दंगों की व्यथा-कथा का मर्मस्पर्शी पाठ

पुस्तक-पिघले चेहरे (उपन्यास)
लेखक- सच्चिदानंद चतुर्वेदी
प्रकाशन-2018
प्रकाशक-अमन प्रकाशन,104A/80c,
रामबाग, कानपुर-208012
मूल्य-395

भारतीय राजनीति, धर्म और साम्प्रदायिकता का त्रिकोण ऐसा है जिसकी नाप-तोल सरल नहीं और ना ही खतरों से खाली है। ‘अधबुनी रस्सी-एक परीकथा’, और ‘मझधार’ के बाद सच्चिदानंद चतुर्वेदी का ‘पिघले चेहरे’ 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों पर लिखा गया नया उपन्यास है जो राजनीति और धर्म की आड़ में खेले जा रहे साम्प्रदायिकता के खेल की नब्ज की सही टटोल के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार, सिख हिस्ट्री और 1984 के घटनाक्रमों पर केंद्रित कई पुस्तकों के अध्ययन के पश्चात रचा गया है।( पुस्तकों की सूची लेखक ने आभार में ही दे दी है जो उपन्यास की शोधपरकता को प्रमाणित करते हुए इसे और अधिक मजबूत बनाती है।) संवेदनशील मन और वैचारिक दृष्टि का तालमेल इस उपन्यास में एक नई किस्सागोई रचता है। उपन्यास को पढ़ते समय पाठक को यह एहसास बना रहता है कि वह जिस कथा संसार में प्रवेश कर चुका है, वहां ग्रामीण और नगरीय जीवन के अनुभवों की एक गहरी बुनावट है और उस बुनावट की नींव में बिना किसी लाउडनेस के सत्ता समीकरणों की प्रश्नाकूल पड़ताल है। पर क्या यह उपन्यास केवल 1984 तक सीमित है? नहीं, इस समाज व्यवस्था में जब तक राजनीतिक स्वार्थ हैं, जब तक दंगें इन स्वार्थों की पूर्ति का ईंधन हैं, जब तक मनुष्य में पशुत्व है, तब तक यह उपन्यास सामयिक है। क्योंकि सामयिकता लेखक के दृष्टिकोण और घटना या समस्या को वैज्ञानिक  क्रम में खंगालने से जुड़ती है और यह उपन्यास तो अपने परिवेश में एक बड़ी सच्चाई को लेकर चलता है। लेखक कहता है, ‘दंगों के दौरान जो सिख मारे गए हैं, वे वास्तव में मारे नहीं गए हैं, वरन प्रजातंत्र द्वारा ठगे गए हैं, और अपने ही देशवासियों के विश्वासघात का शिकार हुए हैं।’ (पृ.105)

इस उपन्यास में रचनाकार प्रजातांत्रिक व्यवस्था के राजनीतिक, धार्मिक,  प्रशासनिक, न्यायिक, सामाजिक, आर्थिक क्षेत्रों में व्याप्त विकृतियों और उनके दुष्परिणामों को ना केवल बखूबी रेखांकित करता है बल्कि पलटन बाबा, मास्टर रुद्रदेव, नन्दा  कौर आदि के विचारों एवं उनकी गतिविधियों के माध्यम से उन मानवीय मूल्यों को भी सहेजता है, जिससे मनुष्य में मनुष्य का विश्वास बना रहे। जाहिर है, इस विश्वास को कायम रखना आसान नहीं और तब तो और भी नहीं जब धर्म का नाम लेकर भड़काए दंगों में जीवन को बचाए रखना ही बड़ी चुनौती हो। लेकिन बावजूद इसके लेखक का विश्वास है कि आपसी सौहार्द और बंधुत्व-भाव, पक्के इरादे और अंतहीन संघर्ष ही मानवीय मूल्यों को बचाए रखने के उपादान बन सकते हैं।

कृपाचार्य बाजपेई, विधायक दुर्जन सिंह और आचार्य धर्माधिकारी जैसे चरित्रों के माध्यम से लेखक प्रजातांत्रिक व्यवस्था में व्याप्त अवसरवाद और राजनीति के अपराधीकरण तथा साम्प्रदायिकता की पूरी मानसिक प्रक्रिया पर खुलकर विचार करता है। इस व्यवस्था में  देवदत्त जैसे चरित्र का जुड़ जाना स्वभाविक है। ‘मुसलमान हिन्दुओं के दुश्मन होते हैं’ (पृ.21) वाली सोच से संचालित होकर बचपन में ही रहमान चाचा को मौत के घाट उतार देने वाला देवदत्त उपन्यास के अंत तक एक खलनायक के रूप में उभरता है। देवदत्त की बहन देवयानी का चरित्र स्त्री-स्थिति पर विचार करने को विवश करता है तो समाज में आदर के साथ देखे जाने वाले मास्टर लोगों के चरित्र का भंडाफोड़ ठाकुर जगमोहन और उसके आसपास बुने कथा प्रसंगों से होता है।

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उपन्यास में लेखक 1984 के समाज और उसकी व्यवस्था के प्रायः सभी प्रमुख प्रश्नों से टकराता है। साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक मनोवृति के कुत्सित चरित्र तथा उसके प्रतिरोध को उभारने में पूरी सफलता पाता है। लेखक के मन, मस्तिष्क में एकदम स्पष्ट है कि साम्प्रदायिकता धार्मिक संकीर्णता के माध्यम से छुटभैए नेताओं से लेकर कांग्रेस जैसी पार्टियों के लिए एक राजनीतिक कार्यक्रम है और जटिल एवं कुटिल स्वार्थ पर आधारित स्पर्धा ने समय-समय पर साम्प्रदायिकता की आग में मनुष्य की गरिमा एवं अर्थवत्ता का गला घोटा है। इस घृणा ने प्रतिशोध, लूटपाट, दंगों और हत्या को जन्म दिया है। इसमें निहित ‘अन्य’ की वैचारिकी ने अचानक से पड़ोसियों के संबंधों तक हो अनुदार बनाया है। उपन्यास से एक बानगी प्रस्तुत है, “मास्टर साहब को देखकर ठाकुर साहब उत्साहित होकर बोल उठे-‘… आप तो चंडीगढ़ वालों के यहां बहुत दिनों से ट्यूशन पढ़ा रहे हैं, इसलिए उनके घर की कुछ अंदरूनी बातें भी जानते होंगे? उनके घर पर चढ़ाई करने में आप हमारे बड़े काम आ सकते हैं।… यह सब भिंडर वाले हैं, इनका कानपुर से सफाया होना बहुत ही जरूरी है।’” (पृ.98)

वास्तव में, उपन्यास के फलक का भौगोलिक विस्तार तो कन्नौज से लगभग 4 मील दूर गंगा नदी के दक्षिणी तट पर बसे एक बहुत छोटे से गांव बागसर से शुरू होकर कानपुर और शाहजहांपुर तक जाता है किंतु इसका वैचारिक भूगोल काफी विस्तृत और राष्ट्रीय है। पंजाब, दिल्ली, कानपुर, बोकारो आदि शहरों में हुई सिखों की हत्या और लूटपाट के प्रसंग इसके वैचारिक भूगोल के दायरे का विस्तार करते हैं। बागसर के एक निर्धन भक्त नामक ब्राह्मण के परिवार, विशेष रूप से उसके दो बच्चों देवदत्त और देवयानी के आसपास से निर्मित  हुई कथा का ताना-बाना इब्राहिम पट्टी के रहमान चाचा से होते हुए सुल्तानपुर निवासी, बकौल कृपाचार्य बाजपेई चमट्टा बभ्रुवाहन और देवयानी के पति लोमहर्ष से होते हुए मास्टर रुद्रदेव के बेटे सत्यदेव और नन्दा कौर के विवाह तक को समेटता है। पर कथा सूत्रों में ना तो कहीं कोई फांक है और ना ही टूटन। कथा को गुँथने में लेखक को अद्भुत सफलता मिली है।

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इस उपन्यास में पठनीयता एक अंतर्धारा की तरह आद्योपांत व्याप्त है। ‘विपन्नता वैसे भी कभी किसी गांव में ऊपर छलकती दिखाई नहीं पड़ती, उसी प्रकार जैसे  घर का कवाड़ कभी बैठक में नहीं दिखाई पड़ता।’ (पृ.10) या ‘पर वे शायद यह भूल गए थे कि सपने केवल सपने होते हैं और एक हल्के से हवा के झोंके से मकड़ी के जाले की भांति टूट जाते हैं।’ (पृ.16) जैसे कलात्मक वाक्यों से होते हुए उपन्यास अपने अंतिम कथन- ‘सुना है कि तिलचट्टे लाखों साल जीवित रहते हैं। यदि वह सही है तो हमारे देश के प्रजातंत्र को अभी लाखों साल तक कोई खतरा नहीं है।’ में भीषण हो चुकी राजनीतिक सच्चाई से पर्दा उठता है। सही है कि धर्म, साम्प्रदायिकता, दंगे, हत्याएं, लूटपाट और आगजनी की राजनीति करने वाली पार्टियां आज हमारे राष्ट्रीय फलक पर ज्यादा प्रभावी हैं।

‘पिघले चेहरे’ के लेखक में चित्रण करने और सवाल उठाने की अद्भुत कला है। यूं तो पूरे उपन्यास में जहां-जहां दृश्यों, स्थितियों, दंगों षड्यंत्रों और तिकड़मों का चित्रण किया है, वे सभी स्थल ध्यान आकर्षित करते हैं लेकिन पाठक का विशेष ध्यान वहां जाता है जहां लेखक दंगे शुरू होने के बाद बागसर आने वाले रास्ते पर खड़े ट्रकों के सिख ड्राइवरों की सुरक्षा के लिए तत्पर गांव वालों के प्रसंग के संदर्भ में नगर और शहर का अंतर वर्णित करता है। वह लिखता है, ‘नगर लोगों की पीढ़ी के अलावा और कुछ नहीं होते। इंसानियत वहां मरुस्थल में जल की भांति सूख जाती है। वहां के अमीर और गरीब इंसान न रह कर, भावना-शून्य यंत्र बन जाते हैं, जो पदे-पदे भावनाएं रखने का ढोंग रचते हैं। नगर और गांव के गरीबों और उनकी गरीबी में कोई अंतर नहीं होता, अंतर होता है, उनकी पहचान का। नगर के गरीब देश की जनगणना के आंकड़े मात्र होते हैं, जिनकी कोई पहचान नहीं होती। लेकिन गांव के गरीबों की गरीबी अपने में स्वयं एक पहचान होती है। वह गांव भर का चाचा-ताऊ वगैरा होता है। इसीलिए नगर के पहचान खोए हुए  गरीब कुंठा और अवसाद में डूबकर, अपनी ही प्रजाति के लोगों को निगलने के लिए तत्पर हो जाते हैं। यही लोग राजनीतिक दलों के इशारे पर नाचते हैं।’ (पृ.111) निश्चित तौर पर यह अंतर ग्रामीणों की मानवीयता और नगर के लोगों में पसरी संवेदनहीनता के कारणों तथा परिणामों पर बड़ी टिप्पणी बनता है और इतनी तार्किकता के साथ आता है कि इसे लेखक का नॉस्टेलजिया कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार पृ. 104 पर आया अपराध और दंगे का अंतर लेखक की सूक्ष्म विश्लेषण शक्ति और सामाजिक बोध का परिचय देता है।

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उपन्यास में देवयानी और नन्दा कौर समाज में स्त्री-स्थिति की प्रतीक बनकर उभरती हैं। ‘अबला तेरी यही कहानी’ की टेक पर जीवन जीती देवयानी कभी पिता की ‘चिट्ठी लिखना-पढ़ना भर सीख ले’ वाली आकांक्षा पूरी करने, कभी पति की लखपति बनने की प्रतिज्ञा पूर्ती में सहायता हेतु एल.एल. बी. के लिए लखनऊ जाने, कभी वकालत करने, कभी बार काउंसिल के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने, कभी नगरपालिका परिषद के अध्यक्ष पद का पर्चा भरने की अनगिनत (पति) इच्छाओं को पूरा करते-करते ‘रेस की घोड़ी’ बनी आखिरकार नर्वस ब्रेकडाउन का शिकार होकर, बिना इलाज अस्पताल में जिंदगी हार जाती है। आखिरी समय में ना भाई आगे आता है और ना पति। लोमहर्ष कहता है, ‘और इतने में तो एक नई घोड़ी खरीदी जा सकती है।… उसे खूंटे पर बांध कर चारा कौन खिलाएगा?’ (पृ.170) पलटन बाबा के कहने पर गांव वाले जरूर अपनी सामुदायिक संवेदना को समेटे पैसा जोड़ते हैं पर उसमें भी बहुत देर हो जाती है। निश्चित ही समय के सापेक्ष स्त्री के मनोभावों, उसके अंतर्द्वंद्वों, उसकी रोजमर्रा की  लड़ाइयों, स्त्री-मन में गहरे पैठे मूल्यों आदि को लेखक अत्यंत बारीकी से पकड़ता है। देवयानी से इतर वह नन्दा कौर को एक जुझारू चेतना संपन्न और आत्मनिर्भर स्त्री के रूप में दर्शाता है जो अपने निर्णय स्वयं लेती है और पूरे उपन्यास में साम्प्रदायिकता का प्रतिरोध रचती एक बड़ा वाक्य कहती है, ‘किसी भी धर्म या जाति के सभी लोग कभी बुरे नहीं होते।’ (पृ.159) नन्दा कौर का चरित्र स्त्री-विमर्श के उत्कृष्ट आदर्श को सामने रखता है। स्वतंत्र स्त्री की सही और खरी-खरी परिभाषा गढ़ता है।

 

कुल मिलाकर ‘पिघले चेहरे’ अपने ढब और रंग में विशेष है। शब्दों का चयन और प्रयोग अत्यंत मार्मिक बन पड़ा है। उपन्यास में वाक्य की संरचना ध्यान आकर्षित करती है, जैसे- ‘उसने अपनी रिहाई के लिए धन्यवाद दिया था भारतीय प्रजातंत्र को और उसकी न्याय व्यवस्था को जहां अंधे पीसते हैं और कुत्ते खाते हैं।’ (पृ.164) भाषा की अशुद्धियां इस उपन्यास में अवश्य खटकती हैं और कई बार पढ़ने का क्रम भी खंडित करती हैं पर लेखक की इस बात के लिए प्रशंसा की जानी चाहिए कि यह उपन्यास क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा?’ कहानी के साथ मजबूती से खड़ा दिखता है। 1984 के दंगे का वस्तुगत और ऐतिहासिक आधार प्रस्तुत करता है। बहुत से प्रश्न उठाता है पर कहीं भी मनुष्य और मनुष्यता में अपना विश्वास नहीं खोता।

प्रोमिला

असिस्टेंट प्रोफेसर,हिन्दी विभाग

अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय,

हैदराबाद-500605

मो.-8977961191

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