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विश्व हिंदी संगठन, नई दिल्ली द्वारा महादेवी वर्मा जी की जन्मदिवस के उपलक्ष्य में आयोजित अंतरर्राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी

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विश्व हिंदी संगठन, नई दिल्ली द्वारा महादेवी वर्मा जी की जन्मदिवस के उपलक्ष्य में आयोजित अंतरर्राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी में निम्न विषय पर शोधालेख आमंत्रित किये  जा रहे हैं । 

विषय- “महादेवी वर्मा की रचनाधर्मिता : एक पुनरावलोकन “

उपविषय- 

• महादेवी वर्मा के निबंध और स्त्री संघर्ष का चित्रण
• महादेवी वर्मा के काव्य में संवेदना
• महादेवी वर्मा के रेखा चित्रों में चित्रित ग्राम जीवन 
• महादेवी वर्मा के रेखाचित्रों में समाज जीवन और नारी 
• महादेवी वर्मा के रेखाचित्रों में समाज जीवन और पुरुष 
• महादेवी वर्मा के रेखाचित्रों की वस्तु 
• महादेवी वर्मा का गद्य साहित्य एक चिंतन 
• महादेवी वर्मा का पद्य साहित्य: एक चिंतन 
• महादेवी वर्मा के साहित्य में नारी जीवन की समस्या और समाधान 
• महादेवी वर्मा का सांस्कृतिक और राष्ट्रीय जागरण में योगदान 
• महादेवी वर्मा की काव्य कृतियां एक अध्ययन 
• महादेवी वर्मा के काव्य में विरह अनुभूति 
• महादेवी वर्मा के काव्य में संगीत की दृष्टि/ संगीत की दृष्टि से महादेवी वर्मा के काव्य का अनुशीलन 
• महादेवी वर्मा के काव्य में संगीत तत्व 
• महादेवी वर्मा का साहित्य काव्य कला और जीवन दर्शन
• आधुनिक युग की मीरा: महादेवी वर्मा 
• महादेवी वर्मा के गद्य की भाषा एवं विशेषताएं 
• महादेवी वर्मा के काव्य का शिल्प: एक अध्ययन 
• महादेवी वर्मा का व्यक्तित्व एवं कृतित्व : एक अध्ययन

उपर्युक्त विषय पर आमंत्रित शोधालेख ISBN पुस्तक में प्रकाशित किये जायेंगे और आपको PDF ई –मेल द्वारा भेज दी जायेगी I 

1. शोधालेख Kruti Dev 10 तथा Unicode Font में भेजे I  (Font size 16, MS Word File)
2. शब्द संख्या 1500 से 2500 शब्दो तक हो I 
3. शोधालेख ई-मेल vishwahindisangathan@gmail.com  पर दि. 22 मार्च, 2021 तक भेजे I
4. शोधालेख पर महाविद्यालय का नाम, Mobile No., E-mail address आवश्यक है।
5. पंजीकरण शुल्क ₹.100/- (शुल्क भुगतान UPI/NEFT द्वारा निम्न खाते में करना है I
Account Holder name- Garima Jain 
Account no 10340813481, 
IFSC- SBIN0003752, 
MICR – 208002062. Branch Code- 3752

अंतरर्राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी पंजीकरण लिंक

विश्व हिंदी संगठन टेलिग्राम लिंक 

संपर्कसूत्र  :
1. डॉ. कोयल विश्वास –  9035042342
2. डॉ. आरती पाठक  –  9584812608
3. डॉ. गरिमा जैन   –  9035042342
4. डॉ. संतोष कुलकर्णी – 9421362107

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एक दिवसीय राष्ट्रीय हिंदी वेबीनार – “समकालीन : स्त्री, दलित, आदिवासी एवं किन्नर विमर्श”

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एक दिवसीय राष्ट्रीय हिंदी वेबीनार – “समकालीन : स्त्री, दलित, आदिवासी एवं किन्नर विमर्श”

.वि.प्र. समाज संचालित, कर्मवीर शांताराम बापू कोंडाजी वावरे कला, विज्ञान व वाणिज्य महाविद्यालय सिडको, नासिक-8 (महाराष्ट्र) के हिंदी विभाग एवं आय.क्यु.ए.सी. के सयुंक्त तत्वाधान से एक दिवसीय राष्ट्रीय हिंदी वेबीनार “समकालीन : स्त्री, दलित, आदिवासी एवं किन्नर विमर्श” इस विषय पर आयोजित किया जा रहा है|

वेबीनार में आमंत्रित साहित्यकार एवं विद्वतजन :- 

1.श्रीमती नासिरा शर्मा (प्रमुख अतिथि, प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं आलोचक)
2.श्रीमती अनामिका (प्रतिष्ठित साहित्यकार)
3.श्रीमती सूर्यबाला (सुप्रसिद्ध हिंदी कथाकार)
4.डॉ. विजयकुमार रोड़े (प्रोफ़ेसर हिंदी विभाग, सावित्रीबाई फुले, पुणे विश्वविद्यालय पुणे)
5.डॉ. दीपेंद्रसिंह जडेजा (प्रोफ़ेसर हिंदी विभाग, महाराजा सयाजीराव गायकवाड विश्वविद्यालय, बडौदा)
national seminar

*वेबीनार हेतु पंजीकरण पुर्णतः निशुल्क है |

प्रतिभागियों को पंजीकरण करने के बाद ही वेबीनार में सम्मिलित होने का अवसर प्राप्त होगा । तद्पश्चात फीडबैक फॉर्म भरने के उपरांत ई-सर्टिफिकेट प्राप्त होगा। आपकी गरिमामय उपस्थिति सादर प्रार्थनीय है।
* संयोजन समिति :-
*अध्यक्ष : प्राचार्य डॉ. जे.डी.सोनखासकर
*समन्वयक :
डॉ. मंजूर सैय्यद (हिंदी विभाग प्रमुख, मो. 9822991516)
डॉ. एन.पी. नाठे (मो. 9423179873)
श्री. पी.बी. बिरारी (मो. 9850391121)
डॉ. जी.पी. परमार (मो. 7972969593)
· हिंदी विभाग ईमेल- hindi@cidcocollegenashik.ac.in

· वेबीनार पंजीकरण हेतु लिंक – https://forms.gle/NvPaSoqNz3HTPDbJ8

·निम्नांकित व्हाट्सप समूह की लिंक में से किसी एक लिंक से जुड़े :-
1. व्हाट्सप समूह – https://chat.whatsapp.com/LbwyptHqs2g0IaozyqLvWC
2. व्हाट्सप समूह – https://chat.whatsapp.com/Eut8GyRI5Tj5HUsJJxQIHL
3.व्हाट्सप समूह – https://chat.whatsapp.com/HLriP0QCaJd6Oi4YlXrbAO
वेबीनार आरंभ होने से पहले 30 मिनट पूर्व व्हाट्सप समूह पर आपको गूगल मिट से जुड़ने की लिंक भेज दी जायेंगी |
धन्यवाद सहित !

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कहाँ गई गौरैया

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कहाँ गई गौरैया
छुटकी,प्यारी गौरैया
चीं चीं करती गौरैया
संगी अपनी गौरैया,
शायद ढूंढ रही हो 
उड़ उड़ वैसा अंगना
सूख रहे हों धान वहाँ,  
सुस्ताए और कर सके
कुछ देर जलपान जहाँ,
चूर हुई थक कर  पर
धान मिले न अंगना,
उदास  हुई गौरैया
कहाँ गई गौरैया!!
शहर शहर में ढूंढे गाँव
गाँव गाँव में बाग,
नीम मिला  न खेत कहीं
दिखते नहीं बिखरे दाने,
जाए कहाँ भूख मिटाने,
न पेडों पर पानी की हाँडी
रहे न ताल तलैय्या
रूठ गई गौरैया,
छोड चली गौरैया,
जाने कहाँ गई गौरैया !!
-ओम प्रकाश नौटियाल 
(पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित )
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किस पर लिखूं कविता

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                    चाहता हूं ऐसी कविता लिखना
                    जिसमें लहरें न हों,
                    उनका अथक दोहराव
                    बड़ा उबाऊ है
                    प्रेरक तो कतई नहीं,
                    चांद को भी कविता में
                    कैसे  दूं स्थान
                    भाता नहीं उसका
                    घटता बढ़़ता आकार,
                    और फिर 
                    सदियों से बना रक्खी है
                    हमसे  दूरी
                    ओह इतना अहंकार,
                    पास आने की 
                    बिल्कुल चाह नहीं,
                    कविता में क्यों जिक्र हो 
                    फूलों का
                    उनकी सुगंध का 
                    `भंवरों की गुंजन का
                    नदियों की कलकल का 
                    हवाओं पर्वतों का
                    इन सबके जीवन में तो
                    अभाव है
                    मानवीय जीवन की
                    विकटता औ’ विविधता का,
                    समर्पण इनका स्वभाव है , 
                    चाहता हूं 
                    कविता में जिक्र न हो
                    तारों का
                    सपनों और बहारों का
                    चाह इतनी सी है
                    कि कविता जीवन के पास हो
                    पर कविता इसके लिये
                    शायद अभी तैयार नहीं 
                    और जिनसे इसका रिश्ता है
                    उनसे भूख का सरोकार नहीं !! 
  -ओम प्रकाश नौटियाल
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समीक्षा -उपन्यास “अज्ञातवास” ,समीक्षक -ओम प्रकाश नौटियाल

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उपन्यास “अज्ञातवास”
उपन्यास लेखिका – अनुपमा नौडियाल
प्रकाशक -हिंद युग्म ब्लू
पृष्ठ संख्या -96
मूल्य 125 /-
अमेजन पर उपलब्ध (लिंक) : https://www.amazon.in/Agyaatvaas-Anupama-Naudiyal /dp/9387464881/
उपन्यास समीक्षक -ओम प्रकाश नौटियाल, वडोदरा, मोबाइल 9427345810

2020 में प्रकाशित लेखिका अनुपमा नौडियाल के उपन्यास अज्ञातवासका ताना बाना
युवाओं के  मन में अपने आने वाले समय
में  समाज के लिए कुछ अलग हटकर  अच्छा करने की 
आदर्श अभिलाषा के अंकुरित और पल्लवित होने के इर्द गिर्द बुना गया है ।
भविष्य में सकारात्मक बदलाव लाने   की
मंजिल चुनने की उनकी मनोकामना एक स्वस्थ सोच है लेकिन इसके लिए अपने वर्तमान को
सँवारना और विद्यार्थी जीवन का समय इस भाँति सुकारथ लगाना कि मँजिल पाने की राह की
चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए व्यक्ति सक्षम हो सके और अपना संबल स्वयं बन सके
, नितांत आवश्यक है । यह वह उम्र है जिसमें अपनी मंजिल तय
करने के लिए अपनी क्षमताओं के सही आकलन के साथ साथ स्वस्थ और परिपक्व सलाह की
आवश्यकता तो होती है किंतु साथ ही साथ यही वह उम्र होती है जिसमें सबसे अधिक भ्रम
पालने और स्वयं को सर्वज्ञानी समझने का जुनून भी चरम पर होता है अतः युवाओं को
समझाने के लिए माँ बाप और गुरू जनों में
, सलाह देने का आभास
दिए बिना
, सलाह देने की कला आनी चाहिए । यह समय अपने   बुद्धि ज्ञान, कौशल और
सोच  में परिपक्वता लाने और उसे सुद्दढ
करने का है
,किंतु साथ ही साथ युवा अवस्था में भ्रमित होने ,
अव्यवहारिक लच्छेदार बातों से प्रभावित होकर पथ विचलित होने की
संभावना भी बहुत अधिक रहती है ।

उपन्यास अस्सी के दशक के मध्य से प्रारंभ होता है । आत्म
विश्वास से सराबोर और  प्रतिभासंपन्न
छात्रा मंजुला कैसे एक  खोखले आदर्शों पर
जीवनयापन कर रहे और वर्षों से कालेज में रहकर एक के बाद एक डीग्री हासिल करने वाले
पलायवादी
, अधिक उम्र के अथर्व के
विचारों  से प्रभावित होकर
, उसके साथ प्रेम करने लगती है और जीवन यात्रा में उसकी सहयात्री बनकर अपने
आदर्शों को मूर्तरूप देने की सोचने लगती है । साथ ही कालेज में उसकी एक प्रिय
सहेली स्वरा भी है सहमी
, संकोची सी । इन प्रनुख पात्रों की
रोचक जीवन यात्रा में गुंफित यह उपन्यास हर द्दष्टि से अत्यंत प्रभावशाली बन पडा
है । उपन्यास कालेज परिवेश में जन्म लेकर मंजुला के युवा मष्तिष्क में चल रहे
वैचारिक संघर्ष
,पारंपरिक तय पथ को छोडकर किसी अन्य
कंटकपूर्ण मार्ग के माध्यम से एक धुँधली सी मंजिल पाने  की ललक और इसके लिए हर टकराव से मुकाबला करने
की अप्रतिम इच्छा के सहारे आगे बढता है । उपन्यास की कथावस्तु के विषय में पाठकों
की रोचकता बनाए रखने  के लिए केवल इतना
कहना चाहूँगा कि उपन्यास हर द्दष्टि से पाठकों को बाँधे रखने में सक्षम है । कालेज
के परिवेश
,विद्यार्थियों के वार्तालाप का सहज, स्वाभाविक और यथार्थपूर्ण चित्र ,कथानक के छोटे छोटे
प्रभावशाली मोड उपन्यास की रोचकता और गतिशीलता बनाए रखते हैं। विभिन्न पात्रो के
मध्य वार्तालाप छोटे और स्वाभाविक हैं और शब्द चयन भी पात्रों के चरित्र के अनुसार
सटीक है । कहीं भी केवल  कलम का चमत्कार
दिखाने के लिए लम्बे उबाऊ वर्णन नहीं हैं
, छोटे छोटे
स्वाभाविक संवाद हैं कोई उपदेशात्मकता नहीं । युवाओं के लिए अत्यंत लाभप्रद और
उनके जीवन की दिशा निर्धारित करने वाले संदेश कथानक के अत्यंत रोचक यथार्थ परक
प्रस्तुतिकरण एवं  उसमें निहित प्रसंगो से
स्वतः निकल आते हैं जो पाठक के हृदय पर गहरी छाप छोडने में सफल रहते हैं
,मेरे विचार से यह उपन्यास  युवा
वर्ग को तो अवश्य ही पढना चाहिए
, और इसकी प्रतियाँ हर कालेज
के पुस्तकालय में  होनी चाहिएं ।

उपन्यास की भाषा में परंपरा और आधुनिकता का समावेश पात्रों ,समय और महौल के अनुरूप विविधता  के रंग और शब्द चयन लिए हैं ,चाहे वह बुद्धिजीवियों का जामा ओढे और खोखले आदर्शों पर जी रहे पात्रों की
आपसी बातचीत हो
, जसवन्ती के बच्चो की बाल सुलभता हो,
या सहेलियों के मध्य हो रही अंतरंग वार्ता हो या फिर अलग अलग
पीढियों के पात्रों के मध्य का संवाद । पात्रों के मनोविज्ञान उनके आत्मसंघर्ष के
चित्रण में सिद्धहस्त लेखिका अनुपमा जी की पहली पुस्तक “अपने अपने प्रतिबिंब
” की कहानियों को भी मैंने पढा है और सादगी तथा बिना अनावश्यक अतिरेकता के
कथावस्तु को अत्यंत रोचक और सहज  ढंग से
प्रस्तुत करने की उनकी प्रतिभा को सराहा है ।

मुंशी प्रेमचंद ने कहा था, ” मैं उपन्यास को मानवजीवन का चित्रमात्र समझता हूं।
मानव
चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही
उपन्यास का मूल तत्व है।
मुझे इस बात की प्रसन्नता है
कि इस मापदंड पर यह उपन्यास खरा उतरता है ।

सुगठित कथानक , सजीव
, स्वाभाविक चरित्र-चित्रण ,पात्रों और
परिस्थितियों के अनुसार संवाद तथा सरल एवं व्यवहारिक भाषा
,युवा
कल्याण की ओर इंगित करने वाले नैतिक आदर्शों की प्रतिष्ठा का प्रयास इस उपन्यास की
खूबियाँ हैं ।

उपन्यास विधा भारतेन्दु , द्विवेदी ,प्रेमचंद और प्रेमचंदोत्तर  युगों से गुजर कर आधुनिक युग तक पहँच गई है ।
अलग अलग युग में उपन्यास की विषय वस्तु और कथन शैली तत्कालिन विचारधाराओं
,
भौगोलिक और एतिहासिक पृष्ठ भूमि आदि से प्रभावित रही है । हर युग ने
हमें बहुत अच्छे उपन्यास दिए हैं और इनकी सफलता का एक मात्र स्वीकार्य मापदंड रहा
है पाठकों के मध्य उनकी लोकप्रियता । यही उपन्यास की सफलता का पैमाना होना चाहिए
और उसकी श्रेष्ठता के आकलन की सही  तकनीक
भी । इस कृति की यह समीक्षा भी इसी पाठकीय द्दष्टि से है ।

 मैं चाहूँगा कि
विद्यार्थी
, युवावर्ग , साहित्यकार एवं साहित्य प्रेमी एक बार इस उपन्यास को अवश्य पढें ,पढवाएं और अपनी प्रतिक्रिया दें । मैं प्रतिभाशाली लेखिका अनुपमा जी को
उनको इस अनुपम सृजन के लिए बधाई देता हूँ आशा है भविष्य में उनसे इसी तरह का
स्तरीय साहित्य पढने को मिलेगा । वह संभावनाओं से सराबोर हैं । मेरी हार्दिक
शुभकामनाएं ।

ओम प्रकाश नौटियाल, वडोदरा,मोबाइल 9427345810

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चिपको आंदोलन के प्रणेता डा. सुंदर लाल बहुगुणा

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पर्यावरण चेतना के मुखर और प्रखर स्तंभ , गाँधीवादी डा. सुंदरलाल बहुगुणा का जन्म 9 जनवरी 1927 को उत्तराखण्ड के टिहरी जिले में मरोडा नामक स्थान पर हुआ था । शुक्रवार 21 मई 2021 को दोपहर लगभग 12 बजे  एम्स ऋषिकेश में , जहाँ वह कोरोना संक्रमित होकर 8 मई को भर्ती हुए थे , उन्होंने  94 वर्ष की आयु में इस नश्वर देह को त्याग दिया ।
उनके जीवन का प्रमुख लक्ष्य पर्यावरण सुरक्षा रहा जिसके लिए वह आजीवन प्रयत्नशील रहे । वृक्षों की सुरक्षा के लिए चलाया गया उनका 
’चिपको आंदोलन ’ वृक्ष संरक्षण की दिशा में एक अद्वितीय मुहीम के रूप में विश्व भर में जाना और सराहा गया । इस आंदोलन में पर्वतीय महिलाएं उनकी विशेष सहयोगी रही । यह आंदोलन उन्होंने 1970  में गौरा देवी और अन्य महिलाओं के सहयोग से आरंभ किया गया था । 27  मार्च 1974 को चमोली जिले के गाँवों की महिलाएं ठेकेदार के आदमियों से वृक्ष कटान बचाने के लिए वृक्षों पर चिपक कर खड़ी हो गई । वृक्ष बचाने का यह आंदोलन बहुत जल्दी ही पूरे देश ,यहाँ तक की विश्व भर में , एक प्रभावी आंदोलन के रूप में फैल गया । प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी से मिलकर उन्होंने पंद्रह वर्ष के लिए वृक्षों के कटने पर रोक लगवा दी ।
डा. बहुगुणा प्रांरंभिक शिक्षा के पश्चात लाहौर चले गए थे जहाँ से वह स्नातक होने के पश्चात वापस लौटे । किशोर अवस्था में उन्होंने अपना राजनीतिक जीवन शुरू कर दिया था ,वह गाँधी जी के परम अनुयायी थे । 1949 में मीरा बेन और ठक्कर बाबा से मुलाकात के पश्चात वह दलित वर्ग के विद्यार्थियों की अनेकों समस्याओं को लेकर तथा मंदिर में दलितों के प्रवेश को लेकर आंदोलनरत हुए । 1956 में उनका विवाह विमला नौटियाल जी से हुआ जो जीवन भर उनके कामों में भरपूर सहयोग देती रही ।विमला जी  ने सामाजिक कार्य हेतु स्वयं भी कई संस्थाओं का सफल और प्रभावी संचालन किया । विवाह के पश्चात बहुगुणा जी ने राजनीति से सन्यास लिया और स्वयं को पूरी तरह पर्यावरण सुरक्षा और पर्वतीय लोगों के हित में समर्पित कर दिया । 1971 में उन्होंने पत्नी के सहयोग से नवजीवन मण्डल की स्थापना की तथा पर्वतीय क्षेत्रों में शराब की दुकाने खोलने के विरोध में सोलह दिन का अनशन किया ।
1980 के प्रारंभिक वर्षों मे उन्होने पर्वतीय लोगों के मध्य पर्यावरण का संदेश देने के लिए पाँच हजार किलोमीटर की यात्रा की । उन्होंने टिहरी बाँध निर्माण के विरोध में 84 दिन का लम्बा उपवास रक्खा । वह पर्वतीय  क्षेत्रों मे अंधाधुंध हो रहे निर्माण और लक्जरी टूरिज्म के भी विरोधी थे । कालान्तर में जब उतराखणड में  जल प्रलय , भूकंप ,बाढ ,बादल फटने जैसी घटनाओं की आवृति बढ गयी जिनके अनेक कारणों में पर्यावरण से घातक छेड़ छाड़ प्रमुख कारण था तब लगा कि बहुगुणा जी जैसे पर्यावरणविदों की दूरगामी द्दष्टि की अवहेलना करना कितना घातक हुआ है ।
बहुगुणा जी को 1980 में अमेरिका की फ्रैंड्स आफ नेचर संस्था ने सम्मानित किया । 1986 में उन्हें रचनात्मक कार्यों के लिए जमनालाल पुरस्कार मिला ,1987 में चिपको आंदोलन के लिए राइट टू लाइवलीहुड सम्मान मिला । 1989 में उन्हें IIT रूरकी विश्वविद्यालय ने डाक्टर आफ सोशल साइन्सेस की मानक उपाधि से तथा 2009 में भारत सरकार ने पद्म विभूषण से सम्मानित किया ।
विश्व में पर्वावरण के सच्चे हितैषियों को जब जब याद किया जाएगा ,देवभूमि पुत्र , देश के गौरव डा. सुन्दर लाल बहुगुणा का नाम सर्वोपरि रहेगा । ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे । और अंत में चिपको आंदोलन का यह प्रेरक घोष युग्म :
क्या हैं जंगल के उपकार , मिट्टी पानी और बयार 
मिट्टी पानी और बयार ,जिंदा रहने के आधार !
डा . सुंदर लाल बहुगुणा जी को कोटि कोटि नमन  !!
-ओम प्रकाश नौटियाल
बडौदा ,गुजरात
(तथ्य -अंतर्जाल के सौजन्य से )
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विश्व पर्यावरण दिवस -2021

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 अमेरिका के पूर्व राष्ट्र्पति अब्राहम लिंकन ने एक बार पाखंडी शब्द को परिभाषित करते हुए कहा था – “यह मुझे उस व्यक्ति की याद दिलाता है जो अपने माता पिता का वध करने के बाद अदालत में यह कहकर दया की भीख माँगता है कि वह अनाथ है ।” कुछ यही हाल आज हमारा है हम वर्षों से पर्यावरण की निर्मम हत्या करते हुए  अब भगवान से हमें विष कूप से बाहर निकालने की प्रार्थना कर रहे हैं जो हमने तथाकथित विकास के नाम पर अपने लिए स्वयं तैयार किया है । हमारा साँसे आज सुरक्षित नहीं हैं । पर्यावरण के निरंतर ह्वास की चिंता भी बहुत पुरानी है किंतु इस विषय में गोष्ठियों, भाषणो अथवा कहीं कही  यदा क्दा किए गए छुट मुट प्रयासों से अधिक कुछ विशेष नहीं हुआ है हाँ चिंता के उद्‍घोष  में बुलंदी अवश्य आई है ।
आज से 49 वर्ष पहले स्वीडन की राजधानी स्टाकहोम में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पर्यावरण और प्रदूषण पर पहला अंतराष्ट्रीय सम्मेलन 5 जून से 16 जून तक आयोजित किया गया था इसी सम्मेलन में , जिसमें 119 देशों ने भाग लिया था  , संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का गठन किया गया था जिसका नारा  था- “केवल एक पृथ्वी”। तभी से हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस हर वर्ष नए थीम के साथ  मनाया जाता है ।  2018, 2019 , 2020  में यह  थीम्स क्रमशः इस प्रकार  थी -बीट प्लास्टिक पॉल्यूशन, वायु प्रदूषण एवं जैव विविधता ।
इस वर्ष अर्थात 2021 में ,शायद कोरोना महामारी में पर्यावरण असंतुलता का भारी योगदान देखते हुए, थीम है ‘Ecosystem Restoration’  यानि जिसका पारिस्थितिक तंत्र  की पुनर्बहाली । इस थीम का उद्देश्य है – नष्ट प्रायः हो चुके पारिस्थितिक तंत्र को  पुनर्जीवित करने का यथा संभव प्रयास करना तथा  उन पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण करना ,जो  अभी बरकरार हैं, किंतु जिन्हे अत्यंत देखभाल की आवश्यकता है । पर्यावरण के प्रति हर व्यक्ति का सजग होना अत्यंत आवश्यक है । बाढ़, भूकम्प, भूस्खलन आदि आपदाओं की तीव्रता कम करने के लिए वृक्ष लगाने और उनकी देखभाल करना सभी का कर्तव्य है तभी हम भावी पीढी को अच्छा पर्यावरण धरोहर के रूप में सौंप सकते हैं ।
लिए कुल्हाड़ी हाथ में, आया अंध विकास
बिन देर कर बिछा गया, शत वृक्षों की लाश ,
वृक्षों की रक्षा करें , नई लगाएं पौध 
तब ही निकट भविष्य में, ले पाएंगे श्वास !!
-ओंम प्रकाश नौटियाल
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दुनियाँ लगे अलाव

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कैसा खेला धूप ने, यह अजीब सा दाँव
पहले वृक्ष सुखा दिये, ढूंढ़ रही अब छाँव
किरणें दिखलाने लगी , अपना रूप प्रचंड़
मौसम के आदेश पर , हमे दे रही दंड़
सूरज तपता देखकर , गई बसंत बहार
रूखा सूखा हो चला , नदियों का व्यवहार
तनहा सूरज धूप से, कैसे करे बचाव
अंतस मे जब आग हो, दुनियाँ लगे अलाव
सूर्य देव के क्रोध को, मौसम की पहचान
ठंड़ा पड़ता शीत में,  चढ़ता ग्रीष्म उफान
सूरज का चाबुक चला नदियाँ हुई लकीर
ताल तड़ाग सूख गये, नयन बचा बस नीर
हरा भरा पथरा गया, फैली रेत ही रेत
झुलसे झुलसे लोग हैं, सूखे सूखे खेत
भानु भट्टी भभक रही, धरा तपे बेभाव
जले भुने जो विगत से,उन पर कहाँ प्रभाव ?
-ओम प्रकाश नौटियाल
(सर्वाधिकार सुरक्षित )
https://www.amazon.in/s?k=om+prakash+nautiyal

योग

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योग
माया के लोभी नहीं  
बड़भागी वह लोग,
तन ,मन सदा स्वस्थ रहे, 
करते हैं नित योग
करते हैं नित योग , 
डाह से दूर सदा हैं
चैन , प्रेम, संतोष , 
हृदय  में रचा बसा है
कहें ’ओ्म’ कविराय , 
भाग्य से दिन फिर आया
विश्व करेगा योग, 
इसी मे ब्रह्म समाया !
-ओम प्रकाश नौटियाल