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प्रेम दिवस -चंद दोहे -ओंम प्रकाश नौटियाल

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प्रेम दिवस के पर्व  में , प्रेम बिका बाजार
महँगी  जितनी  भेंट है, छिछला उतना प्यार

प्रेम गली जब तंग थी , गया वक्त वह बीत
अब है पूरा राजपथ ,  साथ  मीत ही  मीत

गत वर्ष बनी प्रेमिका , अब अतीत की बात
फिर से नई तलाश कर, लुटा रहे सौगात

सात समंदर पार से , मिला ज्ञान  यह खूब
प्रेम दिवस बस नियत है, नियत नही महबूब

दुनियाँ को हमने दिया, पावन प्रेम  स्वरूप
अब करते आयात हम,  भोंडा इसका  रूप

प्रेम शाश्वत सत्य यहाँ ,जन्म जन्म का मेल
पश्चिम की अंधी नकल , इसे बनाती खेल

आई है  वसंती ऋतु  , खिले  प्रेम  के  फ़ूल
जीवन महकेगा तभी , निष्ठा हो   जब मूल
-ओंम प्रकाश नौटियाल
(पूर्व प्रकाशित-सर्वाधिकार सुरक्षित)

प्रेम की आवाज

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प्रेम
की आवाज
-ओंम प्रकाश नौटियाल
गीतिका
प्रेम
की आ्वाज अब जमाने में
तूतरी
सी ज्यों नक्कारखाने में
ढह
गए अरमान सुकून चैन के अब
मुद्दतें
बीती जिन्हें कमाने में
मनुष्यता
की बदल गई परिभाषा
है
बहुत ही शान बरगलाने में
ढूंढते
विकर्मी धर्म हत्याओं में
गैर
बनकर रीझते सताने में
’ओंम
’ ऐसा ही रहा मंजर जो यह
युग
लगेंगे फिर बहार आने में
-ओंम प्रकाश
नौटियाल
, बड़ौदा , मोबा.9427345810

प्रेम

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                 प्रेम 

नयन बंद कर जब वो मुझसे, आँख मिचोली खेल रही |
वो इठलाती-बहलाती, मधुबाला सी डोल रही ||
वो जब-जब कोमल हाथो से, मुझको स्पर्श कर जाती है |
वो मेरे ह्रदय की धडकन को, थोडा और बढ़ाती है ||
उसके तीखे नैनो के,इशारे कातिलाना है |
वो हसती है तो जैसे गर्मी में,सूरज का छिप जाना है ||
© आशीष कुमार पाण्डेय

प्राथमिक स्तर की शिक्षा व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में एक अध्ययन

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shallow focus photo of girl holding newspaper
Photo by jaikishan patel on Unsplash

प्राथमिक स्तर की शिक्षा व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में एक अध्ययन

दिनेश कुमार
शोध छात्र
पाश्चात्य इतिहास विभाग
लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ

शोध सार

प्रस्तुत शोध पत्र में वर्तमान प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था पर प्रकाश डाला गया है और उसके साथ ही प्राथमिक शिक्षा को कैसे गुणवत्तापूर्ण बनाया जाए जिससे कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को उचित शिक्षा उपलब्ध कराई जा सके और देश का समुचित विकास किया जा सके। शिक्षा के माध्यम से बालक का शोधन एवं मार्गांतीकरण किय जाता है।

कुंजी -शब्द:- सर्वांगीण,गुणवत्तापरक, शोधन, मार्गांतीकरण, क्रियान्वयन, संलग्न, नवाचार, शिक्षाशास्त्री, रोजगारोन्मुखी, व्यावसायीकरण, भविष्योन्मुखी, अध्ययनशील, न्यायालय, इलाहाबाद, जनसंख्या आदि।

परिचय:-

किसी भी देश का सर्वांगीण विकास वहां की शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करता है क्योंकि शिक्षा ही मनुष्य की प्रगति का आधार है। औपचारिक शिक्षा व्यवस्था के प्रथम स्तर को प्राथमिक शिक्षा स्तर कहा जाता है। यह शिक्षा 6 वर्ष की आयु से 14 वर्ष की आयु तक चलती है।1 यह प्रगति पूर्ण रूप से तभी संभव है, जब प्राथमिक स्तर पर ही बालक को उचित शिक्षा दी जाए और सही मार्गदर्शन किया जाय। प्राथमिक शिक्षा छात्र के मार्गांतीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

भारतीय शिक्षा के संबंध में प्रत्येक व्यक्ति न केवल अपनी राय रखता है, बल्कि उसे व्यक्त करने के लिए भी तत्पर रहता है। शिक्षा व्यक्ति, परिवार तथा समाज को किसी न किसी रूप से अवश्य प्रभावित करती है। शिक्षा उसकी विषयवस्तु तथा विधा समय के साथ गतिमान रहते हुए ही अपनी सार्थकता सिद्ध कर सकती है। इसके लिए व्यवस्था तथा क्रियान्वयन में संलग्न सभी व्यक्तियों को सजग तथा सीखने के लिए प्रतिबद्ध होना आवाश्यक होगा। उनकी नवाचार में रूचि तथा उसे कर सकने की स्वायत्तता मिलनी ही चाहिए।2 स्वतंत्र भारत में शिक्षा का जो विस्तार हुआ है उसे अभी मीलों नहीं बल्कि कोसों लम्बा रास्ता तय करना है। सरकारी प्राथमिक शिक्षा ने कई उपलब्धियां भी हाँसिल की हैं क्योंकि हमारी शिक्षा की नींव यहीं पर मजबूत की जाती है, जो जीवन पर्यंत मानव जीवन एवं समाज को सार्थक बनाती है। अगर शिक्षा व्यवस्था में ही उसके मूल्यों के ह्रास का घुन लग जाए, तब उसका समाधान ढूढ़ना अत्यंत कठिन हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था से परिचित है। वर्तमान में यह शिक्षा दो हिस्सों में बँट गई है जो आगे आने वाली पीढ़ियों को भी विभक्त कर रही है। इसका सबसे बड़ा मूलरूप से कारण है नीति निर्धारकों का स्वार्थ।

आज लगभग प्रत्येक ग्राम पंचायत में प्राथमिक एवं जूनियर स्कूलों की व्यवस्था की गई है जहां पर हजारों ग्रामीण अँचल के बच्चे अध्ययन के लिए जाते हैं। सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की अगर बात की जाय तो इन स्कूलों में सबसे योग्य अध्यापक रखे जाते हैं। वह भी बी.एड एवं बी.टी.सी प्रशिक्षित होते हैं। इन्हें बच्चों के क्रियाकलापों एवं किस प्रकार पढ़ाना है पहले ही बता दिया जाता है। इन योग्यताओं के बावजूद अब तो अध्यापक पात्रता परीक्षा (टी.ई.टी.) भी पास करके आना होता है। इतनी योग्यता तो प्राइवेट विद्यालयों के अध्यापक के पास मुश्किल से ही ढूंढे मिलेगी। सरकारी शिक्षकों को वेतन से लेकर प्रत्येक प्रकार की सरकार सहायता भी देती है। इन सबके बावजूद हमारे सरकारी स्कूलों की शिक्षण व्यवस्था दयनीय हो गई है। इसकी गुणवत्ता की बात की जाय तो नाम मात्र की हो सकती है इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है मैं कुछ स्कूलों को गया जहां बच्चों से राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री का नाम पूंछा जो कि बच्चे नहीं बता पाएं। सम्पूर्ण साक्षरता अभियान तो सरकारी कागजों पर ही दिखाई दे रहा है। अगर उसकी वास्तविकता पता करनी हो तो सरकारी स्कूल जाकर देखी जा सकती है।

इसके पश्चात ले चलते हैं प्राइवेट शिक्षण संस्थानों की तरफ मैंने तो जाकर देखा है कि प्राइवेट स्कूल किसी शिक्षाशास्त्री या किसी उच्चयोग्यता प्राप्त व्यक्ति के कम ही मिलेंगे अधिकतर नेताओं एवं माफियाओं के ही मिलेंगे। इन लोगों का स्कूल खोलने का एकमात्र लक्ष्य लाभ कमाना होता है। इनसे गुणवत्ता परक शिक्षा का ख्वाब भी करना बेकार है क्योंकि दोनों एक साथ नहीं चल सकते। इन स्कूलों में ज्यादतर अध्यापकों की योग्यता इण्टर एवं स्नातक अर्थात अनट्रेंड मिलेंगे। बहुत कम ही व्यक्ति मिलेंगे जो उस क्लास एवं सम्बंधित विषय को पढ़ाने की योग्यता रखते हैं। प्राइवेट स्कूलों को देखकर ऐसा लगता है कि मानों शिक्षा का व्यावसायीकरण सा हो गया है। बच्चों को स्कूल की क्लासों से ज्यादा कोचिंग संस्थान गुणवत्तापरक एवं भविष्योन्मुखी लगने लगते हैं। लखनऊ जैसे शहर में सम्पूर्ण दिन जिधर निकलो प्रत्येक दो या तीन घंटे बाद कोचिंग संस्थानों की इतनी भीड़ निकलती है। ऐसा लगता है कि किसी स्कूल में छुट्टी हो गई है। इस प्रकार की शिक्षा मजदूरी करने वाला अभिभावक नहीं दे पाता और सरकारी स्कूलों में शिक्षक मिड-डे-मील खिलाने और पल्स-पोलियो पिलाने में ही अपना बहुमूल्य समय निकाल देते हैं। इसी प्रकार की सरकार की गलत तरीक़े से क्रियांवित नीतियों का शिकार अबोध विद्यार्थियों को बनना पड़ता है। इन बालकों को इस समय यह समझ ही नहीं होती कि उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। इन्हीं सब कारणों से सरकारी और प्राइवेट स्कूलों की शिक्षा की गुणवत्ता का दायरा निरंतर बढ़ता जा रहा है।

वर्तमान शिक्षा की आवश्यकता एवं अनिवार्यता को स्वीकार करते हुए अच्छी, गुणवत्तापूर्ण एवं नैतिक शिक्षा के लिए प्रयत्न करने होंगे। इसके लिए कर्मठ, प्रशिक्षित, लगनशील, अध्ययनशील एवं संवेदनशील अध्यापक भी चाहिए, जो अपने उत्तरदायित्व को अंतर्निहित कर चुके हों। भारत की नई पीढ़ी को तैयार करने के पवित्र कार्य में भागीदारी निभा सकें। शिक्षा ही ऐसा माध्यम है, जिसके माध्यम से बालक का शोधन एवं मार्गांतीकरण किया जा सकता है। गाँधीजी भी ऐसी शिक्षा के पक्षधर थे जिससे बालक का सर्वांगीण विकास हो सके।3 सरकारी तंत्र ने इसे समझा नहीं या इसे जानबूझ कर नजरअंदाज कर दिया। निजी स्कूलों में बच्चों को प्रवेश दिलाने के किए जो आपाधापी प्रतिवर्ष मचती है, वह शिक्षा के माध्यम से जुड़ाव का नहीं बल्कि अलगाव की कहानी है।

सन्‌ 2015 में न्यायालय का निर्णय भारत की शिक्षा व्यवस्था की वस्तुस्थिति का बड़ा ही सटीक वर्णन करता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर-प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि वे लोग जो सरकारी कोष से वेतन पाते हैं, अपने बच्चों का नाम सरकारी स्कूलों में लिखाएं।4 इस आदेश की सरकारी तंत्र खासतौर से नौकरशाही वर्ग ने इसकी तीखी आलोचना की। न्यायालय का यह निर्णय प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए अविस्मरणीय कदम था क्योंकि शिक्षा नीतियां बनाने एवं क्रियांवित कराने वालों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते ही नहीं। जब इनके बच्चे इन स्कूलों में नहीं पढ़ते तो सुधार की बात सोंचेगे ही क्यों?5 शैक्षिक योजनाएँ क्रियांवित कराने के नाम पर दिखावा मात्र बनकर रह जाती हैं। इन लोगों को अपने बच्चों की चिंता तो निरंतर रहती है। उन गरीबों एवं किसानों के बच्चों को भूल जाते हैं, जो सरकारी प्राथमिक स्कूलों में अध्ययन कर रहे होते हैं। अगर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस निर्णय को ईमानदारी पूर्वक लागू कर दिया जाय तो जल्द ही सरकारी स्कूलों की शक्ल बदल जाएगी।

निष्कर्ष :

प्राथमिक शिक्षा बच्चों के विकास के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण एवम्‌ शिक्षा की आधारशिला है, जिस प्रकार से एक मकान बनाने के लिए उसकी नींव का मजबूत होना आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार बच्चे के उचित विकास के लिए प्राथमिक शिक्षा का होना आवश्यक है। भरत एक कृषि प्रधान देश है इसकी अधिकांश जनसंख्या गांवों में निवास करती है, इसलिए गाँवों को भारत की आत्मा कहा जाता है। ग्रामीण क्षेत्र के अधिकांश बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढ़ते हैं। वर्तमान में सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता का स्तर निरंतर गिर रहा है और दूसरी तरफ शिक्षा का निजीकरण भी तेजी से हो रहा है जिससे कि निजी शिक्षण-संस्थानों की संख्या निरंतर तेजी से बढ़ती जा रही है। इन संस्थानों में शिक्षा बहुत ही महंगी है जिसके कारण गरीब बच्चे इनमें नहीं पढ़ पते हैं। अत: सरकार को अपने शिक्षण संस्थाओं में प्राइवेट स्कूलों की तरह शिक्षकों को जवाबदेही बनाया जाय। अनुपस्थित रहने वाले शिक्षकों के प्रति कठोर कार्यवाही की जाय और सारे स्कूलों की सी.सी.टी.वी. कैमरों से निगरानी की जाय। प्रत्येक शिक्षक और छात्र की डिजिटल उपस्थिति भी दर्ज की जाय।

संदर्भ :-

  1. गुप्ता एस.पी, आधुनिक भारतीय शिक्षा की समस्याएँ, शारदा पुस्तक भवन, इलाहाबाद,2007, पृ० 37
  2. शेखावत कृष्ण गोपल सिंह, शिक्षा के दार्शनिक आधार, तरुण प्रकाशन, जयपुर, 2008, पृ० 21-22
  3. भटनागर सुरेश, आधुनिक भारतीय शिक्षा और उसकी समस्याएँ, आर० लाल बुक डिपो, मेरठ, 2007, पृ० 71
  4. हिंदुस्तान समाचार पत्र, लखनऊ संस्करण, सम्पादकीय, जून 17, 2011
  5. वही, जुलाई 28, 2011

 

 

प्रसिद्ध साहित्यकार व आलोचक डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय जी से बातचीत

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“काल के अनंत प्रवाह में कभी-कभी ऐसा अद्भुत क्षण आता है जब काल स्वयं मनुष्य को अपना इतिहास बनाने तथा अपनी नियति का नियंता बनने का अवसर प्रदान करता है।”

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय

मुंबई विश्वविद्यालय

के हिंदी विभाग के

प्राध्यापक, प्रसिद्ध साहित्यकार व आलोचक

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय

से

डॉ. प्रमोद पाण्डेय

की बातचीत

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मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में हिंदी प्राध्यापक के रूप में कार्यरत प्रसिद्ध साहित्यकार, आलोचक एवं मार्गदर्शक गुरुवर डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय जी के जीवन, व्यक्तित्व तथा साहित्यिक जगत से संबंधित हाल ही में डॉ. प्रमोद पाण्डेय द्वारा की गई बातचीत के कुछ अंश :-

१- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: आपका जन्म कब और कहाँ हुआ?

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय: मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में ‘घोरका तालुकादारी’ नामक गाँव में 15 अप्रैल सन् 1968 को हुआ था। मेरा गाँव सई नदी के तट पर स्थित है। प्राकृतिक दृष्टि से बहुत ही रमणीय जगह है।

२- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: आप अपनी आरंभिक व उच्च शिक्षा के बारे में बताइए ।

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय: जहाँ तक आरंभिक शिक्षा का सवाल है तो मैंने आठवीं तक अपने गाँव में ही शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद बारहवीं तक की शिक्षा कालूराम इंटर कॉलेज, शीतलागंज, उत्तर प्रदेश में संपन्न हुई। जून 1986 में 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के उपरांत मैं मुंबई आ गया और मैंने अंधेरी स्थित एम. वी. एंड एल.यू. कॉलेज में बी.ए. की कक्षा में प्रवेश लिया। सन् 1989 में प्रथम श्रेणी से मैंने बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद मुंबई विश्वविद्यालय के तत्कालीन हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. चंद्रकांत बांदिवडेकर जी के निर्देश पर मैंने हिंदी विषय में एम.ए. किया। सन् 1991 में एम.ए. प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुआ। उसके बाद मैंने पीएच.डी. उपाधि हेतु शोध कार्य आरम्भ किया।

३- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: आपके बचपन की कोई ऐसी घटना जो आपके जीवन में प्रेरणादायी बन गई हो?

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय:जहाँ तक बचपन का सवाल है, तो एक बार मैं सई नदी पार कर रहा था, उसी समय हमारे गाँव के दूसरी तरफ बाबा बेलखरनाथ धाम से एक बूढ़ा माली अपने दो पोतों को सई नदी में नहलाने के लिए लाया था। चूँकि बूढ़े माली को देखने में तकलीफ थी और नहाते समय जैसे ही उसके हाथ से दोनों बच्चों की उंगलियाँ छूटीं वे दोनों नदी में बहने लगे। मैंने अपनी साइकिल फेंक करके उन दोनों बच्चों को बचाया और उस माली को बाहर निकलकर ठीक से समझाया। यह मेरे जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना है।

४- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: आपने अध्यापन की शुरुआत कहाँ से की?

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय: जहाँ तक अध्यापन के आरंभ का सवाल है तो मैंने अगस्त 1991 से फरवरी 1992 तक सिद्धार्थ महाविद्यालय, मुंबई में अध्यापन कार्य किया। 14 फरवरी 1992 को मैं के.सी. महाविद्यालय, चर्चगेट के डिग्री कॉलेज में नियुक्त हुआ। तब से लेकर मैं सितंबर- 2001 तक के.सी. कॉलेज में कार्यरत रहा। उसके बाद मेरी नियुक्ति पुणे विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में रीडर पद पर हुई।

५- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: मुंबई विश्वविद्यालय में आप कब आए?

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय: जब मैं पुणे विश्वविद्यालय में पढ़ा रहा था तो उसी समय मेरी नियुक्ति मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में रीडर के पद पर हुई और मैंने दिसंबर- 2003 में मुंबई विश्वविद्यालय में रीडर पद का कार्यभार संभाला।

६- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: मुंबई विश्वविद्यालय का आपका आरंभिक अनुभव कैसा रहा?

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय: मैं मुंबई विश्वविद्यालय में अपनी पी-एच.डी. पूर्ण  होने के उपरांत सन् 1997 से ही अतिथि प्राध्यापक के रूप में एम.ए. की कक्षाएं ले रहा था। मैंने अपनी पी-एच.डी. डॉ. चंद्रकांत बांदिवडेकर जी के मार्गदर्शन में संपन्न की थी। अतः मैं कह सकता हूँ कि मैं 1989 से ही मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से जुड़ा रहा और वहाँ की तमाम गतिविधियों से परिचित था। इसलिए जब मैंने मुंबई विश्वविद्यालय में अपना कार्यभार संभाला तो मुझे किसी प्रकार की कोई तकलीफ नहीं हुई।

७- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: आपकी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत कब और कैसे हुई?

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय: जहाँ तक मेरी साहित्यिक यात्रा का सवाल है तो मैंने 11वीं और 12वीं के अध्ययन के दौरान ही मीराबाई नामक एक काव्य नाटक लिखा जो अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ है। उसके बाद मुंबई आकर मैंने कहानी, कविता और निबंध लेखन के क्षेत्र में अपनी रुचि का परिचय दिया। लेकिन एम.ए. करने के दौरान ही मैं आलोचना के क्षेत्र में आ गया और मूल रूप से आलोचक ही बन गया।

८- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: आप अपनी साहित्यिक यात्रा के लिए किसे प्रेरणा स्रोत मानते हैं?

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय: जहाँ तक साहित्यिक यात्रा के प्रेरणा स्रोत का सवाल है तो मैं अपनी साहित्यिक यात्रा के प्रेरणा स्रोत के रूप में डॉ. चंद्रकांत बांदिवडेकर, डॉ. रोशन डुमासिया और अपने बड़े भाई साहब को श्रेय देता हूँ क्योंकि इन लोगों ने मुझे साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय होने के लिए प्रेरित किया।

९- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: आप एक प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक के रूप में प्रसिद्ध हैं, इतनी लंबी यात्रा आपने कैसे तय की?

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय: इस संदर्भ में कहना चाहूंगा कि मैंने एम.ए. के दौरान आलोचनात्मक लेख लिखने आरंभ किए थे। जब मैं पी-एच.डी. कर रहा था, उस समय 1995 में मेरी दो आलोचना की पुस्तकें, “सर्जना की परख,” “साहित्यकार बेकल: संवेदना और शिल्प” प्रकाशित हुई। इसके बाद सन् 1999 में मेरा पी-एच.डी. का शोध प्रबंध “आधुनिक हिंदी कविता में काव्य चिंतन” शीर्षक से प्रकाशित हुआ। उसके बाद 2001 में “पाश्चात्य काव्य चिंतन के विविध आंदोलन” विषय पर विश्व विद्यालय अनुदान आयोग की अध्येतावृत्ति पर मेरा पोस्ट डॉक्टर रिसर्च संपन्न हुआ। सन्- 2002 में मेरी पुस्तक “मध्यकालीन काव्य चिंतन और संवेदना” तथा 2003 में “पाश्चात्य काव्य चिंतन” नामक काव्यशास्त्रीय ग्रंथ प्रकाशित हुआ। इसी क्रम में पत्र-पत्रिकाओं में लगातार लेखन होता रहा। सन् 2007-08 में 5 पुस्तकें प्रकाशित हुई। इन पुस्तकों में “हिंदी कथा साहित्य का पुनर्पाठ,” “विविधा,” “आधुनिक कविता का पुनर्पाठ,” “हिंदी का विश्व संदर्भ” इत्यादि का समावेश है। इसके बाद कई पुस्तकें प्रकाशित हुई, जिनमें आवां विमर्श, वक्रतुंड मिथक की समकालीनता, ब्लैक होल विमर्श, सृजन के अनछुए संदर्भ, हिंदी साहित्य मूल्यांकन और मूल्यांकन, साहित्य और संस्कृति के सरोकार, जैसे ग्रंथों का उल्लेख किया जा सकता है। इस दौरान पाश्चात्य काव्य चिंतन तथा हिंदी का विश्व संदर्भ के 3 संस्करण प्रकाशित हुए हैं और पाश्चात्य काव्य चिंतन का छात्र संस्करण भी दो बार प्रकाशित हुआ है।

१०- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक यात्रा के विषय में कृपया बताएं?

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय: इस संदर्भ में मैं कहना चाहूंगा कि मैं मारीशस, संयुक्त राज्य अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों की यात्रा कर चुका हूँ और मैंने इन देशों की तमाम साहित्यिक, सांस्कृतिक संदर्भ और हिंदी भाषा की अद्यतन स्थिति का विवरण अपनी पुस्तक हिंदी का विश्व संदर्भ में दिया है।

११- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: आपकी अब तक की प्रकाशित पुस्तकों के बारे में बताइए?

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय: जहाँ तक मेरी प्रकाशित पुस्तकों का सवाल है तो अब तक मेरी 16 मौलिक आलोचनात्मक पुस्तकें और 12 संपादित आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में 300 से अधिक शोध लेख भी प्रकाशित हो चुके हैं।

१२- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: आपकी पुस्तक ‘हिंदी का विश्व संदर्भ’ काफी चर्चा में रही है। कृपया इस पुस्तक के संदर्भ में हमें बताएं?

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय:इस संदर्भ में मैं कहना चाहूंगा कि हिंदी का विश्व संदर्भ निश्चित रूप से अत्यंत चर्चित पुस्तक रही है। यहाँ तक कि 10 जनवरी- 2017 को विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी के सबसे बड़े अखबार, जो विश्व का भी सबसे बड़ा अखबार है “दैनिक जागरण” में यह पुस्तक मुख्य ख़बर (हेडलाइन) के रूप में प्रकाशित हुई है। अपने 40 से ज्यादा संस्करणों में इस पुस्तक को मुख्य खबर के रूप में प्रकाशित करके “दैनिक जागरण” ने सराहनीय कार्य किया । इस पुस्तक की विशेषता यह है कि इसमें न केवल विश्व भर में हिंदी बोलने वालों की अद्यतन जानकारी दी गई है अपितु विश्व के जिन-जिन देशों में हिंदी पठन-पाठन की व्यवस्था है तथा जिन विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं में हिंदी का प्रशिक्षण दिया जा रहा है उसकी भी जानकारी दी गई है। इसके अलावा विदेशों में जो रचनाकार हिंदी में रचना कर रहे हैं और जो पत्र-पत्रिकाएं हिंदी में प्रकाशित हो रही हैं, उन तमाम चीजों की जानकारी एकत्र मिल जाती है। इस कारण यह पुस्तक बहुचर्चित रही है।

१३- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: आप रक्षा विशेषज्ञ के रूप में कई हिंदी समाचार चैनलों पर अपना मंतव्य व्यक्त कर चुके हैं, कृपया इस संदर्भ में हमें विस्तारपूर्वक बताएं?

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय: इस संदर्भ में मैं कहना चाहूंगा कि मैंने बी.ए. और एम.ए. की कक्षाओं के दौरान अंतरराष्ट्रीय विषय पर पर्याप्त अध्ययन किया था और मैं आई.ए.एस. की तैयारी कर रहा था। इस कारण मुझे अंतरराष्ट्रीय मामलों और रक्षा से संबंधित तमाम प्रश्नों की गहन जानकारी है। हिंदी के कई समाचार चैनल, जैसे- ज़ी न्यूज़, न्यूज़२४, सहारा समय, जियो न्यूज समेत अनेक चैनलों ने रक्षा विशेषज्ञ और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार के रूप में कई बार मेरा साक्षात्कार लिया है। अनेक प्रश्नों पर उन्होंने एक विशेषज्ञ के रूप में मेरी टिप्पणी भी ली है। यह मेरी रुचि और शौक का क्षेत्र है, जिसे मैं साहित्य के अलावा लगातार विकसित और अद्यतन करता रहता हूँ।

१४- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: आप मुंबई विश्वविद्यालय में हिंदी प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं, आपका अब तक का अनुभव कैसा रहा?

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय: इस संदर्भ में मैं कहना चाहूंगा कि हिंदी प्राध्यापक के रूप में मेरा स्वयं का अनुभव बहुत अच्छा है। मैंने पूरी निष्ठा से अपना कार्य संपन्न किया है। अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए अपनी जवाबदेही को बड़ी ही ईमानदारी के साथ निष्ठापूर्वक निभाया है। इस कारण तमाम छात्र-छात्राएं, सहयोगी और हिंदी के विद्वान मुझे अपना स्नेह और सम्मान देते हैं।

१५- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: आपके मार्गदर्शन में अभी तक कितनी पी-एच.डी. व एम.फिल. हुई है?

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय: अब तक मेरे मार्गदर्शन में 25 पी-एच.डी. और 50 छात्र एम.फिल. की उपाधि प्राप्त कर चुके हैं। यह अपने आप में एक विशिष्ट उपलब्धि है।

१६- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: आप मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष पद पर भी रह चुके हैं, आपका अनुभव कैसा रहा?

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय: मैंने हिंदी विभागाध्यक्ष के पद पर रहते हुए दो बड़े कार्य किए हैं। पहला कार्य यह कि हमारे विभाग में वर्षों से कई पद रिक्त थे, तो मैंने पाँच अध्यापकों की नियुक्ति करवाई। दूसरा बड़ा कार्य यह कि मैंने महाराष्ट्र शासन के जिलाधिकारी से मुंबई विश्वविद्यालय के कालीना परिसर में हिंदी भाषा भवन निर्माण हेतु 5 करोड़ रुपए की राशि स्वीकृत कराई। इन दोनों चीजों को मैं अपनी उपलब्धि मानता हूँ। इसके अलावा मेरे कार्यकाल के दौरान 27 संगोष्ठियां हुई। जिनमें एक अंतरराष्ट्रीय और 10 राष्ट्रीय संगोष्ठियां शामिल हैं। मैंने अपने कार्यकाल के दौरान हिंदी शिक्षण और शिक्षा के स्तर को यथासंभव ऊपर उठाने का प्रयत्न किया और उस दौरान जो भी साहित्यिक अनुष्ठान संपन्न हुए हैं वे सब इस बात के गवाह हैं कि साहित्यिक स्तर कितना ऊपर रहा है।

१७- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: आपको अभी तक प्राप्त पुरस्कार एवं सम्मान के संदर्भ में बताएं।

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय: अभी तक मुझे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 12 पुरस्कार मिले हैं। इसके अतिरिक्त राज्य स्तर पर और स्थानीय स्तर पर जो पुरस्कार और सम्मान मिले हैं, उनकी संख्या दर्जनों में है। मुझे मुंबई विश्वविद्यालय का सर्वोत्तम शिक्षक का भी पुरस्कार मिला है ।

१८- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: आप मेरे लिए प्रेरणा स्रोत हैं।अतः आप आने वाले विद्यार्थियों के लिए प्रोत्साहन स्वरूप क्या कहना चाहेंगे?

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय: आपने स्वयं यह स्वीकार किया है कि मैं आपके लिए प्रेरणास्रोत हूँ। मैं दूसरे या आने वाले छात्रों के लिए भी यही कहना चाहूंगा कि जीवन में कठिन परिश्रम का कोई विकल्प नहीं है। हम अपने अध्ययन-अध्यापन, लेखन और परिश्रम के द्वारा उपलब्धियों के तमाम बड़े शिखर पार कर सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि हम अपने व्यक्तित्व को संघटित रखें और अपने समय और ऊर्जा का सही दिशा में सार्थक उपयोग करें।

१९- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने हेतु आपने काफी प्रयास किया। इस संदर्भ में आप क्या कहना चाहते हैं?

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय: हम न केवल हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए प्रयास कर रहे हैं अपितु हम लगातार भारत सरकार से यह आग्रह कर रहे हैं कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाई जाए। वह इसलिए क्योंकि आज पूरे विश्व में हिंदी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। जिसके प्रयोक्ताओं की संख्या एक अरब तीस करोड़ है। विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा होने के बावजूद भी यदि हिंदी संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा नहीं बन पाई है तो यह विश्व के हर छठे व्यक्ति के मानवाधिकार का उल्लंघन है। अतः मैं भारत सरकार से यह आग्रह करता हूँ कि वह न केवल हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने का प्रयास करे अपितु आज ऐसे कई स्वार्थी तत्व जो हिंदी को तोड़ने में लगे हैं उनसे हिंदी की रक्षा भी करे। आज कतिपय तत्त्व हिंदी की बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करवा कर हिंदी के संयुक्त परिवार को तहस-नहस करना चाहते हैं। ऐसा करने से न केवल हिंदी बिखर जाएगी अपितु जो हिंदी, राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बनाए रखने तथा राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर संवाद कायम करने का सबसे सशक्त माध्यम है वह भी खतरे में पड़ जाएगा अतः आज हिंद और हिंदी दोने के अखंडता की रक्षा करना हमारा सबसे बड़ा दायित्व है।

२०- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: आपका विद्यार्थियों के प्रति हमेशा आत्मीय व्यवहार रहा है। अतः विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए क्या कहना चाहेंगे?

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय: मैं सदैव अपने सभी विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता आया हूँ और पुनः सभी विद्यार्थियों के प्रति इस साक्षात्कार के माध्यम से अपनी शुभकामनाएं प्रेषित करता हूँ। मैं चाहता हूँ कि मेरे पढ़ाए हुए छात्र जीवन और कैरियर के तमाम क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करते हुए यश की प्राप्ति करें ताकि उनकी उपलब्धियों से हमारा भी नाम चतुर्दिक ख्याति प्राप्त करे। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ।

कहना ना होगा कि बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय साहित्यिक क्षेत्र के विविध सोपानों को पार करते हुए उच्च शिखर पर पहुँचे हैं। विद्यार्थियों के प्रति उनका आत्मीय व्यवहार रहा है। पठन-पाठन में रुचि रखने वाले तथा हँसमुख एवं चिंतनशील स्वभाव वाले डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय हिंदी साहित्य को नई दिशा प्रदान करने के साथ-साथ हिंदी भाषा को नया आयाम दिलाने के लिए प्रयत्नशील हैं। इतनी प्रतिष्ठा एवं ख्याति के बावजूद भी इनके मन में किसी प्रकार की ईर्ष्या, द्वेष व अहंकार नहीं है। ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ रखने वाले डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय ने हमेशा विद्यार्थियों के प्रति आत्मीय एवं मित्रवत व्यवहार रखते हुए उन्हें उचित मार्गदर्शन प्रदान किया है। इस साक्षात्कार से निश्चित ही भावी साहित्यिक पीढ़ी एवं विद्यार्थी न सिर्फ लाभान्वित होंगे अपितु उनकी विद्वत्ता का भी अनुसरण करेंगे। ऐसे ख्यातिप्राप्त आलोचक, साहित्यकार, विद्वान तथा मुंबई विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष एवं वर्तमान हिंदी प्राध्यापक गुरुवर डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय की महानता व उनकी विद्वत्ता के प्रति मैं नतमस्तक हूँ।

डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय की कुछ प्रकाशित पुस्तकें

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डॉ. प्रमोद पाण्डेय 

(सहा. हिंदी प्राध्यापक तथा कार्यकारिणी सदस्य- मुंबई प्रांतीय राष्ट्रभाषा प्रचार सभा, मुंबई)

पता-  ए/ 201, जानकी निवास, तपोवन, रानी सती मार्ग, मलाड (पूर्व), मुंबई- 400097.

मोबाइल:   09869517122 ईमेल: drpramod519@gmail.com

प्रसाद का आरंभिक काव्य: विराट संभावना का उन्मेष-डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय

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प्रसाद का आरंभिक काव्य: विराट संभावना का उन्मेष

*डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय

महाकवि जयशंकर प्रसाद हिंदी के बहुआयामी साहित्यकार हैं।इनका जन्म 30 जनवरी 1890 को काशी के सुप्रतिष्ठ सुंघनी साहू परिवार में हुआ था।इन्होंने सातवीं कक्षा तक विद्यालयीन शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत घर पर ही हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी भाषा एवं साहित्य का गहन अध्ययन किया।आप भारतीय इतिहास, संस्कृति, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान , कला और साहित्य के निष्णात विद्वान माने जाते हैं।गोस्वामी तुलसीदास की तरह ही आप हिंदी के बहुश्रुत कवि और श्रेष्ठतम प्रतिभा के रूप में हमारे सामने आते हैं। आप बीसवीं सदी की सर्वश्रेष्ठ प्नरतिभा सम्पन्न रचनाकार हैं जिन्होंने जातीय प्रश्नों को उसके वास्तविक रूप में प्रस्तुत और अबाधित किया।आपने अपनी प्रतिभा से ने न केवल हिंदी में अनेक विधाओं का सूत्रपात किया अपितु उसे विश्वस्तरीय भी बनाया।अतः इनके संपूर्ण साहित्य का पुनर्पाठ वर्तमान समय की मांग है। आपके व्यक्तित्व से यह सीख मिलती है कि यदि हम अपने व्यक्तित्व को सुसंगठित एवं सक्रिय रखें तो कम आयु में ही उपलब्धियों के बड़े शिखर पार कर सकते हैं। आपने चित्राधार से कामायनी तक की यात्रा करके इसका अभूतपूर्व दृष्टांत प्रस्तुत किया है। आप जीवन और जगत के बृहत्तर संदर्भों के साथ-साथ मनुष्य की नियति एवं उसके अंतर्जगत के गहरे पारखी हैं। अतः आपका आरंभिक काव्य लेखन भी एक नये विश्लेषण की मांग करता है।

प्रसादजी के रचनात्मक जीवन का आरंभ काव्य-लेखन से ही हुआ । आपकी आरंभिक कविताएं ‘ चित्राधार’ में संकलित हैं।आपने ‘कलाधर ‘उपनाम से ब्रजभाषा में काव्यारंभ किया।यद्यपि यहां रीतिकाल का पूर्ण रूप से अतिक्रमण नहीं हो सका है परन्तु नयी उद्भावनाओं का संकेत बड़े ही स्पष्ट तरीके से व्यक्त हुआ है। चित्राधार में ‘वनमिलन’,’प्रेमराज्य’ और ‘ अयोध्या का उद्धार’ नामक तीन आख्यानक कविताएं संकलित हैं। वनमिलन में कालिदास के आभिज्ञान शाकुंतल की कथा को नए युगबोध के आलोक में प्रस्तुत किया गया है। यहां प्रसाद का जिज्ञासु मन प्रकृति के अनंत रमणीय सौंदर्य के प्रति जिज्ञासा ही प्रकट नहीं करता अपितु वह प्रेम-सौंदर्य के साथ-साथ प्रकृति के वैविध्यपूर्ण चित्र भी उकेरता है। इसी तरह अयोध्या का उद्धार भी कालिदास के रघुवंश महाकाव्य के सोलहवें सर्ग पर आधारित हैं जिसमें राम के सुपुत्र कुश द्वारा अयोध्या के पुनरुद्धार की कथा वर्णनात्मक शैली में प्रस्तुत की गयी है। इसकी तीसरी आख्यानक कविता ‘ प्रेम राज्य’ प्रसाद की मौलिक सृष्टि है जिसका आधार इतिहास है।इतिहासकारों के अनुसार सन 1564 ई.में विजयनगर और अहमदाबाद के बीच टालीकोट का युद्ध हुआ था। इस काव्य का आरंभ युद्ध से किन्तु इसका समापन एक महान मानवीय संदेश में होता है।इसमें शिव के विराट स्वरूप का चित्रांकन हुआ है। कवि इस कविता में पाठक को उच्चतर भावभूमि पर ले जाता है । वह लौकिक धरातल पर अलौकिक आदर्श की प्रतिष्ठा करता है। प्रसाद जी ने स्वयं लिखा है कि छंद की दृष्टि से इसमें रोला छंद है।

इसमें स्फुट कविताओं को ‘पराग’ और ‘ मकरन्द बिन्दु’ के अंतर्गत रखा गया है जिनमें अधिकांश रचनाएं प्रकृति परक हैं। प्रसाद जी के भीतर प्रकृति के रहस्यों के प्रति जो जिज्ञासा भाव है वही उन्हें प्रकृति संसर्ग की ओर ले जाता है। प्रसाद की ऋषिदृष्टि प्रकृति के संसर्ग से खुलती है। जब कवि दृष्टि अतिक्रमित होती है तब ऋषिदृष्टि का उन्मीलन होता है। यही दृष्टि प्रसादजी को उच्चतर भावभूमि और लम्बी यात्रा पर ले जाती है। इन कविताओं ने विराट संभावना का संकेत कर दिया है। इसमें प्रकृति के प्रति रागपरक रहस्य चेतना और अंतर्दृष्टि क्रमशः सूक्ष्मतर होती गयी है।कवि का नवीन भाव-बोध पूरी तरह खुलकर सामने आ गया है।

इनके द्वारा रचित ‘प्रेम पथिक’ पहले ब्रजभाषा के छंदगत अनुशासन में प्रकाशित हुआ किन्तु समय की मांग और जरूरत को ध्यान में रखकर प्रसाद जी ने उसे 1913 में दुबारा प्रकाशित करवाया।यह खड़ीबोली हिंदी के अतुकांत रूप में है।यह एक संभावनावान कवि की किशोर भावनाओं के अनुरूप प्रेम के उदात्त, भावनात्मक और सार्वभौम-शास्वत स्वरूप का निर्वचन है।किसी के प्रेम में योगी होकर प्रकृति के स्वच्छंद एवं अकृत्रिम परिवेश में रहने की आदिम आकांक्षा मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति है।इस मूल भावना को प्रेम, सौंदर्य एवं कल्पना के द्वारा व्यवस्थित रूपक प्रदान किया गया है जिससे यह हिंदी की पहली लंबी कविता भी बन गयी है।यह अपने रूपात्मक तंत्र में एक विराट कवि की संभावनाओं का निदर्शन करती है। इनकी काव्य-प्रतिभा की इन्हीं संभावनाओं पर विचार करते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है कि,” प्रसाद जी में ऐसी मधुमयी प्रतिभा और ऐसी जागरूक भावुकता अवश्य थी कि उन्होंने इस पद्धति का अपने ढंग पर बहुत ही मनोरम विकास किया। ” 1

प्रेम पथिक में प्रसादजी किशोर और चमेली के माध्यम से प्रेम, सौंदर्य और प्रकृति के अनंत रमणीय सौंदर्य का जो रूपायन करते हैं वह हर युग के युवाओं के लिए रमणीय वस्तु है।पथिक अनंत की जिज्ञासा से प्रेरित होकर जब प्रदीर्घ यात्रा पर निकलता है तो वह प्रकृति की अनंत विभूति तथा जीवन साधना के विलक्षण रूप से परिचित होता है।कवि पथिक द्वारा तापसी के समक्ष अपनी अंतहीन यात्रा और प्रेम की व्यथा-कथा का वृत्तांत प्रस्तुत करवाता है ।चूंकि वह पुतली अथवा चमेली ही थी अतः वह किशोर को पहचान जाती है।वह भी अपनी करुण-कथा कह डालती है।फलतः पथिक भी उसे पहचान लेता है और दोनों के बाल्यकाल की स्मृतियां उन्हें उदात्त भावभूमि पर पहुंचा देती हैं।वे दोनों विश्व के प्रत्येक परमाणु में अपरिमित सौंदर्य के दर्शन करते हुए विश्वात्मा ही सुन्दरतम है – की प्रतिष्ठा करते हैं।उनके प्रेम में प्रेय( आनंद) के स्थान पर श्रेय ( लोकमंगल) का पक्ष प्रबल हो जाता है ।वे अपने प्रेम की मानवीय सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए उसे चराचर जगत अथवा विश्वप्रेम में रूपांतरित कर देते हैं।प्रेम के अत्यंत व्यापक और उदात्त रूप के चित्रण के कारण यह कविता आज वेलेंटाइन डे मनाने वाली पीढ़ी को भी प्रेरितऔर प्रभावित कर सकती है।

यह कविता अपने विश्वबोध, प्रकृति और कृषक जीवन के बहुस्तरीय एवं बहुरंगी चित्रों, उदात्त भावना, जीवन-संघर्ष, त्याग-तपस्या तथा मानवीय मूल्यों की अपूर्व सृष्टि के कारण हिंदी की एक अतिशय महत्वपूर्ण तथा कालजयी कृति है। इसे खंडकाव्य और लंबी कविता दोनों का गौरव प्राप्त है।लेकिन मैं इसे हिंदी की पहली लंबी कविता के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहता हूँ।यह कविता न केवल भाव-बोध, वस्तुविन्यास, मनोवैज्ञानिक अंतर्द्वंद्व के धरातल पर रीतिकालीन काव्यपरंपरा का अतिक्रमण करती है अपितु रचना-विधान, आत्मव्यंजना, भाषिक अनुप्रयोग , कल्पनात्मक छवियों तथा समुचित अलंकार योजना के कारण भी कामायनी जैसे महाकाव्य के स्रष्टा की विराट प्रतिभा का स्फुरण भी बन जाती है।प्रसादजी की इस बहुचर्चित घोषणा को संपूर्णता में विश्वसनीयता प्रदान करते हुए यह कविता स्वयं ही ऐतिहासिक महत्व की अधिकारिणी बन जाती है—

” इस पथ का उद्देश्य नहीं है श्रांत भवन में टिक रहना

किन्तु पहुंचना उस सीमा पर जिसके आगे राह नहीं ।” 2

इन आरंभिक कविताओं में प्रसाद जी भक्ति से जीवनादर्श तथा प्रकृति से दार्शनिक चिंतन का विकास करते हैं।वे अपने को ब्रजभाषा से खड़ी बोली की ओर ले जाते हैं। कविता के कथ्य के साथ-साथ वे काव्यभाषा के प्रति भी निरंतर सतर्क और सचेष्ट रहे हैं।सन 1912 में प्रकाशित ‘ कानन कुसुम’में खड़ी बोली की कविताएं पहली बार प्रकाशित होती हैं। सर्वप्रथम ‘चित्र’ शीर्षक से ‘इंदु’ पत्रिका में उनकी खड़ी बोली की पहली कविता प्रकाशित हुई। प्रसाद जी अपने समय एवं समाज की बिखरी हुई शक्तियों के समन्वय द्वारा भारतीय मनुष्यता का चतुर्दिक विकास चाहते थे। वे अपने व्यक्तिगत जीवन में नियति की क्रूरता को झेलते हुए भी स्वयं को बिखरने नहीं देते और शक्ति के विद्युत्कणों के समन्वय द्वारा अपने जीवन दर्शन का विकास करते हैं। प्रसाद जी इस बात को लेकर लगातार चिंतित एवं उन्मथित थे कि अंग्रेज तथा पश्चिम भक्त इतिहासकार एक षडयंत्र के अंतर्गत भारतीय इतिहास को विकृत कर रहे थे। उनका ऐतिहासिक ज्ञान अद्भुत और अद्वितीय है। वे अपनी भेदक दृष्टि द्वारा भारतीय इतिहास का नया पाठ तैयार करते हैं। वे भारतीय इतिहास के गौरव चिह्नों का संधान करके उन्हें अपने लेखन का विषय बनाते हैं।इस दृष्टि से उनका पहला ऐतिहासिक काव्य ‘ महाराणा का महत्त्व’ है। इस कविता में महाराणा प्रताप सिंह के महत्त्व का प्रतिपादन करते हुए राष्ट्रीय आकांक्षा की अभिव्यक्ति हुई है। महाराणा प्रताप देशभक्ति, राष्ट्रीय अस्मिता तथा हिंदू गौरव के चरम प्रतीकों में से एक हैं। प्रसाद अपनी इतिहास अन्वेषी दृष्टि के बल पर उनके संघर्ष और बलिदान को अमरत्व प्रदान करते हैं। वे महाराणा के शत्रु विदेशी आक्रांता के मुख से भी प्रताप का यशोगान करवाते हैं। वह महाराणा प्रताप की प्रशंसा करते हुए कहता है कि

” सच्चा साधक है सपूत निज देश का

मुक्त पवन में पला हुआ वह बीर है।”3

इस कविता में प्रकृति की मनोरम छवि का भी अंकन किया गया है। कवि ने लिखा है कि :- ” विस्तृत तरु शाखाओं के ही बीच में

छोटी-सी सरिता थी, जल भी स्वच्छ था।

कल-कल ध्वनि भी निकल रही संगीत-सी

व्याकुल को आश्वासन -सा देती हुई।।” 4

इस कविता का विन्यास अत्यंत नाटकीय शैली में हुआ है। संपूर्ण कविता चार भागों में सुविन्यस्त है। कविता के आरंभ में राजकुमार अमरसिंह यवनों को उनकी बेगमों समेत बंदी बनाकर महाराणा प्रताप सिंह के समक्ष उपस्थित करते हैं।महाराणा उन्हें मुक्त कर देते हैं।इसके बाद बेगम और खानखाना के मध्य वार्तालाप चित्रित हुआ है। बेगम अकबर के पास जाने के लिए कहती हैं।जब खानखाना अकबर को समस्त वृत्तांत सुनाते हैं तो वे आज्ञा देते हैं कि अब महाराणा पर आक्रमण न हो। इस तरह प्रसाद जी महाराणा के महत्त्व का प्रतिपादन करते हैं।

इसमें कवि ने अमरसिंह के शौर्य एवम् युद्धकौशल का भी सुन्दर चित्रण किया है। यहां एक साथ महाराणा प्रताप तथा राजकुमार अमरसिंह के पराक्रम का निदर्शन परिलक्षित होता है।यह कविता देश की स्वाधीनता, सुरक्षा और अस्मिता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने की प्रेरणा देती है। कहना न होगा कि कवि ने स्वतंत्रता संग्राम के कठिन संघर्ष के उन दिनों में भारतीय जन मानस में राष्ट्रीय चेतना का अमर मंत्र फूंकने के लिए इस कविता का सृजन किया था। अतः ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर रचित यह कविता भले ही खंडकाव्य के ताने-बाने में बुनी गयी है परन्तु इसका रूपात्मक तंत्र लम्बी कविता का ही है। यह कविता ऐतिहासिक वस्तुयोजना, सुपरिणत रचना-विधान, सहज एवं स्वाभाविक भाषा तथा उदात्त शैली की दृष्टि से ऐतिहासिक महत्त्व की अधिकारिणी है। इसका पुनर्पाठ राष्ट्रीय स्वाभिमान की प्रतिष्ठा के लिए यह जरूरी है।

प्रसाद जी के ‘कानन कुसुम’ में चित्रकूट, भरत , शिल्प-सौंदर्य, कुरुक्षेत्र, वीर बालक, श्री कृष्ण जयंती आदि आख्यानक कविताओं का समावेश हुआ है।इन कविताओं की पृष्ठभूमि इतिहास और पुराण पर आधारित है परन्तु उसमें प्रसाद जी ने अपने नए दृष्टिकोण तथा भाव-बोध का प्रकटन किया है। चित्रकूट की कथा रामचरितमानस के अयोध्या काण्ड से प्रेरित है। लेकिन प्रसाद जी यहाँ भी अपने आदर्श एवं मौलिक दृष्टिकोण की प्रतिष्ठा करते हैं। आपने राम और सीता के प्रेम का अत्यंत परिष्कृत एवं छविमान चित्र प्रस्तुत किया है।राम के अंक में सीता नीले गगन में चंद्रमा की भांति सुशोभित होती हैं। राम जानकी के मुख मंडल की शोभा पर मोहित होकर पूछ बैठते हैं:-

” स्वर्गंगा का कमल मिला कैसे कानन को,

नील मधुप को देख , वहीं उस कुंज कली ने

स्वयं आगमन किया कहा यह जनक लली ने।”5

इसी तरह कवि भरत आगमन को लेकर लक्ष्मण के रोष, राम-भरत मिलन तथा रजनी के अंतिम प्रहर के चित्रण में निहायत नवीन और अनछुए उपमानों का सन्निवेश करता है।

कवि ने आभिज्ञान शाकुंतल के सप्तक अंक के आधार पर ‘भरत’ शीर्षक से कविता लिखी है। हम सब जानते हैं कि इस देश का भरत के नाम पर ही भारतवर्ष नाम पड़ा है। वह भारतवर्ष का गौरव है। कवि देश-प्रेम की भावना से अनुप्राणित होकर इतिहास पुरुष भरत के गौरवशाली व्यक्तित्व का अंकन करता है। जिस तरह आभिज्ञान शाकुंतल का भरत शिशु सिंह के दांत गिनता है उसी तरह प्रसाद का भरत भी कहता है कि:-

” खोल, गोल मुख सिंह बाल , मैं देखकर,

गिन लूंगा तेरे दांतों को हैं भले

देखूं तो कैसे यह कुटिल कठोर हैं।-6

इसी क्रम में अगली कविता ‘ शिल्प सौंदर्य’ शीर्षक से है। भरत की भांति यह भी अतुकांत छंद में विरचित है । कवि भारतवर्ष के अनंत रमणीय शिल्प सौष्ठव का निर्वचन करता है। वह एक सार्वभौम-शास्वत सत्य की प्रतिष्ठा करते हुए लिखता है कि धार्मिक कट्टरता कभी-कभी अनेक अनिष्ट कर जाती है। आतताई आलमगीर ने आर्य मंदिरों को खुदवाकर उनके शिल्प सौंदर्य को मटियामेट कर दिया था। फलतः मुगल साम्राज्य के बालू की दीवार भी ढह जाती है। कवि यह स्थापित करता है कि क्रूरता को वीरता नहीं माना जा सकता है। आक्रांताओं की धार्मिक कट्टरता ने अनेक सुन्दर ग्रंथों को नष्ट करने के साथ-साथ विज्ञान, शिल्प, कला, साहित्य और वास्तुकला का भी भयावह नुकसान किया है। बावजूद इसके भारत के ध्वंस शिल्प भी करुण वेश में भी अपने गौरव को छिपाए हुए हैं। ‘ कुरुक्षेत्र’ में श्रीकृष्ण के जीवन चरित, गीता के उपदेश तथा महाभारत के युद्ध का चित्रांकन हुआ है। ‘वीर बालक’ कविता में भी धर्मांधता की निस्सारता बतलाई गई है। कवि सिक्ख बालक जोरावर सिंह तथा फतेह सिंह के स्वाभिमान तथा अस्मिता बोध का चित्रण करता है। कवि स्पष्ट करता है कि दोनों वीर बालक दीवार में चुने जाने के बावजूद इस्लाम स्वीकार नहीं करते। यह अपनी आन-बान और शान पर मर मिटने का अभूतपूर्व दृष्टांत है। इसमें भी अतुकांत छंद के साथ-साथ अद्भुत उपमानों का प्रयोग हुआ है। संक्षेप में , प्रसाद की आरंभिक कविताएं इस बात का प्रमाण हैं कि एक विराट प्रतिभा का उन्मेष हैं जो परवर्ती अप्रतिम रचनाओं के कारण प्रायः उपेक्षित रही हैं। ये कविताएं प्रेम और सौंदर्य के साथ-साथ प्रकृति-पर्यावरण तथा भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं दर्शन के प्रति कवि के अनुराग की विकास कथा भी हैं। इन कविताओं से यह भी सिद्ध होता है कि प्रसाद ही हिंदी में लंबी कविताओं का सूत्रपात करते हैं।

संदर्भ- सूची

  1. हिंदी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, पृष्ठ-539
  2. प्रेम पथिक, जयशंकर प्रसाद, पृष्ठ-28
  3. महाराणा का महत्व, जयशंकर प्रसाद, पृष्ठ-14
  4. वही. पृष्ठ-15
  5. कानन कुसुम, जयशंकर प्रसाद, पृष्ठ-103
  6. वही, पृष्ठ-105

* प्रोफेसर एवं अध्यक्ष,

हिंदी विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय

मुंबई 400098

प्रवासी साहित्यकार उषा प्रियंवदा कृत ‘नदी’ उपन्यास : प्रवासी स्त्री जीवन का संत्रास- सपना दास

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प्रवासी साहित्यकार उषा प्रियंवदा कृत ‘नदी’ उपन्यास : प्रवासी स्त्री जीवन का
संत्रास
सपना दास
शोध सारांश:

       प्रवासी
चर्चित महिला साहित्यकारों में उषा प्रियंवदा का नाम अग्रणी है | उन्होंने अबतक 6 उपन्यासों की रचना की हैं | 2007 में प्रकाशित उपन्यास ‘भया कबीर उदास के बाद 2016 में प्रकाशित ‘नदी’ उपन्यास प्रवासी स्त्री जीवन के दस्तावेज को चित्रित करने वाला उपन्यास है | प्रवासी साहित्यकार उषा प्रियंवदा कृत ‘नदी’ उपन्यास में प्रवासी स्त्री जीवन की गाथा को प्रस्तुत करने वाला उपन्यास है | यह उपन्यास प्रवासी स्त्री जीवन के मानवीय मूल्यों, नैतिक विचारों से लेकर प्रवासी स्त्री जीवन के विविध स्वरूप को एवं उनके अधिकारों की गाथा कहने वाली उपन्यास कहलाएगी | प्रवास में गए लोगों विशेषकर स्त्रियों के संघर्ष, मानसिकता का विखराव, दाम्पत्य जीवन में विखंडन, परिवार में अलगावबोध, घुटन, संत्रास, अकेलापन आदि जीवन की विविध परिस्थितियों का वर्णन लेखिका ने किया है | प्रस्तुत शोधालेख शोधार्थियों के लिए अति लाभदायक सिद्ध होगा |

इस उपन्यास में प्रवासी
स्त्री जीवन के विविध पक्षों को सामने उजागर किया गया है चाहे वह विस्थापन की
समस्या हो, या परिवार से दूर कुंठा की समस्या, एकांकीपन की समस्या, प्रवासी स्त्री
जीवन का संघर्ष हो, चाहे मानसिक अंतर्द्वद्व की समस्या ही क्यों न हो? और मानसिकता
की टकराहट पीढ़ीगत भी निहित है, जिसके भीतर नयी पीढ़ी के साथ साथ द्वितीय पीढ़ी यानी
स्वयं इस उपन्यास की नायिका आकाशगंगा और उसके पति गगनेंद्र को झेलना पड़ता है | साथ
ही इसकी चपेट में बूढ़े माँ-बाप और दोनों बेटियाँ भी आ घिरते हैं | 

मूल शब्द: प्रवासी,
डायस्पोरा, प्रवासन, अप्रवासी, उत्प्रवासी, वासी, मूल निवासी, एन. आर. आई. आदि

अन्य नाम: प्रवासी
साहित्य लगभग 80 के बाद आया जबकि 1834 में गिरमिटिया प्रथा, उससे पहले दास प्रथा
या गुलामी प्रथा के नाम से जाना गया |

भाव: जीवन मूल्य,
मानवीय मूल्यबोध, आधुनिकता उत्तर आधुनिकताबोध, संस्कृति बोध

उषा प्रियंवदा कृत ‘नदी’ उपन्यास में प्रवासी स्त्री जीवन का यथार्थ

उषा प्रियंवदा कृत ‘नदी’
उपन्यास में भारत और अमेरिकी पृष्ठभूमि स्वतंत्रता का ताना-बाना अत्यंत व्यापक रूप
से दिखाया गया है | इस उपन्यास में उपन्याकार मध्यवर्गीय परिवार से जुड़ी आधुनिकता
की दौड़ में भागती नारी के अंतर्द्वंद्व, वैचारिक वैमनस्य के कारण पारिवारिक,
सामाजिक, दाम्पत्य संबंधों की टूटन को रेखांकित करती हैं | यह विघटन पात्रों की
मानसिकता को भी प्रभावित करता है और तनाव और अकेलेपन से ग्रस्त हो जाते हैं |
लेखिका ने अन्य परम्परागत रिश्तों की गढ़न को नकारते हुए वर्तमान संदर्भ में
विभाजित किया है | स्वतंत्रता बाद के उपन्यासों में अनेकों बदलाव परांगत होती हुई
नज़र आती है | यह बदलाव बदलता हुआ परिवेश व दृष्टि की ही देन है | मूलरूप से इसका
आभास प्रेमचंद के गोदान से ही मिलने लगता है | “गोदान ही हिंदी का वह पहला उपन्यास
है, जिसने सभी परंपरागत, भ्रष्टाचार, तिलिस्म और मनोरंजन के सस्ते नुस्खे के चौखट
को उखाड़ फेका है और सामाजिक यथार्थ को उसके समस्त कोणों से उद्घाटित कर एक नवीन
औपन्यासिक धर्म का सूत्रपात किया है |”1    

      आधुनिक
उपन्यासकार के लिए कथानक, चरित्र-चित्रण, कथोपकथन आदि परंपरागत बातें महत्वपूर्ण
नहीं रह गई | वह इन्हें नकार कर नवीनता और आधुनिकता बोध के नये आयाम खोजता है |
साथ ही परिवेश को चरित्र में एवं चरित्र को मनोविज्ञान में खोजता है जबकि
मनोविज्ञान को व्यक्तित्व में खंगालता है | उषा प्रियम्वदा ने अपने उपन्यासों में
विविध परिस्थितियों के आधार पर सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक, यथार्थवादी आदि विविध
विषयों पर उपन्यास में केन्द्रित किया | “आज का उपन्यासकार ऐतिहासिक, सामाजिक या
राजनीतिक उपन्यास नहीं लिखता, वह उनके माध्यम से आधुनिक व्यक्ति चेतना को परखता
है, प्रतिस्थित करता और उनका मुल्यांकन करता है |”2

      मानव
मन बहुत ही चंचल होता है कभी यहाँ तो कभी वहाँ | जीवन के विविध क्षेत्र में उतार
चढ़ाव लगे रहते हैं ऐसे में व्यक्ति का जीवन परिस्थियों से होकर यथार्थ रूप में
मानस पटल पर विचरित करता रहता है | ‘नदी’ उपन्यास आधुनिक जीवन के यथार्थ को
प्रस्तुत करने का स्पष्ट दस्तावेज़ है | जिसका संबंध मानव के आम जीवन से जुड़ा हुआ
है | उषा प्रियंवदा ने ‘नदी’ उपन्यास में प्रवासी जीवन के यथार्थ को विविध
समस्याओं व् परिस्थितयों के माध्यम से मुखरित किया है –

परिवार से दूर विस्थापन
की समस्या

परिवार से दूर जाकर
प्रावासी व्यक्ति वियोग का शिकार हो जाता है | अपनी मातृभूमि का मोह प्रत्येक
व्यक्ति के मन में वियोग की स्थिति उत्त्पन्न कर देता है | जैसे-जैसे पुरानी
स्मृतियाँ मन-मस्तिष्क पर छाने लगती है व्यक्ति पूरी तरह से अतीत में चला जाता है
ऐसे में उसकी वेदना की गति तीव्र होने लगती है | वह चाह कर भी प्रवास में अपने
परिवार और अपने रिश्तों को भुला नहीं सकता | अच्छी जिंदगी व्यतीत करने की लालसा और
अपनी मिट्टी से जुड़कर अपनी पहचान बनाए रखने की आकांक्षाओं के कारण ही विदेश में
रहते हुए भी व्यक्ति की मानसिकता को कुरेदती है |

      शिक्षा अथवा रोजगार के उद्देश्य से व्यक्ति भले ही प्रवाश
में जाकर नयी गृहस्थी शुरू करता है परन्तु पाश्चात्य समाज में व्यक्ति को फिट होने
में समय लग जाता है | विदेशी चकाचौंध सदैव भारतीयों को अपनी ओर आकर्षित करती है
परन्तु वास्तविकता तब नजर आती है जब व्यक्ति उस समाज में उस मानसिकता के साथ फिट
नहीं बैठता | ऐसे में आर्थिक रूप से सम्पन्नता भी कमी होने लगती है | यहाँ सबसे
ज्यादा जो जरुरी चीज है वह है निश्चित आवास का होना | परन्तु पराये देश में पहले
पहले किसी न किसी व्यक्ति का आश्रय लेना पड़ता है फ़िर जाकर फ्लेट या अपार्टमेन्ट
में रहना पड़ता है | यह स्थिति अनेक दिक्कते उत्पन्न करती है| आकाशगंगा के शब्दों
में- दूर देश में न कोई सगा सम्बन्धी है, न रहने का ठिकाना |”3 बहुत बार ऐसा देखा
गया है कि विदेश में अपनी इच्छाओं की ललक को पूरा करने के लिए अनेक भारतवंशी जाकर
वहाँ बस जाते है | यानी कभी इच्छा वश तो कभी बेसहाय वश परन्तु भारतीय परिवार को
अनेक समस्याओं से जूझना पड़ता है, जो कि एक प्रवासी के लिए बड़ा सपना बन कर रह जाता
है |

अपनत्व का अभाव

      प्रत्येक
क्रिया-कलाप, मान्यताएं, मूल्य-बोध, संस्कृति आदि समस्त गतिविधियाँ सामाज द्वारा
संचालित होता है | यही कारण है कि प्रत्येक सामाजिक जीवन मूल्यों को समाज ही
गतिशीलता प्रदान करती है, उसे विकसित  है |
प्रवासी जीवन शैली भारतीय जीवन शैली से कई अधिक भिन्न है | भारतीय समाज में
पाश्चात्य की लहर आधुनिकता का ही मापदंड है | प्रवास के दौरान व्यक्ति में
परिवर्तन आना एवं उनकी मानसिकता में बदलाव का आना स्वभाविक है | साथ ही विविध
प्रकार की समस्यायों का यथार्थ रूप में सामना करना, चाहे वह रंगभेद की दृष्टि से
हो या भाषागत दृष्टि से ही क्यों न हो | बदलते परिवेश में दूरियों का आना आम बात
जान पड़ता है | इससे व्यक्ति परिवार से परिवार समाज से कटता जाता है और एक नए समाज
में अपने को सामंजस्य बैठाने की कोशिश में लग जाता है, परन्तु इसका विखंडित स्वरूप
परिवार में खलन पैदा करता है | यही कारण है कि प्रवासी जीवन जीने के दौरान व्यक्ति
को जीवन के तमान कठिनाईयों से होकर गुजरना पड़ता है | साथ ही अपनत्व अभाव खलता रहता
है | इस संदर्भ में गोविन्द मिश्र कथन बहुत ही प्रासंगिक है | उनका कहना है-
“विचारों की आंधियां आती जाती रहती है | थोडा बहुत संवेदना को मोड़ती है | लेकिन
मूलतः उसका विकास जमीन के साथ जो-जो हो रहा है उसी के साथ चलता है | छलांग लगाकर
कलाहीन और नहीं पहुँच सकता… जैसा की वैचारिक स्तर पर अक्सर संभव होता है |”4 गंगा
का जीवन एक ऐसे छोर पर जा अटकी थी जिसमें कोई सगा सम्बन्धी था ही नहीं | एक ऐसे
पराए देश में जहाँ न कोई परिवार न कोई रिश्ता | वह कहती है- “ क्या लौटना पडेगा ?
यह सब छोड़कर, उस दूर देश में, जहाँ कोई सगा सम्बन्धी नहीं |”5

      व्यक्ति शिक्षा के क्षेत्र में, रोजगार की खोज में या नई
जीवन यापन की खोज में व आर्थिक विवशता के कारण आदि चाहे जिन परिस्थितियों में
प्रवास में निवास करता है | उस दैनिक जीवन में अपनी मिट्टी की खुसबू उसे सताती है
| जिसके चलते व्यक्ति पराए देश में रहकर वह न वहां का हो पाता है और न ही यहाँ का
| क्योंकि प्रवासी व्यक्ति का मन पेंडुलम की तरह डोलते रहता है जिससे की एकाग्र
नहीं हो पाता | भले ही थोड़े समय के लिए अपने को फिट परिस्थितियों के अनुसार फिट कर
लें परन्तु कुछ समय बाद जब उसे अपने घर और परिवार का बोध होता है तो कहीं न कहीं
अपने आप को अकेला ही पाता है जिसके चलते वह व्यक्ति प्रवास में रहकर भी अपनी
मिट्टी से जुड़ा रहता है | आकाशगंगा के शब्दों में- “अपनी संस्कृति और सभ्यता से
अपने को उखाड़ कर न यहाँ के पूर्णत: हो पाते हैं, न वहाँ के |”6  प्रवासी मनुष्य की मानसिकता अनिश्चित होती है |
जब उस पर पुरानी स्मृतियाँ हावी होती है तब वह न अपने देश को भुला पाता है और न ही
पाश्चात्य संस्कृति को अपने में फिट बैठा पता है | यही कारण है कि वह अपनी जमीन व
मातृभूमि के प्रति खिचाव बढ़ता चला जाता है |

अकेलापन एवं अजनबीपन  

मूल्यों की विसंगति ही
अकेलापन है | व्यक्ति के भीतर सामाजिक मूल्यों एवं निजी  मूल्यों की स्वीकृति का जो संघर्ष उत्पन्न होता
है उससे अलगाव की समस्या उत्पन्न होती है | अलगाव का मतलब है दूर हो जाना या अलग
हो जाना | ऐसे में व्यक्ति अकेलापन का शिकार हो जाता है | अर्थात् इसका मूल
अभिप्राय हुआ अलग या अजनबीपन होने की अनुभूति | अमृतराय ने लिखा है- “यह अजनबीपन
और संवेदनहीनता मूलतः एक ही चीज है | आदमी-आदमी के बीच संवाद नहीं है और न होने की
संभावना | इसलिए सब के सब एक दूसरे के लिए अजनबी है |”7 यह दूर होने की प्रक्रिया
के पीछे कई कारण भी हो सकते हैं जैसे आपसी अनबन के कारण अपनों से दूर हो जाना,
दाम्पत्य जीवन में प्रेम की माधुर्यता की कमी के कारण दूर हो जाना इत्यादि | जबकि
अकेलापन आज की सबसे विकत समस्या है | देवी शंकर अवस्थी के शब्दों में- “आधुनिक
मानव का अकेलापन ही इसकी त्रासदी और विडम्बना है |”8

पुत्र भविष्य के अंतिम
संस्कार कर लौटने के बाद पति डॉ. सिन्हा का कटु वचन उसे न केवल पति से बेगाना बना
देता है बल्कि पूरे परिवार में रहकर भी अपने आप को अलगाव का बोध करने लगती है |
ऐसे समय में उसे उसे जिसका साथ चाहिए था वही उस पर लांछन लगाता है- “तुमसे शादी
करने की गलती की मैंने, गोर चेहरे को देख कर माता जी धुल गई थीं, पर तुम्हारा रक्त
ही दूषित है, तुम्हारे दो भाई ल्यूकीमिया से मरे-और मेरा भविष्य भी तुम्हारे जहर
भरे रक्त की भेंट चढ़ गया | अब मुझे तुमसे लेना-देना नहीं | जो चाहो करो, जहाँ चाहो
जाओ |”9 ऐसे में आकाशगंगा के पास उसकी अपनी पीड़ा, आत्मलांछना और अपराध भावना का तो
कोई छोर ही न था |

व्यक्ति जब समाज से या
परिवार से अपने आप को अजनबी महसूस करने लगता है तब ऐसी स्थिति में उसके विश्वास और
आस्था के सारे सहारे टूट कर बिखर जाते हैं तथा जब वह महसूस करता है कि स्वयं
परिवार में उसका कोई आदर नहीं हो रहा है तो उसमें अपने आप ही अजनबीपन की भावना का
उत्पन्न होना स्वाभाविक है | औद्योगिकीकरण के इस चकाचौंध ने व्यक्ति को अपनी ओर इस
कदर आकर्षित कर रखा है कि दिनोंदिन वह काल के गाल में समाता चला जा रहा है |

वैज्ञानिक प्रगति के कारण
परंपरागत जीवन मूल्यों के आगे आज प्रश्न चिह्न लगाये जा रहे हैं | मौलिक चिंतन
शक्ति के विकास के कारण परंपरागत मूल्य आज निरर्थक मानकर छोड़े जा रहे हैं |
समकालीन सामाजिक जीवन में मूल्यों का विघटन एक ओर व्याप्त है तो दूसरी ओर
यांत्रिकी | मुख्यत: भूमंडलीकरण के प्रभाव के कारण मानवीय संबंध भयंकर तनाव के बीच
गुजर रहे हैं | वास्तव में मूल्यों के साथ हमारा मानसिक संबंध स्थापित हो जाता है
| चूँकि युगीन परिस्थितियों में परिवर्तन होने के साथ जीवन मूल्यों में भी
परिवर्तन होना सहज है |

प्रवास में जीवन यापन कर
रहे एक भारतीय महिला की सारी संवेदनाएँ विघटित हो जाने के लिए विवश है | उसे येसा
लग रहा है कि अब उसका इस दुनिया में कोई नहीं | आकाशगंगा समुन्द्र के किनारे जा
रेत पर लेट जाती है उसे न सुध है लहरों की न ही मृत्यु की | समुद्र की यह लहरे आती
और पैरों को भिगोकर चली जाती है | लेखिका के शब्दों में- “यह शरीर कितना अतृप्त
है, कितना वंचित है किसी के स्नेहिल स्पर्श का, जैसे सारी त्वचा में धीरे-धीरे आँच
सुलग रही है |”10 अकेलेपन की छटपटाहट उसे अंदर से व्याकुल कर देती है | दूर प्रदेश
में उसका कोई अपनानहीं रहता है सिवाय एकाकीपन के | क्योंकि जो अपना था वह भी उसे
अकेले छोड़ गया | वह बुदबुदाती है, “सभी कोई क्यों मुझे छोड़कर चले जाते हैं- तुम आओ
न माँ-मुझे उठकर अपनी बाँहों में भर लो | मुझे दुलराओ माँ- मुझे उठाकर बैठाओ-अरे
कोई तो हो जो…”11  अत: उसे न सांस की
परवाह है और ना ही मृत्यु की | प्रवास का यह अकेलापन विछोह की स्थिति वाला अकेलापन
नहीं है | “वरन व्यक्ति और घटनाओं के बीच असम्प्रेरणा से युक्त अद्भुत छटपटाहट का
क्षण है जिसका उत्तर दर्शन के पास नहीं है |”12

इस उपन्यास में नायिका
आकशगंगा के जीवन में द्वंद्वात्मक परिस्थितियाँ तब उभर कर सामने आती है जब एक ओर
प्रवास में पति छोड़कर चला जाता है | वहीँ दूसरी ओर अर्जुन सिंह का आश्रय पाती है
परन्तु गैर क़ानूनी कम करवाने के जुर्म में रातों-रात उसकी गिरफ्तारी हो जाती है |
ऐसे में उसके पास न वीजा है न भारत लौटने का दूसरा मार्ग | आकाशगंगा के शब्दों
में- “इस ठंडे पराए देश में, जहाँ आकर लोग इतना बदल जाते हैं कि उन्हें सही गलत का
आभास भी नहीं रहता
 ?”13 प्रवासी समाज में सांस ले रहा भारतीय समाज
व परिवार जब भी परायेपन का शिकार होता है तब वह अतीत में खो जाता है और वर्तमान
में अपने उन पुरानी यादों के बीच छोटी-छोटी खुशियों को तलाशने की कोशिश करने लगता
है | अतीत के प्रति मोह व्यक्ति को नए परिवेश में सामंजस्य स्थापित करने में बाधा
उत्पन्न करता है |

अकुलाहट

एकांत जीवन का यह भयावह
सच है कि व्यक्ति का मन मश्तिष्क, चेतना शून्य हो जाता है | जीवन में सब चीज उसे
बिखरता हुआ ही नज़र आता है जहाँ केवल अँधेरा ही अँधेरा है | समुन्द्र के किनारे,
रेत पर बैठी-बैठी आकाशगंगा जान रही थी कि “यह जिन्दगी ऐसे टूट गई है, टुकड़े-टुकड़े
होकर बिखर गई है कि नर्सरी गीत के ह्म्पटी – डम्पटी की तरह कभी जुड़ नहीं पाएगी |”14
 

आधुनिक प्रेम की विडम्बना
का प्रस्तुतीकरण भी इनके साहित्य में हैं कि आज का मनुष्य    अपने भीतर अलगाव, अभाव एवं शून्य आदि जैसी विविध परिस्थितियों का
अनुभव कर रहा है | उसके इस अभाव की पूर्ति प्रेम से ही हो सकती है | किन्तु मानव
जीवन यह है कि वह प्रेम करने में असमर्थ है | पति गगनेंद्र अपने बेटे के मृत्यु का
आक्षेप अपनी पत्नी को मानता है यही कारण है कि वह अपनी पत्नी  एवं उसके प्रेम को भूलकर सदैव के लिया छोड़ कर
भारत चला जाता है | बिना बताए चले जाने से आकाशगंगा को यकीन नहीं होता | यही कारण
है कि वह वर्तमान में जीते हुए भी अतीत के गर्त में चली जाती है | घर वही रहता है
बशर्ते उसमें रहने वाला व्यक्ति कोई नहीं रहता है | यह जानते हुए भी की उसका पति
अपनी बेटियों को लेकर चला गया है बावजूद इसके भी उसे येसा लगता है कि मानों यह
स्वप्न है | बेटियाँ झरना और सपना उसे आकर पुकारेगी | अत: अपने पति के प्रेम से
वंचित होकर वह काल्पनिक जगत में यहाँ से वहाँ विचरती रहती है |

बेरोजगारी की समस्या 

      पति
से विलगाल हो जाने के बाद आकाशगंगा प्रवास में स्थाई रूप से नौकरी करके रहने का
मार्ग अपनाती है | वास्तविकता से परिचित है कि डॉ. सिन्हा उसे अपनाएंगें नहीं
इसलिए वह विदेश में ही रहकर काम करना चाहती है | एरिक से कहती है- “मैं सम्मान से
जीना चाहती हूँ बहले ही मुझे झाड़ू लगाने का काम करना पड़े |”15        

मूल्यों की
टकराहट

“मूल्य शब्द मूल्य+यात से
निष्पन्न है, जिसका अभिप्राय है- किसी वस्तु के विनिमय में दिया जाने वाला धन,
दाम, बाजार भाव आदि | परन्तु क्रमशः मूल्य शब्द के अर्थ में विस्तार हुआ है और यह
शब्द मानदण्ड के अर्थ की भी अभिव्यक्ति करने लगा है | यही नहीं संस्कृति जैसे
सूक्ष्म भाव के आधारभूत तत्वों को जिनसे किसी समाज की सांस्कृतिक अवस्था का ज्ञान
होता है इसे भी मूल्य कहा जाने लगा है |”16 आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में
परस्पर विरोधी मूल्य एक दूसरे से टकराकर टूट रहे हैं | आज का व्यक्ति परंपरागत
जीवन मूल्यों को आत्मसात करने लगा है | इस नव मूल्य की प्रक्रिया में व्यक्ति के
लिए संघर्ष एक आवश्यकता बन गया है| इस उपन्यास में प्रवास में जीवन यापन कर रहे
भारतीय परिवार के जीवन मूल्यों की टकराहट को स्पष्टत: देखा जा सकता है |

मूल्य जन समाज की वह रीढ़
है, जिसके सहारे समाज पूर्णत: अस्तित्ववान होता है | किसी समाज की संस्कृति का
अध्ययन उस समाज में प्रचलित मानव मूल्यों के आधार पर ही संभव है | मानव की तानित
सी त्रुटि संसार की अशांति का कारण बन सकती है | वस्तुतः मूल्य विघटन आधुनिक काल
की उपज है | यह उपन्यास आपसी रिश्तों में आये खलन, नैतिक जीवन मूल्यों में विघटन
पर बल देता है | शक के बुनियाद पर टिकी यह पति-पत्नी का संबंध अधूरे मानसिकता,
आडम्बरों से पैदा हुए चकाचौंध जैसे मन:स्थिति को उजाकर कर पाठको के समक्ष प्रस्तुत
करता है | बदले परिवेश में पुरानी मायताओं को लेकर जूझती रहती है | इस भाग दौड़ की
जिंदगी में गंगा अपने को अशांत पाती है | महेंद्र भल्ला कृत ‘दूसरी तरफ’ उपन्यास
में वे विदेशी आक्रान्ताओं को स्पष्ट करते हुए कहते हैं- “हिन्दुस्तान में बिल्कुल
विपरीत जहाँ लोगों की आवाज़े बोलती थी, बेचने की आवाज़े चिल्लाती थी, सबसे ऊपर होती
थी | शायद यही फर्क है पश्चिम और पूरब में |”17 देखा जाए तो मूल्य संघर्ष का
संत्रास गंगा के जीवन में कही-न-कही किसी न किसी रूप में चलता रहता है | जिसके
चलते जीवन मूल्यों के बीच सघर्ष करती हुई दिखाई देती है | मूल्य विघटन का प्रमुख
कारण निरंतर होने वाला परिवर्तन ही है | डॉ. गणेश दास के अनुसार- “जन व्यक्ति के
जीवन मूल्यों के बीच संक्रमण आती है | तब मनुष्य उसे स्पष्ट रूप से विभाजित नहीं
कर पाता |”18 मानसिक और बाहरी द्वंद्व के कारण व्यक्ति उलझन से भरा रहता है | इससे
उसका चरित्र किसी भी ढांचे में ढल नहीं पाता है यही कारण है कि व्यक्ति के जीवन
मूल्यों में टकराहट की स्थिति दिखाई देती है |

वर्तमानयुगीन जीवन
मूल्यों के संक्रमण के कारण उत्पन्न मानव जीवन की कटुता, परिवार विघटन आदि के
परिप्रेक्ष्य में नवमूल्यों की स्थापना ही इस उपन्यास का उद्देश्य है | मूल्य
विघटन की स्थिति में स्त्री जीवन असंगत बनाता जा रहा है | विद्रूपता, भावहीनता आदि
अनेक असंगत प्रवृतियाँ उसमें दिखाई देने लगी है |

भारतीय सामजिक जीवन में
दाम्पत्य संबंध या विवाह वासनापूर्ति का साधन नहीं हैं | वह जीवन का पवित्र बंधन
है, त्याग एवं समर्पण का चिह्न है | पति पत्नी के बिना पारिवारिक रथ नहीं चल सकता
| भारतीय समाज में पारिवारिक जीवन की सफलता का मुख्य कारण पारम्परिक प्रेम एवं
त्याग है | वर्तमान सांचा आज खोखला हो चुका है | इस उपन्यास में पति डॉ. सिन्हा
अपनी पत्नी को अमेरिका में छोड़ कर भारत केवल इसलिए चला जाता है क्योंकि उसके पुत्र
भविष्य के मृत्यु का कारण अपनी पत्नी को मानता है | इसलिए वह बिना बताए वीजा लेकर
चला जाता है | यही कारण है कि परित्यक्ता होकर जीवन बिताती है | “परित्यक्ता होना
आखिर कोई ऐसी अनहोनी बात तो नहीं है , हमारे देश में तो न जाने कितने लोग अपनी
पत्नी को छोड़ देते हैं |”19

स्त्री-पुरुष के
वार्तालाप से ही कटुता का अहसास होता है कि दाम्पत्य जीवन से सुखी नहीं है | जहाँ
तक स्त्री की बात है पति के स्वभाव के साथ उसका स्वभाव मेल नहीं खाता | पाश्चात्य
संस्कृति में निवास करने के कारण पत्नी की विचारधारा स्वतंत्र होती है परन्तु
भारतीय पति को यह पसंद न था | जबकि पत्नी अपने पति का प्यार चाहती है परन्तु बदलें
में उसे आत्मलांछना का शिकार होना पड़ता है | कई बार उसे अपने पति के कटु वचन का
शिकार होना पड़ता है | “तुमसे शादी करने की गलती की मैंने, तुम्हारा रक्त ही दूषित
है |”20 उनकी यही बात उनके बीच कटुता बनकर उभरती है | यहाँ एक प्रश्न है क्या यह
जरुरी है कि दाम्पत्य जीवन की पीड़ा का दोष स्त्री के माथे मढ दिया जाए | यदि किसी
भी रिश्ते में कटुता व् कड़वाहट उत्पन्न हो रही है तो इसमें दोनों भागीदारी है न कि
कोई एक |

प्रवास में रह रहे भारतीय
परिवार की मानसिकता वहीँ धरी की धरी है | आधुनिक होकर भी उसकी मानसिकता दबी
कुची है | परन्तु यह भी सत्य है कि आधुनिकता की इस चकाचौंध में व्यक्ति अपनी गरिमा
को न पार करे | पति का यह बदलाव तब देखा जाता है जब स्वयं के परिवार को ही संदेह
की दृष्टि से देखने लगता है | पति डॉ. सिन्हा अपनी माँ से कहता है- “अम्माँ- तुम
उसे पहचानती नहीं, वह बड़ी चालाक है, उसका भरोसा मत करो-अच्छा, रात को उसके कमरे
में बाहर से ताला लगा दिया करो |”21

नारी के स्वतंत्र सामाजिक
जीवन में पुरुष वर्ग द्वारा अपने परंपरागत संस्कारों एवं अधिकारों को छोड़ नहीं
पाना तथा आर्थिक दृष्टि से नारी की आत्मनिर्भरता, अविश्वास बनावट आदि ही के कारण
है जिनसे समकालीन दाम्पत्य संबंधों में कटुता आ रही है | डॉ. सुरेश सिन्हा का कथन
दृष्टव्य है- “इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक तरफ आज की नारी की
वेदना को बड़ी मार्मिकता से रूपायित करता है, दूसरी तरफ आधुनिक जीवन सन्दर्भों की
कृत्रिमता और खोखलेपन को बड़ी सूक्ष्मता से उजागर किया गया है |”22 गौरतलब यह है कि
दाम्पत्य संबंधों की विषमता एवं विघटन का प्रभाव वर्तमान समय में न केवल पति और
पत्नी पर पड़ रहा है अपितु उनकी संतान एवं परिवार पर भी पड़ रहा है

यौन संबंध 

यौन प्रवृति मनुष्य की
जन्मजात प्रवृतियों में से एक है | वर्तमान समय में आधुनिक नारी की यौन सम्बन्धी
दृष्टि बदली है | डॉ. रामेश्वर नारायण ‘रमेश’ के मतानुसार- “आधुनिक नारियाँ बौधिक
आदर्शवादी है तो यथार्थवादी भी | आधुनिक बौधिक नारियाँ सत्यानुभूति से प्रेरित
होकर तथ्यों पर बल देती है | वे आधुनिक है, शिक्षिता है | संभवत: इसलिए वे
आदर्शवादिता का विरोध करती है | वे पूर्णरूपेण विकासवादी सिद्धांत की समर्थिका है
इसलिए वह यथार्थवादी है|”23 स्त्री पुरुष का पारस्परिक आकर्षण एक नैसर्गिक मनोवृति
है | इस उपन्यास में अर्जुन सिंह का सान्निध्य आकाशगंगा को बुरा नहीं लगा | अर्जुन
सिंह ने उसे सब सुविधाओं से पाट दिया था , काम-काज या सारी जिम्मेंदारियों से
मुक्त कर रखा था | अर्जुन सिंह केवल उसे सज-सँवारकर बैठे देखना चाहता था | अर्जुन
सिंह आकाशगंगा से कहता है- “तुझसे कभी जी नहीं भरेगा  मेरी डार्लिंग-तेरा चाहे भर जाए |”24 आकाशगंगा
का संबंध पहले अर्जुन सिंह से होता है फ़िर एरिक से तत्पश्चात प्रवीन से | परन्तु
इन संबंधों में कहीं मजबूरीवश, शारीरिक जरूरतों की माँग है, तो कहीं, तो कहीं
असहाय वश एकाकी जीवन का सहारा मात्र | 

      वास्तविकता
तो यह है कि औरत पुरुष को अपनी जिंदगी का अंतिम पुरुष मानती है | पर पुरुष अपने
चाहे जितनी औरतों के संपर्क में आया हो, औरत से जानना कभी नहीं भूलता कि उसके पहले
उसकी जिंदगी में कोई आया तो नहीं, शायद इससे उसका अहम् सन्तुष्ट होता होगा |
समकालीन समय में स्त्री स्वछंद विचार धारा रखती है | इस संदर्भ में डॉ. राजरानी
शर्मा का कहना है- “अब नारी सेक्स के संदर्भ में न ग्लानी अनुभव करती है और न उसके
लिए मात्र पुरुष को जिम्मेदार मानती है | वह अपने कर्म और स्वयं के फल के प्रति
अपने को जिम्मेदार मानती है | यह नारी की रुढ़िमुक्तता का ही एक आयाम है |”25

 ‘यौन विकृति’ की चर्चा भी इस उपन्यास में मिलती
है | आज आधुनिक समाज में रिश्ते और नामों का कोई सार्थक अर्थ नहीं रह गया है | सच
में संबोधन जितने सच्चे होते है, उतना सच्चा प्यार नहीं होता | अर्जुन सिंह उसे
सहलाता, थपकियाँ देता, पहले-पहल आकाशगंगा को यह सब अजीब सा लगा | परन्तु पति
द्वारा अपमान मिलने रहने के कारण इस प्रकार से पुरुष का स्पर्श वह भूल चुकी थी |
लेखिका कहती है- “इस रिश्ते में अगर कुछ रिश्ता था-तो वह केवल शरीर का- उसे तृप्ति
तो मिल रही थी, पर वांछनीय नहीं था, वह जानती थी यह उसकी मज़बूरी नहीं थी, वह बंधी
नहीं थी, किसी भी दिन दरवाज़ा खोलकर होटल से बाहर जा सकती थी पर उसे लगा कि वह जाना
नहीं चाहती, एकदम निष्क्रिय रहने, होटल में रहने की सुविधा और एक पुरुष का हर वक़्त
उसकी इच्छा पूर्ति करना एक सुखद अनुभव था |”26 इस रिश्ते का न कोई नाम है न ही इस
रिश्तें में प्यार बल्कि यह एक-दूसरे की इच्छापूर्ति का माध्यम है | डॉ.त्रिभुवन
सिंह के मतानुसार- “समय ऐसा आ गया है, जिसमें नाम और संबंध एक दूसरे की
पर्यायवाचिता खो बैठे हैं, यहाँ तक कि उसके उल्लंघन में अब पश्चाताप और मानसिक
क्लेश भी नहीं रह गया है |”27

पारस्परिक रूप में
स्त्री-पुरुष के काम रूप को अभिन्न अंग माना गया है “यौन भावना प्राकृतिक आवश्यकता
या शारीरिक भूख है जिसकी तृप्ति चाहे किसी भी स्थिति में होनी चाहिए |”28 फ्रायड
ने काम को समस्त चेतन जगत एवं क्रिया-कलापों का मूल माना है | अत: यह आवश्यक नहीं
है कि जिसके साथ यौन संबंध हो उसके साथ प्रेम हो या किसी भी प्रकार का संबंध हो |
यौन प्रवृति के संस्कारपूर्ण रोप का विकास है प्रेम | प्रेम मानव चरित्र का प्रेरक
तत्व है | “शारीरिक और संवेगात्मक आकर्षक के मिलन बिंदु पर प्रेम का आविर्भाव होता
है | प्रेम केवल अध्यात्म की अनुभूति नहीं है, शरीर से उसका दृढ़ संबंध होता है |
मांस में उसकी चेतना है, रक्त में उसका उष्ण | या वासना चाहे अछि हो या बुरी, जीवन
का नेवारी अंग है |”29

नर नारी का आकर्षण स्वाभाविक
एवं सहज है | इस दृष्टि से वह सम्पूर्ण जीवन प्रसंगों से जुड़ी हुई परिपक्व जटिल
प्रक्रिया है | अपने व्यापक अर्थ में प्रेम भावना मूलतः एक मानवीय जुड़ाव का भाव है
| “नर नारी के बीच सम्बन्धों की समस्या सदैव रही है | इसमें भावात्मक, रागात्मक,
सेक्स-मूलक सम्बन्धों के व्यस्था की समस्या अपने आप में काफी जटिल है |”30  किन्तु आधुनिक मानवीय संबंधों के प्रभाव से
समकालीन प्रेम भावना को भी धक्के लगे है | एक ओर जहाँ गंगा को पति का प्रेम नहीं
मिल पाता है | वहीँ दूसरी ओर अर्जुन सिंह से नैसर्गिक संबंध का बनना कहाँ तक सही
है ? साथ ही उसका साथ थोड़े ही दिन का रहता है कि आगे एरिकसन का साथ सहानुभूति का
साथ है जिसमें प्रेम का नाम नहीं परन्तु संबंध स्थापित जरुर होता है |

सौन्दर्य का ख्याल रखना ,
प्लास्टिक सर्जरी करवाना, मसाज करवाना आदि जिअसी विविध गतिविधियाँ कहीं न कहीं
पाश्चात्य की ही दें है | लोग विज्ञापन की चकाचौंध में पूरी तरह समाहित होता चला
जा रहा है | इस विज्ञापन पद्धति को व्यक्ति दिनोंदिन अपनी निजी जीवन में भी लागू
करता जा रहा है | चुकी किसी भी आकर्षक चीज क्षणभंगुर मात्र है | बशर्ते जरुरत है
कि उन चीजों का हम उपयोग करते हैं या दुरपयोग | पाश्चात्य परिवेश में देखा गया है
कि “वे जवानी में में खूबसूरती का दीवाना हुआ करते हैं | इसलिए हजारों
स्त्री-पुरुष प्लास्टिक सर्जरी करवाकर अपने को जवान रखतेहैं |”31 चूँकि गंगा अपने
आप को साज-सँवारकर महज अर्जुन सिंह के लिए रखती जिसने उसे हर प्रकार की सुविधाओं
से भरपूर कर रखा था | न उसे अशार का बोध होता और न ही एकाकीपन का | ऐसे में उसे
क्या चाहिए केवल यही कि जिस पुरुष ने उसे हर बंधनों से मुक्त रखा उसकी इच्छापूर्ति
का ख्याल रखे | “खाली समय में वह पलंग पर पड़ी-पड़ी छत को ताका करती थी, न टेलीविजन
देखती थी, न ही पढ़ती-लिखती थी | हर दो-तीन दिन में होटल की ब्यूटी शॉप में जाकर
हाथ, पाँव, चेहरा सब सँवरवा लेती थी, पुरे शरीर की मालिश हो जाती थी | फ़िर तैयार
होकर यानी साड़ी या चमकदार सलवार-कुरता पहनकर बैठी रहती थी |”32 यह साज-सजा स्वयं
के लिए नहीं था बल्कि अपने को जवान रख कर अर्जुन सिंह को रिझाने के लिए था |

यह संबंध स्पर्श का,
एहसास का, आत्मीयता का, सहानुभूति का होता है | चूँकि गंगा जानती है कि एरिक का
साथ साथ महज़ कुछ ही क्षण के लिए है इसके बाद वह स्वीटजरलैंड चला जाएगा | बावजूद
इसके भी वह उसके द्वारा प्राप्त सहानुभूति सरे ग़मों को भुला देती है | यह भी एक
प्रकार से उत्कृष्ट प्रेम की चरम सीमा है | एरिक आकाशगंगा से कहता है- “अभी तो हम
संग है न- बस यही काफी नहीं है ?”33 विघटन की प्रक्रिया से गुजर रहे आधुनिक प्रेम
भावना पर यंत्र युग के आत्मनिर्वसन का प्रभाव पड़ा है |

उषा प्रियंवदा का ‘नदी’
उपन्यास प्रेम और नैतिकता के परंपरागत प्रतिमानों पर न केवल प्रश्न चिह्न लगता है,
अपितु मानवीय संबंधों के यथार्थ को भी प्रस्तुत करता है | भारतीय संस्कृति के
अनुसार शादी के पूर्व या बाद एक स्त्री किसी गैर पुरुष से संबंध रखती है तो उसे
गलत माना जाता है | परन्तु जब एक पुरुष पत्नी के रहते किसी एनी स्त्री से संबंध
रखे तो उसे मर्दानगी कहा जाता है | गंगा नए देश, नए परिवेश में है, अर्जुन के साथ
संबंध हर दृष्टि से गलत है, वह विवाहिता हैं , चार बेटियों और एक बेटे का पिता है
| यह जानते हुए भी गंगा उसके साथ नैसर्गिक संबंध बनती है | यहाँ तक कि अर्जुन सिंह
भी केवल अपनी इच्छाओं की ही पूर्ति मात्र गंगा से करता है जो कि उसे अपनी पत्नी से
नहीं प्राप्त हो पता | अर्जुन सिंह कहता है- “मैं किसी का हक़ छीनकर किसी और से
नहीं बाँट रहा हूँ- यह मेरी ख़ुशी है | मुझे भी कुछ ख़ुशी पाने का अधिकार है कि नहीं
|”34 यौन संबंध को घृणा एवं अश्लील की  की
एवं अश्लील की से देखा जाता था परन्तु आज उसकी सहज अभिव्यक्ति अपेक्षित है |

निष्कर्ष

      आधुनिक
जीवन की सबसे बड़ी जटिल व् प्रमुख समस्या आजीविका, प्रेम, विवाह और सेक्स की कमी है
| कमजोरियाँ हर व्यक्ति में होती हैं, कोई भी पूर्ण नहीं | स्त्री भी अपनी
कमजोरियों को जानती है, पर कुछ कमजोरियाँ आदत और बेसहाय व् लाचारीपन में शामिल हो
जाती हैं | कभी-कभी यह भी एक कारण बन जाती है, कटुता का, अलगाव, विखरापन का, संबंध
विखंडन का आदि | व्यक्ति इस क्षेत्र में समाज की रूढ़ सनातन धारणाओं एवं मान्यताओं
में अनास्था रखता हुआ मानसिक संघर्षों से ग्रस्त रहता है | सामाजिक मान्यताओं को
प्रधानता देने पर जिस आत्मिक कष्ट और अंतर्द्वंद्व को लेकर वह जीता है वह उसके
व्यक्तिगत क्षेत्र में हानिकारक सिद्ध होता है | अतृप्त वासनाएँ व्यक्ति के जीवन
को कुंठित कर पूर्ण रूप से उसे मानसिक रोगी बना देती है | भारतीय समाज प्राचीन
संस्कृति एवं आदर्शों में इतना आस्थावान है कि उनके विपरीत संस्कृति, मनोभाव, आचरण
वालो को उचित मान्यता नहीं देता |

      मुख्यरूप
से देखा जाए तो इस उपन्यास में कलात्मक परिपक्वता, संवेदनशीलता और उत्तर आधुनिक
बोध की परिपूर्णता दिखाई देती है | साथ ही इसमें प्रवासी भारतीय स्त्री के जीवन के
संत्रास और अकेलेपन से उत्पन्न छटपटाहट और मानसिकता यंत्रणा, अर्थाभाव के कारण
चाहते हुए भी कुछ ना कर पाने की विवशता अपने पूर्ण यथार्थ के साथ अभिव्यक्त हुई है|
लेखिका ने व्यक्ति, परिवार तथा स्त्री-पुरुष के संबंधों, नारी की स्थिति आदि को
अत्यंत प्रभावशाली रूप में चित्रित किया है |

उपन्यास के केंद्र में
स्त्री की सुख-दुखात्मक स्थितियाँ, अंतर्द्वंद्व, आकांक्षा तथा पुरुष से उसका
संबंध आदि विषय है | साथ ही उससे जूझती समस्याओं का एवं सवेद्नाओं का मार्मिक
विस्तारपूर्वक वर्णन है | इसके साथ ही साथ द्विभाषीय राष्ट्र जैसे भारत और
अमेरिकीय जीवन शैली की विरोधी संस्कृतियों की टकराहट भी इनमें स्पष्ट रूप से उभर
कर आती है | जिसके चलते पारिवारिक जीवन शैली में तनाव व टकराहट की स्थितियाँ आ
जाती है | जिसका परिणाम यह होता है कि स्त्री-पुरुष के संबंध में विखराव के साथ-
साथ मानव जीवन में उत्पन्न परिस्थियों से रु-ब-रु करवाया गया है |

संदर्भ ग्रन्थ सूची

1.       डॉ. दंगल झाल्टे, नए
उपन्यासों में नए प्रयोग, पृष्ठ-16

2.       डॉ.पुरुषोत्तम दुबे, व्यक्ति चेतना और स्वातंत्र्योत्तर हिंदी उपन्यास,
पृष्ठ-170

3.       उषा प्रियंवदा, नदी
उपन्यास, पृष्ठ-84

4.       श्री गोविन्द मिश्र,
साहित्य का सन्दर्भ, पृष्ठ-100

5.       उषा प्रियंवदा, नदी
उपन्यास, पृष्ठ-84

6.       उषा प्रियंवदा, नदी
उपन्यास, पृष्ठ-36 

7.       गीता सोलंकी, नारी चेतना
और कृष्णा सोबती के उपन्यास, पृष्ठ-116

8.       वहीँ, पृष्ठ-116

9.       उषा प्रियंवदा, नदी
उपन्यास, पृष्ठ-21

10.    उषा प्रियंवदा, नदी
उपन्यास, पृष्ठ संख्या-25

11.    उषा प्रियंवदा, नदी
उपन्यास, पृष्ठ संख्या-25

12.    क्षमा गोस्वामी, नगरीकरण
और हिंदी उपन्यास, पृष्ठ-188

13.    उषा प्रियंवदा, नदी,
उपन्यास, पृष्ठ-36

14.    उषा प्रियंवदा, नदी
उपन्यास, पृष्ठ-22

15.    उषा प्रियंवदा, नदी
उपन्यास, पृष्ठ संख्या-44

16.    आप्टे वामन शिवराम, संकृत
हिंदी कोश, पृष्ठ-812

17.    महेंद्र भल्ला, दूसरी तरफ
उपन्यास, पृष्ठ-204

18.    डॉ.सौ मंगल कप्पीकेरे,
साठोत्तरी हिंदी लेखिकाओं की कहानियों में नारी, पृष्ठ-68 

19.    मन्नू भंडारी, एक इंच
मुस्कान, पृष्ठ-23

20.    उषा प्रियंवदा, नदी
उपन्यास, पृष्ठ-22

21.    उषा प्रियंवदा, नदी
उपन्यास, पृष्ठ-60 

22.    डॉ. सुरेश सिन्हा, हिंदी
उपन्यास, पृष्ठ-23, स्वराज प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण- 2006

23.    डॉ. माधवी बागी, देवेश
ठाकुर के उपन्यास में नारी,
 पृष्ठ-118

24.    उषा प्रियंवदा, नदी
उपन्यास, पृष्ठ-31

25.    डॉ.राजरानी शर्मा, हिंदी
उपन्यासों में रुढियमुक्त नारी, पृष्ठ-102

26.    उषा प्रियंवदा, नदी
उपन्यास, पृष्ठ-28

27.    डॉ.त्रिभुवन सिंह, हिंदी
उपन्यास और यथार्थवादी लेखक, पृष्ठ- 586, स्वराज प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम
संस्करण- 2006
 

28.    डॉ.रामदरश मिश्र, हिंदी
उपन्यास एक अंतर्यात्रा, पृष्ठ-93

29.    डॉ. गणेशन,  हिंदी उपन्यास साहित्य का
अध्ययन, पृष्ठ-169

30.    डॉ. माधवी बागी, देवेश
ठाकुर के उपन्यासों में नारी, पृष्ठ-113

31.    उषा प्रियंवदा का रचना संसार,

32.    उषा प्रियंवदा, नदी
उपन्यास, पृष्ठ-29

33.    उषा प्रियंवदा, नदी
उपन्यास, पृष्ठ-42

34.    उषा प्रियंवदा, नदी
उपन्यास, पृष्ठ-33

सपना दास

एम.फिल (शोधार्थी)

हिंदी विभाग 

गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय

दूरभाष संख्या-7044355873

ईमेल पता-sapna070295@gmail.com

        
        
          

 

प्रवासी साहित्यकार उषा प्रियंवदा कृत ‘नदी’ उपन्यास : प्रवासी स्त्री जीवन का संत्रास

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flying birds above herd of animals near trees
Photo by Vincent van Zalinge on Unsplash

प्रवासी साहित्यकार उषा प्रियंवदा कृत ‘नदी’ उपन्यास : प्रवासी स्त्री जीवन का संत्रास

सपना दास

शोध सारांश:

प्रवासी चर्चित महिला साहित्यकारों में उषा प्रियंवदा का नाम अग्रणी है | उन्होंने अबतक 6 उपन्यासों की रचना की हैं | 2007 में प्रकाशित उपन्यास ‘भया कबीर उदास के बाद 2016 में प्रकाशित ‘नदी’ उपन्यास प्रवासी स्त्री जीवन के दस्तावेज को चित्रित करने वाला उपन्यास है | प्रवासी साहित्यकार उषा प्रियंवदा कृत ‘नदी’ उपन्यास में प्रवासी स्त्री जीवन की गाथा को प्रस्तुत करने वाला उपन्यास है | यह उपन्यास प्रवासी स्त्री जीवन के मानवीय मूल्यों, नैतिक विचारों से लेकर प्रवासी स्त्री जीवन के विविध स्वरूप को एवं उनके अधिकारों की गाथा कहने वाली उपन्यास कहलाएगी | प्रवास में गए लोगों विशेषकर स्त्रियों के संघर्ष, मानसिकता का विखराव, दाम्पत्य जीवन में विखंडन, परिवार में अलगावबोध, घुटन, संत्रास, अकेलापन आदि जीवन की विविध परिस्थितियों का वर्णन लेखिका ने किया है | प्रस्तुत शोधालेख शोधार्थियों के लिए अति लाभदायक सिद्ध होगा |

इस उपन्यास में प्रवासी स्त्री जीवन के विविध पक्षों को सामने उजागर किया गया है चाहे वह विस्थापन की समस्या हो, या परिवार से दूर कुंठा की समस्या, एकांकीपन की समस्या, प्रवासी स्त्री जीवन का संघर्ष हो, चाहे मानसिक अंतर्द्वद्व की समस्या ही क्यों न हो? और मानसिकता की टकराहट पीढ़ीगत भी निहित है, जिसके भीतर नयी पीढ़ी के साथ साथ द्वितीय पीढ़ी यानी स्वयं इस उपन्यास की नायिका आकाशगंगा और उसके पति गगनेंद्र को झेलना पड़ता है | साथ ही इसकी चपेट में बूढ़े माँ-बाप और दोनों बेटियाँ भी आ घिरते हैं |

मूल शब्द: प्रवासी, डायस्पोरा, प्रवासन, अप्रवासी, उत्प्रवासी, वासी, मूल निवासी, एन. आर. आई. आदि

अन्य नाम: प्रवासी साहित्य लगभग 80 के बाद आया जबकि 1834 में गिरमिटिया प्रथा, उससे पहले दास प्रथा या गुलामी प्रथा के नाम से जाना गया |

भाव: जीवन मूल्य, मानवीय मूल्यबोध, आधुनिकता उत्तर आधुनिकताबोध, संस्कृति बोध

उषा प्रियंवदा कृत ‘नदी’ उपन्यास में प्रवासी स्त्री जीवन का यथार्थ

उषा प्रियंवदा कृत ‘नदी’ उपन्यास में भारत और अमेरिकी पृष्ठभूमि स्वतंत्रता का ताना-बाना अत्यंत व्यापक रूप से दिखाया गया है | इस उपन्यास में उपन्याकार मध्यवर्गीय परिवार से जुड़ी आधुनिकता की दौड़ में भागती नारी के अंतर्द्वंद्व, वैचारिक वैमनस्य के कारण पारिवारिक, सामाजिक, दाम्पत्य संबंधों की टूटन को रेखांकित करती हैं | यह विघटन पात्रों की मानसिकता को भी प्रभावित करता है और तनाव और अकेलेपन से ग्रस्त हो जाते हैं | लेखिका ने अन्य परम्परागत रिश्तों की गढ़न को नकारते हुए वर्तमान संदर्भ में विभाजित किया है | स्वतंत्रता बाद के उपन्यासों में अनेकों बदलाव परांगत होती हुई नज़र आती है | यह बदलाव बदलता हुआ परिवेश व दृष्टि की ही देन है | मूलरूप से इसका आभास प्रेमचंद के गोदान से ही मिलने लगता है | “गोदान ही हिंदी का वह पहला उपन्यास है, जिसने सभी परंपरागत, भ्रष्टाचार, तिलिस्म और मनोरंजन के सस्ते नुस्खे के चौखट को उखाड़ फेका है और सामाजिक यथार्थ को उसके समस्त कोणों से उद्घाटित कर एक नवीन औपन्यासिक धर्म का सूत्रपात किया है |”1

आधुनिक उपन्यासकार के लिए कथानक, चरित्र-चित्रण, कथोपकथन आदि परंपरागत बातें महत्वपूर्ण नहीं रह गई | वह इन्हें नकार कर नवीनता और आधुनिकता बोध के नये आयाम खोजता है | साथ ही परिवेश को चरित्र में एवं चरित्र को मनोविज्ञान में खोजता है जबकि मनोविज्ञान को व्यक्तित्व में खंगालता है | उषा प्रियम्वदा ने अपने उपन्यासों में विविध परिस्थितियों के आधार पर सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक, यथार्थवादी आदि विविध विषयों पर उपन्यास में केन्द्रित किया | “आज का उपन्यासकार ऐतिहासिक, सामाजिक या राजनीतिक उपन्यास नहीं लिखता, वह उनके माध्यम से आधुनिक व्यक्ति चेतना को परखता है, प्रतिस्थित करता और उनका मुल्यांकन करता है |”2

मानव मन बहुत ही चंचल होता है कभी यहाँ तो कभी वहाँ | जीवन के विविध क्षेत्र में उतार चढ़ाव लगे रहते हैं ऐसे में व्यक्ति का जीवन परिस्थियों से होकर यथार्थ रूप में मानस पटल पर विचरित करता रहता है | ‘नदी’ उपन्यास आधुनिक जीवन के यथार्थ को प्रस्तुत करने का स्पष्ट दस्तावेज़ है | जिसका संबंध मानव के आम जीवन से जुड़ा हुआ है | उषा प्रियंवदा ने ‘नदी’ उपन्यास में प्रवासी जीवन के यथार्थ को विविध समस्याओं व् परिस्थितयों के माध्यम से मुखरित किया है –

परिवार से दूर विस्थापन की समस्या

परिवार से दूर जाकर प्रावासी व्यक्ति वियोग का शिकार हो जाता है | अपनी मातृभूमि का मोह प्रत्येक व्यक्ति के मन में वियोग की स्थिति उत्त्पन्न कर देता है | जैसे-जैसे पुरानी स्मृतियाँ मन-मस्तिष्क पर छाने लगती है व्यक्ति पूरी तरह से अतीत में चला जाता है ऐसे में उसकी वेदना की गति तीव्र होने लगती है | वह चाह कर भी प्रवास में अपने परिवार और अपने रिश्तों को भुला नहीं सकता | अच्छी जिंदगी व्यतीत करने की लालसा और अपनी मिट्टी से जुड़कर अपनी पहचान बनाए रखने की आकांक्षाओं के कारण ही विदेश में रहते हुए भी व्यक्ति की मानसिकता को कुरेदती है |

शिक्षा अथवा रोजगार के उद्देश्य से व्यक्ति भले ही प्रवाश में जाकर नयी गृहस्थी शुरू करता है परन्तु पाश्चात्य समाज में व्यक्ति को फिट होने में समय लग जाता है | विदेशी चकाचौंध सदैव भारतीयों को अपनी ओर आकर्षित करती है परन्तु वास्तविकता तब नजर आती है जब व्यक्ति उस समाज में उस मानसिकता के साथ फिट नहीं बैठता | ऐसे में आर्थिक रूप से सम्पन्नता भी कमी होने लगती है | यहाँ सबसे ज्यादा जो जरुरी चीज है वह है निश्चित आवास का होना | परन्तु पराये देश में पहले पहले किसी न किसी व्यक्ति का आश्रय लेना पड़ता है फ़िर जाकर फ्लेट या अपार्टमेन्ट में रहना पड़ता है | यह स्थिति अनेक दिक्कते उत्पन्न करती है| आकाशगंगा के शब्दों में- दूर देश में न कोई सगा सम्बन्धी है, न रहने का ठिकाना |”3 बहुत बार ऐसा देखा गया है कि विदेश में अपनी इच्छाओं की ललक को पूरा करने के लिए अनेक भारतवंशी जाकर वहाँ बस जाते है | यानी कभी इच्छा वश तो कभी बेसहाय वश परन्तु भारतीय परिवार को अनेक समस्याओं से जूझना पड़ता है, जो कि एक प्रवासी के लिए बड़ा सपना बन कर रह जाता है |

 

अपनत्व का अभाव

प्रत्येक क्रिया-कलाप, मान्यताएं, मूल्य-बोध, संस्कृति आदि समस्त गतिविधियाँ सामाज द्वारा संचालित होता है | यही कारण है कि प्रत्येक सामाजिक जीवन मूल्यों को समाज ही गतिशीलता प्रदान करती है, उसे विकसित है | प्रवासी जीवन शैली भारतीय जीवन शैली से कई अधिक भिन्न है | भारतीय समाज में पाश्चात्य की लहर आधुनिकता का ही मापदंड है | प्रवास के दौरान व्यक्ति में परिवर्तन आना एवं उनकी मानसिकता में बदलाव का आना स्वभाविक है | साथ ही विविध प्रकार की समस्यायों का यथार्थ रूप में सामना करना, चाहे वह रंगभेद की दृष्टि से हो या भाषागत दृष्टि से ही क्यों न हो | बदलते परिवेश में दूरियों का आना आम बात जान पड़ता है | इससे व्यक्ति परिवार से परिवार समाज से कटता जाता है और एक नए समाज में अपने को सामंजस्य बैठाने की कोशिश में लग जाता है, परन्तु इसका विखंडित स्वरूप परिवार में खलन पैदा करता है | यही कारण है कि प्रवासी जीवन जीने के दौरान व्यक्ति को जीवन के तमान कठिनाईयों से होकर गुजरना पड़ता है | साथ ही अपनत्व अभाव खलता रहता है | इस संदर्भ में गोविन्द मिश्र कथन बहुत ही प्रासंगिक है | उनका कहना है- “विचारों की आंधियां आती जाती रहती है | थोडा बहुत संवेदना को मोड़ती है | लेकिन मूलतः उसका विकास जमीन के साथ जो-जो हो रहा है उसी के साथ चलता है | छलांग लगाकर कलाहीन और नहीं पहुँच सकता… जैसा की वैचारिक स्तर पर अक्सर संभव होता है |”4 गंगा का जीवन एक ऐसे छोर पर जा अटकी थी जिसमें कोई सगा सम्बन्धी था ही नहीं | एक ऐसे पराए देश में जहाँ न कोई परिवार न कोई रिश्ता | वह कहती है- “ क्या लौटना पडेगा ? यह सब छोड़कर, उस दूर देश में, जहाँ कोई सगा सम्बन्धी नहीं |”5

व्यक्ति शिक्षा के क्षेत्र में, रोजगार की खोज में या नई जीवन यापन की खोज में व आर्थिक विवशता के कारण आदि चाहे जिन परिस्थितियों में प्रवास में निवास करता है | उस दैनिक जीवन में अपनी मिट्टी की खुसबू उसे सताती है | जिसके चलते व्यक्ति पराए देश में रहकर वह न वहां का हो पाता है और न ही यहाँ का | क्योंकि प्रवासी व्यक्ति का मन पेंडुलम की तरह डोलते रहता है जिससे की एकाग्र नहीं हो पाता | भले ही थोड़े समय के लिए अपने को फिट परिस्थितियों के अनुसार फिट कर लें परन्तु कुछ समय बाद जब उसे अपने घर और परिवार का बोध होता है तो कहीं न कहीं अपने आप को अकेला ही पाता है जिसके चलते वह व्यक्ति प्रवास में रहकर भी अपनी मिट्टी से जुड़ा रहता है | आकाशगंगा के शब्दों में- “अपनी संस्कृति और सभ्यता से अपने को उखाड़ कर न यहाँ के पूर्णत: हो पाते हैं, न वहाँ के |”6 प्रवासी मनुष्य की मानसिकता अनिश्चित होती है | जब उस पर पुरानी स्मृतियाँ हावी होती है तब वह न अपने देश को भुला पाता है और न ही पाश्चात्य संस्कृति को अपने में फिट बैठा पता है | यही कारण है कि वह अपनी जमीन व मातृभूमि के प्रति खिचाव बढ़ता चला जाता है |

अकेलापन एवं अजनबीपन

मूल्यों की विसंगति ही अकेलापन है | व्यक्ति के भीतर सामाजिक मूल्यों एवं निजी मूल्यों की स्वीकृति का जो संघर्ष उत्पन्न होता है उससे अलगाव की समस्या उत्पन्न होती है | अलगाव का मतलब है दूर हो जाना या अलग हो जाना | ऐसे में व्यक्ति अकेलापन का शिकार हो जाता है | अर्थात् इसका मूल अभिप्राय हुआ अलग या अजनबीपन होने की अनुभूति | अमृतराय ने लिखा है- “यह अजनबीपन और संवेदनहीनता मूलतः एक ही चीज है | आदमी-आदमी के बीच संवाद नहीं है और न होने की संभावना | इसलिए सब के सब एक दूसरे के लिए अजनबी है |”7 यह दूर होने की प्रक्रिया के पीछे कई कारण भी हो सकते हैं जैसे आपसी अनबन के कारण अपनों से दूर हो जाना, दाम्पत्य जीवन में प्रेम की माधुर्यता की कमी के कारण दूर हो जाना इत्यादि | जबकि अकेलापन आज की सबसे विकत समस्या है | देवी शंकर अवस्थी के शब्दों में- “आधुनिक मानव का अकेलापन ही इसकी त्रासदी और विडम्बना है |”8

पुत्र भविष्य के अंतिम संस्कार कर लौटने के बाद पति डॉ. सिन्हा का कटु वचन उसे न केवल पति से बेगाना बना देता है बल्कि पूरे परिवार में रहकर भी अपने आप को अलगाव का बोध करने लगती है | ऐसे समय में उसे उसे जिसका साथ चाहिए था वही उस पर लांछन लगाता है- “तुमसे शादी करने की गलती की मैंने, गोर चेहरे को देख कर माता जी धुल गई थीं, पर तुम्हारा रक्त ही दूषित है, तुम्हारे दो भाई ल्यूकीमिया से मरे-और मेरा भविष्य भी तुम्हारे जहर भरे रक्त की भेंट चढ़ गया | अब मुझे तुमसे लेना-देना नहीं | जो चाहो करो, जहाँ चाहो जाओ |”9 ऐसे में आकाशगंगा के पास उसकी अपनी पीड़ा, आत्मलांछना और अपराध भावना का तो कोई छोर ही न था |

व्यक्ति जब समाज से या परिवार से अपने आप को अजनबी महसूस करने लगता है तब ऐसी स्थिति में उसके विश्वास और आस्था के सारे सहारे टूट कर बिखर जाते हैं तथा जब वह महसूस करता है कि स्वयं परिवार में उसका कोई आदर नहीं हो रहा है तो उसमें अपने आप ही अजनबीपन की भावना का उत्पन्न होना स्वाभाविक है | औद्योगिकीकरण के इस चकाचौंध ने व्यक्ति को अपनी ओर इस कदर आकर्षित कर रखा है कि दिनोंदिन वह काल के गाल में समाता चला जा रहा है |

वैज्ञानिक प्रगति के कारण परंपरागत जीवन मूल्यों के आगे आज प्रश्न चिह्न लगाये जा रहे हैं | मौलिक चिंतन शक्ति के विकास के कारण परंपरागत मूल्य आज निरर्थक मानकर छोड़े जा रहे हैं | समकालीन सामाजिक जीवन में मूल्यों का विघटन एक ओर व्याप्त है तो दूसरी ओर यांत्रिकी | मुख्यत: भूमंडलीकरण के प्रभाव के कारण मानवीय संबंध भयंकर तनाव के बीच गुजर रहे हैं | वास्तव में मूल्यों के साथ हमारा मानसिक संबंध स्थापित हो जाता है | चूँकि युगीन परिस्थितियों में परिवर्तन होने के साथ जीवन मूल्यों में भी परिवर्तन होना सहज है |

प्रवास में जीवन यापन कर रहे एक भारतीय महिला की सारी संवेदनाएँ विघटित हो जाने के लिए विवश है | उसे येसा लग रहा है कि अब उसका इस दुनिया में कोई नहीं | आकाशगंगा समुन्द्र के किनारे जा रेत पर लेट जाती है उसे न सुध है लहरों की न ही मृत्यु की | समुद्र की यह लहरे आती और पैरों को भिगोकर चली जाती है | लेखिका के शब्दों में- “यह शरीर कितना अतृप्त है, कितना वंचित है किसी के स्नेहिल स्पर्श का, जैसे सारी त्वचा में धीरे-धीरे आँच सुलग रही है |”10 अकेलेपन की छटपटाहट उसे अंदर से व्याकुल कर देती है | दूर प्रदेश में उसका कोई अपनानहीं रहता है सिवाय एकाकीपन के | क्योंकि जो अपना था वह भी उसे अकेले छोड़ गया | वह बुदबुदाती है, “सभी कोई क्यों मुझे छोड़कर चले जाते हैं- तुम आओ न माँ-मुझे उठकर अपनी बाँहों में भर लो | मुझे दुलराओ माँ- मुझे उठाकर बैठाओ-अरे कोई तो हो जो…”11 अत: उसे न सांस की परवाह है और ना ही मृत्यु की | प्रवास का यह अकेलापन विछोह की स्थिति वाला अकेलापन नहीं है | “वरन व्यक्ति और घटनाओं के बीच असम्प्रेरणा से युक्त अद्भुत छटपटाहट का क्षण है जिसका उत्तर दर्शन के पास नहीं है |”12

इस उपन्यास में नायिका आकशगंगा के जीवन में द्वंद्वात्मक परिस्थितियाँ तब उभर कर सामने आती है जब एक ओर प्रवास में पति छोड़कर चला जाता है | वहीँ दूसरी ओर अर्जुन सिंह का आश्रय पाती है परन्तु गैर क़ानूनी कम करवाने के जुर्म में रातों-रात उसकी गिरफ्तारी हो जाती है | ऐसे में उसके पास न वीजा है न भारत लौटने का दूसरा मार्ग | आकाशगंगा के शब्दों में- “इस ठंडे पराए देश में, जहाँ आकर लोग इतना बदल जाते हैं कि उन्हें सही गलत का आभास भी नहीं रहता ?”13 प्रवासी समाज में सांस ले रहा भारतीय समाज व परिवार जब भी परायेपन का शिकार होता है तब वह अतीत में खो जाता है और वर्तमान में अपने उन पुरानी यादों के बीच छोटी-छोटी खुशियों को तलाशने की कोशिश करने लगता है | अतीत के प्रति मोह व्यक्ति को नए परिवेश में सामंजस्य स्थापित करने में बाधा उत्पन्न करता है |

अकुलाहट

एकांत जीवन का यह भयावह सच है कि व्यक्ति का मन मश्तिष्क, चेतना शून्य हो जाता है | जीवन में सब चीज उसे बिखरता हुआ ही नज़र आता है जहाँ केवल अँधेरा ही अँधेरा है | समुन्द्र के किनारे, रेत पर बैठी-बैठी आकाशगंगा जान रही थी कि “यह जिन्दगी ऐसे टूट गई है, टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गई है कि नर्सरी गीत के ह्म्पटी – डम्पटी की तरह कभी जुड़ नहीं पाएगी |”14

आधुनिक प्रेम की विडम्बना का प्रस्तुतीकरण भी इनके साहित्य में हैं कि आज का मनुष्य अपने भीतर अलगाव, अभाव एवं शून्य आदि जैसी विविध परिस्थितियों का अनुभव कर रहा है | उसके इस अभाव की पूर्ति प्रेम से ही हो सकती है | किन्तु मानव जीवन यह है कि वह प्रेम करने में असमर्थ है | पति गगनेंद्र अपने बेटे के मृत्यु का आक्षेप अपनी पत्नी को मानता है यही कारण है कि वह अपनी पत्नी एवं उसके प्रेम को भूलकर सदैव के लिया छोड़ कर भारत चला जाता है | बिना बताए चले जाने से आकाशगंगा को यकीन नहीं होता | यही कारण है कि वह वर्तमान में जीते हुए भी अतीत के गर्त में चली जाती है | घर वही रहता है बशर्ते उसमें रहने वाला व्यक्ति कोई नहीं रहता है | यह जानते हुए भी की उसका पति अपनी बेटियों को लेकर चला गया है बावजूद इसके भी उसे येसा लगता है कि मानों यह स्वप्न है | बेटियाँ झरना और सपना उसे आकर पुकारेगी | अत: अपने पति के प्रेम से वंचित होकर वह काल्पनिक जगत में यहाँ से वहाँ विचरती रहती है |

बेरोजगारी की समस्या

पति से विलगाल हो जाने के बाद आकाशगंगा प्रवास में स्थाई रूप से नौकरी करके रहने का मार्ग अपनाती है | वास्तविकता से परिचित है कि डॉ. सिन्हा उसे अपनाएंगें नहीं इसलिए वह विदेश में ही रहकर काम करना चाहती है | एरिक से कहती है- “मैं सम्मान से जीना चाहती हूँ बहले ही मुझे झाड़ू लगाने का काम करना पड़े |”15

मूल्यों की टकराहट

“मूल्य शब्द मूल्य+यात से निष्पन्न है, जिसका अभिप्राय है- किसी वस्तु के विनिमय में दिया जाने वाला धन, दाम, बाजार भाव आदि | परन्तु क्रमशः मूल्य शब्द के अर्थ में विस्तार हुआ है और यह शब्द मानदण्ड के अर्थ की भी अभिव्यक्ति करने लगा है | यही नहीं संस्कृति जैसे सूक्ष्म भाव के आधारभूत तत्वों को जिनसे किसी समाज की सांस्कृतिक अवस्था का ज्ञान होता है इसे भी मूल्य कहा जाने लगा है |”16 आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परस्पर विरोधी मूल्य एक दूसरे से टकराकर टूट रहे हैं | आज का व्यक्ति परंपरागत जीवन मूल्यों को आत्मसात करने लगा है | इस नव मूल्य की प्रक्रिया में व्यक्ति के लिए संघर्ष एक आवश्यकता बन गया है| इस उपन्यास में प्रवास में जीवन यापन कर रहे भारतीय परिवार के जीवन मूल्यों की टकराहट को स्पष्टत: देखा जा सकता है |

मूल्य जन समाज की वह रीढ़ है, जिसके सहारे समाज पूर्णत: अस्तित्ववान होता है | किसी समाज की संस्कृति का अध्ययन उस समाज में प्रचलित मानव मूल्यों के आधार पर ही संभव है | मानव की तानित सी त्रुटि संसार की अशांति का कारण बन सकती है | वस्तुतः मूल्य विघटन आधुनिक काल की उपज है | यह उपन्यास आपसी रिश्तों में आये खलन, नैतिक जीवन मूल्यों में विघटन पर बल देता है | शक के बुनियाद पर टिकी यह पति-पत्नी का संबंध अधूरे मानसिकता, आडम्बरों से पैदा हुए चकाचौंध जैसे मन:स्थिति को उजाकर कर पाठको के समक्ष प्रस्तुत करता है | बदले परिवेश में पुरानी मायताओं को लेकर जूझती रहती है | इस भाग दौड़ की जिंदगी में गंगा अपने को अशांत पाती है | महेंद्र भल्ला कृत ‘दूसरी तरफ’ उपन्यास में वे विदेशी आक्रान्ताओं को स्पष्ट करते हुए कहते हैं- “हिन्दुस्तान में बिल्कुल विपरीत जहाँ लोगों की आवाज़े बोलती थी, बेचने की आवाज़े चिल्लाती थी, सबसे ऊपर होती थी | शायद यही फर्क है पश्चिम और पूरब में |”17 देखा जाए तो मूल्य संघर्ष का संत्रास गंगा के जीवन में कही-न-कही किसी न किसी रूप में चलता रहता है | जिसके चलते जीवन मूल्यों के बीच सघर्ष करती हुई दिखाई देती है | मूल्य विघटन का प्रमुख कारण निरंतर होने वाला परिवर्तन ही है | डॉ. गणेश दास के अनुसार- “जन व्यक्ति के जीवन मूल्यों के बीच संक्रमण आती है | तब मनुष्य उसे स्पष्ट रूप से विभाजित नहीं कर पाता |”18 मानसिक और बाहरी द्वंद्व के कारण व्यक्ति उलझन से भरा रहता है | इससे उसका चरित्र किसी भी ढांचे में ढल नहीं पाता है यही कारण है कि व्यक्ति के जीवन मूल्यों में टकराहट की स्थिति दिखाई देती है |

वर्तमानयुगीन जीवन मूल्यों के संक्रमण के कारण उत्पन्न मानव जीवन की कटुता, परिवार विघटन आदि के परिप्रेक्ष्य में नवमूल्यों की स्थापना ही इस उपन्यास का उद्देश्य है | मूल्य विघटन की स्थिति में स्त्री जीवन असंगत बनाता जा रहा है | विद्रूपता, भावहीनता आदि अनेक असंगत प्रवृतियाँ उसमें दिखाई देने लगी है |

भारतीय सामजिक जीवन में दाम्पत्य संबंध या विवाह वासनापूर्ति का साधन नहीं हैं | वह जीवन का पवित्र बंधन है, त्याग एवं समर्पण का चिह्न है | पति पत्नी के बिना पारिवारिक रथ नहीं चल सकता | भारतीय समाज में पारिवारिक जीवन की सफलता का मुख्य कारण पारम्परिक प्रेम एवं त्याग है | वर्तमान सांचा आज खोखला हो चुका है | इस उपन्यास में पति डॉ. सिन्हा अपनी पत्नी को अमेरिका में छोड़ कर भारत केवल इसलिए चला जाता है क्योंकि उसके पुत्र भविष्य के मृत्यु का कारण अपनी पत्नी को मानता है | इसलिए वह बिना बताए वीजा लेकर चला जाता है | यही कारण है कि परित्यक्ता होकर जीवन बिताती है | “परित्यक्ता होना आखिर कोई ऐसी अनहोनी बात तो नहीं है , हमारे देश में तो न जाने कितने लोग अपनी पत्नी को छोड़ देते हैं |”19

स्त्री-पुरुष के वार्तालाप से ही कटुता का अहसास होता है कि दाम्पत्य जीवन से सुखी नहीं है | जहाँ तक स्त्री की बात है पति के स्वभाव के साथ उसका स्वभाव मेल नहीं खाता | पाश्चात्य संस्कृति में निवास करने के कारण पत्नी की विचारधारा स्वतंत्र होती है परन्तु भारतीय पति को यह पसंद न था | जबकि पत्नी अपने पति का प्यार चाहती है परन्तु बदलें में उसे आत्मलांछना का शिकार होना पड़ता है | कई बार उसे अपने पति के कटु वचन का शिकार होना पड़ता है | “तुमसे शादी करने की गलती की मैंने, तुम्हारा रक्त ही दूषित है |”20 उनकी यही बात उनके बीच कटुता बनकर उभरती है | यहाँ एक प्रश्न है क्या यह जरुरी है कि दाम्पत्य जीवन की पीड़ा का दोष स्त्री के माथे मढ दिया जाए | यदि किसी भी रिश्ते में कटुता व् कड़वाहट उत्पन्न हो रही है तो इसमें दोनों भागीदारी है न कि कोई एक |

प्रवास में रह रहे भारतीय परिवार की मानसिकता वहीँ धरी की धरी है | आधुनिक होकर भी उसकी मानसिकता दबी कुची है | परन्तु यह भी सत्य है कि आधुनिकता की इस चकाचौंध में व्यक्ति अपनी गरिमा को न पार करे | पति का यह बदलाव तब देखा जाता है जब स्वयं के परिवार को ही संदेह की दृष्टि से देखने लगता है | पति डॉ. सिन्हा अपनी माँ से कहता है- “अम्माँ- तुम उसे पहचानती नहीं, वह बड़ी चालाक है, उसका भरोसा मत करो-अच्छा, रात को उसके कमरे में बाहर से ताला लगा दिया करो |”21

नारी के स्वतंत्र सामाजिक जीवन में पुरुष वर्ग द्वारा अपने परंपरागत संस्कारों एवं अधिकारों को छोड़ नहीं पाना तथा आर्थिक दृष्टि से नारी की आत्मनिर्भरता, अविश्वास बनावट आदि ही के कारण है जिनसे समकालीन दाम्पत्य संबंधों में कटुता आ रही है | डॉ. सुरेश सिन्हा का कथन दृष्टव्य है- “इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक तरफ आज की नारी की वेदना को बड़ी मार्मिकता से रूपायित करता है, दूसरी तरफ आधुनिक जीवन सन्दर्भों की कृत्रिमता और खोखलेपन को बड़ी सूक्ष्मता से उजागर किया गया है |”22 गौरतलब यह है कि दाम्पत्य संबंधों की विषमता एवं विघटन का प्रभाव वर्तमान समय में न केवल पति और पत्नी पर पड़ रहा है अपितु उनकी संतान एवं परिवार पर भी पड़ रहा है

यौन संबंध

यौन प्रवृति मनुष्य की जन्मजात प्रवृतियों में से एक है | वर्तमान समय में आधुनिक नारी की यौन सम्बन्धी दृष्टि बदली है | डॉ. रामेश्वर नारायण ‘रमेश’ के मतानुसार- “आधुनिक नारियाँ बौधिक आदर्शवादी है तो यथार्थवादी भी | आधुनिक बौधिक नारियाँ सत्यानुभूति से प्रेरित होकर तथ्यों पर बल देती है | वे आधुनिक है, शिक्षिता है | संभवत: इसलिए वे आदर्शवादिता का विरोध करती है | वे पूर्णरूपेण विकासवादी सिद्धांत की समर्थिका है इसलिए वह यथार्थवादी है|”23 स्त्री पुरुष का पारस्परिक आकर्षण एक नैसर्गिक मनोवृति है | इस उपन्यास में अर्जुन सिंह का सान्निध्य आकाशगंगा को बुरा नहीं लगा | अर्जुन सिंह ने उसे सब सुविधाओं से पाट दिया था , काम-काज या सारी जिम्मेंदारियों से मुक्त कर रखा था | अर्जुन सिंह केवल उसे सज-सँवारकर बैठे देखना चाहता था | अर्जुन सिंह आकाशगंगा से कहता है- “तुझसे कभी जी नहीं भरेगा मेरी डार्लिंग-तेरा चाहे भर जाए |”24 आकाशगंगा का संबंध पहले अर्जुन सिंह से होता है फ़िर एरिक से तत्पश्चात प्रवीन से | परन्तु इन संबंधों में कहीं मजबूरीवश, शारीरिक जरूरतों की माँग है, तो कहीं, तो कहीं असहाय वश एकाकी जीवन का सहारा मात्र |

वास्तविकता तो यह है कि औरत पुरुष को अपनी जिंदगी का अंतिम पुरुष मानती है | पर पुरुष अपने चाहे जितनी औरतों के संपर्क में आया हो, औरत से जानना कभी नहीं भूलता कि उसके पहले उसकी जिंदगी में कोई आया तो नहीं, शायद इससे उसका अहम् सन्तुष्ट होता होगा | समकालीन समय में स्त्री स्वछंद विचार धारा रखती है | इस संदर्भ में डॉ. राजरानी शर्मा का कहना है- “अब नारी सेक्स के संदर्भ में न ग्लानी अनुभव करती है और न उसके लिए मात्र पुरुष को जिम्मेदार मानती है | वह अपने कर्म और स्वयं के फल के प्रति अपने को जिम्मेदार मानती है | यह नारी की रुढ़िमुक्तता का ही एक आयाम है |”25

‘यौन विकृति’ की चर्चा भी इस उपन्यास में मिलती है | आज आधुनिक समाज में रिश्ते और नामों का कोई सार्थक अर्थ नहीं रह गया है | सच में संबोधन जितने सच्चे होते है, उतना सच्चा प्यार नहीं होता | अर्जुन सिंह उसे सहलाता, थपकियाँ देता, पहले-पहल आकाशगंगा को यह सब अजीब सा लगा | परन्तु पति द्वारा अपमान मिलने रहने के कारण इस प्रकार से पुरुष का स्पर्श वह भूल चुकी थी | लेखिका कहती है- “इस रिश्ते में अगर कुछ रिश्ता था-तो वह केवल शरीर का- उसे तृप्ति तो मिल रही थी, पर वांछनीय नहीं था, वह जानती थी यह उसकी मज़बूरी नहीं थी, वह बंधी नहीं थी, किसी भी दिन दरवाज़ा खोलकर होटल से बाहर जा सकती थी पर उसे लगा कि वह जाना नहीं चाहती, एकदम निष्क्रिय रहने, होटल में रहने की सुविधा और एक पुरुष का हर वक़्त उसकी इच्छा पूर्ति करना एक सुखद अनुभव था |”26 इस रिश्ते का न कोई नाम है न ही इस रिश्तें में प्यार बल्कि यह एक-दूसरे की इच्छापूर्ति का माध्यम है | डॉ.त्रिभुवन सिंह के मतानुसार- “समय ऐसा आ गया है, जिसमें नाम और संबंध एक दूसरे की पर्यायवाचिता खो बैठे हैं, यहाँ तक कि उसके उल्लंघन में अब पश्चाताप और मानसिक क्लेश भी नहीं रह गया है |”27

पारस्परिक रूप में स्त्री-पुरुष के काम रूप को अभिन्न अंग माना गया है “यौन भावना प्राकृतिक आवश्यकता या शारीरिक भूख है जिसकी तृप्ति चाहे किसी भी स्थिति में होनी चाहिए |”28 फ्रायड ने काम को समस्त चेतन जगत एवं क्रिया-कलापों का मूल माना है | अत: यह आवश्यक नहीं है कि जिसके साथ यौन संबंध हो उसके साथ प्रेम हो या किसी भी प्रकार का संबंध हो | यौन प्रवृति के संस्कारपूर्ण रोप का विकास है प्रेम | प्रेम मानव चरित्र का प्रेरक तत्व है | “शारीरिक और संवेगात्मक आकर्षक के मिलन बिंदु पर प्रेम का आविर्भाव होता है | प्रेम केवल अध्यात्म की अनुभूति नहीं है, शरीर से उसका दृढ़ संबंध होता है | मांस में उसकी चेतना है, रक्त में उसका उष्ण | या वासना चाहे अछि हो या बुरी, जीवन का नेवारी अंग है |”29

नर नारी का आकर्षण स्वाभाविक एवं सहज है | इस दृष्टि से वह सम्पूर्ण जीवन प्रसंगों से जुड़ी हुई परिपक्व जटिल प्रक्रिया है | अपने व्यापक अर्थ में प्रेम भावना मूलतः एक मानवीय जुड़ाव का भाव है | “नर नारी के बीच सम्बन्धों की समस्या सदैव रही है | इसमें भावात्मक, रागात्मक, सेक्स-मूलक सम्बन्धों के व्यस्था की समस्या अपने आप में काफी जटिल है |”30 किन्तु आधुनिक मानवीय संबंधों के प्रभाव से समकालीन प्रेम भावना को भी धक्के लगे है | एक ओर जहाँ गंगा को पति का प्रेम नहीं मिल पाता है | वहीँ दूसरी ओर अर्जुन सिंह से नैसर्गिक संबंध का बनना कहाँ तक सही है ? साथ ही उसका साथ थोड़े ही दिन का रहता है कि आगे एरिकसन का साथ सहानुभूति का साथ है जिसमें प्रेम का नाम नहीं परन्तु संबंध स्थापित जरुर होता है |

सौन्दर्य का ख्याल रखना , प्लास्टिक सर्जरी करवाना, मसाज करवाना आदि जिअसी विविध गतिविधियाँ कहीं न कहीं पाश्चात्य की ही दें है | लोग विज्ञापन की चकाचौंध में पूरी तरह समाहित होता चला जा रहा है | इस विज्ञापन पद्धति को व्यक्ति दिनोंदिन अपनी निजी जीवन में भी लागू करता जा रहा है | चुकी किसी भी आकर्षक चीज क्षणभंगुर मात्र है | बशर्ते जरुरत है कि उन चीजों का हम उपयोग करते हैं या दुरपयोग | पाश्चात्य परिवेश में देखा गया है कि “वे जवानी में में खूबसूरती का दीवाना हुआ करते हैं | इसलिए हजारों स्त्री-पुरुष प्लास्टिक सर्जरी करवाकर अपने को जवान रखतेहैं |”31 चूँकि गंगा अपने आप को साज-सँवारकर महज अर्जुन सिंह के लिए रखती जिसने उसे हर प्रकार की सुविधाओं से भरपूर कर रखा था | न उसे अशार का बोध होता और न ही एकाकीपन का | ऐसे में उसे क्या चाहिए केवल यही कि जिस पुरुष ने उसे हर बंधनों से मुक्त रखा उसकी इच्छापूर्ति का ख्याल रखे | “खाली समय में वह पलंग पर पड़ी-पड़ी छत को ताका करती थी, न टेलीविजन देखती थी, न ही पढ़ती-लिखती थी | हर दो-तीन दिन में होटल की ब्यूटी शॉप में जाकर हाथ, पाँव, चेहरा सब सँवरवा लेती थी, पुरे शरीर की मालिश हो जाती थी | फ़िर तैयार होकर यानी साड़ी या चमकदार सलवार-कुरता पहनकर बैठी रहती थी |”32 यह साज-सजा स्वयं के लिए नहीं था बल्कि अपने को जवान रख कर अर्जुन सिंह को रिझाने के लिए था |

यह संबंध स्पर्श का, एहसास का, आत्मीयता का, सहानुभूति का होता है | चूँकि गंगा जानती है कि एरिक का साथ साथ महज़ कुछ ही क्षण के लिए है इसके बाद वह स्वीटजरलैंड चला जाएगा | बावजूद इसके भी वह उसके द्वारा प्राप्त सहानुभूति सरे ग़मों को भुला देती है | यह भी एक प्रकार से उत्कृष्ट प्रेम की चरम सीमा है | एरिक आकाशगंगा से कहता है- “अभी तो हम संग है न- बस यही काफी नहीं है ?”33 विघटन की प्रक्रिया से गुजर रहे आधुनिक प्रेम भावना पर यंत्र युग के आत्मनिर्वसन का प्रभाव पड़ा है |

उषा प्रियंवदा का ‘नदी’ उपन्यास प्रेम और नैतिकता के परंपरागत प्रतिमानों पर न केवल प्रश्न चिह्न लगता है, अपितु मानवीय संबंधों के यथार्थ को भी प्रस्तुत करता है | भारतीय संस्कृति के अनुसार शादी के पूर्व या बाद एक स्त्री किसी गैर पुरुष से संबंध रखती है तो उसे गलत माना जाता है | परन्तु जब एक पुरुष पत्नी के रहते किसी एनी स्त्री से संबंध रखे तो उसे मर्दानगी कहा जाता है | गंगा नए देश, नए परिवेश में है, अर्जुन के साथ संबंध हर दृष्टि से गलत है, वह विवाहिता हैं , चार बेटियों और एक बेटे का पिता है | यह जानते हुए भी गंगा उसके साथ नैसर्गिक संबंध बनती है | यहाँ तक कि अर्जुन सिंह भी केवल अपनी इच्छाओं की ही पूर्ति मात्र गंगा से करता है जो कि उसे अपनी पत्नी से नहीं प्राप्त हो पता | अर्जुन सिंह कहता है- “मैं किसी का हक़ छीनकर किसी और से नहीं बाँट रहा हूँ- यह मेरी ख़ुशी है | मुझे भी कुछ ख़ुशी पाने का अधिकार है कि नहीं |”34 यौन संबंध को घृणा एवं अश्लील की की एवं अश्लील की से देखा जाता था परन्तु आज उसकी सहज अभिव्यक्ति अपेक्षित है |

निष्कर्ष

आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी जटिल व् प्रमुख समस्या आजीविका, प्रेम, विवाह और सेक्स की कमी है | कमजोरियाँ हर व्यक्ति में होती हैं, कोई भी पूर्ण नहीं | स्त्री भी अपनी कमजोरियों को जानती है, पर कुछ कमजोरियाँ आदत और बेसहाय व् लाचारीपन में शामिल हो जाती हैं | कभी-कभी यह भी एक कारण बन जाती है, कटुता का, अलगाव, विखरापन का, संबंध विखंडन का आदि | व्यक्ति इस क्षेत्र में समाज की रूढ़ सनातन धारणाओं एवं मान्यताओं में अनास्था रखता हुआ मानसिक संघर्षों से ग्रस्त रहता है | सामाजिक मान्यताओं को प्रधानता देने पर जिस आत्मिक कष्ट और अंतर्द्वंद्व को लेकर वह जीता है वह उसके व्यक्तिगत क्षेत्र में हानिकारक सिद्ध होता है | अतृप्त वासनाएँ व्यक्ति के जीवन को कुंठित कर पूर्ण रूप से उसे मानसिक रोगी बना देती है | भारतीय समाज प्राचीन संस्कृति एवं आदर्शों में इतना आस्थावान है कि उनके विपरीत संस्कृति, मनोभाव, आचरण वालो को उचित मान्यता नहीं देता |

मुख्यरूप से देखा जाए तो इस उपन्यास में कलात्मक परिपक्वता, संवेदनशीलता और उत्तर आधुनिक बोध की परिपूर्णता दिखाई देती है | साथ ही इसमें प्रवासी भारतीय स्त्री के जीवन के संत्रास और अकेलेपन से उत्पन्न छटपटाहट और मानसिकता यंत्रणा, अर्थाभाव के कारण चाहते हुए भी कुछ ना कर पाने की विवशता अपने पूर्ण यथार्थ के साथ अभिव्यक्त हुई है| लेखिका ने व्यक्ति, परिवार तथा स्त्री-पुरुष के संबंधों, नारी की स्थिति आदि को अत्यंत प्रभावशाली रूप में चित्रित किया है |

उपन्यास के केंद्र में स्त्री की सुख-दुखात्मक स्थितियाँ, अंतर्द्वंद्व, आकांक्षा तथा पुरुष से उसका संबंध आदि विषय है | साथ ही उससे जूझती समस्याओं का एवं सवेद्नाओं का मार्मिक विस्तारपूर्वक वर्णन है | इसके साथ ही साथ द्विभाषीय राष्ट्र जैसे भारत और अमेरिकीय जीवन शैली की विरोधी संस्कृतियों की टकराहट भी इनमें स्पष्ट रूप से उभर कर आती है | जिसके चलते पारिवारिक जीवन शैली में तनाव व टकराहट की स्थितियाँ आ जाती है | जिसका परिणाम यह होता है कि स्त्री-पुरुष के संबंध में विखराव के साथ- साथ मानव जीवन में उत्पन्न परिस्थियों से रु-ब-रु करवाया गया है |

संदर्भ ग्रन्थ सूची

डॉ. दंगल झाल्टे, नए उपन्यासों में नए प्रयोग, पृष्ठ-16

डॉ.पुरुषोत्तम दुबे, व्यक्ति चेतना और स्वातंत्र्योत्तर हिंदी उपन्यास, पृष्ठ-170

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-84

श्री गोविन्द मिश्र, साहित्य का सन्दर्भ, पृष्ठ-100

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-84

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-36

गीता सोलंकी, नारी चेतना और कृष्णा सोबती के उपन्यास, पृष्ठ-116

वहीँ, पृष्ठ-116

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-21

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ संख्या-25

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ संख्या-25

क्षमा गोस्वामी, नगरीकरण और हिंदी उपन्यास, पृष्ठ-188

उषा प्रियंवदा, नदी, उपन्यास, पृष्ठ-36

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-22

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ संख्या-44

आप्टे वामन शिवराम, संकृत हिंदी कोश, पृष्ठ-812

महेंद्र भल्ला, दूसरी तरफ उपन्यास, पृष्ठ-204

डॉ.सौ मंगल कप्पीकेरे, साठोत्तरी हिंदी लेखिकाओं की कहानियों में नारी, पृष्ठ-68

मन्नू भंडारी, एक इंच मुस्कान, पृष्ठ-23

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-22

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-60

डॉ. सुरेश सिन्हा, हिंदी उपन्यास, पृष्ठ-23, स्वराज प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण- 2006

डॉ. माधवी बागी, देवेश ठाकुर के उपन्यास में नारी, पृष्ठ-118

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-31

डॉ.राजरानी शर्मा, हिंदी उपन्यासों में रुढियमुक्त नारी, पृष्ठ-102

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-28

डॉ.त्रिभुवन सिंह, हिंदी उपन्यास और यथार्थवादी लेखक, पृष्ठ- 586, स्वराज प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण- 2006

डॉ.रामदरश मिश्र, हिंदी उपन्यास एक अंतर्यात्रा, पृष्ठ-93

डॉ. गणेशन, हिंदी उपन्यास साहित्य का अध्ययन, पृष्ठ-169

डॉ. माधवी बागी, देवेश ठाकुर के उपन्यासों में नारी, पृष्ठ-113

उषा प्रियंवदा का रचना संसार,

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-29

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-42

उषा प्रियंवदा, नदी उपन्यास, पृष्ठ-33

सपना दास
एम.फिल (शोधार्थी)
हिंदी विभाग
गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय
दूरभाष संख्या-7044355873
ईमेल पता-sapna070295@gmail.com

प्रवासी संसार तथा गिरमिट वैचारिकी: सारिका जगताप

0
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प्रवासी संसार तथा
गिरमिट वैचारिकी
     प्रवासी जीवन अपने भिन्‍न और विशिष्‍ट संरचना के कारण विश्‍व में
प्रसिद्ध रहा है। विश्‍व के परिदृश्‍य में भारतीय डायस्‍पोरा का अपना एक विशिष्‍ट
स्‍थान है। भारतवंशी लोग प्राचीन काल से अपने देश से विश्‍व के विभिन्‍न देशों में
जाकर बसे हैं। इस प्रवासन के कारण और परिणाम दोनों भिन्‍न-भिन्‍न है। कारण के रूप
में यायावर वृत्ति
, रोजगार की खोज, जीवन को समुन्‍नत
करने की जिजीविषा तो शामिल है ही। साथही
, राजनैतिक और सांस्‍कृतिक
कारक भी इसके कारण रहे हैं। परिणाम के रूप में यह वै‍श्विक प्रवासन हमारे सामने
उपस्थित है। भारतीय लोग कभी दासों के रूप में
, तो कभी
अनुबंधित श्रमिकों (गिरमिटिया) कंगनी और मैस्‍त्री प्रथा के रूप में देश से बाहर
ले जाए गए। भारतीय डायस्‍पोरा समुदाय अपनी विशिष्‍ट भाषा
,
रहन-सहन एवं संस्‍कृति के कारण विश्‍व में अपना अलग स्‍थान रखता है। इसकी अनेक
खासियतें अन्‍य डायस्‍पोरा समुदायों से इसे भिन्‍न करती है। प्रवासी जीवन अपनी
पूरी संरचना में एक वैचारिकी के रूप में भी हमारे सामने आता है। जिसे
गिरमिट वैचारिकी के रूप में देखा जा सकता है। यहाँ
हम प्रवासी जीवन और गिरमिट आइडियोलोजी पर विचार करने जा रहे हैं।

 ‘गिरमिट
शब्‍द सामान्‍यत: ओल्‍ड या पुराने डायस्‍पोरा के जीवन संसार को बताने के लिए
प्रयुक्‍त किया गया शब्‍द है।
द लिटरेचर ऑफ द इंडियन डायस्‍पोरा
 थिओरिजिंग द डायस्‍पोरा  इमेजनरी
में विजय मिश्रा
लिखते हैं कि
गिरमिटशब्‍द विशेषत:
इंडो-फ़ीजीयन (फीजी में रहनेवाले भारतीय) ने अनुबंधित व्‍यवस्‍था के समय में अपने
अनुभव को व्‍यक्‍त करने के लिए इस शब्‍द का प्रयोग किया था।
गिरमिट शब्‍द एग्रीमेंट का अपभ्रंश रूप हैं।[1]
वास्‍तव में आज़ादी के पहले 19वीं और 20वीं शताब्‍दी में भारतीय लोग बंधुआ मजदूरों
के रूप में भारत से बाहर मारीशस
, फ़ीजी, सूरीनाम, गयाना आदि देशों में गए। इन बंधुआ मजदूरों
में भारी संख्‍या में उत्‍तर-भारतीय भी शामिल थे । वे मजदूर अपनी सांस्‍कृतिक
विशेषताओं के साथ जैसे–भाषा
, धर्म आदि से अपने समूहों का
प्रतिनिधित्‍व करने लगे ।

   मारीशस में भारतीय गिरमिटिया समाज में हिंदुओं
के साथ मुस्लिम भी थे। हालांकि
, मुस्लिम संख्‍या में कम थे, फिर भी अपनी धार्मिक और सांस्‍कृतिक पहचान बनाए हुए थे। अपनी जड़ों से
उखड़कर बाहर बसने के क्रम में दोनों धर्मों में एकरूपता आती चली गई। भाषा
, खान-पान, पहनावे तथा एक ही तरह के कार्य करते हुए
दोनों धर्मों के बीच दूरियाँ कम हुई और एकरूपता आयी। दोनों समुदायों के बीच विवाह
संबंध भी दिखाई देते हैं। बाद में एक सरकारी योजना के तहत पूरे देश की जनसंख्‍या
को हिंदू समुदाय
, मुस्लिम समुदाय तथा क्रियोल सामान्‍य
समुदाय के रूप में बाँटा गया। सामान्‍यत: गिरमिटिया लोग अपने दैनंदिन जीवन में डटे
रहे और अपने को
जो यात्रा उन्‍होंने शुरू की थी जहाजी भाई के रूप में वही यात्रा भाई चारे के रूप
में चलती रही। यही विचारधारा सामान्‍य जनजीवन की अंग बन गई।
            फ़ीजी में इन प्रवासी भारतीयों ने आर्थिक विकास को एक नई
दिशा दी। लगभग 1914 के आस-पास कुछ गुजराती प्रवासी भारतीयों का फ़ीजी आगमन हुआ।
उन्‍होंने जल्‍द ही कुछ उद्योगों की स्‍थापना शहर में कर ली। हालांकि वे यूरोपियन
लोगों की तरह ऊँचे तो नहीं उठ पाए
; किंतु भारतीय
व्‍यापार की सफलता का चेहरा जरूर दिखाई देने लगा। फ़ीजी के शुरूआती अखबारों (1927
और 1936)
फ़ीजी समाचार और शांतिदूत आदि में बहुत जोरो-शोरों से जिस चीज पर
जोर दिया जा रहा था वह थी
, नृजातीय एकात्‍मकता की भावना तथा
मूल स्‍थान के प्रति लगाव को जगाना। साथही
, वे एक ऐसे कल्‍पनात्‍मक
भारत की निर्मिति कर रहे थे जो कि फ़ीजी में भी दिखाई दे । इन समाचार पत्रों में
दोनों देशों भारत और फ़ीजी के रूप में दर्शाया जा रहा था-  
                                 जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है                                     
                                  वो 
नर  नहीं  नर पशु 
निरा  और मृतक समान है।
[2]
गिरमिट वैचारिकी और गिरमिटिया
जीवन को समझने के लिए तोताराम सनाढ्य का लेखन महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा करता है।
तोताराम सनाढ्य का जहाज
जुमना 21
मई 1893 को फ़ीजी पहुँचा था। तब फ़ीजी में पहले से ही 12
,000
अनुबंधित मजदूर पहुँच चुके थे। तोताराम सनाढ्य के इमीग्रेशन पास पर एक मजदूर के
रूप में उनका उल्‍लेख 2 फरवरी 1893 को हुआ था। 
तोताराम सनाढ्य मूलत: आगरा जिले के छोटे से गाँव के रहने वाले थे। उनकी
अवस्था उस समय 16 वर्ष लिखी हुई है और उन्‍हें ठाकुर या क्षत्रिय जाति  का बताया गया है
; किंतु
कुछ अभिलेख इससे भिन्‍न हैं। जिसमें उन्‍हें उस समय 18 वर्ष का और ब्राम्‍हण जाति
का बताया गया है। तोताराम सनाढ्य अपनी जिंदगी के अगले 21 वर्षों तक फ़ीजी में रहे
। पहले वे बंधुआ मजदूर थे
, बाद में किसान हो गए। वहीं उन्‍होंने
प्रवासित लोगों की ही पुत्री से विवाह कर लिया और सन् 1914 में पत्‍नी तथा अपनी
सासूजी  के साथ भारत लौट आए। लौटने के
दौरान उन्‍होंने अपनी पूरी कहानी बनारसीदास चतुर्वेदी  को बताई
, जो भारतीय राष्‍ट्रवादी
व्‍यक्ति थे और प्रकाशन का कार्य भी करते थे। 1915 और 1922 के बीच यह कहानी अनेक
भागों में भारतीय पत्रिकाओं  में प्रकाशित
हुई। हस्‍तलिखित पाण्‍डुलिपियों को चतुर्वेदी ने स्‍वयं  के द्वारा केन गिलियन को 1955 के आसपास यह पाण्‍डुलिपि
सुपूर्द की थी। 1980 में गिलियन और पी-एच.डी. शोधार्थी बृजलाल द्वारा इस पाण्‍डुलिपि
को संपादित और प्रकाशित किया गया था। वर्तमान इस पाण्‍डुलिपि पर फ़ीजी भारतीयों का
अधिकार  हैं।[3]
फ़ीजी
में अनुबंधित श्रमिकों की त्रासद जीवन गाथा को सनाढ्य ने बड़ी गहराई से बताया है।
वहाँ सभी एक दूसरे का भोजन करते थे और एक दूसरे की भाषा सीखते थे। एक बार भूखे और
बीमार होने के कारण सनाढ्य ने आत्‍महत्‍या करने
, फाँसी
लगाने का भी प्रयास किया था। कुछ फ़ीजी के किसान भाइयों ने सनाढ्य को बचाया।
अनुबंधित श्रमिकों के समुदाय द्वारा सामाजिक–सांस्‍कृतिक माहौल बना। उनके पास अपनी
कुछ मूल पुस्‍तकें
, मान्‍यताएं, कथाएं
थीं, जिनको आधार बनाकर वे अपनी सांस्‍कृतिक धरोहर को सामने ला रहे थे। वे तुलसीदास
की रामायण
, सत्‍यनारायण कथा, सुखसागर, इंद्र जाल, आल्‍हाकमद तथा इंदरसभा आदि पुस्‍तकों को
अपनी सांस्‍कृतिक धरोहर के रूप में साझा कर रहे थे। फ़ीजी में
इंदरसभा बहुत प्रचलित हुआ। जिसमें फ़ीजी हिंदी, उर्दू, ब्रज, अवधी, भोजपुरी और खड़ी बोली का सम्मिश्रण दिखाई देता है। भारतीय सिनेमा का अपना
महत्‍वपूर्ण स्थान रहा है। जब भारतीय सिनेमा फ़ीजी पहुँचा
,
तो इंदरसभा पर आधारित फिल्‍म
इंदरसभा 1932 बहुत प्रसिद्ध हुई। जलपरी (1952), हुस्‍न का चोर
(1953)
, रूपकुमारी (1956), शांतिदूत
(1936)
, शीरी फरहाद (1931) आदि ऐसी फिल्‍में थी, जो फ़ीजी के सिनेमाघरों में हाउसफुल जा रही थी।[4]      
सनाढ्य
ने वहां प्रचलित मौखिक गीतों जैसे – बरसात के गीत (चौमासा) जो परंपरागत रूप से चले
आ रहे हैं। बिदेशिया में इन गीतों का अच्‍छा खासा प्रयोग किया गया है। जिनमें
प्राय: दो तरह के अर्थ और अर्थस्‍तर पाए जाते हैं। जिसमें एक ओर प्रवास और प्रवास
के पहले का जिक्र है
, दूसरी ओर प्रेम और विरह आदि
शामिल हैं। जैसे 
बिदेसिया के कुछ पद –
घिर घिर
बदर
, सावनवा कि है रामा
कौनि
नगरिया में काही रे बिदेसिया
गैया
बेहाल मोरे कोठवा ये भूखे रोए
अंखियों
से अँसुवा बहईये रे बिदेसिया
अमुआ
के डलिया में कुहुके कोयलिया
मनवा
में अगिया लगाईये रे बिदेसिया
हरि
हरि पतिया पे लिखे हरि हरि
कवनी
नगरिया में छाही रे बिदेसिया
[5]
सनाढ्य
पढ़े–लिखे थे। उन्‍हें लोक और धर्म के बारे में जानकारी थी। अत: वो मजदूर से किसान
और पुरोहित बन गए थे। वहां वे  एक साथ
किसानी और पु‍रोहिती का काम करते थे। वहां एक रामायण मंडली थी
, जिसका नेतृत्‍व भी सनाढ्य ही करते थे। सनाढ्य जब भारत लौट आए थे।  तो भारत में वे ज्‍यादा समय अनुबंधित श्रमिकों
और उनके प्रवासी जीवन के बारे में  ही
बताते रहते थे। उनकी आत्‍मकथा
फ़ीजी द्वीप में मेरे 21 वर्ष
के भाग 1917 और 1922 में छपे। इस आत्‍मकथा में तत्‍कालीन फ़ीजी के
अनुबंधित श्रमिकों के जीवन व्‍यापार
, उनके सुख-दुख, संघर्षों की झाँकी मिलती है। हालांकि, जब वे वहां
से लौट रहे थे
, तब फ़ीजी के लोगों का जीवन और संघर्षमय होता
जा रहा था। स्त्रियों पर अत्‍याचार बढ़ रहे थे। स्त्रियाँ वेश्‍यावृत्ति‍ की ओर
झोंकी जा रही थी। भूख और गरीबी बढ़ती जा रही थी।
सनाढ्य
के भारत लौटने के बाद उन्‍होंने यहाँ कई भाषण दिए। (1914 से 1919 के बीच में) उन्‍होंने  भारत से ले जा रहे भारतीयों की त्रासद दशा
बताते हुए कहा था कि
यहाँ से श्रमिकों को ले जाने के
लिए एक जहाज में पशुओं की तरह भरा जाता था। अधिकारियों के द्वारा खाने को कुत्‍तों
के खाने के बिस्किट दिए जाते थे। वहाँ पहुँचने के बाद सभी को मनमाने ढ़ंग से किसी
को  कहीं
, किसी
को  कहीं 
भेज  दिया जाता था। जहाज में बनी
मित्रता का भी ध्‍यान नहीं दिया जाता था। कुछ लोग ऐसी स्थितियों में आत्‍महत्‍या  भी  कर
लेते  थे।
[6]
प्रवासी
भारतीयों में से अनेक साहित्‍यकार हुए। फ़ीजी के साहित्‍यकारों में से सत्‍येंद्र
नंदन
, मोहित प्रसाद, रेमंड पिल्‍लई और सुदेश मिश्रा आदि
प्रमुख हैं
, जिन्‍होंने बहुत गहराई से गिर‍मिटिया संवेदना को
अपनी कविताओं
, कथा साहित्‍य में व्‍यक्‍त किया है।
सुरेश
मिश्रा अपनी एक कविता में लिखते हैं
गिरमिटिया, माई मेकर
योर
जर्नी
हैज
ब्रोकेन माई हार्ट
(1992 : 13)[7]
वहीं
मोहित प्रसाद अपनी कविता में इस यात्रा को कुछ इस तरह देखते  हैं
आई
कॅरेस एन एमटी थॉट
एज आई
क्‍लीन आउट ए ब्रास प्‍लेट
ऑफ
थिन ढाल एंड ब्रोकन राइस बीट्स
आई
अॅम कैरिंग अ मैंगो सीड
टू प्‍लैंट
एट द एंड ऑफ दीज वोवेज
’ (2001: 47)[8]
फ़ीजी
में भारतीयों और फ़ीजी लोगों के बीच के द्वंद्व को पि‍ल्‍लई ने कुछ इस तरह बयां
किया हैं

काई
बिती काई इंडियान नाई सको इक रास्‍ता पकरो
 
(
फ़ीजीयन और भारतीय एक साथ एक रास्‍ते पर नहीं चल सकते । ) (2001 : 211/271) 
सन्
1873 में लाला रूख 279 पुरुष
, 70
महिलाओं
, 32 लड़के, 18 लड़कियों के साथ जहाज से सूरीनाम पहुँचे । वहाँ पहुँचकर लोगों ने डच
भाषा को स्‍वीकार तो किया
; किंतु भोजपुरी का भी प्रयोग करते
रहे। भोजपुरी भाषा उनके दुख
दर्द, उनके
अनुभव और अपने घावों को व्‍यक्‍त करने की भाषा बनी। सूरीनाम के कवि चाँदनी भोजपुरी
में लिखते हैं-
                   ‘माई लोस्‍ट यूथ आई रिकाल
                        अ लाइफ स्‍पेंट इन पेन
                                         एंड नाऊ
डेज आर अस्‍थमैटिक
                                         रिमेंबरिंग
ए फार्मर्स लाइफ
                                         अवेरिंग
द आवर्स एंड  
                                         इटिंग
विद क्‍लोज्‍ड आइज़ ।
[9] (1990:8)
जीत
नारायण आदि लेखकों ने भी भोजपुरी भाषा में कविताएँ लिखी। जिनमें सूरीनाम के बंधुवा
मजदूरों की जिदंगी झाँकती है। सूरीनाम का डायस्‍पोरा  एक साथ तीन आधारों पर दिखता है वह है- क्रियोल
, इंडियन और जवानीज। वहीं त्रिनिदाद का डायस्‍पोरा दो धुव्रों पर अवस्थित
है – क्रियोल और इंडियन। राजनीतिक और सांस्‍कृतिक दोनों दृष्टियों से भारतीय डायस्‍पोरा  अपनी भूमिका अदा कर रहा है। सन् 1999 में फ़ीजी
के पहले भारतीय प्रधानमंत्री महेंद्र चौधरी हुए ।
महेंद्र चौधरी के दादा 1912 में
भारत से फ़ीजी गए थे। वहाँ गन्ने के खेत में उन्होंने मज़दूरी की। फ़ीजी में वह
भारतीय मूल के पहले प्रधानमंत्री थे। मूलत: भारत के उत्तरी राज्य हरियाणा के
निवासी रहे महेंद्र चौधरी आज भी अपनी जड़ों से जुड़े हैं। बहुजमालपार गाँव में रह
रही अपनी बहन से मिलने वह
1997 में गए थे। एक ऑडिटर के तौर
पर काम करने वाले चौधरी ने फ़ीजी में व्याप्त भ्रष्टाचार को हटाने के लिए काम करना
शुरू किया। फ़ीजी में सत्ता पलट जैसी घटनाओं के बाद महेंद्र चौधरी फ़ीजी के भारतीय
बहुल निवासियों की आकांक्षाओं के प्रतीक बन गए। फ़ीजी की
44 प्रतिशत
जनता चौधरी में एक ऐसे राजनेता को देखती है जो प्रजातंत्र और क़ानून व्यवस्था के
प्रति समर्पित है। शायद यही वो कारण है जिसे महेंद्र चौधरी अपनी प्रेरणा मानते थे।
 त्रिनिदाद में बासदेव पांडेय के राजनीतिक संघर्ष
का अपना महत्‍व है।  इनका जन्‍म 23 मई
, 1933 को प्रिंसेस टाउन में हुआ था। यह त्रिनिदाद एवं टुबैगो के 5 वें
प्रधानमंत्री बने थे। इनका कार्यकाल 1955 से 2001 तक रहा। इन्‍होंने अपने राजनैतिक
जीवन में बड़े उतार-चढ़ाव देखें। वे एक कुशल राजनितिज्ञ के साथ-साथ वकील भी थे। वे
यूनाइटेड नेशनल कांग्रेस के अध्‍यक्ष और नेता भी रहे हैं। इनका यह कार्यकाल (
1976–1977, 1978–1986,
1989–1995, 2001–2006 और 2007–2010 तक) रहा।
यह भारतीय मूलवंशी है। इन्‍होंने अपनी कार्यक्षमता के बल पर फ़ीजी में अपने
अस्तित्‍व को स्‍थापित किया था। 
 
गिरमिट
वैचारिकी को दो सांस्‍कृतिक रूपों मे समझा जा सकता है। पहला चीनी और गन्‍ने के
बागानों से जुड़े हुए लोगों के अनुभवों के द्वारा तथा दूसरे ऐसे मजदूरों के
अनुभवों के द्वारा जो नियत ईकाई के कार्य और मजदूरी में  लगे रहे । जिन्‍हें
आब्‍सट्रैक्‍ट लेबर की संज्ञा दी गई। यह मजदूर तेरहचौदह घंटे काम के बदले एक निश्चित मजदूरी कैसे कर सके? लेकिन किया। इस पूरी त्रासद कथा को मारीशस के कथाकार अभिमन्‍यु
अनत के
लाल पसीना उपन्‍यास में
चित्रित किया गया है। यह उपन्‍यास समाज
, संस्‍कृति, इतिहास सबको तार्किक रूप से देखता है, समीक्षा करता
है। जड़ों से उखड़े लोगों की
बागानों का जीवन का विशद चित्र प्रस्‍तुत करता है। यह उपन्‍यास गिरमिट वैचारिकी को समझने
के लिए आधार सामग्री उपलब्‍ध कराता है।
इस
उपन्‍यास में किशन सिंह और बेचू आदि किरदारों के माध्‍यम से पूरे प्रवासी संसार की
जटिलताओं को दुखों और कष्‍टों को दिखाया है। भारतीय डायस्‍पोरा में
गिरमिट वैचारिकी में गिरमिट शब्‍द अपने आपमें अनेक
सांस्‍कृतिक और सामाजिक पूँजी या धरोहर के अर्थ को धारण करता है। गिरमिट वैचारिकी
में गिरमिटिया लोगों के विशद अनुभव ही हैं
,जो उसे एक
विचारधारा या सिद्धांत के रूप में सामने लाते हैं। भारतीय डायस्‍पोरा अपने स्‍वरूप
में
, अपने दुखों, अपने अनुभवों पर
आधारित
गिरमिट वैचारिकी का निर्माण
करते हैं। हैमलेट  के शब्‍दों में
For
the people of the old plantation – Indian diaspora the girmit ideology is the
ghost that reminds the son of the endless unhappiness of diaspora. Till the foul crimes done in my days of nature/Are burnt and prug’d
away”       (Hamlet I. v, 12-13)        
                                                                                                      सारिका जगताप
एम.फिल.
प्रवासन और डायस्‍पोरा अध्‍ययन विभाग
अनुवाद
विद्यापीठ
,.गां.अं.हिं.वि.वर्धा (महाराष्‍ट्र)


[1] मिश्रा विजय,‘
लिटरेचर ऑफ द इंडियन डायस्‍पोरा थिओरिजिंग द डायस्‍पोरा इमेजनरी
’, पृष्ठ 22
[2] वही, पृष्‍ठ  27
[3] वही, पृष्‍ठ 28
[4] वही,पृष्‍ठ 30
[5] वही,पृष्‍ठ 30
[6] वही पृष्‍ठ 3334
[7] वही, पृष्‍ठ 40
[8] वही,पृष्‍ठ 40
[9] वही, पृष्‍ठ 53

[साभार: जनकृति पत्रिका, चित्र साभार: theindiandiaspora.com

प्रवासी मजदूर

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जब खत्म हुआ दाना पानी
वापस घर जाने की ठानी
कौड़ी थी पास नहीं पल्ले
हफ्तों से बैठे  निठल्ले
सुदूर गाँव , मात्र एक आस
असंभव यहाँ आगे प्रवास

यहाँ सुने कोई आह नहीं
राहों में उनकी राह  नहीं
पैदल निकले छुपते छुपते
जलते जलते तपते तपते
रूखा सूखा जो मिला ग्रास
कुछ जल बूंदो से बुझा प्यास

मीलों पैदल चलते चलते
रवि क्षितिज पार ढलते ढलते
सब पटरी पर तब लेट गये
जीते जीते मरते मरते
चिंतित चेहरा देह उदास
व्यवस्था से होकर निराश

पर नींद रही इतनी गहरी
कि गयी न फिर, वहीं चिर ठहरी
निकले थे चलने मील हजार
पर पहुँच गये वह क्षितिज पार
कोई न जहाँ हो दूर पास
किसी के न हों, रहें प्रभु दास

वह सबके थे, उनका न कोई
फटका न जीते पास कोई
जीवन भर  रोटी को तरसे
जब जग  छोड़ा पैसे बरसे
यह राजनीति क्या समझे लाश
जीवन की होती कद्र, काश
-ओंम प्रकाश नौटियाल
बडौदा,मोबा. 9427345810
(पूर्व प्रकाशित-सर्वाधिकार सुरक्षित )