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सत्ता के दाँव –पेंच से रूबरू कराती रघुवीर की कविताएँ

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सत्ता के दाँव –पेंच से रूबरू कराती रघुवीर की कविताएँ

डॉ. मणिबेन पटेल

रघुवीर सहाय की कविताओं में लोकतंत्र के बचाव की गहरी चिंता है। उन्होंने लोकतंत्र को महज सत्ता से जुड़े संदर्भ में ही नहीं देखा बल्कि वे लगातार सामाजिक संरचना और आपसी संबंधों के विविध स्तरों के बीच भी इसकी स्थापना के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहे। अलोकतांत्रिक व्यवस्था और संबंधों को अपनी कविता का विषय बनाते रहे। १९५० में लोकतांत्रिक देश घोषित होने के बाद भी स्थितियाँ नहीं बदली। झूठे और मक्कार लोगों का ही महिमामंडन किया गया , उन्हें प्रतिष्ठित किया गया। देश के विकास के नाम पर आज भी क़ुरबानी माँगी जा रही।विस्थापन और विनाश का मंजर हम अपने चारों ओर देख सकते हैं। ‘शाइनिंग इण्डिया ‘ और ‘अच्छे दिन’ के नाम पर लगातार सपने दिखाए जा रहे हैं। किसका देश, किसका विकास और किसके अच्छे दिन , प्रश्न आज भी वही है। रघुवीर सहाय लिखते हैं-

“हम ही क्यों यह तकलीफ उठाते जाएं

दुख देने वाले दुख दें और हमारे

उस दुख के गौरव की कविताएँ गाएं

……………….

हम सहते हैं इसलिए की हम सच्चे हैं

हम जो करते हैं ले जाते हैं वे

वे झूठे हैं लेकिन सबसे अच्छे हैं

जब ठौर नहीं मिलता है कोई दिल को

हम जो पाते हैं उसपर लुट जाते हैं

क्या यही पहुँचना होता है मंजिल।”

आज भी हमारा समय-समाज घनघोर असमाजिकताओं की जकड़न में घुट रहा है। हत्या-आत्महत्या के दौर से गुजरती पीढ़ी के दुख-दर्द को दूर करने की अपेक्षा, उन निहायत चालाक सत्ताधारियों से ही करना हमारी नियति बनकर रह गयी है। ऐसे में लोकतंत्र का अंतिम क्षण है कहकर हँसने वाले नेतृत्वकारी वर्ग को रघुवीर सहाय ने बेनकाब किया है। अरक्षित, असहाय जिन्दगी और सत्ता का विरोध ही उनकी कविताओं के केंद्र में रहा है, आजादी के बाद से ही शासकों के बड़े–बड़े वायदे, उपदेशों के सिलसिले शुरू हुए और लोग लगातार उनके झाँसे में आते रहे।आज स्थिति यह है कि हम अपने ही देश में देशद्रोही कहलाकर परायों सी जिन्दगी जीने को अभिशप्त हैं। चारों ओर भय का माहौल बनाया जा रहा है। बहुसंख्यकों की आजादी को कुछ लोगों ने कैद कर रखा है। जनविरोधी प्रवृत्ति वाले सत्ताधारियों के लिए संस्कृति, देशप्रेम, दया, करुणा और बहस सबकुछ प्रायोजित है। जनजीवन के लिए उनके पास खोखले शब्दों के शिवाय कुछ भी नहीं। उनकी असंवेदनशीलता के कारण मानवीय मूल्यों पर भारी संकट उपस्थित होता जा रहा है। पदलोलुप देशभक्तों ने देश की दुर्दशा करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा है। जनआंदोलनों को कुचलने , जनता का शोषण करने , सत्ताविरोधी संस्कृति , साहित्य और लोगों का दमन जोरों पर है। विचारों से परहेज करना आज की सत्ता का स्वभाव बनता जा रहा है। जीवन के हलचल , आजादी के अहसास और जायज हक़ माँगने भर से सत्ता अपने भविष्य को असुरक्षित समझने लगती है और अक्रामक रूख़ अख्तियार कर लेती है। रघुवीर सहाय सत्ता के केंन्द्रीकरण का विरोध और ताकत के उचित बँटवारे की माँग करते हैं। आज सत्ता में बने रहना ही सबसे बड़ी राजनीति हो गयी है। जनप्रतिनिधियों का जनता के प्रति अपने दायित्वों से कोई सरोकार नहीं है , वे महज सत्ता का भोग करना चाहते हैं। धर्म , जाति , हिंसा , घृणा आदि के माध्यम से जनता को विभाजित करने की उनकी पुरानी रणनीति आज भी अपनाई जा रही है। अख़बार, प्रेस ,सूचनातंत्र सब पर हमला किया जा रहा। असली समाचार देश की जनता तक पहुँचता ही नहीं। रघुवीर सहाय इस राजनीति से बेखबर नहीं हैं। वे सत्ता के दाँव–पेंच को बखूबी समझते हैं। जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि जनता से डरता है। उसे न खुद पर विश्वास रहता है न जन समाज पर। भय के कारण वह जनता की कमजोरियों को और अधिक विस्तार देता है। विचार , बहस आदि से भरसक बचने तथा नागरिकों का मनोबल तोड़ने का प्रयास करता है।उन्हें दिमाग़ी गुलाम बनाने का हर सम्भव प्रयत्न करता है। रघुवीर सहाय की कविताएँ हमें राजनीति के मर्म से रूबरू कराती हैं। उसके जनविरोधी चरित्र की पहचान कराती हैं। पतनशील सत्ता की सेवा करने के लिए विवश पत्रकारिता से परिचित कराती हैं –

“बीस बड़े अखबारों के प्रतिनिधि पूछें पच्चीस बार

क्या हुआ समाजवाद

कहें महासंघपति पच्चीस बार हम करेंगे विचार

आँखे मारकर पच्चीस बार हँसे वह , पच्चीस बार

हँसे बीस अख़बार।”

यह कविता लोक चेतना की रक्षा का दावा करने वाली पत्रकारिता अखबारों के खोखलेपन को उजागर करती है। सत्ता और पत्रकारिता के गठजोड को बेनकाब करती है। आज की व्यवस्था और तन्त्र के बीच फंसा साधारण मनुष्य असहाय होकर भी जीने का संघर्ष कर रहा है। भारतीय लोकतंत्र में मतदाताओं के असुरक्षित जिन्दगी की खबरें उन्होंने अपनी कविताओं में दर्ज किया है –

“फिर जाड़ा फिर गर्मी आई

फिर आदमियों के पाले से, लू से मरने की खबर आई

न जाड़ा ज्यादा था न लू ज्यादा

तब कैसे मरे आदमी

वे खड़े रहते हैं तब नहीं दिखते

मर जाते हैं तब , लोग जाड़े और लू की

मौत बताते हैं।”

अभावग्रस्त लोगों की जीवन स्थितियाँ, मरता हुआ समाज, सिकुड़ता हुआ देश, नेतृत्वकारियों की मसखरी, डूबता हुआ लोकतंत्र कवि की मूल चिंता का विषय है। आज ऐसी ताकतें सक्रिय हैं जो जिन्दगी को दहशत बनाने पर आमदा हैं। आदमी घरों में बेदम -सा होता जा रहा है। उसकी कोशिशें, जिंदादिली खत्म होती जा रही है। उदार खुलापन, गर्माहट, सच्ची मानवीयता दम तोडती सी नजर आ रही है। हिंसा की राजनीति फल–फूल रही है। साधारण श्रमजीवी आदमी मारा जा रह है। संवेदनाशून्य , आत्मकेंद्रित होता समाज हत्यारे को पहचानते हुए भी मारे दहशत के चुप है। चोर, बदमाश, माफिया, हत्यारे, झूठे, लुटेरे, गुंडे सत्ता पर काबिज हैं। चारों ओर अँधेरा गहराता जा रहा है। राजनीति के अंधड़ से मनुष्य को बचाना कठिन चुनौती बनती जा रही है। ‘लोकतंत्र’ एक अश्लील मजाक बनकर रह गया है। ऐसे कठिन समय में मानवद्रोही चेहरे को बेनकाब करने वाली रघुवीर सहाय की कविताएँ याद आती हैं –

“यह समाज मर रहा है इसका मरना पहचानो मंत्री

देश ही सबकुछ है धरती का क्षेत्रफल सबकुछ है

सिकुडकर सिंहासन भर रह जाय तो भी वह सब कुछ है

राजा ने मन में कहा जो प्रजा की दुर्बलता को नहीं पहचानता

वह अपने देश को नहीं बचा सकता प्रजा के हाथों से।”

रघुवीर की कविताएँ यथार्थ की एक दुनिया को उद्घाटित करती हैं। जनसामान्य से उनका आत्मीय तादात्म्य बेहद सघन है। आमजन की बेचारगी, विवशता, लाचारी को उनकी कविताएँ अभिव्यक्त करती हैं।कवि अत्याचारी शक्तियों के चेहरों की पहचान करता है। उन ताकतवर लोगों को चिह्नित करता है जो साधारण जन में भय का वातावरण पैदा करते हैं। आज हर शासक पुराने आतातायी शासक की जगह लेते ही उसी के पद-चिह्नों पर चल पड़ता है , उसी की तरह व्यवहार करने लगता है। किसी भी प्रकार जनता को चैन नहीं लेने देता। आज जो जितना बड़ा मक्कार और सत्य का विरोधी है वह उतना ही आदरणीय है। रघुवीर सहाय आज के शासक और शासन करने की नीतियों को बखूबी समझते हैं –

“दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है जिसमें

हर नया शासक पुराने के पापों को आदर्श मानता

और जन वंचित जन जो कुछ भी करते हैं काम–धाम, राग–रंग

वह ऐसे शासक के विरुद्ध ही होता है

यह संस्कृति उसको पोसती है जो सत्य से विरक्त है।”

आज विचारधारात्मक सहमति या फिर बल प्रयोग के माध्यम से प्राय: शासक वर्ग शोषण आधारित समाज व्यवस्था कायम रखने की कोशिश करता है। रघुवीर सहाय व्यवस्था के अमानवीय रूप, छल-छद्म के बीच जीने को अभिशिप्त मनुष्य को भी अपनी कविताओं में अभिव्यक्त करते हैं –

“निर्धन जनता का शोषण है

कहकर आप हँसे

लोकतंत्र का अंतिम क्षण है

कहकर आप हँसे

सबके सब हैं भ्रष्टाचारी

कहकर आप हँसे

चारों ओर बड़ी लाचारी

कहकर आप हँसे

कितने आप सुरक्षित होंगे

मैं सोचने लगा

सहसा मुझे अकेला पाकर

फिर से आप हँसे।”

सत्ता की अमानवीय हंसी , व्यवस्था के यथार्थ का चित्रण , लोकतंत्र की निष्क्रियता, व्यापक भ्रष्टाचार और जनता की विवशता को बड़े सटीक ढंग से रघुवीर सहाय अपनी कविताओं में प्रस्तुत करते हैं। आज नई प्रतिभा को सामाजिक चेतना के विषय में बलपूर्वक अशिक्षित रखने की गम्भीर साजिश रची जा रही है। रचनात्मकता को कुंठित और विकृत करने का अभियान चालू है। किसी ख़ास व्यक्ति का दैवीकरण कर उसी को देश समझाने का भ्रम फैलाया जा रहा है। धर्म के नाम पर नृशंस हत्याओं को जारी रखने के लिए नये–नये माहौल बनाए जा रहे हैं। और अपराधियों की सुरक्षा हेतु न्यायपालिका को भी भयभीत करने का प्रयास होता रहा है। रघुवीर सहाय की कविताएँ जिन्दगी की वास्तविकताओं, सचाइयों की खबर देती हैं। वे लिखते हैं –

“कविता न होगी साहस न होगा

एक और ही युग होगा जिसमें ताकत ही ताकत होगी

और चीख न होगी।”

आज के समकालीन परिदृश्य और वर्तमान समय में रघुवीर सहाय को सबसे प्राणवान, जीवंत, समर्थ और नवीनता का प्रस्तोता कहा जाय तो अतिश्योक्ति न होगी। इनकी कविताओं में जीवन के प्रति अटूट आस्था है। इनकी काव्ययात्रा मानवीय भागीदारी और सहानुभूति का समर्थन करती रही है। उनके पास नितांत देशी अनुभव और सरोकार थे। वर्तमान समय , समाज में उनकी कविताओं की प्रासंगिकता दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। आज आम लोगों का मानवीय गरिमा के साथ जीना दूभर हो गया है।ऐसे में जीवन विरोधी स्थिति की पहचान करती रघुवीर सहाय की कविताएं हमें उससे मुठभेड़ की शक्ति प्रदान करती हैं। उन्होंने जहाँ भी जनता के अधिकारों को सरकारों द्वारा रौंदता हुआ देखा, पूरी ताकत के साथ उसका विरोध किया। उनकी कविताएँ लोकतांत्रिक शासन में सत्ता के विभिन्न रूपों की पड़ताल करते हुए उसके मनुष्य विरोधी चरित्र का पर्दाफास करती हैं। असहमति को विकासशील लोकतंत्र का मूल्य मानने वाले रघुवीर सहाय सच्चे अर्थों में पारदर्शी, स्वाधीन लोकचेतना सम्पन्न लोकतंत्र के समर्थक कवि थे।

कविता

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robert keane rlbg0p nqou unsplash
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कविता

गुलाबचंद पटेल

कविता में संवेदना और प्रेम की नदियाँ बहती है | सच्चा कवि-रचनाकार वो है जो किसी भी स्थान या जगा की परवाह किये बिना कविता की रचना करने में ही रस होता है | कितने लोग कविता पढना टालते है | कितने लोगों को कभी कभी कविता सुनने में भी रस होता nahinahinनहीं है | लेकिन कितने किस्से ऐसे होते है जिसमे कविता आदमी को टालती है | ह्रदय और मन की सूक्ष्म भावनाओं से कविता की रचना होती है | इसमें अनहद का नाद होता है | इसी लिए कवि इश्वर के करीब होते है |

कविता स्थल और शुक्ष्म की ओर की यात्रा है | इसीलिए संतोने परम पिता इश्वर की प्राप्ति के लिए कविता द्वारा ही प्रयत्न किया है | कविता की किताब कम पढ़ी जाती है | कविता मनुष्य के जीवन से दूर जा रही है उसका एक ही कारण है कि, मनुष्य सवेंदन हिन हो गया है इसके कारण कविता ने अपनी नजाक़त और मार्मिक अभिव्यक्ति खो दी है |

साहित्य समाज का अरीसा है | साहित्य प्रतिबिम्ब (परछाई) भिन्न नहीं लेकिन समाज का प्रतिनिधि है | जीवन के साथ रचा हुआ साहित्य ही सुन्दर होता है |

हिंदी साहित्यकार प्रेमचंदजी कर सुर है, कि साहित्य केवल मन (दिल) बह्लानेकी चीज नहीं है मनोरंजन के सिवा उसका और भी उदेश्य है | जो दलित है, पीड़ित है, वंचित है, चाहे वो व्यक्ति को या समूह उसकी वकालत करना ही साहित्य का कर्म है |

साहित्य में समाज के निचले स्तर का दलित, पीड़ित शोषित वर्ग के मनुष्यों की अवहेलना करने के कारण दलित साहित्य का जन्म हुआ है | पांडित्य और प्रशिष्टता के युग में भाषा और साहित्य की मुखधारा से समाज का अंतिम मनुष्य वंचित रह जाने के कारण दलित साहित्य का उद्भव ही कारण है | साहित्य दलित नहीं होता | लेकिन जिस साहित्य में दलित, पीड़ित, शोषित समाज की परछाई उनका सामाजिक जीवन की कठिनाईयां और अच्छी बातों का प्रतिरूप दिखाई देता है, वो दलित साहित्य है |

कविता सामाजिक परिवर्तन का माध्यम है | रचनाकार आलोचक पैदा करता है | समय समय पर समाज में उत्तम मनुष्य पैदा होते रहे हैं ऐसे हर समय में श्रेष्ट कविता की सरिता निरंतर बहती रही है |

कविता भाषा का अलंकार है | कविता संस्कृति का विशेष महत्वपूर्ण अंग है | जिस कविता में मनुष्य की बात नहीं होती वह कविता लोगों के दिल को छुती नहीं | कितनी रचनाएं ऐसी होती है जो विवेचक को खुश कर के इनाम पा लेती है | मनुष्य की बात करने वाली कविता ही लोगों में संवेदना प्रगट करती है |

कवि जहोन किट्स ने अपने कवि मित्र जहोन टेलर को कहा था कि कविता वृक्ष के पन्नों की तरह खिलती नहीं है वो अच्छा है |

कविता सूक्ष्म भावों को अपने में समा लेने वाली पेन ड्राइव हैं | कविता मैं लघु कथा का रस होता है | ललित कला के निबंध का गद्य की छटा का आस्वाद होता है | अमेरिकन पत्रकार डॉन मार्कविस ने ये बात अच्छी तरह की है |

कविता लिखना वो गहरी खाई में गुलाब की पंखुड़ी डाल के उसकी आवाज का प्रतिध्वनी सुनने के लिए प्रतीक्षा करने के बराबर है |

मनुष्य जाति के लिए हिंसा, अज्ञानता, झगडे-फसाद और कोलाहल से भरी इस दुनिया में कविता एक आश्वासन है | कविता का आम मनुष्य के साथ संबंध रहता ही है |

कवीर अपनी कविता में कहते है कि,

“बहता पानी निर्मला, बांध गंधीला होय

साधूजन रमते भले, दाग न लगे कोई”

कबीरजी अपनी कविता के माध्यम से कहते हैं की जो पानी बहता रहता है वो बहुत निर्मल और शुध्ध होता है और बंधा हुआ पानी गंदा होता है | “रनिंग वोटर इज ओलवेझ क्लीन” | कुदरती गति से बहता पानी हंमेशा स्वच्छ और पारदर्शक होता है | पवित्र होता है | बहेते पानी में लयबध्ध संगीत का अनुभव होता है | बहता पानी जिवंत होता है |बंध पानी बेजान होता है |

उपनिषद ने कहा है की चरे वेति – चरे वेति | चलते रहो-चलते रहो | आप कहाँ से आते हो वो महत्वपूर्ण नहीं हैं | और आप कहाँ जाने वाले है उसका भी आपको मालूम नहीं है वो बात भी बराबर है लेकिन बस चलते रहो |

स्कोटीश नवलकथाकार (उपन्यास लिखने वाला) रॉबर्ट लुइ स्टीवन्स ने लिखा है कि, “I travel not to go anywhere but to go” | इसका मतलब है कि में कहीं जाने के लिए नहीं लेकिन चलने के लिए चलता हूँ | अच्छा प्रवासी वो होता है जो किसी भी प्रकार की सोच मन में नहीं लाता | चलने मतलब मात्र हाथ पैर हिलाके चलना वो नहीं हैं | चलने के साथ शरीर और मन दोनों चलना चाहिये | चलने की बात कुदरत के साथ जुड़ जाती है तब वो आध्यात्मिक बन जाती है | समाज के साथ संवाद करने से वो समाजीक बन जाती है |

संत कबीर ने कहा है कि साधू हंमेशा खेलता रहता है, लोगों के साथ निश्वार्थ भाव से वो लोगों के लिए चलता रहता है | उसको दाग कैसे लगे? कितने लोग यात्रा को निकलते है लेकिन सामान के साथ वो वापस लोटते हैं तब उनके सामान में बढ़ावा होता है लेकिन उन में कोई सुधार यानि कि बदलाव नहीं आता | कितने लोग ऐसे है कि एक ही जगा बैठे रहते हैं लेकिन वो भीतर से चलते हैं | सूक्ष्म रूपमें वो लोगों से संपर्क बनाए रखते हैं | उनका आध्यात्मिक विकास होता है | उनका मन-ह्रदय प्रसन्न रहता है | इसके सन्दर्भ में कबीर की ये साखी है;

“बंधा पानी निर्मला, जो एक गहिरा होय

साधुजन बैठा भला, जो कुछ साधन होय” |

बंधा पानी निर्मल हो सके, यदि वो गहरा हो तो | इसी तरह एक जगह बैठा हुआ साधू संत भी निर्मल और सात्विक हो सकता है | यदि वो जप-तप में डूबा हुआ है तो |

कभी कभी एक शब्द या पंक्ति से कविता निर्माण होती है | “सुनो भाई साधू” गीत उस का उदहारण है | कभी कभी कविता लिखने का अवसर लम्बे अरसे तक प्राप्त नहीं होता है | लेकिन कभी कभी ऐसा भी होता है कि कविता की लहर मन में अचानक दौड़ आती है |

संत रविदास की कविता-

“प्रभुजी तुम चन्दन हम पानी तुम दिया हम बाती”

कितनी अच्छी है ?

हिलाने से बच्चा सोता है, राजा जागता है“

वेनुगोपालजी की पंक्ति है |

तुलसीदास, पिंगलीदास, केशवदास – ये सब हिंदी कवि है |

“माली आवत देख के कलियाँ करे पुकार,

फूलों को तो चुन लिया, कब हमें चुन लेगा”?

साठोतरी हिंदी कविता : हिंदी कविता लेखन के क्षेत्र मैं सन १९६० के बाद एक परिवर्तन परिलक्षित होता है | जिसके अंतर्गत करीब तीन दर्जन से अधिक काव्यान्दोलन चलाये गए | जिस में से अकविता आन्दोलन को मह्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ | साठोतरी हिंदी कविता की दिशाएं काफी व्यापक रूप धारण किये हुए है | साठोतरी हिंदी कविता की सबसे प्रमुख विशेषता, आझादी से मोहभंग रही है | जिस के अंतर्गत साठोतरी कवियोंने राजनितिक, आर्थिक तथा सामाजिक क्षेत्रों की बुराइयों को उखाड फेंकने के लिए कविता को अपना माध्यम बनाया | अत: कहना न होगा कि साठोतरी हिंदी कविता की दिशायें व्यापक द्रष्टिकोण वाली है | सन १९६० के बाद हिंदी कविता में विशेष रूपसे राजनितिक की और झुकाव परिलक्षित होता है |

साठोतरी जनवादी कविता में प्रेम की एक नयी द्रष्टि दिखाई देती है | इन कवियों का प्रेम संबंध रूमानी न रहकर यथार्थ के कठोर धरातल पर पैदा होता एवं परिपक्व होता है | इस के साथ ही नारी की एक नयी पहेचान सामने आती है | जिस में नारी भोग्या या दासी न रहकर सहभागिनी है | अनेक जगहों पर नारी का क्रान्तिकारी रूप सामने आता है | स्त्रियाँ हाथ में बन्दुक ले कर शोषक और बलात्कारी व्यवस्था के खात्मे के लिए मैदान में आ जाती है |

कविता को वाणी की आँख कहते हैं | कविता में डिब्ब गुर्राता है | झुग्गी के छेद को टपकाता है | कविता सिर्फ शब्दों का बिसात नहीं है, वाणी की आँख है | हिंदी कविता की विषय वस्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद लोगों के समक्ष उपस्थित समस्यायों को उजागर करती है |

गुलाबचंद पटेल

कवि लेखक अनुवादक

नशा मुक्ति अभियान प्रणेता

गांधीनगर गुजरात

मो.०९९०४४८०७५३

पटना का गोलघर

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बीजापुर के गुम्बद से भी दोगुना ऊँचा है पटना का गोलघर

-प्रदीप श्रीवास्तव 

अप्रैल माह का तीसरा सप्ताह, सूर्य देवता पूरे शबाब पर, एक शादी में शामिल होने पटना आया हूँ, वह भी लगभग तीस साल बाद, जहाँ तक याद आ रहा है सन 1986 में आया था । तब के और आज के पटना में कितना बदलाव आ गया है, गली –मोहल्लों ने कंक्रीट का जंगल अपना लिया है ।जगह -जगह गगन चुम्बी इमारतों ने अपनी पैठ बना ली है ।जो रही सही जगह थी उसे फ्लाई ओवरों ने पूरी कर दी । एक दिन का समय है, सोचा पटना घूमा जाए। मन में आया कि क्या देखें, चलो गोलघर ही देखते हैं । बेली रोड से टेम्पो पकड़ा, वाही डग्गामार (आज भी पटना की सड़कों पर निःसंकोच दौड़ती हैं, जैसे 31 साल पहले ) टैम्पो वाले से  गाँधी  मैदान चलने को कहता हूँ । गोलघर पर उतरना चाहता हूँ तो टेम्पो वाला कहता है कि साहब आज तो बंद है, यह पूछने पर कि क्यों, तो जवाब मिलता है कि आज महावीर जयंती है । लेकिन में यह सोच कर वापस गोलघर लौटता हूँ कि पुरातत्व के अधीन आने वाले स्मारक तो केवल शुक्रवार को छोड़ कर बंद नहीं रहते ।

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 गोलघर के सामने खड़ा हूँ, ऊँचा सा गुम्बद नुमा घर (यही कहें तो ठीक होगा ) सामने दूर गंगा का तट, लगभग गंगा जी यहाँ सूखी   सी दिखाती हैं । टिकट खिड़की से प्रवेश के लिए टिकट लेता हूँ, और अन्दर । परिसर बहुत ही साफसुथरा, मन मोह लेता है, वहां का वातावरण । देखरेख करने वाले कर्मचारियों से गोलघर का इतिहास जानना चाहता हूँ, तो एक टूक जवाब मिलता है की पर्यटन कार्यालय जाइये, वहां आप को जानकारी मिल जायेगी । मजे की बात यह है कि गोलघर स्थित टिकट घर में भी जानकारी की कोई पुस्तक व प्रपत्र नहीं है । गोलघर के प्रांगण में पर्यटक न के बराबर, कुछ युवा जोड़े (स्कूल के ही लड़के-लड़कियां )गलबहियां डाले अपनी दुनिया में मशगूल, मानों सातों जन्म की बातें आज ही कर डालेंगे, जिसे देख कर कर अपना भी छात्र जीवन (इस तरह का तो नहीं ) याद आ जाता है, वहां के एक कर्मचारी से इस बाबत पूछता हूँ तो वह कहता है, कैसे आप इन्हें रोकोगे, घर से निकले तो माँ – बाप ने सोचा होगा कि पढ़ने गएँ होंगे, लेकिन उन्हें क्या पता कि उनके बच्चे तो यहाँ मस्ती कर रहे होंगे, साहब खाना तक साथ लाते और शाम को ही वापस लौटते हैं, ख़ैर ।।

गोलघर के ठीक नीचे खड़ा हूँ, अन्दर खोखला भवन, जिसमे प्रकाश व ध्वनि के माध्यम से गोलघर के इतिहास की जानकारी दी जाती है ।गोलघर के ऊपर जाने के लिए दोनों तरफ से घुमावदार जीने बने  है, जिसके रख-रखाव व रंग रोगन का काम आजकल चल रहा है ।लखोरी ईटों से बने गोलघर की उचाई 96 फीट, व्यास 109 फीट और दीवार की मोटाई 12 फीट 4 ईंच है। जिसपर चढ़ने के लिए दोनों तरफ बने जीनों की संख्या 145 है, जिस पर चढते – चढते हाफा आने लगता है, ऊपर पहुँच कर पटना शहर देखते बनता, सामने गंगा का विशाल तट, पीछे देखें तो पटना शहर, गाँधी मैदान का विशाल प्रांगण, जहाँ सभाएं व रैलियां होती हैं। गुम्बद के बीचो बीच 2 फीट 7 इंच का एक सुराख़ नुमा जगह, जिसे अब बंद किया जा चूका है। कहते हैं कि इसी सुराख़ से अन्दर अनाज डाला जाता था।अनाज निकलने के लिए नीचे के दरवाजों का प्रयोग किया जाता था। लेकिन इस बात की पुष्टि कोई नहीं कर पाता कि वास्तव में कभी ऊपर से अनाज भरा गया हो।कहते हैं कि 1770 में पड़े सूखे के बाद ब्रिटिश कैप्टन जान हास्टिंन ने गोलघर अनाज रखने (ब्रिटिश आर्मी के लिए) के लिए बनवाया था। इसमें 14 लाख टन अनाज रखा जा सकता है। यह 20 जुलाई 1786 में बना था। इसकी मरम्मत 2002 में करवाई गई ।  परिसर में लगे शिलापट्ट पर जगह खाली पड़ी है, पर अंग्रेजी में यह जरुर लिखा है कि ‘ सामान्य योजना के तहत गवर्नर जनरल के आदेश से इस क्षेत्र में पड़ने वाले अकाल से निपटने की लिए इस गल्ला भंडारण का निर्माण किया गया। जिसका निर्माण कैप्टन जॉन गैरस्टीन द्वारा 1784 में शुरू करवाया था जो दो साल बाद 20 जुलाई 1786 में बन कर तैयार हुआ। 

गोलघर को मै अपलक निहार रहा हूँ, विश्वास ही नहीं हो रहा कि बिना बिम्बों के यह गुम्बद बना होगा । वास्तविकता भी यही है कि यह सिर्फ एक गुम्बद हे, किसी ईमारत का हिस्सा नहीं ।बताते हैं कि दुनिया में सबसे ऊँचा माना जाने वाला येरुशलम के गुम्बद ‘’ डोम आफ रॉक’’ से 40 फीट ऊँचा एवं कर्णाटक के बीजापुर गुम्बद से इसकी ऊँचाई दोगुना अधिक है। मुझे इस बात का आश्चर्य हो रहा हे कि अपने आकर -प्रकार से दुनिया में यह गुम्बद अकेला है लेकिन विडम्बना यह है इसे आज तक वह मान्यता नही मिली है, जिसकी यह हक़दार है ।सदियों बाद आज भी गोलघर सरकारी उपेक्षा का शिकार ही है ।गोलघर के भीतर माचिस की तीलियों के जलने की गूंज आप कभी भी जलाकर सुन सकते है ।इसके अन्दर पैदा होने वाली गूंज लखनऊ के भूलभुलैया की याद दिलाने लगती  है।इतिहास के पन्नों को पलटें तो सबसे पहले 1806 में श्रीमती शेरवुड ने इस गूंज का उल्लेख किया था ।श्रीमती शेरवुड ने उस समय इसकी तुलना लन्दन के सेंट पाल गिरजाघर गुम्बद से की थी। उनके बाद 1824 में जब बिशप हेवर पटना आये तो उन्हों ने भी इस गूंज की बात कही, लेकिन हेवर ने इसकी तुलना किसी से नहीं की।कहते हैं कि गोलघर का निर्माण अंग्रेजों द्वारा 1770 में बंगाल में पड़े आकाल के बाद गल्ला भण्डारण की जरुरत को महसूस करते हुए 1786 में किया गया था। गोलघर में ऐसे तो ईंटों का प्रयोग हुआ है लेकिन इसके शिखर पर लगभग तीन मीटर तक ईंट की जगह पर पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। कहा जाता है कि मजदूर एक ओर से अनाज लेकर गोलघर के शीर्ष पर पहुंचते थे और वहां बने दो फीट सात इंच व्यास के छिद्र में अनाज डालकर दूसरी ओर की सीढ़ी से उतरते थे।वैसे बाद में इस छिद्र को बंद कर दिया गया। 145 सीढ़ियों को तय कर गोलघर के ऊपरी सिरे पर पहुंचा जा सकता है। यहां से शहर के एक बड़े हिस्से खासकर गंगा तट के मनोहारी दृश्य को देखा जा सकता है। सरकार ने इस स्मारक पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया। वर्ष 1979 में राज्य संरक्षित स्मारक तो इसे घोषित कर दिया गया परंतु स्मारक के चारों ओर बढ़ी आबादी और सड़कों के निर्माण से स्मारक प्रभावित हुआ। कहते  है कि भवनों के निर्माण से भी गोलघर की नींव और दरारें प्रभावित हुईं।   

19वीं सदी के अंत में डॉ आर वैडल ने संभवतः पहली बार यह बात उठाई कि यह भवन बौध स्तूप की नक़ल है ? तभी से इस बात की चर्चा जोरों से पकड़ ली कि यह भवन वास्तव में स्तूप ही है ।इस बात की पुष्टि 1997 में पटना में आयोजित एक सेमिनार में पटना संग्रहालय के इतिहासकार अरविन्द महाजन ने भी करते हुए इसे “अम्ल्का स्तूप” बताया, जिसकी चर्चा चीनी यात्री फाहियान ने अपनी यात्रा संस्मरण में इसे सम्राट अशोक के पगोड़ा के रूप में की है।वहीँ  ह्वेनसांग ने भी अपने संस्मरण में इसे “अम्ल्का स्तूप” लिखा है । ह्वेनसांग लिखते हैं कि अम्ल्का स्तूप पाटलिपुत्र नगर के दक्षिण –पूर्व में स्थित है। 

गोलघर के परिसर में घूमते – घूमते एक कोने में बने नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बी।पी।कोईराला की मूर्ति के पास पहुंचता हूँ ।जिसे देख कर सोच में पड़ जाता हूँ कि यहाँ पर इस मूर्ति की क्या जरुरत ।कोईराला जी का क्या योगदान था इस जगह के लिए ? अगर इस जगह पर नेपाल के जांबाज जंग बहादुर की मूर्ति लगी होती तो कोई बात थी।कहते हैं कि नेपाल के जंगबहादुर ने घोड़े पर सवार हो कर एक तरफ के जीने से गोलघर के ऊपर चढ़ कर दूसरी तरफ के जीने से उतरने का कारनामा कर दिखाया था । इस बात का उल्लेख 1919 में प्रकाशित बाबू राम लाल सिन्हा की पुस्तक ‘पाटलिपुत्र’ मे मिलता है । प्रांगण से बाहर निकलने की सोच ही रहा था कि पेड के नीचे एक वृद्ध महिला बैठी दिख जाती है।सोचता हूँ की शायद वह यहाँ के बारे में कुछ बता सकें, उनके बगल में जा कर बैठ जाता हूँ। 

फिर शुरू हो जाता है बातचीत का शिलशिला ।।।

अम्मा, आप कब से यहाँ आ रहीं है ?

वह कहने लगती हैं, बेटा बचपन से आ रही हूँ, इसी गोलघर के नीचे अब्बा, दादा सहित परिवार के साथ रात में सोते थे, दादा की रेलवे स्टेशन पर दुकान थी, हम लोग क्या, पूरा मोहल्ला यहीं सोता था, तब तो बिजली थी नहीं, न ही इतने मकान बने थे, सामने गंगा नदी बहती थी, ठंडा रहता था यहाँ पर ।

अम्मा, आप का नाम ?

बेगम खातून मुझे कहते हैं, अब्बा ने यही पर शादी कर दी, यहीं के होकर रह गए, परिवार है लेकिन दिन में एक बार यहाँ आये बिना मन नहीं मानता, इसी लिए चली आती हूँ ।

पूछता हूँ, अन्दर आने के लिए टिकट लेती हैं क्या ?

इतना पूछते ही वह चीख कर वहां काम कर रहे कर्मचारियों की तरफ इशारा करते हुए कहने लगती हैं की कौन मांगेगा टिकट, कुछ गाली के शब्दों का प्रयोग करने लगती है ।जिसे सुनकर कर्मचारी मुस्कराते हुए निकल लेते है ।

फिर पूछता हूँ, आप की उम्र कितना होगी अम्मा ?

वे बोलती हैं, सन वन तो याद नहीं, अंग्रेजों का शासन था, लगभग 103 तो होगी। 

गोलघर के बारे में कुछ बताइए ?

वे कहती हैं इतना याद कि है बैलगाड़ियों में अनाज भर कर आता था और इसी गोलघर में रखा जाता था, बाद में निकाल कर ले जाते थे, कहाँ ले जाते यह नहीं मालूम। इससे अधिक अम्मा कुछ नहीं बताती, बातों को घूमते हुए परिसर से लगे मजारों के विषय में बताने लगती है, जिसका उल्लेख फिर कभी करूँगा ।सूरज पश्चिम दिशा में छिपने को लालायित हैं, और में गोलघर से बाहर  निकल कर टैम्पो की तलाश में सड़क के किनारे खड़ा हो जाता हूँ ।

प्रदीप श्रीवास्तव, ”उदगम”, 537-F /64 A, इंद्रपुरी कॉलोनी , सुभाष चंद्र बोस अकादमी के बगल, आई.आई.एम.-हरदोई रोड , बिठोली  तिराहा, लखनऊ -226013 , उत्तर प्रदेश , सम्पर्क 8604408528

pradeep।srivastava2@gmail।com

लॉकडाऊन

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How social distancing can help flatten the curve
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कहानी

लॉकडाऊन

अशोक शर्मा, ‘सोहन-स्नेह’

नौकरी का पहला ही दिन था। बड़ी मेहनत,प्रतीक्षा और चप्पल घसीटी के बाद मिली थी राकेश को शिक्षाकर्मी की यह नौकरी। जाने कितने पापड़ बेलने पड़े थे इस नौकरी के लिए भी।

अब थोड़ी बहुत ही सही लेकिन माँ और पापा को थोड़ी तसल्ली तो होगी जिन्होंने अपने इकलौते बेटे के लिए जाने क्या क्या अरमान संजोए थे । सोचता हुआ बस स्टैंड की ओर तेजी से बढ़ रहा था राकेश। पापा के डाक विभाग से रिटायर होने के बाद इन चार सालों में यही तो वह बड़ी खुशी थी जो राकेश और उसके परिवार को मिली है। बस स्टैण्ड अभी दूर था लेकिन विचार तेजी से नजदीक आते जा रहे थे। ‘पापा ने मुझे इंजीनियरिंग कराने के लिए तनख्वाह के साथ साथ अपनी बचत का कितना बड़ा हिस्सा खर्च कर दिया था , मैंने भी मेहनत में कहाँ कमी की थी,हर बार फर्स्ट, हर सेमेस्टर ऑल क्लियर। पर कोई कम्पनी जॉब देने आती तब तो,जाने कौन सी मंदी थी जिसने हर अरमान का गला घोंट दिया था। पापा के सपने को पहली चोट थी यह शायद।’ – ‘खैर पापा के साथ साथ मैंने भी तो कर लिया था समझौता और आखिर गणित में एम.एस.सी. भी बहुत अच्छे अंको से पास कर ही ली,लेकिन दुर्भाग्य ने कहाँ पीछा छोड़ा,कोई नौकरी होती तो मिलती न।’ –दो साल में छोटी मोटी ट्यूशन ही दिला पाई थी ये डिग्रियाँ।’

राकेश याद कर रहा था वह दिन जब बहुत भारी और टूटे मन से पापा ने कहा था ‘बेटा तू बी.एड. क्यों नहीं कर लेता,बैठे बैठे कब तक किसी नौकरी का इंतजार करेगा,कोई काम धंधा करने के लिए न तो हमारे पास अनुभव है और न ही कोई बहुत ज्यादा पूँजी बची है। बी.एड. कर लेगा तो शायद शिक्षाकर्मी की ही नौकरी मिल जाए। मेरी पेंशन से ले देकर घर तो चल जाता है लेकिन और भी तो जरूरतें हैं फिर तेरी शादी भी तो करना है।’

–‘यह कहते हुए थोड़ी देर के लिए ही ही सही पापा के चेहरे पर एक हल्की चमक आई तो थी।राकेश ने याद किया। ‘ माँ का चेहरा केवल इतना सुनते ही कितना दमकने लगा था।’ — राकेश भी तो जानता था कि ‘उसकै बड़े आदमी बनते हुए देखने और ठाठ-बाट से उसकी शादी करके एक सुन्दर,सुशील बहू घर में लाने के तमाम बुझे हुए सपनों के बीच अब माँ-पापा को यही एक आस थी कि उनके मरने के पहले बहू और पोते पोतियों का चेहरा ही देख ले।’ एक गहरी साँस खींचते हुए राकेश ने पीठ पर टंगे पिट्ठू बैग को ठीक किया,बस स्टैंड नजदीक आ चुका था। ‘यादें भी तो नजदीक और बहुत नजदीक आ रही हैं’ – राकेश फिर सोचने चलो कम से कम इस बार तो निराशा नहीं हुई ,क्या हुआ जो तनख्वाह कम है,नौकरी छोटी है,लेकिन है तो सरकारी। फिर अपना खर्च भी कितना है ,गुजारा हो ही जायेगा। कुछ समय तक नौकरी कर लूँ कुछ पैसा कौड़ी जोड़ लूँ फिर शादी भी कर लेना है। माँ -पापा को और कोई खुशी तो नहीं दे सका लेकिन यह खुशी तो जरूर और बहुत जल्द देना है।’

हार्न की आवाज से राकेश का ध्यान भंग हुआ। बस स्टैण्ड आ चुका था ,बस जाने को तैयार ही खड़ी थी,ड्राइवर ने हार्न बजाते हुए बस को थोड़ा आगे बढ़ाया। कण्डेक्टर ने राकेश को आवाज देते हुए बुलाया ‘चलो भाई चलना है तो जल्दी चढ़ो , बस छूट रही है।’ – राकेश ने एक नजर भरी हुई बस को देखा,बाहर से ही लग रहा था कि कोई सीट खाली नहीं है। उसने बस के पीछे देखा शायद कोई और बस भी हो। कण्डेक्टर ने तुरंत ही राकेश की आँखो को पढ़ते हुए कहा -‘बाबू साहब अगले दो घंटे अब और कोई बस इस रूट पर नहीं जायेगी। जल्दी चढ़ जाओ,थोड़ी देर में शायद सीट भी मिल जाए।’

राकेश पिट्ठू बैग संभालता हुआ भरी हुई बस में चढ़ गया । सभी सीटों पर लोग बैठे हुए थे दोनों तरफ की सीट के बीच में आठ-दस लोग खड़े हुए थे, वे सबके सब चारों तरफ देख रहे थे कि कहीं कोई बैठने की गुंजाइश बन जाए। गाड़ी के बोनट के पास राकेश भी खड़ा हो गया। बस चलने लगी थी। खिडकियों से गर्म हवा अंदर आ रही थी। बस की खिड़की के शीशों के किनारे में लगे हुए रबर मौसम की मार से या तो कट चुके थे या ढ़ीले हो चुके थे जिसके कारण लगातार खड़ खड़ की जोर की आवाज खिडकियों से आ रही तेज गर्म हवाओं का साथ दे रही थी। बोनट का ढ़क्कन भी बेसुरी और कर्कश आवाज में खिड़कियों के शीशों का बखूबी साथ दे रहा था। बोनट के नीचे ईंजन से निकलने वाली तेज गर्म हवा वाकई अच्छी लगती यदि ये कड़कड़ाती ठण्ड के दिसम्बर या जनवरी के दिन होते लेकिन अभी तो गरमी ही अपने शवाब पर है उस पर ये जुल्म अलग।’ – -राकेश बदस्तूर सोचता चल रहा था। अब तीखी आँच जूतों के भीतर घुसकर पैंरों को भी झुलसा रही थी। ‘ये बस मालिक यात्रियों की ही नहीं बस की भी जान निकाल कर मानेगा।’ इतने कष्ट में भी राकेश ने मुस्कुराते हुए सोचा।

इस बीच बस में दस पन्द्रह लोग और सवार हो चुके थे। ‘न जाने कैसे इतनी जगह बनती जा रही है गोया बस नहीं कोई वो कहानी वाली खोपड़ी हो जो बचपन में माँ सुनाया करती थी,आदमी की खोपड़ी का भिक्षा पात्र,जितना भी डालो भरता ही नहीं हर बार कुछ न कुछ खाली ही रह जाता।’ –‘ भगवान चालीस किलोमीटर का सफर है कुछ तो रहम कर,और कुछ नहीं तो थोड़ी बेठने की जगह तो मिले।’ राकेश मन ही मन प्रार्थना भी कर रहा था और बड़े कातर भाव से बस में चारों तरफ देख भी रहा था। अचानक उसकी नजर बस के बोनट के बाजू लम्बी सीट पर बैठी उस सुन्दर लड़की पर पड़ी जो ठसाठस भरी हुई सीट में एक कोने में बैठी हुई थी। वाकई बहुत सुन्दर थी, लगभग तेईस चौबीस साल की होगी। घर से निकलते वक्त बाल जरूर करीने से सँवारे होंगे लेकिन खिड़की से आती तेज गर्म हवा के कारण हेयर क्लिप और क्लचर के पूरे प्रयास के बावजूद कुछ जुल्फें चेहरे पर उड़ रही थीं। आसमानी रंग की साड़ी के साथ नीले रंग का ब्लाऊज उस पर बहुत फब रहा था। गले में सोने की पतली चैन,माथे पर छोटी सी नीली टीकी। पसीने को रूमाल से बार बार पोंछने के कारण पूरा चेहरा लाल हो गया था। यह सब एक नजर में ही देख लिया था राकेश ने। बस में चढ़ने और सीट की चिंता के कारण अभी तक उस लड़की के चेहरे की ओर देख ही नहीं पाया था राकेश। – ‘वाकई बहुत सुन्दर है। ‘ यह सोचते हुए राकेश ने अब उस लड़की ओर जरा और गौर से देखा तो उसकी सीट के बाजू बहुत छोटी सी जगह में रखा उसका पिट्ठू बैग भी नजर आया। शायद पीठ के पीछे रखने में दिक्कत के कारण किसी तरह गुंजाइश बनाकर उसने उस बैग को बाजू मेंं रख लिया था। राकेश ने उस बैग के स्थान पर अपने बैठने की गुंजाइश तलाश करते हुए एक नजर फिर उस लड़की की ओर देखा तो मालूम हुआ कि वह भी उसे ही देख रही है। नजर मिलते ही राकेश को यह आभास भी हो गया कि उस लड़की ने भी उसके मनोभावों को पढ़ लिया है।लड़की ने एक नजर बैग की ओर फिर एक नजर राकेश की ओर देखा अबकी बार उसके चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट भी थी। इस बीच किसी सवारी को उतारने के लिए ड्राइवर ने अचानक जोर से ब्रेक लगाया तो सारे लोग एक दूसरे पर गिरते गिरते बचे। राकेश भी उस लड़की पर गिरते गिरते बचा। लड़की का शरीर अपने आगे बैठी एक वृद्धा के ऊपर लगभग टिक गया था,लेकिन इस सबके बीच सारे लोगों के एक दूसरे से कुछ और अधिक सट जाने के कारण लड़की के बाजू थोड़ी बहुत जगह की गुंजाइश और हो गई थी। राकेश की नजरें बड़े दीन भाव से कभी उस जगह पर और कभी उस लड़की पर ही टिकी हुई थीं।लड़की ने भी राकेश की नजरों को बखूबी पढ़ लिया था। सप्रयास थोडा़ आगे की ओर और ज्यादा सरकते हुए उसने बहुत ही धीमी मगर मीठी आवाज में राकेश से कहा–‘देखिये, यदि बैठ सकें तो बैठ जाईये। आपको शायद दूर तक जाना है। हम लोग कुछ आगे पीछे हो लेते हें हो सकता है बैठते बन जाए आपको कुछ राहत तो मिल ही जायेगी।’

राकेश के कानों में मानो मिश्री ही घुल गई थी। उसने बड़ी आभारयुक्त दृष्टि से लड़की की ओर देखा और किसी तरह उस छोटी सी जगह में अपने को समेटकर रखते हुए कहा–‘बहुत बहुत धन्यवाद, सच में बहुत परेशानी हो रही थी,मुझे आईडिया भी नहीं था,वर्ना बस में भीड़ होने के और पहले ही बस स्टैण्ड आ जाता।’

लड़की ने कुछ कहा तो नहीं पर उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट तैर गई। बस अपनी रफ्तार से चली जा रही थी। बस के हिचकोलों ने राकेश को दिक्कतों के साथ ही सही उस सीट पर टिके रहने के लायक जगह तो बना ही दी थी। –‘इतना ही बहुत है,कुछ तो राहत मिली,वर्ना पहले दिन ही जान निकलने में कोई कसर तो नहीं रह गई थी’ –राकेश ने सोचा। अब राकेश नौकरी और बस की दिक्कतों से बहुत कुछ बाहर आ चुका था और अब तो उस लड़की के बारे में ही सोच रहा था। –‘कहाँ जा रही है आप?’ लड़की से कुछ परिचय बढ़ाने के लिहाज से राकेश ने पूछा। ‘जी, मैं,.., मैं एक प्राईवेट फर्म में एकाऊँटेंट हूँ,रोज यहाँ से आना जाना करती हूँ।’ – ‘और आप ‘ अचानक हुए प्रश्न से चौंकते हुए लेकिन तुरंत खुद को संभालते हुए लड़की ने अगले कुछ प्रश्नों के जवाब भी बिना पूछे ही दे दिये और अब उससे भी पूछ रही थी कि वह क्या करता है। अब चौंकने की बारी राकेश की थी।

‘ मेरी पास ही एक स्कूल में शिक्षाकर्मी की नौकरी लगी है। पहला दिन है,ज्वॉईन करने ही जा रहा हूँ।’ राकेश, राकेश नाम है मेरा ।’ एक ही साँस में राकेश ने भी सारे जवाब दे दिए। ‘नमस्ते राकेश जी’ अब लड़की के चेहरे पर भी लम्बी मुस्कुराहट घिर आई थी। — ‘ आपने मेरा नाम तो जान ही लिया है, अब लगे हाथ आप अपना नाम भी बता दीजिए।’ –अंजलि, अंजलि नाम है मेरा,दो तीन महिने पहले ही मैंने भी नौकरी करना शुरू किया है,सुबह बस से जाने के बाद शाम तक लौट आती हूँ। ‘ अंजलि से यह पहला परिचय था और पहली ही मुलाकात में अंजलि ने न केवल अपनी खूबसूरती से बल्कि अपने व्यवहार से भी राकेश के मन में घर कर लिया था। राकेश ने बहुत बार सोचा कि अंजलि से उसके मोबाईल का नम्बर पूछे लेकिन एक तो इस डर से रूक जाता कि जाने अंजलि इस बात का क्या मतलब निकाले। संबंध इतने भी प्रगाढ़ नहीं हुए थे कि एक दूसरे के मोबाईल नम्बर की जानकारी ले सकें। दूसरा अंजलि को कभी मोबाईल रखे या बात करते भी तो नहीं देखा है,शायद मोबाईल रखती ही न हो या मोबाईल केवल अपने परिवार वालों के लिए ही उपयोग करती हो,अनावश्यक और बाहरी लोगों से बातें करना उसका पसंद ही न हो।

अगले कुछ दिनों में राकेश और अंजलि का परिचय थोडा और प्रगाढ़ हो चुका था। जो भी पहले बस स्टैण्ड पहुँच जाता वह दूसरे के लिए बाजू में एक सीट रोक लेता था। स्कूल जाते और आते समय विभिन्न विषयों पर बात के सिलसिले से राकेश ने यह भी जान लिया था कि अंजलि अत्यंत परिपक्व और बुद्धिमान थी। घर में अकेली माँ ही थी,पिता का निधन बहुत पहले हो चुका था । गाँव मे पिता को विरासत में मिला हुआ चार एकड़ खेत था जिसे चाचा बोते थे और उसके बदले साल भर का अनाज और कुछ नकद दे दिया करते थे। चाचा के बहुत अहसान थे उन पर।चाचा की मदद से ही पढ़ लिखकर ही आज इस काबिल हो गई थी कि इस प्राईवेट फर्म की नौकरी की बदौलत शहर में रहकर अपना और अपने परिवार का बोझ उठा सके। बात ही बात में यह भी मालूम हुआ कि अंजलि की माँ का भी यही अरमान है कि जल्दी से कोई सुयोग्य वर मिल जाए तो अंजलि के हाथ पीले कर दूँ,लेकिन अंजलि जानती थी कि फिलहाल तो माँ की इच्छा पूरा कर पाना संभव नहीं है। चाहने के बावजूद ऐसा कौन सा सुयोग्य लड़का मिल जायेगा जो शादी के बाद भी उसकी माँ की जिम्मेदारियां उठाने में उसे रोकेगा टोकेगा नहीं। ‘माँ को किसके भरोसे अकेले छोड़ सकती हूँ मैं।’ अंजलि ने मन ही मन सोचा। वैसे ये बात भी नहीं थी कि अंजलि शादी ही न करना चाहती हो,बल्कि साथ की अनेक सहेलियों के विवाह के मौकों पर हर बार अपना घर बसाने के बारे में अंजलि भी सोचती ही थी। आखिर उसके भी सपने थे,युवावस्था के सुनहरे सपने उसे भी लुभाते थे। अपने सपनों के राजकुमार के साथ उसने भी जीवन को अपने मनचाहे अंदाज में जीने के बहुत से प्लॉन बनाये हैं लेकिन ये सपने हर बार माँ की देखभाल और उसके अकेले रह जाने की सोच पर आकर और सच की कठोर सतह से टकराकर धड़ाम से बिखर जाते थे। इस सवाल का कोई हल भी तो नहीं था उसके पास। कभी कभी वह सोचती कि ऐसा क्यों होता है कि शादी के बाद लड़की को ही विदा होकर ससुराल जाना पड़ता है क्या लड़के विदा होकर ससुराल नहीं आ सकते।

आज भी बस में बैठे बैठे यही सब कुछ तो सोच रही थी अंजलि। सोच के तार कुछ और फैले तो उसने एकबार कनखी से राकेश की ओर देखा, –‘कितना अच्छा, सुन्दर, भला लड़का है बिल्कुल मेरे सपनों में आनेवाले उस राजकुमार सा ही ,जिसके पास शायद मेरी सारी समस्याओं की चाबी थी। ‘ फिर उसने सर को एक झटका देकर इस विचार को झटकने की कोशिश की। ‘ ऐसा कैसे हो सकता है,राकेश कितना भी अच्छा ,भला लड़का क्यों न हो अपने माँ -बाप को थोड़े ही छोड़ सकेगा और मैं भी इतनी स्वार्थी कहाँ हो सकती हूँ जो ऐसा सोच भी सकूँ। ‘ –‘पर किसी तरह यदि ये संभव हो तो कितना अच्छा हो,राकेश जैसे भले लड़के अब मिलते ही कहाँ हैं,यदि ये मेरे जीवन में आ जाए तो न केवल मेरी बल्कि माँ की भी जिम्मेदारी बहुत अच्छे से संभालेगा ये विश्वास तो पक्का है। ‘ गहरी साँस लेते हुए अंजलि ने एक बार फिर विचारों में खो गई।

राकेश की मन में भी बहुत दिनों से यही उमड़ घुमड़ चल रही थी। अंजलि पहली नजर में ही उसे भा गई थी। यह भी निश्चित था कि माँ और बाबूजी को भी एक नजर में ही अंजलि भा जायेगी। इन कुछ दिनों में ही कभी कभी ही सही जब भी कनखियों से राकेश अंजलि की आँखो में झाँकता तो हर बार यह पाता था कि यह लगाव एकतरफा नहीं है। –‘ये तो तय है कि अंजलि भी उसे चाहती है। अंजलि की समस्या के बारे में भी कभी खुलकर और कभी इशारों में बात हो चुकी थी। अंंजलि की माताजी के बारे में लगातार राकेश भी सोचता रहा था। यह भी संभव नहीं लगता था कि अंजलि से शादी करके अपने माता- पिता को छोड़कर वह अंजलि के घर रहने लगे।बहुत दिनों से इस सवाल से लगातार जूझ रहा था लेकिन हल नहीं मिल रहा था इसी उहापोह में वह चाहकर भी अंंजलि से अपने प्यार का इजहार भी नहीं कर पा रहा था। रोज हिम्मत करता कि आज उसे मन की बात कह दूँगा लेकिन जीवन के व्यावहारिक पक्ष और इस जटिल सच का सामना करते ही हिम्मत जवाब दे जाती।

‘बेटा तेरी तबियत तो ठीक है ना,आजकल रोज तू गहरी चिंता में डूबा जाने क्या क्या सोचता रहता है। देख रही हूँ कि खाने पीने में भी तेरा मन नहीं लग रहा है। ‘ — माँ की आवाज से राकेश का ध्यान भंग हुआ, आज शाम घर लौटकने के बाद कुर्सी पर बैठा हुआ जाने कब वो फिर से अंजलि के ध्यान में डूब गया था और फिर उसी जटिल सच का हल खोज रहा था जिसका मिलना संभव नहीं है यह भी जानता था।

—‘ नहीं, कुछ नहीं, ऐसा कुछ नहीं है माँ ,कोई बात नहीं है तू चिंता मत कर।’ कनखियों से उसने पास में ही बैठे पिताजी की ओर एक नजर डाली जोकि वहीं कुर्सी पर बैठे टीवी पर समाचार सुन रहे थे।

–”बेटा , माँ हूँ तेरी, मैं तो बंद आँख से भी तेरे चेहरे को पढ़ सकती हूँ। तू जरूर मुझसे कुछ छुपा रहा है,बहुत दिनों से तेरी यही हालत है,कुछ तो है जो मुझसे छुपा रहा है। तुझे मेरी कसम, आज तो तुझे सच बताना ही पड़ेगा।”

”वो क्या है माँ, वो, वो …” और फिर संकोच और सकुचाहट के साथ उसने सारी मन की गुत्थियां आज उजागर कर ही दी। बीच -बीच में पिताजी की ओर भी देख रहा था जो कि अब समाचार सुनना छोड़कर गौर से उसकी ही बातें सुन रहे थे।

‘अरे,बस इतनी सी बात के लिए इतनी बड़ी खुशखबरी छुपाए बैठा था। ”माँ ने प्यार से माथा सहलाते हुए कहा तो उसका संकोच कम हुआ,लेकिन आँखो में तो प्रश्न तैर ही रहा था कि इस समस्या का हल आखिर माँ के पास क्या है। एक नजर पिताजी की ओर डाली तो वे भी मंद मंद मुस्कुरा रहे थे जैसे यह कोई समस्या ही न हो।

— ” माँ-बाप के प्रति अपना कर्तव्य निभाना हर बेटे-बेटी की जिम्मेदारी है, अंजलि की माँ की जिम्मेदारी बेशक उसकी है लेकिन शादी के बाद दामाद भी तो बेटा ही होता है । यदि अंजलि से तुम्हारा विवाह होता है तो यह फर्ज केवल अंजलि का ही नहीं बल्कि तुम्हारा भी होगा कि उसकी माँ की देखभाल करो ,रह गई हमारी बात तो अभी तो हम दोनों शारिरिक रूप से स्वस्थ और सक्षम हैं तेरे पिता और मैं अभी एक दूसरे की देखभाल तो कर ही सकते हैं। हमसे ज्यादा जरूरत अंजलि की माँ को देखभाल की होगी। यह परम्परा भले ही है कि शादी के बाद बेटियाँ ही विदा होकर पति के घर जाती हों , लेकिन यह परम्परा तोड़ी भी तो जा सकती है और फिर कौन सा तुम लोग इस शहर से दूर जाओगे। रोज हमसे भी मिलने आ जाया करना। आँख के सामने रहोगे जरूरत पर आते जाते रहोगे तो यह कतई जरूरी नहीं है कि शादी के बाद अंजलि ही विदा होकर इस घर में आए बल्कि हम खुद तुम्हें विदा करके अंजलि के घर भेजेंगे, बल्कि ऐसा होने पर तुम्हारे और अंजलि के इस शहर में एक नहीं दो -दो घर होंगे। बच्चे खुश रहें,अपनी जिम्मेदारी समझते रहें इससे अधिक माँ-बाप को और चाहिए भी क्या। तुम कल ही अंजलि से बात करो और अगर वह और उसकी माँ इस प्रस्ताव पर तैयार हों तो हमें भी जल्दी से अंजलि से मिलवाओ,हम भी तो देखें उसे जिसने हमारे बेटे की आँखो की नींद चुरा ली है।”

— माँ की बातें सुनते हुए पास में बैठे पिताजी भी न केवल सहमति में गर्दन हिला रहे थे बल्कि गर्व के साथ पत्नी और पुत्र को देख भी रहे थे । राकेश भौचक्का सा कभी माँ को और कभी पिताजी को देखते हुए सोच रहा था मेरे लिए जो समस्या इतनी जटिल थी उसे माँ ने कितने सरल ढंग से सुलझा दिया है। अब उसके चेहरे पर लाज के साथ-साथ माता-पिता के लिए गर्व के भाव भी थे। कर्तव्य और प्रेम दोनों के निर्वहन का एक नया रास्ता उसे दिखाई दे रहा था ।

”कल सबसे पहले अंजलि से अपने प्यार का इजहार करूँगा,अंजलि भी जरूर हामी भरेगी ही, माँ-पिताजी की सहमति के साथ -साथ अंजलि को यह भी बताऊँगा कि आने वाले समय में अब न केवल दोनों के घर की खुशियाँ साझी होंगी बल्कि दोनों की जिम्मेदारियाँ भी साझी होंगी। हम दोनों मिलकर समाज को भी एक नया रास्ता दिखायेंगे कि विवाह और बेटियों की विदाई एक परम्परा ही है लेकिन परम्परायें जीवन की सच्चाइयों से बड़ी नहीं होती । परम्परायें समाज को दिशा देने,बेहतर बनाने और समस्याओं में रास्ता दिखाने के लिए होती हैं किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि परम्परायें ही समस्या बन जाएँ। ऐसे हरेक दौर में पुरानी परम्परा से ही एक नयी परम्परा का जन्म होता है ,यही होना भी चाहिए। परम्परायें कोई ताल तलैय्या थोड़े ही हैं, रुके हुए पानी की तरह,बल्कि ये तो नदियाँ है सतत प्रवाहित, सतत नयी, सतत सलिला,जीवनदायिनी।”

राकेश प्रमुदित मन से सोचता चला जा रहा था, जल्द से जल्द यह बात अंजलि से कह देना चाहता था, कल का इंतजार बहुत भारी लगने लगा राकेश को। ध्यान में डूबे राकेश की तन्द्रा अचानक पास में ही टेलीविजन से प्रसारित हो रहे ब्रेकिंग न्यूज से टूटी। एँकर बता रहा था कि ‘जनता कर्फ्यू’ तो ‘कोरोना’ की महामारी से लड़ने के लिए लोगों की मानसिक तैयारी परखने का एक प्रयोग था। जिसमें आम भारतीय खरे उतरे हैं , ‘कोरोना’ से असली लड़ाई तो अब शुरू होगी और कल से इक्कीस दिनों का ‘लॉकडाऊन’ लागू होगा। कोई अपने घर से नहीं निकलेगा, एकदम जरूरी सेवाओं, वह भी सीमित समय के लिए, सब कुछ पूरा बंद।

राकेश की कल्पनाओं को जोर का झटका लगा,खुशियाँ थोड़ी देर के लिए उदासी में बदल गईं, गुस्से के साथ – साथ दुखी भाव से राकेश ने टीवी के न्यूज एँकर को एक बार देखा,फिर अपनी भावनाओं पर काबू पाते हुए अपने आप को मन ही मन समझाने लगा कि कोई बात नहीं इक्कीस दिनों का इंतजार और सही।

घर की दिवारों में कैद राकेश के इंतजार के एक -एक दिन बीत रहे थे। आज यह इक्कीसवें दिन की बला भी कटने वाली थी लेकिन यह क्या वही मनहूस टीवी एँकर फिर से प्रकट हो गया था और अगले चौदह दिन के लिए ‘लॉकडाऊन’ बढ़ाने की खबरें दे रहा था।

राकेश बेबसी और गु्स्से में एँकर की आवाज सुन रहा था और अब तो हर बार अगले चौदह दिन के बाद फिर अगले चौदह दिन और फिर अगले चौदह दिन के लॉकडाऊन’ बढ़ने की खबरें टीवी से मिल रहीं थीं। इस बीच शहर में भी ‘कोरोना’महामारी के फैलने के समाचार आने लगे थे, चारों तरफ एक अजीब किस्म का सन्नाटा और भय पसरा हुआ था इन दिनों। ‘लॉकडाऊन’ कब तक जारी रहेगा कब खुलेगा कोई नहीं बता पा रहा था। सबके अपने अपने कयास थे बस कयास ही पक्का कुछ भी नहीं। राकेश को अपने ऊपर भी कोफ्त हो रही थी कि क्यों उसने संकोच छोड़कर अंजलि से उसका मोबाईल नम्बर नहीं माँग लिया। कम से कम उसका हाल-चाल तो जान लेता। राकेश का गुस्सा, बेचैनी और इंतजार बढ़ता चला जा रहा था। घर में बैठे बैठे अब उसका एक ही काम रह गया था कि वह टीवी देखता रहे और इंतजार करे कि कभी तो ‘लॉकडाऊन’ खुलने की खबर आयेगी।ये ‘लॉकडाऊन’ सभी के लिए बहुत लम्बा था लेकिन राकेश के लिए तो यह सदियों की तरह लम्बा होता चला जा रहा था यह लॉकडाऊन।’

कॉलेज रोड, महासमुंद, (छत्तीसगढ़)493-445, मो. 9425215981

डी एम मिश्र की ग़ज़लें

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shadow of person's hand holding flowers
Photo by Tanya Trofymchuk on Unsplash

डी एम मिश्र की ग़ज़लें

1

दिल से जो लफ्ज निकले वह प्‍यार बना देना

पर आँख से जो बरसे अंगार बना देना ।

तन्हा हॅू निहत्था हॅू घर से निकल पडा हॅू

ईमान को मेरे अब हथियार बना देना ।

दुनिया से दुश्मनी का नामोनिशाँ मिटा दूँ

तिनका भी उठाऊँ तो तलवार बना देना ।

चाँदी की तरह चमके सोने की तरह दमके

मेरे खुदा मेरा वो किरदार बना देना ।

भूखा न कोई सोये प्यासा न कोई रोये

याचक हमें भी बेशक़ इक बार बना देना ।

कश्ती उतार दी है दरिया में तेरे दम पर

तूफाँ को मेरे मौला पतवार बना देना ।

2

तेरे नक़्शेकदम पे चलता हूँ

जिंदगी ख़्वाब तेरे बुनता हूँ।

आग ऐसी लगी है सीने में

रात दिन बस उसी में जलता हूँ।

जब कोई रास्ता नहीं सूझे

ऐ ख़ुदा तुझको याद करता हूँ।

यूँ तो दुनिया में हसीं लाखों हैं

तेरी सूरत पे मगर मरता हूँ।

बडी मुश्किल से जलें चूल्हे भी

उन ग़रीबों का दुख समझता हूँ।

दूसरों का जो छीन लेते हक़

उन लुटेरों से रोज़ लड़ता हूँ।

बात भी आदमी की करता हूँ।

बात भी आदमी से करता हूँ।

3

जंग लड़नी है तो बाहर निकलो

अब ज़रूरी है सड़क पर निकलो ।

कौन है रास्ता जो रोकेगा

सारे बंधन को काटकर निकलो ।

क्या पता रास्ते में काँटे हों

मेरे हमदम न बेख़बर निकलो ।

बाज भी होंगे आसमानों में

झुंड में मेरे कबूतर निकलो ।

उसकी ताक़त से मत परीशाँ हो

छोड़कर खौफ़ झूमकर निकलो ।

दूर तक फैला हुआ सहरा है

भर के आँखों में समन्दर निकलो ।

4

ताक़त में वो भारी है

जंग हमारी जारी है ।

जिस के भीतर मानवता

कवि उसका आभारी है ।

सही रास्ता दिखलाना

कवि की जिम्मेदारी है ।

लाइलाज हो गयी ग़रीबी

ये कैसी बीमारी है ।

लेखन भी अब धंधा है

लेखक भी व्यापारी है ।

जिस पर राजा खुश होता

वह कविता दरबारी है ।

बात उसूलों की वरना

दुश्मन से भी यारी हैं ।

सम्‍पर्क -डॉ डी एम मिश्र 604 सिविल लाइन निकट राणाप्रताप पीजी कालेज सुलतानपुर 228001 उ0प्र0 मोबाइल नं0 9415074318

हैं

यूजीसी केयर सूची में पत्रिका को शामिल करने की प्रक्रिया

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UGC-CARE-JOURNAL

(UGC CARE LIST) यूजीसी केयर सूची में पत्रिका को शामिल करने की प्रक्रिया

यूजीसी केयर क्या है 

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्चतर शिक्षा संस्थानों में मानकों को बनाए रखने के लिए उत्तरदायी शीर्ष नियामक निकाय के रूप में शोध की गुणवत्ता में सुधार करने और प्रकाशन आचारनीति की रक्षा के लिए कड़े कदम उठाए हैं। इस प्रयोजन के लिए यूजीसी ने 14 जनवरी, 2019 की अधिसूचना द्वारा  गुणवत्तापूर्वक संदर्भ सूची’ तैयार करने और रखरखाव के लिए ‘शैक्षिक और शोध आचारनीति सह-संघर्ष (केयर) की स्थापना है।  केयर का मुख्य कार्य भारतीय विश्वविद्यालयों में शोध की गुणवत्ता के साथ-साथ प्रकाशन आचारनीति को बढ़ावा देना है।

यूजसी केयर सूची में पत्रिकाएँ कब शामिल की जाती है ?

यह सूची वर्ष में तीन बार संशोधित की जाती है। यूजीसी केयर के सदस्यों द्वारा शोध के मानकों को ध्यान में रखकर गुणवत्तापूर्वक पत्रिकाओं का चयन किया जाता है।

ugc care list

यूजीसी केयर में पत्रिका शामिल करने हेतु आवेदन कैसे करना है ? (Apply for Ugc Care)

केवल विश्वविद्यालयों के शिक्षण संकाय निर्धारित प्रस्तुत करने की प्रक्रिया का पालन करने के पश्चात पत्रिकाओं की संस्तुति कर सकते हैं। पत्रिका शीर्षक/कों की संस्तुति विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के माध्यम से निम्नानुसार की जाएंगीः
विश्वविद्यालयः विश्वविद्यालय के आईक्यूएसी प्रकोष्ठ संबंधित क्षेत्र यूजीसी-केयर विश्वविद्यालय को पत्रिका के शीर्षक/कों की संस्तुति कर सकते हैं।
संबद्ध महाविद्यालयः महाविद्यालय आईक्यूएसी प्रकोष्ठ पत्रिका के शीर्षक/कों की संस्तुति कर सकते हैं, अगर उन्हें मूल विश्वविद्यालय के आईक्यूएसी प्रकोष्ठ के लिए उपयुक्त पाया गया है। मूल विश्वविद्यालय का आईक्यूएसी प्रकोष्ठ संस्तुत पत्रिका शीर्षक को अग्रेशित कर सकता है, यदि संबन्धित क्षेत्रीय यूजीसी-केयर विश्वविद्यालय के लिए उपयुक्त पाया जाता है।
व्यक्ति विशेष कोई भी व्यक्ति विशेष निकटतम महाविद्यालय अथवा विश्वविद्यालय के आईक्यूएसी प्रकोष्ठ के माध्यम से केवल शिक्षण संकाय की संस्तुति के साथ निर्धारित प्रस्तुतीकरण प्रक्रिया का पालन करके यूजीसी-केयर विश्वविद्यालय को पत्रिका शीर्षक/कों की संस्तुति कर सकता है।प्रकाशक प्रकाशक सम्बद्ध महाविद्यालय के आईक्यूएसी प्रकोष्ठ अथवा विश्वविद्यालय के आईक्यूएसी प्रकोष्ठ के माध्यम सेशिक्षण संकाय की संस्तुति के साथ निर्धारित प्रस्तुतीकरण प्रक्रिया का पालन करके पत्रिका शीर्षक/कों की संस्तुतिकर सकते हैं।

Apply for ugc care


यूजीसी-केयर विश्वविद्यालय 

  1. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली (उत्तरी क्षेत्र)
  2. एम.एस. बड़ौदा विश्वविद्यालय, वडोदरा (पश्चिमी क्षेत्र)।
  3. हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद (दक्षिणी क्षेत्र)
  4. तेजपुर विश्वविद्यालय, असम (पूर्वी क्षेत्र)

यूजीसी केयर में आवेदन हेतु आवेदन पत्र 

आप इस लिंक पर क्लिक करें – आवेदन पत्र करके फॉर्म डाऊनलोड कर  सकते हैं और नजदीक के कॉलेज अथवा विश्वविद्यालय द्वारा प्रेषित कर सकते हैं।

इसके अतिरिक्त आप ऑनलाइन आवेदन भी कर सकते हैं।

यूजसी में शामिल पत्रिकाओं को कहाँ देखें 

यूजीसी केयर सूची (UGC CARE LIST) को आप पुणे विश्वविद्यालय के अधीन यूजीसी केयर की वेबसाइट पर देख सकते हैं। 

ugc care journal list

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अधिगम पत्रिका

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अधिगम पत्रिका

परिचय

‘अधिगम’ पत्रिका उत्तर प्रदेश सरकार के शिक्षण संस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं शिक्षण परिषद (एससीईआरटी) द्वारा शुरू की गई एक शोध पत्रिका है, जिसमें विद्यार्थियों की शिक्षा संबंधी अनेक शोध उपयोगी जानकारी का प्रकाशन किया जाता है। यह शोध पत्रिका अधिगम विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है। यह पत्रिका उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा संचालित सभी विद्यालयों में निःशुल्क वाटी जाती है। इस पत्रिका में प्रकाशित की गई सामग्री वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बेहद उपयोगी होती है और विद्यार्थियों के लिए नई वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने में सहायता करती है। इस पत्रिक के माध्यम से विद्यार्थी अपनी अनेक शैक्षिणिक समस्याओं का समाधान आसानी से पा सकते हैं।

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अधिगम पत्रिका के संपादक

अधिगम पत्रिका के संपादक का नाम डॉ. आशुतोष दूबे है।

अधिगम पत्रिका की वेबसाइट

अधिगम पत्रिका के अंक को आप उत्तर प्रदेश सरकार के शिक्षण संस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं शिक्षण परिषद (एससीईआरटी) की वेबसाइट से प्राप्त कर सकते हैं।

यूजीसी केयर सूची में क्या अधिगम शामिल है ?

जी, हाँ अधिगम पत्रिका यूजीसी केयर सूची में शामिल है।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय ई- परिचर्चा

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय ई- परिचर्चा

मोतीलाल नेहरू लॉ कालेज, खंडवा द्वारा अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय ई- परिचर्चा का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें आप सभी की सहभागिता अपेक्षित है।
दिनांक– 08/03/2021
समय – प्रातः 11.00 बजे से
सभी प्रतिभागियों को ई- प्रमाण पत्र प्रदान किया जाएगा।
मिटिंग लिंक ?? — https://meet.google.com/tvv-rsey-nze
womens day semnar

संपर्क सूत्र- ओम नारायण शुक्ला
                 सहायक प्राध्यापक
                 9425186669

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दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड द्वारा 1809 पदों के लिए विज्ञापन जारी

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दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड द्वारा 1809 पदों के लिए विज्ञापन जारी

दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड Delhi Subordinate Services Selection Board (DSSSB) में Technical Assistant, Laboratory Attendant, Assistant Chemist, Asst Engineer, Jr Engineer, Draftsman,  Personal Asst, Pharmacist इत्यादि पदों के लिए विज्ञापन जारी। यह विज्ञापन कुल 1809 पदों के लिए जारी किया गया है। 
कुल पद- 1809 
विज्ञापन – विज्ञापन 
dsssb vacancy 2021


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कश्मीरनामा: अशोक कुमार पाण्डेय

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कश्मीरनामा

परिचय

‘‘अशोक कुमार पाण्डेय की ‘कश्मीरनामा’ हिन्दी में कश्मीर के इतिहास पर एक पथप्रदर्शक किताब है। यह किताब घाटी के उस राजनैतिक इतिहास की उनकी स्पष्ट समझ प्रदर्शित करती है जिसने इसे वैसा बनाया, जैसी यह आज है।’’
-शहनाज बशीर, युवा कश्मीरी उपन्यासकार

‘‘ ‘कश्मीरनामा’ पढ़कर इस बात का सुखद अनुभव होता है कि इसे एक-एक ऐतिहासिक घटना को बड़े एहतियात के साथ, छेड़े बिना, किसी भी प्रकार के पूर्वग्रह से मुक्त होकर लिखा गया है। मुझे उम्मीद है ‘कश्मीरनामा’ को कश्मीर में रुचि रखने वाले पाठक, शोधकर्ता और शिक्षक कश्मीर के इतिहास की पुस्तकों में एक दिग्दर्शन-पुस्तक के रूप में लेंगे।’’
-डॉ. निदा नवाज, प्रख्यात कश्मीरी कवि तथा लेखक

‘‘कश्मीर के अतीत और वर्तमान की समझ को लेकर हमारे चारों ओर जो खौफनाक चुप्पी पसरी है उसे तोड़ने की कोशिश करती इस पथप्रदर्शक किताब के महत्व को कम करके नहीं आँका जा सकता। चूँकि कश्मीर हर हिंदुस्तानी की जबान पर मौजूद रहता है, थोड़ी असहजता के साथ ही सही, ऐसी दर्जनों किताबें पहले ही हिन्दी पाठकों के सम्मुख होनी चाहिए थीं। अब इस तरह के कदमों से कश्मीर को अखबारों और टेलीविजन की सुर्खियों के शिकंजे से बचाया जा सकता है, और ये एक शुरुआती संवाद का रूप भी ले सकते हैं जिससे लोग यह विचार कर सकें कि कश्मीर से भारत को आखिर क्या मिला है। और भारत ने कश्मीर में क्या किया है।’’
-संजय काक, जाने माने फिल्मकार और लेखक

लेखक

अशोक कुमार पाण्डेय एक चर्चित कवि और विचारक हैं जो सामार्थिक विषयों पर गहन शोध के लिए जाने जाते हैं। उनसे ashokk34@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

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