बाज़ारवाद, विज्ञापन और बचपन

डाॅ0 प्रीति अग्रवाल
पोस्ट डाॅक्टोरल रिसर्च फेलो
लखनऊ विश्वविद्यालय
लखनऊ
मो0नं0-9695683926
Email-preetiagarwal.lko1@gmail.com

वर्तमान समय के बाजारवादी व उपभोक्तावादी समाज में पूंजीवादी प्रचार तन्त्र की एक व्यापक परिघटना के रूप में फैला विज्ञापनों की दुनिया का तिलिस्म लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है। टी0वी0, अखबार, रेडियो, पत्र-पत्रिकाएं, इन्टरनेट, सड़कों के किनारे लगे बोर्ड, बस-स्टाॅप, रेलवे स्टेशन सब कहीं विज्ञापनों की भरमार है। इस बाजारवादी तथा उपभोक्तावादी संस्कृति में शिक्षा, चिकित्सा, कला, साहित्य, संस्कृति मीडिया, धर्म, खेल, राजनीति सब एक ‘प्रोडक्ट’ के रूप में तब्दील हो चुके हैं और खरीदे-बेचे जा रहे हैं। वैश्विक पूंजी के नियन्त्रण ने इनमें अनेक विकृतियां पैदा की हैं। आज बाजार हमारी जरूरतों पर निर्भर नहीं बल्कि वह खुद हमारी जरूरतें निर्धारित कर रहा है और मीडिया इसमें घी का काम कर रहा है। बाजार जहां मनुष्य को अब मात्र एक ‘उपभोक्ता’ के रूप में देखता है वहीं विज्ञापन जगत उस उपभोक्ता को विज्ञापित सामानों के अधिकाधिक उपभोग द्वारा ही स्वयं को अच्छा, स्मार्ट और आधुनिक साबित करने के लिए उकसाता है। आज विज्ञापन केवल वस्तुओं व सेवाओं की मार्केटिंग का माध्यम भर नहीं हैं अपितु पूंजीवाद के एक धारदार औजार के रूप में इसका तेवर उत्तरोत्तर आक्रामक और खतरनाक होता जा रहा है। कुछ भी करके अपने प्रोडक्ट कोे भौतिक बाजार में ही नहीं बल्कि लोगों के मन-मस्तिष्क में उतारकर उनकी मानसिकता पर वार करना ही अब विज्ञापनों का लक्ष्य बनता जा रहा है। लुभावने विज्ञापनों द्वारा हमारी सोंच को इस प्रकार भ्रमित कर दिया जाता है कि हमें विज्ञापनों में दिखाया गया हर झूठ सच लगता है और हम अपने विवेक को ताक पर रखकर सम्मोहित सा व्यवहार करते हैं। टीवी विज्ञापनों का उद्देश्य है खरीददार की बची खुची तर्क शक्ति समाप्त करना, विनिमय की आंतरिक तर्कबद्धता को अनावश्यक उपभोग की निम्नतम इच्छा में रूपांतरित करना। कई उदारपंथी और माक्र्सवादियों द्वारा स्वीकृत इस विचार के अनुसार अपनी बिक्री बढ़ाने और बाजार में हिस्सेदारी बनाए रखने के लिए विज्ञापनकर्ता कुछ भी कर सकते हैं।1 बच्चे उपभोक्ताओं के एक ऐसे बहुमूल्य एवं विशिष्ट वर्ग को निर्मित करते हैं जिनसे मजबूत संबंध स्थापित करने का प्रयास प्रत्येक विपणनकर्ता करता है। इस कार्य के लिए बाजार विज्ञापनों को एक माध्यम के रूप में प्रयोग करता है। यह एक आभासी दुनिया है जिसके जरिये हमें बताया जाता है कि हमारी प्रसन्नता, प्रतिष्ठा और आधुनिकता सभी इन वस्तुओं के उपभोग की समतुल्यता से निर्धारित होती है। जहां तक बच्चों का प्रश्न है, इलेक्ट्रानिक मीडिया आज बच्चों का मित्र, मार्गदर्शक तथा गुरू बनता जा रहा है। आज हम अपने बच्चों को सभी संभव सुख-सुविधाएं तो दे रहे हैं, किन्तु समय नहीं। बच्चे अपना अकेलापन तमाम तरह के इलेक्ट्रानिक उपकरणों जैसे-टी0 वी0, मोबाइल, कम्प्यूटर इन्टरनेट आदि के साथ बांट रहे हैं। बच्चों का बड़ों के साथ संवाद घटता जा रहा है। वैश्वीकरण ने आज इन उपकरणों की भूमिका पूरी तरह बदल दी है। ये सभी माध्यम अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और लोकशिक्षण के दायित्व से कट चुके हैं और मात्र कारोबारी हित साधन में लिप्त हैं। बच्चे कल्पनाशील होते हैं। मीडिया की सतरंगी चमक उनकी कल्पना से मेल खाती है, अतः वे आसानी से मीडिया के प्रभाव में आ जाते हैं। मीडिया ही आज बच्चों की भाषा, संस्कार, व्यवहार, चिंतन, व्यक्तित्व आदि सभी को प्रभावित कर रहा है।2 उनका कोमल और सरल मन कल्पना और यथार्थ का अन्तर नहीं पहचानता अतः इनमें दिखने वाले पात्र, उनका व्यवहार, भाषा, वेषभूषा और कार्यशैली को आदर्श मानकर बच्चे उनका पूर्णतः अनुकरण करना चाहते हैं। सुप्रसिद्ध मीडिया समालोचक सुधीश पचैरी का मत है कि बच्चे निष्क्रिय उपभोक्ता होते हैं और विज्ञापनों की झनकार से सम्मोहित हो जाते हैं। उन्हें जो पसंद है वह हर कीमत पर उन्हें चाहिए।3 चिन्ता की बात यह है कि विज्ञापन कम्पनियों ने अपने प्रोडक्ट का बाजार भविष्य के लिए सुनिश्चित करने हेतु बच्चों को अपना ‘टारगेट’ बना लिया है। वर्तमान में जनमाध्यम बच्चों को उपभोक्ता की स्थिति में देख रहे हैं उन्हें बचपन भी तभी मान्य है जब वह उपभोक्ता होकर आता है जहां ऐसा नहीं होता वहां बाजार बालश्रम व बालमन के दोहन के पुराने हथियारों को और भी पैना व धारदार बनाकर उसकी मासूमियत के विरोध में प्रयुक्त करता है। अब हिंसा, कामुकता, रोमांस, संगीत, विज्ञान, खेल, धारावाहिक, कार्टून और सीरियल आदि को बचपन से नत्थी करके प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि उसमें छुपी उपभोगवादी मानसिकता को मासूमियत में लपेट कर मन मस्तिष्क में इस तरह बैठा दिया जाए कि प्रतिवाद होने की संभावना ही लगभग समाप्त हो जाए। बचपन का प्रतिरोध आसान नहीं होता और बचपन द्वारा प्रायोजित वस्तु विशेष की इमेज को तोड़ना लगभग असंभव कार्य होता है, यह तथ्य पूंजीवाद, बाजार और विज्ञापन बखूबी जानता है। बच्चों के संदर्भ में विज्ञापनों की वैचारिक तत्व नीति को देखने पर कुछ मुख्य पहलू सामने आते हैं-

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पहली तरह के विज्ञापन वे हैं, जिनमे बच्चे प्रमुख भूमिकाओं में हैं और विज्ञापित वस्तु व उत्पाद सीधे उनसे संपृक्त हैं।

दूसरी तरह के विज्ञापनों में बच्चे प्रमुख भूमिकाओं में तो हंै परंतु विज्ञापित वस्तु व उत्पाद सीधे उनसे संपृक्त नहीं हैं।

तीसरे तरह के विज्ञापनों में बच्चे प्रमुख भूमिकाओं में नहीं है तथा उत्पाद से भी प्रत्यक्षतः संबंधित नहीं है परंतु उनकी उपस्थिति समस्त वातावरण को विश्वसनीय बनाने में योगदान देती है। भारतीय परिवार की छवि को सजीव बनाने की रणनीति विज्ञापन में घर के भीतर बच्चों को दिखाने पर बल देती है।

विज्ञापन जब बाल छवियों का प्रयोग करता है तो इस प्रचार अभियान के द्वारा सीधे-सीधे उसके व्यवहार द्वारा हमला बोला जाता है। उसकी सारी बाल-छवियों, आचरण और क्रीड़ाओं को उत्पादक विज्ञापन में समाहित कर लेता है और इस तरह उसे एक आदर्श ग्राहक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि अब वह आम ग्राहक का आदर्श बन जाता है।4 शैम्पू, तेल, साबुन, कार, कपड़े, जूते, फोन, फर्नीचर, मकान, शीतल पेय हर विज्ञापन में एक न एक बच्चा अवश्य मौजूद है। बच्चों के लिए यह चमक-दमक से भरा ‘मायालोक‘ एक आदर्श दुनिया है जिसे वह हर कीमत पर पाना चाहता है। बच्चे बाजार की चालों को समझने में असमर्थ हैं। बच्चों को प्रभावित करने के लिए अधिकतर विज्ञापनों में बाल कलाकारों को माॅडल के तौर पर लिया जा रहा है। विज्ञापनों के ये बच्चे आम बच्चों को लुभाते हैं। उनके जैसा दिखने के लिए, अपने दोस्तों के बीच दिखाने के लिए कि ‘मैं किसी के कम नहीं’ या अपने दोस्तों की बराबरी करने के लिए बच्चे अब वस्तु नहीं बल्कि ‘ब्रांड’ मांगते हैं और इच्छित वस्तुएं पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। विज्ञापनों के इस भ्रामक संसार ने बच्चों के खान-पान की रुचियों व जीवन शैली को बदल दिया है जिससे उनके शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। एक बड़ी संख्या में खाद्य सामग्री से संबंधित विज्ञापन या तो बच्चों के टीवी चैनलों पर प्रसारित किए जाते हैं या उन प्राइम चैनलों पर प्रसारित किए जाते हैं जिन्हें बच्चे देखते हैं। यदि बचपन से संबंधित सर्वाधिक विज्ञापित किए जाने वाले खाद्य पदार्थों की बात करें तो उनमें मीठे खाद्य पदार्थ, कैंडी, डेजर्टस, कम पोषक पेय पदार्थ एवं नमकीन स्नैक्स जिन्हें सामूहिक रूप से ‘बिग फाइव’ खाद्य पदार्थ कहते हैं, इस श्रेणी में आते हैं यह वे उत्पाद हैं जिनके लिए बच्चे बार.बार अपने अभिभावकों से अनुरोध करते हैं। विज्ञापन दाता आमतौर पर अपने संभावित ग्राहकों को आकर्षित करने तथा बच्चों से अपने मजबूत संबंध स्थापित करने हेतु अपने विज्ञापनों में मस्ती, कल्पना, हास्य भाव, एनिमेशन आदि पर अपना सारा ध्यान केंद्रित करते हैं किंतु उनके इस प्रयास में इन खाद्य पदार्थों के पोषण संबंधी पहलुओं को साफ तौर पर नजर अंदाज कर दिया जाता है। इतना ही नहीं अपने उत्पाद के संवर्द्धन एवं समर्थन हेतु प्रायः बच्चों के लोकप्रिय कार्टून चरित्रों और मशहूर हस्तियों के नाम का भी विज्ञापनों में प्रयोग होता है कुछ विपणनकर्ता तो अपने उत्पाद का नामकरण ही विभिन्न कार्टून चरित्रों के नाम पर करते हैं जो मासूम बचपन को प्रभावित करने वाले कारक के रूप में उचित नहीं कहा जा सकता, उनके इस कृत्य को बचपन के ‘भावात्मक दोहन’ की श्रेणी में रखा जा सकता है।5 विभिन्न प्रकार के पोषक तत्वों से भरपूर भोज्य सामग्रियों के बजाय बच्चे अब फास्ट-फूड चाउमिन, पित्ज़ा, बगैर, चिप्स, चाॅकलेट, कोल्ड डिंक्स, केक, ब्रेड, बन आदि में ही रूचि रखते हैं। सर्वेक्षणों में यह तथ्य सामने आया है कि बच्चों में शर्करा, कोलेस्ट्रोल, उत्तेजना, तनाव, मानसिक विकार आदि बढ़ रहा है। उनकी शारीरिक क्षमता में कमी आती जा रही है जबकि मोटापा बढ़ रहा है। आंख व दांत छोटी उम्र में ही खराब हो रहे हैॅं। वे बीमारियां जो पहले केवल प्रायः प्रौढ़ों एवं बूढ़ों की मानी जाती थीं-मधुमेह, ब्लडप्रेशर, नेत्र रोग, हृदय रोग तथा पाचन तंत्र की गड़बड़ी आदि, अब बच्चों में तेजी से घर करती जा रही हैं। यही नहीं उनके मन-मस्तिष्क पर भी इसका गहरा असर है। ललचाऊ और भड़काऊ विज्ञापन उन्हें चिड़चिड़ा, फिजूलखर्च, जिद्दी, क्रोधी व हिंसक बना रहे हैं। लेडी इरविन काॅलेज की आहार विशेषज्ञ डाॅ0 सुषमा शर्मा कहती हैं कि ‘‘नूडल्स और झागवाले पेय जैसे फटाफट भोजन और आचरण में बदलाव के बीच एक तरह का संबंध है।’’ नेपाल में मध्यवर्ग के बच्चों की खान-पान संबंधी आदतों पर हाल में हुए एक अध्ययन से पता चलता है कि सप्ताह में तीन बार इस तरह का भोजन करने वाले बच्चे एकाग्रता की कमी से पीड़ित थे और अति चंचल भी। वे कहती हैं कि ‘अति चंचल बच्चे झगड़ालू बन जाते हैं।‘6 टेलीविजन बच्चों के जीवन में एक इलेक्ट्रॉनिक बेबी सीटर के रूप में प्रवेश करता जा रहा है बच्चे अपने समय का एक बड़ा भाग टेलीविजन देखने में व्यतीत करते हैं जिससे उनका संबंध टेलीविजन पर प्रसारित कार्यक्रमों के माध्यम से बढ़ता जाता है और विभिन्न प्रकार के उस्तादों के विषय में उनकी जानकारी में वृद्धि होती रहती है, कभी-कभी तो यह जानकारी इतनी बढ़ जाती है यह बच्चे अपने परिवार के अन्य सदस्यों को खरीदारी करने में सहयोग करते हैं और कहीं-कहीं तो वे परिवार के लिए स्वयं ही स्वतंत्र खरीदारी करते हैं। टेलीविजन पर लगातार आने वाले खाद्य पदार्थों के विज्ञापनों तथा बच्चों की इन विज्ञापनों के प्रति बढ़ती हुई रूचि के कारण इन उत्पादों एवं ब्रांडों के प्रति बच्चों की ब्रांड निष्ठा स्थापित हो जाती है, ऐसी स्थिति में माता-पिता के लिए बच्चों के खान-पान पर कठोर नियंत्रण करना असंभव सा हो जाता है। इतना ही नहीं उन लोगों द्वारा लगातार किसी उत्पाद का निषेध एवं उसको खरीदने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करना दुष्कर होता है और यदि वे फिर भी ऐसा करने का प्रयास करते हैं तो यह क्रिया बच्चों और उनके मध्य गतिरोध एवं संघर्ष को जन्म देती है। कुछ माता-पिता बच्चों के साथ टेलीविजन देखते हुए सक्रिय मध्यस्थता का कार्य करते हैं अर्थात अभिभावक बच्चों को मीडिया के सकारात्मक या नकारात्मक पहलुओं से अवगत कराते चलते हैं। इस प्रकार अभिभावक विज्ञापनों के दुष्परिणामों को कम करने में समर्थ हो सकते हैं क्योंकि जब अभिभावक बच्चों के साथ प्रोग्राम सामग्री पर चर्चा करते हैं तो यह चर्चा बच्चों को कार्यक्रम का मूल्यांकन करने में मदद करती है बच्चों को टेलीविजन से अधिक से अधिक सीखने के लिए प्रेरित भी करती है। विज्ञापनों के प्रति दृष्टिकोण संचार की प्रकृति एवं परिवारों द्वारा बच्चों के पालन-पोषण के तरीके आदि कुछ ऐसे महत्वपूर्ण घटक हैं, जिनके द्वारा विभिन्न परिवारों द्वारा प्रयुक्त मध्यस्थता शैली निर्धारित होती है। भारतीय परिवेश में टेलीविजन विज्ञापन के प्रति स्थापित धारणा है कि विज्ञापन एक अवैयक्तिक संप्रेषण है जिसका उद्देश्य विज्ञापन देखने वाले को नवीन उत्पादों से अवगत कराना एवं उसे बाजार के बारे में शिक्षित करना है तथा विज्ञापन उपभोक्ताओं के हाथ में एक उपयोगी सूचना अस्त्र है, किन्तु दिल्ली के 9 जनपदों में से 1000 परिवारों का चयन कर उनके बीच किए गए सर्वेक्षण से इस तथ्य का खुलासा होता है कि जब अभिभावकों से यह पूछा गया कि क्या उनकी राय में विज्ञापन बच्चों पर खाद्य सामग्री तथा खिलौने आदि खरीदने के लिए दबाव बनाते हैं, तो लगभग 72 प्रतिशत से भी ज्यादा उत्तरदाताओं ने यह स्वीकार किया तथा लगभग 76 प्रतिशत अभिभावक यह मानते हैं कि आधुनिक विज्ञापन बच्चों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते हैं। 71 प्रतिशत से भी ज्यादा उत्तरदाताओं का यह मानना है कि अभिभावकों तथा बच्चों के बीच संबंध को दर्शाने वाले आकर्षक विज्ञापनों के बार-बार दिखाए जाने के कारण विशिष्ट उपभोग प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है। 72 प्रतिशत से भी ज्यादा लोगों ने माना कि बहुराष्ट्रीय निगम बच्चों को अपने बाजार के केवल एक भाग के रूप में देखते हैं तथा वे उन बच्चों की भावनाओं के संदर्भ में कुछ नहीं सोंचते, जो उनका उत्पाद खरीदते हैं।7 इस प्रकार विज्ञापन बचपन संबंधी सभी पूर्व धारणाओं को उलट-पलट रहा है और जो नई इमेज बना रहा है वे संदर्भों के अभाव में भावहीन, अतार्किक, गतिशील एवं उत्तेजक हैं। आज विज्ञापनों की यह तिलिस्मी दुनिया हमारे बच्चों को कौन से स्वप्न बेच रही है, उनके सामने कौन से मूल्य गढ़ रही है, बच्चों के रोल माॅडल्स आज कौन बन रहे हैं, उनके व्यवहार में किस प्रकार के परिवर्तन परिलक्षित हो रहे हैं, उनका शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य किस प्रकार प्रभावित हो रहा है, इन सभी तथ्यों की जांच, पड़ताल करना अपरिहार्य है।

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सन्दर्भ सूची

  1. आज की दुनिया में सूचना पद्धति-मार्क पोस्टर, 2010, पृ0-77

  2. वर्तमान परिवेश और बच्चों पर दबाव- लेख, डाॅ0 रवि शर्मा, आजकल, नवंबर 2009, पृ0-5

  3. यह लावा कहां से आता है-लेख, मधु जैन, ‘बच्चे और हम’- सम्पा0-राजकिशोर, 2005, पृ0-69

  4. उपभोग संस्कृति, बाजार और बचपन-रीनू गुप्ता, आदित्य पी0 त्रिपाठी आदि, 2013, पृ0-85

  5. वही, पृ0-8

  6. यह लावा कहां से आता है-लेख, मधु जैन, ‘बच्चे और हम’- सम्पा0-राजकिशोर, 2005, पृ0-69

  7. उपभोग संस्कृति, बाजार और बचपन-रीनू गुप्ता, आदित्य पी0 त्रिपाठी आदि, 2013, पृ0-143-152

  8. कितना तंदुरूस्त है आपका बच्चा – इंडिया टुडे, नवंबर, 2009

  9. बाजार की बिसात पर बचपन- दैनिक जागरण, नवंबर, 2012

  10. ‘टेलीविजन‘ समीक्षा सिद्धान्त और व्यवहार-सुधीश पचौरी, 2006

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