दूसरे दौर की पत्रकारिता और समसामयिक समीकरण

मीडिया और समसामयिक समीकरण विषय पर बातचीत करें तो यह कथन पूर्णतः सत्य होगा कि वर्तमान युग मीडिया का युग है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मीडिया का दखल है ।लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया क्या अपनी निर्धारित भूमिका निभाने में सफल हो रहा है? यह एक विचारणीय प्रश्न है। मीडिया समय समय के साथ नहीं समय के हाथ है ।मजबूत लोकतंत्र की नींव निर्भीक मीडिया ही रख सकता है। इस दृष्टि से आजादी से पूर्व का पत्रकारिता जगत लोकतंत्र की मजबूत नींव आजादी से लगभग 1 70 वर्ष पूर्व 1780 में हिक्की गजट के माध्यम से रख चुका था। वह अलग बात है कि आज मीडिया का उससे बिल्कुल विपरीत रूप दिखाई देता है। वह परतंत्र भारत की पत्रकारिता थी और यह स्वतंत्र भारत की पत्रकारिता यदि भारतेंदु युगीन मीडिया पर दृष्टि डालें तो हम पाते हैं कि स्वयं भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके समकालीन साहित्यकारों ने साहित्यिक पत्रकारिता के नए प्रतिमान स्थापित किए, फिर चाहे वह प्रताप नारायण मिश्र हो या बालमुकुंद गुप्त? यह हिंदी पत्रकारिता का दूसरा दौर था जिसकी शुरुआत 18 77 ईस्वी से मानी जाती है ।यह स्वतंत्र भारत की पत्रकारिता थी ।इस समय 23 मार्च 18 74 को कवि वचन सुधा एक प्रतिज्ञा पत्र भारतेंदु के संपादन में आया ?जिसने साहित्यिक सामाजिक और राजनीतिक जगत में अपना अलग स्थान बनाया । इस टिप्पणी के माध्यम से तत्कालीन पत्रकारिता के सामाजिक सरोकारों को समझा जा सकता है। ” हम लोग सर्वांत दासी सत्र स्थल में वर्तमान सर्व दृष्टा और नित्य सत्य को साक्षी मानकर यह नियम मानते हैं और लिखते हैं कि हम लोग आज के दिन से कोई विलायती कपड़ा नहीं पहनेंगे और जो कपड़ा पहिले से मोल ले चुके हैं और आज की कीमत तक हमारे पास हैं उनको तो उनके हीन हो जाने तक काम में लावेंगे , पर नवीन मोल लेकर किसी भांति का विलायती कपड़ा ना पहिरेंगे। हिंदुस्तान का ही बना कपड़ा पहिरेंगें।(1)

डॉ रामविलास शर्मा स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत का पूरा श्रेय भारतेंदु जी को देते हैं उन्होंने लिखा है कि” कांग्रेस ने अभी स्वदेशी आंदोलन का विधि पूर्वक आरंभ ना किया था, ना बंग भंग आंदोलन ने जन्म लिया था केवल हिंदी में भारतेंदु ने स्वदेशी आंदोलन का सूत्रपात बहुत पहले कर दिया था”2 तत्कालीन पत्रकारिता की प्रतिबद्धता संपूर्ण राष्ट्रीय चेतना और जातीय चेतना का कोई सानी नहीं स्वदेशी आंदोलन को गति देने में भारतेंदु युगीन पत्रकारिता की महती भूमिका है। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में 16 जुलाई 1893 को बाबू श्यामसुंदर दास , रामनारायण मिश्र ठाकुर, शिव कुमार सिंह के महान प्रयासों से काशी में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई। प्रचारिणी सभा का प्रारंभ में राष्ट्रीय एकता और भाषा को प्रमुख रूप से स्वर दे रही थी किंतु यह तथ्य भी स्मरणीय है कि वह एक कुटिल विदेशी साम्राज्य अंग्रेजी सत्ता की दमनीय नीति का भी सामना कर रही थी ।यह समय भारतीय हरिशचंद का समय था इस समय मुख्य समस्या थी देश की आजादी और ब्रिटिश सत्ता से छुटकारा। एक ओर भारतेंदु साहित्य और पत्रकारिता रीतिकालीन साहित्य परिदृश्य बाहर निकलने के लिए छटपटा रही थी। ब्रजभाषा के आवरण से मुक्त होना चाहती थी दूसरी ओर हिंदी गद्य अपना आकार ग्रहण कर रहा था। इस संबंध में डॉ रामविलास शर्मा ने ‘भारतेंदु युग’ में लिखा है कि ‘जिस में तुम्हारी भलाई हो वैसी ही किताबें पढ़ो वैसे ही खेल खेलो वैसी ही बातचीत करो परदेसी वस्तु और परदेसी भाषा का भरोसा मत रखो । अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो”3 आज साहित्य और समाज के प्रति ऐसा आग्रह आज की पत्रकारिता में दूर-दूर तक नजर नहीं आता। भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके समकालीनो की मित्रता ही ब्रिटिश सत्ता की जड़े हिलाने की ताकत रखती थी ।यह युग गद्य निर्माण का युग था । हिंदी की बहुत सी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं का प्रकाशन भारतेंदु युगीन काव्य साहित्यकारों ने प्रजातंत्र की धार पर भारतीय जनमानस के हृदय में क्रांति की लहर पैदा करने एवं राष्ट्रीयता की भावना के विकास हेतु बहुत ही मनोयोग से किया था कवि वचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगजीन ,हरिश्चंद्र चंद्रिका ,हिंदी प्रदीप ,ब्राह्मण ,भारत मित्र ,हिंदुस्तान सांसद निधि आदि महत्वपूर्ण पत्र पत्रिकाएं इसी समय निकले।

इन पत्र-पत्रिकाओं की चर्चा वर्तमान परिपेक्ष में करना आवश्यक हो जाता है। आज मीडिया का जो स्वरूप हमारे सामने है उससे समाज रसातल में जा रहा है ।समाचार पत्रों- पत्रिकाओं और टीवी शो के माध्यम से भाषा और भाव दोनों की आत्मा को तार-तार किया जा रहा है। सांस्कृतिक निरंतर बढ़ रहा है ।सामाजिक सद्भाव निरंतर घट रहा है। राजनीतिक वैमनस्य इतना तीव्र है कि मीडिया समाज में खबरों को छोड़कर केवल सत्ताधारी राजनीतिक धर्म का प्रचारक बनकर रह गया है। शाम 5:00 बजे से रात 12:00 बजे तक समाचार चैनलों पर बिना बजे की बहसों का जो सिलसिला शुरू होता है वह पारिवारिक संबंधों में दरार पैदा कर रहा है। एक दूसरे के ऊपर आरोप- प्रत्यारोप के अतिरिक्त उन चैनलों के पास जनता को देने के लिए कुछ भी नहीं। समाचार संचालक की भाव- भंगिमा को देखकर उसकी हर एक पढ़े-लिखे सामाजिक व्यक्ति के मन में ही पैदा कर देती है। मैं इस आलेख के माध्यम से यह तथ्य प्रकाश में लाना चाहती हूं कि भारतेंदु युगीन पत्रकारिता जिसे हिंदी पत्रकारिता के दूसरे दौर के रूप में जाना जाता है गुलाम भारत की पत्रकारिता थी। भारतीय समय और राजनीति के उत्थान के लिए उसी निर्भीकता और सामंजस्य की आवश्यकता है।

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मैं यहां प्रताप नारायण मिश्र का एक वाक्यांश यहां प्रस्तुत कर रही हूं, जिसके माध्यम से हिंदी लेखकों के द्वारा किए जा रहे हैं स्वदेशी आंदोलन के विषय में अनुमान लगाया जा सकता है — ‘हम और हमारे सहयोगी गण लिखते हैं हार गए कि देशोन्नति करो, यहां वालों का सिद्धांत है कि अपना भला हो देश चाहे चूल्हे में जाएं ,यद्यपि जब देश जुमले में जाएगा तो हम बचे ना रहेंगे। पर समझाना तो मुश्किल काम है ना, सो भाइयों यह तो तुम्हारे मतलब की बात है।(4) इस तरह की निर्भीकता वर्तमान पत्रकारिता में प्रायः कम ही दिखाई पड़ती है। यह पत्रकारिता का दूसरा दौर था यदि इसे पत्रकारिता का द्वितीय अध्याय कहा जाए तो अधिक उत्तम होगा। जहां स्वतंत्र रूप से लिखना दंडनीय था ,विधायिका ,न्यायपालिका और कार्यपालिका के समान मीडिया समसामयिक विषयों पर जनता को जागृत करने का कार्य उसका प्राथमिक कर्तव्य है। किसी देश के लिए और स्वतंत्र निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता का होना बहुत आवश्यक है ।वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी का कथन है कि मीडिया जब तक जनता को साथ लेकर नहीं चलेगी तब तक जनता भी उसका साथ नहीं देगी। यानी मीडिया को जनता के लिए जनता के द्वारा और जनता से ही संचालित होने के पैमाने को अपनाना होगा, किंतु किसी तरह की सत्ता को पाकर व्यक्ति विशेष उसके मद में चूर हो जाता है ।किसी मीडिया हाउस का उद्देश्य किसी पार्टी विशेष का प्रचार प्रसार करना नहीं होना चाहिए ।वर्तमान चुनौतियों से सामना करते हुए हर संभव पारदर्शी नीति अपनाते हुए आगे बढ़ना चाहिए। प्रजातंत्रीय व्यवस्था की गरिमा बनाए रखने के लिए निष्पक्ष कार्य प्रणाली के माध्यम से कार्य करना चाहिए । मीडिया के समसामयिक समीकरण में निरंतर गिरावट के कई कारण है- सबसे पहला कारण है सत्ताधारी राजनीतिक दलों के प्रति झुकाव, सरकार से अधिक से अधिक सुविधाएं प्राप्त करना, सत्ता के मदमस्त हाथी पर झूमते हुए समाचार के नाम पर केवल आधारहीन बहस में जन समुदाय को उलझाना।

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पत्रकारिता हमेशा निर्भीकता की मांग करती है सरकार के द्वारा किए जा रहे जनहित के कार्यों का प्रचार प्रसार करना किसी भी मीडिया हाउस का दायित्व होता है किंतु सरकार के द्वारा गरीब ,मजदूर और बेरोजगार लोगों की समस्याओं को पहुंचाना और उनका समाधान प्रस्तुत करना भी मीडिया का दायित्व होना चाहिए ।

बंगाल गजट भारत का प्रथम समाचार पत्र जो 1780 में प्रकाशित हुआ जिसे हिक्की गजट के नाम से जाना गया। इस पत्र के संपादक जेम्स ओगेस्टक हिक्की का उद्देश्य धन कमाना नहीं था। हिक्की ईस्ट इंडिया कंपनी की दूषित मानसिकता और उसकी छद्म नीतियों का पर्दाफाश करके घोटालों को जनता के सामने ला रहा था उसका यह कदम ब्रिटिश सत्ता को कैसे रास आता??

हिक्की को देश के बाहर निकाल दिया गया। अखबार बंद करवा दिया गया। हिक्की गजट और ओगेस्टक हिक्की अब तक वर्तमान पत्रकारिता के इतिहास में बड़े गौरव के साथ याद किए जाते हैं। “अपने शुरुआती दौर में हिंदुस्तान की मीडिया की भूमिका यह रही है कि वह स्वाधीनता संग्राम के लिए जमीन को हमवार करें उसके लिए खाद का इंतजाम करें इसलिए यह कोई अजब बात नहीं कि हमारे यहां मीडिया पहले आया और उसके बाद स्वाधीनता संग्राम का इतिहास शुरू हुआ”5 गोहर रजा की टिप्पणी तत्कालीन मीडिया के राष्ट्रीय हितों और सामाजिक सरोकारों का सच्चा दस्तावेज है। आर्थिक समस्या की शिकार तत्कालीन मीडिया लड़खड़ा कर चलती रही । विभिन्न विघ्नों को हराकर जन सरोकारों से कभी समझौता नहीं किया ।समाज के यथार्थ को जनता के समक्ष रखना पत्रकारिता का प्रथम उद्देश्य रहा है ।आखिर मीडिया की सार्थक भूमिका क्या होनी चाहिए? क्या आज मीडिया न्यायपालिका की भूमिका मैं है ?लोकतंत्र में मीडिया को अभिव्यक्ति का अधिकार मिला तो क्या लोकतंत्र में मीडिया के कुछ कर्तव्य नहीं है? अधिकार और कर्तव्य का यही असंतुलन सामाजिक सरोकारों की नींव कमजोर कर रहा है। केवल और केवल राजनीतिक मुद्दों पर बात मीडिया के एक पक्षीय प्रतिबद्धता का द्योतक है ।स्त्री समस्या ,महंगाई, बेरोजगारी सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं को जनता के बीच ले जाने के लिए भी मीडिया को हमेशा तत्पर रहना चाहिए। महात्मा गांधी ने लिखा है कि खबर का क्या अर्थ है मैं नहीं चाहता कि जनता को हर दिन बिना वजह की खबरें मिले, जिससे उनके मस्तिष्क में आपसी वैमनस्य, रोज छीना झपटी चोरी और आपसी झगड़ों को जनता के सामने परोसना मीडिया का कार्य नहीं। उसका कार्य जीवन मूल्य और सांस्कृतिक संवर्धन हेतु कार्य करना है। पर्यावरण चेतना सामाजिक यथार्थ विकास के मुद्दे और सकारात्मक खबरों का संपादन मीडिया के स्वस्थ स्वरूप की पहचान है। मुझे यह बात कहने में जरा भी संकोच नहीं कि मीडिया को पूंजीवाद ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। ग्राउंड जीरो की रिपोर्टिंग करके जनता के सामने सच को लाने का कार्य कौन करेगा? स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए फैशन, क्राइम और क्रिकेट की चारदीवारी के बाहर सामान्य जनमानस की भूख ,बेरोजगारी और कुपोषण की तस्वीरों को सरकार के सामने लाना होगा। आज भी कुछ पत्रकार हैं जो जनता के सामने सरकार की नीतियों की चर्चा भी करते हैं उनके कार्यान्वयन की बात भी करते हैं साथ ही जनता के जमीन जमीनी मुद्दों को भी उठाते हैं किंतु उनकी संख्या लगातार घट रही है ।जरूरत है बड़े-बड़े टीवी चैनलों और अखबारों को सत्ता के मोह से अलग होने की जिससे वे समसामायिक समीकरण को सही दिशा दे सके। आज प्रभाष जोशी, रामशरण जोशी ,मृणाल पांडे की पत्रकारिता को अब्बल दर्जे में क्यों शामिल किया जाता है? उसका कारण है उनकी सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता रवीश कुमार को जनता पसंद करती है ?वह जनता के सवालों को उठाते हैं। जनता से सीधे संवाद करते हैं। यदि हम इन पत्रकारों की बात करें तो संजय द्विवेदी का यह कथन सर्वथा सत्य प्रतीत होता है कि” नई तकनीक और संचार साधनों ने जिस तरह हमारे समय को प्रभावित किया है वह अद्भुत है। हमारे आचार विचार व्यवहार सब में वे चीजें देखी जा सकती हैं। इसे प्रभावित करने में सबसे सशक्त माध्यम के रूप में उभरा है मीडिया ।”6 यह कहना अतिशयोक्ति ना होगा कि मीडिया आज के समय की मनमोहक छवियों की प्रस्तुति का मंच बन गया है ।समय का बदलाव नियमित चक्र के साथ आगे बढ़ता है, निश्चित ही उसी समय चक्र में मीडिया के इस स्वरूप पर अपना प्रभाव छोड़ा है । परिवर्तन विकास के नए प्रतिमान स्थापित करता है ।तकनीकी विकास की बात छोड़ दें तो मीडिया के स्तर में लगातार गिरावट आई है ।अखबारों की रूपरेखा खासतौर पर उनकी भाषा का स्तर निरंतर रसातल में जा रहा है । टीवी चैनलों की भाषा, परिभाषा ,भाव भंगिमा से कौन परिचित नहीं। मीडिया जगत में निश्चित ही परिवर्तन का नया दौर चल रहा है किंतु यहां नकारात्मक परिवर्तनों की झड़ी दिखाई देती है। यहां पर एक विचारणीय प्रश्न है कि मीडिया आधुनिक सामाजिक व्यवस्था के लिए वरदान है या अभिशाप ? एक ओर नई तकनीकी विकास की गति है तो दूसरी ओर सामाजिक राजनीतिक सरोकार मीडिया के किस पक्ष के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। मीडिया ने पूरे विश्व को ग्लोबल ग्राम में परिवर्तित कर दिया है। वसुधैव कुटुंबकम की भावना को झोले में डालकर सामाजिक समरसता की किताब को नई जिंद में बांधकर आज का मीडिया समय के हाथ है ना कि समय के साथ । सामाजिक सरोकारों का भद्दा मजाक बनकर रह गया है आज का मीडिया। इन प्रश्नों का जवाब मिलना मुश्किल है।

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संदर्भ सूची

1.उद्धृत हिंदी पत्रकारिता कृष्ण बिहारी मिश्र रामविलास शर्मा भारतेंदु पृष्ठ संख्या 116

2.वही 16-17

3.भारतेंदु युग रामविलास शर्मा पृष्ठ 11

4.हिंदी साहित्य का इतिहास रामचंद्र शुक्ल पृष्ठ 453

5.मीडिया और जनतंत्र संपादक रमेश उपाध्याय व संज्ञा उपाध्याय 2012 पृष्ठ 34

6.मीडिया शिक्षा मुद्दे और अपेक्षाएं संजय द्विवेदी पृष्ठ 10

Dr Saroj Kumari, Assistant professor, Department of Hindi, Vivekananda CollegeUniversity of Delhi8587037978

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