-ओंम प्रकाश नौटियाल
आश्रम में प्रवेश करते ही पार्थ ने नीम  वृक्ष के चबूतरे पर बैठे गुरू जी के चरण स्पर्श करते हुए प्रश्न कर दिया ।
“गुरूदेव प्रणाम । गुरूदेव कृपया बतायें कि इस संसार में कितने  प्रकार के युद्ध होते रहे हैं और  हो रहे हैं ?” गुरूदेव प्रश्न सुनकर मुस्कराये और बोले, ” पार्थ , विभिन्न विषयों के प्रति तुम्हारी  उत्सुकता से मैं अत्यंत प्रसन्न हूं ।तुम्हारी बाल सुलभ जिज्ञासा  मुझे बहुत भाती है ।सुनो पार्थ , इस संसार में आदि काल से अलग अलग स्तर के, अलग अलग पैमाने के,अलग अलग अवधि के युद्ध  विभिन्न कारणों से लडे जाते रहे हैं । युद्धों का वर्गीकरण उसके कारणों , प्रतिद्वंदियों की क्षमता, समय काल परिस्थिति तथा युद्ध के औचित्य आदि के अनुसार विभिन्न श्रेणियों में किया जा सकता है ।”
”  गुरूदेव , मैं जानना चाहूंगा की विश्व में  कहीं न कहीं होते रहने वाले इन युद्धों के पीछे क्या कारण रहे हैं ?”
” पार्थ , युद्ध होने के अनेक कारण हो सकते हैं । अधिकतर कारणों के पीछे युद्धस्थ पक्ष के नायकों का निहित स्वार्थ है ।स्वार्थ अनेक तरह का हो सकता है ,इसमें राज्य विस्तार , संपत्ति हड़पने के  लिये विलय करने की लिप्सा,अहं तुष्टि के लिये प्रभु सत्ता स्वीकार करवाने की मंशा, दूसरे पक्ष की सुंदर स्त्री पर कुद्दष्टि रख कुछ बनावटी कारण खड़े कर के प्रारंभ किये गये युदध आदि आदि । आधुनिक युग में तो शस्त्र उद्योग को बढ़ावा देने का स्वार्थ भी युद्ध और आतंकी गतिविधियों का कारण रहता है ।कभी कभी अपनी प्रभुसत्ता और स्वतंत्रता बचाने के लिये न चाहते हुए भी युद्ध करना पड़ जाता है ।
“गुरूदेव आपने बहुत उपयोगी जानकारी दी है । अब कृपया यह भी बता दें कि संसार में श्रेष्ठतम युद्ध कौन सा है ?”
“पार्थ, यह तुमने बहुत ही सुंदर प्रश्न किया है । इससे पहले कि मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूं मै तुम्हे यह बताना आवश्यक समझता हूं कि संसार में निकृष्टतम युद्ध कौन सा है ।पार्थ ,इस  संसार में चुनावी युद्ध सबसे अनैतिक और निम्न स्तर का है क्योंकि यह सिर्फ झूठ की बुनियाद पर लड़ा जाता है । इस युद्ध में भाग लेने वाले सभी प्रतिद्वंदी पक्ष जनता को यह बतलाते हैं कि वह उनकी भलाई के लिये लड़ रहे हैं जबकि सच्चाई यह है कि यह युद्ध  वह मात्र अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिये लड़ते  हैं । दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस युद्ध में वाणी से ऐसे विषैले गाली वाण चलाये जाते हैं जिनके लिये कोई रक्षा कवच उपलब्ध नहीं है ।  अब मैं तुम्हारे मूल प्रश्न पर आता हूं ।सुनों,पार्थ इस संसार में पति पत्नी के बीच  लड़ा जाने वाला युद्ध ही श्रेष्ठतम है । इसमे दोनों पक्षों का कोई भी स्वार्थ न होते हुए भी यह युद्ध उम्र भर अपनी गति और प्रवाह बनाये रखने में सक्षम  है । इस युद्ध से किसी अन्य तीसरे पक्ष की हानि होने की संभावना भी नगण्य रहती है। इस युद्ध की निरंतरता से  दोनों के प्रेम की बुनियाद मजबूत होती चली जाती है । दोनों को जीने का ध्येय मिल जाता है ।युद्धश्रम से  दोनों पक्षों का स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है, परिवार और पड़ोस के अन्य लोगों का मनोरंजन अलग से होता है । एक दूसरे पर तीखे किंतु हानि रहित शब्दवाणों का प्रयोग शब्द ज्ञान बढ़ाता है । वाणी और बुद्धि की कुशाग्रता बढती है ।इसलिये हे पार्थ मेरी द्दष्टि में निस्वार्थ भाव से लड़ा जाने वाला यह युद्ध बहुत ही कल्याणकारी है अतः श्रेष्ठतम है। यदा कदा यदि कभी शस्त्र का प्रयोग किसी पक्ष द्वारा कर भी लिया जाता है तो वह शस्त्र गृह कार्य में प्रयुक्त होने वाला अशस्त्र की श्रेणी वाला मामूली शस्त्र होता है । ऐसी स्थिति में यदि किसी को कभी हल्की चोट पहँच भी जाती है तो अशस्त्र चलाने वाला ही तुरंत प्रतिद्वंदी को घरेलू उपचार से ठीक कर देता है । प्रेम की प्रगाढ़ता बढाने के लिये इक्का दुक्का ऐसी घटनायें रामवाण सिद्ध होती हैं । “
“मैं धन्य हुआ गुरूदेव । मेरी यह जिज्ञासा तो शान्त हुई किंतु गुरूदेव  मैं यह भी जानना चाह रहा था …”
“बस पार्थ , शेष फिर कभी , अभी मुझे मतदान के लिये जाना है ।”
“धन्यवाद गुरूदेव ।”
-ओंम प्रकाश नौटियाल
बडौदा,मोबा. 9427345810

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