रात -ओम प्रकाश नौटियाल
दूर दूर फैली रही, तिमिर ढकी वह रात
भोर किरण की टोह में , खिसकी सिसकी रात

कुटिया में दम तोडती ,उस वृद्धा की साँस
उसकी पीर न हर सकी,सरकी भटकी रात

मेघ नाद संवेग से, दिया कलेजा चीर
रो बैठी बरसात में , हिचकी ले ले रात

लुप्त गुप्त थी चाँदनी, ना तारों की दीद
अंबुद की ओढे चुनर , सहमी कँपती रात

अंगना में कुम्हार के , साये घने घनेर
माटी चिपकी चाक पर, थकती तकती रात

इस अँधियारे घोर में , जुगनु जिये औकात
लेट नीम की डाल पर , पत्ते गिनती रात
-ओंम प्रकाश नौटियाल, बड़ौदा , मोबा.9427345810

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