पर वार्ता प्रसारित।

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