योग
हवा का इंतजाम (बालकथा- संग्रह), लेखक : गोविंद शर्मा, समीक्षक- ज्ञानप्रकाश ‘पीयूष’
समीक्ष्य कृति: हवा का इंतजाम (बालकथा- संग्रह)
लेखक : गोविंद शर्मा
प्रकाशक : साहित्यागार, जयपुर -03
प्रथम संस्करण : 2021.
पृष्ठ संख्या : 80, मूल्य : ₹200.00/- (सजिल्द)
भाव संवेदनाओं से संपृक्त प्रेरक बालकथा-संग्रह :हवा का इंतजाम
विगत पाँच दशकों से सृजन-कर्म में रत सिद्धि-लब्ध बाल साहित्यकार गोविंद शर्मा का सद्य प्रकाशित बालकथा-संग्रह “हवा का इंतजाम” ने बाल साहित्य जगत में एक और पुरजोर दस्तक दी है। यह बालकों के जीवन में संस्कारों की उज्ज्वल जोत जगाता है तथा उनका समुचित मार्गदर्शन ,ज्ञानवर्धन व मनोरंजन करता है। गोविंद जी के अनुसार – यह संग्रह उनका गृह-उत्पाद है।उनके शब्दों में कहें तो – ” इस संग्रह को मेरा गृह-उत्पाद भी कह सकते हैं। कहानियाँ मैंने लिखी हैं, कहानियों के साथ रेखाचित्र और प्रथम आवरण मेरी दोहिती प्राची मटोलिया ने बनाए हैं।
एक कहानी ‘वनराज और गजराज’का रेखाचित्र और अंतिम कवर मेरे पौत्र अम्बुज शर्मा ने बनाया है। कहानियों को क्रम दिया है,छोटे पौत्र रितिक शर्मा ने।”
समीक्ष्य कृति में कुल 17 बाल कथाएँ संगृहीत हैं, जो बाल मनोविज्ञान के धरातल पर आधारित, सरल व सुबोध भाषा में रचित हैं तथा भाव-संवेदनाओं से संपृक्त हैं। इनमें बाल सुलभ जिज्ञासा,कौतूहल, कल्पना का समुचित वैभव, रोचकता और मनोरंजन के साथ सामाजिक संदेश भी विद्यमान हैं जो पुस्तक की
अर्थवत्ता ,बोधगम्यता व उपादेयता में चार चाँद लगाते हैं।

संग्रह की पहली बालकथा “हवा का इंतजाम”
दादा-पोते के आत्मिक प्यार को उद्घाटित करती है
और संयुक्त परिवार के महत्त्व को भी प्रतिपादित करती है क्योंकि बाल प्रतिभा के सर्वांगीण विकास में माता-पिता के लालन-पालन व निर्देशन के साथ दादा-दादी के निश्छल प्यार की भी अहम भूमिका
होती है। इसी कहानी की मूल संवेदना के आधार पर आलोच्य कृति का नामकरण “हवा का इंतजाम” किया गया है जो कि सर्वथा समीचीन एवं उपयुक्त है।
“वनराज और गजराज” कहानी में शेर को वनराज और हाथी को गजराज कहने की सार्थकता पर रोचक ढंग से संवादात्मक शैली में प्रकाश डाला गया है।
“कला की कद्र” कहानी प्रस्तुतीकरण और सन्देश की दृष्टि से बहुत उत्कृष्ट है। इसमें कला के महत्त्व पर प्रकाश डालने के साथ उच्च विचारों की उपादेयता
को भी रेखांकित किया गया है।
गोविंद शर्मा की इन कहानियों को पढ़कर बालक संस्कारवान बनेंगे और उनमें कला व उच्च विचारों के प्रति आस्था पैदा होगी।
” चिंपू के सच्चे दोस्त” और “चिंपू बन गया” कहानियाँ
भी बड़ी प्रभविष्णु और शिक्षाप्रद हैं। “चिंपू के सच्चे दोस्त” में बताया गया है कि जानवर मानव से गुणों में कम नहीं होते। वे बड़े समझदार होते हैं।हमें उन पर शक नहीं करना चाहिए तथा “चिंपू बन गया” कहानी मानव के मनोविज्ञान पर प्रकाश डालती है। यदि किसी मानव के सामने उसकी प्रशंसा की जाए तो वह ऊर्जावान हो कर अच्छा प्रदर्शन करने लगता है और सफ़लता अर्जित कर लेता है।
“हौसले की उड़ान” बैल की जगह गाड़ी में खुद जुत कर पानी की सेवा करने वाले आसाराम की प्रेरणादायी व शिक्षाप्रद कहानी है।
“चूहागढ़ में चुनाव” हास्य मिश्रित व्यंग्यात्मक शैली में रचित एक प्रभावशाली बालकथा है। इसमें सरकारी गोदामों की दुर्दशा पर तीक्ष्ण कटाक्ष किया गया है। लेखक ने सरकारी गोदामों को चूहागढ़ कहा है क्योंकि वहाँ असंख्य चूहों का साम्राज्य होता है। कहानी में दो चूहों ‘उल्टा’और ‘पुल्टा’ के बीच चुनाव लड़ने की प्रतियोगिता होती है। ‘उल्टा’ चुनाव जीत कर चूहागढ़ में सुधार करना चाहता है। वह अपना चुनाव घोषणा-पत्र तैयार करता है। उसका मानना है कि चूहे अनाज की नई-नई बोरियों को काट देते हैं।उनमें से थोड़ा-सा अनाज खाते हैं और बहुत-सा अनाज खराब कर देते हैं। अतः वह चाहता है कि अनाज की बोरियों को रखते समय जो अनाज जमीन पर नीचे गिर जाता है,चूहे उसी अनाज को खाएँ,वे बोरियों को न काटें।
परन्तु ‘पुल्टा’ “खूब खाने और खूब बिखराने” की नीति में विश्वास रखता है ।वह इंसानों को अपने ख़िलाफ़ मानता है कि “वे हमें पिंजरों में बंद कर के खुले में,झाड़ियों में या दूसरों के घरों में छोड़ देते हैं और
हमें मरवाने के लिए बिल्लियाँ पालते हैं।”
चुनाव हुआ ।उल्टा चुनाव जीत गया। ज़्यादातर वोटरों ने अच्छा काम करने के पक्ष में वोट दिए। पुल्टा ने उल्टा को बधाई दी और उसकी नीति के अनुसार ही अच्छा काम करने का मन बनाया। उसने उल्टा से कहा- ” ठीक है, अब मेरी बात सुनो। तुम्हें सौ में से नब्बे ने सही माना है। अब मैं भी तुम्हें सही मान गया हूँ। जो नौ हैं उन्हें हम दोनों मिलकर बनाएंगे ।तुमने बहुत अच्छी बातें अपने घोषणा-पत्र में लिखी हैं। एक मेरी तरफ से जोड़ लेना कि हम चूहे अब यहाँ-वहाँ खुले में शौच नहीं करेंगे। इसके लिए कुछ स्थान निश्चित करेंगे।हमारे शौच से ही अनाज दूषित होता है जब हम किसी के लिए नुकसान पहुँचाने वाले नहीं होंगे तो वे हमें क्यों मारेंगे?”
” वाह, मैं तुमसे सहमत हूँ।”
“हम अपने चूहागढ़ में सुधार करेंगे।उसके बाद दूसरी जगह स्थित चूहागाँव, चूहानगर,चूहापुर,चूहा कॉलोनी में हम अच्छी बातों के लिए काम करेंगे।”पृष्ठ-34.
इस प्रकार लेखक ने प्रस्तुत कहानी के माध्यम से बालकों के मन में अच्छाई का बीजारोपण करने का
श्लाघनीय प्रयास किया है तथा यहाँ-वहाँ शौच न करने व स्वच्छता को बढ़ावा देने के सामयिक सामाजिक स्वच्छता अभियान को पुष्ट किया है।
ये कहानियाँ न केवल बालकों के लिए उपयोगी हैं अपितु हर वर्ग के पाठकों के लिए प्रेरणादायी ,
मनोरंजक व ज्ञानवर्धक हैं।
इन बाल कहानियों के अतिरिक्त ” टांय-टांय फिश, बब्बू जी और मोबाइल,परीक्षा परी का उपहार,देश की सेवा,वह सच बोला,बुद्धि की तलाश,दोस्ती, बदल गया बदलू, जूते व हाथी पर ऊँट आदि कहानियाँ विविध विषयों पर आधारित बहुत रोचक, ,ज्ञानवर्धक एवं सन्देशप्रद हैं जो देश प्रेम, मानव सेवा ,वृक्षारोपण,
दोस्ती की उपादेयता व सत्य बोलने के महत्त्व आदि पर सरल शब्दों में प्रकाश डालती हैं।
बाल कहानियों की कथावस्तु से मेल खाते आकर्षक चित्र इस कृति का वैशिष्टय हैं जो समीक्ष्य कृति की बोधगम्यता को सुग्राह्य बनाते हैं।
समीक्ष्य कृति कथ्य,शिल्प, अभिव्यक्ति कौशल व रचना अभिप्रेत की दृष्टि से बहुत श्रेष्ठ है। इनमें सरल-मुहावरेदार भाषा व हास्य-व्यंग्य प्रधान शैली
का सुंदर प्रयोग हुआ है। वर्तमान समय में ऐसे प्रेरणादायी बालकथा साहित्य के सृजन की नितांत आवश्यकता है। मुझे आशा है कि गोविंद शर्मा जी भविष्य में इससे भी उत्कृष्ट बालकथा साहित्य का सृजन कर अपने पाठकों को उपकृत करेंगे।शुभकामनाओं सहित।
शुभेच्छु
ज्ञानप्रकाश ‘पीयूष’
पता-
ज्ञानप्रकाश ‘पीयूष’ आर.ई.एस.
पूर्व प्रिंसिपल,
1/258, मस्जिद वाली गली,
तेलियान मोहल्ला,नजदीक सदर बाजार सिरसा-125055(हरि.) संपर्क–094145-37902,070155-43276
ईमेल-gppeeyush@gmail.com
छन्द विन्यास: लेखक-डा संजीव चौधरी, समीक्षक-राजेश कुमार सिन्हा
एक ख्याति लब्ध शल्य चिकित्सक का कवितायें लिखना या दूसरे शब्दों में कहें तो सिर्फ कवितायें नहीं लिखना बल्कि छन्द पर आधारित कवितायें लिखने के लिए काव्य लेखन कुंजी के रुप में एक पुस्तक लिख देने को सही मायने में मणि कांचन संयोग कहा जा सकता है,जो विरले ही देखने को मिलता है।डा संजीव कुमार चौधरी एक शल्य चिकित्सक होने के साथ साथ एक प्रोफेसर भी हैं जिनका पहला शौक है कवितायें लिखना।डा संजीव की यह तीसरी पुस्तक है जो काव्य सृजन में सबसे कठिन समझे जाने वाले विषय “छन्द”पर पूरी जानकारी देने के साथ साथ छन्द में काव्य लेखन की बारीकियों को उदाहरण के साथ समझाती भी है।ऐसे में यह कहना ज्यादा उचित होगा कि पहली बार किसी ने एक ऐसी सहायक पुस्तक तैयार की है जिसके सहयोग से नये सृजक थोड़ा प्रयास करके छन्द में अपनी कवितायें लिखना (जो आमतौर पर काफी जटिल कार्य माना जाता है)प्रारम्भ कर सकते हैं।

यह पुस्तक कैसी होगी इसकी बानगी इसी बात से मिल जाती है कि प्राक्कथन भी छन्द और मात्रा को ध्यान में रख कर लिखा गया है छन्द लेखन प्रक्रिया पर भरा ज्ञान का भंडार आदिकाल से नवयुग तक अनेकों हैं विचार पुख्ता जो करना हो कविता का शिलान्यास मददगार साबित होगी यह पुस्तक छन्द विन्यास आज कवितायें खूब लिखी जा रही हैं और यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आज की हिन्दी कविता भारत की और विश्व की बहुत सी कविता से बेहतर है।पर जब मुझ जैसा कोई नवोदित कवि अपनी बात छन्द-बद्ध तरीके से कहना चाह्ता है तो उसके सामने पहली समस्या यह होती है कि वह छन्द जैसे जटिल विषय का कितना अध्ययन करे कि वह अपनी अभिव्यक्ति छन्द-बद्ध रुप में प्रस्तुत कर सके,तो इसमें कोई दो राय नहीं कि ऐसी समस्या का समाधान यह पुस्तक अवश्य कर सकती है।
डा संजीव इस जटिलता का हल अपनी पुस्तक के पहले खण्ड मे बड़ी ही सहजता से दे देते हैं भावना का कर श्रृंगार झंकृत करे मन के तार शब्द विहंसे मंद मंद कविता है वही तो छन्द और फिर डा सन्जीव आगे लिखते हैं प्रस्तुत है छन्द की सरंचना की यह अद्भूत कथा नवोदित रचनाकारों की दूर करेगी थोड़ी व्यथा स्वर-अक्षर कहलाए वर्ण तो सिर्फ स्वर मात्रा गति यति तुक मात्रा गणना से बंधती छन्द यात्रा अक्षर के उच्चारण काल को कवि कह्ते हैं स्वर हलन्त लगे अगर नहीं गिने जाते वर्ण वो अक्षर इस तरह एक कविता की पूरे छन्द विन्यास के सिद्धांत और उसके प्रयोग को समझाने की कोशिश की गई है।कह्ते हैं कि जीवन को जिस आँख से कविता देखती है वह कवि की अपनी होती है इसलिये उसमें दृश्य का अनूठापन और स्वप्न की अंतरंगता एक साथ पाई जाती है और इन दोनों के साथ मिलने के बाद जो अभिव्यक्ति के स्वर बनते या निकलते हैं वे बेशक विशेष होते हैं।ऐसे में यह कहा जा सकता है कि यहाँ कवि जिस नजरिये से छन्द को देखता है वह बिलकुल स्पष्ट है और अनोखा भी है :छन्द की जटिलता को सरल बनाते हुए नवोदित रचनाकारों को छन्द बद्ध रचनायें लिखने के लिए प्रोत्साहित करना।
यहाँ एक सवाल यह भी उठता है कि छन्द में क्यों लिखा जाये?जाहिर तौर पर यह विमर्श का विषय हो सकता है या इस पर लम्बी चौड़ी बहस की जा सकती है। बेशक अगर सामान्य अर्थों में समझा जाये तो छन्द रचना की गेयता को बढ़ा कर उसे मधुर और खूबसूरत बना देता है जिससे पाठक को एक सुखद अनुभूति होती है ,पर डा संजीव न तो इस बहस में पड़ते हैं और न ही छन्द के पैरोकार के रुप में नज़र आते हैं बल्कि उनकी मंशा यही है कि नवोदित रचनाकार इसे इतना जटिल नहीं समझें जितना इसे मान लिया जाता है।इस पुस्तक में चार खण्ड हैं पहले में छन्द परिचय दूसरे में मात्रिक छन्द तीसरे में वर्णिक छन्द और चौथे में छन्द मुक्त/नव सृजन के बारे में चर्चा की गई है।मात्रिक छन्द में 60 वर्णिक में 61 और नव सृजन के अन्तर्गत 17 अलग अलग प्रकार की विधा पर चर्चा भी उसी विधा में लिखी गई रचना के माध्यम से की गई है।इस विशेषता को इन उदाहरणों के माध्यम से देखा जा सकता है।पर यहाँ मेरे विशेषता का अर्थ विशेषता है अद्वितीयता नहीं,अद्वितीय होने पर दूसरों से अपनी निजता का साझा नहीं रह जाता अथार्त संवाद और सम्प्रेषण पर भी प्रश्न चिन्ह लग जाता है।मात्रिक छन्द
मात्रा भार का ध्यान रख रचे जाते जो छन्द प्रचलित हैं साहित्य में अनेकों मात्रिक छन्द हर चरण में जो हो मात्रा की गणना समान ऐसी रचनाओं को सम मात्रिक लेते हैं मान
सम मात्रिक के भी कई प्रकार हैं मसलन अहीर, तोमर, लीला ,मधु मालती, मनोरम ,चौपाई सगुण ,सिन्धु राधिका ,रोला, गीता, विष्णु पद, छन्न पकैया, तांटक, विधाता और कुण्डलिया आदि।
वर्णिक छन्द
वर्णों की गणना आधारित होता छन्द वर्णिक मात्रा गिनने का इसमें न रहे प्रतिबंध तनिक लघु गुरु का क्रम भी जो होते चरणों में तय गणों के नियत क्रम सजा करें चरण निश्चय सात चरणों में वर्णों की संख्या रखे समान सम वर्णिक छन्द को दें वर्णिक वृत का मान वर्णिक छन्द के भी कई प्रकार हैं मसलन मल्लिका, स्वागता, भुजंगी, शालिनी, इन्दिरा, तोटक, चामर, सवैया मदिरा, किरीट, घनाक्षरी, मनहरण घनाक्षरी आदि।
मुक्तछन्द /नव सृजन
आधुनिक युग की मुक्तछन्द है देन लय प्रवाह बना येन केन प्रकारेण मात्रा वर्ण गणना का ना होवे मान स्वछन्द गति भाव वश यति विधान
इसके भी कई प्रकार हैं मसलन तुकान्त/अतुकांत मुक्त छन्द, पंचाट छन्द , हाइकु , तांका , सेदोका , वर्ण पिरामिड ,डमरू काव्य ,माहिया, गीत विधा, चतुष्पदी मुक्तक और क्षणिकाएं आदि।
इसके अतिरिक्त डा संजीव ने अपनी एक नई काव्य विधा “पंचाट छन्द विधा” भी इजाद की है।
पंचाट नाम की मेरी नव मौलिक विधा न कठिन परम्परागत नियम की दुविधा रचे समूह रख सम तुकान्त पँक्तियाँ पाँच समूहों के अलग तुकान्त ना लायें आँच समूहों की संख्या रख लें चाहे जितनी न्यूनतम तीन तो मगर होगी ही रखनी
डा संजीव चौधरी की” छन्द विन्यास” को पढ़ कर ऐसा नहीं लगता कि वे पेशे से एक शल्य चिकित्सक हैं बल्कि ऐसा लगता है कि वे छन्द विधा के चिकित्सक हैं।इसमें कोई दो राय नहीं कि इनकी यह कृति पठनीय और संग्रहनीय है जिसका स्वागत किया जाना चाहिये।

राजेश कुमार सिन्हा
बान्द्रा (वेस्ट),
मुंबई -507506345031
औपचारिक शिक्षा व्यवस्था पर अनियोजित शहरीकरण का प्रभाव: विश्व और भारतीय परिदृश्य-अश्विनी
औपचारिक शिक्षा व्यवस्था पर अनियोजित शहरीकरण का प्रभाव: विश्व और भारतीय परिदृश्य
अश्विनी
9210473599
ashwini.edu21@gmail.com
कार्ल मार्क्स ने दास कैपिटल में कहा था, “मजदूरों का कोई देश नहीं होता।” (Marx, 1848) इसका एक अर्थ यह भी है कि व्यक्ति की आजीविका ही उनका निवास स्थान तय करता है। औद्योगिक क्रांति के बाद आर्थिक संरचना में हुए तेजी से बदलाव एवं बढ़ते शहरीकरण ने इस बात को भली भांति प्रमाणित कर दिखाया। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की रिपोर्ट ‘विश्व जनसंख्या की स्थिति 2007’ (‘The State of World Population 2007’ के अनुसार वर्ष 2008 विश्व जनसंख्या में संक्रमण (परिवर्तन) का एक ऐतिहासिक काल है। इस वर्ष, मानव इतिहास में पहली बार, दुनिया की आधी से अधिक आबादी (3.3 बिलियन) शहरी क्षेत्रों में रह रही थी। अब (2018में) यह 55% हो गयी थी और 2050 तक, इसके 68 % हो जाने की उम्मीद है। एशिया और अफ्रीका में शहरी आबादी 2000 से 2030 के बीच दोगुना हो जाने का अनुमान है। विकासशील दुनिया के कस्बों और शहरों में इसी अवधि के दौरान कुल वैश्विक शहरी जनसंख्या का 80% हिस्सा होगा। भारत भी इस विश्व परिदृश्य से अछूता नहीं रहा है। साल 2018 से 2050 के बीच शहरी आबादी में भारत 41.6 करोड़, चीन 25.5 करोड़ और नाइजीरिया 18.9 करोड़, के साथ सर्वाधिक योगदान करने वाला देश होगा। इस अवधि में टोक्यो को पीछे छोड़ते हुए दिल्ली सबसे बड़ी आबादी का नगर बन जायेगा। इस प्रकार 21वीं शताब्दी को हम शहरीकरण का युग भी कह सकते है। (Obaid, 2007)
1901 की जनगणना के अनुसार, भारत में शहरी क्षेत्रों में रहने वाली जनसंख्या 11.4% थी। जो 2001 की जनगणना के अनुसार 28.53% हो गई, और 2011 की जनगणना के अनुसार 31.16% हो चुकी है । 2007 में जारी संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी ‘राज्य जनसंख्या रिपोर्ट’ के एक सर्वेक्षण के अनुसार, 2030 तक, भारत की आबादी का 40.76%( 600 मिलियन) शहरी क्षेत्रों में रहने की उम्मीद है। विश्व बैंक के अनुसार, भारत, चीन, इंडोनेशिया, नाइजीरिया और संयुक्त राज्य अमेरिका को पछाड़, 2050 तक दुनिया की शहरी जनसंख्या का नेतृत्व करेगा और भारत की आबादी का 50% से अधिक हिस्से का शहरीकरण हो चुका होगा। इस प्रकार भारत इस शताब्दी के मध्य तक आते-आते अपनी कृषि प्रधानता और ग्राम प्रधानता की विशेषता को इतिहास के पन्नों में दफ़न कर शहर प्रधान देश बन चुका होगा। (Rizvi, 2013) (CHANDRAMOULI, 2011) अब एक चुनौती के रूप में भारत सहित तीसरी दुनिया के सभी देशों में ‘तीव्र शहरीकरण’ का विश्व परिदृश्य उभरा है।
1.2 नीतिगत कारणों की तलाश – आखिर निवेश कहाँ हुआ-
मानवीय संसाधनों मे या भौतिक संसाधनों में ? शहरी क्षेत्र में या ग्रामिण क्षेत्र में?
अर्थशास्त्री डब्ल्यू आर्थर लुईस के बाद शहरीकरण को आर्थिक विकास की धुरी मानने वाले अर्थशास्त्री जॉन सी एच फाई एवं गुस्ताव रैनिस के अनुसार “यदि कृषि मजदूरों को औद्योगिक क्षेत्र में स्थानांतरित किया जाता है तो इससे उनकी आर्थिक उत्पादन क्षमता में वृद्धि होगी, जिसके फलस्वरूप आर्थिक विकास होगा।” (Thrilwall, 2006) गौरतलब बात यह है इन तीनों ही अर्थशास्त्रियों के विकास और/या संवृद्धि मॉडल के में निम्न बातों का न तो कोई समाधान प्रस्तुत किया न ही जिक्र ही हुआ –
- संवृद्धि के इन मॉडलों के नीतिगत कार्यान्वयन के फलस्वरूप शहरी क्षेत्र में बढ़ने वाली जनसंख्या के घनत्व का समाधान प्रस्तुत नहीं किया।
- शहरी क्षेत्र में बढ़ती जनसंख्या के लिए जन सुविधाओं की व्यवस्था का प्रावाधान भी नहीं दिया।
- गहन औद्योगिकीकरण और उच्च स्तर की सेवाओं को बढ़ावा देने में शिक्षा एवं तकनीकी ज्ञान की क्या भूमिका हो सकती है, इसकी भी चर्चा नहीं की ।
- शहरी व्यवस्था के सुचारू संचालन में शिक्षा के योगदान की चर्चा तक नहीं की।
- तकनीकी कौशल एवं शिक्षा का उत्पादकता से संबंध की चर्चा भी नहीं है।
जबकि, अंतर्जात संवृद्धि एवं विकास(Endogenous Growth and Development Modal ) मॉडल ने शिक्षा और अनुसंधान को आर्थिक एवं समाजिक विकास की धुरी माना है। “मानव पूंजी मॉडल का तात्पर्य है कि शिक्षा कौशल वाले व्यक्तियों को जन्म देती है।“ “मानव पूंजी मॉडल के अनुसार शिक्षा एक निवेश है जो भविष्य में लाभ पैदा करता है। इसलिए शिक्षा खर्च में हालिया कटौती भविष्य की राष्ट्रीय आय को कम कर देगी।“ (Quiggin, 1999) इस प्रकार शिक्षा और अनुसंधान में निवेश ही दीर्घकालीन संवृद्धि एवं विकास की धुरी है। आज, जापान, पूर्वी एशिया के नव विकसित देशों एवं पश्चिमी देशों के विकास का आधार शिक्षा ही है। गौरतलब है कि शिक्षा पर होने वाले खर्च से सीधे तौर पर लाभान्वित व्यक्ति को ही लाभ नहीं मिलता, बल्कि सभी को अधिक शिक्षित समाज और विकसित अर्थव्यवस्था का लाभ मिलता है। एक व्यक्ति के लिए शिक्षा साथ ही दूसरों को भी लाभ पहुंचती है। हर व्यक्ति के लिए शिक्षा सम्पूर्ण समाज को समग्र तौर पर लाभ पहुंचती है। । इन तरह में, “शिक्षा एक सकारात्मक बाह्यता है।“ “शिक्षा में निवेश करने वाली अर्थव्यवस्था अपनी बाजार प्रणाली को प्रोत्साहन देकर विश्व अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करेगी।” (Parker, 2012) इस प्रकार मुफ्त और सर्वव्यापी शिक्षा की जरूरत को समाजवाद के साथ जोड़ कर देखना एक अधुरा सत्य है। पूर्ण सत्य तो यह है कि शिक्षा हर तरह की आधुनिक अर्थव्यवस्था और समाज के विकास की धुरी है।
1966 में अंतर्जात संवृद्धि एवं विकास के सिद्धांत पर कोठारी कमीशन की ‘राष्ट्रीय शिक्षा और विकास’ रिपोर्ट आयी थी। इस रिपोर्ट ने सकल घरेलू उत्पाद का 6 % शिक्षा पर व्यय करने का सुझाव दिया गया था। जिसे भविष्य में बढ़ाना भी था । पर, कोठारी कमीशन का यह सुझाव धरा का धरा रह गया। अभी तक हमारी सरकारें इसके आधे के बराबर भी शिक्षा पर खर्च नहीं कर रही है। पर, अर्थशास्त्री लुईस-फाई-रैनिस के आर्थिक विकास मॉडलों का नीतिगत प्रभाव यह पड़ा कि भारत में स्वतंत्रता के बाद योजना काल (Nehru-Mahalanobish Model, 1950-1990) और गैर योजना या उदारीकरण काल (Raw-Manmohan Model, 1991- Till), इन दोनों ही कालों में अपनायी गयी, आर्थिक नीतियों ने शहरीकरण को बढ़ावा दिया है। मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति की वजह से जहाँ शहरीकरण की प्रक्रिया में गति आयी और बोकारो, राउरकेला आदि नए-नए शहरों के साथ कई छोटे बड़े कस्बे उभरे। पर, 1991 में अपनायी गयी उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नई आर्थिक नीति ने शहरीकरण की प्रक्रिया को सिर्फ बड़े शहरों तक केन्द्रित करते हुए, शहरीकरण की इस प्रक्रिया में अनियंत्रित रूप से बाढ़ की स्थिति ला दी। 1991 के बाद के दौर में, राष्ट्रीय आबादी एव जनसंख्या धनत्व के मुकाबले महानगरों की आबादी एवं जन-घनत्व कई गुणा अधिक तेजी से बढ़ा है। कई क्षेत्रों में तो ग्रामिण एवं कस्बई जनसंख्या एवं जन घनत्व कम भी हुआ है। जिसका सीधा सा अर्थ है कि लोग गांवों कस्बों से महानगरों की तरफ पलायन कर रहे है।
अधोसंरचना पर होने वाले कुल सार्वजनिक निवेश के एक बड़े हिस्से का निवेश (अनुमानतः 60-70%) शहरी, विशेषतः मैट्रोपोलिटेंट क्षेत्रों या उनकों केन्द्र में रख कर ही किया जा रहा है । औद्योगिक क्षेत्र के विकास के लिए आवश्यक अद्योसंरचना का विकास ग्रामिण एवं ग्रामिण क्षेत्र के साथ सटे कस्बाई क्षेत्रों में तुलनात्मक रूप में कम ही रहा है। निजी उपभोक्ताओं का भी प्रतिव्यक्ति व्यय एवं उपभोग प्रवृति भी शहरी क्षेत्र में अधिक है। इसलिए, सार्वजनिक निवेश हो या निजी निवेश या उपभोक्ता व्यय, हर तरह के व्यय का केन्द्र शहरी और वह भी महानगरों तक ही सीमित है। अतः ये सरकार की आर्थिक नीतियों का ही परिणाम है कि रोजगार का सृजन विशेषतः महानगरीय क्षेत्रों में ही हो रहा है। परिणामस्वरूप ‘रोजगार का सृजन एवं रोजगार गुणक’ भी शहरी क्षेत्र तक ही सीमित है या कहे कि महानगरीय क्षेत्रों में ही केन्द्रित है। रोजगार गुणक एवं आय गुणक ये बताते है कि निवेश की एक युनिट खर्च करने पर कितने गुणा रोजगार की युनिट और आय की युनिट में बढ़ौतरी होगी। इसलिए, महानगरीय क्षेत्रों में उच्च स्तर के रोजगार गुणक एवं आय गुणक होने की वजह से एक लम्बे अरसे से रोजगार की तलास में, बड़ी संख्या में लोगों का पलायन शहरी क्षेत्र की तरफ हो रहा है। अब, महानगरीय क्षेत्र में यदि किसी एक व्यक्ति के लिए रोजगार का सृजन होता है तो, उस व्यक्ति पर आश्रित उसका परिवार मतलब चार-पांच और लोग भी धीरे-धीरे शहर में ही आ कर बस जाते है। इन आश्रितों में एक बड़ी संख्या स्त्रियों और बच्चों की होती है। उस व्यक्ति के परिवार के विस्तार के साथ ही, आश्रित बच्चों की संख्या में और वृद्धि होती है। इस प्रकार, लगातार हो रहे पलायन की वजह शहरी क्षेत्र की जनसंख्या वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत वृद्धि से कई गुणा अधिक है। पर गौर करने वाली बात यह है कि ये शहर गांवों के आस-पास के कस्बे और छोटे शहर होते तो, शहरीकरण का प्रव्रजन(Migration) प्रभाव इतना चुनौतिपूर्ण न होता।
1.3 महानगरीय-शहरीकरण का स्वरूप
अब, जैसा कि ऊपर चर्चा की जा चुकी है कि इस शताब्दी के मध्य तक, विकासशील दुनिया के कस्बों और शहरों में कुल वैश्विक शहरी जनसंख्या का 80% हिस्सा निवास कर रहा होगा। अब इसके बाद जो सवाल उठता है वह यह है कि इन देशों के शहरीकरण की प्रकृति शहरी प्रभुत्व वाले यूरोपीय और अन्य पश्चिमी देशों के समान है या यह अलग होगा? अतः कुल मिला कर सवाल शहरीकरण के स्वरूप पर ही आ टिकता है? आम तौर पर शहरी क्षेत्र की पहचान चौड़ी सड़के और नियोजित एवं व्यवस्थित रूप से खड़ी गगनचुमंबी इमारतों, शिक्षा और स्वास्थ्य की जैसे नागरिक सुविधाओं की समूचित व्यवस्था से करायी जाती है। पर, भारत एवं अन्य विकासशील मूल्कों की हकीकत कुछ और भी है। इन देशों में, शहरी क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा फुटपाथों, स्लम और अनियोजित तंग कॉलोनियों में निवास करता है। इस प्रकार भारत एवं तीसरी दूनियाँ के देशों का शहरीकरण यूरोप में हुए शहरीकरण से भिन्न है। यूरोप एवं अन्य पश्चीमी देशों की अधिकतर आबादी शहरों में बसती है। वहां का शहरीकरण एक व्यवस्थित शहरीकरण है, जो एक योजनाबद्ध तरीके से हुआ है। भारत में भी नई दिल्ली का लुटियन जोन, चंडीगढ़, टाटानगर और बोकारो आदि शहरों को युरोपीय तर्ज पर ही विकसित किया गया है। पर, शहरीकरण की मांग और पूर्ति में असंतुलन की वजह से अधिकतर शहरों का एक बड़ा हिस्सा अनियोजित और अव्यवस्थित तौर पर बढ़ता जा रहा है। आज दिल्ली शहर की 80-85% आबादी अनियोजित रिहायशी क्षेत्रों में बसी हुई है। दिल्ली के कुल रिहायशी क्षेत्र का 24% हिस्सा ही नियोजित ढ़ग से विकसित है। मेरठ, पटना, कानपुर आदि-आदि शहरों की स्थिति तो और भी अधिक भयानक है । अनियोजित क्षेत्रों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि बिना जमीन के उपयोग की स्थिति को बदले ही राजनीतिक एवं प्रशासनिक मिली भगत से आर्थिक फायदे के लिए रातो-रात तंग बस्तियाँ बसा दी जाती है। इन कॉलोनियों में अलग से न तो सार्वजनिक स्कूलों के लिए कोई जगह होती है और न ही पार्कों और हस्पतालों आदि के लिए ही। (Madhuri, 2015) अतः अल्पविकसित देशों के शहरीकरण का एक बड़ा विरोधा भाष यह ही है कि एक तरफ मांग से पूर्णतः अपर्याप्त योजनाबध तरिके से “स्मार्ट सिटी”(व्यवस्थित शहर) बसाये जाते है, वही उस स्मार्ट सीटी के बाहर की पैरी-फैरी में घनी आबादी स्वतः बस जाती है। नियोजित शहर और इस क्षेत्रों की आबादी के घनत्व में जमीन आसमान का अंतर होता है। उदाहरण के लिए, दिल्ली के सभी क्षेत्रों की आबादी का न तो घनत्व (Density) ही समान है और न ही विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं हस्पतालों का आबंटन ही जनसंख्या-घनत्व के अनुरूप है। दिल्ली में नई दिल्ली, दक्षिण पश्चिम, दक्षिण दिल्ली की आबादी का घनत्व जहाँ क्रमशः 4000, 5446, 11000 हजार प्रति वर्ग किलोमीटर है। वहीं उत्तर पूर्व, पूर्वी दिल्ली की आबादी का घनत्व जहाँ क्रमशः 36,000, 27,000 हजार प्रति वर्ग किलोमीटर है। अब यदि तुलना अनियोजित और नियोजित आबादी में की जाए तो स्थिति और भी भयानक हो जाएगी।
1.4 शिक्षा प्रणाली पर अनियोजित शहरीकरण का प्रभाव
अब यदि शैक्षिक सुविधाओं की बात करे तो, वे इलाके जहाँ पर आबादी का घनत्व अधिक है, वहाँ आबादी के अनुपात में शैक्षिक संस्थाओं का नितांत अभाव है। वही इस शहर के अधिकतर गुणवतापूर्ण सरकारी एवं निजी शिक्षण संस्थान कम घनत्व वाले नियोजित इलाकों में ही स्थित है। एक अवलोकन के दौरान मैंने पाया कि शिक्षा स्वास्थ्य जैसी तमाम जनसुविधाओं से वंचित उत्तर पूर्व दिल्ली स्थित सोनिया विहार और उत्तरी पश्चीमी दिल्ली स्थित प्रेमनगर किराड़ी की आबादी नई दिल्ली (NDMC), भुसावल, सिरसा आदि शहरों से भी कही ज्यादा है, या बराबर है। इन रिहायसी क्षेत्रों की जनसंख्या की ताकत को इस तरह से समझा जा सकता है कि सोनिया विहार से इलाके से दो MCD के पार्षद चुने जाते है। किराड़ी गाँव के पास तो अपनी विधानसभा सीट भी है। पर दो MCD सीट देने वाले सोनिया विहार के पास एक ही प्राथमिक और एक ही माध्यमिक स्कूल बिल्डिंग है। जिसमें दो पाली में दो स्कूल चलते है। यही हाल किराड़ी का है। ये स्कूल 1990 की आबादी के हिसाब से प्रयाप्त है, पर प्रव्रजन की वजह से जिस अनुपात में जनसंख्या का घनत्व बढ़ा है, उस हिसाब से अब ये पूर्णतः अप्रयाप्त है।
इस प्रकार घनी आबादी की कच्ची कॉलोनियों में एक तरफ सरकारी स्कूलों का नितांत अभाव है। जिसकी वजह से सरकारी स्कूलों में विद्यार्थी शिक्षक अनुपात 100-150 या उस के भी अधिक हो जाता है। दूसरी तरफ, गली-गली में ‘कम लागत के निजी (तथाकथित) स्कूल’ खुल रहे है। इन स्कूलों में न तो अहर्तायुक्त सक्षम शिक्षक ही मौजूद है और न ही स्वस्थ और सुरक्षित शैक्षिक वातावरण ही। माता-पिता या तो, सही स्कूलों के अभाव में और/या आय के अभाव में और/या शिक्षाशास्त्र एवं शिक्षा अधिकार अधिनियम की समझ के आभाव में, इन खाना पूर्ति के निजी स्कूलों में ही अपने बच्चों का दाखिला दिलवाते है।
पर आश्चर्य तो तब होता है जब NUPAE जैसी संस्था इन स्कूलों में दाखिल 6-14 वर्ष के विद्यार्थियों को ‘शिक्षा अधिकार अधिनियम’ के तहत विद्यालयी शिक्षा प्राप्त करने वाले में गिनती शामिल कर लेती है।(DIAS Report) जबकी शिक्षक से लेकर तमाम तरह की शैक्षिक सुविधाओं तक से ये स्कूल नदा नद है?
1.5 शिक्षा का अधिकार
अब ‘शिक्षा के अधिकार’ का कदापि अर्थ ‘विद्यालयों की कैद’ तो, नहीं ही हो सकता। अब, जब यहाँ विद्यालयों की तुलना ‘जेलों’ से की जा रही है तो, इसका सीधा सा अर्थ है ‘शिक्षा के अधिकार’ का दायरा निशुल्क और अनिवार्य विद्यालयी दाखिले (शिक्षा) से कहीं आगे का है। “बच्चों का निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम यह अधिकथित करता है कि पाठ्यक्रम में कार्यकलाप ,अन्वेषण और खोज के माध्यम से शिक्षा प्राप्ति का प्रावधान होना चाहिए।” इसमें सभी के लिए गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा शामिल है न कि सिर्फ स्कूलों में होने वाले दाखिला भर। यदि शिक्षा प्रक्रिया में गुणवत्ता का अभाव है तो इसका सीधा सा अर्थ है कि बच्चों को उनके शैक्षिक अधिकार से वंचित किया जा रहा है।
1.6 छिपा शैक्षिक अपव्यय एवं ठहराव
शिक्षा का दायरा, लिखने पढ़ने की योग्यता से कही आगे है। प्रारंभिक कक्षाओं में तो प्रोन्नति (Promote) के बावजूद भी यदि विद्यार्थी माध्यमिक कक्षा में सुचारू रूप से शिक्षा ग्रहण करने की योग्यता से वंचित है, यहाँ तक कि प्रारंभिक कक्षा पास विद्यार्थी यदि आधारभूत लेखन कौशल भी हासिल नहीं कर पाता एवं ‘विवेचनात्मक कौशल’ की जगह सिर्फ जानकारियों का पुलिंदा ही हासिल कर पाता है। ऐसी शिक्षा उन विद्यार्थियों के जीवन और समाज के आर्थिक एवं सांस्कृतिक उत्थान में स्थाई ‘ठहराव’ ही पैदा ही नहीं करेगी, अपितु अवनति लाएगी।
प्रारंभिक कक्षा के विद्यार्थियों को भी NCF-2005 में वर्णित एवं RTE-2009 में अधिनियमित बालकेन्द्रित विधि से सीखने का वातावरण नहीं मिला तो, वे ‘शिक्षा के मौलिक अधिकार(अनुच्छेद 21A)’ से वंचित ही है। प्रारंभिक कक्षा पास करने वाले ये विद्यार्थी ‘छद्म रूप से ही शिक्षितों’ में गिने जाएंगे। पर हकीकत में ये सभी विद्यार्थी ‘सीखने के आभाव (Learning Deficit)’ से ग्रसित है। ऐसी विद्यालयी व्यवस्था धन, उर्जा और समय का अपव्यय कर, उनके जीवन में स्थाई ठहराव लाएगी। हकीकत में ऐसे विद्यार्थियों ने अपने जीवन के आठ सालों को विद्यालय में व्यर्थ ही गंवाता है।
ऐसे सरकारी या निजी स्कूल, जो किसी भी तरह से रचनात्मक एवं विवेचनात्मक शिक्षण के लिए उपर्युक्त नहीं है। पर आश्चर्य तो तब होता है जब NIEPA जैसी संस्था द्वारा तैयार DIAS Report(NIEPA) में ऐसे ‘Learning Deficiency’ वाले स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को RTE-2009 के अनुरूप शिक्षा का अधिकार प्राप्त करने वालों में गिना लिया जाए। अब या तो RTE में ही खामी है या NIEPA जैसी संस्था के अनुसंधान प्रक्रिया में कि ‘Learning Deficiency’ से ग्रस्त बच्चों को RTE के तहत शिक्षा अधिकार प्राप्त बच्चों के दायरे में गिना जाता है।
1.7 छिपे अपव्यय एवं ठहराव पर रोकने हेतू ‘क्रांतिक न्यूनतम प्रयत्न’ अनिवार्यता
किसी भी समाजिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आर्थिक संसाधनों को जुटाने की भी जरूरत होती है। अतः हर रिहायसी क्षेत्र के, हर विद्यालय में गुणवतापूर्ण शिक्षा के न्यूनतम स्तर के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ‘वास्तविक क्रांतिक निवेश’ का एक न्यूनतम स्तर अनिवार्य है। यदि संसाधनों को न्यूनतम क्रांतिक स्तर से कम जुटाया जाए तो, निर्धारित लक्ष्य प्राप्त करना संभव नहीं होगा।
“पिछड़ेपन की स्थिति से अधिक विकसित स्थिति में संक्रमण करने के लिए, जहां से हम स्थिर समान वृद्धि दर की उम्मीद कर सकते हैं, यह आवश्यक है, हालांकि हमेशा पर्याप्त स्थिति नहीं है, उसी बिंदु पर या इसी अवधि के दौरान, अर्थव्यवस्था को विकास के लिए एक प्रोत्साहन प्राप्त करना चाहिए जो एक निश्चित क्रांतिक न्यूनतम आकार का हो “– लाइबेनस्टीन
क्रांतिक न्यूनतम प्रयत्न के इस सिद्धान्त को यदि मार्गदर्शक सिद्धान्त के रूप में देखे तो शिक्षा के क्षेत्र में न्यायौचित स्तर पर, समतामूलक तरिके से न्यूनतम क्रांतिक निवेश की ही आवश्यकता नहीं, उस निवेश का प्रभावपूर्ण प्रतिफल प्राप्त करने के लिए संस्थागत एवं व्यवस्थागत ढांचे मे भी परिवर्तन अनिवार्य है। अब यदि उस क्रांतिक न्यूनतम स्तर से कम का निवेश होगा और लक्ष्य के अनुरूप संस्थागत ढ़ांचे में परिवर्तन नहीं होगा, तो कभी भी निर्धारित लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकेगा। उदाहरण के तौर पर, शिक्षा पर पैसा खर्च तो हो रहा हो, पर वह किसी भी तरह से शिक्षा अधिकार अधिनियम या इस विषय पर गठित आयोगों के द्वारा सुझाई स्थिती को प्राप्त करने के अनुकूल नहीं है तो, हम जहां से चले थे, वही पर लुढ़क कर पहुंच जाएंगे। अर्थात किया गया सब निवेश सब पूर्णतः व्यर्थ । इस प्रकार हम शिक्षा के क्षेत्र में ‘ठहराव’ की स्थिति में ही होंगे और शिक्षा के क्षेत्र में जो भी निवेश होगा वह सब का सब व्यर्थ ‘अपव्यय’ होगा। यह तो स्थिर जनसंख्या की स्थिति का वर्णन था।
1.8. अब बढ़ती जनसंख्या की स्थिति में
तेजी से बढ़ती शहरी आबादी की वृद्धि दर के मुकाबले, यदि शिक्षा में होने वाले निवेश की वृद्धि दर अधिक नहीं तो, एक समय में क्रांतिक न्यूनतम स्तर से ऊपर का इलाका भी क्रांतिक न्यूनतम स्तर से नीचे आ जाएगा। अतः किसी भी रिहायसी क्षेत्र में किया जाने वाला शिक्षा पर निवेश, उस क्षेत्र की जनसंख्या वृद्धि (जन्मदर-मृत्यु दर+ पलायन) दर(विशेषः बाल जनसंख्या वृद्धि दर) से अधिक होना चाहिए। नहीं तो, उस क्षेत्र विशेष के लोगों की जीवन गुणवता में विकास के स्थान पर, ह्रास होने लगेगा।
- इस विश्लेषण के आधार पर हम कह सकते है कि शहरीकरण की प्रक्रिया को व्यवस्थित किये बिना क्या शिक्षा के अधिकार का कार्यान्वयन संभव नहीं है?
- तंग गलियों में, तंग दरवाजे के साथ तंग इमारत वाला एक निजी स्कूल बच्चों के जीवन के साथ खेल रहा है। परसवाल यह है कि सरकार ऐसे स्कूल चलाने की अनुमति ही क्यों और कैसे देती है? जहाँ न तो कोई फायर ब्रिगेड और न ही कोई अन्य सहायता दल पहुंच सकता है।
- अब यदि अनियोजित क्षेत्र में बच्चों के समग्र विकास के लक्ष्य के अनुरूप विद्यालय संभव ही नहीं, तो यह भी छात्रों की शिक्षा के अधिकार का हनन ही है?
- बच्चों को उनका शिक्षा अधिकार उपलब्ध कराने के लिए विद्यालयी व्यवस्था के नियोजन के साथ, अनियंत्रित शहरीकरण को नियंत्रित कर शहरीकरण के नियोजन की भी आवश्यकता है।
क्या अनियोजित शहरीकरण बच्चों के जीने के अधिकार का अतिक्रमण नहीं ?
1.9. गरीबी का दुष्चक्र बनाम विषमता का दुष्चक्र
अर्थशास्त्री प्रो. रागनर नर्क्से द्वारा प्रतिपादित ‘गरीबी के दुष्चक्र’ की अवधारणा के अनुसार अल्पविकसित देश गरीबी के दुष्चक्र में फंसे होते है। यह दुष्चक्र अनेक शक्तियों का ऐसा घेरा होता है। जो एक दूसरे के साथ ऐसी क्रिया-प्रतिक्रिया करता है। जिसकी वजह से निर्धन-निर्धन बना रहता है। प्रो. नर्क्से ने गरीबी को ही गरीबी का मुख्य कारण माना है। जबकि शिक्षाविद पाउलो फ्रेरे के शिक्षाशास्त्र के अनुसार इस (गरीबी) विभीषिका का राज विषमता में छिपा है। विषमता का प्रकट रूप गरीबी में दिखाई देता है। समस्या को गरीबी कहना ही एक गलत प्रस्थान बिन्दु है। गरीबी उत्पीडन का एक सुविधाजनक और भ्रामक नाम है। उत्पीडित को गरीब बता कर उत्पीडक वर्ग उसकी स्थिति और हैसियत को वैध ठहराने में समर्थ होता है। अतः उत्पीड़न का परिणाम, गरीबी की अमानवीय स्थिती पूंजी के अभाव के कारण नहीं है। यह उत्पीडक वर्ग द्वारा लगातार उत्पीडित वर्ग अर्थात आर्थिक एवं समाजिक रूप से कमजोर वर्ग का शोषण किये जाने की वजह से है। पाउलो फ्रेरे आगे कहते है, ‘‘शोषक और शोषित दोनों का अमानुषीकरण मानवीय विडंबना है। इस दो तरफा अमानवीकरण से इंसानी नियति को बचाने की क्षमता एवं जिम्मेदारी शोषक के पास न होकर शोषित की ही है।“ स्पष्ट है शोषक यथास्थिती के बनाए रखने से लाभ की स्थिती में है। वह भला क्यों इस स्थिती में बदलाव लाना चाहेगा? अतः यथास्थिती में बदलाव लाने का जिम्मेदारी उत्पीडित की ही है। पर क्या शिक्षातंत्र के स्तरीकरण के माध्यम से उत्पीड़न तंत्र को चलाए रखने की चेतना उत्पीडित वर्ग (जनसामान्य) की है?
विष्मता (गरीबी) के दुष्चक्र को तोड़ने के लिए रचनात्मक-विवेचनातमक शिक्षा महत्वपूर्ण औजार हो सकता है। पाउलो फ्रेरे के अनुसार शिक्षा भी राजनीति है। जिस तरह राजनीति वर्गीय होती है, उसी तरह शिक्षा भी वर्गीय होती है। शिक्षा के वर्गीय होने का सीधा सा अर्थ शिक्षा के पाठ्यक्रम, पाठ्यचर्या एवं प्रावाधानों का किसी वर्ग विशेष के हितों के अनुरूप होना। शिक्षा के ढर्रे को कक्षाओं ‘समाजिक पूंजी’ के विविध पायादानों पर बैठे व्यक्तियों का भविष्य उनकी ‘स्कूलिंग’ की प्रक्रिया ही तय कर रही है। अब जरा विजय रैना द्वारा हिन्दी में रूपांतरित पुस्तक खतरा स्कूल के “जैसा बाप – वैसा बेटा” अध्याय में चित्र के माध्यम से जो सवाल उठाया गया है। उस सवाल को यदि हम भारतीय स्कूली ढांचे के संदर्भ में देखें तो, सवाल उठता है कि एक जैसे पाठ्यक्रम वाली, विविध समाजिक-आर्थिक हैसियत वाले स्कूली व्यवस्था में पाठ्यचर्या को लागू करने के तरिकों में अंतर की वजह से एक स्तर की कक्षा पास विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धियों में संभवतः एक सार्थक अंतर है। यह अंतर स्कूलों के स्तर की विविधता का या विद्यार्थियो की अपनी क्षमता का। इस पर सवालीया निशान है? उच्च शिक्षा में श्रेष्ट इलाकों के श्रेष्ट माने जाने वाले विद्यालयों के विद्यार्थियों का ही प्रवेश देखा गया है। क्यों? हर क्षेत्र के सर्वोच्च पदों जैसे नौकरशाह, प्रोफेसर, प्रबंधक, डॉक्टर, इंजिनियर, सैन्य अधिकारी, यहाँ तक कि लोकप्रिय एवं धनअर्जन करने वाले खेलों के खिलाड़ी तक सभी इसी श्रेष्ट माने जाने वाले स्कूलों के रास्ते आते है या सभी स्तर के स्कूलों की इसमें समान भागीदारी होती है? सिक्यूरिटी गार्ड, हेल्पर आदि की स्कूलिंग किस ढर्रे के स्कूलों में हुई है? निम्न आय वर्ग एवं निम्न स्तर के विद्यालयों के विद्यार्थी कामचलाऊ तौर पर ही साक्षर हो पाते है? अपवाद समाज विज्ञान की वास्तविकता ही नहीं, यथास्थिती को बनाए रखने का सेफ्टीवॉल भी होता है। पर क्या समाजिक यथार्थ यह नहीं कि किसी बच्चे का भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस तरह की पृष्ठभूमि से संबंधित है? क्या गली नुक्कड़ के स्कूलों और बढ़ती आबादी की जरूरत के हिसाब से नाकाफी सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों और उन्हीं के समकक्ष उच्च स्तर के निजी और सरकारी स्कूलों(प्रतिभा, केन्द्रीय स्कूलों) में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की शैक्षिक गुणवता में अंतर उनके स्कूलों के स्तर में अंतर की वजह से है? यदि हाँ, तो क्या उनकी शिक्षा पर होने वाला अपर्याप्त व्यय एक अपव्यय नहीं और उन विद्यार्थियों के जीवन में स्थाई ठहराव पैदा करने वाला नहीं?
1.10 ‘क्रांतिक न्यूनतम प्रयत्न’ का ‘सामूहिक क्रांतिक न्यूनतम चेतना’ से संबंध
इवान इलिच भी जब डिस्कूलिंग सोसायटी में स्कूलों को भंग करने की बात करते है तो वे वहाँ स्कूल के माध्यम से से एक खास तरह के सांचे में ढ़ालने की प्रक्रिया अर्थात ‘स्कूलड’ पर अंकुश लगाने की बात कर रहे है। वे कहते है, “स्कूल रूपी संस्था इस सिद्धांत पर स्थापित है कि सीखना (स्कूली) शिक्षण का परिणाम है।” और “जिसे हम आजकल ‘शिक्षा’ कहते हैं, वह उपभोक्ता माल है, जिसका उत्पादन ‘स्कूल’ नाम की संस्था द्वारा होता है। इसलिए कोई व्यक्ति जितना अधिक तथाकथित श्रेष्ट विद्यालयों की शिक्षा का उपभोग करता है, उसका अपना भविष्य उसे उतना ही अधिक सुरक्षित महसूस होता है। साथ ही साथ, ज्ञान के पूँजीवादी तंत्र में अपना दर्ज़ा वह उतना ज़्यादा ऊँचा उठाने में सफल रहता है। इस तरह शिक्षा समाज के पिरामिड में एक नया वर्ग बनाती है और जो शिक्षा का उपयोग करते हैं, वे यह दलील पेश करते हैं कि उन्हीं से समाज को ज़्यादा फायदा होगा।” जैसा देखा गया है कि नियोजित क्षेत्र की तुलना में, तो अनियोजित क्षेत्र के निजी और सरकारी स्कूलों की स्थिति बदतर हैं। निजी और सरकारी स्कूलों के भी अलग-अलग स्तर हैं। इन स्कूलों में विद्यार्थियों का दाखिला पूर्णतः उनके माता पिता की समाजिक एवं आर्थिक हैसियत का प्रतिफल है। तो क्या हम यह माने कि नियोजित और अनियोजित क्षेत्र के स्कूलों के बीच का अन्तर लोगों के सामाजिक हैसियत के अंतर का प्रतिफल है और उसी को बनाए रखने के लिए है?
माइकल ऐप्पल ‘आधिकारिक ज्ञान’ पुस्तक में कहते है कि शिक्षा की व्यवस्था पर निजी क्षेत्र का दबदबा दक्षिण पंथी सांस्कृतिक वर्चस्व की रणनीतियों का हिस्सा है। स्कूल के भीतर की गतिविधियाँ इस प्रकार से संचालित की जाती है कि वे निजी और व्यावसायिक क्षेत्र के आर्थिक आधार को कायम रखने वाली समाजिक अद्योसंरचना को मजबूत बनाने में सहायक हो।
- अब उनकी इस बात को भारतीय संदर्भ में देखने का प्रयास करें,
- भारतीय संविधान सभा द्वारा शिक्षा को मौलिक अधिकार के खंड से निकाल कर नीति निर्देशक सिद्धान्तों के खंड मे डालना,
- संविधान के लागू होने के दस वर्ष के भीतर 0-14 साल के बच्चों की हर भरसक प्रयत्न(न्यूनतम क्रांतिक प्रयत्न) करने के संविधानिक वादे के वावजूद शिक्षाव्यवस्था का जस का तस बना रहना।
- कोठारी आयोग(1964-66) की समान विद्यालयी व्यवस्था की अनुशंसा के बावजूद भी, विद्यालयी व्यवस्था का असमान रहना,
- 1993 के मोहिनी जैन और उन्नीकृष्णन्न वाद के फैसलों से शिक्षा के मौलिक अधिकार बनने के बाद, अनुच्छेद 45 की भाषा को 86वें संशोधन में संकुचित कर 21A लाना
- 21A में शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के बावजूद भी विद्यालयों के विविध स्तर का बने रहना,
1.11 निष्कर्ष बिन्दु
किसी भी राष्ट्र की समृद्धि एवं सुव्यवस्था का स्तर सुशिक्षित जनसंख्या का समानुपातिक होता है। आज वे ही देश तरक्की कर रहें है जो वैज्ञानिक(रचनात्मक एवं विवेचनात्मक) एवं तकनीकी रूप से सुशिक्षित है। शहरी गैर नियोजित क्षेत्रों में उन सामाजिक, संथागत एवं व्यवस्थागत बाधाओं के बने रहना चिंता का विषय है, जो वंचित वर्ग के बच्चों की मानवीय क्षमता को सीमित करती है। जो लोग अपने बच्चों को शिक्षक और शैक्षिक सुविधाओं से अभाव ग्रस्त स्कूलों में दाखिला करा रहे है, क्यों नहीं वे लोग समान विद्यालयी व्यवस्था की मांग कर रहे है? दूसरा बड़ा सवाल क्या इतनी घनी अबादी में, अबादी के अनुपात में स्कूल संभव भी है? यदि नहीं, तो लोगों के शैक्षिक अधिकारों की रक्षा के लिए, शिक्षा का अधिकार अधिनियम और शहरी नियोजन अधिनियम कानून के बीच समन्वय की आवश्यकता है। ऐसी स्थिति में सिद्धांतिक रूप से ‘शिक्षा अधिकार अघिनियम 2009’ के लागू होने के बावजूद भी बच्चों को ‘गुणवतापूर्ण शिक्षा’ के अधिकार से वंचित स्थिती में देख कर व्याग्रित है।
लोगों में सामूहिक ‘क्रांतिक न्यूनतम शिक्षाशास्त्रीय चेतना’ के अभाव एवं दक्षिणपंथी राजनीति के सांस्कृति वर्चस्व की वजह से ही शिक्षा में क्रांतिक निवेश की मांग नहीं हो रही है। शिक्षा में विषमता दक्षिणपंथी रूढ़िवादी राजनीतिक एजेंडें के सांस्कृतिक वर्चस्व को कायम रखने की नीति का ही हिस्सा है। सार्वजनिक एवं निजी विद्यालयों का विविध स्तर पाठ्यक्रम, पाठ्यचर्या, पाठ्यपुस्तकों एवं शिक्षण का विविध स्तर इसी सांस्कृतिक वर्चस्व को बनाए रखने का उपकरण है। अतः शिक्षा में क्रांतिक निवेश हो इसके लिए लोगों के शिक्षाशास्त्रीय चेतना को जगाने की जरूरत है।
बाज़ारवाद, विज्ञापन और बचपन-डाॅ. प्रीति अग्रवाल

बाज़ारवाद, विज्ञापन और बचपन
डाॅ0 प्रीति अग्रवाल पोस्ट डाॅक्टोरल रिसर्च फेलो लखनऊ विश्वविद्यालय लखनऊ मो0नं0-9695683926 Email-preetiagarwal.lko1@gmail.com
वर्तमान समय के बाजारवादी व उपभोक्तावादी समाज में पूंजीवादी प्रचार तन्त्र की एक व्यापक परिघटना के रूप में फैला विज्ञापनों की दुनिया का तिलिस्म लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है। टी0वी0, अखबार, रेडियो, पत्र-पत्रिकाएं, इन्टरनेट, सड़कों के किनारे लगे बोर्ड, बस-स्टाॅप, रेलवे स्टेशन सब कहीं विज्ञापनों की भरमार है। इस बाजारवादी तथा उपभोक्तावादी संस्कृति में शिक्षा, चिकित्सा, कला, साहित्य, संस्कृति मीडिया, धर्म, खेल, राजनीति सब एक ‘प्रोडक्ट’ के रूप में तब्दील हो चुके हैं और खरीदे-बेचे जा रहे हैं। वैश्विक पूंजी के नियन्त्रण ने इनमें अनेक विकृतियां पैदा की हैं। आज बाजार हमारी जरूरतों पर निर्भर नहीं बल्कि वह खुद हमारी जरूरतें निर्धारित कर रहा है और मीडिया इसमें घी का काम कर रहा है। बाजार जहां मनुष्य को अब मात्र एक ‘उपभोक्ता’ के रूप में देखता है वहीं विज्ञापन जगत उस उपभोक्ता को विज्ञापित सामानों के अधिकाधिक उपभोग द्वारा ही स्वयं को अच्छा, स्मार्ट और आधुनिक साबित करने के लिए उकसाता है। आज विज्ञापन केवल वस्तुओं व सेवाओं की मार्केटिंग का माध्यम भर नहीं हैं अपितु पूंजीवाद के एक धारदार औजार के रूप में इसका तेवर उत्तरोत्तर आक्रामक और खतरनाक होता जा रहा है। कुछ भी करके अपने प्रोडक्ट कोे भौतिक बाजार में ही नहीं बल्कि लोगों के मन-मस्तिष्क में उतारकर उनकी मानसिकता पर वार करना ही अब विज्ञापनों का लक्ष्य बनता जा रहा है। लुभावने विज्ञापनों द्वारा हमारी सोंच को इस प्रकार भ्रमित कर दिया जाता है कि हमें विज्ञापनों में दिखाया गया हर झूठ सच लगता है और हम अपने विवेक को ताक पर रखकर सम्मोहित सा व्यवहार करते हैं। टीवी विज्ञापनों का उद्देश्य है खरीददार की बची खुची तर्क शक्ति समाप्त करना, विनिमय की आंतरिक तर्कबद्धता को अनावश्यक उपभोग की निम्नतम इच्छा में रूपांतरित करना। कई उदारपंथी और माक्र्सवादियों द्वारा स्वीकृत इस विचार के अनुसार अपनी बिक्री बढ़ाने और बाजार में हिस्सेदारी बनाए रखने के लिए विज्ञापनकर्ता कुछ भी कर सकते हैं।1 बच्चे उपभोक्ताओं के एक ऐसे बहुमूल्य एवं विशिष्ट वर्ग को निर्मित करते हैं जिनसे मजबूत संबंध स्थापित करने का प्रयास प्रत्येक विपणनकर्ता करता है। इस कार्य के लिए बाजार विज्ञापनों को एक माध्यम के रूप में प्रयोग करता है। यह एक आभासी दुनिया है जिसके जरिये हमें बताया जाता है कि हमारी प्रसन्नता, प्रतिष्ठा और आधुनिकता सभी इन वस्तुओं के उपभोग की समतुल्यता से निर्धारित होती है। जहां तक बच्चों का प्रश्न है, इलेक्ट्रानिक मीडिया आज बच्चों का मित्र, मार्गदर्शक तथा गुरू बनता जा रहा है। आज हम अपने बच्चों को सभी संभव सुख-सुविधाएं तो दे रहे हैं, किन्तु समय नहीं। बच्चे अपना अकेलापन तमाम तरह के इलेक्ट्रानिक उपकरणों जैसे-टी0 वी0, मोबाइल, कम्प्यूटर इन्टरनेट आदि के साथ बांट रहे हैं। बच्चों का बड़ों के साथ संवाद घटता जा रहा है। वैश्वीकरण ने आज इन उपकरणों की भूमिका पूरी तरह बदल दी है। ये सभी माध्यम अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और लोकशिक्षण के दायित्व से कट चुके हैं और मात्र कारोबारी हित साधन में लिप्त हैं। बच्चे कल्पनाशील होते हैं। मीडिया की सतरंगी चमक उनकी कल्पना से मेल खाती है, अतः वे आसानी से मीडिया के प्रभाव में आ जाते हैं। मीडिया ही आज बच्चों की भाषा, संस्कार, व्यवहार, चिंतन, व्यक्तित्व आदि सभी को प्रभावित कर रहा है।2 उनका कोमल और सरल मन कल्पना और यथार्थ का अन्तर नहीं पहचानता अतः इनमें दिखने वाले पात्र, उनका व्यवहार, भाषा, वेषभूषा और कार्यशैली को आदर्श मानकर बच्चे उनका पूर्णतः अनुकरण करना चाहते हैं। सुप्रसिद्ध मीडिया समालोचक सुधीश पचैरी का मत है कि बच्चे निष्क्रिय उपभोक्ता होते हैं और विज्ञापनों की झनकार से सम्मोहित हो जाते हैं। उन्हें जो पसंद है वह हर कीमत पर उन्हें चाहिए।3 चिन्ता की बात यह है कि विज्ञापन कम्पनियों ने अपने प्रोडक्ट का बाजार भविष्य के लिए सुनिश्चित करने हेतु बच्चों को अपना ‘टारगेट’ बना लिया है। वर्तमान में जनमाध्यम बच्चों को उपभोक्ता की स्थिति में देख रहे हैं उन्हें बचपन भी तभी मान्य है जब वह उपभोक्ता होकर आता है जहां ऐसा नहीं होता वहां बाजार बालश्रम व बालमन के दोहन के पुराने हथियारों को और भी पैना व धारदार बनाकर उसकी मासूमियत के विरोध में प्रयुक्त करता है। अब हिंसा, कामुकता, रोमांस, संगीत, विज्ञान, खेल, धारावाहिक, कार्टून और सीरियल आदि को बचपन से नत्थी करके प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि उसमें छुपी उपभोगवादी मानसिकता को मासूमियत में लपेट कर मन मस्तिष्क में इस तरह बैठा दिया जाए कि प्रतिवाद होने की संभावना ही लगभग समाप्त हो जाए। बचपन का प्रतिरोध आसान नहीं होता और बचपन द्वारा प्रायोजित वस्तु विशेष की इमेज को तोड़ना लगभग असंभव कार्य होता है, यह तथ्य पूंजीवाद, बाजार और विज्ञापन बखूबी जानता है। बच्चों के संदर्भ में विज्ञापनों की वैचारिक तत्व नीति को देखने पर कुछ मुख्य पहलू सामने आते हैं-
पहली तरह के विज्ञापन वे हैं, जिनमे बच्चे प्रमुख भूमिकाओं में हैं और विज्ञापित वस्तु व उत्पाद सीधे उनसे संपृक्त हैं।
दूसरी तरह के विज्ञापनों में बच्चे प्रमुख भूमिकाओं में तो हंै परंतु विज्ञापित वस्तु व उत्पाद सीधे उनसे संपृक्त नहीं हैं।
तीसरे तरह के विज्ञापनों में बच्चे प्रमुख भूमिकाओं में नहीं है तथा उत्पाद से भी प्रत्यक्षतः संबंधित नहीं है परंतु उनकी उपस्थिति समस्त वातावरण को विश्वसनीय बनाने में योगदान देती है। भारतीय परिवार की छवि को सजीव बनाने की रणनीति विज्ञापन में घर के भीतर बच्चों को दिखाने पर बल देती है।
विज्ञापन जब बाल छवियों का प्रयोग करता है तो इस प्रचार अभियान के द्वारा सीधे-सीधे उसके व्यवहार द्वारा हमला बोला जाता है। उसकी सारी बाल-छवियों, आचरण और क्रीड़ाओं को उत्पादक विज्ञापन में समाहित कर लेता है और इस तरह उसे एक आदर्श ग्राहक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि अब वह आम ग्राहक का आदर्श बन जाता है।4 शैम्पू, तेल, साबुन, कार, कपड़े, जूते, फोन, फर्नीचर, मकान, शीतल पेय हर विज्ञापन में एक न एक बच्चा अवश्य मौजूद है। बच्चों के लिए यह चमक-दमक से भरा ‘मायालोक‘ एक आदर्श दुनिया है जिसे वह हर कीमत पर पाना चाहता है। बच्चे बाजार की चालों को समझने में असमर्थ हैं। बच्चों को प्रभावित करने के लिए अधिकतर विज्ञापनों में बाल कलाकारों को माॅडल के तौर पर लिया जा रहा है। विज्ञापनों के ये बच्चे आम बच्चों को लुभाते हैं। उनके जैसा दिखने के लिए, अपने दोस्तों के बीच दिखाने के लिए कि ‘मैं किसी के कम नहीं’ या अपने दोस्तों की बराबरी करने के लिए बच्चे अब वस्तु नहीं बल्कि ‘ब्रांड’ मांगते हैं और इच्छित वस्तुएं पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। विज्ञापनों के इस भ्रामक संसार ने बच्चों के खान-पान की रुचियों व जीवन शैली को बदल दिया है जिससे उनके शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। एक बड़ी संख्या में खाद्य सामग्री से संबंधित विज्ञापन या तो बच्चों के टीवी चैनलों पर प्रसारित किए जाते हैं या उन प्राइम चैनलों पर प्रसारित किए जाते हैं जिन्हें बच्चे देखते हैं। यदि बचपन से संबंधित सर्वाधिक विज्ञापित किए जाने वाले खाद्य पदार्थों की बात करें तो उनमें मीठे खाद्य पदार्थ, कैंडी, डेजर्टस, कम पोषक पेय पदार्थ एवं नमकीन स्नैक्स जिन्हें सामूहिक रूप से ‘बिग फाइव’ खाद्य पदार्थ कहते हैं, इस श्रेणी में आते हैं यह वे उत्पाद हैं जिनके लिए बच्चे बार.बार अपने अभिभावकों से अनुरोध करते हैं। विज्ञापन दाता आमतौर पर अपने संभावित ग्राहकों को आकर्षित करने तथा बच्चों से अपने मजबूत संबंध स्थापित करने हेतु अपने विज्ञापनों में मस्ती, कल्पना, हास्य भाव, एनिमेशन आदि पर अपना सारा ध्यान केंद्रित करते हैं किंतु उनके इस प्रयास में इन खाद्य पदार्थों के पोषण संबंधी पहलुओं को साफ तौर पर नजर अंदाज कर दिया जाता है। इतना ही नहीं अपने उत्पाद के संवर्द्धन एवं समर्थन हेतु प्रायः बच्चों के लोकप्रिय कार्टून चरित्रों और मशहूर हस्तियों के नाम का भी विज्ञापनों में प्रयोग होता है कुछ विपणनकर्ता तो अपने उत्पाद का नामकरण ही विभिन्न कार्टून चरित्रों के नाम पर करते हैं जो मासूम बचपन को प्रभावित करने वाले कारक के रूप में उचित नहीं कहा जा सकता, उनके इस कृत्य को बचपन के ‘भावात्मक दोहन’ की श्रेणी में रखा जा सकता है।5 विभिन्न प्रकार के पोषक तत्वों से भरपूर भोज्य सामग्रियों के बजाय बच्चे अब फास्ट-फूड चाउमिन, पित्ज़ा, बगैर, चिप्स, चाॅकलेट, कोल्ड डिंक्स, केक, ब्रेड, बन आदि में ही रूचि रखते हैं। सर्वेक्षणों में यह तथ्य सामने आया है कि बच्चों में शर्करा, कोलेस्ट्रोल, उत्तेजना, तनाव, मानसिक विकार आदि बढ़ रहा है। उनकी शारीरिक क्षमता में कमी आती जा रही है जबकि मोटापा बढ़ रहा है। आंख व दांत छोटी उम्र में ही खराब हो रहे हैॅं। वे बीमारियां जो पहले केवल प्रायः प्रौढ़ों एवं बूढ़ों की मानी जाती थीं-मधुमेह, ब्लडप्रेशर, नेत्र रोग, हृदय रोग तथा पाचन तंत्र की गड़बड़ी आदि, अब बच्चों में तेजी से घर करती जा रही हैं। यही नहीं उनके मन-मस्तिष्क पर भी इसका गहरा असर है। ललचाऊ और भड़काऊ विज्ञापन उन्हें चिड़चिड़ा, फिजूलखर्च, जिद्दी, क्रोधी व हिंसक बना रहे हैं। लेडी इरविन काॅलेज की आहार विशेषज्ञ डाॅ0 सुषमा शर्मा कहती हैं कि ‘‘नूडल्स और झागवाले पेय जैसे फटाफट भोजन और आचरण में बदलाव के बीच एक तरह का संबंध है।’’ नेपाल में मध्यवर्ग के बच्चों की खान-पान संबंधी आदतों पर हाल में हुए एक अध्ययन से पता चलता है कि सप्ताह में तीन बार इस तरह का भोजन करने वाले बच्चे एकाग्रता की कमी से पीड़ित थे और अति चंचल भी। वे कहती हैं कि ‘अति चंचल बच्चे झगड़ालू बन जाते हैं।‘6 टेलीविजन बच्चों के जीवन में एक इलेक्ट्रॉनिक बेबी सीटर के रूप में प्रवेश करता जा रहा है बच्चे अपने समय का एक बड़ा भाग टेलीविजन देखने में व्यतीत करते हैं जिससे उनका संबंध टेलीविजन पर प्रसारित कार्यक्रमों के माध्यम से बढ़ता जाता है और विभिन्न प्रकार के उस्तादों के विषय में उनकी जानकारी में वृद्धि होती रहती है, कभी-कभी तो यह जानकारी इतनी बढ़ जाती है यह बच्चे अपने परिवार के अन्य सदस्यों को खरीदारी करने में सहयोग करते हैं और कहीं-कहीं तो वे परिवार के लिए स्वयं ही स्वतंत्र खरीदारी करते हैं। टेलीविजन पर लगातार आने वाले खाद्य पदार्थों के विज्ञापनों तथा बच्चों की इन विज्ञापनों के प्रति बढ़ती हुई रूचि के कारण इन उत्पादों एवं ब्रांडों के प्रति बच्चों की ब्रांड निष्ठा स्थापित हो जाती है, ऐसी स्थिति में माता-पिता के लिए बच्चों के खान-पान पर कठोर नियंत्रण करना असंभव सा हो जाता है। इतना ही नहीं उन लोगों द्वारा लगातार किसी उत्पाद का निषेध एवं उसको खरीदने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करना दुष्कर होता है और यदि वे फिर भी ऐसा करने का प्रयास करते हैं तो यह क्रिया बच्चों और उनके मध्य गतिरोध एवं संघर्ष को जन्म देती है। कुछ माता-पिता बच्चों के साथ टेलीविजन देखते हुए सक्रिय मध्यस्थता का कार्य करते हैं अर्थात अभिभावक बच्चों को मीडिया के सकारात्मक या नकारात्मक पहलुओं से अवगत कराते चलते हैं। इस प्रकार अभिभावक विज्ञापनों के दुष्परिणामों को कम करने में समर्थ हो सकते हैं क्योंकि जब अभिभावक बच्चों के साथ प्रोग्राम सामग्री पर चर्चा करते हैं तो यह चर्चा बच्चों को कार्यक्रम का मूल्यांकन करने में मदद करती है बच्चों को टेलीविजन से अधिक से अधिक सीखने के लिए प्रेरित भी करती है। विज्ञापनों के प्रति दृष्टिकोण संचार की प्रकृति एवं परिवारों द्वारा बच्चों के पालन-पोषण के तरीके आदि कुछ ऐसे महत्वपूर्ण घटक हैं, जिनके द्वारा विभिन्न परिवारों द्वारा प्रयुक्त मध्यस्थता शैली निर्धारित होती है। भारतीय परिवेश में टेलीविजन विज्ञापन के प्रति स्थापित धारणा है कि विज्ञापन एक अवैयक्तिक संप्रेषण है जिसका उद्देश्य विज्ञापन देखने वाले को नवीन उत्पादों से अवगत कराना एवं उसे बाजार के बारे में शिक्षित करना है तथा विज्ञापन उपभोक्ताओं के हाथ में एक उपयोगी सूचना अस्त्र है, किन्तु दिल्ली के 9 जनपदों में से 1000 परिवारों का चयन कर उनके बीच किए गए सर्वेक्षण से इस तथ्य का खुलासा होता है कि जब अभिभावकों से यह पूछा गया कि क्या उनकी राय में विज्ञापन बच्चों पर खाद्य सामग्री तथा खिलौने आदि खरीदने के लिए दबाव बनाते हैं, तो लगभग 72 प्रतिशत से भी ज्यादा उत्तरदाताओं ने यह स्वीकार किया तथा लगभग 76 प्रतिशत अभिभावक यह मानते हैं कि आधुनिक विज्ञापन बच्चों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते हैं। 71 प्रतिशत से भी ज्यादा उत्तरदाताओं का यह मानना है कि अभिभावकों तथा बच्चों के बीच संबंध को दर्शाने वाले आकर्षक विज्ञापनों के बार-बार दिखाए जाने के कारण विशिष्ट उपभोग प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है। 72 प्रतिशत से भी ज्यादा लोगों ने माना कि बहुराष्ट्रीय निगम बच्चों को अपने बाजार के केवल एक भाग के रूप में देखते हैं तथा वे उन बच्चों की भावनाओं के संदर्भ में कुछ नहीं सोंचते, जो उनका उत्पाद खरीदते हैं।7 इस प्रकार विज्ञापन बचपन संबंधी सभी पूर्व धारणाओं को उलट-पलट रहा है और जो नई इमेज बना रहा है वे संदर्भों के अभाव में भावहीन, अतार्किक, गतिशील एवं उत्तेजक हैं। आज विज्ञापनों की यह तिलिस्मी दुनिया हमारे बच्चों को कौन से स्वप्न बेच रही है, उनके सामने कौन से मूल्य गढ़ रही है, बच्चों के रोल माॅडल्स आज कौन बन रहे हैं, उनके व्यवहार में किस प्रकार के परिवर्तन परिलक्षित हो रहे हैं, उनका शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य किस प्रकार प्रभावित हो रहा है, इन सभी तथ्यों की जांच, पड़ताल करना अपरिहार्य है।
सन्दर्भ सूची
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आज की दुनिया में सूचना पद्धति-मार्क पोस्टर, 2010, पृ0-77
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वर्तमान परिवेश और बच्चों पर दबाव- लेख, डाॅ0 रवि शर्मा, आजकल, नवंबर 2009, पृ0-5
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यह लावा कहां से आता है-लेख, मधु जैन, ‘बच्चे और हम’- सम्पा0-राजकिशोर, 2005, पृ0-69
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उपभोग संस्कृति, बाजार और बचपन-रीनू गुप्ता, आदित्य पी0 त्रिपाठी आदि, 2013, पृ0-85
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वही, पृ0-8
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उपभोग संस्कृति, बाजार और बचपन-रीनू गुप्ता, आदित्य पी0 त्रिपाठी आदि, 2013, पृ0-143-152
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कितना तंदुरूस्त है आपका बच्चा – इंडिया टुडे, नवंबर, 2009
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बाजार की बिसात पर बचपन- दैनिक जागरण, नवंबर, 2012
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‘टेलीविजन‘ समीक्षा सिद्धान्त और व्यवहार-सुधीश पचौरी, 2006
परंपरागत हिंदी काव्य में चित्रित दलित समाज और जीवन-डॉ. चैनसिंह मीना

परंपरागत हिंदी काव्य में चित्रित दलित समाज और जीवन
डॉ. चैनसिंह मीना
दलित, स्त्री, आदिवासी, किसान, मजदूर, अल्पसंख्यकों आदि के जीवन संघर्ष और उनसे जुड़े विविध मुद्दों पर हिंदी के परंपरागत काव्य में पर्याप्त विचार विमर्श हुआ है। आधुनिक हिंदी काव्य के अंतर्गत युगीन साहित्यिक प्रवृतियों के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक संदर्भों में भी रचनात्मक लेखन किया गया। परंपरागत काव्य में अनेक गैर-दलित कवियों के नाम सामने आते हैं जिन्होंने दलित जीवन और उसकी समस्याओं पर पूरी संवेदना के साथ भाव और विचार व्यक्त किए हैं। यह बात अलग है कि वर्तमान दलित आलोचकों की दृष्टि में इन रचनाकारों का यह चित्रण सहानुभूति और पूर्वग्रहों से युक्त है। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने साहित्यिक और आलोचकीय मान्यताओं द्वारा दलित लेखन में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी है। इस संदर्भ में उनका मत है कि “हिंदी के महान कवियों की रचनाओं को सामने रख कर बात की जाये तो निष्कर्ष स्वयं सामने आ जायेंगे। आधुनिक हिंदी साहित्य के शीर्षस्थ कवियों नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध की रचनाओं में हजारों साल से इस देश की विकास यात्रा को अवरुद्ध कर देने वाली वर्ण-व्यवस्था और उससे उपजी जाति व्यवस्था का उनकी रचनाओं में कहीं मुखर विरोध सुनायी पड़ता है? इनमें से नागार्जुन की ‘हरिजन गाथा’ या त्रिलोचन की ‘नगई महरा’ जैसी इक्का-दुक्का कविताओं को अपवाद मानकर छोड़ दें तो कहीं भी उनका स्वर पीड़ा के साथ स्वयं को नहीं जोड़ पाता है।”[1] यह परंपरागत हिंदी काव्य और आलोचना का यथार्थ है लेकिन तत्कालीन समय और समाज की परिस्थितियों एवं चुनौतियों के संदर्भ में गैर-दलित कवियों के रचना कर्म को रेखांकित करने का प्रयास तो किया ही जा सकता है। दलित जीवन का चित्रण करने वाले रचनाकारों में भारतेंदु हरिश्चंद्र, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔद्य’, गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’, भगवती चरण वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुभद्रा कुमारी चौहान, नागार्जुन, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, धूमिल, केदारनाथ सिंह, राजेश जोशी इत्यादि नाम उल्लेखनीय हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने बड़ी सहजता से यह स्वीकार किया कि समाज में व्याप्त असमानता या भेदभाव का कारण सत्ताधारी वर्ग की वर्चस्ववादी नीतियाँ ही हैं-
‘अपरस, सोला, छूत रचि
किये तीन तेरह सबै
छौंका चौका लाय
बहुत हमने फैलाए अधर्म
बढ़ाया छुआछूत का कर्म।’
कुछ मुट्ठी भर लोग शासन और सत्ता पर काबिज होकर शोषणकारी नीतियाँ बनाते हैं। उल्लेखनीय है कि ऐसी नीतियों से बहुसंख्यक वर्ग व्यापक स्तर पर आक्रांत होता है। अदम गोंडवी ने आजाद भारत की ऐसी ही अकल्पनीय तस्वीर को अपने शब्दों में व्यक्त किया है- ‘सहमी सहमी हर नजर हर पाँव में जंजीर है/ ये मेरे आजाद हिंदुस्तान की तस्वीर है।’ दलित समुदाय के जीवन से जुड़े बिना उसके कष्टों और बिडंबनाओं को समझ पाना किसी के लिए भी विशेषकर समाज की मुख्यधारा के लिए कठिन और चुनौतीपूर्ण कार्य है। दलित समाज का परिवेश, वातावरण, रहन-सहन, वेषभूषा, खान-पान इत्यादि मुख्यधारा के व्यक्ति के लिए असह्य है। मुख्यधारा निरंतर इस समाज के परिवेश से अपने को दूर रखने का प्रयास करती रही है। गाँव और शहरों की सबसे अंतिम बस्ती में रहने वाले दलित समाज का हर शख्स पग-पग पर किसी-न-किसी समस्या या शोषण से आक्रांत है। उदाहरणस्वरूप अदम गोंडवी की कुछ काव्य पंक्तियों यहाँ दृष्टव्य हैं-
‘आइए महसूस करिए ज़िंदगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको
मैं निमंत्रण दे रहा हूँ- आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों की घनी अमराइयों की छाँव में
गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही हैं
तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती हैं जिस्म कितनी कृष्णा रोटी के लिए।’
मुख्यधारा से सम्बद्ध संवेदना युक्त कवि जानता है कि छूत-अछूत का भाव महज एक भेदभाव पैदा करने की नीति है। वास्तविक तौर पर ऐसा कुछ नहीं होता। किसी व्यक्ति के द्वारा छू लेने मात्र से कोई अछूत कैसे हो सकता है? अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔद्य’ ने छूत-अछूत भावों और प्रसंगों में अपनी कलम चलाई है-
‘हरिऔद्य’ धरमधुरंधर मुदित होत,
मोह मद बिनसे प्रमादीन के मुये ते,
छाये रहे उर मैं अवनि के अछूते-भाव,
बनत अछूत ना अछूत-जन छूये ते।’[2]
राष्ट्रीय काव्यधारा में महत्त्वपूर्ण स्थान रखने वाले कवि मैथिलीशरण गुप्त ने ‘बुद्ध महाभिनिष्क्रमण’ कविता में राष्ट्र के अंतर्गत अछूत जीवन और उसकी त्रासदी को उकेरने का प्रयास किया है- ‘क्यों अछूत है आज अछूत?/ वे हैं हिंदू कुल संभूत/ गाते हैं श्री हरि का नाम/ आते हैं हम सबके काम/ बने विधर्मी वे अनजान/ मुसलमान किंवा क्रिस्तान/ तो हो जाते हैं सुपृश्य?/ हाय देव क्या दारुण दृश्य?’ भूख और लाचारी की मार सबसे अधिक दलित-दमित समाजों को झेलनी पड़ी है। आधुनिक भारत भी इस समस्या से मुक्त नहीं हो सका। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के काव्य में इस समस्या का व्यापक चित्रण मिलता है-
‘श्वानों को मिलता दूध-वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं
माँ की हड्डी से चिपक ठिठुर, जाड़ों की रात बिताते हैं।
युवती के लज्जा वसन बेच जब ब्याज चुकाए जाते हैं
मालिक जब तेल-फुलेलों पर पानी-सा द्रव्य बहाते हैं
पापी महलों का अहंकार देता तब मुझको आमंत्रण।’
प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक दलित समाज की समस्याएँ इतनी विकराल हो चुकी हैं कि कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को आहत मन से यह कहना पड़ा- ‘दीन दलितों के क्रंदन बीच/ आज क्या डूब गये भगवान।’ यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अछूत समुदाय के श्रम और जीवन संघर्ष पर ही सवर्ण समुदाय सछूत बना हुआ है या कहें कि उसका अस्तित्व कायम है। सवर्ण समुदाय की नजर में बहुत से कार्य घृणित और हेय हैं। उन सब कार्यों में मजबूरन या जबरन दलित समुदाय संलग्न है। गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ इस संदर्भ में भाव व्यक्त करते हैं कि दलित समुदाय की गैर मौजूदगी में यह कार्य स्वयं सवर्ण समाज को करना पड़ता-
‘सेवक अगर अछूत न होते
कैसे आप अछूते रहते
किसी तरह तो पूत न होते
सेवक अगर अछूत न होते।’[3]
ऐसा नहीं है कि गौतम बुद्ध, संत कबीर, संत रविदास आदि के विचारों ने केवल दलित-दमित या अस्मिता के लिए संघर्षरत समुदाय के लोगों को ही प्रभावित किया। इनके समस्त विचार या वाणियाँ मानवता के हित में थी। इन व्यक्तित्वों की मान्यताओं ने सवर्ण समुदाय के कवियों और उनके विचारों को भी व्यापक स्तर पर प्रभावित किया। इसी प्रभाव के आलोक में मुख्यधारा के काव्य में भी मानवीय भेदभाव की ऐतिहासिक परंपरा का चित्रण मिलता है-
‘एक ही विधाता के अमृत पुत्र, एक देश
कुछ यों अपूत कुछ पूत कैसे हो गए?
सब की नसों में रक्त एक ही प्रवाहित है
कुछ देवदूत कुछ भूत कैसे हो गये?
बंधु श्री वशिष्ठ, व्यास विदुर, पाराशर के
वाल्मीकि वंशज अछूत कैसे हो गये?’
अछूत होने का भाव उसे ही पीड़ित करता है जिसने अछूतपन की त्रासदी को झेला हो। यह याद रखा जाना चाहिए कि इस पीड़ा को किसी एक व्यक्ति ने नहीं बल्कि भारतीय सामाजिक परिदृश्य में करोड़ों व्यक्तियों ने सहा है। कितनी बड़ी बिडंबना है कि ‘वसुधैवकुटुंबकम’ के दर्शन को लेकर चलने वाले देश में करोड़ों लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त करना तो दूर उन्हें छूना तक पाप समझा गया। ऐसी कुंठित मानसिकता और भेदभाव आज भी बदस्तूर जारी है। यह भेदभाव भारतीय सामाजिक संरचना में समरसता की भावना पर प्रश्नचिह्न लगाता है। यहाँ पर भगवती चरण वर्मा की कुछ महत्त्वपूर्ण काव्य पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-
‘अरे ये इतने कोटि अछूत
तुम्हारे बेकौड़ी के दास
दूर है छूने की बात
पाप है आना इनके पास।’
मंदिर प्रवेश दलितों के लिए प्राचीन काल से ही वर्जित रहा। संभवतः मंदिर प्रवेश में पाबंदी के चलते ही मध्यकालीन समय में संत कवियों द्वारा निर्गुण काव्य रचा गया। तत्कालीन समय में संत कवियों के पास इसके अतिरिक्त और कोई विकल्प भी नहीं था। आधुनिक काल में आकार ही मंदिर प्रवेश के संदर्भ में अखिल भारतीय स्तर पर आंदोलन हुए। उल्लेखनीय है कि सभी धर्मों के मूल स्वरूप में जब विकृति का समावेश हो गया तो दलित-दमित वर्गों और स्त्री को दोयम दर्जे पर रखा गया। मंदिर प्रवेश के संदर्भ में भी शूद्र और स्त्री के लिए स्थिति बदतर ही रही। मंदिर प्रवेश के संदर्भ में स्त्री और अछूत जीवन की बिडंबना पर कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपने भाव व्यक्त किए हैं-
‘मैं अछूत हूँ मंदिर में आने का,
मुझको अधिकार नहीं है।
किंतु देवता यह न समझना,
तुम पर मेरा प्यार नहीं है।
प्यार असीम अमिट है फिर भी,
पास तुम्हारे आ न सकूँगी।
यह अपनी छोटी-सी पूजा,
चरणों तक पहुँचा न सकूँगी।’[4]
आधुनिक काल में अनेक सुधार आंदोलनों द्वारा सामाजिक परिवर्तन भी हुए। जाति और वर्ण के संदर्भ में आए कुछ परिवर्तनों को सुमित्रानन्दन पंत ने अपने काव्य में रेखांकित किया है- ‘जाति वर्ण की श्रेणी वर्ग की तोड़ भित्तियाँ दूर्धर/ युग-युग के बंदीगृह से मानवता निकली बाहर।’ छायावाद के बाद की कविता जन की ओर अधिक उन्मुख हुई। देश की आजादी के साथ निम्न वर्गों की सामाजिक प्रताड़नाओं से मुक्ति का संकल्प भी छायावादोत्तर हिंदी कविता में परिलक्षित होता है। ‘आधुनिक हिंदी कविता में दलित चेतना को व्यापक अभिव्यक्ति मिली है। हिंदी कविता का सृजन करने वाले प्रगतिशील कवियों ने दलित-शोषित की पक्षधरता की है। उनके द्वारा रचित कविताओं में शोषित वर्ग के दुख-दर्द को अभिव्यक्ति मिल सकी है। स्वयं दलित न होने पर भी इन कवियों ने शोषित तथा दलितों के जीवन में बदलाव लाने हेतु जन चेतना को जाग्रत किया।’[5] आधुनिक हिंदी कवियों में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का व्यक्तित्व अपनी अलग आभा रखता है। उन्होंने दलित, दमित, मजदूर, किसान, असहाय, स्त्री इत्यादि से जुई समस्याओं का बेवाकी से चित्रण किया। नि:संदेह दलित समाज की समस्याएँ व्यापक हैं। दलित समाज की त्रासदी को भी उन्होंने भली-भाँति पहचाना। इस समाज के दुखों को देखकर वे ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि-
‘दलित जन पर करो करुणा
दीनता पर उतर आए
प्रभु तुम्हारी शक्ति अरुणा।
हरे तन मन प्रीति पावन।’
दलित समाज को लेकर मुख्यधारा का कविमन सदैव द्वंद से युक्त रहा। पीड़ा के संदर्भ में ईश्वर का स्मरण भी कहीं-न-कहीं उसी व्यवस्था का समर्थन है जो इस समाज के कष्टों का कारण है। जिस ईश्वर और धर्म के नाम पर दलित समाज का शोषण किया गया उसी ईश्वर पर आस्था किसी भी लिहाज से दलित हित में नहीं है। दलित शोषण की दीर्घ परंपरा से निराला भली-भाँति परिचित हैं। निराला ने बीसवीं सदी में उभरती दलित चेतना को निराला को रेखांकित किया है- ‘जिस शूद्र को एक दिन सामाजिक नियमों के लांछन के कारण अवतार श्रेष्ठ श्रीराम के हाथों प्राण देने पड़े थे, वही शूद्र शक्ति आज सहस्त्र रामचंद्रों को पराजित कर देने में समर्थ है। अछूत ही आज भारत के प्रथम गण्य मनुष्य, चिंत्य समस्या है।[6] एक संवेदनशील मनुष्य और कवि होने के नाते उन्हें दलित-दमित वर्गों ऊपर होने वाला शोषण सहन नहीं होता। यही कारण है कि उन्होंने शोषण की परंपरा का शीघ्रता से खात्मा कर सामाजिक न्याय और समता की स्थापना का आह्वान किया-
‘जल्द जल्द पैर बढ़ाओ, आओ आओ।
आज अमीरों की हवेली
किसानों की होगी पाठशाला
धोबी, पासी, चमार, टेली,
खोलेंगे अंधेरे का ताला
एक पाठ पढ़ेंगे टाट बिछाओ
जल्द जल्द पैर बढ़ाओ, आओ आओ।’[7]
दलित समाज भारतीय संस्कृति का निर्माता रहा। आधुनिक भारतीय समाज और नव संस्कृति के विकास की बड़ी ज़िम्मेदारी भी उस पर है। कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ दलित समाज की इस शक्ति से भली-भाँति परिचित हैं-
‘नव संस्कृति के अग्रदूत हैं
पद दलितों की आस।
एक तुम्हारी गति पर अटकी
मानवता की आस।
पर अजेय है आज तुम्हारी
पहले से भी शक्ति
जिसमें मिली विश्व भर के
दलितों की चिर अनुरक्ति।’
दलित शोषण की दृष्टि से नागार्जुन कृत ‘हरिजन गाथा’ कविता बहुत महत्त्वपूर्ण है। 1977 में पटना जिले के बेलछी गाँव में 13 दलित समुदाय के लोगों को जिंदा जला दिया गया था। सामंती समाज और उसी के पक्ष में खड़ा कानून, प्रशासन पूरी तरह इस घटना से अनभिज्ञ एवं मूक बना रहा। क्या यह लोकतंत्र के विपरीत अमानवीय और निंदनीय कृत्य नहीं था? अखिल भारतीय परिदृश्य में ऐसी अनेकानेक दलित नरसंहार की घटनाएँ घटित हुईं हैं। इन अमानवीय घटनाओं को सड़ी-गली, प्राचीन और क्रूर परंपराओं के नाम पर, वर्चस्व के नाम पर ही अंजाम दिया जाता है। उल्लेखनीय है कि इनमें से अनेक घटनाएँ उभरती दलित चेतना और सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा को नेस्तनाबूद करने के उद्देश्य से भी प्रायोजित होती हैं। ‘हरिजन गाथा’ कविता की पंक्तियाँ यहाँ दृष्टव्य हैं-
‘ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि
एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं
तेरह के तेरह अभागे
अकिंचन मनुपुत्र
जिंदा झोंक दिए गए हों
प्रचंड अग्नि की विकराल लपटों में।
साधन-सम्पन्न ऊँची जातियों वाले
सौ-सौ मनुपुत्रों द्वारा!’
‘हरिजन गाथा’ कविता दलित जीवन की त्रासदी को चित्रित करने वाली श्रेष्ठ कविताओं में से एक है। यह कविता न केवल दलित शोषण को रेखांकित करती है बल्कि आज की आवश्यकता के अनुरूप भावी समाज का विकल्प भी प्रदान करती है। डॉ. मैनेजर पाण्डेय के अनुसार ‘इस कविता में भारतीय समाज-व्यवस्था के वर्तमान रूप का यथार्थ चित्र और उसके भावी विकास का संकेत है। भारत के गाँवों में सामंतों द्वारा खेतिहर मजदूरों-हरिजनों के क्रूरतम…. दमन का जैसा प्रभावशाली चित्रण हरिजन गाथा में है, वैसा इस बीच की किसी दूसरी कविता में नहीं है। नागार्जुन इस भयानक यथार्थ का त्रासद चित्रण करके चुप नहीं हो गए हैं। उन्होंने इस यथार्थ के परिवर्तन का संकेत भी दिया है। कविता में एक बच्चे के माध्यम से इतिहास प्रक्रिया व्यक्त हुई है। वह बच्चा इतिहास का बेटा है और भावी इतिहास का निर्माता है।’ मुख्यधारा के कविहृदय जातिप्रथा, धार्मिक कट्टरता, सांप्रदायिकता, भेदभाव एवं अप्रासंगिक प्राचीन रीति-रिवाजों के दुष्परिणामों से भली-भाँति परिचित हैं तथा राष्ट्र और समाज हित में जातिप्रथा को नेस्तनाबूद करने के समर्थक हैं। कवि केदारनाथ सिंह जातिप्रथा के खात्मे के संदर्भ में अपने भाव व्यक्त करते हैं कि-
‘भारत का सृजन अगर
फिर से करना
तो जाति-नामक रद्दी को
फेंक देना अपनी टेबुल के नीचे
टोकरी में।’[8]
भारत में वर्ण व्यवस्था की विकृति, सांस्कृतिक संक्रमण और धार्मिक कट्टरता के नाम पर तमाम संघर्षरत दलित-दमित वर्गों का शोषण किया गया। परंपरागत हिंदी कवियों में से कुछ इस तथ्य को नकारते हैं तो कुछ पूर्णतः स्वीकार करते हैं। वर्ण व्यवस्था की विसंगतियों के दुष्परिणामों को देखकर ही राजेश जोशी यह लिखने को मजबूर होते हैं कि-
‘मेरे मर जाने के बाद
जब लिखा जाए कहीं कि मैं हिंदू था
तो लिखा जाए साफ-साफ कि मैं शर्मिंदा था।’[9]
शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बाद दलित समाज में अधिकार चेतना व्यापक स्तर पर जागृत हुई। आज दलित कविता में शोषण के विरुद्ध कवियों के आक्रोशित स्वर को देखा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि यह आक्रोश न केवल दलित समाज से जुड़े कवियों का है बल्कि गैर दलित कवियों के यहाँ भी दलित-दमित दमन के संदर्भ में पर्याप्त मात्रा में आक्रोश मिलता है। उदाहरण स्वरूप बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की काव्य पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं- ‘लपक चाटते जूठे पत्ते/ जिस दिन देखा मैंने नर को/ उस दिन सोचा क्यों न लगा दूँ आग/ आज इस दुनिया भर को।’ प्राचीन काल से लेकर आज तक समस्या यही रही है कि दलित-दमित समाज जो किसी समय समता और स्वतन्त्रता से युक्त थे उन्हें मुख्यधारा के जीवन से नितांत दूर रखा गया। यह स्थिति आधुनिक काल में कुछ सुधरी लेकिन पूर्णतः खत्म नहीं हुई है। मुख्यधारा के काव्य में स्पष्ट तौर पर यह स्वीकार किया गया है कि यह प्रवृति या अमानवीयता समाज को उन्नति से दूर रखेगी। रूप नारायण पाण्डेय कृत ‘सत्यानाश भयो भारत को’ कविता इस सत्य को सम्मुख रखती है-
‘अपना ही अंग है अंत्यज असंख्य इन्हें,
गले न लगाया तो अवश्य पछताओगे।
ममता के मंत्र से विषमता का विश जो,
उतारा नहीं जाति को तो जीवित न पाओगे।
पक्षाघात पीड़ित समाज जो रहेगा पंगु,
उन्नति की दौड़ में कहाँ से जीत पाओगे।
साधना स्वराज की, सफल कभी होगी नहीं,
अगर अछूतों को न आप अपनाओगे।’[10]
ऐसा नहीं है कि मुख्यधारा के सभी कवि दलित जीवन के विरोधी हैं या उनकी संवेदना झूठी है। एक कवि के नाते संवेदना का प्रस्फुटन गैर दलित कवि में भी स्वाभाविक तौर पर मिलता है। कोई भी शोषक यह घोषित नहीं करेगा कि वह किसी का शोषण कर रहा है। जब दलित समाज के शोषण की बात आती है तो मुख्यधारा भी इसे अधिकांशतः नकारती ही रहती है। लेकिन मुख्यधारा के कुछ कवियों ने दलित समुदाय के प्रति इतिहास के संदर्भ में होने वाली साजिश का पर्दाफाश भी किया है। उदाहरणस्वरूप ऋषवदेव शर्मा की काव्य पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं-
‘तुम्हारे अंधे इतिहास में
तुम्हारी सभ्यता के विकास में
मेरा गला जला जा रहा है
मेरी पीठ सुलग रही है
तेरी आँखों में चिंगारी धधक रही है
मेरे कानों में जलन भर रही है
और मेरी जीभ में चुभन हो रही है
तुम्हारे अंधे इतिहास में
अंकित है
मेरी हत्या का षड्यंत्र।’[11]
भारतीय समाज और संस्कृति के अंतर्गत ‘शस्त्र’ और ‘शास्त्र’ दोनों के जरिये दलित शोषण को व्यापकता से अंजाम दिया गया। रमणिका गुप्ता ने सदियों से चले आ रहे और कभी खत्म नहीं होने वाले शोषण के चक्रव्यूह को ‘अब मूरख नहीं बनेंगे हम’ कविता के माध्यम से स्पष्ट किया है- ‘एक शब्द गीता/ सब्र का जहर/ संतोष की अफीम/ भाग्य का चक्रव्यूह/ निष्काम प्रेम का नशा/ परिश्रम के/ फल से वंचित रखने की साजिश/ परजीवी जमातों का/ सर्जक/ निठल्ले लोगों का स्वर्ग।’ मूलभूत मानवीय आवश्यकताओं से वंचित समाज और उसकी समस्याओं को बहुलता से चित्रित किया गया है। सुख-सुविधाएँ बाद की बात है अधिकांशतः दलित समाज आज भी जीवन का गुजारा करने के लिए संघर्षरत है, सामाजिक सम्मान से वंचित है। रमणिका गुप्ता ने ‘प्रतिरोध’ कविता में दलित समाज की विद्रोही चेतना का कारण स्पष्ट किया है-
‘हमने तो कलियाँ माँगी ही नहीं
काँटे ही माँगे
पर वो भी नहीं मिले
यह न मिलने का एहसास
जब सालता है
तो काँटों से भी अधिक गहरा चुभ जाता है
तब
प्रतिरोध में उठ जाता है मन—
भाले की नोकों से अधिक मारक बनकर।’
गैर-दलित कवियों ने दलित जीवन के संदर्भ में जो भी कविताएँ लिखी हैं उनकी व्यापक स्तर पर चर्चा हुई। रामचन्द्र शुक्ल कृत ‘अछूत की आह’, सुभद्रा चौहान कृत ‘प्रभु तुम ही जानो’, श्रीहरिकृष्ण प्रेमी कृत ‘हरिजन बंधु’ भगवती चरण वर्मा कृत ‘हिंदू’, धूमिल कृत ‘मोचीराम’, वीरेन डंगवाल कृत ‘राम सिंह’, विष्णु खरे कृत ‘मैला ढोने की प्रथा’ आदि कविताएँ भी इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। भले ही दलित आलोचक मुख्यधारा के कवियों द्वारा रचित कविताओं को सिरे से खारिज करें या ये कविताएँ वर्तमान दलित कविता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती हों किंतु इन कविताओं में निहित विचार किसी-न-किसी रूप में हिंदी दलित कविता और दलित समाज के सहयोगी अवश्य ठहरते हैं। इन कवियों के विचार जाति, वर्ण, वर्ग, धर्म, समाज, संस्कृति के संदर्भ में मानवीयता पर उसी प्रकार बल देते हैं जैसे दलित समुदाय के कवियों के विचार। दलित समाज के समकालीन यथार्थ से मुँह मोड़ना मुख्यधारा के कवियों के लिए भी आसान नहीं रहा। यह अवश्य है कि इस चित्रण में मुख्यधारा का अपना नजरिया है। डॉ. मैनेजर पाण्डेय के अनुसार ‘हिंदी में दलितों के जीवन पर उपन्यास और कविता लिखने वाले गैर-दलित ने अपने वर्ग और वर्ण-संस्कारों से मुक्त होकर ही दलित जीवन पर लिखा है। फिर भी, उनके लेखन में अनजाने में ही सही, सवर्ण संस्कारों की छाया आ गई है।’[12] जो भी हो हिंदी की मुख्यधारा के रचनाकारों ने दलित जीवन पर जो लिखा है उसे कमतर आँकना साहित्यिक दृष्टि से उचित नहीं। समकालीन समय में इस लेखन का भी अपना महत्त्व है। कथा साहित्य को लेकर प्रेमचंद पर भी तमाम आक्षेप लगाए गए। यहाँ सवाल उठता है कि क्या तत्कालीन समय में दलित जीवन से जुड़े मुद्दों पर प्रेमचंद जैसा साहित्य मिलता है? उस समय के सामाजिक परिवेश में इस तरह का लेखन (जिसे दलित आलोचक सहानुभूति से युक्त साहित्य मानते हैं) भी जोखिम में डालने वाला कार्य था। इसका कारण स्पष्ट है कि तत्कालीन समाज उस सहानुभूति के भी खिलाफ था। उल्लेखनीय है कि मुख्यधारा के काव्य के अंतर्गत दलित जीवन और समाज के संदर्भ में जैसा लेखन किया गया उसे तत्कालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही आलोचकों को अपनी राय निर्मित करनी चाहिए न कि पूर्वग्रहों को ओढ़कर।
- संदर्भ:-
ब्रजेश (संपादक); सृजन संवाद, अंक-10, अगस्त 2010, पृ. 142 ↑
- पंडित नंदकिशोर तिवारी (संपादक); चाँद (अछूत अंक), मई 1927, दूसरी आवृति 2008, राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली, पृ. 14 ↑
- पंडित नंदकिशोर तिवारी (संपादक); चाँद (अछूत अंक), पृ. 64 ↑
- माताप्रसाद; हिंदी काव्य में दलित काव्यधारा, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, सं. 1993, पृ. 76 ↑
- डॉ. रमेश कुमार; दलित चिंतन के सरोकार, पृ. 93 ↑
- सुधा, मासिक, लखनऊ, जून 1933, संपादकीय से ↑
- विवेक निराला; निराला साहित्य में दलित चेतना, शिल्पी प्रकाशन, इलाहाबाद, 2006, पृ. 85 ↑
- केदारनाथ सिंह; सृष्टि पर पहरा, राजकमल प्रकाशन, सं. 2014, पृ. 47 ↑
- शरण कुमार लिंबाले; दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, वाणी प्रकाशन, सं. 2000, पृ. 25 ↑
- माताप्रसाद, हिंदी काव्य में दलित काव्यधारा, पृ. 77 ↑
- ऋषभदेव शर्मा; ताकि सनद रहे, तेवरी प्रकाशन, हैदराबाद, 2002, पृ. 56 ↑
- मैनेजर पाण्डेय; मेरे साक्षात्कार, किताबघर, नई दिल्ली, सं., पृ. 128
डॉ. चैनसिंह मीना सहायक प्राध्यापक हिंदी विभाग पी.जी.डी.ए.वी. कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय नेहरू नगर, नई दिल्ली-110065 मो.- 8010081419 ई-मेल- csmeena.foa@gmail.com ↑
आदिवासी कथा साहित्य में स्त्री-लीना कुमारी मीना

आदिवासी कथा साहित्य में स्त्री
लीना कुमारी मीना शोधार्थी , जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय नई दिल्ली ११००६७
वर्तमान दौर में आदिवासी साहित्य अस्मितावादी विमर्शों की कड़ी में अपनी पहचान के लिए दस्तक दे चुका है दलित व स्त्री साहित्य के बाद, अब आदिवासी साहित्य अपनी प्रखर आवाज में सदियों से शोषित-पीड़ित आदिवासी समाज के संघर्षों को वाणी दे रहा है|
“भारत के लोग अधिकतर जनजातियों(एस.टी.)को आदिवासी कहते हैं|…..संस्कृत में आदिवासी शब्द का अर्थ है, किसी क्षेत्र के मूल निवासी जो आदिकाल से किसी स्थान विशेष में रहते चले आ रहे हैं| माना जाता है कि आदिवासी भारतीय प्रायद्वीप के सबसे प्राचीन बाशिंदे या मूल निवासी हैं|”[1] इसके अलावा यह भी मान्यता है कि “आर्यों के अतिक्रमण के समय आदिवासी पहले से ही भारतीय उपमहाद्वीप में रह रहे थे|”[2] अर्थात् प्राचीनकाल में आर्यों ने भारतवर्ष पर आक्रमण के दौरान यहाँ के मूल निवासियों में से कुछ को बंदी बना लिया व कुछ घने जंगलों में पलायन कर गये| बंदी बनाये जाने वाले लोगों को अछूत कहा जाने लगा एवं जो व्यक्ति समूह बनाकर घने जंगलों में पलायन कर गये; वे सभ्यता, संस्कृति, आचार–विचार से मुख्यधारा के समाज से बिल्कुल कट गये| ये लोग समूहों के रूप में रहने लगे, ऐसे लोगों को ही आदिवासी कहा जाने लगा|
अंग्रेज सरकार की औपनिवेशिक नीति में विकास के तहत जंगलों की कटाई शुरू हुई जिससे आदिवासियों के पारम्परिक रोजगार के साधन समाप्त हो गये और इन्हें आजीविका के लिए मजदूरी का विकल्प तलाशना पड़ा| अंग्रेजी प्रशासक प्रारम्भ में इन्हें बहादुर, मेहनती और सरल स्वभाव का मानते थे परन्तु जब इन आदिवासियों ने अंग्रेजों की स्वार्थपूर्ण नीतियों का विरोध किया तो उन्होंने इनकी अर्थव्यवस्था, धर्म, संस्कृति एवं रीति-रिवाजों का कोई सम्मान न करते हुए इन्हें घुमन्तू, असभ्य एवं जंगली घोषित कर दिया|
यद्यपि आदिवासी साहित्य की मौखिक रूप में एक लम्बी परम्परा रही है परन्तु अशिक्षा की वजह से उसका कोई लिखित इतिहास नहीं रहा| आजादी के बाद से ही आदिवासी समाज को साहित्य का विषय बनाया जाने लगा परन्तु उसमें उन्हें प्रकृति पर निर्भर, कमर पर बित्तेभर चिंदी लपेटने वाला अर्थात् एक अजूबे के रूप में पेश किया गया| स्वतंत्रता के पश्चात् ‘राष्ट्र निर्माण’ के लिए बनाई गयी नीतियों ने आदिवासी समाज के सामने व्यापक समस्याएं खड़ी कर दी| उन नीतियों की वजह से उनके जंगलों पर रहे परम्परागत अधिकार खत्म होते चले| औद्योगीकरण की नीतियों ने उनको अपने जल, जंगल, जमीन से बेदखल कर दिया, इसके तहत जो समाज अब तक आत्मनिर्भर था वही अब भूखा मरने लगा| ऐसे समय में योगेन्द्रनाथ सिन्हा, राजेन्द्र अवस्थी, शानी, मेहरुनिशा परवेज आदि लेखक-लेखिकाओं ने इस समाज को लेखनी का विषय बनाया| बंगला लेखिका महाश्वेता देवी के आदिवासी लेखन और उड़िया लेखक गोपीनाथ महंती ने आदिवासी लेखन के हिंदी अनुवादों से भी आदिवासी समाज की तरफ पाठक वर्ग का ध्यान खींचा,लेकिन आदिवासी समाज तथाकथित मुख्यधारा के साहित्य में हाशिये पर ही बना रहा|
आदिवासी समुदाय के हाशियेकरण की कोशिश 90 के दशक में सर्वाधिक हुई| 90 के दशक में भारत सरकार की वैश्वीकरण, उदारीकरण की नीतियों ने आदिवासी समाज को सर्वाधिक प्रभावित किया| उदारीकरण की नीतियों ने मुक्त व्यापार और मुक्त बाजार की व्यवस्था को स्थापित किया जिससे सीधे तौर पर आदिवासी समुदाय प्रभावित हुआ क्योंकि देश की सबसे अधिक वन एवं अन्य प्राकृतिक सम्पदा, खनिज सम्पदा आदिवासी क्षेत्रों में है| इस प्राकृतिक सम्पदा की लूट-खसोट के लिए नित्य नई वैश्विक कम्पनियां आदिवासी इलाकों में पहुँचने लगी है जिसके कारण आदिवासी समाज के जल, जंगल, जमीन उनसे छीने जाने लगे| सरकार उनकी स्थितियों पर गौर किए बिना उनके शोषण में उद्यमियों का साथ दे रही है- “छत्तीसगढ़, झारखण्ड और उड़ीसा में हाल के दिनों में वहाँ की सरकारों ने खनिज सम्पदा के अंधाधुंध दोहन में जुटी देश-विदेश की बड़ी कम्पनियों के इशारे पर जिस तरह से सूबे की गरीब, आदिवासी और पिछड़ी आबादी को विकास के ‘शत्रु-खेमे’ में डालकर उनके खिलाफ अभियान चलाया है, वह भारतीय लोकतंत्र के अब तक के इतिहास का सबसे शर्मनाक कारनामा है| लाखों को बेदखल किया गया है और असंख्य भूमि हड़पी गयी है| इस तरह के उद्योग-विस्तार के नाम पर जहाँ-जहाँ राज्य प्रशासन ने भूमि-हड़प अभियान को सफलतापूर्वक चलाया, सत्ताधारी खेमे और मीडिया के बड़े हिस्से ने उन सरकारों को ‘विकासवादी’ बताकर महिमामंडित किया है|” [3]इसी तरह के भूमि-हड़प के चक्कर में सिंगूर और नंदीग्राम में जिस तरह से सरकार ने गरीबों पर अत्याचार किए हैं वह रोंगटे खड़े करने वाले हैं| इससे विस्थापन की समस्या प्रमुख रूप से सामने आयी है| इस विस्थापन एवं पलायन की सर्वाधिक मार आदिवासी महिलाओं को झेलनी पड़ी है| जंगलों के उजड़ने व औद्योगिक शहरों के विकास के कारण आदिवासी महिलायें पहले से अधिक असुरक्षित हो गई हैं| शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाओं के प्रचार–प्रसार से आदिवासियों का मुख्यधारा के समाज से सम्पर्क स्थापित हुआ हैं| इससे इस समाज की स्त्रियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा| पितृसत्तात्मक व्यवस्था का प्रभाव आदिवासियों पर मुख्यधारा के समाज से ही आया है वरन् आदिवासी समाज में स्त्री एवं पुरुष की स्वतन्त्रता व समानता में विशेष अंतर नहीं है| इस समाज में स्त्रियों के सम्मान एवं स्वतन्त्रता में जब कोई दखल देता है तो वे इसका खुलकर विरोध करती हैं परन्तु गैर आदिवासी रचनाकारों ने मुख्यधारा के देखा-देखी आदिवासी साहित्य में भी स्त्री पर बाहरी संस्कृति लाद दी है इस सन्दर्भ में डॉ. रोज केरकेट्टा लिखती है- “आदिवासी शिष्ट साहित्य में स्त्री श्रम, सहिष्णुता, ममत्व से पूर्ण तो मिलती है, लेकिन अपने लिए और परिवार के लिए निर्णय लेती हुई कम मिलती है| वह जीने के लिए कठिन परिश्रम करती है, देस-परदेस जाती है, सेवा करती है, दूसरों को प्रसन्न रखने के लिए|”[4] परन्तु वास्तविकता में ऐसा नहीं है यह केवल सामन्ती समाज की सोच है| आदिवासी कविता व लोककथाओं में यह स्त्री बराबरी की माँग करती हुई इस तरह नजर आती है-
“मैं जानती हूँ कि तुम क्या सोच रहे हो मेरे बारे में
वही जो एक पुरुष, एक स्त्री के बारे में सोचता है|
पर याद रखो
तुम्हारी मानसिकता की पेचीदा गलियों से गुजरती
मैं तलाश रही हूँ तुम्हारी कमजोर नसें
ताकि ठीक समय पर
ठीक तरह से कर सकूं हमला
और बता सकूं सरेआम गिरेबान पकड़
कि मैं वो नहीं हूँ जो तुम समझते हो|”
आदिवासी समाज में स्त्री अपनी आजादी में किसी की रोक-टोक स्वीकार नहीं करती है| यदि उसकी मान्यताएं इसमें उसके आड़े आती है तो वह इनका विरोध करती है| ‘शाम की सुबह’ उपन्यास में वाल्टर भेंगरा ‘तरुण’ ने संध्या नामक युवती को कथा नायिका बनाया है जो जीवन में आने वाली कई समस्याओं से जूझते हुए समाजसेवा के निहितार्थ नर्स के व्यवसाय को अपनाती है| इस उपन्यास में स्त्री का आत्मसम्मान सर्वोपरि है| उसके जीवन में कई उलझने आती है परन्तु वह कुंठाग्रस्तता से बचते हुए अपने स्वाभिमान एवं नारीत्व को बनाए रखती है|
‘लौटते हुए’ उपन्यास में लेखक ने आदिवासी युवतियों के काम के लिए महानगरों की ओर तेजी से बढ़ते पलायन की समस्या को कथावस्तु का आधार बनाया है| इस उपन्यास में आदिवासी युवती ‘सलोमी’ कथा की नायिका है| महानगरों में इन युवतियों को विविध समस्याओं का सामना करना पड़ता है| वहाँ सभी लोग इनका अधिक से अधिक शोषण करना चाहते हैं, जिसमें देह शोषण भी शामिल है| पिछड़े हुए आदिवासी इलाकों में लोग सुधारवाद से प्रभावित होकर ईसाई धर्म में धर्मान्तरित हो गये परन्तु इससे उनकी सामाजिक स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है|
इसके अलावा इस उपन्यास में एक मुद्दा यह भी उठाया गया है कि माता-पिता एवं परिवार की देखभाल के एवज में आदिवासी स्त्रियों को पैतृक सम्पति में हिस्सा नहीं मिलता| माता-पिता के जीवित रहते हुए एवं उनकी सेवा करने के उपरांत भी, उनकी जमीन की उपज का उपभोग तक वे नहीं कर पाती हैं| उनकी विडम्बना है कि कमाकर कर लाए गए पैसों का उपभोग पूरा परिवार करता है, परन्तु उनके भविष्य के लिए तनिक भी चिंता नहीं करता|
‘छैला सन्दू’ मंगल सिंह मुंडा द्वारा रचित उपन्यास है| आदिवासी समाज स्त्री-पुरुष के प्राकृतिक प्रेम को सहजता से स्वीकार करने वाला समाज रहा है| कुल-जाति-गोत्र-पूंजी की दीवारें यहाँ प्रेम के रास्ते में खड़ी नहीं की जाती| लेकिन अपने स्वाभिमान को गिरवी रखकर प्रेम के आगे बिक जाना भी यहाँ स्वीकार्य नहीं है| इस उपन्यास का नायक छैला सांवले रंग का, छरहरे शरीर का, आकर्षक व्यक्तित्व और मानवीय गुणों से युक्त अपने समाज का चहेता पात्र है| सन्दू इलाके के सूबेदार की बेटी बुंदी से प्यार करता है लेकिन एक दिन इस बेमेल प्रीति की बात उजागर हो जाती है| ऊँची जाति और ऊँचे पद का गुमान अपनी बेटी के आदिवासी प्रेमी को स्वीकार कैसे सकता था? इस कारण सूबेदार सन्दू के गाँव पर अपनी फौज के साथ चढ़ाई करता है| मुंडा आदिवासी भी अपने प्रेम और स्वाभिमान की खातिर सन्दू का साथ देते हुए हाकिम से युद्ध करते हैं| किन्तु आदिवासियों की संयुक्त ताकत के सामने हाकिम को झुकना पड़ता है| लेकिन अपने स्वाभिमान की लड़ाई में वह सन्दू और बुंदी के प्रेम और विवाह के साथ एक प्रतियोगिता की शर्त जोड़ देता हैं परन्तु शर्त जीतकर अपने प्रेम को उपहार में एक वस्तु की तरह पाना, स्त्री-पुरुष समता में विश्वास करने वाली आदिवासी संस्कृति का रिवाज नहीं होता| अत: शर्त में मिले दान को नकारकर सन्दू अपने गाँव लौट आता है| लोगों की साजिश के तहत सन्दू की मौत हो जाती है एवं सन्दू की मौत से उसका इंतजार कर रही बुंदी के भी प्राण पखेरू उड़ जाते है| इस उपन्यास के माध्यम से ज्ञात होता है कि स्त्री-पुरुष की सहज मैत्री आदिवासी समाज में उदारता की द्योतक है|
‘शव काटने वाला आदमी’ उपन्यास येसे दरजे थोंगछी द्वारा लिखित है| अरुणाचल प्रदेश की एक जनजाति है मनपा| बौद्ध धर्मावलम्बी इस जनजाति के लोग मृतकों को एक सौ आठ टुकड़ों में काटकर नदी में बहा देते हैं| इसी रीति के आधार पर इस उपन्यास की कहानी केन्द्रित है| मनपा जनजाति में स्त्री–पुरुषों के मध्य समानता है| स्त्रियाँ भी पुरुषों के प्रत्येक कार्य में बराबर की भागीदारी निभाती है| इस उपन्यास में स्त्री बेटी, पत्नी, माँ, प्रेमिका व दोस्त के रूप में उपस्थित है| वह अपने प्रत्येक रिश्ते को बखूबी निभाती है|
फादर पीटर पौल एक्का ने भी ‘मौन घाटी’, ‘जंगल के गीत’, ‘पलाश के फूल’ एवं ‘सोनपहाड़ी’ में आदिवासी जनजीवन को अपने उपन्यासों की विषयवस्तु बनाया है| ‘मौनघाटी’ उपन्यास में रांची के निकट ‘अम्बाघाट’ नामक आदिवासी इलाका केंद्रबिंदु के रूप में है| उपन्यास में सरोज, सरस्वती, सुधारानी आदि स्त्रीपात्र है; ये सभी इस इलाके के सुधार हेतु प्रयासरत हैं, परन्तु अस्पताल का कर्मचारी हरिया, फोरेस्टर व कुछ लोग अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए यहाँ के लोगों का भरपूर शोषण करते हैं तथा औरतों को वे केवल भोग की वस्तु समझते हैं|
‘जंगल के गीत’ उपन्यास में लेखक ने आदिवासियों के एक गाँव को केंद्रबिंदु बनाया है जो दुनिया के नियमों से बेखबर अपने अलग संसार में खुश है| दिकु समाज का शोषणतन्त्र यहाँ भी अपना शिकंजा फैलाये हुए है जो तरह- तरह के हथकंडे अपनाकर इन आदिवासियों का शोषण करने में कोई कसर नहीं छोड़ता| इन आदिवासियों के मध्य पितृसत्तात्मक व्यवस्था हावी नहीं है| समाज के नियमों-उपनियमों को बनाने में यहाँ स्त्री व पुरुष अपनी समान भागीदारी निभाते हैं एवं सभी मिलकर शोषक वर्ग का प्रतिरोध करते हैं|
‘पलास के फूल’ एवं ‘सोनपहाड़ी’ उपन्यासों में भी फादर पीटरपौल एक्का ने आदिवासी समुदायों के रहन-सहन, संस्कृति एवं सामाजिक जीवन को बखूबी उकेरा है| इस समुदाय में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को लेखक ने बेहतर ढंग से पेश किया है एवं दिखाया है कि औरतें किस तरह से सामाजिक व्यवस्था में अपनी भागीदारी भलीभांति निभाती हैं|
‘पूर्वोत्तर की आदिवासी कहानियाँ’ कहानी संकलन ‘रमणिका गुप्ता’ द्वारा सम्पादित है| पूर्वोत्तर की कहानियाँ अपनी संस्कृति, भाषा, भूगोल आदि कई मायनों में शेष भारत से अलग है| बीस कहानियों के संग्रह में दस भाषा की कहानियाँ शामिल है| असम से बोडो, कार्बी और तीवा भाषा की तेरह कहानियाँ हैं| मिजो और खासी की तीन-तीन और तैनिडे, लेपचा और शेरदुकपेन की दो-दो और कोकबोरोक व मैतेई भाषा की एक-एक कहानी है| आदिवासी महिला की स्थिति सामाजिक परम्पराओं रीति-नीतियों और सामाजिक नियमों के कम बंधन के चलते आजाद रहती है पर आर्थिक बदहाली और पुरुष की सोच कई बार वैसी क्रूर रही है जितनी कि मुख्यधारा में देखने को मिलती है| वह उतनी ही प्रताडना की शिकार है जितनी भारतीय औरत रही है| ‘बाँझ’ कहानी में पुरुष से औरत की कमजोर स्थिति व त्रासदी को उजागर किया है| रोबांसी हमेशा अपने पति द्वारा पीटी जाती है| उसकी पिटाई में सास-ससुर की मूक सहमति रहती है क्योंकि वह बाँझ है| वह उनके आरोपों और पति की पिटाई से तंग आकर अपने पूर्व प्रेमी गजोम की झोपड़ी में एक अंधेरी रात में दस्तक देकर उसे पत्नी बनाने का खुला प्रस्ताव देती है| परन्तु गजोम की चुप्पी का अर्थ ना समझकर वह रात में ही घर लौट आती है| पति दूसरे का बच्चा पत्नी की कोख में पलता देख कर उसे बुरी तरह से पीटता है| इस कहानी से पता चलता है कि कई बार आदिवासी औरत भी अन्य औरतों की भांति पति की ज्यादतियाँ सहती है| पूर्वोत्तर आदिवासी समाज की सांस्कृतिक झांकी इस कहानी संग्रह में संकलित कहानियों के माध्यम से मिलती है|
‘पगहा जोरी-जोरी रे घाटों’ में आदिवासी लेखिका रोज केरकेट्टा द्वारा लिखित कहानियाँ संकलित है| इन कहानियों में झारखण्ड के ग्रामीण समाज के प्रति उनका गहरा जुड़ाव दिखाई देता है| भंवर, घाना लोहार का, कोंपलों को रहने दो, केराबांझी इत्यादि कहानियों में लेखिका स्त्री अधिकारों व उनकी प्राप्ति को लेकर प्रतिबद्ध है| भंवर एक आदिवासी विधवा महिला की कहानी है जिसे कानूनी रूप से अधिकार मिलने पर भी सामाजिक कमजोरी के कारण वह इनका उपयोग नहीं कर पाती है इससे समाज में स्त्री की वास्तविक स्थिति का बोध होता है| ‘केराबांझी’ पुरातन परम्परा का पालन करने वाले एक किसान कालीचरण की कहानी है जो परिवार नियोजन को एक बुराई के रूप में देखता है परन्तु उसके दो बेटे व बहू इसका विरोध करते हैं| उसकी बहू सिर्फ एक बेटी पैदा करती है एवं स्वयं को केराबांझी कहने पर कोई शर्म महसूस नहीं करती| इस कहानी में स्त्री-चेतना की झलक देखने को मिलती है|
‘अपना-अपना युद्ध’, ‘जंगल की ललकार’ व ‘देने का सुख’ कहानी संकलन वाल्टर भेंगरा ‘तरुण’ द्वारा रचित है| इन कहानी संकलनों में उन्होंने आदिवासी समाज में विद्यमान पितृसत्तात्मक व्यवस्था एवं आदिवासी स्त्रियों की स्थिति का जिक्र किया है|
‘राजकुमारों के देश में’ एवं ‘क्षितिज की तलाश’ फादर पीटर पाल एक्का द्वारा रचित कहानी संग्रह है| इन कहानियों में भी लेखक ने आदिवासी समाज की विसंगतियों को उजागर किया है|
‘सिसकियाँ’ कहानी संग्रह विजय सिंह मीणा द्वारा रचित है| विगत दशकों में गाँव की दशा-दुर्दशा में भारी बदलाव आया है| आधुनिकता के संसाधन शहरों-कस्बों से होते हुए गाँव तक पहुंच गये हैं एवं गाँव भी छल-कपट और राजनीतिक कुचेष्टाओं के शिकार हो रहे हैं| अधिकांश गाँव का जीवन आज भी अभाव और उत्पीड़न का जीवन है| नारी जीवन तो और भी दुखद है क्योंकि इन्हें दोहरी मार झेलनी पड़ रही है, जहाँ सामाजिक बन्धनों ने इन्हें कठोर बेड़ियों में जकड़ रखा है, वहीं वे अपने परिवार में ही घुट-घुट कर जीवन बिताने को विवश हो जाती हैं| इनकी लगभग सारी कहानियाँ राजस्थान के ग्रामीण समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं|
मंगल सिंह मुंडा की कहानियाँ ‘महुआ का फूल’ नामक कहानी संग्रह में संकलित हैं| इनकी कहानियाँ समयानुकूल है| इन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से समाज के नग्न और कठोर यथार्थ को बड़े खुले और स्पष्ट ढंग से उजागर करने का प्रयत्न किया है| कहानियों में स्वाभाविकता एवं मनोवैज्ञानिकता है| ‘महुआ का फूल’ शीर्षक कहानी में लेखक ने पुरुषों के अत्याचारों का विरोध करती हुई नारी को दर्शाया है| आदिवासी स्त्री राधिकाबाई करमु सरपंच के आदमी बिरजू को छुरा मारकर हत्या कर देती है और इस प्रकार वह स्त्रियों के ऊपर होने वाले पुरुषों के अत्याचारों का विरोध करती है जिससे समाज में स्त्रियों का सिर ऊँचा उठता है| ‘सिंदूर की डिबिया’ शीर्षक कहानी दहेज विरोधी एक लड़की के त्याग की कहानी है| दहेज के कारण सुनीता की शादी भूपति बाबू नहीं कर पाते| सुनीता पिता के दर्द को पहचान जाती है और अचानक एक दिन घर से चुपचाप निकल पडती है|
- पृष्ठ स. 29,आदिवासी कौन-रत्नाकर भेंगरा,सी.आर बिजोय,सम्पादिका- रमणिका गुप्ता ↑
- पृष्ठ स.37भारत का इतिहास,रोमिला थापर- भाग 1 ,पेंग्विन प्रकाशन, नई दिल्ली ↑
- पृष्ठ स.13,उदारीकरण और विकास का सच, सम्पादक- उर्मिलेश, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स(प्रा.)लिमिटेड ,नई दिल्ली-2010 ↑
- पृष्ठ संख्या197, आदिवासी साहित्य विमर्श- लेखिका-वंदना टेटे (सम्पादक- गंगा सहाय मीणा) ↑
आदिवासी विमर्श में समकालीन यात्रा साहित्य का अवदान-हेमंत कुमार

आदिवासी विमर्श में समकालीन यात्रा साहित्य का अवदान
“आदिवासी लोक की यात्राएँ” के संदर्भ में
हेमंत कुमार
हिन्दी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग
केरल केंदीय विश्वविद्यालय, केरल
दूरभाषा संपर्क- 8574027674
मेल क्रमांक – kumarhemant0777@gmail.com
आदिवासी शब्द सामान्यतः उस जनसमूह को प्रदर्शित करता है जो जंगलों में निवास करते हैं | ये वास्तव में संपूर्ण मानव समाज के सबसे पहले मनुष्य हैं, जिनसे पृथ्वी पर मानव समाज का सृजन हुआ | आदिवासी लोग धरती को माता, आकाश को पिता, हवा को बहन तथा पानी को भाई मानते हैं अर्थात जल, जंगल और जमीन को अपना सब कुछ समझते हैं तथा इनमें आत्मिक लगाव भी महसूस करते हैं | ये लोग प्राकृतिक संतुलन के साथ थोड़ी भी छेड़-छाड़ पसंद नहीं करते हैं | जो लोग करते हैं उनको बर्दाश्त भी नहीं करते हैं, उनके खिलाफ किसी भी हद तक जा कर अपनी जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा स्वयं करते हैं | आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन तथा उनकी सभ्यता, संस्कृति, वेश-भूषा खान-पान, रहन-सहन सभी चीजों पर दिकुओं ने अतिक्रमण किया तथा उनकी पहचान मिटाने की हर संभव कोशिश की और इनको इतिहास के पन्नों से गायब कर दिया गया | आदिवासियों ने अपनी अस्मिता की सुरक्षा के लिए प्रतिरोध करना शुरू किया, जिसके कारण कुछ आदिवासी लेखकों ने कलम भी उठायी, जिसका जीता-जागता प्रमाण आदिवासी विमर्श है, जो कि कविता, कहानी, नाटक उपन्यास, लोककथा तथा यात्रा-साहित्य के रूप में सामने आने लगा है |
आदिवासी की वास्तविक पहचान को कैसे छिपा लिया गया और सभ्य समाज में कैसे उनके बर्बर प्रतिरूप को प्रदर्शित किया गया, इसको ‘निर्मला पुतुल’ के काव्य संग्रह “बेघर सपने” में संकलित कविता “बायोडाटा” के माध्यम से समझा जा सकता है – “बायोडाटा में जो आदमी दिखता है / वह होता नहीं है / और जो होता है वह दिखता नहीं है / बायोडाटा एक आवरण है /…… बायोडाटा एक तस्वीर है / एक आईना है / जिसमें हर आदमी देखता है अपना पूरा चेहरा / और दिखाता है दूसरे को अपना / आधा-अधूरा चेहरा / इस तरह बायोडाटा में जो दिखता है वह होता नहीं है / और जो होता है वह दिखता नहीं है |”1
आदिवासियों के समस्याओं को साहित्य के रूप में लाने के लिए विभिन्न आदिवासी, गैर-आदिवासी लोगों ने लेखन किए हैं | जिनमें से पिछले डेढ़ दशक की अवधि में अपना विशिष्ट योगदान देने वाले लोगों में महाश्वेता देवी, रमणिका गुप्ता, तेजिंदर सिंह, प्रो. चौधरीराम यादव, रामशरण जोशी, कथाकार संजीव, प्रो. वीरभारत तलवार, प्रो. रविभूषण आदि शामिल हैं | आदिवासी बुद्धिजीवी लेखकों में रामदयाल मुंडा, रोज केरकेट्टा, ग्रेस कुजूर, मंगल सिंह मुंडा, लक्ष्मण गायकवाड, वाहरु सोनवणे, भुजंग मेश्राम, सी. के. जानू, महादेव टोप्पो, निर्मला पुतुल, वंदना टेटे, भीम सिंह मीणा, हरिराम मीणा और अनुज लुगुन जैसे महानुभाव लोगों का नाम सम्मान के साथ लिया जा सकता है |
उक्त साहित्यकारों में से हरिराम मीणा ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्होंने आदिवासी से संबंधित दो काव्य संग्रह, एक प्रबंध काव्य, दो यात्रा-वृतांत, एक उपन्यास, आदिवासी विमर्श की एक पुस्तक तथा समकालीन आदिवासी कविता (संपादित) लिखी हैं | इन्होने अपने साहित्य में आदिवासियों को केंद्र में रखकर उनके खिलाफ हो रहे साजिशो को बेनकाब करने की कोशिश की है |
आदिवासी विमर्श में समकालीन साहित्य का योगदान एक दूसरे के पूरक के रूप में देखा जा सकता है | क्योकि उत्तर आधुनिककाल के दौर में भूमंडलीकरण के प्रभाव से सभी समाज और साहित्य प्रभावित हुआ है ऐसे समय में भला आदिवासी साहित्य और यात्रा साहित्य जैसे अन्य साहित्य अछूते कैसे हो सकते हैं | समकालीन यात्रा साहित्य में अपना विशेष योगदान देने वाले साहित्यकारों में से रामदरश मिश्र, विष्णु प्रभाकर, नरेश मेहता, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, असगर वजाहत, नासिरा शर्मा, अमृतलाल वेगड़, ओम थानवी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, हरिराम मीणा आदि लोगों का नाम प्रमुखता के साथ लिया जा सकता है | हरिराम मीणा ने अब तक दो यात्रा साहित्य लिखे हैं “साईबर सिटी से नंगे आदिवासियों तक” तथा दूसरी पुस्तक “आदिवासी लोक की यात्राएँ” | मेरा शोध आलेख “आदिवासी लोक की यात्राएँ” पुस्तक पर केंद्रित है | हरिराम मीणा ने आदिवासियों के तमाम समस्याओं को जानने के लिए जिन-जिन स्थानों की यात्रा की उनको अपने ज्ञानेन्द्रियो से अनुभूत करके पुस्तकाकार रूप दिया है | उन्होंने भारत में आदिवासियों के वास्तविक स्थिति से रूबरू होने के लिए आदिवासी बहुल इलाकों जैसे झारखण्ड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान व गुजरात की यात्राएँ की और दक्षिण भारत का प्रतिनिधि प्रतिनिधित्व करने वाली नीलगिरी की घाटियाँ, बंगाल की खाड़ी के कालापानी के तूफानी थपेड़ों को सदियों से झेल रहे अंडमान टापू और पश्चिम बंगाल से लेकर हिमालय के धवल शिखरों की यात्राएँ भी शामिल है | इस यात्रा साहित्य में कुल ग्यारह अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में अलग-अलग आदिवासी इलाकों और आदिवासियों की वास्तविक स्थिति का जीवंत वर्णन है | हरिराम मीणा ने यात्रा साहित्य के महत्व को उद्घाटित करते हुए कहते हैं कि “घुमक्कड़ राहुल जी ने कही कही थी कि ‘सैर कर दुनिया की गाफिल…’ यह कहने के पीछे मस्ती मारना नहीं था प्रत्युत देशाटन के माध्यम से ज्ञानार्जन था | जब बाबा कबीर ने तर्क दिया था कि “तू कहता कागद की लेखी मैं कहता आंखन की देखी” तब उनका भी इशारा फर्स्ट हैंड नॉलेज की तरफ ही था और उससे पहले महात्मा बुद्ध ने भी सलाह दी थी कि “किसी गुरु ने कहा है अथवा किसी ग्रंथ में लिखा इसलिए मत मान लेना, इंद्रीय-बोध से खुद परखना |”2
उक्त बातों से स्पष्ट है कि यात्रा सहित वास्तविक और प्रत्यक्ष रूप से महसूस किया हुआ खोजी ज्ञान होता है | आदिवासियों के बारे में मीडिया सरकार और दिकुओ ने झूठा भ्रम फैला है कि आदिवासी लोग बर्बर और असभ्य होते हैं तथा तीर-धनुष के माध्यम से सामान्य-जन को क्षति पहुंचाते हैं | आमजन पुस्तकों से काफी दूर होते हैं और वास्तविकता से काफी अनभिज्ञ होते हैं | हरिराम मीणा ने इन्हीं सब भ्रम को खत्म करने के लिए आदिवासी क्षेत्रों की यात्रा की और उन आदिवासियों से विचार-विश्लेषण तथा काफी अध्ययन के बाद “आदिवासी लोक की यात्राएँ” नामक पुस्तक लिखी | इस पुस्तक में हरिराम मीणा ने आदिवासियों की प्रमुख समस्याओं को काफी जीवंतता के साथ पाठक के सामने रखी है जिससे आम पाठक वर्ग की संवेदनाएँ आदिवासियों के प्रति स्वतः ही जाग जाती है और आदिवासियों के बारे में तमाम भ्रांतियों को आमजन के मन-मस्तिष्क से बेनकाब करने की कोशिश की हैं | आदिवासियों के बारे में आम लोगों के बीच में तमाम गलत धारणा बनी हुई है कि ये विकास विरोधी होते हैं, इनके बच्चे विद्यालय नहीं जाना चाहते हैं, ये कामचोर होते हैं तथा यह वस्त्र नहीं पहनते हैं या कम पहनते है, ये सामाजिक नहीं होते हैं आदि धारणाएँ बनी हुई है जो कि बिल्कुल गलत है | वास्तविकता यह है कि आधुनिक सभ्य समाज ने आदिवासियों को विकास के नाम पर इतना ज्यादा छला है कि उनका विश्वास ही दिकुओं उद्योगपतियों और सरकारों से उठ गया है | सबसे पहले हमें उन आदिवासियों का विश्वास जीतना होगा जो आदिवासी शुरू से अभी तक लगातार हर प्रकार के शोषण के शिकार होते आए हैं | आदिवासी की जगह हम आमजन भी होते तो शायद हम भी वही करते जो आदिवासी कर रहे हैं | आदिवासियों का विश्वास जीतने के लिए आमजन और आदिवासियों के बीच आत्मिक संप्रेषण का होना बहुत जरूरी है | सरकार आदिवासियों के लिए जो योजनाएँ उनके कल्याण के लिए बनाती है उस समय आदिवासियों के आदिम परंपरा और उनकी मानसिकता को ध्यान मे रख कर बनाएँ | तब आदिवासी लोग उन योजनाओं को सहर्ष स्वीकार करेंगे |
“भील द्रोण फिर से माँगना अंगूठा” नामक अध्याय में हरिराम मीणा ने भील आदिवासियों के बारे में विस्तार से लिखे हैं | झाबुआ क्षेत्र का भ्रमण करते वक्त इनको सुनाई दिया कि आदिवासी विकास विरोधी होते है जिसका कारण यह बताया गया कि सन् 2000 में सरकार ने “इंदिरा आवास योजना” के तहत आदिवासियों को द्विकक्षीय पक्के मकान बना कर देना चाहती थी जिसका आदिवासियों ने कड़ा विरोध किया | विरोध होने का कारण यह था की सरकार की योजनाओं का इन्हे सही से पता ही नहीं था | संप्रेषण का अभाव होने के कारण आदिवासियों ने स्वयं अपने लिए बनाए गए घर को तोड़ दिये और पुनः पुराना घास-फूस की अपनी झोपड़ी बना लीजिए | आदिवासी लोग ऐसा क्यों किए ? जब यह पता किया गया तो आदिवासियों ने बताया कि हमें लगा कि यह लोग हमारे जमीन पर अधिग्रहण कर लेंगे और ये घर हम लोगों के लिए नहीं सरकार के आदमी अपने लिए बनाए हैं |
आदिवासियों पर दूसरा आरोप लगाया जाता है कि ये शिक्षित नहीं होना चाहते हैं लेखक जब मध्य प्रदेश के उज्जैन जिला गए हुए थे तो उक्त संदर्भ में किसी व्यक्ति ने एक संदर्भ बताया कि एक सरकारी स्कूल में मास्टर ने अपने बच्चों से एक सवाल पूछा “एकलव्य कौन था ? किसी ने रटा-रटाया उत्तर दिया कि ‘एक भील का लड़का’ | तब किसी अन्य गैर-आदिवासी छात्र ने महिपाल की तरफ इशारा करते हुए टिप्पणी कर डाली कि भील! यानी कि इसी जैसा जंगली|’ महिपाल भूरिया ने इस अपमान को सहन नहीं करते हुए उसी दिन स्कूल छोड़ दिया |”3
आदिवासियों पर तीसरा आरोप लगाया जाता है कि आदिवासी आलसी होते हैं इसका खण्डन लेखक ने “मुंडा : मेरे बिरसा, तू कहीं से भी आ!” नामक अध्याय में करते हुए कहते हैं – “आदिवासी आलसी नहीं, बल्कि वह उस धन के पीछे नहीं भागता, जो तनिक चूके कि सारी आफतों की जड़ बन जाता है | भौतिक सुविधाओं के बोझ तले आदिवासी दवना-घुटना नहीं चाहता, वह जहाँ तक संभव हो फुर्सत निकाल कर जीवन को जीना चाहता है |”4
आदिवासियों के बारे में आमजन के बीच चौथी धारणा है कि ये आदिवासी लोग कपड़े नहीं पहनते या बहुत कम पहनते हैं, अब आप ही लोग बताइए कि जो आदिवासी अपने पेट तक नहीं भर पा रहा है तथा उनके बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं जो अपने तथा अपने परिवार की दवा तक नहीं कर पा रहे हैं भला वे लोग कैसे अच्छे कपड़े पहन सकते हैं | आदिवासी हो या कोई भी मानव समुदाय हो किसको अच्छा खाना, पीना पहनना अच्छा नहीं लगता |
आदिवासियों के बारे में आमजन के बीच पाँचवी धारणा है कि आदिवासी सामाजिक नहीं होते हैं इन आदिवासियों के सामाजिकता का अंदाजा आदिवासियों की शादी-ब्याह या गमी के मौके पर देखा जा सकता है | याथा “किसी खुशी अथवा गमी के मौके पर किसी परिवार द्वारा जो सामूहिक भोज दिया जाता है उसका भार आयोजनकर्ता घर-परिवार के कंधों पर ही नहीं पड़ता, बल्कि सारी बस्ती तथा रिश्तेदार किसी ने किसी प्रकार का योगदान देते हैं चाहे अनाज, आटा, गुड़, तेल, घी, नमक, मसाले, दाल, चावल,वगैरा-वगैरा कुछ भी हो | किसी दूसरे पर भार नहीं बनने की आदिम प्रवृत्ति और सामूहिकता की भावना इनकी संस्कृति में कुट-कुट कर भरी हुई है |”5
आदिवासियों के अच्छाइयों पर गौर करें तो इन लोगो में दहेज प्रथा भी नहीं होती बल्कि उल्टा लड़के वाला लड़की पक्ष को मूल्य देता है | “गरासिया : पत्थर ही फेंकते रहोगे क्या?” नामक अध्याय में मीणा जी ने आदिवासियों के प्रेम विवाह का बड़ा ही मोहक वर्णन किया है, “विवाह की ‘भगोरिया’ प्रथा भी मैंने यही देखी | मेले की मस्ती के दौरान युवक-युवतियों के मध्य प्रेम संबंध भी बनते हैं | ऐसे बहुत से जोड़े मेला स्थल से भागकर निकटवर्ती ‘मगरा’ यानी कि पहाड़ी पर चढ़ जाते हैं और वहाँ से ऐलान करते हैं कि “मैं फला का छोरा और मै फला की छोरी ब्याह करना चाहते हैं |”….. इस प्रकार प्रेम पर आधारित विवाह संबंधों की ऐसी स्वतंत्र पारंपरिक समाजों में अन्यत्र देखने को कहाँ मिलेगी?”6
उक्त विवेचना से स्पष्ट हो गया होगा कि जो सभ्य समाज आदिवासियों को बर्बर कहते है तथा तमाम घिनौनी आक्षेप लगाते है उनमें कितना सत्यता है | वास्तविकता यह है कि आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन का लगातार शोषण होने से आदिवासी लोग अभिशप्त जीवन जीने के लिए मजबूर हो रहे हैं | दिकुओं के ज्ञान मे बर्बर, अज्ञानी समझे जाने वाले आदिवासियों के अधिकार क्षेत्र में जब जल, जंगल और जमीन थी तब प्राकृतिक संतुलन बहुत अच्छा था, वर्षा नियमित होती थी, जंगल हरे-भरे हुआ करते थे, शुद्ध ऑक्सीजन अच्छी मात्रा में मिलती थी, सूखा नहीं पड़ता था, वही जब से जल, जंगल और जमीन, सभ्य और अपने को शिक्षित मानने वाले ज्ञानी दिकुओं के अधिकार क्षेत्र में गया, तब से लगातार प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने लगा है जिसका आशीर्वाद स्वरूप प्रकृति ने हमें ग्रीन हाउस गैस प्रभाव, ओजोन परत का फटना, दिनों-दिन कार्बन डाइऑक्साइड गैस की मात्रा में वृद्धि होना, सूर्य की पराबैगनी किरणों का बढ़ता प्रभाव, नियमित समय पर वर्षा न होना, अम्लीय वर्षा होना, हिम ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्र के जल स्तर में बढ़ोतरी होना, विभिन्न खतरनाक चक्रवातों का आना आदि अनेक प्रभाव प्रकृति ने हमें सौगात के रूप में हमें भेंट की हैं | इस प्रकार से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाने से पुरे दुनिया का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है | अब हमें सोचना चाहिए कि वास्तव में प्रकृति के रखवाले असभ्य, बर्बर और अज्ञानी आदिवासी लोग हैं या अपने को ज्ञानी, शिक्षित मानने वाले दिकु |
आदिवासियों का लिंगानुपात हम सभ्य और शिक्षित समाज से काफी अच्छा है, जबकि हम सभ्य और शिक्षित लोग है | ये भी सोचने पर मजबूर करता हैं | हम अपने अतीत को याद करें तो जिस आदिवासी मनुष्य से आज हम होमोसेपियंस आधुनिक मानव कह लाते हैं उसमे भी आदिवासियो का ही योगदान है | प्राचीन काल मे आग की खोज हो या पहिये की खोज हो, तमाम औषधियों ज्ञान, धातुओं का ज्ञान इन्हीं लोगों से प्राप्त हुए हैं | हिन्दी भाषा के शब्दकोश मे बहुत से आदिवासी बहुल क्षेत्रों मे प्रचलित शब्दों को लिया गया हैं | इस प्रकार से हिन्दी भाषा के शब्दावलियों मे वृद्धि करने मे भी आदिवासियों का योगदान है |
उक्त बातों पर ध्यान दे तो पाते है की हम आदिवासियों से लेने के सिवाय देने का कार्य नहीं के बराबर किए हैं | बस कहने को हम सभ्य और शिक्षित हैं जबकि हमसे काफी समझदार आदिवासी लोग हैं | आज जरूरत है तो आदिवासियों के शब्द संपदा, भाषा, लिपि, औषधि ज्ञान और भी अन्य ज्ञान को जो केवल आदिवासियों को ही पता हैं उनको सूरक्षित करने का हैं | यदि समय रहते इन बातों पर गौर नहीं किया गया तो आदिवासियों के साथ ही साथ उनका ज्ञान संपदा भी अतीत के गर्भ मे दफन हो जाएगा |
उक्त संदर्भ में डॉ. रमेश चंद्र मीणा ने सभ्य समाज की चुटकी लेते हुए “हम तुमको आदमी बना देगे” शीर्षक कविता में व्यक्त किए है – “वे आए / हमें सभ्यता सिखाने / झोपड़ियों से निकलकर / अपटूडेट बनाने उन्होंने कहा / तुम्हारी परम्पराएँ आदिम हैं / संस्कार आउटडेटेड हैं / हम तुम्हें सभ्य बनाएंगे / और कुछ ही सालों में / तुम्हें आदमी बना देंगे / उन्होंने पहाड़ों को थोड़ा / जंगलों को काटा / हमारी झोपड़ी पर / बुलडोजर चलाकर / कुछ सिक्के फेंक दिए / महुआ के पेड़ों के बदले / थमा दी दारू की बोतल / अब वहाँ ऊँची-ऊँची चिमनिया / उगल रही है गाढ़ा धुआ / पगडंडियाँ सड़कों में बदल गई / और हम मजबूरी में / मजदूरों में बदल गए / साहूकारों और दिकुओं के / भाग्य खुल गए / और हम निराधार बन गए / आदमी बनाने की ओट में / आजादी ही नहीं / सब कुछ छीन लिया / अस्मिता भी और अस्मत भी / पहले वे हमें असभ्य बताते थे / और अब / हमारी नई पीढ़ी के अपने / हमें असभ्य बताते हैं / समझ में नहीं आ रहा है कि हम पहले असभ्य थे / या अब असभ्य हैं |”7
निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि जो आदिवासीयों के पास अच्छा है उसे अपनाया जाए और सभ्य विकसित लोगों के पास जो अच्छा है उन आदिवासी लोगों के साथ साझा किया जाए | आदिवासियों को उनके आदिमता से बाहर लाया जाए और उनको भौतिक सुख-सुविधाओं से परिचित कराया जाए | सब मिलाकर उन आदिवासियों को उनकी आदिमता वाले हालत पर छोड़ना भी नहीं है और उनके निवास क्षेत्रों में आवश्यकता से अधिक छेड़-छाड़ भी नहीं करनी है, तब जाकर आदिवासियों की दशा और दिशा में सुधार हो सकता है |
संदर्भ ग्रंथ सूची
- निर्मला पुतुल, बेघर सपने, आधार प्रकाशन प्रा. लि. एससीएफ 267, सेक्टर-16 पंचकूला – 134113 (हरियाणा), प्रथम संस्करण : 2014, पृ. 32
- हरि राम मीणा, आदिवासी लोक की यात्राएँ, भारतीय ज्ञानपीठ 18, इन्स्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नयी दिल्ली- 110003, प्रथम संस्करण : 2016, पृ. 129
- वही, पृ. 42
- वही, पृ. 114
- वही, पृ. 49
- वही, पृ. 69
- बी. पी वर्मा ‘पथिक’- अरावली उद्घोष, अंक 58, पृ. 58
मराठी रंगमंच का पूर्वार्ध; स्त्रियॉं के सर्जनात्मक प्रतिरोध के विशेष संदर्भ में-डॉ. सतीश पावड़े

मराठी रंगमंच का पूर्वार्ध; स्त्रियॉं के सर्जनात्मक प्रतिरोध के विशेष संदर्भ में
*डॉ. सतीश पावड़े
नारीवाद की परिकल्पना 1975 के पश्चात भारत में अवतरित हुई है। किन्तु नारी प्रश्नों को लेकर एक गंभीर पहल सुधारणाओं के परिप्रेक्ष्य में 1848 में ही की गयी। नारी शिक्षा को लेकर यह पहल की गयी थी। महात्मा ज्योतिबाराव फुले ने लड़कियों के लिए इसी वर्ष पहली पाठशाला शुरू की। 1852 के करीब फुले दाम्पत्य द्वारा यूने जिले में 18 पाठशालाए शुरू की गयी। जिसमें 250 लड़कियों को दाखिला दिया गया। इस समय तक सावित्री बाई फुले अध्यापिका, मुख्य अध्यापिका से भारत को प्रशिक्षित शिक्षिका बन गयी थी।
इस काल के पश्चात बाल विवाह,सती प्रथा,विधवाओं का विवाह,परिष्कृत स्त्रियॉं का पुनर्वसन,आदि प्रश्न हासिए पर आए। स्त्री शिक्षा,स्त्री अधिकार,नारी सम्मान के विषय सामाजिक आंदोलनों के मुख्य प्रश्न बनते गए। जिसका प्रभाव रंगमंच के व्यवहार पर भी पड़ता गया। रंगमंच पर स्त्रियॉं को प्रवेश या उनके भारीदारी का प्रश्न भी चर्चा का विषय बनता गया। अगले 25 वर्ष तक यह चर्चा निरंतर चलती रही किन्तु सामंतवादी, पुरुषसत्तात्मक व्यवस्था द्वारा उसका पुरजोर विरोध होता रहा। सामाजिक सांस्कृतिक मान्यताएं उन्हे रंगमंच पर जाने से रोकती रही।
इस परिस्थिति में भी रंगमंच को लेकर स्त्री वर्ग द्वारा प्रतिरोधी स्वर बुलंद करने का साहस स्त्रियॉं द्वारा किया गया। मराठी रंगमंच का पूर्वार्ध कुछ विद्रोही स्त्रियॉं के सर्जनात्मक प्रतिरोधी स्वर से दीप्तिमान हुआ है। किन्तु इस इतिहास को मुख्य धारा के इतिहास ने कभी प्रकाश में ही नहीं आने दिया । स्त्री नाटक कार,कलाकारों को 65 वर्ष से भी अधिक वर्ष रंगमंच की दुनियाँ में आने से रोका गया। माध्यम वर्गीय मानसिकता इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा रोड़ा बनी थी। किन्तु क्षुद्रति शूद्र,दलित,अस्पर्श और बहुजन वर्ग के स्त्रियॉं ने अपने विद्रोह से न की रंगमंच पर प्रवेश किया अलकि अपने कर्तव्य से एक सुनहरा इतिहास भी लिखा।
इतिहास के पन्नों मेंहस्ताक्षर बने यह संदर्भ मुख्य धारा के इतिहासकारों ने कभी प्रकाश में आने ही नहीं दिये,किन्तु शनै शनै … यह इतिहास अब काल की परतों को चीर कर सामने आने लगा है।
1856 को इनहि शूद्र वर्ग के स्त्री कलाकारों ने स्वतंत्र तमाशा कंपनी स्थापित की थी, इस प्रकार का संदर्भ प्राप्त हुआ है । 1867 में महिलाओं द्वारा एक और मिश्र नाटक मंडलीकी स्थापना की गयी थी। विभूजन चित चातक स्वाति वर्षा पुणेकर हिन्दू स्त्री नाटक मंडली यह और एक मंडली का नाम था । यह पहली स्त्री नाटक मंडली थी,जिसकी स्थापना म्हालसा नमक नाती द्वारा किया गया। इस मंडली में सिर्फ महिलाएं ही थी । मनोरंजन के साथ यह मंडली बाल विवाह का विरोध,विधवा,परित्यक्ताओं के विवाह का समर्थन,अमानवीय धार्मिक रूढ़ियों का विरोध,और सामाजिक सुधारनाओं पर बल देती थी। इसी नाटक मंडली का सर्वाधिक चर्चित नाटक पद्मावती था जिसमें एक समबल और विद्रोही स्त्री का चरित्र मुखीन किया गया था।
1867 में मनोरंजन मुंबई हिन्दू स्त्री मिश्रित नाटक मंडली,यह और एक नाटक मंडली नीरबाई, टैबई,विठाबाई,म्हालसा बाई आदि स्त्रियॉं ने सहकारी तत्वों पर स्थापित किया । इसके पश्चात माणिक प्रभु प्रसादिक पूर्ण चंदर्योदय सनलिकार मंडली,सोनी पुणेकरीन तथा कृष्णबाई द्वारा संचालित की जाती रही। 1908 तक यह सारी महिला नाटक मंडली धूम ढलल्ले से चलती रही। खास तौर पर यह सारी महिलाए शूद्र दलित बहुजन (वारंगना,कलवंतीन तवायफ,कोलहटीन, नटी) समाज से थी। क्योकि सवर्ण समाज में मंच पर आना पापकर्म समझा जाता था । फिर अभिनय अथवा अन्य रंगकर्म तो बहुत दूर की बात थी। 1908 से 1925,इस काल में बेलगांवकर स्त्री नाटक मंडली,सटरकर स्त्री नाटक मंडली तथा मनोहर स्त्री नाटक मंडली जो केवल महिलाओं को नाटक मंडलियां थी,उन्होने पुरुषों द्वारा स्थापित नाटक मंडलियों को टक्कर दी। अपने आप में यह गतिविधि प्रतिरोध के सर्जनात्मक स्वर थे। जिसे भविष्य में लिखे गए इतिहास से गायब कर दिया गया।
जिस समय में महिलाएं घर की दहलीज़ के अंदर ही अपना जीवन का प्रारम्भ और अंत कर लेती,उस समय में मंच पर केवल अभिनय ही नहीं अपितु नाटक मंडली स्थापित करना विविध नाटकों का संचालन और निर्माण करना,सक्षम आर्थिक स्थाईट प्राप्त करना था यह अपने आप में बड़ी बात थी। गणिका,वारांगना समाज से आई,हाशिये पर स्थित समाज की यह महिलाएं अपने प्रतिरोध का सर्जनात्मक स्वर अपने अपने नाटकों में प्रस्तुत कर रही थी । सामाजिक सांस्कृतिक समस्याए उनके मुख्य विषय थे।
बड़ी हिम्मत के साथ यह प्रयास किए जाते रहे । बेलगांवकर नाटक मंडली एकांबबाई द्वारा,सादुबई सतारकर,द्वारा सतारकर नाटक मंडली स्थापित की गयी थी । यह तीनों स्त्री नाटक मंडली ने प्रसिद्धि और पैसा दोनों कमाया पर सम्मान और प्रतिष्ठा उन्हे नहीं दी गयी।
1914 में पहली बार सवर्ण में से पहली स्त्री कमला बाई गोखले को इस रंगमंचीय व्यवहार में शामिल किया गया पर सह व्यवष्ठापक के रूप में। उनके पति द्वारा स्थापित इस नाटक मंडली में उनके पति ने उनकी सह व्यवस्थापक के रूप में नियुक्ति की थी । इसी समय प्रसिद्ध गायिका तथा नाटककर हीराबाई पेडनेकर ने नूतन संगीत नाटक मंडली की स्थापना की जो मिश्रा स्वरूप की थी । 1929 तक अर्थात 1865 से 1929 तक इन 64 वर्षों में अभिजन,सवर्ण वर्ग के स्त्रियॉं को रंगमंच पर नहीं आने दिया गया। जबकि समाज से तिरस्कृत तबके से आई महिलाओं में विद्रोह की लंबी लड़ाई लड़ी । बेलगांवकर नाटक मंडली ने इस विद्रोह का परचम सबसे पहले हाथा मे उठाया । इस कंपनी में पुरुषों की भूमिकाएँ भी स्त्रियॉं द्वारा अभिनीत की जाती थी । जिसमें शिवाजी आगरकर,लोकमान्य तिलक, जैसे किरदार शामिल थे। इस संदर्भ में मॉडर्न मराठी थियेटर में नीरा आडरकर लिखती है कि,”dandhari the play,which was produce by womens thetre company,founded by prostitute,almost all this plays on social reforms dealing with womens education,chaild marriage,love marrigemarrige of widows,divorse women,also dowery marriage,they were enact by totally mail cast.this contribution is never mention in any of the debates about women and thetre.”
दंदधारी नाटक बाल गंगाधर तिलक के कार्यो पर आधारित था। उनकी भूमिका तथा इस प्रकार का नाटक करने पर इस कंपनी को प्रताड़ित भी किया गया। वेश्या गणिकाओं को ऐसे नाटक करने का अधिकार किसने दिया। ऐसे सवाल पूछकर तत्कालीन नाट्य आलोचकों द्वारा ऐसे प्रयासों को घिनौना,अप्राकतिक बाजारू,भयानक निचले दर्जे की हरकत कहा गया। उसे पापकर्म भी कहा गया।
1912 में मथुरा बाई द्रविड़ द्वारा इन आक्षेपों को जोरदार उत्तर दिया गया । महाराष्ट्र के अमरावती में इस वर्ष अखिल भारतीय नाट्य सम्मेलन सम्पन्न हुआ जिसमे मथुराबाई ने कहा की ‘the way the actors wore low necked blouses and the mans in which the sari was stretched over the front emphasizing the breast in a vulgar fashion. They used seductive gestures all the time in companision of that act of these women was very moral respective and prestigious.’मथुराबाई ने इस प्रकार पुरुष सत्ता,सामंतवादी दृष्टि को कडा जवाब दिया ।
1930 तक आभिजात्य वर्ग के किसी भी महिला को रंगमंच पर नहीं आने दिया गया। जबकि 1915 मेन रन्गभूमि मासिक पत्रिका द्वारा ‘रंगमंच पर स्त्रियॉं के प्रवेश’ को लेकर एक चर्चा आयोजित की गयी थी। इस चर्चा में काशी बाई हिरलेकर इस महिला द्वारा सर्व प्रथम जाहीर तौर पर इस प्रवेश का समर्थन किया गया था । 1933 में भी संजीवन नामक साप्ताहिक द्वारा इसी प्रकार की चर्चा आयोजित की गयी जिसमें 8 महिलाओं में से 6 महिलाओं ने स्त्रियॉं को रंगमंच पर प्रवेश करने की हिमायत की गयी थी। इसके संदर्भ में जो भूमिका इन महिलाओं ने रखी वह बहुत विशेष है।
- रंगमंच पर काम करना इसे व्यक्तिगत चुनाव के रूप में स्वीकारा जाए ।
- जैसे शिक्षक डाक्टर व्यवसाय है,वैसा ही दर्जा इसे भी दिया जाए।अर्थात व्यावसायिक रूप में मान्यता दी जाए ।
- कला का संबंध कुलीनता अथवा नैतिकता से न जोड़ा जाए ।
- स्त्रियॉं रंगमंच पर प्रवेश करने के लिए हिचकिचाहट न करने। पर पुरुषों को गैर फायदा लेने से रोके,और चरित्र आदि की रक्षा स्वयं करें।
- स्त्रियॉं ने समाज के अनुमति की राह नहीं देखनी चाहिए। बल्कि अपने कार्य से, कर्तव्य से उनके पूर्वाग्रह दूर करने चाहिए।
- सहकारी पुरुषों में मुक्कता पूर्वक संबंध रखें और अपनी सकारात्मक परंतु कठोर भूमिका निर्माण करें।
एक प्रकार से इसे नारीवादी चिंतन भी कहा जा सकता है । पर मराठी रंगमंच पर स्त्रियॉं के प्रवेश को लेकर यह किया गया,यह यथार्थ है । एक अन्य लेखिका,यमुना बाई द्रविड़ द्वारा अपने समर्थन में प्रतिरोध के स्वर को बुलंद करती है । स्त्री के सकारात्मक चरित्र, भूमिका निर्माण करने में मराठी के अधिकतम नाटककारों ने न्याय नहीं किया गया है। खाडिलकर जैसे बड़े नाटककार भी अपवाद नहीं है। जबकि इनहि खाडिलकर द्वारा ‘कीचक वहा’ जैसा नाटक लिखा गया । किन्तु रंगमंच पर अभिजन,सवर्ण वर्ग की स्त्रियॉं के प्रवेश को लेकर अंत तक विरोध जारी रहा। यह समाज कई शर्ते नियमों के आधार पर स्त्रियॉं को रंगमंच पर आने से इन स्त्रियॉं को रोकती रही । जिसमें श. बा. मजूमदार, न्यायमूर्ति महाबल, श्री म. माटे, गणपतराव बोडस,बालगंधर्व आदि महामनाओं का नाम शामिल है। जबकि कमला बाई किबे,विमल लाल जी,बेबी कुलकर्णी,यमुनाबाई द्रविड़,मथुराताई द्रविड़ आदि महिलाओं ने उसका जोरदार समर्थन किया। अंतत; 1933 में ‘नाट्यमंतर’संस्था द्वारा पहली बार सवर्ण,अभिजन महिलाओं को रंगमंच पर प्रवेश दिया गया। नाटक का नाम था ‘आन्ध्यांची शाझ’ (अन्धो की पाठशाला) । तह नाटक व्योनर्सन आयर्स के ‘गंतलेटनाटक’ का रूपान्तरण था । इस नाटक में ज्योत्सना भोले नायिका तथा पद्माटाई वर्तक सह नायिका के रूप में थी । नायक और निर्देशक थे ज्योत्सना भोले के पति केशवराव भोले। और निर्माता और अनुवादक थे पद्माटाई वर्तक के पति श्री वा. वर्तक।
रंगमंच पर स्त्रियॉं के र्पवेश का एक और महत्वपूर्ण कारण ‘अर्थकारण’ भी था। नाटक मंडलियों द्वारा इसके पूर्व अन्य वर्ग के स्त्रियॉं को 1000 रुपये माह वेतन देना पड़ता था, कुलीन स्त्रियॉं को केवल 150 रुपए माह दिये जाते थे । इस कारण भी नाटक मंडली के मालिक भी सवर्ण,अभिजन महिलाओं के रंगमंच में प्रवेश हेतु उत्तरार्ध में प्रयत्न करते दिखाईदेते थे।अंततः यह एक लंबी लड़ाई जीती तो गयी पर मराठी रंगमंच के इस पूर्वार्ध में दलित शूद्र,बहुजन तथा हाशिये पर आसीन महिलाओं दारा जो भूमिका अदा की गयी उसका महत्व सर्जनात्मक प्रतिरोध स्वर के परिप्रेक्ष्य में समझना आवश्यक है।
*डॉ. सतीश पावड़े
सहायक प्रोफेसर
प्रदर्शनकारी कला विभाग (नाटक और फ़िल्म)
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा
EMAIL; satishpawade1963@gmail.com
MOBILE; 9372150158
नारी जीवन: आदर्श एवं उत्कर्ष,लेखक- डॉ. प्रमोद पाण्डेय,समीक्षक- आलोक चौबे
नारी जीवन: आदर्श एवं उत्कर्ष
लेखक- डॉ. प्रमोद पाण्डेय
समीक्षक- आलोक चौबे
प्राचीन काल से लेकर वर्तमान काल तक नारी जीवन
के विभिन्न पहलुओं का चित्रण करती डॉ. प्रमोद पाण्डेय द्वारा
लिखित पुस्तक "नारी जीवन: आदर्श एवं उत्कर्ष"
नारी जीवन की समस्याओं तथा उनकी स्थितियों पर डॉ. प्रमोद पाण्डेय द्वारा लिखी गई पुस्तक “नारी जीवन: आदर्श एवं उत्कर्ष” इस पुस्तक में प्रागैतिहासिक काल से लेकर वर्तमानकाल तक की महिलाओं की समस्याओं और स्थितियों पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया गया है। पर्दा प्रथा, बहु विवाह प्रथा, सती प्रथा आदि द्वारा महिलाओं के शोषण को उजागर करने वाली यह पुस्तक सिर्फ भारत देश की ही नहीं बल्कि अमेरिका, रूस जैसे कई देशों की महिलाओं की स्थितियों का चित्र उकेरा गया है।
आर. के. पब्लिकेशन, मुंबई द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में कुल एक सौ सोलह पृष्ठ हैं। इसकी कीमत १७५/- रुपए है। इस पुस्तक में लेखक ने अपनी बात में लिखा है कि “आधुनिक दौर स्त्री विमर्श कर दो रहा है, स्त्री विमर्श के अंतर्गत प्रागैतिहासिक काल से लेकर वर्तमान काल तक की नारी जीवन से जुड़ी तमाम समस्याओं का विभिन्न कालखंडों में नारी की स्थिति का चित्रण हुआ है। आज के दौर में स्त्रियों के बढ़ते कदम ने नारी जीवन को नई दिशा प्रदान की है।”

इसी क्रम में भी आगे लिखते हैं कि “वैदिक कालीन समाज में स्त्रियों की स्थिति सम्मानजनक थी परंतु मध्यकाल में उनकी स्थिति अत्यंत देनी होती चली गई। उनकी इस दयनीय अवस्था का कारण पुरुष का स्वार्थ है। स्वार्थ पूर्ति हेतु पुरुषों ने स्त्रियों को ऐसे मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया, जहां से उनका निकलना असंभव सा लगने लगा था।” अपनी बात में लेखक ने अंत में यह लिखा है कि “स्त्रियों को पुनः समाज में प्रतिष्ठा, आदर व सम्मान प्राप्त हो ऐसी शुभकामनाएं मैं इस पुस्तक के माध्यम से प्रेषित कर रहा हूं। मैं यह उम्मीद करता हूं कि समाज में स्त्रियों के प्रति लोगों का नजरिया अवश्य बदलेगा और समाज में उन्हें पुरुषों के बराबर का दर्जा प्राप्त होगा।”
पहले अध्याय में लेखक डॉ. प्रमोद पाण्डेय ने प्राचीन भारतीय नारी जीवन के आदर्श को बड़े ही सुंदर और सटीक ढंग से अर्थ को समझाते हुए उसकी व्याख्या प्रस्तुत करते हुए परिभाषित किया है। इसके साथ ही साथ नारी जीवन के उत्कर्ष के अर्थ को समझाते हुए नारी जीवन के उत्कर्ष को सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। उन्होंने एक जगह लिखा है कि “मनुष्य सत्ता के दो भाग हैं- ज्ञान और शक्ति। मनुष्य पहले तो जानना चाहता है और फिर कहना चाहता है। इसके अतिरिक्त मनुष्य सत्ता का तीसरा भाग भी है, उसे हम प्रेम कहते हैं। यही प्रेम दोनों का समान आश्रय स्थान है। दोनों जाकर इसी प्रेम में आश्रय लेते हैं।”
दूसरे अध्याय में लेखक ने विभिन्न युगों में नारी जीवन के अस्तित्व को चित्रित किया है। जिसमें प्रागैतिहासिक युग से लेकर वर्तमान युग तक नारी जीवन की समस्याओं तथा स्थितियों का सुंदर एवं स्पष्ट चित्रण किया है। इसके अंतर्गत प्राचीनकाल, मध्यकाल तथा वर्तमानकाल के आधार पर नारी जीवन की समस्या का वर्णन किया है। यहाँ पर विधवा के संदर्भ में गांधी जी द्वारा लिखा गया एक मत उन्होंने प्रस्तुत किया है। जिसमें गांधीजी ने नवयुवकों को परामर्श देते हुए लिखा है कि “मैं उस लड़की को विधवा ही नहीं मानता जो १५ से १६ साल की उम्र में बिना पूछे ब्याह दी गई। अपने नामधारी पति के साथ कभी रही भी नहीं और एक दिन अचानक विधवा करार देगी दे दी गई। यह शब्द और भाषा का दुरुपयोग है और भारी पाप है।” इसी क्रम में वे विधवा पुनर्विवाह के संबंध में लिखते हैं कि “जो माता-पिता अपने संरक्षकत्व का दुरुपयोग करके अपनी दुधमुही लड़की का विवाह किसी अधेड़ बुड्ढे से अथवा किसी किशोर से कर देते हैं, उनका कम से कम यह कर्तव्य है कि यदि उनकी लड़की विधवा हो जाए तो उसका पुनर्विवाह करके अपने पाप का प्रायश्चित कर लें।” लेखक का मानना है कि इन सब कुरीतियों का कारण अंधविश्वास, निरक्षरता और अज्ञानता है। स्त्रियों को इन सब समस्याओं से छुटकारा दिलाने के लिए राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी दयानंद सरस्वती, पंडिता रमाबाई, महर्षि केशव कर्वे, महात्मा गांधी, सावित्रीबाई फुले जैसे महान समाज सुधारकों का ध्यान एक साथ समाज सुधार व स्त्री शिक्षा की ओर गया, तब जाकर कहीं समाज में परिवर्तन संभव हुआ।
तीसरे अध्याय में लेखक ने स्वतंत्रता पूर्व स्त्रियों के भविष्य की गई कल्पना जो आज के दौर में साकार हो रही है, उसको बड़े ही सुंदर एवं स्पष्ट शब्दों में प्रस्तुत किया है। स्वतंत्रता पूर्व का भविष्य काल जो आज वर्तमान काल हो चुका है, उस दौर में साहित्यकारों द्वारा स्त्रियों की समस्याओं के संदर्भ में की गई कल्पनाएं आज साकार हो रही हैं। लेखक ने एक जगह पर लिखा है कि “भूतकाल में स्त्रियां जिस स्थिति से गुजर रही थीं, उन पर इतना अत्याचार हुआ था, भविष्य में उन्हीं प्रतिक्रियाओं का परिणाम सामने अवश्य दिखाई देगा।” लेखक का मानना है कि समाज में स्त्रियों को स्वतंत्रता मिलने के साथ-साथ उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता भी मिलनी चाहिए।
यह तो हम सभी जानते हैं कि भारत में स्त्रियों की स्थिति प्राचीन काल से लेकर अब तक किस प्रकार की रही है परंतु अमेरिका, रूस आदि देशों की महिलाओं की स्थिति किस प्रकार की थी। इस पर लेखक ने चौथे अध्याय में अमेरिका, रूस और भारत की स्त्रियों की स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक में एक जगह लिखा है कि “यूरोप के स्त्री समुदाय ने अपने संकुचित जीवन से आगे बढ़कर संसार के सामने यह बात स्पष्ट रूप से प्रदर्शित की कि स्त्रियां जीवन के प्रत्येक अंग में उसी तत्परता और योग्यता से काम कर सकती हैं, जिस तत्परता और योग्यता से पुरुष करते हैं परंतु एक अवस्था में।”
इसी क्रम में एक और जगह और लिखा है कि “प्राचीन काल में न सिर्फ हिंदू स्त्रियां बल्कि मुस्लिम स्त्रियों की भी स्थिति अत्यंत दयनीय थी।” इस आधार पर पांचवें अध्याय में उन्होंने प्राचीन युग की मुस्लिम स्त्रियों की विवेचना प्रस्तुत की है। उनका मानना है कि प्राचीन काल में भी मुस्लिम संप्रदाय में बहुविवाह की प्रथा अधिक मात्रा में प्रचलित थी। इस संदर्भ में उन्होंने प्राचीन इतिहास को भी दर्शाया है। एक जगह पर लेखक ने मोहम्मद पैगंबर और एक युवती के वार्तालाप को बड़े सुंदर ढंग से दर्शाया है। वे लिखते हैं कि “किसी समय एक युवती ने आकर मोहम्मद पैगंबर से शिकायत की कि मेरे मां-बाप ने मेरी इच्छा के विरुद्ध मेरा विवाह कर दिया है। यह सुनकर पैगंबर साहब ने उसके पिता को बुलवाया और पिता के आ जाने पर उसके सामने ही पैगंबर ने युवती से कहा कि यदि तू चाहे तो अपना यह विवाह तोड़ सकती है। युवती ने उत्तर दिया- हे खुदा के दूत, मेरे पिता ने जो मेरा विवाह कर दिया है, वह रहने दिया जाए। मैं केवल यह बता देना चाहती थी कि किसी युवती के विवाह में पिता को जबरदस्ती करने का कोई अधिकार नहीं है।”
इसके बाद लेखक ने छठवें अध्याय में स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व आधुनिक स्त्री धर्म का विस्तृत वर्णन किया है। जिसके अंतर्गत वे शिष्टाचार एवं वेशभूषा, कला, गुण, सतीत्व की महत्ता, स्वास्थ्य एवं सौंदर्य, पर्दा प्रथा, सार्वजनिक क्षेत्र में नारी, चूल्हा चौका आदि का सुंदर एवं स्पष्ट चित्र प्रस्तुत किया है।
सातवें अध्याय में लेखक ने स्त्री शिक्षा जो कि आज एक महत्वपूर्ण विचारणीय विषय है, उसे प्रस्तुत किया है। स्त्री शिक्षा जो आज के समाज की अपरिहार्य मांग है, ऐसे में लेखक ने स्त्री शिक्षा को बड़े ही सुंदर और सटीक ढंग से इस अध्याय में स्थान प्रदान किया है। एक जगह पर उन्होंने लिखा है कि “स्त्री को इस प्रकार शिक्षा से वंचित रखना स्त्री तथा समाज दोनों के प्रति अन्याय करना है। स्त्री शिक्षा का असली प्रश्न यही है, जिसका ऊपर की पंक्तियों में वर्णन किया है।” स्त्रियों को आर्थिक रूप से स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। यह आज नहीं अपितु स्वतंत्रता पूर्व प्राचीन युग से यह परंपरा चली आ रही है।
आठवें अध्याय में लेखक ने स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता का वर्णन किया है। इस अध्याय के अंतर्गत पाश्चात्य अंग्रेजी लेखकों के भी मतों को प्रस्तुत किया है। इसी क्रम में अगले अध्याय में ‘समाज की रचना में स्त्रियों का सहभाग’ इस अध्याय में उन्होंने यह दर्शाया है कि समाज की रचना में न सिर्फ पुरुषों का महत्वपूर्ण योगदान होना चाहिए बल्कि स्त्रियों का भी योगदान होना चाहिए और उन्हें पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए। इसी क्रम में ही आगे उन्होंने अगले अध्याय ‘समाज में स्त्री-पुरुष का स्थान’ में स्त्री-पुरुष समानता की बात की है । उनका मानना है कि मनुष्य सत्ता के दो भाग हैं- ज्ञान और शक्ति। दोनों सत्ता स्त्री और पुरुष को समाज की रचना में समान रूप से अधिकार मिलना चाहिए।
मध्यकाल में जिस प्रकार स्त्रियों के जीवन को गुलामी की जंजीरों में जकड़ दिया गया था। आज वे उन जंजीरों को तोड़कर बाहर निकल चुकी हैं। ऐसे में लेखक ने अगले अध्याय ‘स्त्री जीवन गुलामी से आजादी की ओर’ में उन्होंने स्त्रियों की स्वतंत्रता के लिए किए गए प्रयासों का चित्रण किया है। इसके लिए कई संस्थाएं भी उठकर सामने आई हैं। जिनका जिक्र इस अध्याय में किया गया है।
अंत में उन्होंने अपने अंतिम अध्याय वर्तमान युग में नारी जीवन की स्थिति किस प्रकार की है तथा आगे किस प्रकार की होनी चाहिए, इसकी विवेचना की है।
कहना न होगा कि लेखक ने अपनी इस पुस्तक में स्त्री जीवन से जुड़ी तमाम समस्याओं को बड़े ही सुंदर, सटीक एवं सुस्पष्ट ढंग से संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया है, जिससे पाठक स्वयं कम से कम शब्दों में बहुत कुछ स्पष्ट रूप से समझ लेता है। कुल मिलाकर लेखक ने अपनी इस पुस्तक के माध्यम से स्त्री जीवन की तमाम समस्याओं एवं स्थितियों का चित्रण करने के साथ-साथ उन स्थितियों से कैसे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ा जाय, इसका उपाय भी बताया गया है। उम्मीद करता हूं कि यह पुस्तक समाज के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। मैं इस पुस्तक के लेखक डॉ. प्रमोद पांडेय को अपने इस समीक्षा के माध्यम से हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं देता हूं कि उन्होंने ऐसे ज्वलंत मुद्दे को समाज के सामने लाने का प्रयत्न किया है। आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आने वाली पीढ़ी के लिए यह पुस्तक अत्यंत प्रेरणादायी सिद्ध होगी।
मैंने स्वयं इस पुस्तक की पचास प्रतियां खरीदकर कुछ नवयुवा हिंदी साहित्य प्रेमियों को न सिर्फ मुफ्त में वितरित किया है बल्कि उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया है।
आलोक चौबे
हिंदी लेखक एवं समीक्षक
प्रीतम विला, ठाकुर कॉम्प्लेक्स,
कांदिवली (पू.), मुंबई- 400101




