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विचार-विमर्श

सारा का सारा समाज ही ढह रहा है : ‘घासीराम कोतवाल’नाटक की प्रासंगिकता का संदर्भ-हरदीप सिंह

इस नाटक में घासीराम और नाना फड़नवीस का वयक्ति संघर्ष प्रमुख होते हुए भी तेंदुलकर ने इस संघर्ष के साथ - साथ अपनी विशिष्ट शैली में तत्कालीन सामाजिक एवं राजनैतिक स्थिति का मार्मिक चित्रण किया है। परिणामतः सत्ताधारी एव जनसाधारण की सम्पूर्ण स्थिति पर काल - अवस्थापन के अंतर से विशेष अंतर नहीं पड़ता।

भारतीय सिनेमा का चुनिया यानी ‘लवेबल-विलेन’-तेजस पूनियां 

मरीश पुरी ने फिल्मों में हीरो बनने के लिए जो स्क्रीन टेस्ट दिया था वे उसे पास नहीं कर पाए थे। इस बात से निराश हो उन्होंने मिनिस्ट्री ऑफ लेबर में काम किया। इसी दौरान उन्होंने स्टेज पर एक्टिंग और फिल्मी पर्दे पर विलेन के रुप में काम करना भी शुुरू किया। कुछ फिल्‍मों में सकारात्मक भूमिकाएं भी अदा की।

डिजिटल दुनिया और युवा पीढ़ी-दिव्या शर्मा

दुनिया में दो तरह की सिविलाइजेशन का दौर शुरू हो चुका है, वर्चुअल और फिजिकल सिविलाइजेशन । आने वाले समय में जल्द ही दुनिया की आबादी से दो तीन गुना अधिक आबादी अंतरजाल पर होगी।

गुमनामी के अंधेरों में खोया सितारा : इंद्र बहादुर खरे-डॉ.नूतन पाण्डेय

दी साहित्य का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि उनके जीवनकाल में उनकी रचनाएं लोगों तक नहीं पहुँच सकीं लेकिन उनकी लेखनी में एक ऐसा जादू था, शिल्प का एक ऐसा चमत्कार था, भावों का एक ऐसा अपूर्व संयोजन था, पाठक जिसके वशीभूत हुए बिना नहीं रह सकते।

‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की शिक्षक, शिक्षा और शिक्षार्थी ही आधार-प्रदीप सिंह

क भारत श्रेष्ठ भारत अभियान मूलतः भारत के राज्यों के लिए है जिसमें प्रतिवर्ष एक राज्य किसी अन्य राज्य का चुनाव करेगा और उस राज्य की भाषा,इतिहास,संस्कृति,ज्ञान विज्ञान आदि को अपनाएगा और उसको पूरे देश के सामने बढ़ाएगा

औपचारिक शिक्षा व्यवस्था पर अनियोजित शहरीकरण का प्रभाव: विश्व और भारतीय परिदृश्य-अश्विनी

शिक्षा और अनुसंधान में निवेश ही दीर्घकालीन संवृद्धि एवं विकास की धुरी है। आज, जापान, पूर्वी एशिया के नव विकसित देशों एवं पश्चिमी देशों के विकास का आधार शिक्षा ही है। गौरतलब है कि शिक्षा पर होने वाले खर्च से सीधे तौर पर लाभान्वित व्यक्ति को ही लाभ नहीं मिलता

बाज़ारवाद, विज्ञापन और बचपन-डाॅ. प्रीति अग्रवाल

एवं विशिष्ट वर्ग को निर्मित करते हैं जिनसे मजबूत संबंध स्थापित करने का प्रयास प्रत्येक विपणनकर्ता करता है। इस कार्य के लिए बाजार विज्ञापनों को एक माध्यम के रूप में प्रयोग करता है। यह एक आभासी दुनिया है

परंपरागत हिंदी काव्य में चित्रित दलित समाज और जीवन-डॉ. चैनसिंह मीना

दलित जीवन का चित्रण करने वाले रचनाकारों में भारतेंदु हरिश्चंद्र, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔद्य’, गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’, भगवती चरण वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुभद्रा कुमारी चौहान, नागार्जुन, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, धूमिल, केदारनाथ सिंह, राजेश जोशी इत्यादि नाम उल्लेखनीय हैं।

आदिवासी कथा साहित्य में स्त्री-लीना कुमारी मीना

सिन्हा, राजेन्द्र अवस्थी, शानी, मेहरुनिशा परवेज आदि लेखक-लेखिकाओं ने इस समाज को लेखनी का विषय बनाया| बंगला लेखिका महाश्वेता देवी के आदिवासी लेखन और उड़िया लेखक गोपीनाथ महंती ने आदिवासी लेखन के हिंदी अनुवादों से भी आदिवासी समाज की तरफ पाठक वर्ग का ध्यान खींचा,लेकिन आदिवासी समाज तथाकथित मुख्यधारा के साहित्य में हाशिये पर ही बना रहा|

आदिवासी विमर्श में समकालीन यात्रा साहित्य का अवदान-हेमंत कुमार

मकालीन यात्रा साहित्य में अपना विशेष योगदान देने वाले साहित्यकारों में से रामदरश मिश्र, विष्णु प्रभाकर, नरेश मेहता, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, असगर वजाहत, नासिरा शर्मा, अमृतलाल वेगड़, ओम थानवी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, हरिराम मीणा आदि लोगों का नाम प्रमुखता के साथ लिया जा सकता है |

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