29 C
Delhi
होम ब्लॉग पेज 24

मैत्रेयी पुष्पा की कहानियों में व्यक्त नारी समस्याएँ-प्रो. डॉ. हेमल बहन एम. व्यास

0
woman in white and black dress holding woven basket
Photo by Sanaea Sanjana on Unsplash

मैत्रेयी पुष्पा की कहानियों में व्यक्त नारी समस्याएँ

  • प्रो. डॉ. हेमल बहन एम. व्यास

एक नहीं दो दो मात्राएं नर से बढ़कर नारी है ।

इस उक्ति के आधार पर नारी संस्कार,मर्यादा,पवित्रता,संवेदना ओढ़े हुए है। इसीलिए नारी को नर से बढ़कर कहाँ है । सीता-राम,राधे-श्याम,उमा-महेश्वर,लक्ष्मी-नारायण में भले ही दैवीय शक्ति को आगे रक्खा गया किन्तु वहीं भारतीय मानसिकता आधि आबादी का हिस्सा स्त्री को अपना अधिकार देने के लिए तत्पर नहीं है । पुरुष प्रधान समाज की इस मानसिकता को स्त्री ने हर क्षेत्र में चुनौती के रूप में रक्खा है । साहित्य भी इससे अछूता नहीं है । स्त्री मुक्त हो गई,थोड़ी बहुत स्वतंत्र भी हो गई अब स्त्री सभी दृष्टि से सशक्त हो रहीं है । इस दिशा में हिन्दी साहित्य की लेखिकाओं ने स्त्री विमर्श की नई बहस छेड़ दी है ।

पुरुषों द्वारा दिये प्रतीकों-पूजा, केवल श्रद्धा हो,नरक का कुंड,नहीं….अब वह अपनी पहचान,अपनी इच्छा, अपनी शोध बताने का कार्य कर रहीं है । ऐसी अनगिनत स्त्री लेखिकाओं ने नारी जीवन का चितार अपने साहित्य में किया है ।

बीसवीं सदी के अंतिम दशक से कहानियों के विषय में काफी परिवर्तन आया है । कहानी लेखन में भूमंडलीय करण,बाज़ार वाद,आधुनिकीकरण एवं पाश्चात्य प्रभाव जैसे विषय पर खुलकर सत्य लिखा गया । साथ ही स्त्री विमर्श,स्त्री संदर्भ अत्यंत विस्तृत विषय बन गये हैं । खास करके लेखिकाओं के साहित्य लेखन में स्त्री विमर्श पर काफी लिखा गया। ऐसी कहानियाँ लिखने वाली प्रमुख लेखिकाएँ है –शिवानी ,मन्नू भंडारी,क्रुष्ना सोबती ,प्रभा खैतान,मैत्रैय पुष्पा,नासीरा शर्मा,मृनाल पांडे,सुर्यबाला ममता कालिया ,मृदुला गर्ग,राजी शेठ,दीप्ति खंडेलवाल,मालती जोशी,मंजुल भगत,सुधा अरोडा,दिव्या माथुर,क्रुष्ना अग्निहोत्री,मधु काकरिया,आदि लेखिकाओं ने अपने अपने अंदाज में नारी की समस्याओं को,नारी के विविध स्वरूप को तथा नारी जीवन से संबंधित विविध पहलुओं को केन्द्र में रखकर ही कहानियों का लेखन किया है ।

मैत्रेयी पुष्पा की कहानियाँ 21वीं शताब्दी की दहलीज पर स्त्री शक्ति की दस्तक है । मैत्रेयी पुष्पा ने अत्यंत सफलता के साथ स्त्री विमर्श पर अपनी कलम चलाई है । मैत्रेयी पुष्पा अपनी कहानियों में स्त्री वादी दृष्टि रखती है । उन्होंने भोगे गये सत्य को ,जीवन की वास्तविकता के चितार को प्रस्तुत किया है । वह स्त्री की पीड़ा को,उनके संघर्ष को,समाज के सामने रखना चाहती है । मैत्रेयी पुष्पा ने पुरुषवादी परिवेश से स्त्री के लिए सशक्तिकरण की,स्त्री मुक्ति की मांग रखी है । उनकी कहानियों में स्त्रियों की समस्याओं को उनके जीवन के संघर्ष तथा उनेक प्रश्नों को बड़ी संवेदन शीलता के साथ रखा गया है । उनके स्त्री पात्र पुरुषों को चुनौती देती दिखाई देती है । मैत्रेयी पुष्पा पुरुषवादी मानसिकता की विरोधी है वे कहती है- —’’मैं स्त्री विमर्श की कट्टर हिमायती हूँ । उस पुरुष व्यवस्था से चीड़ है,मुझे जो स्त्री के चारों तरफ बंधन डालता है —।’’ (1) (मुद्दे की बात–पुष्पा, मैत्रेय 52)

माता पिता का घर छोड़कर स्त्री पराई बन जाती है,पराये को अपना बनाकर भी वहाँ वह अपनी नहीं बन पाती । अपनेपन की तलाश में वह भटकती रहती है । एक स्त्री विवाह के बाद अपना नाम कुल पहचान सब खो बैठती है । ऐसे समय पर शादी के अपनी पहचान खो बैठने वाली मैत्रैय पुष्पा ने साहित्य लेखन में अपने नाम की तलाश में अपने अतीत में झांक कर देखा,पिता को प्रिय मैत्रेयी तथा माता को प्रिय पुष्पा यानि मैत्रेयी पुष्पा नाम धारण करके माता पिता के स्वप्न को साकार किया । यही मैत्रेयी पुष्पा साहित्य जगत में स्त्री शक्ति की मिसाल बन गई। जो स्त्री विमर्श की कट्टर हिमायती है ।

लंबे संघर्ष एवं जीवन में कई उतार चढ़ाव के पश्चात उम्र के 40 वे पड़ाव के बाद लेखन प्रारंभ करने के बावजूद भी 10 साल में मैत्रेयी पुष्पा हिन्दी साहित्य की विशेष पहचान बन गई ।

इदन्नमम,चाक,झूला नट,आल्मा कबूतरी,जैसे सफल उपन्यास लिखने वाली मैत्रेयी पुष्पा ने कहानी लेखन में भी कलम चला कर अपनी विशेष पहचान बनाई है । उनके प्रमुख कहानी संग्रह है-

चिह्नार (1991)-12 कहानियाँ

ललमनियाँ (1996) -10 कहानियाँ

गोमा हंसती है (1998) -10 कहानियाँ

दस प्रतिनिधि कहानियाँ –(2006) छुटकारा नयी कहानी

इन कहानी संग्रहों में कुल 33 कहानियाँ हैं । जिनमें मैत्रेयी पुष्पा ने नारी जीवन की विभिन्न समस्याओं को चित्रित किया है । यदि हम उन समस्याओं पर चिंतन करें तो मैत्रेयी पुष्पा की प्रतिनिधि कहानियाँ में हमें निम्न समस्याएँ दृष्टि गोचर होती हैं । जैसे कि दहेज, बेमेल विवाह,स्त्री भ्रूण हत्या,बाँझपन एक अभिशाप,त्यक्ता नारी,विधवा नारी, बलात्कार-जातीय शोषण ,वेश्या वृत्ति-देह विक्रय जैसी समस्याओं को वर्णित किया है । साथ ही उन समस्याओं का प्रतिकार करती नारियों की शक्ति से भी अवगत करवाया है । मैत्रेयी पुष्पा की कहानियों में चित्रित नारी जीवन की विभिन्न समस्याओं को निम्न रूप से रक्खा जा सकता हैं-

दहेज की समस्या

दहेज भारतीय समाज का सबसे बड़ा कलंक है । जिसने पुरातन समय से लेकर आधुनिक समय तक अपनी झाल फैलाई है । भयानक राक्षस की तरह बढ़ती चली जाती है ।

मैत्रेयी पुष्पा की ”साँप-सीढ़ी” कहानी में सुरजन सिंह ने अपनी बेटी रज्जो को इसीलिए अच्छा पढ़ाया ताकि उसके विवाह में कोई तकलीफ न हो,अच्छा वर को तराशा किया किन्तु विवाह तय करते समय ही बेटी का ससुर अपना वास्तविक स्वरूप दिखाते हुए डेढ़ लाख की माँग करता है ।

”ताला खुला है पापा” कहानी की बिन्दो बड़ी बहन के विवाह में हुए दहेज के कर्ज को देखकर माँ से कहती है ।

”अम्मा तुम मेरे ब्याह की फिकर बिल्कुल न करना।जो रुपे खर्च कराएगा,मैं उससे ब्याह नहीं करूंगी।” (2) (पुष्पा, गोमा हस्ती है-’ताला खुला है पापा’ 75)मैत्रेयी पुष्पा” केवल समस्या उठाना नहीं जानती किन्तु उनका योग्य समाधान भी प्रस्तुत करना जानती है। दहेज जैसी जटिल समस्या का हल उन्होंने ”सफर के बीच” कहानी के द्वारा देना चाहा है । इस कहानी का गिरराज जिलाधिकारी बनता है साथ ही दहेज का विरोध करते हुए गरीब की बेटी से ब्याह करता है ।

बेमेल विवाह

21वीं शताब्दी के युग में विवाह अपनी इच्छा,चाहना ओर पसंदगी का विषय है ,ऐसे समय समय में बेमेल विवाह शब्द भी अचरज पैदा करता है लेकिन ऐसा नहीं है । आज भी कई ऐसी लड़कियां है जिन्हें गरीबी,दहेज या किसी न किसी कारण बेमेल विवाह का शिकार होना पड़ता है । अपनी इच्छाओं को मार कर कड़वे घुट पीना पड़ता है ।

” बहेलिये ” कहानी में गिरजा के पिता की मृत्यु हो जाने के कारण उनके चाचा उनका विवाह पिता के उम्र के पुरुष से तथा उनकी बहन का विवाह एक मरीज से करवा देता है । माँ के विरोध करने पर उनके चाचा कहते है,-”करम की खोटी थी तो भोगना पड़ रहा है । तू अकेली रांड विधवा कैसे ब्याह शादी करेगी ? मरद की उमर नहीं देखी जाती (3) (पुष्पा, चिहनार -बहेलिये 37) गिरजा के जीवन में कोई अरमान नहीं रहते , पति की मृत्यु हो जाने के बाद वह दूसरे विवाह के बारे में नहीं सोचती ,बल्कि वह समाज सुधारक बन जाती है ।

”रास” कहानी की जैमन्ती का विवाह मन सुखा नामक एक ऐसे पुरुष के साथ होता है जो आधा पुरुष और आधी स्त्री है । इस बेमेल विवाह के कारण किस हद तक जैमन्ती पर सामाजिक अत्याचार हुआ है,इसका वर्णन रास कहानी में मैत्रेयी पुष्पा ने बड़ी कुशलता के साथ किया है ।

स्त्री भ्रूण हत्या

21वीं सदी का प्रभाव मैत्रेयी पुष्पा के साहित्य में बखूबी रूप से दिखाई देता है । आज के युग में हम भले ही अपने को आधुनिक मानते हो किन्तु हमारी सोच आज भी सदियों से भी पुरानी है । पहले के युग में लड़की का जन्म होते ही उस को दूध भरे पात्र में डूबो कर मार दिया जाता था,आज के युग में तो लड़कियों को जन्म लेने का भी हमने अधिकार नहीं दिया । उसका गर्भ परीक्षण करके तुरंत ही उसे गर्भ में ही मार दिया जाता है उसे हम स्त्री का शरीर भी धारण करने नहीं देते । दुःख की बात तो यह है कि कभी कभी इसकी जिम्मेदार खुद स्त्री ही होती है।

मैत्रेयी पुष्पा ने ’तुम किसकी हो बिन्नी’ कहानी में सोनोग्राफी करके,बच्ची को जन्म से पहले ही मारने की बात कहीं है। ’’कै बेर तो इसकी माँ ने गरभ गिराये हैं,दूरबीन से दिखवाय लिये। छोरी निकली तो गिरवाय दई । कसाईन री है निरी……..’’(4) (पुष्पा, ललमनियाँ ,तुम किसकी हो बिन्नी 120) डॉं.अग्रवाल खुद गर्भपात के लिए उस जगह का नाम लिख देते है । इस प्रकार मैत्रेयी पुष्पा ने स्त्री भ्रूण हत्या की समस्या उठाई है ।

बाँझपन स्त्री जीवन का अभिशाप

संतान हीनता विवाहिता नारी के जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप माना जाता है । नारी जीवन की अनेक समस्याओं में से एक है,जिसे एक नारी ही दूसरी नारी को इस समस्या के लिए जिम्मेदार मानकर दुःखी और परेशान करती है ।’’मन ना ही दस बीस ’’कहानी में चंदना का पति नपुंसक है,फिर भी उसकी साँस उनकी बहू पर ही दोष लगाती है । देवर से रिश्ता रखने को कहती है,जली कटी सुनाती है ,वह कहती है,’’कच्चे गोद पेट काट डाले होंगे,फिर कहाँ से जनेगी पूत।हमारे करम खोटे थे जो ब्याह लाये छिंनाल को’’(5) (पुष्पा, चिहनार,मन नाहिं दस बीस 64)

त्यक्ता नारी

नारी को हर रूप में पुरुष पर आश्रित रक्खा गया है । पिता,भाई,पति या पुत्र शायद यहीं पर नारी सुरक्षित रह सकती है । पिता विश्वास के साथ बेटी को पति के हाथ में सौपता है लेकिन यदि वही पति जब स्त्री को त्याग दे तब उनकी क्या गति । पति द्वारा पत्नी को त्याग देना नारी का सबसे बड़ा अपमान है । मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी कहानियों में पराधीन नारी की विवशता का बड़ा दर्दनाक चित्र प्रस्तुत किया है ।

’ राय प्रवीण ’कहानी की सावित्री के पति को सावित्री पर हुए शारीरिक अत्याचार का पता चलने पर सहानुभूति देने बजाय उसे गाली देते हुए घर से निकाल देता है…..’’ क्यों आ गई…….आगे पाँव मत रखना रंडी ’’(6) (पुष्पा, गोमा हँस्ती हैं….राय प्रवीण 46)

शारीरिक रूप से शोषित सावित्री पति द्वारा तो परित्यक्ता होती है किन्तु अब सावित्री को उनके पिता भी अपने घर पर रखने के लिए तैयार नहीं होते । मैत्रेयी पुष्पा ने राय प्रवीण कहानी के द्वारा समाज में प्रताड़ित ऐसी नारी की समस्या का वर्णन किया है जो शारीरिक,मानसिक और सामाजिक दृष्टि से शोषित है ।

’’बिछड़े हुए’’कहानी एक ऐसे पलायन वादी पुरुष की कहानी है जो अपनी जिम्मेदारी से भाग जाता है । पति सुग्रीव के त्याग कर साधु बन कर चले जाने के बाद चँदा बेटी को पालने की जिम्मेदारी अकेली ही उठा लेती है।

विधवा नारी

नारी का यह रूप करुणा ,दर्द और अंधकार पूर्ण जीवन का समन्वय मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी कहानियों में नारी के विधवा रूप को और उनके जीवन की कठिनता का अत्यंत ही दर्द पूर्ण वर्णन किया है ।

’’उज्रदारी’’कहानी की विधवा शांति को उनके पति के गुजर जाने के बाद उन्हीं के परिवार वाले उसे जायदाद से बेदखल करते है । ऐसे कठिन समय पर बड़े धैर्य और साहस के साथ शांति अपने हक के लिए लड़ती है ।

’’केतकी’’कहानी में पंडित श्री गोपाल का गाँव की एक बाल विधवा से अनैतिक संबंध रखने का चित्रण हुआ है,साथ ही रेशमिया जैसी पवित्र विधवा नारी पर बलात्कार करने के बाद पंच उसे व्याभिचार बताते है । तब घर की इज्जत बचाने के लिए देवर गिरधर सिंह उनका हाथ पकड़ता है । यह उनकी मजबूरी थी —’’क्या करता विधवा भाभी की कोख में न जाने किसका अंश था,लेकिन पिता का नाम उस शिशु को उसके सिवा देता भी कौन(7) (पुष्पा, चिह्नार …केतकी.. 130)

मैत्रेयी पुष्पा की ’चिहनार’कहानी की सरजु एक विधवा स्त्री है ,उसके साथ उनके परिवार वाले अमानवीय अत्याचार करते है । उसे अपनी बेटी से भी मिलने नहीं देते ।सरजु को घर के पीछे एक कोठे में रक्खा जाता है । समाज में आये दिन शांति,रेशमिया,सरजु जैसी विधवा नारी पर अनेक प्रकार के शारीरिक , मानसिक अत्याचार होते ही रहते है । मैत्रेयी पुष्पा ने नारी के वैधव्य जीवन की समस्याओं का वास्तविक चितार प्रस्तुत किया है ।

बलात्कार-जातीय शोषण

दुनिया बहुत बड़ी है किन्तु सुरक्षा कहीं नहीं ,घर छोटा है किन्तु सुरक्षा सबसे बड़ी है । किन्तु घर परिवार के या आस पास के लोग ही जंगली बन जाए तो सुरक्षा कहीं पर नहीं है । यदि नारी घर में सुरक्षित नहीं है तो वह कहीं पर भी सुरक्षित नहीं है । पुरुष ने नारी को सदा भोग की वस्तु माना है , कोई भी स्त्री क्यों न हों उसे कहीं न कहीं कभी न कभी ,किसी न किसी पुरुष से शारीरिक या मानसिक रूप से जातीय शोषण का शिकार होना पड़ा होगा । संबंधों के नाम पर वह सबसे पहले कौटुंबिक जातीय शोषण का शिकार होती है । जहाँ उसे सदैव चुप रहने के लिए धमकाया जाता मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी आत्मकथा गुड़ियां भीतर गुड़ियां में अपने भोगे हुए सत्य का वर्णन किया है । उन्होंने ने अपनी कहानियों में भी नारी पर होते बलात्कार एवं जातीय शोषण का खुलकर वर्णन किया है।

’’बहेलियें’’ कहानी की भोली पर बलात्कार होने के बाद उसे धमकाया जाता है,किसी को भी इस के बारे में न बताने को कहा जाता है। जब भोली के पेट में बच्चा रह जाता है तब उनकी माँ उसी को जली कटी सुनाती है । भोली उन पर हुए दुगुने अत्याचार न सह पाने के कारण वह जलकर मर जाती है । पुलिस घुस लेकर उसे साधारण आत्महत्या का केस बना लेता है ।

’’रास ’’कहानी की जैमन्ती का ब्याह एक ऐसे पुरुष से हुआ जो पूर्ण पुरुष भी नहीं है । परिवार के अन्य पुरुष उसे सदैव बुरी नज़र से देखा करते है। आखिर उनके ससुर द्वारा बलात्कार का प्रयास होने के कारण जैमन्ती मानो नागिन बन जाती है –’’ जैमन्ती की आंखों में भग भग लपटें उठने लगी । सास कांपने लगी ,सास का बेटा आंखें मींडता हुआ कभी बाप को देखे तो कभी उसे। (8) (पुष्या 127) उनका जीवन बरबाद हो जाता है।

’’अब फूल नहीं खिलते ’’ कहानी में शिक्षा के क्षेत्र में नारी का किस प्रकार से शोषण होता है उसे बताया गया है ।’’राय प्रवीण’’ कहानी की सावित्री गाँव में बाढ़ के विनाश के बाद ,अन्न प्राप्ति के लिए सहायता के बजाय सरकारी अधिकारी तथा ठेकेदारों से हवस का शिकार होती है।

’’केतकी’’कहानी का गंधवॅसिंह केतकी से अनैतिक संबंध बनाने की कोशिश करता है।विरोध देखकर अवसर पाकर एक दिन उस पर बलात्कार करता है।केतकी इस यौन शोषण के खिलाफ विद्रोह करती है तथा पुलिस में शिकायत करके गंधवॅसिंह को समाज के सामने लाती है।

प्रतिकार करती नारी

वर्तमान युग की नारी में विद्रोह करने की क्षमता बढ़ी है। अत्याचार करने वाले से अत्याचार सहने वाला ज्यादा गुनहगार होता मैत्रेयी पुष्पा ने एक जिम्मेदार लेखिका की भूमिका अदा की है । उन्होंने ने नारी की विविध समस्याओं का चित्रण किया हैं, साथ ही नारी में रहीं शक्ति का भी परिचय करवाया । मैत्रेयी पुष्पा की कई ऐसी कहानियाँ है जिसकी नायिका अत्याचार सहते-सहते बदला लेने के लिए विद्रोह करती है । वह केवल अत्याचार सहन करना ही नहीं जानती किंतु समय आने पर प्रतिकार भी करती है ,फिर अत्याचार करने वाला पुरुष उसका पति ही क्यों न हो ।-जैसे

’’राय प्रवीण ’’की सावित्री एक साहसी नारी है।उसका पति जब उसे घर से बाहर निकाल देता है,लात-घूसो से पीटता है,तब उनके मन में दबा क्रोध फूट पड़ता है।उस समय का वर्णन करते हुए लेखिका लिखती है- ’’पति ने हाथ लगाया कि चोट दर्द भूलकर दो लाते मारी मर्दानी कमर पर…..तीन चार धक्के दीये लगातार और घर में जा घुसी।’’(9) (पुष्पा, गीमो हँस्ती है-राय प्रवण- 46)

उज्रदारी कहानी की विधवा शांति अपने अधिकार के लिए घर से बाहर निकल जाती है। वह कहती है-’’मेरी जैसी अनाथ औरत क्या किसी भी औरत को जेठ-ससुर के सामने बोलने का हक नहीं,आदमियों की बिरादरी ऊँची है । ’’(10) (पुष्पा, गोमा हँस्ती है-’उज्रदारी’ 100) वहीं शांति जो जेठ-ससुर के सामने बोलने में असमर्थ थी पति की मृत्यु के बाद ज़मीन,घर,परिवार से निष्कासित करने के कारण उनके खिलाफ उज्रदारी करती है।तब वह सोचती है-’’आज मुझे डर नहीं । जेठ का लिहाज नहीं ताज्जुब है । आज क्या हो गया है ऐसा ? शर्मीली बहू कहा गई ? पति के रहते उँगली न दिखा ने वाली अंगूठा दिखाने की सोच रही है ?’’(11) (पुष्पा, गोमा हँस्ती है-’उज्रदारी’ 102)

नारी सदा ही अपने शील और सौन्दर्य से गर्वित रहती है, लेकिन जब उसके चरित्र पर कोई दाग लगाने की कोशिश करता है तब वह महाकाली का स्वरूप धारण कर लेती है ।’केतकी’ की केतकी भी कुछ ऐसा ही करती है । वह गंधर्वसिंह द्वारा किये गये अत्याचार का प्रतिकार करती है । माधुपुर गाँव में आज से पहले कभी पुलिस नहीं आयी, किंतु केतकी ने गंधर्वसिंह को पकड़ ने के लिए पुलिस बुलाई है। वह निर्भीक होकर कहती है।—’’तुम्हारे खिलाफ बोलने का साहस तो सब बेच चूके हैं……….मैं लाई हूँ पुलिस,क्योंकि मुझे तुम्हारा भय नहीं हैं ।’’(12) (म. पुष्पा, चिह्नार-’केतकी’ 132)

’फैसल’ कहानी की वसुमती सरपंच तो बन गई किंतु उसका पति उसे कोई फैसला नहीं लेने देता। अतः वसुमति ने विरोध के रूप में अपने पति को ही वोट नहीं दिया । नारी अपने अधिकार के लिए लड़ना सीख गई है।अब वह हद से ज्यादा अन्याय नहीं सहती बल्कि उनका प्रतिकार कर लेती है । जब अन्याय हद से ज्यादा बढ़ाता है,असहनीय हो जाता है तब वह रणचंडी का रूप लेकर विनाश का कार्य करने के लिए तैयार हो जाती है।जैसे कि’मन नाहीं दस बीस’ कहानी की चन्दा का पति नपुंसक है । उनकी सास संतान पाने के लिए उसे उनके देवर से संबंध बनाने के लिए दबाव डालती है । जब चन्दा के मना करने पर उन पर अत्याचार बढ़ जाता है तब चन्दा उनको मारने के लिए मंगवाए गये धतूरे को भोजन में डाला जिससे उनका देवर तो मर गया,किंतु उसी भोजन को गलती से उनका पति भी खा लेता है और वह भी मर जाता है । इस प्रकार देखा जा सकता है कि मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी कहानियों में नारी जीवन की विभिन्न समस्याओं को चित्रित किया है । इतना ही नहीं इन प्रमुख नारी समस्याओं के अलावा नारी जीवन की अन्य समस्याओं को भी किसी न किसी कहानी में दिखाया गया है । जैसे-

’भँवर’कहानी में -बहु पत्नी प्रथा तथा-मार पीट करना ,’ताला खुला है पापा’ कहानी में-लड़का लड़की भेद,’शतरंज के खिलाड़ी’कहानी में-नारी को केवल राजनैतिक मोहरा समझना,’छुटकारा’ कहानी में – अस्पृश्य नारी के साथ का व्यवहार,’आक्षेप कहानी में – स्त्री पुरुष संबंध,’अपना अपना आकाश’कहानी में -वृद्ध नारी की समस्या,’सहचर’ कहानी में -अपाहिज नारी की पारिवारिक स्थिति ,’मन नाहीं दर बीस’ कहानी में -परिवार में नारी शोषण,’’राय प्रवीण’’कहानी में – कहानी में वेश्यावृत्ति-देह विक्रय की समस्या । इत्यादि ….

इस प्रकार कहा जा सकता है कि मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी कहानियों में नारी जीवन की विभिन्न विषम समस्याओं को विस्तृत रूप से वर्णित किया है । मैत्रेयी पुष्पा ने नारी जीवन के विविध संघर्षों का चितार करते हुए नारी शोषण के हर पहलुओं को उजागर किया है । नववें शतक में कहानी के विकास में मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी अलग ही पहचान बनाई है । उन्होंने बूंद से ही समुद्र का आस्वाद करवाया है। भारतीय नारी की दिशा-दशा बताते हुए उसकी अस्मिता का ,उसके अस्तित्व का चित्रण किया है । पुष्पा जी ने नारी को उनके अधिकार के जागृत किया है यहीं उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है ।

अस्तु धन्यवाद

प्रो. डॉ. हेमल बहन एम. व्यास

अध्यक्षा हिन्दी विभाग,

एम.पी.शाह ऑट्स एन्ड सायन्स कोलेज,

एस.टी.रोड़ ,सुरेन्द्रनगर. (गुजरात) भारत -363001

hemalmvyas@gmail.com M: 09428192298

संदभॅ ग्रंथ-

1) मैत्रेयी पुष्पा. गोमा हँस्ती है-. दिल्ही , किताबघर , 1998. ISBN-81-7016-398-6.

2) मैत्रेयी पुष्पा.-चिहनार-दिल्ली, आर्य प्रकाशन मंडल, 1991. ISBN-81-88118-68-0.

3) मैत्रेयी पुष्पा. ललमनियाँ – दिल्ली , किताब घर, 1996. ISBN-81-706-312-9.

4) “मुद्दे की बात–पुष्पा, मैत्रेयी.” हंस (अक्तुबर -2004):

सहायक ग्रंथः-

1) साहित्य प्रवाह और स्त्री विमर्ष-डॉ.रुचा शर्मा -अन्नपुर्णा प्रकाशन -कानपुर

2) नारी विमर्ष की नई दिशाएँ-डॉ.रेनुका मोरे, – अल्का प्रकाशन, कानपुर

3) समकालीन हिन्दी कहानी और 21वीं सदी की चुनौतियाँ-सं डॉ.इन्दुमती सिंह-आशीष . . . प्रकाशन,कानपुर

4) हिन्दी कहानी और नारी –विमर्ष के अहम सवाल-डॉ.शोभा पवार- अन्नपूर्णा प्रकाशन,कानपुर

5) प्रतिनिधि महिला कहानीकारों मैं चित्रित नारी-डॉ.मीना जोशी-शैलजा प्रकाशन , कानपुर

अध्यक्षा हिन्दी विभाग,

एम.पी.शाह ऑट्स एन्ड सायन्स कोलेज,

एस.टी.रोड़ ,सुरेन्द्रनगर. (गुजरात) भारत -363001

hemalmvyas@gmail.com M: 09428192298

साहित्य लेखन के सन्दर्भ में स्त्री अस्मिता : एक चिंतन-दर्शना जी. वैश्य

0
woman in purple and white sari dress
Photo by Srimathi Jayaprakash on Unsplash

साहित्य लेखन के सन्दर्भ में स्त्री अस्मिता : एक चिंतन

शोधार्थी-दर्शना जी. वैश्य

पीएच.डी. शोध छात्रा

गुजरात युनिवर्सिटी, अहमदाबाद-380009

ईमेल-vaishyadarshana@gmail.com

पितृसत्ता एक सामाजिक घटना है, हजारों साल से चली आई ऐसी व्यवस्था है, जिसमें स्त्री की अधीनस्थता सर्वविदित है। पितृसत्ता ने स्त्री को अपने ज्ञान की वस्तु बनाया । उसे साधन के रूप में प्रयुक्त किया – उसके नाम, रूप, जाति, गौत्र् सब अपने संदर्भ में परिभाषित किये । स्त्री का यह अमानवीकरण दलित के अमानवीकरण से कहीं ज्यादा सूक्ष्म है, क्योंकि दलित पुरुष अपने दमन से परिचित है । मगर स्त्री चाहे वह किसी भी जाति या वर्ण की हो, अपने उत्पीडन से परिचित ही नहीं है । वह अपनी दैहिकता में कैद है । यह तो इतिहास में पहली बार घट रहा है कि स्त्री पितृसत्ता को नकार रही है, उस सत्ता द्वारा आरोपित भूमिकाओं के प्रति सवाल उठा रही है । वह वस्तु से व्यक्ति बनने की प्रक्रिया में है । उसका जीवन अनंत संभावनाओं से भरपूर है ।

साठ-पैंसठ साल पहले तक महिलाओं की सामाजिक स्थिति पर, उनके सशक्तिकरण, उनकी उपलब्धियों और संघर्षों पर, उनके रचे साहित्य और अवधारणाओं पर गंभीरता से चर्चा नहीं की जाती थी । महिला लेखन को बहुत सम्माननीय दर्जा प्राप्त नहीं था और जो दो-चार महिलाएँ रचनाएँ करती भी थीं, उन्हें घर के सीमित दायरे की सीमित समस्याओं के घेरे में रचा लेखन मानकर या घर बैठी सुखी महिलाओं का लेखन मानकर या तो गंभीरता से नहीं लिया जाता था या एक आरक्षित रियायत दे दी जाती थी कि आखिर तो इनका दायरा छोटा है, परिवेश सीमित है तो बड़े फलक के मुद्दे कैसे उठाएँगी ।

भारत के साहित्य इतिहास में महिला साहित्यकारों ने हमेशा से अपने लेखन से महिला शक्ति को एक मजबूत आवाज़ दी हैं । महादेवी वर्मा से लेकर शिवानी जी और महाश्वेता जी तक महिलाओ ने भारतीय भाषाओ के साहित्य में अभूतपूर्व योगदान दिया हैं और महिलाओ के प्रति समाज की सोच में एक सकारात्मक रवैये के लिए बदलाव पर ज़ोर दिया हैं । आज भी महिला-लेखन में स्त्री-वर्ग की शिकायतों, उसके प्रकट और अप्रकट क्रोध, छुपे हुए आक्रोश तथा जीवन के प्रति उसके विशिष्ट दृष्टिकोण को ज्यादा शिद्दत से अभिव्यक्त किया जा सकता है । रोजमर्रा की जंदगी, निजी घटनाओं का सटीक वर्णन जितना महिला-लेखन में प्रस्तुत किया जा सकता है उतना पुरुष-लेखन में नहीं ।

दिव्या उपन्यास जिसे यशपाल ने लिखा है । जिसमें लिखा गया है कि समाज में स्त्री की स्थिति को देखते हुए कोठे पर बैठी वेश्या उससे ज्यादा बेहतर लगती है क्योंकि वो किसी भी प्रकार के बंधन में नहीं बंधी है पर एक समाज में रहने वाली स्त्री तमाम बंधनों में अपने जीवन की एक-एक सांस लेती है ।

मन्नू भंडारी का उपन्यास -आपका बंटी हिन्दी साहित्य में एक मील का पत्थर हैं, जो अपने समय से आगे की कहानी कहता है और हर समय का सच होने के कारण कालातीत भी है । शकुन के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि व्यक्ति और माँ के इस द्वंद्व में वह न पूरी तरह व्यक्ति बनकर जी सकी, न पूरी तरह माँ बनकर और क्या यह केवल शकुन की त्रासदी है ? अपने व्यक्तित्व को पूरी तरह नकारती हुई, अपने मातृत्व के लिए संबंधों के सारे नकारात्मक पक्षों को पीछे धकेलती हुई या उन्हें अनदेखा करती हुई , हिन्दुस्तान की हजारों औरतों की यही त्रासदी है ।

ममता कालिया के उपन्यास बेघर और एक पत्नी के नोट्स में एक मध्यवर्गीय पढ़ी लिखी महिला का भी अपने पति द्वारा एक सामान्य औरत की तरह ट्रीट किया जाना और गाहे बगाहे व्यंग्य का शिकार होना तथाकथित प्रगतिशील और पढ़े लिखे वर्ग को बेनकाब करता है ।

मृदुला गर्ग का अनित्य जिसमें दो महत्वपूर्ण स्त्री पात्रों में से एक काजल एक फेमिनिस्ट प्राध्यापक की तरह उभरती है जो अनलिखे इतिहास को दुबारा लिखना चाहती है, भगतसिंह के सिद्धांतों पर विश्वास करती है और उसे पढ़ाती है हालाँकि वह उनके कोर्स में नहीं है, संगीता जो एक वेश्या की बेटी है पर अपने सिद्धांत खोती नहीं, अपनी अस्मिता के साथ खड़ी होती है ।

कथा-साहित्य में भी स्त्री चेतना ने अपनी उपस्थिति पूरी गहराई और शिद्दत से दर्ज करवाई है पर हिन्दी साहित्य में तथाकथित स्त्री विमर्श और विचार इतने बौद्धिक स्तर पर है कि आम औरतों तक या उन औरतों तक, जिन्हें सचमुच जागरूक बनाने की जरूरत है, यह पहुँच ही नहीं पाता है । हालांकि यह कार्य इतना आसन नहीं है जैसे कि नासिर जी ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि-

‘‘किसी भी इन्सान का पूरा जीवन सुख से नहीं भरा होता फिर एक लेखक जो दूसरों के दुख पर कलम उठाता है । उसकी जिन्दगी इकहरे अनुभव लिए क्यों होगी । सृजन दरअसल व्यथा का ऐसा तालाब हैं जिसमें लेखक उतरता तैरता रहता है । मगर इसका यह मतलब नहीं कि वह छाती पीटे ।’’[1]

व्यापक अर्थ में स्त्री विमर्श स्त्री जीवन के अनछुए अनजाने पीड़ा जगत को व्यक्त करने का अवसर देता है, परन्तु उसका उदेश्य, स्तिथि पर आंसू बहाना और यथा स्थिति स्वीकार करना नहीं है, बल्कि इनके जिम्मेदार तथ्यों की खोज करना भी है ।

नामवर सिंह के अनुसार –

‘‘सच्चा साहित्यकार अपने काल को निचोड़ता है और निचोड़कर के रस की वर्षा करता है । कुछ लोग इसका विवेचन दूसरे ढंग से करते है, मैं अलग ढंग से करता हूँ । पाँच-चार चीजे मिलकर के जो निकलता है वो रस नहीं, जो निचोड़कर के सत्य होता है वो रस ।’’[2]

नारी मुक्ति का अर्थ पुरुष हो जाना नहीं है । स्त्री की अपनी प्राकृतिक विशेषताएँ है, उनके साथ ही उनके द्वारा बनाए गए स्त्रीत्व के बन्धनों से मुक्ति के साथ, मनुष्यत्व की दिशा में कदम बढ़ाना, सही अर्थों में स्वतंत्रता है । स्त्री को अपनी धारणाओं को बदलते हुए, जो भी घटित हुआ, उसे नियति मानाने की मानसिकता से उबरने की आवश्यक्ता है, लेकिन साथ ही पुरुष वर्ग को ही दोषी मनाकर कठगरे में खड़े करने वाली मनोवृति बदलनी होगी । हालाँकि कुछ हद तक अब यह बदलाव देखा भी जा रहा है-

‘‘आधुनिक युग में नारी का बहुमुखी उत्थान हुआ । समता एवं स्वतन्त्रता के अवसर मिले । नारी-शिक्षा को प्रश्रय मिला जिसके कारण आज की नारी के व्यक्तित्व में परिवर्तन हुआ । बौद्धिक उन्नयन एवं नव जागृति के कारण वैचारिक के धरातल पर नारी में आधुनिकता का समावेश हुआ ।’’[3]

स्त्री-लेखन का एक और महत्त्वपूर्ण उद्देश्य स्त्री की विभिन्न भूमिकाओं का मानव-समाज को परिचय देना है, जीवन के उन अंधेरे कोनों पर प्रकाश डालना है जिसकी पीडा स्त्रियों ने सदियों से झेली है । जरूरत है कि स्त्री अपनी मानवीय गरिमा और अधिकार को समझकर संरचनात्मक, सांस्कृतिक तथा मानवीय दृष्टिकोण के मूल तत्त्वों का विश्लेषण करे, अपने लेखन से उन तमाम स्त्रियों को शक्ति दे, जो संघर्षरत हैं तथा जो स्त्री-समाज के विकास में सक्रिय हैं, वे जो समाज की नजरों से दूर, कहीं किसी कोने में सुबक रही हैं, जिनके पास मानवीय गरिमा के नाम पर केवल अपना शरीर है, उन्हें जीने की प्रेरणा दे और साहित्य के विकास के नए दृष्टिकोण तथा वैकल्पिक अवधारणाओं को विकसित करें ।

सन्दर्भ ग्रंथ –

  1. खान, एम. फिरोज़ (डॉ.) नियाब, शगुफ़्ता (डॉ.) नारीविमर्श : दशा और दिशा, आकाश पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, ई-10/663, उत्तरांचल कॉलोनी, लोनी बोर्डर, गाजियाबाद-201102, प्रथम संस्करण-2010
  2. बद्रीनारायण, साहित्य और समय (अन्तः सम्बन्धों पर पुनर्विचार) वाणी प्रकाशन, 4695, 21ए, दरियागंज, नयी दिल्ली-110002, प्रथम संस्करण : 2010.
  3. वर्मा, रतनकुमारी, महिला साहित्यकारों का नारी चित्रण (हिन्दी कहानियों के संदर्भ में), अध्ययन पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स 4378/4B, 105, जे. एम. डी. हाउस, मुरारी लाल स्ट्रीट, अंसारी रोड, दरियागंज, नयी दिल्ली-11002, संस्करण : 2009
  1. नारी विमर्श दशा और दिशा, खान, एम. फिरोज़ (डॉ.) नियाब, शगुफ़्ता (डॉ.) पृ.175
  2. साहित्य और समय (अन्तः सम्बन्धों पर पुनर्विचार), बद्रीनारायण, पृ.32
  3. महिला साहित्यकारों का नारी-चित्रण (हिन्दी कहानियों के संदर्भ में), वर्मा, (श्रीमती) रतन कुमारी (डॉ.), पृ.263-264

कथाकार भगवानदास मोरवाल से डॉ. एम. फीरोज अहमद की बातचीत

0

कथाकार भगवानदास मोरवाल से डॉ. एम. फीरोज अहमद की बातचीत

1- आप अपने जन्म स्थान घर परिवार और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में विस्तार से बताइए…?

– मेरा जन्म हरियाणा के काला पानी कहे जाने वाले मेवात क्षेत्र के छोटे-से क़स्बा नगीना के एक अति पिछड़े मज़दूर और इस धरती के आदि कलाकार कुम्हार जाति के बेहद निम्न परिवार में हुआ। अपने मेरे घर-परिवार और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में पूछा है। अभी हाल में मैं अपने क़स्बे में गया हुआ था, तो संयोग से कुम्हार जाति की वंशावली का लेखा-जोखा रखने वाले हमारे जागा अर्थात जग्गा आ पहुँचे। मैंने जब इनसे अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में पूछा, तब इन्होंने कुछ ऐसी जानकारी दी जो मेरे लिए लगभग अविश्वसनीय थीं। जैसे इन्होंने बताया की हमारे मोरवाल गोत्र के पूर्वज उत्तर प्रदेश के काशी के मूल निवासी थे। काशी से वे पलायन कर बनारस आये। इसके बाद बनारस से पलायन कर सैंकड़ों मील दूर दक्षिण हरियाणा के बावल क़स्बे, जो रेवाड़ी के पास है, यहाँ आये। बावल से चलकर ये दक्षिण दिल्ली के महरोली, महरोली से पलायन कर सोहना (गुडगाँव) के समीप इंडरी गाँव और अंत में यहाँ से चलकर दक्षिण हरियाणा के ही मेवात के इस क़स्बे में जाकर पनाह ली। अपने आप को ऋषि भारद्वाज के वंशज कहलाने वाले इन जागाओं की बेताल नागरी में लिखी इन पोथियों में यह भी दर्ज़ है कि मेरे सड़ दादा गंगा राम के पाँच बेटे थे। इनमें से तीसरे नंबर के पल्टू राम के बेटे सुग्गन राम और सुग्गन राम के चार बेटों में से दूसरे नंबर के बेटे मंगतू राम के तीन बेटों में से दूसरे नंबर का बेटा भगवानदास। मुझ समेत हम तीन भाई और दो बहनें हैं। मैं यहाँ एक बात बता दूं कि हमारा पुश्तैनी काम मिटटी के बर्तन बनाना था, जो 1985 तक रहा।

 मेव (मुसलमान) बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण मेरे क़स्बे और मेरे क़स्बे का वह चौधरी मोहल्ला भी मेव बाहुल्य मोहल्ला है। यहाँ एक रोचक जानकारी दे दूँ कि मेरे इस चौधरी मोहल्ले का नामकरण हिन्दुओं के चौधरियों के नाम पर नहीं है बल्कि मेव चौधरियों के नाम पर है। मेरे घर के सामने अगर ऐसा ही मेव चौधरी का घर है, तो बाएं तरफ भी ऐसा ही घर है। जबकि हमारे घर का पिछवाड़ा मुसलमान लुहारों से आबाद है। अपने परिवार में उस समय के हिसाब से मैं एकमात्र शिक्षित व्यक्ति था। हालाँकि अपनी क्षमता के अनुसार मैंने अपने दोनों बच्चों अर्थात बेटा प्रवेश पुष्प जिसकी शिक्षा एमसीए है, तो बेटी नैया ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिंदी में पीएच.डी किया हुआ है। वैसे मैंने अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में अपनी स्मृति-कथा पकी जेठ का गुलमोहर में भी विस्तार से लिखा हुआ है।

2. आप की शिक्षा-दीक्षा कहां से हुई और कहां तक…?

– मेरी प्रारंभिक शिक्षा अपने कस्बे में हुई। हाँ, स्नातक मैंने मेवात के जिले और प्रमुख शहर नूहं से की है। बाकी की शिक्षा जिसे ‘शिक्षा’ कहना उचित नहीं होगा, ऐसे ही चलते-चलाते पूरी की। स्नातक के बाद पहले राजस्थान विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। इसके बाद यहीं से हिंदी में एम.ए. किया। बस, मेरठ विश्वविद्यालय से ‘हिंदी पत्रकारिता में दिल्ली का योगदान’ विषय में पीएच.डी. होती-होती रह गयी।

3. आपकी प्रिय विधा कौन सी है और क्यों….

– जहां तक मेरी प्रिय विधा का प्रश्न है तो इस समय निसंदेह मेरी प्रिय विधा उपन्यास है। इसका एक कारण यह है कि एक लेखक द्वारा जिस तरह एक विधा साधनी चाहिए, शायद वह मुझसे साध गयी है। इसका प्रमाण पिछले कुछ सालों में एक के बाद तीन उपन्यासों के रूप में देखा जा सकता है। जबकि आगामी उपन्यास पर धीरे-धीरे काम हो रहा है। मुझे लगता है एक लेखक के रूप में मैं जितना सहज अपने आपको उपन्यास में पाता हूँ उतना शायद दूसरी विधा में नहीं। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि जीवन-जगत को प्रस्तुत करने के लिए जिस आख्यान की ज़रुरत होती है, उपन्यास उसे बखूबी अपना विस्तार प्रदान करता है। दूसरे शब्दों में कहूं तो मेरी जैसी सामाजिक पृष्ठभूमि है उसके दुखों, संतापों और आक्रोश को मैं उपन्यास के माध्यम से ही व्यक्त कर सकता हूँ। इसीलिए मैं जितना अपने व्यक्तिगत जीवन में निर्मम हूँ, उतना ही अपनी रचनाओं में हूँ। प्रपंच या नकलीपन न मेरे असली जीवन में है, न मेरी रचनाओं में आपको नज़र आएगा। सच कहूं अब मैं उपन्यास को नहीं जीता हूँ बल्कि उपन्यास मुझे जीता है। मेरी रचनाओं और उनके पात्रों में आपको वह दुविधा या दुचित्तापन दिखाई नहीं देगा जो एक लेखक को कमज़ोर बनाता है।

4. हलाला उपन्यास लिखने का उद्देश्य किया था…?

– आपने हलाला के लिखने के उद्धेश्य के बारे में पूछा है। मेरा माना है कि किसी भी लेखक से उसके लिखने के उद्धेश्य के बारे में नहीं पूछना चाहिए ल लेखक या रचनाकार किसी उद्धेश्य को ध्यान में रख कर नहीं लिखता है। क्या प्रेमचन्द ने गोदान, रेणु ने मैला आँचल, राही मासूम रज़ा ने आधा गाँव, अब्दुल बिस्मिल्लाह ने बीनी-बीनी झीनी चदरिया, भीष्म साहनी ने तमस, श्रीलाल शुक्ल ने राग दरबारी, अज्ञेय ने नदी के द्वीप किसी उद्धेश्य के तहत लिखे होंगे – नहीं। दरअसल, रचना किसी उद्धेश्य का प्रतिपाद नहीं बल्कि एक लेखक के अंदर अपने समाज में देखी गयी विसंगतियों से पनपे द्वन्द्वों का सत्य होता है। यह वह सत्य होता है जिसे एक व्यक्ति महसूस तो करता मगर उसे व्यक्त नहीं कर पाता। एक लेखक वास्तव में उस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व या कहिए ऐसा प्रतिरूप होता है जो एक पाठक को अलग-अलग पात्रों के रूप में नज़र आता है। उसके लिए धर्म-संप्रदाय या स्त्री-पुरुष मायने नहीं रखते हैं बल्कि उसके लिए उनके दुःख-दर्द और सरोकार कहीं ज़्यादा मायने रखते हैं। एक बेहतर कल्पना उसके लिए कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है। इसलिए यह कहना की हलाला लिखने मेरा क्या उद्धेश्य रहा होगा, इसे आपने उसे पढ़ कर जान और समझ लिया होगा।

5. क्या यह सब लिखने के लिए आप किसी मुस्लिम महिला से मुलाकात की थी?

-आपने पूछा कि इसे लिखने के लिए मैंने किसी मुस्लिम महिला से मुलाक़ात की थी? ‘हलाला’ की पृष्ठभूमि मेवात की होने के कारण पाठक को ऐसा लगता है मानो हलाला की रस्म मेवात में प्रचलित है। सच तो यह है कि मेवात में यह रस्म बिलकुल भी चलन में नहीं है। मैंने आज तक हलाला से संबंधित एक भी मामला न देखा न हीं सुना। अब आप पूछेंगे कि फिर आपने इसे मेवात की कहानी क्यों बनाया? इस पर मैं पलट कर आपसे जानना चाहता हूँ कि क्या ऐसी समस्याएँ सिर्फ़ मेवात की हो सकती हैं। मेवात से बाहर का मुस्लिम समाज ऐसी समस्याओं से नहीं जूझ रहा होगा ? इस उपन्यास की पृष्ठभूमि मेवात देने का कारण मात्र इतना है ही कि मैं उस समाज को गहरे तक जानता हूँ। अपने लेखकीय कौशल का इस्तेमाल कर मैं पानी बात को अपने चिर-परिचित पात्रों के माध्यम से कहीं ज्यादा बेहतर तरीके से कह सकता हूँ। सच तो यह  कि तलाक़ या हलाला जैसी समस्याएँ सामाजिक समस्याएँ हैं जिन्हें हमने धार्मिकता का वारन ओढा कर और विकराल बना दिया। इस विकरालता को और भयानक हमारे उन मर्दों ने बना दिया जो औरत को महज एक उपभोग की वस्तु और अपनी जागीर मान बैठा है। 

लेखक का पाने पात्रों में ढालना या कहिए परकाया में प्रवेश करना ही उसकी सबसे बड़ी सफलता है। अगर यह उपन्यास काल्पनिक होते हुए भी कुछ सवाल उठाता है तो लेखक के साथ-साथ यह इसकी भी सफलता है।

6. हलाला उपन्यास लिखने के लिए क्या आपने कुरान या हदीस को पढ़ा था?

-यह आप अच्छी तरह जानते हैं कि किसी भी रचना या उपन्यास पर काम करने से पहले  एक शोधार्थी की तरह मैं अपनी क्षमता और समझ के मुताबिक़ पूरी मेहनत करता हूँ। विषय से संबंधित हर तरह की उपलब्ध साहित्य और सामग्री का अध्ययन करता हूँ। उपन्यास ‘हलाला’ पर काम शुरू करने से पहले इस रस्म से संबंधित कुरआन की आयतों को खोजा, तो कुरआन में इससे संबंधित सूरा अल-बक़रा की मुझे सिर्फ़ 230वीं एक आयत मिली। बाकी हलाला के बारे में मुझे कोई दूसरी आयत नहीं मिली। इस आयत को मैं हू-ब-हू यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ – ‘तो यदि उसे ‘तलाक़’ दे दे, तो फिर उस के लिए यह स्त्री जायज नहीं है जब तक कि किसी दूसरे पति से निकाह न कर ले। फिर यदि वह उसे तलाक़ दे दे, तो फिर इन दोनों के लिए एक-दूसरे की ओर पलट आने में कोई दोष न होगा।’ 

इसे और स्पष्ट करने के लिए कुरआन में लिखा गया है –‘यह दूसरा पति यदि उसे छोड़ दे या उसकी मृत्यु हो जाए, तो यह स्त्री अपने पहले पति के साथ फिर से विवाह कर सकती है। ‘ इस आयत का अलग-अलग कोणों से अध्ययन करने के बाद मेरे मन में एक प्रश्न यह उठा कि अगर कुरआन में ऐसा कहा गया है, तो फिर दूसरे पति से निकाह के बाद उससे सहवास की बात कहाँ से आयी। हालाँकि कुरआन से इतर दूसरे धार्मिक ग्रन्थ जैसे हदीस में इसे क्यों और कहाँ जोड़ा गया कि औरत दूसरे शौहर के लिए उस वक़्त तक हलाल नहीं हो सकती, जब तक कि दूसरा शौहर उसके साथ न कर ले। अगर मैं एक आम मुस्लिम के नज़रिए से सोचूँ तो मेरे भीतर इस सवाल का उठाना स्वाभाविक है कि जब कुरआन में ऐसा कहीं है ही नहीं तो दूसरे पति से सहवास का क्या मतलब है। जहाँ तक हदीस की बात है और जितना मुझे पता है हदीस का आधार भी कुरआन ही है। अब हम यदि कुरआन को एक मुक्कदस आधार ग्रन्थ मानते हैं तो जो बात उसमें है ही नहीं वह खां से आयी। जबकि इसके बरअक्स दूसरे ग्रन्थों में सहवास का न केवल उल्लेख किया गया है बल्कि एक आम मुसलमान को जिस तरह समझाने की कोशिश की गयी है, उसमें मर्दवादी सोच पूरी तरह निहित है। जैसे सैयद अबुल आला मौदूदी की एक पुस्तक में हलाला के बारे में कहा गया है – नबी सल्लाहेवलेअस्ल्लम  ने साफ़ कहा है कि हलाला के लिए केवल दूसरा निकाह ही काफी नहीं है, बल्कि औरत उस वक़्त तक पहले शौहर के लिए हलाल नहीं हो सकती, जब तक कि दूसरा शौहर उससे सहवास का स्वाद न चख ले। इसी तरह मैंने एक पत्रिका इसलाहे समाज  में पढ़ा था कि …दूसरा शौहर उससे सहवास का मज़ा न चख ले। 

अब आप देखिए कि कुरआन की मूल आयात का अर्थ एक पुस्तक से होता हुआ एक  रिसाले तक आते-आते कितने चटखारे और मसालेदार हो गया ? मेरी नज़र में इस रस्म को घृणित और एक तरह से पूररी तरह स्त्री विरोधी उसके बाद के इन अर्थों और व्याख्याओं ने बना दिया है। चूंकि हमारा आम असमाज और आम नागरिक अपने धार्मिक दानिशवरों पर बहुत भरोसा करता है इसलिए जब स्वाद और मज़ा उन तक संप्रेषित होते हैं , उनके मायने और सलीके भी बदल जाते हैं। एक लेखक होने के नाते मैंने अपनी बात बिना किसी उत्तेजना और उकसावे के स्त्री के हक़ में कही है।

   

7. अधिकांश लेखक दूसरे की प्रथा पर लिखने से बचते हैं आपको नहीं लगा की कुछ गलत लिख दिया तो….

-आपने सही कहा है कि कोई भी लेखक दूसरे की प्रथा विशेष कर धार्मिक प्रथाओं पर लिखने से बचता है और बचाना भी चाहिए। मगर यह इस पर निर्भर करता है कि ऐसा विषय चुनते हुए उसकी मंशा और नीयत क्या और कैसी है। ऐसा ही सवाल कई पाठकों ने मेरे दूसरे उपन्यास ‘बाबल तेरा देस में’  को पढ़ने के बाद उठाया था। इस उपन्यास में भी ऐसे मुद्दों को उठाया गया था। इस बारे में मेरा कहना यह है कि मुझे बचना या डरना तब चाहिए जब मैं दूसरे मज़हब या धर्म को आहात कर रहा हूँ। आप ‘हलाला’ को पढ़ कर थोड़ी देर के लिए सहमत या असहमत तो हो सकते हैं लेकिन मेरी बदनीयती पर सवाल नहीं उठा सकते। हाँ, अगर मुझे सिर्फ़ विवादास्पद होना होता , या मुझे कुछ हासिल करना होता तो शायद यह बात लागू होती। ऐसी कोई मंशा मेरी न तो ‘बाबल तेरा देस में’ लिखने के दौरान थी, न ‘हलाला’ लिखने के दौरान। सनसनी पैदा करने की नीयत से लिखी गयी किसी भी कृति या रचना की उम्र बहुत छोटी होती है। अच्छी रचना वही है जो पाठक को भीतर से बेचैन करे,न कि मज़े लेने के लिए लिखी जाए। हाँ, कभी-कभी तब डर-सा लगता है जब कुछ लोग इसे अपनी निजता और धार्मिक मामलों में दखल समझ कर लेखक पर सवाल उठाते हैं कि लेखक को इस्लाम की क्या समझ है। मैं मानता हूँ कि समझ नहीं होगी मगर कोई धर्म या धार्मिकता मनुष्यता से तो ऊपर नहीं है। लेखक का एक दायित्व यह भी होता है कि वह निरपेक्ष हो कर अपने विवेकानुसार गलत और सही में फ़र्क करे। किसी एक का पक्षकार होना भी कभी-कभी उसके लिए घातक सिद्ध हो सकता है। गलत और सही का आकलन खुद लेखक से बेहतर और कौन कर सकता है।

8. क्या आप को पता है कि हज और जमात में बहुत अंतर है?

– आपने पूछा है कि क्या आपको पता है कि हज्ज और जमात में बहुत अंतर है। आपका सोचना एक हद तक बहुत सही है और ईमानदारी से कहूँ, तो सचमुच मुझे हज्ज और जमात में क्या अंतर है, नहीं पता। मुझे सिर्फ़ इतना पता है कि ‘हज्ज’ मुसलमानों का एक ज़ियारत अर्थात तीर्थ-स्थल है। मक्का मदीना स्थित अल्लाह का वह काबा (घर) है जिसके दर्शन का हर मुसलमान इरादा रखता है। वैसे ‘हज्ज’ का मतलब ही इरादा करना होता है। ‘हज्ज’ यानी इरादा करना, वास्तव में आदमी की ओर से इस बात का एलान करना है कि उसका प्रेम और श्रद्धा, उसकी इबादत और बंदगी सब कुछ अल्लाह के लिए ही है। ‘हज्ज’ का मूल उद्देश्य यह है कि इनसान अल्लाह की चाह में उन्मत्त हो कर अपना सब कुछ उसकी राह में लगा दे। वास्तव में यह मूल उद्देश्य केवल हज्ज का ही नहीं है बल्कि सभी धर्मों के तीर्थ-स्थलों का है। इस ‘मूल’ की अवधारणाएँ इतनी व्यापक हैं कि अगर मनुष्य इन्हें सच्चे मन से धारण कर ले, तो आज हमारे समाज में जिस तरह की धार्मिक अहिष्णुता घर कर गयी है, वह शायद हमें देखने को न मिले। दरअसल, यह धारण करना ही धर्म कहलाता है। 

अब आता हूँ  ‘तबलीग़ जमात’  पर। अरबी में तबलीग़ शब्द का अर्थ होता है ‘किसी के पास कुछ पहुँचाना’, ‘धर्म का प्रचार करना’ या ‘दूसरों को अपने धर्म में मिलाना’। यहाँ यह एक बड़ा प्रश्न है की तबलीग़ आन्दोलन मुस्लिम मिशनरी है या मुस्लिम धर्म का पुनर्जीवन आन्दोलन। इसी पर अपनी समझ और जानकारी के मुताबिक़ कुछ रोशनी डाल सकता हूँ। शायद आपको यक़ीन न हो, या आपको इसमें कुछ अतिश्योक्ति लगे, मगर आपको सुनकर हैरानी होगी कि तबलीग़ जमात की शुरुआत 1926 में मेरे मेवात से ही हुई और इसके प्रवर्तक और प्रेरक थे मौलाना मौहम्मद इलियास खंडालवी (1885-1944)। वही तबलीग़ जमात जो आज हर मुसलमान के लिए मानो उसकी धार्मिक अनिवार्यता और जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। मौलाना इलियास ने एक नारा दिया दिया था -ऐ मुसलमानो मुसलमान बनो ! हालांकि तबलीग़ की स्थापना मौलाना इलियास द्वारा 1920 में की गयी थी। मगर इसकी जड़ें 19वीं शताब्दी के उत्तर्राद्ध में इनके वालिद मोहम्मद इस्माइल ने बंगले वाली मस्जिद, हज़रात निजामुद्दीन, नई दिल्ली में जमा दी थीं। मौलाना इलियास 1923 ने मेवात के नूहं में मदरसा मोइनुल इस्लाम की स्थापना की। 1926 में तबलीग़ जमात का पहला जत्था सहारनपुर के मौलाना खलील अहमद के नेतृत्व में आया। इस जत्थे ने स्थानीय लोगों की मदद से नूहं क़स्बे में एक सम्मेलान का आयोजन किया था। हज़ारों की तादाद वाले इस सम्मलेन में लोगों से हिन्दू-रीति-रिवाजों को त्यागने और मुस्लिम क्रियाकलापों को अपनाने तथा पूरे मेवात में तबलीग़ आन्दोलन को फैलाने की अपील की गयी थी। मेवात के मेव मुसलमानों से यह अपील इसलिए की गयी थी की यहाँ के मेव मुसलानों की धार्मिकता आधी हिन्दू रीति-रिवाजों पर आधारित थी, तो आधी मुस्लिम रीति-रिवाज़ों पर। यहाँ तक कि उस समय के पुरषों के नाम हिन्दू नामों से प्रेरित थे, जैसे हरिसिंह, धनसिंह, चांदसिंह, लालसिंह आदि। इस तरह तबलीग़ जमात के मेवात से शुरुआत का एक कारण यह भी हो सकता है। 

9. आपने जिन जिन पात्रों का उपन्यास में उल्लेख किया है क्या वह काल्पनिक है या वास्तविक?

-किसी भी रचना के चरित्र या पात्र वास्तविक और काल्पनिक दोनों होते हैं। बल्कि कहना होगा कि कोई भी पात्र न तो अपने आप में पूरी तरह काल्पनिक होता है, न पूरी तरह वास्तविक जो पात्र वास्तविक जीवन से लिए गये होते हैं, उनमें लेखक अपनी कल्पना और लेखकीय कौशल इतना विश्वसनीय और प्रामाणिक बना देता है कि एक पाठक के लिए यह तय करना मुश्किल हो जाता है वह कितना काल्पनिक है और कितना वास्तविक। यही बात उन काल्पनिक पात्रों पर लागू होती है। एक लेखक निजी अनुभवों और पात्रों के मिश्रित अनुभवों से अपने इन काल्पनिक पात्रों को अपनी कल्पना शक्ति से इतना जीवंत और प्रामाणिक बना देता है कि पाठक को लगता है मानो ये पात्र यहीं कहीं उसके आसपास खड़े हैं। यह एक लेखक की कल्पनाशीलता और लेखकीय कौशल पर निर्भर करता है कि वह अपने इन पात्रों को कितना और किस तरह जीता है, या कहिए उनको किस हद तक आत्मसात करता है। यह आत्मसात करने की चुनौती तब और बढ़ जाती है, जब उसने अपने किसी पात्र से ज़िन्दगी में कभी मुलाक़ात ही न की हो। बल्कि दूसरे धर्म व स्त्री पात्र और पुरुष पात्रों के मनोविज्ञान को व्यक्त करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। यह चुनौती स्त्री व पुरुष दोनों लेखकों के लिए सामान होती है। मैं यह बात सिर्फ़ ‘हलाला’ के सन्दर्भ में नहीं, बल्कि मेरी सभी रचनाओं के पात्रों पर लागू होती है। आप कल्पना कर सकते है कि एक लेखक अपने पूरे जीवन काल की अपनी कितनी रचनाओं के कितने काल्पनिक और वास्तविक पात्रों को एकसाथ जीता होगा। इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि एक लेखक के असंख्य पात्रों से गुज़रते हुए हम के पात्रों के नहीं बल्कि एक लेखक के अनेक रूपों और व्यक्तित्वों से भी गुज़रते हैं। यह आशा-निराशा ख़ुशी-गम, नैराश्य-कुंठा, चतुराई-चालाकियाँ, घात-प्रतिघात पात्रों की नहीं स्वयं लेखक की होती हैं। अब एक लेखक अपने पाठकों को अपने लेखकीय कौशल से उलझाता या भ्रमित करता है , तो यह उसकी सबसे बड़ी सफलता है।

10. क्या आपने सूर बकरा आयत नं. 228 को पढ़ा है उसमें भी शायद उसी तरह का कोई जिक्र हुआ है । आपकी टिप्पणी?

-सूरा अल-बक़रा की आयतें पारंपरिक तलाक़ यानी उन सूरतों की आयते हैं जिनमें कुरआन के मुताबिक़ तलाक़ के पूरे विधि-विधान की बात कही गयी है। जबकि भारतीय समाज के ज़्यादातर तलाक़ के मामले कुरआन के मुताबिक़ होते ही नहीं हैं। अधिकतर मामलों में पति की अराजक मनमर्ज़ी चलती है। उसका एक कारण है कि कुरआन में पुरुष को औरत का क़व्वाम यानी एक दर्ज़ा दिया गया है। तलाक़ के मामलों में प्राय: यह देखने में आया है कि विधि-विधान की शर्तें केवल औरत पर थोपी जाती हैं, जबकि पुरुष इनसे पूरी छूट ले लेता है। वैसे भी सूरा अल-बक़रा की यह आयत बीवी के गर्भवती होने कि स्थिति को लेकर है। जिन तीन महावारियों का इसमें ज़िक्र किया गया है, वह इसीलिए किया गया है ताकि यह पता चल सके कि वह गर्भवती है या नहीं। या कहना चाहिए कि इस बहाने तीन महीने तक औरत के चरित्र की परीक्षा ली जाति है। 

11. बिना इद्दत की अवधि पूरे किए व निकाह किए बिना स्त्री बपने पूर्व पति के घर नहीं जा सकती है। लेकिन आपने गलत उल्लेख कर दिया। जिससे लोगों में भ्रामकता पैदा होती है।

-आपने अपने सवाल में इद्दत का मुद्दा उठाया है तो मैं इसके बारे में यह कहना चाहता हूँ कि उपन्यास ‘हलाला’  में यह कहाँ नहीं कहा गया है कि बिना इद्दत पूरी किये नज़राना का डमरू से निकाह हुआ है, या अपने पहले पति के पास लौट आयी होगी ? तलाक़ के मामले में इद्दत एक सामान्य प्रक्रिया है, और इसके बारे हम सब लगभग जानते हैं। चूँकि इस उपन्यास की विषय वस्तु हलाला को आधार बना कर तैयार  की गयी है न कि  तलाक़ को आधार बना कर, इसलिए पाठक को ऐसा लगता है मानो इद्दत को छोड़ दिया गया है। इद्दत का मामला शिक्षित परिवारों के उन तलाक़ के मामलों में बारीक़ी के साथ देखा जाता है, जहाँ पति-पत्नी के बीच अचानक नहीं बल्कि काफी सोच-विचार के बाद तलाक़ लिया जाता है। वैसे भी यह उपन्यास एक ग्रामीण और लगभग अशिक्षित समाज को केंद्र में रख कर लिखा गया है। एक ऐसे भारतीय आम परिवारों को केंद्र बना कर जिनमें धर्म की जगह उनके जीवन-जगत में सिर्फ़ उतनी रहती है, जिससे उनकी धार्मिक पहचान सुरक्षित रह सके। और यह बात सभी धर्मों के समाजों पर लागू होती है। अधिकतर धर्मों में बहुत-सी रस्मों का पता भी नहीं होता है, बस परम्परा के नाम पर एक-दूसरे की देखादेख उन्हें लगभग निभाया भर जाता है। हिन्दुओं में भी धर्म का असली पालन कितना होता है, हम सब जानते हैं। इसका बड़ा उदाहरण है करवा चौथ। छलनी से चन्द्रमा देखने से यह व्रत पूरा थोड़े ही हो जाता है। मगर एक भेड़चाल जिसने शिक्षित-अशिक्षित सभी तरह की महिलाओं को अपनी चपेट में ले लिया है। दरअसल ऐसी शर्तों के पीछे स्त्री को बंधक बनाये रखने की हम मर्दों की एक चाल है। इसलिए तलाक़ ही नहीं बाकी के मामलों में भी मेरा  यह मानना है कि एक ‘सच्चा’ मुसलमान अगर पूरी ईमानदारी से कुरआन का पालन करे, तो मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूँ कि मुस्लिम समाज में न एक तलाक़ हो, न एक हलाला। सच तो यह है कि अपने स्वार्थों के चलते हमने अपनी कुछ सामाजिक समस्याओं को धार्मिक बना कर रख दिया। धर्म या मज़हब को पूरी तरह आत्मसात करना हरेक के बूते की बात है ही नहीं। दरअसल, धर्म का मामला इतना आसान नहीं है जितना हम समझते हैं।

12. आपने अपने हलाला उपन्यास को पाँच अध्याय में विभक्त किया है जिसके नाम पाँच वक्त की नमाजों पर है उससे आपका क्या अभिप्राय है।

-उपन्यास को पाँच अध्यायों में न तो किसी सोचे-समझे अभिप्राय के तहत बाँटा गया है न किसी योजना के तहत। अगर इसमें से इन पाँचो नमाज़ों, कुरआन की आयतों और रेखांकनों को हटा भी दें, तो मूल कथा पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है। अंतिम प्रूफ़ तक यह उपन्यास सिर्फ़ दस अध्यायों बांटा गया था। मेरे पास जब इसको सरसरी तौर पर अवलोकन के लिए भेजा गया, तो मुझे लगा यह एक पाठक के साथ अन्याय होगा कि वह दस अध्याय बिना अपनी आँखों को आराम दिए पढता जाए। इसलिए मैंने सोचा कि पाठक को पढ़ने के दौरान कुछ रीलिफ़ मिलनी चाहिए। इसके लिए एक ही तरीक़ा था कि इसके अध्याय बनाये जाएँ। कैसे बनाये जाएँ अंतिम समय में यह बड़ी चुनौती थी। एक बार सोचा कि इसे सुबह, दोपहर, शाम इन तीन शीर्षकों के अध्यायों में बांटा जाए। लेकिन तभी लगा कि इस तरह के शीर्षक पहले भी प्रयोग में लाये जा चुके हैं। वैसे भी यह जिस तरह का उपन्यास है उसके लिए ये उपयुक्त नहीं था। ऐसा लगना चाहिए कि सचमुच अध्याय उपन्यास के कथानक के ही हिस्से हैं। बहुत सोच-विचार के बाद मन में आया  कि इसे नमाज़ों के शीर्षकों में विभाजित किया जाए, तथा  इसे और प्रमाणिक व रोचक बनाने के लिए इसमें कुरआन की आयतें दी जाएँ। यह प्रयोग पाठकों को भाया भी। हालाँकि कई पाठकों ने इस पर यह कहते हुए आपत्ति जतायी कि कुरआन की आयतों का ऐसे इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। मेरा एक लेखक होने के नाते यह कहना है कि ऐसे प्रयोग उसी रचना प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसे जानने की एक पाठक में बड़ी जिज्ञासा होती है। मेरा मानना है कि ऐसे प्रयोगों से रचना की रेंज बढ़ती ही है, घटती नहीं हैं। 

13. नजराना हलाला उपन्यास की मुख्य पात्र है जो हलाला से पीड़ित है उसको उपन्यास में कम महत्व दिया गया है बल्कि वही दूसरी पात्र आमना को ज्यादा स्पेस दिया है… ऐसा क्यों?

-आपने यह बड़ा रोचक सवाल पूछा है कि मुख्य पात्र नज़राना की अपेक्षा इसकी एक अन्य पात्र आमना को ज़्यादा स्पेस दिया गया है। दरअसल, कोई भी रचना विशेषकर उपन्यास लिखते समय लेखक कई तरह के प्रयोगों  से झूझता रहता है, जिसमें एक यह भी है कि कोई पात्र दूसरे पात्र पर बेवजह ज़्यादा भारी न पड़ जाए। जिस स्पेस की आपने बात की है, वह स्पेस नहीं प्रवृत्तियाँ हैं। चाहे वह मनुष्य है अथवा पशु-पक्षी, यहाँ तक कि पेड़-पौधे सबकी कुछ न कुछ प्रवृत्तियाँ होती हैं। यही प्रवृत्तियाँ पात्रों की विशेषताएँ होती हैं जो एक-दूसरे को एक-दूसरे से अलग करती हैं। ये प्रवृत्तियाँ अगर साहित्यिक शब्दावली का इस्तेमाल करूँ तो  पात्रों की विशेषताएँ होती हैं। मैं आपसे ही पूछना चाहता हूँ कि आमना के बिना यह उपन्यास आपको कुछ अधूरा नहीं लागत। क्या हमारे समाज में नसीबन जैसी भाभियाँ नहीं होती हैं ? डमरू जैसे युवा नहीं होते हैं ? नियाज़ जैसे लोग नहीं होते हैं ? लपरलैंडी जैसे किरदार नहीं होते हैं ? कहने का मेरा आशय यह है कि रचना में किसी पात्र को कोई स्पेस नहीं दिया जाता। यह तो रचना की मांग पर निर्भर करता है कि उसका कौन-सा पात्र कितना स्पेस लेता है।

14. स्त्री किस तरह के पुरुषवाद का शिकार है कि वह एक दूसरी स्त्री को खुद गालियां देती है?

-आपके इस प्रश्न से ऐसा लगता है जैसे एक स्त्री पुरुष के इशारों पर दूसरी स्त्री की जान की दुश्मन बनी हुई है। पता नहीं हमारा तथाकथित सभ्य समाज अपनी  गालियों के प्रति इतना दुराग्रही क्यों हैं ? ऐसा लगता है जैसे वह अपने लोक को विस्मृत करता जा रहा है। पता नहीं हिंदी में ऐसा कोई शोध हुआ है या नहीं मगर बांग्ला में अपने समाज की गालियों और उनके मनोविज्ञान  को  लेकर कुछ शोध हो चुके हैं। गाली या कहिए अश्लीलता की आड़ में हम अपनी उस शुचिता को ढांपने का प्रयास करते हैं, जो हमारे लोक जीवन और उसके हास-परिहास का बड़ा हिस्सा रहा है। अगर आप ब्रज समेत उत्तर भारत में शादी की कुछ रस्मों को देखेंगे, तो आपको लगेगा जैसे बिना गालियों के शादी-विवाह का कोई अर्थ नहीं है। लड़की की शादी से ठीक एक दिन पहले महिलाएँ जो रतजगा करती हैं और उसमें जिस तरह अपने देवी-देवताओं के सामने गालियाँ, वह भी स्त्रियों द्वारा इस्तेमाल की जाती हैं उसकी आप कल्पना नहीं कर सकते। ऐसी ही एक रस्म है खोड़िया । इस रस्म में लड़के की बारात जाने के बाद, घर-मोहल्ले में रह गयी महिलाओं द्वारा खेले जाने वाले खेलों को एक पुरुष देख-सुन नहीं सकता। इसलिए इसमें पुरुषों की उपस्थिति पूरी प्रतिबंधित होती है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। मुझे ऐसा लगता है कि पुरुषों द्वारा सदियों से स्त्री का दमन होता रहा है, ऐसी रस्मों में गाली उसकी परिणति है। इस रस्मों का किसी धर्म से कोई लेना-देना है, ये समाज में पनपी उन्हीं चलनों का अतिक्रमण है, जिन्हें स्त्रियों पर ज़बरन थोपा गया है। यहाँ एक बात कह दूँ कि अश्लीलता वास्तव में हमारी समझ और नज़र का फ़र्क है। 

चूँकि यहाँ बात सिर्फ़ ‘हलाला’ उपन्यास को लेकर हो रही है और इस उपन्यास की पृष्ठभूमि मेवाती है इसलिए आपके मन में यह सवाल उठ रहा है। इसमें ही नहीं मेरे इससे पहले के दोनों  उपन्यास ‘काला पहाड़’ और ‘बाबल तेरा देस में’  जिनकी पृष्ठभूमि भी मेवात है उनमें स्त्रियों द्वारा ‘रंडी’ शब्द का बहुत इस्तेमाल हुआ है। कहने और सुनने में यह शब्द किसी गाली से कम नहीं है। बल्कि गाली ही है। मगर इस शब्द के अर्थ इसके कहन के लहज़े के चलते बदल जाते हैं। सच कहूँ इस तरह के शब्द जिन्हें हम गाली मानते हैं मेवाती संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। उसकी अपनी एक पहचान हैं। 

15. हलाला उपन्यास में गालियों का भी प्रयोग है क्या उसके बिना हलाला की समस्या को स्पष्ट नहीं किया जा सकता था?

-आपने ‘हलाला’ में गालियों के प्रयोग को हलाला की समस्या से जोड़ कर देखा है। जबकि इनका इस समस्या से कोई  संबंध नहीं है। वैसे इस उपन्यास में कुल कितनी गालियों (जिन्हें मैं गालियाँ नहीं मानता) का इस्तेमाल हुआ होगा ? मुश्किल से तीन-चार। तो क्या लेखन या सृजन महज हमारी शुचिताओं को सुरक्षित रखने का औज़ार मात्र है ? हाँ, उपन्यास में मेवात की जगह अगर लखनऊ या किसी ऐसे ही सभ्य मुस्लिम परिवेश चित्रण होता, तो वहाँ इनका इस्तेमाल नहीं होता। पात्रों के संवाद इस पर निर्भर करते हैं कि रचना की पृष्ठभूमि और परिवेश क्या है। किसी भी रचना को पृष्ठभूमि और परिवेश मौलिक बनाता है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जितनी बात इस उपन्यास पर इसकी मेवाती पृष्ठभूमि के चलते हो रही है, उतनी शायद किसी दूसरी पृष्ठभूमि के चलते नहीं होती। मैं इस उपन्यास की एक बड़ी सफलता की वजह इसके विषय के साथ-साथ इसकी पृष्ठभूमि भी मानता हूँ।  

 

16. डमरू को छेड़ने के पीछे स्त्रियों का कौन सा मनोविज्ञान काम कर रहा है? जबकि वह एक सीधा सा पुरुष है?

– हमारे समाज में आदमी के भोलेपन और उसके सीधेपन को अक्सर उसकी मूर्खता का पर्याय माना जाता है। डमरू वास्तव में हमारे समाज के इसी भोलेपन और उसके सीधेपन का प्रतीक है। आपने सही कहा कि डमरू सीधा-सा पुरुष है और वह लगता भी है।  मगर सीधा होने का अर्थ ना-समझ या अज्ञानी होना नहीं होता। ठीक ऐसे ही जैसे शराफत को आजकल किसी की भीरुता से जोड़ दिया जाता है। देवर को छेड़ने-कोंचने या कहिए चुहल की परंपरा कोई नई नहीं है। सच तो यह है जीवन के सारे उल्लास हमारे संबंधों में छिपे हुए हैं। वैसे भी डमरू तीनों भाइयों में सबसे छोटा तो है ही साथ में कुँआरा भी है। कुरूपता और बढ़ती उम्र का यह कुँआरापन ही उसके लिए सबसे बड़ा अभिशाप है। मगर समाज और परिवार की मर्यादाओं का इसने कभी अतिक्रमण नहीं किया। इसलिए डमरू के प्रति पाठक के मन में उसका सम्मान धीरे-धीरे बढ़ता चला जाता है। नज़राना की आसक्ति भी उसके प्रति उसके इसी व्यवहार और मन की निर्मलता के चलते मजबूत होती जाती है, जिसकी परिणति नज़राना के उस सार्वजनिक फैसले के रूप में होती है, कि वह इसी ईमान वाले आदमी के साथ रहेगी। वास्तव में  डमरू किसी दुचित्तेपन या द्वंद्व का शिकार नहीं है।   

17. क्या हलाला प्रथा मर्द के अधिकारों का गलत इस्तेमाल है?

-सिर्फ़ हलाला ही नहीं बल्कि ज़्यादातर धर्मों की प्रथाओं का ग़लत इस्तेमाल हो रहा है। हलाला को मैं इसलिए ज़्यादा अमानवीय मानता हूँ कि जो शर्त कुरआन में ही नहीं है उसकी स्त्री के ख़िलाफ़  ग़लत व्याख्या क्यों की जा रही है। हालाँकि इसकी मूल भावना तलाक़ को रोकने  की है। मगर उसके बजाय धर्म की आड़ में इस प्रथा को दुष्कर्म का रूप दे दिया। जहाँ इससे स्त्री और पुरुष को बराबर रूप से सबक सिखाना रहा है, पर वहाँ यह स्त्री-शोषण का एक हथियार बन गया। दरअसल यह एक मर्दवादी साज़िश है। एक और बात   मुझे तो यही समझ में नहीं आता कि ऐसा कौन-सा मरद होगा, जो जानते हुए दूसरे शौहर के साथ सहवास के बाद अपनी पहली पत्नी को आसानी से स्वीकार कर लेगा। मर्दवादी मानसिकता इसे आसानी से स्वीकार ही नहीं करेगी और ऐसा कुछ मर्दों ने किया भी है, तो सच कहूँ वे कम-से-कम इनसान तो नहीं फ़रिश्ते ही होंगे। सोचिए कि ऐसे फ़रिश्तों और पति-पत्नियों को उसी का समाज किस नज़र से देखता होगा ?

18- वैसे आपने इस्लाम के भीतर की एक वैवाहिक प्रथा हलाला को केन्द्र में रखकर किया है लेकिन बीच-बीच में हिन्दू कथाओं के मिथकों और दोहों का भी उल्लेख किया है। क्या और भी किसी धर्म में ऐसा होता है?

-अगर आप समाजशास्त्रीय नज़रिए  से अपनी  प्रथाओं, रस्मों अर्थात रीति-रिवाज़ों का गहराई से अध्ययन करें, तो इनका अस्तित्व में आना मनुष्य की ज़रूरतों और उसके सामाजिक अनुशासन की मुख्य वजह रही हैं। चूँकि मनुष्य का स्वभाव थोड़ा बगावती रहा है इसलिए इन्हें लागू करने के लिए धर्म का सहारा लिया गया। धर्म का सहारा इसलिए ताकि मनुष्य को अधर्म के रास्ते से भटकने से रोका जा सके। इसके लिए हमारे संत-फ़कीरों ने जीवन-दर्शन को मनुष्य का आईना बना उसके कर्मों पर आधारित लोक साहित्य रचा। इसका सबसे अच्छा उदाहरण है  हमारा मध्य काल अर्थात भक्ति काल। इस काल को अगर सामाजिक नव जागरण काल कहा जाता है तो इसीलिए कि इसमें सामाजिक बुराइयों और कुप्रथाओं पर सबसे ज़्यादा चोट की गयी है। यह चोट मिथकों और मौखिक साहित्य के द्वारा की गयी है। आप देखेंगे कि लोकोक्तियों, मुहावरों और दोहों की मारक क्षमता इतनी गहरी और असरदार होती है कि जिस अनैतिकता का इलाज़ कानून कि किसी किताब में नहीं होता उसे ये बखूबी कर जाते हैं। लोक साहित्य व्यक्ति के निजी और उसके सामाजिक अनुभवों से सींचा हुआ होता है। इसीलिए कहा गया है कि अपने लोक से कटे लेखक का चिंतन कभी मौलिक नहीं हो सकता। रही बात लोकोक्तियों, मुहावरों और दोहों के किसी धर्म विशेष से जुड़े होने की, तो मैं आपसे पूछता हूँ कि मनुष्य का दुःख-दर्द, उसकी पीड़ा, पीड़ा, संताप और उनकी अभिव्यक्ति को क्या हम किसी धर्म के खानों में बाँट कर देख सकते हैं ? क्या हम इसे व्याख्यित कर सकते हैं कि हिन्दू का दुःख ऐसा होता है, और मुसलमान का दुःख वैसा है । चूँकि हमारा समाज आस्था, मिथकों और परंपराओं पर जीने वाला समाज है, इनका हस्तक्षेप हमारे निजी जीवन में ज़रुरत से ज़्यादा रहा है इसलिए हमारी बहुत-सी मुश्किलों का निदान भी इनमें छिपा हुआ है। 

19. क्या धर्म और मर्दवादी व्यवस्था ने स्त्री को बागे नहीं बढ़ने दिया है? आपकी राय?

-धर्म और मर्दवादी व्यवस्था का गठजोड़ इतना मजबूत है कि उसे बींधना बहुत मुश्किल है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि सभी धर्मों के धर्मग्रंथों के रचयिता हम मर्द ही रहे हैं। इसलिए हमने अपने बचने के तो सारे रास्ते खोज लिए मगर अपने से निरीह और कमज़ोर तबकों के रास्ते या तो बेहद संकरे छोड़ दिए, या उन्हें बंद ही कर दिया। पूरी दुनिया में धर्मों का जितना इस्तेमाल स्त्री सत्ता के खिलाफ हुआ है उसके बारे में हम सब जानते है। कई बार तो ऐसा लगता है मानो सब धर्मों के धार्मिक ग्रंथों के रचयिताओं ने आपस में मिलकर स्त्री-संबंधी संहिताओं को बुना है। इसका मैं एक उदाहरन देता हूँ। अथर्ववेद (2:36:4) का एक श्लोक है जिसका अर्थ है-  ‘जिस तरह वन्य-जीवों तक को शांत वातावरण प्रिय होता है, उसी तरह परिवार को सुखमय बनाने के लिए स्त्री को चाहिए कि वह पति से विरोध या कलह न करे, अपितु उसके अनुकूल रहकर प्रियता प्राप्त कर अपने ऐश्वर्य की वृद्धि करे।’   

अब आप कुरआन की चौथी सूरा अन-निसा की इस 34वीं आयत को देखिए,जिसका अर्हत है- 

‘मर्द औरतों के सवामी हैं। जो नेक औरतें होती हैं, वे आज्ञाकारी और अपने रहस्यों की रक्षा करने वाली होती हैं। जिन स्त्रियों से विद्रोही होने का भय हो – उन्हें समझाओ, उन्हें अपने बिस्तरों से दूर रखो और उन्हें कुछ सज़ा दो।’  

इन दोनों यानी अथर्ववेद के श्लोक और कुरआन की इस आयत में समानता देखिए कि सारी  हिदायतें, सारी सलाह औरत को ही दी गयी हैं। इतना ही ही नहीं अगर वह आज्ञाकारी नहीं है तो उसे सज़ा भी दी जाए। इतना ही नहीं हमारे संविधान के स्त्री संबंधी कानून भी इन्हीं धर्म-ग्रंथों को ध्यान में रख कर बनाये गये हैं। मेरे अपने हरियाणा के पुराने गुड़गाँव के मेवात में ऐसा ही रिवाज़-ए-आम को ध्यान में रख कर कानून बना हुआ है। इस कानून के मुताबिक़ अगर किसी बहन के सगे भाई नहीं हैं, तो पिता की संपत्ति पर उसका नहीं, उसके चचेरे या ताऊ के लड़कों का हक़ होगा।  

मुझे इस्लाम के धर्म गर्न्थों का तो पता नहीं लेकिन मैं हिन्दू धर्म की कह सकता हूँ कि जितना धर्म और मर्दवादी मानसिकता के चलते धर्म का इस्तेमाल स्त्रियों के विरुद्ध किया गया है, उतना शायद ही दूसरे धर्मों में किया गया है। मनुस्मृति ही नहीं दूसरे ब्राह्मणों द्वारा रचित धर्म ग्रंथों में स्त्री और दलितों के विरुद्ध ज़हर उगला गया है, आप उसकी अक्ल्पने नहीं कर सकते। अम्बेडकर ने तो इस मनुस्मृति का सार्वजनिक दहन ही इसलिए किया था कि इसमें दलितों और स्त्रियों को आगे बढ़ने न देने के स्पष्ट निर्देश दिए गये हैं। कहने का मेरा आशय यह है कि आदि काल से ही धर्म का इस्तेमाल हमारी मर्दवादी व्यवस्था करती आ रही है।

20. आपको लगता है कि शरीयत और हदीस का भय दिखाकर औरतों का शोषण होता है?

आपका कहना सही है कि शरीयत या हदीस का भय दिखा कर पुरुषों द्वारा स्त्रियों का शोषण होता रहा है। मैं आपकी बात को थोड़ा विस्तार देना चाहता हों और यह कि अगर स्त्रियों का सबसे ज्यादा शोषण हुआ है तो वह धर्म की आड़ में हुआ है। ‘स्त्री-धर्म’ के नाम पर पुरुषों द्वारा उसके चारों तरफ़ जिस तरह वर्जनाओं की कंटीले तारों की बाड़ खड़ी कर दी गयी है, उसे वह चाह  कर भी नहीं लांघ पाती है। कहीं वह इस मर्दवादी व्यवस्था के खिलाफ बग़ावत न कर बैठे, इसलिए धर्म का हवाला दे उसके आगे बढ़ने के रास्तों को रोकने की कोशिश होती रही है। यह रास्ता स्त्रियों में भी दलित स्त्री, विधवा, अशिक्षित के लिये और भी मुश्किल है। मैं कई बार कहता हूँ स्त्री का सबसे पहले आर्थिक और शैक्षणिक रूप से सशक्त होना बहुत ज़रूरी है। जैसे-जैसे स्त्री  आर्थिक और शैक्षणिक रूप से सशक्त  होती जा रही है, वह वैसे-वैसे एक पुरुष और सामाजिक रूढ़ियों के लिए चुनौती बनती जा रही। वह अपनी आवाज़ उठाने लगी है। इसका जीता-जागता उदाहरण है इसी हलाला और तीन तलाक़ के मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय। मगर मेरा सवाल यहाँ दूसरा है और यह कुरआन के ही संदर्भ में है कि जब कुरआन के मुताबिक़  एकसाथ तीन तलाक़ मान्य है ही नहीं तब यह प्रचलन में क्यों है ? क्या ऐसा करना कुरआन की तौहीन नहीं है। कहने का आशय यह है कि धर्म में दिए गए निर्देशों की व्याख्याओं को पुरुष अपनी सुविधा और मर्ज़ी से तय करना लगा है। सच तो यह है कि स्त्रियाँ अपनी मर्ज़ी से नहीं पुरुषों के तय किये गए निर्देशों के अनुसार जी रही हैं। धर्म की आड़ में स्त्रियों की नकेल पुरुष अपने हाथ में रखना चाहता है।

21. आपने हलाला उपन्यास में महिलाओं की नकारात्मक छवि दिखाई है ऐसा क्यों?

-आपने एक बड़ा ही असहज करने वाला सवाल किया है कि उपन्यास ‘हलाला’ में मैंने महिलाओं की नकारात्मक छवि दिखाई है। जहां तक मैं आपके इस प्रश्न की गहराई को समझ पाए हैं उसके अनुसार आपका कहना यह है कि कहीं न कहीं मैं इस अवधारणा को और पुख्ता करना चाहता हूँ कि स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है ? या फिर आपके कहने का मतलब यह है कि एक स्त्री को अपने विवेक सम्मत कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए , या मर्दों द्वारा स्त्री-धर्म के नाम पर उसके चारों तरफ खींच दी गयी लक्ष्मण-रेखा को उसे नहीं  लाँघना चाहिए ? अगर नज़राना चुपचाप शरई क़ानून के मुताबिक़ ज़िनाह के नाम पर हलाला जैसी क्रूर रस्म का पालन कर एक ‘नेक’ और ‘भली’ स्त्री की तरह अपने पहले पति के पास आ जाती ? आमना  को अपने देवर डमरू  की शादी नहीं होने देनी चाहिए थी ? कैसे महिलाओं की नकारात्मक छवि दिखाई है, और कौन सी वह नकारात्मकता है जो आपको नज़र आती है ? जहां तक इस उपन्यास  में आपके मुताबिक़ कुछ गालियों का सवाल है, मैं इसे नकारात्मकता के रूप में नहीं देखता। यह तो लोक से उपजी एक क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक पहचान है। असल बात यह है कि स्त्री के मनोभावों को एक पुरुष जानने का दम तो भरता है मगर सच्चाई यह है कि यह पुरुष का कोरा भ्रम है। आपसे मैं एकदम सहमत नहीं हूँ  कि उपन्यास ‘हलाला’ में मैंने महिलाओं की किसी तरह की नकारात्मक छवि पेश की है।

प्रसाद का आरंभिक काव्य: विराट संभावना का उन्मेष-डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय

0

प्रसाद का आरंभिक काव्य: विराट संभावना का उन्मेष

*डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय

महाकवि जयशंकर प्रसाद हिंदी के बहुआयामी साहित्यकार हैं।इनका जन्म 30 जनवरी 1890 को काशी के सुप्रतिष्ठ सुंघनी साहू परिवार में हुआ था।इन्होंने सातवीं कक्षा तक विद्यालयीन शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत घर पर ही हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी भाषा एवं साहित्य का गहन अध्ययन किया।आप भारतीय इतिहास, संस्कृति, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान , कला और साहित्य के निष्णात विद्वान माने जाते हैं।गोस्वामी तुलसीदास की तरह ही आप हिंदी के बहुश्रुत कवि और श्रेष्ठतम प्रतिभा के रूप में हमारे सामने आते हैं। आप बीसवीं सदी की सर्वश्रेष्ठ प्नरतिभा सम्पन्न रचनाकार हैं जिन्होंने जातीय प्रश्नों को उसके वास्तविक रूप में प्रस्तुत और अबाधित किया।आपने अपनी प्रतिभा से ने न केवल हिंदी में अनेक विधाओं का सूत्रपात किया अपितु उसे विश्वस्तरीय भी बनाया।अतः इनके संपूर्ण साहित्य का पुनर्पाठ वर्तमान समय की मांग है। आपके व्यक्तित्व से यह सीख मिलती है कि यदि हम अपने व्यक्तित्व को सुसंगठित एवं सक्रिय रखें तो कम आयु में ही उपलब्धियों के बड़े शिखर पार कर सकते हैं। आपने चित्राधार से कामायनी तक की यात्रा करके इसका अभूतपूर्व दृष्टांत प्रस्तुत किया है। आप जीवन और जगत के बृहत्तर संदर्भों के साथ-साथ मनुष्य की नियति एवं उसके अंतर्जगत के गहरे पारखी हैं। अतः आपका आरंभिक काव्य लेखन भी एक नये विश्लेषण की मांग करता है।

प्रसादजी के रचनात्मक जीवन का आरंभ काव्य-लेखन से ही हुआ । आपकी आरंभिक कविताएं ‘ चित्राधार’ में संकलित हैं।आपने ‘कलाधर ‘उपनाम से ब्रजभाषा में काव्यारंभ किया।यद्यपि यहां रीतिकाल का पूर्ण रूप से अतिक्रमण नहीं हो सका है परन्तु नयी उद्भावनाओं का संकेत बड़े ही स्पष्ट तरीके से व्यक्त हुआ है। चित्राधार में ‘वनमिलन’,’प्रेमराज्य’ और ‘ अयोध्या का उद्धार’ नामक तीन आख्यानक कविताएं संकलित हैं। वनमिलन में कालिदास के आभिज्ञान शाकुंतल की कथा को नए युगबोध के आलोक में प्रस्तुत किया गया है। यहां प्रसाद का जिज्ञासु मन प्रकृति के अनंत रमणीय सौंदर्य के प्रति जिज्ञासा ही प्रकट नहीं करता अपितु वह प्रेम-सौंदर्य के साथ-साथ प्रकृति के वैविध्यपूर्ण चित्र भी उकेरता है। इसी तरह अयोध्या का उद्धार भी कालिदास के रघुवंश महाकाव्य के सोलहवें सर्ग पर आधारित हैं जिसमें राम के सुपुत्र कुश द्वारा अयोध्या के पुनरुद्धार की कथा वर्णनात्मक शैली में प्रस्तुत की गयी है। इसकी तीसरी आख्यानक कविता ‘ प्रेम राज्य’ प्रसाद की मौलिक सृष्टि है जिसका आधार इतिहास है।इतिहासकारों के अनुसार सन 1564 ई.में विजयनगर और अहमदाबाद के बीच टालीकोट का युद्ध हुआ था। इस काव्य का आरंभ युद्ध से किन्तु इसका समापन एक महान मानवीय संदेश में होता है।इसमें शिव के विराट स्वरूप का चित्रांकन हुआ है। कवि इस कविता में पाठक को उच्चतर भावभूमि पर ले जाता है । वह लौकिक धरातल पर अलौकिक आदर्श की प्रतिष्ठा करता है। प्रसाद जी ने स्वयं लिखा है कि छंद की दृष्टि से इसमें रोला छंद है।

इसमें स्फुट कविताओं को ‘पराग’ और ‘ मकरन्द बिन्दु’ के अंतर्गत रखा गया है जिनमें अधिकांश रचनाएं प्रकृति परक हैं। प्रसाद जी के भीतर प्रकृति के रहस्यों के प्रति जो जिज्ञासा भाव है वही उन्हें प्रकृति संसर्ग की ओर ले जाता है। प्रसाद की ऋषिदृष्टि प्रकृति के संसर्ग से खुलती है। जब कवि दृष्टि अतिक्रमित होती है तब ऋषिदृष्टि का उन्मीलन होता है। यही दृष्टि प्रसादजी को उच्चतर भावभूमि और लम्बी यात्रा पर ले जाती है। इन कविताओं ने विराट संभावना का संकेत कर दिया है। इसमें प्रकृति के प्रति रागपरक रहस्य चेतना और अंतर्दृष्टि क्रमशः सूक्ष्मतर होती गयी है।कवि का नवीन भाव-बोध पूरी तरह खुलकर सामने आ गया है।

इनके द्वारा रचित ‘प्रेम पथिक’ पहले ब्रजभाषा के छंदगत अनुशासन में प्रकाशित हुआ किन्तु समय की मांग और जरूरत को ध्यान में रखकर प्रसाद जी ने उसे 1913 में दुबारा प्रकाशित करवाया।यह खड़ीबोली हिंदी के अतुकांत रूप में है।यह एक संभावनावान कवि की किशोर भावनाओं के अनुरूप प्रेम के उदात्त, भावनात्मक और सार्वभौम-शास्वत स्वरूप का निर्वचन है।किसी के प्रेम में योगी होकर प्रकृति के स्वच्छंद एवं अकृत्रिम परिवेश में रहने की आदिम आकांक्षा मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति है।इस मूल भावना को प्रेम, सौंदर्य एवं कल्पना के द्वारा व्यवस्थित रूपक प्रदान किया गया है जिससे यह हिंदी की पहली लंबी कविता भी बन गयी है।यह अपने रूपात्मक तंत्र में एक विराट कवि की संभावनाओं का निदर्शन करती है। इनकी काव्य-प्रतिभा की इन्हीं संभावनाओं पर विचार करते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है कि,” प्रसाद जी में ऐसी मधुमयी प्रतिभा और ऐसी जागरूक भावुकता अवश्य थी कि उन्होंने इस पद्धति का अपने ढंग पर बहुत ही मनोरम विकास किया। ” 1

प्रेम पथिक में प्रसादजी किशोर और चमेली के माध्यम से प्रेम, सौंदर्य और प्रकृति के अनंत रमणीय सौंदर्य का जो रूपायन करते हैं वह हर युग के युवाओं के लिए रमणीय वस्तु है।पथिक अनंत की जिज्ञासा से प्रेरित होकर जब प्रदीर्घ यात्रा पर निकलता है तो वह प्रकृति की अनंत विभूति तथा जीवन साधना के विलक्षण रूप से परिचित होता है।कवि पथिक द्वारा तापसी के समक्ष अपनी अंतहीन यात्रा और प्रेम की व्यथा-कथा का वृत्तांत प्रस्तुत करवाता है ।चूंकि वह पुतली अथवा चमेली ही थी अतः वह किशोर को पहचान जाती है।वह भी अपनी करुण-कथा कह डालती है।फलतः पथिक भी उसे पहचान लेता है और दोनों के बाल्यकाल की स्मृतियां उन्हें उदात्त भावभूमि पर पहुंचा देती हैं।वे दोनों विश्व के प्रत्येक परमाणु में अपरिमित सौंदर्य के दर्शन करते हुए विश्वात्मा ही सुन्दरतम है – की प्रतिष्ठा करते हैं।उनके प्रेम में प्रेय( आनंद) के स्थान पर श्रेय ( लोकमंगल) का पक्ष प्रबल हो जाता है ।वे अपने प्रेम की मानवीय सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए उसे चराचर जगत अथवा विश्वप्रेम में रूपांतरित कर देते हैं।प्रेम के अत्यंत व्यापक और उदात्त रूप के चित्रण के कारण यह कविता आज वेलेंटाइन डे मनाने वाली पीढ़ी को भी प्रेरितऔर प्रभावित कर सकती है।

यह कविता अपने विश्वबोध, प्रकृति और कृषक जीवन के बहुस्तरीय एवं बहुरंगी चित्रों, उदात्त भावना, जीवन-संघर्ष, त्याग-तपस्या तथा मानवीय मूल्यों की अपूर्व सृष्टि के कारण हिंदी की एक अतिशय महत्वपूर्ण तथा कालजयी कृति है। इसे खंडकाव्य और लंबी कविता दोनों का गौरव प्राप्त है।लेकिन मैं इसे हिंदी की पहली लंबी कविता के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहता हूँ।यह कविता न केवल भाव-बोध, वस्तुविन्यास, मनोवैज्ञानिक अंतर्द्वंद्व के धरातल पर रीतिकालीन काव्यपरंपरा का अतिक्रमण करती है अपितु रचना-विधान, आत्मव्यंजना, भाषिक अनुप्रयोग , कल्पनात्मक छवियों तथा समुचित अलंकार योजना के कारण भी कामायनी जैसे महाकाव्य के स्रष्टा की विराट प्रतिभा का स्फुरण भी बन जाती है।प्रसादजी की इस बहुचर्चित घोषणा को संपूर्णता में विश्वसनीयता प्रदान करते हुए यह कविता स्वयं ही ऐतिहासिक महत्व की अधिकारिणी बन जाती है—

” इस पथ का उद्देश्य नहीं है श्रांत भवन में टिक रहना

किन्तु पहुंचना उस सीमा पर जिसके आगे राह नहीं ।” 2

इन आरंभिक कविताओं में प्रसाद जी भक्ति से जीवनादर्श तथा प्रकृति से दार्शनिक चिंतन का विकास करते हैं।वे अपने को ब्रजभाषा से खड़ी बोली की ओर ले जाते हैं। कविता के कथ्य के साथ-साथ वे काव्यभाषा के प्रति भी निरंतर सतर्क और सचेष्ट रहे हैं।सन 1912 में प्रकाशित ‘ कानन कुसुम’में खड़ी बोली की कविताएं पहली बार प्रकाशित होती हैं। सर्वप्रथम ‘चित्र’ शीर्षक से ‘इंदु’ पत्रिका में उनकी खड़ी बोली की पहली कविता प्रकाशित हुई। प्रसाद जी अपने समय एवं समाज की बिखरी हुई शक्तियों के समन्वय द्वारा भारतीय मनुष्यता का चतुर्दिक विकास चाहते थे। वे अपने व्यक्तिगत जीवन में नियति की क्रूरता को झेलते हुए भी स्वयं को बिखरने नहीं देते और शक्ति के विद्युत्कणों के समन्वय द्वारा अपने जीवन दर्शन का विकास करते हैं। प्रसाद जी इस बात को लेकर लगातार चिंतित एवं उन्मथित थे कि अंग्रेज तथा पश्चिम भक्त इतिहासकार एक षडयंत्र के अंतर्गत भारतीय इतिहास को विकृत कर रहे थे। उनका ऐतिहासिक ज्ञान अद्भुत और अद्वितीय है। वे अपनी भेदक दृष्टि द्वारा भारतीय इतिहास का नया पाठ तैयार करते हैं। वे भारतीय इतिहास के गौरव चिह्नों का संधान करके उन्हें अपने लेखन का विषय बनाते हैं।इस दृष्टि से उनका पहला ऐतिहासिक काव्य ‘ महाराणा का महत्त्व’ है। इस कविता में महाराणा प्रताप सिंह के महत्त्व का प्रतिपादन करते हुए राष्ट्रीय आकांक्षा की अभिव्यक्ति हुई है। महाराणा प्रताप देशभक्ति, राष्ट्रीय अस्मिता तथा हिंदू गौरव के चरम प्रतीकों में से एक हैं। प्रसाद अपनी इतिहास अन्वेषी दृष्टि के बल पर उनके संघर्ष और बलिदान को अमरत्व प्रदान करते हैं। वे महाराणा के शत्रु विदेशी आक्रांता के मुख से भी प्रताप का यशोगान करवाते हैं। वह महाराणा प्रताप की प्रशंसा करते हुए कहता है कि

” सच्चा साधक है सपूत निज देश का

मुक्त पवन में पला हुआ वह बीर है।”3

इस कविता में प्रकृति की मनोरम छवि का भी अंकन किया गया है। कवि ने लिखा है कि :- ” विस्तृत तरु शाखाओं के ही बीच में

छोटी-सी सरिता थी, जल भी स्वच्छ था।

कल-कल ध्वनि भी निकल रही संगीत-सी

व्याकुल को आश्वासन -सा देती हुई।।” 4

इस कविता का विन्यास अत्यंत नाटकीय शैली में हुआ है। संपूर्ण कविता चार भागों में सुविन्यस्त है। कविता के आरंभ में राजकुमार अमरसिंह यवनों को उनकी बेगमों समेत बंदी बनाकर महाराणा प्रताप सिंह के समक्ष उपस्थित करते हैं।महाराणा उन्हें मुक्त कर देते हैं।इसके बाद बेगम और खानखाना के मध्य वार्तालाप चित्रित हुआ है। बेगम अकबर के पास जाने के लिए कहती हैं।जब खानखाना अकबर को समस्त वृत्तांत सुनाते हैं तो वे आज्ञा देते हैं कि अब महाराणा पर आक्रमण न हो। इस तरह प्रसाद जी महाराणा के महत्त्व का प्रतिपादन करते हैं।

इसमें कवि ने अमरसिंह के शौर्य एवम् युद्धकौशल का भी सुन्दर चित्रण किया है। यहां एक साथ महाराणा प्रताप तथा राजकुमार अमरसिंह के पराक्रम का निदर्शन परिलक्षित होता है।यह कविता देश की स्वाधीनता, सुरक्षा और अस्मिता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने की प्रेरणा देती है। कहना न होगा कि कवि ने स्वतंत्रता संग्राम के कठिन संघर्ष के उन दिनों में भारतीय जन मानस में राष्ट्रीय चेतना का अमर मंत्र फूंकने के लिए इस कविता का सृजन किया था। अतः ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर रचित यह कविता भले ही खंडकाव्य के ताने-बाने में बुनी गयी है परन्तु इसका रूपात्मक तंत्र लम्बी कविता का ही है। यह कविता ऐतिहासिक वस्तुयोजना, सुपरिणत रचना-विधान, सहज एवं स्वाभाविक भाषा तथा उदात्त शैली की दृष्टि से ऐतिहासिक महत्त्व की अधिकारिणी है। इसका पुनर्पाठ राष्ट्रीय स्वाभिमान की प्रतिष्ठा के लिए यह जरूरी है।

प्रसाद जी के ‘कानन कुसुम’ में चित्रकूट, भरत , शिल्प-सौंदर्य, कुरुक्षेत्र, वीर बालक, श्री कृष्ण जयंती आदि आख्यानक कविताओं का समावेश हुआ है।इन कविताओं की पृष्ठभूमि इतिहास और पुराण पर आधारित है परन्तु उसमें प्रसाद जी ने अपने नए दृष्टिकोण तथा भाव-बोध का प्रकटन किया है। चित्रकूट की कथा रामचरितमानस के अयोध्या काण्ड से प्रेरित है। लेकिन प्रसाद जी यहाँ भी अपने आदर्श एवं मौलिक दृष्टिकोण की प्रतिष्ठा करते हैं। आपने राम और सीता के प्रेम का अत्यंत परिष्कृत एवं छविमान चित्र प्रस्तुत किया है।राम के अंक में सीता नीले गगन में चंद्रमा की भांति सुशोभित होती हैं। राम जानकी के मुख मंडल की शोभा पर मोहित होकर पूछ बैठते हैं:-

” स्वर्गंगा का कमल मिला कैसे कानन को,

नील मधुप को देख , वहीं उस कुंज कली ने

स्वयं आगमन किया कहा यह जनक लली ने।”5

इसी तरह कवि भरत आगमन को लेकर लक्ष्मण के रोष, राम-भरत मिलन तथा रजनी के अंतिम प्रहर के चित्रण में निहायत नवीन और अनछुए उपमानों का सन्निवेश करता है।

कवि ने आभिज्ञान शाकुंतल के सप्तक अंक के आधार पर ‘भरत’ शीर्षक से कविता लिखी है। हम सब जानते हैं कि इस देश का भरत के नाम पर ही भारतवर्ष नाम पड़ा है। वह भारतवर्ष का गौरव है। कवि देश-प्रेम की भावना से अनुप्राणित होकर इतिहास पुरुष भरत के गौरवशाली व्यक्तित्व का अंकन करता है। जिस तरह आभिज्ञान शाकुंतल का भरत शिशु सिंह के दांत गिनता है उसी तरह प्रसाद का भरत भी कहता है कि:-

” खोल, गोल मुख सिंह बाल , मैं देखकर,

गिन लूंगा तेरे दांतों को हैं भले

देखूं तो कैसे यह कुटिल कठोर हैं।-6

इसी क्रम में अगली कविता ‘ शिल्प सौंदर्य’ शीर्षक से है। भरत की भांति यह भी अतुकांत छंद में विरचित है । कवि भारतवर्ष के अनंत रमणीय शिल्प सौष्ठव का निर्वचन करता है। वह एक सार्वभौम-शास्वत सत्य की प्रतिष्ठा करते हुए लिखता है कि धार्मिक कट्टरता कभी-कभी अनेक अनिष्ट कर जाती है। आतताई आलमगीर ने आर्य मंदिरों को खुदवाकर उनके शिल्प सौंदर्य को मटियामेट कर दिया था। फलतः मुगल साम्राज्य के बालू की दीवार भी ढह जाती है। कवि यह स्थापित करता है कि क्रूरता को वीरता नहीं माना जा सकता है। आक्रांताओं की धार्मिक कट्टरता ने अनेक सुन्दर ग्रंथों को नष्ट करने के साथ-साथ विज्ञान, शिल्प, कला, साहित्य और वास्तुकला का भी भयावह नुकसान किया है। बावजूद इसके भारत के ध्वंस शिल्प भी करुण वेश में भी अपने गौरव को छिपाए हुए हैं। ‘ कुरुक्षेत्र’ में श्रीकृष्ण के जीवन चरित, गीता के उपदेश तथा महाभारत के युद्ध का चित्रांकन हुआ है। ‘वीर बालक’ कविता में भी धर्मांधता की निस्सारता बतलाई गई है। कवि सिक्ख बालक जोरावर सिंह तथा फतेह सिंह के स्वाभिमान तथा अस्मिता बोध का चित्रण करता है। कवि स्पष्ट करता है कि दोनों वीर बालक दीवार में चुने जाने के बावजूद इस्लाम स्वीकार नहीं करते। यह अपनी आन-बान और शान पर मर मिटने का अभूतपूर्व दृष्टांत है। इसमें भी अतुकांत छंद के साथ-साथ अद्भुत उपमानों का प्रयोग हुआ है। संक्षेप में , प्रसाद की आरंभिक कविताएं इस बात का प्रमाण हैं कि एक विराट प्रतिभा का उन्मेष हैं जो परवर्ती अप्रतिम रचनाओं के कारण प्रायः उपेक्षित रही हैं। ये कविताएं प्रेम और सौंदर्य के साथ-साथ प्रकृति-पर्यावरण तथा भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं दर्शन के प्रति कवि के अनुराग की विकास कथा भी हैं। इन कविताओं से यह भी सिद्ध होता है कि प्रसाद ही हिंदी में लंबी कविताओं का सूत्रपात करते हैं।

संदर्भ- सूची

  1. हिंदी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, पृष्ठ-539
  2. प्रेम पथिक, जयशंकर प्रसाद, पृष्ठ-28
  3. महाराणा का महत्व, जयशंकर प्रसाद, पृष्ठ-14
  4. वही. पृष्ठ-15
  5. कानन कुसुम, जयशंकर प्रसाद, पृष्ठ-103
  6. वही, पृष्ठ-105

* प्रोफेसर एवं अध्यक्ष,

हिंदी विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय

मुंबई 400098

हिन्दी साहित्य और सिनेमा में एल०जी०बी०टी० समुदाय का मूल्यांकन-सविता शर्मा

0
close up photography of rainbow rays on eye
Photo by Harry Quan on Unsplash

हिन्दी साहित्य और सिनेमा में एल०जी०बी०टी० समुदाय का मूल्यांकन

*सविता शर्मा

हिन्दी साहित्य में लगभग नब्बे के दशक से ही विमर्शों का दौर रहा है। हिन्दी कथा साहित्य में दलित विमर्श, स्त्री विमर्श एवं आदिवासी विमर्श अपनी निर्णांयक भूमिका के साथ अवस्थित हुए। दरअसल ये ऐसे विमर्श हैं जिन्होंनें आज़ादी से पहले ही संघर्ष करना शुरू किया और एक पूरा विमर्श बनते-बनते इन्हें कई साल लगे। किन्तु वर्तमान में हिन्दी साहित्य में ये तीनों विमर्श – दलित विमर्श, स्त्री विमर्श और आदिवासी विमर्श अपने चरम पर हैं।

साहित्य एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा प्रत्येक वर्ग की सुध ली जाती है। दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, स्त्री विमर्श के साथ-साथ समाज में कई अन्य वर्ग भी हैं। जिन्हें हाशिये के भी हाशिये पर जगह नहीं मिली है। इस प्रकार के विमर्श में सबसे मुख्य एल०जी०बी०टी० विमर्श है। एल अर्थात् ‘लेस्बियन‘, जी अर्थात् ‘गे‘, बी०अर्थात् ‘बाएसेक्सुअल‘ तथा टी० अर्थात् ‘ट्रांसजेंडर‘ है। यह एक ऐसा समूह है जिसका अस्तित्व तब से ही समाज में है जब से पृथ्वी पर जीवन का आरम्भ हुआ।

प्राचीन काल से ही इस एल०जी०बी०टी० वर्ग की उपस्थिति हमारे समाज में रही है और यही नहीं सम्मानीय स्थिति में रही है, जिसके प्रमुख उदाहरण हैं-

वात्सयायन का ‘कामसूत्र‘, वेद व्यास का महाभारत‘, कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र‘ तथा ‘पुराण‘ आदि। वर्तमान में ‘खजुराहों के मंदिर‘ इसका सबसे अच्छा उदाहरण है जो कि यूनेस्को की धरोहर सूची में भी शामिल है। खजुराहों के मंदिर जो कि 11वीं सदी के चन्देलों नें बनवाए थे, तत्कालीन समाज में समलैंगिकता या एल०जी०बी०टी० समुदाय की उपस्थिति का एक जीता-जागता प्रमाण है। अतः इस समुदाय के अस्तित्व को हम मानते तो है किन्तु जाने नहीं।

हैरानी की बात तो यह है कि साहित्य जो कि अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। उसने भी इस समुदाय की ओर ध्यान नहीं दिया। हिन्दी साहित्य में एल०जी०बी०टी० विषय पर लिखे गए ग्रंथ इतने है कि इन्हें आसानी से अंगुलियों पर गिना जा सकता है।

जिनमें से ज्यादातर ग्रंथ हाल ही में लिखे गए हैं। जब उच्चतम न्यायालय द्वारा इन समुदायों को मनुष्य का दर्जा देने की पहल की गई। उच्चतम न्यायालय के ऐसे दो फैसले इस प्रकार हैं-

2014 में ट्रांसजेंडर समुदाय को तृतीय लिंग का दर्जा देते हुए 3 % का आरक्षण दिया तो 6 सितम्बर, 2018 में ‘धारा 377’ जो कि अप्राकृतिक यौन संबंधों के विरूद्ध थी को गैर-कानूनी बताते हुए ‘निजता के अधिकार‘ के तहत स्वेच्छा से 18 वर्ष के व्यस्क व्यक्ति स्त्री या पुरूष के साथ एकांत में संबंध बना सकते हैं मो मान्यता दी है।

ये दो फैसले माननीय उच्चतम न्यायालय ने जब से दिए हैं तब से ही ज़्यादातर हिन्दी जगत भी इन हाशिए के वर्ग के प्रति जागा है। इसमें भी केवल ट्रांसजेंडर के संदर्भ में ही। समलैंगिक समुदाय अभी भी समाज के साथ-साथ साहित्य में भी हाशिये पर ही है। जिस कारण एल०जी०बी०टी० समुदाय का संघर्ष और गहरा ही होता है कम नहीं।

साहित्य के साथ-साथ सिनेमा भी एक ऐसा माध्यम है जो समाज का आईंना होता है। किन्तु विडम्बना यह है कि साहित्य की तरह सिनेमा में भी इन एल०जी०बी०टी० वर्ग को लगभग नगण्य स्थान ही मिला है और मिला भी तो हास्यास्पद या नकारात्मक छवि के रूप में। इस प्रकार की कुछ फिल्में – संघर्ष, मर्डर-2, सड़क, दोस्ताना, कल हो न हो हैं।

किन्तु ऐसा नहीं है कि केवल नकारात्मक सिनेमा ही एल०जी०बी०टी० वर्ग पर बना है। कुछ सकारात्मक फिल्में भी इस वर्ग में हैं जैसे- तमन्ना, बोल, शबनम मौसी, डियर डैड, हनीमून ट्रेवल प्रा० लिमिटेड, शुभ मंगल ज़्यादा सावधान आदि।

दरअसल सिनेमा एक श्रव्य-दृश्य माध्यम है, जिस कारण जो लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं उन पर भी फिल्मों का गहरा असर पड़ता है। जिस कारण सिनेमा को समाज में अपनी भूमिका समझते हुए वृहद स्तर पर ऐसे विषयों को उठाना चाहिए जो हाशिये पर जिंदगी जीने को मजबूर हैं, क्योंकि यदि साहित्य की जगह हमारी स्टडीरूम तक है तो सिनेमा की बैडरूम तक। अतः सिनेमा को चाहिए कि वृहद स्तर पर ऐसे विषय उठाए, क्योंकि इसकी पहुँच प्रत्येक उम्र के व्यक्ति से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक है। जिससे समाज में एल०जी०बी०टी० वर्ग की छवि बदलने तथा उन्हें भी आम मनुष्य की तरह जीवन व्यतीत करने में आसानी होगी।

हिन्दी के प्रख्यात रचनाकार राजकमल चैधरी की बहुचर्चित बहुप्रशंसित कृति है ‘मछली मरी हुई‘। लेखक ने अपनी इस महत्त्वकांक्षी कृति में जहाँ महानगर कलकत्ता के उद्योग जगत की प्रमाणिक और सजीव तस्वीर प्रस्तुत की है, वहीं आनुषंगिक विषय के रूप में समलैंगिक स्त्रियों के रति-आचरण का भी इस उपन्यास में सजीव चित्रण किया है। इसमें ठनकती हुई शब्दावली और मछली के प्रतीक की ऐसी सृजनात्मक है जो लेखक की करूणा सर्वत्र सींचती रहती है।

उपन्यास को स्त्री-समलैंगिकता पर केन्द्रित उपन्यास के रूप में देखा जा सकता है, जो लेखक के इस विषय पर गहन शोध का ही परिणाम है।

समलैंगिकता पर आधारित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का ग्रंथ ‘कुल्लीभाट‘ एक प्रसिद्ध पुस्तक है। कुल्लीभाट अपनी कथावस्तु और शैली-शिल्प के नयेपन के कारण न केवल निराला के गद्य साहित्य की बल्कि हिन्दी के संपूर्ण गद्य-साहित्य की एक विशिष्ट उपलब्धि है। यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि कुल्ली के जीवन-संघर्ष के बहाने इसमें निराला का अपना सामाजिक जीवन मुखर हुआ है और बहुलांश में यह महाकवि की आत्मकथा ही है।

कुल्ली के माध्यम से निराला दिखाते है कि केवल समलैंगिक होने के कारण समाज में वह हेय की दृष्टि से देखा जाता है हालांकि कुल्ली है बड़ा संवेदनशली व्यक्ति। कुल्ली के लिए जात-पात कोई मायने नहीं रखती उसके लिए सबसे महत्त्वपूर्ण चीज है मनुष्यत्व, जिस बात को बाद में बाकी लोग मानते भी हैं। कुल्ली राजनीति में सक्रिय होता है किन्तु उसका अंत इतना दयनीय है, जिससे कि पाठक और स्वयं निराला भी उसकी पीड़ा महसूस करते हैं। समलैंगिकों के विभिन्न क्षेत्र में सक्रियता के बावजूद उनके जीवन का अंत कितना दर्दनाक है यह हम ‘कुल्लीभाट‘ में देख सकते है। गोर्की के शब्दों में – ‘‘जीवन-चरित जैसे आदमियों के बने और बिगड़े, कुल्ली भाट ऐसे आदमी न थे। उनके जीवन का महत्त्व समझे, ऐसा अब तक एक ही पुरूष संसार में आया है, पर दुर्भाग्य से अब वह संसार में नहीं रहा।‘‘ (पृष्ठ सं० 13, कुल्लीभाट, निराला, राजकमल, पेपरबैक्स, नई दिल्ली)

यही नहीं बल्कि ट्रांसजेंडर अर्थात् किन्नर समुदाय पर लिखा गया प्रथम उपन्यास ‘यमदीप‘ भी इस समाज के दुख-दर्द को बेबाकी से बयां करता है। हमारे समाज के घोर अभिशप्त माने जाने वाले किन्नर समुदाय के अंतरंग जीवन की मार्मिक गाथा प्रस्तुत करने वाला यह उपन्यास अपने-आप में एक अद्वितीय कृति है। यह उपन्यास लेखिका नीरजा माधव को एक ओर तो स्त्री-लेखन एवं दलित-लेखन की भीड़ से अलग करता है, तो दूसरी ओर, नारी – अस्मिता और शोषित – उपेक्षित वर्ग के उन अनछुए पहलुओं को भी सामने रखता है, जिनकी ओर आज तक कोई सजग लेखनी उन्मुख ही नहीं हुई।

साथ ही सुप्रसिद्ध कथाकार महेंद्र भीष्म का उपन्यास ‘किन्नर कथा‘ सख्.त भाषा में बेहद गंभीरता के साथ प्रश्न उठाता है कि प्रकृति ने किन्नरों के साथ अन्याय क्यों किया? क्यों हम किन्नरों को मुख्यधारा में शामिल करने से बचते रहे हैं, क्यों यह माना जाता है कि वह हमारी तरह इन्सान नहीं हैं? राजघराने में अपनी जुड़वां बहन के साथ जन्म लेने वाली सोना उर्फ चंदा देखने में अतीव सुन्दर है, उसके बोलने पर ही पता लगता है कि वह किन्नर है। बचपन से ही उसे पिता ने लोकलाज के चलते अपने विश्वस्त दीवान को सौंप दिया था ताकि वह उसे मार डाले। लेकिन वह उसे एक किन्नर गुरू तारा को दे देता है। यहीं से सोना नाम बदलकर चंदा बन जाती है। संयोग से चंदा 15 बरस बाद अपनी ही जुड़वां बहन के विवाह में पहुँचती है। अद्भुत कथा – प्रवाह में बहा ले जाने वाली यह कथाकृति जहाँ महत्त्वपूर्ण प्रश्नों से टकराती है, वहीं कथारस की ऐसी सृष्टि भी करती है कि सांस थामे पाठक पढ़ता ही चला जाए। इसका पाठक संवेदना के उन तंतुओं से स्वतः जुड़ता चलता है जो बताते हैं कि हर किन्नर का एक अतीत होता है। परिवार से विस्थापन का दंश भुगतते हुए उसका अनाम संघर्ष उसे कैसे तपाता रहता है। बेहद गंभीरता के समय किन्नरों की दुनिया की पड़ताल करते हुए महेंद्र भीष्म का यह उपन्यास पाठकों की सोई संवेदना को झिंझोड़कर जगा देता है। किन्नरों की समस्याओं के साथ बाहरी दुनिया को अपने अनूठे अंदाज में परिचित करते हुए यह उपन्यास अपने आपको पढ़ा ले जाने का माद्दा रखता है।

इसी की तरह चित्रा मुद्गल का उपन्यास ‘पोस्ट बॉक्स नं० 203 नाला सोपारा’ भी है जिसमें लेखिका बताती है कि किस प्रकार केवल किन्नर भर होने से विनोद जैसे बच्चे अपने परिवार से दूर जीवन जीने को अभिशप्त हैं। उपन्यास में विनोद बार-बार प्रश्न भी करता है कि यदि आँख की विकलांगता, टांग की विकलांगता या अन्य किसी शरीर के अंग की विकलांगता के कारण आप लोग अपने बच्चे को घर से बाहर नहीं फेकते तो केवल लिंग विकलांगता के बच्चों को इतनी बड़ी सज़ा क्यों? साथ ही लेखिका किन्नरों की समस्याओं के साथ-साथ घर वापसी जैसे समाधान भी उपन्यास में समझातीं हैं।

‘दरमियाना’ सुभाष अखिल का एक किन्नर विषय पर आधारित एक अन्य उपन्यास है, जिसमें लेखक इस समुदाय की व्यथा कहता है। दरअसल ‘दरमियाना’ नाम से 1980 में ‘सारिका’ में इनकी कहानी प्रकाशित हुई जिसे थर्ड जेंडर पर आधारित प्रथम कहानी भी माना जाता है, इसी को लेखक ने उपन्यास के रूप में भी अब लिखा है।

सहानुभूति से अच्छा वर्णन स्वानुभूति में होता है और आत्मकथा इसका सबसे अच्छा माध्यम रहा है। किन्नर समाज पर आधारित ‘मैं हिजड़ा मैं लक्ष्मी‘ (लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी) की आत्मकथा तो है ही साथ ही ‘पुरूष तन में फंसा मेरा नारी मन‘ मानोबी बंधोपाध्याय की एक और आत्मकथा है जिसमें मानोबी बताती हैं कि किस प्रकार उन्होंने किन्नर होने के बावजूद संघर्ष करते हुए पश्चिम बंगाल के एक कॉलेज में प्रिंसिपल का पद प्राप्त किया। अत्यंत बेबाकी से उन्होंने यह आत्मकथा लिखी है। इन आत्मकथाओं से अच्छा माध्यम इन हाशिये के समाज को जानने का शायद ही कुछ और हो।

यही नहीं बल्कि ‘हमख़्याल‘ एक अन्य कहानी संग्रह है जो समलैंगिक समाज के यथार्थ को पकड़ने की कोशिश करता है। एम० फिरोज़ की यह कृति तारीफ के काबिल है तो वहीं प्रदीप सौरभ का उपन्यास ‘तीसरी ताली‘ एक अन्य महत्त्वपूर्ण उपन्यास है जो अपने में सम्पूर्ण एल०जी०बी०टी० समुदाय को न सिर्फ समेटता है बल्कि उनकी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सबसे ज्यादा सांस्कृतिक पक्षों को पाठकों के सामने रख के इस वर्ग की समस्याओं से रूबरू कराता है जो जन्म से लेकर मरण तक चलती ही रहती हैं। यही नहीं बल्कि यह उपन्यास यह भी बताता है कि दुनिया में हर जगह इस वर्ग की उपस्थिति है। एबीसीडी अर्थात् आरा, बलिया, छपरा प्रत्येक स्थान पर यह समुदाय मिल जाएगा। किन्तु हर जगह इस वर्ग की स्थिति ऐसी ही दोयम दर्जे की है।

इन तमाम रचनाओं के द्वारा हिन्दी साहित्य में एल०जी०बी०टी० वर्ग की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक समस्याओं की पड़ताल तो की जा सकती है साथ ही साथ उनके संभावी समाधानों का भी पता लगाया जा सकता है।

दरअसल यह एक ऐसा विषय है जिस पर साहित्य और सिनेमा ने तो कम ध्यान दिया ही है साथ ही शोध की स्थिति भी लगभग नगण्य है। जिस कारण ये समाज निम्नत्तर स्थिति में जीवन जीने को अभिशप्त है। आँकड़ों के मुताबिक एल०जी०बी०टी० वर्ग की लगभग 25 लाख लोगों की जनसंख्या हैं जो कि दयनीय स्थिति में ही हैं। उच्चतम न्यायालय के फैसलों से इनकी स्थिति में सुधार की कुछ उम्मीद है किन्तु समाज इन्हें कहाँ तक अपना पाएगा यह अभी भविष्य के गर्त में हैं।

सन्दर्भ ग्रंथ

  1. माधव, नीरजा, यमदीप, सामयिक पेपरबेक्स, नई दिल्ली, 2017
  2. मुदग्ल, चित्रा, पोस्ट बॉक्स नं० 203 नाला सोपारा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2016
  3. सौरभ प्रदीप, तीसरी ताली, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2011
  4. चैधरी, राजकमल, मछली मरी हुई, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पेपरबैक्स संस्करण, 2009
  5. निराला, सूर्यकांत त्रिपाठी, कुल्ली भाट, राजकमल पेपर बैक्स, नई दिल्ली, पांचवा संस्करण, 2019
  6. सिंह, विजेंद्र प्रताप, कथा और किन्नर, अमन प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 2016
  7. सिंह, विजेंद्र प्रताप, हिन्दी उपन्यासों के आइनें में थर्ड जेंडर, अमन प्रकाशन, कानपुर
  8. खराटे, मधु, हिन्दी उपन्यासों में किन्नर विमर्श, विकार प्रकाशन कानपुर
  9. खान, एम०फिरोज़, थर्ड जेंडर अतीत और वर्तमान, विकार प्रकाशन, कानपुर
  10. खान, एम०फिरोज़, थर्ड जेंडर: हिन्दी कहानियाँ, अनुसंधान पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, कानपुर
  11. खान, एम०फिरोज़, थर्ड जेंडर अनूदित कहानियाँ, अनुसंधान पब्ल्शिर्स एण्ड डिस्टीब्यूटर्स, कानपुर

*शोधार्थी, पीएच.डी. हिन्दी

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

ईमेल- savita3590@gmail.com

 

दलित विमर्श और हिन्दी की दलित आत्मकथाएँ: एक समीक्षा-भारती

0
brown and gray abstract painting
Photo by Dan-Cristian Pădureț on Unsplash

दलित विमर्श और हिन्दी की दलित आत्मकथाएँ: एक समीक्षा

भारती*

“चूल्हा मिट्टी का

मिट्टी तालाब की

तालाब ठाकुर का ………..”1

(ओमप्रकाश वाल्मीकि)

दलित शब्द का अर्थ किसी भी समाज में दमित, कुचलित और पिछड़े से लगाया जाता है। दलित साहित्य की एक निश्चित विचारधारा है, जो समता, स्वतंत्रता और बंधुता को स्थापित करती है। दलित साहित्य अम्बेडकरवादी और फूले (ज्योतिबा फूले) की विचारधारा पर आधारित है। अक्सर यह सवाल उठाया जाता है कि दलित संवेदन क्या है? क्या जो गैर-दलित लेखक है उनमें दलित संवेदना है? इसको लेकर आलोचकों में काफी विवाद है। दलित आलोचकों का मानना है कि जो गैर-दलित लेखक है, उनका साहित्य मात्र एक सहानुभूति का साहित्य है। इस प्रकार सहानुभूति और स्वानुभूति का सवाल उठाया जाता है। श्यौराज सिंह बेचैन के अनुसार-

‘‘दलित वह है जिसे भारतीय संविधान में अनुसूचित

जति का दर्जा दिया गया है।“ 2

दलित चेतना क्या है? दलित आलोचकों का मानना है कि दलित चेतना उन साहित्यकारों में है जो अम्बेडकरवादी और फूले की विचारधारा पर अपने साहित्य को लिखते है। अक्सर सवाल उठाया जाता है कि क्या प्रेमचंद के साहित्य में दलित चेतना है? यदि हाँ तो दलित आलोचक उन्हे गैर-दलित चेतना का साहित्यकार क्यों मानते है?

हिन्दी आलोचकों का मानना है कि दलित साहित्य अस्मितावादी साहित्य है। डा० मैनेजर पाण्डेय के अनुसार – दलित साहित्य हिन्दी साहित्य का लोकतंत्रीकरण कर रहा है। लेकिन दलित आलोचकों का मानना है कि यह अस्मितावादी साहित्य न होकर समाज में समता, स्वतंत्रता तथा बंधुता को स्थापित करने वाला साहित्य है। ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते है –

‘‘दलित चेतना का सीधा सरोकार मैं कौन हूँ?

से है जो दलितों की सामाजिक, सांस्कृतिक

तथा ऐतिहासिक भूमिका की छवि तिलिस्म

को तोड़ती है। वही दलित चेतना है।‘‘3

‘दलित साहित्य’ के अंतर्गत क्या आना चाहिए और क्या नहीं इस विषय में विद्वानों में मतभेद है। प्रेम कुमार मणि के अनुसार –

‘‘दलितों के लिए दलितों के द्वारा लिखा जा

रहा साहित्य दलित साहित्य है।‘‘4

गैर दलित साहित्य की तुलना दलित साहित्य से करते हुए कंवल भारती इस बात को ठीक ही रेखांकित करते हैं कि उसमें व्यक्ति की अपेक्षा समुदाय केन्द्र में है।

हिन्दी क्षेत्र में काफी समय से ही इस विषय पर बहस चल रही है कि दलित साहित्य किसे माना जाए, परंतु लंबी बहसों के बाद अब यह माना जाने लगा है कि दलित ही दलित की पीड़ा को अपने भोगे हुए आयतित की अनुभूति द्वारा साहित्य में बदल सकता है। इसको परिभाषित करते हुए कई विद्वानों ने मत प्रकट किए है। डॉ.शरण कुमार लिम्बाले के अनुसार –

‘‘दलित केवल हरिजन और नव बौद्ध नहीं। गाँव की सीमा के बाहर रहने वाली सभी अछूत जातियाँ, आदिवासी, भूमिहीन खेत मज़दूर, श्रमिक कष्टकारी जनता और यायावर जातियाँ सभी की सभी ‘दलित’ शब्द से व्याख्याथित होती है।“5

समाज में व्याप्त संकीर्णता और विसंगतियों से मानव को मुक्त करना एवं पीड़ित मानवता को सम्मानीय जीवन प्रदान करना ही दलित साहित्य का एकमात्र उद्देश्य है-

‘”यह साहित्य दुखों, वेदनाओं और संघर्षों तक ही सीमित नहीं है। उसमें परिवर्तन की अटूट आस्था है और जीवन के उदात्त भावों जैसे प्रेम, भाईचारा आदि का भी संदेश है, जो समस्त मानव जाति को एक माला में पिरोकर रखना चाहता है।“6

नवें दशक में दलित साहित्य की अनेक विधाएँ सामने आई। इन विधाओं में दलित आत्मकथाओं नें दलित साहित्य को एक पहचान दी। आत्मकथा विधा के कारण ही दलितों का यथार्थ वास्तविक रूप में अंकित हुआ। दलित आत्मकथाओं में लेखको ने अपने समाज की यातनाओं, पीड़ाओं व शोषण की विभीषिका का तीखा और यथार्थ चित्रण किया है। डॉ. विमल घारोत ने लिखा है –

‘‘दलित आत्मकथाएं आज दलित समुदाय के विभिन्न आयामों को अपने अंदर समेट कर शोषण के उस हर एक पहलू की, एक समाज शास्त्रीय चिकित्सक की दृष्टि से चीरफाड़ करके सामाजिक व्यवस्था और अन्तर्सम्बन्धों की पड़ताल करता हुआ दिखाई पड़ता है।‘‘7

दलित आत्मकथाकारों नें अपनी आत्मकथाओं के माध्यम से दलित समुदाय की गरीबी, गुलामी और यातना की दिल दहलाने वाली जो तस्वीरें प्रस्तुत की है, वें वास्तव में सराहनीय है। दलित आत्मकथाकारों में ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहन दास नेमिशराय, कौशल्या बैसंत्री, सूरजपाल – चैहान – अनिता भारती, तुलसीराम, जय प्रकाश कर्दम, श्यौराज सिंह बेचैन आदि का नाम प्रसिद्ध है।

दलित साहित्य में स्त्री शोषण की या कहें कि उसके तिहरे शोषण की समस्या को भी उठाया गया है। महिला दलित साहित्यकारों में कौशल्या बैसन्त्री नें अपनी आत्मकथा ‘दोहारा अभिशाप‘ में अपने जीवन के यथार्थ को, शिक्षकों के क्रूर व्यवहार को और सामाजिक जातिय अत्याचारों को उजागर करते हुए लिखा है-

‘‘जब मैने कन्या पाठशाला में पाँचवी कक्षा में प्रवेश लिया तब स्कूल की फीस ज्यादा थी, एक रूपये बारह आने। बच्चों की फीस देना माँ – बाप के सामथ्र्य के बाहर था। बाबा ने हैडमिस्ट्रेस से बड़ी विनती की कि वे फीस नहीं दे सकते। बहुत मुश्किल से वह मान गई और कहा पढ़ाई अच्छी न करने पर निकाल देगी। बाबा ने हैडमिस्टेªस के चरणों के पास अपना सिर झुकाया दूर से क्योंकि वे अछूत थे स्पर्श नहीं कर सकते थे।‘‘8

ब्राहमणवादी मानसिकता, शिक्षकों के मन में इस प्रकार से रच बस गई कि जिस प्रकार सवर्णों के मन में दलितों के प्रति जो घृणापूर्ण धारणाएँ व व्यवहार है ठीक यही स्थिति शिक्षकों की है वहीं शिक्षक होते हुए भी दलितों के साथ घृणित व्यवहार करते थे।

‘अक्करमाशी” में शरण कुमार लिम्बाले ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है –

‘‘हम महार जाति के थे, इसलिए प्रति शनिवार पूरे स्कूल की जमीन को गोबर से लीपने का कार्य हमें दिया जाता था। गोबर इकट्ठा करके पूरा स्कूल लीपने के बाद शिक्षक मेरी सराहना करते। घर पर मैं किसी प्रकार का काम नहीं करता था पर स्कूल का यह काम मुझे चुपचाप करना पड़ता था।‘‘9

इस प्रकार शिक्षक का यह व्यवहार शिक्षक पद की गरिमा के एकदम विपरीत है।

सूरजपाल चैहान ने अपनी आत्मकथा ‘तिरस्कृत‘ में संस्कृत के अध्यापक वेदपाल शर्मा के विषय में लिखा है कि वह शिक्षक होते हुए भी जाति का ओछापन किस तरह याद दिलाते रहते थे। एक दिन उन्होंने सूरजपाल की ओर संकेत करते हुए कहा था –

‘‘यदि देश के सारे चूडहे चमार पढ़ लिख गए तो गली-मौहल्लों की सफाई और जूते बनाने का कार्य कौन करेगा। ‘’10

इस कथन से स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षक चाहे, शहर का हो या गाँव का लेकिन उसकी सोच विकृत सवर्णवादी मानसिकता से पूरी तरह से ग्रस्त है। बस अंतर इतना है कि एक ओर शहर का शिक्षक दलितों को गली मौहल्लों की सफाई और जूते बनाने के लिए अनपढ़ रखना चाहता हैं वहीं दूसरी ओर गाँव का शिक्षक गाँव से जुड़े कार्यों को करने के लिए।

डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन ने अपनी आत्मकथा ‘चमार‘ में दलितों के साथ सवर्णों का जो व्यवहार रहा है उसके विषय में लिखा हैं –

‘‘धन्य है मेरा देश भारत। किस वर्ग से बढ़कर है यह देश जहाँ मेरी माँ – बहनों की तुलना पशुओं से की जाती है और उनसे पशु जैसा आचरण किया जाता है स्वीकार हो हुज़ूर। दलित लौटाना चाहता है आपको आपकी भाषा, आपका व्यवहार।‘‘11

इससे स्पष्ट होता है कि लेखक के मन में व्यवस्था के प्रति आक्रोश है।

वही दूसरी ओर नैमिशराय जी ने अपनी आत्मकथा ‘अपने-अपने पिंजरे‘ में लिखा है कि उन्हें इस बात पर गर्व है कि वे ऐसे समुदाय से ताल्लुक नहीं रखतें जिसने शोषण किया, निर्दोषों को सताया और धर्म के नाम पर अमानवीय परंपराओं को वैधता प्रदान की। वे लिखते है –

‘‘हम गरीब जरूर थे पर हमने न देश बेचा था न अपना ज़मीर। न हम डंडीमार थे और न ही सूदखोर। चोर लुटेरों की श्रेणी में हम नहीं आते थे। ……….. सवर्णों की तरह हमने न मुगलों से समझौता किया न ही अंगे्रजों से सौदेबाज़ी की।“12

गरीबी, बेरोज़गारी और अर्थाभाव की अर्थी पर फेंके जाने वाले पैसों को इकट्ठा करने में हम दलितों को कोई हिचकिचाहट नहीं होती थी मोहनदास नैमिशराय ने यह सब दरिद्रता के कारण किया –

‘‘अर्थी के ऊपर फेंके गये पैसे उठाने के लिए बा और ताई ने कभी मना नहीं किया था।‘‘13

अपनी आत्मकथा की भूमिका में वे लिखते हैं –

‘‘व्यक्ति हो या समाज उसे अपने अधिकार स्वयं ही लेने होते हैं। बैसाखियों पर जीवन नहीं चलता। चलेगा भी कितने दिन।“14

समाज में व्यक्ति की हैसियत व दर्जा जाति के आधार पर तय किया जाता है जातिवादी समाज में सर्वप्रथम व्यक्ति की जाति के बारे में जानने की जिज्ञासा रहती है और जाति के आधार पर ही संवाद की स्थिति तय की जाती है।

दलित लेखकों नें संपूर्ण व्यवस्था के प्रति अपना आक्रोश प्रकट किया है। इस आक्रोश का कारण समाज में व्यवस्थित व्यवस्था है, जन्म से पहले ही जिस समाज में जाति निर्धारित कर दी जाती है। व अछूत का लेबल माथे पर चिपका दिया जाता है ऐसे कुंठित समाज में किसी भी मनुष्य का छटपटाना सामान्य है। जाति व अस्पृश्यता का सहारा लेकर सवर्णों द्वारा दलित समाज को नियंत्रित किया जाता है जो दर्जा समाज में दलितों के लिए निर्धारित था, वहीं दर्जा स्कूल में भी लागू होता है। विडंबनापूर्ण स्थिति तब होती है जब ‘अक्करमाशी‘ में लिम्बाले ने दिखाया है –

‘‘बनियों और ब्राहमणों के लड़के कबड्डी खेल रहे थे। हम अछूत बच्चे उनसे अलग थलग ही बैठे थे………… दलितों का खेल अलग। दो-दो खेल दो-दो आँधियों की तरह।‘‘15

इस प्रकार कहा जा सकता है कि जिन शिक्षण संस्थाओं का कार्य विषमता को समाप्त तथा बराबरी का अहसास पैदा करना है लेकिन वहीं गैर बराबरी और विषमता की भावना को बढ़ावा दे रहें है तो इससे बड़ी समाज की विडंबनापूर्ण स्थिति क्या होगी ?

‘जूठन‘ की भूमिका में ओमप्रकाश वाल्मीकि ने लिखा है –

‘‘दलित जीवन की पीड़ाएँ असहनीय और अनुभव दग्ध है। ऐसे अनुभव जो साहित्यिक अभिव्यक्तियों में स्थान नहीं पा सके। एक ऐसी ही समाज व्यवस्था में हमने सांसे ली है, जो बेहद क्रूर और अमानवीय है।“16

‘जूठन’ मे वाल्मीकि जी ने हिन्दू समाज की विकृतियों का पर्दाफाश किया है। वर्ण व्यवस्था नें दलितों को ऐसे घाव दिए हैं जो असहनीय है। ‘जूठन‘ में गाँव के भीतर जीवन की तस्वीर दिखाते हुए वाल्मीकि जी लिखतें है –

‘‘अस्पृश्यता का ऐसा माहौल कि कुत्ते-बिल्ली, गाय भैंस को छूना बुरा नहीं था, लेकिन यदि चूहडे का स्पर्श हो जाए तो पाप लग जाता था। सामाजिक स्तर पर इंसानी दर्जा नहीं था। वे सिर्फ ज़रूरत की वस्तु थे काम पूरा होते ही उपयोग खत्म, इस्तेमाल करो, दूर फेंकों।“17

दलित आत्मकथा दलित के जीवन का अतीत और वर्तमान के संदर्भ में एक ऐसा प्रयास है जिसमें लेखक अपने जीवन को नहीं, अपने चारों तरफ फैले समाज को भी समझता है। वस्तुतः दलित आत्मकथा आत्मपहचान का संघर्ष है जिसके साथ एक दमनात्मक समाज भी उद्घाटित होता है।

दलित साहित्य के सौंदर्य शास्त्र पर भी काफी सवाल उठाए गए है। कुछ आलोचकांे का मानना है कि दलित साहित्य की भाषा बहुत खराब है, लेकिन दलित आलोचकों का मानना है कि साहित्य की भाषा समाज से निर्मित होती है, उन्हें जिस तरह का समाज मिला है उसका चित्रण ऐसी ही भाषा में हो सकता है। दलित साहित्य का सबसे अधिक विरोध छायावाद से है। दुर्भाग्य की बात है कि विकसित होते हुए दलित साहित्य में भी अंतर्विरोध की नींव पड़ चुकी है, जो साहित्य के विकास के दृष्टिकोण से उचित नहीं जान पड़ती है या यों कहें कि यह रचनाकारों को एक सीमा में बांधती है। यह कहना गलत न होगा की दलित विमर्श, स्त्री विमर्श तथा आदिवासी विमर्श द्वारा साहित्य के विभिन्न गंभीर मुद्दों पर विचार किया जा रहा है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भारतीय वर्ण व्यवस्था नें दलित समाज को समस्त अधिकारों से हज़ारों वर्षों तक वंचित रखा। आत्मकथाओं में लेखक समूची व्यवस्था के प्रति दलित समाज को दुरूस्त करने का कार्य कर रहे है। अर्थात् दलितों को सचेत करते हुए संघर्षरत होने का आह्वाहन भी दलित लेखकों ने किया है दलित आत्मकथाकारों ने अपनी आत्मकथाओं के माध्यम से जहाँ दलितों की सभी समस्याओं को समस्त समाज से परिचित कराया है,वहीं साथ ही व्यवस्था के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए दलितों के विकास के लिए मार्गा भी प्रशस्त किया है।

संदर्भ – ग्रंथ

  1. ओमप्रकाश वाल्मीकि – (ठाकुर का कुआँ)

  2. हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, प्रकाशन – (राधाकृष्ण प्रकाशन) पृष्ठ संख्या – 18

  3. ओमप्रकाश वाल्मीकि, जूठन, प्रकाशन – (राजकमल प्रकाशन)

  4. प्रेम कुमार मणि: दलित साहित्य: एक परिचय (लेख) दलित साहित्य चिन्तन विविध आयाम, सं डा० एन० सिंह पृष्ठ संख्या – 57

  5. डॉ. शरण कुमार लिम्बाले, दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र पृष्ठ संख्या – 38

  6. दलित चिन्तन, 2011, डॉ० प्रकाश कुमार, पृष्ठ संख्या – 41

  7. दलित साहित्य में विविध विधाएँ, माता प्रसाद, डाॅ० विमल थारोत, पृष्ठ संख्या – 56

  8. दोहरा अभिशाप, कौशल्या बैसंत्री, पृष्ठ संख्या – 21

  9. अक्करमाशी, शरण कुमार लिम्बाले, पृष्ठ संख्या – 61

  10. तिरस्कृत, सूरजपाल चैहान, पृष्ठ संख्या – 58

  11. चमार, श्यौराज सिंह बैचेन, पृष्ठ संख्या – 44

  12. अपने – अपने पिंजरे, मोहानदास नैमिशराय, पृष्ठ संख्या – 12

  13. वही पृष्ठ संख्या – 12-13

  14. वही पृष्ठ संख्या – 13

  15. अक्करमाशी, शरण कुमार लिम्बाहे, पृष्ठ संख्या – 48

  16. जूठन, ओमप्रकाश वाल्मीकि, पृष्ठ संख्या – 32

  17. वही पृष्ठ संख्या – 32

(सहायक ग्रंथ)

  1. दलित साहित्य की अवधारणा – कंवल भारती
  2. दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र (लेख) – निरंजन कुमार

*शोधार्थी, एम.फिल. हिंदी

दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

ईमेल: mebharti19bharti@gmail.com

पितृसत्ता: अर्थ, उत्पत्ति एवं व्यापकता-पूजा मिश्रा

0
woman in black tank top climbing on brown rocky mountain during daytime
Photo by Fionn Claydon on Unsplash

पितृसत्ता: अर्थ, उत्पत्ति एवं व्यापकता

*पूजा मिश्रा

सारांश:

प्रस्तुत आलेख द्वारा वैश्विक स्तर पर स्त्री की दोयम स्थिति के आधारभूत और महत्वपूर्ण कारक के रूप में पितृसत्ता को परिभाषित किया गया है। पितृसत्ता को मूलरूप से समझने के लिए इसके उत्पत्ति संबंधित मतों पर ध्यान देना आवश्यक है अतः पितृसत्ता को सार्वभौमिक और सार्वकालिक घोषित करने वाले विभिन्न मतों के साथ ही मानवविज्ञानी, सैली स्लोकम, इतिहासकार गर्डा लर्नर तथा मार्क्सवादी फ्रेडरिक एंगल्स इत्यादि द्वारा इन मतों का खंडन करने वाले तर्क भी प्रस्तुत किए गए हैं जिससे यह सत्यापित हो सके कि पितृसत्ता, सार्वभौमिक और सार्वकालिक नहीं है। पितृसत्ता की व्यापकता का अनुभव विश्व की लगभग प्रत्येक संस्कृति और समाज में किया जा सकता है परंतु यदि सम्मिलित प्रयास किए जाएं तो निश्चय ही पितृसत्ता और मातृसत्ता से परे एक समतामूलक समाज की स्थापना की जा सकती है।

बीज शब्द:

पितृसत्ता, मातृसत्ता, स्त्रीविमर्श, सामाजिक संरचना, शिकारी पुरुष, आदिम समाज

भूमिका:

पितृसत्ता अंग्रेजी के शब्द ‘पैट्रिआर्की’ का हिंदी अनुवाद है तथा ‘पैटर’ और ‘आर्के’ शब्दों से मिल कर बना है अर्थात ‘पिता का शासन’। पितृसत्ता एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जिसमें परिवार की संपूर्ण बागडोर घर के वृद्ध अथवा प्रभावशाली पुरुष के हाथ में होती है। परिवार में वंश पिता के पूर्वजों के अनुसार चलता है। ऐसी पारिवारिक व्यवस्था में सत्ता का हस्तानांतरण पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक पुरुष से दूसरे पुरुष के हाथों होता रहता है। भारत ही नहीं वरन विश्व के अधिकांश भागों में पितृसत्तात्मक व्यवस्था का ही अनुसरण किया जाता है। स्त्रीवादी विशेषज्ञों ने स्त्री की सामाजिक दोयम स्थिति का मूलभूत कारण पितृसत्ता को ही घोषित किया है। केट मिलेट ने अपनी पुस्तक ‘सेक्सुअल पॉलिटिक्स’ में स्त्री के ऊपर पुरुष वर्चस्व की स्थिति के लिए ‘पितृसत्ता’ शब्द का प्रयोग किया था। विभिन्न स्त्रीवादी विद्वानों द्वारा पितृसत्ता व्यवस्था की व्याख्या की गई है। प्रसिद्ध समाज शास्त्री सिल्विया वाल्बे के अनुसार “पितृसत्ता सामाजिक संरचना की एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें पुरुष महिला पर अपना प्रभुत्व जमाता है, उसका दमन करता है और शोषण करता है।”[1] स्त्रीविमर्श के विभिन्न संप्रदायों में से एक ‘उग्र स्त्रीवाद’ पितृसत्ता की जिस प्रकार से व्याख्या करता है , वह अनेक स्त्रीवादी विद्वानों को संतुष्ट नही करती है। ‘उग्र स्त्रीवाद’ स्त्रियों की प्रजनन क्षमता को उसकी अधीनता के मुख्य कारकों में गिनता है। ‘उग्र स्त्रीवाद’ यह मानता है कि यदि स्त्री प्रजनन की अनिवार्यता को हटा दिया जाए तो पुरुषों पर निर्भर रहने की उनकी विवशता स्वतः ही समाप्त हो जाएगी। शुल्मिथ फायरस्टोन अपनी पुस्तक ‘द डायलेक्टिक ऑफ़ सेक्स’ द्वारा इसी विचारधारा का समर्थन करती हैं परंतु अन्य स्त्रीवादी विद्वान मानते हैं कि हमारा समाज जाति, जेंडर, नस्ल, वर्ग और धर्म इत्यादि के आधार पर बंटा हुआ है अतः पितृसत्ता के अनुभव प्रत्येक स्त्री के लिए एक से ही नहीं हैं। उदाहरंणस्वरूप देखा जा सकता है कि निम्न जातियों की स्त्री का शोषण मात्र पितृसत्ता ही नहीं वरन जाति व्यवस्था द्वारा भी किया जाता है। वह पुरुषों की अधीनता के साथ ही उच्च वर्ग की स्त्रियों द्वारा भी शोषण का शिकार होती है। इसी प्रकार निम्न जाति के पुरुष भी उच्च जाति की स्त्रियों द्वारा शोषित होते हैं। तात्पर्य यह है कि अन्य स्त्रीवादियों ने उग्र स्त्रीवादियों के पितृसत्ता संबंधी विचारों पर अपना मत रखते हुए कहा कि सामाजिक संरचना एक जटिल संरचना है और इसका विभाजन मात्र स्त्री और पुरुष को दो भिन्न खेमों में रख कर नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार ‘बैरेट’ और ‘शीला रोबोथम’ जैसे स्त्रीवादी विद्वान पितृसत्ता की अवधारणा को अनुपयोगी करार देते हैं। इस संदर्भ में सिल्विया वाल्बी कहती हैं कि, “इस सिद्धांत को अनुपयोगी मानने की अपेक्षा इसे एक संकल्पना और सिद्धांत के रूप में इस तरह से विकसित किया जा सकता है कि स्त्री अधीनता की देश, काल, जाति, नस्ल, वर्ग तथा धर्म इत्यादि पर आधारित भिन्नताएं नजरअंदाज ना होने पाएं।”[2]

इसप्रकार पितृसत्ता को लेकर विभिन्न विद्वानों के विभिन्न मत हैं परंतु ध्यान देने वाली बात यह है कि पितृसत्ता एक व्यवस्था है, पितृसत्ता एक मानसिकता है। यह जरुरी नहीं है कि सभी पुरुष पितृसत्तात्मक मानसिकता का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। बहुत सारी स्त्रियाँ भी पुरुषवादी सोच का प्रतिनिधित्व करती हैं। पितृसत्ता, सामाजिक संरचना का महत्वपूर्ण अंग कैसे बनी या पितृसत्ता कब से विद्यमान है इस संबंध में विभिन्न मत हैं। पितृसत्ता के पक्षधर इसे मानव सभ्यता का एक स्वाभाविक अंग मानते हुए इसे सार्वभौमिक और सार्वकालिक घोषित करते हैं परंतु इस संबंध में हुए गहन शोध के उपरांत विभिन्न इतिहासकारों, स्त्रीवादी विद्वानों तथा मानव विज्ञानियों इत्यादि द्वारा इस तथ्य की पुष्टि की गई है कि पितृसत्ता , मानव सभ्यता के विकास का एक स्वाभाविक अंग न होने के साथ ही सार्वभौमिक और सार्वकालिक भी नहीं है। “समाज और संस्कृति निर्माण की प्रक्रिया में महिलाएं सदैव ही केंद्रीय भूमिका में रही हैं न कि हाशिए पर।”[3]

पितृसत्ता उत्पत्ति संबंधी मत:

पितृसत्ता की सार्वभौमिकता और सार्वकालिकता के संबंध में धार्मिक तर्क दिए जाते हैं जिनके अनुसार संपूर्ण विश्व का निर्माण ईश्वर द्वारा किया गया है और ईश्वर द्वारा ही स्त्री और पुरुष के लिए अलग- अलग भूमिकाओं का निर्धारण किया गया है। स्त्री का जन्म घर सँभालने और बच्चों की देखभाल करने के लिए ही हुआ है। आज भी इन धार्मिक तर्कों पर विश्वास रखने वाले परिवार का वंश आगे बढ़ाने के लिए पुत्र जन्म अनिवार्य मानते हैं। पुत्रवधुओं को पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया जाता है। पितृसत्ता के पक्षधरों द्वारा पितृसत्ता की सार्वभौमिकता के लिए ‘शिकारी पुरुष’ का तर्क दिया जाता है। मानव विज्ञानी शेरवुड वाशबर्न और सी. लैंकैस्टर ने पितृसत्ता के संबंध में डार्विन के उद्विकास सिद्धांत( थ्योरी ऑफ़ इवोल्यूशन) के आधार पर ‘शिकारी पुरुष’ का तर्क प्रस्तुत किया। यह तर्क डार्विन की कृतियों ‘ओरिजिन ऑफ़ स्पेशीज’ और ‘द डिस्टेंट ऑफ़ मैन’ में उद्धृत मानव विकास की लंबी शृंखला पर आधारित है। इस अवधारणा के अनुसार आदिम समाज में पुरुष शिकार पर जाया करते थे और स्त्रियाँ घर पर बच्चों की देखभाल करती थीं तथा भोजन की व्यवस्था करती थीं। ‘शिकारी पुरुष’ का तर्क पुरुष को स्त्री के आश्रयदाता के रूप में स्वीकार करता है। मानव विज्ञानी सैली स्लोकम ‘शिकारी पुरुष’ की अवधारणा को मानवशास्त्रियों की पुरुषवादी दृष्टि की उपज बताती हैं।[4] वह शिकारी पुरुष की अपेक्षा स्त्री और पुरुष दोनों को ही आहारसंग्रहकर्ता की भूमिका में देखती हैं। स्लोकम मानती हैं कि यदि पुरुष शिकार पर जाते थे तो इस समय को स्त्रियों ने बच्चों के पालन-पोषण के साथ ही कुछ रचनात्मक गतिविधियों में लगाया होगा यथा कंदमूल एकत्र करना और आरंभिक काल की कृषि की ओर अग्रसर होना। इतिहासकार गर्डा लर्नर भी मानती हैं कि आदिम समाज, भोजन के लिए पुरुषों द्वारा जुटाए गए बड़े शिकारों की अपेक्षा स्त्रियों द्वारा जुटाए गए छोटे शिकारों तथा कंदमूल पर अधिक निर्भर था।[5] इस प्रकार के तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि शिकार संग्रह अवस्था में भले ही स्त्री और पुरुष के बीच श्रम विभाजन रहा हो परंतु आदिम समाज में पुरुष, स्त्री के आश्रयदाता की अपेक्षा उसके पूरक के रूप में देखे जाते थे। भारतीय इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने मध्य भारत की भीमबेटका की गुफाओं के भित्तिचित्र का उदाहरण दिया है। इन भित्तिचित्रों में स्त्रियाँ एक साथ विभिन्न भूमिकाओं में नजर आती हैं। स्त्रियों के हाथ में फल- फूल बटोरने की टोकरी के साथ मछली पकड़ने का जाल भी नजर आता है। इन भित्तिचित्रों से यह स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ माँ होने के साथ ही आहार संग्रहकर्ता की भूमिका भी निभाती थीं।[6] पितृसत्ता के पक्षधरों में नाम जीव-विज्ञानी ई. ओ. विल्सन का भी आता है। विल्सन, स्त्री और पुरुष के बीच की असमानता को उचित ठहराने के लिए डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत का सहारा लेते हैं। विल्सन का मत है कि जिस समूह में मादाएं बच्चों को पालने पोसने का काम करती हैं और नर भोजन जुटाने का काम करते हैं वह समूह विकास की राह पर आगे निकल आता है।[7] इतिहासकार गर्डा लर्नर, विल्सन के इस मत का खंडन करती हैं कि आज के आधुनिक समाज में जहाँ बच्चों का पालन- पोषण मात्र माँ पर ही निर्भर नहीं करता है तथा जहाँ स्त्रियाँ भी बाहर जाकर आत्मनिर्भर बन रही हैं वहां इस तरह की धारणा निर्मूल हो जाती हैं। लर्नर, प्राचीन और आधुनिक समाज दोनों में ही ऐसे कबीलों का उदाहरण देती हैं जहाँ शिशु के पालन- पोषण का दायित्व कबीले के वृद्ध पुरुष, युवक अथवा अपेक्षाकृत बड़े बच्चे निभाते हैं। नारीवादी आलोचकों द्वारा भी विल्सन के इस मत को अप्रमाणिक एवं अवैज्ञानिक घोषित किया गया है। पितृसत्ता की उत्पत्ति उसकी सार्वभौमिकता तथा सार्वकालिकता को लेकर उसे सामाजिक व्यवस्था का एक स्वाभाविक अंग घोषित करने वाले विद्वानों की स्त्रीवादी विद्वानों द्वारा कड़ी आलोचना की गई है। गर्डा लर्नर ने अपनी पुस्तक ‘क्रिएशन ऑफ़ पैट्रीआर्की’ में लिखती हैं कि, “पितृसत्ता की स्थापना को मात्र किसी एक घटना से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। बल्कि इसे एक प्रक्रिया की भांति समझा जा सकता है जिसे बनने में लगभग 2500 वर्ष( 3100 से 600 ईसा पूर्व) लगे हैं।”[8] गर्डा लर्नर से पूर्व यह मत फ्रेडरिक एंगल्स द्वारा भी दिया जा चुका है कि पितृसत्ता का निर्माण एतिहासिक घटनाक्रमों में कुछ निश्चित कारणों से हुआ है। फ्रेडरिक एंगल्स ने 1884 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्यों की उत्पत्ति’ में स्त्री पराधीनता के मुख्य कारकों के संबंध में विस्तार से चर्चा की है। एंगल्स ने अपनी इस पुस्तक द्वारा परिवार के इतिहास को समझाने के लिए 1861 में प्रकाशित बखोफेन की पुस्तक ‘मदर राईट’ तथा 1870 में प्रकाशित हेनरी मार्गन की पुस्तक ‘प्राचीन समाज’ की सहायता ली है। पितृसत्ता पारिवारिक संरचना से जुड़ा हुआ शब्द है अतः पितृसत्ता की व्याख्या के लिए एंगल्स आदिम समाज में पारिवारिक संरचना की व्याख्या करते हैं। एंगल्स के अनुसार 1861 में बखोफेन की पुस्तक के प्रकाशन के बाद से परिवार के इतिहास का अध्ययन आरंभ हुआ। बखोफेन की पुस्तक मूलरूप से जर्मन में ‘Das Mutterrecht’ के नाम से लिखी गई थी जिसमें ‘मातृ अधिकार’ नाम से एक अध्याय है। यह पुस्तक आदिम सामाजिक व्यवस्था के कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर प्रकाश डालती है। बखोफेन के अनुसार आदिम समाज ‘यौन स्वछंदता’ या हैटेरिज्म की स्थिति में था जिसमें एक स्त्री के विभिन्न पुरुषों से संबंध होते थे। इस अवस्था में किसी नवजात शिशु के पिता का निर्धारण नहीं किया जा सकता था। अतः शिशुओं की पहचान माँ द्वारा ही होती थी और वंश भी मातृ पूर्वजों के नाम से ही चलता था। बखोफेन के अनुसार यह वह समय था जब स्त्रियों को समाज में बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। बखोफेन के मातृ अधिकार की अवधारणा से ही मातृसत्ता की अवधारणा विकसित होती है। बखोफेन हैटेरिज्म से एकनिष्ठ विवाह में परिवर्तन और मातृसत्ता से पितृसत्ता में परिवर्तन के पीछे यूनानी सभ्यता में हुए धार्मिक परिवर्तनों का आधार देते हैं। इसके लिए उन्होंने इस्खिलिस के नाटक ‘ओरेस्टिया’ की नई व्याख्या दी। इस नाटक के अनुसार ‘ओरेस्टस’ को अपनी माता ‘क्लिटेमिस्ट्रा’ की हत्या के आरोप से बरी कराने के लिए देवता अपोलो तथा देवी ऐथना ओरेस्टस का साथ देते हैं। बखोफेन रोमन सभ्यता में आए इस पौराणिक बदलाव को ही मातृसत्ता के विनाश का आरंभ मानते हैं। “बखोफेन द्वारा प्रस्तुत आदिम समाज में उपस्थित मातृसत्ता की अवधारणा से बीसवीं सदी के अधिकाँश नारीवादी विचारक सहमत हैं। फ्रेडरिक एंगल्स, चार्लोट पर्किंसन, गिलमैन तथा एलिजाबेथ कैंडी स्टैंटन इत्यादि विचारकों ने बखोफेन की अवधारणा के अनुसार स्त्री- पराधीनता पर अपने मत प्रस्तुत किए हैं।”[9] फ्रेडरिक एंगल्स निजी संपत्ति के आविर्भाव को मातृसत्ता के विनाश का कारण मानते हैं। एंगल्स ने परिवार शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा कि परिवार या फेमिली शब्द फेम्युलस (famulus) शब्द से बना है जहाँ फेम्युलस शब्द का अर्थ ‘घरेलू दास’ होता है। फेमेलिया शब्द का अर्थ एक व्यक्ति के सारे दासों का समूह होता है। रोमन लोगों द्वारा निर्मित इस सामाजिक संगठन फेमेलिया में उसके मुखिया के अधीन उसकी पत्नी, उसके बच्चे और कुछ दास होते थे। और रोमन पितृसत्ता के अंतर्गत उसके हाथों में इन लोगों की जिंदगी और मौत का अधिकार होता था। एंगल्स ने घर के मुखिया की निरंकुश सत्ता को इंगित करते हुए लिखा, “पत्नी के सतीत्व की रक्षा करने के लिए यानि बच्चों के पितृत्व की रक्षा करने के लिए नारी को पुरुष की निरंकुश सत्ता के अधीन बना दिया जाता है। वह यदि उसे मार भी डालता है तो वह अपने अधिकार का ही प्रयोग करता है।”[10] फ्रेडरिक एंगल्स ने निजी संपत्ति की अवधारणा के साथ ही स्त्री अधीनता के लिए स्त्रियों की उत्पादन में भागेदारी न होने को भी दोषी ठहराया। घरेलू श्रम के दायरे में सीमित हो जाने के कारण स्त्रियाँ सामाजिक उत्पादन के क्षेत्रों से दूर होती जाती हैं। एंगल्स मानते हैं कि, “जब तक स्त्रियों को सामाजिक उत्पादन के काम से अलग और केवल घर के कामों तक ही, जो निजी काम होते हैं, सीमित रखा जाएगा तब तक स्त्रियों का स्वतंत्रता प्राप्त करना और पुरुषों के साथ बराबरी का हक़ पाना असंभव है और असंभव ही बना रहेगा।”[11] परंतु एंगल्स के तर्कों की भी स्त्रीवादी विद्वानों द्वारा आलोचना की गई। लर्नर ने यह स्पष्ट किया कि ऐसा नहीं है कि विश्व की हर संस्कृति में घरेलू कार्यों की जिम्मेदारी मात्र स्त्री की ही होती है। क्रिश हर्मन मानती हैं कि स्त्री के इन्हीं घरेलू कार्यों की जिम्मेदारी उठाने से ही कृषि का विकास हुआ। स्त्रीवादी विद्वानों द्वारा एंगल्स की इसलिए भी आलोचना की गई क्यों कि उन्होंने मातृसत्ता और मातृवंशीयता को एक दूसरे का पर्याय समझा। इसके अतिरिक्त एंगल्स की निजी संपत्ति के आविर्भाव से स्त्री अधीनता के पथ पर अग्रसर हुई इस तथ्य को प्रायः सभी स्त्रीवादी विद्वानों द्वारा गलत साबित किया गया जिसमें मुख्यतः संरचनावादी मानवविज्ञानी क्लाउड मेलेसा, इतिहासकार गर्डा लर्नर तथा मानव विज्ञानी पीटर आबी प्रमुख हैं। इस प्रकार “आधुनिक मानवविज्ञानियों द्वारा बखोफेन और एंगल्स की आदिम समाज में मातृसत्ता के अस्तित्व की अवधारणा को निरस्त किया गया है। आधुनिक मानवविज्ञानी ‘मातृसत्ता’ की अपेक्षा ‘मातृस्थानिकता’ तथा ‘मातृवंशीयता’ शब्द को अधिक उपयुक्त मानते हैं।”[12] गर्डा लर्नर लिखती हैं कि, “मैं मातृसत्ता को पितृसत्ता के विलोम के रूप में परिभाषित कर सकती हूँ और इस परिभाषा के अनुसार मैं निष्कर्षतः यह कह सकती हूँ कि मातृसत्तात्मक समाज कभी भी अस्तित्व में नहीं रहे हैं।”[13] लर्नर की इस पुष्टि के साथ ही यह भी तथ्यात्मक सत्य है कि भारत में केरल के नायर संप्रदाय और पूर्वोत्तर भारत के गारो, खासी और जयंतिया समुदाय में ‘मातृस्थानिकता’ और ‘मातृवंशीयता’ के साथ ही ‘मातृसत्तात्मक व्यवस्था’ का प्रभाव भी देखा जा सकता है। गर्डा लर्नर ने अपनी पुस्तक ‘क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की’ में पितृसत्ता के विविध पक्षों पर गंभीर विचार किया है। लर्नर का मानना है कि पितृसत्ता को एक घटना के रूप में नहीं वरन प्रक्रिया के रूप में देखने की आवश्यकता है। पितृसत्ता उत्पन्न नहीं हुई वरन मानव सभ्यता के विकास के पथ पर ग्रसर होने के साथ क्रमशः निर्मित होती चली आई है। इसके पीछे किसी एक कारक की भूमिका न होकर विविध कारकों का हाथ है। लर्नर यह नहीं मानती कि पितृसत्ता एक सोची समझी साजिश का परिणाम है। लर्नर कहती हैं कि स्त्री- पुरुष के बीच का श्रम विभाजन आगे के वर्षों में स्त्री को अधीनता के पथ पर अग्रसर कर देगा इसका स्त्रिओं को जरा सा भी भान नहीं था। ‘सेपियंस’ पुस्तक के लेखक युवाल नोआह हरारी मानते हैं कि स्त्री और पुरुष को दो भिन्न- भिन्न खेमों में बाँटना यह ज्यादा कुछ सांस्कृतिक और काल्पनिक सत्य पर निर्भर करता है न कि जैव वैज्ञानिक सत्य पर। स्त्रीत्व और पुरुषत्व सामाजिक भिन्नताओं के साथ बदलता रहता है। किसी जीव के सेक्स का निर्धारण जीव विज्ञान के आधार पर किया जाता है किन्तु जेंडर या लिंग का निर्धारण सांस्कृतिक आधार पर किया जाता है। हरारी मानते हैं कि मानव विकास की प्रक्रिया में लगभग सभी समाज कृषि क्रांति के बाद से पितृसत्तात्मक ही रहे हैं। अतः हरारी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि “पितृसत्तात्मक व्यवस्था जैववैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित न होकर मिथकों पर आधारित है।”[14] संरचनावादी मानवविज्ञानी क्लाउड लेवी स्त्रास संस्कृति के निर्माण के लिए स्त्री- पराधीनता की आवश्यकता पर पर एक सैद्धांतिक व्याख्या देते हैं। “स्त्रास के अनुसार आदिम और खानाबदोश जनजातियों में स्त्रियों की अदला- बदली ही स्त्री- पराधीनता का मूल है।”[15] शेरी ऑटनर ने पितृसत्तात्मक व्यवस्था की उत्पत्ति और स्त्री पराधीनता पर अपना मत प्रस्तुत करते हुए 1974 के एक निबंध में लिखा था कि “अभी तक के सभी ज्ञात आदिम समाज में स्त्रियों का संबंध संस्कृति की अपेक्षा प्रकृति से ज्यादा प्रगाढ़ रहा है। लगभग प्रत्येक समाज एवं संस्कृति में मानव द्वारा विकास पथ पर अग्रसर होने में प्रकृति की उपेक्षा की गई है। जिसका सीधा असर स्त्रियों पर भी पड़ा है।[16]

इस प्रकार स्त्री- पराधीनता के मूल तथा पितृसत्तात्मक व्यवस्था की उत्पत्ति के संबंध में विभिन्न मत हैं। जिनका एक संक्षिप्त विवरण यहाँ प्रस्तुत किया गया है।

पितृसत्ता: व्यापकता

जब से स्त्री विमर्श के विद्वानों द्वारा स्त्री की दोयम स्थिति और उसके अधीनता के कारकों के रूप में पितृसत्ता को परिभाषित किया गया है तब से यदि देखा जाए तो पितृसत्ता की व्यापकता हमें जीवन के हर मोड़ पर दिखाई देगी। “ स्त्री का अपना होना और उस होने की प्रक्रिया की सारी अर्थवत्ता अब तक पितृसत्ता निर्धारित करती आई है। चूँकि कोई ‘दूसरा’ यानी पुरुष जाति उसका निर्धारण करती है इसलिए स्त्री की अपनी स्वायत्तता नहीं रहती। उसका वस्तुकरण हो जाता है। स्त्री के संदर्भ में यह एक ऐतिहासिक सच है।”[17] विश्व की प्रत्येक संस्कृति में इस सत्ता के पोषकों द्वारा स्त्रियों को हमेशा दब कर रहने की हिदायत दी जाती। धार्मिक रूप से भी इस सत्ता का सदैव समर्थन किया गया है। भारतीय धर्मशास्त्र की आधारशिला कही जाने वाली मनुस्मृति में पतिसेवा को ही स्त्रियों के अग्निहोत्र कर्म के तुल्य बताया गया है।[18] पति यदि सदाचारहीन, कामी या विधादि गुणों से हीन भी हो तो वह पूज्य है।[19] मुस्लिम धर्म ग्रंथ ‘सुरा बकारा’ की आयत 223 में स्त्री को उसके पति द्वारा चरने के लिए तैयार अनाज का खेत कहा गया है।[20] यह पितृसत्ता की व्यापकता ही है कि स्त्री चेतना के शुरूआती दौर में स्त्रियों को अपने मौलिक नागरिक अधिकारों के लिए भी संघर्ष करना पड़ा। चाहे वह वोट देने का अधिकार हो, चाहे वह संपत्ति में हिस्से का अधिकार हो या फिर तलाक लेने का अधिकार हो। 1929 में अपनी पुस्तक ‘ए रूम ऑफ वंस ओन’ में वर्जीनिया वूल्फ इस दोयम स्थिति के संदर्भ में एक प्रश्न पूछती हैं कि यदि शेक्सपियर की कोई बहन होती तो क्या उसे भी अपने कौशल को विकसित करने के वही समान अवसर मिलते जो शेक्सपियर को मिले थे?[21] स्त्री शिक्षा के सीमित अवसरों और संसाधनों की ओर इंगित करते हुए वर्जीनिया लिखती हैं कि, “आप (पितृसत्तात्मक समाज) चाहें तो अपने पुस्तकालयों पर ताला लगा सकते हैं। पर कोई दरवाजा, कोई ताला ऐसा नहीं है जिससे आप मेरी मानसिक स्वतंत्रता को अवरुद्ध कर सकें।”[22] वर्जीनिया वुल्फ के प्रश्न और कथन तब और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं जब स्वयं वर्जीनिया और उनकी बहन की शिक्षा- दीक्षा घर में ही संपन्न हुई जबकि उनके भाइयों को प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ने का अवसर मिला। सीमंतनी उपदेश की अज्ञात लेखिका 1882 में स्त्री- पुरुष की तुलना करते हुए महिलाओं पर थोपे गए धार्मिक पाखंडो, रीति- रिवाजों पर प्रश्न उठाती हैं।[23] बीसवीं सदी के शुरूआती दौर में महादेवी वर्मा अपने निबंधों के संग्रह ‘शृंखला की कड़ियाँ’ में स्त्रियों के मूल नागरिक अधिकारों की मांग करते हुए लिखती हैं कि “हमें न किसी पर जय चाहिए, न किसी से पराजय, न किसी पर प्रभुता चाहिए, न किसी का प्रभुत्व। केवल अपना वह स्थान, वे स्वत्व चाहिए जिनका पुरुषों के निकट कोई उपयोग नहीं है, परंतु जिनके बिना हम समाज का उपयोगी अंग बन नहीं सकेंगी। हमारी जागृत और साधन संपन्न बहनें इस दिशा में विशेष महत्वपूर्ण कार्य कर सकेंगी इसमें संदेह नहीं।”[24] स्त्री चेतना के फलस्वरूप स्त्री की सामाजिक दोयम स्थिति के विरोध में विभिन्न प्रयास किए जा रहे हैं। लिंग समानता के पुरजोर प्रयास किए जा रहे हैं परंतु इन लक्ष्यों में सबसे बड़ी बाधा पितृसत्तात्मक व्यवस्था की व्यापकता ही है। आज स्त्रियों के विरुद्ध होने वाले अधिकांश अपराधों के मूल में पितृसत्तात्मक व्यवस्था की वह मानसिकता ही है जो विभिन्न अपराधों द्वारा पुरुषों की स्त्रियों पर श्रेष्ठता साबित करना चाहती है।

निष्कर्ष:

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि पितृसत्ता पर हुए गहन अध्ययन के उपरान्त इसे सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक कहना उचित नहीं है और न ही इसे मानव सभ्यता के विकास का स्वाभाविक अंग समझना चाहिए। स्त्रीवादी विद्वानों ने मातृसत्ता के अस्तित्व को नकारने के साथ ही स्त्रियों के सदैव पराधीन रहने के तथ्य को भी नकारा है। स्त्रीवादी दृष्टिकोण से पितृसत्तात्मक व्यवस्था की जांच- पड़ताल का मुख्य उद्देश्य लिंग- समानता की स्थापना तथा किसी भी लिंग विशेष के आधिपत्य से मुक्ति है। इस दिशा में यदि सकारात्मक प्रयास किए जाएँ तो निश्चित रूप से एक ऐसी व्यवस्था उभर कर आएगी जो मातृसत्तात्मक अथवा पितृसत्तात्मक होने की अपेक्षा मानव संभावनाओं के सभी द्वारों को सभी के लिए समान रूप से खुला रखेगी।

*शोधार्थी

प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी, कोलकाता

9674380830

pooja.shukla2607@gmail.com

  1. फरहत खान एवं डॉ. अरुणा सेठी द्वारा लिखित आलेख, भारत में लिंग असमानता, Indian Streams Research Journal
  2. विजय झा द्वारा लिखित आलेख, पितृसत्ता: विमर्श के भीतर, कथादेश, मार्च 2019, पृ. सं.- 64
  3. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, भूमिका
  4. सैली स्लोकम का आलेख, आहार संग्रहकर्ता की भूमिका में स्त्री: मानवशास्त्र की पुरुषवादी दृष्टि, अनुवाद- रंजना श्रीवास्तव, कथादेश, मार्च 2019, पृ. सं.- 13
  5. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 22
  6. विजय झा द्वारा लिखित आलेख, पितृसत्ता: विमर्श के भीतर, कथादेश, मार्च 2019, पृ. सं.- 66
  7. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 19
  8. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, भूमिका
  9. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 26
  10. एंगल्स फ्रेडरिक, परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति, प्रगति प्रकाशन, मास्को, पृ. सं.- 73
  11. एंगल्स फ्रेडरिक, परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति, प्रगति प्रकाशन, मास्को, पृ. सं.- 208
  12. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 29
  13. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 31
  14. युवाल नोआह हरारी, सेपियंस, विंटेज प्रकाशन, लंदन, पृ. सं.- 178
  15. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 24
  16. लर्नर गर्डा, द क्रिएशन ऑफ पैट्रिआर्की, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, पृ. सं.- 26
  17. पितृसत्ता के नए रूप, संपादक: राजेंद्र यादव, प्रभा खेतान, अभय कुमार दूबे, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. सं.- 16
  18. मनुस्मृति, संपादक- पंडित हरिशंकर शास्त्री, साक्षी प्रकाशन, दिल्ली, पृ. सं.- 38
  19. मनुस्मृति, संपादक- पंडित हरिशंकर शास्त्री, साक्षी प्रकाशन, दिल्ली, पृ. सं.- 16
  20. अग्रवाल रोहिणी, साहित्य का स्त्री स्वर, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, पृ. सं.- 08
  21. वुल्फ वर्जीनिया , ए रूम ऑफ वंस ओन’, फिंगर प्रिंट क्लासिक, (प्रकाश बुक्स इंडिया)
  22. वुल्फ वर्जीनिया , ए रूम ऑफ वंस ओन’, फिंगर प्रिंट क्लासिक, (प्रकाश बुक्स इंडिया), पृ. सं.- 81
  23. सीमंतनी उपदेश, संपादक: डॉ. धर्मवीर, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
  24. वर्मा महादेवी, शृंखला की कड़ियाँ, लोकभारती पेपरबैक्स, इलाहबाद, पृ. सं.- 23-24

हिंदी नवजागरण और स्त्री-सुमित कुमार

0
five person sitting on concrete floor
Photo by elCarito on Unsplash

हिंदी नवजागरण और स्त्री

*सुमित कुमार

इतिहास साक्षी है कि स्त्रियों का शोषण विभिन्न कालों में भिन्न-भिन्न रूपों में होता आया है। यही कारण है कि आज 21वीं सदी में पूरे विश्व में नारी मुक्ति के आंदोलन जोर-शोर चल रहे हैं। भारत जैसे देश में परंपरागत रूप में यह देखा जाता है कि स्त्रियाँ आर्थिक रूप से पुरुषों पर निर्भर करती हैं और इस कारण वे स्वयं को प्राप्त अधिकारों से भी वंचित हो जाती हैं। साथ ही वे पुरुषों के अधीन होकर उनके अनुरूप ही जीवन निर्वाह करने पर विवश हो जाती हैं, चाहे वह उचित हो या अनुचित। एक पितृप्रधान समाज की यह विडंबना है कि वो स्त्रियों को अपने अधीन बनाए रखने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाता है। जैसे कि समाज में स्त्रियों पर कई प्रकार की पाबंदी लगाना, घर से बाहर न निकलने देना, उनके आचार-विचार और व्यव्हार पर पुरुषों की तुलना में कई नियम-कानून लागू करना। शिक्षा, जो सबके लिए अनिवार्य होनी चाहिए उससे भी स्त्रियों को वंचित करना और यदि शिक्षा दी भी जाए तो यह सिखाना कि वे एक आदर्श और पतिव्रता स्त्री कैसे बने आदि। हालाँकि समय के प्रवाह और स्त्री के अधिकार के संघर्ष से परिस्थितियाँ बदली हैं और यह बदलाव विशेषकर नवजागरण काल से शुरू होता है। जिसमें स्त्रियों के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक आदि क्षेत्रों में उनके अधिकार और योगदान को लेकर कई आंदोलन हुए। इस लेख में नवजागरण काल की विभिन्न स्थितियों पर नजर डालते हुए यह जानने की कोशिश की जाएगी कि स्त्रियों की दशा कैसी थी और उसमें सुधार किस प्रकार हुए और विशेषकर साहित्य का योगदान क्या रहा। सबसे पहले यहाँ भारतीय नवजागरण और हिंदी नवजागरण को जानना महत्त्वपूर्ण होगा।

पाश्चात्य से आए हुए शब्द ‘रेनेसां’ का हिंदी रूपांतरण ‘नवजागरण’ या ‘पुनर्जागरण’ है जिसका अर्थ है ‘फिर से जागना’। भारतीय नवजागरण की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कर्मेंदु शिशिर लिखते हैं, “भारतीय नवजागरण की शुरुआत के संकेत काफी पहले से मिले हैं, लेकिन सन् 1857  के बाद इसका तार्किक और व्यवस्थित स्वरूप स्पष्ट होने लगा। भारतीय भाषाओं में गद्य का विकास तेजी से हुआ और अपेक्षित आधुनिक विचारों के लेखन की शुरुआत हुई। इसकी मुख्य अवधारणा है, हिन्दू मुसलमानों की एकता, धार्मिक रूढ़ियों, पाखंडों का पर्दाफाश, भारतीय भाषाओं के वर्चस्व का आंदोलन, किसानों, देशी उद्योगों और कारीगरों की पक्षधरता, साम्राज्यवादी शोषण और लूट का विरोध, नारियों के उत्थान, दमन का विरोध, सामाजिक जड़ता के विरुद्ध प्रगतिशील और आधुनिक विचारों का वरण, विज्ञान, नई तकनीक और नए उद्योगों का आमंत्रण, भारतीय इतिहास की वास्तविक गरिमा की प्रतिष्ठा, व्यापक शिक्षा, अछूतोद्धार, भारतीय ज्ञान-विज्ञान की मीमांसा, औपनिवेशिक संस्कृति का विरोध। ”1

ये वो समय था जब भारत औपनिवेशिक सत्ता के अधीन था और विभिन्न आंतरिक समस्याओं से जूझ रहा था। समाज में बाल-विवाह, सती प्रथा जैसी क्रूर और अमानवीय व्यवस्थाएँ थीं। छोटी उम्र में शादी हो जाने की वजह से स्त्रियाँ पूर्ण रूप से पराश्रित होती थीं। उनका मानसिक विकास एक सीमा में बंधा हुआ था। उन्हें अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक नहीं थी। कम उम्र में शादी होने की वजह से वे कभी अपने स्वयं के आर्थिक उन्नति के बारे में सोच तक नहीं सकती थी। कभी किसी स्त्री का पति मर जाता तो उसे सती होने के नाम पर जबरन अग्नि में प्रवेश करवाया जाता था। इस तरह की अमानवीय कार्यों के विरोध के लिए कई समाज सुधारकों ने आन्दोलन चलाए। स्त्रियों की शिक्षा की बात की और उन्हें आदर-सम्मान और स्वाभिमान से जीने के लिए संघर्ष की प्रेरणा दी। उस समय भारत ही नहीं पूरे विश्व में स्त्रियों की स्थिति और उसमें सुधार करने के बारे में चर्चा करते हुए लेखिका राधा कुमार अपनी पुस्तक ‘स्त्री संघर्ष का इतिहास’ में लिखती हैं, “उन्नीसवीं सदी को स्त्रियों की शताब्दी कहना बेहतर होगा क्योंकि इस सदी में सारी दुनिया में उनकी(स्त्री) अच्छाई-बुराई, प्रकृति, क्षमताएँ एवं उर्वरा गर्मागर्म बहस का विषय थे। यूरोप में फ्रांसीसी क्रांति के दौरान और उसके बाद भी स्त्री जागरुकता का विस्तार होना शुरू हुआ और शताब्दी के अंत तक इंग्लैंड, फ्रांस तथा जर्मनी के बुद्धिजीवियों ने नारीवादी विचारों को अभिव्यक्ति दी। 19वीं सदी के मध्य तक रूसी सुधारकों के लिए ‘महिला प्रश्न’ केंद्रीय मुद्दा बन गया था जबकि भारत में खासतौर से बंगाल और महाराष्ट्र में समाज सुधारकों ने स्त्रियों में फैली बुराइयों पर आवाज उठाना शुरू किया।”2 इसके साथ ही श्रीमती धर्मा यादव जी अपने लेख ‘स्त्री विमर्श और हिंदी लेखन’ में लिखती हैं, “1975ई. पूरे विश्व में अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष के रूप में मनाया गया, जिसके परिणाम स्वरूप कोपहेगन में पहला अंतर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन, नैरोबी में दूसरा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन 1985 में और शंघाई में तीसरा 1995 में संपन्न हुआ। भारत में इस सम्मेलन की शुरुआत नवजागरण के साथ हुई। राजा राम मोहन राय ने 1818ई. में सती प्रथा का विरोध किया और उनके प्रयत्नों के फलस्वरूप 1829 में लॉर्ड विलियम बैंटिक ने सती प्रथा को गैरकानूनी घोषित किया। बाल-विवाह, विधवा-विवाह हो और बहुपत्नी प्रथा के विरुद्ध लड़ते हुए राजा राममोहन राय स्त्री के पक्षधर नजर आते हैं। स्वामी विवेकानंद और स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी स्त्री शिक्षा पर जोर दिया। इस प्रकार अमेरिका से शुरू हुआ यह आंदोलन भारत में स्त्री जाति की चेतना का स्वर बन गया।”3

उस काल में स्त्री का स्वयं अपने अधिकार के लिए जागना भी एक महत्वपूर्ण घटना थी, “बंगाल में राजा राममोहन राय ने ब्रह्म समाज की (सन् 1822ई.) स्थापना की। दूसरी ओर गुजरात में दयानंद सरस्वती का जन्म हुआ (सन्1824-83 ई.) और बम्बई से उन्होंने सन् 1875 ई. में ‘सत्यार्थ प्रकाश’ निकाला और सन् 1877ई. में लाहौर पंजाब में आर्य समाज की स्थापना की। बंगाल में ही श्री रामकृष्ण परमहंस (सन्1834-86) और विवेकानंद (सन् 1866 ई.) का जन्म हुआ। महाराष्ट्र में गोविंद रानाडे का प्रार्थना समाज (सन् 1867 ई.) प्रभावशाली था। कहना नहीं होगा कि यह सभी मूलतः धार्मिक-सांस्कृतिक आंदोलन थे। राष्ट्रवाद इनकी बनावट में शामिल था। लगभग-लगभग एक ही समय में इन महान विचारकों को केंद्र में रखे ये आंदोलन जन्मे और विभिन्न अंचलों में फैल गए। एक महत्वपूर्ण रेखांकित करने योग्य बात यह है कि इन सभी आंदोलनो ने ‘स्त्री विमर्श’ को मुख्य मुद्दा बनाया। सती प्रथा निषेध हो या विधवा विवाह प्रारंभ, सभी ने स्त्री गरिमा और स्वतंत्रता की बात की। इसका परिणाम यह हुआ कि स्त्री ने स्वयं को अपनी और अपने परिदृश्य के बारे में सोचना शुरू किया।”4

इसका प्रत्यक्ष उदाहरण ‘सीमंतनी उपदेश’ की लेखिका (एक अज्ञात हिन्दू औरत),पंडिता रमाबाई और ताराबाई शिंदे के रूप में हमारे समक्ष है। ताराबाई शिंदें जैसी लेखिका के बारे में आलोक श्रीवास्तव लिखते हैं, “आज जब उन्नीसवीं सदी के संपूर्ण सांस्कृतिक आलोड़न के स्वरूप और उसकी प्रकृति पर प्रश्न चिन्ह लग रहे हैं, उसकी ब्राह्मणवादी सीमाओं और बुर्जुआ हितों की परिधि स्पष्ट हो चुकी है, तब एक ऐसी रचना (स्त्री-पुरुष तुलना) दिखाई देती है, जिसने समाज के एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर उसी युग में इस वर्ग की सांस्कृतिक जागरण के अंतर्विरोधों की, इस वर्ग के नारी-संबंधी दृष्टिकोण में स्पष्ट शिनाख्त की, उसे चुनौती दी और उसकी भर्त्सना की।”5 ताराबाई शिंदे के बारे में वीरभारत तलवार जी लिखते हैं, “स्त्री-पुरुष तुलना किताब की लेखिका ताराबाई शिंदे उस दौर की दूसरी महत्वपूर्ण स्त्री थीं जिन्होंने भद्रवर्गीय पुरुष-सुधारकों के आन्दोलन की सीमाओं को न सिर्फ पार किया बल्कि उसकी कड़ी आलोचना भी की।”6 स्वयं ताराबाई शिंदे के क्रांतिकारी विचार कुछ इस तरह हैं जिसमें वे विधवा विवाह के बारे में लिखती हैं, “पुराणों में पुत्रहीन राजा की मृत्यु के उपरांत वंश वृद्धि के लिए उसकी रानी को पर पुरुष से नियोग की सम्मति दी गई है। क्या यह परद्वार नहीं ? व्यभिचार नहीं ? ऐसी सम्मति के बजाय पुनर्विवाह की अनुमति ही क्यों न दे दी गई ?”7 जहाँ एक और ताराबाई शिंदे अपने क्रांतिकारी विचारों को इस तरह व्यक्त करती हैं वहीं ‘सीमंतनी उपदेश’ की लेखिका अपना विरोध कुछ इस प्रकार जाहिर करती हैं, “हम सिवाय  चारदिवारी मकान के और कुछ नहीं देखतीं और हम चाहे  इसी को तमाम दुनिया ख्याल करें, चाहे इसी को हिंदुस्तान समझें। इसी जेल खाने में पैदा हुई हैं और इसी में मर जाएंगी।”8

उपर्युक्त बातों में भारतीय नवजागरण की मुख्य रूप से चर्चा की गई और अब हिंदी नवजागरण और उसमें स्त्रियों की स्थिति को जानने की कोशिश की जाएगी। हिंदी नवजागरण में भारतेंदु हरिश्चंद्र का स्थान महत्वपूर्ण माना जाता है। उस काल में भारतेंदु द्वारा किये गये कार्यों की सराहना करते हुए डॉ. नगेन्द्र लिखते हैं, “भारतेंदु हरिश्चंद्र ने जनता को उद्बोधन प्रदान करने के उद्देश्य से ‘जातीय संगीत’ अर्थात लोकगीत की शैली पर सामाजिक कविताओं की रचना पर बल दिया। मातृभूमि-प्रेम, स्वदेशी वस्तुओं का व्यव्हार, गोरक्षा, बालविवाह, निषेध, भ्रूण-हत्या की निंदा आदि विषयों को कविगण (भरतेंदु मंडल ) अधिकाधिक अपनाने लगे थे। राष्ट्रीय भावना का उदय भी इसी काल की अन्य विशेषता है।”9

हिंदी नवजागरण में भारतेंदु की अहम् भूमिका को बताते हुए कर्मेंदु शिशिर लिखते हैं, सन 1857 में जिस संक्षिप्त आक्रोश का विस्फोट हुआ उसी के गर्भ से नवजागरण का उदय हुआ। इसकी गूंज न सिर्फ भारतीय भाषाओं में बल्कि लोक भाषाओं तक में सुनाई पड़ती है। हिंदी में इस नवजागरण का नेतृत्व भारतेंदु हरिश्चंद्र ने किया जब वह सन 1873ई. में हिंदी के नए चाल में चलने की बात करते हैं, तो वस्तुतः भारतीय मानस के नए करवट की चर्चा करते हैं। यह करवट भाषा का ही नहीं, विचारों की भी थी। यह भारत में चिंतन का ऐसा संधिकाल था जब एक ओर आधुनिकता का प्रवेश हो रहा था तो दूसरी ओर पुरानी परम्पराएँ टूट रही थीं। आधुनिकता, वैज्ञानिकता और नए राष्ट्रीय विचारों का तेजी से प्रसार हुआ। जिस बदलते समय में लेखकों के सामने नई चुनोती थी कि वह आगे बढ़ कर रूढ़िवादी विश्वासों का विरोध करते तथा नए परिवर्तनों का अलख जगाते। भारतेंदु ने अपने मंडल के तमाम लेखकों के साथ इन चुनौतियों से सार्थक संवाद किया। इस सार्थक संवाद का आधार था परंपरा का विवेक सम्मत विरोध और विवेक सम्मत स्वीकार।”10

भारतेंदु स्त्री शिक्षा के पक्षधर थे और इसी कारण उन्होंने कई प्रयास भी किये, जिससे स्त्री शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए। उदाहरण के तौर पर उन्होंने ‘बालाबोधानी’ नामक पत्रिका स्त्रियों के लिए निकली थी। परन्तु भारतेंदु जिस स्त्री शिक्षा की बात करते थे उनकी आलोचना करते हुए वीर भारत तलवार जी ने अपनी पुस्तक ‘रस्साकशी’ में भारतेंदु और हंटर कमीशन के बीच हुए बातचीत को बताते हैं, “भरतेंदु ने लड़कियों की शिक्षा के लिए आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की जगह चरित्र निर्माण, धार्मिक और घरेलू प्रबंध के बारे में बताने वाली किताबें पाठ्यक्रम में लगाने के लिए कहा।”11 तलवार जी आगे लिखते हैं, “सिर्फ शिक्षा के प्रसंग में ही नहीं, विधवा विवाह के सवाल पर, पुरानी विवेकहीन रूढ़ियों को तोड़ने के प्रश्न पर और धार्मिक सुधारों के मामले में भी समाज में ऐसी ही उथल-पुथल मची थी, तीखा असर छोड़ने वाली तनावपूर्ण घटनाएँ घटी थीं जिससे इन घटनाओं और उथल-पुथल में भाग लेनेवाले मानवीय चरित्रों के अपार साहस और दृढ संकल्प का पता चलता है। अपने बलिया वाले भाषण में सुधारों के लिए साहस भरे संघर्ष की ज़रूरत पर जोर देते हुए भारतेंदु ने कहा था कि जब तक सौ दो सौ मनुष्य बदनाम न होंगे, जात से बहार न निकाले जाएंगें, दरिद्र न हो जाएँगे, वरंच जान से न मारे जाएँगे, तब तक कोई भी देश न सुधरेगा।”12

जहाँ एक ओर नवजागरण काल में स्त्रियों को लेकर लेखकों में कई रूढ़ियाँ दिखी, वहीं कुछ ऐसे सकारात्मक परिणाम भी दिखे जिसने स्त्री संघर्षों को और मजबूती प्रदान की। इन सकारात्मक पहल को हम श्रीमती धर्मा यादव के इन शब्दों में देख सकते हैं जो स्त्रियों के लिए सकारात्मक पहल थी उस काल की। वे लिखती हैं , “स्त्री मुक्ति का अर्थ पुरुष हो जाना नहीं है। स्त्री की अपनी प्राकृतिक विशेषताएँ हैं, उनके साथ ही समाज द्वारा बनाए गए स्त्रीत्व के बंधनों से मुक्ति के साथ, मनुष्यत्व की दिशा में कदम बढ़ाना, सही अर्थों में स्वतंत्रता है। स्त्री को अपनी धारणाओं को बदलते हुए, जो भी घटित हुआ, उसे नियति मानने की मानसिकता से उबरने की आवश्यकता है, लेकिन साथ ही पुरुष वर्ग को ही दोषी मानकर कटघरे में खड़े करने वाली मनोवृत्ति बदलनी होगी। स्त्रियों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले तथा अपने लेखन व प्रकाशन के द्वारा स्त्री हित विचारने वाले पुरुषों के अमूल्य योगदान को हम विस्मृत नहीं कर सकते।”13 वे कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हुए आगे लिखती हैं, “हिंदी में पहला स्त्री काव्य संकलन ‘मृदुवाणी’ (1905) शीर्षक से मुंशी देवी प्रसाद ने प्रकाशित करवाया। इसमें 35 कवित्रियों की कविताएँ शामिल थीं। इसके बाद गिरिराज दत्त शुक्ला और ब्रजभूषण शुक्ल ने ‘हिंदी काव्य कोकिलाएँ’ (1933) कृति संपादित कर प्रकाशित की। ज्योति प्रसाद मिश्रा निर्मल के प्रकाशन में ‘स्त्री कवि संग्रह’ (1938) में प्रकाशित हुआ। यह संभवतः ‘स्त्री साहित्य’ पाठ्यक्रम के लिए तैयार किया गया था। इनके अतिरिक्त नामवर सिंह के प्रधान संपादकत्व में हिंदी कथा लेखिकाओं की ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ (1984) एवं रमणिका गुप्ता संपादित ‘आधुनिक महिला लेखन’ (1985) महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं। स्त्री चेतना में पत्र-पत्रिकाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। पहली पत्रिका 1874 में भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा प्रकाशित ‘बाला-बोधनी’ थी। इसके अतिरिक्त ‘अर्पणा’, ‘आम-आदमी’, ‘हंस’, ‘मानुषी’, ‘निमित्त’, ‘उत्तरार्ध’, ‘उद्भावना’, ‘साक्षात्कार’ आदि पत्रिकाओं में स्त्री अंक प्रकाशित हुए।”14

हिंदी नवजागरण काल स्त्रियों के लिए, उनकी मुक्ति के संघर्ष के लिए एक शुरुआत थी जिसे पिछले सौ वर्षों से अधिक में देखा गया है। स्वयं स्त्रियाँ भी इसके लिए प्रयासरत रहीं। यही कारण है कि आज नारीवादी साहित्य महिलाओं के हर अधिकारों की मांग करता है जो उसे मिलना चाहिए। हिंदी की कुछ प्रमुख नारी-विमर्श की पुस्तकें तथा लेखिकाएँ इस प्रकार हैं, “बाधाओं के बावजूद नयी औरत’ (उषा महाजन,2001), ‘स्त्री सरोकार’(आशारानी व्होरा,2002), ‘उपनिवेश में स्त्री’ (प्रभा खेतान 2003 ), ‘हम सभ्य औरतें’ (मनीषा, 2002), ‘स्त्रीत्व विमर्श : समाज और साहित्य’ (क्षमा शर्मा, 2002), ‘स्वागत है बेटी’ (विभा देवसरे , 2002), ‘स्त्री-घोष’ (कुमुद शर्मा, 2002 ), ‘औरत के लिए औरत’ (नासिर शर्मा, 2003 ), ‘खुली खिड़कियाँ’, (मत्रेयी पुष्पा, 2003 ), ‘हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’(सुमन राजे ) इत्यादि।”15

इन सभी लेखिकाओं ने नारीवादी साहित्य को पुष्ट किया है तथा विभिन्न विषयों पर इनकी रचनाएँ हैं जो स्त्री के मंगल की कामना करती हैं। इन समकालीन लेखिकाओं के अलावे हिंदी साहित्य में कई ऐसी स्त्रियाँ हुईं जिन्होंने अपनी लेखनी द्वारा दिखाया कि वे भी सृजन की क्षमता रखती हैं और नवजागरण कालीन पुरुषवादी मानसिकता को चुनौती दी। इनमे राजेंद्र बालाघोष (बंग महिला ), सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेवी वर्मा तथा कई ऐसी लेखिकाएँ शामिल हैं और आज लेखिकाओं की बड़ी संख्या पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं, और अपनी भागीदारी न सिर्फ साहित्य में बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में दर्ज करा रही हैं।

उपर्युक्त व्याख्या में हिंदी नवजागरण काल में स्त्रियों की स्थिति को जानने की कोशिश की गई। जिसमें भारतीय नवजागरणकालीन समाज में मुख्यतः ब्रह्मसमाज, प्रार्थनासमाज, आर्यसमाज, रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद के विचारों तथा थियोसॉफिकल सोसाइटी के सिद्धांतों का प्रभाव भी जनजीवन पर पड़ रहा था, और समाज में एक बड़े बदलाव लाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। आर्थिक, औद्योगिक और धार्मिक क्षेत्रों में पुनर्जागरण की प्रक्रिया आरंभ होने लगी थी। पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली ने शैक्षिणिक क्षेत्र में भी वैयक्तिक स्वतंत्रता की प्रेरणा प्रदान की। स्त्रियों से जुड़ी विभिन्न समस्याएँ जैसे सामाजिक, आर्थिक और राजनितिक समस्याओं को समझने का प्रयास किया गया कि किस तरह स्त्रियाँ एक गुलामी की ज़िन्दगी जी रही थीं। उस समय में भारतन्दु जैसे लेखक भी रूढ़िवादिता से ग्रस्त नज़र आते हैं। साहित्यकार तक नारी के भलाई की बात तो करता था, परन्तु उसे परतंत्र ही रखना चाहता था। लेकिन स्त्रियाँ स्वयं ही अपने अधिकारों की मांग करने लगीं तथा उनके द्वारा पुरुषवादी सत्ता का विरोध भी उस काल में देखने को मिलता है। सती प्रथा, विधवा विवाह, बाल विवाह जैसे अनेकों मुद्दे उस काल के प्रमुख विषय थे जिसने आगे स्त्री मुक्ति के आन्दोलन का रूप लिया।

सन्दर्भ :-

  1. शिशिर, कर्मेंदु (संपादक), ‘हिंदी नवजागरण’ (राधाचरण गोस्वामी), स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली , प्रथम संस्करण 2013, पृष्ठ– 12.
  2. कुमार, राधा, ‘स्त्री संघर्ष का इतिहास’, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2002, आवृति– 2011, पृष्ठ- 23.
  3. यादव, श्रीमती धर्मा, ‘स्त्री विमर्श और हिंदी लेखन’ (लेख), www.strivimarsh.blogspot.in
  4. राजे, सुमन, ‘हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’. भरतिय ज्ञानपीठ , नई दिल्ली , चौथा संस्करण– 2011, पृष्ठ-227.
  5. शिंदे, ताराबाई, ‘स्त्री-पुरुष तुलना’, संवाद प्रकाशन, शास्त्रीनगर, मेरठ, प्रथम संस्करण2002, पृष्ठ-8.
  6. तलवार, वीरभारत, ‘रस्साकशी’, (19 वीं सदी का नवजागरण और पश्चिमोत्तर प्रान्त, सारांश प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2002, पृष्ठ- 236.
  7. शिंदे, ताराबाई, ‘स्त्री-पुरुष तुलना’, संवाद प्रकाशन, शास्त्रीनगर, मेरठ, प्रथम संस्करण2002, पृष्ठ-8.
  8. डॉ. धर्मवीर(संपादक), ‘सीमंतनी उपदेश’ (एक अज्ञात हिन्दू औरत ), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम मूल संस्करण 1982, लुधियाना से, वर्त्तमान आवृति-2006, पृष्ठ-44.
  9. डॉ. नगेन्द्र, डॉ. हरदयाल (संपादक), ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1973, आवृति- 2012, पृष्ठ-439.
  10. शिशिर, कर्मेंदु (संपादक), ‘हिंदी नवजागरण’ (राधाचरण गोस्वामी), स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2013, पृष्ठ – 13.
  11. तलवार, वीरभारत, ‘रस्साकशी’, (19 वीं सदी का नवजागरण और पश्चिमोत्तर प्रान्त, सारांश प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2002, पृष्ठ- 42.
  12. वही , पृष्ठ-54.
  13. यादव, श्रीमती धर्मा, ‘स्त्री विमर्श और हिंदी लेखन’ (लेख) www.strivimarsh.blogspot.in
  14. वही
  15. डॉ. नगेन्द्र, डॉ. हरदयाल (संपादक), ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1973, आवृति- 2012, पृष्ठ-432.

*पीएच.डी., हिन्दी अध्ययन केंद्र

गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, गांधीनगर

पता- फ़्लैट न. 89/09, ‘च’ टाइप, सेक्टर- 20

गांधीनगर, पिन- 382021

ईमेल- sumitk2004@gmail.com

मो. 8866508887, 9718817368

दुनियाँ लगे अलाव

0
कैसा खेला धूप ने, यह अजीब सा दाँव
पहले वृक्ष सुखा दिये, ढूंढ़ रही अब छाँव
किरणें दिखलाने लगी , अपना रूप प्रचंड़
मौसम के आदेश पर , हमे दे रही दंड़
सूरज तपता देखकर , गई बसंत बहार
रूखा सूखा हो चला , नदियों का व्यवहार
तनहा सूरज धूप से, कैसे करे बचाव
अंतस मे जब आग हो, दुनियाँ लगे अलाव
सूर्य देव के क्रोध को, मौसम की पहचान
ठंड़ा पड़ता शीत में,  चढ़ता ग्रीष्म उफान
सूरज का चाबुक चला नदियाँ हुई लकीर
ताल तड़ाग सूख गये, नयन बचा बस नीर
हरा भरा पथरा गया, फैली रेत ही रेत
झुलसे झुलसे लोग हैं, सूखे सूखे खेत
भानु भट्टी भभक रही, धरा तपे बेभाव
जले भुने जो विगत से,उन पर कहाँ प्रभाव ?
-ओम प्रकाश नौटियाल
(सर्वाधिकार सुरक्षित )
https://www.amazon.in/s?k=om+prakash+nautiyal

विश्व पर्यावरण दिवस -2021

0
 अमेरिका के पूर्व राष्ट्र्पति अब्राहम लिंकन ने एक बार पाखंडी शब्द को परिभाषित करते हुए कहा था – “यह मुझे उस व्यक्ति की याद दिलाता है जो अपने माता पिता का वध करने के बाद अदालत में यह कहकर दया की भीख माँगता है कि वह अनाथ है ।” कुछ यही हाल आज हमारा है हम वर्षों से पर्यावरण की निर्मम हत्या करते हुए  अब भगवान से हमें विष कूप से बाहर निकालने की प्रार्थना कर रहे हैं जो हमने तथाकथित विकास के नाम पर अपने लिए स्वयं तैयार किया है । हमारा साँसे आज सुरक्षित नहीं हैं । पर्यावरण के निरंतर ह्वास की चिंता भी बहुत पुरानी है किंतु इस विषय में गोष्ठियों, भाषणो अथवा कहीं कही  यदा क्दा किए गए छुट मुट प्रयासों से अधिक कुछ विशेष नहीं हुआ है हाँ चिंता के उद्‍घोष  में बुलंदी अवश्य आई है ।
आज से 49 वर्ष पहले स्वीडन की राजधानी स्टाकहोम में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पर्यावरण और प्रदूषण पर पहला अंतराष्ट्रीय सम्मेलन 5 जून से 16 जून तक आयोजित किया गया था इसी सम्मेलन में , जिसमें 119 देशों ने भाग लिया था  , संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का गठन किया गया था जिसका नारा  था- “केवल एक पृथ्वी”। तभी से हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस हर वर्ष नए थीम के साथ  मनाया जाता है ।  2018, 2019 , 2020  में यह  थीम्स क्रमशः इस प्रकार  थी -बीट प्लास्टिक पॉल्यूशन, वायु प्रदूषण एवं जैव विविधता ।
इस वर्ष अर्थात 2021 में ,शायद कोरोना महामारी में पर्यावरण असंतुलता का भारी योगदान देखते हुए, थीम है ‘Ecosystem Restoration’  यानि जिसका पारिस्थितिक तंत्र  की पुनर्बहाली । इस थीम का उद्देश्य है – नष्ट प्रायः हो चुके पारिस्थितिक तंत्र को  पुनर्जीवित करने का यथा संभव प्रयास करना तथा  उन पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण करना ,जो  अभी बरकरार हैं, किंतु जिन्हे अत्यंत देखभाल की आवश्यकता है । पर्यावरण के प्रति हर व्यक्ति का सजग होना अत्यंत आवश्यक है । बाढ़, भूकम्प, भूस्खलन आदि आपदाओं की तीव्रता कम करने के लिए वृक्ष लगाने और उनकी देखभाल करना सभी का कर्तव्य है तभी हम भावी पीढी को अच्छा पर्यावरण धरोहर के रूप में सौंप सकते हैं ।
लिए कुल्हाड़ी हाथ में, आया अंध विकास
बिन देर कर बिछा गया, शत वृक्षों की लाश ,
वृक्षों की रक्षा करें , नई लगाएं पौध 
तब ही निकट भविष्य में, ले पाएंगे श्वास !!
-ओंम प्रकाश नौटियाल
https://www.amazon.in/s?k=om+prakash+nautiyal