प्रवासी परिधि में स्वदेशी चकाचौंध (तेजेंद्र शर्मा की कहानियों के बहाने ): डॉ राजेश श्रीवास्तव, भोपाल (म०प्र०)
प्रभा खेतान के छिन्नमस्ता उपन्यास में स्त्री विमर्श
प्रभा खेतान के ‘छिन्नमस्ता’ उपन्यास में ‘स्त्री विमर्श’
अनुक्रम
गढवी योगेशकुमार गणपतदान
स्वदूर विला सोसायटी मकान
नं-५ पदमनाथ चौकड़ी,
चाणस्मा हाईवे पाटन,
तहसिल / जिल्ला – पाटन
मो -९८७९३११९६३
शोध सारांश
नारी विमर्श को अंग्रेजी में ‘फेमिनिज्म ‘कहां गया है। पश्चिम के विद्वान इस्टेल फ्रडमैन ने निम्न शब्दों में परिभाषित किया है। “नारी विमर्श यानी पुरुष एवं स्त्री सम महत्व रखते हैं । अधिकांश समाजों में पुरुष को वरीयता देते हैं।स्त्री पुरुष समानता के लिए सामाजिक आंदोलन जरूरी है।क्योंकि लिंगा धारित अंतरअन्य अतः सामाजिक परंपराओं में प्रवेश करता है।जो हो यह निश्चित है कि यह चिंतन अन्याय के विरुद्ध है। भारत की संस्कृति मे जब भी कहीं नारी ने अपने विचार के लिए सिर उठाया तो उसे पश्चिमी सोच समझ कर टाल दिया गया। आज हम प्रभा खेतान जीके ‘छिन्नमस्ता ‘उपन्यास में नारीविमर्श या चिंतन किया है।प्रभा खेतान जीने अपने साहित्य के माध्यम से समाज में चेतना लाने की बात की है।उन्होंने स्त्री को पुरुष के समान दर्जा दिलवाने के लिए अनेक कहानी उपन्यास की रचना की है।
बीज शब्द: स्त्री विमर्श, फेमिनिज़्म, पश्चिम, साहित्य
शोध आलेख :
हिंदी साहित्य ने इस युग मे बहुत से दबे हुए स्वर को उदघोषित किया है। हिन्दी साहित्य ने अनेक विधाओं पर अपनी सशक्त लेखनी चलाई है। आजके आधुनीक युग में विमर्श की लेखनी ज्यादातर लीखी जा रही है। उसमें दलित विमर्श आदिवासी जाती के उत्थान में विमर्श पिछड़े हुए समाजके प्रति उदघोषकेश्वर ज्यादातर दिखाई देते हैं। आज नारी विमर्श की बात कर रहे हैं तो नारी विमर्श या यानी स्त्री विमर्श की बात यह विमर्श मैं स्त्री को केंद्र बिंदु रहकर आंदोलन जरिए स्त्री अस्मिता मुल्कसाहित्य की रचना की जाए उसे नारी विमर्श या स्त्री विमर्श कहा जाता है। नारी विमर्श को अंग्रेजी में ‘फेमिनिज्म ‘कहां गया है। पश्चिम के विद्वान इस्टेल फ्रडमैन ने निम्न शब्दों में परिभाषित किया है। “नारी विमर्श यानी पुरुष एवं स्त्री सम महत्व रखते हैं । अधिकांश समाजों में पुरुष को वरीयता देते हैं।स्त्री पुरुष समानता के लिए सामाजिक आंदोलन जरूरी है।क्योंकि लिंगा धारित अंतरअन्य अतः सामाजिक परंपराओं में प्रवेश करता है।जो हो यह निश्चित है कि यह चिंतन अन्याय के विरुद्ध है। ” -> इस्टेल फ्रेडमेन
भारत की संस्कृति मे जब भी कहीं नारी ने अपने विचार के लिए सिर उठाया तो उसे पश्चिमी सोच समझ कर टाल दिया गया। आज हम प्रभा खेतान जीके ‘छिन्नमस्ता ‘उपन्यास में नारीविमर्श या चिंतन किया है।प्रभा खेतान जीने अपने साहित्य के माध्यम से समाज में चेतना लाने की बात की है।उन्होंने स्त्री को पुरुष के समान दर्जा दिलवाने के लिए अनेक कहानी उपन्यास की रचना की है।
कवियत्री का नारी दर्शन :
प्राचीन समय में भी नारी नें पुरुष समाज के समक्ष अपना वैचारिक द्रोह व्यक्त किया है।उस समय चल रही पुरुष समाज ने अपने बने बनाए नियमों उसके वर्चस्व को स्त्री की अपनी निरिहता के विवशता के कि वह अपने कोउसको जकड़ने से उनकी रुढीयो विपरीताओ के प्रती अपनी आवाज बुलन्द की है। प्रभा खेतान जी नें अपने ‘ छिन्नमस्ता ‘उपन्यास में स्त्री वेदना केा उभारा है । आप महाभारत से लेकर रामायण काल तक स्त्री केा लज्जा के दायरेसंस्कार की दुहाई देकर शोषण किया गया है । तब भी द्रौपदी ने अपनी पांच पति एवं सभा के सभी सदस्यों को फटकार लगाई है । स्त्री को समझना बहुत जरूरी है उसकी भी बहुत सी उम्मीदें भावना पर चोट लगती है तब विमर्श के स्वर बहते हैं । पुरुष प्रधान समाज की कठपुतली नहीं है स्त्रीउसके अनेक रूप है कहीं वह मां के रूप में है कहीं पत्नी के रूप में सदा वात्सल्य ही उसका प्रयोजन रहा है उसकी मासूमियत को जब चोट पहुंचाई जाती है तभी समाज में क्रांति के स्वर गूंजते हैं इस स्वर को पकड़कर लेखिका ने स्त्री पीड़ा कोसमाज तक पहुंचाने का सघन प्रयास किया है । प्रभा जी का जन्म 1 नवंबर 1942 में हुआ था उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एम.ए. की डिग्री हासिल की ज्या पार्ल सार्त्र के अस्तित्व पर पी.एच . डी की उपाधि हासिल की -उन्होंने अपनी 12वर्ष की उम्र से ही साहित्य साधना में लग गई उनकी पहली रचना सुप्रभात में छपी थी हिंदी साहित्य की विलक्षण बुद्धि जीव उपन्यासकार कवियत्री नारीवादी उद्घोषक तथा समाजसेवी रही है।कोलकाता चेंबर ऑफ कॉमर्स की वह पहली महिला अध्यक्ष रहे।स्त्री विमर्श को केंद्र में रखकर लिखने वाले नामांकित लेखकों में से एक डॉ .प्रभा खेतान थे।
डॉ प्रभा खेतान जी ने समाज में आंखें देखी एवं कानों सुनी सभी परिस्थितियों को अभिव्यक्त किया है । स्त्री विमर्श यानीपुरुष प्रधान समाज के द्वारा लैंगिक भेदभाव से स्त्री शोषण के खिलाफ किया गया आंदोलन जिसमें प्रभा खेतान जी ने अपने विचारों की अभिव्यक्ति की है।
प्रभा खेतान जी के उपन्यास छिन्नमस्ता में स्त्री विमर्श :
प्रभा खेतान जी के छिन्नमस्ता उपन्यास में पितृसत्तात्मक समाज मेजो स्त्री को चार दिवार ही उसकी दुनिया है उसमें से पिछड़ी हुई नारी को नई दुनिया नए विचार प्रदान किए हैं । चार दिवार के बाहर भी विशाल विश्व हैस्त्री को इस खोखले समाज ने चार दिवार में ही उसका जीवन है यह समझ देकर चुप करा दिया थावह नारी उसने आधुनिक एवं पाश्चात्य रूप में विद्या के कारणस्त्री ने अपना नारी अस्तित्वएवं स्त्री शक्ति का जयघोष किया । पितृसत्ता को सदा ही जय भय रहता था कि वह स्त्री सत्ता से पराजित हो न जाए स्त्री को उन्होंने लज्जा एवं संस्कार के दायरे देकर स्त्री के अपने विचार को कभी फर्स्ट एवं सहज समझा ही न है । स्त्री अपना जीवन भोजन पकाना एवं घर की जिम्मेदारी को उठाना ही उसका सर्वस्व बन गया है आज आधुनिक नारी शिक्षा एवं कानून से परिचित हुई है और उसने अपने प्रति होने वाले अत्याचार शोषण यौन शोषण मानसिक विडंबना के खिलाफ आवाज उठाई है । स्त्री विमर्श यानी स्त्रीशोषण अत्याचार जैसेसभी उत्पीड़न के सामने स्त्री की पैरवी कर उसे न्याय दिलाना उसके वास्तविक अधिकार को दिलवाना जब स्त्री विमर्श यानी स्त्री के साथ विमर्श जुड़ने से यह तात्पर्य है कि स्त्री वहां मध्यस्थान रखकरया केंद्र रूप रखकर उसकी समाज या परिवार में उपेक्षा एवं अवमानना के कारणों की सघन जांच करना या उसकी अवमानना करने का कारण क्या है यह प्रश्न समाज से पूछना स्त्री विमर्श यानी पुरुष समाज के द्वारा लाजित किए हुए मूल्य पर प्रश्न उठा कर सचोट और कटाक्ष कर स्त्री को पुनः जागरण के लिए जागृत करना । स्त्री विमर्श के माध्यम से पुरुष समाज के द्वारा स्त्री पर हो रहे दुराचारहिंसा प्रहार एवं शोषण करने वाली मानसिकता पर विचार करता है । आज आधुनिक युग में स्त्री पुरुष प्रधान समाज को चुनौती देकर उनके अस्तित्व को बरकरार रखने का प्रयत्न कर रही है । यही प्रधानता छिन्नमस्ता उपन्यास में स्त्री विमर्श की बात को सचोट प्रिया के माध्यम से समझाया गया है । स्त्री पर बहुत शोषण अत्याचार के प्रति प्रिया अपना सिर तानकर खड़ी है । रब्बा खेतान जी ने भी बहुत ही सघन रूप में समाज की अभिव्यक्ति स्पष्ट की है । समय ने करवट बदली है उसी प्रकार लेखन की परिस्थिति बदल रही है। कई सदियों से अपेक्षित वंचित शोषित नारी आज अपने अधिकार के लिए लड़ना सीख गई है । नारी ने अपनी सदियों की चुप्पी को तोड़ा है । पुरुष प्रधान समाज ने चाहा हुआ रूप बिल्कुल अपनाया था स्त्री ने उस चोले को निकालकर दहाड़ नई चेतना रूपी आज के युग अनुरूपनए मूल्यों के अनुसार नारी विमर्श था के स्वरूप कलम चली है । उसमें प्रभा खेतान जी नारी चेतना एवं विमर्श था पर अपनी सशक्त लेखनी चला रही है । स्त्री लेखन की प्रक्रिया सुधरी परंपरा रही है और वह लंबी यात्रा के बाद प्रभा जी के पास मुदित हुई है । श्री के स्वतंत्र अस्तित्व की और उंगली निर्देशन कर रही है उसे घोर निंद्रा के द्वारा उखेड़ रही है । प्रभा जी ने साहित्य जगत में स्त्री की आर्थिक स्थिति संघर्ष को समझ कर कड़वे अनुभवो को बडे संघर्ष को बडे ही सींदत से उठाया गया है । प्रभा जी ने अपने जीवन अनुभव का आईना उनके साहित्य में दिखाई देता है । उनके साहित्य में काल्पनिक का से ज्यादा वास्तविकता दिखाई पड़ती है । प्रभाजी स्त्री विमर्श एवं स्त्री मुक्ति की पैरवी करती हैं । जगत में पुरुष प्रधान समाज के रूबी चुस्त एवं घटिया किस्म के नियम निधान से नारी विमर्श का स्वर उन्होंने छिन्नमस्ता उपन्यास में वर्णित किया है उनके निजी जीवन में घटित घटनाओं एवं अनुभव के द्वारा घिसी पिटी परंपराओं का विरोध किया है और स्त्री जाति को विशिष्ट सम्मान प्रदान किया है ।
‘छिन्नमस्ता ‘ में स्त्री विमर्श के आलाप :
हिंदी साहित्य जगत में प्रभा खेतान जी का कथा साहित्य में उनकी ईमानदारी अनेक स्तरों पर दिखाई पड़ती है । ‘छिन्नमस्ता में विश्व की नारी का जीवनविडंबना का चित्रण है । छिन्नमस्ता में उच्च वर्ग एवं सामंतवादी व्यवस्था की खोखले पन को बहुत ही फिटकारा है । इस उपन्यास का क्षेत्र मारवाड़ी संपन्न परिवार है उसके इत्र गिद्र रचा गया है यह व समाज है जो सब्जी मंडी की तरह अपने बेटे या लड़के को बेचते या खरीदते हैं इस कूरीवाज की शिकार खुद प्रभा जी भी हुई है । छिन्नमस्ता उपन्यास साधारण स्त्री प्रिया के जीवन संघर्ष एवम् असाधारण संघर्षों की गाथा भी कहा जा सकता है । स्त्री विमर्श की प्रमुख पक्षधर रही लेखिका ने नायिका प्रिया के माध्यम से स्त्री जीवन की पीड़ा को दर्द को महसूस क२आलेखा है । हमारे देश एवं समाज की सामंती अर्थ-व्यवस्थाधर्म एवं इज्जत की आड़ में रखकर स्त्री की शोषण प्रक्रिया की गई है । साधारण स्त्री लगने वाली प्रिया अपनों के बीच ही पराया पन महसूस करती हैं । किंतु कहीं भी हिम्मत न हारकर स्त्री विमर्श का जयघोष कर अपने न्याय के लिए लड़ती हैं प्रिया जो स्त्रीपात्र में छिन्नमस्ता मेंप्रमुख नायिका के रूप में अपनी महत्वाकांक्षा का दामन छोड़ती नहीं है । और अंत तक पूर्ण जिजीविषाके साथ वह एक सफल व्यवसायिक बनकरअपना जीवन व्यतीत करती है । जब अपने से ज्यादा व्यवसायिक दौर में ऊपर उठी प्रिया को देखकर बिजनेस में आगे बढ़ने के कारण जब समाज के खोखले आडंबर को छोड़ प्रिया स्त्री अधिकार की बात करती है तब उसकी आजादीसहन ना हो पाने के कारण नरेंद्र प्रिया से गुस्से से कहता है कि -“यह मत भूलो प्रिया कि मैं पुरुष हूं इस घर का कर्ता । यहां मेरी मर्जी चलेगी :हां सिर्फ मेरी ! ” ( छिन्नमस्ता – प्रभा खेतान पृ – 13 ) इस उपन्यास के माध्यम रूप प्रिया ने संघर्षों की और पीड़ा की कहानी नहीं किंतु समाज में स्त्रियों के उत्पीड़न एवं अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की बात करता है । उच्च वर्ग एवं सामंत शाही परिवार जो मर्यादा एवं इज्जत को खोखला पन बेनकाब किया है । स्त्री यदि दहलीज के उस पार जाए तो पुरुष प्रधान उसे लज्जा समझता है । किंतु एक पत्नी होने के बावजूद वह किसी भीस्त्री से संबंध जो अवैधीक है वह रखे तो जायज है । वह लैंगिक भेदभाव को इस उपन्यास में प्रभा जी ने प्रिया नामक नायिका के माध्यम से कोचा एवं सशक्त लेखनी के द्वारा विरोध किया है । “पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री और पुरुष दोनों ही उत्पादन में लगे हुए हैं लेकिन पुरुष सता ने एक खास उत्पादन पद्धति को अपनाया हुआ है पुरुष जो कुछ करता है उसकी कीमत आंकी जाती है । इसलिए उसकी पहचान और अस्मिता विशिष्ट मानी जाती है । दूसरी और स्त्री श्रम का मूल्यांकन नहीं हुआ । यह मूल्यांकन पुरुष ने मनमाने ढंग से किया है । ” ( प्रभा खेतान – स्त्री धर्म और परंपरा – पृ – 52 ) इस उपन्यास का पुरुष पात्र नरेंद्र हो या नरेंद्र का पिता विजय हो जो तिलोत्तमा की मांग में सिंदूर तो भरता है मंगलसूत्र पहनाता है । किंतु समाज एवं जिंदगी में उसे पत्नी के रूप में हाथ थामना नहीं चाहता उसमें उसे झिझक एवं शर्म महसूस होती है उसे आजीवन उसके रखैल का जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर किया जाता है इसी प्रकार उपन्यास स्त्री प्रधान नायिका प्रिया की नानी दूसरी मामी छोटी मां एवं एस आराम की जिंदगी प्रसार करने वाला नरेंद्र कि हर महीने बदलने वाली सेक्रेटरी यह सब स्त्री या शोषित रूप में दिखाई देती है । सबसे को खुलापन यह है कि स्त्रीकों अपनों ने ही प्रताड़ित किया है । स्त्री – स्त्री जाति की दुश्मन बनी हुई है । साडे 9 वर्ष की उम्र में ही प्रिया जब अपने ही बड़े भाई के द्वारा हवस का शिकार बनती हैं तब उसके मानसिक तनाव का अंदाजा भी पुरुष समाज नहीं लगा सकता । जब प्रिया सदियों से चल रही घिसी पिटी प्रथा एवं रिवाज का खंडन करती है तब आग उगला होते हुए नरेंद्र अपनी पत्नी से कहता है कि – “दरअसल तुम्हें इतनी खुली छूट देने की गलती मेरी ही थी । मुझे पहले ही चिड़िया के पंख काट डालने चाहिए थे । ” ( छिन्नमस्ता – प्रभा खेतान पृ – 11 )
इस उपन्यास में सभी स्त्री पात्र अपनी उत्पीड़न को कहे तो भी किसी जहां पुरुष समाज उनके शोषण एवं लूट के लिए तैयार बैठा है एवं स्त्री जाति की चपलता के कारण ही एक स्त्री दूसरी स्त्री सेद्रोणा या इच्छा रखती है पर उनका उनके प्रति सहानुभूति का कोई रूप न देखकर दूसरी स्त्री के शोषण एवं अत्याचार में अपनी हां भर्ती हैं । यदि प्रिया के अत्याचार को उसकी मां बचपन में सुन लेती उसे बचपन में सहानुभूति एवं लाड़ दुलार देती तो मुझे लगता है कि शायद छिन्नमस्ता जैसा उपन्यास लिखा ही न जाता । क्या हुआ समाज है जहां एक पुरुष को तानाशाह में तब्दील कर दिया जाता है और यही तानाशाही वैचारिक ता पत्नी बहन और बेटी को तिरस्कृत करती है । नैतिकता मर्यादा जैसे दिल मिले सब दो की दुहाई देता हुआ पुरुष प्रधान समाज स्त्री को एक बोज वस्तु के अतिरिक्त कुछ नहीं समझा जाता । एवं पुरखो से मिली परंपरागत रूबी का संस्कार है उसके कारण स्त्री की भावना को कहीं कोई चेत ही नहीं दी जाती । केवल स्त्री को पुरुष के पैर की जूतीसमझा जाता है समाज की कोई भी स्त्री या बहन मां हो किंतु इस उपन्यास में नारी की पीड़ा को प्रमुख स्थान दिया गया है । पितृसतावादी समाजमें स्त्री की वंचनायातना को भुगतती है । उसका कच्चा पीठा यहां प्रभा जी ने खोला है । इस उपन्यास में नीना और तिलोत्तमा के माध्यम से हम देख सकते हैं कि पुरुष दोषी होते हुए भी साफ सुथरा दिखाई पड़ता है और स्त्री निर्दोष होने के बावजूद भी सजा भुगत ती है पुरुष प्रधान समाज तिलमिला उठता है उसे लगता है कि अर्थो पाजन उसका जिम्मा है । या अधिकार है इस चित्र में स्त्री कैसे आ सकती है और आप भी जाए तो स्थापित किस प्रकार हो सकती हैंयदि स्त्री अपनी काबिलियत पर स्थापित हो जाए या परिश्रम रंग ला देता हे तो पुरुष समाज को यह जरा भी नहीं भाता इसी बात पर नरेंद्र प्रिया का पति प्रिया को कहता है कि – ‘तू में रुपया ! चाहे ना बोलो कितने रुपए लाख , दो लाख ,करोड़ जब देखो रुपया के पीछे भागती रहती है । लो यह लो !जब अपने से ज्यादा व्यवसायिक क्षेत्र में आगे बढ़े हुए प्रिया को देखकर नरेंद्र उसे कहता है कि तुझे परिवार चाहिए या व्यवसाय इस दोनों में से किसी एक को चुन लें इस प्रकार उसकी प्रगतिके पथ पर कांटे बिछाता है । नरेंद्र प्रिया से कहता है कि “मैं सीरियस हूं । फिर कहता हूं यदि आज तुम लन्दन गई तो मेरे घर में तुम्हारी जगह नहीं । यह भी साली को जिंदगी है ,जब देखो तब बिजनेस । फिर सुन लो ,यहां मत आना आओगी तो मैं धक्के देकर बाहर निकलवा दूंगा । ” ( छिन्नमस्ता – प्रभा खेतान – पृ . 13 )
यह कैसी विडंबना है कि एक स्त्री कितनी यातना एवं विडंबना को सहते हुएअपने अस्तित्व को बरकरार करती हैं तो पुरुष समाज इसको देख तिलमिला उठता है उसके अहंकार को ठेस पहुंचती है । जिसको कभी अपनी बराबरी का नहीं समझा वह नारी शक्ति उसके बराबर कैसे होगी इस संदर्भ में छिन्नमस्ता उपन्यास नारी विमर्श हो प्रबलता से उभारता है । इस उपन्यास के द्वारा वस्तुतः रूप में स्त्री को कंटे बिखरे मार्ग वाह स्वतंत्र अस्तित्व की खोज के लिए लोही लुहान होता दृष्टिकोण प्रदान करता है । स्त्री एवं पुरुष दो सिक्के की एक पहलू है या दोनों पुरुष स्त्री समानता का जयघोष करता है । जब तक स्त्री अपने अन्याय के लिए खुद लड़ना सीखेगी नहीं तब तक उसे न्याय न मिलेगा । जबकि उपन्यास इस बात को बार-बार दोहराता है स्त्री को अपने अस्तित्व का वजूद खुद होना पड़ेगा । इसी संदर्भ में उपन्यास की प्रमुख नायिका यह कथन करती है प्रिया की – ” नीना हम सबको अपनी अपनी लड़ाई अकेले ही लडनी होगी । ” यहां नारी के मान में फिलिप कहता है कि – “प्रिया सम्मान कोई देगा नहीं सम्मान अर्जित करना पड़ता है सम्मान अर्जन के लिए स्त्री पहले आत्मा रूप से आत्मनिर्भर बने । “
प्रिया पुरुष शून्य होकर निरंतर अपनी जिंदगी में आत्मा और समाज से संघर्ष करती हुई परिस्थिति से जूझते हुए अपने मुकाम पर पहुंचती है प्रिया कहती है कि पुरुष पैसा कमाता है वह दो चार लोगों को पाल लेता है जब स्त्री सीमा लग जाती है तो वही परंपरा समाज उसके लिए खत्म हो जाता है । “लेकिन असल रूप में मानव समाज बहुत बड़ा है प्रिया जो स्त्री होकर इस समाज को दे सकती है वह पुरुष होकर भी नरेंद्र नहीं दे सकता । प्रभा जी ने इस उपन्यास में पुरुष समाज का स्वार्थ बेनकाब किया है । प्रिया के माध्यम से प्रभा जी ने सशक्त स्त्री चेतना का चिंतन करवाया है प्रिया कहती है – “मैंने अभी-अभी जीना सीखा है धरती पर मेरी जरूरत के मुताबिक धूप है हवा है पानी है और मैं अपनी इस गति से दौड़ रही हूं । ” दोस्तों इसी गति से पुरुष प्रधान समाज डरा हुआ है स्त्री की यही गति को अटकाने के लिए हीस्त्री के पथ पर रोड़े अटकाता है । स्त्री को समाज के सम्मानित ठेकेदार दरअसल ऐसी घरतोड़ स्त्री कोसजा देने के हक में हैं वे चाहते हैं कि स्त्री को आगे ना बढ़ने दिया जाए । क्योंकि यदि एक स्त्री अपने अधिकार को अपने अधिकार को प्राप्त कर लेगी तो दूसरी औरतें भी न्याय के लिए लड़ने लगेगी और उनके पितृसत्ता की सिहासन खुर्ची एवं सत्ता का क्या होगा इसलिए स्त्री को संवेदना एवं चेतना शून्य बनाए रखना उचित है । समाज की खोखली मर्यादा संस्कार जैसी रूढीता में स्त्री को ही क्यों आहूत किया जाता है । ” सच कहूं नरेंद्र , ये शब्द भ्रम है । औरत को यह सब इसलिए सिखाया जाता है कि वह इन शब्दों के चक्रव्यू से कभी बाहर नहीं निकल पाए ताकि युगो सें चली आती आहुती की परंपरा को कायम रखे । ” ( छिन्नमस्ता – प्रभा खेतान – पृ -12 ) इस उपन्यास में इस और दृष्टिकोण किया हैप्रिया के माध्यम से समाज में नारी जाति को आगे बढ़ने का साहस दिलवाया है । स्त्री स्वतंत्रता के माध्यम से पथरीला मार्ग पर चलना एवं अपने खुद के निर्णय सोचने के लिए प्रोत्साहित किया है । इस दुनिया में अपना अस्तित्व स्थापित कर जयघोष कराना चाहा है उपन्यास में कहा है कि उठो अपनी बाहों को फैलाओ अपने अधिकार की लड़ाई खुद को लड़ने पड़ेगी । आज के युग में स्त्री की सुरक्षा के अनेक प्रश्न दिखाई पड़ते हैं । सूरत में स्त्री की हत्या का केस अभी ही दर्ज हुआ है । क्या यह घर में या घर के बाहर सुरक्षित है कि नहीं इसे दर्शाते प्रिया उपन्यास में कहती है कि “मुझे नफरत है इस पुरुष जाति से नफरत है उनसे जो मासूम छोटी नादान लड़कियों को भी नहीं छोड़ते जन्म से औरऔरत असहाय औरत उसे न पीता छोड़ता है । न भाई अपनी नारी देह मे स्वयं क्षत-विक्षत कर रह जाती हैं। इस दलदल से जिंदगी में क्या कहीं नया पनया बदलाव दिखाई नहीं देता । छिन्नमस्ता उपन्यास तरीके कमजोरी को न तो कहीं छुपाता है न कि उसकी ताकत को दबाता है । वरन बेबाक होकर स्त्री अपने आप को अपने जीवन को समाज के सन्मुख खोलकर सत्यता बताने की हिम्मत करती हैं । इस उपन्यास में स्त्री विमर्श को आवाज दी गई है ।
निष्कर्ष :
निष्कर्षत: छिन्नमस्ता उपन्यास की स्त्री अंधेरे से अधिकार हीन स्त्री को उजाले की और किरण भी दिखाता है । उपन्यास स्त्री जीवन के जख्म एवं दर्द को समाज में मुखिया कराती हैं । वाह चाहती नहीं कि उसके दर्द में कोई भागी हो या कोई जख्म पर मलम लगाए । अपने बाहुबल के द्वारा ही स्वयं अपने जख्म खोलकर अधिकार न्याय की मांग करती है । नैना और प्रिया के माध्यम से प्रिया संकल्प कर कहती है कि “नहीं मैं हार नहीं मानूंगीबड़ी कीमत दूंगी और बड़ी आहुति देखती हूं कोई मेरी उपेक्षा कैसे करता है । मैं जरूरी हूं इस समाज का अपने परिवार का बहुत ही जरूरी खंभा हूँ । ” स्त्री निव का पत्थर है उसके बिना जीवन शक्य नहीं है यही बात धर्म भी बताता है -यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता यानी स्त्री का जहां आदर होता है वही प्रभु का वास होता हैइसी बात को दोहराते हुए स्त्री अधिकार की मोहर प्रभा जी समाज में इस उपन्यास के माध्यम से लगाना चाहती है । इस उपन्यास के माध्यम से पिछड़ी हुई स्त्री को समाज में मान एवं आदर का जीवन जी ने के लिए स्त्री विमर्श को प्रभा जी ने उभारा है । इस प्रकार यह उपन्यास स्त्री चेतना का सघन प्रयास है ।
संदर्भ सूची
1. छिन्नमस्ता – प्रभा खेतान – पृ – 13
2. स्त्री धर्म और परंपरा – पृ 52
3. छिन्नमस्ता – प्रभा खेतान – पृ – 11
4. छिन्नमस्ता -प्रभा खेतान – पृ – 13
5. छिन्नमस्ता -प्रभा खेतान – पृ – 12
प्रदीप त्रिपाठी की पुस्तक ‘कल्पना का पहला दशक’ का लोकार्पण
प्रत्यय अर्थ, परिभाषा, भेद, उदाहरण pratyay
प्रत्यय (Suffix)की परिभाषा
अनुक्रम
- 1 प्रत्यय (Suffix)की परिभाषा
- 2 प्रत्यय के भेद
- 3 कृदंत और तद्धित में अंतर
जो शब्दांश, शब्दों के अंत में जुड़कर अर्थ में परिवर्तन लाये, प्रत्यय कहलाते है।
दूसरे अर्थ में- शब्द निर्माण के लिए शब्दों के अंत में जो शब्दांश जोड़े जाते हैं, वे प्रत्यय कहलाते हैं।
प्रत्यय दो शब्दों से बना है- प्रति+अय। ‘प्रति’ का अर्थ ‘साथ में, ‘पर बाद में’ है और ‘अय’ का अर्थ ‘चलनेवाला’ है। अतएव, ‘प्रत्यय’ का अर्थ है ‘शब्दों के साथ, पर बाद में चलनेवाला या लगनेवाला। प्रत्यय उपसर्गों की तरह अविकारी शब्दांश है, जो शब्दों के बाद जोड़े जाते है।
जैसे- पाठक, शक्ति, भलाई, मनुष्यता आदि। ‘पठ’ और ‘शक’ धातुओं से क्रमशः ‘अक’ एवं ‘ति’ प्रत्यय लगाने पर
पठ + अक= पाठक और शक + ति= ‘शक्ति’ शब्द बनते हैं। ‘भलाई’ और ‘मनुष्यता’ शब्द भी ‘भला’ शब्द में ‘आई’ तथा ‘मनुष्य’ शब्द में ‘ता’ प्रत्यय लगाने पर बने हैं।
प्रत्यय के भेद
मूलतः प्रत्यय के दो प्रकार है –
(1) कृत् प्रत्यय (कृदन्त) (Agentive)
(2) तद्धित प्रत्यय (Nominal)
(1) कृत् प्रत्यय(Agentive):- क्रिया या धातु के अन्त में प्रयुक्त होनेवाले प्रत्ययों को ‘कृत्’ प्रत्यय कहते है और उनके मेल से बने शब्द को ‘कृदन्त’ कहते है।
दूसरे शब्दो में- वे प्रत्यय जो क्रिया के मूल रूप यानी धातु (root word) में जोड़े जाते है, कृत् प्रत्यय कहलाते है।
जैसे- लिख् + अक =लेखक। यहाँ अक कृत् प्रत्यय है तथा लेखक कृदंत शब्द है।
ये प्रत्यय क्रिया या धातु को नया अर्थ देते है। कृत् प्रत्यय के योग से संज्ञा और विशेषण बनते है। हिंदी में क्रिया के नाम के अंत का ‘ना’ (कृत् प्रत्यय) हटा देने पर जो अंश बच जाता है, वही धातु है। जैसे- कहना की कह्, चलना की चल् धातु में ही प्रत्यय लगते है।
कुछ उदाहरण इस प्रकार है-
(क)
| कृत्-प्रत्यय | क्रिया | शब्द |
|---|---|---|
| वाला | गाना | गानेवाला |
| हार | होना | होनहार |
| इया | छलना | छलिया |
(ख)
| कृत्-प्रत्यय | धातु | शब्द |
|---|---|---|
| अक | कृ | कारक |
| अन | नी | नयन |
| ति | शक् | शक्ति |
(ग़)
| कृत्-प्रत्यय | क्रिया या धातु | शब्द (संज्ञा) |
|---|---|---|
| तव्य (संस्कृत) | कृ | कर्तव्य |
| यत् | दा | देय |
| वैया (हिंदी) | खेना-खे | खेवैया |
| अना (संस्कृत) | विद् | वेदना |
| आ (संस्कृत) | इश् (इच्छ्) | इच्छा |
| अन | मोह, झाड़, पठ, भक्ष | मोहन, झाड़न, पठन, भक्षण |
| आई | सुन, लड़, चढ़ | सुनाई, लड़ाई, चढ़ाई |
| आन | थक, चढ़, पठ | थकान, चढ़ान, पठान |
| आव | बह, चढ़, खिंच, बच | बहाव, चढ़ाव, खिंचाव, बचाव |
| आवट | सज, लिख, मिल | सजावट, लिखावट, मिलावट |
| आहट | चिल्ला, गुर्रा, घबरा | चिल्लाहट, गुर्राहट, घबराहट |
| आवा | छल, दिख, चढ़ | छलावा, दिखावा, चढ़ावा |
| ई | हँस, बोल, घुड़, रेत, फाँस | हँसी, बोली, घुड़की, रेती, फाँसी |
| आ | झूल, ठेल, घेर, भूल | झूला, ठेला, घेरा, भूला |
| ऊ | झाड़, आड़, उतार | झाड़ू, आड़ू, उतारू |
| न | बंध, बेल, झाड़ | बंधन, बेलन, झाड़न |
| नी | चट, धौंक, मथ | चटनी, धौंकनी, मथनी |
| औटी | कस | कसौटी |
| इया | बढ़, घट, जड़ | बढ़िया, घटिया, जड़िया |
| अक | पाठ, धाव, सहाय, पाल | पाठक, धावक, सहायक, पालक |
| ऐया | चढ़, रख, लूट, खेव | चढ़ैया, रखैया, लुटैया, खेवैया |
(घ)
| कृत्-प्रत्यय | धातु | विशेषण |
|---|---|---|
| क्त | भू | भूत |
| क्त | मद् | मत्त |
| क्त (न) | खिद् | खित्र |
| क्त (ण) | जृ | जीर्ण |
| मान | विद् | विद्यमान |
| अनीय (संस्कृत) | दृश् | दर्शनीय |
| य (संस्कृत) | दा | देय |
| य (संस्कृत) | पूज् | पूज्य |
| आऊ (हिंदी) | चल, बिक, टिक | चलाऊ, बिकाऊ, टिकाऊ |
| आका (हिंदी) | लड़, धम, कड़ | लड़ाका, धमाका, कड़ाका |
| आड़ी (हिंदी) | खेल, कब, आगे, पीछे | खिलाड़ी, कबाड़ी, अगाड़ी, पिछाड़ी |
| आकू | पढ़, लड़ | पढ़ाकू, लड़ाकू |
| आलू/आलु | झगड़ा, दया, कृपा | झगड़ालू, दयालु, कृपालु |
| एरा | लूट, काम | लुटेरा, कमेरा |
| इयल | सड़, अड़, मर | सड़ियल, अड़ियल, मरियल |
| ऊ | डाका, खा, चाल | डाकू, खाऊ, चालू |
कृत् प्रत्यय के भेद
हिंदी में रूप के अनुसार ‘कृत् प्रत्यय’ के दो भेद है-
(i)विकारी कृत् प्रत्यय (ii)अविकारी कृत् प्रत्यय
(1)विकारी कृत् प्रत्यय- ऐसे कृत्-प्रत्यय जिनसे शुद्ध संज्ञा या विशेषण बनते हैं। इसलिए इसे विकारी कृत् प्रत्यय कहते हैं।
विकारी कृत् प्रत्यय के चार भेद होते है-
(i)क्रियार्थक संज्ञा (ii)कर्तृवाचक संज्ञा (iii)वर्तमानकालिक कृदन्त (iv)भूतकालिक कृदन्त
(i)क्रियार्थक संज्ञा- वह संज्ञा जो क्रिया के मूल रूप में होती है और क्रिया का अर्थ देती है अथार्त को का अर्थ बताने वाला वह शब्द जो क्रिया के रूप में उपस्थित होते हुए भी संज्ञा का अर्थ देता है वह क्रियाथक संज्ञा कहलाती है।
(ii)कर्तृवाचक संज्ञा- वे प्रत्यय जिनके जुड़ने पर कार्य करने वाले का बोध हो उसे कर्तृवाचक संज्ञा कहते हैं।
(iii)वर्तमानकालिक कृदन्त- जब हम एक काम को करते हुए दूसरे काम को साथ में करते हैं तो पहले वाली की गई क्रिया को वर्तमानकालिक कृदन्त कहते हैं।
(iv)भूतकालिक कृदन्त- जब सामान्य भूतकालिक क्रिया को हुआ, हुए, हुई आदि को जोड़ने से भूतकालिक कृदन्त बनता है।
(2) अविकारी कृत् प्रत्यय- ऐसे कृत्-प्रत्यय जिनसे क्रियामूलक विशेषण या अव्यय बनते हैं। इसलिए इसे अविकारी कृत् प्रत्यय कहते हैं।
हिन्दी क्रियापदों के अन्त में कृत्-प्रत्ययों के योग से निम्नलिखित प्रकार के कृदन्त बनाए जाते हैं-
(i) कर्तृवाचक कृत् प्रत्यय (ii) कर्मवाचक कृत् प्रत्यय (iii) करणवाचक कृत् प्रत्यय (iv) भाववाचक कृत् प्रत्यय (v) क्रियाद्योतक कृत् प्रत्यय
(i) कर्तृवाचक कृत् प्रत्यय- कर्ता का बोध कराने वाले प्रत्यय कर्तृवाचक कृत् प्रत्यय कहलाते है।
जैसे- रखवाला, रक्षक, लुटेरा, पालनहार इत्यादि।
(ii) कर्मवाचक कृत् प्रत्यय- कर्म का बोध कराने वाले प्रत्यय कर्मवाचक कृत् प्रत्यय कहलाते हैं।
जैसे- ओढ़ना, पढ़ना, छलनी, खिलौना, बिछौना इत्यादि।
(iii) करणवाचक कृत् प्रत्यय- करण यानी साधन का बोध कराने वाले प्रत्यय करणवाचक कृत् प्रत्यय कहलाते हैं।
जैसे- रेती, फाँसी, झाड़ू, बंधन, मथनी, झाड़न इत्यादि।
(iv) भाववाचक कृत् प्रत्यय- क्रिया के व्यापार या भाव का बोध कराने वाले प्रत्यय भाववाचक कृत् प्रत्यय कहलाते हैं।
जैसे- लड़ाई, लिखाई, मिलावट, सजावट, बनावट, बहाव, चढ़ाव इत्यादि।
(v) क्रियाद्योतक कृत् प्रत्यय- जिन कृत् प्रत्ययों के योग से क्रियामूलक विशेषण, रखनेवाली क्रिया का निर्माण होता है, उन्हें क्रियाद्योतक कृत् प्रत्यय कहते हैं।
दूसरे शब्दों में- क्रियाद्योतक कृत् प्रत्यय बीते हुए या गुजर रहे समय के बोधक होते हैं।
मूल धातु के आगे ‘आ’ अथवा ‘या’ प्रत्यय लगाने से भूतकालिक तथा ‘ता’ प्रत्यय लगाने से वर्तमानकालिक कृत् प्रत्यय बनते है। जैसे-
भूतकालिक कृत् प्रत्यय-
लिख + आ= लिखा
पढ़ + आ= पढ़ा
खा + या= खायावर्तमानकालिक कृत् प्रत्यय-
लिख + ता= लिखता
जा + ता= जाता
खा + ता= खाता
नीचे संस्कृत और हिंदी के कृत्-प्रत्ययों के उदाहरण दिये जा रहे हैं-
हिंदी के कृत्-प्रत्यय (Primary suffixes)
हिंदी के कृत् या कृदन्त प्रत्यय इस प्रकार हैं- अ, अन्त, अक्कड़, आ, आई, आड़ी, आलू, आऊ, अंकू, आक, आका, आकू, आन, आनी, आप, आपा, आव, आवट, आवना, आवा, आस, आहट, इयल, ई, इया, ऊ, एरा, ऐया, ऐत, ओड़ा, औता, औती, औना, औनी, आवनी, औवल, क, का, की, गी, त, ता, ती, न, नी, वन, वाँ, वाला, वैया, सार, हारा, हार, हा इत्यादि।
हिंदी के कृत्-प्रत्ययों से कर्तृवाचक कृत्-प्रत्यय, कर्मवाचक कृत् प्रत्यय, करणवाचक कृत्-प्रत्यय, भाववाचक कृत्-प्रत्यय और विशेषण बनते हैं।
इनके उदाहरण, प्रत्यय-चिह्नों के साथ नीचे दिया जा रहा है-
(i)कर्तृवाचक कृत्-प्रत्यय
कर्तृवाचक कृत्-प्रत्यय बनाने के लिए धातु के अन्त में अंकू, आऊ, आक, आका, आड़ी, आलू, इया, इयल, एरा, ऐत, आकू, अक्कड़, वन, वाला, वैया, सार, हार, हारा इत्यादि प्रत्यय लगाये जाते हैं। उदाहरणार्थ-
| प्रत्यय | धातु | कृदंत-रूप |
|---|---|---|
| आऊ | टिक | टिकाऊ |
| आक | तैर | तैराक |
| आका | लड़ | लड़का |
| आड़ी | खेल | खिलाड़ी |
| आलू | झगड़ | झगड़ालू |
| इया | बढ़ | बढ़िया |
| इयल | अड़ | अड़ियल |
| इयल | मर | मरियल |
| ऐत | लड़ | लड़ैत |
| ऐया | बच | बचैया |
| ओड़ | हँस | हँसोड़ |
| ओड़ा | भाग | भगोड़ा |
| अक्कड़ | पी | पिअक्कड़ |
| वन | सुहा | सुहावन |
| वाला | पढ़ | पढ़नेवाला |
| वैया | गा | गवैया |
| सार | मिल | मिलनसार |
| हार | रख | राखनहार |
| हारा | रो | रोवनहारा |
(ii)कर्मवाचक कृत्-प्रत्यय
कर्मवाचक कृत्-प्रत्यय बनाने के लिए धातु के अन्त में ना, नी औना इत्यादि प्रत्यय लगाये जाते हैं। उदाहरणार्थ-
| प्रत्यय | धातु | कृदंत-रूप |
|---|---|---|
| ना | ओढ़, पढ़ | ओढ़ना, पढ़ना |
| नी | छल, ओढ़, मथ | छलनी, ओढ़नी, मथनी |
| औना | खेला, बिछ | खिलौना, बिछौना |
(iii)करणवाचक कृत्-प्रत्यय
करणवाचक कृत्-प्रत्यय बनाने के लिए धातु के अन्त में आ, आनी, ई, ऊ, औटी, न, ना, नी इत्यादि प्रत्यय लगते हैं। उदाहरणार्थ-
| प्रत्यय | धातु | कृदंत-रूप |
|---|---|---|
| आ | झूल | झूला |
| आनी | मथ | मथानी |
| ई | रेत | रेती |
| ऊ | झाड़ | झाड़ू |
| औटी | कस | कसौटी |
| न | बेल | बेलन |
| ना | बेल | बेलना |
| नी | बेल | बेलनी |
(iv)भाववाचक कृत्-प्रत्यय
भाववाचक कृत्-प्रत्यय बनाने के लिए धातु के अन्त में अ, अन्त, आ, आई, आन, आप, आपा, आव, आवा, आस, आवना, आवनी, आवट, आहट, ई, औता, औती, औवल, औनी, क, की, गी, त, ती, न, नी इत्यादि प्रत्ययों को जोड़ने से होती है। उदाहरणार्थ-
| प्रत्यय | धातु | कृदंत-रूप |
|---|---|---|
| अ | भर | भार |
| अन्त | भिड़ | भिड़न्त |
| आ | फेर | फेरा |
| आई | लड़ | लड़ाई |
| आन | उठ | उठान |
| आप | मिल | मिलाप |
| आपा | पूज | पुजापा |
| आव | खिंच | खिंचाव |
| आवा | भूल | भुलावा |
| आस | निकस | निकास |
| आवना | पा | पावना |
| आवनी | पा | पावनी |
| आवट | सज | सजावट |
| आहट | चिल्ल | चिल्लाहट |
| ई | बोल | बोली |
| औता | समझ | समझौता |
| औती | मान | मनौती |
| औवल | भूल | भुलौवल |
| औनी | पीस | पिसौनी |
| क | बैठ | बैठक |
| की | बैठ | बैठकी |
| गी | देन | देनगी |
| त | खप | खपत |
| ती | चढ़ | चढ़ती |
| न | दे | देन |
| नी | चाट | चटनी |
(v)क्रियाद्योतक कृत्-प्रत्यय
क्रियाद्योतक कृदन्त-विशेषण बनाने में आ, ता आदि प्रत्ययों का प्रयोग होता है।
‘आ’ भूतकाल का और ‘ता’ वर्तमानकाल का प्रत्यय है।
अतः क्रियाद्योतक कृत्-प्रत्यय के दो भेद है-
(i) वर्तमानकाल क्रियाद्योतक कृदन्त-विशेषण, और
(ii) भूतकालिक क्रियाद्योतक कृदन्त-विशेषण।
इनके उदाहरण इस प्रकार है-
वर्तमानकालिक विशेषण-
| प्रत्यय | धातु | वर्तमानकालिक विशेषण |
|---|---|---|
| ता | बह | बहता |
| ता | मर | मरता |
| ता | गा | गाता |
भूतकालिक विशेषण-
| प्रत्यय | धातु | भूतकालिक विशेषण |
|---|---|---|
| आ | पढ़ | पढ़ा |
| आ | धो | धोया |
| आ | गा | गाया |
संस्कृत के कृत्-प्रत्यय और संज्ञाएँ
| कृत्-प्रत्यय | धातु | भाववाचक संज्ञाएँ |
|---|---|---|
| अ | कम् | काम |
| अना | विद् | वेदना |
| अना | वन्द् | वन्दना |
| आ | इष् | इच्छा |
| आ | पूज् | पूजा |
| ति | शक् | शक्ति |
| या | मृग | मृगया |
| तृ | भुज् | भोक्तृ (भोक्ता) |
| उ | तन् | तनु |
| इ | त्यज् | त्यागी |
| कृत्-प्रत्यय | धातु | कर्तृवाचक संज्ञाएँ |
|---|---|---|
| अक | गै | गायक |
| अ | सृप् | सर्प |
| अ | दिव् | देव |
| तृ | दा | दातृ (दाता) |
| य | कृ | कृत्य |
| अ | प्र+ह् | प्रहार |
(2)तद्धित प्रत्यय(Nominal):- संज्ञा सर्वनाम और विशेषण के अन्त में लगनेवाले प्रत्यय को ‘तद्धित’ कहा जाता है और उनके मेल से बने शब्द को ‘तद्धितान्त’।
दूसरे शब्दों में- धातुओं को छोड़कर अन्य शब्दों में लगनेवाले प्रत्ययों को तद्धित कहते हैं।
जैसे-
मानव + ता = मानवता
अच्छा + आई = अच्छाई
अपना + पन = अपनापन
एक + ता = एकता
ड़का + पन = लडकपन
मम + ता = ममता
अपना + पन = अपनत्व
कृत-प्रत्यय क्रिया या धातु के अन्त में लगता है, जबकि तद्धित प्रत्यय संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण के अन्त में। तद्धित और कृत-प्रत्यय में यही अन्तर है। उपसर्ग की तरह तद्धित-प्रत्यय भी तीन स्रोतों- संस्कृत, हिंदी और उर्दू- से आकर हिन्दी शब्दों की रचना में सहायक हुए है। नीचे इनके उदाहरण दिये गए है।
हिंदी के तद्धित-प्रत्यय (Nominal suffixes)
हिंदी के तद्धित-प्रत्यय ये है- आ, आई, ताई, आऊ, आका, आटा, आन, आनी, आयत आर, आरी आरा, आलू, आस आह, इन, ई, ऊ, ए, ऐला एला, ओ, ओट, ओटा औटी, औती, ओला, क, की, जा, टा, टी, त, ता, ती, नी, पन, री, ला, ली, ल, वंत, वाल, वा, स, सरा, सा, हरा, हला, इत्यादि।
तद्धित-प्रत्यय के प्रकार
हिंदी में तद्धित-प्रत्यय के आठ प्रकार हैं-
(1) कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय
(2) भाववाचक तद्धित प्रत्यय
(3) संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय
(4) गणनावाचक तद्धित प्रत्यय
(5) गुणवाचक तद्धित प्रत्यय
(6) स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय
(7) ऊनवाचक तद्धित प्रत्यय
(8) सादृश्यवाचक तद्धित प्रत्यय
(1) कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय- कर्ता का बोध कराने वाले प्रत्यय कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।
कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय
संज्ञा के अन्त में आर, इया, ई, एरा, हारा, इत्यादि तद्धित-प्रत्यय लगाकर कर्तृवाचक तद्धितान्त संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-
| प्रत्यय | संज्ञा-विशेषण | कर्तृवाचक संज्ञाएँ |
|---|---|---|
| आर | सोना | सुनार |
| आर | लोहा | लुहार |
| ई | तमोल | तमोली |
| ई | तेल | तेली |
| हारा | लकड़ी | लकरहारा |
| एरा | साँप | सँपेरा |
| एरा | काँसा | कसेरा |
(2) भाववाचक तद्धित प्रत्यय- भाव का बोध कराने वाले प्रत्यय भाववाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।
भाववाचक तद्धित प्रत्यय
संज्ञा के अन्त में आ, आयँध, आई, आन, आयत, आरा, आवट, आस, आहट, ई, एरा, औती, त, ती, पन, पा, स इत्यादि तद्धित-प्रत्यय लगाकर भाववाचक तद्धितान्त संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-
| प्रत्यय | संज्ञा-विशेषण | भाववाचक संज्ञाएँ |
|---|---|---|
| आ | चूर | चूरा |
| आई | चतुर | चतुराई |
| आन | चौड़ा | चौड़ान |
| आयत | अपना | अपनायत, अपनापन |
| आरा | छूट | छुटकारा |
| आस | मीठा | मिठास |
| आहट | कड़वा | कड़वाहट |
| ई | खेत | खेती |
| एरा | अन्ध | अँधेरा |
| औती | बाप | बपौती |
| त | रंग | रंगत |
| पन | काला | कालापन |
| पन | लड़का | लड़कपन |
| पा | बूढा | बुढ़ापा |
(3) संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय- संबंध का बोध कराने वाले प्रत्यय संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।
संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय
संज्ञा के अन्त में आल, हाल, ए, एरा, एल, औती, जा इत्यादि तद्धित-प्रत्यय लगाकर सम्बन्धवाचक तद्धितान्त संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-
| प्रत्यय | संज्ञा-विशेषण | सम्बन्धवाचक संज्ञाएँ |
|---|---|---|
| आल | ससुर | ससुराल |
| हाल | नाना | ननिहाल |
| औती | बाप | बपौती |
| जा | भाई | भतीजा |
| एरा | मामा | ममेरा |
| एल | नाक | नकेल |
(4)गणनावाचक तद्धित प्रत्यय- संख्या का बोध कराने वाले प्रत्यय गणनावाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते है।
गणनावाचक तद्धित प्रत्यय
संज्ञा-पदों के अंत में ला, रा, था, वाँ, हरा इत्यादि प्रत्यय लगाकर गणनावाचक तद्धितान्त संज्ञाए बनती है।
| प्रत्यय | गणनावाचक संज्ञाएँ |
|---|---|
| ला | पहला |
| रा | दूसरा, तीसरा |
| था | चौथा |
| वाँ | सातवाँ, आठवाँ |
| हरा | दुहरा, तिहरा |
(5)गुणवाचक तद्धित प्रत्यय- गुण का बोध कराने वाले प्रत्यय गुणवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।
गुणवाचक तद्धित प्रत्यय
संज्ञा के अन्त में आ, इत, ई, ईय, ईला, वान इन प्रत्ययों को लगाकर गुणवाचक संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-
| प्रत्यय | संज्ञा-विशेषण | गुणवाचक संज्ञाएँ |
|---|---|---|
| आ | ठंड, प्यास, भूख | ठंडा, प्यासा, भूखा |
| इत | पुष्प, आनंद, क्रोध | पुष्पित, आनंदित, क्रोधित |
| ई | क्रोध, जंगल, भार | क्रोधी, जंगली, भारी |
| ईय | भारत, अनुकरण, रमण | भारतीय, अनुकरणीय, रमणीय |
| ईला | चमक, भड़क, रंग | चमकीला, भड़कीला, रंगीला |
| वान | गुण, धन, रूप | गुणवान, धनवान, रूपवान |
(6)स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय- स्थान का बोध कराने वाले प्रत्यय स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।
स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय
संज्ञा के अन्त में ई, वाला, इया, तिया इन प्रत्ययों को लगाकर स्थानवाचक संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-
| प्रत्यय | संज्ञा-विशेषण | स्थानवाचक संज्ञाएँ |
|---|---|---|
| ई | जर्मन, गुजरात, बंगाल | जर्मनी, गुजराती, बंगाली |
| वाला | दिल्ली, बनारस, सूरत | दिल्लीवाला, बनारसवाला, सूरतवाला |
| इया | मुंबई, जयपुर, नागपुर | मुंबइया, जयपुरिया, नागपुरिया |
| तिया | कलकत्ता, तिरहुत | कलकतिया, तिरहुतिया |
(7)ऊनवाचक तद्धित-प्रत्यय-ऊनवाचक संज्ञाएँ से वस्तु की लघुता, प्रियता, हीनता इत्यादि के भाव व्यक्त होता हैं।
ऊनवाचक तद्धितान्त संज्ञाए
संज्ञा के अन्त में आ, इया, ई, ओला, क, की, टा, टी, ड़ा, ड़ी, री, ली, वा, सा इन प्रत्ययों को लगाकर ऊनवाचक संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-
| प्रत्यय | संज्ञा-विशेषण | ऊनवाचक संज्ञाएँ |
|---|---|---|
| आ | ठाकुर | ठकुरा |
| इया | खाट | खटिया |
| ई | ढोलक | ढोलकी |
| ओला | साँप | सँपोला |
| क | ढोल | ढोलक |
| की | कन | कनकी |
| टा | चोर | चोट्टा |
| टी | बहू | बहुटी |
| ड़ा | बाछा | बछड़ा |
| ड़ी | टाँग | टँगड़ी |
| री | कोठा | कोठरी |
| ली | टीका | टिकली |
| वा | बच्चा | बचवा |
| सा | मरा | मरा-सा |
(8)सादृश्यवाचक तद्धित प्रत्यय- समता/समानता का बोध कराने वाले प्रत्यय सादृश्यवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।
सादृश्यवाचक तद्धित प्रत्यय
संज्ञा के अन्त में सा हरा इत्यादि इन प्रत्ययों को लगाकर सादृश्यवाचक संज्ञाएँ बनायी जाती हैं। जैसे-
| प्रत्यय | संज्ञा-विशेषण | सादृश्यवाचक संज्ञाएँ |
|---|---|---|
| सा | लाल, हरा | लाल-सा, हरा-सा |
| हरा | सोना | सुनहरा |
तद्धितीय विशेषण
संज्ञा के अन्त में आ, आना, आर, आल, ई, ईला, उआ, ऊ, एरा, एड़ी, ऐल, ओं, वाला, वी, वाँ, वंत, हर, हरा, हला, हा इत्यादि तद्धित-प्रत्यय लगाकर विशेषण बनते हैं। उदाहरण निम्नलिखित हैं-
| प्रत्यय | संज्ञा | विशेषण |
|---|---|---|
| आ | भूख | भूखा |
| आना | हिन्दू | हिन्दुआना |
| आर | दूध | दुधार |
| आल | दया | दयाल |
| ई | देहात | देहाती |
| ऊ | बाजार | बाजारू |
| एरा | चाचा | चचेरा |
| एरा | मामा | ममेरा |
| हा | भूत | भुतहा |
| हरा | सोना | सुनहरा |
संस्कृत के तद्धित-प्रत्यय
संस्कृत के तद्धित-प्रत्ययों से बने जो शब्द हिन्दी में विशेषतया प्रचलित हैं, उनके आधार पर संस्कृत के ये तद्धित-प्रत्यय हैं- अ, अक आयन, इक, इत, ई, ईन, क, अंश, म, तन, त, ता, त्य, त्र, त्व, था, दा, धा, निष्ठ, मान्, मय, मी, य, र, ल, लु, वान्, वी, श, सात् इत्यादि।
शब्दांश भी तद्धित-प्रत्ययों के रूप में प्रयुक्त होते हैं। ये शब्दांश समास के पद है; जैसे- अतीत, अनुरूप, अनुसार, अर्थ, अर्थी, आतुर, आकुल, आढ़य, जन्य, शाली, हीन इत्यादि।
अर्थ के अनुसार इन प्रत्ययों के प्रयोग के उदाहरण इस प्रकार हैं-
| प्रत्यय | संज्ञा-विशेषण | तद्धितान्त | वाचक |
|---|---|---|---|
| अ | कुरु | कौरव | अपत्य |
| अ | शिव | शौव | संबंध |
| अ | निशा | नैश | गुण, सम्बन्ध |
| अ | मुनि | मौन | भाव |
| आयन | राम | रामायण | स्थान |
| इक | तर्क | तार्किक | जानेवाला |
| इत | पुष्प | पुष्पित | गुण |
| ई | पक्ष | पक्षी | गुण |
| ईन | कुल | कुलीन | गुण |
| क | बाल | बालक | उन |
| अंश | तः | अंशतः | रीति |
| अंश | जन | जनता | समाहर |
| म | मध्य | मध्यम | गुण |
| तन | अद्य | अद्यतन | काल-सम्बन्ध |
| तः | अंश | अंशतः | रीति |
| ता | लघु | लघुता | भाव |
| ता | जन | जनता | समाहार |
| त्य | पश्र्चा | पाश्र्चात्य | सम्बन्ध |
| त्र | अन्य | अन्यत्र | स्थान |
| त्व | गुरु | गुरुत्व | भाव |
| था | अन्य | अन्यथा | रीति |
| दा | सर्व | सर्वदा | काल |
| धा | शत | शतधा | प्रकार |
| निष्ठ | कर्म | कर्मनिष्ठ | कर्तृ, सम्बन्ध |
| म | मध्य | मध्यम | गुण |
| मान् | बुद्धि | बुद्धिमान् | गुण |
| मय | काष्ठ | काष्ठमय | विकार |
| मय | जल | जलमय | व्याप्ति |
| मी | वाक् | वाग्मी | कर्तृ |
| य | मधुर | माधुर्य | भाव |
| य | दिति | दैत्य | अपत्य |
| य | ग्राम | ग्राम्य | सम्बन्ध |
| र | मधु | मधुर | गुण |
| ल | वत्स | वत्सल | गुण |
| लु | निद्रा | निद्रालु | गुण |
| वान् | धन | धनवान् | गुण |
| वी | माया | मायावी | गुण |
| श | रोम | रोमेश | गुण |
| श | कर्क | कर्कश | स्वभाव |
| सात् | भस्म | भस्मसात् | विकार |
संस्कृत की तत्सम संज्ञाओं के अन्त में तद्धित-प्रत्यय लगाने से भाववाचक, अपत्यावाचक (नामवाचक) और गुणवाचक विशेषण बनते हैं।
अब इन प्रत्ययों द्वारा विभित्र वाचक संज्ञाओं और विशेषणों से विभित्र वाचक संज्ञाओं और विशेषणों के निर्माण इस प्रकार हैं-
जातिवाचक से भाववाचक संज्ञाएँ- संस्कृत की तत्सम जातिवाचक संज्ञाओं के अन्त में तद्धित प्रत्यय लगाकर भाववाचक संज्ञाएँ बनती हैं। इसके उदाहरण इस प्रकार है-
| तद्धित प्रत्यय | संज्ञा | भाववाचक संज्ञा |
|---|---|---|
| ता | शत्रु | शत्रुता |
| ता | वीर | वीरता |
| त्व | गुरु | गुरुत्व |
| त्व | मनुष्य | मनुष्यत्व |
| अ | मुनि | मौन |
| य | पण्डित | पाण्डित्य |
| इमा | रक्त | रक्तिमा |
व्यक्तिवाचक से अपत्यवाचक संज्ञाएँ- अपत्यवाचक संज्ञाएँ किसी नाम के अन्त में तद्धित-प्रत्यय जोड़ने से बनती हैं। अपत्यवाचक संज्ञाओं के कुछ उदाहरण ये हैं-
| तद्धित-प्रत्यय | व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ | अपत्यवाचक संज्ञाएँ |
|---|---|---|
| अ | वसुदेव | वासुदेव |
| अ | मनु | मानव |
| अ | कुरु | कौरव |
| अ | पृथा | पार्थ |
| अ | पाण्डु | पाण्डव |
| य | दिति | दैत्य |
| आयन | बदर | बादरायण |
| एय | राधा | राधेय |
| एय | कुन्ती | कौन्तेय |
विशेषण से भाववाचक संज्ञाएँ- विशेषण के अन्त में संस्कृत के निम्नलिखित तद्धित-प्रत्ययों के मेल से निम्नलिखित भाववाचक संज्ञाएँ बनती हैं-
| तद्धित-प्रत्यय | विशेषण | भाववाचक संज्ञाएँ |
|---|---|---|
| ता | बुद्धिमान् | बुद्धिमत्ता |
| ता | मूर्ख | मूर्खता |
| ता | शिष्ट | शिष्टता |
| इमा | रक्त | रक्तिमा |
| इमा | शुक्ल | शुक्लिमा |
| त्व | वीर | वीरत्व |
| त्व | लघु | लघुत्व |
| अ | गुरु | गौरव |
| अ | लघु | लाघव |
संज्ञा से विशेषण- संज्ञाओं के अन्त में संस्कृत के गुण, भाव या सम्बन्ध के वाचक तद्धित-प्रत्ययों को जोड़कर विशेषण भी बनते हैं। उदाहरणार्थ-
| प्रत्यय | संज्ञा | विशेषण |
|---|---|---|
| अ | निशा | नैश |
| य | तालु | तालव्य |
| य | ग्राम | ग्राम्य |
| इक | मुख | मौखिक |
| इक | लोक | लौकिक |
| मय | आनन्द | आनन्दमय |
| मय | दया | दयामय |
| इत | आनन्द | आनन्दित |
| इत | फल | फलित |
| इष्ठ | बल | बलिष्ठ |
| निष्ठ | कर्म | कर्मनिष्ठ |
| र | मुख | मुखर |
| र | मधु | मधुर |
| इम | रक्त | रक्तिम |
| ईन | कुल | कुलीन |
| ल | मांस | मांसल |
| वी | मेधा | मेधावी |
| इल | तन्द्रा | तन्द्रिल |
| लु | तन्द्रा | तन्द्रालु |
उर्दू के तद्धित-प्रत्यय
बहुतेरे उर्दू शब्द हिंदी में प्रयुक्त होते है। ये शब्द ये फारसी, अरबी, और तुर्की के है।
फारसी तद्धित-प्रत्यय के तीन प्रकार होते है-
(i)संज्ञात्मक (ii) विशेषणात्मक (iii) अरबी तद्धित-प्रत्यय
(1)संज्ञात्मक फारसी तद्धित-प्रत्यय
| प्रत्यय | मूलशब्द | सपरतीय शब्द | वाचक |
|---|---|---|---|
| आ | सफेद | सफेदा | भाववाचक |
| आ | खराब | खराबा | भाववाचक |
| कार | काश्त | काश्तकार | कतृवाचक |
| गार | मदद | मददगार | कतृवाचक |
| ईचा | बाग | बगीचा | स्थितिवाचक |
| दान | कलम | कलमदान | स्थितिवाचक |
(ii)विशेषणात्मक फारसी तद्धित-प्रत्यय
| प्रत्यय | मूलशब्द | सपरतीय शब्द | प्रत्ययार्थ |
|---|---|---|---|
| आना | मर्द | मर्दाना | स्वभाव |
| इन्दा | शर्म | शर्मिन्दा | संज्ञा |
| नाक | दर्द | दर्दनाक | गुण |
| ई | आसमान | आसमानी | विशेषण |
| ईना | कम | कमीन | उनार्थ |
| ईना | माह | महीना | संज्ञा |
| जादा | हराम | हरामजादा | अपत्य |
(iii)अरबी फारसी तद्धित-प्रत्यय
| प्रत्यय | मूलशब्द | सपरतीय शब्द | वाचक |
|---|---|---|---|
| आनी | जिस्म | जिस्मानी | विशेषण |
| इयत | इंसान | इंसानियत | भाव |
| म | बेग | बेगम | स्त्री |
कृदंत और तद्धित में अंतर
कृत् और तद्धित प्रत्ययों में अंतर यह है कि कृत् प्रत्यय धातुओं में लगते हैं, जबकि तद्धित प्रत्यय धातुभित्र शब्दों के साथ लगाये जाते हैं।
इतिहास या स्रोत के आधार पर हिन्दी प्रत्ययों को चार वर्गो में विभाजित किया जाता है-
(1) तत्सम प्रत्यय
(2) तद्भव प्रत्यय
(3) देशज प्रत्यय
(4) विदेशज प्रत्यय
(1)तत्सम प्रत्यय
| प्रत्यय | बोधक/अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| -आ | स्त्री प्रत्यय; भाववाचक संज्ञा प्रत्यय | आदरणीया, प्रिया, माननीया, सुता, इच्छा, पूजा |
| -आनी | स्त्री प्रत्यय | देवरानी, भवानी, मेहतरानी |
| -आलु | विशेषण प्रत्यय, वाला | कृपालु, दयालु, निद्रालु, श्रद्धालु |
| -इत | विशेषण प्रत्यय, युक्त | पल्लवित, पुष्पित, फलित, हर्षित |
| -इमा | भाववाचक संज्ञा प्रत्यय | गरिमा, नीलिमा, मधुरिमा, महिमा |
| -इक | विशेषण व संज्ञा प्रत्यय | दैनिक, वैज्ञानिक, वैदिक, लौकिक |
| -क | स्वार्थ, समूह | घटक, ठंडक, शतक, सप्तक |
| -कार | लिखने या बनाने वाला; वाला | पत्रकार, जानकर |
| -ज | जन्मा हुआ | अंडज, जलज, पंकज, पिंडज, देशज, विदेशज |
| -जीवी | जीनेवाला | परजीवी, बुद्धिजीवी, लघुजीवी, दीर्घजीवी |
| -ज्ञ | जाननेवाला | अज्ञ, मर्मज्ञ, विज्ञ, सर्वज्ञ |
| -तः | क्रिया विशेषण प्रत्यय | मुख्यतया, विशेषतया, सामान्ततया |
| -तर | तुलना बोधक प्रत्यय | उच्चतर, निम्नतर, सुन्दरतर, श्रेष्ठतर |
| -तम | सर्वाधिकता बोधक प्रत्यय | उच्चतम, निकृष्टतम, महत्तम, लघुतम |
| -ता | भाववाचक संज्ञा प्रत्यय | नवीनता, मधुरता, सुन्दरता |
| -त्व | भाववाचक संज्ञा प्रत्यय | कृतित्व, ममत्व, महत्व, सतीत्व |
| -मान | विशेषण वाचक प्रत्यय | उच्चतम, निकृष्टतम, महत्तम, लघुतम |
| -वान | वाला | गुणवान, धनवान, बलवान, रूपवान |
(2)तद्भव प्रत्यय
| प्रत्यय | बोधक/अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| -अंगड़ | वाला | बतंगड़ |
| अंतू | वाला | रटंतू, घुमंतू |
| -अत | संज्ञा प्रत्यय | खपत, पढ़त, रंगत, लिखत |
| -आँध | संज्ञा प्रत्यय | बिषांध, सराँध |
| -आ | भाववाचक | जोड़ा, फोड़ा, झगड़ा, रगड़ा |
| -आई | भाववाचक प्रत्यय | कठिनाई, बुराई, सफाई |
| -आऊ | वाला | खाऊ, टिकाऊ, पंडिताऊ, बिकाऊ |
| आप/आपा | भाववाचक प्रत्यय | मिलाप, अपनापा, पुजापा, बुढ़ापा |
| -आर/आरा/आरी | करनेवाला | कुम्हार, लुहार, चमार, घसियारा, पुजारी, भिखारी |
| -आलू | करनेवाला | झगड़ालू, दयालु |
| -आवट | भाववाचक प्रत्यय | कसावट, बनावट, बिनावट, लिखावट, सजावट |
| -आस | इच्छावाचक प्रत्यय | छपास, प्यास, लिखा, निकास |
| -आहट/-आहत | भाववाचक प्रत्यय | गड़गड़ाहट, घबराहट, चिल्लाहट, भलमनसाहत |
| -इन | स्त्री प्रत्यय | जुलाहिन, ठकुराइन, तेलिन, पुजारिन |
| -इया | वाला; लघुत्व, बोधक; स्त्री प्रत्यय | चुटिया, चुहिया, डिबिया, कनौजिया, भोजपुरिया |
| -इला | वाला | चमकीला, पथरीला, शर्मीला |
| -एरा | वाला | चचेरा, फुफेरा, बहुतेरा, ममेरा |
| -औड़ा/-औड़ी | लिंगवाचक | पकौड़ी, सेवड़ा, रेवड़ी |
| -त/-ता | भाववाचक, कर्मवाचक | चाहत, मिल्लत, आता, खाता, जाता, सोता |
| -पन | भाववाचक प्रत्यय | छुटपन, बचपन, बड़प्पन, पागलपन |
| -वाला | कर्तृवाचक, विशेषण | अपनेवाला, ऊपरवाला, खानेवाला, जानेवाला, लालवाला |
(3) देशज प्रत्यय
| प्रत्यय | बोधक/अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| -अक्कड़ | वाला | घुमक्कड़, पियक्कड़, भुलक्कड़ |
| -अड़ | स्वार्थिक | अंधड़, भुक्खड़ |
| -आक | भाववाचक | खर्राटा, फर्राटा |
| -इयल | वाला | अड़ियल, दढ़ियल, सड़ियल |
(4) विदेशज प्रत्यय
(i) अरबी-फारसी प्रत्यय
| प्रत्यय | बोधक/अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| -आ | भाववाचक | सफेदा, खराबा |
| -आना | भाववाचक विशेषण | वाचक जुर्माना, दस्ताना, मर्दाना, मस्ताना |
| -आनी | संबंधवाचक | जिस्मानी, बर्फ़ानी, रूहानी |
| -कार | करनेवाला | काश्तकार, दस्तकार, सलाहकार, पेशकार |
| -खोर | खानेवाला | गमखोर, घूसखोर, रिश्वतखोर, हरामखोर |
| -गार | करनेवाला | परहेजगार, मददगार, यादगार, रोजगार |
| -गी | भाववाचकसंज्ञा प्रत्यय | गन्दगी, जिन्दगी, बंदगी -चा/ची वाला देगचा, बगीचा, इलायची, डोलची, संदूकची |
| -दान | स्थिति वाचक | इत्रदान, कलमदान, पीकदान |
| -दार | वाला | ईमानदार, कर्जदार, दूकानदार, मालदार |
| -नाक | वाला | खतरनाक, खौफनाक, दर्दनाक, शर्मनाक |
| -बान | वाला दरबान, बागबान, मेजबान | अज्ञ, मर्मज्ञ, विज्ञ, सर्वज्ञ |
| -मंद | वाला | अक्लमंद, जरूरतमंद |
(ii) अंग्रेजी प्रत्यय
| प्रत्यय | बोधक/अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| -इज्म | वाद/मत | कम्युनिज्म, बुद्धिज्म, सोशलिज्म |
| -इस्ट | वादी/व्यक्ति | कम्युनिस्ट, बुद्धिस्ट, सोशलिष्ट |
स्रोत: hindigrammer.in
प्रतिरोधी समाजव्यवस्था एवं इक्कीसवीं सदी की हिंदी स्त्री आत्मकथाएँ-सुप्रिया प्रभाकर जोशी

प्रतिरोधी समाजव्यवस्था एवं इक्कीसवीं सदी की हिंदी स्त्री आत्मकथाएँ
सुप्रिया प्रभाकर जोशी
साहित्य मानव की अभिव्यक्ति है । उत्तर आधुनिक काल में गद्य का क्षेत्र काफी विस्तृत हो गया है। हिंदी साहित्य में आत्मकथा लेखन विधा आधुनिक काल की देन है । आत्मकथा में लेखक अपना जीवन वृत्त स्वयं प्रकाशित करता है। परिणामत: हर एक आत्मकथा अपनी अलग सी विशेषता रखती है। संपुर्ण विश्व के अनेक महान विभुतियों ने आत्मकथा इस विधा को समृध्द बनाया। समकालीन परिवेश में भारत में भी अनेक आत्मकथाएँ लिखी जा रही है। बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में तथा इक्कीसवीं सदी के आरंभ से नारियों ने भी निडरता के साथ इस विधा को समृद्ध करने में अपना योगदान दिया। नारियों द्वारा लिखी हुयी आत्मकथाएँ विचारोत्तेजक, नारी विमर्श के नए आयामों को उद्घाटित करती है। इन आत्मकथाओं को पढ़ने के बाद हमारी नैतिकता और सामाजिकता पर अनेक प्रश्न उपस्थित होते है। प्रभा खेतान ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, ” आत्मकथा एक चीख भी है जो बताती है कि अपने किए और भोगे हुए के लिए सिर्फ हम जिम्मेदार नहीं होते। हमारे पीछे खडा सारा समाज इस जिंदगी का साक्षी और सहभोक्ता ही नहीं, इसकी हालत के लिए उत्तरदायी व्यूह रचना का निर्माता भी वह है।” १
प्रभा खेतान के इस वक्तव्य से हम यह कह सकते है कि समाज इस रचना का प्रभा ने अच्छी तरह से अनुभव किया तभी वह यह कहने का साहस जुटा पायी है। समाज व्यवस्था ने मध्ययुग के पश्चात नैतिकता, संस्कार के नाम पर नारी को उनके दायरे में ,रीति-रिवाजों में जकडकर रखा । उन्हें समाज द्वारा केवल अपमान, शोषण और उपेक्षा ही मिली। नारीयों ने भी इस पुरुषवादी समाज व्यवस्था का विरोध करने की ताकत जुटा ली और पढ लिखकर विभिन्न क्षेत्रों में अपना स्थान सुनिश्चित किया। इन सभी विद्रोही परिस्थितियों की विस्तृत व वास्तविक जानकारी हमें आत्मकथाओं से हुयी है।
मैत्रेयी पुष्पा के आत्मकथा के पहला भाग ‘ कस्तुरी कुण्डल बसै ‘ में लेखिका से अधिक उनकी मां कस्तुरी केंद्र में रही है। छोटे- छोटे प्रसंगों को मैत्रेयी ने विस्तार से खोलकर रखे है। ‘ कस्तुरी कुण्डल बसै ‘ की शुरुवात ‘ मैं ब्याह नहीं करुँगी ‘ के ऐलान से होती है। यह वाक्य एक सोलह वर्ष की लडकी के मुँह से प्रस्फुटित होना यह समाज व्यवस्था के लिए बडी चुनौती थी। कस्तुरी के इस निर्णय से माता-पिता और परिवार को व्यवस्था की चिंता साथ ही सामाजिक प्रतिष्ठा की चिंता होती है इसके कारण कस्तुरी की माँ कहती है, “कस्तुरी , लडकियों से ऎसे दुस्साहस की उम्मीद कौन करता है वे तो माँ बाप के सामने सिर उठाकर बात तक नहीं कर सकती , मरने का शाप हँस-हँसकर झेलती है और गालियाँ चुपचाप सहन करती हुई अपनी शील का परिचय देती है, तु मर्यादा तोडनेपर आमदा क्यों हुई ? ” २ उपर्युक्त वक्तव्य से ज्ञात होता है कि महिलाओं पर ऎसे संस्कार किए जाते है कि विवाह होना आवश्यक ही है। वह पुरुष पर ही अवलंबित रहे उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व न हो यही व्यवस्था बनाई गयी है। कस्तुरी अपने ही स्वकीयों द्वारा बेच दी जाती है। मैत्रेयी अठारह महिने की होती है उसी समय से ही कस्तुरी वैधव्य के दंश सहती है। किंतु कस्तुरी रुप समयानुसार विद्रोही, क्रांतिकारी रूप ले लेती है विधवा बनने के बाद शिक्षा प्राप्त करने घर से निकल पड़ती है, मैत्रेयी के शादी की जिद के कारण उसके लिए वर ढुँढने के लिए वह स्वयं निकल पडती है , बिना दहेज शादी करने पर अडे रहती है,आदि ऎसी कई घटनाओं को उजागर किया है जिसमें सामाजिक संरचना पर, रुढी-परंपराओं पर कस्तुरी ने प्रहार किया है।
मैत्रेयी के आत्मकथा का दूसरा खंड ‘ गुडिया भीतर गुडिया ‘ है। अपने अंदाज में बोल्ड लेखन करनेवाली लेखिका का व्यक्तित्व , मानसिक यातनाएँ या उनका होनेवाला विकास आदि बातें इस भाग में कुछ ज्यादा उभरकर आयी है। मैत्रेयी ने भूमिका में लिखा है, ” मैं ने कलम थाम ली । कलम के सहारे मेरी चेतना, जिसे मैंने आत्मा की आवाज के रुप में पाया,तभी तो साहित्य के व्दार तक चली आयी। सुना था साहित्य व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता देता है। हाँ, लिखकर ही तो मैंने जाना कि न मैं धर्म के खिलाफ थी, न नैतिकता के विरुध्द । मैं तो सदियों से चली आ रही तथाकथित सामाजिक व्यवस्था से खुद को मुक्त कर रही थी। “३
उपर्युक्त पंक्ति से मैत्रेयी ने हमे वैचारिक परिपक्वता, अस्मिता का समान, स्त्रीत्व की प्रतिष्ठापना का मार्ग दिखाने का काम किया है। आत्मकथा यह खंड मार्मिक और विस्फोटक है । गाँव से ब्याहकर लायी गयी लडकी को ‘ गँवार ‘ शब्द से आहत किया जाता है। मैत्रेयी को तथाकथित लोगों की नजरों से सुंदर न होने पर भी ताने सुनने पडते है। ऎसे मैत्रेयी के जीवन के बारे में , उनके रहन-सहन के बारे में समाज के साथ उनके पति भी नाराज रहते है। कुछ सालों के पश्चात मैत्रेयी स्वयं को बदल देती है आधुनिक तौर तरीके सीख लेती है इसपर भी पति और समाज के लोग दुष्चरित्र होने का आरोप लगाते है। यानि नारी गाँव के संस्कारों के साथ रहे तो गँवार ठहरायी जाती है और आधुनिक बन जाए तो अनैतिक कहलाती है। समाज व्यवस्था का यह कौन सा रुप है ?
मैत्रेयी ने तीन बेटियों को ही जन्म दिया इस पर अनेक लोग उन्हें ‘ कुल नाशिनी ‘ कहते है। किंतु इस बार मैत्रेयी सामाजिक बंधनों का स्वीकार नहीं करती उनका डटकर मुकाबला करती है। एक साहित्यकार के रुप में अपनी पहचान बनाने में उन्हें कई मुश्किल परिस्थितियों से जूझना पड़ा । साहित्य के क्षेत्र के जाने माने पुरुष संपादकों ने भी उन्हे केवल ‘ स्त्री ‘ के नजर से ही देखा। मैत्रेयी ने अपने साहित्य के माध्यम से स्वतंत्र महिला का आदर्श सामने रखा है। सामान्य जनमानस तथा लोकप्रिय साहित्यकार, महिला साहित्यकारों ने भी इस साहित्य पर अश्लीलता , अभद्र और शर्मसार करने वाला साहित्य कहा है। संक्षेप में यही कह सकते है कि मैत्रेयी की आत्मकथाओं के दोनों खंडों में समाज व्यवस्था का आकलन कर उनके गुण-दोषों का निष्पक्ष भाव से किया है। उन्होने आत्मकथा में सुंदरता नहीं बल्कि सत्यता उतारा है।
‘ जो कहा नहीं गया ‘ यह आत्मकथा कुसुम अंसल की है। कुसुम ने अपने हिस्से आयी प्रताड़ना और उपहास का जिक्र अपनी आत्मकथा में किया है। वे जब मात्र दस माह की थी उसी समय उनकी माँ चल बसी । सौतेली माँ से प्यार नहीं मिला । पिता के घर के माहौल में कोने-कोने में समृध्दी भरी थी परंतु कुसुम इस समृद्धि से अछूती रही। शादी होने तक उनका सफर बेऔलाद फुफा के घर से पिता के घर पर चलता रहा , किसी ने यह जानने की कोशिश ही नहीं की कुसुम क्या चाहती है ? कुसुम की मर्जी या इच्छा जाने बिना ही उनके लिए घर बदलते रहे। ” क्यों पिता यह समझ नहीं पाए कि वह मन, बुद्धि, हृदय के सुमेल से बनी एक जीवित व्यक्ति है। नहीं, पितृक व्यवस्था के सांचे में ढले पिता के लिए यह सब सोचना बेमानी था। “४
कुसुम अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए सारा जीवन रिश्तों के बीच हिचकोले खाती रही। उच्च शिक्षा प्राप्त की तीव्र इच्छा कुसुम को थी किंतु समाज के नियमों के कारण उनकी पढ़ाई रोक दी गयी । जब वह जिद पर अडकर मनोविज्ञान में फर्स्ट डिवीजन में पास होने पर पिता सिर पर हाथ मारकर कहते है, ” वैसे ही कोई लड़का नहीं मिलता,अब इसने तो एम. ए पास कर लिया है, वह भी फर्स्ट डिवीजन में ………। “५
इस वाक्य से हम पुरुषवादी सोच का अंदाजा लगा सकते है। उनकी सोच यही है ,’ लडकी ना पढ़े और अगर पढ़ भी ले तो पुरुषों से आगे कदम न बढाएँ । ‘विवाह के बाद तो कुसुम का जीवन संघर्ष और भी बढ़ जाता है। ससुराल के सभी सदस्यों के शुष्क व्यवहार से उनका मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है। अपना अस्तित्व बचाने के लिए वह अपने आपको इस पिंजरे से मुक्त कर रंगमंच से जुड जाती है। बहु के में नाटक काम करने से परिवार तथा आस-पडोस के लोग उनपर ताना कसने का एक भी मौका नहीं छोड़ते। किंतु कुसुम उन बातों को अनसुना कर अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त करती है। अपनी आत्मकथा से उन्होने सामाजिक- पारिवारिक बंधनो, वर्जनाओं को तोड़कर बाहर आने का संकेत देती है।
‘घर और अदालत ‘ यह आत्मकथा लीला सेठ की है जो भारत की पहली महिला चीफ जस्टिस बनी थी। लीला का जन्म १९३० में हुआ उस समय घर में लड़की का पैदा होना अशुभ माना जाता था किंतु उनके माता-पिता शिक्षित थे साथ ही पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित थे इसलिए उन्होने लड़का लड़की में कोई भेद नहीं किया। शादी के योग्य हो जाने पर उनकी शादी एक शिक्षित युवक से करवा दी। पति के नौकरी के कारण वे विदेश में रही है। समय के सदुपयोग के लिए लीला ने विदेश में ही विधि या कानून की शिक्षा प्राप्त की । कानून की परिक्षा में सफल हो गयी , इस बात से विदेश में पुरुषवादी सोच ने अखबार में लीला के बारे इस तरह उल्लेख किया है, ” एक ऐसी माँ जो कानून की बारीकियों से परिचित है, यह है लखनऊ में जन्म लेने वाली २८ वर्षीय मिसेज लीला सेठ। उन्होंने हाल ही में फायनल परिक्षा में सभी पुरुष अभ्यर्थियों को पछाडकर पहला स्थान हासिल किया है। पढाई के दौरान उनपर पति,पाँच वर्षीय बेटे और छह माह के शिशु की देखभाल की जिम्मेदारी भी थी। “६ एक भारतीय विवाहित महिला का विदेशों के पुरुष विद्यार्थियों को पीछे छोड पहला स्थान प्राप्त करने से कुछ लोगों की उनके प्रति गौरव की भावना थी तो पुरुषवादीयों के मिथ्याहंकार को गहरी चोट लगी। अपनी योग्यता पर प्रैक्टिस के लिए भारत में किसी बैरिस्टर से मिलने पर उन्होंने शादी करने , बच्चें पैदा करने की सलाह दी। ” कानूनी पेशा अपनाने के बजाय जाकर शादी- वादी करो….. ,जाकर बच्चा पैदा करो……यह तो ठीक नहीं है कि बच्चा अकेला रहे इसलिए अच्छा होगा कि तुम दूसरे बच्चे के जन्म के बारे में सोचो। “७ हम देख सकते है कि उच्चशिक्षित पुरुषों की मानसिकता भी यही रही कि स्त्री को शादी कर बच्चें ही पैदा करने चाहिए उसी में उसकी सार्थकता है। लीला सेठ के जज बनने पर भी समाज का या पुरुषों का रवैया नहीं बदल सका । हाईकोर्ट में आयोजित किए जानेवाले समारोह की तैयारियाँ करते समय एक पुरुष ने यह स्पष्ट कह दिया ,” अब जब हमारे बीच एक महिला जज भी है, हमें खाने-पीने के इंतजाम के बारे में चिंता करने की कोई जरुरत नहीं है। वह चाय पान की सारी व्यवस्था कर देगी। “८जज के इस वक्तव्य से हम समझ सकते है कि पुरुष किसी भी पेशे में क्यों न हो वह नारी को ‘ रसोईवाली ‘ इसी दृष्टि से देखता है। एक महिला वकील और न्यायाधीश होने के कारण लीला को अपने स्त्रीत्व के कारण कदम-कदम पर दोयम दर्जा मिलता गया फिर भी अपने गुणों से उन्होंने उनके कार्य में कोई कसर नहीं छोडी।
‘ शिकंजे का दर्द ‘ यह आत्मकथा दलित स्त्री आत्मकथाओं में से एक चुनिंदा आत्मकथा है। मनुवादी विषमता में वर्णवादी- जातिवादी समाज व्यवस्था ने पिछडी हुयी जातियों का जीना मुश्किल किया था साथ ही पुरुषसत्ताक व्यवस्था में उनका शोषण भी होता रहा। दलित होने के साथ महिला होने दंश समाज ने और पति की ओर से उन्होंने सहे है। वर्ण व्यवस्था के कारण बचपन से ही उन्हे दबाने की कोशिश की गयी स्कूल, कॉलेज, नौकरी के जगह पर भी उनकी जाति ने उनका पीछा नहीं छोडा। ” मुझे छु जाने पर वे नहाकर शुध्द होते है, यह बात मैं जानती थी। वे मुझसे दूर रहे, इसकी अपेक्षा मैं स्वयं उनसे दूर रहती थी ताकि मेरे कारण किसी को तकलीफ या परेशानी न हो। बचपन से सिखायी गई बातों से यह आदत बन गई थी। ” ९ स्कुल में भी वर्ण तथा जाति व्यवस्था के अनुरुप ही कक्षा का वर्गीकरण किया गया था । बचपन से ही उनके मन पर दासता, आदर्श संस्कार पैर में बेडीयों की तरह बांधे गए थे। सुशीला घर से बाहर जाति के कारण और घर के अंदर स्त्री होने के कारण प्रताड़ित होना पडा। पति के सामने जैसे वह दासी की तरह ही रहती थी। उनके इशारे पर पैरों के पास बैठकर उनके जुते, मोजे उतारना ऎसे काम करने पडते थे। इस बात पर थोडा भी विरोध जताने पर झगडा, मारपीट तो तय ही थी। ” मेरे पैरों पर अपना सिर रखकर माफी मांग, तब मैं तेरी बात मानुँगा। “१० अपने अधिकारों केलिए लडने के कारण उनके हिस्से अपमान और असह्य पीड़ा आयी। इन परिस्थितियों से संघर्ष कर सुशीला ने अपनी पढ़ाई पुरी की, एक महाविद्यालय में अध्यापक की नौकरी भी की है। अपने पति के इस अमानुष बर्ताव के लिए वह लिखती है, ” पुरुष सत्ता बनी रहे इसलिए स्त्रियों को शुरू से कमजोर बनाकर रखा जाता है। समाज की परंपराएँ स्त्री विरोधी है। इन्हें तोडकर ही स्त्री स्वतंत्रता, समता और सम्मान पायेगी ,तब वह अबला नहीं रहेगी, सबला बन जायेगी। ” ११ इस तरह समाज में संघर्ष करके ही प्राचीन मान्यताएँ तोडी जा सकती है इस ओर सुशीला संकेत करती है । पुरुषवादी, मनुवादी मानसिकता पर आक्रोश व्यक्त करते हुए समाज को जागृत होने संदेश देती है।
उपर्युक्त महिला आत्मकथाओं की श्रृंखला हमे इक्कीसवीं सदीं में मिलती है। प्रस्तुत शोध प्रपत्र में हिंदी साहित्य की कुछ गिनी-चुनी आत्मकथाओं का ही उल्लेख किया गया है। इक्कीसवीं सदीं की कौसल्या बैसंत्री, रमणिका गुप्ता, प्रभा खेतान, मन्नु भंडारी, शीला दीक्षित, आशा आपराद, रजनी तिलक, सुषम बेदी, आदि ऐसी अनेक महिलाओं ने अपने जीवन संघर्ष की कहानी हमारे सम्मुख रखी है। इनमें ज्यादातर महिला साहित्य से जुडी हुयी है, किंतु ज्ञान-विज्ञान के हर क्षेत्र की नारीयों ने आमकथा लिखकर उनकी जिंदगी में आए संकट और चुनौतियों का उल्लेख कर हमे हर हाल में न हारते हुए चुनौतियों का सामना करने की प्रेरणा दी है, हमें रास्ता दिखाने की कोशिश की है। सभी आत्मकथाओं का उल्लेख यहाँ पर होना असंभव है।
स्त्री अस्मिता पर विचार करते समय इस बातपर गौर करना जरुरी है कि स्त्री अनेक सामजिक स्तर, विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने के बावजुद भी , उच्चशिक्षित होने पर भी उनका लैंगिक स्तर ही अंतत: निर्णायक भुमिका अदा करता है। पितृसत्ताक समाज ने नारी को सदैव पुरुष का गुलाम और सामाजिक नियमों के अधीन बनाकर रखा । उत्पीडन का अपना अलग सा मनोविज्ञान रहा है। चाहे वह समाज व्यवस्था का नारी के लिए हो या वर्ण के अनुसार हो । नारी का पारिवारिक, सामाजिक,आर्थिक, मानसिक ,दैहिक शोषण होता रहा है। किंतु शिक्षित नारी अब सजग हो चुकी है। भारतीय संविधान ने नारी को जो हक दिए है उसके बलबुतेपर शिक्षित हो रही है, अपने सोच-विचार के दम पर वह अपने अधिकार माँग रही है। इस समाज के विपरीत परिस्थितियों से लडकर हर एक भारतीय स्त्री ने अपना अस्तित्व खोने नहीं दिया । विपरीत परिस्थितियों में रहकर भी हौसले और हिम्मत के कारण यह सभी भारतीय महिला ‘ महिला सशक्तिकरण ‘ का उदाहरण बनकर प्रस्तुत हुई है।
संदर्भ सुची :
- अन्या से अनन्या – प्रभा खेतान – पृ- 255
- कस्तुरी कुण्डल बसै- मैत्रेयी पुष्पा -पृ- 09
- गुडिया भीतर गुडिया- मैत्रेयी पुष्पा- भुमिका से
- जो कहा नहीं गया- कुसुम अंसल -पृ-10
- जो कहा नहीं गया- कुसुम अंसल – पृ-42
- घर और अदालत- लीला सेठ- पृ- 94
- घर और अदालत- लीला सेठ – पृ-99
- घर और अदालत – लीला सेठ- पृ- 258
- शिकंजे का दर्द -सुशीला टाकभौरे- पृ-18
- शिकंजे का दर्द- सुशीला टाकभौरे -पृ- 144
- शिकंजे का दर्द- सुशीला टाकभौरे- पृ-144
- हिंदी साहित्य की कतिपत्य विशिष्ट महिलाएं एवं उनकी रचनाएं – डॉ. देवकृष्ण मौर्य
- प्रतिशोध का दस्तावेज : महिला आत्मकथाएं – डॉ.नीरु
- हिंदी आत्मकथा विद्याशास्त्र और इतिहास – डॉ. बापुराव देसाई
*हिंदी भाषा एवं साहित्यानुवाद केंद्र
जे. ई. एस महाविद्यालय,
जालना-४३१२०३ (महा )
मो. ९८२३६३८४५५
प्रतिबंधित हिन्दी-साहित्य में प्रवासी भारतीय: डॉ. मधुलिका बेन पटेल
विश्वविद्यालय
देश से जुड़े लगभग हर मुद्दों पर चर्चा की गई। इन रचनाओं में महज़ अंग्रेजों से
मुक्ति के संबंध में ही ध्यान नहीं दिया गया वरन् किसान, मजदूर, स्त्री व दलितों के अलावा विदेशों में गुलामों की जिन्दगी
जीने को मजबूर प्रवासी भारतीयों की समस्या को भी बड़ी बेबाकी से उठाया गया। सजग
लेखकों ने प्रवासी भारतीयों के ऊपर होती क्रूर हिंसा को अपनी रचनाओं के माध्यम से
उजागर किया। अंग्रेजी सरकार सीधे-सादे भारतीयों को बहला-फुसला कर विदेश जाने के
लिए राजी कर लेती थी। वहाँ पहुँचने पर उन्हें गुलाम बना लिया जाता था। इस क्रूर
चक्र में फँस कर बेबस, बेसहारे मजदूर अनवरत श्रम और हिंसा के कारण मर-खप जाते।
‘‘फीजी में गन्नों की खेती या चीनी उद्योग के विकास के लिए ब्रिटिश शासकों को
सस्ते मजदूरों की सख्त कमी महसूस हुई। साम्राज्यवादी मनोवृत्ति के अनुरुप अंग्रेज
भारतवासियों की ग़रीबी एवं मजबूरी का अनुचित लाभ उठाने की कला में दक्ष हो चुके
थे। स्वयं नियामक बन कर वे पार्श्व में रहे और छल-नीति का पालन करते हुए भर्ती का
काम भारतवासियों को सौंपा। देश के छोटे नगरों-कस्बों, तीर्थ-स्थानों आदि पर आरकटियों (मक्कार किस्म के दलाल) का
जाल बिछाया गया जो भूले-भटके लोगों-मुसाफिरों को कोई न कोई झांसा देकर
बहकाकर-जैसे-तैसे-नाना हथकंडे अपनाते हुए उन्हें भर्ती के डिपो तक ले आते थे। यह
भर्ती का डिपो न होकर – जाल में फँसाने का एक ऐसा तन्त्र था जहाँ चारों ओर
आरकटियों का आतंक छाया हुआ था। हकीकत से अनजान, दबे-सहमे ये बेबस लोग यंत्रवत सरकारी कार्यवाही पूरी करने देते थे। दूसरे शब्दों में,
उन्हें प्रतिज्ञाबद्ध कुली की मंजूरी देनी पड़ती थी।
धोखाधड़ी में फँसे इन लोगों, को यह नहीं मालूम था कि अब वे इन्सान नहीं रहे,
फीजी शासन के गुलाम हो गए हैं। फीजी में उनके जीवन या
व्यवसाय के किसी पहलू या हित की बात उठाएँ, वह जुल्म या यन्त्रणा से भरी मिलेगी। वहाँ निपट दमन एवं
शोषण का शासन था। अपने देशवासियों की ऐसी अमानुषिक दुर्गति एवं नए प्रकार की
गुलामी की दर्द भरी बातें खुलने लगीं। देशाभिमान जाग उठा और चारों ओर भयंकर विरोध
होने लगा।’’[1]
बिचौलियों को सौंप देती थी। ‘भारत का मजदूर वर्ग: उद्भव और विकास (1830-2010)’
पुस्तक में सुकोमल सेन लिखते हैं,
‘‘इन मजदूरों को भरती करने का तरीका
अवर्णनीय संत्रास से भरा था। यूरोप के मालिक भारत के ग्रामीण इलाकों से मजदूरों को
एकत्र करने के लिए भारत के अपराध जगत से जुडे़ कुछ बिचौलियों का इस्तेमाल करते थे।
इन आदमियों को प्रचलित शब्दों में अरकथी कहा जाता था। यह अरकथी बहुत ही लापरवाह और
बेरहमी से तमाम धूर्ततापूर्ण उपाय अपनाकर इन बेरोजगार, अधनंगे, भूखे ग्रामीण लोगों को लालच देकर भारत से बाहर जाने के लिए
तैयार कर लेते थे।’’[2] झूठे कपट जाल में फँसा कर इन ग्रामीणों को
बँधुआ बना लिया जाता था। वहाँ इन्हें अनवरत श्रम और हिंसा का सामना करना पड़ता था।
ब्रिटिश राज में जब्त की गई पुस्तकों से इस बर्बरतापूर्ण सचाई का खुलासा होता है।
लक्ष्मण सिंह के नाटक ‘कुली-प्रथा’ में प्रवासी भारतीयों की दीन दशा का वर्णन है।
‘‘कुली-प्रथा का लेखन 1913 में और प्रकाशन 1916 में हुआ जिसके पीछे गणेशशंकर विद्यार्थी एवं माखनलाल
चतुर्वेदी की प्रमुख भूमिका रही है। प्रारम्भ में यह नाटक धारावाहिक रुप से
‘प्रताप’ में छपता रहा। इसे पुस्तकाकार मिला 1916 में और तभी इस नाट्य-कृति पर प्रतिबंध लगा दिया गया।’’[3]
बड़ी बेबाकी से साम्राज्यवादी शक्ति के कुरुप चेहरे को बेनकाब किया है। वे
सीधे-सादे ग्रामीणों को आरकटियों द्वारा विभिन्न प्रपंचों में फँसा कर उन्हें
गुलाम बनाए जाने की कहानी कहते हैं। इस संबंध में सत्येन्द्र कुमार तनेजा ने लिखा
हैं, ‘‘अवसर
मिले तो साम्राज्यवाद का चेहरा किस कदर खौफनाक हो सकता है, इस असलियत का अहसास ‘कुली-प्रथा’ नाटक के पाठ से हो जाता
है। फीजी या किसी नए उपनिवेश में खेती-बाड़ी के लिए मजदूर ले जाना एक बात है,
सीधे-सादे लोगों को बहकाकर बँधुआ मजदूर बनाना और गुलाम
व्यापार करना इन्सानियत को ताक पर रखना है। फीजी में निरंकुशता का उन्माद छाया हुआ
था। सनातनी-संस्कारों वाले दम्पति भोलाराम और कुन्ती के बेटे शंकर को घर से भागे
कई वर्ष बीत चुके हैं, उसकी कोई खोज-ख़बर नहीं आई। कुछ उदास कुछ उखडे़ माँ-बाप
तीर्थ यात्रा के लिए जगन्नाथपुरी आए घूम रहे हैं। उधर आरकटियों (ठगों) का एक दल
ऐसे भटके लोगों को अपने जाल में फँसाने में जुटा हुआ है ताकि उन्हें कुली बनाकर
फीजी भेजा जा सके।’’[4] कुलियों को लाने के एवज में आरकटियों को पैसे
मिलते थे। इस बात का खुलासा लक्ष्मण सिंह करते हैं। नाटक के प्रथम अंक (प्रथम
दृश्य) में नौकर के वक्तव्य से यह साफ जाहिर होता है-
फिर किसका डर ? आज उन्होंने लिखा है कि दस कुलियों की आवश्यकता है,
प्रति मनुष्य 210 रुपये मिलेंगे।’’[5] नाटक में सेठ बृजलाल ऐसा ही पात्र है,
जो मनुष्यों की खरीद-फरोख़्त में लिप्त रहता है- ‘‘बृज.:
कुछ क्या, बहुत कुछ है। दस और चाहिए, दस !
हम। ठगी करने के लिए बन जाते कभी डाकटर हैं, ढूँढ़ रोगियों को भेजें फिज़ी अस्पताल में हम;
फाँस लिया करते हैं…।’’[6]
‘‘उन्नीसवीं सदी के तीसरे दशक से प्रारंभ होकर बीसवीं सदी की शुरुआत तक भारतीय
मजदूर वर्ग, अफ्रीका और वेस्ट इंडीज में चीनी के उपनिवेशों प्रवासी मजदूर के रुप में जाता
रहा। भारतीय मजदूर वर्ग के इतिहास में उत्प्रवास का यह दौर एक अत्यधिक हृदय-विदारक
परिघटना है।’’[7] ब्रिटिश राज में जब्त की गई बाबूराम पेंगोरिया
की पुस्तक ‘राष्ट्रीय आल्हा’ में भारतीयों को विदेश भेजे जाने का विवरण है। यह
पुस्तक जैन प्रेस, आगरा से 1930 में प्रकाशित हुई थी। इसमें बाबूराम पेंगोरिया ‘भारत
प्रवासी’ नामक कविता में लिखते हैं-
हजार हैं और शम में चार हजार।।
हैं:
हज़ार ६ सौ है जान।
ब्रिटिश गिना, त्रिनिदाद और जमाइका द्वीप समूह चीनी उत्पादन के लिए
प्रसिद्ध थे। इन द्वीप समूहों में गन्ने के खेतों और चीनी मिलों में दास मजदूरों
से काम लिया जाता था। दासों के व्यापार की समाप्ति के बाद इन दास मजदूरों ने चीनी
मिलों और गन्ने के खेतों में काम करने से मना कर दिया। इससे इन द्वीपों की चीनी
मिलों और गन्ने के खेतों के लिए मजदूरों का भारी संकट उत्पन्न हो गया। तब
साम्राज्यवादियों का समर्थन प्राप्त चीनी उद्योग के धन्ना सेठों ने,
इन उपनिवेशों में भारत के गरीब और भूमिहीन किसानों का मजदूर
के रुप में आयात करना प्रारंभ किया।’’[10]
भारतीय मजदूरों का निर्यात किया जाता था। नाटक के प्रथम अंक के चौथे दृश्य में
युवकों की बातचीत से इस बात का खुलासा होता है,
‘‘पहला: यह देश वीरान और ऊसर- सा पड़ा
था। हड्डीतोड़ परिश्रम की आवश्यकता थी। यह परिश्रम विलासी शरीर से होना असम्भव था।
उस आवश्यकता की कुछ पूर्ति वहाँ के हबशियों ने की, फिर नित्य प्रति बढ़ने वाली उस आवश्यकता ने भारत की
जनसंख्या पर हाथ फेरा। इसी से ¼Indenture Labour System½ अर्थात् ‘प्रतिज्ञाबद्ध कुली-प्रथा’ का अवतार हुआ जिसने
हमारे देशवासियों को गुलामी के कीच में जा उतारा। यह प्रथा बहुत वर्षों से प्रचलित
है। ब्रिटिश उपनिवेशों में, भारतवासी स्त्री-पुरुष शाखों की संख्या में पहुँच चुके
हैं।’’[11] ये मजदूर स्वतंत्र नहीं होते थे। सुकोमल सेन
लिखते हैं, ‘‘इन प्रवासी मजदूरों को स्वतंत्र मजदूर नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह अपनी
श्रमशक्ति बेचने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र नहीं थे। वे अनुबंधित मजदूर थे।’’[12] सीधे-सादे यात्रियों और ग्रामीणों को
बहला-फुसला कर फँसा लिया जाता था। ‘‘इन लोगों को धोखाधड़ी से कैसे भरती किया जाता
था, इसकी
एक मिसाल हरी बिस्वाल की निम्नलिखित गवाही में देखें: मैं कटक का निवासी हूँ। हम
चार लोग रोजगार की तलाश में रुके। एक आदमी जिसके पास बिल्ला (बैज) था वह भी अन्य
यात्रियों के साथ रुका। अगले दिन हम लोग अपनी यात्रा पर निकल पड़े
। वह चपरासी जिसके हाथ पर बिल्ला लगा था वह भी हमारे साथ-साथ
चल दिया। हम लोगों से उसकी बातचीत होने लगी। बातों ही बातों में उसने कहा कि हम
लोग उसके साथ कोलकाता चलें वह नौकरी की व्यवस्था कर देगा। उसने कहा कोलकाता से
मात्र चार दिन की यात्रा पर एक जगह मारीशस है। वह मारीशस में 10 रु. प्रति माह पर नौकरी दिला देगा और मुझे जब चाहूँ
इस्तीफा देने की स्वतंत्रता होगी।’’[13] ‘कुली-प्रथा’ नाटक में भी आरकटियों द्वारा
नौकरी के नाम पर छल-प्रपंच से गुलाम बनाने की नीति दिखाई देती है। कुन्ती का बेटा
शंकर इसी कपट का शिकार होकर फीजी पहुँच गया। ‘‘शंकर: माँ, मैंने अमेरिका जाने की इच्छा से घर छोड़ा। दो वर्ष तक
इधर-उधर घूमता रहा। आरकटियों ने धोखा दे यहाँ भेज दिया।’’[14]
‘फिजीद्वीप में मेरे 21 वर्ष’ पुस्तक में तोताराम सनाढ्य इस कठोर जीवन की रुपरेखा
बयान करते हैं। उन्होंने लिखा है, ‘‘सन् 1893 ई. में नौकरी के लिए मैं घर से निकल कर पैदल चल दिया। मेरे
पास कुल सात आने पैसे थे। मार्ग में अनेक कठिनाईयों का सामना करता हुआ कोई सोलह
दिन में प्रयाग पहुँचा। बस, इसी स्थान से मेरी तुच्छ जीवनी की दुःखजनक रामकहानी प्रारंभ
होती है।…एक दिन मैं कोतवाली के पास चौक में इसी चिंता में निमग्न था कि इतने
में मेरे पास एक अपरिचित व्यक्ति आया और उसने मुझसे कहा: क्या तुम नौकरी करना
चाहते हो ? मैंने कहा: हाँ। तब उसने कहा: अच्छा, हम तुम्हें बहुत अच्छी नौकरी दिलवायेंगे। ऐसी नौकरी कि
तुम्हारा दिल खुश हो जाय।’’[15] सीधे-सादे भारतवासियों को किस प्रकार बहकाया
जाता था इसका वर्णन भी तोताराम जी करते हैं। वे बताते हैं,
‘‘वह आरकाटी मुझे बहकाकर अपने घर ले
गया वहाँ जाकर मैंने देखा कि एक दालान में लगभग एक सौ पुरुष और दूसरे में करीब साठ
स्त्रियाँ बैठी हुई हैं। कुछ लोग गीली लकडि़यों से रसोई कर रहे थे और चूल्हा
फूँकते-फूँकते हैरान हो रहे थे।’’[16] जब तोताराम सनाढ्य ने नौकरी करने से मना कर दिया
तो उनके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया गया। ‘‘जब मैं समझाए जाने पर किसी तरह राजी न
हुआ, तो एक
कोठरी में बंद कर दिया गया। एक दिन एक रात मैं भूखा-प्यासा इसी कोठरी में रहा। अंत
में लाचार होकर मुझे कहना पड़ा कि मैं फिजी जाने को राजी हूँ।’’[17]
यहाँ से भारी संख्या में नागरिकों को बाहर भेजा गया, जिनकी दशा अच्छी न थी। लक्ष्मण सिंह लिखते हैं,
‘‘वहाँ की सरकार का नियम है कि कोई
एशियावासी, विशेषकर भारतीय, विशेष प्रान्तों को छोड़ दूसरे प्रान्तों की सीमा में पैर
नहीं रख सकता, और न वह सोने की खानों के आसपास डेढ़ मील के अन्दर रह सकता है। उसका मकान नगर
के बाहर मीलों दूर होना चाहिए। सारांश वहाँ उन्हें पाले हुए पशुओं से अधिक
स्वाधीनता नहीं। फिज़ी इत्यादि द्वीपों में पाँच वर्ष पश्चात् प्रतिज्ञा से
छुटकारा पाने पर भी उन्हें स्वतंत्रता के स्वत्व नहीं दिए जाते। केनेडा,
आस्ट्रेलिया आदि उपनिवेशों में तो कोई भारतवासी जा ही नहीं
सकता। ये तो हुई वहाँ की बातें जहाँ हमारे अंग्रेज बहादुर का राज्य है। अब
यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका में नियम बनने वाला है कि वहाँ भारतवासी न धँसने
पाँवें। बात सच है, जो घर में ही दुरदुराया जावे उसका बाहर कौन मान करेगा ?
पोर्चुगााल वालों के पूर्वीय अफ्रीका का नियम है कि जो
भारतवासी वहाँ जाकर रहेगा उस पर कर लगेगा। अंग्रेजी उपनिवेशों में ही नहीं किन्तु
विदेशीय उपनिवेशों में भी भारतवासी, कुली भेजे जाते हैं। 1912 के दिसम्बर में डच गायना में 4669 भारतीय कुली थे। वहाँ पर भी वे अत्याचारों से नहीं बचते।
अपने देश भारतवर्ष में भी हमारी दशा शोचनीय है। कहीं निलहे कोठी वाले दुहरा लगान
वसूल करते हैं, कहीं चाय बागान वाले नादिरशाही मचाते हैं, कहीं बेगार वाले औरंगजे़बी करते हैं और कहीं बात-बात पर
ठोकरें पड़ती हैं।’’[18]
बनाने के लिए लोगों का अपहरण भी होता था। ‘‘प्र. क्या आप 1837 के ऐक्ट नं. v के पारित होने से पहले अगवा करने की घटनाओं से भली प्रकार
अवगत हैं ? उ. इस तरह की घटनाएँ होती थीं। मुझे एक घटना याद है जिसमें एक औरत को बेहोश कर
के एक बक्से में बंद कर दिया गया था। वे लोग उसे मैदान के पार ले जा रहे थे तभी
उसे होश आ गया। उसे काट डाला गया था। मैं इससे अधिक कुछ नहीं बता सकता। बंगाल
प्रान्त के निचले भाग में बड़े पैमाने पर
अपहरण की घटनाएँ होती हैं।’’[19] भारतीय कुलियों पर होने वाले अत्याचारों की
कहानी यत्र-तत्र प्रकाशित होने लगी थी। ‘‘15 जून 1938 को बांबे गजेट में इस दर्दनाक घटना के बारे में लिखा गया:
इन ठगे गए मजदूरों को नौकरी का भुलावा देकर घर से बहका कर लाया जाता। जलपोतों में
भर कर उनको गंतव्य को भेजा जाता, तभी से वह अपने काम लेने वाले मालिक के आधीन हो जाते मानो
उनका जन्म ही गुलामी में हुआ है। उन्हें ऐसे उपनिवेशों में भेजा जाता जहां दास
प्रथा समाप्त हो गई थी लेकिन वे दास बना दिए जाते।’’[20] कुलियों पर होने वाले अत्याचारों की कोई सीमा न
थी। वे इस बात की फरियाद कहीं नहीं कर सकते थे। नाटक ‘कुली-प्रथा’ में एक
हिन्दुस्तानी का वक्तव्य है: महाराज, मैं जिस प्रकार बहकाकर लाया गया उसके कहने की कोई आवश्यकता
नहीं। और यहाँ पर जैसे-तैसे कष्ट हुए या होते हैं वे शायद आप को मालूम ही होंगे।
मैं ‘शायद’ इसलिए कहता हूँ कि जब से आप के आने की ख़बर सुनी है तब से सब कोठी वाले
ने और इंस्पेक्टरों ने कुलियों को धमका रखा है कि जो कोई हमारे विरुद्ध बात कहेगा
उसे याद रखना चाहिए के गिरमिट खतम होने तक उसे हमारे ही हाथ रहना होगा। इस प्रकार
धमका के उन्होंने सब बातें पहले से ही गवाहियों को सिखा रखी थीं। आप अभी ‘न्यूचू’
गाँव से यहाँ आए, इसी बीच देखिए मुझ पर कैसी मार पड़ी ?
गवाही देते समय मैंने आप से कह दिया था कि पूरा पूरा भोजन
नहीं मिलता। आपके पीछे इंस्पेक्टर ने मुझे बुलाकर इस बात के कहने के दोष में इतना
मारा कि मेरे ये दाँत टूट गए।’’[21] इन भारतीय मजदूरों के साथ जानवरों की तरह
व्यवहार किया जाता था। ‘‘बुरी तरह से भरे हुए मालवाहक जलपोत में जानवरों की तरह
ठूंस-ठूंस कर उनको भर दिया जाता है, उनको आधा पेट खाना दिया जाता है। उनके साथ दुर्व्यवहार किया
जाता है और दवा आदि की कोई सुविधा नहीं दी जाती। इन अभागे मजदूरों में से कुछ तो
मार्ग में ही मर जाते हैं, बाकी मजदूर जब गंतव्य स्थान पर पहुँचते हैं तो वह बुरी तरह
थके-हारे होते हैं। अपने को इन उपनिवेशों के वातावरण के अनुकूल बनाना भी इनके लिए
अग्नि परीक्षा है। इन उपनिवेशों में काम की स्थितियाँ अति कठिन थीं। इन मजदूरों को
प्रतिदिन 12 से 15 घंटे काम करना पड़ता था। गन्ने के खेतों और चीनी मिलों में अत्यधिक कठिन काम
होने के कारण मजदूरों को अपना लक्ष्य पूरा करने के लिए अधिकतर रात में भी काम करना
पड़ता था। बुरी तरह से थके और निराश,
वह देर रात घर लौटते। जब वे खेतों और मिल में काम करते तो
उन पर कार्यनिरक्षक (दरोगा) निरंतर निगरानी रखता, मानो गुलामों से
काम करा रहा हो। अवकाश के दिन (रविवार) भी इनको कोई न कोई काम सौंप दिया
जाता। कुछ उपनिवेशों में तो उनको 18 घंटे तक काम करना पड़ता था। इस अत्यधिक कठोर काम के कारण
मजदूरों की मृत्युदर भी बहुत अधिक थी।’’[22]
में एक फिजि़यन के कथन से इस अमानवीयता का पता चलता है। ‘‘फिजि़यन: इतने में
इंस्पेक्टर साहब आए। उन्होंने धमका कर दस कोडे़ लगाए तो वह पाजी काम पर जाने की
अपेक्षा वहीं लेट गया। इससे हुजूर, इंस्पेक्टर साहब अधिक क्रुद्ध हुए। और उन्होंने,
फेंक कोट और बाँह चढ़ाकर,/झुँझलाकर और आगे बढ़कर।/घूँसा बाज़ी खूब मचाई,/उसकी यों आपद घिर आई।/कभी पीठ पर, कभी पेट पर,/कभी आँख पर, कभी नाक पर।/कभी गाल पर, कभी कान पर।।/दे दनादन खून वहाँ फिर,/दाँत वाँत इस पाँच गए गिर।’’[23]
शारीरिक शोषण भी होता था। इस संबंध में तोताराम सनाढ्य ने लिखा है,
‘‘आरकटियों ने कुंती और उसके पति को
लखुआपुर जिला गोरखपुर से बहका कर फिजी को भेज दिया था। इन लोगों को वहाँ बड़े बड़े
कष्ट सहने पडे़। इस समय कुंती की अवस्था 20 वर्ष की थी। बड़ी कठिनाईयों से कुंती 4 वर्ष तक अपने सतीत्व की रक्षा कर सकी। तदनंतर सरदार और
ओवरसियर उसके सतीत्व को नष्ट करने के लिए सिरतोड़ कोशिश करने लगे। 10 अप्रैल 1912 को ओवरसियर ने कुंती को साबू केरे नामक केले के खेत में सब
स्त्रियों और पुरुषों से पृथक घास काटने का काम दिया, जहाँ कोई गवाह न मिल सके और चिल्लाने पर भी कोई न सुन सके।
वहाँ उसके साथ पाशविक अत्याचार करने के लिए सरदार और ओवरसियर पहुँचे। सरदार ने
ओवरसियर के धमकाने पर कुंती का हाथ पकड़ना चाहा। कुंती हाथ छुड़ाकर भागी और पास की
नदी में कूद पड़ी।’’[24]
‘‘ब्रजलाल: अरे भाई, गान्ट साहब की कोठी में तो सौ आदमियों के बीच कुल पच्चीस
स्त्रियाँ रह गई हैं। वहाँ अभी आठ और चाहिए। आज्ञा है कि कम-से-कम तीन पुरुषों के
लिए एक स्त्री अवश्य हो।’’[25] अब्बास के कथन से उनके ऊपर होने वाले क्रूर
हिंसा का पता चलता है। कुली-प्रथा में यह
आम बात थी कि सद्यः प्रसूता को भी काम पर जाना पड़ता था। अत्याचार की इस पराकाष्ठा
को देख अब्बास कहता है: ‘‘या ख़ुदा, पाक परवरदिगार, तू ने ठीक ही किया जो ऐसे पापी को मेरे हाथों से मरवाया।
ओफ़! इसने एक दिन दस बारह स्त्रियों को एक क़तार में खड़ी कर के उन्हें उनके
बिलखते हुए बच्चों के ही सामने गेंडे की खाल के कोडे़ से मारा था,
और इतना निर्दयता से कि उनके मोटे कपड़ों के ऊपर होकर ख़ून
बहने लगा था। इसने क्या-क्या नहीं किया ? एक दिन एक स्त्री अपने पाँच दिन के बच्चे को लेकर काम करने
खेत पर आई थी। दोपहर को जब उसे प्यास लगी तो पानी पीने के लिए नदी पर गई। वहाँ
छाया में बैठकर अपने बच्चे को दूध पिला रही थी। दुर्भाग्य से यह पापी वहाँ आ
निकला। इसने उस दूध पीते बच्चे को खींच के नदी में फेंक दिया। मुँह से दूध उगलता
हुआ बच्चा नदी में गिर कर बह गया। यह दुष्ट उस नारी के चिल्लाने की परवाह न कर
उसके बाल पकड़ खींचता हुआ खेत पर ले आया। उस दिन से सब स्त्रियाँ अपने बच्चों के
पैर खूँटे से बाँध, घर में बन्दकर, ताला लगा, खेतों में आती हैं। उस समय यदि कोई कुलियों की झोपड़ी की ओर
चला जावे तो भूखे बच्चों के चिल्लाने और रोने की आवाज से उसका हृदय फटने लगता है।
इसने ज़बरदस्ती स्त्रियों को दूषित किया, इसलिए कई कुलियों ने अपनी स्त्रियों को मार डाला,
और आप फाँसी पर चढ़ गए।’’[26] कहना न होगा कि प्रवासी भारतीयों पर अत्याचार की
कोई सीमा न थी। अपनी रचनाओं में सजग लेखक समुदाय इनके खिलाफ आवाज बुलंद करने लगा
था। उनकी अति दारुण दशा को जनमानस के सामने रखा जाने लगा। इस सक्रियता को देख
ब्रिटिश सरकार ने सख़्त कदम उठाए। उसने इन रचनाओं को जब्त घोषित कर दिया। बावजूद
इसके, लेखक,
संपादक मंडल बड़े साहस के साथ इस अभियान में लगे रहे।
: सितम की इंतिहा क्या है ? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं. 134
(1830-2010) , ग्रन्थ शिल्पी , प्रथम संस्करण 2012, पृ. सं. 61
: सितम की इंतिहा क्या है ? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं. 135
: सितम की इंतिहा क्या है ? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं. 136
: सितम की इंतिहा क्या है ? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं.158
: सितम की इंतिहा क्या है ? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं.158
मजदूर वर्ग : उद्भव और विकास (1830-2010) , ग्रन्थ शिल्पी, प्रथम संस्करण 2012, पृ. सं.60
मजदूर वर्ग : उद्भव और विकास (1830-2010) , ग्रन्थ शिल्पी , प्रथम संस्करण 2012, पृ. सं.60
: सितम की इंतिहा क्या है ? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं.166
मजदूर वर्ग : उद्भव और विकास (1830-2010) , ग्रन्थ शिल्पी, प्रथम संस्करण 2012, पृ. सं.60
मजदूर वर्ग : उद्भव और विकास (1830-2010) , ग्रन्थ शिल्पी, प्रथम संस्करण 2012, पृ. सं.62
: सितम की इंतिहा क्या है ? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं.202
फ़िजीद्वीप में मेरे 21 वर्ष; http://www.hindisamay.com/vividh/fizi-dveep-me-mere-21-varsh.html
Hindi samay . com
फ़िजीद्वीप में मेरे 21 वर्ष ;
http://www.hindisamay.com/vividh/fizi-dveep-me-mere-21-varsh.html Hindi samay
. com
फ़िजीद्वीप में मेरे 21 वर्ष ;
http://www.hindisamay.com/vividh/fizi-dveep-me-mere-21-varsh.html Hindi samay
. com
: सितम की इंतिहा क्या है ? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं.166
मजदूर वर्ग : उद्भव और विकास (1830-2010) , ग्रन्थ शिल्पी , प्रथम संस्करण 2012, पृ. सं.63
मजदूर वर्ग : उद्भव और विकास (1830-2010) , ग्रन्थ शिल्पी , प्रथम संस्करण 2012, पृ. सं.64
: सितम की इंतिहा क्या है ? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं.197
मजदूर वर्ग : उद्भव और विकास (1830-2010) , ग्रन्थ शिल्पी , प्रथम संस्करण 2012, पृ. सं. 65
: सितम की इंतिहा क्या है ? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं190
फ़िजीद्वीप में मेरे 21 वर्ष ;
http://www.hindisamay.com/vividh/fizi-dveep-me-mere-21-varsh.html Hindi samay
. com
: सितम की इंतिहा क्या है ? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं.184
: सितम की इंतिहा क्या है ? :राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010 . पृ. सं.215
प्रज्ञा जी की पांच कविताएँ-
कैसे बिसराउँ?
भर की छोरी
लगे तेरी जबान मे
हैसियत देखती है न सच
तुझे चाहिए चंदा
खिलौना है क्या?
सी लम्बी हो गयी
जिद्द तो देखो तुझसे भी दो हाथ आगे
ही जिद चंदा की रट
से देख ले न जी भर
में दाम चडा है तेरे चंदा का।
न बिटिया चली जा
घर
जा चंदा को
भी भूल गयी थी देहरी लांघकर
है न
के चंदा को सुबह का सूरज निगल जाता है।
में बसा आँख में चमकता
से फिसलता हथेली पे रचा
में हुलसता
कैसे बिसराउँ ?
आखिरी सांस की आस है
किसी देबता में हिम्मत
निगल जाए इसे मेरे संग पूरा।
बहनें
छोटी -सी चारपाई पर
वाली चादर बिछाकर
खींचते थे सरहदें
और मेरी आज़ादी की..
की आगोश में जाने से पहले
हमारे अनगिनत झगड़े
के।
मन में कितना हंसती होगी
पर ,तुझ पर
बान को कसने वाले हर इंसान पर
मज़बूत हाथों से बंधा बान था
नहीं छोड़ता था कोई झोल
था एकदम कसा
था तो बान ही …कोई इस्पाती चादर नहीं
की स्लैब भी नहीं
की आगोश में जाते -जाते
झूला बन जाता था
हो जाती थी सारी लड़ाई
जाती थीं तमाम सरहदें
तेरी -मेरी आज़ादी
आज़ादी बन जाती..
हुए हम साथ भरते थे
..बहुत ऊँची पींगें
जाती सात आसमां पार
हमारी आज़ादी की चीख
भी सात आसमां पार।
सुबह माँ को मिलतीं
बनी चारपाई में
डाले
सपनों में डूबी
बहनें।
आइलैंड को देखकर
घर बसाने नहीं आये थे
सपना होते हैं।
घर छोड़ हुकूमत को तुमने पैर पसारे
खूबसूरत ज़मीनों को आँखों में भरा
की गंध को अपने नथुनों में
के परों पर सवार
इसे हथिया लिया।
उठाने ,
बनाने को मज़दूर मुफ्त मिले
कैदी तुम्हारे हुकुम बजाते
बगिया सींचते
हर ज़ुल्म के बदले फूल खिलाते।
दिमाग में चल रही क्रान्ति की उधेड़बुन से
क्या वास्ता?
मतलब उनके हाथ और पाँव से
खून और पसीने से
उनके दिमाग के दुश्मन थे
, जो
मुक्ति की राह बुनते।
-बुनने वाली सलाइयां तुमने मिटा डालीं
भौंक दीं सपने देखने वाली आँखों में।
का बहुत छोटा -सा सच तुम नहीं जान पाए
खत्म होने पर भी सपने कहाँ मरते हैं?
बनाते गये इमारत दर इमारत।
की कायनात में अपनी बस्तियां बसा लीं
की सुकून भरी सुंदर गोद में
महफिलें सजाते
जीत का जश्न मनाते
बनाते हर हफ्ते की रंगारंग सूचियां
मुताबिक खान- पान
आराम।
गया ये द्वीप
का पेरिस।
गिरफ्त में हमारी धरती की देन
अमर कोष
अभूतपूर्व सौंदर्य के बीच तुम राजा
चाकर
दास।
ज़ुल्म के बाद भी बने रहे तुम धार्मिक
आस्थावान
में प्रार्थना के पाबन्द।
इतने सालों बाद यहाँ कोई नहीं
उजाड़ पसरा है।
मिटा देता है ऐशो आराम के सब निशाँ
की मिसालें।
नहीं, कोई
महफ़िल नहीं
कोई नाम भी नहीं
उन कब्रों के
तुम्हारे नन्हें बच्चे , नौजवानऔर औरतें
कबसे सो रहे हैं
कभी नहीं जगाया उन्हें।
के नियम इंसान तय नहीं करता
हर इमारत हमारी प्रकृति की गिरफ्त में है
इमारतों में छत के बिना
घुसा चला आया है
-दीवार पेड़ों ने कब्जा लिये हैं
रहीं इमारतों में दिखती हैं पेड़ों की जड़ें
में और -और फूट आईं जड़ें
जैसे अन्यायी को सजा देने निकली।
का सब क्रोध, पीड़ा
के उफान को लिए
चढ़ती चली आ रही हैं
गईं हैं रास्तों में,
गई तुम्हारी महफिलों के हर नक्श
फोड़कर चिल्लाती बढ़ी चली आ रही हैं
कबसे।
ये प्रतिशोध है
बर्बर क्रूरताओं से भी सघन
अट्टहास के मुकाबिले शांत
भीतर की घुटन और गुबार को पटकता
जो दफन रहा धरती के दिल में
क्रंदन फ़ैल गया चहुँ ओर।
तुम अपनी सम्पूर्ण यशगाथाओं के संग
नहीं हुए…
, फोड़ दी
गयी आँखों का सपना लेकर
जन्मी है।
लगता है
भी जैसे समय है
हर ताकत को
दम्भ मेंफूली इतराती है
माकूल जगह दिखाती है।
दीवारों पर आज तलक
हैं पीड़ा की अनन्त गाथाएं
सनी दीवारों की पतली ईंटों के बारीक सुराखों
बीच से
उठाते हैं अनगिनत चेहरे
बोलते नहीं
हैं चुप्पियां।
में रात भर डुबोई बेंत से
पर बही आई लहू की नदियां
को बेतरह चीखती हैं ।
की मज़बूत सलाखों के सामने भी
दीवारें ही दीवारें
सहलाना तो दूर, उनकी
आवाज़ भी नहीं
कहीं।
से कोल्हू में तेल पिराती उँगलियों
समुद्र तल से उठती कराह
के दुस्साहस की मिसाल ही तो है ।
जिसे खत्म करने को आदमी आमादा है
ज़िंदा मौत का परवाना रोज़ निकालता है
करता है इंसानों के टूट जाने पर
के अपमान की
कहानियां यहाँ दर्ज हैं।
इतिहास पर गर्व करता है जालिम।
बेशर्मी से
रहकर करता है
मन का हरा रंग
मन पर पड़े बेजान पीले पत्ते बुहार देता है
उभरी नसों की नीलाई
कर मेरे दिमाग में बन जाती है विचार
रक्ताभ हथेलियाँ
थाम लेती हैं मेरी बाहें
जाता है विराट इंद्रधनुष।
की इस दुनिया में
रंग तेरा
रंग मेरा
खिला देते हैं हज़ारों रंग।
रंग मिलकर न जाने कहाँ से ले आते हैं
सा उजाला
की खनक।
आँखों में उतर आती है
से बहती कोई अजस्र धार।
हमारे सपनों की दुनिया के रंग
और चटख हो जाते हैं।।
प्रज्ञा की किताब ‘नाटक से संवाद’ का लोकार्पण
पुस्तक मेले के दूसरे दिन 8 जनवरी को अनामिका प्रकाशन से आई
डॉ प्रज्ञा की किताब ‘नाटक से सम्वाद‘ का
लोकार्पण हुआ. नाटक पर केंद्रित डॉ
प्रज्ञा की यह तीसरी किताब है। किताब का लोकार्पण स्वराज प्रकाशन के स्टाल पर हुआ।
शीर्षक की प्रामाणिकता को पुस्तक के लोकार्पण में भलीभाँतिपूर्वक देखा जा सकता
था.इस अवसर पर दो वरिष्ठ नाट्यचिन्तक-डॉ प्रताप सहगल, प्रो
देवेंद्रराज अंकुर ने विस्तार से अपनी बात नाटक और प्रज्ञा की नाट्य आलोचना दृष्टि
पर केंद्रित की। कार्यक्रम का संचालन डॉ
राकेश कुमार ने किया। सम्वाद की शुरुआत नाटककार-आलोचक प्रताप सहगल जी ने की। जिसमें उन्होंने पुस्तक की विषयगत विविधता
जैसे- बाल रंगमंच, नुक्कड़ नाटक, अस्मिता
रंगमंच, अभिनेता व नाटककार के साथ सम्वाद और नाट्य संस्थाओ
की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की. उन्होंने किताब के आने को एक घटना के रूप में
लेते हुए कहा कि “नाटक पर केंद्रित किताबें कम हैं और अच्छी किताबें बहुत कम
हैं। उसमें प्रज्ञा की किताब सुचिंतित तरीके से,रंग दृष्टि
से और मंजी हुई भाषा में लिखी गई किताब है।” उन्होंने ‘माधवी‘
और नाटककार विजय तेंदुलकर पर आधारित लेखों को बेहद जरूरी
बताया। प्रसिद्ध रंगकर्मी और रंग चिन्तक
देवेंद्र राज़ अंकुर जी ने डॉ प्रज्ञा के
नाटक की दृष्टि से किये गए पहले के कामों-
में नुक्कड़ नाटक की स्थापना को लेकर लिखा गया पुस्तक ‘नुक्कड़
नाटक: रचना और प्रस्तुति‘ तथा नुक्कड़ नाटक संचयन ‘जनता के बीच जनता की बात‘ सरीखे मह्त्वपूर्ण कामों
के लिए बधाई दी. उनके सम्वादों में रंगमंच की एक चिंता साफ झलक रही थी कि नाटक और
उसके मंचन के बारे में जो पढा-लिखा तथा शोध किया जा रहा है वह बेहद सतही होता है.
जिसमें हम नाटक पर काम तो करते हैं लेकिन अपने किताबों से निकल रंगमंच की दुनिया को देखने की जहमत भी
नहीं उठा पाते. नाटकों की समझ को पुख्ता बनाने के लिए जरुर रंगमंच की चार दीवारी
में प्रवेश करना होगा तभी रंगकर्म पर सार्थक लिखा-पढा जाना सार्थक हो पायेगा. इस
दृष्टि से उन्होंने प्रज्ञा के काम का मूल्यांकन विश्वविद्यालयों की दृष्टि से
बाहर रंगमंच की दृष्टि के भीतर माना। उनका कहना था प्रज्ञा का काम उसी सार्थकता की तलाश है और उम्मीद है
इसी तरह वे अपना सम्वाद नाटकों से हमेशा कायम रखें. उन्होंने ये भी कहा कि “अब तक नाटक में
सम्वाद की बात होती थी प्रज्ञा ने नाटक से सम्वाद की बात की है। दोनों वरिष्ठ
रंगकर्मी ने ‘माधवी‘ और विजय तेन्दुलकर
पर लिखे लेख की प्रशंसा की. अस्मिता नाट्य संस्था के अरविन्द गौड़ जी से रंगमंच के
बारे में तथा पुस्तक के बारे में बातें हुई.
साहित्यकार जयप्रकाश कर्दम , रमेश उपाध्याय ,प्रेम जनमजेय के अलावा कवि-व्यंग्यकार लालित्य ललित , नामदेव और स्वराज प्रकाशन के अजय
मिश्रा ने भी प्रज्ञा को अपनी शुभकामनाएं दीं। प्रेम जनमेजय जी ने कहा
“प्रज्ञा की क्षमताओं पर मुझे पूरा भरोसा है। इनसे बहुत अपेक्षाएं हैं। नाटक
पर लिखते रहने के साथ ये कहानियां लिखना कभी न छोड़ें।”
उपाध्याय, अंकित, विकास, मनीषा ,राजीव, बरखा,साजिद, देवेश, दीपक, ललिता जैसे रचनाकार, शोध छात्र और युवा रंगकर्मी भी
मौजूद थे। मेले के माहौल में भी इस गम्भीर कार्यक्रम के समापन पर प्रज्ञा ने सबका
आभार व्यक्त करते हुए कहा-” मैं विश्वास दिलाती हूँ नाटक से सम्वाद की मेरी
यात्रा चलती रहेगी और मुझे भरोसा है इस किताब को पढ़कर आप भी मुझसे सम्वाद करेंगे।
पेरियार ललई के सन्दर्भ में एक दुर्लभ जानकारी: धर्मवीर यादव गगन
पेरियार ललई के सन्दर्भ में एक दुर्लभ जानकारी….
पूर्वोत्तर भारत के पर्व-त्योहार
पूर्वोत्तर भारत के पर्व-त्योहार
मोन्यू त्योहार (Monyu Festival)फोम नागालैंड की एक प्रमुख जनजाति है I यह समुदाय चार प्रमुख त्योहार मनाता है जिसमें मोन्यू सबसे महत्वपूर्ण है I अन्य त्योहार हैं – मोहा, बोंगवुम और पांगमो I मोन्यू 1-6 अप्रैल को शरद ऋतु की समाप्ति और ग्रीष्म ऋतु के आरम्भ में मनाया जाता है I यह बारह दिवसीय त्योहार है जिसमें सामुदायिक भोज, नृत्य, गीत का आयोजन किया जाता है I इस अवसर पर साफ–सफाई और पुल आदि की मरम्मत भी की जाती है I इस त्योहार में पुरुष अपनी विवाहित पुत्रियों के प्रति स्नेह और सम्मान का प्रदर्शन करने के लिए मदिरा और अन्य विशेष व्यंजन प्रस्तुत करते हैं I त्योहार आरम्भ होने के पूर्व विशेष धुन पर पारंपरिक लॉग ड्रम बजाय जाता है ताकि ग्रामवासियों को ज्ञात हो जाए कि एक–दो दिनों में त्योहार की शुरुआत होनेवाली है I पुजारी और गाँव के बुजुर्ग भविष्यवाणी करते हैं कि यह त्योहार ग्रामवासियों के लिए वरदान सिद्ध होनेवाला है अथवा अभिशाप I
आओलियंग त्योहार (Aoleang Festival)आओलियंग नागालैंड की कोन्यक जनजाति का एक प्रमुख त्योहार है I प्रत्येक वर्ष 1-3 अप्रैल को इस त्योहार का आयोजन किया जाता है I नए खेत में बीज बोने के बाद यह त्योहार मनाया जाता है। यह पुराने वर्ष की विदाई और नए वर्ष का स्वागत करने का त्योहार है । इस त्योहार के अवसर पर भरपूर फसल व धन–धान्य के लिए ईश्वर से प्रार्थना की जाती है। इस त्योहार का आयोजन अत्यंत धूमधाम और उत्साह के साथ किया जाता है। इस त्योहार के प्रत्येक दिन का अपना महत्व, रीति रिवाज और परंपरा है। यह त्योहार प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी प्रतिबिंबित करता है I इस त्योहार के अवसर पर कोन्यक जनजाति के स्वदेशी नृत्य, गीत और खेल का प्रदर्शन किया जाता है । त्योहार के पहले दिन को “मान लाई याह नइह” के नाम से जाना जाता है जो त्योहार की तैयारी करने का दिन है। “यिन मोक फो न्यह” त्योहार का दूसरा दिन है I इस दिन नए युवकों को शिकार करना सिखाया जाता है । जिस दिन शिकार किए गए जानवरों को मारा जाता है वह त्योहार का तीसरा दिन है I इस दिन को “यिन मोक शेक न्यह” कहा जाता है। त्योहार का चौथा दिन सबसे महत्वपूर्ण दिन है जिसे “लिंग्यु न्यह” कहा जाता है । “लिंग न्यह” त्योहार का पाँचवाँ दिन है I इस दिन कोन्यक समुदाय के युवा अपने बुजुर्गों का सम्मान करते हैं और उनके प्रति अपना आभार व्यक्त करते हैं । त्योहार के अंतिम दिन को “लिंगशान न्यह” कहा जाता है I इस दिन घरों और गाँवों की साफ़-सफाई की जाती है I














