ब्रज के संस्कार लोक-गीतों में निहित नारी वेदना

डॉ. बौबी शर्मा

सर्वप्रथम ब्रज शब्द का प्रयोग वेदों में दृष्टिगोचर होता है जहाँ उन शब्दों से किसी भौगोलिक सीमा का तो आभास नहीं होता है परन्तु किसी खास क्षेत्र विशेष की ओर अवश्य संकेत करते हैं। ब्रज का शाब्दिक अर्थ है- ‘‘गौशाला, गोष्ठ-गवामय, ‘ब्रज’ वृधि कृष्णव राधौ आद्रिव’’1, ‘‘ब्रज गच्छ गोष्ठम’’2, यत्र गावो भूरि श्रृंगा आयासः’’3 और उन सबसे ब्रज के सन्दर्भ में संस्कृत उक्ति बनी- ’’ब्रजान्ति गावों यस्मिन्निति ब्रज।’’ अर्थात जहाँ गायें विचरण करती हैं या चरती हैं, वह ब्रज है। वस्तुतः ब्रज भगवान् कृष्ण की लीला भूमि का परिचायक है। ब्रज का कृष्ण गोप-गोपी से घनिष्ठ सम्बन्ध है। यही कारण है कि वेद ब्रज को ‘गोलोक’, गोलोकाख्यधाम् गोकुल आदि नामों से सम्बोधित करते हैं।

श्री कृष्ण की लीला-भूमि इस ब्रज का विस्तार कितना है? यह निश्चय करना बड़ा ही मुश्किल है। इसका कारण यह है कि इस सन्दर्भ में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। डॉ. सत्येन्द्र के अनुसार- ‘‘ब्रज की ऐतिहासिक और भौगोलिक सीमाएँ आज भी अनिश्चित एवं विवादास्पद है, किन्तु ब्रज की छाप समस्त भारत पर पड़ी है, इसमें कोई सन्देह नहीं कर सकता।’’4 ब्रज नामकरण से पूर्व इसके कई नाम है, यथा-मध्यदेश, ब्रह्मर्षि- ब्रह्मवर्त, शूरसेन, मथुरा-मण्डल, ब्रज या ब्रज मण्डल आदि। अधिकांश विद्वान ब्रज के केन्द्र में मथुरा को स्वीकारते हैं- ‘‘भारत के उस प्रदेश का नाम ब्रज है जो मथुरा को केन्द्र मानकर चैरासी कोस के बीच स्थित है।’’5 भगवान कृष्ण की ब्रज-संस्कृति से ओत-प्रोत ‘ब्रज-चैरासी’ ही ब्रज क्षेत्र के अन्तर्गत लोकमान्य है और रहेगा।

लोक-कवि अपनी भावाभिव्यक्ति हेतु अनेकानेक तरीकों-धुन – लय- तान आदि का प्रयोग करता है। जिसके लिए वह विभिन्न शैलियों का इस्तेमाल करता है। ये अभिव्यक्तियाँ संक्षिप्त एवं विस्तृत हुआ करती हैं। इनके अतिरिक्त ये अभिव्यक्तियाँ संक्षिप्त एवं विस्तृत हुआ करती हैं। इनके अतिरिक्त ये अभिव्यक्तियाँ गद्य-पद्य एवं मिश्रित तीनों माध्यमों से हुआ करती हैं। इन वैभिन्नयताओं के कारण लोक-काव्य को विभिन्न वर्गों में विभक्त करने की सम्भावनाएँ बनती है जिनके आधार पर लोक-साहित्य के मर्मज्ञ विद्ववानों ने उसे लोक-गीत, लोक-गाथा, लोक-कथा, लोक-नाट्य, मुहावरों, लोकोक्तियों और अन्य प्रकीर्ण विभागों में विभक्त किया है। जिनमें लोक-गीत अंग्रेजी के ‘फोक सांग’ का पर्याय है। यह लोक-साहित्य की सशक्त एवं प्रधान विधा है। लोक-गीत सरल, मधुर एवं गेय हुआ करते हैं जिनमें लय-तान एवं संगीतात्मकता का सरल एवं स्वाभाविक प्रवाह हुआ करता है। लोकगीत सामूहिक जन-चेतना के गर्भ से उद्भूत होते हैं। ये लोक मानस की वे सहज् सरल एवं स्वाभाविक भावाभिव्यक्तियाँ हैं, जिनमें जन-मानस के नैसर्गिक, निश्चल एवं अकृत्रिम जीवन का प्रतिबिम्ब दृष्टिगोचर होता है। इनमें लोक-मानस की कामनाएँ, भावनाएँ, उल्लास और विषाद सब कुछ समाहित है और बगैर जटिलता, गोपनीयता, दुरूहता, अश्लीलता के। भोले-भाले मन की भोली-भाली अभिव्यक्तियाँ लोक-जीवन के सत्य को अनुस्यूत किये हुए हैं, जहाँ ताल-तलैया, पीपर-पनघट, बासंती धानी चुनरी ओढ़े धरा, आम-अमराइयाँ, पर्वत-पठार, नदी-पोखर, कछार, झार-निर्झर, कुंज-निकुंज, कूप-बाबड़ी, अरण्य-प्रान्त, रेगिस्तान, मेघ-मालाएँ, बरसते बादल, होरी, रसिया, फाग, आल्हा, सोहर-विवाह, किंबहुना सम्पूर्ण लोक-जीवन ही समाहित है। यही कारण है कि लोकगीतों के उद्गम स्थल के अन्वेषक डॉ. देवेन्द्र सत्यार्थी लिखते हैं-’’ कहाँ से आते हैं गीत? स्मरण-विस्मरण की आँख मिचैली से। कुछ अठ्ठाहास से। कुछ उदास हृदय से। कहाँ से आते हैं इतने गीत? जीवन के खेत से उगते हैं ये गीत।’’6 लोकगीत जनमानस में अत्यंत प्राचीनकाल से परम्पराबद्ध चले आ रहे हैं। इनका गीतकार अनाम हुआ करता है। इसकी परम्परा मौखिक एवं श्रुत हुआ करती है। युग परिवर्तन के साथ-साथ इनमें भी संशोधन एवं परिवर्तन हुआ करते हैं। डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल का मत है-’’ लोकगीत कभी न छीजने वाले रस के सोते हैं। वे कण्ठ से गाने के लिए और हृदय से आनन्द लेने के लिए हैं।’’7 संगीतात्मकता, सरलता, प्रवाहमयता, सरसता, प्रभावकता, स्वाभाविकता, आकृत्रिमता, परम्परानुगतता, लघुता, लोक-भाषा, अनाम रचनाकार, श्रुति परम्परा आदि लोकगीतों की विशेषताएँ हैं।

ब्रज के लोक-गीतों में वहाँ का सम्पूर्ण जीवन प्रतिबिम्बित होता है। ब्रज क्षेत्र के सुख-दुख, आमोद-प्रमोद, आनन्द उत्साह आदि की अभिव्यक्ति इन लोकगीतों के माध्यम से होती है। जनमानस के सर्वाधिक नैकट्य के कारण लोक-जीवन की जैसी सफल अभिव्यक्ति इन गीतों के माध्यम से होती है वैसी नागरिक गीतों के द्वारा सम्भव नहीं है। सम्पूर्ण ब्रज-प्रदेश भक्ति-भावना से ओत-प्रोत तीज त्यौहारों का प्रदेश है। उत्तर आधुनिक युग में भी ब्रज प्रदेश में पारिवारिक आत्मीयता काफी हद तक विद्यमान है, जिसका दिग्दर्शन सामाजिक जीवन में दृष्टिगोचर होता है। यद्यपि सामाजिक परिवर्तन से कोई भी प्रदेश अछूता नहीं रहता, ब्रज भी इससे विलग नहीं है तथापि ब्रज के लोक के कलाकार इन परिवर्तनों के मध्य भी अपनी वाणी से लोक-मानस का श्रृंगार करते रहे हैं। ब्रज के लोक-गीत विविध प्रकार के होते हैं। यथा-संस्कार गीत, ऋतु गीत, धार्मिक गीत, जाति-गीत, श्रम-गीत, कथागीत आदि।

यह भी पढ़ें -  राष्ट्रभाषा हिन्दी और जनपदीय बोलियाँ

शास्त्रों में सोलह संस्कारों का वर्णन है। शास्त्रों से वंचित लोक-मानस भी जाने-अनजाने इन संस्कारों में जीता है। गर्भाधान, पुंसवन, जन्म जनेऊ, विवाह और मृत्यु से कौन वंचित है? प्रत्येक संस्कार हेतु जन-मानस ने विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान और उनके लिए लोकगीत बनाये हैं जो विभिन्न अवसरों पर बड़ेहर्षोल्लास सहित गाये जाते हैं। ये लोकगीत संस्कारों के प्रधान अंग हैं। ब्रज भी इनमें असम्पृक्त नहीं है। यहाँ जन्म से मृत्यु पर्यन्त गीत ही गीत है जिनमें नारी हृदय की वेदना के अनेक दृश्य बिखरे पड़े हैं।

आज हम पुरूष-प्रधान समाज में रह रहे हैं, जहाँ नारी को हीन और पराधीन माना जाता है। यह सब कैसे हुआ इस प्रक्रिया से सभी परिचित है। आर्य संस्कृति में माँ को सर्वोच्च पद दिया गया है। ‘मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, परन्तु इतना विशद पद देकर भी पुरूष ने नारी को अपने अधीन बनाये रखने की व्यवस्था की है। ‘‘जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता वास करते हैं, यह घोषण करके भी उसे बचपन में पिता के अधीन, यौवन में पति की दासी और बुढ़ापे में सन्तान पर निर्भर माना जाता है। किसी ने कभी यह घोषण नहीं की, कि बचपन में पुत्री के समान पुत्र भी माता-पिता पर निर्भर रहता है, यौवन में वह पति के बिना जी नहीं सकता। बुढ़ापे में तो पति-पत्नी एक दूसरे के सच्चे मित्र होते हैं।’’8

वस्तुतः यह सच है कि उत्तर आधुनिकता के इस युग में भी नारी पर अत्याचार हो रहे हैं। प्राचीनकाल से लेकर आज तक नारी किसी न किसी मोड़ पर अत्याचारों को सहन कर रही हैं। लोकगीत इसके जीवंत प्रमाण है, जिनमें नारी वेदना को सहज, सरल शब्दों में मार्मिक अभिव्यक्ति दी गयी है।

ब्रज में पुत्र जन्म के अवसर पर लम्बा अनुष्ठान होता है। गर्भाधान से जन्म के मध्य के समस्त संस्कार जन्म संस्कार के अन्तर्गत आते हैं। सामाजिक मान्यता है कि निपूते का मुँह देखना पाप है। पुत्री बेशक ‘लक्ष्मी’ होती है परन्तु वह तो पराया धन होती है। इसके विपरीत पुत्र ही पार (भव-सागर से) लगाता है। बन्ध्या की चहुँ ओर दुर्गति होती है। उसके लिए तो ताल, पोखर नदी, आदि भी सूख जाते हैं, उधर पुत्रवती के समस्त दोष, गुण में बदल जाते हैं। निःसंतान स्त्री को निपूती कहकर अपमानित किया जाता है इसके विपरीत पुरूष के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जाता। ब्रज के एक लोक-गीत में बाँझिनि, सास-ननद के तानों से खिन्न होकर गंगा में डूबने के लिए चल पड़ती है तो गंगा उसे पुत्रवती होने का वरदान देती है-

राजे गंगा किनारे एक तिरिया, सु ठाढ़ी अरज करै।

गंगा एक लहर हमें देउ तौ जामै डूँबि जैऐ, अरे जामै डूबि जैऐं।

कै दुखरी तोयें सासुरी-ससुर को, कै पिया परदेस।

कै दुःखरी तोयें मात-पिता कै, कै तेरे माँ-जाए वीर।

काए दुःख डूबि जैऐ।

ना दुःखरी मोयें सासुरी ससुर कौ, नाऐं मेरे पिया परदेस

………………………………………..

सासु, बहू कहि नां बोलै, ननद भाभी ना कहै

यह भी पढ़ें -  अफसोस

नाहिं राजे, बे हरि बाँझ कहि टेरें तौ छतियाँ जू फटि गई।

जाई दुःख डूबिहों सों जाई दुःख डूबि हौं।9

गंगा उसे वरदान देती है। वह घर लौटकर बढ़ई से काठ का पुत्र बनवाती है और सूर्यदेव से करूण विनती करती है। देव कठपुतले में प्राण डाल देते हैं। फिर क्या? बधाई बजती हैं और मंगल गान होते हैं और उस नारी का मान बढ़ जाता है-’’ धनि धनि गंगे तोई धनि ऐं, तैने बढ़ाई मेरी मान।’’

बाँझ होने के कारण स्त्री को बाघिन तक मारकर खाना पाप समझती है। उसे डर है कि यदि वह बाँझ को खा लेगी तो वह भी बाँझ हो जायेगी। इस अवधी भाषा के लोकगीत में भी निःसंतान स्त्री की इसी मार्मिक वेदना को अभिव्यक्ति मिली है-

घरवाँ से निकरि बाँझिनिया जंगल बिच ठाढ़ी हो,

रामा वन से निकरी बघिनियाँ वो दुख, सुख पूछइ हो।

तिरिया, कौन विपतिया की मारी जंगल बिच ठाढ़ी हो,

सासु मोरी कहेली बाँझिनिया, ननद ब्रजवासिनी हो।

बाघिन जिनकी में बारी बियाही, उइ घर से निकारेनि हों,

बाघिन हमका जो तुम खाइ लेतिउ बिपतिया से छूटित हों,

जइवाँ से तुम आइउ, लउटि उहाँ जाओ तुमहिं नाहीं खइबइ हों,

बाँझिन, तुमका जो हम खाइ लेबइ हमहुँ बाँझिन होबइ हो।10

बाघिन ही नहीं नागिन भी बाँझ स्त्री को डसने के लिए तैयार नहीं होती। बाँझ को हर समय घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। माँ न बनना स्त्री के लिए सब दुखों से बढ़कर है। जब कोई सन्तान न हो, तो इच्छा होती है कि एक कन्या ही जन्म ले ले, किन्तु जब यह भान होता है कि कन्या तो पराया धन है, तब पुत्र जन्म की ही कामना की जाती है। यथा-

मैं तो पहिले जनौंगी धीयरी,

मेरी जो कोख होय कुलच्छिनी।

जाकी गरजति आवैगी बारात री,

पालिकी चढ़ि आवै साजना।

मेरो घरू जो रितो अरू पेटुरी,

मेरी धीयरी जमइया लै गयौ।

मैं तो बहुरि जानोंगी पूतरी

मेरी जो कोखि होय सुलच्छिनी,

जाकी गरजति जाइगी बराइत री।

पालिकी चढ़ि आवै कुलवधू

मेरो घरू तौ भरौ अरू पेटुरी।

मेरी रूनुक-झुनुक डोलै कुलवधू।’’

ब्रज क्षेत्र में विवाह संस्कार के अवसर पर वर अथवा कन्या की मां अपनी भाई के यहांँ भात न्योतने जाती है। उसके इस निमंत्रण पर भाई विवाह से एक-दिन पूर्व या विवाह वाले दिन अपनी बहन तथा उसके ससुराल पक्षवालों के लिए वस्त्रादि लेकर भात पहनाने जाता है और उचित समय पर भात पहनाता है। भात के लिए बहिन की आँखें अपने पीहर की ओर निहारती रहती हैं। जिस बहिन के भाई नहीं होता है उसके लिए तो यह बहुत ही कारूणिक प्रसंग बन जाता है। ब्रज क्षेत्र में एक ऐसा ही भात का गीत है जिसमें एक बहन के भाई नहीं है लेकिन फिर भी वह अपने पति से आग्रह करती है भात नौतने के लिए जाने को। उसका पति जब कहता है कि तुम्हारे तो भाई नहीं है किसको भात का निमंत्रण दोगी तब वह कहती है कि मेरे पीहर में महुए का पेड़ है जिसको में निमंत्रण दूँगी। देखिए एक बहन की वेदना का गीत-

एसौ री होइ कोई कुमर छत्तिरी, हमैं पीहर पहुँचावे जी,

तुम तौरी गोरी जनम की सोगिनि, तिहारे पीहर कहाएँ जी।

हमरे पीहर एकु महुए कौ बिरवां, बापै भात हम नौतेंजी,

एकु बनु नाखि दूजौ बनु नाखियौं, तीजे बन पीहर पहुँचे जी

रोमत-रोमत महुए ढिंग पहुँची, भइया होइ तौ बोलै जी

कौन बिरन पैरी भातु रे माँगियौ, कौन बिरन की हौ बहिना जी।12

……………………………………………………..

महुए ने उस बहन के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। विवाह की तिथि पूछकर आने का आश्वासन दिया। उसने शर्त रखी कि जब तुम भात पहनो तब महुए के पट्टा (पीढ़ा) पर पैर मत रखना। जब वह भात पहनाने आता है तो पहले वह अपनी सास-ननद आदि परिजनों को भात पहनवाती है। जब उसकी बारी आती है तो वह भूलवश महुए के पट्टा पर पैर रख देती है। फिर क्या होता है उसका भाई गायब हो जाता है। सास-ननद ताने मारती हैं कि भूत कहीं भात पहनाते हैं क्या? इस प्रकार दृश्य बहुत ही कारूणिक बन जाता है। बहन रूदन करने लगती है। उसके मन एक ही मलाल रह जाता है कि जी भरके भाई से मिल न सकी।

यह भी पढ़ें -  औरतों की जिंदगी में अब नही आता बसंत

भारतीय कन्या पराई धरोहर मानी जाती है। विवाह होते ही उसे अपना चिर-परिचत घर और परिवार को छोड़कर जीवन भर के लिए एक दूसरे अनजान घर में चला जाना पड़ता है। बेटी की विदाई के अवसर पर मर्मभेदी व करूणाविगलित करने वाले लोक-गीतों की ब्रज क्षेत्र में भरमार है। प्रत्येक बेटी के माता-पिता का हृदय इन गीतों को सुनकर द्रवित हो उठता है। कारूणिक मनोदशा का जीवन्त चित्र उपस्थित करता एक ब्रज लोक-गीत देखिए-

‘‘छोटे बीरन ने पकड़ी पलकियां

मेरी बहन कहाँ जाइ हो।

छोड़ो बीरन हमारी पलकियां,

हमकूँ तौ छायौ परदेस जी

तुमकूँ तौ छाई बीरन लाल अँटरिया,

हमकूँ तौ छायौ परदेस जी

मइया के रोवे ते नदिया बहति ऐ,

बाबुल के रोवे ते सागर-ताल जी।’’

सामाजिक कर्तव्यों में बँधे माता-पिता भी, जिन्होंने जन्म दिया, पाला पोसा और प्यार के साथ ‘बिटिया’ कहकर पुकारा, उसे अपने पास रखने में अपने को असमर्थ पाते हैं। कन्या अपनी और अपने मांँ-बाप की इस विवशता को भली-भांति समझती है; किन्तु क्या करें उसका हृदय नहीं मानता। बेटी की विदा के अवसर की वेदना की इस लोकगीत में मार्मिक अभिव्यक्ति देखने को मिलती हैं-

तेरा चर्खा सूना होय बाबुल तेरी धीय बिना,

मेरी बहू कातेंगी हे लाड़ो बेटी जाव घराँ।

………………………..

मेरी गाड़ी अटकी रे, बाबुल तेरी गलियों में

दो ईंटें कढ़वा दूँ हे लाड़ो बेटी जाव घराँ।

तुझे बाबुल कौन कहे, बाबुल तेरी धीय बिना

आँसू तो भर आये नैन कि लाड़ो बेटी जाव घराँ।13

वास्तव में बेटी की विदा की स्थिति बड़ी करूणाजनक हो उठती है महाकवि कालिदास कृत ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ में शकुन्तला की विदा के समय महर्षि कण्व कहते हैं- ‘‘आज शकुन्तला विदा होगी। इसलिए मेरा हृदय दुख से भारी हो रहा है। आँसुओं के बहने को रोकने से मेरा गला भर आया है। मेरी दृष्टि चिन्ता के कारण निश्चेष्ट हो गई है। मुझ जैसे वनवासी को शकुन्तला के प्रति स्नेह होने के कारण इस प्रकार का दुख अनुभव हो रहा है, तो गृहस्थ लोग पहली बार पुत्री के वियोग से कितने अधिक दुखित होते होंगे।’’

स्पष्टतः लोक-गीतों का सम्बन्ध लोक-जीवन से होता है। लोक-गीत लोक जीवन के जीवंत चित्र हुआ करते हैं। लोक-जीवन का रहन-सहन, बोली-भाषा, आचार-व्यवहार, शिष्टाचार, धर्म-कर्म, पशु-पक्षी प्रकृति, हर्ष-उल्लास, सुख-दुख, संस्कृति आदि सभी को समाहित किये रहते हैं ये लोक-गीत। सम्पूर्ण ब्रज-मण्डल में लोकगीतों की भरमार है। यहाँ प्रत्येक अवसर के लिए विभिन्न तरह के गीत प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। विभिन्न संस्कारों के अवसर पर गाये जाने वाले ये गीत नारी वेदना को मार्मिकता के साथ अभिव्यक्त करते हैं। इन संस्कार गीतों का सृजनकर्ता कोई पुरूष न होकर अज्ञात महिला समूह ही रहा होगा, जिसके कारण नारी-वेदना के सहज-चित्रों की भरमार इन संस्कारी लोक-गीतों में पग-पग पर मिलती है।

सन्दर्भ-

1. ऋग्वेद – 1.10.7

2. यजुर्वेद – 1.25

3. शुक्ल यजुर्वेद – 6.3

4. डा0 सत्येन्द्र, ब्रज का लोक साहित्य, पृ0-903

5. पोद्दार अभिनन्दन ग्रन्थ में डा0 दीनदयाल गुप्त

6. धरती गाती है – डा0 देवेन्द्र सत्यार्थी, पृ0 178

7. धीरे बहो गंगा – डा0 वासुदेव शरण अग्रवाल, पृ0 9

8. विष्णु प्रभाकरः संस्कृति क्या है, पृ0 51

9. उदघृतः डा0 सत्येन्द्र-पोद्दार अभिनन्दन ग्रन्थ-स0 वासुदेवशरण अग्रवालपृ0 116

10. डा0 गोपाल बाबू शर्माः लोक जीवन में नारी-विमर्श, पृ0 52

11. वही पृ0 57

12. निज संग्रह- अप्रकाशित

13. डा0 गोपाल बाबू शर्माः लोक जीवन में नारी-विमर्श पृ0 35

 

ग्राम$पो0 – उसरम

तहसील- खैर

जिला-अलीगढ़ (उ0प्र0)

मो0- 8126967718

 

Sending
User Review
( votes)

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.