नये काव्यशास्त्र/ सौंदर्यशास्त्र की आवश्यकता और नये कवि

दिविक रमेश

पहला प्रश्न या जिज्ञासा तो यही है कि नये काव्यशास्त्र अथवा सौंदर्यशास्त्र की आवश्यकता क्यों पड़ती है। इसी प्रश्न में निहित है कि क्या काव्यशास्त्र स्थायी अथवा शाश्वत नहीं होता। और साथ ही यह भी कि ‘नया’ जुड़ने का आशय सर्वथा भिन्न होता है अथवा पुराने की डोर थामें नवीनता। सौंदर्यशास्त्र, वस्तुत: साहित्य या कलात्मक कृतियों से अभिव्यक्त सौंदर्य का तात्विक, दृष्टिसम्पन्न और मार्मिक विवेचन करने वाला शास्त्र होता है।

उल्लेखनीय है कि सौंदर्य की निरपेक्ष सत्ता मानने वाले भी हैं और उसे सामाजिक संदर्भों और विचारधाराओं के परिप्रेक्ष्य में मानने वाले भी। मसलन मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र के तहत साहित्य/कला में अभिव्यक्त सौदर्यबोध पर, सामाजिक संदर्भों के गलियारे से वस्तुपरक ढंग से प्रकाश डाला जाता है। दलित साहित्य के सौंदर्य शास्त्र में सामाजिक-आर्थिक समानता, राजनीति में भागीदारी, सहानुभूति का विरोध, दलितों का भयावह यथार्थ और उनका प्रतिरोधात्मक गुस्सा, अब तक गाली समझी जाने वाली शब्दावली, इत्यादि दलित साहित्य के सौंदर्य की पहचान और उसके मूल्यांकन के प्रतिमान होते हैं। अपेक्षाकृत युवा दलित लेखक और एक्टिविस्ट सूरज बड़त्या ने लिखा है कि ‘ अब मैं यह मानता हूं कि वक्त आ गया है कि दलित साहित्य की परिधि को व्यापक रूप दिया जाए। गैर दलित द्वारा लिखे गये उस साहित्य को भी दलित साहित्य के अंतर्गत माना जाना चाहिए जो वर्णविरोधी हो, समता, न्याय, सामुदायिकता कॉ बात करे। लैंगिक भेद को मिटाने वाला हो और गहरे मानवीय सरोकारों से युक्त हो।“ (कामरेड का बक्सा, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, अपनी बात, 2013) । दलित-विमर्श का परिदृश्य अनेक स्तरों पर निरंतर बदलाव की सुगबुहाटों से भरा हुआ है।‘अस्मिता’ या अपने होने की पहचान को, कम ही सही पर, नए रूप में भी देखा जा रहा है। पंजाबी गायक राज ददराल का कहना है कि वे चाहते हैं कि उनकी जाति का नाम ज्यादा से ज्यादा लोगों की जुबान पर चढ़ जाए। उनका मानना है कि उन्हें दलित कहने से उनकी पहचान छिपती है, वो चमार हैं और उन्हें इस बात पर गर्व है। कवि रमेश भंगी अपने नाम के साथ जुड़े भंगी शब्द को अपराध के रूप में जातिसूचक शब्द मानने से इंकार करते हैं।

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आदिवासी-विमर्श जन्य रचनाओं के अंतर्गत आया पहले की दृष्टि से असंयमी-सा दिखने वाला आक्रोश नए ढंग से सोचने पर विवश करता है। विभिन्न सामाजिक विद्रोह, स्त्री की अपनी अस्मिता, शोषण और संघर्ष, अस्तित्व के खतरे से टकराहट, विस्थापन का दर्द, शिक्षा आदि तो आदिवासी-विमर्श जन्य रचनाओं का सशक्त सौंदर्य है ही, इधर तो आत्मालोचन की शैली में भी रचनाएं सामने आ रही हैं जिनके अनुसार अपने स्वार्थों या अपनी न समझी के चलते स्वयं आदिवासी आदिवासियों के हितों के विरुद्ध आचरण कर रहे हैं। एक विशेष अर्थ में ये आदिवासी विमर्श के अंतर्गत समझदार रचनाएं हैं।

इस परिप्रेक्ष्य में नारी-विमर्श जन्य रचनाओं के अंतर्गत देहवादिता (और इधर तो नारी सशक्तीकरण के दायरे में ब्रा या चोली के त्यागने (क्योंकि यदि नारी का शरीर अपना है तो उस पर पहनावे की छूट भी उसी के पास है) के उभर रहे क्रांतिकारी स्वर, प्रवासी (विशेषकर दूसरे दौर के स्वेच्छा से प्रवासी बनने वाले रचनाकारों के) साहित्य में आ रहे संबंधों के खुले चित्रण और बालक विमर्श जन्य इधर के साहित्य में बालक के पारम्परिक दबे-कुचले-चुप्पा रूप के स्थान पर नए उभर रहे अपनी बात को पूरे आत्म विश्वास के साथ रखने वाले तर्क सम्पन्न रूप की जरूरत का संदर्भ समझा जा सकता है। आज जहां प्रवासी साहित्य को साहित्य की केंद्रीय विधा के रूप में मान्यता देने की मांग उठ रही है वहीं इधर लिखे जा रहे नयी दृष्टि नए सौंदर्य-बोध से सम्पन्न बाल-साहित्य के भी नए सौंदर्यशास्त्र की आवश्यकता के स्वर गूंज रहे हैं।

वस्तुत: नये काव्यशास्त्र या सौंदर्य शास्त्र की आवश्यकता का संदर्भ अगली कविता की पुरानी कविता से मुक्ति अथवा नवीनता से जुड़ा है। हम जानते ही हैं कि नये काव्यशास्त्र की मांग के संदर्भ में हिंदी साहित्य में वस्तु और शिल्प दोनों ही स्तरों पर नवीनता का प्रवेश विशेष रूप से आधुनिक काल से उपलब्ध होता है। विधाओं की दृष्टि से भी साहित्य की बहुवचनीयता का यही समय है। आधुनिक काल अनेक दृष्टियों से सजग एवं क्रांतिकारी युग है। इस काल में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नए अन्वेषण हुए हैं। साहित्य भी इस दृष्टि से अछूता नहीं रहा है। विषय और रूप-शिल्प की दृष्टि से वह विविधताओं से भरा पड़ा है। गद्य और पद्य दोनों ही प्रकार के साहित्य में यह युग नाना प्रकार की नवीनताओं का जनक है। द्विवेदी युग में पुराने संस्कारों के प्रति विद्रोह और नवीन संस्कारों का बीजारोपण हो चला था। निश्चय ही, द्विवेदी-युग में भाषा

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शैली के प्रति, भारतेन्दु युग की अपेक्षा, अधिक सजगता मिलती है। किन्तु यदि आधुनिकता की दृष्टि से देखें तो छायावाद का ही समय है जहाँ आकर कविता परम्परागत रूप से पर्याप्त मात्रा में मुक्त हो सकी थी, छायावाद युग के साहित्य की एक बड़ी विशेषता यह थी कि उसने रूढि़-समर्पित-समर्थित काव्य-कला पर प्रश्नचिह् लगाया तथा स्वच्छन्दतावादी प्रवृत्तियों को बल दिया। छायावादी एवं रीतिकालीन दृष्टि का अन्तर स्पष्ट करते हुए नामवर सिंह ने छायावाद का महत्त्व इस प्रकार रेखांकित किया है – ‘‘कवि का वास्तविक कर्म-क्षेत्र है परम्परा-प्राप्त शिल्प की अधिकाधिक सिद्धि। इस धारणा के अन्तर्गत यह मान्यता निहित है कि विषय-वस्तु में नवीनता सम्भव नहीं है। इसलिए कवि की शक्ति की परीक्षा केवल शिल्प के क्षेत्र में ही की जा सकती है। छायावादी कवियों ने जब विषय-वस्तु में भी नवीनता का दावा किया तो काव्य-सम्बंधी एक परम्परागत धारणा को ठेस लगी।’’ (कविता के नये प्रतिमान, पृ0 109)। नामवर सिंह के इस मत से यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि छायावाद से पूर्व के दो उत्थानों में कवियों द्वारा नवीन विषय नहीं अपनाए गए थे। — किन्तु रूप-शिल्प की दृष्टि से कमोबेश परम्परा का अनुसरण भी होता रहा है। भारतेन्दु युग में परम्परा का अनुसरण द्विवेदी युग से कहीं ज्यादा नजर आता है।

प्रयोग: सशक्त अभिव्यक्ति-क्षमताओं की खोज

सामान्यत: भारतीय काव्याचार्यों ने कवि के लिए काव्यशास्त्र का ज्ञान आवश्यक माना है। काव्य-रचना के साथ-साथ जो कवि काव्य-सिद्धांतों का भी प्रतिपादन करते हैं यानी जो काव्यशास्त्र की चर्चा करते हैं, राजशेखर के शब्दों में वे शास्त्र-कवि कहलाते हैं। लेकिन परम्परा से प्राप्त काव्यशास्त्र से हटकर, अपनी कविता को केंद्र में रखकर कविता संबंधी चिंताओं और चर्चाओं की दृष्टि से देखें तो यह प्रवृत्ति पहली बार छायावादी कवियों में मिलती है। उनके लिए अपनी रचना-प्रक्रिया का स्पष्टीकरण देना जरूरी हो गया था। इसी प्रवृत्ति को छायावादोत्तर काल में नये कवियों ने विकसित किया।

नए कवि ने प्रयोग को भी जरूरी और सशक्त अभिव्यक्ति-क्षमताओं की खोज का माध्यम बनाया। विशेष रूप से प्रारम्भ में। वह शिल्प के नए-नए प्रयोगों के माध्यम से संप्रेषण की समस्या का हल ढूँढ़ने लगा। प्रचलित उपादानों के नवीनीकरण के साथ-साथ देश और विदेश के आधुनिक कवि-चिंतकों एवं काव्यांदोलनों की प्रेरणा से नए-नए उपादानों को आत्मसात् करने

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लगा। स्वभावतः भारतीय काव्यशास्त्र के परंपरागत सिद्धांतों में पूरी आस्था रखने वाले पंडितों को प्रयोग-बहुल नई कविता और उसकी पैरवी अराजक भी नजर आई। आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने मत प्रकट किया- हिंदी की प्रौढ़ काव्यधारा से नये प्रयोगियों की रचना इतनी भिन्न हो गई है कि दोनों में किसी प्रकार का तारतम्य देखा पाना भी कठिन हो गया है।“ ( हिंदी: साहित्य: बीसवीं शताब्दी, पृ0 208)। स्पष्ट है कि आचार्य वाजपेयी उस दौर की रचना भिन्नता को सराह नहीं सकए थे। परिणामतः पंडितों और नए कवियों में टकराहट भी शुरू हुई। इस प्रकार की टकराहट छायावाद के समय से ही लक्षित हो चली थी। नए कवि का तर्क था कि युगीन परिस्थितियों और जटिल भावबोध को संप्रेक्ष्य बनाने के लिए उसकी कविता ने सहज ही नवीन शिल्प-विधान को अपनाया है। वह शिल्प के पुराने पड़ गए उपादानों को छोड़ने पर विवश है। अतः उनकी कविताओं का मर्म उन्हीं की कविताओं के परिवेशगत संदर्भ में समझा जाना चाहिए। प्रतिमान उन्हीं की कविताओं से ढूँढ़े जाने चाहिए। अज्ञेय के शब्दों में –“ “‘‘आज जो कविता लिखी जा रही है उसे अगर एक मुकदमे के रूप में प्रस्तुत करना है तो उसका वकील उसी में से निकलना चाहिए— आज जो लिखा जा रहा है उसका सच्चा वकील आज का लिखने वाला ही होना चाहिए।।…भूमिकाओं में अथवा कवियों के वक्तव्यों में दी गई दलीलों पर विचार करना ही चाहिए।’’( चौथा सप्तक, पृ0 9)। पंडितों का तर्क था कि पुराने उपादान प्रामाणिक हैं। वे व्यापक हैं। उन्हें अपनाने के लिए मनोयोग की आवश्यकता होती है। अपने जातीय उपादान होने की वजह से कविता की सही कसौटी वही है। उनकी अवहेलना कविता को अराजक बना देती है। उदाहरण ऐसे भी मिलते हैं जहां पंडितों ने नए काव्य को प्रतिमानों को विकसित या लचीला करके पुराने काव्यशास्त्र में समटेने का भी असफल प्रयत्न किया है। यूं कोई आज की कविता में भी रस, अंगी रस, स्थायी एवं संचारी भाव, अलंकार-वैभव और चमत्कार, भाषा और छंद-दोष, मर्यादोओं आदि कसौटियों पर कसने का गौरव प्राप्त करना चाहे तो कौन रोक सकता है। ऐसे आचार्यों के पास एक सुविधा यह भी रही है कि बावजूद उपर्युक्त लचीलेपन के यदि कविता के तत्व स्थायी भाव आदि में समाहित नहीं मिलते तो वे काव्य-सिद्धांत को दोष देने की जगह नयी कविता को ही दोषी मान बैठते हैं। बदली हुई रचना के लिए नए प्रतिमानों की खोज उनका विषय नहीं बन पाया। काव्य में रस-सिद्धांत के समर्थक डॉ. नगेंद्र के संदर्भ में डॉ, नामवर सिंह ने ऐसे ही मत को रखते हुए लिखा- “ “वे यह भूल जाते हैं कि कवि –कर्म शास्त्र-निरूपित कुछ

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गिने-चुने स्थायी या संचारी भावों को उदाहृत करना नहीं, बल्कि नयी वास्तविकता से उत्पन्न होने वाली वृत्तियों को उजागर करना होता है। इसी दृष्टि से अज्ञेय ने रागात्मक संबंधों के क्षेत्र को कवि-कर्म का क्षेत्र कहा है। नये कवि की समस्या इस रूप को ही भाव में रूपांतरित करने की है, प्राप्त भाव को रूप देने की नहीं।“ (कविता के नये प्रतिमान, पृ026)। राग, रागात्मक संबंध और बदले हुए रागात्मक संबंध का पक्ष अज्ञेय ने अपने द्वारा संपादित और 1951 में प्रकाशित दूसरा सप्तक की भूमिका में अच्छे से समझाने का प्रयत्न किया हैं। भूमिका में अज्ञेय ने लिखा है—“ निरे ‘तथ्य’ और ‘सत्य’ –या कह लीजिए ‘वस्तु-सत्य’ और ‘व्यक्ति-सत्य’ (ध्यान दीजिए –व्यक्ति सत्य की बात की गई है जिसकी प्राप्ति में विकसित अनुभूतियों और रागात्मक संबंधों की बदली प्रणाली का हाथ होता है।) में –यह भेद है कि ‘सत्य’वह ‘तथ्य’ है जिस के साथ हमारा रागात्मक संबंध है; बिना इस संबंध के वह एक बाह्य वास्तविकता है जो तद्वत काव्य में स्थान नहीं पा सकती। लेकिन जैसे-जैसे बाह्य वास्तविकता बदलती है-वैसे-वैसे हमारे उस से रागात्मक सम्बंध जोड़ने की प्रणालियां भी बदलती हैं। …कहना होगा कि जो आलोचक इस परिवर्तन को नहीं समझ पा रहे हैं वे उस वास्तविकता से टूट गये हैं जो आज की वास्तविकता है।“ समझ लिया जाए कि मसला यहां भी बुनियादीतौर पर रचनाकार के संदर्भ में अनुभूति की प्रामाणिकता का है।

वस्तुत: अज्ञेय कवि का कार्य, नए अनुभवों, नए भावों की खोज नहीं मानते, बल्कि पुराने और परिचित भावों के उपकरण से ही नूतन अनुभूतियों–ऐसी अनुभूतियों, जो उन भावों से पहले नहीं मिली थीं– की सृष्टि मानते हैं।( त्रिशंकु, पृ039)। अज्ञेय इन नई अनुभूतियों का हेतु उन रागात्मक संबंधों की प्रणालियों में ढूँढ़ते हैं जो बाह्य वास्तविकता के बदलाव पर निर्भर करती हैं। वस्तुतः एक ओर अज्ञेय अनुभव और अनुभूति में ‘स्रोत’ और उससे प्राप्य वस्तु के रूप में अंतर करते नजर आते हैं तथा दूसरी ओर यह मानते हुए कि बाह्य वास्तविकताओं के बदलाव की वजह से, उससे जोड़ने वाली रागात्मक संबंधों की प्रणालियों में जो अंतर आ जाता है, उसी के कारण परिचित भावों से अपूर्व अनुभूतियों की प्राप्ति होती है। अतः भाव वे ही रहते हुए भी, नए कवि के लिए यथावत् ग्रहण की वस्तु नहीं होते। उनसे प्राप्त पुरानी अनुभूतियाँ भी नए कवि के लिए ग्राह्य नहीं हैं। वे तो भावों की नाना अनभिज्ञ अनुभूतियों की खोज में विश्वास करते हैं।

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खैर, टकराहट जितनी घनी होती गई, छायावादी कवि की परंपरा को और अधिक दृढ़ एवं व्यापक करते हुए नया कवि अपनी रचना-प्रक्रिया को स्पष्ट करने के साथ-साथ अपने शिल्प और रूप के प्रयोगों को न्याय-संगत सिद्ध करने लगा। उस समय तक के सर्वाधिक प्रचलित एवं मान्य प्रतिमान ‘रस’ के संबंध में उसने घोषणा की– ‘‘आज की स्थिति यह है कि रस-संप्रदाय के आचार्य यदि उसमें (रस संख्या) में दो सौ रस और जोड़ लें फिर भी वह नई कविता और आज के नए साहित्य के उचित विश्लेषण में सफल नहीं हो सकेंगे।’’( कवि की दृष्टि, भारतभूषण अग्रवाल, पृ0 160)। पुरानी और नई काव्य-दृष्टियों की भिन्न्ता के संदर्भ में कहा गया है — ‘‘यह भिन्नता आकार की नहीं और न ही रूप-विधान की है। यह भिन्नता मनःस्थितियों की है।’’( नये प्रतिमान: पुराने निकष, लक्ष्मीकांत वर्मा, पृ0 4)। श्रीकांत वर्मा का दावा है– ‘‘भारतीय काव्य-शास्त्र की रचना कविता को एक व्यवस्था देने के लिए हुई थी। लेकिन हर व्यवस्था एक सीमा पर जाकर खत्म हो जाती है। यह सरहद था रीतिकाव्य जहाँ स्वयं काव्य के लक्षण काव्य में, एक निकृष्ट ह्रासोन्मुख पद्य में परिणत हो गए। आलोचना को यह समझ लेना चाहिए था कि भारतीय काव्यशास्त्र की संभावनाएँ रीति-काव्य के साथ ही समाप्त हो गईं।’’( जिरह, पृ0 42) । इस संदर्भ में नामवर सिंह के उनकी पुस्तक ‘कविता के नये प्रतिमान’ में संकलित लेखों (‘रस के प्रतिमान की प्रसंगानुकूलता’, ‘कविता के नये प्रतिमान’ और ‘कविता क्या है’) को पढ़ा जाना चाहिए। साथ ही उनका एक लेख “एक नया काव्यशास्त्र त्रिलोचन के लिए’ भी ध्यान में आ रहा है जो आलोचना: अंक 82, 1987 में प्रकाशित है। इस लेख की शुरुआत में ही लिखा गया है –“ त्रिलोचन की कविता एक नए काव्यशास्त्र की मांग करती है। शास्त्रीयता की गंध के कारण ‘काव्यशास्त्र’ शब्द से परहेज हो तो जी चाहे काव्यदृष्टि कह लीजिए। फर्क नही पड़ता। नयी काव्यदृष्टि से तात्पर्य है कविता सम्बंधी चालू धारणाओं के दायरे से बाहर निकलना। अंग्रेजी मे जिसे ‘कैनन’ कहते हैं उसे चुनौती देना, बदलना। इस काव्यदृष्टि के सूत्र, सौभाग्य से, स्वयं कवि के काव्य में सुलभ हैं।“

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‘बदलते परिप्रेक्ष्य’ नामक पुस्तक के पृ. 34-35 पर कवि नेमिचंद्र जैन ने भी लिखा है- “‘‘रचनाकार के मूल प्रेरणा-स्रोत को समझे बिना हम उसके रूप अथवा वस्तुगत सौष्ठव तथा वैशिष्ट्य को समझ न सकेंगे। आधुनिक जीवन की जटिलता और विविधता और जीवन में एक साथ ही नाना स्तरों और गतियों के कारण आज के कला-सृजन का इतना व्यक्तिपरक होना कोई

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आश्चर्य की बात नहीं। इसी से उसके सौंदर्यमूलक और भावात्मक स्वरूप को समझने के लिए, उसका सही मूल्यांकन करने के लिए, स्वयं कलाकार की दृष्टि को, उसकी मान्यताओं और उसके कलात्मक उद्देश्य को समझने और उन्हें मानकर चलने के सिवा और कोई उपाय नहीं। दूसरा रास्ता केवल यही है कि हम उसे अनर्गल और परंपराभ्रष्ट मानकर अस्वीकार कर दें।’’

सामान्यत: इन्होंने शिल्प के प्रति जागरूकता को अत्यंत आवश्यक माना है। आधुनिक मानसिकता और बदली हुई परिस्थितियां, बदला हुआ भाव और उलझी हुई संवेदानाएं आदि इन कवियों की शिल्प-सजगता के प्रेरणा-स्रोत हैं। सच यह भी है कि यह कार्य हर कवि ने समान रूप से नहीं किया है।

काव्य-शिल्प-सजगता के संदर्भ में नई काव्य-वस्तु-चेतना

आगे बढ़ने से पूर्व इन कवियों के द्वारा काव्य-शिल्प-सजगता के संदर्भ में काव्य-वस्तु-चेतना पर व्यक्त विचारों को समझना बेहतर रहेगा।

नया कवि वस्तु और रूप में सहज अंतस्संबंध मानता है। संबंध की व्याख्या की दृष्टि से नए कवियों के तीन वर्ग हैं। सामान्यतया सभी कवि वस्तु-तत्त्व को ही ‘रूप’ का निर्धारक तत्त्व मानते हैं किंतु उन्होंने वस्तु-तत्त्व से इतर तत्त्वों को भी रूप के सहायक, निर्धारक तत्त्वों के रूप में व्याख्यायित किया है। इन तत्त्वों में कवि-व्यक्तित्व, परिवेश या सामाजिक संरचना, काव्यांदोलन आदि प्रमुख हैं। नए कवियों की दृष्टि में कुछ तत्त्व ‘रूप’ के सहज निर्धारण में बाधक भी होते हैं। वे तत्त्व हैं– कवि की संवेदन-क्षमता की कमजोरी, पुराने कला-संस्कार, विशेष रूप के प्रति मोह या चमत्कार उत्पन्न करने की लालसा, घिसी-पिटी अनुभूतियाँ आदि। नए कवि सामान्यतया दोनों को किंतु सापेक्ष दृष्टि से वस्तु को अधिक महत्त्व देते नजर आते हैं। हालांकि रूप का महत्त्व इनकी दृष्टि में गौण नहीं है।

प्रश्न उठता है कि कविता में वस्तु तत्त्व से तात्पर्य क्या है? सामान्यतः वस्तु तत्त्व के लिए आज कई शब्द प्रचलित हैं, मसलन मन्तव्य, कथ्य, विषय, भाव आदि। मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि जो चीज कविता में अभिव्यक्त होती है उसी को वस्तु तत्त्व कहा जाता है। किंतु कविता की रचना-प्रक्रिया एक जटिल प्रक्रिया होती है कि उससे गुजर कर जो चीज कविता के

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रूप में हमें उपलब्ध होती है उसका संप्रेष्य तत्त्व यानि वह तत्त्व जो अभिव्यक्ति के उपादानों– भाषा, छंद, प्रतीक, बिंब आदि– के माध्यम से संप्रेषित हुआ है, वह वस्तु, वस्तु के अनुभव, कवि की दृष्टि, कवि के उद्देश्य तथा माध्यम रूपी अभिव्यक्ति के उपादानों आदि के सम्मिलित प्रभाव से अछूता नहीं होता। इसलिए इस तत्त्व की ठीक-ठीक पहचान करना या उसे निस्संग रूप से दिखाना जटिल या असंभव काम ही होता है। इसकी एक और वजह यह भी है कि सच्ची कविता मात्र विषय नहीं होती यानि उसकी प्रक्रिया यांत्रिक नहीं होती। उसमें कविमन की अत्यंत महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी होती है। यह कवि-मन जितना ही जटिल होगा, उसकी कविता का वस्तु तत्त्व भी उतनी ही जटिलता से संप्रेष्य होगा यद्यपि उसके संप्रेषण में अन्य उपादानों की अनिवार्य भूमिका को भी नहीं नकारा जा सकता। अर्न्स्ट फिशर के अनुसार कृति के विषय का रचना के वस्तु तत्त्व के रूप में सामने आना रचनाकार के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है, कारण वस्तु तत्त्व वही चीज नहीं होती जोकि रचना में प्रस्तुत की जाती है, वरन् वह कैसे प्रस्तुत की जाती है, यह तथ्य भी वस्तु तत्त्व के अंतर्गत ही जाता है। इसीलिए उन्होंने माना है कि रचना के अंतर्गत विषय का अर्थ बदल जाता है। (मार्क्सवादी साअहित्य चिंतन, डॉ. शिव कुमार मिश्र, पृ. 391)। नए कवियों में मुक्तिबोध और अज्ञेय ने वस्तु तत्त्व के आशय पर सर्वाधिक विचार किया है। मुक्तिबोध काव्य की वस्तु और काव्य के विषय में बहुत भेद मानते हैं। उनकी दृष्टि में, ‘विषय’ शब्द का अर्थ व्यापक है, ‘वस्तु’ का संकुचित।( मुक्तिबोध रचनावली-5, सं0 नेमिचंद्र जैन, पृ. 99)। उनकी स्पष्ट धारणा है कि एक ही विषय पर लिखी जाकर भी दो कृतियों का वस्तु-तत्त्व अलग-अलग हो सकता है। तुलसी के मानस और वाल्मीकि की रामायण के उदाहरण से उन्होंने अपने मत की पुष्टि की है। उनकी मान्यता है कि ‘मानस’ और ‘रामायण’ एक ही विषय पर लिखी जाकर भी काव्य की ‘वस्तु’ की दृष्टि से भिन्न-भिन्न हैं अर्थात् दोनों का वस्तु तत्त्व अलग-अलग है। इसी प्रकार उन्हीं के शब्दों में — ‘‘उषाकाल पर लिखी हुई दो कविताओं के वस्तु तत्त्व अलग-अलग हो सकते हैं।’’ (मुक्तिबोध रचनावली, पृ099)। एक ही विषय रहते हुए भी वस्तु-तत्त्व की भिन्नता का आधारभूत कारण, मुक्तिबोध, कवि-प्रकृति और बाह्य जगत् के द्वंद्व में देखते हैं।(मुक्तिबोध रचनावली, पृ0 99)। इसीलिए वे कला की वस्तु की ‘मात्र आध्यात्मिक’ अथवा ‘मात्र –मनोवैज्ञानिक’ व्याख्या करने वाले भाववादी आलोचक-विचारकगण से अपने को अलग कर लेते हैं। (मुक्तिबोध रचनावली, पृ099)। अतः कवि की प्रकृति और जीवन-जगत् की पारस्परिक

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प्रतिक्रिया के गुम्फों से तैयार हुए ‘मनस्तत्त्व’ को वे काव्य का वस्तु-तत्त्व मानते हैं। यह मनस्तत्त्व कलाभिव्यक्ति के लिए आतुर हो उठता है। स्पष्ट है कि मुक्तिबोध नई कविता की प्रगतिशील धारा के नए कवि होते हुए भी बाह्य आग्रहों या बाह्य जगत के यथावत् चित्रण को काव्य नहीं मानते–अर्थात् उस रूप में चित्रित वह बाह्य जगत् उनकी दृष्टि में काव्य-तत्त्व या वस्तु-तत्त्व नहीं होता। सौंदर्य-चेतना कोई जड़वस्तु भी नहीं होती। मनुष्य उसका निरंतर विकास करता है। वह अपने सृजन को विशिष्ट एवं अधिक आकर्षक बनाने के लिए तरह-तरह के प्रयोग करता है। अतः यह समझना भूल होगी कि वस्तुवादी या यथार्थवादी अभिरुचि वाले कवियों ने सृजन में नवीनता के प्रति आग्रह नहीं होता। अज्ञेय भी काव्य के विषय और काव्य की वस्तु में अंतर मानते हैं क्योंकि उनकी दृष्टि में संप्रेष्य विषय नहीं, वस्तु होती है। अज्ञेय के अनुसार विषय केवल नए हो सकते हैं, मौलिक नहीं– मौलिकता वस्तु से ही संबद्ध होती है। इसीलिए नए कवियों समेत जो कवि विषय को वस्तु समझने की भूल करते हैं, वे अज्ञेय के मत में, अपना और पाठकों का पथ भ्रष्ट करते हैं।(तीसरा सप्तक, पृ0 9)। वस्तुतः अज्ञेय भी मुक्तिबोध की तरह ‘वस्तु’ को मनोमय या मानवीय मानते हैं। उनके अनुसार,जैसा पहले भी कहा जा चुका है, काव्य की वस्तु ‘‘विषय के साथ कवि के रागात्मक संबंध का प्रतिबिंबित होती है।’’ (आत्मनेपद, पृ0 167)। रागात्मक संबंध के बिना, अज्ञेय की धारणा है, कोई भी तथ्य एक बाह्य वास्तविकता होती है जिसका काव्य में स्थान नहीं होता। (नये प्रतिमान: पुराने निकष, लक्ष्मीकांत वर्मा, पृ. 158)। अतः इलियट की तरह (The Sacred Wood, p. ix : That the feeling, or emotion, or vision, resulting from the poem is something different from the feeling or emotion or vision in the mind of the poet) अज्ञेय भी काव्य-तत्त्व के निर्माण में कवि-मानस की भूमिका की अहमियत को मानते हैं।

विजयदेव नारायण साही सामान्य अनुभूति को काव्य का विषय न मानकर उसकी अद्वितीयता तथा विशिष्टता पर बल देते हैं। उन्होंने लिखा है कि ‘जो मैंने भोगा है वह सब मेरी कविता का विषय नहीं है। कविता का विषय वह होता है जो अब तक की भोगने की प्रणाली में नहीं बैठ पाता।’( तीसरासप्तक, पृ0276)। इस प्रकार के वक्तव्य नए कवि की मौलिकता एवं नवीनता के प्रति उत्कट ललक को ही प्रदर्शित करते हैं।

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अज्ञेय और मुक्तिबोध ने ही नहीं, प्रायः जिस भी नए कवि ने इस बिंदु पर विचार किया है उसने काव्य-वस्तु और उस वस्तु के कच्चे माल (विषय, भाव) में अंतर माना है। यह अंतर कवि की मानसिकता, दृष्टिकोण, व्यक्तित्व आदि की वजह से आता है। कवि-मन के दखल के ढंग को लेकर मतभेद जरूर मिल जाता है, लेकिन इतना जरूर है कि इन्होंने कविता में व्यक्त हो चुकी संवेदना या वस्तु को विषय से भिन्न माना है।

मैं समझता हूँ कि यह जो अनुभूति की जटिलता की बात की जाती है, वह दरअसल कवि-मन की जटिलता ही होती है। असल में कवि-मन या चेतना कोई व्यक्तित्वविहीन तत्त्व नहीं होती, जिसमें बाह्य यथार्थ वैसे ही प्रतिबिंबित हो जाता है जैसे आईने में। जिस प्रकार जीवन की बाह्य वास्तविकता जटिल हो सकती है, उसी प्रकार कलाकार की चेतना भी जटिल और व्यक्तित्ववान हो सकती है। इन दोनों की टकराहट से ही काव्यानुभूति या काव्य तत्त्व का निर्माण होता है।

‘अनुभूति’ नये कवियों का प्रिय शब्द है। थोड़े-बहुत मतभेद के साथ प्राय: सभी भावधाराओं के नये कवियों ने अनुभूति पर बल दिया है। भेद वस्तुत: वस्तुवादी एवं आत्मवादी दृष्टियों का है।

यहां डॉ. नामवर सिंह का इसी संदर्भ में किए गए ‘अनुभूति’-विवेचन पर ध्यान जा रहा है जिससे अनुभूति और रस का पारस्परिक संबंध और इस संदर्भ में नये कवियों का रस के रूप में पुराने प्रतिमान से नये कवि का प्रस्थान-बिंदु उजागर होता है। उनके शब्दों में –“ आज छायावादियों की तरह कोई ‘हूदय की अनुभूति’ भले न कहता हो, किंतु “ अनुभूति की प्रामाणिकता” को तकिया-कलाम की तरह आज खूब इस्तेमाल किया जाता है। ‘हृदयकी अनुभूति’ न सही ‘अनुभूति की प्रामाणिकता’ ही सही, अनुभूति पर बल तो अब भी है। फिर ‘रस’ से इस प्रकार दामन बचाने या मुंह चुराने का मतलब?” (कविता के नये प्रतिमान, पृ0 45-46)। पृ0 45 पर ही डॉ. नामवर सिंह ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल का यह मत उद्धृत किया है-“ दिन में सैकड़ों बार ‘हृदयकी अनुभूति’, ‘हृदयकी अनुभूति’ चिल्ल्लाएंगें, पर ‘रस’ का नाम सुनकर ऐसा मुँह बनाएंगे मानों उसे न जाने कितना पीछे छोड़ आये हैं। भलेमानुस इतना भी नहीं जांते कि हृदय की अनुभूति ही साहित्य में ‘रस’ और ‘भाव’ कहलाती है।“ उल्लेखनीय है कि रामचंद्र शुक्ल ने रस

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को हृदय की अनुभूति के रूप में निरूपित अवश्य किया लेकिन ‘शब्द-शक्ति’, अलंकार आदि विषयों को भी काव्य-समीक्षा के लिए उपयोगी माना। उन्होंने ‘अर्थ- मीमांसा’ की दिशा में भी कदम बढ़ाया जिसके बिना ‘रस’ अपूर्ण ही नहीं निरर्थक है।( कविता के नये प्रतिमान, पृ0 47)। पृ0 49 और 50 पर नामवर सिंह ने एक महत्त्वपूर्ण बात लिखी है जो अन्तत: नये कवियों की धारणा के करीब पड़ती है- “वस्तुत: संस्कृत काव्यशास्त्र में निरूपित रस-सिद्धांत के दो पक्ष हैं, जिसमें से एक का सम्बंध अर्थ-मीमांसा से है तो दूसरे का सम्बंध तत्त्व-मीमांसा से। …अर्थ मीमांसा की पद्धति बहुत-कुछ सम्प्रदाय-निरपेक्ष व्याकरण-दर्शन से सम्बद्ध होने के कारण प्राचीन काल के समान ही आज भी रचनात्मक विकास की संभावनाओं से युक्त है। इसके विपरीत रस का आस्वाद पक्ष है जो आनंदमूलक तत्त्ववाद से संबद्ध होने के कारण एक निश्चित युग की संस्कृति से परिबद्ध है। आज के अनेक नये लेखक जब रस को सर्वथा अप्रासंगिक करार देते हैं तो सम्भवत: इसी आनंदमूलक प्राचीन तत्त्ववाद के ही कारण। उदाहरण के लिए शी स0ही0 वात्स्यायन ने रस पर दो आपत्तियां की है। (1) रस का आधार है- समाहिति,अद्वंद्व; किंतु नयी कविता द्वंद्व और असामंजस्य की कविता है। (2) नयी कविता वर्तमान पर केंद्रित है, जब कि रस की दृष्टि अतीतोन्मुख रहती है- नयी कविता का विषय है क्षण की अनुभूति जब कि रस का आधार है..वासना और स्थायी भाव।“

संक्षेप में कहा जाए तो नये कवि के लिए कोई भी विषय वर्जित नहीं रह इसीलिए उनका मानना है कि साहित्य में कोई नियम वर्जित नहीं होना चाहिए। अकवितावादी श्याम परमार इस हद तक कह गए कि ‘अभिकव्यक्ति के लिए जो सुखद हो—अर्थवत्ता और अर्थेतर कैसी भी स्थिति में वही अकविता के क्षेत्र की वस्तु है।“ ( अकविता और कला संदर्भ,पृ010)।

कुछ कवि रचना-प्रक्रिया को रहस्यात्मक वस्तु मानते हैं और कुछ सजग मानस की उपज। नया कवि रचना-प्रक्रिया अर्थात् विषय-वस्तु से कलात्मक अभिव्यक्ति ; रूप तक की यात्रा की प्रक्रिया को तीन सोपानों में बाँटकर देखता है। पहले सोपान में कवि जीवन को देखता है, दूसरे में वह अपनी कलात्मकता से अनुभव को क्रम और स्वरूप देता है और तीसरे में वह सृजन-शक्ति से उसे कलात्मक अभिव्यक्ति देता है।

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कलात्मक अभिव्यक्ति के उपादान और नई काव्य-दृष्टि

नए कवियों ने, बदली हुई परिस्थितियों में काव्य-वस्तु के साथ-साथ विशेष रूप से भाषा, शब्द-योजना, छंद, लय, तुक, उपमान, बिम्ब.प्रतीक आदि शिल्प के तत्वों और छोटी कविता, लंबी कविता, काव्य-नाटक, नवगीत आदि काव्य-रूपों पर, अपनी और अपने समय की केंद्रीय धारा की कविता को ध्यान में रखकर, बुनियादीतौर पर एक रचनाधर्मी के रूप में, नई दृष्टि से विचार किया है और अपने सिद्धांत प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है। वस्तुत: ये शिल्प के परमपरागत अथवा नये तत्वों के उन्हीं रूपों पर अधिक विचार करते हैं जो इनकी कविताओं में प्रयुक्त हुए हैं।

कलात्मक अभिव्यक्ति के उपादानों की बात की जाए तो नये कवियों ने भाषा और छंद को प्रमुख तत्व माना है और इन्हीं पर सर्वाधिक विचार किया है। यहां इन्हं पर विशेष विचार करूंगा।

भाषा

काव्य-शिल्प की चर्चा में नए कवि का सर्वाधिक प्रिय विषय काव्य-भाषा या कविता की भाषा ही रहा है। उनकी दृष्टि में भाषा अथवा शब्द का संस्कार व्याकरण-शुद्धि से अधिक बड़ी और गहरी बात होती है।(आत्मनेपद, अज्ञेय, पृ0165)। इसीलिए अज्ञेय यह भी मानते हैं कि रचनाशील भाषा अपूर्व या अतर्कित स्थिति में कोश का मुँह नहीं जोहती बल्कि नई भाषा गढ़ लिया करती है और यह नई गढ़न, भाषा के समग्र संस्कार के अनुरूप ही होती है।( स्रोत और सेतु, पृ0 98)।

असल में भाषा के प्रति सजगता आधुनिक युग की कविता की एक प्रमुख प्रवृत्ति है। अज्ञेय का तो मत ही है कि आधुनिक युग की कविता शब्द और उसके अर्थ की समस्या को लेकर आगे बढ़ी है। इस नाते यदि नई कविता की भाषा में सरलता की अपेक्षा जटिलता भी आई है तो उसे, एक विवशता के रूप में सही, नए कवि ने स्वीकार किया है। नए कवि के सामने काव्य-भाषा का भारतीय एवं पाश्चात्य चिंतन-पक्ष भी था और हिंदी कविता की भाषा के

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व्यावहारिक रूप की परंपरा भी। तो भी नए कवि का लक्ष्य काव्य-भाषा पर काव्यशास्तत्रीय ढंग से विचार करना नहीं रहा है, बल्कि कवि होने के नाते अपनी या अपने समय की कविता की भाषा की विशेषताओं को न्यायसंगत ठहराना रहा है। अतः सभी नए कवियों ने सिलसिलेवार काव्य-भाषा के सभी आयामों पर विचार नहीं किया है।

नया कवि दोहरी समस्या से जूझ रहा था। वह प्रमुखतः छायावाद के रूमानी भाव-बोध से भी जूझ रहा था और उसके शिल्प से भी। बच्चन आदि उत्तरछायावादी कवियों के द्वारा प्रयुक्त लगभग बोल-चाल की भाषा को ही काव्य-भाषा का स्थान देना भी उसे उचित नहीं लगा। इस नाते वह कविता की लोकप्रियता की कीमत पर भी कविता के शिल्प में नए-नए प्रयोग करने पर विवश हुआ। उसका प्रयत्न अपने परिवर्तितत भाव-बोध को सक्षम-से-सक्षम अभिव्यक्ति देते हुए संप्रेषित करने का था। इस प्रयत्न में कही उसे पुराने हथियार ही नए ढंग से इस्तेमाल में लाने पड़े और कहीं सर्वथा नए हथियार खोजने पड़ें। कविता के संदर्भ में, भाषा अभिव्यक्ति का सर्वाधिक प्रकृत एवं मूल साधन है। अतः अपवादस्वरूप एक-आध कवि को छोड़कर, अलग-अलग विचारधारों के होते हुए भी, सामान्यतः सभी नए कवियों ने उसे सिद्धान्ततः भी पर्याप्त महत्त्व दिया है। यहां स्पष्ट कर दिया जाए कि अपनी और अपने समय की कविता के संदर्भ में पहले की काव्यभाषा, शब्द, अलंकार आदि को उपयुक्त न पाने या उसके नवीनीकरण की जरूरत का यह मतलब नहीं है कि वह शब्द या अलंकार, स्वयं पुरानी विशिष्ट रचनाओं के संदर्भ में चुके हुए दिखाई पड़ते हैं। बात इतनी है कि ‘‘बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है’’ या ‘‘ये उपमान मैले हो गए हैं’’ (कविश्री, अज्ञेय, पृ025) कहने वाले अज्ञेय और कुछ मत प्रस्तुत करने वाले दूसरे नए कवियों ने भी अपने समय के संदर्भ में ही शब्दों, उपमाओं आदि को चुका हुआ माना है। यानी ये यह नहीं कहते कि जो शब्द, उपमा आदि चुके हुए या चमत्कार-रहित नजर आते हैं, वे पहले चमत्कार-युक्त नहीं थे। इस बात की पुष्टि में हम अज्ञेय का ही ‘गुलाबी’ शब्द को लेकर किया गया विवेचन उद्धृत कर सकते हैं। अज्ञेय के अनुसार ‘गुलाबी’ शब्द में ‘गुलाब के रंग जैसा रंग यह उपमा उसमें निहित है। आरंभ में ‘गुलाबी’ शब्द से उस रंग तक पहुँचने के लिए गुलाब के फूल की मध्यस्थता अनिवार्य रही होगी–उस समय यह प्रयोग चमत्कारिक रहा होगा। पर अब वैसा नहीं है।…अब उस अर्थ का चमत्कार मर गया है।’’(दूसरा सप्तक, पृ0 10)।

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अज्ञेय भाषा का दोहरा प्रयोजन मानते हैं। ‘एक ओर तो वह सत्य के जानने का साधन है और दूसरी ओर उस माने हुए सत्य को प्रेषित करने का साधन है।’’(दूसरासप्तक, पृ07)। इस प्रकार अज्ञेय ने भाषा के संदर्भ में एक नवीन मत की स्थापना की है और भाषा के महत्त्व को बढ़ाया है। डा. नामवर सिंह ने भाषा के प्रति इस दृष्टि को पूरे बल के साथ रेखांकित करते हुए टिप्पणी की है– ‘‘इस मान्यता की नवीनता यह है कि इसमें भाषा को जानने का भी साधन माना गया है। इससे पहले भाषा केवल अभिव्यक्ति का साधन मानी जाती थी।’’(कविता के नये प्रतिमान, पृ0111)। यह अलग बात है कि भाषा के इस दोहरे प्रयोजन के संकेत ऋग्वेद आदि में खोजे जा सकते हैं। (अलोचना, जुलाई-सितम्बर,1977, पृ0 21, रवींद्रनाथ श्रीवास्तव)।

नया कवि सिद्धांतत: भाषा के सहज रूप पर कमोबेश बल देता है। यानी वह ऐसी भाषा को ही उपयुक्त मानता है जो कवि के हाथों सधी हो, नियोजित हो। स्पष्ट है कि नया कवि कवि के भाषा पर सहज अधिकार का ही प्रशंसक है। अज्ञेय के शब्दों में–‘‘भाषा का संस्कार वही सही होता है जो इतना गहरा हो जाए कि लिखते-बोलते समय ही नहीं, स्वप्न देखते समय भी यह प्रश्न न उठे कि भाषा सही है या नहीं।“ (अद्यतन, पृ057)। अपनी-अपनी भाव-धारा के कारण नए कवियों के भाषा संबंधी महत्त्व को थोड़ा अलग-अलग करके समझने की भी जरूरत है। त्रिलोचन और अज्ञेय जैसे दो विभिन्न भावधाराओं के कवियों के भाषा संबंधी विचारों की समता के बावजूद व्यवहार की भाषा का अंतर देखा जा सकता है। इस बात को अज्ञेय और त्रिलोचन की काव्य-भाषा के संदर्भ से बखूबी समझा जा सकता है। त्रिलोचन कविता को जीवन की जीवंत भाषा प्रदान कर उसे पुनः जीवित कर सके हैं और कह सकते हैं कि ‘भाषा की लहरों में जीवन की हलचल है’ जबकि अज्ञेय रूपवादी रुझान होने के कारण, अपनी अभिव्यक्ति को अधिक प्रभावशाली रूप देने के लिए भाषा या शब्द की खोज करते चले गए हैं। रूपवादी रुझान के कवि भी युग-संपृक्ति की बात तो करते हैं किंतु उनका बल भाषा के निःसंग रूप पर ही होता है। यही कारण है कि ऐसे कवियों की भाषा में वह देसीपन नजर नहीं आता जो ज्यादातर जीवनोन्मुख कवियों की भाषा में नजर आता है।त्रिलोचन की मान्यता के अनुसार जीवित भाषा किताबों से नही, जीवन से आती है।( महत्व स्मारिका(त्रिलोचन), 5-6 जून, 1982, पृ. 7) । शमशेर बहादुर सिंह सिद्धान्त: सरल या जनवादी-भाषा के कायल हैं। इसीलिए उन्होंने आज की काव्य-भाषा के लिए लोक-भाषा का आधार जरूरी एवं उचित माना है।पूर्वग्रह (अंक 12-13), जनवरी-अप्रैल, 1976, पृ032)। नये कवि ने काव्य-भाषा में आंचलिक बोलियों के शब्दों का समावेश भी स्वीकार किया है। नए कवि की दृष्टि में जन-बोलियों, इतर भाषाओं के शब्दों से युक्त बोलचाल की भाषा ही

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काव्य-भाषा के रूप में उपयुक्त है। लेकिन बोलचाल की भाषा का यह मिश्रित रूप तभी उपयुक्त माना जाएगा जब कविता में यह केवल जामा नजर नहीं आयेगा। यानी जन-बोली आदि का कोई भी शब्द इस रूप में जाना चाहिए कि वह खपा हुआ लगे, आरोपित नहीं। और ऐसा तभी हो सकता है जब कवि उस शब्द के प्रयोग-संदर्भों की भी समझ रखता हो अर्थात् जब वह उस शब्द के प्रयोग में लाने वाले जीवन-संदर्भों से सीधा रिश्ता भी रखता हो, अन्यथा भाषा में वह रचनात्मक वेग नहीं आ पायेगा जिससे कृति अमरत्व पाती है। यही नहीं, जो कवि जनबोलियों के शब्दों का इस्तेमाल बतौर फैशन करते हैं वे क्षण-जीवी ही होते हैं।(आलोचना, जुलाई-सितम्बर, 1975, पृ0 133)। त्रिलोचन यह तो मानते हैं कि रचनाकार को, भाषा कैसे बोली जाती है, यह पकड़ होनी चाहिए, लेकिन वे यह भी मानते हैं कि कवि भाषा के कठोर नियमों को तोड़ता है। यानी कवि बोलचाल या सामान्य भाषा का इस्तेमाल अपने ढंग से किया करता है। मुक्तिबोध इस बात का तो स्वागत करते हैं कि नई कविता की भाषा बातचीत के निकट की भाषा है किंतु वे इस निकटता के नाम पर ‘काव्यात्मकता’ का होम स्वीकार नहीं करते। अर्थात् वे यह तो मानने को तैयार हैं कि काव्य-भाषा बातचीत की भाषा हो सकती है किंतु वे काव्य-भाषा के रूप में बातचीत के उसी खास रूप को स्वीकार करते हैं जिसमें काव्यात्मकता होती है।(मुक्तिबोध रचनावली,(भग-5), पृ0344)। राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित मुक्तिबोध की पुस्तक ‘ नये साहित्य का सौदर्यशास्त्र ‘ में एक लेख है –‘जनता का साहित्य किसे कहते हैं’ जिसके 78 और 79 पृष्ठों पर उन्होंने लिखा है-  ‘जनता का साहित्य किसे कहते हैं?’ शीर्षक आलेख में मुक्तिबोध जनधर्मी साहित्य की परिभाषा देते हुए कहते हैं: ‘ ‘जनता का साहित्य’ का अर्थ जनता को तुरंत ही समझ में आनेवाले साहित्य से हरगिज नहीं। अगर ऐसा होता तो किस्सा तोता-मैना और नौटंकी ही साहित्य के प्रधान रूप होते। साहित्य के अंदर सांस्कृतिक भाव होते हैं। सांस्कृतिक भावों को ग्रहण करने के लिए बुलंदी, बारीकी और खूबसूरती को पहचानने के लिए, उस असलियत को पाने के लिए जिसका नक्शा साहित्य में रहता है, सुनने या पढ़नेवाले की कुछ स्थिति अपेक्षित होती है। वह स्थिति है उनकी शिक्षा, उनके मन का परिष्कार।…‘जनता का साहित्य’ का अर्थ ‘जनता के लिए साहित्य’ से है…ऐसा साहित्य जो जनता के जीवन-मूल्यों को, जनता के जीवनादर्शों को प्रतिष्ठापित करता हो, उसे अपने मुक्तिपथ पर अग्रसर करता हो।’  यहां दो बातें समझने योग्य हैं- (1) मुक्तिबोध किसी कवि की कविता की भाषा के जटिल होने को न्यायसंगत मानते हुए स्वीकृति देते हैं और (2) उसका समाधान श्रोता या पाठक की तैयारी में खोजते हैं। उल्लेखनीय है कि मुक्तिबोध की कविता-भाषा के जटिल और गुम्फित होने का प्रश्न बार-बार उठता रहा है। खैर। प्रसंग है कि क्या कविता –की भाषा में आम बोलचाल का हूबहू रूप होता है। नागर्जुन की काव्य-भाषा पर विचार करते हुए रामविलास शर्मा ने नागार्जुन की भाषा को किसान-मजदूरों की भाषा का निखरा हुआ रूप कहा है।(नयी कविता और अस्तित्ववाद, पृ0

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140)। यानी नागार्जुन की काव्य-भाषा के शब्द तो मूलतः आम बोलचाल के ही होते हैं किंतु वे उनका परिष्कार कर देते हैं, यानी उन शब्दों को विशेष कर देते हैं। वस्तुतः शब्द नहीं, शब्द का प्रयोग ही शब्द को सामान्य स्तर से उठाकर काव्य के विशिष्ट स्तर पर बैठाता है।भाषाके संदर्भ में नये कवियों का शब्द-अर्थ विवेचन महत्त्वपूर्ण है। ध्यान देन योग्य तथ्य है कि विशेष रूप से आठवें दसक की कविता में लोक का भरपूर उपयोग हुआ है। शकुंत माथुर ने साफ माना है कि नई कविता में जीवन की भाषा, बोलचाल के शब्द, मुहावरे तथा दैनिक जीवन में व्यवहार की जाने वाली चीजों के प्रतीक-उपमान आये हैं। (चांदनी चूनर, पृ0 7)।

बोलचाल की भाषा का काव्य-भाषा के रूप में उपयोग करने से प्रायः यह तात्पर्य लिया जाता है कि काव्य-भाषा संस्कृत के शब्दों या कहें तत्सम-प्रधान शब्दावली का बहिष्कार करती है और जब नया कवि बोलचाल की भाषा का, कविता की भाषा के रूप में, पक्ष लेता है तो यह आशय और भी प्रकट होता नजर आता है क्योंकि जिस छायावादी भाषा का नया कवि विरोध करता है उसकी एक प्रवृत्ति यह भी मानी गई कि वह तत्सम-प्रधान थी। किंतु कुछ नए कवि ऐसे भी हैं जो न तो संस्कृत के ज्ञान को त्याज्य मानते हैं और न उसकी शब्दावली को ही। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि ऐसे मत के प्रबल समर्थक मुक्तिबोध और नागार्जुन जैसे प्रगतिशील भावधारा के ही कवि हैं यद्यपि यदि व्यवहार में देखें तो अज्ञेय, नरेश मेहता, शमशेर आदि सभी भावधाराओं के नए कवियों को हम अपनी-अपनी कविताओं में तत्सम शब्दों का प्रयोग करते हुए पाएँगे। मुक्तिबोध की यह स्पष्ट मान्यता है कि नई काव्य-भाषा में सामान्य वार्तालाप की भाषा के प्रयोग का अर्थ यह नहीं होता कि उसमे संस्कृत शब्दों का त्याग हो। (मुक्तिबोध रचनावली, भाग-5, पृ0 344)। अर्थवहन की क्षमता के लिए विदेशी शब्दों के इस्तेमाल के लिए भी कवि विवश हुआ है।

छंद- मुक्त छंद

काव्य-शिल्प के तत्त्व के रूप में भाषा के बाद नए कवियों ने छंद पर ही सर्वाधिक लिखा है और छंद संबंधी इनका विवेचन तथा व्यवहारतः छंदगत इनके प्रयोग पर्याप्त चर्चा एवं विवाद का विषय भी रहे हैं। व्यापक रूप में ‘छंद’ मर्यादा या अनुशासन का ही पर्यायवाची है यद्यपि बाद में चलकर छंद का तात्पर्य केवल छंद-प्रकारों के नियमों तक ही सीमित मान लिया गया है और इस प्रकार छंद के मूल आशय को संकीर्णाताओं में बांधने की कोशिश की गई। पारम्परिक छंद को, नया कवि अपनी स्वच्छंद प्रवृत्ति के अनुकूल, उसके हूबहू रूप में ग्रहण नहीं कर पाता।

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वह छंद को बंधन के रूप में पसंद नहीं करता। अज्ञेय ने सॉनेट के क्षेत्र में किये गये तिलोचन के प्रयोगों की सराहाना अवश्य की लेकिन बंधे छंद को न छोड़ पाना उनकी सीमा माना है। (दिनमान, 1 अक्टूबर, 19732, पृ0 52)। वस्तुतः नए कवि स्वभावतः मुक्तिकामी हैं। अतः उनका यह स्वभाव काव्य-शिल्प के क्षेत्र में भी उजागर हुआ है। अज्ञेय के अनुसार आधुनिक काल में टेक्नोलॉजी के विकास ने कविता को उस वाचिकता से बहुत कुछ मुक्त कर दियाहै जिसकी वजह से छंद कविता का अनिवार्य तत्त्व बना रहा है। (आधुनिक हिंदी कविता का अबिव्यंजनावाद,डॉ. हरदयाल, पृ0 290)। नए कवियों ने मुक्तछंद का प्रबल समर्थन किया है। छंद से मुक्ति की माँग यद्यपि नए कवियों से पूर्व की है तथापि उसे चरम स्थिति तक ले जाने का श्रेय नए कवियों को ही जाता है। नए कवियों ने छंद और उसके विवेचन की प्राचीनता तो स्वीकार की है किंतु छंद और छंद-प्रकारों के उद्भव पर विचार बहुत कम किया है। केदारनाथ अग्रवाल ने अवश्य इस विषय पर विचार करते हुए कविता का जन्म श्रम के संगीत से माना है और छंद को मनुष्य के सचेष्ट प्रयास की प्राप्ति बताया है। पारम्परिक छंद-विधान को नए कवियों ने अपनी अभिव्यक्ति के लिए अक्षम एवं अनावश्यक पाया है। अतः छंद को छोड़ कर अथवा तोड़कर चलना ही उन्हें उपयुक्त लगा है। वस्तुतः इन कवियों का मूल विरोध छंद को साँचे के रूप में अनिवार्य उपादान मानने वाली प्रवृत्ति से है। छंद की प्राथमिक आवश्यकता ‘अनुशासन’ को नए कवि भी मानते हैं। अतः छंद को मुक्त करने के नाम पर कविता को कवित्वहीन कर देना इन्हें मान्य नहीं है। नए कवियों के निकट सर्वाधिक त्याज्य वस्तु अन्त्यानुप्रास है। तुक को ये कवि छंद का अनिवार्य तत्त्व नहीं स्वीकार करते। भावाभिव्यक्ति में तुक को ये कवि बाधक वस्तु ही मानते हैं। किंतु सामान्यतः सभी कवि लयानुशासन को मुक्त-छंद के लिए अनिवार्य मानते हैं। मुक्तछंद में पंक्तियों के विधान का एक आधार भी ये कवि लय को ही मानते है। वस्तुतः छंद के बाहरी बंधनों को छोड़ने और उसकी आंतरिक विशिष्टता लय को अपनाने का आग्रह नए कवियों में सहज प्राप्त होता है। लय के स्वरूप की भी नए कवियों ने विशेष चर्चा की है। लय को से कवि स्थूल वस्तु न मानकर, कविता की अंतर्भूत, अतः अनिवार्य, वस्तु मानते हैं। जगदीश गुप्त ने नई कविता के संदर्भ में ‘अर्थ की लय’ की उद्भावना की है। लय का मुख्य स्रोत इन कवियों की दृष्टि में जीवन का विविध एवं विशाल क्षेत्र ही है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि अनेक नए कवियों ने पारम्परिक छंदों–मसलन, कवित्त, सवैया आदि को तोड़कर भी मुक्त-छंद की रचना की है।

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अज्ञेय, नागार्जुन, शमशेर, मुक्तिबोध, त्रिालोचन, गिरिजाकुमार माथुर, प्रभाकर माचवे, रामविलास शर्मा आदि अनेक कवियों ने ‘पुराने पथ’ का भी संस्कार किया है। नागार्जुन और त्रिलोचन जैसे कवि तो नए-से-नए कवि के लिए भी छंद का ज्ञान अनिवार्य मानते हैं। इन कवियों की दृष्टि में छंद से सर्वथा मुक्ति नहीं हो सकती। वस्तुतः विवेच्य कवि छंदों के न तो अन्य विरोधी हैं और न ही अन्य समर्थक। कुछ ऐेसे कवि अवश्य हैं जो पारम्परिक छंदों के किंचित् उपयोग को भी कवि की अक्षमता मानते हैं।हम जानते हैं कि मानी गई केंद्रीय कविता के बाद में आने वाले कवि पारम्परिक छंदों की सोच से सर्वथा मुक्त होते चले गए। यूं गीत, नवगीत, गजल, दोहा आदि लिखे ही जा रहे हैं। बीच-बीच में छंद-वापसी की आवाजें भी आती रहती हैं।

प्रतीक और बिम्ब

आधुनिक पश्चिमी काव्य-चिंतन के प्रभावस्वरूप नए कवियों ने प्रतीक और बिम्ब पर भी विचार किया है। उल्लेखनीय है कि प्राचीन भारतीय काव्यशास्त्रा में इन दोनों का ही स्पष्ट विवेचन उपलब्ध नहीं है। प्रतीक यद्यपि बहुत प्राचीन शब्द है और इस तथ्य को केदारनाथ सिंह और केदारनाथ अग्रवाल जैसे कवि स्वीकार भी करते हैं तथापि इस शब्द की आधुनिक संकल्पना अंग्रेजी ‘सिम्बल’ के ही निकट है। सामान्यतः नए कवियों ने प्रतीक का महत्त्व मानते हुए प्रचलित प्रतीकों की अपेक्षा नए प्रतीकों के उपयोग पर बल दिया है किंतु नागार्जुन प्रभृति कवियों ने सांस्कृतिक प्रतीकों का उपयोग भी आवश्यक माना है। यह एक दिलचस्प तथ्य है कि निजी प्रतीकों के समर्थक नए कवि भी प्रतीकों के ऐसे प्रयोग में आस्था रखते हैं जो यथार्थ की ओर ले जाता हो, उससे काटता न हो। अज्ञेय जैसे कवियों ने युग की आवश्यकता को देखते हुए यौन-प्रतीकों का उपयोग सहज माना है। नए कवियों की दृष्टि में प्रतीक की उपयोगिता और महत्त्व के अनेक कारण हैं। इन कवियों के निकट प्रतीक संप्रेषण का सशक्त साधन है। सूक्ष्म और अस्पष्ट भावों के उद्बोधन के लिए इसकी उपयोगिता सिद्ध की गई है। प्रतीक भाव-व्यंजना को अधिक सपफलता के साथ तो व्यक्त करते ही हैं, भाषा में शब्द-संयम का गुण भी पैदा करते हैं। नए कवियों में प्रतीकों के प्रति विरोध का भाव भी मिलता है। नेमिचंद्र जैन जैसे कवियों ने जहाँ संस्कारहीन एवं अराजक प्रतीक-योजना का विरोध किया है वहाँ ‘सपाट-बयानी’ के पक्षधर

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सर्वेश्वरदयाल सक्सेना और रघुवीर सहाय जैसे नए कवियों ने प्रतीक की सत्ता पर ही प्रहार किया है। प्रतीक-विरोधी ऐसे कवियों का तर्क है कि प्रतीक-शैली कवि को दयनीय एवं पलायनवादी बनाती है। सामान्यतः नए कवि प्रतीक के सायास प्रयोग, उसके प्रति अतिशय मोह और उसके कारण जन्मी दुरूहता को अनुचित मानते हैं। वस्तुतः इन कवियों की दृष्टि में जीवन और प्रतीक में गहरा संबंध है।

यद्यपि हिंदी में नए कवियों से पूर्व ही आधुनिक अर्थ में बिम्ब का विवेचन उपलब्ध है तथापि कविता के एक महत्त्वपूर्ण प्रतिमान के रूप में बिम्ब-विवेचन का वास्तविक कार्य नए कवियों के समय में ही हो सका है। नए कवियों की रुचि बिम्ब के स्वरूप, प्रकार आदि का व्यवस्थित एवं गहन विवेचन प्रस्तुत करने में नहीं रही है। यूँ भी केदारनाथ सिंह, गिरिजाकुमार माथुर, जगदीश गुप्त जैसे कुछ ही कवि हैं जिन्होंने बिम्ब के अनेक पक्षों पर सूक्ष्म विचार किया है। भाषा को समृद्ध, जीवंत एवं संवेदनशील बनाने की दृष्टि से, नए कवि बिम्ब की उपयोगिता स्वीकार करते हैं। फिर भी बिम्ब, उनकी दृष्टि में, कविता का प्राणतत्त्व न होकर एक सशक्त एवं अत्यंत प्रभावशाली माध्यम ही है। इस माध्यम को नए कवि अलंकार की भाँति बाह्य एवं ऊपरी नहीं मानते। इन कवियों ने बिम्ब को अलंकार, ध्वनि आदि के निकट मानते हुए भी उनसे इसका अंतर स्थापित किया है। बिम्ब की मूल पहचान उसकी ऐंद्रियता मानी गई है। ऐंद्रिय, रागपूर्ण एवं आवेगाश्रित बिम्बों की सृष्टि-करना नया कवि अपना धर्म मानता है। बिम्ब-निर्मिति के लिए कवि की कल्पना-शक्ति और गहरी अनुभूति को नए कवियों ने आवश्यक माना है। दूसरी ओर बिम्ब के प्रति अतिशय मोह और अज्ञानतापूर्ण बिम्ब-विधाकी प्रवृत्ति को इन कवियों ने कविता के लिए घातक माना है। बिम्बजन्य दुरूहता को भी सिद्धांतातः ये कवि पसंद नहीं करते। किंतु नए-नए बिम्बों की योजना इन कवियों के लिए युगजन्य विवशता रही है। पुराने-प्रचलित, कुंठित एवं संवेदनाशून्य बिम्बों को ये कवि त्याज्य समझते हैं। केदारनाथ अग्रवाल जैसे कवियों ने बिम्ब का महत्त्व स्वीकार करते हुए बिम्ब को कथ्य से अधिक महत्त्व देने की प्रवृत्ति को खतरनाक बताया है। केदारनाथ सिंह ने अत्याधुनिक कवियों के अधूरे और सशक्त बिम्ब-विधान के प्रति अपना रोष व्यक्त किया है। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना और लक्ष्मीकांत वर्मा जैसे कवियों ने बिम्ब को निरर्थक कहते हुए उसे छोड़ने का आह्वान तक किया है। फिर भी, कुल मिलाकर, नए कवियों ने बिम्ब को शिल्प का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व ही स्वीकार किया है।

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काव्य-रूप

शिल्प के तत्त्वों के क्षेत्रा में ही नहीं, काव्य-रूपों के क्षेत्रा में भी नए कवि नवीनता के आग्रही हैं। पारम्परिक काव्य-रूपों के प्रति इनका विद्रोह ही अधिक प्रकट हुआ है। वस्तुतः इन कवियों ने भी पारम्परिक काव्य-रूपों को अपनी जटिल संवेदनाओं की अभिव्यक्ति के लिए असमर्थ पाया है। सामान्यतः नए कवि पूर्वनिर्मित आकार को ही अंतिम नहीं मानते। अतः युगानुरूप नए-नए रूपों की खोज करना कवि के लिए संभव एवं उपयुक्त मानते हैं। रूप के प्रति विशेष सजग होने के कारण ये कवि काव्य-रूप के उतने ही प्रकार मानने को तैयार हैं जितनी इनकी कविताएँ हैं। फिर भी काव्य-नाटक, छोटी कविता, लंबी कविता, नवगीत आदि नवीन काव्य-रूपों की इन कवियों ने विशेष विवेचना की है। ‘काव्य-नाटक’ एक आधुनिक काव्य-रूप है। अनेक नए कवियों ने इस रूप को दृश्य-काव्य के मूल उद्देश्य के अनुरूप अपनाया है। नए कवियों में कुछ लंबी कविता और कुछ छोटी कविता के प्रबल समर्थक हैं। इन दोनों रूपों की आवश्यकता युगजन्य स्वीकार करते हुए दोनों का भेद केवल आकारगत नहीं माना गया है अपितु नए कवि दोनों का अंतर तात्त्विक मानते हैं। नए कवियों ने दोनों काव्य-रूपों के आकार की कोई स्पष्ट सीमा भी निर्धारित नहीं की है। छोटी कविता जहाँ प्रगीतात्मक मानी गई है वहाँ लंबी कविता को वस्तुपरक नाटकीय प्रस्तुति के रूप में स्वीकार किया गया है। जहाँ तक नवगीत और नई कविता का प्रश्न है, नए कवि सामान्यतः विधागत विवाद को व्यर्थ मानते हैं। नवगीत का ये कवि सामान्यतः स्वागत करते हैं। गिरिजाकुमार माथुर जैसे कवि तो नवगीत को नई कविता की परिधि में ही स्वीकार करते है। युगानुरूप ‘गीत’ के पारम्परिक ढाँचे में परिवर्तन की आवश्यकता पर इन कवियों ने बल दिया है। वस्तुतः इन कवियों का मूल विरोध समय से कटे चलताऊ ढंग के गीतों से ही लक्षित होता है। नए कवि गीत में भी बनी-बनाई तुकों के प्रयोग के आग्रही नहीं हैं। वस्तुतः इस विधा में भी ये कवि भाषा, छंद, तुक आदि सभी क्षेत्रों में नवीनता के समर्थक हैं। गजल और सॉनेट पर इन कवियों के अत्यंत अल्प विचार मिलते हैं। उपलब्ध विचारों के आधार पर कहा जा सकता है कि हिंदीतर इन विधाओं को ये कवि भारतीय स्वभाव देकर ही अपनाने के समर्थक हैं।

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वस्तुत: एक नए काव्यशास्त्र या काव्यदृष्टि की मांग का सिलसिला बाद के साहित्य अर्थात अब तक के साहित्य की सभी विधाओं के साहित्य में कमोबेश चल रहा है। आज साहित्य में नारी-विमर्श, दलित-विमर्श, आदिवासी-विमर्श, प्रवासी –विमर्श प्रमुखता से अपने-अपने नए सौंदर्यशास्त्र की मांग में जुटे हैं। इस कड़ी में मैं बालक-विमर्श को भी जोड़ना चाहूंगा। ये तमाम विमर्श बुनियादीतौर पर नारी, दलित, आदिवासी, प्रवासी और बालक के प्रति नई दृष्टिजन्य नई मन:स्थिति का ही परिणाम हैं और तब नई भाषा, नए शिल्प के प्रेरणादायी जनक भी हैं।

यहां उल्लेखनीय है कि हम सब जानते हैं कि कोई भी नई काव्य-प्रवृत्ति अपनी युगीन परिस्थितियों की वजह से जन्म लिया करती है और इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब आसपास का संसार बदलता है तो उस बदलाव की वजह से ‘बोध’ में भी परिवर्तन आता है, तो भी नई होकर भी अर्थात कितनी भी नई होने के बावजूद अपनी काव्य-परम्परा का सूत्र थामकर ही चलती है। अत: रचना और रचना-दृष्टि अथवा रचना-शास्त्र में उनकी परम्पराओं की अनुगूंजें न उपलब्ध होती हों, ऐसा संभव नहीं होता। वस्तुतः यह भ्रम कि नयी कविता परम्परा के सर्वथा विच्छिन्न है– अपनी निजी पहचान बनाने के उत्साह में नये कवियों द्वारा दिये गये वक्तव्यों से ही प्रचलित/प्रचारित हुआ। बाद में, अनेक कारणों से इन कवियों को परम्परा से अपने संबंध को स्पष्ट करना पड़ा। अजित कुमार ने लिखा- “प्रत्येक रचना में कुछ-न- कुछ नया होता ही है और साथ ही उसमें ऐसा भी कुछ होता है, जिसके नाते हम उसे पहले की कविता के साथ जोड़कर सापेक्षिक बना सकते हैं।“ ( कविता का जीवित संसार, पृ0 30)। अज्ञेय को स्पष्ट लिखना पड़ा –“नयी कविता न तो परम्परा की अंध पूजा करती है और न उसके विरुद्ध हीन-ग्रंथि युक्त निरर्थक विद्रोह। वह परम्परा को आत्मसात कर उसे नये स्तर पर प्रतिष्ठित करती है, नयी दिशा में मोड़ती है।“ (नयी कविता(अंका 2), सं जगदीश गुप्त, 1955, पृ. 49)। एकाध अपवाद को छोड़कर नया कवि न तो परम्परा के पूर्ण त्याग की बात करता है, न ही उसके अन्धानुकरण का समर्थन करता है। यह बात अलग है कि परम्परा के प्रति अपने दृष्टिकोण को नये कवियों ने अलग-अलग ढंग से व्यक्त किया है। निजी विचारगत या भावगत नवीनता को नये कवि अपनी पूरी काव्य-परम्परा से एकदम अलग-थलग करके नहीं देखते। यह संकेत करना अप्रासंगिक न होगा कि नये कवियों में प्रगतिशील धारा के कवियों के लिए नवीन या आधुनिक विचार या बोध से तात्पर्य प्रगतिशील विचारधारा तथा प्रगतिशील ताकतों को महत्त्व देना है। उसी

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नजरिये से काव्य की वस्तु और शिल्प पर वे विचार भी करते हैं। परम्परा और प्रयोग अथवा नए भावबोध जन्य आधुनिकता के भेद को कवि विजयदेव नारायण साही के कथन से समझना और भी दिलचस्प होगा। वे लिखते हैं—“ जब मेरे पिता मुझसे कहते हैं कि मेरे बाबा ने क्या काहा था तो वह परम्परा है। जब मैं स्वयं कहता हूं कि मेरे बाबा ने क्या कहा था तो यह प्रयोग है।“ (तीसरा सप्तक, पृ0 177)। तात्पर्य यह है कि नया कवि अपने वास्तविक वजूद या अस्तित्व और स्वविवेक का दखल अपने हर आचरण में जरूरी समझता है। इस बात को आज प्रचलित विमर्शों पर लागू करके देखा जा सकता है।

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