आधे-अधूरे : एक यर्थाथवादी रंगशिल्प

ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह

दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली

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19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में गद्य का अविर्भाव भारतीय नवजागरण की एक महत्वपूर्ण विशेषता है, अपने प्रारम्भिक दौर में गद्य की विधाओं यथा- निबन्ध, उपन्यास, नाटक में सबसे ज्यादा जोर नाट्य लेखन पर दिखाई देता है, नाटक महज पाठ्य विधा नहीं है अपितु दृश्य विधा भी है । अपने दृश्यात्मकता के कारण ही यह गद्य की अन्य विधाओं से अलग है।

हिन्दी साहित्य में नाटक की परंपरा का विकास भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के नाटकों से होता है बीसवीं शताब्दी तक आते-आते रंगमंच के क्षेत्र में पर्याप्त विकास होने से नाटक गद्य की एक लोकप्रिय विधा बन गई, इसे विशिष्ट बनाने के लिए महान कलाकारों एवं रचनाकारों ने काम किया। नाटक की परम्परा भारतेन्दु युग से होते हुए प्रसाद युग एवं प्रसादोत्तरयुगीन नाटकों से होते हुए स्वातन्त्रोत्तर हिन्दी नाटक की ओर बढ़ती है इसी स्वातन्त्रोत्तर नाटककारों में मोहन राकेश का नाम लिया जाता है, जिन्होंने अपने लेखन से हिन्दी नाटक की ऊँचाईयों को पार कर लिया, जिसके सम्बन्ध में ‘हृदयेश मिश्र’ एवं ‘शिवलोचन पाण्डेय’ अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि- ‘‘मोहन राकेश ने अपने तीन नाटकों द्वारा हिन्दी नाटक की बुलंदियों को छू लिया है। इनके ‘आषाढ़ का एक दिन’, ‘लहरों के राजहंस’ और ‘आधे-अधूरे’ में व्यक्ति एवं समाज के द्वन्द्व से उत्पन्न स्थितियों का चित्रण विभिन्न कथानकों के माध्यम से किया गया है। इनके नाटक शिल्प एवं रंगमंच की दृष्टि से भी अत्यन्त सफल सिद्ध हुए हैं।’’1

‘‘नाटक की कसौटी रंगमंच है। रंगमंच को नाटक का निष्कर्ष मानकर ही उसकी निजी सत्ता की खोज संभव है। नाट्यकृति और रंगमंच एक-दूसरे के कार्य और कारण है, दूसरे स्तर पर एक-दूसरे के पूरक यहाँ तक कि एक दूसरे के पर्याय भी। निर्विवाद रूप से यह सिद्ध होता है कि रंगमंच की आत्मा नाटकीयता है और नाटक की आत्मा रंगमंचीयता। भरतमुनि ने अपने ‘नाट्यशास्त्र’ में कहा है कि- नाटक का शरीर है वाचिक अभिनय, क्योंकि आंगिक और सात्विक अभिनय तथा नेपथ्य आदि सब उसी को व्यंजित करते हैं।’’2 स्वतंत्र भारत में नाटक की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी रंगमचीयता की ओर अग्रसर होना है, जोकि स्वतंत्रता पूर्व के या प्रसादयुगीन नाटक की कमी रही है, लेकिन स्वातन्त्रोत्तर नाटकों में रंगमंचीयता का स्पष्ट विकास परिलक्षित होता है, जिसके सम्बन्ध में डॉ. नरनारायण राय का कहना है कि- ‘‘स्वतंत्र भारत में नाटक की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी रंगमंचीयता की ओर अग्रसर होना है अथवा यों कहें की दृश्यकाव्य के रूप में नाटक की दृश्यत्व की ओर ले जाकर उसे वास्तविक रूप में सार्थकता प्रदान करना है। जगदीशचन्द्र माथुर के नाटक ‘कोणार्क’ में पहली बार यह सन्नाटा टूटा था, अंधायुग’ ने एक और झटका दिया तथा मोहन राकेश ने सन्नाटे के तार-तार बिखेर डाले। यदि हिन्दी रंगमंच पर प्रदर्शनमूलक गतिविधियों में बढ़ोत्तरी आयी, दर्शक वर्ग तैयार हुआ, साहित्यिक नाटक भी प्रदर्शनों में लोकप्रियता की ओर अग्रसर हुए तो इसमें अधिकांश योगदान मोहन राकेश का ही रहा है।’’3

उपरोक्त उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है कि स्वतन्त्रता के पूर्व हिन्दी नाटकों में रंगमंच के सन्नाटे को किस प्रकार स्वातन्त्रोत्तर नाटकों में तोड़कर उसे रंगमंच के निकष पर खरा उतारा गया, यह बदलाव ही हमें समकालीन जीवन के यर्थाथ का दर्शन कराते हैं।

मोहन राकेश के नाटक पाठकों का जितना मनोरंजन करते है, मंच पर भी उसी सफलता के साथ अभिनीत होते हैं। इसी का परिणाम है कि उनके नाटक ‘आषाढ का एक दिन’, ‘लहरों के राजहंस’ अनेक बार नाट्य संस्थाओं द्वारा रंगमंच पर अभिनीत हो चुके हैं। इन नाटकों के सफल मंचन के बाद मोहन राकेश के ‘आधे-अधूरे’ के मंचन ने उन्हें शिखर पर पहुँचा दिया। जिसके सम्बन्ध में सुरेन्द्र यादव के मत स्पष्ट है कि ‘‘हिन्दी नाटक में एक अकेला नाम मोहन राकेश का उभरता है जिन्होंने एक सशस्त विधा तथा हिन्दी रंगमंच को एक सार्थक माध्यम के रूप में जीवंत पहचान दी।’’4

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‘आधे-अधूरे’ नाटक यथार्थवादी रंगशिल्प का सफल उदाहरण है, इसे समझने से पहले हमें रंगशिल्प के बारे में समझ लेना आवश्यक है, रंगशिल्प दो प्रकार के होते हैं यथार्थवादी तथा अयथार्थवादी। यथार्थवादी रंगशिल्प वह है जो जीवन, समाज, वर्ग आदि का स्पष्ट या हूबहू या ज्यों का त्यों चित्रण प्रस्तुत करता है इस प्रकार के रंगमंच के विकास या रंगशिल्प के विकास की परम्परा पाश्चात्य देशों से मानी जाती है। अयथार्थवादी रंगशिल्प जीवन, समाज, वर्ग आदि का हूबहू चित्रण न करके उसका आभास कराते हैं या सांकेतिक चित्रण करतें हैं, जिसमें भाव और कल्पना का समावेश होता है, इस प्रकार के रंगशिल्प ‘प्रसाद’ के नाटकों में उपलब्ध होते हैं जैसे- ‘चन्द्रगुप्त’ में मौर्य वंश का चित्रण।’

‘आधे-अधूरे’ नाटक का रंगशिल्प ‘रियलिष्टिक थियटर’ अर्थात् ‘यथार्थवादी रंगमंच’ के पूर्णतः अनुकूल है, क्योंकि इस नाटक में कमरे की स्थिति का हूबहू चित्रण है, जो इस प्रकार है- ‘‘ ‘आधे-अधूरे’ का कार्य स्थल मकान का बैठने का कमरा है, जिसमें सोफे, कुर्सियाँ, मेजें, अलमारी, किताबें, फाइलें आदि हैं। यह कमरा एक समय साफ-सुथरा रहा होगा, पर सालों की आर्थिक कठिनाइयों के कारण अब सब पर धूल की तह जम गई है।’’5

‘‘सामान में कहीं एक तिपाई, कहीं दो-एक मोढ़े, कहीं फटी-पुरानी किताबों का एक शेल्फ और कहीं पढ़ने की एक मेज-कुर्सी भी है। गद्दे, परदे, मेजपोश और पलंगपोश अगर है, तो इस तरह घिसे, फटे या सिले हुए कि समझ में नहीं आता कि उनका न होना क्या होने से बेहतर नहीं था?’’6 इस उदाहरण से स्पष्ट होता है, कि हर-चीज का रिश्ता दूसरी चीज से टूटा होना, असुविधाओं में ही सुविधा खोजने की कोशिश, फटी-पुरानी किताबें, घिसे-फटे गद्दे, परदे, मेजपोश आदि वातारण में ऐसा बिम्ब प्रस्तुत करतें हैं, जो नाटक के परिवार की समस्त विसंगतियों और मजबूरियों को स्पष्ट करने के साथ पात्रों की स्थितियों को भी ध्वनित कर देते हैं । इस नाटक के पात्र भी असुविधा में सुविधा खोजने की तलाश में लगे हुए हैं। उनका आपस में रिश्ता टूट चुका है और वे गद्दे, परदे आदि की तरह ही घिस-पिट गये हैं। इसी सम्बन्ध में नाट्य समीक्षक जयदेव तनेजा का मत स्पष्ट है कि ‘‘जो कुछ भी है वह अपनी अपेक्षाओं के अनुसार न होकर कमरे की सीमाओं के अनुसार एक और ही अनुपात से है। एक चीज का दूसरी चीज से रिश्ता तत्कालीन सुविधा की माँग के कारण लगभग टूट चुका है।’’7

‘आधे-अधूरे’ नाटक को प्रस्तुत करने के लिए मोहन राकेश ने रंगमंचीय संरचना में यथार्थवादी शिल्प का कुशलता से प्रयोग किया है। एक ऐसा ढाँचा जो यह दर्शाता है कि इस मकान में कभी एक उच्च मध्यवर्गीय परिवार रहा करता था जिसकी आर्थिक दुर्दशा ने उसके आंतरिक तथा बाहरी दोनों ढाँचों को छिन्न-भिन्न कर दिया है। मोहन राकेश अपने नाटक में दिखाते हैं कि- ‘‘तो पता नहीं और क्या बर्वादी हुई होती। जो दो रोटी आज मिल जाती है मेरी नौकरी से वह भी न मिल पाती। लड़की भी घर में रहकर ही बुढ़ा जाती, पर यह न सोचा होता किसी ने कि…’’8

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मध्यवर्गीय परिवार की संवेदना को विस्तार देते हुए लेखक ने प्रत्येक पात्र की वेशभूषा का चित्रण निर्धारित किया है, वह भी यर्थाथवादी रंगशिल्प को बहुआयामी बनाता है- ‘‘पुरुष एक के रूप में वेशान्तर: पतलून-कमीज। जिन्दगी से अपनी लड़ाई हार चुकने की छटपटाहट लिए। पुरुष दो, दूसरे रूप में: पतलून और बन्द गले का कोट। अपने आप से सन्तुष्ट, फिर भी आशंकित। पुरुष-तीन के रूप में: पतलून, टी-शर्ट। हाथ में सिगरेट का डिब्बा। लगातार सिगरेट पीता। अपनी सुविधा के लिए जीने का दर्शन पूरे हाव-भाव में। पुरुष-चार के रूप में: पतलून के साथ पुरानी काट का लम्बा कोट। चेहरे पर बुजुर्ग होने का खारा अहसास का काइयाँपन।’’9 इस उदाहरण को कुछ लोग अनुपयोगी और अव्यावहारिक मानते हैं। किन्तु ‘ओम शिवपुरी’ ने ‘काले सूट वाला आदमी’ समेत चारों पुरुष की भूमिकाओं का बहुत ही सफलता से अभिनय कर इस तथ्य को गलत सिद्ध कर दिया है यह अवश्य कहा जा सकता है, कि साधारण अभिनेता शायद सफलता पूर्वक एक साथ पाँच पुरुषों की भूमिकाएँ न कर सके।

इसी प्रकार ‘‘इक्कीस वर्षीय लड़के का अभिनय पतलून में भड़कीली शर्ट दबाए हुए आकर्षक लगता है। उसके चेहरे पर खास तरह की कड़वाहट झलकती है। स्त्री साधारण से साड़ी-ब्लाउज में, जिसके चेहरे पर यौवन की चमक और चाह, फिर भी शेष का प्रतिबिम्ब झलकता है, जिसका अभिनय दर्शक को मोह लेता है। तीस वर्षीय लड़की ‘बिन्नी’ साधारण सुरुचिपूर्ण साड़ी-ब्लाउज में, जिससे व्यक्तित्व में बिखराव, अवसाद और उतावलेपन का प्रतिबिम्ब झलकता है। छोटी लड़की ‘किन्नी’ फ्रॉक और मोज़े पहने हुए, जिसके चेहरे पर चंचलता का हाव-भाव और मुखमुद्रा से संबंधित अभिनय बड़ा ही आकर्षक और रोचक है।’’10 इससे स्पष्ट हो जाता है कि नाटक के पात्रों की वेश-भूषा हमारे तत्कालीन जीवन से मिलती है जिसका यर्थाथ चित्रण नाटक मंचन में प्रस्तुत हुआ है इन्हीं कारणों से यथार्थवादी रंगशिल्प का सफल उदाहरण है ‘आधे-अधूरे’।

ध्वनि का भी रंगमंच की दृष्टि से विशेष महत्व है जो परोक्ष एवं नेपथ्य के माध्यम से ध्वनित होकर मंचीय प्रभाव को बढ़ा सकती है और दर्शक के मन में अमूर्त बिम्ब बनाकर नाट्य स्वाद को तीव्र कर सकती है या दर्शक के कौतूहल को तीव्र कर सकती है मोहन राकेश ने ‘आषाढ़ का एक दिन’ में बादलों के गर्जन का परोक्ष-ध्वनि के रूप में सफल प्रयोग किया है। ‘‘लहरों के राजहंस’’ में हंसो की ध्वनि का उपयोग किया है लेकिन ‘आधे-अधूरे’ में परोक्ष-ध्वनियों का व्यापक प्रयोग नहीं हुआ है जो हुआ है वह नेपथ्य से हुआ है जो इस प्रकार है- ‘‘अहाते के पीछे से दरवाजे की कुण्डी खटखटाने की आवाज, बाहर से ऐसा शब्द सुनाई देता है जैसे पाँव फिसल जाने से किसी ने दरवाजे का सहारा लेकर अपने को बचाया हो।’’11

‘आधे-अधूरे’ नाटक में ध्वनि की तुलना में प्रकाश का प्रयोग लेखक ने अधिक किया है, जिससे मंच पर प्रकाश का प्रभाव दर्शक के मन को आकर्षित करता है, प्रकाश वृत्तों से, धीमे तथा तेज प्रकाश से, छाया तथा अन्धकार से मंच पर प्रभाव डाला गया है जो इस प्रकार है- ‘‘परदा उठने पर सबसे पहले चाय पीने के बाद डाइनिंग टेबल पर छोड़ा गया अधटूटा टी-सेट आलोकित होता है। फिर फटी किताबों और टूटी कुर्सियों आदि में से एक-एक। कुछ सेकण्ड बाद प्रकाश सोफे के उस भाग पर केन्द्रित हो जाता है, जहाँ बैठा काले सूटवाला आदमी सिगार के कश खींच रहा है उसके सामने रहते प्रकाश उसी तरह सीमित रहता है, पर बीच-बीच में कभी यह कोना और कभी वह कोना साथ आलोकित हो उठता है।’’12 इसी प्रकार प्रकाश का प्रयोग नाटक के बीच-बीच में होता रहता है और अन्त में प्रकाश का प्रयोग- ‘‘प्रकाश खण्डित होकर स्त्री और बड़ी लड़की तक सीमित रह जाता है। स्त्री स्थिर आँखों से बाहर की तरफ देखती आहिस्ता से कुर्सी पर बैठ जाती है।… उन दोनों पर भी प्रकाश मद्धिम पड़ने लगता है। तभी, लगभग अंधेरे में लड़के की बाँह थामें पुरुष एक की धुंधली आकृति अन्दर आती दिखाई देती है।’’13

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ऊपर दिये गए विभिन्न मतों एवं विवेचनों से यह प्रमाणित हो जाता है कि रंगमंच एवं अभिनेयता की दृष्टि से ‘आधे-अधूरे’ नाटक एक अत्यन्त सफल नाटक है। आज तक इसका अभिनय अनेक बार हो चुका है, यह भी इसी तथ्य का स्पष्ट परिचायक है। नाटककार ने जिस शिल्प तथा जिस तकनीक को यहाँ अपनाया है, वह एक प्रकार से सर्वथा नवीन है। आधुनिक रंगमंच एवं नाट्य-शिल्प की आवश्यकताओं के सर्वथा अनुरूप है। दृश्य-योजना का मंचीय या अभिनेय नाटकों में बहुत अधिक महत्व है। ‘आधे-अधूरे’ नाटक की यह एक प्रमुख विशेषता है कि इसका समूचा दृश्य-विधान एक ही सैट पर किया गया है। मोहन राकेश ने दृश्य-विधान एक ही सैट पर किया है। राकेश ने दृश्य-विधान के समान ही एक ही पुरुष- पाँच द्वारा चार-पाँच भूमिकाएँ निभा ले जाने का भी एक नवीन प्रयोग किया है। एक ही पुरुष अभिनेता थोड़ी-सी वेश-भूषा के परिवर्तन के साथ चार-पाँच पात्रों का चुनौतीपूर्ण अभिनय कर जाता है। निश्चय ही मोहन राकेश की यह एक नव्यतम एवं अद्भुत उपलब्धि है।

निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि ‘आधे-अधूरे’ यथार्थवादी रंग शिल्प का सफल उदाहरण है चाहे वह मंच का वातावरण, वेश-भूषा एवं प्रकाश आदि हो सभी के प्रयोग से यथार्थवादी रंगशिल्प के निकष पर ‘आधे-अधूरे’ मोहन राकेश का सर्वोत्कृष्ट नाटक है। ‘आधे-अधूरे’ की साधारण भाषा, वेश-भूषा, प्रकाश- योजना, कथ्य एवं संवाद हमारे समकालीन यथार्थवादी जीवन का चित्रण करने में सफल हुए हैं इसीलिए ‘आधे-अधूरे’ नाटक यथार्थवादी रंगशिल्प का सफल उदाहण है।

संदर्भ सूची

1. ‘‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’’- हृदयेश मिश्र एवं शिवलोचन पाण्डेय, पृष्ठ सं. 226, प्रकाशक-भारतीय भवन पटना, 2003

2. ‘‘नाटककार मोहन राकेश’’- डॉ. स्वामी प्यारी कौड़ा, पृष्ठ सं. 111, प्रकाशक के.एच. पचौरी प्रकाशन, गाजियाबाद, 2008

3. ‘‘रंगशिल्पी मोहन राकेश’’- डॉ. नरनारायण राय, पृष्ठ सं. 29

4. ‘‘नाटक, रंगमंच और मोहन राकेश’’- डॉ. सुरेन्द यादव, पृष्ठ 267

5. ‘‘आधे-अधूरे’’- मोहन राकेश, पृष्ठ सं. 11 प्रकाशक-राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2009

6. उपरोक्त, पृष्ठ सं. 16

7. ‘‘मोहन राकेश रंगशिल्प और प्रदर्शन’’- जयदेव तनेजा, पृष्ठ सं. 225-226 प्रकाशक-राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली,1996

8. ‘‘आधे-अधूरे’’- मोहन राकेश, पृष्ठ सं. 28

9. उपरोक्त, पृष्ठ सं. 15

10. ‘‘नाटककार मोहन राकेश’’- डॉ. स्वामी प्यारी कौड़ा, पृष्ठ सं. 275

11. ‘‘आधे-अधूरे’’- मोहन राकेश, पृष्ठ सं. 99

12. उपरोक्त, पृष्ठ सं. 16

13. उपरोक्त, पृष्ठ सं. 99-100

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