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साक्षात्कार

वरिष्ठ कवि दिविक रमेश से बैंगलोर विश्वविद्यालय के सेवानिवृत प्रो0 टी० प्रभाशंकर की बातचीत

बाल साहित्य के क्षेत्र में मॆंने दिविक रमेश के नाम से ही प्रवे श किया था -संभवत: 1980 में । मेरी पहली बाल कविता धर्मयुग में प्रकाशित हुई थी । 12 फरवरी, 1978 के अंक में ।

चौथे सप्तक के कवि एवं पश्चिम बंगाल के प्रतिनिधि हिंदी उपन्यासकार स्वदेश भारती जी से बातचीत

कविता लेखक के रूप में ही लगभग एक दशक 1965 से 1980 तक चर्चित रहा | 1979 में चौथा सप्तक प्रकाशित हुआ | अज्ञेय ने कई बार कई संदर्भो में कहा- मैं आपकी कविता का पाठक रहा हूँ |

प्रसिद्ध साहित्यकार व आलोचक डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय जी से बातचीत

हम न केवल हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए प्रयास कर रहे हैं अपितु हम लगातार भारत सरकार से यह आग्रह कर रहे हैं कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाई जाए।

‘‘आवारा लड़की को पता ही नहीं था कि आवारा कैसे हुआ जाता है?”- मैत्रेयी पुष्पा

‘नारी-विमर्श‘ का नाम तो बेकार लिया जाता है। मैंने ‘नारी-विमर्श‘ के लिए लेखन नहीं किया था। ना मैं जानती थी ‘नारी-विमर्श‘। ‘नारी-विमर्श‘ करने से स्त्रियों की स्थिति बहुत अच्छी हो जाएगी, ऐसा कह नहीं सकते, लेकिन हाँ, थोड़ी सी एक चेतना तो जागती है, उसे पढ़कर कि हमारे अधिकार क्या होने चाहिए? हमारा हक़ क्या होना चाहिए?

नारी कहीं भी, कभी भी कमजोर नहीं – डॉ. सुशीला टाकभौरे

समतावादी दलित साहित्यकार के रूप में विख़्यात, नर्मदा-अंचल की बेटी डॉ. सुशीला टाकभौरे जी से बातचीत के प्रमुख अंश

कथाकार भगवानदास मोरवाल से डॉ. एम. फीरोज अहमद की बातचीत

मुझे ऐसा लगता है कि पुरुषों द्वारा सदियों से स्त्री का दमन होता रहा है, ऐसी रस्मों में गाली उसकी परिणति है। इस रस्मों का किसी धर्म से कोई लेना-देना है, ये समाज में पनपी उन्हीं चलनों का अतिक्रमण है, जिन्हें स्त्रियों पर ज़बरन थोपा गया है। यहाँ एक बात कह दूँ कि अश्लीलता वास्तव में हमारी समझ और नज़र का फ़र्क है। 

उषा गांगुली से साक्षात्कार

उषा गांगुली, जन्म- 1945, जोधपुर आप कोलकाता में रहकर हिंदी रंगकर्म करती हैं। आपने 1976 में ‘रंगकर्मी’नामक अपनी नाट्य –संस्था की स्थापना की। उषा गांगुली द्वारा अभिनीत एवं निर्देशित प्रमुख नाटकों में महाभोज, लोककथा, होली,खोज, वामा, बेटी आई, मय्यत, रुदाली, मुक्ति और काशीनामा इसके अलावा आपने ब्रेख्त के नाटक ‘मदर करेज’ को ‘हिम्मतमाई’ के नाम से निर्देशित एवं स्वयं माँ की भूमिका को निभाया। ‘माँ’ की सजीव भूमिका के लिए 1982 -83 में सरकार द्वारा आपको ‘लेबदेब’ पुरस्कार से नवाजा गया। आपको 1998 में आपको संगीत नाटक अकादमी ने श्रेष्ठ निर्देशक के रूप में पुरस्कृत किया साथ ही उ.प्र.संगीत नाटक अकादमी ने सफ़दर हाशमी पुरस्कार से नवाजा।

साक्षात्कार- लन्दन के बहुचर्चित प्रवासी साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा जी से डॉ.सुमन सिंह की बातचीत

वासी साहित्य जगत का चर्चित, प्रतिष्ठित और बहुपठित नाम है 'तेजेन्द्र शर्मा '। लन्दन में रहकर विगत कई वर्षों से साहित्य-सेवा के साथ-साथ कथा -यूके की स्थापना करके हिन्दी-उर्दू और पंजाबी साहित्य के प्रचार -प्रसार में तेजेन्द्र जुटे हैं।

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