समीक्षा/ जिंदगी की जद्दोजहद और दुश्वारियों का आईना है उपन्यास ‘’मैं शबाना’’

-फारूक आफरीदी

मुस्लिम परिवेश और उसमें भी महिलाओं की स्थिति को लेकर हिंदी उपन्यास यों तो पहले भी खूब लिखे जाते रहें हैं किन्तु युसूफ रईस का ताजा उपन्यास ‘’मैं शबाना’’ मुस्लिम औरत की जद्दोजहद भरी जिंदगी से सीधा रूबरू कराता है। यह रईस का पहला ही उपन्यास है लेकिन इसकी भाषा शैली, कथ्य और शिल्प से ऐसा नहीं लगता कि वह किसी स्तर पर कमजोर है।

शबाना इस उपन्यास का मुख्य किरदार है और सारी कथा इसके इर्दगिर्द ही घूमती दिखाई देती है।इसकी कथा को कुछ इस तरह बुना गया है जिसके जरिए मुस्लिम स्त्रियों के अधिकारों पर कुठाराघात, उनके प्रति समाज के गैर जिम्मेदार और उपेक्षापूर्ण रवैये और सामाजिक सोच को बखूबी समझा जा सकता है।उपन्यासकार ने इसे आज के तीन दशक पहले के हवाले से रचते हुए मौजूदा दौर तक ला खड़ा किया है।

शबाना एक अच्छे खासे खाते-पीते जागीरदार परिवार की महिला है।उसकी तालीम और परवरिश भी उसी के अनुरूप हुई और व्यस्क होने पर एक बराबर के ही खानदान के नौजवान असलम से उसका निकाह हो जाता है । वह अपने होने वाले शौहर और उसके खानदान के बारे में पहले से कुछ नहीं जानती । शादी से पहले वह अपनी माँ से सवाल पूछती है- ‘’मैं जिस घर में जा रही हूँ, वहां के लोग कैसे हैं ? क्या मुझे ये जानने का हक़ नहीं था ? आपने मेरे हक़ में बेहतर ही किया होगा लेकिन मैं कोई बेजान खिलौना तो नहीं;जिसे आप सजा कर जिसे चाहें सौंप दें?’’ माँ जवाब देती है- ‘’ये औरतों की बदकिस्मती है कि वो अपनी जिंदगी का कोई फैसला नहीं कर सकती है।‘’ शबाना का शक सही निकलता है क्योंकि ससुराल पहुँचने पर उसे पता चलता है कि जिससे उसका निकाह हुआ वह शख्स किसी दूसरी लड़की से मोहब्बत करता है मगर उसकी मर्जी को तवज्जो देने का तो वहां कोई रिवाज ही नहीं था। सुहागरात के दिन से ही उसके और शबाना के बीच दांपत्य जीवन के वे तार नहीं जुड़े जिनकी दाम्पत्य जीवन की नींव में जरुरी दरकार होती है। इससे शबाना बिलख पडती है किन्तु उसने प्रण कर लिया है कि वह एक दिन असलम का दिल जीतने में कामयाब हो जाएगी।उसे अपनी फूफी जान की यह बात याद आ गई कि ‘’मर्द भले ही दिन भर काबू में ना आए लेकिन बिस्तर पर उसे शीशे में उतारा जा सकता है।’’ मगर उसे वह तरकीब मालूम ना थी। संयोगवश इन कोशिशों के बीच शबाना की माँ के दुर्घटना के हादसे ने दोनों को एक दूसरे के करीब लाने में मदद की जिससे दोनों में मोहब्बत के पुष्प पल्लवित होने लगे। माँ की दुर्घटना के दौरान ही शबाना को अपने और पराए के बीच के रिश्तों की पहचान होती है । घर में उसके मूक बधिर छोटे भाई जुबैर की देखभाल करने को लेकर चिंता और गहरी हो जाती है । एक भाई अपनी पढाई में मशगूल है ।ऐसे ही समय में शबाना अपने ससुराल की एक अजब कहानी से भी रूबरू होती है। असलम, उसके पिता और बड़े भाइयों में आपस में सदभाव का कोई रिश्ता ही नहीं है। सब अपने-अपने फायदों के लिए जी रहे हैं। सब एक बड़ी हवेली में तो जरूर रहते हैं लेकिन उनके दिलों में अप्रत्यक्ष दीवार खींची हुई है।किसी का भी एक दूसरे से सलाम दुआ के अलावा कोई वास्ता नहीं है। शबाना की चूंकि सास नहीं है इसलिए उसके ससुर ने ही बहुओं को रसोई की जिम्मेदारी बाँट रखी है और वे ही तमाम फैसलों के खुद मुख़्तार हैं। ऐसे में शबाना अपने ससुराल में ‘’उस गुलदान की तरह थी, जो घर के एक कोने में नुमाइश के लिए तो रखा जाता है, लेकिन उसमें कभी फूल नहीं सजाए जाते हैं।‘’

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शबाना को अपनी जेठानी के जरिये यह बात मालूम होती है कि उसके सबसे बड़े जेठ जुल्फिकार चरित्र के मामले में हद दर्जे तक गिरे हुए एक गलीच किस्म के इन्सान हैं और अपनी ही साली तक को हवश का शिकार बना चुके हैं, जिसने बाद में आत्म हत्या कर ली और इसके बाद उनकी पत्नी उन्हें छोड़कर हमेशा-हमेशा के लिए उनकी जिंदगी से जा चुकी है। यह सुनकर शबाना बुरी तरह घबरा जाती है । वह जब दुल्हन बनकर हवेली में आई तभी से जुल्फिकार उस पर बुरी नज़र रखने लगे, लेकिन वह उससे बचने की हर चन्द कोशिश करती रही ताकि कोई अनहोनी ना हो जाए। सब कुछ पटरी पर चल रहा होता है और उसको पहला बच्चा भी हो जाता है किन्तु शबाना की किस्मत को कुछ और ही मंजूर था और एक दिन अचानक मौका पाकर जुल्फिकार अपनी अश्लील हरकत कर बैठता है ।शबाना इस घटना के बाद भीतर तक आहत हो जाती है । सौहर असलम ने जब यह किस्सा सुना तो वह अपने भाई की जलील हरकत पर इतना आग बबूला होता है कि काटो तो खून नहीं लेकिन शबाना उन्हें ऐसा कोई कदम उठाने से रोक लेती है जिससे उनकी रुसवाई हो। इस घटना के बाद जुल्फिकार घर से नदारद हो जाता है। इस स्थिति में दोनों अगले ही दिन हवेली छोड़ने का फैसला कर लेते हैं । अन्य व्यवस्था होने तक असलम अपनी पत्नी शबाना को उसके पिता के घर छोड़ आते हैं और किराये का घर तलाशने निकल पड़ते है। वे घर तलाश भी कर लेते हैं लेकिन वह इतना जर्जर होता है कि उसमें दाखिल होने से पहले ही छज्जे से गिरकर उनकी मौत हो जाती है। इस तरह शबाना पर यह दूसरा पहाड़ टूट पड़ता है। इसके बाद तो शबाना के लिए जैसे क़यामत ही आ गई।

उपन्यास की भाषा, शैली, कथ्य और शिल्प को लेकर कहा जा सकता है कि उपन्यासकार ने बहुत सावधानी बरती है। भाषा की रोचकता इतनी प्रभावी बन पड़ी है कि पाठक एक बार पढ़ना प्रारम्भ कर दे तो उसे बीच में छोड़ना नहीं चाहेगा। उपन्यास इस खूबी से भरा हुआ है कि पाठक की उत्सुकता निरंतर बनी रहती है कि उसमें आगे क्या होने वाला है। उपन्यास की एक विशेषता यह भी है कि वह अनुमान नहीं लगा सकता कि उसका अंत कैसे और कहाँ होगा अन्यथा कई फिल्मो को देखते हुए या उपन्यासों को पढ़ते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कहानी अब क्या मोड़ लेने वाली है। उपन्यास चूँकि मुस्लिम परिवेश से जुडा हुआ है तो स्वाभाविक है कि मुस्लिम समाज के रीति रिवाजों और संस्कारों से भी परिचित कराता है। इस उपन्यास में नायिका को लेकर कई मोड़ आते हैं जो उसकी त्रासदी से जुड़े हुए हैं। यह उपन्यास मूलतः नायिका के विषादों और आंसुओं की गाथा है जिसमें खुशियों के पल तो कभी कभार रेगिस्तान में बारिश की आंधी भरी बूंदों की तरह आते हैं।उपन्यास की नायिका के जीवन में दुखों के पहाड़ ही पहाड़ खड़े हैं। जीवन में कहीं यदि नदियाँ हैं भी तो वे भी एकदम सूखी हुई हैं । नायिका की बागडोर ऊपर वाले के हाथ में है और उसे संघर्षों से निरंतर जूझते हुए दरिया को पार करना है। कभी-कभी उसे किसी तिनके का सहारा भी मिल जाता है जिसकी वह कल्पना भी नहीं कर सकती।उसे अपनी अस्मिता को बचाए रखने के लिए पग-पग पर इम्तहान से गुजरना पड़ता है।उसके लिए ना कोई रिश्ते हैं ना नाते। जीवन में उसे शून्य बिंदु से आगे बढ़ना है और जीने के लिए खुद ही को नए रिश्ते गड़ने हैं। हर मोड़ पर उसे एक अंधी गली से गुजरते हुए अपनी मंजिल तलाश करनी है। उसे अपनी बदनसीब जिंदगी को नसीब में बदलने की आकांक्षा के साथ बिना थके एक तपते हुए रेगिस्तान में मीलों चलना और अपना बिना किसी मार्गदर्शक या सहारे के अपना गंतव्य तलाशना है। नायिका कई बार टूटती-बिखरती है। अपने वुजूद को मिटाकर समाज की दर-दर ठोकरें खाने और फिर संभलते रहना ही उसकी नियति है। उसे अपनी जिन्दगी से कोई प्यार या लगाव नहीं रह गया है अपितु वह अपने दो बच्चों के भविष्य को संवारने के यज्ञ में आहुति दे रही है। उसकी जीवटता और जिजीविषा ही उसे जिन्दा रखे हुए है। वह हारती नहीं है जबकि जिंदगी और समाज उसे पल-पल हराने की हौड़ में लगा हुआ है।जिंदगी के खौफनाक हादसे शायद उसका हर वक्त इम्तहान लेते रहते हैं किन्तु वह हर बार लडखडाती हुई उठ खड़ी होती है। उसने अपने सारे सुखों को एक गठरी में बांधकर मानो समंदर में फेंक दिया है।

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‘’मैं शबाना’’ का एक दर्दनाक पहलू यह भी कि है जब पिता के चाहने पर अपनी विधवा पुत्री को वे अपनी जमीन जायदाद का एक चौथाई हिस्सा देना चाहते हैं तब सगा भाई कदीर और भाभी ताहा उसके दुश्मन बन जाते हैं और दबाव बनाकर उस दुखयारी बहन से अपना हक़ छोड़ देने के कागजातों पर दस्तखत करवाकर उसे घर से बेदखल तक कर देते हैं । अपने ससुराल हारी और धक्के खाने के बाद उसे अपने उस घर से भी निकाल दिया जाता है, जहाँ वह पैदा हुई,पली-बढ़ी हुई और ससुराल गई। इससे बड़ा सदमा एक औरत के लिए और क्या हो सकता है। यह सदमा भी उसने रोते बिलखते झेला लेकिन किसी को उसक हालत पर रत्ती भर तरस नहीं आया। अपने पिता और भैया भाभी के होते हुए भी उसे फिर एक अँधेरी गुफा की तरफ बढ़ना पड़ा जहाँ उसके सामने कोई राह नहीं थी। जिंदगी की उधेड़बुन में वह बिना कुछ सोचे समझे एक ट्रेन में चढ़ जाती है जिसमें हाथ की कारीगर कुछगरीब परिवार की देहाती महिलाएं सफ़र कर रही होती हैं । शबाना उन्हीं के बीच संवाद बनाकर अपनी जिंदगी की अगली राह चुनने लगती है।वह अपने सारे अरमानों को यादों की संदूक में कैद कर एक साधारण मजदूर बनकर उनके साथ रहने लगती है, जिसमें उन अनपढ़ और गंवाई महिलाओं का उसे भरपूर सहयोग मिलता है। यहीं उसे अकेले जीने का बड़ा हौसला मिलता है। यहीं उसे इस बेदर्द दुनिया से अपनी भाषा और शैली के साथ अपना जीवन जीने का सलीका मिलता है। अंतत वह एक स्लम बस्ती में अपना डेरा डाल कर अपने बच्चों की परवरिश करने लगती है।उसने यहाँ रहकर फिर पलटकर कभी अपनी पिछली जिंदगी की ओर नहीं झाँका। अभावों की जिंदगी को ही वह अपनी ताकत लेती है।

एक बार नायिका अपनी बेटी के गंभीर रूप से बीमार हो जाने पर उसका जीवन बचाने और इलाज के लिए अपने जीवन का सौदा तक करने को भी राजी हो जाती है, हालाँकि उसके साथ ऐसा वैसा हादसा नहीं होता है जिसकी कल्पना करना औरत लिए भयावह है। बावजूद इसके उसके द्वारा हाँ कहना ही उसकी जिंदगी का नासूर बन जाता है जिसकेके पश्चाताप की आग में जलते हुए वह अपनी जवान युवती के लिए मौत का फंदा बन जाती है। यह उसके जीवन की सबसे घातक और दर्दनाक और जीवन भर सालते रहने वाली घटना के रूप में सामने आती है जो उसके जीते जी अवसाद भरी है। यह ऐसी दुर्घटना है जो उसको हमेशा के लिए किसी अंधे कुए में धकेलने जैसी साबित होती है। नायिका ने अपने बच्चो के भविष्य को लेकर जिन अरमानों के साथ जिंदगी की लम्बी जंग लड़ी, बिटिया को पढाया-लिखाया और जवान किया उसके हाथ पीले नहीं कर सकी और हमेशा के लिए उसे खो दिया। जिंदगी भर जो औरत वह बड़े से बड़े और कड़े से कड़े इम्तहानों में पास होती रही वही अपने आखिरी इम्तहान में हार गई।

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यह उपन्यास आज के समाज के नंगे सच को बयान करता है। इस नंगे सच से मुस्लिम समाज की अनेक शबानाएं ही नहीं बल्कि भारतीय समाज की अन्यानेक औरतें भी इन्हीं हादसों से गुजरती हैं। समाज भले ही आधुनिकता का दावा करे किन्तु औरतों के प्रति हमारी धारणाएँ आज भी बहुत अधिक नहीं बदली हैं। महिलाओं के हितों पर आज भी जबरदस्त कुठाराघात होता है जिसका खामियाजा उनके मासूम और बेकसूर बच्चों को भी भुगतान पड़ता है। हमारे सारे नियम भले ही महिला और बाल अधिकारों की वकालत करते हों, लेकिन उनको वास्तविक अधिकारों की प्राप्ति अभी भी दूर की कौड़ी है। समाज में बदलावों की गति अभी भी बहुत मंथर है।ऐसे में पीड़ित महिलाएं या तो अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेती हैं या नारकीय जीवन जीने को विवश हैं। पुरुष सत्तात्मक समाज का घिनौना चेहरा इस उपन्यास में साफ साफ नज़र आता है।

उपन्यासकार युसूफ रईस ने ‘’मैं शबाना’’ के जरिये समाज के रीति रिवाजों की बजाय मनुष्य के चेहरे के पीछे छिपे चेहरे को बेनकाब करने की कोशिश की है । इन अर्थों में यह उपन्यास झकझोर देने वाला है। यह उपन्यास इन मायनों में भी महत्वपूर्ण है कि इसमें कहानियों का कोई गुम्फन भर नहीं है बल्कि नायिका को केंद्र में रखकर आगे बढ़ता जाता है और समाज के ओछेपन, टुच्चेपन, स्वार्थ, अहंकार और हीनता की परत दर परत खोलता है। यह उपन्यास सम्पूर्ण समाज को निश्चय ही उद्वेलित करेगा और पाठक इसका ह्रदय से स्वागत करेंगे।

शबाना एक थकी हारी महिला के रूप में अपनी जिंदगी से निहत्थी रहकर अकेली लड़ाई लड़ती हुई प्रतीत होती है। ‘’मैं शबाना’’ जीवन से हारी हुई एक बेसहारा औरत उथल-पुथल और संघर्ष भरे जीवन की अमर गाथा है जो हारकर भी जीती है। उसकी हार समाज और व्यवस्था की हार नहीं बल्कि उस पर एक तमाचा है।यह एक यथार्थपरक उपन्यास है जो पाठक को बार-बार रुला देता है और यही इसकी एक बड़ी कामयाबी है। आज जब साम्प्रदायिकता को लेकर अनेक चुनौतियां हैं तब यह उपन्यास इसे ख़ारिज करता हुआ कहता है कि असली चुनौती, गरीबी, भूख हाशिये पर जा चुके परिवारों को संबल प्रदान करने की है जिन पर किसी का ध्यान नहीं जाता। सामाजिक समानता के ढोंग और इन्सान की घटिया सोच इसके लिए जिम्मेदार है। ये चुनोतियाँ महिलाओं की दशा को लेकर और भी भयावह हैं।

फारूक आफरीदी, बी-70/102, प्रगति पथ,बजाजनगर,

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ईमेल: faindia2015@gmail.com

farooqgandhi@gmail.com

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मैं शबाना : उपन्यास

संस्करण: 2018 पृष्ठ: 182 मूल्य 199 रु.

प्रकाशक ; नोशन प्रेस ओल्ड नंबर 38,

न्यू नंबर 6, मेक निकोलस रोड़, चेटपेट,

चैन्नई-600031

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