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किसी शहर में । Kisi Shahar Mein

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कस्बाई जीवन की अकथ कहानी

  • राहुल देव

‘किसी शहर में’ वरिष्ठ लेखक अश्विनी कुमार दुबे का नया व्यंग्य उपन्यास है जिसे नेशनल पेपरबैक्स, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है। दुबे जी एक मंझे हुए उपन्यासकार हैं। प्रकाशन के क्रम में देखा जाय तो यह उनका चौथा उपन्यास है। परसाई के अनुसार, ‘सार्थक व्यंग्य करुणा से उपजता है।’ इस उपन्यास की अंतर्धारा भी इसी मूलभाव की कथात्मक अभिव्यक्ति है। लेखक ने यथासंभव कथा के साथ व्यंग्य को साधने का प्रयास किया है। कथावस्तु के प्रवाह में यद्यपि व्यंग्य की भाषा का खिलंदड़ापन कहीं कहीं छूटता दिखता है। जिसकी स्वीकारोक्ति वह ‘अपनी बात’ में भी करते हैं, ‘सत्य की राह में जगह-जगह नुकीले पत्थर बिछे हुए हैं जिन पर चलते हुए आदमी लहूलुहान हो जाता है। इसके बावजूद उस पर चलना और निरंतर चलते रहने का साहस कुछ लोगों में कभी नहीं झुकता। ऐसे गिरते-उठते और चलते लोगों की कहानी है यह उपन्यास ‘किसी शहर में’।’

इस उपन्यास को पढ़कर आप पाते हैं कि व्यंग्य के प्रचलित मुहावरों से हटकर यह उपन्यास पाठक को सोचने पर विवश करते हुए अपनी एक अलग राह बनाता है। हमारे देश में छोटे कस्बों की वही स्थिति है जोकि समाज में एक मध्यमवर्गीय परिवार की है। वह त्रिशंकु की तरह निम्न और उच्च वर्ग के बीच सामंजस्य बिठाने के लिए जीवन भर अटका रहता है। उसी तरह एक कस्बा भी शहर और गांव के बीच अभिशप्त होकर मानो लटका रहता है। वह न पूरी तरह गांव हो पाता है और न पूरी तरह शहर। उपन्यास का मुख्य चरित्र देवदत्त है जो कि पेशे से अध्यापक है। वह स्वभाव से जुझारु है, संघर्षशील है। लेखक ने अपनी इस कृति में सामाजिक राजनीतिक और प्रशासनिक सिस्टम की विसंगतियों की जमकर खबर ली है।

उपन्यास की भाषा व शैली सरल व सहज है। उसमे कोई कृत्रिमता नही है। घटनाओं के नरेशन में भी लेखक को पर्याप्त सफलता मिली है। जिस तरह ‘राग दरबारी’ में श्रीलाल शुक्ल ग्रामीण अंचल की विसंगतियों पर प्रहार करते हैं वही काम इस उपन्यास में अश्विनी कुमार दुबे हरबोंगपुर नामक कस्बे को लेकर करते हैं। परिवेश की लगभग हर विडंबना पर लेखक की दृष्टि गई है, “सड़कों में गड्ढे हैं। नालियां चोक हैं। जगह-जगह कचरे के ढेर लगे हुए हैं। जलापूर्ति हो नहीं पाती। 24 घंटों में सिर्फ 1 घंटे बमुश्किल जल प्रदाय हो पाता है। अप्रैल से जून तक पानी की बहुत किल्लत रहती है। दो-तीन दिन के अंतराल में नल खुलते हैं। पानी का यहां भीषण संकट है। इसके बावजूद भी जनता में कोई हलचल नहीं। कोई समस्याओं का जिक्र ही नहीं करता। मानो यही उनकी नियति है जिसे सब ने सहर्ष स्वीकार कर लिया है।” देवदत्त को यह सब देखते हुए गुस्सा आता है। उसका मन बेचैन हो उठता है। यहां पड़ोसी भी बगैर मतलब आपसे बात नहीं करता जैसे देवदत्त के पड़ोसी गुप्ता जी, “गुप्ता जी सहजता से हर ऐरे-गैरे आदमी को नजदीक नहीं आने देते। वह उसी से मधुर संबंध बनाना पसंद करते हैं जो भविष्य में उनके काम आए। हरबोंगपुर का यह दृश्य चित्रण देखें, “हरबोंगपुर में सड़कें गलियां और पुलिया देखने लायक हैं। लोग कहते हैं कि किसी भी महानगर में वाहन चलाना बहुत सरल है। परंतु हरबोंगपुर में उतना ही कठिन। पहली बात तो यह किस शहर की मुख्य सड़क पर ट्रक, ट्रैक्टर, बस, कार, जीप, रिक्शा, बैलगाड़ी, हाथठेला, साइकिल और पैदल यात्रियों की बेतरतीब भीड़ चारों तरफ बिखरी दिखाई देती है। इसी भीड़ के बीच में कहीं कोई भैंस या साड़ आपको पसरा हुआ मिल जाएगा। जानवर आदमी और मशीन एक साथ इस सड़क पर रुक-रुक कर आगे बढ़ते रहते हैं। गोबर,  फलों के छिलके, प्लास्टिक का टूटा-फूटा सामान और विभिन्न प्रकार का कचरा कहीं सड़क के बीचो-बीच तो कहीं दोनों किनारों पर बिखरा हुआ आपको अवश्य दिखाई देगा। कहीं भी पान खाकर थूकना। यूं ही थूकते रहना या फिर तंबाकू खा कर अगल-बगल पिच करते रहना, यहां के नागरिकों का प्रिय शौक है।” यानी आप देखें तो यहाँ हर जिम्मेदार गैर जिम्मेदारी के नशे में सिर से पैर तक डूबा हुआ है। क्या सरकार और क्या नागरिक हर कोई, हर विभाग अपना काम नहीं करना चाहता। वह अपना काम दूसरों के सिर मढ़कर मजे लेता है। भ्रष्टाचार उनकी रगों में गहरे तक प्रवेश कर गया है।

उपन्यास ज्यादा बड़ा नहीं है। पूरे ही कथानक को 20 छोटे-छोटे खंडों में विभाजित किया गया है। कथा प्रवाह के कारण इसकी पठनीयता प्रारंभ से अंत कायम रही है। इसके जरिए लेखक देश के किसी भी आम कस्बे/छोटे शहरों, वहां के लोगों, वहां की जर्जर व्यवस्था की पड़ताल करते हैं। एक ऐसी व्यवस्था जिसके लिए ईमानदारी और नैतिकता जैसे शब्द अपने अर्थ खो चुके हैं। धन-बल ही जिसका मूल्य बन गए हो। उपन्यास को पढ़ते हुए धीरे-धीरे यह पूरा अनुभव एक त्रासद और मार्मिक राष्ट्रीय बयान बन जाता है। व्यंग्य चलताऊ व्यवस्था पर प्रहार करता है। व्यंग उपन्यास इन्हीं कारणों से साहित्य में अपना एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। अश्विनी जी का यह उपन्यास भी उसी परम्परा का अनुसरण करता है।

 

किसी शहर में/ उपन्यास/ अश्विनी कुमार दुबे/ नेशनल पेपरबैक्स, नई दिल्ली/ वर्ष 2019/ पृष्ठ  187/ मूल्य 450/-

बलमा जी का स्टूडियो । Balamaji ka studio

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पुस्तक समीक्षा

औरत के हिस्से का आकाश

राहुल देव

‘बलमा जी का स्टूडियो’ उभरती हुई युवा कहानीकार सोनी पांडेय का पहला कहानी संग्रह है | इस संग्रह में उनकी दस कहानियां हैं | सोनी पांडेय की यह कहानियां प्रचलित स्त्रीकथा विमर्श से हटकर लिखी हुई कहानियां हैं इसलिए इन्हें पढ़कर पाठक को एक नया आस्वाद मिलता है | सोनी पांडेय का इससे पहले ‘मन की खुलती गिरहें’ एक कविता संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है | वह एक वैचारिक प्रतिभासंपन्न लेखिका हैं | उनकी कहानियां कहीं न कहीं मुझे उनकी कविताओं का ही विस्तार लगतीं हैं यानि रचनाकार जो कविताओं के माध्यम से अभिव्यक्त न कर सकी उसे यह कहानियां आकार देती नज़र आती हैं | कथालेखन करते हुए उन्होंने ग्रामीण यथार्थ को बड़ी जीवन्तता और विश्वसनीयता के साथ प्रस्तुत किया है | अच्छी बात यह कि वह अपनी कहानियों अपने किसी पूर्ववर्ती के पदचिन्हों पर न चलते हुए खुद से अपनी मौलिक पहचान बनाने की सफल कोशिश करती नजर आती हैं |

इस संग्रह की कहानियों को पढ़कर आप अपने असल भारतीय कथालोक से जुड़ते हैं | सोनी का अपनी कहानियों में ग्रामीण स्त्री के जीवन को पकड़ पाने तथा आंचलिक कथाभाषा पर पूरा अधिकार है | संग्रह की सभी कहानियां लगभग चर्चित पत्र-पत्रिकाओं में छपकर पहले ही चर्चित रह चुकी हैं | ऐसे समय में जब महानगरों की स्त्री लेखिकाएं साहित्य के नाम पर स्त्री विमर्श का देहवादी एक सूत्रीय एजेंडा उठाकर नारे लगा रही हों आजमगढ़ जैसे छोटे से शहर की यह लेखिका एक नई उम्मीदों की तरह से हमारे सामने आती है |

संग्रह की पहली कहानी ही है ‘बलमा जी का स्टूडियो’ | यह एक लम्बी लेकिन पठनीयता से भरपूर कहानी है | ग्रामीण जीवन के तमाम कथारंग इस कहानी में बड़ी ख़ूबसूरती के साथ उभरे हैं | लम्बी होकर भी यह अत्यंत सुगठित कहानी है | कहानी को नैरेटर अपनी स्मृतियों के साथ शुरू करती है और अंत में जिस तरह से वह अपने गाँव पर शहरी आधुनिकता के दुष्प्रभाव को दिखाती है वह किस्सागोई की लुप्त होती परम्परा को जीवित कर देती है | आज ऐसी ही कहानियों की जरुरत है | इसमें तस्वीर के उजले और स्याह दोनों ही पहलू हैं | सोनी की कहानियां पढ़ते हुए आपको रेणु की याद आ जाना स्वाभाविक है | सोनी की कहानियां सीधे सीधे उनकी परम्परा से जुड़ती हैं | सोनी की इन कहानियों की सफलता का राज़ उनका अपने परिवेश से गहरा जुड़ाव है जिसे अनुभवों से उत्खनित कर उन्होंने कहानी का रूप दे दिया है | ‘बेबी’ खुद इस कहानी की सबसे सशक्त स्त्री पात्र है | वह साहसी है और संवेदनशील भी | परिवार और समाज की जंजीरों से जकड़ी हुई अपने आसपास की औरतों के सपनों और जीवन को देखकर वह बेचैन होती है | ‘कभी मन होता, सबके घर जाकर कह दूँ और बलमा की जमकर धुनाई करवाऊ…| फिर खयाल आता, लड़कियों की तोड़ाई पहले होगी | बदनामी अलग से | मैं सोचती रही |’ इस कहानी में आया ‘बलमा’ भी बड़ा रोचक और जरुरी चरित्र है | कहानी के प्रारंभ में आप उसको लेकर आपकी राय कहानी के अंत होते होते बदल जाती है | इस कहानी में जहाँ बचपन के प्रेम की तमाम खुश्बुएं हैं वहीँ गाँव के भीतर की तमाम समस्याएं और टकराहटें भी | कहानी आपको अपने भीतर ले जाकर संवाद करती चलती है | शीर्षक कहानी इस संग्रह की सबसे सशक्त कहानी है |

‘टूटती वर्जनाएं’ हमारे गाँवों में कर्मकांड और अंधभक्ति की समस्या पर केन्द्रित है | इस कहानी में लेखिका ने दिखाया है कि किस तरह से आज भी शिक्षित हो जाने के बावजूद आज भी गाँव के परिवारों के अन्दर कुल परम्परा के नाम पर कैसे छोटे-छोटे भ्रम भक्ति में और फिर अंधभक्ति में बदलते जाते हैं | ‘स्वर्ग-नर्क’ कहानी में परिस्थितियों के बदलाव किस तरह आपसी रिश्तों तक को बदल देते हैं, किस तरह एक स्त्री ही स्त्री की दुश्मन बन जाती है, पर आधारित कथानक बुना गया है | ‘अंजुमन खाला को गुस्सा क्यों नही आता’ भी एक अच्छी कहानी बन पड़ी है | इस कहानी में लेखिका ने बड़ी कुशलता के साथ मुस्लिम परिवेश और भाषा की नफासत का प्रयोग किया है | इनके यहाँ रोती-कलपती नही बल्कि अशिक्षा और विषम परिस्थितियों के बावजूद वे हुनरमंद स्त्रियाँ हैं जो स्वाभिमान के साथ अपनी रोटी कमाना जानती हैं | वे संघर्षों से विचलित होकर मार्ग नही भटकतीं बल्कि जीवन को तमाम मुश्किल हालातों के बावजूद हँसते हुए जीना चाहती हैं | ‘वे हुनरमंद औरतें मेरे देखते-देखते धर्म की गलियों से निकल मनुष्यता की सड़क पर मिलने लगीं थीं |’ इसके बदले में उसकी पुरुषों से क्या अपेक्षा है वह भी स्पष्ट है, ’औरत जीवन में एक अदद मोहब्बत ही तो चाहती है मर्द से, बदले में उसके लिए खुशी-ख़ुशी कुर्बान हो जाती है |’

आम मध्य वर्ग से लेकर निम्न वर्ग तक की औरतें व उनसे जुड़ी घटनाएँ उनकी लगभग सभी कहानियों में आयी हैं | फिर चाहे पर बेबी हो, अम्मा हो, उच्च शिक्षित ज्योत्सना हो, रेखा हो, सलमा हो, कनिया हो, पारुल हो, चुनमुनिया हो, मुन्नी हो या फिर आठवीं पास रधिका हो, ‘औरतें यहाँ शिव की तरह हलाहल कंठ में रोकने में सिद्धहस्त होती है | सबने मौन हलाहल पी लिया कि परिवार में शांति बनी रहे |’ (जाजिम) ‘जानती हो रधिका, जो औरत अपने पैरों पर खड़ी हो औकात में आ जाए, बड़े से बड़े विरोधी पस्त हो जाते हैं | अकेली औरत के सारे पुण्य तभी तक पाप हैं, जब तक वह कमज़ोर है | सबल होते ही इस ज़माने में पाप भी पुण्य हो जाते हैं |’ (मोरी साड़ी अनाड़ी न माने राजा) यह सभी प्रमुख स्त्री कथाचरित्र बड़े जाने पहचाने और अपने से लगते हैं | उनमें आत्मविश्वास है और कुछ कर गुजरने की धुन | आप कहानियां पढ़ते हैं तो ऐसा लगता है मानो लेखिका इन कहानियों के माध्यम से अपने वंचित समाज के लोगों के दर्द को हमसे साझा करना चाहती हो |

उपरोक्त कहानियों के अलावा इस संग्रह में ‘बुद्धि-शुद्धि-महायज्ञ’, ‘एही ठियामुनरी हेरानी हो रामा’ और ‘मोरी साड़ी अनाड़ी न माने राजा’ भी उल्लेखनीय कहानियां हैं | शेष कहानियां अपेक्षाकृत औसत लगीं जिनपर और काम किया जा सकता था | लेखिका का पहला संग्रह है इसलिए इस बात की छूट दी जा सकती है | वैसे भी उन्होंने अपनी पहली ही कहानी से ऐसा लेवल सेट कर दिया है कि अब उनसे हमारी अपेक्षाएं थोड़ा बढ़ जाती हैं | सुखद है कि सोनी पूरी तैयारी के साथ कहानी के मैदान में उतरी हैं और लगातार अच्छी कहानियां लिख रही हैं | उनके भण्डार में विषयों की कमी नही |

सोनी पांडेय का कहानी कहने का ढंग बड़ा ही सहज है | वह पाठक को तमाम अन्य लेखिकाओं की तरह अपने कथाकौशल से आतंकित नही करती न ही बेवजह के उबाऊ विवरणों में फँसती हैं | कहानी कहाँ से शुरू करनी है और किस तरह उसे निर्वाह तक ले जाना है उन्हें बखूबी पता है | किसी लेखिका की पहली किताब इतनी मुक्कमल हो बहुत कम देखने को मिलता है | निश्चित ही उन्हें अपने लोक की गहराई से समझ है | कहानियों के बीच-बीच में प्रसंगानुरूप आए लोकगीत पढ़कर आप इस बात की तस्दीक कर सकेंगें | वह किसी जल्दबाजी में नही दिखती यह बहुत अच्छी बात है | इस संग्रह के बाद पाठकों की ओर से उनकी ज़िम्मेदारी भी बढ़ गयी है | उनसे समकालीन हिंदी कथा साहित्य को बड़ी उम्मीदें रहेंगीं |

बलमा जी का स्टूडियो/ कहानी संग्रह/ सोनी पांडेय/ रश्मि प्रकाशन, लखनऊ/ 2018/ पृष्ठ 126/ मूल्य 135/-

9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध), सीतापुर, उ.प्र. 261203

मो. 09454112975

नाच्यो बहुत गोपाल

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नाच्यो बहुत गोपाल

‘नाच्यो बहुत गोपाल’ साहित्यकार अमृतलाल नागर द्वारा लिखित उपन्यास है। इसे राजपाल एंड सन्स, दिल्ली द्वारा सन् 2010 में प्रकाशित किया गया है। इसमें एक मेहतर (अछूत जाति) या ब्राह्मणी के मेहतर बनने के जीवन की सम्पूर्ण कथा को चित्रित किया गया है। इसमें समाज के संरचनागत ढांचे से सामाजिक-आर्थिक-मनोवैज्ञानिक और न-जाने कितने पक्षों में मिले यातनाओं व उपेक्षाओं का वर्णन किया गया है। अमृतलाल नागर के इस उपन्यास को पढ़ने से निःसन्देह यह कहा जा सकता है कि वे साहित्य जगत के मूर्धन्य व यशस्वी साहित्यकारों में से एक हैं। उनकी लेखन शैली इतनी प्रभावी है मानो लगता है कि यह पूरा घटनाक्रम आँखों के सामने ही घटित हो रहा हो। अमृतलाल नागर के अन्य उपन्यास भी अपने-आप में एक अनूठी लिए हुये हैं। ‘बूँद और समुद्र’, ‘अमृत और विष’, ‘मानस का हंस’ तथा ‘खंजन नयन’ ने उन्हें हिन्दी-साहित्य जगत का महत्वपूर्ण स्तम्भ बना दिया।

इस उपन्यास की रूप-रेखा तैयार होने में ढाई से तीन सालों का समय लग गया। इसमें उन्होने उपन्यास लिखने की प्रेरणा के बारे में भी लिखा है। उन्होने एक कथा सुनी थी कि एक धनी ब्राह्मण की पत्नी एक मेहतर युवक के साथ भाग गयी थी और वह अपने साथ काफी सारे गहने-जेवरात भी लेकर भागी थी। दो दिन बाद ही वह अपने प्रेमी सहित पकड़ी भी गयी थी। इस संबंध में उपन्यासकार को कोई अन्य जानकारी प्राप्त न हो सकी और उसकी जिज्ञासा व कल्पना इस उपन्यास के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत हुई। इसके लिए अमृतलाल नागर ने कई मेहतरों के इंटरव्यू भी लिए और इसमें उनके प्रति आभार भी प्रकट किया गया है।

यूं तो ये कहानी निर्गुण की है, उसकी संवेदनाओं की है, उसके यातनाओं की है जो की उसके महिला मात्र होने पर अमानवीय अत्याचारों को बखूबी बयान करती है पर साथ ही साथ एक और पक्ष भी रहता है जो कि जाति और उसके संस्तरण से संबन्धित है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी संस्तरण के आधार पर नायिका के जीवन में बदलाव लगातार होते रहे और उसकी प्रस्थिति भी समाज में परिवर्तित होती रही। वह कैसे ब्राह्मण से मेहतर तक के सफर को तय करती है और उसके इस सफर के दौरान यह खोखली जाति व्यवस्था भी अपने रूप को बदलते रहती है।

यह कहानी कई खण्डों में चलती रहती है। कभी साहित्यकार और निर्गुण के संवाद तो कभी निर्गुण के अतीत के जीवन से संबन्धित संवाद चलते रहते हैं। साहित्यकार की लेखन शैली के प्रवाह ने इन किरदारों व उनके भाव-आवेश को जीवंत कर देने सा प्रयास किया है। इस कहानी के मूल में है निर्गुण जो की एक ब्राह्मणी हैं। निर्गुण का जन्म संवत् 1962 में एक ऊंचे ब्राह्मण कुल में हुआ था। निर्गुण का पालन-पोषण उनके नाना-नानी के यहाँ हुआ। नाना-नानी के गुजर जाने के बाद निर्गुण के पिता उसे अपने साथ हवेली ले गए जहां वे मालकिन के रखैल थे। यहीं से निर्गुण के जीवन के उतार-चढ़ाव का सिलसिला जारी होता है। उस हवेली का माहौल बहुत गंदा था वहाँ रहने वाले सभी अपने-अपने स्तर पर अश्लीलता में लिप्त रहते थे। इस अश्लीलता ने निर्गुण को भी अपने आगोश में ले लिया। उसका जीवन एक पहेली बन चुका था जिसे सुलझाने के लिए तो सभी तैयार थे लिकिन वे उसे और भी उलझा ही जाते थे, चाहे वह अम्मां (हवेली की मालकिन) हों या नौकर खड़गबहादुर हो या बबुआ सरकार हों या मास्टर बसन्तलाल हों। सभी ने उसके साथ अपने-अपने स्वार्थ साध रखे थे। इनमें से बसन्तलाल मास्टर ही एक ऐसा किरदार था जो कि उसके प्रति कुछ सचेत था पर आगे चलकर वह भी पतित ही हो गया। इसी बीच वह बबुआ सरकार से गर्भवती होती है और उसके गर्भ को नष्ट किया जाता है। बबुआ सरकार के साथ प्रेम-प्रसंग में निकटता देखकर मालकिन ने उसका विवाह 75 साल के बूढ़े मसुरियादिन ब्राह्मण से करा दिया। वह निर्गुण को चारदीवारी में कैद रखता था और बूढ़े हो जाने के कारण निर्गुण की यौन-इच्छाओं को तृप्त भी करने में असंतुष्ट था। एक मेहतरानी आती थी जो मल-मूत्र साफ करती थी और उसी से निर्गुण बात किया करती थी। निर्गुण और बाहरी समाज के बीच वह एक माध्यम के रूप में थी। फिर मेहतरानी के छुट्टी पर जाने के एवज में उसका बेटा मोहन घर साफ-सफाई के लिए आने लगा। जिसे देखकर निर्गुण का यौवन जाग उठा। उसने जात-पात के बंधनों को तोड़ दिया और उसके साथ भाग गई। मोहन की माँ के दुत्कार देने के बाद वे मोहन के मामा-मामी के पास गए। वहाँ उसके मामा ने तो किसी तरह उसे स्वीकार लिया पर मामी के मन में उसके प्रति द्वेष की भावना सदा ही बनी रही। उससे जितना बन सका उसने निर्गुण (जो अब निरगुनिया बन चुकी थी) को सताया, कष्ट दिये, उत्पीड़न किए। शुरू-शुरू में तो मोहन ने भी मामी का साथ दिया और उसके कुकृत्यों में बराबर का भागी बना रहा। बाद में उसने इसका विरोध किया और अपनी मामी को खरी-खोटी भी सुनाई। निरगुनिया के मस्तिष्क में एक अलग ही द्वंद चल रहा था ब्राह्मणी और मेहतरानी का। वह मोहन के साथ रहकर मेहतरानी तो बन चुकी थी पर अन्तर्मन से अभी भी ब्राह्मणी ही थी। पर कब तक? लेखक के पुछने पर निरगुनिया बोलती हैं “मार से भूत भाग जाता है। फिर मन के ब्राह्मणपन की भला क्या विसात?” (नागर, 2010, 89)

मोहना कप्तान जैक्सन के बैंड में काम करता था और दोनों का संबंध भी घनिष्ठ था। बैंड में एक नया लड़का आता है-माशूक हुसैन। जो पहले वहीदा डाकू के गिरोह में था। वह एक भरे पूरे बदन का आकर्षक लड़का था। जैक्सन ने हुसैन को ईसाई बनाया और उसे नया नाम दिया डेविड। डेविड के प्रति जैक्सन को अपार प्रेम था परंतु यह प्रेम मोहना से उसके संबंध को भेद नहीं पाया। यद्यपि इसका प्रयास तो डेविड ने बहुत किया। जैक्सन ईसाई बनाने का काम भी किया करता था और उसने मोहना और उसकी बीवी (निरगुनिया) को भी यह सलाह दी। निरगुनिया इसके बिलकुल खिलाफ थी। वह तो वैसे भी किसी जात कि नहीं बची (ब्राह्मणी, नौकरानी, ठाकुरानी, मेहतरानी) तो धर्म परिवर्तन का आखिर क्या प्रयोजन। निरगुनिया के निवेदन पर मोहना जैक्सन से बैंड खरीदना चाहता है। तभी वहीदा डाकू मोहना से मिलता है और उसे बताता है कि माशूक ने उसके एक बेशकीमती हार की चोरी की है और उसे लेकर भाग गया है। तुम्हें यह पता लगाना है कि वह हार कहाँ है? मोहन ने वही किया और वहीदा को बताया की हार जैक्सन के घर में है। वहीदा डाकू वहां आता और जैक्सन को मार देता है और हार की खोज-बिन में लग जाता है। मोहना डेविड को मार-मार कर हार का पता लगता है और हार को वहीदा डाकू को सौप देता है। इसी बीच डेविड को मरा हुआ देखकर मोहना हड़बड़ा जाता है। वहीदा डाकू जाते-जाते मोहना को भी अपने साथ लिए जाता है। वहां पुलिस आती है। बसन्तलाल, जो अब दरोगा बन चुका है, निरगुनिया को पहचान लेता है और उसे थाने ले जाता है। दरोगा बसन्तलाल, निरगुनिया के गहने-जेवर ले लेता है और उसके साथ छेड़खानी करता है। निरगुनिया उससे मींठी-मींठी बातें करके वह से बच के निकल जाती है और बीमार होने के कारण सड़क पर ही कहीं बेहोश होकर गिर जाती है। मसीताराम, जो कि मोहन का नातेदारी में चाचा लगता है, उसे उठाकर अपने घर ले जाता है। निरगुनिया का इलाज करवाने के बाद वह 3-4 दिन में स्वस्थ्य हो गई। मसीताराम के साथ उसकी दोस्त गुल्लन चाची भी वही रहती थी और उसने भी निरगुनिया के इलाज में मदद की थी। निरगुनिया वहीं रहने लगी और कुछ महीने बाद पता चला कि मोहना डाकू बन गया है। उधर बसन्तलाल दरोगा, निरगुनिया को परेशान किया करता था। इस पर मसीताराम व गुल्लन ने उसे स्वामी वेद प्रकाशानन्द जी के वेद मंदिर चले जाने का सुझाव दिया और स्वामी जी से उसे मिलवाया। सारी व्यथा सुनाने के बाद वह मंदिर में रहने चली गयी। वेद मंदिर में ऋषिदेवी और वेदवती दो बहने रहती थी जिनसे निरगुनिया को काफी स्नेह और अपनापन मिला। वे दोनों ही यतनाओं व उत्पीड़न की मार से गुजर चुकी थीं। कुछ समय बीतने के बाद मोहना डाकू, निरगुनिया से मिलने आता है और उसके प्रति अपने प्रेम के दीपक को पुनः प्रज्वलित करता है। मोहना डाकू द्वरा मिले पैसे से निरगुनिया अपने अर्थात मसीताराम के घर व आर्थिक अस्त-व्यस्तता को नियोजित करती है। फिर एक किताब ‘रंगीला रसूल’ के कारण शहर में दंगा हो जाता है। इसके अतिरिक्त एक अन्य पुस्तक ‘तलकीने मजहब’ ने भी दंगे में अत्यंत वेग उत्पन्न कर दिया। इसके पृष्ठ 21 पर लिखा है, ‘सीता चौदह बरस रावन के कब्ज़े में रहने की वजह से उसकी गर्वीदा हो गई थी, इस वजह से सीता के रावन का कत्ल होना सख्त सदमे का वाइस हुआ। सीता अपने आशिके कद्रदान की मूरत बनाकर रोजाना पूजा करती थी।” (वही, 2010, 246) वहीं योगेश्वर श्रीकृष्ण के संबन्ध में 49वें पृष्ठ पर यह लिखा है, “नतीजा यह हुआ कि जिस तरह उसने बेशुमार बेगुनाहों का कत्ल किया था, उसका भी कत्ल हुआ और द्वारका की जमीन पर मुफ़्सिद-पर्दाज़ जानी से पाकोसाफ हो गई।” (वही, 2010, 246) इसके कारण हिन्दू लोगों का खून खौल उठा और प्रत्युत्तर के रूप में भीषण दंगा बन के उभरा। उसमें मोहना के मामा-मामी मारे जाते हैं। इसी बीच निरगुनिया को एक बेटी होती है जिसका नाम शकुंतला रखा गया। मोहना डाकू बेटी के पैदा होने के चार महीने बाद निरगुनिया और अपनी बेटी से मिलता है। मोहना हमेशा उसे आर्थिक सहायता देता रहता था। गुल्लन के बेटे नब्बू को मोहना डाकू द्वारा पीते जाने के कारण गुल्लन में मोहना व निरगुनिया के प्रति रोष व्याप्त हो रहा था। बसन्तलाल ने दरोगा की नौकरी छोड़ कर प्राइवेट जासूस का धन्धा खोल लिया पर वो मोहना डाकू की तलाश में लगा रहा। डेढ़ साल बाद मोहना डाकू, निरगुनिया से मिलने आया और अपने चाचा, बेटी शकुन्तला के लिए पैसे भी दिये। मोहना डाकू पर 5 हजार का इनाम भी सरकार ने रखवा दिया है। रिपुदमन सिंह चौहान वहां के नए दरोगा थे। इसके लालच और द्वेष में गुल्लन ने उसके ठिकाने को पुलिस में जा कर बता दिया। परिणामस्वरूप मोहना डाकू मारा गया और निरगुनिया की रही-सही आस भी इसी के साथ खत्म हो गयी।

अगर इस उपन्यास के पूरे विमर्श को देखें तो यह जाति, वर्ग, लिंग और उसकी शक्ति (सत्ता) के आस-पास घूमता रहता है। वास्तव में ये सभी विमर्श, एक मसलें के रूप में उनके लिए हैं जो स्वयं तो एक ऐसे स्तर पर विराजमान हैं जिन्हे न तो इस विमर्श के परिणाम से कोई फर्क है और न ही इसकी कोई आवश्यकता। क्योंकि जो स्वयं सत्ता-संरचना में है उसके लिए क्या नियमावली और क्या मान्यता? वे तो स्वयं में ही कानून हैं। जो कोई इस सत्ता-संरचना को चुनौती देता है वो या तो मिटा दिया जाता है या तो सत्ता-संरचना उसे अपने में मिला लेती है। (वेबर, 1905) जिसके कारण न तो नियमों में बदलाव आता है और न ही इसके लिए प्रयास ही हो पता है। इस विमर्श और उसकी समस्या से दिक्कत तो उन लोगों को होगी जो कि हाशिये पर के लोग हैं। इस साहित्य के माध्यम से कई गंभीर मसलों पर विचार किया गया है। किस प्रकार का जीवन निर्गुण (ब्राह्मण) का था? किस प्रकार की जीवन-शैली निरगुनिया (मेहतरानी) का था? इस संबंध में समाज का रवैया किस प्रकार का था? महिलाओं के प्रति समाज का रूप कैसा था? इत्यादि प्रकार के गंभीर सवालों का जवाब साहित्यकार ने बड़ी ही स्वच्छता व सफलता से दिया है। अमृतलाल नागर ने उपन्यास के माध्यम से आजादी से पहले के समाज में हो रही घटनाओं का अच्छा परिवेश प्रस्तुत किया है। उन्होने उस समय में जाति के वर्चस्व के साथ-साथ शक्ति के अस्तित्व को भी सूचित किया है। जब निरगुनिया का पति मोहना, डाकू बन जाता है तो स्वतः समाज में उसकी स्थिति में परिवर्तन होता है। यह उसके लिए एक बेंचमार्क जैसे प्रयोग होता है।

साहित्यकार के अनुसार निरगुनिया का जीवन एक ऐसे बेपेंदी के लोटे के समान बन चुका था कि जो बस यहाँ से वहाँ नाचता ही रहे और अपने स्थिर होने की कल्पना मात्र ही कर सके। पर या संभव होना भी अपने-आप में एक संशय का मसला है।

अब मैं नाच्यो बहुत गुपाल।

काम क्रोध को पहिर चोलना कण्ठ विषै की माल।।

अब मैं नाच्यो बहुत गुपाल।…

अनुराग कुमार पाण्डेय
पी-एच.डी. समाजशास्त्र
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी

अक्टूबर जंक्शन

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चित्रा और सुदीप सच और सपने के बीच की छोटी-सी खाली जगह में ‍10 अक्टूबर 2010 को मिले और अगले 10 साल हर 10 अक्टूबर को मिलते रहे। एक साल में एक बार, बस। अक्टूबर जंक्शन के ‘दस दिन’ 10/अक्टूबर/ 2010 से लेकर 10/अक्टूबर/2020 तक दस साल में फैले हुए हैं।
एक तरफ सुदीप है जिसने क्लास 12th के बाद पढ़ाई और घर दोनों छोड़ दिया था और मिलियनेयर बन गया। वहीं दूसरी तरफ चित्रा है, जो अपनी लिखी किताबों की पॉपुलैरिटी की बदौलत आजकल हर लिटरेचर फेस्टिवल की शान है। बड़े-से-बड़े कॉलेज और बड़ी-से-बड़ी पार्टी में उसके आने से ही रौनक होती है। हर रविवार उसका लेख अखबार में छपता है। उसके आर्टिकल पर सोशल मीडिया में तब तक बहस होती रहती है जब तक कि उसका अगला आर्टिकल नहीं छप जाता।
हमारी दो जिंदगियाँ होती हैं। एक जो हम हर दिन जीते हैं। दूसरी जो हम हर दिन जीना चाहते हैं, अक्टूबर जंक्शन उस दूसरी ज़िंदगी की कहानी है। ‘अक्टूबर जंक्शन’ चित्रा और सुदीप की उसी दूसरी ज़िंदगी की कहानी

Dehaati Ladke । देहाती लड़के

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जवानी के बेहतरीन दिनों में कमरे में बंद रीजनिंग और मैथ्स लगाते हुए। बस वैसे ही एक लड़के की कहानी है ये।

Allahabad Blues । इलाहाबाद ब्लूज

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इस पुस्तक से गुज़रते हुए पाठकों को यह लगेगा कि वो अपने ही जीवन से कहीं गुज़र रहे हैं। उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ की गँवई ज़मीन से शुरू हुई यह यात्रा इलाहाबाद होते हुए यूपीएससी, धौलपुर हाउस और दिल्ली तक का सफ़र तय करती है।

Ei Illahabad Hai Bhaiya । ई इलाहाबाद है भईया

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यह किताब इलाहाबाद की ख़ूबसूरत यादों का क़र्ज़ उतारने की कोशिश है।