Home साक्षात्कार वरिष्ठ कवि दिविक रमेश से बैंगलोर विश्वविद्यालय के सेवानिवृत प्रो0 टी० प्रभाशंकर की बातचीत

वरिष्ठ कवि दिविक रमेश से बैंगलोर विश्वविद्यालय के सेवानिवृत प्रो0 टी० प्रभाशंकर की बातचीत

वरिष्ठ कवि दिविक रमेश से बैंगलोर विश्वविद्यालय के सेवानिवृत प्रो0 टी० प्रभाशंकर की बातचीत

वरिष्ठ कवि दिविक रमेश से बैंगलोर विश्वविद्यालय के सेवानिवृत प्रो0 टी० प्रभाशंकर की बातचीत

प्रो० टी०प्रभाशंकर: दिविक जी आप हिन्दी के वरिष्ठ ऒर प्रतिठित कवि हॆं । आप की ख्याति देश ऒर विदेश में हॆ । आपने कब लिखना शुरु किया ऒर अपनी रचनाओं के प्रारम्भ के बारे में बताएं ।

डॉ०दिविक रमेश: सबसे पहले तो मेरे लिए प्रयुक्त विशेषणों के लिए आभार व्यक्त करता हूं । थोड़ा बता दूं कि मेरा जन्म 1946 में दिल्ली के एक गांव “किराड़ी’ में माता श्रीमती कलावती ऒर पिता श्री चन्द्रभान के यहाँ हुआ था । किराड़ी गाँव हरियाणा की सीमा पर हॆ अत: वहाँ की बोली आदि हरियाणवी हॆ । मेरे पिता को लोक गायकी का बहुत शॊक था । स्वांग (सांग) से भी जुड़े थे । मेरे दादा पंडित यादराम पुराणों आदि के अध्येता थे ऒर हम बच्चों को पॊराणिक कहानियां सुनाया करते थे । पाँचवी कक्षा पास करने के बाद मुझे अपने नाना-नानी के पास दिल्ली शहर में भेज दिया गया । उसके बाद से मॆं शहर में ही हूं । मेरे नाना पंडित शिवकुमार भारद्वाज साहित्यिक अभिरुचि के व्यक्ति थे । उनके पास बहुत सी पुस्तकें थीं जिन्हें मॆं भी पढ़ता था । मेरी बड़ी मामी मुझे लाल बुझक्कड़, शेखचिल्ली आदि की

कहानियां सुनाती थीं । हमारे यहां हिन्दी के अखबार आते थे जिनमें बाल साहित्य छपा होता था । मॆं वह सब निरन्तर पढ़्ता था । इन सब का प्रभाव मुझ पर ज़रूर पड़ा होगा । जब मैं बालक था, लगभग 13-14 वर्ष का, तो मैंने लिखना शुरू किया। जब मैं बड़ा हुआ तब भी लिखता रहा। लेकिन जब मैं और बड़ा हुआ और मेरा लिखा खूब प्रकाशित भी होने लगा तो मेरा ध्यान बच्चों के लिए लिखने के प्रति भी दिलाया गया। प्रारम्भ में, जहाँ तक कविता का सवाल है, मुझे मेरे मित्र, घर-परिवार के सदस्य, गाँव में स्थित गाय आदि लिखने को प्रेरित करते थे। वे ही मेरे विषय थे। वे रचनाएँ उन्हें सुनाकर मुझे बहुत अच्छा लगता था। तब तक छपने की ओर कोई ध्यान नहीं था। इस बीच, न जाने कैसे, फिल्में देखने का चस्का लग गया। फिल्मी गाने मुझे बहुत अच्छे लगते थे – खासतौर पर रूलाने वाले। फिल्मी गाने यूँ मैं आज भी सुनना पसन्द करता हूँ। ख़ैर। फिल्मी गाने सुन कर मुझे भी वैसे ही गाने लिखने को मन होता। नाटक में देखे हुए पात्रों की नकल तो पहले ही करता था अब फिल्मी अभिनेताओं से भी प्रभावित होने लगा।

बी.ए. करने के लिए अजमेरी गेट, दिल्ली स्थित दिल्ली कॉलिज (सांध्य) में प्रवेश लिया। उन्हीं दिनों हमारे एक अध्यापक थे डॉ०.गंगा प्रसाद विमल। वे भी करौलबाग में रहते थे और उनकी कविताएँ, कहानियाँ आदि, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपती थीं, उनसे भी सम्पर्क हुआ। अब तक मैं गीत या लयात्मक कविता लिखता था। उनके करीब गया तो उन्होंने एक ओर जहाँ छन्द मुक्त (फ्रीवर्स) कविता लिखने को कहा वहीं रचनाएँ पढ़ने की भी सलाह दी। साथ ही लम्बी कविता लिखने का सुझाव भी दिया। उन्हीं की प्रेरणा से मैंने ‘फ्री वर्स’ लिखना शुरू किया।

मेरा स्वभाव, जहाँ तक सृजन करने का सवाल है, अपने निजी सुख-दुःख की बुनियाद पर, अपने से बाहर की दुनिया के सुख-दुःख देखने का रहा है। मेरे अनुभव के निजी-प्रसंग मुझे कविता के लिए केवल तब प्रेरित कर सके हैं जब उनमें विशिष्ट से सामान्य होने की क्षमता-संभावना पैदा हुई है। यह बात अलग है कि अनुभव की निजता मेरे लिए सृजन का एक लगभग अनिवार्य कारण रही है। यही कारण है कि मैं सामाजिक कही जा सकने वाली रचनाएँ अधिक कर सका और बावजूद सहज किशोर या युवा आकर्षणों के जैसी कविताएँ बहुत कम लिख सका जिन्हें कोमल भावों की कविताएँ कह सकते हैं। यूँ भी, आकर्षण-सम्बद्ध दुविधा की स्थिति से उबर कर किसी निर्णयात्मक स्थिति में न पहुँचने के कारण सृजन की प्रेरणा तो बने होंगे लेकिन स्पष्ट अभिव्यक्ति के नहीं।

अब सोचता हूँ तो प्रेम-कविता न लिख पाने का कारण घर-परिवार के वे संस्कार रहे जो एक आयु के बाद लड़के-लड़की के बीच बात करना भी उचित नहीं मानते थे। यह बात अलग है कि मेरा मन भीतर ही भीतर वैसे संस्कारों के प्रति विद्रोही बन रहा था। शायद मेरा प्रेम-विवाह भी उसी विद्रोह का प्रतिफल कहा जा सकता है। मेरे पहले संग्रह की कविताएँ अधिकतर मेरे विरोधी मन की ही अभिव्यक्तियाँ हैं जिनमें नकार का स्वर प्रमुख है। गाँव से आने के बाद शहर से जो संघर्ष करना पड़ा उसकी भी अभिव्यक्तियाँ वहाँ मौजूद हैं। जो, अपनी निष्ठा के बावजूद नहीं मिल सका, उसको लेकर अपने आपको समझाने से सम्बद्ध अभिव्यक्तियाँ हैं। बँधे संस्कारों ने एक फ़ायदा ज़रूर पहुँचाया। उन्होंने मुझे भाषा के उस स्वरूप से बचाया जो अकविता के कितने ही कवियों को उस समय प्रिय था, और वह फैशन में भी था। मैं वैसे शब्द नहीं लिख सकता था। हांलाकि कुछ न कुछ प्रभाव तो था । मेरा पहला कविता संग्रह “रास्ते के बीच” 1977 में प्रकाशित हुआ था ऒर इसके लिए कविताओं का चयन कवि शमशेर बहादुर सिंह ने किया था । यह संग्रह अत्यधिक चर्चित रहा था । बाद में त्रिलोचन जी के साथ ने मेरी कविता-धारा को जैसे मोड़ ही दिया। ‘खुली आँखों में आकाश’(पहला संस्करण;1983) नाम का मेरा दूसरा कविता-संग्रह त्रिलोचन जी की महीन छलनी में छन कर आया। ऒर मेरे लिए यह भी गॊरव की बात रही कि इन पहले ही संग्रहों को “सोवियत लॆंड नेहरू” जॆसे उस समय के अत्यंत प्रतिष्ठित पुरस्कार/सम्मान के योग्य भी समझा गया । अर्थात मॆं कवि के रूप में उभर कर आने का मेरा समय 20 वीं शताब्दी का आँठवा दशक रहा । ऎतिहासिक दृष्टि से मेरी निगाह में मेरी पहली ठीक-ठाक कविता ’एक सूत्र’ कही जा सकती हे जो 1970 में कलकत्ता से प्रकाशित होने वाली लघु पत्रिका “मणिमय” में प्रकाशित हुई थी । बाद में यह कविता 1970 में ही लोकभारती से प्रकाशित कविता-संग्रह “दिविक” में प्रकाशित हुई थी जिसकी भूमिका में डॉ० नगेन्द्र ने लिखा था,”प्रस्तुत संकलन की कविताएं उस प्रवृति की ओर उन्मुख हॆं, जिसे सामान्यत: ’नयी’ कविता कहा जाता हॆ ।”

प्रो० प्रभाशंकर: आपने ’दिविक’ संग्रह की बात की । यह बताइए कि आपका यह ’दिविक’ काव्य नाम कॆसे पड़ा ऒर दिविक का कोई विशेष अर्थ ?

दिविक रमेश :मेरी साहित्यिक सक्रियता प्रारम्भ में, दिविक, मुट्ठियों में बंद आकार और दूसरा दिविक आदि के माध्यम से काफ़ी बनी हुई थी। दिविक को छोड़ शेष दो का तो मैं सम्पादक भी था। ‘मुठ्ठियों में बंद आकार’ तक मैं अपने मूल नाम ‘रमेश शर्मा’ के नाम से लिखता-छपता था। हालांकि मुझसे ज़्यादा प्रसिद्ध उन दिनों कंक के सम्पादक रमेश शर्मा थे। मॆं 1970 में दिल्ली के एक महाविद्यालय में प्राध्यापक नियुक्त हुआ । वहाँ मेरे वरिष्ठ सहयोगी थे- डॉ० नरेन्द्र कोहली । गोष्ठियां करते थे ऒर ’अतिमर्श’ नाम की पत्रिका भी निकालते थे। उन्हीं की सोच ऒर सहयोग से मेरा नया नामकरण हुआ दिविक रमेश जो कुछ दिनों तक रमेश दिविक – दिविक रमेश के द्वन्द्व में भी फँसा रहा। दिविक के सहयोगी एक-दो कवियों को मेरा यह कर्म अच्छा नहीं लगा और वे मेरे इस उपनाम के लोकप्रिय होते जाने के साथ-साथ कुंठाओं के शिकार होते गए। मौका मिलने पर मजाक भी उड़ाते और यह कहने से भी नहीं चूकते कि दिविक नाम रख लेने के कारण ही मेरी कविताएँ छप रही हैं। शुरू-शुरू में स्वयं मुझे भी अपना नाम अटपटा लगता था। लेकिन बाद में यह खूब चल गया। विशेष रूप से “धर्मयुग” जॆसी लोकप्रिय पत्रिका ने मुझे इसी नाम से खूब प्रकाशित किया ऒर मेरे दिविक रमेश नाम को अत्यधिक प्रचारित भी कर दिया । जहाँ तक इस शब्द के अर्थ का प्रश्न हे तो यह कोश का शब्द नहीं हॆ । एक बार प्रसिद्ध इतिहास विद प्रो० रामशरण शर्मा ने इसका अर्थ दिवि + क के आधार पर करके बताया था- दिवि संबंधी । खॆर इसका वास्तविक अर्थ मॆं अनेक बार बता चुका हूं । डॉ० नामवर सिंह ने मेरी कविता पुस्तक “गेहूं घर आया हॆ” पर लिखते हुए ठीक ही खुलासा किया हॆ,” रमेश छात्र जीवन से ही कविता को लेकर न केवल गंभीर रहे हॆं, बल्कि नयी पहल भी करते रहे हॆं । जब वे दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र थे, उस समय के युवा कवियों का एक समूह बना कर उन्होंने अपनी पीढ़ी को स्थापित करने का प्रय्त्न किया था । उन दिनों उस समूह को ’दिल्ली विश्वविद्यालय कवि’ के रूप में जाना गया । ’दिविक’ इसी का संक्षिप्त रूप हे, जिसे रमेश ने अपने नाम के साथ हमेशा-हमेशा के लिए जोड़ लिया ।…..बहुत ही प्रॊढ़ ऒर खबरदार करने वाले कवियों में से एक हॆं दिविक रमेश ।” मॆं यह भी बता दूं कि बाल साहित्य के क्षेत्र में मॆंने दिविक रमेश के नाम से ही प्रवे श किया था -संभवत: 1980 में । मेरी पहली बाल कविता धर्मयुग में प्रकाशित हुई थी । 12 फरवरी, 1978 के अंक में । कविता थी -मुन्ना बन बॆठा दादा जब । संयोग देखिए इसे पजाब एजुकेशन बोर्ड, मोहाली ने सीधे पाठ्यक्रम में लगा दिया ।

प्रो० प्रभाशंकर: बाल कविता ऒर कहानियों पर आपकी दो दर्जन से अधिक पुस्तकें निकली हॆं ऒर राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत भी हॆं ।आज के हिन्दी के बाल साहित्य पर कुछ प्रकाश डालिए ।

दिविक रमेश: बहुत ही महत्त्वपूर्ण जिज्ञासा हॆ । आज मॆं बाल साहित्य सृजन को किसी भी लेखक के लिए अनिवार्यता की हद तक मानता हूं । मुझे खुशी हॆ कि मुझसे बाल साहित्य का सृजन निरन्तर हो रहा हॆ । संतोष की बात हॆ कि आज हिन्दी ही नहीं भारतीय भाषाओं में लिखे जा रहे बाल-साहित्य की ओर विशिष्ट संस्थाओं, विश्वविद्यालयों ऒर लेखकों/विद्वानों आदि का ध्यान जाने लगा हॆ । साहित्य अकादमी, दिल्ली ने बाल-साहित्य को न केवल प्रकाशित करना प्रारम्भ किया हॆ बल्कि उसके महत्तव को रेखांकित करने के लिए हाल ही में अलग से पुरस्कार भी देने प्रारम्भ कर दिए हॆ । प्रथम हिन्दी बाल साहित्य पुरस्कार की तीन सदस्यीय ज़ूरी में मॆं भी था । आज हिन्दी में कितने ही प्रकाशक बाल साहित्य की पुस्तकें निरन्तर प्रकाशित कर रहे हॆं । बड़ी-बदई पुस्तकें भी निकाल रहे हॆं । प्रकाश मनु बाल साहित्य का इतिहास लिखने का महात्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हॆ । प्रसिद्ध बाल साहित्यकार ऒर नन्दन के अनेक वर्षों तक रहे संपादक स्व० जयप्रकाश भारती जी ने तो 20वीं सदी को बाल साहित्य का स्वर्ण युग घोषित किया था । उनके संपादन में प्रकाशित पुस्तक “हिन्दी के श्रेष्ठ बालगीत” आज भी एक महत्त्व की पुस्तक मानी जाती हॆ । मेरा एक लेख हॆ, “fgUnh dk cky&lkfgR; % ijEijk] izxfr vkSj iz;ksx” जो नेट पर भी उपल्ब्ध हॆ । इसे गूगल के माध्यम से खोज कर देखा जा सकता हॆ । उत्तर के लिए इसे भी पढ़ा जा स्कता हॆ । इसी लेख की बात दोहराऊं तो कहूंगा कि हिन्दी का बाल-साहित्य कम महत्वपूर्ण नहीं है। बल्कि कहा जा सकता है कि आज हिन्दी के पास समृद्ध बाल-साहित्य, विशेष रूप से बाल-कविता उपलब्ध है। और इसका अर्थ यह भी नहीं कि बाल-साहित्य की अन्य विधाओं, मसलन कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी आदि के क्षेत्र में उत्कृष्ट सामग्री उपलब्ध न हो। बाल-नाटकों की एक अच्छी पुस्तक ‘उमंग’ हाल ही में सुप्रसिद्ध कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी के संपादन में राजकमल से प्रकाशित हुई है। हिन्दी में जहाँ अनूदित साहित्य के रूप में बाल-साहित्य या बाल-कहानी (साहित्य) उपलब्ध हुआ वहाँ मौलिक कहानियाँ भारतेन्दु युग से ही उपलब्ध होनी शुरू हो गई थीं। शिवप्रसाद सितारे हिन्द को कुछ विद्वानों ने बाल कहानी के सूत्रपात का श्रेय दिया है। उनकी कुछ कहानियाँ हैं — राजा भोज का सपना, बच्चों का ईनाम, लड़कों की कहानी। बाद में तो रामनरेश त्रिपाठी, सुभद्रा कुमारी चैहान, प्रेमचंद, विष्णु प्रभाकर आदि की रचनाओं के रूप में हिन्दी बाल-साहित्य की कहानी परम्परा का समृद्ध रूप मिलता है। स्वतंत्रता मिलने के बाद तो इस क्षेत्र में अत्यंत उल्लेखनीय प्रगति देखी जा सकती है। विष्णु प्रभाकर, जयप्रकाश भारती, राष्ट्रबंधु, हरिकृष्ण देवसरे, क्षमा शर्मा, यादवेन्द्र चन्द्र शर्मा, चक्रधर नलिन, दिविक रमेश, उषा यादव, देवेन्द्र कुमार आदि कितने ही नाम गिनाए जा सकते हैं। कविता के क्षेत्र में भी जो अद्वितीय साहित्य रचा गया है, उसे ध्यान में रखते हुए स्व. जयप्रकाश भारती ने इस समय को बाल-साहित्य का स्वर्णिम युग कहा था। परम्परा को खोजते हुए वे श्री निरंकार देव सेवक की महाकवि सूरदास को सफल बाल गीतकार न मानने की धारणा से भिन्न, स्नेह अग्रवाल के मत का समर्थन करते हुए सूरदास को ही बाल-साहित्य का आदि गुरू मानते हुए प्रतीत होते हैं। हाँ, यह भी सत्य है कि सूरदास से पूर्व भी हिन्दी के ऐसे कवि उपलब्ध हैं जिनकी रचनाएँ अपने आंशिक रूपों में बच्चों को भी सृजनात्मक साहित्य का आनन्द देती रही है। जगनिक द्वारा रचित आल्हा खंड के कुछ अंश ग्रामीण बच्चों में प्रचलित रहे हैं। अमीर खुसरो की रचनाएँ बच्चों को भी प्रिय हैं। जहाँ तक बालक की पहली पुस्तक का प्रश्न है, तो वह 1623 ई0 में जटमल द्वारा लिखित ‘गोरा बादल की कथा’ मानी जाती है। मिश्र बंधुओं ने पुस्तक की भाषा में खड़ी बोली का प्राधान्य माना है। इस कृति में मेवाड़ की महारानी पद्मावती की रक्षा करने वाले गोरा-बादल की कथा है। बाल-कविता के क्षेत्र में श्रीधर पाठक, विधाभूषण ‘विभु’, स्वर्ण सहोदर, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी, सोहनलाल द्विवेदी आदि कितने ही रचनाकारों की रचनाएँ अमर हैं। स्वाधीन भारत में बाल-साहित्य और साहित्यकार की भले ही घनघोर उपेक्षा होती आई हो लेकिन रचनाओं की दृष्टि से निसंदेह यह युग स्वर्णिम युग है और विश्व की अन्य श्रेष्ठ बाल-रचनाओं के लिए चुनौतीपूर्ण है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, श्रीप्रसाद, दामोदर अग्रवाल, शेरजंग गर्ग, दिविक रमेश, बालकृष्ण गर्ग, रमेश तैलंग, प्रकाश मनु, लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, रमेश कौशिक, कृष्ण शलम, अहद प्रकाश, श्यामसिंह शशि, जयप्रकाश भारती, राधेश्याम प्रगल्भ, श्याम सुशील, ओमप्रकाश कश्यप, सुरेन्द्र विक्रम, शकुन्तला कालरा आदि एक बहुत ही लम्बी सूची के कुछ उल्लेखनीय एवं महत्वपूर्ण बिन्दु माने गए हैं। इनके अतिरिक्त बच्चन, भवानीप्रसाद मिश्र, प्रभाकर माचवे, नागार्जुन, जैसे कवियों ने भी बाल-कविता-जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज की है। अपने बारे में यह भी जोड़ दूं कि राजकमल प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित मेरा बाल नाटक ” बल्लू हाथी का बालघर” भी काफी चर्चित हुआ हॆ ।

प्रो० प्रभाशंकर: आपका तो एक बहुत ही चर्चित, विशिष्ट ऒर प्रतिष्ठित काव्य-नाटक भी हॆ -खण्ड-खण्ड अग्नि” जिसे राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार मिला हॆ । इसका अनुवाद अंग्रेजी, मराठी, गुजराती ऒर क्न्नड़ में हो चुका हॆ ऒर संस्कृत में भी हो रहा हॆ । इस बहुचर्चित रचना

की रंगमचीय संभावनाओं पर प्रकाश डालिए ।

दिविक रमेश: सीता की अग्नि-परीक्षा से प्रेरित यह कृति “खण्ड-खण्ड अग्नि” जिसका प्रकाशन वाणी प्रकाशन, दिल्ली के द्वारा 1964 में हुआ था मेरी भी प्रिय कृति हॆ जिसकी अभिव्यक्ति मेरे लिए अनेक चुनॊतियों से भरी थी । लेकिन अन्तत: सफलता मिली कुछ ऎसे पात्रों की उपलब्धि के रूप में जो कालजयी चिरन्तन भावों के देहधारी रूप हॆं, जॆसे विश्वास, उत्तरदायित्व, हर्ष, सन्नाटा आदि जिनके माध्यम से मॆं वह सब अभिव्यक्त कर सका जो असल में मॆं करना चाहता था ।कथा कहना तो मेरा आशय नहीं था न । लिखते समय भी ऒर लिखे जाने के बाद भी इसे अनेक नाटक-मर्मज्ञों के समक्ष पढ़ने का मॊका मिला । उनके सुझाव भी मिले जिन्हें ज्ज़ारूरी लगने पर अपनाया भी गया । इन मर्मज्ञों में विशेष रूप से देवेन्द्रराज अंकुर, नेमिचन्द्र जॆन, प्रताप सहगल, केवल सूद आदि का नाम ले सकता हूं । इस कृति को रंगमंचीयता की दृष्टि से सभी ने उपयुक्त माना हॆ । दिल्ली विश्वविद्यालय के कमला नेहरू कॉलिज ने तो इसके एक भाग का हाल ही में मंचन भी किया था जो बहुत ही अच्छा कहा जा सकता हॆ। वस्तुत: इसके छपते-छपते मॆं अतिथि आचार्य होकर कुछ वर्षों के लिए कोरिया चला गया था । अत: इसका मंचन जिस रूप में होना चाहिए था नहीं हो सका । आपने तो इसका कन्नड़ में अनुवाद किया ही हॆ । अपने देखा ही हॆ कि रंग-निर्देश, संवाद आदि की दृष्टि से इसमें मंचन की दृष्ट से पूरी संभावनाएं हॆं । मॆंने इसकी भूमिका में लिखा भी था कि इस कृत को जानबूझकर लचीला रखा गया हॆ कि जहाँ इसे मंच पर नाटक के रूप में प्रस्तुत करने की सुविधा रहे वहाँ नृत्य-नाटिका के रूप में भी प्रस्तुत किया जा सके । मेरी प्रबल इच्छा हॆ कि इस कव्य-नाटक का मंचन हो । कन्नड़ अनुवाद का भी हो तो मुझे बहुत अछ्छा लगेगा ।

प्रो० प्रभाशंकर: आप देश-विदेश घूम आए हॆं । ऒर जॆसा आपने भी बताया कि कोरिया में तो आपने अध्यापन का कार्य भी किया । बताइये विदेशों में हिन्दी की स्थिति क्या हॆ ? लोगों की रुचि कितनी हॆ ?

दिविक रमेश: पिछले दिनों इंग्लॆंड, जर्मनी, रूस आदि देशो में हिन्दी के प्रति कुछ कमी ज़रूर देखी गयी लेकिन कुल मिलाकर विदेशों में हिन्दी की स्थिति अच्छी हॆ ऒर बेहतर भी हो रही हॆ । आज वेबजाल ने हिन्दी को ऒर मजबूती दिलायी हॆ । जहाँ तक कोरिया का प्रश्न हॆ

वहाँ हिन्दी के प्रति अनेक कारणॊं से, जिनमें एक कारण भारत के प्रति सांस्कृतिक ऒर भावनात्मक लगाव भी हॆ, विशेष रुचि हॆ । पिछले वर्षों में वहाँ भारतीय हिन्दी अध्यापकों की संख्या भी बढ़ी हॆ । इस विषय पर भी मेरे लेख उपल्ब्ध हॆं जिनके द्वारा अधिक जानकारी ली जा सकती हॆ । 2008 में ग्रंथलोक, दिल्ली-110032 से प्रकाशित मेरी पुस्तक “संवाद भी विवाद भी” में विदेश हिन्दी से संबंद्ध कई लेख हॆं । अपने एक लेख में मेंने लिखा था कि आंकड़ों के आधार पर तो हम विश्व-पटल पर हिंदी की उपस्थिति को लेकर गर्व भी कर सकते हैं लेकिन कुछ देशों के संदर्भ में हकीकत चिन्ताजनक भी हुई है। एक ओर जहाँ हिन्दी के वेबजालों की संख्या में बढ़ोतरी होती जा रही है और अमेरिका जैसे देश में तो हिन्दी को स्कूलों के स्तर पर भी पढ़ाया जा रहा है – कितने ही अमेरिकी तो भारत आकर विशेष रूप से हिन्दी सीख रहे हैं। वे हिन्दी जानना अपना विकल्प नहीं बल्कि अपनी आवश्यकता मानते हैं। वे जानते हैं कि भारत के भाषाई और सांस्कृतिक संसार तक पहुँच के लिए हिन्दी का आना अनिवार्य है। भारतीय जीवन के गहरे एवं यथार्थ पूर्ण अध्ययन के लिए भी वे हिन्दी की जानकारी को अनिवार्य मानते हैं। कुछ का इरादा तो हिन्दी में पारंगत होकर हिन्दी का अध्यापक बनना भी है। वहाँ हिन्दी के गढ़ माने जाने वाले देशों जैसे रूस और जर्मनी में हिन्दी के पठन-पाठन और उसके विस्तार पर आघात भी पहुँचा है। कुछ ही पहले ब्रिटेन के एक स्थापित विश्वविद्यालय में हिन्दी के पठन-पाठन को लेकर जो हुआ वह भी काफ़ी तकलीफ़देह कहा जा सकता है। लेकिन सच्चाई यह भी है, और यह कम महत्वपूर्ण भी नहीं है, कि भारत में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों या विदेशी कम्पनियों के प्रभावशाली आगमन और उससे उपजे भारतीय बाज़ार के दबाव ने हिन्दी की ओर बाहर और भीतर दोनों ही लोगों का न केवल अधिक ध्यान आकृष्ट किया है बल्कि उसकी उपयोगिता को सिद्ध करते हुए उसके अन्यान्य रूपों के विस्तार को भी संभव किया है। और यह क्रम बढ़ता ही जा रहा है। मीडिया और प्रोपेगेण्डा साहित्य से लेकर वार्तालापी हिन्दी (व्यावहारिक हिन्दी) की दिशा में तो जैसे विस्फोट सा हुआ है। हिन्दी चैनेलों की पहुँच उन देशों तक भी पहुँच चुकी है जहाँ पहले इस दृष्टि से भयंकर उजाड़ था। जैसे दक्षिण कोरिया। डाo केदारनाथ सिंह के इस निष्कर्ष से सहमत हुआ जा सकता है कि ‘यूरोप केंद्रित सांस्कृतिक प्रभाव का क्षेत्र कुछ सिकुड़ा है और एशिया का साहित्य-मानस एक-दूसरे के निकट आने के नए रास्तों की तलाश कर रहा है। बल्कि इस वृत्त का विस्तार करते हुए हम कह सकते हैं कि इस गोलार्द्ध से कुछ पश्चिमी देशों – खासतौर से लैटिन अमेरिकी देशों के सृजन-सूत्र भी जुड़ते दिखाई पड़ रहे हैं और निःसंदेह अफ्रीका के भी।’ (जनसत्ता, दिल्ली, 29 अप्रैल, 2007, पृ.7)। यह कथन तथ्यों के आधार पर उचित सिद्ध किया जा सकता है। आज नार्वे, हंगरी, पौलेंड, होलैंड जैसे हिन्दी-साहित्य की दृष्टि से पर्याप्त उत्साहजनक यूरोपीय देशों के साथ हम चीन और जापान ही नहीं दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई देशों को भी सम्मिलित कर सकते हैं। अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे देशों में भी हिन्दी का प्रभुत्व पग रख चुका है। मार्च, 2010 में आई.सी. सी.आर, नई दिल्ली के सभागार में अफ़गानिस्तान में हिन्दी सीखने वाले विद्यार्थियों से मिलकर ऒर हिन्दी पर उनकी पकड़ देखकर बहुत गर्व हुआ ।अब तो देश के बाहर न केवल अनुवाद के माध्यम से बल्कि रचनात्मक लेखन के द्वारा भी हिन्दी अग्रसित हो रही है।इस प्रसंग में इतना अवश्य जोड़ना चाहूँगा जो कि मेरे ही द्वारा बहुत पहले लिखे हुए एक लेख ‘हिन्दी और विदेश’ में भी उपलब्ध है कि ‘या तो हमें देश और विदेशों में भारत की तमाम भाषाओं के सीखने-सिखाने की स्थितियाँ पैदा करनी होंगी या फिर एक ऐसी भारतीय भाषा को चुनना होगा जिसके माध्यम से भारत की अन्य भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य को भी विदेशों में पहुँचाया जा सके और साथ ही उस भाषा के विदेशों में अध्ययन-अध्यापन की भरपूर स्थितियाँ भी पैदा की जाएँ। और यह भी कि वह भाषा स्पष्ट कारणों से, भारतीय मूल की ही होनी चाहिए। मेरी विनम्र राय है कि उपर्युक्त दूसरा रास्ता ज्यादा व्यावहारिक है। उदाहरण के लिए यदि हम ‘हिन्दी’ को विदेश के संदर्भ में देश की भाषा स्वीकार कर लें तो विदेशों में केवल हिन्दी सीखने-सिखाने का प्रबन्ध करना होगा और देश में एक उचित योजना के तहत हिन्दी में अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य को उपलब्ध कराना होगा ताकि वह सब हिन्दी के माध्यम से विदेशों में पहुँचाया जा सके।’ अच्छी बात यह है कि बिना हिन्दीतर भारतीय भाषाओं का गला दबाए इस दिशा में काम चल निकला है।

प्रो० प्रभाशंकर :आप एक अच्छे अनुवादक भी हॆं । कोरियाई कवितायात्रा , कोरियाई बाल कविता, कोरियाई लोककथाएं, सुनो अफ्रीका आदि अपाकी अनेक महवपूर्ण पुस्तकें हॆं । अनुवादक के रूप में अपने अनुभव बताएंगे ?

दिविक रमेश: धन्यवाद । सबसे पहले तो में यह कहना चाहूंगा कि अनुवादक मॆं आपदधर्म वश बना । मेरा सारा अनुवाद मेरी रुचि की रचनाओं का हॆ। विशेष रूप से कोरिया प्रवास के दॊरान मॆंने पाया कि भारत ऒर कोरिया के बीच साहित्यिक आदान प्रदान न के बराबर हॆ । वहँ मुझे कुछ विशेष सुविधाएं प्राप्त थीं, जॆसे हिन्दी-अंग्रजी जानने वाले कोरियाई विदयार्थी की सचिव के रूप में सेवा । उसके ऒर अन्य विद्यार्थियों के सहयोग से मॆंने कोरिया की संस्कृति उसके जीवन आदि के परिवेश का जीवन्त अनुभव लिया । साथ ही कुछ रचनाकारों से परिचय ऒर भेट भी हुई । कोरियाई भाषा को भी पकड़ने की कोशिश की । इस सबका परिणाम यह हुआ कि मेरी कोरियाई साहित्य के पाठन ऒर उसके अनुवाद की ओर रुचि जगी । अनुवाद के लिए मॆंन अंग्रेजी का भी सहारा लिया ऒर कोरियाई विद्यार्थियों का समूह बनाकर कार्यशालाओं का भी सहारा लिया । जहाँ तक “सुनो अफ्रीका” का प्रश्न हॆ तो उसे तो मॆंने मूल यूगांडियन अंग्रेजी से किया हॆ । कुछ संदर्भों के लिए मूल कवि का भी सहारा मिला ।

प्रो० प्रभाशंकर: भरतीय भाषाओं के विकास में हिन्दी का पात्र क्या हॆ ? कर्त्व्य क्या हॆ ऒर दायित्व क्या हॆ ?

दिविक रमेश :संक्षेप में कहूं तो वही हॆ जो एक बड़ी बहिन ऒर बड़ी सखी का अपनी छोटी बहिनों ऒर सखियों के प्रति होना

चाहिए । एक दूसरे के सहयोग ऒर अनुभव से आगे बढ़ना । एक दूसरे के प्रति स्नेह ऒर सम्माने से आगी बढ़ना । खुद को दूसरे पर

बिना लादे आगे बढ़ना । बड़े-छोटे का अर्थ ज्यादा-कम न लेना । हर भाषा अपने परिवार की माँ होती हॆ ऒर हर बच्चे को अपनी माँ अधिक प्यारी होती हॆ । लेकिन सच यह भी हॆ कि किसी बच्चे को किसी भी माँ से नफरत नहीं होती ।

प्रो० प्रभाशकर:आप से बात करके बहुत अच्छा लगा । धन्यवाद ।

दिविक रमेश :मुझे भी । धन्यवाद

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