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हिंदी और मराठी की समान रूपी भिन्‍नार्थी शब्‍दावली

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हिंदी और मराठी की समान रूपी भिन्‍नार्थी शब्‍दावली

सुषमा लोखंडे, 
मराठी भाषा अध्‍यापिका, 
 म. गां. अं. हिं. वि. वर्धा, (महाराष्‍ट्र)
 ई-मेल - Susoju456@gmail.com

भारत एक बहुभाषी देश है । संसार के भाषा परिवार में से भारत में मुख्‍यत: चार परिवारों की भाषाएं बोली जाती हैं । जिसमें भारोपीय, द्रविड़, चीनी एवं एशियाटिक इनका समावेश है । हिंदी और मराठी भारोपीय परिवार में बोली जाने वाली भाषाएं हैं । दोनों आधुनिक भाषाएं हैं, इन भाषाओं के साथ संस्‍कृत का संबंध ऐतिहासिक है । हिंदी और मराठी को संस्‍कृत परिवार की भाषाएं कहा गया है । दोनों भाषाएं संस्‍कृतोदुभव मानी जाती हैं । दोनों भाषाओं की लिपि देवनागरी है, दोनों पर संस्‍कृत भाषा का अत्‍यधिक प्रभाव होने के कारण दोनों में समानताएं मिलती हैं । पर न्‍ड भाषा एक व्‍यवस्‍था है । हर भाषा की अपनी विशिष्‍टता होती है और इस विशिष्‍टता के कारण एक भाषा दूसरी भाषा से कई रूपों में अलग-अलग होती है । हिंदी और मराठी दोनों संस्‍कृतोद्भव भाषाएं हैं, उनकी लिपि एक है, दोनों एक ही परिवार से हैं । फिर भी प्रवृत्ति अलग होने के कारण दोनों भाषाओं में असमानताएं भी मिलती हैं । इसका अर्थ यह हुआ दो भाषाओं में केवल आंशिक समानता की आशा की जा सकती है ।

हिंदी और मराठी दोनों आर्य परिवार की दो प्रमुख भाषाएं हैं । दोनों पर संस्‍कृत का अधिक प्रभाव होने के कारण दोनों में समानताएं मिलना स्‍वाभाविक भी है, पर दोनों में भाषाओं की प्रवृत्ति अलग होने के कारण दोनों में असमानताएँ भी मिलती हैं , ये असमानताएँ भाषा के प्रत्‍येक स्‍तर पर दिखाई देती हैं । जहां समानताएँ हैं वहां अन्‍य भाषा शिक्षण में कोई कठिनाई नहीं होती किंतु जहां दोनों भाषाओं में अंतर है, वहां अन्‍य भाषा शिक्षण में व्‍याघात उपस्थित होता है । हिंदी तथा मराठी में शब्‍द स्‍तर पर कहीं समानता है तो कहीं पर्याप्‍त अंतर है । प्रत्‍येक भाषा का वैभव उसकी शब्‍द संग्रह से सिद्ध होता है, शब्‍द के माध्‍यम से ही हम जीवन संबंधी नए विचार, नए अनुभव प्रस्‍तुत कर सकते हैं । शब्‍द विश्‍व की समस्‍त भाषाओं का आधार है ।

हिंदी और मराठी दोनों भाषाओं की शब्‍दावली विभिन्‍न स्रोतों से आई है । आर्य परिवार की भाषाएं होने के कारण दोनों पर संस्‍कृत का अधिक प्रभाव है । उत्‍तरी भारत में मुसलमानों का कई शताब्दियों तक शासन होने के कारण अरबी, फारसी का प्रभाव भी दोनों भाषाओं पर दिखायी देता है। अंग्रेजों ने भारत पर दो शताब्दियों तक शासन किया, उस समय संपूर्ण भारतीय भाषाओं पर अंग्रेजी का प्रभाव पड़ा । इस प्रकार दोनों भाषाओं की शब्‍दावली के विभिन्‍न स्रोत हैं । इसी कारण दोनों भाषाओं में समानताओं के साथ विषमताएं भी हैं । शब्‍दस्‍तर पर ये समानताएं और विषमताएं मुख्‍य रूप से मिलती हैं । दोनों भाषाओं की शब्‍दावली, ध्‍वनि व्‍यवस्‍था, उच्‍चारण प्रक्रिया, व्‍याकरणिक प्रक्रिया, उपसर्ग, प्रत्‍यय, वाक्‍य रचना आदि पर अरबी-फारसी तथा अंग्रेजी का प्रभाव पड़ा ।

अन्‍य भाषा-शिक्षण में हिंदी-मराठी के अध्‍येता को शब्‍दों के अर्थगत, उच्‍चारणगत एवं वर्तनीगत विषमताओं से अवगत कराना आवश्‍यक हो जाता है । दोनों भाषाओं में कुछ ऐसे शब्‍द हैं जिनका रूप समान है परंतु शब्‍दों के अर्थ भिन्‍न हैं, दोनों भाषाओं में संस्‍कृत, प्राकृत, अंग्रेजी, अरबी, फारसी, पुर्तगाली, डच, कन्‍नड, तमिल, गुजराती, उडिया आदि भाषाओं के शब्‍द मिल जाते हैं । दोनों भाषाओं में कई ऐसे शब्‍द है जिनकी वर्तनी समान है परंतु दोनों का उच्‍चारण अलग है । कुछ ऐसे भी शब्‍द है जिनकी वर्तनी भिन्‍न होते हुए भी दोनों भाषाओं में उनका उच्‍चारण समान है उदाहरण – घोड़ा । दोनों भाषाओं में कुछ ऐसे भी शब्‍द हैं जिनकी वर्तनी और उच्‍चारण में थोड़ा-थोड़ा अंतर है । कुछ अपवादों को छोड़कर मराठी में शब्‍द के अंत में ह्स्‍व ‘इ’ कार तथा ‘उ’ कार को दीर्घ लिखने की प्रथा है, हिंदी में वही शब्‍द ह्स्‍व लिखे जाते हैं ।

हिंदी तथा मराठी में कुछ शब्‍द ऐसे हैं जिनकी वर्तनी तथा स्रोत एक होने पर भी उनके अर्थ में भिन्‍नता है । मराठी सीखने वाले हिंदी भाषा के छात्र जब अपनी भाषा में रूढ़ अर्थ को ध्‍यान में रखते हुए ऐेसे शब्‍दों का जब मराठी में प्रयोग करते हैं तब शब्‍दों के साथ-साथ वाक्‍य का अर्थ भी बदल जाता है ।

उदाहरण – त्‍याला शिक्षा दे

हिंदी भाषी विद्यार्थी उक्‍त वाक्‍य में ‘शिक्षा’ शब्‍द का स्‍वभाषागत रूढार्थ ही लेते हैं । लेकिन मराठी में ‘शिक्षा’ शब्‍द का अर्थ ‘सजा’ देना है । इससे पूरे वाक्‍य का अर्थ बदल जाता है । इस अर्थ परिवर्तन से बचने के लिए हिंदी भाषी विद्यार्थी को ऐसे शब्‍द जिनका रूप समान होते हुए भी दोनों भाषाओं में जिनके अर्थ भिन्‍न है उनका परिचय देना आवश्‍यक हो जाता है । नीचे कुछ ऐसी शब्‍दावली दे रहें हैं जो समान रूपी हैं लेकिन जिनके अर्थ में भिन्‍नता के कारण शब्‍दों के प्रयोग में होने वाली गलतियों से बचा जा सकता है –

शब्‍द हिंदी अर्थ मराठी अर्थ

अंदाज ढंग, ढब, अदा अनुमान

अक्‍का माता, माँ दीदी, बड़ी बहन

अकाली सिक्‍खों का एक संप्रदाय असमय

अगाऊ पेशगी, आगेका पहले का

अटक रुकावट, रोक, अड़चन गिरफ्तार

अनाड़ी अज्ञान, अकुशल अनपढ़

अपेक्षा किसी की तुलना में आकांक्षा, चाह

अभ्‍यास किसी काम को बार-बार करना, आदत अध्‍ययन

अमल क्रिया, व्‍यवहार सत्‍ता, शासन

अवांतर बीच में स्थित, मध्‍यवर्ती अन्‍य, दूसरा

अहेर शिकार भेंट, सौगात

आई आना, इस क्रिया का स्‍त्री वाची माता, माँ

भूतकालीन रूप

चारी आचारवान, सदाचारी रसोइया

आपण बाजार, दुकान हम, आप

आर शत्रुता, घृणा अजगर,सुस्‍त व्‍यक्ति

आला ताक, ताखा आया

आली सखी, सहेली आयी

इयत्‍ता परिमित, सीमा वर्ग, कक्षा

उजाड ध्‍वस्‍त, उजड़ा हुआ वीरान, निर्जन

उतराई उतरना कृतज्ञ

उतारा नदी पार करने की क्रिया अनुच्‍छेद

उपहार भेंट नास्‍ता

उपाधी उपद्रवी, उत्‍पाती पदवी

उशी चाहना, इच्‍छा तकिया

उशीर खस देर, विलंब

ऊन भेंड़ के कोमल बाल धूप

ऊब उबना गरमाहट

ओटा परदे के लिए बनी दिवार चबूतरा

ओटी कपास ओटने की चरखी स्‍त्री की गोद भरना

ओला हिम के कण गीला

ओस शबनम निर्जन,विरान

ओसरी अवसर, बारी बरामदा

कंस कांसा, एक माप कोष्‍ठक

कट काट, तराश षडयंत्र

कटाव काट व्‍य‍वस्थित, स्‍थायी

कड गूंगा, कर्कश पक्ष लेना

कड़ा सख्‍त, कठोर पहाड की ढलान

कणा पीपल रीढ

कद देह की ऊँचाई, लंबाई रेशम की धोती

कदर आरा, अंकुश मान, योग्‍यता

कपाट दरवाजा अलमारी

कपार कपाल पहाड़ की खोंड़र

करडा कड़ा, कठोर धूमिल

करील एक कटीला पेड़ करेगा

कल बीता हुआ या आने वाला दिन झुकाव

काऊ कभी, कोई कौआ

काठ चट्टान, पत्‍थर किनारा

कात भेंड़ों के बाल काटने की कैंची कत्‍था

काना एकाक्ष खड़ी पाई

काल अकाल बीता हुआ दिन, कल

काला कोयले के रंग का श्रीकृष्‍ण चंद्र का प्रसाद

कासार तालाब चूडि़या पहनाने वाला

किल्‍ला खूंटा, मेख गढ़, किला

किल्‍ली खूंटी चावी,चाभी

कीस थैली बुरादा

कुठला अनाज रखने का बड़ा पात्र कहाँ का

कुंडी पत्‍थर का बना गोला गमला

कुशी फाल करवट, गोद

केला केला किया

कोठी हवेली अनाज का भंडार

कोड संकेत प्रणाली कोढ़

खचित अंकित जडाऊ

खड़ा सीधा ऊपर को उठा हुआ, लंबरूप कड़क

खत पत्र खाद

खवा कंधा खोया, खोवा

खाक धूल, मिट्टी जलकर नष्‍ट होना

खांड मिसरी टुकड़ा

खात खोदना गड्ढा

खाली रिक्‍त नीचे

खून लहू हत्‍या

खोटा सदोष झूठा

खोल ‘खोलना’ क्रिया का रूप गहरा

खोली तंग कोठरी गहराई, कमरा

गड़बड़ अव्‍यवस्‍था धूमधाम

गत बीता हुआ अवस्‍था, दशा

गर्द धूल घना

गनीमत बड़ी बात लूप

गड़ ओट, घेरा किला

गप्‍प इधर-उधर की बाते चुपचाप

गलका छाले जैसा फोड़ा शोर, कोलाहल

गश्‍ती पहरेदार आदेश-पत्र

गार गाली, गड्ढा ठंढा

गुंगी न बोलने वाली मूर्च्‍छा, नशा

गुंडी गेंडुरी, सूत की लच्‍छी बटन

गेंद कपडे, रबर से बना खेल का गोला गेंदे का फूल

गोठा सलाह गोशाला

घट घड़ा नुकसान, घटाई

घट्ट घाट मजबूत

घड़ी घड़ी, समय बताने वाला यंत्र कपडे को

घाट गर्दन का निचला भाग घॉटी

घाम कठिनाई पसीना

घाल ग्राहक को तौलने के बाद दी जाने वाली जीच डालना

घास तृण, पशुओं का चारा निवाला

चकना चकित काना

चक्‍का पहिया थक्‍का

चकाचक तर-बतर चमकना

चटक चमक, चटकने की क्रिया आदत

चटकन तमाचा तुरंत

चट्टा चेला, शिष्‍य फफोले का दाग

चरक दूत चरख (गन्‍ने का)

चरी चरागाह खंदड, छोटी सी गली

चाव एक तरह का बॉस चबा

चारा उपाय घास

चिकित्‍सा इलाज पूछताछ

चीनी शक्‍कर चीन देश का व्‍यक्ति

चूल बाल, चोटी चूल्‍हा

चेष्‍टा प्रयत्‍न हास्‍य, विनोद

चोख तेजी शुद्ध, निर्मल

चौपट तबाह चौगुना

जंग लड़ाई मोरचा

जकात दान, खैरात आयातकर

जड़ मूल भारी, वजनदार

जवस घास अलसी

जरब आघात छाप, प्रभाव

जलसा सभा, बैठक नृत्‍य–गान की सभा

जाड़ा शीतकाल मोटा

जाते जाना क्रिया का रूप चक्‍की

जरी सुनहरे तारों का बना हुआ यदि

जिला चमक, जिला जिसे

जीना जिंदा रहना सीढियां

झाड़ झाड़ने की क्रिया पेड़

झाला राजपूतों का भेद हो गया

झोका तेज हवा झूला, दोला

झोपा गुच्‍छा ‘सोना’ क्रिया का रूप

टर घमंड मजाक, अपमान

टोक रोक नोंक

टोला छोटी बस्‍ती फटका

ठेका अड्डा ताल, ठेका

डाल वृक्ष की शाखा बांस की टोकरी

ढेरी राशि बड़ा पेट

तड़क तड़कना सीधा, एकदम

तमा रात्रि पर्वाह

तलखी कडुवाहट, उग्रता घमका, ऊमस

तलफ नष्‍ट, तबाह सनक

तसला बड़ा और गहरा बरतन वैसा

तह परत समझौता, सुलह

ताई ताऊ की पत्‍नी बड़ी बहन

ताक पर छाछ

ताप गरमी बुखार

तालीम शिक्षा व्‍यायाम शाला

तुबा कद्दू लकड़ी की तुंबी

तेरा तुम्‍हारा तेरह

तो तब वह

थर स्‍थल, जगह स्‍तर

थारा तुम्‍हारा आश्रय

थोर थोड़ा, अल्‍प श्रेष्‍ठ

दंड डंडा अर्थदण्‍ड

दगड लड़ाई का डंका पत्‍थर

दरार फटा हुआ धाक, आतंक

दरी बिछाने की दरी घाटी

दव जंगल में स्‍वत: लगने वाली आग हिम, ओस

दहा ताजिया दस

दक्षता निपुणता, कुशलता सावधानी

दाखला प्रवेश उपमा, उदाहरण

दादा पिता के पिता बड़ा भाई

दार दरार दरवाजा

धावा हमला, चढाई क्रिकेट के रन

धड़ा बाट, तुला पाठ्, नियम

नवल नवीन आश्‍चर्य, कारक

नाती पोता रिश्‍ता

नाव नौका नाम, नौका

निकाल निकालना परिणाम

नेम नियम निशान

पचनी जंगली निंबू पचन होना

पत्‍ता पेड़ का पत्‍ता पता

पतरला म्‍यान वापस आ गया

परवा चिंता फिक्र

पाट विस्‍तार लकडी का आसन

पाना प्राप्‍त करना नट खोलने का यंत्र

पाशी वरूण, यम पास, समीप

पीक पान का थूक फसल

पिल्‍ला कुत्‍ते का बच्‍चा छोटा बच्‍चा

पीठ पीठ आटा

प्रकृति निसर्ग स्‍वास्‍थ्‍य

प्रद्यात मारण परंपरा

फाटका सट्टा फटा हुआ

फिर बाद में घूमना

बकला छिलका व्‍यर्थ की बड़-बड़

बगल समीप, पार्श्‍व कॉख

बस पर्याप्‍त बैठ

बस्‍ता बंधा हुआ गल्‍ला

बरा वट वृक्ष ठीक, अच्छा

बक्षीस ईनाम परितोषिक

बाट वजन, पत्‍थर कलंक, दोष

बोट नाव उंगली

भट सैनिक उपाध्‍याय, ब्राम्‍हण

भटई झूठी तारीफ बैंगन का एक प्रकार

भाऊ प्रेम, भाव भाई

मान परिभाषा, प्रतिष्‍ठा गर्दन, प्रतिष्‍ठा

मुरब्‍बी पालन करने वाला अनुभवी

मूल जड़ संतान

मेला मेला मर आया

मैल मल मील, आधा कोस

मोटा स्‍थूल बड़ा

या संदेह, अथवा अगर

यात्रा प्रवास तीर्थयात्रा

रंगत हालत, दशा सजावट

राई सरसों वृक्षों की पंक्ति

राग रंजन क्रोध

राजी सहमत प्रसन्‍न

राजीनामा समझौता त्‍यागपत्र

रूसवा अपमानित रूठन, नाराजगी

रोप रोपण छोटा पौधा

लगन मन, प्रवृत्ति का किसी ओर लगाना विवाह

लादी बोझ फरसी

वर्दी पोशाक संदेशा

वर चुनाव , पसंद आर्शिवाद, दुल्हा

वारा किफायत हवा

वीज बीया ,मूल कारण बिजली

वीजन पंखा बैठक

वीटा एक खेल ईंट का बहुवचन

शिस्‍त मछली पकड़ने का कांटा अनुशासन

शिक्षा शिक्षण सजा, दंड

शेर गजल के दो चरण एक प्रमाण

संचार भ्रमण काया प्रवेश

सदर छाती, सीना सीमा, हद

सराव ढक्‍कन अभ्‍यास

सरी छोटा सरोवर एक अभूषण

स्‍वस्‍थ्‍य तंदुरूस्‍त शांत, चुपचाप

सही दोषरहित हस्‍ताक्षर

साठा ऊख, ग न्‍ना संग्रह

साठी धान की एक किस्‍म के लिए

संसार दुनिया गृहस्‍थी

साथ सामप्ति मलाई

साधी साधक सामान्‍य

सारा संपूर्ण, समस्‍त लगान

साहित्‍य वाड्.मय सामग्री

सुना एक पेड़ बहुएं

हट्टी दूकान, बाजार हठीला, जिद्दी

हरकत गति, चेष्‍ठा रोकना, रूकावट

हार पराजय माला

होल अवस्‍था आपदा, कष्‍ट

अक्षत अखंडित कुमकुम मिश्रित चावल के दाने

दोनों भाषाओं की प्रकृति अलग-अलग है इसलिए दोनों भाषाओं में समानता के साथ-साथ असमानताएं भी प्रत्‍येक स्‍तर में दिखाई देती है । भाषा-शिक्षण में ये असमानताएं बाधाएं उत्‍पन्‍न करती हैं । इन भाषाओं का अध्‍येता यदि इन असमानताओं को नहीं समझेगा तो भाषा अध्‍ययन में बाधाएं उत्‍पन्‍न होंगी । अनेक गलतियों के शिकार हो जाएंगे । अगर उनके सामने दोनों भाषाओं की तुलना करके उसमें प्राप्‍त समानताओं तथा विषमताओं को स्‍पष्‍ट कर दें तो अध्‍येता लेखन – वाचन एवं उच्‍चारण में गलतियां नहीं करेगा, वह दोनों भाषाओं की विषमताओं को ठीक तरह से समझ सकेगा तथा मराठी मातृभाषि‍ओं को हिंदी शिक्षण तथा हिंदी मातृभाषियों को मराठी शिक्षण सुगम होगा ।

संदर्भ – ग्रंथ सूची –

  1. बृहत् हिंदी कोश – सं. कालिका प्रसाद राजवल्‍लभ सहाय, मुकुन्‍दीलाल श्रीवास्‍तव – ज्ञान मंडल लिमिटेड, वाराणसी, चतुर्थ संस्‍करण
  2. हिंदी और मराठी की व्‍याकरणिक कोटियाँ – अंबादास देशमुख अतुल प्रकाशन, कानपुर 1990 प्रथम
  3. हिंदी और मराठी की समान स्रोतीय भिन्‍नाथी शब्‍दावली डॉ. रामानुज गिलडा, नीरज बुक सेंटर, दिल्‍ली – 92
  4. मराठी से हिंदी शब्‍द संग्रह – ग.र. वैशंपायन
  5. मराठी – हिंदी शब्‍दकोश – सं. श्री.ह. अ. भावे वरदा प्रकाशन, पुणे
  6. सुलभ हिंदी- मराठी कोश – सं. य. रा. दाते, प्र. केशव भिकाजी ढवळे, मुंबई – 4
  7. भारत के भाषा – परिवार – राजमल बोरा, आलेख, दिल्‍ली

शैली की उपयोगिता एवं महत्ता

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शैली की उपयोगिता एवं महत्ता

  • श्रीमती अंजू श्रीवास्तव

किसी भी रचना में उसे लिखने वाले या रचना करने वाले का जब तक व्यक्तित्व समाहित न हो तब तक उस में वो अर्थ नहीं आ सकता जो उसे उसका उचित स्थान दिला सके। तात्पर्य यह है कि किसी भी उत्तम कोटि की रचना में उसकी रचना करने वाले का व्यक्तित्व झलकता ही है। उस रचना में अर्थों के प्रयोग ,भाषा वैशिष्ट्य आदि रचनाकार के व्यक्तित्व योग्यता कला आदि से ही समझा जा सकता है। इसी व्यक्तित्व के प्रस्फुटन को विद्वानों ने शैली नाम दिया है।

श्रेष्ठ और कालजयी रचना वही है जो बता दे कि यह अमुक व्यक्ति की रचना है। समाज पुस्तक के बजाय व्यक्ति को ज्यादा याद रखता है अतः व्यक्ति की छाप से पुस्तक भी अमर हो जाती है। रामचरितमानस यद्यपि प्रसिद्ध राम कथा पर आधारित है किंतु घर घर में रामायण के स्थान पर रामचरितमानस की पूजा होती है क्योंकि वह समन्वय के सम्राट तुलसीदास की रचना है।

प्रसाद की कामायनी, शुक्ल की चिंतामणि ,प्रेमचंद्र के कथा साहित्य, निराला की राम की शक्ति पूजा , आदि रचनायें स्पष्ट रूप से अपने रचनाकार को उजागर कर देती हैं यही विधा शैली कहलाती है।

शैली की परिभाषा

संस्कृत के विद्वानों ने शैली की स्वतंत्र रूप से कोई व्याख्या नहीं की है किंतु भाषा, अलंकार, शब्द-शक्ति , वक्रोक्ति, रीति, छंद, गुण, दोष आदि का तो विस्तार से विवेचन किया है, पर शैली के विषय में वे मौन रहे है। दरअसल संस्कृत साहित्य ने प्रत्येक रचनाकार को अपना व्यक्तित्व प्रस्तुत करने के लिये स्वतंत्र छोड़ दिया है और उसे किसी सिद्धांत के दायरे में नहीं बांधा है। उनकी दृष्टि में शैली प्रतिभा के अंतर्गत ही है। शैली को आधार बनाकर पाश्चात्य विद्वानों ने इस पर काफी विचार किया है और लिखा है।

प्रमुख पाश्चात्य विद्वानों की शैली परिभाषाऐं प्रस्तुत है-

  1. प्लेटो – जब विचार को रूप दिया जाता है,तभी शैली का जन्म होता है।
  2. MWk- tkWulu – हर व्यक्ति एक विशिष्ट शैली को अपनाता है।

3. शोयप हार्बर- किसी भी कृतिकार की शैली उसके मस्तिष्क की विश्वसनीय प्रतिलिपि होती है।

4. चेस्टरफील्ड – विचारों के परिधान को शैली कहते है।

5. न्यूमैन – भाषा के अंतर्गत संरचना ही शैली है।

6. एलिस – स्वयं विचार ही शैली है।

7. बूर्फो – विचार – क्रम तथा विचार-गति को शैली कहते है।

8. प्राउस्ट- शैली एक तकनीक का प्रश्न नहीं, अतितु यह दृष्टि का प्रश्न है।

9. स्वेन- शैली भाषा और विचार दोनों में ही विद्यमान रहती है।

10. शेरन – किसी भी कलात्मक अभिव्यक्ति में व्यक्तिव की विद्यमानता को शैली कहते है।

11. मरी – भाषा के उस वैशिष्टय को शैली कहते है, जो भावों और विचारों को उचित ढंग से प्रेषित करता है।

हिन्दी के समीक्षकों और विचारकों ने भी शैली की परिभाषाऐं प्रस्तुत की है, उनमें कुछ प्रमुख निम्न प्रकार है-

1. डॅा. श्यामसुन्दर दास – किसी कवि या लेखक की शब्द – योजना, वाक्यांशें का प्रयोग वाक्यों की बनावट और उनकी ध्वनि आदि का ही शैली है।

2. डॅा गुलाबराय – शैली शब्द के दो – तीन अर्थ है- एक तो वह अर्थ है, जिसमें कि यह कहा जाता है कि शैली ही मनुष्य है वहां इस अर्थ में शैली, अभिव्यक्ति का वैयक्तिक प्रकार है। दूसरे अर्थ में शैली अभिव्यक्ति के सामान्य प्रकारों को कहते है। भारतीय समीक्षाशास्त्र की रीतियां इसी अर्थ में शैलियां है । तीसरे अर्थ में शैली , वर्णन की उत्तमता को कहते हैं, जब हम किसी रचना के सम्बन्ध में कहते हैं – यह है शैली या किसी की अलोचना करते हुए कहते हैं कि यह क्या शैली है? वे क्या जानें कि शैली क्या है ?तब हम इसको इसी अर्थ में प्रयुक्त करते हैं। शैली में न तो इतना निजीपन हो कि वह सनक की हद तक पहुच जाये और न इतनी सामान्यता हों कि वह नीरस और निजींव हो जाये। शैली अभिव्यक्ति के कुछ गुणों को कहते हैं, जिन्हें लेखक का कवि अपने मन के प्रभाव को समान रूप में दूसरों तक पहुचाने के लिए अपनाता है।

3. रामदहिन मिश्र – किसी वर्णनीय विषय के स्वरूप को खडा़ करने के लिए उपयुक्त शब्दों के चुनाव और उनकी योजना को शैली कहते हैं ।

4. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भावों को प्रधानता दी है किंतु उन्होंने बिना शैली के किसी रचना को उत्तम कोटि का नहीं माना है। वस्तुतः शुक्ल जी ने शैली को विशेष रूप् से ही देखा है उनके अनुसार समय के अनुरूप् अपने उदात्त विचारों को इस प्रकार प्रस्तुत करना कि जो वह कहना चाहता है वह दूसरों तक पहुंच जाये अर्थात् विचारों का प्रभावी यथार्थ रूप् में दूसरों तक पहुंचाना ही शैली है।

5. डॅा.नगेन्द्र – साहित्य एवं साहित्यशास्त्र की प्रायः दृष्टि से शैली के तीन अर्थ होते हैं

1. शैली कृतिकार के व्यक्तित्व के वैशिष्ट्य का सहज गुण है।

2. शैली विषय प्रतिपादन की प्रविधि है, और

3. शैली कलात्मक अभिव्यक्ति है इस प्रकार यह साहित्य की चरम उपलब्धि है।

भाषा – वैज्ञानिकों के अनुसार शैली के चार अर्थ हैं

1. व्यक्ति – सापेक्ष भाषिक – चयन को शैली कहते है।

2. प्रासंगिक मानक भाषा से विपथन को शैली कहते हैं ।

3. प्रभावी अभिव्यंजना शैली कहलाती है, और

4. असामान्य, अतक्र्य भाषिक को शैली कहते हैं ।

क्ल मिलाकर शैली से तात्पर्य अपने व्यक्तित्व को काव्य तत्वों के दायरे में रहकर पूरी तरह प्रस्तुत करना कि रचना का प्रयोजन भी पूर्ण हो जाये वही शैली है।

इसी शैली के रहस्य समझने के लिये जिन सिद्धांतों का पालन किया जाता है उसे शैली विज्ञान कहा जाता है। शैली – विज्ञान का परिचय देते हुए डॅा. भोलानाथ तिवारी ने लिखा है- ‘‘एक भाषा – भाषी व्यक्तियों की भाषा, ध्वनि, शब्द, रूप तथा वाक्य -रचना आदि की दृष्टि से पूर्णतः समान नहीं होती । इसी प्रकार एक ही भाषा में लिखने वाले लेखकों एवं कवियों की भाषा में उनकी कुछ शैलीगत विशेषताए होती हैं, जिनके आधार पर बताया जा सकता हैं कि कौन किसकी रचना है। इन वैचारिक अन्तरों या शैलीगत विशेषताओं या काव्य- भाषा का अध्ययन शैली-विज्ञान का विषय है।

प्रत्येक व्यक्ति का अपना व्यक्तित्व तथा अपनी कार्य-शैली होती है। कार्य-शैली से तात्पर्य काम करने के ढंग से है। सभी के काम करने अर्थात् बोलने चालने आदि का अपना ढंग होता है। इसी कारण कुछ लोगों का चेहरा देखे बिना उनकी चाल से अथवा उनकी बातचीत के ढंग पहचान लिया जाता है। लेखकों और कवियों में भी भाषा के प्रयोग का अपना अलग ढंग होता हैं, जिससे उनकी रचना पहचान ली जाती है। इसी आधार पर अंग्रेजी की कहावत – ‘‘ स्टाइल इज दी मैन हिमसैल्फ ’’ ( style is the man himself) अर्थात् मनुष्य स्वयं एक शैली है, प्रचलित हुई है। अंग्रेजी के स्टाइल style शब्द के बदले हिन्दी में शैली शब्द का प्रयोग उचित बताते हुए डॅा. द्वारिका प्रसाद सक्सेना ने लिखा है कि, शैली विज्ञान मूलतः शैली का विज्ञान है, जिसमें शैली का वैज्ञानिक ढंग से अथवा व्यवस्थित रूप में अध्ययन किया जाता है। यह शैली शब्द अंगे्रजी के स्टाइल शब्द का अनुवाद है। कुछ विद्वानों ने अंग्रेजी में स्टाइल शब्द के लिए रीति कहना उपयुक्त माना है। परन्तु रीति शब्द रचना- विधि या गमन-विधि का वाचक होने के कारण स्टाइल के सम्पूर्ण अर्थ का द्योतक नहीं है, अपितु इसमें वक्ता वक्तृत्व -पद्धति लेखन की अभिव्यंजना पद्धति , उसकी वैयक्तिक विशेषता विषय -विवेचन की प्रविधि , व्यक्ति के आचार- व्यवहार का ढंग , बोलने या बातचीत करने का लहजा ,किसी कवि या लेखक के मस्तिष्क में उठने वाले भावों या विचारों के प्रतिरूप आदि का भी समावेश रहता है । अतः स्टाइल को रीति कहना कदापि सम्भव नहीं है। इसी कारण पं0 रामदहिन मि़त्र ने स्पष्ट लिखा है। कि शैली के लिए रीति शब्द का प्रयोग होता है। पर यह यथार्थ नहीं , शैली शब्द के लिए style शब्द का प्रयोग होना उपयुक्त माना जाता है। इसको भाषा-शैली भी कहते हैं । भाषा-शैली भावानुरूप होना चाहिए। भावनाए अपने आकार को प्रस्तुत करने के लिए काव्यांगों -गुण, रीति, अलंकार, वक्रोक्ति आदि को अपनाती है। इसमें रीति व भाषा-शैली लेखक के भावनात्मक शरीर को पहनाई हुई पोशाक ही नहीं है, बल्कि उसे उसकी चमड़ी समझना चाहिए। इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि कलाकार का व्यक्तित्व भाषा शैली से फूट पड़ता है।

शैली-विज्ञान को भाषा-विज्ञान के विभाग अथवा शाखा के रूप में प्रस्तावित करने के लिए चाल्र्स वेली का नाम लिया जाता है। चाल्र्स वेली को रैशनल स्टाईलिस्टिक्स (rational stylistics) का जन्मदाता स्वीकार माना जाता है। डॅा. द्वारिका प्रसाद सक्सेना ने शैली – विज्ञान के पाच भेद किए हैं और प्रत्येक का परिचय संक्षेप में इस प्रकार दिया है-

1. ध्वनि-शैली -विज्ञान – इसके अंतर्गत ध्वनि-विचलन, ध्वनि,-चयन, ध्वनि-प्रकाश, ध्वनि- समानान्तरता, लय , ध्वन्य- अवस्था आदि का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है।

2. शब्द – शैली विज्ञान – इसके अंतर्गत शब्द विचलन , शब्द-चयन, शब्द-समानान्तरता, शब्दालंकारों में प्रयुक्त शब्दों के विचलन ,चयन आदि का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है।

3. रूप- शैली विज्ञान – इसके अन्तर्गत रूप-विचलन, रूप-चयन रूप-समानान्तरता आदि का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है।

4. वाक्य-शैली विज्ञान – इसके अन्तर्गत विविघ प्रकार के वाक्यों, मुहावरों लोकोक्तियों आदि में प्राप्त विचलन, चयन, समानान्तरता आदि का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है।

5. अर्थ-शैली-विज्ञान- इसके अन्तर्गत अर्थ विचलन, अर्थ-चयन, अर्थ समानान्तरता के साथ साथ अर्थालंकारों में प्राप्त विचलन, चयन एवं समानान्तरता का वैज्ञनिक अनुशीलन किया जाता है।

इन सभी भेदों में विचलन, चयन और समानान्तरता आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है। इनका अर्थ समझना आवश्यक है, जो निम्न प्रकार है-

1. विचलन – सामान्य भाषा के नियम को छोड़कर नये मार्ग पर गमन करना अथवा नवीन मार्ग पर चलना विचलन है। विचलन शब्द का अर्थ विशेष प्रकार प्रभाव को डालने में समर्थ गमन समझना चाहिए ।

2. चयन – अनेक समानार्थक शब्दों, ध्वनियों, वाक्यों आदि में से अपने मनोवांछित प्रभाव को डालने में समर्थ ध्वनि,शब्द या वाक्य आदि का निश्चय करना चयन है।

3. समानान्तरता -समान ध्वनिया शब्दों, वाक्यों, रूपों एवं अर्था का प्रयोग करना,समानान्तरता कहलाता है। समानान्तरता का लाभ यह है कि इसके कारण रचना में संगीतात्मकता, तथा नाद- सौन्दर्य का समावेश किया जा सकता है।

शैली की उपादेयता

शैली का साहित्य निर्माण में अपरिहार्य योगदान है। साहित्य किसी विषय पर लेखन ही नहीं है। प्रायः संसार में किसी भी विषय को एक व्यक्ति द्वारा ही नहीं समझा जा सकता है। कई बार हर विषय पर अलग अलग लोगों द्वारा अलग अलग दृष्टिकोण से ही उसे ठीक तरह से समझा जा सकता है। साहित्य यही कार्य करता है और विभिन्न रचनाकार ही अपने मत द्वारा सही प्रस्तुतीकरण कर सकते हैं। रचनाकार का अनुभव ही सही दृष्टि रख सकता है। क्या किसानों का यथार्थ चित्रण प्रेमचंद्र जैसा कोई कर सकता है? क्या राम जैसे मर्यादा पुरूषोत्तम का दर्शन तुलसी के अतिरिक्त करा सकता है? क्या विचारों का ऐसा संगुंफन डॅा. रामचंद्र शुक्ल के अतिरिक्त कोई कर सकता है? अर्थात् मानव मन के असीम भावों को एक रचनाकार नहीं समा सकता है अतः यह विविधता शैली के द्वारा ही आ सकती है।

शैली काव्य या रचना की सबसे बड़ी प्रेरणा है। प्रायः साहित्यकार किसी भाव के प्रति उसकी क्या सोच है यह दर्शाने के लिये ही वह रचना करने को प्रेरित होता है उसे अपने ही अंदाज में नये तरीके से प्रस्तुत करता है। हर घटना का परिणाम उसके अनुसार क्या होना चाहिये वह अपनी शैली में ही प्रस्तुत करता है। इस प्रेरणा के कारण ही साहित्य का असीम विस्तार हो जाता है और फिर भी उसके नवीन विस्तार के लिये गुंजाइश बनी रहती है।

न सिर्फ साहित्य वल्कि भाषा के विस्तार में भी शैली का अहम योगदान होता है क्योंकि कलापक्ष या भाषा ही उस भाव को प्रस्तुत करती है। भाव तो सभी में ऐक जैसे ही विद्यमान रहते हैं किंतु उनका साहित्य में प्रस्तुतीकरण भिन्न भिन्न होता है और उसको प्रस्तुत करने के लिये वह नये तरीके अपनाता है जिसके लिये वह भाषा में नये प्रयोग भी करता है और उसे विचित्र तरीके से परिवर्तित भी करता है। इस प्रयास में भाषा के भंडार का भी विस्तार हो जाता है।

ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में भी शिक्षक की शैली से काफी फर्क पड़ता है। विद्यार्थी के मानसिक स्तर के अनुरूप ही शिक्षक को स्वयं को बदलना होता है ताकि वह ठीक तरीके से विद्यार्थी को संतुष्ट कर सके।

उपरोक्त सभी परिस्थितियों में शैली का विशिष्ट स्थान होता है। अतः कहा जा सकता है कि साहित्य भाषा और ज्ञान एवं शिक्षा के क्षेत्र में शैली का अपरिहार्य स्थान है।

लेखिका

श्रीमती अंजू श्रीवास्तव

हिन्दी अध्ययनशाला विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन म-प्र-

C/O LIG/53 शिवानगर शिवपुरी म-प्र- 473551 7566605253

हिंदी भाषा शिक्षण हेतु वेब आधारित सामग्री का मूल्यांकन

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हिंदी भाषा शिक्षण हेतु वेब आधारित सामग्री का मूल्यांकन

संजय कुमार
पी-एच.डी. हिंदी (भाषा प्रौद्योगिकी)
भाषा प्रौद्योगिकी विभाग, भाषा विद्यापीठ
म.गां.अं.हि.वि. वर्धा

सार

पिछले दो दशक में प्रौद्योगिकी का विकास हुआ है वह बेशक असाधारण और आश्चर्यजनक रूप से निरंतर आगे बढ़ रही है। आज इंटरनेट का व्यापक उपयोग भाषा शिक्षण के लिए हो रहा है। अनेक अन्य भाषाओं के लिए नए-नए वेबसाइट डिजाइन किए जा रहे है। जहाँ मल्टीमीडिया और हाइपर्टेक्ट के माध्यम से कथ्य, ध्वनि, एवं वीडियों आदि की सहायता से भाषा का शिक्षण अधिगम किया जाता है। हिंदी भाषा के शिक्षकों द्वारा भी स्वीकार किया गया है कि यह भाषा और संचार के लिए प्रामाणिक स्रोत है। भाषा शिक्षण से संबंधित वेबसाइट बहुत ही सरल होती है। इंटरनेट सुविधा से युक्त विद्यार्थी सहज और सरल तरीके से भाषा अधिगम में समर्पित वेबसाइट पर लाँगऑन करके भाषा का अध्ययन कर हिंदी भाषा में प्रमाणिक जानकारी प्राप्त कर अप्रत्यक्ष रूप से अपनी लक्ष्य भाषा का अभ्यास कर सकते हैं।

इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य उन वेबसाइट का मूल्यांकन करना है, जो हिंदी भाषा अधिगम हेतु समर्पित है।

की-वर्ड-

इंटरनेट, वेबसाइट, भाषा शिक्षण।

प्रस्तावना

पिछले दो दशक में जिस गति से तकनीक विकसित हुई है, वह स्वीकार्य रूप से असाधारण एवं निरंतर चकित करने वाली है। हिंदी भाषा अधिगम हेतु पर्याप्त संख्या में अकादिमिक संस्थानों, शैक्षणिक संगठनों एवं व्यक्तियों ने वेबसाइट प्रकाशित किए हैं। शिक्षण संबंधी सॉफ़्टवेयर में भी एक क्रांतिकारी परिवर्तन यह हुआ है कि जो सॉफ़्टवेयर कल तक संगणक कार्यक्रम हेतु प्रयोग में लाए जा रहे थे वे अधिकाधिक सरल एवं संग्राह्य हो गए है। वही दूसरी ओर levy(1997) के अपने शब्दों में कहा है कि “हार्डवेयर और सॉफ़्टवेयर के तीव्र विकास ने शिक्षार्थीयों हेतु मूल्यांकन करने के लिए बहुत अल्प समय छोड़ दिया है, शिक्षा के क्षेत्र में तकनीक का निरंतर तीव्र विकास ने ठीक प्रकार से मूल्यांकन करने की क्षमता को भी बहुत पीछे छोड़ दिया है।”[1] तकनीकी के विकास के कारण एक से अधिक संख्या में वेबसाइट उपलब्ध है। एक उदाहरण यह है कि ‘भाषा शिक्षण या भाषा अधिगम’ को इंटरनेट के सर्च इंजन पर डालते ही इंटरनेट एक से अधिक उन वेबसाइट का विवरण प्रस्तुत करने लगता है जो भाषा शिक्षण में सहायक होती है। परिणाम स्वरूप एक इंटरनेट उन्मुख भाषा शिक्षक के लिए ये दुष्कर हो जाता है कि वे किन-किन वेबसाइट को खोजें, वर्गीकृत करे, मूल्यांकित करे या अपने शिक्षण में किन वेबसाइट को जोड़े।

वेबसाइट-

वेबसाइट सर्वर पर डिजिटल रूप में संचित होती है वेबसाइट को कंप्यूटर या लेपटॉप पर देखने के लिए एक विशेष प्रोग्राम का उपयोग किया जाता जिसे हम वेब ब्राउजर (इन्टरनेट एक्स्प्लोरर, मोजिला फ़ायरफ़ॉक्स, सफारी, ऑपेरा, फ्लॉक और गूगल क्रोम) कहते है। वेबसाइट को URL (यूनीफॉर्म रिसोर्स लोकेटर) के रूप में लोकेट किया जाता है। वेबएड्रेस या डोमेन नेम यह किसी विशिष्ट फ़ाइल, डायरेक्टरी या वेबसाइट के पेज का एड्रस होता हैं| वेबसाइट का एड्रेस वेबसाइट के होम पेज को रिप्रेजेंटे करता है। इस वेबएड्रेस का आरंभ अंग्रेज़ी के अक्षर-समूह http (हाइपरटेक्स्ट ट्रांसफ़र प्रोटोकॉल) से होता है, जैसे-

  • http://www.ispeakhindi.com/
  • http://www.mindurhindi.com
  • http://www.akhlesh.com
  • http://www.rocketlanguages.com/hindi/
  • http://www.learning-hindi.com

वेब पर उपलब्ध शिक्षण कार्यक्रम ऑनलाइन शिक्षण कार्यक्रम है। जिसे हम अन्य नाम जैसे- आभासी शिक्षण, इंटरनेट आधारित शिक्षण और वेब आधारित शिक्षण के नाम से जानते हैं। यह दूरस्थ शिक्षण कार्यक्रम है। इसमें भौगोलिक सीमाएँ नहीं होती हैं। यहाँ शिक्षण सामग्री कथ्य, श्रव्य और श्रव्य-दृश्य रूप में होती हैं। जिसके माध्यम से भाषा शिक्षण और अधिगम का कार्य किया जाता है। वेब पाठ्यक्रम के अंतर्गत संचार साधनों के रूप में चैट रूम, ई-मेल, आदि का उपयोग किया जाता है।

सामग्री-

आज कल वेबसाइट का प्रयोग भाषा शिक्षण के लिए अधिक हो रहा है। जिससे कुछ समस्याएँ भी आ सकती है, क्योंकि यहाँ भाषा शिक्षण सामग्री बहुत अधिक मात्रा में होती है और प्रभूत सामग्री के कारण हतोत्साहित और विचलित होने की संभावना बनी रहती है। प्रकाशन से पूर्व सामग्री की छँटनी के अभाव में वर्तनी और व्याकरण की त्रुटियों के अतिरिक्त बिशिष्ट अस्वीकार्य सांस्कृतिक सूचनाओं के निहित होने की स्थिति बनी रहती है, और वेब पर प्रस्तुत सामग्री में विषयनुसार संरचित न होने के कारण उसे खोजना कठिन हो जाता है, इन सभी संभावित उपयोगों और समस्याओं को दृष्टिगत रखते हुए वेब आधारित भाषा शिक्षण सामग्री का मूल्यांकन किया जाता है।

भाषा शिक्षण और अधिगम हेतु इंटरनेट के चार प्रकार से उपयोग होते हैं-

  1. व्यक्ति उपयोग
  2. सामूहिक उपयोग
  3. वर्गीय कक्षा उपयोग
  4. स्वीकार्य पहुँच उपयोग

इंटरनेट आधारित सामग्रियों का मूल्यांकन- मूल्यांकन दोनों आधार पर संभव है।

  1. भाषा आधारभूत सिद्धांत
  2. भाषा का व्यवहार में अनुप्रयोग

यह मूल्यांकन इस बात का है कि क्या वेब आधारित सामग्री का आधारभूत सिद्धांत एवं व्यवहार में उसके वास्तविक अनुप्रयोग के आधार पर किया जा सकता है। प्रस्तुत मूल्यांकन में निम्नलिखित पर विचार किया गया है :-

  1. भाषा संबंधी मुद्दे (द्वितीय भाषा अर्जन के सिद्धांत, शिक्षण प्रविधियाँ)
  2. विषयवस्तुपरक मुद्दे (प्रामाणिकता,सटीकता,गुणवत्ता और सामग्री की मात्रा, संरचना और संगठन, इनपुट(निवेश), आउट्पुट(निर्गत),प्रतिपुष्टि वर्ग और स्वीकार्य के प्रयोजन के आधार पर उपयोगिता)
  3. मानव कंप्यूटर अंतरक्रिया (प्रयोजनीयता, अधिगम्यता, अंतरापृष्ठ)
  4. मल्टीमीडिया के अनुप्रयोगों की उपयुक्क्ता और प्रभावशीलता (दृश्यश्रव्य प्रस्तुति, पाठ ग्राफिक्स की उपयुकता और प्रभावशीलता, प्रयुक्त युक्तियाँ और प्रस्तुत सुविधाएँ)

मूल्यांकन में व्यक्तिगत आत्म-निरीक्षण अभिगम का उपयोग करते हुए अपने अनुभव के आधार पर कई उपरयुक्त चरों की जाँच सूची का प्रयोग करते हुए मूल्यांकन विंदुओं का मूल्यांकन किया। इस प्रकार के मूल्यांकन में वस्तुनिष्टता का अभाव हो सकता है भले ही इसके निराकरण के लिए एक से अधिक विशेषज्ञयों का उपयोग किया गया हो।

विधि-

यह मूल्यांकन एक समय अवधि (जुलाई 2016 से अगस्त 2016)में उपलब्ध 5 वेबसाइटों को लेकर किया गया है। वे सभी वेबसाइट किसी संस्था या संगठन से संबंधित है जो इस प्रकार हैं ।

  1. वेब साइट का नाम – I SPEAK HINDI

http://www.ISpeakHindi.com

Email:Support@ISpeakHindi.com

  1. वेब साइट का नाम – Mind ur Hindi

http://www.mindurhindi.com

Contact : Akshay@mindurhindi.com

  1. वेब साइट का नाम – आओ हिंदी सीखें

http://www.akhlesh.com

akhlesh.agarwal@gmail.com

  1. वेब साइट का नाम – Rocket languages speak and understand a new language faster

http://www.rocketlanguages.com/hindi/

support@rocketlanguages.com

  1. वेब साइट का नाम – Learning Hindi!

वेब साइट का पता – http://www.learning-hindi.com

परिणाम :-

भाषा संबंधित चिंतन –

इनमें से अधिकतर वेबसाइटों में स्किनर के उद्दीपन, अनुक्रिया और पुनर्बलन के सिद्धांत पर आधारित हैं अर्थात व्यवहारवादी प्रकृति के है, और यहाँ यह आश्चर्यजनक है कि जो संरचना और शब्दावली सिखी जानी है उन्हें आदर्श निर्माण के लिए दोहराया नहीं गया है। यहाँ सीखने वालों के लिए पर्यटन से संबंधी जानकारी को सम्मिलित किया गया है जिससे उनके शब्दों के ज्ञान में वृद्धि हो, वह अपने व्यावहारिक जीवन में उनका श्रवण तथा व्याकरण का अभ्यास कर सकें। यहाँ भाषा जानकारी के स्रोत का कार्य करती है जिससे छात्र एक प्राक्क्ल्पना तैयार कर भाषा अधिगम प्रक्रिया में सक्रियता के साथ भाग ले सके।

इन साइटों का आधारभूत सिद्धांत SLA(द्वितीय भाषा अर्जन के सिद्धांत) के लक्ष्य के अनुरूप है जो श्रोतागण प्रयोजन तथा स्थिति के अनुरूप औपचारिक और अनौपचारिक प्रस्थितियों में संप्रेषण एवं सांस्कृतिक रूप में स्वीकार्य विधियों से हिंदी भाषा व्यवहार का कार्य करता है। कुछ वेबसाइटों में अंतरण,संज्ञानात्मक, नमनीयता तथा निर्माणत्कतावाद के सिद्धांतों का वेहतर उपयोग किया गया है।

विषयवस्तुपरक मुद्दे-

  1. भाषा आधारित विचार/ मुद्दे – अधिकांश साइट अभ्यास आधारित है।
  2. सामग्री – सभी वेबसाइट पर उपलब्ध सामग्री प्रामाणिक हैं। सामगी में वर्तनीगत त्रुटियाँ नहीं के बराबर पाई गयी सामान्यतः कुछ त्रुटि पंचमाक्षर से संबंधित थे। ये इस बात का द्योतक है कि वेबसाइट का अद्यतीकरण नहीं किया गया है।
  3. संरचना – संरचना से संबंधित किसी प्रकार की त्रुटि नहीं पाई गई।
  4. गुणवत्ता और सामग्री की मात्रा- प्रयोजन के अनुसार सामग्री की मात्रा और गुणवत्ता उपयुक्त है।

मानव कंप्यूटर अंतरक्रिया-

  1. प्रयोग अंतरापृष्ठ- वेबसाइट सही तरह से निर्मित है, इनमें रंगों, इंटरनेट डिज़ाइन तकनीकों, मानव मशीन अंतरापृष्ठ तकनीकों का उपयोग किया गया हैं।

उपयुक्कता और प्रभावशीलता (मल्टीमीडिया अनुप्रयोगों का)-

  1. I SPEAK HINDI- पाठ कथ्य और श्रव्य में है। पाठों को अधिगमकर्ता के आरंभिक स्तर, मध्य स्तर और उच्च स्तर में विभाजित कर प्रस्तुत किया गया है।
  2. Mind ur Hindi- इस वेबसाइट पर हिंदी वर्णमाला, हिंदी अभ्यास, हिंदी पाठ, हिंदी व्याकरण, हिंदी संवाद शीर्षक दिए गए हैं। हिंदी वर्णमाला से संबंधित पाठ स्वर, व्यंजन और बारहखड़ी को क्थ्य और श्रव्य रूप में दिए गए हैं। हिंदी पाठ के अंतर्गत पाठों को फ्लैस कार्ड के माध्यम से अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद एवं हिंदी वाक्यों का लिप्यंत्रण कर प्रस्तुत किया गया है। हिंदी अभ्यास के अंतर्गत अंग्रेज़ी शब्द का हिंदी में अनुवाद कर हिंदी शब्द को वाक्य में प्रयोग कर प्रस्तुत किया गया है। ये पाठ कथ्य रूप में है।
  3. आओ हिंदी सीखें- इस वेबसाइट की सामग्री ईमेज के रूप में है। जिसे अधिगमकर्ता पढ़ सकता है, साथ ही उसे डाउनलोड भी कर सकते हैं।
  4. Rocket languages- इस वेबसाइट पर पाठ श्रव्य रूप में दिया गया है। पाठ के वाक्य/शब्द हिंदी और अंग्रेज़ी में दिए गए हैं। साथ ही हिंदी शब्द/ वाक्य का लिप्यंत्रण कर प्रस्तुत किया गया है।
  5. Learning Hindi!- शिक्षण और अधिगम सामग्री को छोटे-छोटे पाठ में विभक्त किया गया हैं जैसे- स्वर ध्वनियां (अ,आ) (इ,ई) (उ,ऊ) (ए,ऐ) (ओ,औ) (ऋ) में विभाजन कर प्रस्तुत किया गया है, उसी प्रकार व्यंजन ध्वनियां को उच्चारण स्थान के आधार पर विभाजित किया गया है। स्वर और व्यंजन ध्वनियां के उच्चारण दिए गए हैं। शेष पाठ कथ्य रूप में दिए गए हैं। उन पाठ में प्रयुक्त शब्द आदि को चित्रों के माध्यम दर्शाया गया है।

निष्कर्षतः-

यहाँ जितनी भी वेबसाइटों का मूल्यांकन किया गया है वे सही तरह से निर्मित है इनमें रंगों,इंटरनेट डिजाइन तकनीकों, मानव मशीन अंतरापृष्ठ तकनीकों का उपयोग किया गया है। तथा जो सामग्री प्रस्तुत की गई वह भी सटीक और शैक्षणिक गुणवत्तायुक्त पाई गई। यहाँ मूल्यांकन में यह भी दिखाया गया है कि जिस वेबसाइटों का मूल्यांकन किया गया है उनमें से अधिकांश प्रकृति से व्यवहारवादी थी। यद्यपि ये पूर्णतः इच्छित आदत निर्माण हेतु पुनरावृत्तिपरक नहीं थी। यहाँ एक बात महत्वपूर्ण है कि CALL की तरह पुरानी शिक्षण पद्धतियों को बढ़ावा देते हुए उच्च तकनीक का प्रयोग किया गया है। अन्य कल्पनाशील साइटों द्वारा प्रस्तुत भाषा संबंधित सामग्री सांस्कृतिक सूचनाओं सहित कई संदर्भों का उपयोग कर शिक्षार्थी के लिए नई-नई जानकारी देने का प्रयास किया गया है, जिससे कि वह सांस्कृतिक रूप से जागरूकता बढ़ाते हुए सीखने में सक्रिय रूप से संलग्न हो सके ।

अंततः यह दावा किया जा सकता है कि अधिकांश विदेशी भाषा के रूप में हिंदी भाषा शिक्षण वेबसाइट शिक्षक के अभाव में स्वयं संचालित की जा सकती है।

संदर्भ ग्रंथ सूची-

  1. गुप्त,मनोरमा, (): भाषा शिक्षण : सिद्धांत और प्रविधि, आगरा केंद्रीय हिंदी संस्थान|.
  2. नारंग, वैश्ना (1996):संप्रेषणपरक हिंदी भाषा शिक्षण, नई दिल्ली प्रकाशन संस्थान।
  3. भाटिया, कैलाशचंद्र (2001) : आधुनिक भाषा-शिक्षण, नई दिल्ली तक्षशिला प्रकाशन।
  4. शर्मा, डॉ. गीता, (2009): हिंदी शिक्षण सिद्धांत और व्यवहार, मेरठ: श्री हरिअंग प्रकाशन। .
  5. श्रीवास्तव, रवींद्रनाथ, (2000): अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान: सिद्धांत एवं प्रयोग, दिल्ली: राधाकृष्ण प्रकाशन लिमिटेड।

English book

वेब लिंक

  1. http://guides.library.cornell.edu/c.php?g=32334&p=203767&preview=ad0bac0490cf7ab0653096fe3b4a0fee
  2. http://www.lib.umd.edu/tl/guides/evaluating-web
  3. http://www.widener.edu/about/campus_resources/wolfgram_library/evaluate/
  4. http://lib.colostate.edu/howto/evalweb.html
  5. ttp://www.lib.vt.edu/instruct/evaluate/
  6. http://guides.lib.berkeley.edu/evaluating-resources
  7. http://www.library.kent.edu/criteria-evaluating-web-resources
  8. https://eprints.usq.edu.au/820/1/Son_ch13_2005.pdf
  9. http://www.conta.uom.gr/conta/publications/html/EVALUATION%20OF%20INTERNET%20BASED%20MATERIALS%20FOR%20LANGUAGE%20LEARNING.htm
  1. Levy, M. (1997). Computer-assisted language learning: Context and conceptualization. Oxford University Press.

राष्ट्रभाषा हिन्दी और जनपदीय बोलियाँ

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राष्ट्रभाषा हिन्दी और जनपदीय बोलियाँ

सुरेखा शर्मा

इस विषय पर अपनी बात मैं कवि ‘गोपाल सिंह नेपाली’ जी की पंक्तियों से शुरु करना चाहूंगी-‘ दो वर्तमान को सत्य सरल , सुंदर भविष्य के सपने दो,

हिन्दी है भारत की बोली,तो अपने आप पनपने दो।

बढ़ने दो इसे सदा आगे,हिन्दी जन -मन की गंगा है,

यह माध्यम उस स्वाधीन देश का,जिसकी ध्वजा गिरंगा है।

हिन्दी है भारत की बोली,इसे अपने आप पनपने दो।”

राष्ट्रभाषा हिन्दी व उनकी सभी बोलियों का मूल स्रोत संस्कृत भाषा है।वैदिक साहित्य की भाषा के विश्लेषण से ये संकेत तो स्पष्ट मिलते हैं कि उस काल में बोलचाल में तीन प्रकार की बोलियां थीं-पश्चिमोत्तरी, मध्यवर्ती तथा पूर्वी

बाद में बोलचाल की भाषा संस्कृत का विकास जब पाली भाषा के रूप में हुआ,जिसमें बौद्ध धर्म के बहुत से ग्रंथ लिखे गये। इसके बाद स्थानीय बोलियां बढ़ती गयी।पाली के बाद भाषा का जो जन प्रचलित रूप था उनके कुछ रूप इनमें अधिक विकसित हुए जैसे गुजरात,राजस्थान, हरियाणा,हिमाचल प्रदेश,दिल्ली,पश्चिमी तथा उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश।

हिन्दी क्षेत्र की भाषा हिन्दी है तथा उस क्षेत्र में पांच उपभाषाएं अर्थात् बोली वर्ग हैं,,जैसे- राजस्थानी,पश्चिमी हिन्दी, पूर्वी हिन्दी, पहाड़ी,बिहारी।

हिन्दी भाषा की बोलियां तीन रूपों में विभक्त हैं—

क.हिन्दी प्रदेश की-ब्रजभाषा,अवधी,भोजपुरी,

ख.हिन्दीत्तर प्रदेशों की-दक्खिनी हिन्दी,बम्बइया हिन्दी,कलकत्तिया हिन्दी।

ग.विदेशों में बोले जाने वाली बोलियां-सूरीनाम हिन्दी,फिज़ी हिन्दी,मारीशस हिन्दी।

भारत के बाहर की प्राय:सभी बोलियां मूलत: भोजपुरी पर आधारित हैं।जिन पर उन स्थानों की अपनी भाषाओं तथा यूरोपीय भाषाओं का प्रभाव पड़ा है।

भारतीय हिन्दीत्तर की बोलियों में तत्व तो खड़ी बोली,भोजपुरी, राजस्थानी आदि के हैं।संभवत: उनका आधार खड़ी बोली को ही मान सकते हैं।

ब्रजभाषा,कनौजी,बुंदेली,अवधी, बघेली,छत्तीसगढ़ी,हिमाचली,कुमायुंनी,गढवाली,भोजपुरी,मगही,मैथिली।

देश,विदेश में प्रचलित उपर्युक्त हिन्दी बोलियां भी अपने क्षेत्रों में खूब प्रचलित हैं ।देखा जाए तो दक्खिनी हिन्दी की ही लगभग बारह उपबोलियां हैं-जो गोलकुंडा, औरंगाबाद,अहमदाबाद,अरकाट, बीजापुर,अन्नामलाई कोचीन आदि जगह पर बोली जाती हैं।इसी प्रकार भोजपुरी के कुछ रूप विदेशों में भी हैं।

इस प्रकार राष्ट्रभाषा हिन्दी की जनपदीय बोलियों का विस्तार काफी दूर तक फैला हुआ है।

अब यहां प्रश्न यह है कि हिन्दी भाषा और जनपदीय बोलियों का आदान-प्रदान का।

हिन्दी भाषा का जन्म तो एक हजार ई.में हो गया था,किंतु साहित्य में प्रयोग बाद में हुआ।जिसे हम अदिकालीन हिन्दी भी कहते हैं।

भाषा की तुलना में बोलियों का ही मुहावरों व लोकोक्तियों में प्रयोग अधिक हुआ है।आधुनिक काल में आकर हिन्दी भाषा के स्थान पर खड़ीबोली कहा जाने वाला रूप ही आसीन हो गया,और यही रूप साहित्य की भाषा,शिक्षा की,राज काज की भी भाषा है।

जहां तक आधुनिक काल में हिन्दी भाषा एवं जनपदीय बोलियों से आदान- प्रदान का संबन्ध है तो विश्व की सभी भाषाओं और उनकी बोलियों में भी आदान- प्रदान चलता रहता है।

भाषा और बोलियों में मुख्यत: दो प्रकार के सम्बंध होते हैं।एक ऐतिहासिक व दूसरा सांस्कृतिक।ये बोलियां हिन्दी भाषा या मानक हिन्दी से विकसित नहीं हैं,बल्कि विभिन्न प्रकार की अपभ्रशों से इनका विकास हुआ है। इसलिए ‘हिन्दी की बोली ‘कहे जाने का आधार यह है कि पूरा हिन्दी प्रदेश एक सांस्कृतिक सूत्र में बंधा हुआ है।हिन्दी क्षेत्र के हिन्दी भाषा बोलने वालों ने इस क्षेत्र के ब्रज,अवधी,भोजपुरी आदि भाषा रूपों को हिन्दी की बोलियां स्वीकार किया है।

आधुनिक काल में हिन्दी का केन्द्र बनारस रहा है।इस दृष्टि से प्रसाद, भारतेन्दु, प्रेमचंद ,शुक्ल,राहुल सांकृत्यायन,विद्यानिवास मिश्र,नामवर सिंह,हजारी प्रसाद. द्विवेदी,कुबेरनाथ राय आदि के नाम लिए जा सकते हैं।सभी मूलत: भोजपुरी क्षेत्र से ही रहे हैं।अवधी में भी बहुत से साहित्यकारों का साहित्य मिलता है।ब्रज भाषा की गंध जिनमें आती है वे हैं- रांघेय राघव, कमलेश्वर आदि।

मैथिली-दिनकर,नागार्जुन की भाषा रही ,पहाड़ी शिवानी,शैलेश मटियानी और बुंदेली मैथिलीशरण गुप्ता और वृन्दावन लाल वर्मा का नाम लिया जाता है।

यह तो थी हिन्दी क्षेत्र और वहां की जनपदीय बोलियों के विषय में,लेकिन हिन्दी प्रदेश से बाहर की जनपदीय बोलियों ने भी हिन्दी भाषा को समृद्ध बनाया है।उदाहरण के लिए यदि जगदम्बा प्रसाद दीक्षित के ‘मुरदाघर’ की हिन्दी ‘बंबइया हिन्दी’ के प्रयोंगों से युक्त है। “और नदी बहती रही ” तथा “खामोशी के चीत्कार ” आदि पुस्तकों की हिन्दी मारिशस की भोजपुरी के प्रयोगों से युक्त है।

रांगेयराघव का प्रसिद्ध उपन्यास ”कब तक पुकारूं” में भरतपुरी ब्रज के शब्द और मुहावरों का अधिकतर प्रयोग हुआ है।जैसे–गबरू,दारी,झाई मारना,मंत्र डोलना आदि।इसी प्रकार अमृतलाल नागर के प्रसिद्ध उपन्यास “मानस का हंस” में अवधी का प्रयोग बखूबी किया गया है।जैसे -औचक,बप्पा,सुतवां,बड़कऊ,चक्करघिन्नी,धरतिन ,व्याहुली आदि।

यदि हम मुहावरों व लोकोक्तियों की बात करें तो हम पाएंगे कि मूलत:फारसी से आए हैं जो अधिकांश बोलियों की ही देन हैं।

इसी प्रकार मानक हिन्दी,बोलियों में प्रयुक्त बूझना, पैठना,बिसरना पोसना,लुकना आदि क्रियाओं का प्रयोग नहीं करती।इनके सगथान पर समझना,घुसना,भूलना,पालना,छिपना आदि क्रियाओं का प्रयोग करती है।

जहां तक हिन्दी की बोलियों के हिन्दी से लेने का प्रश्न है,यह धयान देने की बात है कि प्रत्येक बोली अपने भाषाभाषियों की सभी प्रकार की अभिव्यक्तियों की दृष्टि से सम्पन्न और समर्थ होती है।जहां तक शब्द लेने का प्रश्न है,प्राय:कोई भी बोली अपनी उस भाषा से ही शब्द लेती है,जिसकी वह बोली होती है।

यब अपवाद भी है यदि बोली किसी ऐसे क्षेत्र में बोली जाती हो,जहां किसी और भाषा की भी सीमा लगती हो ,तो उससे भी शब्द ले लेती है।हिन्दी की कई बोलियों ने इस दृष्टि से पंजाबी, गुजराती,मराठी,उड़िया,बंगला से शब्द लिए हैं।

यहां कुछ शब्द हैं जो कुछ बोलियों में आम तौर पर बोले जाते हैं- हरियाणवी में एक खाद्य पदार्थ को राबड़ी कहते हैं,जबकि यह दूध की बनी रबड़ी से अलग होती है।कहने का अभिप्राय यह है कि ये बोली के शब्द हैं।

जो डाल जल्दी टूट जाए उसे भोजपुरी में ‘अरर’ कहते हैं। इस प्रकार बहुत शब्द ऐसे हैं जो हिन्दी की बोलियों में हैं ।हिन्दी भाषा इनको लिए बिना पूरे हिन्दी प्रदेश की भाषिक अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती।यदि मानकता की बात करें तो प्रत्येक क्षेत्र के लोग अपने-अपने क्षेत्र के शब्दों का प्रयोग मानक हिन्दी बोलने में भी करते हैं।उदाहरण के लिए एक प्रकार की सब्जी को हिन्दी में “तौरी ” तो कहीं ‘तरोई’, कहीं “नेनुआ” तो कही “घेवड़ा ” कहते हैं,लेकिन कोई भी शब्द ऐसा नहीं जो हिन्दी प्रदेश में समझा जा सके।इसी प्रकार इसको कहीं पेठा,कहीं काशीफल,कद्दू, सीताफल कहा जाता है।

आशय यह है कि बोलियों से इस प्रकार सारे शब्दों को एकत्र कर अपेक्षाकृत बड़े क्षेत्र में प्रयुक्त शब्दों को मानक हिन्दी को अपना लेना चाहिए ।जिससे शक्ति तो बढ़ेगी ही मानकता को भी बल मिलेगा।

सुरेखा शर्मा

हिन्दी सलाहकार सदस्या नीति आयोग

६३९/१०-ए,सेक्टर गुरुग्राम-१२२००१

०९८१०७१५८७६.

राजभाषा हिन्दी : समृद्ध इतिहास और भावी चुनौतियाँ

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राजभाषा हिन्दी : समृद्ध इतिहास और भावी चुनौतियाँ

2.डॉ विमलेश शर्मा
सहायक आचार्य,हिन्दी
राजकीय कन्या महाविद्यालय,
अजमेर,राजस्थान

1.डॉ के.आर.महिया
सहायक आचार्य, संस्कृत
राजकीय कन्या महाविद्यालय
अजमेर,राजस्थान

भारतीय ऋषियों, चिंतकों,महर्षियों व मनीषियों ने शब्द को ब्रह्म कहा है। उसे नित्य, शाश्वत व सनातन माना है; वाक् को देवी कहा , सरस्वती कहा तथा उसकी उपासना की बात इन शब्दों में कही-

“वाचमुपास्व”1

वस्तुतः भाषा(शब्द) ही वह माध्यम है जिसके कारण अल्प आयास से विशालतम व्यापार की सिद्धि हो जाती है-

“अणीयस्तवाच्च शब्देन संज्ञाकरणं व्यवहारार्थ लोके।”2

मनुष्य जाति की समस्त लोकयात्रा इसी भाषा रूपी प्रासाद पर अवलम्बित है, आश्रित है। भाषा ही इस लोकयात्रा में शाब्दिक अभिव्यक्ति हेतु एकमात्र सशक्त आधार है।

“इहशिष्टानुशिष्टानां

शिष्टानामपि सर्वथा

वाचामेव प्रसादेन

लोकयात्रा प्रवर्तते।।”3

कल्पना कीजिए हमारी जिन्दगी से एक दिवस के लिए भी भाषिक अवकाश हो जाए तो, कैसा होगा हमारा जीवन? हजारों सूर्य मिलकर भी इस भुवन को दीप्त नहीं कर पाएँगें, कितनी भयावह है यह कल्पना ही, कि विचार अभिव्यक्त ही ना हो। इसी तथ्य को उद्घाटित करते हुए संस्कृत साहित्यशास्त्र के सुप्रसिद्ध आलंकारिक आचार्य दण्डी ने भाषा के अभाव से जन्मी उस विभीषिका की ओर संकेत करते हुए कहा है कि शब्द रूपी ज्योति के अभाव में यह समस्त भुवनत्रय अंधकार में निमग्न रहता-

“इदमन्धतमः कृतस्नं जायेत भुवनत्रयम्।

यदि शब्दाह्वयं ज्योतिरासंसारं दीप्यते।।” 4

भाषा संजीवनी है, प्राण शक्ति का आधार है, साथ ही हमारे अस्तित्व व अस्मिता की पहचान और अभिधान भी। भाषा प्रवहमान निर्झर है अतः इसका सतत् प्रवाहमान होना आवश्यक है। हमारे समग्र विकास को , संस्कृति और चिंतन परंपरा की विरासत को यदि किसी माध्यम से प्रतिबिंबित किया जा सकता है तो वह भाषा है । आज हमारी अस्मिता पर जितने भी प्रश्नचिन्ह लगे हैं वे सब भाषा को नकारने और उसे सामान्य भाव से व हल्के रूप में लेने के कारण ही है । विचारणीय है कि हिन्दी को कभी संस्कृत, पाली, अरबी, फारसी या अंग्रेजी की तरह राज्याश्रय नहीं मिला। इसके पीछे कारण भी यही हैं कि “ तमगा बनने की उसकी इच्छा कभी रही ही नहीं, अलबत्ता वह देश की बाँसुरी, तलवार और ढाल ज़रूर बनी है। जब भी देश को एक सूत्र में पिरोने की ज़रूरत पड़ी, जब भी उसके विद्रोह को वाणी देने की आवश्यकता हुई ; हिन्दी ने पहल की है।”5

हालांकि स्थितियाँ सुखद भी हैं, आज हिन्दी विश्व की भाषा है, वैश्विक बाज़ार की भाषा है औऱ इसका कारण यहाँ का विशाल जन समूह है। सार्क देशों में तो व्यापार परिवर्धन के लिए हिन्दी को सम्पर्क भाषा बनाए जाने की माँग भी उठने लगी है। परन्तु इसी के साथ ही अनेक चुनौतियाँ है जिसका सामना व्यक्ति मात्र के प्रयोग और सहयोग से ही हिन्दी कर सकती है। “आज भी हिन्दीभाषी दूसरे नम्बर का नागरिक है। दफ्तरों में, रेलवे में, बैकों में, व्यापार-व्यवसाय में अंग्रेजीभाषी विशिष्ट और सभ्य माना जाता है और उसका काम त्वरित होता है। इसीलिए हिन्दी तथा अन्य भाषा-भाषी भी अपनी भाषा में अंग्रेजी की खिचड़ी पकाकर सभ्य औऱ पढ़े-लिखे होने का बोध करना चाहते हैं।”6 बचपन से ही भाषायी श्रेष्ठता का बीज हम बालमन में रोप देते हैं, इसके पीछे बाजारवादी मानसिकता है , जिसमें हम सदैव आगे रहना चाहते हैं। हिन्दी लोकप्रियता और प्रयोग की दृष्टि से श्रेष्ठ होने के बाद भी इस दृष्टि से दोयम क्यों है, इस पर हमें मिल बैठकर ही विचार करना होगा।

भारत विश्व में सर्वाधिक विविधताओं वाला देश है। यह बात भाषाई दृष्टि से भी स्वतः सिद्ध है। यहाँ 22 बोलियाँ (संविधान की आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट) अपने-अपने भाषायी सौष्ठव के साथ मौजूद है, हाँ! पर हिन्दी अपने वर्चस्व के कारण राष्ट्रभाषा और एकांगी रूप से राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित है । इसका एक कारण यह भी है कि भारत में हिन्दी सम्पर्क भाषा भी रही है । सम्पर्क भाषा होने के कारण ही यह लोकप्रियता के उन सोपानों को छू सकी जिसे छूने में अन्य लोक भाषाएँ असमर्थ रही। इस लोकप्रियता के पीछे अनेक संत, महात्मा, कवि व लेखकों का अप्रतिम योगदान दृष्टिगोचर होता है। निःसंदेह यह हिन्दी की जन्मकुंडली के राजयोग व अन्यान्य सुयोगों का ही प्रतिफल है कि हिन्दी भाषा को इतने सशक्त व आत्मोन्नत श्रेष्ठ पुरुषों की संगति प्राप्त हुई।

हिन्दी का जो स्वरूप आज हम देख रहें हैं वह वस्तुतः आठवीं शताब्दी में प्रस्फुटित हुआ और कालांतर में पल्लवित हुआ।हिंदी की विकासयात्रा की चर्चा किए बिना हिंदी की बात करना बेमानी होगी। वस्तुतः हिन्दी का जो स्वरूप हम आज देख रहे हैं इसे अपना यह स्वरूप प्राप्त करने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है । लम्बी पराधीनता के बाद जो भी देश आज़ाद हुए हैं उनमें राष्ट्रभाषा के प्रश्न पर प्रायः विवाद हुए हैं। जन-जन की भाषा कही जाने वाली हिंदी का वास्तविक संघर्ष 1850 के पश्चात् दिखाई देता है । तात्कालिक हिंदी साहित्य इस बात का साक्षी है; जिसने अपने अथक प्रयासों से इस भाषा का परचम दिग्दिगंतमेंलहरानेकी ठान ली थी। अंग्रेजों ने जब हिन्दी के स्थान पर उर्दू को राजभाषा के पद पर आसीन करवाने की चाल चली तो देश के हिन्दू औऱ मुसलमान दोनों भ्रमित हुए। “1857 के बाद तो इस विषय पर बाकायदा खुलकर संघर्ष होने लगा। अंग्रेजों की फूट डालो और राज्य करो वाली नीति काम कर गई। भाषा की कटुता जातियों में फैल गई। भाषा जातीयता तथा धार्मिकता का सशक्त प्रतीक बन गई। अंग्रेजों ने इसका भरपूर लाभ उठाया। इसी संघर्ष के दौरान अंग्रेजों ने चालाकी से रोमन लिपि को भी न्यायालयों में प्रचलित करके अंग्रेजी भाषा के लिए सशक्त राह खोल दी। ”7 इस चाल का व्यवहार आज तक चला आ रहा है। आज भी कई बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि हिन्दी के लिए रोमन लिपि रहे तो बेहतर होगा। यह ठीक वैसा ही होगा; जैसे भारतीय आत्मा को पाश्चात्य देह में लपेट दिया गया हो ऐसे में हमारी व हमारी भाषा की क्या दशा होगी सुधिजन विचार कर लें।

स्वाधीनता आंदोलन के साथ-साथ हिंदी भी पली- बढ़ी। पहली लड़ाई इसकी लिपि के लिए थी । जिसके लिए भी कैथी लिपि,मुड़िया लिपि और नागरी लिपि में संघर्ष छिड़ा । परन्तु उन्नीस सौ में तमाम विरोधो के बाद भी इसकी लिपि देवनागरी स्वीकार की गई। स्वतंत्रता पूर्व की परिस्थतियों में राजभाषा हिन्दी के लिए जितना काम स्व.सेठ गोविंददास ने किया है; उतना शायद ही किसी अन्य ने किया हो। “ सन् 1927 से ही उन्होंने कौंसिल ऑफ स्टेट में भारतीय विधान मंडल में हिन्दी या उर्दू में भाषण करने(देने)की अनुमति पाने के लिए जोरदार माँग की। आगे चलकर स्व. सेठ ने स्वतंत्र भारत के लिए संविधान बनाने वाली संविधान सभा की कार्रवाई हिन्दी में कराने पर ज़ोर दिया। परंतु उनकी आवाज़ सुनी नहीं गई थी।”8

नागरी लिपि के उत्थान और इसे वर्तमान स्वरूप(परिष्कृत) में पहुँचाने के लिए अनेक भाषाविज्ञों और साहित्यकारों का महनीय योगदान रहा है। इन्हीं तपोनिष्ठ विद्वानों के पवित्र श्रम के कारण आज हिन्दी हमारी संपर्क भाषा , संचार भाषा , तकनीकी भाषा , व्यापार की भाषा व विज्ञापन और राजभाषा तथा राष्ट्रभाषा बनी हुई है । इसे हम यूँ भी कह सकते हैं कि भारतीयों की आत्मिक व मानसिक अनुभूतियों के प्रकटीकरण हेतु यही संपर्क भाषा सशक्त उपादान है। हिन्दी को एक सर्व सम्मत औऱ मानक रूप देने में इसकी सहयोगी भाषाओँ ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उर्दू हो फारसी, मैथिली हो या भोजपूरी , बांग्ला हो या कन्नड़, बिहारी हो या राजस्थानी सभी भाषाओँ के प्रभाव ने हिन्दी को एक गरिमामय सौष्ठव प्रदान किया है। हमारे संविधान के अनुच्छेद 351 में कहा गया है कि – “ संघ का कर्तव्य होगा कि वह हिन्दी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे , जिससे भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्त्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुस्तानी में और आठवीं अनुसूची में निर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली औऱ पदों को आत्मसात् करते हुए और जहाँ आवश्यक या वांछनीय हो वहाँ उसके शब्द भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।” भारत की सामासिक संस्कृति वह संस्कृति है, जो न हिन्दू है, ना मुसलमान, ना सिख ना इसाई। “ जिस प्रकार अमरीका में विभिन्न संम्प्रदायों जातियों को मिलाकर अमेरीकन संस्कृति बनी ठीक उसी प्रकार भारत की बहुरंगी भेद सहित अभेदमयी संस्कृति को समष्टि रूप में भारतीय संस्कृति कह सकते हैं; और उस सतरंगी संस्कृति की भाषा को भारती।” 9 “शायद यह नाम देश हित में भी होता क्योंकि हिन्दी नाम से न केवल हिंदी भाषियों में एक व्यर्थ का अहं भाव उत्पन्न होता है वरन् अहिंदीभाषियों में भी ग़लतफ़हमी पैदा होती है।” 10 तमाम वैपरीत्य के बाद भी अनुच्छेद 351 में उल्लिखित हिंदी भारत की सामासिक संस्कृति की संपर्क भाषा ही है जो भारतीयों के बीच सशक्त भावनात्मक व सामाजिक संपर्क स्थापित करती है।

भारत के संविधान निर्माण से पूर्व प्रश्न राष्ट्रभाषा को लेकर था, संविधान ने ही पहले-पहल राजभाषा नाम दिया। जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया वैसे-वैसे हिन्दी के रचनाकार एवं भाषाविज्ञ राजभाषा शब्द व उसकी परिभाषा से परिचित होते गए। राजभाषा की अनेक एकपक्षीय परिभाषाएँ हैं परन्तु इसके व्यापक अर्थ ग्रहण की दृष्टि से रामबाबू शर्मा की परिभाषा महत्त्वपूर्ण है। डॉ रामबाबू शर्मा ने ‘हिन्दी भाषा का राजकाज में प्रयोग ’ में उल्लिखित किया है -“ राजभाषा वह व्यापक भाषा होती है जिसका प्रयोग केन्द्र सरकार द्वारा समन्वय की दृष्टि से अंतर प्रांतीय स्तर पर होता है। यह भाषा इतनी समृद्ध , व्यापक और समन्वयकारी होती है कि संपूर्ण देश तथा उसकी विभिन्न प्रांतीय भाषाओं को सांस्कृतिक, साहित्यिक राजनीतिक, प्रशासनात्मक शब्दावली, वाक्य योजना एवं लिपि आदि की दृष्टि से एक सूत्र में आबद्ध कर राज्य एवं उसकी नीतियों के अनुसार उस देश को सुदृढ़ बनाती है। यह भाषा इतनी व्यापक होती है कि इसके माध्यम से देश के विभिन्न भाषा-भाषी लोगों से संपर्क स्थापित होता है इसलिए इसे संपर्क भाषा भी कहते हैं। अंग्रेजी में इसे लिंगुआ फ्रेंका, केंद्र, राज्य और देश के विभिन्न निकायों के संपर्क के माध्यम के कारण राजभाषा, एकतंत्रात्मक शासन में इसे राजा की भाषा, प्रजातंत्र प्रणाली में इसे राज्य की भाषा (राजभाषा) या संघभाषा भी कहते हैं। … भारत जैसे बड़े देशों में केन्द्रीय स्तर पर प्रयुक्त होने वाली मुख्य राजभाषा के अंतर्गत विभिन्न राज्यों में प्रयुक्त होने वाली क्षेत्रीय भाषाओं को भी राजभाषा की संज्ञा के नाम से अभिहित करते हैं। वास्तव में क्षेत्रीय राजभाषाएँ केन्द्रीय भाषा की पूरक होती हैं। इससे राजभाषा के विशाल रूप का उद्घाटन होता है।” 11 इसके इतर अगर संक्षेप में हम राष्ट्रभाषा की बात करें तो चूँकि हिन्दी भारत में छोटे-बड़े पैमाने में बोली समझी जाती है , इसलिए महात्मा गाँधी ने उसे राष्ट्रभाषा कहा और देश में उसका प्रचार करने की प्रेरणा दी। सुखद आश्चर्य यह भी है कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा और राजभाषा बनाने का स्वप्न भी हिन्दीभाषियों का नहीं था, इसकी आवश्यकता भी पहले-पहल अहिन्दीभाषियों ने ही महसूस की। राष्ट्रभाषा कहें या राजभाषा अगर हम उसे खारिज करते हैं तो अपनी पहचान खोने लगते हैं, अपने अस्तित्व से इनकार करने लगते हैं।

हिन्दी आज समस्त नकारात्मक प्रचार के बावजूद प्रत्येक क्षेत्र मे अपना निर्विकल्प वर्चस्व स्थापित कर चुकी है । भाषिक दृष्टि से हिन्दी अशक्त नहीं है। इसका व्याकरण निर्दोष, ग्रहणशील और परिवर्द्धिमान है। लेखन औऱ उच्चारण में साम्य होने के कारण यह विश्व की सर्वाधिक सरल भाषाओं में से एक है। संस्कृत की समृद्ध विरासत के बावजूद इसने विगत एक शती में ही अन्य भाषाओं, उपभाषाओं, बोलियों के असंख्य शब्दों को आत्मसात् करते हुए अपने शब्दकोश को परिवर्द्धित किया है; अभिव्यक्ति की श्रेष्ठता प्रतिपादित की है। सभी प्रांतों में कमोबेश बोली जाने के कारण हिन्दी भारत को एक सूत्र में बाँधने की क्षमता रखती है। या यूँ कहें कि हिन्दी भारतीयों की सामाजिक, सांस्कृतिक व धार्मिक विरासत की अक्षुण्ण एकता की संवाहक भाषा है ; आवश्यकता इसको परिष्कृत, परिमार्जित व परिशोधित करने की है।

संचार माध्यमों के हर तेवर व फ़न में अपना सहज विस्तार पाने के कारण हिन्दी ने सशक्त लोकतांत्रिक हैसियत जो पूर्व से ही थी उसमें औऱ इज़ाफा कर लिया है। कहना होगा कि आज हिन्दी जनभाषा है , संसदीय भाषा है और इससे बढ़कर हर मन की भाषा है; तो कहीं ना कहीं अन्य सहयोगी भाषाओं के आत्मोत्सर्ग से, नहीं तो हजारों वर्षों की बोलियों के स्थान पर खड़ी बोली का बहुजन की भाषा औऱ आज वैश्विक भाषा बन पाना लगभग असम्भव था। यही बात केन्द्र में रखते हुए डॉ रामविलास शर्मा कहते हैं- “हिन्दी को केन्द्रीय भाषा’ बनाने का यह अर्थ नहीं है कि प्रादेशिक भाषाओं के अर्थ मारे जाएं।”12

तमाम विकसनशील तत्त्वों के होते हुए आज भी कुछ सवाल अनुत्तरित हैं । ये सवाल दरअसल निहित स्वार्थों और उनसे उत्पन्न पूर्वाग्रहों के कारण हैं   । आज संचार माध्यमों में हिन्दी का जो रूप है वह पूर्णतः बाजारसापेक्ष है, जिसे बहुत अधिक तोड़ मरोड़ दिया गया है; यही कारण है कि वह कहीं ना कहीं अपनी मूल संस्कृति से विमुख हो गई है। यह सही है कि आज हिन्दी इतनी सक्षम है कि सूचना विस्फोट से उत्पन्न हुई अफ़रातफ़री को संभाल सकती है, संवरण कर सकती है परन्तु स्वयं हिन्दी को संभालने के लिए अनेक सबल हाथों की आवश्यकता है। हिन्दी का भविष्य अन्य देश भाषाओं के भविष्य से जुड़ा है। उनका अविकसित रहना हिन्दी का कमजोर होना है। हिन्दी की जड़ें संस्कृत में है। नई पीढ़ी को उस भाषा की और लौटाना होगा जिसमें हमारी संस्कृति फली- फूली है। यह सुकृत्य सामूहिक उत्तरदायित्व से ही संभव है। यदि हमने (भाषाविज्ञों) नई पीढ़ी की वैचारिकता को भाषा का माहात्म्य का पाठ पढ़ा दिया, तो निश्चय ही हिन्दी का स्वर्णिम भविष्य भाषाप्रेमियों को आह्लादित तो करेगा ही साथ ही दृष्टिगत भी होगा।

हिन्दी अपनी वैज्ञानिकता के कारण ही स्वयंसिद्ध भाषा है जो त्वरित गति से जीवन के हर क्षेत्र में छा रही है । संचार माघ्यमों की त्वरा के अनुरूप इसके शब्दकोश में भी नए शब्दों का तथा व्याकरण में नवीन वाक्यों , अभिव्यक्तियों और वाक्य संयोजन की विधियों का समावेश हुआ है। इस सबसे हिन्दी भाषा के सामर्थ्य में अभिवृद्धि हुई है; फलत: हिन्दी सहज रूप से ज्ञान विज्ञान और आधुनिक विषयों से जुड़ रही है। यही कारण है कि वह वर्तमान वैज्ञानिक युग में हिन्दी की उपादेयता को विकसित कर रही है। यद्यपि भारत के कुछ प्रान्तों में हिन्दी व्यवहार की भाषा है, लेकिन 872 भाषाओं औऱ बोलियों के इस देश में वह ऐसी अकेली भाषा है जिसके सहारे आप पूरे देश में यात्राएँ कर सकते हैं। अनिवासी भारतीय सम्पूर्ण विश्व में फैले हुए हैं। विदेशों में 40 से अधिक देशों के 600 से अधिक विश्वविद्यालयों और स्कूलों में हिन्दी पढाई जाती है।

हिन्दी खाड़ी देशों (पाकिस्तान, नेपाल, भूटान,बांग्लादेश, म्यांमार, श्री लंका और मालदीव) के साथ-साथ अनेक देशों में भी बोली जा रही है। इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, चीन, मंगोलिया, कोरिया तथा जापान भारतीय संस्कृति की सराहना करते हैं, यही कारण है कि वहाँ हिन्दी बोली औऱ समझी जाती है। अनेक देशों यथा-अमेरिका, आस्ट्रेलिया,कनाडा और यूरोप के अनेक देशों में हिन्दी को आधुनिक भाषा के रूप में पढ़ाया जाता है। अरब और अन्य इस्लामी देशों में भी हिन्दी बोली व समझी जाती है । इस तरह स्पष्ट है हिन्दी अपने अप्रवासी जनसमूह के साथ विश्वजनमत का निर्माण करने में सक्षम है ; इस भाषा का सामर्थ्य बेलाग है, फिर भी जो प्रश्न अनुत्तरित हैं वे इसके अस्तित्व हेतु ज़रूरी जान पड़ते हैं ।

हिन्दी को आज भारतेन्दु सरीखे क्रांतिकारियों की जरूरत है जो उसी तरह कह सके कि- ‘भीतर तत्व न झूठी तेजी। क्यों सखि सज्जन ! को अंग्रेजी?’ वस्तुतः हिन्दी को संगोष्ठियों और दिन विशेष पर दिए जाने वाले वक्तव्यों और शोक प्रस्तावों की आवश्यकता नहीं है बल्कि ऐसे कामों की ज़रूरत है जिससे वह समृद्ध होती है और उसका माथा ऊँचा होता है। शिक्षा संस्थान इस दिशा में सार्थक पहल कर सकते हैं। अनेक गतिविधियों व दैनिक प्रयोग के माध्यम से शिक्षक छात्रों को मातृभाषा, राजभाषा से जोड़ सकते हैं। शिक्षा संस्थानों को विद्यार्थियों में पढ़ने की आदत उन पुस्तकों के माध्यम से विकसित करनी होगी जो भारतीय संस्कृति की थाती रही हैं। भाषा की प्रामाणिकता, शुद्धिकरण और मानकीकरण के लिए भाषाविज्ञों को श्रम करना होगा क्योंकि हिन्दी में मानक आदर्श पुस्तकों का अभाव है। अनेक देशों में ( मिसाल के तौर पर इटली) सार्वजनिक स्थानों पर अशुद्ध भाषा लिखना दण्डनीय अपराध है, लेकिन हम हमारी भाषा से खिलवाड़ करना नहीं छोड़ते हैं। हिन्दी के शुद्ध प्रयोग के लिए हर व्यक्ति को सजग होना पड़ेगा और ऐसे में शिक्षाविदों की जिम्मेदारी कुछ औऱ बढ़ जाती है। हिन्दी में आज साहित्य तो बहुत लिखा जा रहा है परंतु मानविकी, विज्ञान, चिकित्सा,मनोविज्ञान, इतिहास,समाजशास्त्र आदि की उच्च स्तरीय मौलिक पुस्तकें नगण्य हैं। इसके मूल में प्रकाशन और क्रय करने वाली संस्थाओं की मानसिकता भी है। इसके उपचार के लिए ज्ञान के इन क्षेत्रों में हिन्दी के मौलिक साहित्य के प्रकाशन को बढ़ावा देना होगा।

हिन्दी के विकास में अनुवाद महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है अतः अनुवाद को सर्वोच्च महत्त्व का काम समझते हुए, अनुवादकों का सही चयन और प्रशिक्षण देकर भाषायी श्रेष्ठ साहित्य को प्रकाश में लाकर सर्वसुलभ बनाना होगा। हिन्दी की प्रकृति जनवादी है, जबकि ज्यादातर अनुवाद क्लिष्ट और दूभर है अतः अनुवाद की इस भ्रांति को दूर करना होगा। इसके साथ ही सभी विषयों की मानक शब्दावली का संस्कार और एकमात्र शब्द का निर्धारण करना होगा, जिससे भाषागत एकरूपता का निर्माण होगा। हिन्दीभाषी प्रदेशों में आज भी हिन्दी वह वास्तविक सम्मान प्राप्त नहीं कर पाई है , जिसकी वह अधिकारिणी है अतः इन क्षेत्रों में राज-काज, शिक्षा आदि सभी स्तरों पर ईमानदारी व प्रतिबद्धता के साथ हिन्दी की वास्तविक प्रतिष्ठा करनी होगी। हिन्दी ग्रंथ अकादमियों को अधिकाधिक गतिशील बनाना होगा जिससे श्रेष्ठ ग्रंथों का प्रकाशन व अनुवाद संभव हो सके। इन उपायों से न केवल हिन्दी को व्यावहारिक प्रतिष्ठा मिलेगी वरन् अहिन्दीभाषियों में भी भाषा के प्रति गहरा सम्मान और विश्वास पैदा होगा। हिन्दी को राष्ट्रव्यापी भाषा बनाने और उसमें श्रेष्ठ साहित्य औऱ ज्ञान को संजोने के लिए जिस अध्यवसाय की ज़रूरत है उसका अभाव विश्वविद्यालयों में दिखता है। उल्लेखनीय है कि कई विश्वविद्यालय ऐसे भी हैं जहाँ हिन्दी विषय ही स्वीकृत नहीं है। हिन्दी में हो रहे शोध गुणवत्ता को खो रहे हैं। इन सभी दिशाओं में सोचकर सार्थक कदम उठाने होंगे जिससे हिन्दी की उन्नति व्यावहारिक धरातल पर हो सके।

आज यह भी प्रचारित किया जा रहा है कि हिन्दी रोज़गार देने में सक्षम नहीं है और इसलिए यह जीवन की विविध अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरती है ।संभवतः यही कारण है कि हमारी नई पीढ़ी युवा हिन्दी माध्यम से पढ़ने औऱ जुड़ने को लालायित नही रहते और जो हिन्दी से उच्चशिक्षा प्राप्त करते हैं, उनमें भी सबल आत्मविश्वास उत्पन्न नहीं हो पाता। वे स्वयं को कम आंक कर हीन महसूस करते हैं । दरअसल यह एक भ्रांति है कि हिन्दी रोजगार सुलभ नहीं है। आज हिन्दी में रोजगार के अनेक अवसर उपलब्ध हैं। अनुवाद, प्रिंट व सोशल मीडिया, भाषा विशेषज्ञ तथा प्रशासनिक सेवाओं जैसे प्रतिष्ठित अवसर हिन्दी सुलभ कराती है। अब तो कम्प्युटर के लिए भी दुनिया की सर्वश्रेष्ठ और वैज्ञानिक लिपि देवनागरी मानी जाती है। जो लिपि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य होने लगी है उस पर अपने मूल स्थान पर ही प्रश्नचिह्न लगाना चौंकाता है। विडम्बना यह है कि हम अपनी स्वयंसिद्धा व सर्वसमावेशी भाषा की शक्ति को नकारते हैं, उसकी महत्ता व उपादेयता का ठीक ढंग से आकलन नहीं कर पाते हैं। जिसके कारण अपने ही घर में हमारी सांस्कृतिक विरासत व मूल्यों को सहेजने वाली हिन्दी हेय होती जा रही है। आज बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हिन्दी की अहमियत को समझ रही है । भले ही हिंग्लिश के प्रयोग के साथ ही परन्तु वे हिन्दी को अपना रही हैं क्योंकि हिन्दी का एक बहुत बड़ा वैश्विक बाज़ार है औऱ इसी बाज़ार के कारण एक और प्रश्न समानान्तर खड़ा हो गया है कि क्या हिन्दी बाज़ार की भाषा है औऱ अगर हिन्दी बाज़ार की भाषा बन रही है तो यह बात निःसंदेह चौकाने वाली है और अतिरिक्त सतर्कता के प्रति आगाह करने वाली है क्योंकि तब हमें इसके मानकीकरण की तरफ ठोस कदम उठाने होंगें। क्योंकि बाज़ार भाषा के प्रति जवाबदेही तय नहीं करता वह केवल भाषा का अपने हिसाब से प्रयोग करता है। वहाँ महज़ व्यावसायिकता का बोलबाला होता है। कई बार लचीलेपन की ओट में उस के शब्दों और व्याकरण के साथ भी खिलवाड़ करने की कोशिश करता है। वर्तमान में प्रिंट मीडिया इसका सजग उदाहरण है। अतः यह निःसंदेह खुशी और सम्मान की बात है कि हिन्दी वैश्विक धरातल पर अपनी पहचान बना रही है परन्तु साथ ही इस पहचान को कायम रखने और हिन्दी के वास्तविक स्वरूप को सहेजने की जिम्मेदारी भी हमें ही वहन करनी है। अगर हिन्दी को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनानी है तो अपनी मौलिकता को बरकरार रखना होगा और इसके लिए हिन्दी के प्रति नव पीढ़ी का रूझान भी उतना ही मायने रखता है। यह तय है कि इस दुर्निवार भूमंडलीकरण के युग में भाषा में बदलाव आएँगें; परन्तु तकनीक के भँवरजाल में कुछ सहजताओं और लचीलेपन को अपनाते हुए अगर हम हिन्दी के वास्तविक स्वरूप को अक्षुण्ण रख पाते हैं तो यह निःसंदेह हमारे लिए औऱ हमारी भाषा के सहेजन के लिए एक उपलब्धि होगी। हम जानते हैं कि हिन्दी को अभी भी एक लम्बी दूरी, सफर तय करना है, लेकिन दूरियाँ चलने से ही तय होंगी,यह विश्वास कायम रखना होगा। भाषा को लेकर हमारे पूर्वजो में एक जुनून रहा है , उस संघर्ष की लाज हिन्दी के अधिकाधिक एवं शुद्ध प्रयोग से करनी होगी। हिन्दी के लिए उत्सर्ग और संघर्ष करने वालों को सलाम करते हुए ही संभवतः निराला ने लिखा होगा-

‘मेरी राख को हिन्दुस्तान के कोने-कोने में बिखेर दिया जाए

ताकि लोग उसे रौंदे, लेकिन हिन्दी को गलत न समझे।’

संदर्भ सूची-

  1. छांदोग्यपनिषद्-729
  2. यास्क – निरूक्त, प्रथम अध्याय, प्रथम पाद
  3. दण्डी-काव्यादर्श-113
  4. दण्डी-काव्यादर्श- प्रथम अध्याय, चतुर्थ श्लोक)
  5. हिन्दी दशा और दिशा- प्रभाकर श्रोत्रिय- हिमाचल पुस्तक भंडार, दिल्ली-पृ.13, प्रथम संस्करण-1995
  6. यथोपरि- पृ.34
  7. राजभाषा के संदर्भ में हिंदी आंदोलन का इतिहास- उदयनारायण दुबे-पृ.-100
  8. राजभाषा हिन्दी-डॉ सेठ गोविंद दास – हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग,(1965)( कौन सभा में संविधान की कार्रवाई चलेगी- शीर्षक से अध्याय)
  9. रिपोर्ट ऑफ द ऑफिशियल लैंग्वेज कमीशन ( 1956) भारत सरकार, पृ.286
  10. राजभाषा भारती- अप्रेल-जून-1979, अंक-5, दीक्षांत भाषण कृपानारायण सचिव, राजभाषा विभाग, पृ.11
  11. हिन्दी भाषा का राजकाज में प्रयोग,डॉ रामबाबू शर्मा शोध ग्रंथ(आगरा विश्वविद्यालय),पृ.11-12
  12. डॉ. रामविलास शर्मा, भाषा और समाज,पृ.457

संपर्क भाषा के रूप में भारत में हिंदी

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संपर्क भाषा के रूप में भारत में हिंदी

अनुक्रम

रश्मि रानी, पीएच.डी. (भाषा प्रौद्योगिकी)
भाषा प्रौद्योगिकी विभाग, भाषा विद्यापीठ
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)

किसी भी भाषा को संपर्क भाषा का दर्जा मिलना बहुत बड़ी बात होती है क्योंकि संपर्क भाषा जोड़ने का कार्य करती है। परस्पर संपर्क बनाए रखने के लिए संपर्क भाषा का होना बहुत आवश्यक है। एक व्यक्ति को दूसरे भाषा समुदाय के व्यक्ति से, एक प्रांत को दूसरे प्रांत से, एक देश को दूसरे देश से संपर्क स्थापित करने के लिए जिस भाषा का प्रयोग किया जाता है वही संपर्क भाषा कहलाती है। संपर्क भाषा मातृभाषा से अलग भाषा होती है जो हमें अपने भाषा समुदाय से भिन्न भाषा समुदाय से संपर्क स्थापित करने में मदद करती है। जिस प्रकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेजी को संपर्क भाषा का दर्जा प्राप्त है उसी प्रकार राष्ट्रीय स्तर पर भारत में हिंदी को संपर्क भाषा का दर्जा दिया गया है। बोधगम्यता को भाषा-बोली के निर्धारण का आधार माना जाए तो हिंदी को संपूर्ण उत्तर भारत की संपर्क भाषा माना जा सकता है। दक्षिण भारत में भले ही हिंदी को लेकर विरोध की स्थिति बनी रहती है तत्पश्चात भी कुछ हद तक हिंदी संपर्क भाषा का कार्य कर रही है। हालाँकि अंग्रेजी भी एक संपर्क भाषा के रूप में कार्य कर रही है। किंतु एक आम शिक्षित भारतीय यदि पूरे देश की यात्रा पर निकलता है तो संपर्क भाषा के रूप में हिंदी ही उसकी लाठी बनती है। इसीलिए सही मायने में हिंदी ही भारत की संपर्क भाषा है अंग्रेजी ने तो भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर रखी है। अंग्रेजी सिर्फ पढ़े लिखे उच्च वर्ग के लिए संपर्क भाषा का कार्य कर सकती है। कुछ लोगों के द्वारा फैलाया गया ये मायाजाल से मुक्ति हिंदी के भले के लिए बहुत आवश्यक है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के दौरान भी हिंदी भिन्न भाषा-भाषी लोगों के बीच संपर्क स्थापित करने का साधन रही और उसने देशवासियों को एकता के सूत्र में पिरोया। हिंदी के इसी महत्त्व के कारण महामा गाँधी ने कहा था- “प्रांतीय भाषा या भाषाओँ के बदले में नहीं बल्कि उनके अलावा एक प्रांत से दूसरे प्रांत का संबंध जोड़ने के लिए सर्वमान्य भाषा की आवश्यकता है और ऐसी भाषा तो एकमात्र हिंदी या हिन्दुस्तानी ही हो सकती है।”

कोई भाषा तभी तक चहुंमुखी विकास कर पाती है जब तक उसका संपर्क आम जनता से रहता है। जीवित भाषा निरंतर विकास की ओर अग्रसर रहती है। हिंदी अपने उद्भव काल से ही विभिन्न प्रदेशों की संपर्क भाषा रही है। डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार अकबर के महल में बोलचाल की भाषा हिंदी ही थी। अंग्रेजी शासन स्थापित हो जाने के बाद अंग्रेज़ अफसर भारत की आम जनता से संपर्क साधने के लिए हिंदी भाषा सीखते थे। हिंदी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों का प्रमुख हथियार भी थी।

मध्य देश की हिंदी जो दसवीं सदी के आसपास एक सीमित क्षेत्र सूरसेन प्रदेश (मथुरा के आस पास) में बोली जाती थी वह विकसित होते-होते इतनी सक्षम हो गई की भारत के विभिन्न प्रदेशों की संपर्क भाषा के रूप में सहर्ष स्वीकार कर ली गई।

हिंदी भाषियों की संख्या व हिंदी भाषा का सामर्थ्य हिंदी को राष्ट्र व संपर्क भाषा का दर्जा देने के लिए उपयुक्त है किंतु हिंदीतर प्रदेश का हिंदी के प्रति विरोध हिंदी को संपर्क भाषा का दर्जा देने का विरोध करता आ रहा है। उन्हें अपनी भाषा न्यून होती नज़र आने लगती है जो सत्य नहीं है। विश्व में अंग्रेजी के ज्ञान का महत्व सब जानते हैं किंतु हिंदी को स्वीकार करने का आशय अंग्रेजी का विरोध करना बिल्कुल नहीं है। भारत में बोली जाने वाली अन्य भाषाओँ की अपेक्षा हिंदी का फलक इतना बड़ा है कि दिन-प्रतिदिन हिंदी बोलने वाले भारतीयों की संख्या बढ़ती जा रही है। भारत की अन्य किसी भाषा की अपेक्षा हिंदी में ये योग्यता अधिक है कि वो दो समुदायों की बात समझ व समझा पाए।

हिंदी के बढ़ते प्रयोग का अंदाजा प्रस्तुत आंकड़ों पर नज़र डालकर लगा सकते हैं जो ये बताते हैं कि किस प्रकार हिंदी ने संपर्क भाषा के रूप में अपनी जड़ें जमाई हैं-

वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार भारत के लगभग ४१.३ % लोगों द्वारा हिंदी भाषा का प्रयोग किया जाता है। times of india अख़बार के 19 जून 2014 के अंक के अनुसार 1971 से मातृभाषा के रूप में हिंदी बोलने वाले लोगों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। कुल जनसंख्या में हिंदी बोलने वालों की संख्या 1971 में 36.99 % थी जो 1981 में बढ़कर 38.74% और 1991 में 39.29% हो गई।

हिंदी को जनभाषा और संपर्क भाषा बनाने में इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। हिंदी फिल्मों और फ़िल्मी गीतों ने हिंदी को लोकप्रिय बनाने में महती भूमिका निभाई है। अहिंदी भाषी राज्यों में हिंदी फिल्में और गीत्त बहुत लोकप्रिय हैं। प्राचीन समय की बात की जाए तो हिंदी साहित्यकारों ने भी हिंदी को प्रचारित करने में मुख्य भूमिका निभाई है। हिंदी के प्रारंभिक उपन्यासकार देवकीनंदन खत्री ऐसे उपन्यासकार रहे हैं जिनके उपन्यासों को पढ़ने के लिए लोग हिंदी सीखते थे। उनके कुछ उपन्यास जैसे चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति तो पूरे भारत में लोकप्रिय हुए। हिंदी को संपर्क भाषा बनाने में हिंदी साहित्यकारों का भी मुख्य योगदान रहा है। दक्षिण भारतीय हिंदी साहित्यकार भी हिंदी को दक्षिण में मज़बूत स्थिति प्रदान करने के कार्य में लगे हुए हैं। श्री आरिगपुडि रमेश चौधरी, श्री बालशौरि रेड्डी, के नारायण, डॉ. एन चंद्रशेखरन नायर, डॉ. रामन नायर, डॉ. पी आदेश्वर राव, डॉ. रामन नायर, आनंद शंकर माधवन, जी. सीतारामय्या, पि. नारायण “नरन” आदि प्रमुख दक्षिण भारतीय हिंदी साहित्यकार हैं। इन साहित्यकारों ने अपनी मातृभाषा के साथ-साथ हिंदी लेखन के क्षेत्र में भी नाम कमाया। इनकी हिंदी रचनाएं भी हिंदी को दक्षिण भारत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

दक्षिण भारत में हिंदी को भले ही विरोध का सामना करना पड़े किंतु सच्चाई यही है कि यदि एक उत्तर भारतीय को दक्षिण भारत में जाना पड़े तो उसे हिंदी का ही सहारा मिलेगा। अंग्रेजी कम “पढ़े लिखे भारतीयों के लिए संपर्क भाषा का कार्य नहीं कर सकती। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कहा था कि “हिंदी इसलिए बड़ी नहीं है कि हममें से कुछ इस भाषा में कहानी या कविता लिख लेते हैं या सभा मंचों पर बोल लेते हैं। वह इसलिए बड़ी है कि कोटि-कोटि जनता के हृदय और मस्तिष्क की भूख मिटाने में यह भाषा इस देश का सबसे बड़ा साधन हो सकती है। यदि देश में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को हमें जन-साधारण तक पहुँचाना है तो इसी भाषा का सहारा लेकर हम काम कर सकते हैं।”

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अनुसार देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को भारत संघ की राजभाषा घोषित किया गया है । हिंदी को राजभाषा इसलिए बनाया गया क्योंकि यह भारत की अधिकांश जनता द्वारा बोली तथा समझी जाने वाली भाषा थी। हिंदी भाषी क्षेत्र के अधिकांश व्यक्ति सीमित एवं व्यापक तथा औपचारिक संदर्भों के लिए हिंदी का प्रयोग करते हैं। जबकि अन्य भाषाओँ के बोलने वालों के लिए देश से खुद को जोड़ने के लिए हिंदी एक संपर्क भाषा का कार्य करती है। ब्रिटिश काल में अंतर-भाषाई संपर्क के लिए अंग्रेजी को संपर्क भाषा के रूप में विकसित किया गया था। यह दायित्व अंग्रेजी निभाती तो रही लेकिन अत्यंत सीमित क्षेत्र में। अंग्रेजी की अपेक्षा हिंदी संपर्क भाषा के रूप में कहीं अधिक सक्षम है। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में कोई भी भाषा किसी पर अनचाहे रूप से थोपी नहीं जा सकती।

भारतीय भाषा नियोजन की यह विशेषता रही है कि हिंदी को किसी अन्य भारतीय भाषा या अंग्रेजी के प्रतिस्पर्धी के रूप में नहीं रखा गया है। यह सर्वविदित है कि कोई भी भाषा अभिव्यक्ति-माध्यम के रूप में अक्षम या कम क्षमता रखने वाली नहीं होती, विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोग के अवसर मिलने पर ही भाषा सक्षम बनती चली जाती है। हिंदी को वो अवसर प्राप्त होता चला गया जिसे वो अन्य किसी भारतीय भाषा की अपेक्षा अधिक सक्षम रूप में सामने आई। हिंदी भारत में ही नहीं भारत के बहार भी विश्व के अनेक देशों में बोली, समझी और पढाई जाती है। आज विश्व के लगभग 150 विश्वविद्यालयों में हिंदी के पठन–पाठन की व्यवस्था है। विदेशों में बसे करोड़ों की संख्या में प्रवासी भारतीयों औरर भारतीय मूल के लोगों के बीच आत्मीयता के संबंध सूत्र स्थापित करने और उन्हें भारत, भारतीयता, और भारतीय संस्कृति से निरंतर जोड़े रखने में हिंदी एक सशक्त माध्यम का काम कर रही है और इसी में वे अपनी अस्मिता की पहचान भी देख रहे हैं।

भारत के प्रथम लोकसभा स्पीकर अनंतशयनम आयंगार के अनुसार – “अहिंदी भाषा-भाषी प्रांतों के लोग भी सरलता से टूटी –फूटी हिंदी बोलकर अपना काम चला लेते हैं”।
पंडित नेहरु ने हिंदी की सशक्तता का वर्णन करते हुए कहा था कि “हिंदी स्वयं अपनी ताकत से बढ़ेगी”।

हिंदी में रोज़गार के बढ़ते अवसर भी हिंदी के प्रसार में महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ है। बढ़ते रोज़गार अवसरों ने भी हिंदी सीखने के प्रति लोगों की रुचि को बढ़ाया है। हिंदी का क्षेत्र किसी अन्य भारतीय भाषा की तुलना में अधिक व्यापक है। इस प्रकार भारत में एक राज्य को दुसरे राज्य से यदि कोई भाषा जोड़ सकती है तो वो मात्र हिंदी ही है। अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भले ही देशों को जोड़ने वाली भाषा हो किंतु भारत में संपर्क भाषा के रूप में हिंदी अधिक सशक्त साबित हुई है। यहां तक कि विदेशी कंपनियों को भी भारत में अपनी पहचान बनाने के लिए अंग्रेजी से अधित हिंदी का सहारा लेना पड़ता है। संचार माध्यम भी हिंदी के द्वारा सूचनाओं को प्रसारित करना अधिक उपयोगी समझते हैं। यही कारण है कि अंग्रेजी समाचार चैनलों द्वारा अपने हिंदी चैनल भी शुरू किए जा रहे हैं। इस प्रकार हिंदी कितनी सशक्त और विकास की ओर अग्रसर है इसका अनुमान संपूर्ण भारत में हिंदी की लोकप्रियता और मौजूदगी देखकर लगाया जा सकता है। अंग्रेजी के मायाजाल से निकलना हमारे लिए आवश्यक है।

निम्नलिखित विद्वानों की के ये हिंदी के संपर्क भाषा रूप की भूमिका को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है –

देवव्रत शास्त्री के अनुसार “ हिंदी जानने वाला व्यक्ति देश के किसी भी कोने में जाकर अपना काम चला लेता

है।”

अंतरराष्ट्रीय ख्याती के एक विद्वान राजनयिक डा. स्मेकल ने कहा था कि “भारतवासियों से बातें करते हुए हिंदी निरंतर मेरे समीप रही संपर्क भाषा के रूप में।“

मरघट लाशों से पट गया-प्रियंका पांडेय त्रिपाठी

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silhouette of two person on boat
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जो कल तक थे अपने,
वे लावारिश लाश हो गए।
कुछ नदी के किनारे पड़े,
तो कुछ नदी में तैर रहे।।

मरघट लाशों से पट गया और,
किसी को ना हुई चिता भी नसीब।
कुछ हुए बेबस लाचार मजबूर,
तो किसी का मर गया जमीर।।

धर्म के ठेकेदार बैठे हैं चुप्पी साधकर,
आज नही पड़ता कोई भी फर्क ,
किसे जलाया?किसे किया दफन?
और किसे नोच रहे चील-श्वान?

प्रियंका पांडेय त्रिपाठी
स्वरचित एवं मौलिक

अनूदित लातिन अमेरिकी कहानी-एक पीला फूल

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yellow Daisy flower
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(अनूदित लातिन अमेरिकी कहानी)

एक पीला फूल

मूल : जूलियो कोर्टाज़ार

अनुवाद : सुशांत सुप्रिय

हम अमर हैं । मैं जानता हूँ , सुनने में यह किसी चुटकुले जैसा लगता है । मैं जानता हूँ क्योंकि मैं इस नियम के अपवाद से मिला । मैं एकमात्र नश्वर व्यक्ति से मिला । उसने मुझे अपनी कहानी कैम्ब्रॉन के एक शराबख़ाने में सुनाई । वह पिए हुए था इसलिए वह बिना फ़िक्र किए मुझे सच्चाई बता सका , हालाँकि शराबख़ाने का मालिक , वहाँ काम करने वाले लोग और वहाँ नियमित रूप से आने वाले पियक्कड़ — सभी उसकी बातें सुन कर इतना हँस रहे थे कि हँसते-हँसते उनकी आँखों से दारू बाहर आने लगी थी । मेरे चेहरे को देखकर उसे लगा होगा कि मुझे उसकी कहानी अच्छी लग रही है । इसलिए धीरे-धीरे वह मेरी ओर खिसक आया । अंत में हम दोनों कोने की एक मेज़ की ओर चले गए ताकि हम वहाँ बैठकर पी सकें और आराम से बातें कर सकें ।

उसने मुझे बताया कि वह नौकरी से अवकाश ग्रहण कर चुका था और उसकी पत्नी गर्मी के इस मौसम में अपने माता-पिता के पास रहने चली गई थी । हालाँकि उसके यह कहने के लहज़े से मुझे ऐसा लगा जैसे उसकी पत्नी उसे छोड़ गई थी । दिखने में वह ज़्यादा बूढ़ा नहीं लग रहा था और बेवक़ूफ़ तो बिलकुल नहीं । उसका चेहरा सूखा हुआ-सा था और उसकी आँखें तपेदिक के मरीज़ जैसी थीं । सच कहूँ तो वह ग़म ग़लत करने के लिए पी रहा था , जैसा कि उसने शराब का अपना पाँचवॉं गिलास शुरू करते हुए बताया । लेकिन मैं उस शख़्स में पेरिस की गंध नहीं ढूँढ़ पाया — पेरिस की वह ख़ास गंध जिसे हम विदेशी आसानी से ढूँढ़ लेते हैं । उसके नाख़ून क़रीने से कटे हुए थे और उन पर कोई दाग-धब्बे नहीं थे ।

उसने मुझे बताया कि कैसे उसने इस लड़के को पंचानवे नम्बर की बस में देखा था । वह लगभग तेरह साल का लड़का था । वह बूढ़ा कुछ देर तक उसे टकटकी बाँधे देखता रहा और तब अचानक उसे यह हैरानी भरा अहसास हुआ कि दिखने में वह लड़का हू-ब-हू उसी की तरह लगता था , कम-से-कम उस लड़के की उम्र में वह जैसा दिखता था , ठीक वैसा । धीरे-धीरे वह पक्के तौर पर इस नतीजे पर पहुँचा कि वह लड़का उसकी किशोरावस्था का हमशक्ल ही था । लड़के की एक-एक चीज़ हू-ब-हू उस के जैसी थी — उसका चेहरा , उसके हाथ , माथे पर गिर आए उसके घुँघराले बाल , उसकी आँखें । और इनसे भी ज़्यादा उसका शर्मीलापन , कहानियों की किताब में शरण ढूँढ़ने का उसका ढंग , पीछे की ओर सिर झटक कर अपने माथे पर गिर आई लटों को हटाने का उसका तरीका , और अनाड़ियों जैसी उसकी हरकतें । लड़के की शक़्ल-सूरत और हाव-भाव उससे इतना ज़्यादा मिलते थे कि उसे इस बात पर हँसी आ गई , लेकिन जब वह लड़का रेनेस नाम की जगह पर बस से उतरा तो वह बूढ़ा भी उसके पीछे-पीछे वहीं बस से उतर गया , हालाँकि उसे मौंटपारनैसे जाना था जहाँ उसका एक दोस्त उसका इंतज़ार कर रहा था ।

लड़के से बात करने का बहाना ढूँढ़ते हुए बूढ़े ने उससे किसी ख़ास सड़क के बारे में पूछा और जवाब में उसने वह आवाज़ सुनी जो ठीक उसकी किशोरावस्था की आवाज़ जैसी थी । वह लड़का भी उधर ही जा रहा था और कुछ देर तक वे दोनों चुपचाप एक साथ चलते रहे । तनाव से भरे उस पल में अचानक उसके ज़हन में जैसे कोई रहस्योद्घाटन हो गया ।

मोटे तौर पर बात यह थी कि उसने उस लड़के का घर देख लेने का बहाना ढूँढ़ लिया । साथ ही उसने क़िले जैसे बने उस फ़्रांसीसी घर में बेरोक-टोक आने-जाने का तरीक़ा भी ढूँढ़ लिया । दरअसल , वह कुछ समय तक एक गुप्तचर के रूप में काम कर चुका था । फिर भला उसकी यह ख़ूबी कब काम आती ।

उस लड़के के घर में बदहाली की एक मर्यादित गंध थी । वहाँ अपनी उम्र से बूढ़ी दिखने वाली उसकी माँ थी , काम से अवकाश ग्रहण कर चुके उसके मामा थे और दो पालतू बिल्लियाँ थीं । बाद में उनसे घुलना-मिलना ज़्यादा मुश्किल नहीं रहा । संयोग से बूढ़े के चचेरे भाई का बेटा उस लड़के का अच्छा दोस्त था और वह बूढ़ा इसी बहाने उस लड़के ल्यूक से मिलने हर हफ़्ते उसके घर जाने लगा । लड़के की माँ बूढ़े को गरम-गरम कॉफ़ी पिलाती और वे दोनों युद्ध , नौकरी और ल्यूक के बारे में बातें करते रहते ।

जो बात एक आकस्मिक खोज से शुरू हुई थी वह अब रेखागणित के प्रमेय-सी विकसित हो रही थी । यह एक ऐसी शक़्ल ले रही थी जिसे लोग किस्मत कहते

हैं । यदि रोज़मर्रा के शब्दों में कहें तो ल्यूक दोबारा अस्तित्व में आया उसी बूढ़े का रूप था । यानी नश्वरता जैसी कोई चीज़ नहीं थी । हम सभी अमर थे ।

” हम सब के सब अमर हैं , बुज़ुर्गवार ! हालाँकि कोई इसे साबित नहीं कर सका था , किंतु इसे मेरे साथ होना था — पंचानवे नम्बर की बस पर । जैसे पूरे तंत्र में थोड़ा-सा खोट । जैसे लहरदार समय का दोहराव। मेरा मतलब है , हू-ब-हू वही ।

जैसे उसने किशोरावस्था की मेरी देह धारण कर ली हो । जैसे वह मेरा अवतार हो । लेकिन उसी समय में । मेरे बाद नहीं । यदि ढंग से सोचा जाए तो जब तक मेरी मृत्यु नहीं हो जाती , ल्यूक को पैदा ही नहीं होना चाहिए था । और फिर उस अनोखे हादसे के बारे में आप क्या कहेंगे जब शहर की भीड़ भरी बस में मेरी मुलाक़ात अपने ही पुराने प्रतिरूप से हो गई ! है न हैरानी की बात ? लेकिन ऐसे मामले में आप भौंचक्के रह जाते हैं । आपको लगता है कि ऐसा कैसे हो सकता है । कहीं आपका दिमाग़ तो नहीं घूम गया । हालत यह हो जाती है कि आपको अपने चित्त को शांत करने के लिए दवाइयाँ खानी पड़ती हैं ।

” जब मैं अपने मन की बात लोगों से कहता तो वे मुझ पर हँसते । मैं साफ़ देख सकता था कि वह मेरी किशोरावस्था का प्रतिरूप था , बल्कि वह भविष्य में भी ठीक मेरी ही तरह बनने वाला था । यह सिरफिरा जो अभी आप से बात कर रहा है ,

ठीक उसकी तरह । उस के हाव-भाव , उसका व्यवहार , उसका पूरा व्यक्तित्व हू-ब-हू मेरा ही था । वह ठीक मेरी तरह खेलता था । वैसे ही गिरता और चोट खाता था । मेरी ही तरह उसके पैरों में भी मोच आ जाती थी । और वह मेरी ही तरह घबराता और शर्माता था ।

” ल्यूक की माँ मुझे अपने बेटे की हर बात बताती जबकि वह बेचारा लज्जित या परेशान-सा वहीं खड़ा हो कर यह सब सुन रहा होता । उसकी नितांत निजी और अंतरंग बातें भी … उसके बचपन की घटनाएँ — उसके पहले दाँत के उगने का क़िस्सा , जब वह आठ साल का था तो कैसे चित्र बनाता था , उसकी बीमारियाँ … उसकी माँ को बातें करना अच्छा लगता था । एक बात तो तय थी कि उसे कभी मुझ पर संदेह नहीं हुआ । उसके मामा मेरे साथ शतरंज खेलते थे । दरअसल मैं उसके परिवार का हिस्सा बन गया था । यहाँ तक कि कभी-कभी महीने के अंत में तंगी के दिनों में मैं उन्हें घर चलाने के लिए पैसे भी उधार दे देता था ।

” ल्यूक के अतीत के बारे में जानना आसान था । घर के बुज़ुर्गों से बातचीत के दौरान मासूम से सवाल पूछने भर की देर थी । चाचा जी के गठिया , देश की राजनीति और बढ़ती बेईमानी की बातों के बीच ल्यूक का ज़िक्र भी आ जाता ।

इसलिए शतरंज की चालों और मांस की क़ीमत में वृद्धि की गम्भीर चर्चा के बीच मुझे ल्यूक के बचपन की घटनाओं के बारे में भी पता चला और छोट-छोटे साक्ष्य मिलकर ठोस सबूत बन गए । लेकिन मैं चाहता हूँ कि आप मेरी बात ठीक से समझें । इस बीच हम बैरे से कुछ और मँगवाते हैं ।

” तो मैं कह रहा था कि बचपन में मैं जैसा था , ल्यूक इस समय ठीक वैसा ही था । लेकिन वह हू-ब-हू मेरा प्रतिरूप नहीं था । उसे समरूप कह सकते हैं ,

समझे ? मेरा मतलब है , जब मैं सात साल का था तो मेरी कलाई की हड्डी उतर गई थी जबकि उस उम्र में ल्यूक के कंधे की हड्डी उतर गई थी । नौ की उम्र में मुझे

‘खसरा’ हो गया था जबकि उसे इसी उम्र में ऐसा बुखार हो गया था जिसमें उसकी देह पर लाल चकत्ते निकल आए थे । ‘ खसरा ‘ की वजह से मैं दो हफ़्तों तक बीमार रहा था जबकि ल्यूक पाँच दिनों में ठीक हो गया था । देखिए , समय के साथ विज्ञान तरक़्क़ी करता ही है । तो यह सारा मामला एक दोहराव था ।

” चलिए , मैं आपको एक और उदाहरण देता हूँ । कोने पर जो बेकरी की दुकान है , उसका मालिक नेपोलियन का प्रतिरूप है । लेकिन वह यह बात नहीं जानता क्योंकि प्रतिरूप में कोई बदलाव नहीं हुआ है । मेरा मतलब है , नानबाई की दुकान का वह मालिक कभी भी शहर की किसी बस में असली नेपोलियन से नहीं मिल पाएगा ; पर यदि किसी तरह उसे इस सच्चाई का पता चला तो शायद वह यह जान पाए कि वह नेपोलियन का दोहराव है , कि वह अब भी नेपोलियन को ही दोहरा रहा है । बर्तन धोने वाले व्यक्ति से एक ठीक-ठाक बेकरी का मालिक बनने तक की उसकी यात्रा में कॉर्सिका से फ़्रांस के सिंहासन तक की नेपोलियन की यात्रा का साम्य ढूँढ़ा जा सकता है । और यदि उस बेकरी के मालिक ने ध्यान से अपने जीवन की घटनाओं का अध्ययन किया तो उसे अपने जीवन में भी नेपोलियन के जीवन से मेल खाती घटनाओं का अंबार दिखने लगेगा — मिस्र का अभियान , वाणिज्य-दूतावास की घटना , ऑस्टरलिट्ज़ का युद्ध आदि । सम्भवत: उसे इस बात का आभास भी हो जाए कि कुछ बरसों के बाद उसकी बेकरी के साथ कुछ गड़बड़ होने वाली है । हो सकता है , उसका अंत भी नेपोलियन की तरह ही सेंट हेलेना जैसी किसी जगह में हो — छठे माले पर स्थित किसी एक कमरे वाली तंग जगह में । क्या उसके लिए यह भी नेपोलियन की पराजय की तरह नहीं होगा ? चारो ओर एकाकीपन के जल से घिरा हुआ । तब भी उस बेकरी पर गर्व करता हुआ जो उसके जीवन में किसी राजसी ठाठ से कम नहीं थी । आप समझे ? “

देखिए , मैं सब कुछ समझ रहा था , लेकिन मुझे यह भी लगा कि हम सभी लगभग उसी उम्र में बचपन में बीमार हुए होंगे और फ़ुटबॉल खेलते हुए तक़रीबन हम सभी ने कुछ-न-कुछ तोड़ा होगा ।

” मैं जानता हूँ , मैंने प्राय: दिखने वाले सामान्य संयोगों के अलावा और किसी चीज़ का उल्लेख नहीं किया है । उदाहरण के लिए , यदि आप बस में हुए रहस्योद्घाटन पर विचार करें तो भी ल्यूक का मेरे जैसा दिखना किसी गम्भीर महत्त्व की बात नहीं कही जा सकती । लेकिन जो बात महत्त्वपूर्ण थी वह थी घटनाओं का क्रम । और इसे समझा पाना मुश्किल है क्योंकि इसमें चरित्र और स्वभाव शामिल हैं , ग़ैर-सटीक स्मृतियाँ शामिल हैं , बचपन की पौराणिक कथाएँ शामिल हैं । जब मैं ल्यूक की उम्र का था , तो मैं एक बहुत बुरे समय से गुज़र रहा था जिसकी शुरुआत एक लम्बी बीमारी से हुई थी । स्वास्थ्य-लाभ के बीच में ही कुछ मित्रों के साथ खेलते हुए मेरी बाँह टूट गई । जैसे ही मेरी बाँह ठीक हुई , मुझे अपने स्कूल के एक मित्र की बहन से बेइंतहा प्यार हो गया । हे ईश्वर , यह ऐसा दुखदायी था जैसे आप उस लड़की से नज़रें नहीं मिला पा रहे हों क्योंकि वह आपका मज़ाक उड़ा रही है । ल्यूक भी बीमार पड़ा और जब वह कुछ ठीक होने लगा था , वे उसे लेकर सर्कस देखने गए जहाँ वह फिसल कर गिर गया और उसके टखने का जोड़ उखड़ गया । इस घटना के कुछ ही समय बाद एक दिन दोपहर में ल्यूक की माँ ने संयोग से उसके हाथों में लिपटा हुआ एक छोटा-सा रुमाल देखा जब वह खिड़की के सामने खड़ा रो रहा था। । उसकी माँ ने वह रुमाल पहले कभी नहीं देखा था । “

चूँकि किसी को तो इस चर्चा को आगे बढ़ाना ही था , इसलिए मैंने कहा कि छिछला प्यार चोटों , टूटी हड्डियों और सीने में दर्द का अपरिहार्य सहगामी होता

है । लेकिन मुझे यह मानना पड़ा कि खिलौने वाले हवाई जहाज का मामला अलग क़िस्म का था । वह हवाई जहाज ल्यूक को अपने जन्म-दिन पर मिला था जिसके नोदक को रबड़-बैंड चलाता था ।

” जब ल्यूक को यह तोहफ़ा मिला तो मुझे उत्थापक-यंत्र वाला अपना उपहार याद आ गया जो मेरी माँ ने मुझे तब दिया था जब मैं चौदह साल का था । और मुझे याद आ गया कि उसका क्या हुआ था । मैं बाहर बगीचे में था हालाँकि आँधी आने वाली थी । बादलों की गड़गड़ाहट साफ़ सुनाई दे रही थी । गली से लगे मुख्य दरवाज़े के पास उगे पेड़ के नीचे पड़ी मेज पर मैं उस समय मशीन को जोड़ रहा था । तभी किसी ने मुझे मकान में से पुकारा और मुझे एक मिनट के लिए भीतर जाना पड़ा । किंतु जब मैं लौटा तो मैंने पाया कि मेरा बक्सा और उत्थापक-यंत्र ग़ायब थे और मुख्य द्वार पूरा खुला हुआ था । निराशोन्मत्त हो कर चीख़ता हुआ मैं बाहर गली की ओर भागा लेकिन वहाँ कोई भी नहीं था । उसी पल सड़क के उस पार मकान पर बिजली गिरी ।

” यह सब एक झटके में हो गया और मैं यही सब याद कर रहा था जब ल्यूक अपने हवाई-जहाज के खिलौने को उतनी ही खुशी से देख रहा था जितनी खुशी से मैंने अपने उत्थापक-यंत्र को देखा था । उसकी माँ मेरे लिए कॉफ़ी ले आई और हम आपस में सामान्य बातचीत करने लगे । तभी हमें एक चीख़ सुनाई दी । ल्यूक दौड़ कर कमरे की खिड़की तक गया था और वहाँ ऐसे खड़ा था जैसे वह खिड़की में से बाहर कूद जाना चाहता था । उसका चेहरा पीला पड़ गया था और उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे । किसी तरह वह हमें बता पाया कि उसका हवाई जहाज वाला खिलौना हवा में मुड़ा था और आधी खुली खिड़की में से होता हुआ बाहर जा कर ग़ायब हो गया था । वह हवाई जहाज हमें अब कभी नहीं मिलेगा — ल्यूक बुदबुदाता रहा । वह तब भी सुबक रहा था जब हमें निचली मंज़िल पर शोर सुनाई दिया । तभी उसके चाचा यह ख़बर ले कर दौड़ते हुए आए कि गली के उस पार स्थित मकान में आग लग गई थी । अब आप समझे ? जी हाँ , थोड़ी शराब और लेना उचित होगा । “

बाद में जब मैंने कुछ नहीं कहा तो उस बूढे ने आगे कहना जारी रखा । अब वह केवल ल्यूक के बारे में सोच रहा था , ल्यूक की किस्मत के बारे में । उसकी माँ ने यह फ़ैसला किया था कि उसे शिक्षा प्राप्त करने के लिए एक व्यावसायिक विद्यालय में भेजा जाएगा । उसकी माँ जिसे ‘ उसके जीवन का मार्ग ‘ बता रही थी और कह रही थी कि यह दिशा अच्छी और संतोषजनक होगी , वह मार्ग तो पहले से ही उसके लिए खुला था । यदि वह ल्यूक के बारे में उन्हें कुछ कहता तो उसकी माँ और उसके मामा — दोनों उसे पागल समझते और ल्यूक को उससे दूर कर देते । किंतु केवल वह , जो अपनी ज़बान नहीं खोल सकता था , केवल वह ही उन्हें यह बता सकता था कि ल्यूक के बारे में कुछ भी करने का कोई फ़ायदा नहीं था । वे कुछ भी करते , नतीजा वही रहने वाला था । अपमान , एक भयंकर दिनचर्या , एक के बाद एक आने वाले नीरस बरस , दुखद विपत्तियाँ — ये सभी उसके कपड़ों और उसकी आत्मा को लगातार कुतरते रहने वाले थे । इनकी वजह से कुढ़ा हुआ और एकाकी ल्यूक किसी रात्रिकालीन क्लब की शरण में चला जाने वाला था ।

लेकिन इस सारे मामले में ल्यूक की नियति ही सबसे बुरी बात नहीं थी । सबसे ख़राब बात यह थी कि समय आने पर ल्यूक की मृत्यु हो जानी थी , और फिर कोई और व्यक्ति ल्यूक के और अपने जीवन के नमूने को फिर से जीने वाला था , जब तक कि उसकी भी मृत्यु नहीं हो जाती और फिर कोई अन्य व्यक्ति इस चक्र का हिस्सा नहीं बन जाता । ऐसा लग रहा था जैसे उस बूढ़े के लिए ल्यूक अभी से महत्त्वहीन हो गया था । अनिद्रा-रोग से ग्रस्त वह बूढ़ा रात में ल्यूक के अलावा उन सभी व्यक्तियों के बारे में सोचता रहता था जो इस चक्र का हिस्सा बनने वाले थे — वे अन्य जिनके नाम रॉबर्ट या क्लॉड या माइकेल होने थे । जैसे यह सब किसी अनंत विस्तार का सिद्धांत हो । जैसे बिना जाने बेचारे अनंत लोग किसी नमूने को दोहरा रहे हों , हालाँकि उन्हें अपनी इच्छाशक्ति और कुछ भी चुनने की आज़ादी पर पूरा भरोसा हो । बूढ़े के आँसू उसके बीयर के गिलास में घुल रहे थे , हालाँकि उस गिलास में बीयर नहीं , शराब पड़ी थी । आप इसके बारे में कर ही क्या सकते थे , कुछ भी नहीं ।

” जब मैं उन्हें यह बताता हूँ कि कुछ माह बाद ल्यूक की मृत्यु हो गई तो वे मुझ पर हँसते हैं । वे मूढ़ यह सब समझने में असमर्थ हैं … जी हाँ , अब आप मेरी ओर ऐसी निगाहों से मत देखिए । कुछ महीनों के बाद ल्यूक की मृत्यु हो गई । उसकी बीमारी फेफड़ों की सूजन के रूप में शुरू हुई । इसी उम्र में मुझे जिगर की सूजन की बीमारी हो गई थी । मुझे अस्पताल में भर्ती करवाया गया था जबकि ल्यूक की माँ ने उसे घर पर ही रख कर उसकी देख-भाल करने की ज़िद की ।

” मैं उससे मिलने हर रोज़ जाता था । कभी-कभी ल्यूक के साथ खेलने के लिए मैं अपने भतीजे को भी अपने साथ ले जाता । उस घर में इतनी बदहाली और दुख-तकलीफ़ें थीं कि मेरा वहाँ जाना उन लोगों के लिए हर तरह से सांत्वना का काम करता था । मैं ल्यूक के साथ ज़्यादा-से-ज़्यादा समय बिताता । कभी-कभी मैं उसके लिए सूखी हिल्सा मछलियाँ या फल , कचौरियाँ वग़ैरह ले जाता ।

” एक बार मैंने उसकी माँ से उस दवाई की दुकान का ज़िक्र किया जो मुझे विशेष छूट देती थी । फिर तो ल्यूक की दवाइयाँ ख़रीदने की इजाज़त भी मुझे मिल गई । अंत में उन्होंने ल्यूक की सेवा-सुश्रुषा की पूरी ज़िम्मेदारी मुझे सौंप दी । आप समझ सकते हैं कि ऐसे किसी मामले में , जब डॉक्टर बिना किसी विशेष फ़िक्र के कभी भी आ-जा सकता है , कोई भी इस बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं देता कि रोगी की बीमारी के अंतिम लक्षणों का उसके पहले इलाज से कोई लेना-देना है या नहीं … आप मेरी ओर ऐसे क्यों देख रहे हैं ? क्या मैंने कोई ग़लत बात की है ? “

नहीं , नहीं । उसने कुछ भी ग़लत नहीं कहा था , ख़ास करके तब जब वह शराब पीने की वजह से नशे में था । बल्कि यदि आप ख़ास तौर पर किसी भयंकर दृश्य की कल्पना न करें तो बेचारे ल्यूक की मृत्यु से यही साबित होता था कि यदि किसी की कल्पना-शक्ति उर्वर हो , तो वह पंचानवे नम्बर की बस से एक स्वप्न-चित्र शुरू कर सकता है जिसकी परिणति शांतिपूर्वक मर रहे किसी लड़के के बिस्तर के किनारे हो सकती है । मैंने केवल उसे शांत करने के लिए ‘नहीं’ कहा था । अपनी कहानी दोबारा शुरू करने से पहले वह कुछ देर तक शून्य में ताकता रहा ।

” ठीक है , आप जो चाहे समझें । सच्चाई यह है कि ल्यूक की अंत्येष्टि के कुछ हफ़्ते बाद पहली बार मुझे कुछ ऐसा महसूस हुआ , जिसे आप प्रसन्नता कह सकते हैं । मैं अब भी कभी-कभार उसकी माँ से मिलने जाता रहता । अपने साथ कभी-कभी मैं महँगे बिस्किट का पैकेट भी ले जाता , किंतु अब मेरे जीवन में न ल्यूक की माँ का , न ही उस मकान का कोई अर्थ रह गया था । यह ऐसा था जैसे मैं पहला नश्वर व्यक्ति होने की अद्भुत निश्चितता में डूब गया था , यह महसूस करते हुए कि शराब पीते हुए दिन-प्रतिदिन मेरे जीवन का क्षरण हो रहा था । अंत में किसी-न-किसी समय , किसी-न-किसी जगह इस जीवन की इति हो जानी थी ।

” मेरा जीवन किसी अन्य अज्ञात वृद्ध के जीवन की नियति का दोहराव भर था जिसके बारे में मुझे छोड़ कर किसी को नहीं पता था , किंतु केवल मैं जानता था कि अब कोई और ल्यूक इस मूढ़ता के चक्र का हिस्सा बन कर इस मूर्खतापूर्ण जीवन को नहीं दोहराने वाला था । इस अनुभूति के पूरे अर्थ को समझिए , बुज़ुर्गवार , और मेरी खुशी के मेरे साथ रहने तक मुझसे रश्क कीजिए । “

ज़ाहिर तौर पर यह खुशी ज़्यादा समय तक क़ायम नहीं रह सकी थी । सामान्य रेस्त्रां और देसी शराब से यह साबित होता था । उसकी आँखें भी ऐसी चमक से दीप्त थीं जिसका देह से कोई लेना-देना नहीं था । जो भी हो , उस बूढ़े ने अपनी रोज़मर्रा की सामान्यता का पूरा मज़ा लेते हुए कुछ महीने जिए थे । हालाँकि उसकी पत्नी उसे छोड़ गई थी और उसका पचास बरस का जीवन किसी खंडहर-सा था , वह अपनी न छीनी जा सकने वाली नश्वरता के प्रति आश्वस्त था । एक दोपहर लग्ज़ेम्बौर्ग बाग़ से गुज़रते हुए उसने एक पीला फूल देखा ।

” वह क्यारी के किनारे पर था , एक सामान्य पीला फूल । मैं सिगरेट जलाने के लिए वहाँ रुका और उसे देख कर मेरा ध्यान भंग हुआ । ऐसा लगा जैसे वह फूल भी मेरी ओर देख रहा था । आप समझ सकते हैं न , कभी-कभी चीज़ों के बीच कैसा सम्पर्क स्थापित हो जाता है … आप समझ रहे हैं न । कभी-न-कभी सभी इसे महसूस करते हैं । शायद इसे ही लोग सुंदरता कहते हैं । दरअसल मुझे वह फूल बेहद सुंदर लगा । और तब यह अहसास मुझ पर शिद्दत से हावी हुआ कि एक दिन मैं मर कर सदा के लिए ख़त्म हो जाने वाला था । वह फूल बेहद सुंदर था और भविष्य में आने वाले लोगों के लिए फूल हमेशा मौजूद होंगे । और तभी मैं अनस्तित्व और नगण्यता के बारे में सब कुछ जान गया । मुझे लगा था कि मुझे शांति मिल गई थी । मेरे साथ ही इस श्रृंखला का अंत हो जाना था । मेरी मृत्यु के साथ ही । ल्यूक की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी । भविष्य में मेरे किसी समरूप के लिए किसी फूल को मौजूद नहीं रहना था । कहीं कुछ भी नहीं रहना था । कुछ भी नहीं । असल बात यह थी कि यह फूल दोबारा कभी अस्तित्व में नहीं आने वाला था ।

सिगरेट का जल रहा हिस्सा मेरी उँगलियों को जला रहा था । मुझे जलन और टीस महसूस हुई । अगले चौराहे पर मैं एक बस में चढ़ गया जो कहीं जा रही थी — कहाँ जा रही थी , यह महत्वपूर्ण नहीं था । मेरी बेवक़ूफ़ी देखिए कि मैं चारो ओर हर चीज़ को ग़ौर से देखने लगा । सड़क पर दिखाई दे रहे हर आदमी को । बस में मौजूद हर व्यक्ति को । जब बस का अंतिम स्टॉप आया तो मैं उस बस से उतर कर किसी और बस में चढ़ गया जो उपनगर की ओर जा रही थी ।

पूरी दोपहर , बल्कि रात होने तक मैं बसों पर से चढ़ता-उतरता रहा । सारा समय मैं उस फूल और ल्यूक के बारे में सोचता रहा । मैं यात्रियों के बीच ल्यूक से मिलते-जुलते चेहरे ढूँढ़ता रहा । कोई ऐसा व्यक्ति जिसका चेहरा मुझसे या ल्यूक से मिलता-जुलता हो । कोई ऐसा व्यक्ति जो दोबारा मेरा प्रतिरूप बन सके । कोई ऐसा व्यक्ति जिसे देख कर मैं जान जाऊँ कि मैं खुद को ही देख रहा हूँ । कोई हो जो मेरे जैसा हो । और मैं उससे कुछ भी कहे बिना उसे चला जाने दूँ । लगभग उसे बचा कर सुरक्षित रखते हुए ताकि वह जा कर बेचारगी से भरा अपना मूर्खतापूर्ण जीवन जी सके । अपना मूढ़ , निष्फल जीवन । तब तक जब तक कोई और ऐसे ही मूढ़ , निष्फल जीवन को दोहराने न आ जाए । और फिर कोई और ऐसे ही मूढ़ , निष्फल जीवन को दोहराए । और फिर कोई और …

मैंने बिल के पैसे अदा कर दिए ।

प्रेषक : सुशांत सुप्रिय

A-5001 ,

गौड़ ग्रीन सिटी ,

वैभव खंड ,

इंदिरापुरम् ,

ग़ाज़ियाबाद – 201014

( उ. प्र. )

मो : 8512070086

ई-मेल : sushant1968@gmail.com

कहानी- इंडियन काफ़्का: सुशांत सुप्रिय

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Inside the volcano
Photo by Fabien Martin on Unsplash

इंडियन काफ़्का

सुशांत सुप्रिय

मैं हूँ , कमरा है , दीवारें हैं , छत है , सीलन है , घुटन है , सन्नाटा है और मेरा अंतहीन अकेलापन है । हाँ , अकेलापन , जो अकसर मुझे कटहे कुत्ते-सा काटने को दौड़ता है । पर जो मेरे अस्तित्व को स्वीकार तो करता है । जो अब मेरा एकमात्र शत्रु-मित्र है ।

खुद में बंद मैं खुली खिड़की के पास जा खड़ा होता हूँ । अपनी अस्थिरता का अकेला साक्षी । बाहर एड्स के रोगी-सी मुरझाई शाम मरने-मरने को हो आई है । हवा चुप है । सामने पार्क में खड़े ऐंठे पेड़ चुप हैं । वहीं बेंच पर बैठे रोज़ बहस करने वाले दो सठियाए ख़बीस बूढ़े चुप हैं । बेंच के नीचे पड़ा प्रतिदिन अपनी ही दुम से झगड़ने वाला आवारा कुत्ता चुप है । एक मरघटी उदासी आसमान से चू-चू कर चुपचाप सड़क की छाती पर बिछती जा रही है । और सड़क चुप्पी की केंचुली उतार फेंकने के लिए कसमसा रही है ।

साथ वाले आँगन से उड़ कर मिस लिली की छटपटाती हँसी स्तब्ध फ़िज़ा में फ़्रीज़ हो जाती है । तभी नशे में धुत्त एक अजनबी स्वर भेड़िए-सा गुर्राता है । मिस लिली की हँसी अब पिघलने लगती है ।

मुझे अचानक लगता है जैसे मैं ऊब कर ढेर-सी उल्टी कर दूँगा पर वैसा कुछ नहीं होता । खिड़की से नाता तोड़ कर मैं चारपाई से रिश्ता गाँठ लेता हूँ । चाहता हूँ , कुछ गुनगुनाऊँ । पर कोई ‘ नर्सरी-राइम ‘ भी याद नहीं आती । अनायास ही मेरी उँगलियाँ मेरी पुरानी कलाई-घड़ी में चाबी देना चाहती हैं , पर वह पहले से ही फ़ुल है । हाथ दो हफ़्ते लम्बी दाढ़ी खुजलाने लगते हैं । दाढ़ी कड़ी है । चुभती है । जेब से सिगरेट-पैकेट निकालता हूँ । लाइटर भी । सुलगाता हूँ । सुलगता हूँ । सिगरेट मुझे कश-कश पीने लगती है । मैं सिगरेट को पल-पल जीने लगता हूँ । भीतर कहीं कुछ जलने लगता है । राहत मिलती है । क्षणिक ही सही । कल गुप्ता को नई स्टोरी देनी है । नया फ़ीचर लिखना है अखबार के लिए , पर कुछ नहीं सूझता है । विचारों के उलझे धागे में अनगिनत गाँठें पड़ी हैं । झुटपुटे में पल सुलगते हैं और दम तोड़ते जाते हैं । और सिगरेट के राख-सी तुम्हारी याद झरने लगती है … ओ नेहा , तुम कहाँ हो ?

” यार , क्या ऑर्ट-मूवी के पिटे हीरो-सी शक्ल बना रखी है ! शेव क्यों नहीं करते ? “

मैं और नेहा ऐन. ऐम. पैलेस में लगी फ़िल्म ‘ क़यामत से क़यामत तक ‘ देख कर निकले थे । सर्द शाम थी । यूनिवर्सिटी गेट पर थ्री-वहीलर से उतर कर हम गर्ल्स-हॉस्टल की ओर बढ़ रहे थे । मूवी के बारे में बातें हो रही थीं । तभी नेहा ने कहा था , ” कल मिस्टर मजनू यानी तुम अपनी दाढ़ी शेव करके आओगे , समझे ? “

” जानती हो , दाढ़ी में आदमी इंटेलेक्चुअल लगता है । “

” दाढ़ी में आदमी बंदर लगता है । डार्विन का बंदर … “

सिगरेट का बचा हुआ हिस्सा उँगलियों को जलाने लगता है । मेज पर पड़ी कई दिन पुरानी जूठी तश्तरी को ऐश-ट्रे बना उसे बुझा देता हूँ । एक और सींझी हुई रात मुझे आ दबोचेगी । इस अहसास से बचने की एक अधमरी कोशिश करता हूँ । ट्रांजिस्टर का स्विच ऑन कर देता हूँ ।

” यह आकाशवाणी है । अब आप क्लेयर नाथ से समाचार सुनिए … “

खीझ कर बंद कर देता हूँ ट्रांजिस्टर । हुँह् ! समाचार ! रक्तचाप और बढ़ जाएगा समाचार सुनने से । वही वाहियात ख़बरें । सोचता हूँ — हर सुबह अनाप-शनाप ख़बरों से भरे अख़बार कैसे धड़ाधड़ बिक जाते हैं । नेहा को भी अख़बार से चिढ़ थी ।

” … फिर ? क्या सोचा है ? आगे क्या करोगे ? ” हम दोनों ‘ बॉटैनिकल गार्डन ‘ में टहल रहे थे । मैंने उसके बालों में एक सफ़ेद गुलाब लगा दिया था । और उस पर झुकते हुए उसे चूम लिया था । पर वह आशंकित लगी थी ।

” क्या बात है , नेहा ? “

और तब उसने पूछा था — ” फिर ? क्या सोचा है ? आगे क्या करोगे ? ” मैं कुछ देर चुप रहा था । समय धड़धड़ा कर आगे बढ़ रहा था । फिर मैंने कहा था , ” सोचता हूँ , कोई अख़बार ज्वाएन कर लूँ । “

” अख़बार ? ” उसका चेहरा अजनबी हो आया था । उसके चेहरे पर कई भाव आए-गए थे । हवा में उसके अनकहे शब्दों की गूँज थी । उसने ज़ोर देकर कहा था , ” क्या आर्ट मूवी के पिटे हीरो जैसी बातें कर रहे हो । किसी प्रतियोगिता-परीक्षा में क्यों नहीं बैठते ? “

हवा शांत-विरोध से बजने लगी थी …

विचारों का मकड़-जाल मुझे ओक्टोपस-सा जकड़ने लगता है । झटक देता हूँ उन्हें । पर नहीं झटक पाता हूँ अपनी बेबसी और लाचारी को । और अपने अंतहीन अकेलेपन को ।

ऊब कर एक और सिगरेट सुलगा लेता हूँ । बौराए समय से बचने के लिए कमरे में निगाह दौड़ाता हूँ । शाम के झुटपुटे में एक पूँछ-कटी छिपकली दीवार को नापने की तमन्ना लिए इधर से उधर भाग रही है । नादान । खुद ही थक-हार कर दुबक जाएगी किसी कोने में ।

एक लम्बा कश लेता हूँ । और धुएँ को भीतर तक बंद रहने देता हूँ । मज़ा आता है , कहीं भीतर तक खुद को झुलसा लेने में । खाँसी का एक दौरा पड़ता है । तकलीफ़देह । पर सिगरेट मुझे पीती रहती है । और मैं उसे जीता रहता हूँ । अच्छा भाईचारा है मेरा और सिगरेट का कमबख़्त । सीने में सुइयाँ-सी चुभती हैं और दर्द यह अहसास दिला जाता है कि मैं अभी ज़िंदा हूँ । अभिशप्त हूँ जीने के लिए इसकी-उसकी शर्तों पर । अचानक मुझे याद आता है कि मैं पिछले कुछ वर्षों से खुल कर हँसा नहीं हूँ । पर खुद से क्षमा-याचना भी नहीं कर पाता हूँ मैं ।

एक मुरझाई मुस्कान चेहरे पर आ कर सट जाती है । चेहरे की स्लेट से उसे पोंछ कर मैं खिड़की से बाहर झाँकता हूँ । एक और सिमसिमी शाम ढल चुकी है । रोशनी एक अंतिम कराह के साथ बुझ चुकी है । एक और पसीजी रात मटमैले आसमान की छत से उतर कर मेरे सलेटी कमरे में घुसपैठ कर चुकी है । उसी कमरे में जहाँ मैं हूँ , दीवारें हैं , छत है , सीलन है , घुटन है , सन्नाटा है और मेरा अंतहीन अकेलापन है । हाँ , अकेलापन । मेरा एकमात्र शत्रु-मित्र ।

झुके हुए झंडे-से उदास पल मुझे घेर लेते हैं । दूसरी सिगरेट भी साथ छोड़ जाना चाहती है । कल गुप्ता को अखबार के लिए कौन-सा फ़ीचर दूँगा , पता नहीं । कुछ सूझ ही नहीं रहा । भीतर केवल एक मुर्दा हलचल भरी है । लगता है , यह नौकरी भी छूट जाएगी ।

बाहर एक अभागी टिटहरी ज़ोर-ज़ोर-ज़ोर से चीख़ कर सन्नाटे का ट्यूमर फोड़ देती है । शोर का मवाद रिसने लगता है । दूर किसी मुँहझौंसे कारख़ाने का भोंपू उदास सिम्फ़नी-सा बज उठता है । पड़ोस में मिस लिली का दरवाज़ा फ़टाक से बंद होने की आवाज़ कुछ देर स्तब्ध फ़िज़ा में जमी रहती है । फिर एक शराबी स्वर रुखाई से सीढ़ियों को कुचल कर अँधेरे में गुम जाता है । पार्क में पड़ा आवारा कुत्ता ऊँचे स्वर में रो उठता है । मिस लिली के यहाँ से पियानो की मातमी धुन रह-रह कर गूँज जाती है ।

भीतर-बाहर के माहौल की मनहूसियत के विरोध में मैं हवा को एक अशक्त ठोकर मारता हूँ । और खिड़की से बाहर सिगरेट का ठूँठ फेंक कर वापस चारपाई पर आ बैठता हूँ । किसी पर-कटी गोरैया-सा लुटा महसूस करता हूँ । पता नहीं क्यों , नेहा , आज तुम बहुत याद आ रही हो …

” आई. ए. एस. का फ़ॉर्म क्यों नहीं भरते ? ” कैंटीन में काफ़ी सिप करते हुए तुमने तीसरी बार पूछा था ।

” नेहा , आई.ए.एस. मेरे लिए नहीं है । ” आख़िर मुझे कहना पड़ा था । और तब तुमने कहा था , ” पिताजी मेरे लिए आई. ए. एस. लड़का ढूँढ़ रहे हैं … “

बाहर पाशविक अँधेरा तेज़ी से झरने लगता है । फ़्यूज़ बल्ब-सा मैं चारपाई पर बुझा पड़ा रहता हूँ । । आज ढाबे में जा कर खाने का मन नहीं है ।

अनमने भाव से एक और सिगरेट सुलगा लेता हूँ । सोचता हूँ , चारपाई से उठ कर बिजली का लट्टू जला लूँ । फिर मन में आता है , कमरे में उजाला हो जाने से भी क्या फ़र्क पड़ेगा । मेरे भीतर उगे नासूरों के जंगल में फैला काले फ़ौलाद-सा घुप्प अँधेरा तो फिर भी वैसे ही जमा रहेगा । न जाने कब तक ।

सिगरेट पीते-पीते गला सूखने लगता है । फिर भी लेता जाता हूँ । कश पर कश … कश पर कश । गोया खुद से बदला लेने की क़सम खा रखी हो ।

ओ नेहा , मेरी आत्मा के चेहरे पर अपनी स्मृतियों की खरोंच के अमिट निशान छोड़ कर तुम कहाँ चली गई ?

… बहुत पहले कभी एक आर्ट मूवी देखी थी । फ़िल्म की नायिका बचपन में लगे किसी सदमे की वजह से पागल हो जाती है । अमीर माँ-बाप बच्ची को गाँव में दादी के पास छोड़ जाते हैं । फिर बच्ची जवान हो जाती है । और ख़ूबसूरत भी । और नायक पहली मुलाक़ात में ही उससे प्यार करने लगता है । और एक दिन नायक अपने सच्चे प्रेम के बूते पर नायिका को ठीक कर देता है । और मानसिक रूप से स्वस्थ हो चुकी नायिका अपने पागलपन के दिनों को भूल जाती है । और नायक अब उसके लिए एक अजनबी बन जाता है । फिर नायिका अपने माता-पिता के पास लौट जाती है । पर नायक इस सत्य को स्वीकार नहीं कर पाता है । और इस सदमे से वह पागल हो जाता है …

गला कुछ ज़्यादा ही सूखने लगता है । सिगरेट बुझा देता हूँ । रोना चाहता हूँ । शायद सदियों से रोया नहीं हूँ । पर आँखों में आँसू का समुद्र बहुत पहले सूख चुका है । भीतर के खंडहर में रिक्तता की आँधी साँय-साँय करने लगती है । तनहा मैं तड़प उठता हूँ ।

मन कड़ा करके उठ बैठता हूँ । फिर लाइट जलाता हूँ । आँखें कुछ चौंधिया-सी जाती हैं । एक भटका हुआ चमगादड़ कमरे में घुस आया है । और बाहर निकलने के विफल प्रयत्न में बार-बार दीवारों से टकरा कर सिर धुन रहा है । किसी तरह उसे खुली खिड़की के रास्ते बाहर निकाल कर खिड़की बंद कर देता हूँ ।

मेज पर एक लम्बे अंतराल के बाद घर से आया पत्र पड़ा है । उठा कर एक बार फिर पढ़ डालता हूँ । पिता की तबीयत ठीक नहीं है । माँ का गठिया वैसा ही है । सुमी के हाथ पीले करने की चिंता पिता को घुन-सी खाए जा रही है । पिछले तीन महीनों से पिता को पेंशन नहीं मिली है । लिखा है — ऐसा लड़का किस काम का जो घर वालों को सहारा न दे सके …

आँखें मूँद कर एक लम्बी साँस लेता हूँ और बंद कर देता हूँ घर से आई चिट्ठी । सारी दिशाएँ ग़लत लगने लगती हैं । बाहर कोई बौराया मुर्ग़ा असमय बाँग दे रहा है । कल गुप्ता को अख़बार के लिए क्या फ़ीचर दूँगा , कुछ नहीं सूझता । अब तो यह नौकरी भी छूट जाएगी । दिल में आता है , अँधेरे से खूब बातें करूँ । उसे अपना दुखड़ा सुनाऊँ । लगता है जैसे भरी दुपहरी में मेरे सूर्य को ग्रहण लग गया है । जैसे मेरे जीवन की पतीली में रखा दूध फट गया है । जैसे मेरी पूरी ज़िंदगी बेहद अधूरी-सी है । जैसे मैं एक मिसफ़िट बन कर रह गया हूँ । ठहरे हुए पानी पर जमी काई बन कर रह गया हूँ । इंसान नहीं , कोई अदना-सा कीड़ा बन कर रह गया हूँ …

प्रेषक : सुशांत सुप्रिय

A-5001 ,

गौड़ ग्रीन सिटी ,

वैभव खंड ,

इंदिरापुरम् ,

ग़ाज़ियाबाद – 201014

( उ. प्र. )

मो : 8512070086

ई-मेल : sushant1968@gmail.com

स्त्रियों पर कविताएँ: सुशांत सुप्रिय

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three concrete statues
Photo by Vidar Nordli-Mathisen on Unsplash

स्त्रियों पर कविताएँ

1. माँ , अब मैं समझ गया

मेरी माँ

बचपन में मुझे

एक राजकुमारी का क़िस्सा

सुनाती थी

राजकुमारी पढ़ने-लिखने

घुड़सवारी , तीरंदाज़ी

सब में बेहद तेज़ थी

वह शास्त्रार्थ में

बड़े-बड़े पंडितों को

हरा देती थी

घुड़दौड़ के सभी मुक़ाबले

वही जीतती थी

तीरंदाज़ी में उसे

केवल ‘ चिड़िया की आँख की पुतली ‘ ही

दिखाई देती थी

फिर क्या हुआ —

मैं पूछता

एक दिन उसकी शादी हो गई —

माँ कहती

उसके बाद क्या हुआ —

मैं पूछता

फिर उसके बच्चे हुए —

माँ कहती

फिर क्या हुआ —

मैं पूछता

फिर वह बच्चों को

पालने-पोसने लगी —

माँ के चेहरे पर

लम्बी परछाइयाँ आ जातीं

नहीं माँ

मेरा मतलब है

फिर राजकुमारी के शास्त्रार्थ

घुड़सवारी और

तीरंदाज़ी का

क्या हुआ —

मैं पूछता

तू अभी नहीं

समझेगा रे

बड़ा हो जा

खुद ही समझ जाएगा —

यह कहते-कहते

माँ का पूरा चेहरा

स्याह हो जाता था …

माँ

अब मैं समझ गया

2. स्त्रियाँ और वृक्ष

श्श्श

कि स्त्रियाँ बाँध रही हैं धागे

इस वृक्ष के तने से

ये विश्वास के धागे हैं

जो जोड़ते हैं स्त्रियों को

ईश्वर से

केवल स्त्रियों में है वह ताक़त

जो वृक्ष को ईश्वर में बदल दे

श्श्श

कि गीत गा रही हैं स्त्रियाँ

पूजा करते हुए इस वृक्ष की

ये विश्वास के गीत हैं

जो जोड़ते हैं स्त्रियों को

ईश्वर से

केवल स्त्रियों में है वह भक्ति

जो गीत को प्रार्थना में बदल दे

आश्वस्त हैं स्त्रियाँ अपनी आस्था में

कि वृक्ष के तने से बँधे धागे

उनकी प्रार्थना को जोड़ रहे हैं

उनके आदिम ईश्वर से

3. बच्ची

हम एजेंसी से

एक बच्ची

घर ले कर आए हैं

वह सीधी-सादी सहमी-सी

आदिवासी बच्ची है

वह सुबह से रात तक

जो हम कहते हैं

चुपचाप करती है

वह हमारे बच्चे की

देखभाल करती है

जब उसका मन

खुद दूध पीने का होता है

वह हमारे बच्चे को

दूध पिला रही होती है

जब हम सब

खा चुके होते हैं

उसके बाद

वह सबसे अंत में

बासी बचा-खुचा

खा रही होती है

उसके गाँव में

फ़्रिज या टी.वी. नहीं है

वह पहले कभी

मोटर कार में नहीं बैठी

उसने पहले कभी

गैस का चूल्हा

नहीं जलाया

जब उसे

हमारी कोई बात

समझ में नहीं आती

तो हम उसे

‘ मोरोन ‘ और

‘ डम्बो ‘ कहते हैं

उसका ‘ आइ. क्यू. ‘

शून्य मानते हैं

हमारा बच्चा भी

अकसर उसे

डाँट देता है

हम उसकी बोली

उसके रहन-सहन

उसके तौर-तरीक़ों का

मज़ाक उड़ाते हैं

दूर कहीं

उसके गाँव में

उसके माँ-बाप

तपेदिक से मर गए थे

उसका मुँहबोला ‘ भाई ‘

उसे घुमाने के बहाने

दिल्ली लाया था

उसके महीने भर की कमाई

एजेंसी ले जाती है

आप यह जान कर

क्या कीजिएगा कि वह

झारखंड की है

बंगाल की

आसाम की

या छत्तीसगढ़ की

क्या इतना काफ़ी नहीं है कि

हम एजेंसी से

एक बच्ची

घर ले कर आए हैं

वह हमसे

टॉफ़ी या ग़ुब्बारे

नहीं माँगती है

वह हमारे बच्चे की तरह

स्कूल नहीं जाती है

वह सीधी-सादी सहमी-सी

आदिवासी बच्ची

सुबह से रात तक

चुपचाप हमारा सारा काम

करती है

और कभी-कभी

रात में सोते समय

न जाने किसे याद करके

रो लेती है

4. स्टिल-बार्न बेबी

वह जैसे

रात के आईने में

हल्का-सा चमक कर

हमेशा के लिए बुझ गया

एक जुगनू थी

वह जैसे

सूरज के चेहरे से

लिपटी हुई

धुँध थी

वह जैसे

उँगलियों के बीच में से

फिसल कर झरती हुई रेत थी

वह जैसे

सितारों को थामने वाली

आकाश-गंगा थी

वह जैसे

ख़ज़ाने से लदा हुआ

एक डूब गया

समुद्री-जहाज़ थी

जिसकी चाहत में

समुद्री-डाकू

पागल हो जाते थे

वह जैसे

कीचड़ में मुरझा गया

अधखिला नीला कमल थी…

5. एक सजल संवेदना-सी

उसे आँखों से

कम सूझता है अब

घुटने जवाब देने लगे हैं

बोलती है तो कभी-कभी

काँपने लगती है उसकी ज़बान

घर के लोगों के राडार पर

उसकी उपस्थिति अब

दर्ज़ नहीं होती

लेकिन वह है कि

बहे जा रही है अब भी

एक सजल संवेदना-सी

समूचे घर में —

अरे बच्चों ने खाना खाया कि नहीं

कोई पौधों को पानी दे देना ज़रा

बारिश भी तो ठीक से

नहीं हुई है इस साल

6. स्त्रियाँ

हरी-भरी फ़सलों-सी

प्रसन्न है उनकी देह

मैदानों में बहते जल-सा

अनुभवी है उनका जीवन

पुरखों के गीतों-सी

खनकती है उनकी हँसी

रहस्यमयी नीहारिकाओं-सी

आकर्षक हैं उनकी आँखें

प्रकृति में ईश्वर-सा मौजूद है

उनका मेहनती वजूद

दुनिया से थोड़ा और

जुड़ जाते हैं हम

उनके ही कारण

7. वह अनपढ़ मजदूरनी

उस अनपढ़ मजदूरनी के पास थे

जीवन के अनुभव

मेरे पास थी

काग़ज़-क़लम की बैसाखी

मैं उस पर कविता लिखना

चाह रहा था

जिसने रच डाला था

पूरा महा-काव्य जीवन का

सृष्टि के पवित्र ग्रंथ-सी थी वह

जिसका पहला पन्ना खोल कर

पढ़ रहा था मैं

गेंहूँ की बालियों में भरा

जीवन का रस थी वह

और मैं जैसे

आँगन में गिरा हुआ

सूखा पत्ता

उस कंदील की रोशनी से

उधार लिया मैंने जीवन में उजाला

उस दीये की लौ के सहारे

पार की मैंने कविता की सड़क

8. कामगार औरतें

कामगार औरतों के

स्तनों में

पर्याप्त दूध नहीं उतरता

मुरझाए फूल-से

मिट्टी में लोटते रहते हैं

उनके नंगे बच्चे

उनके पूनम का चाँद

झुलसी रोटी-सा होता है

उनकी दिशाओं में

भरा होता है

एक मूक हाहाकार

उनके सभी भगवान

पत्थर हो गए होते हैं

ख़ामोश दीये-सा जलता है

उनका प्रवासी तन-मन

फ़्लाइ-ओवरों से लेकर

गगनचुम्बी इमारतों तक के

बनने में लगा होता है

उनकी मेहनत का

हरा अंकुर

उपले-सा दमकती हैं वे

स्वयं विस्थापित हो कर

हालाँकि टी. वी. चैनलों पर

सीधा प्रसारण होता है

केवल विश्व-सुंदरियों की

कैट-वाक का

पर उस से भी

कहीं ज़्यादा सुंदर होती है

कामगार औरतों की

थकी चाल

9. कामकाजी पत्नी

( पत्नी लीना को

समर्पित )

— सुशांत सुप्रिय

दफ़्तर से लौटकर

थकी-हारी आती है वह तो

महक उठती है

घर की बगिया

बच्चे चिपक जाते हैं

उसकी टाँगों से जैसे

शावक हिरणी से

उन्हें पुचकारती हुई

रसोई में चली जाती है वह

अपनी थकान को स्थगित करती

दूध-चाय-नाश्ता

ले आती है वह

उसे देखता हूँ

बेटी को पढ़ाते हुए तो

लगता है जैसे

कोई थकी हुई तैराक

बहादुरी से लड़ रही है

लहरों से

‘ आज खाना बाहर से

मँगवा लेते हैं ‘ —

मेरी बात सुनकर

उलाहना देती आँखों से

कहती है वह —

‘ मैं बना दूँगी थोड़ी देर में

ज़रा पीठ सीधी कर लूँ ‘

दफ़्तर के काम से जब

शहर से बाहर

चली जाती है वह तब

अजनबी शहर में

खो गए बच्चे-से

अपने ही घर में

खो जाते हैं

मैं और मेरे बच्चे

सूख जाता है

हमारे दरिया का पानी

कुम्हला जाते हैं

हमारे तन-मन के पौधे

इस घर की

धुरी है वह

वह है तो

थाली में भोजन है

जीवन में प्रयोजन है

दफ़्तर और घर के बीच

तनी रस्सी पर

किसी कुशल नटी-सी

चलती चली जा रही है वह

प्रेषक : सुशांत सुप्रिय

A-5001 ,

गौड़ ग्रीन सिटी ,

वैभव खंड ,

इंदिरापुरम् ,

ग़ाज़ियाबाद – 201014

( उ.प्र. )

मो : 8512070086

ई-मेल : sushant1968@gmail.com