असम की प्रमुख नृत्य कलाओं में सत्रिया नृत्य

परीक्षित नाथ
शोधार्थी,एम.फिल,
पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय,
शिलांग,मेघालय,भारत
दूरभाष-7002607797
ईमेल- parikshitnath96@gmail.com

         भारतवर्ष के पूर्वोत्तर में स्थित असम राज्य सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बहुरंगी व बहुआयामी है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में इस स्थान को प्रागज्योतिषपूर के नाम से जाना जाता था। यह राज्य भिन्न-भिन्न जाति, जनजाति तथा बहुधर्मी लोगों की पुण्य भूमि है। धार्मिक दृष्टि से भी यह राज्य मिलन एवं संप्रीति का प्रतीक माना जाता है। सूफी संत आज़ान फकीर के जिकिर एवं जारी तथा श्रीमंत शंकरदेव के बरगीत यहां के लोग बड़े ही आदर और सम्मान के साथ गाते हैं। इसलिए असम राज्य को शंकर-आजान की भूमि भी कहा जाता है।

असम राज्य जाति-जनजातियों का एक समन्वय क्षेत्र है। यहां की जातियां कई समूहों में विभाजित हैं। अलग अलग जाति-जनजातियों की अलग अलग संस्कृति, मान्यता एवं परंपराएं हैं तथा इन सभी के लोकगीत व लोकनृत्य भी अलग अलग हैं । असम की प्रमुख जातियों में ब्राह्मण, कायस्थ, योगी मुख्य हैं तथा जनजातियों में आहोम, बोड़ो, राभा, तिवा, कार्बी, मिसिंग, ताई, ताई फाके, कुकी, मरान, मटक, दिमासा, सुतिया, हाजोंग, चाय जनजाति आदि प्रमुख हैं। साथ ही यहां के मुसलमान और सिख संप्रदाय के लोग भी समन्वित होकर असमिया नाम की अखंड जाति को जन्म दिया है। सभी जाति-जनजाति तथा धर्मों की बहुरंगी परंपराओं व मान्यताओं को मिलाकर असम की इंद्रधनूषीय असमिया संस्कृति की सृष्टि होती है। असम की सभी जाति, जनजाति व धर्मों की परंपराएं व मान्यताएं असमिया संस्कृति में विशेष महत्व रखती हैं।

असम में भिन्न भिन्न जाति-जनजातियों का क्षेत्र होने के कारण लोक नृत्य तथा शास्त्रीय नृत्य का बहुरंगी रूप देखने को मिलता है। यहां के शास्त्रीय नृत्यों में सत्रिया नृत्य, भोरटाल नृत्य, ओजापाली नृत्य, माटी आखरा, सूत्रधारी नृत्य, रास नृत्य, देवदासी नृत्य आदि प्रमुख हैं, दूसरी ओर लोकनृत्यों में बिहू नृत्य, बागुरुम्बा (बोडो जनजाति), झुमुर नृत्य (चाय जनजाति), बहुवा नृत्य (सोनोवाल कछारी), भारीगान नृत्य (राभा जनजाति),  हाचाकेकान नृत्य (मिकिर जनजाति), कार्लेक किकान नृत्य (डिमोरिया कार्बी जनजाति), चोमांकान नृत्य (कार्बी जनजाति), बरतर नृत्य (तिवा जनजाति), गुमराग (मिसिंग जनजाति), फात्री नृत्य (डिमाचा जनजाति), कालीचंडी नृत्य (गोवालपरीया समूह), ज्योन-व नृत्य (टांगछा जनजाति) आदि प्रमुख है। यह सभी अलग-अलग नृत्य भिन्न-भिन्न अवसरों पर किए जाते हैं।

सत्रिया नृत्य असम का शास्त्रीय नृत्य है, जिसके संस्थापक महापुरुष श्रीमंतशंकरदेव हैं। 15 नवंबर सन् 2000 ई. में को इस नृत्य को भारतीय संगीत नाटक अकादमी ने भारत के आठवें शास्त्रीय नृत्य के रूप में स्वीकृति दी । सत्रिया नृत्य श्री शंकरदेव द्वारा संस्थापित करने के कारण इसे शंकरी नृत्य भी कहा जाता है। ‘’सत्रिया’’ शब्द ‘’सत्र’’ से बना है, जिसका अर्थ है मठ या पुण्य स्थान। सत्रिया नृत्य को महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव ने अंकिया नाटकों के लिए बनाया था। बाद में यह नृत्य अवसरों पर प्रदर्शित किया जाने लगा। इस नृत्य का मूलभाव पौराणिक कथाएं हैं, जिसे विभिन्न भाव-भंगिमाओं के द्वारा एक कहानी व घटनाओं के माध्यम से प्रदर्शित करते हैं। यह नृत्य पहले पहल पुरुष द्वारा प्रदर्शित किया जाता था, परंतु अब यह महिला द्वारा भी प्रदर्शित किया जाता है। सत्रिया नृत्य को प्रदर्शित करते समय गीत व वाद्ययंत्रों का भी विशेष ध्यान रखा जाता है। गीत विशेषतः पौराणिक कथाओं पर आधारित होते हैं, जो विशेष ताल व राग में गाया जाता है। वाद्ययंत्रों में से ताल, बांसुरी, खोल (एक प्रकार के मृदंग) आदि का प्रयोग किया जाता है। इसके साथ ही कहीं कहीं- नागारा, भेरी, चेरेंदा, टोकारी, दोतोरा, डबा, पाखोवाज आदि वाद्ययंत्रों का भी प्रयोग किया जाता है। इन सभी वाद्य यंत्रों को भी विशेष ताल में बजाया जाता है।

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सत्रिया नृत्य को कई भागों में विभाजित किया जा सकता है। जैसे- सूत्रभंगी या सूत्रधारी नृत्य, कृष्णभंगी या गोसाई प्रवेश नृत्य, गोपीभंगी या गोपी प्रवेश नृत्य, चालि नृत्य, नटुवा नृत्य, झुमुरा नृत्य, नादुभंगी, रासनृत्य, युद्ध नृत्य, भावरिया नृत्य, धेमाली नृत्य, उजापालि नृत्य आदि। उपरोक्त नृत्यों में से अधिकतर नृत्य नाट्यकला से संबंधित हैं।

सत्रिया नृत्य के एक भाग सूत्रधारी नृत्य संस्कृत नाट के सूत्रधार से भिन्न होता है। इस नृत्य के द्वारा किसी भी नाटक का प्रारंभ होता है तथा नाटकों के कथानक का विश्लेषण तथा आगामी कथाओं का आभास भी इस नृत्य के द्वारा दर्शकों को दिया जाता है। सूत्रधार के माथे पर पगड़ी बंधी होती है, कान में कुंडल कमर तक सफेद कुर्ता पहना जाता है तथा कमर में असम का विशेष वस्त्र तंगाली तथा धोती को भी एक विशेष शैली में पहना जाता है। सूत्रधार के नृत्यभंगी तीन प्रकार के होते हैं- सरुभंगी, बरभंगी और चालीभंगी। असमिया शंकरी नाटकों में सूत्रधारी नृत्य का महत्व सर्वाधिक होता है। सूत्रधार रंगमंच में नाटकों के सभी पात्रों को दर्शकों के सामने एक विशेष नृत्य के द्वारा परिचय कराया जाता है, इसे ही कृष्ण प्रवेश नृत्य कहते हैं। रंगमंच में गोपी, यशोदा तथा अन्य स्त्री पात्रों द्वारा प्रवेश करते समय जो नृत्य प्रदर्शित होता है, उसे गोपी प्रवेश नृत्य कहा जाता है। गोपी प्रवेश नृत्य का भी वस्त्र पहनने का तरीका समान रहता है, केवल ओढ़नी लिये होती है। गोपी प्रवेश नृत्य के भी दो भाग होते हैं, जैसे- साधारण बाजनार नाच और छोलोकार नाच।

चालि नाच का अर्थ होता है मोर के पंख समान नृत्य। सत्र या मठ में इस नृत्य के प्रवर्तक श्रीमंत शंकरदेव के प्रिय शिष्य महापुरुष माधवदेव हैं। चालि नृत्य कितने प्रकार के हैं इसमें विद्वानों में मतभेद है, किसी के अनुसार यह आठ प्रकार के हैं तो किसी विद्वान के अनुसार यह बारह प्रकार के हैं।

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महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव के शिष्य महापुरुष माधवदेव के द्वारा रचित नाटकों को झुमुरा कहकर संबोधित किया जाता है। झुमुरा नृत्य भी इसीसे संबंधित नृत्य हैं। असम के जनजातीय लोगों में प्रचलित बाउरी, महाली, खेरिया, ताँटी, टूड़ी, चाउटाल आदि नृत्य का नाम झुमुरा है। झुमुरा नृत्य के तीन भाग हैं। जैसे- रामादानि, गीतर नाच और मेला नाच।

नादुभंगी नृत्य के द्वारा वृंदावन के गोप-गोपियों के मिलन को दर्शाया जाता है। इस नृत्य के दो भाग होते हैं- रामादानि और गीतर नाच। रासनृत्य माधवदेव के रास झुमुरा नाट से संबंधित है। इस नृत्य के द्वारा कृष्ण के साथ गोपियों का मिलन तथा लीलाओं का प्रदर्शन होता है। शंकरदेव द्वारा विरचित ‘’पारिजात हरण’’ नामक नाटक में नरकासुर के साथ, श्री कृष्ण के युद्ध को युद्धनृत्य के माध्यम से दर्शाया गया है। शंकरदेव के नाटकों में वर्णित युद्ध को इस नृत्य के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। सूत्रधार के गीतों के सुर में सभी कलाकार सामूहिक रूप से अपने अपने किरदार के हिसाब से, अलग प्रकार से नृत्य भंगी करते हैं, जिससे उनकी चारित्रिक विशेषताएं प्रकाशित होती हैं, उसे भावरिया नृत्य कहते हैं। इस नृत्य के माध्यम से कलाकार रंगमंच पर प्रवेश करता है। मूल नाट प्रारंभ होने से पहले वाद्ययंत्रों को बजानेवाले तथा गीतों को गानेवाले लोग मंच पर नृत्यभंगी करते हैं, इस नृत्य को धेमालिर नृत्य कहते हैं। उजापालि नृत्य महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव के पूर्व से ही असम में प्रचलित होता आया है। शंकरदेव ने भी पहले पहल अपने उपदेश व वाणी को उजापालि के द्वारा ही लोगों तक पहुंचाने का काम किया था। बाद में शंकरदेव ने उजापालि नृत्य को भी सत्रिया नृत्य के एक महत्वपूर्ण अंग के रूप में स्वीकृति दी है। उजापालि असम की एक अर्धनाटकीय नृत्यकला है। यह नृत्य सामूहिक रूप में प्रदर्शित किया जाता है। इस नृत्य के द्वारा महाभारत व रामायण आदि कथाओं की व्याख्या प्रस्तुत की जाती है। उजापालि नृत्य अनुष्ठान में उजा और पालि दोनों पात्र गद्य और पद्य दोनों के माध्यम से विषयवस्तु व कहानी एवं आख्यान को लोगों के सामने रोचक ढंग से प्रस्तुत करते हैं। उजापालि को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जाता है- महाकाव्यीय उजापालि और गैर महाकाव्यीय उजापालि। महाकाव्यीय उजापलि के अंतर्गत व्यास उजापालि, पांचाली उजापालि, डुलरी उजापालि, नगंवा उजापालि, भाइरा उजापाली, दुर्गावली उजापालि, सत्रिया उजापालि, दामोदरी सत्र उजापालि आदि। गैर महाकाव्यीय उजापालि के अंतर्गत सुकनानी उजापालि, विषहरी उजापालि, पद्मपुराण गान, मारेगान, झुनागीत अथवा करीगीत, तुकुरिया उजापालि, राखोवाल उजापालि, आपी उजापालि अथवा लिकिरी उजापालि आदि है। इसमें नृत्यगीत को उजा नामक पात्र सूर और राग प्रारंभ करते हैं फिर पालि नामक पात्रों के सहयोग से आगे बढ़ते हैं। उजापालि में उजा मुख्य होते हैं, जो गीत व राग की शुरुआत करते हैं तथा पालि समूह के सहयोग से संपूर्ण होता है। महाकाव्यीय उजापालि के अंतर्गत सत्रिया उजापालि आते हैं, जो सत्रिया नृत्य का एक मुख्य भाग माना जाता है।

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इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि सत्रिया नृत्य श्री शंकरदेव की नाट्यकलाओं से संबंधित है, क्योंकि इसका मूल कारण ही है- शंकरदेव के प्रायः नाटक नृत्यकलाओं पर आधारित नाटक हैं। शंकरदेव के नाटक ‘पत्नीप्रसाद’, ‘कालियदमन’, ‘केलीगोपाल’, ‘रुक्मणी-हरण’, ‘पारिजात-हरण’ आदि नाटक नृत्यकलाओं पर आधारित नाटक हैं। नाटक के संवाद बहुत जगह काव्यपरक हैं, जो आसानी से गाया जा सकता है, तथा अंकिया नाटक (शंकरदेव के नाटक) में सूत्रधार का महत्त्व अत्यधिक है। सत्रिया नृत्यों के माध्यम से एक कथा अथवा आख्यान की व्याख्या की जाती है, इसलिए अलग-अलग स्थान पर इस नृत्य को सूत्रभंगी, कृष्णभंगी, गोपीभंगी आदि कई नामों से संबोधित किया गया है। अंततः यह कहा जा सकता है कि सत्रिया नृत्य असम के ही नहीं बल्कि पूरे भारतवर्ष के एक अमूल्य व महत्वपूर्ण शास्त्रीय नृत्य हैं। इस प्रकार सत्रिया नृत्य भारतीय नृत्यकलाओं में एक विशेष महत्व रखता है।

सहायक ग्रंथ सूची :

  1. शर्मा, नबीन चन्द्र ,भारतर उत्तर पूर्वाञ्चलर परिवेश्य कला, शराइघाट फोटोटाइप्स लिमिटेड, गुवाहाटी
  2. शर्मा, सत्येंद्र, असमियार साहित्यर समीक्षात्मक इतिबृत्त, सौमार प्रकाश, गुवाहाटी
  3. हाकाचाम, उपेन राभा, असमिया आरु असमर जाति-जनगोष्ठी: प्रसंग-अनुसंग, किरण प्रकाशन, धेमाजी
  4. सं.भट्टाचार्य, प्रमोदचन्द्र, असमर जनजाति, किरण प्रकाशन, धेमाजी
चित्र साभार:
Awesome Assam
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