हिंदी साहित्य और सिनेमा

अजय कुमार चौधरी

पहले मैं आपको दो बातें स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि सिनेमा और साहित्य का धरातल अलग-अलग है | सिनेमा शुध्द मनोरंजन प्रधान होता है जिसमें दर्शकों के मांग का ख्याल रखा जाता है, दर्शक को जो चाहिए फिल्म इंडस्ट्री वहीं परोसता है जिसका सीधा संबंध व्यवसाय से होता है,जबकि साहित्य संवेदना और अनुभूति प्रधान होता है, साहित्य दर्शकों के मांग पर नहीं बल्कि साहित्यकार अपनी निजी संवेदना और अनुभूति को केंद्र में रखकर समाज के यथार्थ रूप को सामने लाने का प्रयास करता है | दो धरातल पर होने के बावजूद साहित्य और सिनेमा कई विंदुओं पर मिल भी जाता है | सिनेमा कल्पना प्रधान है ,भावों की अभिव्यक्ति के लिए ऐसे दृश्यों का निर्माण कर दिया जाता है जो शब्दों के द्वारा संभव नहीं है | वहीं साहित्य शब्दों के माध्यम से जिस वातावरण का निर्माण करता है उसे दृश्यरुप में लाना फ़िल्मकारों के लिए कभी –कभी चुनौती भी बन जाती है | साहित्यकार शब्दों के जिस वातावरण का निर्माण करता है उसे पाठक अपनी-अपनी कल्पना द्वारा अलग-अलग भाव और दृश्य मन में बनाते हैं |जबकि फ़िल्मकर द्वारा तैयार किया गया वातावरण दर्शकों के लिए एक जैसा होता है | फ़िल्मकार अपने अनुभव के द्वारा साहित्य से ली गई सामाग्री का ज्यों का त्यों रूपान्तरण नहीं कर पता है या करना नहीं चाहता है क्योंकि वह साहित्य को फिल्म के रूप से परोसना चाहता और साहित्य फिल्म के साँचे में पूर्णरूप से उतार नहीं पता और यहीं से साहित्य और सिनेमा का अंतर्संबंध में विलगाव उत्पन्न हो जाता है |फिल्म समीक्षक विमलेंदु विमलेंदु जी ने साहित्य और सिनेमा के अंतर्संबंध को स्पष्ट करते हुए कहते है कि1 “साहित्य और सिनेमा का सम्बंध भी दो पड़ोसियों की तरह रहा. दोनो एक दूसरे के काम तो आते रहे लेकिन यह कभी सुनिश्चित नही हो पाया कि इनमे प्रेम है या नही.|”

सिनेमा ने अपने आरंभिक चरण में साहित्य से ही प्राण-तत्व लिया. यह उसके भविष्य के लिए ज़रूरी भी था. दरअसल सिनेमा और साहित्य की उम्र में जितना अधिक अंतर है, उतना ही अंतर उनकी समझ और सामर्थ्य में भी है. विश्व सिनेमा अभी सिर्फ 117 साल का हुआ है. साहित्य की उम्र से इसकी तुलना की जाय तो यह अभी शिशु ही है साहित्य के सामने.” उदाहरण के लिए अभी हाल ही में एक मूवी आई थी ‘बाहुबली’ | इस फिल्म में जिस तकनीक के प्रयोग से जिस वातावरण का निर्माण किया गया है उसे हूबहू साहित्य में उतार पाना बड़े से बड़े लेखकों के चुनौती है |ऐसे जगह पर आकार ही साहित्य अपनी सीमा का जान पाती है |

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प्रेमचन्द के ‘ गोदान ‘ पर बनी फिल्म को छोड़ दें तो रेणु की कहानी पर बनी ‘तीसरी कसम’ ने दुनिया को कुछ अमर पात्र दिये. महाश्वेतादेवी की कहानी पर बनी ‘रुदाली’ के दृश्य अविस्मरणीय हैं. विमल मित्र के उपन्यास पर बनी ‘साहब,बीवी और गुलाम’, टैगोर की कहानी-‘नष्टनीड़’ पर सत्यजीत राय की फिल्म ‘चारुलता’, सृजन के नये आयामों की तलाश करती हैं.

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सिनेमा को मण्टो का साथ लेना पड़ा. मण्टो की लेखनी से ‘किसान कन्या’, ‘मिर्ज़ा गालिब’, ‘बदनाम’ जैसी फि़ल्में निकलीं. प्रेमचंद और अश्क भी इस दौर में सिनेमा से जुड़े और मोहभंग के बाद वापस साहित्य की दुनिया में लौट गए. बाद में ख्वाजा अहमद अब्बास, पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र, मनोहरश्याम जोशी, अमृतलाल नागर, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, रामवृक्ष बेनीपुरी, भगवतीचरण वर्मा, राही मासूम रज़ा, सुरेन्द्र वर्मा, नीरज, नरेन्द्र शर्मा, कवि प्रदीप, हरिवंशराय बच्चन, कैफी आज़मी, शैलेन्द्र, मज़रूह सुल्तानपुरी, शकील बदायूँनी इत्यादि ने भी समय-समय पर हिन्दी सिनेमा में किसी न किसी रूप में अपनी आमद दर्ज कराई.

बांग्ला लेखक शरतचंद्र के उपन्यास ‘देवदास’ पर हिन्दी में चार फिल्में बनीं और कमोबेश सभी सफल रहीं. प्रेमचन्द की कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर सत्यजीत रॉय ने इसी नाम से फिल्म बनाई, जो वैश्विक स्तर पर सराही गई. भगवतीचरण वर्मा के अमर उपन्यास ‘चित्रलेखा’ पर भी फिल्में बनीं, जिनमें एक सफल रही. बाद में साहित्यिक कृतियों पर आधारित फिल्मों को आर्ट फिल्मों के खांचे में रखकर इनका व्यावसायिक और हिट फिल्मों से अलगाव कायम करने का प्रयास किया गया, जिससे ऐसी फिल्मों का आर्थिक पहलू प्रश्नचिह्नांकित हो गया और फिल्मकारों ने साहित्यिक कृतियों पर फिल्म बनाने से परहेज करना शुरू कर दिया.

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. हालांकि अमिताभीय युग में भी सत्यजीत रॉय, मृणाल सेन, कमाल अमरोही, ऋषिकेश मुखर्जी, बासु भट्टाचार्य, श्याम बेनेगल, एम. एस. सत्थू, एन. चंद्रा, मुजफ्फर अली, गोविन्द निहलानी, आदि ने अपने-अपने स्तर से साहित्य, सिनेमा और समाज का त्रयी में सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया लेकिन ये सभी चाहे-अनचाहे ‘आर्ट सिनेमा’ में बँधने को बाध्य हुए.

एक कारण और भी था कि इस दौरान साहित्यिक कृतियों पर बनने वाली फिल्में एक-एक कर असफल होने लगी थीं. प्रेमचंद की रचनाओं पर बनीं ‘गोदान’, ‘सद्गति’, ‘दो बैलों की कथा’, फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास पर बनी ‘तीसरी कसम’, मन्नू भंडारी की रचनाओं पर आधारित ‘यही सच है’, ‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’, शैवाल की कहानी पर आई फिल्म ‘दामुल’, धर्मवीर भारती के उपन्यास पर आधारित ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’, चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की कहानी पर आधारित ‘उसने कहा था’, संस्कृत की रचना ‘मृच्छकटिकम्’ पर आधारित ‘उत्सव’, राजेंदर सिंह बेदी के उपन्यास पर बनी ‘एक चादर मैली सी’ आदि का असफल होना सिनेमा और साहित्य से दूरी की एक बड़ी वजह बन गया.

साहित्य और सिनेमा के अन्तर्सम्बन्धों पर गुजराती फिल्म समीक्षक बकुल टेलर ने बेहद सारगर्भित टिप्पणी की है. उनका कहना है, “साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्म अपने आप अच्छी हो, ऐसा नहीं होता. वास्तविकता यह है कि साहित्यिक कृति का सौन्दर्यशास्त्र और सिनेमा का सौन्दर्यशास्त्र अलग-अलग हैं और सिनेमा सर्जक भी साहित्यकृति के पाठक रूप में साहित्यिक आस्वाद तत्वों पर मुग्ध होकर उनका सिनेममेटिक रूपांतरण किए बगैर आगे बढ़ जाते हैं.“

बंकिमचंद्र की कृति पर बनी ‘आनंदमठ’, विमल मित्र कृत ‘साहब बीबी और गुलाम’, आर. के नारायण के अंग्रेज़ी उपन्यास पर बनी ‘गाइड’, उडि़या लेखक फकीरमोहन सेनापति की रचना पर बनी ‘दो बीघा ज़मीन’ और मिर्ज़ा हादी की उर्दू कृति पर बनी ‘उमराव जान’ फिल्मों की सफलता का सबसे बड़ा कारण परिवेश की समनुरूपता रहा है

चलचित्र और साहित्य के अंतर्सम्बन्ध पर अनेक विचारकों ने अपने मत दिए हैं:-

उमेश राठौर लिखते हैं, ‘फिल्म और साहित्य‘ के परस्पर लगाव का प्रश्न सदैव से ही जीवन्त रहा है। इस सम्बन्ध को विकसित करने में गीत, कविता, नाटक और उपन्यास की चर्चा भी अक्सर होती रही है, लेकिन फिल्में केवल उपन्यासों पर ही नहीं बनी-कथाओं पर भी निर्मित की गई।7

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सम्पादक ‘मार्यर शामसी‘ ने चलचित्रों को ‘यांत्रिकी, कला और तकनीकी‘ का मेल मानते हुए लिखा है,“Cinema is a highly mechanical medium. It uses many mechanical devices like cameras, microphones, dubbing machines, editing machines etc. Film is a product of intraction between machines, artistic and technical people”. 8

वे आगे लिखे हैं, “In the beginning, it was considered as a medium of cheep entertainment, but now it was come to be considered as art form. Interactual and serious thinkers have associated themselves with cinema”. 9

‘जयदेव तनेजा‘ के शब्दों में, ‘‘कला प्रयास है, प्रयोग है, सृष्टि है, जीवन है-वस्तु नहीं है। रंग कला भी इसी अर्थ में एक उत्सव है, एक अनुष्ठान है- जीवनमय है, जीवनदायी है।‘‘10

वे पुनः लिखते हैं, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं कि अनेक कथा-कृतियाँ रंगमंच और सिनेमा के माध्यमों से सफलतापूर्वक रूपांतरित हुई हैं।‘‘11

रंगमंच और सिनेमा के प्रबुद्ध अभिनेता बलराज साहनी का कथन है, ‘‘फिल्म-कला को ‘आॅपरेशन टेबल‘ पर रखिए और उसकी चीरफाड़ कीजिए तो पता चलेगा कि फिल्म-कला दरअसल एक कला का नाम नहीं, बल्कि अनगिनत कलाओं के समूह का नाम है।‘‘12

सम्पादक डाoनाल्ड एच0 जान्सटान के अनुसार, “Cinematic adaptation of books, players, poems, diaries and comics demonstrate films profuse influence on print media”. 13

पुनश्च, “In addition to book adaptations, film is, able to extend the run of a play indefinitely through its climatic adaptation of it.” 14

पुनश्च, “Hence, film has a profound influence on print media, giving them a visual dimension that extends the original text’s popularity and scope”. 15

‘सुधीर ‘सुमन‘‘ के शब्दों में, ‘‘सिनेमा मनुष्य के कला के साथ अंतर्सम्बन्ध का दृश्यरूप है। मनुष्य के जीवन में जो सुंदर है उसके चुनाव के विवेक का नाम सिनेमा है।‘‘16

इस प्रकार अनेक विद्वानों ने चलचित्र एवं साहित्य के मध्य गहन अंतर्सम्बन्ध स्वीकार किए हैं। एक सत्य यह भी है कि चलचित्र में विविध कलाओं का समाहार सरलता से सम्भव है। यदि हम साहित्य के चलचित्र रूपांतरण का अध्ययन करे तो भी चलचित्र की उपादेयता स्वयं सिद्ध होती है।

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