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प्रवासी परिधि में स्वदेशी चकाचौंध (तेजेंद्र शर्मा की कहानियों के बहाने ): डॉ राजेश श्रीवास्तव, भोपाल (म०प्र०)

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 प्रवासी परिधि में स्वदेशी चकाचौंध(तेजेंद्र शर्मा की कहानियों के बहाने )

-डॉ राजेश श्रीवास्तव, भोपाल (म०प्र०)

तेजेंद्र शर्मा को प्रवासी कथाकार की श्रेणी में गिनना बहुत अटपटा लगता है . लेकिन यह तो सच ही है . उनकी कहानियां भारतीय परिवेश की बारीकियों का परिचय इस प्रकार कराती हैं कि यह विश्वाश करना कठिन हो जाता है कि वे परदेश में रह रहे हैं . अनेक कहानीकारों की चर्चा में मुझे कई बार शामिल होने का अवसर मिला है किन्तु इस बार यह अवसर बिलकुल अलग है . इस समय दिमाग में कहानियां नहीं तेजेंद्र शर्मा का मुस्कुराता चेहरा भर है , जिसे मैंने केवल तस्वीरों में ही देखा है . कभी दो- चार शब्दों भर बातचीत हुई भी है तो उसके कोई माने नहीं . हां , जब तब , यहाँ –वहां , इधर-उधर , हर कहीं उनकी साहित्यिक लोकप्रियता की चर्चा का भी कम असर नहीं है . तेजेंद्र शर्मा की कहानियों से रूबरू होने के पीछे दो कारण और भी हैं .पहला तो यह कि वे प्रवासी कथाकार हैं . (प्रवासी और अप्रवासी होना एक पहेली है मेरे लिए . कालेज के दिनों में भी मैं इन दो शब्दों के बीच गच्चा खा जाता था. प्रवास एवं इसके विभिन्न स्वरूपों के साथ अनेक भ्रम हैं . इसके सही एवं व्यापक अर्थ को सीमित कर अब केवल ‘विदेश में रहने वाले को ही’ प्रवासी समझा जाने लगा है . गलत होते हुए भी, प्रवासी शब्द का, यह अर्थ अब रूढ़ हो गया है । ‘प्रवास‘ के स्थान पर ‘अप्रवास’ या ‘प्रवासी’ के स्थान पर ‘अप्रवासी’ शब्द का प्रयोग देखने में आ रहा है .) तेजेंद्र शर्मा का प्रवासी होना बड़े मायनेदार है.शायद इसी वजह से उन्होंने अधिक पाठकों ,संपादकों ,प्रकाशकों ,मित्रो और लेखकों को आकर्षित किया है . लेकिन यह एक बेहतरीन स्थिति है खासकर हिंदी के लिए. यू के , लन्दन में रहकर वे हिंदी कथा का दीपक जलाए हुए हैं. हिंदी भाषा की ज्योति जगमगा रही है. हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार का जो काम अनेक संस्थाएं और सरकार तक कर रही है उसे वे सहयोग कर रहे हैं . हिंदी का चतुर्दिक प्रचार-प्रसार हो रहा है . और हिंदी का साहित्य भी समृद्ध हो रहा है – साधुवाद . 
प्रवासी लेखन को लेकर भारतीय आलोचकों , खासकर बामपंथी आलोचकों में बहुत उपेक्षा का भाव रहा है . उसके कुछ कारण सच भी हैं . प्रवासी होने की आड़ में कई रसूकदार लोग साहित्यकार बन गए हैं . वे अन्य कारणों से लोकप्रियता प्राप्त करने में सक्षम हैं . प्रवासी लेखन के बारे में किसी ने एक सवाल किया है .मैंने कहीं पढा था – प्रवासी व्यक्ति होता है उसकी भाषा नहीं . इसलिए प्रवासी साहित्य जैसी कोई धारा की आवश्यकता नहीं है . मेरा मानना है कि प्रवासी साहित्य एक अलग ही धारा है . क्योकि उसमें जो नज़रिया है वो अलग है . एक प्रवासी लेखक कई संस्कृतियों , देशकाल की स्थितियों ,रीति-रिवाजों, प्रथाओं , परम्पराओं, खान-पान ,और साहित्यिक गुणों से जाने- अनजाने वाबस्ता होता रहता है . यही गुण उसे भारतीय लेखन परम्परा से अलग पहचान देता है .देश की राजनीति और सामाजिक सरोकारों और कला संस्कृति पर निरपेक्ष दृष्टि रखना एक प्रवासी लेखक के लिए अधिक आसान है .बशर्ते उसमें यह सब क्षमता भी हो . तो लन्दन में वर्षों से रहने वाले तेजेंद्र शर्मा और रचनाकर्म करने वाले हिंदी में कहानी लिखें , चर्चित हों , सम्मानित हों और हिंदी का गौरव बढे –यह बड़ी बात है . 
उनके तीन कहानी संग्रह अभी मैंने देखे है – ‘ढिबरी टाइट’ (1994), ‘देह की कीमत’ (2001) तथा “बेघर आँखें” (2007). इसके अलावा और भी बहुत से संग्रह हैं उनके . काला सागर, यह क्या हो गया, सीधी रेखा की परतें, कब्र का मुनाफा, दीवार में रास्ता, मेरी प्रिय कथाएँ, प्रतिनिधि कहानियाँ आदि संग्रहों को देखने का सौभाग्य मुझे नहीं मिला . अलबत्ता छुटपुट कहानियां पत्रिकाओं में देख पाया हूँ . 
तेजेंद्र शर्मा की कहानियाँ उनके सजग साहित्यकार होने का प्रमाण है। वे अपने आसपास से ही अपने पात्र चुन लेते हैं जो बिलकुल उनके साथ कदमताल करते चलते हैं . विषय वैविध्य और विषयों की सामायिकता और कथा साहित्य में शिल्प एवं शैली के स्तर पर जो परिवर्तन हुए हैं, उनकी झलक तेजेंद्र शर्मा की कहानियों में देखने को मिलती है।
तेजेंद्र शर्मा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं .किन्तु उनकी असली पहचान उनके रचना संसार से है . (हालाकि यह भी एक सच है कि भारत की जितनी निगरानी वे रखते हैं , उतनी तो यहाँ के बहुत सारे फन्ने खां भी नहीं रख पाते ). कहानियों और कहानीकारों को स्थापित करने का काम हिंदी जगत में प्राय आलोचक जन ही करते आये हैं . और आलोचक भी एक से बढ़कर एक कद्दावर हुए है . सबके सब श्रद्धेय , पूज्यनीय , आदरणीय , लम्बे समय तक हिंदी कहानी को आलोचकों की दृष्टि ने खूब पहचाना . अब हालात बदल गए हैं आलोचकों को पूछता कौन है?(क्षमा करें) आलोचक घर की खिड़की खुली रखते हैं .आलोचकों के विकल्प भी तो बहुत हैं . अपनी पत्रिका , अपना प्रकाशन , अपने पाठक , अपना सम्मान , अपना मीडिया . आलोचक तो खुद मुश्किल में है . उन्हें कोई कवर ही नहीं करता . (क्षमा करें , मैं अब तक तेजेंद्र शर्मा की कहानियों पर नहीं , उनकी कहानी तक पहुचने की प्रक्रिया पर ही बात कर रहा हूँ . लेकिन इतना फिर भी कहना चाहता हूँ , अधिक तड़क – भड़क से बात तो बन सकती है लेकिन कहानी नहीं बनती . तेजेंद्र शर्मा की कहानी बन रही है .प्रवासी परिधि में स्वदेशी चकाचौंध का जादू चल पडा है . उनकी कहानी हिंदी की मुख्य धारा को प्रभावित कर रही है – यह भी बड़ी बात है )
तेजेंद्र शर्मा की कहानियों में जो सबसे बड़ी बात मुझे अपील करती है , वह उनकी अनगढ़ शैली है . बावजूद इसके उनकी कुछ कहानिया मुझे रोककर उनके ठेठ प्रवासी होने का अहसास भी करा जाती हैं . मैं बड़े सद्भाव के साथ यह कहना चाहता हूँ कि उनकी कुछ कहानियां जो मैंने पढ़ी हैं उनके आधार पर मैं उन्हें प्रवासी तमगे से अलग नहीं कर पाया . एकाध कहानी का उदाहरण भी दे ही दूं . जैसे – टेलीफोन लाइन . 
टेलीफोन लाइन की शुरुआत में ही कुछ शब्द परेशान कर देते हैं . फोन , टेलीफोन और मोबाइल शब्दों के प्रयोग में थोड़ी असावधानी हुई है – 
टेलिफ़ोन की घन्टी फिर बज रही है .अवतार सिंह टेलिफ़ोन की ओर देख रहा है . सोच रहा है कि फ़ोन उठाए या नहीं . आजकल जंक फ़ोन बहुत आने लगे हैं. लगता है जैसे कि पूरी दुनियां के लोगों को बस दो ही काम रह गये हैं – मोबाईल फ़ोन ख़रीदना या फिर घर की नई खिड़कियां लगवाना . अवतार सिंह को फ़ोन उठाते हुए कोफ़्त- सी होने लगती है. सवाल एक से ही होते हैं, “हम आपके इलाके में खिड़कियां लगा रहे हैं. क्या आप डबल ग्लेज़िंग करवाना चाहेंगे ? ” या फिर “सर क्या आप मोबाइल फ़ोन इस्तेमाल करते हैं ? ” (टेलीफोन लाइन से )
लाइन शब्द प्राय लेंड लाइन के लिए ही प्रयोग में आता है . मोबाइल के लिए नेटवर्क का प्रयोग हो रहा है . टेलीफोन पर लम्बी बातचीत तो ठीक पर उसके संवादों में कहीं कुछ खटकता है , कहीं – कहीं . 
तुम्हें वो उषा याद है क्या ? ”
“कौन सी उषा ? ”
“वही जो स्कूल के बाहर ही रहती थी. आर्ट्स में थी. वो मुकेश का गाना गाया करती थी, –जियेंगे मगर मुस्कुरा न सकेंगे, कि अब ज़िन्दगी में मुहब्ब्त नहीं है. ” 
“हां जी, उस रोंदड़ को कौन भूल सकता है. बोलती थी तो लगता था कि अब रोई के तब रोई….उसने छ : साल तक बस वो एक ही गाना सुना सुना कर बोर कर दिया…..वैसे अवतार, गाती ठीक थी, …मुझे मुस्कुराए हुए तो एक ज़माना ही बीत गया है.”
“जानती हो उसने एक दिन मुझे कहा था कि अवतार तुम कोई माडर्न नाम रख लो न ! आई विल कॉल यू ऐवी ! अवतार बहुत पुराना सा नाम लगता है. तुम में जो सेक्स अपील है, नाम भी वैसा ही होना चाहिये…. उसके बाद उसने मुझे हमेशा ऐवी कह कर ही बुलाया… मुझे पता ही नहीं चलता था कि मुझे बुला रही है…. वैसे रोंदड़ नहीं थी यार. अच्छी भली लड़की थी… सांवली भी थी. मुझे गोरे रंग के मुकाबले हमेशा सांवला रंग ज़्यादा अट्रेक्ट करता है.”
“मैने भी नोट किया था कि तुमने यह बात स्कूल में दो तीन बार दोहराई थी. तुम्हें अपर्णा सेन बहुत सुन्दर लगती थी…. गोरी चिट्टी हिरोइनें नहीं… फिर इंगलैण्ड में क्या करते हो ?.. किसी गोरी मेम से चक्कर नहीं चला क्या ? ”
“अरे हमारा क्या चक्कर चलना, एक शादी की थी, वो भी संभाली नहीं गई…. फिर से कंवारा बना बैठा हूं. ”
तेजेंद्र शर्मा की यह कहानी एक ओर नायक अवतार सिंह को फोकस करती है तो दूसरी ओर सोफिया जैसे बिंदास केरेक्टर को सामने लाती है . सोफिया का चरित्र बिलकुल अलग है . पचता नहीं है .
स्कूल में साथ पढने वाली कोई लड़की कैसे इस तरह की बात कर सकती है – “अवतार मियां तुम भूल रहे हो कि मेरी शादी हायर सेकेण्डरी पास करते ही हो गई थी. अभी तो अट्ठारह की भी नहीं हुई थी…. जब शादी होगी, तो सुहागरात भी होगी… और जब वो होती है तो पेट फूल ही जाता है. दो बार फूला और दो बार हवा निकलवा दी. वर्ना चार चार को ले कर बैठी होती. हमारे मर्द भी तो जाहिल होते हैं. उनके लिये औरत बस इसी काम के लिये होती है. हर साल एक बच्चा बाहर निकाल लो….बेग़ैरत होते हैं सब. ”
स्कूल के दिनों की घटनाओं के वर्णन में कुछ बडेपन का असर ज्यादह है . सोफ़िया का टेलीफोन पर यह कहना भी अजीब है – “जानते हो कितना जी चाहता था कि मुझे कोई सोफ़ी कह कर लिपटा ले अपने साथ. और फिर वही सोफी अचानक अपनी विधवा बेटी से विवाह का प्रस्ताव अवतार के सामने रख देती है. स्कूल की यादों में केवल लड़कियों के प्रेम , आकर्षण और फ्लर्ट के सिवा कुछ नज़र नहीं आता . हिदू- मुसलमान, सिख , आतंकवाद की घटनाओं में उलझी लपटी और टेलीफोन लाइन की लम्बी बातचीत में यह कहानी पाठक को बहुत उलझाती है . 
अब एक और कहानी हथेलियों में कम्पन – अद्भुत कहानी . परिजनों की अस्थियाँ लेकर हरिद्वार की यात्रा . संवेदना के साथ यथार्थ के धरातल पर झकझोरने वाली अनुभूतियाँ . बहुत ईमानदारी और सच्चाई के साथ लिखी गई कहानी .नरेन् मौसा और कथानायक के बीच मित्रवत व्यवहार है .छोटे –छोटे ख्याल एक विचारvicvividvidhvidhavidhaavidhaarvidhaaravidhaaraaधारा बनकर गहरे संवेदन का साक्षात्कार कराते हैं – मृत्यु क्या केवल एक शारीरिक स्थिति है? क्या कर्मकाण्ड जीवन और मृत्यु के साथ जुड़ा रहना चाहिये? क्या किसी की मृत्यु पर रोना आवश्यक है?… मुझ जैसे अज्ञानी लोग इन सवालों से जूझते रहते हैं।
नरेन त्रिखा का अनुभव संसार बहुत बड़ा है . वे अपने पिता, चाचा, मामा, दो साढ़ुओं, एक साली, एक साले, अपने समधी और कई दोस्तों की अस्थियां हरिद्वार पहुंचा चुके हैं. उनका इन पण्डों को अच्छी तरह समझते थे. उन्हें इन सबसे बातचीत करने का एक लम्बा अनुभव है. बाऊजी की मृत्यु के झटके से भला कहां उबरा था. नरेन मौसा की एक एक बात मेरे लिये फ़रमान था. मुझे आशा थी कि किसी ऐसी जगह जाकर अस्थि विसर्जन करेंगे जैसा कि गंगा नदी को चित्रों में देखा है. मगर नहीं… एक पण्डा मिला जिसने कहा कि यहां ऊपर जो धारा बहती है यहां बेहतर अस्थि विसर्जन होता है. नरेन मौसा ने हामी भर दी. 
मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था… मृत्यु सीधी और सरल क्यों नहीं हो सकती? क्यों कुछ लोग मृत्यु में भी ऑनर्स और पीएच. डी. कर लेते हैं. क्यों हम मरने के बाद उनके द्वारा लूटे जाने पर भी उफ़ नहीं करते? क्यों हर मज़हब का इन्सान मौत के सामने इतना बेचारा हो जाता है? क्यों हम मृतक की आत्मा की शान्ति के लिये बेवक़ूफ़ियों पर बेवक़ूफ़ियां करते चले जाते हैं? हम तो महानगरों में रहने के कारण पूरी तरह से धार्मिक नहीं रहे… मगर जो छोटे शहरों, कस्बों या गांव में रहते हैं… उनका शोषण ये धर्म के ठेकेदार किस तरह करते होंगे. 
कर्मकाण्डो की यह दुनिया बड़ी विचित्र है . तेजेंद्र शर्मा कितनी सरलता से वह सब कह देते हैं , जिसके बारे में सोचते हुए भी सारे बदन में झुरझुरी आ जाती है . 
चारों तरफ़ से घिरा एक स्थान है जहां एक गाय बंधी खड़ी है, एक चारपाई है, एक बिस्तर बंधा हुआ है, एक लालटेन, एक छाता, एक टाइम पीस, एक जोड़ी मर्दाना कपड़े और एक जोड़ी ज़नाना कपड़े, एक मर्दानी चप्पल और एक ज़नाना चप्पल. वहां पास एक और खटिया पर एक पण्डा सुस्ता रहा था. मैं अनायास पूछ बैठा, -ये सब क्या है?
नरेन मौसा से पहले ही पण्डा स्वयं बोल पड़ा, -देखो बेटा हम यहां क्रियाकर्म करते हैं. मरने वाले की आत्मा की शान्ति के लिये हम वे सब चीज़ें यहां रखते हैं जिनकी उसे अगली ज़िन्दगी में ज़रूरत होगी. तुम यहां मृतक के नाम से जो जो चीज़ें दान कर जाओगे, वे सब उसे स्वर्ग में मुहैय्या हो जाएंगी. यहां पांच सौ से ले कर पांच हज़ार तक के क्रियाकर्म की सुविधा मौजूद है. 
मेरी आंखों में अनिश्चितता देख कर पण्डा स्वयं ही बोल पड़ा, -इसमें परेशान होने की तो कोई बात ही नहीं ना. देखिये, अगर आपका बजट पांच सौ रुपये का है तो बस आप खाट, बिस्तर और कपड़ों को हाथ लगा दीजिये. ये मृतक के नाम से दान हो जाएंगे. जैसे जैसे आप नग बढ़ाते जाएंगे, वैसे वैसे दाम बढ़ते जाएंगे. पांच हज़ार में गौदान का लाभ भी मिल जाएगा. 
मृत्यु दर्ज करवाने का दृश्य तो और भी अधिक बौराने वाला है . –
उस बहीखाते में मैंने अपने हाथों से अपने बाऊजी की मृत्यु के बारे में विवरण लिखा. ऐसा लगा जैसे बाऊजी की मृत्यु अब हुई है, इसी पल. कमरे की सीलन… बहीखातों की महक… और फ़ाउण्टेन पेन से की गई एन्ट्री… आंखों में जमे हुए आंसू… एक बार छत की तरफ़ देखा… कम से कम बीस फ़ुट ऊंची तो होगी ही… ऊपर तक बहीखाते ही बहीखाते… चारों तरफ़ से दीवारें तो दिखाई ही नहीं दे रही थीं… ट्यूब-लाइट जल रही थी… कमरा उजला था… बस लाल लाल बहीखाते… क्या कभी ये सभी नाम एक दूसरे से बातचीत करते होंगे… ये तो सभी एक ही बिरादरी, भाषा और क्षेत्र के लोग हैं… क्या उस कमरे में सरायकी भाषा सुनाई देती होगी… ये मृतक आपस में क्या बातें करते होंगे… इतनी शांति मुझे अस्थि विसर्जन करते समय नहीं मिली थी जितनी कि शकुन्तला पाठक की हवेली में मृत्यु दर्ज करवाते समय मिली. praaspraapraprp
(इस कहानी को मैंने कई दफा पढ़ा. दिल भर आया . अभी कुछ दिन पहले ही मैंने अपनी माँ को सदा के लिए खोया है . पिता भी कुछ वर्ष पहले चल बसे . माँ और पिता के अस्थि विसर्जन का एक दृश्य अभी आँखों में ही बसा है और दूसरा तेजेंद्र शर्मा की कहानी में देखता हूँ . संवेदना के स्तर पर यह कहानी बहुत बड़ी कहानी है .) 
इस कहानी का उत्तरार्द्ध और भी ख़ास है .नरेन् मौसा के तीस वर्षीय बेटे की अस्थि विसर्जन का समय है यह . आज गंगा उल्टी बहने वाली है… आज पुत्र अपने पिता की मृत्यु बहीखाते में नहीं भरेगा… आज पिता अपने पुत्र का नाम लिख कर हस्ताक्षर करेगा… ठीक उसी पन्ने में नीचे जहां उसने अपने पिता की मृत्यु का विवरण भरा था. 
इन दो कहानियों से तेजेंद्र शर्मा के कहानी के सभी पक्षों को यक़ीनन ठीक तरह से नहीं समझा जा सकता . लेकिन यह लेखक बिलकुल बेनकाब है . बेनकाब क्या, नकाब तो कभी थी ही नहीं . सब कुछ पारदर्शी .वे एक बड़े लेखक हैं. 
ख्यातिनाम व्यंग्यकार गिरीश पंकज जी ने तेजेंद्र शर्मा के बारे में कहीं लिखा है कि उन्हें अपने बड़े होने का अहसास ही नहीं. लेखक अगर अच्‍छा इंसान न बन सके, तो उसका लेखन बेमानी है. तेजेंद्र शर्मा के लेखन में गहरी करुणा है. उनकी तमाम कहानियाँ मनुष्‍य की प्रवृत्तियों की गहरी पड़ताल करते हैं और पाठक को सोचने पर विवश कर देते हैं. विदेश में रह रहे भारतवंशियों की समस्‍याओं को लेकर या फिर यहाँ से विदेश जाने की ललक रखने वाले रिश्‍तेदारों के स्‍वार्थों की कहानियाँ भी तेजेंद्र ने खूब लिखी हैं. महानगरीय त्रासदियों पर भी उनकी अनेक कहानियाँ हैं. अब तो उनकी कहानियाँ अनेक भाषाओं में भी अनूदित होने लगी हैं. लेकिन तेजेंद्र शर्मा सभी प्रभावों से परे हैं . उनकी कहानियां निजी विचार-विचारधारा तथा प्रवृत्ति को थोपती नहीं है . 
उन्हीं की तरह बड़ी कहानीकार ज़किया ज़ुबैरी जी लिखती हैं -तेजेंद्र शर्मा की लेखन प्रक्रिया एक मामले में अनूठी है. वह अपने आसपास होने वाली घटनाओं को देखते हैं, महसूस करते हैं, और अपने मस्तिष्क में मथने देते हैं. जबतक कि घटना कहानी का रूप नहीं ग्रहण कर लेती. तेजेन्द्र जितने अच्छे कहानीकार हैं उतने ही अच्छे इन्सान भी हैं और बेहद अच्छे दोस्त भी. तेजेंद्र शर्मा एक ख़ुदा-तरस इन्सान है जो कि ज़मीनी हक़ीकत से जुड़ा हुआ है. दूसरों को हंसाने वाला, ख़ुश रखने वाला यह इन्सान, हज़ारों दुख अपने सीने में छिपाए दिन रात इसी कोशिश में रहता है कि कैसे किसी का भला कर दिया जाए. यह संवेदनशील व्यक्ति केवल कहानीकार ही नहीं, कवि भी है और मानव मन की दुखती रगों को पकड़ता है. तेजेंद्र की कहानियां और कविताएं उसके साहित्यिक जीवन का दर्पण हैं.
कैसर तमकीन ने तेजेंद्र शर्मा के उर्दू कहानीपुट पर लिखा है – शर्मा साहिब की कहानियों का मजमुआ (संकलन) ‘ईटों का जंगल’ इस तार्रुफ़ के साथ हमारे हाथ में आता है कि यह हिंदी से उर्दू में तरजुमा (अनुवाद) है। बात ज़रा चौंका देने वाली लगती है क्योंकि हिन्दी से उर्दू या उर्दू से हिंदी तरजुमें के कोई ख़ास मायने नहीं हैं. यह तो सिर्फ़ रसमुल ख़त (लिपि) बदलने की बात होती है. दूसरी बात यह भी है कि तेजेन्द्र शर्मा की कहानियों को तो हिंदी या उर्दू की कहानी कह पाना मुश्किल है. वह इतनी आसान ज़बान लिखते हैं कि हिंदी और उर्दू पढ़ने वाले सभी लोग आसानी से समझ जाते हैं. प्रेमचन्द की तरह शर्मा साहिब की कहानियां भी उस ज़बान में हैं जो उत्तरी हिन्दुस्तान में एक कोने से दूसरे कोने तक बोली और समझी जाती है. थोड़े बहुत फ़र्क के साथ यह उन तमाम जगहों पर आम बोली की तरह इस्तेमाल होती है जहां एशियाई लोग रहते हैं . इस किताब में शर्मा साहिब की कहानियों को तरजुमा कहना अच्छा नहीं लगता. यहां तो सिर्फ़ लिपि बदली गई है. कहानी की देवी एक ही है. पहले यह सिर्फ़ साड़ी पहने हुए थी और अब यह शलवार कमीज़ पहन कर आई है – पर शलवार कमीज़ भी तो पूरे भारत का लिबास है. 
तेजेंद्र शर्मा की लोकप्रियता का यह आलम है कि बड़े – बड़े लेखक भी उनके लेखन की अवहेलना नहीं कर पाते . बहुमुखी प्रतिभा के धनी तेजेंद्र शर्मा की रचनाओं पर विस्तार से शोध किया जाना प्रतीक्षित है . प्रवासी परिधि में स्वदेशी चकाचौंध करते तेजेंद्र शर्मा हिंदी साहित्य के लिए भी एक ज़रूरी लेखक बन गए हैं . 
डॉ राजेश श्रीवास्तव 
विभागाध्यक्ष –हिंदी , शासकीय महाविद्यालय बुदनी (म०प्र०)
बी-१६ ,लेकपर्ल रेजिडेंसी , ई-८ ,अरेरा कालोनी, भोपाल(म०प्र०),भारत 
मो-9827303165 , urvashiurvashibhopal@gmail.com 
सम्पादक – उर्वशी, शोध, साहित्य एवं संस्कृति की अन्तरराष्ट्रीय त्रैमासिकी

प्रभा खेतान के छिन्नमस्ता उपन्यास में स्त्री विमर्श

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woman in white and black dress holding woven basket

प्रभा खेतान के ‘छिन्नमस्ता’ उपन्यास में ‘स्त्री विमर्श’

गढवी योगेशकुमार गणपतदान

स्वदूर विला सोसायटी मकान

नं-५ पदमनाथ चौकड़ी,

चाणस्मा हाईवे पाटन,

तहसिल / जिल्ला – पाटन

मो -९८७९३११९६३

शोध सारांश

नारी विमर्श को अंग्रेजी में ‘फेमिनिज्म ‘कहां गया है। पश्चिम के विद्वान इस्टेल फ्रडमैन ने निम्न शब्दों में परिभाषित किया है। “नारी विमर्श यानी पुरुष एवं स्त्री सम महत्व रखते हैं । अधिकांश समाजों में पुरुष को वरीयता देते हैं।स्त्री पुरुष समानता के लिए सामाजिक आंदोलन जरूरी है।क्योंकि लिंगा धारित अंतरअन्य अतः सामाजिक परंपराओं में प्रवेश करता है।जो हो यह निश्चित है कि यह चिंतन अन्याय के विरुद्ध है। भारत की संस्कृति मे जब भी कहीं नारी ने अपने विचार के लिए सिर उठाया तो उसे पश्चिमी सोच समझ कर टाल दिया गया। आज हम प्रभा खेतान जीके ‘छिन्नमस्ता ‘उपन्यास में नारीविमर्श या चिंतन किया है।प्रभा खेतान जीने अपने साहित्य के माध्यम से समाज में चेतना लाने की बात की है।उन्होंने स्त्री को पुरुष के समान दर्जा दिलवाने के लिए अनेक कहानी उपन्यास की रचना की है।

बीज शब्द: स्त्री विमर्श, फेमिनिज़्म, पश्चिम, साहित्य

शोध आलेख :

हिंदी साहित्य ने इस युग मे बहुत से दबे हुए स्वर को उदघोषित किया है। हिन्दी साहित्य ने अनेक विधाओं पर अपनी सशक्त लेखनी चलाई है। आजके आधुनीक युग में विमर्श की लेखनी ज्यादातर लीखी जा रही है। उसमें दलित विमर्श आदिवासी जाती के उत्थान में विमर्श पिछड़े हुए समाजके प्रति उदघोषकेश्वर ज्यादातर दिखाई देते हैं। आज नारी विमर्श की बात कर रहे हैं तो नारी विमर्श या यानी स्त्री विमर्श की बात यह विमर्श मैं स्त्री को केंद्र बिंदु रहकर आंदोलन जरिए स्त्री अस्मिता मुल्कसाहित्य की रचना की जाए उसे नारी विमर्श या स्त्री विमर्श कहा जाता है। नारी विमर्श को अंग्रेजी में ‘फेमिनिज्म ‘कहां गया है। पश्चिम के विद्वान इस्टेल फ्रडमैन ने निम्न शब्दों में परिभाषित किया है। “नारी विमर्श यानी पुरुष एवं स्त्री सम महत्व रखते हैं । अधिकांश समाजों में पुरुष को वरीयता देते हैं।स्त्री पुरुष समानता के लिए सामाजिक आंदोलन जरूरी है।क्योंकि लिंगा धारित अंतरअन्य अतः सामाजिक परंपराओं में प्रवेश करता है।जो हो यह निश्चित है कि यह चिंतन अन्याय के विरुद्ध है। ” -> इस्टेल फ्रेडमेन

भारत की संस्कृति मे जब भी कहीं नारी ने अपने विचार के लिए सिर उठाया तो उसे पश्चिमी सोच समझ कर टाल दिया गया। आज हम प्रभा खेतान जीके ‘छिन्नमस्ता ‘उपन्यास में नारीविमर्श या चिंतन किया है।प्रभा खेतान जीने अपने साहित्य के माध्यम से समाज में चेतना लाने की बात की है।उन्होंने स्त्री को पुरुष के समान दर्जा दिलवाने के लिए अनेक कहानी उपन्यास की रचना की है।

कवियत्री का नारी दर्शन :

प्राचीन समय में भी नारी नें पुरुष समाज के समक्ष अपना वैचारिक द्रोह व्यक्त किया है।उस समय चल रही पुरुष समाज ने अपने बने बनाए नियमों उसके वर्चस्व को स्त्री की अपनी निरिहता के विवशता के कि वह अपने कोउसको जकड़ने से उनकी रुढीयो विपरीताओ के प्रती अपनी आवाज बुलन्द की है। प्रभा खेतान जी नें अपने ‘ छिन्नमस्ता ‘उपन्यास में स्त्री वेदना केा उभारा है । आप महाभारत से लेकर रामायण काल तक स्त्री केा लज्जा के दायरेसंस्कार की दुहाई देकर शोषण किया गया है । तब भी द्रौपदी ने अपनी पांच पति एवं सभा के सभी सदस्यों को फटकार लगाई है । स्त्री को समझना बहुत जरूरी है उसकी भी बहुत सी उम्मीदें भावना पर चोट लगती है तब विमर्श के स्वर बहते हैं । पुरुष प्रधान समाज की कठपुतली नहीं है स्त्रीउसके अनेक रूप है कहीं वह मां के रूप में है कहीं पत्नी के रूप में सदा वात्सल्य ही उसका प्रयोजन रहा है उसकी मासूमियत को जब चोट पहुंचाई जाती है तभी समाज में क्रांति के स्वर गूंजते हैं इस स्वर को पकड़कर लेखिका ने स्त्री पीड़ा कोसमाज तक पहुंचाने का सघन प्रयास किया है । प्रभा जी का जन्म 1 नवंबर 1942 में हुआ था उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एम.ए. की डिग्री हासिल की ज्या पार्ल सार्त्र के अस्तित्व पर पी.एच . डी की उपाधि हासिल की -उन्होंने अपनी 12वर्ष की उम्र से ही साहित्य साधना में लग गई उनकी पहली रचना सुप्रभात में छपी थी हिंदी साहित्य की विलक्षण बुद्धि जीव उपन्यासकार कवियत्री नारीवादी उद्घोषक तथा समाजसेवी रही है।कोलकाता चेंबर ऑफ कॉमर्स की वह पहली महिला अध्यक्ष रहे।स्त्री विमर्श को केंद्र में रखकर लिखने वाले नामांकित लेखकों में से एक डॉ .प्रभा खेतान थे।

डॉ प्रभा खेतान जी ने समाज में आंखें देखी एवं कानों सुनी सभी परिस्थितियों को अभिव्यक्त किया है । स्त्री विमर्श यानीपुरुष प्रधान समाज के द्वारा लैंगिक भेदभाव से स्त्री शोषण के खिलाफ किया गया आंदोलन जिसमें प्रभा खेतान जी ने अपने विचारों की अभिव्यक्ति की है।

प्रभा खेतान जी के उपन्यास छिन्नमस्ता में स्त्री विमर्श :

प्रभा खेतान जी के छिन्नमस्ता उपन्यास में पितृसत्तात्मक समाज मेजो स्त्री को चार दिवार ही उसकी दुनिया है उसमें से पिछड़ी हुई नारी को नई दुनिया नए विचार प्रदान किए हैं । चार दिवार के बाहर भी विशाल विश्व हैस्त्री को इस खोखले समाज ने चार दिवार में ही उसका जीवन है यह समझ देकर चुप करा दिया थावह नारी उसने आधुनिक एवं पाश्चात्य रूप में विद्या के कारणस्त्री ने अपना नारी अस्तित्वएवं स्त्री शक्ति का जयघोष किया । पितृसत्ता को सदा ही जय भय रहता था कि वह स्त्री सत्ता से पराजित हो न जाए स्त्री को उन्होंने लज्जा एवं संस्कार के दायरे देकर स्त्री के अपने विचार को कभी फर्स्ट एवं सहज समझा ही न है । स्त्री अपना जीवन भोजन पकाना एवं घर की जिम्मेदारी को उठाना ही उसका सर्वस्व बन गया है आज आधुनिक नारी शिक्षा एवं कानून से परिचित हुई है और उसने अपने प्रति होने वाले अत्याचार शोषण यौन शोषण मानसिक विडंबना के खिलाफ आवाज उठाई है । स्त्री विमर्श यानी स्त्रीशोषण अत्याचार जैसेसभी उत्पीड़न के सामने स्त्री की पैरवी कर उसे न्याय दिलाना उसके वास्तविक अधिकार को दिलवाना जब स्त्री विमर्श यानी स्त्री के साथ विमर्श जुड़ने से यह तात्पर्य है कि स्त्री वहां मध्यस्थान रखकरया केंद्र रूप रखकर उसकी समाज या परिवार में उपेक्षा एवं अवमानना के कारणों की सघन जांच करना या उसकी अवमानना करने का कारण क्या है यह प्रश्न समाज से पूछना स्त्री विमर्श यानी पुरुष समाज के द्वारा लाजित किए हुए मूल्य पर प्रश्न उठा कर सचोट और कटाक्ष कर स्त्री को पुनः जागरण के लिए जागृत करना । स्त्री विमर्श के माध्यम से पुरुष समाज के द्वारा स्त्री पर हो रहे दुराचारहिंसा प्रहार एवं शोषण करने वाली मानसिकता पर विचार करता है । आज आधुनिक युग में स्त्री पुरुष प्रधान समाज को चुनौती देकर उनके अस्तित्व को बरकरार रखने का प्रयत्न कर रही है । यही प्रधानता छिन्नमस्ता उपन्यास में स्त्री विमर्श की बात को सचोट प्रिया के माध्यम से समझाया गया है । स्त्री पर बहुत शोषण अत्याचार के प्रति प्रिया अपना सिर तानकर खड़ी है । रब्बा खेतान जी ने भी बहुत ही सघन रूप में समाज की अभिव्यक्ति स्पष्ट की है । समय ने करवट बदली है उसी प्रकार लेखन की परिस्थिति बदल रही है। कई सदियों से अपेक्षित वंचित शोषित नारी आज अपने अधिकार के लिए लड़ना सीख गई है । नारी ने अपनी सदियों की चुप्पी को तोड़ा है । पुरुष प्रधान समाज ने चाहा हुआ रूप बिल्कुल अपनाया था स्त्री ने उस चोले को निकालकर दहाड़ नई चेतना रूपी आज के युग अनुरूपनए मूल्यों के अनुसार नारी विमर्श था के स्वरूप कलम चली है । उसमें प्रभा खेतान जी नारी चेतना एवं विमर्श था पर अपनी सशक्त लेखनी चला रही है । स्त्री लेखन की प्रक्रिया सुधरी परंपरा रही है और वह लंबी यात्रा के बाद प्रभा जी के पास मुदित हुई है । श्री के स्वतंत्र अस्तित्व की और उंगली निर्देशन कर रही है उसे घोर निंद्रा के द्वारा उखेड़ रही है । प्रभा जी ने साहित्य जगत में स्त्री की आर्थिक स्थिति संघर्ष को समझ कर कड़वे अनुभवो को बडे संघर्ष को बडे ही सींदत से उठाया गया है । प्रभा जी ने अपने जीवन अनुभव का आईना उनके साहित्य में दिखाई देता है । उनके साहित्य में काल्पनिक का से ज्यादा वास्तविकता दिखाई पड़ती है । प्रभाजी स्त्री विमर्श एवं स्त्री मुक्ति की पैरवी करती हैं । जगत में पुरुष प्रधान समाज के रूबी चुस्त एवं घटिया किस्म के नियम निधान से नारी विमर्श का स्वर उन्होंने छिन्नमस्ता उपन्यास में वर्णित किया है उनके निजी जीवन में घटित घटनाओं एवं अनुभव के द्वारा घिसी पिटी परंपराओं का विरोध किया है और स्त्री जाति को विशिष्ट सम्मान प्रदान किया है ।

‘छिन्नमस्ता ‘ में स्त्री विमर्श के आलाप :

हिंदी साहित्य जगत में प्रभा खेतान जी का कथा साहित्य में उनकी ईमानदारी अनेक स्तरों पर दिखाई पड़ती है । ‘छिन्नमस्ता में विश्व की नारी का जीवनविडंबना का चित्रण है । छिन्नमस्ता में उच्च वर्ग एवं सामंतवादी व्यवस्था की खोखले पन को बहुत ही फिटकारा है । इस उपन्यास का क्षेत्र मारवाड़ी संपन्न परिवार है उसके इत्र गिद्र रचा गया है यह व समाज है जो सब्जी मंडी की तरह अपने बेटे या लड़के को बेचते या खरीदते हैं इस कूरीवाज की शिकार खुद प्रभा जी भी हुई है । छिन्नमस्ता उपन्यास साधारण स्त्री प्रिया के जीवन संघर्ष एवम् असाधारण संघर्षों की गाथा भी कहा जा सकता है । स्त्री विमर्श की प्रमुख पक्षधर रही लेखिका ने नायिका प्रिया के माध्यम से स्त्री जीवन की पीड़ा को दर्द को महसूस क२आलेखा है । हमारे देश एवं समाज की सामंती अर्थ-व्यवस्थाधर्म एवं इज्जत की आड़ में रखकर स्त्री की शोषण प्रक्रिया की गई है । साधारण स्त्री लगने वाली प्रिया अपनों के बीच ही पराया पन महसूस करती हैं । किंतु कहीं भी हिम्मत न हारकर स्त्री विमर्श का जयघोष कर अपने न्याय के लिए लड़ती हैं प्रिया जो स्त्रीपात्र में छिन्नमस्ता मेंप्रमुख नायिका के रूप में अपनी महत्वाकांक्षा का दामन छोड़ती नहीं है । और अंत तक पूर्ण जिजीविषाके साथ वह एक सफल व्यवसायिक बनकरअपना जीवन व्यतीत करती है । जब अपने से ज्यादा व्यवसायिक दौर में ऊपर उठी प्रिया को देखकर बिजनेस में आगे बढ़ने के कारण जब समाज के खोखले आडंबर को छोड़ प्रिया स्त्री अधिकार की बात करती है तब उसकी आजादीसहन ना हो पाने के कारण नरेंद्र प्रिया से गुस्से से कहता है कि -“यह मत भूलो प्रिया कि मैं पुरुष हूं इस घर का कर्ता । यहां मेरी मर्जी चलेगी :हां सिर्फ मेरी ! ” ( छिन्नमस्ता – प्रभा खेतान पृ – 13 ) इस उपन्यास के माध्यम रूप प्रिया ने संघर्षों की और पीड़ा की कहानी नहीं किंतु समाज में स्त्रियों के उत्पीड़न एवं अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की बात करता है । उच्च वर्ग एवं सामंत शाही परिवार जो मर्यादा एवं इज्जत को खोखला पन बेनकाब किया है । स्त्री यदि दहलीज के उस पार जाए तो पुरुष प्रधान उसे लज्जा समझता है । किंतु एक पत्नी होने के बावजूद वह किसी भीस्त्री से संबंध जो अवैधीक है वह रखे तो जायज है । वह लैंगिक भेदभाव को इस उपन्यास में प्रभा जी ने प्रिया नामक नायिका के माध्यम से कोचा एवं सशक्त लेखनी के द्वारा विरोध किया है । “पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री और पुरुष दोनों ही उत्पादन में लगे हुए हैं लेकिन पुरुष सता ने एक खास उत्पादन पद्धति को अपनाया हुआ है पुरुष जो कुछ करता है उसकी कीमत आंकी जाती है । इसलिए उसकी पहचान और अस्मिता विशिष्ट मानी जाती है । दूसरी और स्त्री श्रम का मूल्यांकन नहीं हुआ । यह मूल्यांकन पुरुष ने मनमाने ढंग से किया है । ” ( प्रभा खेतान – स्त्री धर्म और परंपरा – पृ – 52 ) इस उपन्यास का पुरुष पात्र नरेंद्र हो या नरेंद्र का पिता विजय हो जो तिलोत्तमा की मांग में सिंदूर तो भरता है मंगलसूत्र पहनाता है । किंतु समाज एवं जिंदगी में उसे पत्नी के रूप में हाथ थामना नहीं चाहता उसमें उसे झिझक एवं शर्म महसूस होती है उसे आजीवन उसके रखैल का जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर किया जाता है इसी प्रकार उपन्यास स्त्री प्रधान नायिका प्रिया की नानी दूसरी मामी छोटी मां एवं एस आराम की जिंदगी प्रसार करने वाला नरेंद्र कि हर महीने बदलने वाली सेक्रेटरी यह सब स्त्री या शोषित रूप में दिखाई देती है । सबसे को खुलापन यह है कि स्त्रीकों अपनों ने ही प्रताड़ित किया है । स्त्री – स्त्री जाति की दुश्मन बनी हुई है । साडे 9 वर्ष की उम्र में ही प्रिया जब अपने ही बड़े भाई के द्वारा हवस का शिकार बनती हैं तब उसके मानसिक तनाव का अंदाजा भी पुरुष समाज नहीं लगा सकता । जब प्रिया सदियों से चल रही घिसी पिटी प्रथा एवं रिवाज का खंडन करती है तब आग उगला होते हुए नरेंद्र अपनी पत्नी से कहता है कि – “दरअसल तुम्हें इतनी खुली छूट देने की गलती मेरी ही थी । मुझे पहले ही चिड़िया के पंख काट डालने चाहिए थे । ” ( छिन्नमस्ता – प्रभा खेतान पृ – 11 )

इस उपन्यास में सभी स्त्री पात्र अपनी उत्पीड़न को कहे तो भी किसी जहां पुरुष समाज उनके शोषण एवं लूट के लिए तैयार बैठा है एवं स्त्री जाति की चपलता के कारण ही एक स्त्री दूसरी स्त्री सेद्रोणा या इच्छा रखती है पर उनका उनके प्रति सहानुभूति का कोई रूप न देखकर दूसरी स्त्री के शोषण एवं अत्याचार में अपनी हां भर्ती हैं । यदि प्रिया के अत्याचार को उसकी मां बचपन में सुन लेती उसे बचपन में सहानुभूति एवं लाड़ दुलार देती तो मुझे लगता है कि शायद छिन्नमस्ता जैसा उपन्यास लिखा ही न जाता । क्या हुआ समाज है जहां एक पुरुष को तानाशाह में तब्दील कर दिया जाता है और यही तानाशाही वैचारिक ता पत्नी बहन और बेटी को तिरस्कृत करती है । नैतिकता मर्यादा जैसे दिल मिले सब दो की दुहाई देता हुआ पुरुष प्रधान समाज स्त्री को एक बोज वस्तु के अतिरिक्त कुछ नहीं समझा जाता । एवं पुरखो से मिली परंपरागत रूबी का संस्कार है उसके कारण स्त्री की भावना को कहीं कोई चेत ही नहीं दी जाती । केवल स्त्री को पुरुष के पैर की जूतीसमझा जाता है समाज की कोई भी स्त्री या बहन मां हो किंतु इस उपन्यास में नारी की पीड़ा को प्रमुख स्थान दिया गया है । पितृसतावादी समाजमें स्त्री की वंचनायातना को भुगतती है । उसका कच्चा पीठा यहां प्रभा जी ने खोला है । इस उपन्यास में नीना और तिलोत्तमा के माध्यम से हम देख सकते हैं कि पुरुष दोषी होते हुए भी साफ सुथरा दिखाई पड़ता है और स्त्री निर्दोष होने के बावजूद भी सजा भुगत ती है पुरुष प्रधान समाज तिलमिला उठता है उसे लगता है कि अर्थो पाजन उसका जिम्मा है । या अधिकार है इस चित्र में स्त्री कैसे आ सकती है और आप भी जाए तो स्थापित किस प्रकार हो सकती हैंयदि स्त्री अपनी काबिलियत पर स्थापित हो जाए या परिश्रम रंग ला देता हे तो पुरुष समाज को यह जरा भी नहीं भाता इसी बात पर नरेंद्र प्रिया का पति प्रिया को कहता है कि – ‘तू में रुपया ! चाहे ना बोलो कितने रुपए लाख , दो लाख ,करोड़ जब देखो रुपया के पीछे भागती रहती है । लो यह लो !जब अपने से ज्यादा व्यवसायिक क्षेत्र में आगे बढ़े हुए प्रिया को देखकर नरेंद्र उसे कहता है कि तुझे परिवार चाहिए या व्यवसाय इस दोनों में से किसी एक को चुन लें इस प्रकार उसकी प्रगतिके पथ पर कांटे बिछाता है । नरेंद्र प्रिया से कहता है कि “मैं सीरियस हूं । फिर कहता हूं यदि आज तुम लन्दन गई तो मेरे घर में तुम्हारी जगह नहीं । यह भी साली को जिंदगी है ,जब देखो तब बिजनेस । फिर सुन लो ,यहां मत आना आओगी तो मैं धक्के देकर बाहर निकलवा दूंगा । ” ( छिन्नमस्ता – प्रभा खेतान – पृ . 13 )

यह कैसी विडंबना है कि एक स्त्री कितनी यातना एवं विडंबना को सहते हुएअपने अस्तित्व को बरकरार करती हैं तो पुरुष समाज इसको देख तिलमिला उठता है उसके अहंकार को ठेस पहुंचती है । जिसको कभी अपनी बराबरी का नहीं समझा वह नारी शक्ति उसके बराबर कैसे होगी इस संदर्भ में छिन्नमस्ता उपन्यास नारी विमर्श हो प्रबलता से उभारता है । इस उपन्यास के द्वारा वस्तुतः रूप में स्त्री को कंटे बिखरे मार्ग वाह स्वतंत्र अस्तित्व की खोज के लिए लोही लुहान होता दृष्टिकोण प्रदान करता है । स्त्री एवं पुरुष दो सिक्के की एक पहलू है या दोनों पुरुष स्त्री समानता का जयघोष करता है । जब तक स्त्री अपने अन्याय के लिए खुद लड़ना सीखेगी नहीं तब तक उसे न्याय न मिलेगा । जबकि उपन्यास इस बात को बार-बार दोहराता है स्त्री को अपने अस्तित्व का वजूद खुद होना पड़ेगा । इसी संदर्भ में उपन्यास की प्रमुख नायिका यह कथन करती है प्रिया की – ” नीना हम सबको अपनी अपनी लड़ाई अकेले ही लडनी होगी । ” यहां नारी के मान में फिलिप कहता है कि – “प्रिया सम्मान कोई देगा नहीं सम्मान अर्जित करना पड़ता है सम्मान अर्जन के लिए स्त्री पहले आत्मा रूप से आत्मनिर्भर बने । “

प्रिया पुरुष शून्य होकर निरंतर अपनी जिंदगी में आत्मा और समाज से संघर्ष करती हुई परिस्थिति से जूझते हुए अपने मुकाम पर पहुंचती है प्रिया कहती है कि पुरुष पैसा कमाता है वह दो चार लोगों को पाल लेता है जब स्त्री सीमा लग जाती है तो वही परंपरा समाज उसके लिए खत्म हो जाता है । “लेकिन असल रूप में मानव समाज बहुत बड़ा है प्रिया जो स्त्री होकर इस समाज को दे सकती है वह पुरुष होकर भी नरेंद्र नहीं दे सकता । प्रभा जी ने इस उपन्यास में पुरुष समाज का स्वार्थ बेनकाब किया है । प्रिया के माध्यम से प्रभा जी ने सशक्त स्त्री चेतना का चिंतन करवाया है प्रिया कहती है – “मैंने अभी-अभी जीना सीखा है धरती पर मेरी जरूरत के मुताबिक धूप है हवा है पानी है और मैं अपनी इस गति से दौड़ रही हूं । ” दोस्तों इसी गति से पुरुष प्रधान समाज डरा हुआ है स्त्री की यही गति को अटकाने के लिए हीस्त्री के पथ पर रोड़े अटकाता है । स्त्री को समाज के सम्मानित ठेकेदार दरअसल ऐसी घरतोड़ स्त्री कोसजा देने के हक में हैं वे चाहते हैं कि स्त्री को आगे ना बढ़ने दिया जाए । क्योंकि यदि एक स्त्री अपने अधिकार को अपने अधिकार को प्राप्त कर लेगी तो दूसरी औरतें भी न्याय के लिए लड़ने लगेगी और उनके पितृसत्ता की सिहासन खुर्ची एवं सत्ता का क्या होगा इसलिए स्त्री को संवेदना एवं चेतना शून्य बनाए रखना उचित है । समाज की खोखली मर्यादा संस्कार जैसी रूढीता में स्त्री को ही क्यों आहूत किया जाता है । ” सच कहूं नरेंद्र , ये शब्द भ्रम है । औरत को यह सब इसलिए सिखाया जाता है कि वह इन शब्दों के चक्रव्यू से कभी बाहर नहीं निकल पाए ताकि युगो सें चली आती आहुती की परंपरा को कायम रखे । ” ( छिन्नमस्ता – प्रभा खेतान – पृ -12 ) इस उपन्यास में इस और दृष्टिकोण किया हैप्रिया के माध्यम से समाज में नारी जाति को आगे बढ़ने का साहस दिलवाया है । स्त्री स्वतंत्रता के माध्यम से पथरीला मार्ग पर चलना एवं अपने खुद के निर्णय सोचने के लिए प्रोत्साहित किया है । इस दुनिया में अपना अस्तित्व स्थापित कर जयघोष कराना चाहा है उपन्यास में कहा है कि उठो अपनी बाहों को फैलाओ अपने अधिकार की लड़ाई खुद को लड़ने पड़ेगी । आज के युग में स्त्री की सुरक्षा के अनेक प्रश्न दिखाई पड़ते हैं । सूरत में स्त्री की हत्या का केस अभी ही दर्ज हुआ है । क्या यह घर में या घर के बाहर सुरक्षित है कि नहीं इसे दर्शाते प्रिया उपन्यास में कहती है कि “मुझे नफरत है इस पुरुष जाति से नफरत है उनसे जो मासूम छोटी नादान लड़कियों को भी नहीं छोड़ते जन्म से औरऔरत असहाय औरत उसे न पीता छोड़ता है । न भाई अपनी नारी देह मे स्वयं क्षत-विक्षत कर रह जाती हैं। इस दलदल से जिंदगी में क्या कहीं नया पनया बदलाव दिखाई नहीं देता । छिन्नमस्ता उपन्यास तरीके कमजोरी को न तो कहीं छुपाता है न कि उसकी ताकत को दबाता है । वरन बेबाक होकर स्त्री अपने आप को अपने जीवन को समाज के सन्मुख खोलकर सत्यता बताने की हिम्मत करती हैं । इस उपन्यास में स्त्री विमर्श को आवाज दी गई है ।

निष्कर्ष :

निष्कर्षत: छिन्नमस्ता उपन्यास की स्त्री अंधेरे से अधिकार हीन स्त्री को उजाले की और किरण भी दिखाता है । उपन्यास स्त्री जीवन के जख्म एवं दर्द को समाज में मुखिया कराती हैं । वाह चाहती नहीं कि उसके दर्द में कोई भागी हो या कोई जख्म पर मलम लगाए । अपने बाहुबल के द्वारा ही स्वयं अपने जख्म खोलकर अधिकार न्याय की मांग करती है । नैना और प्रिया के माध्यम से प्रिया संकल्प कर कहती है कि “नहीं मैं हार नहीं मानूंगीबड़ी कीमत दूंगी और बड़ी आहुति देखती हूं कोई मेरी उपेक्षा कैसे करता है । मैं जरूरी हूं इस समाज का अपने परिवार का बहुत ही जरूरी खंभा हूँ । ” स्त्री निव का पत्थर है उसके बिना जीवन शक्य नहीं है यही बात धर्म भी बताता है -यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता यानी स्त्री का जहां आदर होता है वही प्रभु का वास होता हैइसी बात को दोहराते हुए स्त्री अधिकार की मोहर प्रभा जी समाज में इस उपन्यास के माध्यम से लगाना चाहती है । इस उपन्यास के माध्यम से पिछड़ी हुई स्त्री को समाज में मान एवं आदर का जीवन जी ने के लिए स्त्री विमर्श को प्रभा जी ने उभारा है । इस प्रकार यह उपन्यास स्त्री चेतना का सघन प्रयास है ।

संदर्भ सूची

1. छिन्नमस्ता – प्रभा खेतान – पृ – 13

2. स्त्री धर्म और परंपरा – पृ 52

3. छिन्नमस्ता – प्रभा खेतान – पृ – 11

4. छिन्नमस्ता -प्रभा खेतान – पृ – 13

5. छिन्नमस्ता -प्रभा खेतान – पृ – 12

प्रदीप त्रिपाठी की पुस्तक ‘कल्पना का पहला दशक’ का लोकार्पण

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          महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के हिंदी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग के शोध-अध्येता एवं युवा कवि प्रदीप त्रिपाठी की पुस्तक ‘कल्पना का पहला दशक’ का विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली में लोकार्पण संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से चर्चित कवि लीलाधर मंडलोई, वरिष्ठ कथाकार संजीव, रघुवंश मणि, विवेक मिश्र, राजकुमार राकेश, एवं अशोक मिश्र (संपादक, बहुवचन) उपस्थित थे।यह पुस्तक अकादमिक प्रतिभा प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित है। प्रदीप त्रिपाठी की अब तक साहित्य की तमाम पत्र-पत्रिकाओं में लगभग 30 से अधिक कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं। वर्तमान में यह हिंदी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग में ‘अमरकांत की कहानियाँ : अंतर्वस्तु और शिल्प’ विषय पर शोधरत हैं। प्रदीप त्रिपाठी की यह पहली पुस्तक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा को समर्पित है। इस पुस्तक में श्री त्रिपाठी ने गैर हिंदी भाषी क्षेत्र हैदराबाद से निकलने वाली अपने दौर की महत्वपूर्ण पत्रिका कल्पना के दस वर्षीय साहित्यिक यात्रा को साझा किया है। भाषा एवं साहित्य के विकास में कल्पना हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में एक कालजयी पत्रिका के रूप में अविस्मरणीय है। इस पुस्तक में साहित्य की विविध विधाओं के साथ-साथ कल्पना की क्या भूमिका रही है, इसकी पड़ताल करते हुए उसकी विवेचनात्मक एवं विश्लेषणात्मक व्याख्या की गई है या फिर उन पक्षों को उठाने का प्रयास किया गया है जो अब तक चर्चा से बाहर रहे हैं। निश्चित रूप से यह पुस्तक कल्पना की विकास-यात्रा को समझने के लिए एक मुकम्मल दस्तावेज़ के रूप में देखी जा सकती है।

प्रत्यय अर्थ, परिभाषा, भेद, उदाहरण pratyay

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प्रत्यय (Suffix)की परिभाषा

जो शब्दांश, शब्दों के अंत में जुड़कर अर्थ में परिवर्तन लाये, प्रत्यय कहलाते है।
दूसरे अर्थ में- शब्द निर्माण के लिए शब्दों के अंत में जो शब्दांश जोड़े जाते हैं, वे प्रत्यय कहलाते हैं।

प्रत्यय दो शब्दों से बना है- प्रति+अय। ‘प्रति’ का अर्थ ‘साथ में, ‘पर बाद में’ है और ‘अय’ का अर्थ ‘चलनेवाला’ है। अतएव, ‘प्रत्यय’ का अर्थ है ‘शब्दों के साथ, पर बाद में चलनेवाला या लगनेवाला। प्रत्यय उपसर्गों की तरह अविकारी शब्दांश है, जो शब्दों के बाद जोड़े जाते है।

जैसे- पाठक, शक्ति, भलाई, मनुष्यता आदि। ‘पठ’ और ‘शक’ धातुओं से क्रमशः ‘अक’ एवं ‘ति’ प्रत्यय लगाने पर
पठ + अक= पाठक और शक + ति= ‘शक्ति’ शब्द बनते हैं। ‘भलाई’ और ‘मनुष्यता’ शब्द भी ‘भला’ शब्द में ‘आई’ तथा ‘मनुष्य’ शब्द में ‘ता’ प्रत्यय लगाने पर बने हैं।

प्रत्यय के भेद

मूलतः प्रत्यय के दो प्रकार है –
(1) कृत् प्रत्यय (कृदन्त) (Agentive)
(2) तद्धित प्रत्यय (Nominal)

(1) कृत् प्रत्यय(Agentive):- क्रिया या धातु के अन्त में प्रयुक्त होनेवाले प्रत्ययों को ‘कृत्’ प्रत्यय कहते है और उनके मेल से बने शब्द को ‘कृदन्त’ कहते है।
दूसरे शब्दो में- वे प्रत्यय जो क्रिया के मूल रूप यानी धातु (root word) में जोड़े जाते है, कृत् प्रत्यय कहलाते है।
जैसे- लिख् + अक =लेखक। यहाँ अक कृत् प्रत्यय है तथा लेखक कृदंत शब्द है।

ये प्रत्यय क्रिया या धातु को नया अर्थ देते है। कृत् प्रत्यय के योग से संज्ञा और विशेषण बनते है। हिंदी में क्रिया के नाम के अंत का ‘ना’ (कृत् प्रत्यय) हटा देने पर जो अंश बच जाता है, वही धातु है। जैसे- कहना की कह्, चलना की चल् धातु में ही प्रत्यय लगते है।

कुछ उदाहरण इस प्रकार है-

(क)

कृत्-प्रत्ययक्रियाशब्द
वालागानागानेवाला
हारहोनाहोनहार
इयाछलनाछलिया

(ख)

कृत्-प्रत्ययधातुशब्द
अककृकारक
अननीनयन
तिशक्शक्ति

(ग़)

कृत्-प्रत्ययक्रिया या धातुशब्द (संज्ञा)
तव्य (संस्कृत)कृकर्तव्य
यत्दादेय
वैया (हिंदी)खेना-खेखेवैया
अना (संस्कृत)विद्वेदना
आ (संस्कृत)इश् (इच्छ्)इच्छा
अनमोह, झाड़, पठ, भक्षमोहन, झाड़न, पठन, भक्षण
आईसुन, लड़, चढ़सुनाई, लड़ाई, चढ़ाई
आनथक, चढ़, पठथकान, चढ़ान, पठान
आवबह, चढ़, खिंच, बचबहाव, चढ़ाव, खिंचाव, बचाव
आवटसज, लिख, मिलसजावट, लिखावट, मिलावट
आहटचिल्ला, गुर्रा, घबराचिल्लाहट, गुर्राहट, घबराहट
आवाछल, दिख, चढ़छलावा, दिखावा, चढ़ावा
हँस, बोल, घुड़, रेत, फाँसहँसी, बोली, घुड़की, रेती, फाँसी
झूल, ठेल, घेर, भूलझूला, ठेला, घेरा, भूला
झाड़, आड़, उतारझाड़ू, आड़ू, उतारू
बंध, बेल, झाड़बंधन, बेलन, झाड़न
नीचट, धौंक, मथचटनी, धौंकनी, मथनी
औटीकसकसौटी
इयाबढ़, घट, जड़बढ़िया, घटिया, जड़िया
अकपाठ, धाव, सहाय, पालपाठक, धावक, सहायक, पालक
ऐयाचढ़, रख, लूट, खेवचढ़ैया, रखैया, लुटैया, खेवैया

(घ)

कृत्-प्रत्ययधातुविशेषण
क्तभूभूत
क्तमद्मत्त
क्त (न)खिद्खित्र
क्त (ण)जृजीर्ण
मानविद्विद्यमान
अनीय (संस्कृत)दृश्दर्शनीय
य (संस्कृत)दादेय
य (संस्कृत)पूज्पूज्य
आऊ (हिंदी)चल, बिक, टिकचलाऊ, बिकाऊ, टिकाऊ
आका (हिंदी)लड़, धम, कड़लड़ाका, धमाका, कड़ाका
आड़ी (हिंदी)खेल, कब, आगे, पीछेखिलाड़ी, कबाड़ी, अगाड़ी, पिछाड़ी
आकूपढ़, लड़पढ़ाकू, लड़ाकू
आलू/आलुझगड़ा, दया, कृपाझगड़ालू, दयालु, कृपालु
एरालूट, कामलुटेरा, कमेरा
इयलसड़, अड़, मरसड़ियल, अड़ियल, मरियल
डाका, खा, चालडाकू, खाऊ, चालू

कृत् प्रत्यय के भेद

हिंदी में रूप के अनुसार ‘कृत् प्रत्यय’ के दो भेद है-
(i)विकारी कृत् प्रत्यय (ii)अविकारी कृत् प्रत्यय

(1)विकारी कृत् प्रत्यय- ऐसे कृत्-प्रत्यय जिनसे शुद्ध संज्ञा या विशेषण बनते हैं। इसलिए इसे विकारी कृत् प्रत्यय कहते हैं।

विकारी कृत् प्रत्यय के चार भेद होते है-
(i)क्रियार्थक संज्ञा (ii)कर्तृवाचक संज्ञा (iii)वर्तमानकालिक कृदन्त (iv)भूतकालिक कृदन्त

(i)क्रियार्थक संज्ञा- वह संज्ञा जो क्रिया के मूल रूप में होती है और क्रिया का अर्थ देती है अथार्त को का अर्थ बताने वाला वह शब्द जो क्रिया के रूप में उपस्थित होते हुए भी संज्ञा का अर्थ देता है वह क्रियाथक संज्ञा कहलाती है।

(ii)कर्तृवाचक संज्ञा- वे प्रत्यय जिनके जुड़ने पर कार्य करने वाले का बोध हो उसे कर्तृवाचक संज्ञा कहते हैं।

(iii)वर्तमानकालिक कृदन्त- जब हम एक काम को करते हुए दूसरे काम को साथ में करते हैं तो पहले वाली की गई क्रिया को वर्तमानकालिक कृदन्त कहते हैं।

(iv)भूतकालिक कृदन्त- जब सामान्य भूतकालिक क्रिया को हुआ, हुए, हुई आदि को जोड़ने से भूतकालिक कृदन्त बनता है।

(2) अविकारी कृत् प्रत्यय- ऐसे कृत्-प्रत्यय जिनसे क्रियामूलक विशेषण या अव्यय बनते हैं। इसलिए इसे अविकारी कृत् प्रत्यय कहते हैं।

हिन्दी क्रियापदों के अन्त में कृत्-प्रत्ययों के योग से निम्नलिखित प्रकार के कृदन्त बनाए जाते हैं-
(i) कर्तृवाचक कृत् प्रत्यय (ii) कर्मवाचक कृत् प्रत्यय (iii) करणवाचक कृत् प्रत्यय (iv) भाववाचक कृत् प्रत्यय (v) क्रियाद्योतक कृत् प्रत्यय

(i) कर्तृवाचक कृत् प्रत्यय- कर्ता का बोध कराने वाले प्रत्यय कर्तृवाचक कृत् प्रत्यय कहलाते है।
जैसे- रखवाला, रक्षक, लुटेरा, पालनहार इत्यादि।

(ii) कर्मवाचक कृत् प्रत्यय- कर्म का बोध कराने वाले प्रत्यय कर्मवाचक कृत् प्रत्यय कहलाते हैं।
जैसे- ओढ़ना, पढ़ना, छलनी, खिलौना, बिछौना इत्यादि।

(iii) करणवाचक कृत् प्रत्यय- करण यानी साधन का बोध कराने वाले प्रत्यय करणवाचक कृत् प्रत्यय कहलाते हैं।
जैसे- रेती, फाँसी, झाड़ू, बंधन, मथनी, झाड़न इत्यादि।

(iv) भाववाचक कृत् प्रत्यय- क्रिया के व्यापार या भाव का बोध कराने वाले प्रत्यय भाववाचक कृत् प्रत्यय कहलाते हैं।
जैसे- लड़ाई, लिखाई, मिलावट, सजावट, बनावट, बहाव, चढ़ाव इत्यादि।

(v) क्रियाद्योतक कृत् प्रत्यय- जिन कृत् प्रत्ययों के योग से क्रियामूलक विशेषण, रखनेवाली क्रिया का निर्माण होता है, उन्हें क्रियाद्योतक कृत् प्रत्यय कहते हैं।
दूसरे शब्दों में- क्रियाद्योतक कृत् प्रत्यय बीते हुए या गुजर रहे समय के बोधक होते हैं।

मूल धातु के आगे ‘आ’ अथवा ‘या’ प्रत्यय लगाने से भूतकालिक तथा ‘ता’ प्रत्यय लगाने से वर्तमानकालिक कृत् प्रत्यय बनते है। जैसे-
भूतकालिक कृत् प्रत्यय-
लिख + आ= लिखा
पढ़ + आ= पढ़ा
खा + या= खायावर्तमानकालिक कृत् प्रत्यय-
लिख + ता= लिखता
जा + ता= जाता
खा + ता= खाता

नीचे संस्कृत और हिंदी के कृत्-प्रत्ययों के उदाहरण दिये जा रहे हैं-

हिंदी के कृत्-प्रत्यय (Primary suffixes)

हिंदी के कृत् या कृदन्त प्रत्यय इस प्रकार हैं- अ, अन्त, अक्कड़, आ, आई, आड़ी, आलू, आऊ, अंकू, आक, आका, आकू, आन, आनी, आप, आपा, आव, आवट, आवना, आवा, आस, आहट, इयल, ई, इया, ऊ, एरा, ऐया, ऐत, ओड़ा, औता, औती, औना, औनी, आवनी, औवल, क, का, की, गी, त, ता, ती, न, नी, वन, वाँ, वाला, वैया, सार, हारा, हार, हा इत्यादि।

हिंदी के कृत्-प्रत्ययों से कर्तृवाचक कृत्-प्रत्यय, कर्मवाचक कृत् प्रत्यय, करणवाचक कृत्-प्रत्यय, भाववाचक कृत्-प्रत्यय और विशेषण बनते हैं।

इनके उदाहरण, प्रत्यय-चिह्नों के साथ नीचे दिया जा रहा है-

(i)कर्तृवाचक कृत्-प्रत्यय

कर्तृवाचक कृत्-प्रत्यय बनाने के लिए धातु के अन्त में अंकू, आऊ, आक, आका, आड़ी, आलू, इया, इयल, एरा, ऐत, आकू, अक्कड़, वन, वाला, वैया, सार, हार, हारा इत्यादि प्रत्यय लगाये जाते हैं। उदाहरणार्थ-

प्रत्ययधातुकृदंत-रूप
आऊटिकटिकाऊ
आकतैरतैराक
आकालड़लड़का
आड़ीखेलखिलाड़ी
आलूझगड़झगड़ालू
इयाबढ़बढ़िया
इयलअड़अड़ियल
इयलमरमरियल
ऐतलड़लड़ैत
ऐयाबचबचैया
ओड़हँसहँसोड़
ओड़ाभागभगोड़ा
अक्कड़पीपिअक्कड़
वनसुहासुहावन
वालापढ़पढ़नेवाला
वैयागागवैया
सारमिलमिलनसार
हाररखराखनहार
हारारोरोवनहारा

(ii)कर्मवाचक कृत्-प्रत्यय

कर्मवाचक कृत्-प्रत्यय बनाने के लिए धातु के अन्त में ना, नी औना इत्यादि प्रत्यय लगाये जाते हैं। उदाहरणार्थ-

प्रत्ययधातुकृदंत-रूप
नाओढ़, पढ़ओढ़ना, पढ़ना
नीछल, ओढ़, मथछलनी, ओढ़नी, मथनी
औनाखेला, बिछखिलौना, बिछौना

(iii)करणवाचक कृत्-प्रत्यय

करणवाचक कृत्-प्रत्यय बनाने के लिए धातु के अन्त में आ, आनी, ई, ऊ, औटी, न, ना, नी इत्यादि प्रत्यय लगते हैं। उदाहरणार्थ-

प्रत्ययधातुकृदंत-रूप
झूलझूला
आनीमथमथानी
रेतरेती
झाड़झाड़ू
औटीकसकसौटी
बेलबेलन
नाबेलबेलना
नीबेलबेलनी

(iv)भाववाचक कृत्-प्रत्यय

भाववाचक कृत्-प्रत्यय बनाने के लिए धातु के अन्त में अ, अन्त, आ, आई, आन, आप, आपा, आव, आवा, आस, आवना, आवनी, आवट, आहट, ई, औता, औती, औवल, औनी, क, की, गी, त, ती, न, नी इत्यादि प्रत्ययों को जोड़ने से होती है। उदाहरणार्थ-

प्रत्ययधातुकृदंत-रूप
भरभार
अन्तभिड़भिड़न्त
फेरफेरा
आईलड़लड़ाई
आनउठउठान
आपमिलमिलाप
आपापूजपुजापा
आवखिंचखिंचाव
आवाभूलभुलावा
आसनिकसनिकास
आवनापापावना
आवनीपापावनी
आवटसजसजावट
आहटचिल्लचिल्लाहट
बोलबोली
औतासमझसमझौता
औतीमानमनौती
औवलभूलभुलौवल
औनीपीसपिसौनी
बैठबैठक
कीबैठबैठकी
गीदेनदेनगी
खपखपत
तीचढ़चढ़ती
देदेन
नीचाटचटनी

(v)क्रियाद्योतक कृत्-प्रत्यय

क्रियाद्योतक कृदन्त-विशेषण बनाने में आ, ता आदि प्रत्ययों का प्रयोग होता है।
‘आ’ भूतकाल का और ‘ता’ वर्तमानकाल का प्रत्यय है।
अतः क्रियाद्योतक कृत्-प्रत्यय के दो भेद है-
(i) वर्तमानकाल क्रियाद्योतक कृदन्त-विशेषण, और
(ii) भूतकालिक क्रियाद्योतक कृदन्त-विशेषण।

इनके उदाहरण इस प्रकार है-

वर्तमानकालिक विशेषण-

प्रत्ययधातुवर्तमानकालिक विशेषण
ताबहबहता
तामरमरता
तागागाता

भूतकालिक विशेषण-

प्रत्ययधातुभूतकालिक विशेषण
पढ़पढ़ा
धोधोया
गागाया

संस्कृत के कृत्-प्रत्यय और संज्ञाएँ

कृत्-प्रत्ययधातुभाववाचक संज्ञाएँ
कम्काम
अनाविद्वेदना
अनावन्द्वन्दना
इष्इच्छा
पूज्पूजा
तिशक्शक्ति
यामृगमृगया
तृभुज्भोक्तृ (भोक्ता)
तन्तनु
त्यज्त्यागी
कृत्-प्रत्ययधातुकर्तृवाचक संज्ञाएँ
अकगैगायक
सृप्सर्प
दिव्देव
तृदादातृ (दाता)
कृकृत्य
प्र+ह्प्रहार
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(2)तद्धित प्रत्यय(Nominal):- संज्ञा सर्वनाम और विशेषण के अन्त में लगनेवाले प्रत्यय को ‘तद्धित’ कहा जाता है और उनके मेल से बने शब्द को ‘तद्धितान्त’।

दूसरे शब्दों में- धातुओं को छोड़कर अन्य शब्दों में लगनेवाले प्रत्ययों को तद्धित कहते हैं।
जैसे-
मानव + ता = मानवता
अच्छा + आई = अच्छाई
अपना + पन = अपनापन
एक + ता = एकता
ड़का + पन = लडकपन
मम + ता = ममता
अपना + पन = अपनत्व

कृत-प्रत्यय क्रिया या धातु के अन्त में लगता है, जबकि तद्धित प्रत्यय संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण के अन्त में। तद्धित और कृत-प्रत्यय में यही अन्तर है। उपसर्ग की तरह तद्धित-प्रत्यय भी तीन स्रोतों- संस्कृत, हिंदी और उर्दू- से आकर हिन्दी शब्दों की रचना में सहायक हुए है। नीचे इनके उदाहरण दिये गए है।

हिंदी के तद्धित-प्रत्यय (Nominal suffixes)

हिंदी के तद्धित-प्रत्यय ये है- आ, आई, ताई, आऊ, आका, आटा, आन, आनी, आयत आर, आरी आरा, आलू, आस आह, इन, ई, ऊ, ए, ऐला एला, ओ, ओट, ओटा औटी, औती, ओला, क, की, जा, टा, टी, त, ता, ती, नी, पन, री, ला, ली, ल, वंत, वाल, वा, स, सरा, सा, हरा, हला, इत्यादि।

तद्धित-प्रत्यय के प्रकार

हिंदी में तद्धित-प्रत्यय के आठ प्रकार हैं-

(1) कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय
(2) भाववाचक तद्धित प्रत्यय
(3) संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय
(4) गणनावाचक तद्धित प्रत्यय
(5) गुणवाचक तद्धित प्रत्यय
(6) स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय
(7) ऊनवाचक तद्धित प्रत्यय
(8) सादृश्यवाचक तद्धित प्रत्यय

(1) कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय- कर्ता का बोध कराने वाले प्रत्यय कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय

संज्ञा के अन्त में आर, इया, ई, एरा, हारा, इत्यादि तद्धित-प्रत्यय लगाकर कर्तृवाचक तद्धितान्त संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणकर्तृवाचक संज्ञाएँ
आरसोनासुनार
आरलोहालुहार
तमोलतमोली
तेलतेली
हारालकड़ीलकरहारा
एरासाँपसँपेरा
एराकाँसाकसेरा

(2) भाववाचक तद्धित प्रत्यय- भाव का बोध कराने वाले प्रत्यय भाववाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

भाववाचक तद्धित प्रत्यय

संज्ञा के अन्त में आ, आयँध, आई, आन, आयत, आरा, आवट, आस, आहट, ई, एरा, औती, त, ती, पन, पा, स इत्यादि तद्धित-प्रत्यय लगाकर भाववाचक तद्धितान्त संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणभाववाचक संज्ञाएँ
चूरचूरा
आईचतुरचतुराई
आनचौड़ाचौड़ान
आयतअपनाअपनायत, अपनापन
आराछूटछुटकारा
आसमीठामिठास
आहटकड़वाकड़वाहट
खेतखेती
एराअन्धअँधेरा
औतीबापबपौती
रंगरंगत
पनकालाकालापन
पनलड़कालड़कपन
पाबूढाबुढ़ापा

(3) संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय- संबंध का बोध कराने वाले प्रत्यय संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय

संज्ञा के अन्त में आल, हाल, ए, एरा, एल, औती, जा इत्यादि तद्धित-प्रत्यय लगाकर सम्बन्धवाचक तद्धितान्त संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणसम्बन्धवाचक संज्ञाएँ
आलससुरससुराल
हालनानाननिहाल
औतीबापबपौती
जाभाईभतीजा
एरामामाममेरा
एलनाकनकेल

(4)गणनावाचक तद्धित प्रत्यय- संख्या का बोध कराने वाले प्रत्यय गणनावाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते है।

गणनावाचक तद्धित प्रत्यय

संज्ञा-पदों के अंत में ला, रा, था, वाँ, हरा इत्यादि प्रत्यय लगाकर गणनावाचक तद्धितान्त संज्ञाए बनती है।

प्रत्ययगणनावाचक संज्ञाएँ
लापहला
रादूसरा, तीसरा
थाचौथा
वाँसातवाँ, आठवाँ
हरादुहरा, तिहरा

(5)गुणवाचक तद्धित प्रत्यय- गुण का बोध कराने वाले प्रत्यय गुणवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

गुणवाचक तद्धित प्रत्यय

संज्ञा के अन्त में आ, इत, ई, ईय, ईला, वान इन प्रत्ययों को लगाकर गुणवाचक संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणगुणवाचक संज्ञाएँ
ठंड, प्यास, भूखठंडा, प्यासा, भूखा
इतपुष्प, आनंद, क्रोधपुष्पित, आनंदित, क्रोधित
क्रोध, जंगल, भारक्रोधी, जंगली, भारी
ईयभारत, अनुकरण, रमणभारतीय, अनुकरणीय, रमणीय
ईलाचमक, भड़क, रंगचमकीला, भड़कीला, रंगीला
वानगुण, धन, रूपगुणवान, धनवान, रूपवान

(6)स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय- स्थान का बोध कराने वाले प्रत्यय स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय

संज्ञा के अन्त में ई, वाला, इया, तिया इन प्रत्ययों को लगाकर स्थानवाचक संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणस्थानवाचक संज्ञाएँ
जर्मन, गुजरात, बंगालजर्मनी, गुजराती, बंगाली
वालादिल्ली, बनारस, सूरतदिल्लीवाला, बनारसवाला, सूरतवाला
इयामुंबई, जयपुर, नागपुरमुंबइया, जयपुरिया, नागपुरिया
तियाकलकत्ता, तिरहुतकलकतिया, तिरहुतिया

(7)ऊनवाचक तद्धित-प्रत्यय-ऊनवाचक संज्ञाएँ से वस्तु की लघुता, प्रियता, हीनता इत्यादि के भाव व्यक्त होता हैं।

ऊनवाचक तद्धितान्त संज्ञाए

संज्ञा के अन्त में आ, इया, ई, ओला, क, की, टा, टी, ड़ा, ड़ी, री, ली, वा, सा इन प्रत्ययों को लगाकर ऊनवाचक संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणऊनवाचक संज्ञाएँ
ठाकुरठकुरा
इयाखाटखटिया
ढोलकढोलकी
ओलासाँपसँपोला
ढोलढोलक
कीकनकनकी
टाचोरचोट्टा
टीबहूबहुटी
ड़ाबाछाबछड़ा
ड़ीटाँगटँगड़ी
रीकोठाकोठरी
लीटीकाटिकली
वाबच्चाबचवा
सामरामरा-सा
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(8)सादृश्यवाचक तद्धित प्रत्यय- समता/समानता का बोध कराने वाले प्रत्यय सादृश्यवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

सादृश्यवाचक तद्धित प्रत्यय

संज्ञा के अन्त में सा हरा इत्यादि इन प्रत्ययों को लगाकर सादृश्यवाचक संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणसादृश्यवाचक संज्ञाएँ
सालाल, हरालाल-सा, हरा-सा
हरासोनासुनहरा
तद्धितीय विशेषण

संज्ञा के अन्त में आ, आना, आर, आल, ई, ईला, उआ, ऊ, एरा, एड़ी, ऐल, ओं, वाला, वी, वाँ, वंत, हर, हरा, हला, हा इत्यादि तद्धित-प्रत्यय लगाकर विशेषण बनते हैं। उदाहरण निम्नलिखित हैं-

प्रत्ययसंज्ञाविशेषण
भूखभूखा
आनाहिन्दूहिन्दुआना
आरदूधदुधार
आलदयादयाल
देहातदेहाती
बाजारबाजारू
एराचाचाचचेरा
एरामामाममेरा
हाभूतभुतहा
हरासोनासुनहरा

संस्कृत के तद्धित-प्रत्यय

संस्कृत के तद्धित-प्रत्ययों से बने जो शब्द हिन्दी में विशेषतया प्रचलित हैं, उनके आधार पर संस्कृत के ये तद्धित-प्रत्यय हैं- अ, अक आयन, इक, इत, ई, ईन, क, अंश, म, तन, त, ता, त्य, त्र, त्व, था, दा, धा, निष्ठ, मान्, मय, मी, य, र, ल, लु, वान्, वी, श, सात् इत्यादि।

शब्दांश भी तद्धित-प्रत्ययों के रूप में प्रयुक्त होते हैं। ये शब्दांश समास के पद है; जैसे- अतीत, अनुरूप, अनुसार, अर्थ, अर्थी, आतुर, आकुल, आढ़य, जन्य, शाली, हीन इत्यादि।

अर्थ के अनुसार इन प्रत्ययों के प्रयोग के उदाहरण इस प्रकार हैं-

प्रत्ययसंज्ञा-विशेषणतद्धितान्तवाचक
कुरुकौरवअपत्य
शिवशौवसंबंध
निशानैशगुण, सम्बन्ध
मुनिमौनभाव
आयनरामरामायणस्थान
इकतर्कतार्किकजानेवाला
इतपुष्पपुष्पितगुण
पक्षपक्षीगुण
ईनकुलकुलीनगुण
बालबालकउन
अंशतःअंशतःरीति
अंशजनजनतासमाहर
मध्यमध्यमगुण
तनअद्यअद्यतनकाल-सम्बन्ध
तःअंशअंशतःरीति
तालघुलघुताभाव
ताजनजनतासमाहार
त्यपश्र्चापाश्र्चात्यसम्बन्ध
त्रअन्यअन्यत्रस्थान
त्वगुरुगुरुत्वभाव
थाअन्यअन्यथारीति
दासर्वसर्वदाकाल
धाशतशतधाप्रकार
निष्ठकर्मकर्मनिष्ठकर्तृ, सम्बन्ध
मध्यमध्यमगुण
मान्बुद्धिबुद्धिमान्गुण
मयकाष्ठकाष्ठमयविकार
मयजलजलमयव्याप्ति
मीवाक्वाग्मीकर्तृ
मधुरमाधुर्यभाव
दितिदैत्यअपत्य
ग्रामग्राम्यसम्बन्ध
मधुमधुरगुण
वत्सवत्सलगुण
लुनिद्रानिद्रालुगुण
वान्धनधनवान्गुण
वीमायामायावीगुण
रोमरोमेशगुण
कर्ककर्कशस्वभाव
सात्भस्मभस्मसात्विकार

संस्कृत की तत्सम संज्ञाओं के अन्त में तद्धित-प्रत्यय लगाने से भाववाचक, अपत्यावाचक (नामवाचक) और गुणवाचक विशेषण बनते हैं।

अब इन प्रत्ययों द्वारा विभित्र वाचक संज्ञाओं और विशेषणों से विभित्र वाचक संज्ञाओं और विशेषणों के निर्माण इस प्रकार हैं-

जातिवाचक से भाववाचक संज्ञाएँ- संस्कृत की तत्सम जातिवाचक संज्ञाओं के अन्त में तद्धित प्रत्यय लगाकर भाववाचक संज्ञाएँ बनती हैं। इसके उदाहरण इस प्रकार है-

तद्धित प्रत्ययसंज्ञाभाववाचक संज्ञा
ताशत्रुशत्रुता
तावीरवीरता
त्वगुरुगुरुत्व
त्वमनुष्यमनुष्यत्व
मुनिमौन
पण्डितपाण्डित्य
इमारक्तरक्तिमा

व्यक्तिवाचक से अपत्यवाचक संज्ञाएँ- अपत्यवाचक संज्ञाएँ किसी नाम के अन्त में तद्धित-प्रत्यय जोड़ने से बनती हैं। अपत्यवाचक संज्ञाओं के कुछ उदाहरण ये हैं-

तद्धित-प्रत्ययव्यक्तिवाचक संज्ञाएँअपत्यवाचक संज्ञाएँ
वसुदेववासुदेव
मनुमानव
कुरुकौरव
पृथापार्थ
पाण्डुपाण्डव
दितिदैत्य
आयनबदरबादरायण
एयराधाराधेय
एयकुन्तीकौन्तेय

विशेषण से भाववाचक संज्ञाएँ- विशेषण के अन्त में संस्कृत के निम्नलिखित तद्धित-प्रत्ययों के मेल से निम्नलिखित भाववाचक संज्ञाएँ बनती हैं-

तद्धित-प्रत्ययविशेषणभाववाचक संज्ञाएँ
ताबुद्धिमान्बुद्धिमत्ता
तामूर्खमूर्खता
ताशिष्टशिष्टता
इमारक्तरक्तिमा
इमाशुक्लशुक्लिमा
त्ववीरवीरत्व
त्वलघुलघुत्व
गुरुगौरव
लघुलाघव

संज्ञा से विशेषण- संज्ञाओं के अन्त में संस्कृत के गुण, भाव या सम्बन्ध के वाचक तद्धित-प्रत्ययों को जोड़कर विशेषण भी बनते हैं। उदाहरणार्थ-

प्रत्ययसंज्ञाविशेषण
निशानैश
तालुतालव्य
ग्रामग्राम्य
इकमुखमौखिक
इकलोकलौकिक
मयआनन्दआनन्दमय
मयदयादयामय
इतआनन्दआनन्दित
इतफलफलित
इष्ठबलबलिष्ठ
निष्ठकर्मकर्मनिष्ठ
मुखमुखर
मधुमधुर
इमरक्तरक्तिम
ईनकुलकुलीन
मांसमांसल
वीमेधामेधावी
इलतन्द्रातन्द्रिल
लुतन्द्रातन्द्रालु

उर्दू के तद्धित-प्रत्यय

बहुतेरे उर्दू शब्द हिंदी में प्रयुक्त होते है। ये शब्द ये फारसी, अरबी, और तुर्की के है।

फारसी तद्धित-प्रत्यय के तीन प्रकार होते है-
(i)संज्ञात्मक (ii) विशेषणात्मक (iii) अरबी तद्धित-प्रत्यय

(1)संज्ञात्मक फारसी तद्धित-प्रत्यय
प्रत्ययमूलशब्दसपरतीय शब्दवाचक
सफेदसफेदाभाववाचक
खराबखराबाभाववाचक
कारकाश्तकाश्तकारकतृवाचक
गारमददमददगारकतृवाचक
ईचाबागबगीचास्थितिवाचक
दानकलमकलमदानस्थितिवाचक
(ii)विशेषणात्मक फारसी तद्धित-प्रत्यय
प्रत्ययमूलशब्दसपरतीय शब्दप्रत्ययार्थ
आनामर्दमर्दानास्वभाव
इन्दाशर्मशर्मिन्दासंज्ञा
नाकदर्ददर्दनाकगुण
आसमानआसमानीविशेषण
ईनाकमकमीनउनार्थ
ईनामाहमहीनासंज्ञा
जादाहरामहरामजादाअपत्य
(iii)अरबी फारसी तद्धित-प्रत्यय
प्रत्ययमूलशब्दसपरतीय शब्दवाचक
आनीजिस्मजिस्मानीविशेषण
इयतइंसानइंसानियतभाव
बेगबेगमस्त्री

कृदंत और तद्धित में अंतर

कृत् और तद्धित प्रत्ययों में अंतर यह है कि कृत् प्रत्यय धातुओं में लगते हैं, जबकि तद्धित प्रत्यय धातुभित्र शब्दों के साथ लगाये जाते हैं।

इतिहास या स्रोत के आधार पर हिन्दी प्रत्ययों को चार वर्गो में विभाजित किया जाता है-
(1) तत्सम प्रत्यय
(2) तद्भव प्रत्यय
(3) देशज प्रत्यय
(4) विदेशज प्रत्यय

(1)तत्सम प्रत्यय

प्रत्ययबोधक/अर्थउदाहरण
-आस्त्री प्रत्यय; भाववाचक संज्ञा प्रत्ययआदरणीया, प्रिया, माननीया, सुता, इच्छा, पूजा
-आनीस्त्री प्रत्ययदेवरानी, भवानी, मेहतरानी
-आलुविशेषण प्रत्यय, वालाकृपालु, दयालु, निद्रालु, श्रद्धालु
-इतविशेषण प्रत्यय, युक्तपल्लवित, पुष्पित, फलित, हर्षित
-इमाभाववाचक संज्ञा प्रत्ययगरिमा, नीलिमा, मधुरिमा, महिमा
-इकविशेषण व संज्ञा प्रत्ययदैनिक, वैज्ञानिक, वैदिक, लौकिक
-कस्वार्थ, समूहघटक, ठंडक, शतक, सप्तक
-कारलिखने या बनाने वाला; वालापत्रकार, जानकर
-जजन्मा हुआअंडज, जलज, पंकज, पिंडज, देशज, विदेशज
-जीवीजीनेवालापरजीवी, बुद्धिजीवी, लघुजीवी, दीर्घजीवी
-ज्ञजाननेवालाअज्ञ, मर्मज्ञ, विज्ञ, सर्वज्ञ
-तःक्रिया विशेषण प्रत्ययमुख्यतया, विशेषतया, सामान्ततया
-तरतुलना बोधक प्रत्ययउच्चतर, निम्नतर, सुन्दरतर, श्रेष्ठतर
-तमसर्वाधिकता बोधक प्रत्ययउच्चतम, निकृष्टतम, महत्तम, लघुतम
-ताभाववाचक संज्ञा प्रत्ययनवीनता, मधुरता, सुन्दरता
-त्वभाववाचक संज्ञा प्रत्ययकृतित्व, ममत्व, महत्व, सतीत्व
-मानविशेषण वाचक प्रत्ययउच्चतम, निकृष्टतम, महत्तम, लघुतम
-वानवालागुणवान, धनवान, बलवान, रूपवान

(2)तद्भव प्रत्यय

प्रत्ययबोधक/अर्थउदाहरण
-अंगड़वालाबतंगड़
अंतूवालारटंतू, घुमंतू
-अतसंज्ञा प्रत्ययखपत, पढ़त, रंगत, लिखत
-आँधसंज्ञा प्रत्ययबिषांध, सराँध
-आभाववाचकजोड़ा, फोड़ा, झगड़ा, रगड़ा
-आईभाववाचक प्रत्ययकठिनाई, बुराई, सफाई
-आऊवालाखाऊ, टिकाऊ, पंडिताऊ, बिकाऊ
आप/आपाभाववाचक प्रत्ययमिलाप, अपनापा, पुजापा, बुढ़ापा
-आर/आरा/आरीकरनेवालाकुम्हार, लुहार, चमार, घसियारा, पुजारी, भिखारी
-आलूकरनेवालाझगड़ालू, दयालु
-आवटभाववाचक प्रत्ययकसावट, बनावट, बिनावट, लिखावट, सजावट
-आसइच्छावाचक प्रत्ययछपास, प्यास, लिखा, निकास
-आहट/-आहतभाववाचक प्रत्ययगड़गड़ाहट, घबराहट, चिल्लाहट, भलमनसाहत
-इनस्त्री प्रत्ययजुलाहिन, ठकुराइन, तेलिन, पुजारिन
-इयावाला; लघुत्व, बोधक; स्त्री प्रत्ययचुटिया, चुहिया, डिबिया, कनौजिया, भोजपुरिया
-इलावालाचमकीला, पथरीला, शर्मीला
-एरावालाचचेरा, फुफेरा, बहुतेरा, ममेरा
-औड़ा/-औड़ीलिंगवाचकपकौड़ी, सेवड़ा, रेवड़ी
-त/-ताभाववाचक, कर्मवाचकचाहत, मिल्लत, आता, खाता, जाता, सोता
-पनभाववाचक प्रत्ययछुटपन, बचपन, बड़प्पन, पागलपन
-वालाकर्तृवाचक, विशेषणअपनेवाला, ऊपरवाला, खानेवाला, जानेवाला, लालवाला

(3) देशज प्रत्यय

प्रत्ययबोधक/अर्थउदाहरण
-अक्कड़वालाघुमक्कड़, पियक्कड़, भुलक्कड़
-अड़स्वार्थिकअंधड़, भुक्खड़
-आकभाववाचकखर्राटा, फर्राटा
-इयलवालाअड़ियल, दढ़ियल, सड़ियल

(4) विदेशज प्रत्यय

(i) अरबी-फारसी प्रत्यय

प्रत्ययबोधक/अर्थउदाहरण
-आभाववाचकसफेदा, खराबा
-आनाभाववाचक विशेषणवाचक जुर्माना, दस्ताना, मर्दाना, मस्ताना
-आनीसंबंधवाचकजिस्मानी, बर्फ़ानी, रूहानी
-कारकरनेवालाकाश्तकार, दस्तकार, सलाहकार, पेशकार
-खोरखानेवालागमखोर, घूसखोर, रिश्वतखोर, हरामखोर
-गारकरनेवालापरहेजगार, मददगार, यादगार, रोजगार
-गीभाववाचकसंज्ञा प्रत्ययगन्दगी, जिन्दगी, बंदगी -चा/ची वाला देगचा, बगीचा, इलायची, डोलची, संदूकची
-दानस्थिति वाचकइत्रदान, कलमदान, पीकदान
-दारवालाईमानदार, कर्जदार, दूकानदार, मालदार
-नाकवालाखतरनाक, खौफनाक, दर्दनाक, शर्मनाक
-बानवाला दरबान, बागबान, मेजबानअज्ञ, मर्मज्ञ, विज्ञ, सर्वज्ञ
-मंदवालाअक्लमंद, जरूरतमंद

(ii) अंग्रेजी प्रत्यय

प्रत्ययबोधक/अर्थउदाहरण
-इज्मवाद/मतकम्युनिज्म, बुद्धिज्म, सोशलिज्म
-इस्टवादी/व्यक्तिकम्युनिस्ट, बुद्धिस्ट, सोशलिष्ट

स्रोत: hindigrammer.in

प्रतिरोधी समाजव्यवस्था एवं इक्कीसवीं सदी की हिंदी स्त्री आत्मकथाएँ-सुप्रिया प्रभाकर जोशी

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प्रतिरोधी समाजव्यवस्था एवं इक्कीसवीं सदी की हिंदी स्त्री आत्मकथाएँ

सुप्रिया प्रभाकर जोशी

साहित्य मानव की अभिव्यक्ति है । उत्तर आधुनिक काल में गद्य का क्षेत्र काफी विस्तृत हो गया है। हिंदी साहित्य में आत्मकथा लेखन विधा आधुनिक काल की देन है । आत्मकथा में लेखक अपना जीवन वृत्त स्वयं प्रकाशित करता है। परिणामत: हर एक आत्मकथा अपनी अलग सी विशेषता रखती है। संपुर्ण विश्व के अनेक महान विभुतियों ने आत्मकथा इस विधा को समृध्द बनाया। समकालीन परिवेश में भारत में भी अनेक आत्मकथाएँ लिखी जा रही है। बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में तथा इक्कीसवीं सदी के आरंभ से नारियों ने भी निडरता के साथ इस विधा को समृद्ध करने में अपना योगदान दिया। नारियों द्वारा लिखी हुयी आत्मकथाएँ विचारोत्तेजक, नारी विमर्श के नए आयामों को उद्घाटित करती है। इन आत्मकथाओं को पढ़ने के बाद हमारी नैतिकता और सामाजिकता पर अनेक प्रश्न उपस्थित होते है। प्रभा खेतान ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, ” आत्मकथा एक चीख भी है जो बताती है कि अपने किए और भोगे हुए के लिए सिर्फ हम जिम्मेदार नहीं होते। हमारे पीछे खडा सारा समाज इस जिंदगी का साक्षी और सहभोक्ता ही नहीं, इसकी हालत के लिए उत्तरदायी व्यूह रचना का निर्माता भी वह है।” १

प्रभा खेतान के इस वक्तव्य से हम यह कह सकते है कि समाज इस रचना का प्रभा ने अच्छी तरह से अनुभव किया तभी वह यह कहने का साहस जुटा पायी है। समाज व्यवस्था ने मध्ययुग के पश्चात नैतिकता, संस्कार के नाम पर नारी को उनके दायरे में ,रीति-रिवाजों में जकडकर रखा । उन्हें समाज द्वारा केवल अपमान, शोषण और उपेक्षा ही मिली। नारीयों ने भी इस पुरुषवादी समाज व्यवस्था का विरोध करने की ताकत जुटा ली और पढ लिखकर विभिन्न क्षेत्रों में अपना स्थान सुनिश्चित किया। इन सभी विद्रोही परिस्थितियों की विस्तृत व वास्तविक जानकारी हमें आत्मकथाओं से हुयी है।

मैत्रेयी पुष्पा के आत्मकथा के पहला भाग ‘ कस्तुरी कुण्डल बसै ‘ में लेखिका से अधिक उनकी मां कस्तुरी केंद्र में रही है। छोटे- छोटे प्रसंगों को मैत्रेयी ने विस्तार से खोलकर रखे है। ‘ कस्तुरी कुण्डल बसै ‘ की शुरुवात ‘ मैं ब्याह नहीं करुँगी ‘ के ऐलान से होती है। यह वाक्य एक सोलह वर्ष की लडकी के मुँह से प्रस्फुटित होना यह समाज व्यवस्था के लिए बडी चुनौती थी। कस्तुरी के इस निर्णय से माता-पिता और परिवार को व्यवस्था की चिंता साथ ही सामाजिक प्रतिष्ठा की चिंता होती है इसके कारण कस्तुरी की माँ कहती है, “कस्तुरी , लडकियों से ऎसे दुस्साहस की उम्मीद कौन करता है वे तो माँ बाप के सामने सिर उठाकर बात तक नहीं कर सकती , मरने का शाप हँस-हँसकर झेलती है और गालियाँ चुपचाप सहन करती हुई अपनी शील का परिचय देती है, तु मर्यादा तोडनेपर आमदा क्यों हुई ? ” २ उपर्युक्त वक्तव्य से ज्ञात होता है कि महिलाओं पर ऎसे संस्कार किए जाते है कि विवाह होना आवश्यक ही है। वह पुरुष पर ही अवलंबित रहे उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व न हो यही व्यवस्था बनाई गयी है। कस्तुरी अपने ही स्वकीयों द्वारा बेच दी जाती है। मैत्रेयी अठारह महिने की होती है उसी समय से ही कस्तुरी वैधव्य के दंश सहती है। किंतु कस्तुरी रुप समयानुसार विद्रोही, क्रांतिकारी रूप ले लेती है विधवा बनने के बाद शिक्षा प्राप्त करने घर से निकल पड़ती है, मैत्रेयी के शादी की जिद के कारण उसके लिए वर ढुँढने के लिए वह स्वयं निकल पडती है , बिना दहेज शादी करने पर अडे रहती है,आदि ऎसी कई घटनाओं को उजागर किया है जिसमें सामाजिक संरचना पर, रुढी-परंपराओं पर कस्तुरी ने प्रहार किया है।

मैत्रेयी के आत्मकथा का दूसरा खंड ‘ गुडिया भीतर गुडिया ‘ है। अपने अंदाज में बोल्ड लेखन करनेवाली लेखिका का व्यक्तित्व , मानसिक यातनाएँ या उनका होनेवाला विकास आदि बातें इस भाग में कुछ ज्यादा उभरकर आयी है। मैत्रेयी ने भूमिका में लिखा है, ” मैं ने कलम थाम ली । कलम के सहारे मेरी चेतना, जिसे मैंने आत्मा की आवाज के रुप में पाया,तभी तो साहित्य के व्दार तक चली आयी। सुना था साहित्य व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता देता है। हाँ, लिखकर ही तो मैंने जाना कि न मैं धर्म के खिलाफ थी, न नैतिकता के विरुध्द । मैं तो सदियों से चली आ रही तथाकथित सामाजिक व्यवस्था से खुद को मुक्त कर रही थी। “३

उपर्युक्त पंक्ति से मैत्रेयी ने हमे वैचारिक परिपक्वता, अस्मिता का समान, स्त्रीत्व की प्रतिष्ठापना का मार्ग दिखाने का काम किया है। आत्मकथा यह खंड मार्मिक और विस्फोटक है । गाँव से ब्याहकर लायी गयी लडकी को ‘ गँवार ‘ शब्द से आहत किया जाता है। मैत्रेयी को तथाकथित लोगों की नजरों से सुंदर न होने पर भी ताने सुनने पडते है। ऎसे मैत्रेयी के जीवन के बारे में , उनके रहन-सहन के बारे में समाज के साथ उनके पति भी नाराज रहते है। कुछ सालों के पश्चात मैत्रेयी स्वयं को बदल देती है आधुनिक तौर तरीके सीख लेती है इसपर भी पति और समाज के लोग दुष्चरित्र होने का आरोप लगाते है। यानि नारी गाँव के संस्कारों के साथ रहे तो गँवार ठहरायी जाती है और आधुनिक बन जाए तो अनैतिक कहलाती है। समाज व्यवस्था का यह कौन सा रुप है ?

मैत्रेयी ने तीन बेटियों को ही जन्म दिया इस पर अनेक लोग उन्हें ‘ कुल नाशिनी ‘ कहते है। किंतु इस बार मैत्रेयी सामाजिक बंधनों का स्वीकार नहीं करती उनका डटकर मुकाबला करती है। एक साहित्यकार के रुप में अपनी पहचान बनाने में उन्हें कई मुश्किल परिस्थितियों से जूझना पड़ा । साहित्य के क्षेत्र के जाने माने पुरुष संपादकों ने भी उन्हे केवल ‘ स्त्री ‘ के नजर से ही देखा। मैत्रेयी ने अपने साहित्य के माध्यम से स्वतंत्र महिला का आदर्श सामने रखा है। सामान्य जनमानस तथा लोकप्रिय साहित्यकार, महिला साहित्यकारों ने भी इस साहित्य पर अश्लीलता , अभद्र और शर्मसार करने वाला साहित्य कहा है। संक्षेप में यही कह सकते है कि मैत्रेयी की आत्मकथाओं के दोनों खंडों में समाज व्यवस्था का आकलन कर उनके गुण-दोषों का निष्पक्ष भाव से किया है। उन्होने आत्मकथा में सुंदरता नहीं बल्कि सत्यता उतारा है।

‘ जो कहा नहीं गया ‘ यह आत्मकथा कुसुम अंसल की है। कुसुम ने अपने हिस्से आयी प्रताड़ना और उपहास का जिक्र अपनी आत्मकथा में किया है। वे जब मात्र दस माह की थी उसी समय उनकी माँ चल बसी । सौतेली माँ से प्यार नहीं मिला । पिता के घर के माहौल में कोने-कोने में समृध्दी भरी थी परंतु कुसुम इस समृद्धि से अछूती रही। शादी होने तक उनका सफर बेऔलाद फुफा के घर से पिता के घर पर चलता रहा , किसी ने यह जानने की कोशिश ही नहीं की कुसुम क्या चाहती है ? कुसुम की मर्जी या इच्छा जाने बिना ही उनके लिए घर बदलते रहे। ” क्यों पिता यह समझ नहीं पाए कि वह मन, बुद्धि, हृदय के सुमेल से बनी एक जीवित व्यक्ति है। नहीं, पितृक व्यवस्था के सांचे में ढले पिता के लिए यह सब सोचना बेमानी था। “४

कुसुम अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए सारा जीवन रिश्तों के बीच हिचकोले खाती रही। उच्च शिक्षा प्राप्त की तीव्र इच्छा कुसुम को थी किंतु समाज के नियमों के कारण उनकी पढ़ाई रोक दी गयी । जब वह जिद पर अडकर मनोविज्ञान में फर्स्ट डिवीजन में पास होने पर पिता सिर पर हाथ मारकर कहते है, ” वैसे ही कोई लड़का नहीं मिलता,अब इसने तो एम. ए पास कर लिया है, वह भी फर्स्ट डिवीजन में ………। “५

इस वाक्य से हम पुरुषवादी सोच का अंदाजा लगा सकते है। उनकी सोच यही है ,’ लडकी ना पढ़े और अगर पढ़ भी ले तो पुरुषों से आगे कदम न बढाएँ । ‘विवाह के बाद तो कुसुम का जीवन संघर्ष और भी बढ़ जाता है। ससुराल के सभी सदस्यों के शुष्क व्यवहार से उनका मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है। अपना अस्तित्व बचाने के लिए वह अपने आपको इस पिंजरे से मुक्त कर रंगमंच से जुड जाती है। बहु के में नाटक काम करने से परिवार तथा आस-पडोस के लोग उनपर ताना कसने का एक भी मौका नहीं छोड़ते। किंतु कुसुम उन बातों को अनसुना कर अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त करती है। अपनी आत्मकथा से उन्होने सामाजिक- पारिवारिक बंधनो, वर्जनाओं को तोड़कर बाहर आने का संकेत देती है।

‘घर और अदालत ‘ यह आत्मकथा लीला सेठ की है जो भारत की पहली महिला चीफ जस्टिस बनी थी। लीला का जन्म १९३० में हुआ उस समय घर में लड़की का पैदा होना अशुभ माना जाता था किंतु उनके माता-पिता शिक्षित थे साथ ही पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित थे इसलिए उन्होने लड़का लड़की में कोई भेद नहीं किया। शादी के योग्य हो जाने पर उनकी शादी एक शिक्षित युवक से करवा दी। पति के नौकरी के कारण वे विदेश में रही है। समय के सदुपयोग के लिए लीला ने विदेश में ही विधि या कानून की शिक्षा प्राप्त की । कानून की परिक्षा में सफल हो गयी , इस बात से विदेश में पुरुषवादी सोच ने अखबार में लीला के बारे इस तरह उल्लेख किया है, ” एक ऐसी माँ जो कानून की बारीकियों से परिचित है, यह है लखनऊ में जन्म लेने वाली २८ वर्षीय मिसेज लीला सेठ। उन्होंने हाल ही में फायनल परिक्षा में सभी पुरुष अभ्यर्थियों को पछाडकर पहला स्थान हासिल किया है। पढाई के दौरान उनपर पति,पाँच वर्षीय बेटे और छह माह के शिशु की देखभाल की जिम्मेदारी भी थी। “६ एक भारतीय विवाहित महिला का विदेशों के पुरुष विद्यार्थियों को पीछे छोड पहला स्थान प्राप्त करने से कुछ लोगों की उनके प्रति गौरव की भावना थी तो पुरुषवादीयों के मिथ्याहंकार को गहरी चोट लगी। अपनी योग्यता पर प्रैक्टिस के लिए भारत में किसी बैरिस्टर से मिलने पर उन्होंने शादी करने , बच्चें पैदा करने की सलाह दी। ” कानूनी पेशा अपनाने के बजाय जाकर शादी- वादी करो….. ,जाकर बच्चा पैदा करो……यह तो ठीक नहीं है कि बच्चा अकेला रहे इसलिए अच्छा होगा कि तुम दूसरे बच्चे के जन्म के बारे में सोचो। “७ हम देख सकते है कि उच्चशिक्षित पुरुषों की मानसिकता भी यही रही कि स्त्री को शादी कर बच्चें ही पैदा करने चाहिए उसी में उसकी सार्थकता है। लीला सेठ के जज बनने पर भी समाज का या पुरुषों का रवैया नहीं बदल सका । हाईकोर्ट में आयोजित किए जानेवाले समारोह की तैयारियाँ करते समय एक पुरुष ने यह स्पष्ट कह दिया ,” अब जब हमारे बीच एक महिला जज भी है, हमें खाने-पीने के इंतजाम के बारे में चिंता करने की कोई जरुरत नहीं है। वह चाय पान की सारी व्यवस्था कर देगी। “८जज के इस वक्तव्य से हम समझ सकते है कि पुरुष किसी भी पेशे में क्यों न हो वह नारी को ‘ रसोईवाली ‘ इसी दृष्टि से देखता है। एक महिला वकील और न्यायाधीश होने के कारण लीला को अपने स्त्रीत्व के कारण कदम-कदम पर दोयम दर्जा मिलता गया फिर भी अपने गुणों से उन्होंने उनके कार्य में कोई कसर नहीं छोडी।

‘ शिकंजे का दर्द ‘ यह आत्मकथा दलित स्त्री आत्मकथाओं में से एक चुनिंदा आत्मकथा है। मनुवादी विषमता में वर्णवादी- जातिवादी समाज व्यवस्था ने पिछडी हुयी जातियों का जीना मुश्किल किया था साथ ही पुरुषसत्ताक व्यवस्था में उनका शोषण भी होता रहा। दलित होने के साथ महिला होने दंश समाज ने और पति की ओर से उन्होंने सहे है। वर्ण व्यवस्था के कारण बचपन से ही उन्हे दबाने की कोशिश की गयी स्कूल, कॉलेज, नौकरी के जगह पर भी उनकी जाति ने उनका पीछा नहीं छोडा। ” मुझे छु जाने पर वे नहाकर शुध्द होते है, यह बात मैं जानती थी। वे मुझसे दूर रहे, इसकी अपेक्षा मैं स्वयं उनसे दूर रहती थी ताकि मेरे कारण किसी को तकलीफ या परेशानी न हो। बचपन से सिखायी गई बातों से यह आदत बन गई थी। ” ९ स्कुल में भी वर्ण तथा जाति व्यवस्था के अनुरुप ही कक्षा का वर्गीकरण किया गया था । बचपन से ही उनके मन पर दासता, आदर्श संस्कार पैर में बेडीयों की तरह बांधे गए थे। सुशीला घर से बाहर जाति के कारण और घर के अंदर स्त्री होने के कारण प्रताड़ित होना पडा। पति के सामने जैसे वह दासी की तरह ही रहती थी। उनके इशारे पर पैरों के पास बैठकर उनके जुते, मोजे उतारना ऎसे काम करने पडते थे। इस बात पर थोडा भी विरोध जताने पर झगडा, मारपीट तो तय ही थी। ” मेरे पैरों पर अपना सिर रखकर माफी मांग, तब मैं तेरी बात मानुँगा। “१० अपने अधिकारों केलिए लडने के कारण उनके हिस्से अपमान और असह्य पीड़ा आयी। इन परिस्थितियों से संघर्ष कर सुशीला ने अपनी पढ़ाई पुरी की, एक महाविद्यालय में अध्यापक की नौकरी भी की है। अपने पति के इस अमानुष बर्ताव के लिए वह लिखती है, ” पुरुष सत्ता बनी रहे इसलिए स्त्रियों को शुरू से कमजोर बनाकर रखा जाता है। समाज की परंपराएँ स्त्री विरोधी है। इन्हें तोडकर ही स्त्री स्वतंत्रता, समता और सम्मान पायेगी ,तब वह अबला नहीं रहेगी, सबला बन जायेगी। ” ११ इस तरह समाज में संघर्ष करके ही प्राचीन मान्यताएँ तोडी जा सकती है इस ओर सुशीला संकेत करती है । पुरुषवादी, मनुवादी मानसिकता पर आक्रोश व्यक्त करते हुए समाज को जागृत होने संदेश देती है।

उपर्युक्त महिला आत्मकथाओं की श्रृंखला हमे इक्कीसवीं सदीं में मिलती है। प्रस्तुत शोध प्रपत्र में हिंदी साहित्य की कुछ गिनी-चुनी आत्मकथाओं का ही उल्लेख किया गया है। इक्कीसवीं सदीं की कौसल्या बैसंत्री, रमणिका गुप्ता, प्रभा खेतान, मन्नु भंडारी, शीला दीक्षित, आशा आपराद, रजनी तिलक, सुषम बेदी, आदि ऐसी अनेक महिलाओं ने अपने जीवन संघर्ष की कहानी हमारे सम्मुख रखी है। इनमें ज्यादातर महिला साहित्य से जुडी हुयी है, किंतु ज्ञान-विज्ञान के हर क्षेत्र की नारीयों ने आमकथा लिखकर उनकी जिंदगी में आए संकट और चुनौतियों का उल्लेख कर हमे हर हाल में न हारते हुए चुनौतियों का सामना करने की प्रेरणा दी है, हमें रास्ता दिखाने की कोशिश की है। सभी आत्मकथाओं का उल्लेख यहाँ पर होना असंभव है।

स्त्री अस्मिता पर विचार करते समय इस बातपर गौर करना जरुरी है कि स्त्री अनेक सामजिक स्तर, विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने के बावजुद भी , उच्चशिक्षित होने पर भी उनका लैंगिक स्तर ही अंतत: निर्णायक भुमिका अदा करता है। पितृसत्ताक समाज ने नारी को सदैव पुरुष का गुलाम और सामाजिक नियमों के अधीन बनाकर रखा । उत्पीडन का अपना अलग सा मनोविज्ञान रहा है। चाहे वह समाज व्यवस्था का नारी के लिए हो या वर्ण के अनुसार हो । नारी का पारिवारिक, सामाजिक,आर्थिक, मानसिक ,दैहिक शोषण होता रहा है। किंतु शिक्षित नारी अब सजग हो चुकी है। भारतीय संविधान ने नारी को जो हक दिए है उसके बलबुतेपर शिक्षित हो रही है, अपने सोच-विचार के दम पर वह अपने अधिकार माँग रही है। इस समाज के विपरीत परिस्थितियों से लडकर हर एक भारतीय स्त्री ने अपना अस्तित्व खोने नहीं दिया । विपरीत परिस्थितियों में रहकर भी हौसले और हिम्मत के कारण यह सभी भारतीय महिला ‘ महिला सशक्तिकरण ‘ का उदाहरण बनकर प्रस्तुत हुई है।

संदर्भ सुची :

  1. अन्या से अनन्या – प्रभा खेतान – पृ- 255
  2. कस्तुरी कुण्डल बसै- मैत्रेयी पुष्पा -पृ- 09
  3. गुडिया भीतर गुडिया- मैत्रेयी पुष्पा- भुमिका से
  4. जो कहा नहीं गया- कुसुम अंसल -पृ-10
  5. जो कहा नहीं गया- कुसुम अंसल – पृ-42
  6. घर और अदालत- लीला सेठ- पृ- 94
  7. घर और अदालत- लीला सेठ – पृ-99
  8. घर और अदालत – लीला सेठ- पृ- 258
  9. शिकंजे का दर्द -सुशीला टाकभौरे- पृ-18
  10. शिकंजे का दर्द- सुशीला टाकभौरे -पृ- 144
  11. शिकंजे का दर्द- सुशीला टाकभौरे- पृ-144
  12. हिंदी साहित्य की कतिपत्य विशिष्ट महिलाएं एवं उनकी रचनाएं – डॉ. देवकृष्ण मौर्य
  13. प्रतिशोध का दस्तावेज : महिला आत्मकथाएं – डॉ.नीरु
  14. हिंदी आत्मकथा विद्याशास्त्र और इतिहास – डॉ. बापुराव देसाई

*हिंदी भाषा एवं साहित्यानुवाद केंद्र

जे. ई. एस महाविद्यालय,

जालना-४३१२०३ (महा )

मो. ९८२३६३८४५५

प्रतिबंधित हिन्दी-साहित्य में प्रवासी भारतीय: डॉ. मधुलिका बेन पटेल

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49204 L Indian Diaspora abroad

प्रतिबंधित हिन्दी-साहित्य में प्रवासी भारतीय
डॉ. मधुलिका बेन पटेल
सहायक प्रोफ़ेसर
हिन्दी विभाग
तमिलनाडु केंद्रीय
विश्वविद्यालय
प्रतिबंधित हिन्दी-साहित्य हमारे देश की अमूल्य निधि है। सेंशरशिप के बावजूद
देश से जुड़े लगभग हर मुद्दों पर चर्चा की गई। इन रचनाओं में महज़ अंग्रेजों से
मुक्ति के संबंध में ही ध्यान नहीं दिया गया वरन् किसान
, मजदूर, स्त्री व दलितों के अलावा विदेशों में गुलामों की जिन्दगी
जीने को मजबूर प्रवासी भारतीयों की समस्या को भी बड़ी बेबाकी से उठाया गया। सजग
लेखकों ने प्रवासी भारतीयों के ऊपर होती क्रूर हिंसा को अपनी रचनाओं के माध्यम से
उजागर किया। अंग्रेजी सरकार सीधे-सादे भारतीयों को बहला-फुसला कर विदेश जाने के
लिए राजी कर लेती थी। वहाँ पहुँचने पर उन्हें गुलाम बना लिया जाता था। इस क्रूर
चक्र में फँस कर बेबस
, बेसहारे मजदूर अनवरत श्रम और हिंसा के कारण मर-खप जाते।
‘‘फीजी में गन्नों की खेती या चीनी उद्योग के विकास के लिए ब्रिटिश शासकों को
सस्ते मजदूरों की सख्त कमी महसूस हुई। साम्राज्यवादी मनोवृत्ति के अनुरुप अंग्रेज
भारतवासियों की ग़रीबी एवं मजबूरी का अनुचित लाभ उठाने की कला में दक्ष हो चुके
थे। स्वयं नियामक बन कर वे पार्श्व में रहे और छल-नीति का पालन करते हुए भर्ती का
काम भारतवासियों को सौंपा। देश के छोटे नगरों-कस्बों
, तीर्थ-स्थानों आदि पर आरकटियों (मक्कार किस्म के दलाल) का
जाल बिछाया गया जो भूले-भटके लोगों-मुसाफिरों को कोई न कोई झांसा देकर
बहकाकर-जैसे-तैसे-नाना हथकंडे अपनाते हुए उन्हें भर्ती के डिपो तक ले आते थे। यह
भर्ती का डिपो न होकर – जाल में फँसाने का एक ऐसा तन्त्र था जहाँ चारों ओर
आरकटियों का आतंक छाया हुआ था। हकीकत से अनजान
, दबे-सहमे ये बेबस लोग यंत्रवत सरकारी कार्यवाही पूरी करने देते थे। दूसरे शब्दों में,
उन्हें प्रतिज्ञाबद्ध कुली की मंजूरी देनी पड़ती थी।
धोखाधड़ी में फँसे इन लोगों
, को यह नहीं मालूम था कि अब वे इन्सान नहीं रहे,
फीजी शासन के गुलाम हो गए हैं। फीजी में उनके जीवन या
व्यवसाय के किसी पहलू या हित की बात उठाएँ
, वह जुल्म या यन्त्रणा से भरी मिलेगी। वहाँ निपट दमन एवं
शोषण का शासन था। अपने देशवासियों की ऐसी अमानुषिक दुर्गति एवं नए प्रकार की
गुलामी की दर्द भरी बातें खुलने लगीं। देशाभिमान जाग उठा और चारों ओर भयंकर विरोध
होने लगा।’’[1]

साम्राज्यवादी शक्तियाँ स्वयं परोक्ष में रहकर मजदूरों की भर्ती का काम
बिचौलियों को सौंप देती थी। ‘भारत का मजदूर वर्ग: उद्भव और विकास (
1830-2010)’
पुस्तक में सुकोमल सेन लिखते हैं,
‘‘
इन मजदूरों को भरती करने का तरीका
अवर्णनीय संत्रास से भरा था। यूरोप के मालिक भारत के ग्रामीण इलाकों से मजदूरों को
एकत्र करने के लिए भारत के अपराध जगत से जुडे़ कुछ बिचौलियों का इस्तेमाल करते थे।
इन आदमियों को प्रचलित शब्दों में अरकथी कहा जाता था। यह अरकथी बहुत ही लापरवाह और
बेरहमी से तमाम धूर्ततापूर्ण उपाय अपनाकर इन बेरोजगार
, अधनंगे, भूखे ग्रामीण लोगों को लालच देकर भारत से बाहर जाने के लिए
तैयार कर लेते थे।’’[2]  झूठे कपट जाल में फँसा कर इन ग्रामीणों को
बँधुआ बना लिया जाता था। वहाँ इन्हें अनवरत श्रम और हिंसा का सामना करना पड़ता था।
ब्रिटिश राज में जब्त की गई पुस्तकों से इस बर्बरतापूर्ण सचाई का खुलासा होता है।
लक्ष्मण सिंह के नाटक ‘कुली-प्रथा’ में प्रवासी भारतीयों की दीन दशा का वर्णन है।
‘‘कुली-प्रथा का लेखन
1913 में और प्रकाशन 1916 में हुआ जिसके पीछे गणेशशंकर विद्यार्थी एवं माखनलाल
चतुर्वेदी की प्रमुख भूमिका रही है। प्रारम्भ में यह नाटक धारावाहिक रुप से
‘प्रताप’ में छपता रहा। इसे पुस्तकाकार मिला
1916 में और तभी इस नाट्य-कृति पर प्रतिबंध लगा दिया गया।’’[3]

इस नाटक के माध्यम से लक्ष्मण सिंह ने 
बड़ी बेबाकी से साम्राज्यवादी शक्ति के कुरुप चेहरे को बेनकाब किया है। वे
सीधे-सादे ग्रामीणों को आरकटियों द्वारा विभिन्न प्रपंचों में फँसा कर उन्हें
गुलाम बनाए जाने की कहानी कहते हैं। इस संबंध में सत्येन्द्र कुमार तनेजा ने लिखा
हैं
, ‘‘अवसर
मिले तो साम्राज्यवाद का चेहरा किस कदर खौफनाक हो सकता है
, इस असलियत का अहसास ‘कुली-प्रथा’ नाटक के पाठ से हो जाता
है। फीजी या किसी नए उपनिवेश में खेती-बाड़ी के लिए मजदूर ले जाना एक बात है
,
सीधे-सादे लोगों को बहकाकर बँधुआ मजदूर बनाना और गुलाम
व्यापार करना इन्सानियत को ताक पर रखना है। फीजी में निरंकुशता का उन्माद छाया हुआ
था। सनातनी-संस्कारों वाले दम्पति भोलाराम और कुन्ती के बेटे शंकर को घर से भागे
कई वर्ष बीत चुके हैं
, उसकी कोई खोज-ख़बर नहीं आई। कुछ उदास कुछ उखडे़ माँ-बाप
तीर्थ यात्रा के लिए जगन्नाथपुरी आए घूम रहे हैं। उधर आरकटियों (ठगों) का एक दल
ऐसे भटके लोगों को अपने जाल में फँसाने में जुटा हुआ है ताकि उन्हें कुली बनाकर
फीजी भेजा जा सके।’’[4]  कुलियों को लाने के एवज में आरकटियों को पैसे
मिलते थे। इस बात का खुलासा लक्ष्मण सिंह करते हैं। नाटक के प्रथम अंक (प्रथम
दृश्य) में नौकर के वक्तव्य से यह साफ जाहिर होता है-

‘‘नौकर: प्रसन्न रहें हमारे डीपी अफसर,
फिर किसका डर ? आज उन्होंने लिखा है कि दस कुलियों की आवश्यकता है,
प्रति मनुष्य 210 रुपये मिलेंगे।’’[5]  नाटक में सेठ बृजलाल ऐसा ही पात्र है,
जो मनुष्यों की खरीद-फरोख़्त में लिप्त रहता है- ‘‘बृज.:
कुछ क्या
, बहुत कुछ है। दस और चाहिए, दस !
दूसरा: दस ? दस की तो कोई बड़ी नहीं है बात।
बृज.: भाई, पर सोच भी तो लो कोई घात।
तीसरा: अजी सेठ जी, चलते-चलते मार लेते हैं हाथ।

चौथा: आप चिन्तित न हूजिए (गाता है) फाँस लिया करते हैं अवसर पे कपट जाल में
हम। ठगी करने के लिए बन जाते कभी डाकटर हैं
, ढूँढ़ रोगियों को भेजें फिज़ी अस्पताल में हम;
फाँस लिया करते हैं…।’’[6]

भारत से मजदूरों को बाहर भेजने का सिलसिला बहुत पहले से शुरु हो गया था।
‘‘उन्नीसवीं सदी के तीसरे दशक से प्रारंभ होकर बीसवीं सदी की शुरुआत तक भारतीय
मजदूर वर्ग
, अफ्रीका और वेस्ट इंडीज में चीनी के उपनिवेशों प्रवासी मजदूर के रुप में जाता
रहा। भारतीय मजदूर वर्ग के इतिहास में उत्प्रवास का यह दौर एक अत्यधिक हृदय-विदारक
परिघटना है।’’[7]  ब्रिटिश राज में जब्त की गई बाबूराम पेंगोरिया
की पुस्तक ‘राष्ट्रीय आल्हा’ में भारतीयों को विदेश भेजे जाने का विवरण है। यह
पुस्तक जैन प्रेस
, आगरा से 1930 में प्रकाशित हुई थी। इसमें बाबूराम पेंगोरिया ‘भारत
प्रवासी’ नामक कविता में लिखते हैं-
‘‘अब कितने बाहर भारतवासी उनका भी कुछ करुँ बखान।
भूख की ज्वाला ने जब मारे पहुँचे परदेशन में जाय।।
इनकी संख्या इस प्रकार है फीजी पहुँचे साठ हजार।
पौने ३ लाख हैं मारीसिस में डीनाटाड में १ लाख २९ हजार।।
नौ लाख भारतीय सिंघल द्वीप में पुगरंडा में दस हजार।
बिंडवार्ड में  दो
हजार हैं और शम में चार हजार।।
गिलवर्ट द्वीप में बसे तीन सौ सेन्टलमेन्टस असी हजार।
न्यूज़ीलैण्ड में बसे पांच सौ दस हजार है जंजीबार।।[8]
आगे वे हांगकांग, केन्या, दक्षिण अफ्रीका, जमैका समेत अन्य देशों में रह रहे भारतीयों का विवरण देते
हैं:
‘‘२५ हज़ार केनिया बस रहे हांगकांग में ४ हज़ार।
दक्षिण अफ्रीका में संख्या १ लाख ६१ हज्जार।।
आस्ट्रेलिया  में इनकी संख्या ६
हज़ार ६ सौ है जान।
0 हज़ार जमैका मांहि बाह बात में जानो चार।।
हुंडराज में दौ सौर पहुंचे मोम वासा में पांच हजार।
सिलेचीज में पांच बस गए हैं बारडीज़ एक हैं जाय।।
भारत प्रवासी से उद्धृत कर यह सब बौर दिया बताय।’’[9]
फीजी, मारीशस समेत कई देशों में मजदूर भेजे जाते थे। ‘‘मारीशश,
ब्रिटिश गिना, त्रिनिदाद और जमाइका द्वीप समूह चीनी उत्पादन के लिए
प्रसिद्ध थे। इन द्वीप समूहों में गन्ने के खेतों और चीनी मिलों में दास मजदूरों
से काम लिया जाता था। दासों के व्यापार की समाप्ति के बाद इन दास मजदूरों ने चीनी
मिलों और गन्ने के खेतों में काम करने से मना कर दिया। इससे इन द्वीपों की चीनी
मिलों और गन्ने के खेतों के लिए मजदूरों का भारी संकट उत्पन्न हो गया। तब
साम्राज्यवादियों का समर्थन प्राप्त चीनी उद्योग के धन्ना सेठों ने
,
इन उपनिवेशों में भारत के गरीब और भूमिहीन किसानों का मजदूर
के रुप में आयात करना प्रारंभ किया।’’[10]

कुली-प्रथा’ नाटक में इस बात की चर्चा की गई है कि परिश्रमी
भारतीय मजदूरों का निर्यात किया जाता था। नाटक के प्रथम अंक के चौथे दृश्य में
युवकों की बातचीत से इस बात का खुलासा होता है
,
‘‘
पहला: यह देश वीरान और ऊसर- सा पड़ा
था। हड्डीतोड़ परिश्रम की आवश्यकता थी। यह परिश्रम विलासी शरीर से होना असम्भव था।
उस आवश्यकता की कुछ पूर्ति वहाँ के हबशियों ने की
, फिर नित्य प्रति बढ़ने वाली उस आवश्यकता ने भारत की
जनसंख्या पर हाथ फेरा। इसी से
¼Indenture Labour System½ अर्थात् ‘प्रतिज्ञाबद्ध कुली-प्रथा’ का अवतार हुआ जिसने
हमारे देशवासियों को गुलामी के कीच में जा उतारा। यह प्रथा बहुत वर्षों से प्रचलित
है। ब्रिटिश उपनिवेशों में
, भारतवासी स्त्री-पुरुष शाखों की संख्या में पहुँच चुके
हैं।’’[11]  ये मजदूर स्वतंत्र नहीं होते थे। सुकोमल सेन
लिखते हैं
, ‘‘इन प्रवासी मजदूरों को स्वतंत्र मजदूर नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह अपनी
श्रमशक्ति बेचने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र नहीं थे। वे अनुबंधित मजदूर थे।’’[12]  सीधे-सादे यात्रियों और ग्रामीणों को
बहला-फुसला कर फँसा लिया जाता था। ‘‘इन लोगों को धोखाधड़ी से कैसे भरती किया जाता
था
, इसकी
एक मिसाल हरी बिस्वाल की निम्नलिखित गवाही में देखें: मैं कटक का निवासी हूँ। हम
चार लोग रोजगार की तलाश में रुके। एक आदमी जिसके पास बिल्ला (बैज) था वह भी अन्य
यात्रियों के साथ रुका। अगले दिन हम लोग अपनी यात्रा पर निकल पड़े

वह चपरासी जिसके हाथ पर बिल्ला लगा था वह भी हमारे साथ-साथ
चल दिया। हम लोगों से उसकी बातचीत होने लगी। बातों ही बातों में उसने कहा कि हम
लोग उसके साथ कोलकाता चलें वह नौकरी की व्यवस्था कर देगा। उसने कहा कोलकाता से
मात्र चार दिन की यात्रा पर एक जगह मारीशस है। वह मारीशस में
10 रु. प्रति माह पर नौकरी दिला देगा और मुझे जब चाहूँ
इस्तीफा देने की स्वतंत्रता होगी।’’[13]  ‘कुली-प्रथा’ नाटक में भी आरकटियों द्वारा
नौकरी के नाम पर छल-प्रपंच से गुलाम बनाने की नीति दिखाई देती है। कुन्ती का बेटा
शंकर इसी कपट का शिकार होकर फीजी पहुँच गया। ‘‘शंकर: माँ
, मैंने अमेरिका जाने की इच्छा से घर छोड़ा। दो वर्ष तक
इधर-उधर घूमता रहा। आरकटियों ने धोखा दे यहाँ भेज दिया।’’[14] 

नौकरी की तलाश में निकले गरीब युवक आरटियों के जाल में फँस जाते थे।
‘फिजीद्वीप में मेरे
21 वर्ष’ पुस्तक में तोताराम सनाढ्य इस कठोर जीवन की रुपरेखा
बयान करते हैं। उन्होंने लिखा है
, ‘‘सन् 1893 ई. में नौकरी के लिए मैं घर से निकल कर पैदल चल दिया। मेरे
पास कुल सात आने पैसे थे। मार्ग में अनेक कठिनाईयों का सामना करता हुआ कोई सोलह
दिन में प्रयाग पहुँचा। बस
, इसी स्थान से मेरी तुच्छ जीवनी की दुःखजनक रामकहानी प्रारंभ
होती है।…एक दिन मैं कोतवाली के पास चौक में इसी चिंता में निमग्न था कि इतने
में मेरे पास एक अपरिचित व्यक्ति आया और उसने मुझसे कहा: क्या तुम नौकरी करना
चाहते हो
? मैंने कहा: हाँ। तब उसने कहा: अच्छा, हम तुम्हें बहुत अच्छी नौकरी दिलवायेंगे। ऐसी नौकरी कि
तुम्हारा दिल खुश हो जाय।’’[15]  सीधे-सादे भारतवासियों को किस प्रकार बहकाया
जाता था इसका वर्णन भी तोताराम जी करते हैं। वे बताते हैं
,
‘‘
वह आरकाटी मुझे बहकाकर अपने घर ले
गया वहाँ जाकर मैंने देखा कि एक दालान में लगभग एक सौ पुरुष और दूसरे में करीब साठ
स्त्रियाँ बैठी हुई हैं। कुछ लोग गीली लकडि़यों से रसोई कर रहे थे और चूल्हा
फूँकते-फूँकते हैरान हो रहे थे।’’[16]  जब तोताराम सनाढ्य ने नौकरी करने से मना कर दिया
तो उनके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया गया। ‘‘जब मैं समझाए जाने पर किसी तरह राजी न
हुआ
, तो एक
कोठरी में बंद कर दिया गया। एक दिन एक रात मैं भूखा-प्यासा इसी कोठरी में रहा। अंत
में लाचार होकर मुझे कहना पड़ा कि मैं फिजी जाने को राजी हूँ।’’[17] 

भारतवासियों की दशा अत्यंत दयनीय थी। उनके साथ पशुवत व्यवहार किया जाता था।
यहाँ से भारी संख्या में नागरिकों को बाहर भेजा गया
, जिनकी दशा अच्छी न थी। लक्ष्मण सिंह लिखते हैं,
‘‘
वहाँ की सरकार का नियम है कि कोई
एशियावासी
, विशेषकर भारतीय, विशेष प्रान्तों को छोड़ दूसरे प्रान्तों की सीमा में पैर
नहीं रख सकता
, और न वह सोने की खानों के आसपास डेढ़ मील के अन्दर रह सकता है। उसका मकान नगर
के बाहर मीलों दूर होना चाहिए। सारांश वहाँ उन्हें पाले हुए पशुओं से अधिक
स्वाधीनता नहीं। फिज़ी इत्यादि द्वीपों में पाँच वर्ष पश्चात् प्रतिज्ञा से
छुटकारा पाने पर भी उन्हें स्वतंत्रता के स्वत्व नहीं दिए जाते। केनेडा
,
आस्ट्रेलिया आदि उपनिवेशों में तो कोई भारतवासी जा ही नहीं
सकता। ये तो हुई वहाँ की बातें जहाँ हमारे अंग्रेज बहादुर का राज्य है। अब
यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका में नियम बनने वाला है कि वहाँ भारतवासी न धँसने
पाँवें। बात सच है
, जो घर में ही दुरदुराया जावे उसका बाहर कौन मान करेगा ?
पोर्चुगााल वालों के पूर्वीय अफ्रीका का नियम है कि जो
भारतवासी वहाँ जाकर रहेगा उस पर कर लगेगा। अंग्रेजी उपनिवेशों में ही नहीं किन्तु
विदेशीय उपनिवेशों में भी भारतवासी
, कुली भेजे जाते हैं। 1912 के दिसम्बर में डच गायना में 4669 भारतीय कुली थे। वहाँ पर भी वे अत्याचारों से नहीं बचते।
अपने देश भारतवर्ष में भी हमारी दशा शोचनीय है। कहीं निलहे कोठी वाले दुहरा लगान
वसूल करते हैं
, कहीं चाय बागान वाले नादिरशाही मचाते हैं, कहीं बेगार वाले औरंगजे़बी करते हैं और कहीं बात-बात पर
ठोकरें पड़ती हैं।’’[18] 

कैप्टन एफ. डब्ल्यू ब्रीच के द्वारा की गई जाँच से ज्ञात होता है कि कुली
बनाने के लिए लोगों का अपहरण भी होता था। ‘‘प्र. क्या आप
1837 के ऐक्ट नं. v के पारित होने से पहले अगवा करने की घटनाओं से भली प्रकार
अवगत हैं
? उ. इस तरह की घटनाएँ होती थीं। मुझे एक घटना याद है जिसमें एक औरत को बेहोश कर
के एक बक्से में बंद कर दिया गया था। वे लोग उसे मैदान के पार ले जा रहे थे तभी
उसे होश आ गया। उसे काट डाला गया था। मैं इससे अधिक कुछ नहीं बता सकता। बंगाल
प्रान्त के निचले भाग में बड़े पैमाने पर
अपहरण की घटनाएँ होती हैं।’’[19]  भारतीय कुलियों पर होने वाले अत्याचारों की
कहानी यत्र-तत्र प्रकाशित होने लगी थी। ‘‘
15 जून 1938 को बांबे गजेट में इस दर्दनाक घटना के बारे में लिखा गया:
इन ठगे गए मजदूरों को नौकरी का भुलावा देकर घर से बहका कर लाया जाता। जलपोतों में
भर कर उनको गंतव्य को भेजा जाता
, तभी से वह अपने काम लेने वाले मालिक के आधीन हो जाते मानो
उनका जन्म ही गुलामी में हुआ है। उन्हें ऐसे उपनिवेशों में भेजा जाता जहां दास
प्रथा समाप्त हो गई थी लेकिन वे दास बना दिए जाते।’’[20]  कुलियों पर होने वाले अत्याचारों की कोई सीमा न
थी। वे इस बात की फरियाद कहीं नहीं कर सकते थे। नाटक ‘कुली-प्रथा’ में एक
हिन्दुस्तानी का वक्तव्य है: महाराज
, मैं जिस प्रकार बहकाकर लाया गया उसके कहने की कोई आवश्यकता
नहीं। और यहाँ पर जैसे-तैसे कष्ट हुए या होते हैं वे शायद आप को मालूम ही होंगे।
मैं ‘शायद’ इसलिए कहता हूँ कि जब से आप के आने की ख़बर सुनी है तब से सब कोठी वाले
ने और इंस्पेक्टरों ने कुलियों को धमका रखा है कि जो कोई हमारे विरुद्ध बात कहेगा
उसे याद रखना चाहिए के गिरमिट खतम होने तक उसे हमारे ही हाथ रहना होगा। इस प्रकार
धमका के उन्होंने सब बातें पहले से ही गवाहियों को सिखा रखी थीं। आप अभी ‘न्यूचू’
गाँव से यहाँ आए
, इसी बीच देखिए मुझ पर कैसी मार पड़ी ?
गवाही देते समय मैंने आप से कह दिया था कि पूरा पूरा भोजन
नहीं मिलता। आपके पीछे इंस्पेक्टर ने मुझे बुलाकर इस बात के कहने के दोष में इतना
मारा कि मेरे ये दाँत टूट गए।’’[21]  इन भारतीय मजदूरों के साथ जानवरों की तरह
व्यवहार किया जाता था। ‘‘बुरी तरह से भरे हुए मालवाहक जलपोत में जानवरों की तरह
ठूंस-ठूंस कर उनको भर दिया जाता है
, उनको आधा पेट खाना दिया जाता है। उनके साथ दुर्व्यवहार किया
जाता है और दवा आदि की कोई सुविधा नहीं दी जाती। इन अभागे मजदूरों में से कुछ तो
मार्ग में ही मर जाते हैं
, बाकी मजदूर जब गंतव्य स्थान पर पहुँचते हैं तो वह बुरी तरह
थके-हारे होते हैं। अपने को इन उपनिवेशों के वातावरण के अनुकूल बनाना भी इनके लिए
अग्नि परीक्षा है। इन उपनिवेशों में काम की स्थितियाँ अति कठिन थीं। इन मजदूरों को
प्रतिदिन
12 से 15 घंटे काम करना पड़ता था। गन्ने के खेतों और चीनी मिलों में अत्यधिक कठिन काम
होने के कारण मजदूरों को अपना लक्ष्य पूरा करने के लिए अधिकतर रात में भी काम करना
पड़ता था। बुरी तरह से थके  और निराश
,
वह देर रात घर लौटते। जब वे खेतों और मिल में काम करते तो
उन पर कार्यनिरक्षक (दरोगा) निरंतर निगरानी रखता
, मानो गुलामों से 
काम करा रहा हो। अवकाश के दिन (रविवार) भी इनको कोई न कोई काम सौंप दिया
जाता। कुछ उपनिवेशों में तो उनको
18 घंटे तक काम करना पड़ता था। इस अत्यधिक कठोर काम के कारण
मजदूरों की मृत्युदर भी बहुत अधिक थी।’’[22]

कुलियों से अनवरत काम लेने के बाद उनसे मारपीट भी की जाती। ‘कुली-प्रथा’ नाटक
में एक फिजि़यन के कथन से इस अमानवीयता का पता चलता है। ‘‘फिजि़यन: इतने में
इंस्पेक्टर साहब आए। उन्होंने धमका कर दस कोडे़ लगाए तो वह पाजी काम पर जाने की
अपेक्षा वहीं लेट गया। इससे हुजूर
, इंस्पेक्टर साहब अधिक क्रुद्ध हुए। और उन्होंने,
फेंक कोट और बाँह चढ़ाकर,/झुँझलाकर और आगे बढ़कर।/घूँसा बाज़ी खूब मचाई,/उसकी यों आपद घिर आई।/कभी पीठ पर, कभी पेट पर,/कभी आँख पर, कभी नाक पर।/कभी गाल पर, कभी कान पर।।/दे दनादन खून वहाँ फिर,/दाँत वाँत इस पाँच गए गिर।’’[23]

सबसे खराब दशा स्त्रियों की थी। उनके शोषण की सीमा न थी। श्रम के साथ-साथ उनका
शारीरिक शोषण भी होता था। इस संबंध में तोताराम सनाढ्य ने लिखा है
,
‘‘
आरकटियों ने कुंती और उसके पति को
लखुआपुर जिला गोरखपुर से बहका कर फिजी को भेज दिया था। इन लोगों को वहाँ बड़े
  बड़े
कष्ट सहने पडे़। इस समय कुंती की अवस्था 20 वर्ष की थी। बड़ी कठिनाईयों से कुंती 4 वर्ष तक अपने सतीत्व की रक्षा कर सकी। तदनंतर सरदार और
ओवरसियर उसके सतीत्व को नष्ट करने के लिए सिरतोड़ कोशिश करने लगे।
10 अप्रैल 1912 को ओवरसियर ने कुंती को साबू केरे नामक केले के खेत में सब
स्त्रियों और पुरुषों से पृथक घास काटने का काम दिया
, जहाँ कोई गवाह न मिल सके और चिल्लाने पर भी कोई न सुन सके।
वहाँ उसके साथ पाशविक अत्याचार करने के लिए सरदार और ओवरसियर पहुँचे। सरदार ने
ओवरसियर के धमकाने पर कुंती का हाथ पकड़ना चाहा। कुंती हाथ छुड़ाकर भागी और पास की
नदी में कूद पड़ी।’’[24]

कुली-प्रथा’ नाटक से भी इस बात का खुलासा होता है।
‘‘ब्रजलाल: अरे भाई
, गान्ट साहब की कोठी में तो सौ आदमियों के बीच कुल पच्चीस
स्त्रियाँ रह गई हैं। वहाँ अभी आठ और चाहिए। आज्ञा है कि कम-से-कम तीन पुरुषों के
लिए एक स्त्री अवश्य हो।’’[25]  अब्बास के कथन से उनके ऊपर होने वाले क्रूर
हिंसा का पता चलता है।  कुली-प्रथा में यह
आम बात थी कि सद्यः प्रसूता को भी काम पर जाना पड़ता था। अत्याचार की इस पराकाष्ठा
को देख अब्बास कहता है: ‘‘या ख़ुदा
, पाक परवरदिगार, तू ने ठीक ही किया जो ऐसे पापी को मेरे हाथों से मरवाया।
ओफ़! इसने एक दिन दस बारह स्त्रियों को एक क़तार में खड़ी कर के उन्हें उनके
बिलखते हुए बच्चों के ही सामने गेंडे की खाल के कोडे़ से मारा था
,
और इतना निर्दयता से कि उनके मोटे कपड़ों के ऊपर होकर ख़ून
बहने लगा था। इसने क्या-क्या नहीं किया
? एक दिन एक स्त्री अपने पाँच दिन के बच्चे को लेकर काम करने
खेत पर आई थी। दोपहर को जब उसे प्यास लगी तो पानी पीने के लिए नदी पर गई। वहाँ
छाया में बैठकर अपने बच्चे को दूध पिला रही थी। दुर्भाग्य से यह पापी वहाँ आ
निकला। इसने उस दूध पीते बच्चे को खींच के नदी में फेंक दिया। मुँह से दूध उगलता
हुआ बच्चा नदी में गिर कर बह गया। यह दुष्ट उस नारी के चिल्लाने की परवाह न कर
उसके बाल पकड़ खींचता हुआ खेत पर ले आया। उस दिन से सब स्त्रियाँ अपने बच्चों के
पैर खूँटे से बाँध
, घर में बन्दकर, ताला लगा, खेतों में आती हैं। उस समय यदि कोई कुलियों की झोपड़ी की ओर
चला जावे तो भूखे बच्चों के चिल्लाने और रोने की आवाज से उसका हृदय फटने लगता है।
इसने ज़बरदस्ती स्त्रियों को दूषित किया
, इसलिए कई कुलियों ने अपनी स्त्रियों को मार डाला,
और आप फाँसी पर चढ़ गए।’’[26]  कहना न होगा कि प्रवासी भारतीयों पर अत्याचार की
कोई सीमा न थी। अपनी रचनाओं में सजग लेखक समुदाय इनके खिलाफ आवाज बुलंद करने लगा
था। उनकी अति दारुण दशा को जनमानस के सामने रखा जाने लगा। इस सक्रियता को देख
ब्रिटिश सरकार ने सख़्त कदम उठाए। उसने इन रचनाओं को जब्त घोषित कर दिया। बावजूद
इसके
, लेखक,
संपादक मंडल बड़े साहस के साथ इस अभियान में लगे रहे।


[1] तनेजा, सत्येंद्र कुमार
: सितम की इंतिहा क्या है
? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं. 134
[2]सेन, सुकोमल : भारत का मजदूर वर्ग : उद्भव और विकास
(
1830-2010) , ग्रन्थ शिल्पी , प्रथम संस्करण 2012, पृ. सं. 61
[3] तनेजा, सत्येंद्र कुमार
: सितम की इंतिहा क्या है
? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं. 135
[4] तनेजा, सत्येंद्र कुमार
: सितम की इंतिहा क्या है
? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं. 136
[5] तनेजा, सत्येंद्र कुमार
: सितम की इंतिहा क्या है
? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं.158
[6] तनेजा, सत्येंद्र कुमार
: सितम की इंतिहा क्या है
? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं.158
[7] सेन, सुकोमल : भारत का
मजदूर वर्ग : उद्भव और विकास (
1830-2010) , ग्रन्थ शिल्पी, प्रथम संस्करण 2012, पृ. सं.60
[8] पेंगोरिया, बाबूराम :
राष्ट्रीय आल्हा
; जैन प्रेस, आगरा, 1930 ,11 वीं कविता (भारत प्रवासी)
[9] पेंगोरिया, बाबूराम :
राष्ट्रीय आल्हा
; जैन प्रेस, आगरा , 1930 ,11 वीं कविता (भारत प्रवासी)
[10] सेन, सुकोमल : भारत का
मजदूर वर्ग : उद्भव और विकास (
1830-2010) , ग्रन्थ शिल्पी , प्रथम संस्करण 2012, पृ. सं.60
[11] तनेजा, सत्येंद्र कुमार
: सितम की इंतिहा क्या है
? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं.166
[12] सेन, सुकोमल : भारत का
मजदूर वर्ग : उद्भव और विकास (
1830-2010) , ग्रन्थ शिल्पी, प्रथम संस्करण 2012, पृ. सं.60
[13] सेन, सुकोमल : भारत का
मजदूर वर्ग : उद्भव और विकास (
1830-2010) , ग्रन्थ शिल्पी, प्रथम संस्करण 2012, पृ. सं.62
[14] तनेजा, सत्येंद्र कुमार
: सितम की इंतिहा क्या है
? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं.202
[15] सनाढ्य, तोताराम :
फ़िजीद्वीप में मेरे
21 वर्ष; http://www.hindisamay.com/vividh/fizi-dveep-me-mere-21-varsh.html
Hindi  samay . com
[16] सनाढ्य, तोताराम :
फ़िजीद्वीप में मेरे
21 वर्ष ;
http://www.hindisamay.com/vividh/fizi-dveep-me-mere-21-varsh.html Hindi   samay 
. com
[17] सनाढ्य, तोताराम :
फ़िजीद्वीप में मेरे
21 वर्ष ;
http://www.hindisamay.com/vividh/fizi-dveep-me-mere-21-varsh.html Hindi   samay 
. com
[18] तनेजा, सत्येंद्र कुमार
: सितम की इंतिहा क्या है
? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं.166
[19] सेन, सुकोमल : भारत का
मजदूर वर्ग : उद्भव और विकास (
1830-2010) , ग्रन्थ शिल्पी , प्रथम संस्करण 2012, पृ. सं.63
[20] सेन, सुकोमल : भारत का
मजदूर वर्ग : उद्भव और विकास (
1830-2010) , ग्रन्थ शिल्पी , प्रथम संस्करण 2012, पृ. सं.64     
[21] तनेजा, सत्येंद्र कुमार
: सितम की इंतिहा क्या है
? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं.197
[22] सेन, सुकोमल : भारत का
मजदूर वर्ग : उद्भव और विकास (
1830-2010) , ग्रन्थ शिल्पी , प्रथम संस्करण 2012, पृ. सं. 65
[23] तनेजा, सत्येंद्र कुमार
: सितम की इंतिहा क्या है
? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं190
[24] सनाढ्य, तोताराम :
फ़िजीद्वीप में मेरे
21 वर्ष ;
http://www.hindisamay.com/vividh/fizi-dveep-me-mere-21-varsh.html Hindi   samay 
. com
[25] तनेजा, सत्येंद्र कुमार
: सितम की इंतिहा क्या है
? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं.184
[26] तनेजा, सत्येंद्र कुमार
: सितम की इंतिहा क्या है
? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं.215

[ साभार: जनकृति पत्रिका, सयुंक्त अंक, अक्टूबर-दिसंबर 2017]

प्रज्ञा जी की पांच कविताएँ-

0
12316395 904467256273977 7733264643268183966 n
1  चंदा
कैसे बिसराउँ
?
बित्ते
भर की छोरी
आग
लगे तेरी जबान मे

हैसियत देखती है न सच
बस
तुझे चाहिए चंदा
कोई
खिलौना है क्या
?
ताड़
सी लम्बी हो गयी
पर
जिद्द तो देखो तुझसे भी दो हाथ आगे
एक
ही जिद चंदा की  रट
खिड़की
से देख ले न जी भर
बाज़ार
में दाम चडा है तेरे चंदा का।
रो
न बिटिया चली जा
 
अपने
घर
भूल
जा चंदा  को
मै
भी भूल गयी थी देहरी लांघकर
जानती
है न
रात
के चंदा को सुबह का सूरज निगल जाता है।
अम्मा
मन
में बसा आँख में चमकता
जुबान
से फिसलता हथेली पे रचा
सपनो
में हुलसता
चंदा
कैसे बिसराउँ
?
मेरी
आखिरी सांस की आस है
 
चंदा
है
किसी देबता में हिम्मत
 
जो
निगल जाए इसे मेरे संग पूरा।
(प्रज्ञा)
2  दो
बहनें
एक
छोटी -सी चारपाई पर
लकीरों
वाली चादर बिछाकर
 
हम
खींचते थे सरहदें
तेरी
और मेरी आज़ादी की..
नींद
की आगोश में जाने से पहले
 
थे
हमारे अनगिनत झगड़े
आज़ादी
के।
 
चारपाई
मन में कितना हंसती होगी
मुझ
पर
,तुझ पर
अपने
बान को कसने वाले हर इंसान पर
वो
मज़बूत हाथों से बंधा बान था
जो
नहीं छोड़ता था कोई झोल
दीखता
था एकदम कसा
 पर
था तो बान ही  …कोई इस्पाती चादर नहीं
सीमेंट
की स्लैब भी नहीं
नींद
की आगोश में जाते -जाते
 
अचानक
झूला बन जाता था
हवा
हो जाती थी सारी लड़ाई
खो
जाती थीं तमाम सरहदें
और
तेरी -मेरी आज़ादी
 हमारी
आज़ादी बन जाती..
 सोते
हुए हम साथ भरते थे
ऊँची
..बहुत ऊँची पींगें
जो
जाती सात आसमां पार
और
हमारी आज़ादी की चीख
 
उससे
भी सात आसमां पार।
हर
सुबह माँ को मिलतीं
पालना
बनी चारपाई में
गलबहियां
डाले
मीठे
सपनों में डूबी
 
दो
बहनें।
3  रॉस
आइलैंड को देखकर
तुम
घर बसाने नहीं आये थे
 
घर
सपना होते हैं।
अपना
घर छोड़ हुकूमत को तुमने पैर पसारे
हमारी
खूबसूरत ज़मीनों को आँखों में भरा
धरती
की गंध को अपने नथुनों में
लहरों
के परों पर सवार
 
झट
इसे हथिया लिया।
ईंट, गारा, पत्थर
उठाने
,
इमारत
बनाने को मज़दूर मुफ्त मिले
जेलयाफ़्ता
कैदी तुम्हारे हुकुम बजाते
तुम्हारी
बगिया सींचते
तुम्हारे
हर ज़ुल्म के बदले फूल खिलाते।
उनके
दिमाग में चल रही क्रान्ति की उधेड़बुन से
तुम्हारा
क्या वास्ता
?
तुम्हें
मतलब उनके हाथ और पाँव से
 
उनके
खून और पसीने से
 
तुम
उनके दिमाग के दुश्मन थे
दिमाग
, जो
मुक्ति की राह बुनते।
उधेड़ने
-बुनने वाली सलाइयां तुमने मिटा डालीं
या
भौंक दीं सपने देखने वाली आँखों में।
ज़िन्दगी
का बहुत छोटा -सा सच तुम नहीं जान पाए
आँखें
खत्म होने पर भी सपने कहाँ मरते हैं
?
तुम
बनाते गये इमारत दर इमारत।
द्वीपों
की कायनात में अपनी बस्तियां बसा लीं
धरती
की सुकून भरी सुंदर गोद में
तुम
महफिलें सजाते
तुम
जीत का जश्न मनाते
ताल, लय और मुद्राओं से भरकर 
तुम
बनाते हर हफ्ते की रंगारंग सूचियां
 उनके
मुताबिक खान- पान
ऐशो
आराम।
बिजली, पानी के संयंत्र से सुसज्जित
 बन
गया ये द्वीप
एशिया
का पेरिस।
तुम्हारी
गिरफ्त में हमारी धरती की देन
उसका
अमर कोष
और
अभूतपूर्व सौंदर्य के बीच तुम राजा
 
हम
चाकर
 
हम
दास।
हर
ज़ुल्म के बाद भी बने रहे तुम धार्मिक
बड़े
आस्थावान
गिरजे
में प्रार्थना के पाबन्द।
 
आज
इतने सालों बाद यहाँ कोई नहीं
 
मीलों
उजाड़ पसरा  है।
समय
 मिटा देता है ऐशो आराम के सब निशाँ
क्रूरताओं
की मिसालें।
तुम
नहीं
, कोई
महफ़िल नहीं
तुम्हारा
कोई नाम भी नहीं
सिवाय
उन कब्रों के
 जिनमें
तुम्हारे नन्हें बच्चे
, नौजवानऔर औरतें
जाने
कबसे सो रहे हैं
हमने
कभी नहीं जगाया उन्हें।
पृथ्वी
के नियम इंसान तय नहीं करता
तुम्हारी
हर इमारत हमारी प्रकृति की गिरफ्त में है
 
नंगी
इमारतों में छत के बिना
 
आसमान
घुसा चला आया है
दरों
-दीवार पेड़ों ने कब्जा लिये हैं
मिट
रहीं इमारतों में दिखती हैं पेड़ों की जड़ें
जड़ों
में और -और फूट आईं जड़ें
अनगिनित, अंतहीन 
धरती
जैसे अन्यायी को सजा देने निकली।
धरती
का सब क्रोध
,  पीड़ा
के उफान को लिए
जड़ें
चढ़ती चली आ रही हैं
फ़ैल
गईं हैं रास्तों में
खा
गई तुम्हारी महफिलों के हर नक्श
 
जमीन
फोड़कर चिल्लाती बढ़ी चली आ रही हैं
जाने
कबसे।
शायद
ये प्रतिशोध है
तुम्हारी
बर्बर क्रूरताओं से भी सघन
तुम्हारे
अट्टहास के मुकाबिले शांत
पर
भीतर की घुटन और गुबार को पटकता
बरसों
जो दफन रहा धरती के दिल में
तमाम
क्रंदन फ़ैल गया चहुँ ओर।
हाय!
तुम अपनी सम्पूर्ण यशगाथाओं के संग
अमर
नहीं हुए…
धरती
, फोड़ दी
गयी आँखों का सपना लेकर
दोबारा
जन्मी है।
मुझे
लगता है
धरती
भी जैसे समय है
वो
हर ताकत को
जो
दम्भ मेंफूली इतराती है
उसकी
माकूल जगह दिखाती है।
4   कालापानी
तीन
दीवारों पर आज तलक
चिपकी
हैं पीड़ा की अनन्त गाथाएं
काई
सनी दीवारों की पतली ईंटों के बारीक सुराखों
के
बीच से
 
सर
उठाते हैं अनगिनत चेहरे
चेहरे
बोलते नहीं
बोलती
हैं चुप्पियां।
पानी
में रात भर डुबोई बेंत से
पीठ
पर बही आई लहू की नदियां
रात
को बेतरह चीखती हैं ।
लोहे
की मज़बूत सलाखों के सामने भी
सिर्फ
दीवारें ही दीवारें
जख्म
सहलाना तो दूर
, उनकी
आवाज़ भी नहीं
 
पहुंचती
कहीं।
सुबह
से कोल्हू में तेल पिराती उँगलियों
 
की
समुद्र तल से उठती कराह
आदमी
के दुस्साहस की मिसाल ही तो है ।
आदमी
जिसे खत्म करने को आदमी आमादा है
वो
ज़िंदा मौत का परवाना रोज़ निकालता है
अट्टहास
करता है इंसानों के टूट जाने पर
आदमी
के अपमान की
 
सैकडों
कहानियां यहाँ दर्ज हैं।
इस
इतिहास पर गर्व करता है जालिम।
इंसान
बेशर्मी से
 
जिंदा
रहकर करता है
नाफ़रमानी।। 
5 दो रंग
तुम्हारे
मन का हरा रंग
 
मेरे
मन पर पड़े बेजान पीले पत्ते बुहार देता है
तुम्हारी
उभरी नसों की नीलाई
कौंध
कर मेरे दिमाग में बन जाती है विचार
तुम्हारी
रक्ताभ हथेलियाँ
 
जब
थाम लेती हैं मेरी बाहें
खिल
जाता है विराट इंद्रधनुष।
रंगों
की इस दुनिया में
एक
रंग तेरा
एक
रंग मेरा
मिलकर
खिला देते हैं हज़ारों रंग।
ये
रंग मिलकर न जाने कहाँ से ले आते हैं
ढेर
सा उजाला
हंसी
की खनक।
कैसे
आँखों में उतर आती है
चिरकाल
से बहती कोई अजस्र धार।
 तब
हमारे सपनों की दुनिया के रंग
अचानक
कुछ
और चटख हो जाते हैं।।  

प्रज्ञा की किताब ‘नाटक से संवाद’ का लोकार्पण

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2017 के विश्व
पुस्तक मेले के दूसरे दिन
8 जनवरी को अनामिका प्रकाशन से आई
डॉ प्रज्ञा की किताब
नाटक से सम्वादका
लोकार्पण हुआ.  नाटक पर केंद्रित डॉ
प्रज्ञा की यह तीसरी किताब है। किताब का लोकार्पण स्वराज प्रकाशन के स्टाल पर हुआ।
शीर्षक की प्रामाणिकता को पुस्तक के लोकार्पण में भलीभाँतिपूर्वक देखा जा सकता
था.इस अवसर पर दो वरिष्ठ नाट्यचिन्तक-डॉ प्रताप सहगल
, प्रो
देवेंद्रराज अंकुर ने विस्तार से अपनी बात नाटक और प्रज्ञा की नाट्य आलोचना दृष्टि
पर केंद्रित की।  कार्यक्रम का संचालन डॉ
राकेश कुमार ने किया। सम्वाद की शुरुआत नाटककार-आलोचक प्रताप सहगल जी ने की।  जिसमें उन्होंने पुस्तक की विषयगत विविधता
जैसे- बाल रंगमंच
, नुक्कड़ नाटक, अस्मिता
रंगमंच
, अभिनेता व नाटककार के साथ सम्वाद और नाट्य संस्थाओ
की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की. उन्होंने किताब के आने को एक घटना के रूप में
लेते हुए कहा कि “नाटक पर केंद्रित किताबें कम हैं और अच्छी किताबें बहुत कम
हैं। उसमें प्रज्ञा की किताब सुचिंतित तरीके से
,रंग दृष्टि
से और मंजी हुई भाषा में लिखी गई किताब है।” उन्होंने
माधवी
और नाटककार विजय तेंदुलकर पर आधारित लेखों को बेहद जरूरी
बताया।  प्रसिद्ध रंगकर्मी और रंग चिन्तक
देवेंद्र राज़ अंकुर जी ने डॉ  प्रज्ञा के
नाटक की दृष्टि से किये गए  पहले के कामों-
में नुक्कड़ नाटक की स्थापना को लेकर लिखा गया पुस्तक
नुक्कड़
नाटक: रचना और प्रस्तुति
तथा नुक्कड़ नाटक संचयन जनता के बीच जनता की बातसरीखे मह्त्वपूर्ण कामों
के लिए बधाई दी. उनके सम्वादों में रंगमंच की एक चिंता साफ झलक रही थी कि नाटक और
उसके मंचन के बारे में जो पढा-लिखा तथा शोध किया जा रहा है वह बेहद सतही होता है.
जिसमें हम नाटक पर काम तो करते हैं लेकिन अपने किताबों  से निकल रंगमंच की दुनिया को देखने की जहमत भी
नहीं उठा पाते. नाटकों की समझ को पुख्ता बनाने के लिए जरुर रंगमंच की चार दीवारी
में प्रवेश करना होगा तभी रंगकर्म पर सार्थक लिखा-पढा जाना सार्थक हो पायेगा. इस
दृष्टि से उन्होंने प्रज्ञा के काम का मूल्यांकन विश्वविद्यालयों की दृष्टि से
बाहर रंगमंच की दृष्टि के भीतर माना। उनका कहना था प्रज्ञा  का काम उसी सार्थकता की तलाश है और उम्मीद है
इसी तरह वे अपना सम्वाद नाटकों से हमेशा कायम रखें.  उन्होंने ये भी कहा कि “अब तक नाटक में
सम्वाद की बात होती थी प्रज्ञा ने नाटक से सम्वाद की बात की है। दोनों वरिष्ठ
रंगकर्मी ने
माधवीऔर विजय तेन्दुलकर
पर लिखे लेख की प्रशंसा की. अस्मिता नाट्य संस्था के अरविन्द गौड़ जी से रंगमंच के
बारे में तथा पुस्तक के बारे में बातें हुई.
इस अवसर पर वरिष्ठ
साहित्यकार जयप्रकाश कर्दम
, रमेश उपाध्याय ,प्रेम जनमजेय के अलावा कवि-व्यंग्यकार लालित्य ललित , नामदेव  और स्वराज प्रकाशन के अजय
मिश्रा ने भी प्रज्ञा को अपनी शुभकामनाएं दीं। प्रेम जनमेजय जी ने कहा
“प्रज्ञा की क्षमताओं पर मुझे पूरा भरोसा है। इनसे बहुत अपेक्षाएं हैं। नाटक
पर लिखते रहने के साथ ये कहानियां लिखना कभी न छोड़ें।”
इस अवसर पर नामदेव, राज बोहरे,अपराजिता,संज्ञा
उपाध्याय
, अंकित, विकास, मनीषा ,राजीव, बरखा,साजिद, देवेश, दीपक, ललिता जैसे रचनाकार, शोध छात्र और युवा रंगकर्मी भी
मौजूद थे। मेले के माहौल में भी इस गम्भीर कार्यक्रम के समापन पर प्रज्ञा ने सबका
आभार व्यक्त करते हुए कहा-” मैं विश्वास दिलाती हूँ नाटक से सम्वाद की मेरी
यात्रा चलती रहेगी और मुझे भरोसा है इस किताब को पढ़कर आप भी मुझसे सम्वाद करेंगे।
 
प्रस्तुति

राजीव कार्तिकेय

पेरियार ललई के सन्दर्भ में एक दुर्लभ जानकारी: धर्मवीर यादव गगन

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पेरियार ललई के सन्दर्भ में एक दुर्लभ जानकारी….

पेरियार ललई के गाँव के लोग बता रहे हैं कि वे अछूत भेदभाव, जातिवाद और ब्राह्मणवाद के खिलाफ लड़ने वाले महान व्यक्तिव थे l उनका सपना मानवतावादी समतामूलक समाज की स्थापन का था l सुबह जब मैं लोगों के साक्षात्कार लेने के लिए पेरियार ललई के घर से निकल रहा था तब लोगों ने मुझे बताया कि आप आज मोहर सिंह के पास जाईए l उनसे बात कीजिये l वे उनके बारे में विस्तार से बताएँगे l मैं वहां गया l उन्होंने बात शुरू होते ही माथे पर हाथ रख लिया और कहा पेरियार ललई जैसा महान व्यक्तित्व मैंने आज तक नहीं देखा l ऐसा अद्भुत मनुष्य जो बिरला है l खोजने पर भी नहीं मिलेगा l जीवन और समाज के प्रति इतना ईमानदा, प्रीतिबद्ध व्यक्तित्व की आप पूछिये मत l वे सबसे अधिक जातीय छुआछूत के खिलाफ लड़ते थे l पेरियार ललई के समय भंगी मंगली प्रसाद का एक परिवार था l जिनकी जाति वाल्मीकि थी l जिनसे सभी जाति के लोग अछूत भेदभाव का व्यवहार करते थे l यहां तक कि मुसहर, पासी, चमार और अहीर आदि सभी जातियों के लोग उनका छुआ पानी नहीं पीते थे उनके बर्तन में भोजन नहीं करते थे l अपने कुंआ से कभी भी पानी नहीं भरने देते थे l उन्हें दूर रह कर पानी को प्राप्त करना होता था l इस अछूत व्यवहार के खिलाफ पेरियार ललई जैसे युद्ध लड़ रहे थे l उन्होंने एक रोज कहा मंगली प्रसाद तुम अब किसी की थाली में मत खाओ l किसी के कुंए से पानी मत भरो l जो भी तुमको अछूत बोले तुम भी बोलो कि तुम अछूट हो इसलिए मैं तुम्हारे बर्तन में पानी नहीं पिता, तुम्हारे कुंएं से पानी नहीं भरता हूँ l इस पर मंगली प्रसाद ने उनसे कहा मेरे पास तो कुंआ ही नही है तो मैं कहाँ से पानी भरूंगा और कैसे अछूत कहूँगा l पेरियार ललई ने कहा कल से तुम्हारे घर के सामने कुंआ की खुदाई शुरू हो जायेगी और उन्होंने कुछ समय बाद एक कुँआ खोदवा दिया गया l कुंआ काफी अच्छा और गहरा था l एक बार हुआ ये कि जबरदस्त अकाल पड़ा बहुत सारे कुंएं सूख गए l गाँव के सवर्ण अपने कुंएं से किसी को पानी नहीं भरने दे रहे थे l इस पर गाँव के मुसहर, पासी, अहीर और चमार आदि जातियों के लोग भागे भागे कुंएं की तरफ बढ़ने लगे जिस पर पेरियार ललई ने मंगली प्रसाद को ललकारते हुए कहा मंगलिया आज लाठी लेकर कुंएं पर खाड़ा होने का समय आ गया है l इस पर मंगली प्रसाद ने कहा– अरे दिवान जी झगड़ा मेरे बस का नहीं है l इस पर दीवान पेरियार ललई ने कहा तो तुम्हारे बस में मुर्दों की तरह जिंदा रहना है l ले ये पकड़ लाठी मैं आज दो लाठी लेकर आया हूँ l मंगली और पेरियार ललई कुएँ की जगती पर पगड़ी बाँधकर सीना तान के खड़े हो गए और पेरियार ललई ने मंगली प्रसाद से कहा कि मंगलिया बोल कि कोई मुसहर, पासी, चरमा और अहीर या कोई भी मेरे कुएँ को छूना नहीं मेरा कुंआ अछूत हो जायेगा l मैं तुम लोगों से स्वच्छ व्यक्ति हूँ l मुझे और मेरे कुंएं को छूना नहीं l सभी अछूतों खबरदार !! मंगली प्रसाद ने इसी तरह गरजते हुए सारी बातें दोहरा दिया और पानी किसी को भी नहीं भरने दिया l सभी लोग डर के मारे दबे पाँव वापस जाने लगे l एक बुजुर्ग व्यक्ति ने पीछे मुड़ते हुए कहा हम सब अब कभी भी ऐसा व्यवहार नहीं करेंगे पानी भर लेने दो बच्चे प्यासे हैं l इस पर पेरियार ललई ने कहा अब ये अनुमति मंगली ही दे सकते हैं l बुजुर्ग के हाथ जोड़ते इस अनुरोध के बाद मंगली प्रसाद ने पानी लेने की अनुमति दे दी l उस दिन से उनके प्रति लोगों का व्यवहार एकदम बदल गया l पेरियार ललई मंगली के घर उठते बैठते थे l मंगली की पत्नी जब खाना बना लेतीं तो पहुँच जाते और कहते अरे हमको पहले खिलाई मंगली को बाद में l उन्हीं की थाली में मंगली और पूरे परिवार के साथ बैठ कर खाना खाते l उसके बाद अपने खाये हुए अन्न का हिस्सा अपने घर से लाकर ध्यान से मंलगी को दे देते l कई बार मंगली प्रसाद को अपने साथ अपने घर लाकर अपनी ही थाली में खाना खिलाते थे l इस तरह का था पेरियार ललई का अछूत भेभाव, जाति के खिलाफ लड़ते हुए मानवतावादी समता मूलक समाज बनाने का सपना l 
नोट– 1– गाँव में पेरियार ललई को लोग दिवान जी कहते हैं l
2– फोटो में मोहर सिंह यादव और उनकी बेटी किरण सिंह यादव हैं l ये पेरियार ललई के साथ लंबे समय तक रहे हैं l
3– कुछ दलित जातियों का नामोल्लेख करने के क्रम में इन शब्दों का प्रयोग साक्षात्कारदाता के हैं l मैं इस पद का प्रयोग नहीं करता हूँ l यहां अछूत जातियों की व्याख्या की अत्यंत आवश्यक थी l इसलिए इस पद का प्रयोग किया गया है l अगर किसी भी व्यक्ति की भवना इससे आहत होती है तो उसके लिए पूर्व ही सॉरी बोलता हूँ l

पूर्वोत्तर भारत के पर्व-त्योहार

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four person boating on body of water
Photo by Amit Jain on Unsplash

पूर्वोत्तर भारत के पर्व-त्योहार

मोन्यू त्योहार (Monyu Festival)फोम नागालैंड की एक प्रमुख जनजाति है I यह समुदाय चार प्रमुख त्योहार मनाता है जिसमें मोन्यू सबसे महत्वपूर्ण है I अन्य त्योहार हैं – मोहा, बोंगवुम और पांगमो I मोन्यू 1-6 अप्रैल को शरद ऋतु की समाप्ति और ग्रीष्म ऋतु के आरम्भ में मनाया जाता है I यह बारह दिवसीय त्योहार है जिसमें सामुदायिक भोज, नृत्य, गीत का आयोजन किया जाता है I इस अवसर पर साफ–सफाई और पुल आदि की मरम्मत भी की जाती है I इस त्योहार में पुरुष अपनी विवाहित पुत्रियों के प्रति स्नेह और सम्मान का प्रदर्शन करने के लिए मदिरा और अन्य विशेष व्यंजन प्रस्तुत करते हैं I त्योहार आरम्भ होने के पूर्व विशेष धुन पर पारंपरिक लॉग ड्रम बजाय जाता है ताकि ग्रामवासियों को ज्ञात हो जाए कि एक–दो दिनों में त्योहार की शुरुआत होनेवाली है I पुजारी और गाँव के बुजुर्ग भविष्यवाणी करते हैं कि यह त्योहार ग्रामवासियों के लिए वरदान सिद्ध होनेवाला है अथवा अभिशाप I

आओलियंग त्योहार (Aoleang Festival)आओलियंग नागालैंड की कोन्यक जनजाति का एक प्रमुख त्योहार है I प्रत्येक वर्ष 1-3 अप्रैल को इस त्योहार का आयोजन किया जाता है I नए खेत में बीज बोने के बाद यह त्योहार मनाया जाता है। यह पुराने वर्ष की विदाई और नए वर्ष का स्वागत करने का त्योहार है । इस त्योहार के अवसर पर भरपूर फसल व धन–धान्य के लिए ईश्वर से प्रार्थना की जाती है। इस त्योहार का आयोजन अत्यंत धूमधाम और उत्साह के साथ किया जाता है। इस त्योहार के प्रत्येक दिन का अपना महत्व, रीति रिवाज और परंपरा है। यह त्योहार प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी प्रतिबिंबित करता है I इस त्योहार के अवसर पर कोन्यक जनजाति के स्वदेशी नृत्य, गीत और खेल का प्रदर्शन किया जाता है । त्योहार के पहले दिन को “मान लाई याह नइह” के नाम से जाना जाता है जो त्योहार की तैयारी करने का दिन है। “यिन मोक फो न्यह” त्योहार का दूसरा दिन है I इस दिन नए युवकों को शिकार करना सिखाया जाता है । जिस दिन शिकार किए गए जानवरों को मारा जाता है वह त्योहार का तीसरा दिन है I इस दिन को “यिन मोक शेक न्यह” कहा जाता है। त्योहार का चौथा दिन सबसे महत्वपूर्ण दिन है जिसे “लिंग्यु न्यह” कहा जाता है । “लिंग न्यह” त्योहार का पाँचवाँ दिन है I इस दिन कोन्यक समुदाय के युवा अपने बुजुर्गों का सम्मान करते हैं और उनके प्रति अपना आभार व्यक्त करते हैं । त्योहार के अंतिम दिन को “लिंगशान न्यह” कहा जाता है I इस दिन घरों और गाँवों की साफ़-सफाई की जाती है I