29.1 C
Delhi
होमविचार-विमर्श

विचार-विमर्श

शोध : अर्थ, परिभाषा और स्वरूप 

अंग्रेजी के रिसर्च के अर्थ के द्योतक खोज, अन्वेषक, अनुसंधान, शोध इत्यादि अनेक शब्द प्रचलित है

नये काव्यशास्त्र/ सौंदर्यशास्त्र की आवश्यकता और नये कवि

नये काव्यशास्त्र की मांग के संदर्भ में हिंदी साहित्य में वस्तु और शिल्प दोनों ही स्तरों पर नवीनता का प्रवेश विशेष रूप से आधुनिक काल से उपलब्ध होता है

समकालीन युग बोध के कवि कुँवर बेचैन

कुंवर बेचैन ने समय को केवल परखा ही नहीं तराशा भी है | बेहतरीन गीतकार तो वह हैं ही बेहतरीन ग़ज़लकार के रूप में उन्होने पाठकों को हिन्दी ग़ज़ल के रूप में खूबसूरत सौगात भेंट की है |

गोविंद मिश्र के यात्रा साहित्य में अंतर्निहित लोक संस्कृति

हिंदी यात्रा-साहित्य के विकास में समकालीन गोविंद मिश्र का प्रदान अहमियत रखता है | वे बहुमुखी प्रतिभासम्पन्न रचनाकार हैं |

हिंदी सिनेमा में हाशिये के लोग – शबनम मौसी के संदर्भ में: वैष्णव पी वी

हिंदी में ‘बुलेट राजा’, ‘रज्जो’, ‘एस. एम.’, ‘क्यून द डेस्टिनी ऑफ डांस’, ‘राजा हिंदुस्तानी’, ‘नटरंग’, ‘नर्तकी’, ‘ट्राफिक सिग्नल’ आदि फिल्म में भी किन्नर की भूमिका है। ‘क्यून द डेस्टिनी ऑफ डान्स’ पूरी तरह किन्नर पर आधरित है।

सिनेमा और समाज में वृद्ध-भावना सरोहा

सिनेमा ने सिर्फ बुजुर्गों को शोषित या दबते हुए ही नहीं दिखाया उन्हें हर स्थिति में अलग अलग भूमिका निभाते हुए दिखाया है . कई बार देखा जाता है कि सब कुछ होने के बाद भी बुज़ुर्ग अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं .

मधुर भंडारकर का सिनेमा और स्त्री विमर्श-दुगमवार साईनाथ गंगाधर

‘चाँदनी बार’(2001), ‘सत्ता’(2003), ‘आन मैन एट वर्क’(2004), ‘पेज-3’(2005), ‘कोर्पोरेट’(2006), ‘ट्रैफिक सिग्नल’(2007), ‘फैशन’(2008), ‘जेल’(2009), ‘दिल तो बच्चा है जी’(2011), ‘हिरोइन’(2012), ‘कैलेण्डर गर्ल्स’(2015) आदि में कुछ एक दो सिनेमा को छोड़ दिया जाए तो बाकि सभी सिनेमा नायिका प्रधान हैं ।

ब्रज के संस्कार लोक-गीतों में निहित नारी वेदना-डॉ. बौबी शर्मा

ब्रज के लोक-गीतों में वहाँ का सम्पूर्ण जीवन प्रतिबिम्बित होता है। ब्रज क्षेत्र के सुख-दुख, आमोद-प्रमोद, आनन्द उत्साह आदि की अभिव्यक्ति इन लोकगीतों के माध्यम से होती है। जनमानस के सर्वाधिक नैकट्य के कारण लोक-जीवन की जैसी सफल अभिव्यक्ति इन गीतों के माध्यम से होती है

हिंदी साहित्य और सिनेमा-अजय कुमार चौधरी

सिनेमा ने अपने आरंभिक चरण में साहित्य से ही प्राण-तत्व लिया. यह उसके भविष्य के लिए ज़रूरी भी था. दरअसल सिनेमा और साहित्य की उम्र में जितना अधिक अंतर है, उतना ही अंतर उनकी समझ और सामर्थ्य में भी है. विश्व सिनेमा अभी सिर्फ 117 साल का हुआ है

एल. जी.बी.टी. पर आधारित मराठी नाटक-डॉ. सतीश पावड़े

आधुनिक मराठी रंगमंच मे 1980 के दशक में जानेमाने नाटककार तथा भारतीय रंगमंच के श्रेष्‍ठतम हस्‍ताक्षर विजय तेंदुलकर ने अपने ‘मित्राची गोष्‍ठ’ नाटक द्वारा समलैंगिकता का प्रश्न हाशिये पर लाया । यह नाटक स्‍त्री समलैंगिकता (लेसबियन)पर आधारित था। उनके पश्‍चात सतीश आळेकर ने अपने ‘बेगम वर्बे’ नाटक में ‘ट्रान्‍सजेंडर ’ (एंड्रोजिनी ) के विषय को रखा । हालांकी इस नाटक में ‘स्‍त्री पार्ट’ करनेवाला पुरूष कलाकार कैसे धीरे धीरे स्‍त्रीत्‍व धारण करता है यह बताया है।

MOST POPULAR

LATEST POSTS