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कविता- नींद

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Photo by engin akyurt on Unsplash

नींद आयी

मेरी पलकों पर बैठ

मुझसे बोली

सुनो!

मैंने कहा-बोलो

आज तो ख्वाब आने से रहे

मैंने कहा क्यों?

वह बोली

कॉफी बनाओ

मैंने कहा- आधी रात

वह बोली

मेरा मन कर रहा है

रात नापते नापते

कदम बोझिल हो गये हैं

फिर मैंने मुस्कुराकर

दो प्याली कॉफी बनायी

हमने साथ साथ पी

तब तक लाली छा गई

वह बोली

अब मैं सूरज की छाती पर

सिर रखकर सोने जा रही!

   डॉFB IMG 1624410037707 b2bc2faa. ऋचा द्विवेदी

विभिन्न देशों की भाषाओं के शब्दकोश

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‘अवगत’ अवार्ड 2021

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Photo by Brands&People on Unsplash

‘अवगत’ अवार्ड 2021

अक्षरवार्ता अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका एवं कृष्ण बसंती शैक्षणिक एवं सामाजिक जनकल्याण समिति, उज्जैन, मप्र., भारत

दिनांक – 14 सितंबर 2021

स्थान – उज्जैन, मप्र.

पंजीयन प्रारूप

लिंक- https://docs.google.com/forms/d/1dbYOILxBHMzC6cwQAZC5u3GWpEOMwhpXAPRVgNTzRiQ/edit
महोदय/महोदया,

प्रसन्नता का विषय है कि अक्षरवार्ता अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका एवं कृष्ण बसंती शैक्षणिक एवं सामाजिक जनकल्याण समिति (पंजी.) द्वारा विभिन्न राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्री संगोष्ठियों, विभिन्न समारोहों, कवि सम्मेलनों, पुरस्कार वितरण समारोह, अक्षरवार्ता अवार्ड समारोह की अगली श्रृंखला में 14 सिंतंबर 2021 को अकादमिक/शोध/साहित्य में उत्कृष्ट कार्य हेतु ‘‘अवगत‘‘ अवार्ड 2021 का आयोजन किया जा रहा है।

यह अवार्ड ‘‘अवगत‘‘ अवार्ड 2021 के नाम से देय होगा।

इस अवार्ड हेतु प्रतिभागीता के लिए कुछ सामान्य नियम इस प्रकार हैं।

अकादमिक/शोध/साहित्य के क्षेत्र में यदि आपने कार्य किया है, अर्थात उक्त संदर्भित क्षेत्र में आपके कोई भी प्रकाशन हुए हैं, तब आप इस ‘‘अवगत‘‘ अवार्ड 2021 हेतु पंजीयन कर सकते हैं।

पंजीयन हेतु निर्धारित प्रारूप में फार्म भरकर ईमेल के माध्यम से अपने बायोडाटा के साथ भेजना होगा, जिसमें आपके कार्य का उल्लेख हो। अथवा यहाँ संलग्न पंजीयन प्रारूप भरकर सबमिट करना होगा, जिसके बाद आपको ईमेल से पंजीयन शुल्क जमा करने हेतु लिंक प्राप्त होगी।
पंजीयन शुल्क – 2000/-
‘‘अवगत‘‘ अवार्ड 2021 हेतु गठित समिति द्वारा निर्धारित मापदण्ड के आधार पर आपका चयन किया जावेगा।

चयन के पश्चात निर्धारित पंयीयन शुल्क जमा करना होगा, जिसकी लिंक ईमेल के माध्यम से प्रेषित की जावेगी।

14 सितंबर 2021 को उज्जैन, मप्र. में एक भव्य समारोह में यह अवार्ड दिये जावेंगे, जिसके अंतर्गत प्रमाणपत्र, रिकगनीशन लेटर, शील्ड/मोमेंटो, मेडल, बेज, आदि दिया जावेगा।

चयन का अंतिम अधिकार आयोजन समिति का होगा एवं परिस्थिति अनुरूप अवार्ड समारोह की दिनांक में परिवर्तन किया जा सकता है।

विवरण भेजने हेतु ई मेल -seminar45march@gmail.com

संपर्क
डाॅ. मोहन बैरागी
संपादक- अक्षरवार्ता अंतराष्ट्रीय शोध पत्रिका
व अध्यक्ष, ‘‘अवगत‘‘ अवार्ड 2021 आयोजन समिति, उज्जैन, मप्र.
मोबाईल- 8989547427
आयोजन समिति-
डॉ. शैलेंद्रकुमार शर्मा
कुलानुशासक- विक्रम यूनिवर्सिटी, उज्जैन
डॉ. जगदीश शर्मा, उज्जैन
डॉ. राजश्री शर्मा, उज्जैन
डॉ. मोहसिन खान, महाराष्ट्र
डॉ. अवनिश अस्थाना, उप्र
डॉ. बी. एल. मालवीय, मप्र.
डॉ. ख्याति पुरोहित, गुजरात
डॉ. किरण खन्ना, पंजाब
डॉ. रुपाली सारये, मप्र.
डॉ. श्वेता पंड्या,मप्र.
डॉ. राम सोराष्ट्रीय,मप्र.
डॉ. पराक्रम सिंह,दिल्ली
डॉ. अलका चौहान, मप्र.
डॉ. रेखा कौशल,मप्र.
डॉ. राकेश परमार,मप्र.

पंचरतंत्र की कथाएँ

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पुस्तक समीक्षा

 तंत्र को अनावृत करती ‘पंचरतंत्र की कथाएँ’

समीक्षक: राहुल देव

व्यंग्य के लगभग पुरुषोचित समझ लिए गए क्षेत्र में नई पीढ़ी की स्त्री व्यंग्यकार भी पूरी मजबूती के साथ बराबरी करते हुए सामने आई हैं। उनके विषय भी केवल सामाजिक नही रह गए हैं बल्कि समय-समाज के राजनीतिक, आर्थिक, साहित्यिक, धार्मिक हालातों में मौजूद विसंगतियों पर भी वे पैनी नज़र रखकर लिख रही हैं। आमतौर पर मैं व्यंग्य लेखिकाओं पर अपनी आलोचनात्मक राय देने से बचता हूँ क्योंकि अधिकांश लेखिकाएं आलोचना को सहजता से नही ले पातीं | अगर कभी-कभार आपकी आलोचना भी हो तो वह इन्हें सकारात्मक भाव से ग्रहण करना चाहिए। उसके लिए विचलित होने की जरूरत नही है। प्रशंसा की तरह आलोचना भी आपकी रचनाशीलता के विकास का एक जरुरी हिस्सा है। आप सभी व्यंग्य लेखिकाएं समकालीन परिदृश्य में हिंदी व्यंग्य का एक उम्मीदों भरा चेहरा उपस्थित करती हैं।

इंद्रजीत कौर का नाम समकालीन महिला व्यंग्यकारों में प्रमुखता से लिया जाता है। वह एक साहसी व्यंग्य लेखिका हैं। इस वर्ष रुझान पब्लिकेशन से उनका दूसरा व्यंग्य संग्रह ‘पंचरतंत्र की कथाएं’ प्रकाशित होकर आया है | इस संग्रह में उनके 56 व्यंग्य संकलित हैं | अपनी बात उन्होंने ‘व्यंग्य में सामयिकता’ पर विचार प्रकट करते हुए की है | व्यंग्य तात्कालिक विसंगतियों पर संवेदनशील मनुष्य की शाब्दिक प्रतिक्रिया होती जरुर है लेकिन उसे रचनात्मक साहित्य में किस तरह ढालें यह सीखना-समझना होता है नही तो एक सामान्य टिप्पणी और एक व्यंग्य रचना में अंतर करना मुश्किल हो जायेगा | इसलिए लेखक को इसकी चिंता छोड़ करके केवल गुणवत्तापूर्ण लेखन पर अपना फोकस करना चाहिए | रचना सामयिक होकर भी भविष्य में प्रासंगिक हो सकती है और रचना शाश्वत का लबादा ओढ़कर भी कूड़ेदान लायक हो सकती है | जब समय अनुकूल होता है तो एक सच्चा लेखक लिखे बगैर रह ही नही सकता है उसकी कलम से रचना फूट ही पड़ेगी |

संग्रह के पहले व्यंग्य को पढ़ते हुए ही अवध की प्रखर व्यंग्य तासीर महसूस होने लगती हैं | इस तासीर के साथ जब पंजाबी फ्लेवर मिलता है तो एक अलग ही आनंद की सृष्टि होती है | इन्द्रजीत के पास सरोकार संपन्न विचारदृष्टि तो है ही जिसके साथ उनका भाषाई शरारत भरा व्यंग्य कौतुक मिलकर रचना को अत्यंत पठनीय बना देता है | इनके व्यंग्यों से गुज़रते हुए लेखिका का अपने परिवेश में व्याप्त विसंगतियों के प्रति गहरी संलग्नता दिखाई देती है | फिर चाहे वह ‘पुरुष सशक्तिकरण वाया फिल इन द ब्लेंक्स’ शीर्षक व्यंग्य हो या ‘होलियानी कविता और तुकबंदी की सा रा रा’ | वह कितने ही मज़े लेकर अपने विषय को शुरू करें लेकिन व्यंग्य के अंतिम उद्देश्य का उन्हें हमेशा स्मरण रहता है | इस कारण उनके व्यंग्य मनोरंजन की सीमित परिधि से निकलकर सार्थक व्यंग्य की परम्परा से जुड़ते हैं | ‘हमारी व्यवस्था की गुरुत्वाकर्षण तरंगें’ शीर्षक व्यंग्य के प्रारंभ में वह लिखती हैं- ‘न्यूटन के पास गुरुत्वाकर्षण सिद्ध करने के लिए एक सेब ही रहा होगा | हमारे पास तो नैतिकता, रुपये का मूल्य, पुलों की कतारें, विद्यालयों की छतें, फैशन परेड के कपड़े आदि कितनी ही चीज़ें हैं इस सिद्धांत को मजबूत करने के लिए |’

व्यंग्यकार को प्रतीक योजना बनाकर व्यंग्य लिखने में तो जैसे महारथ हासिल है | संग्रह का ‘घासतंत्र और रजुआ’ शीर्षक व्यंग्य | मुझे लेखिका के इस संग्रह में कुछ व्यंग्यों के शीर्षक लम्बे मालूम होते हैं | शीर्षक रखने में हमें जल्दबाजी नही करनी चाहिए | रचना का शीर्षक हमेशा संक्षिप्त होना चाहिए तथा उसे सम्पूर्ण व्यंग्य का प्रतिनिधित्व करने वाला होना चाहिए | जैसे ‘ज्यों-ज्यों तबियत बिगड़ने लगी’ शीर्षक व्यंग्य | अपने कंटेंट में यह एक प्रभावशाली व्यंग्य है | इस व्यंग्य से मैं कुछ वक्रोक्तिपूर्ण पंक्तियाँ उदृत करना चाहूँगा –

  • कार्यक्रम वक्त के अनुसार होने के बजाय वक्ताओं के अनुसार शुरू हुआ |
  • माइक पकड़कर वे ख़ुशी से वक्ताये
  • खरखराती हुई आवाज़ में वो वचनाये
  • लोगों ने जितना समझा उस पर तालियाँ बजाईं और जहाँ नही समझा वहां और ज़ोरों से तालियाँ बजायीं |
  • विवादों से सुसज्जित इतिहास के बावजूद महाशय समाचार-पत्रों की सुर्खियाँ नही बटोर पाये थे |

इन्द्रजीत कौर का लेखन बहुआयामी है | व्यंग्य के माध्यम से कहानी बुनने में वह बड़ी ही कुशल हैं | ‘राजा की ऐनक’ उनकी कुछ ऐसी ही व्यंग्यकथा है | इसे पढ़कर पाठक को लेखिका अपनी कल्पनाशीलता से चकित कर जाती है | वर्तमान प्रजातंत्र का इससे अच्छा रचनात्मक ट्रीटमेंट और क्या होगा | ‘एक थे विरोधचंद’ शीर्षक व्यंग्य कथा में लेखिका ने हरदम विरोधी मानसिकता वाले व्यक्तियों की इस प्रवृत्ति पर शानदार व्यंग्य रचा है | इसमें उन्होंने हास्य का अच्छा प्रयोग किया है- ‘वो जब पैदा हुए तो रोकर विरोध कर दिया कि माँ की कोख से क्यूँ जन्म हुआ, पिता से क्यूँ नही ? जब उनके मुँह में दूध की बोतल डाली गयी तो भी रोये थे कि दूध स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है, कोकाकोला पिलाओ |’

इस संग्रह में कुछ व्यंग्य मुझे कुछ अपूर्ण से लगे जिन्हें समय देकर और विस्तार दिया जा सकता था जैसे कि ‘चालाक कौए की सत्यकथा’ और ‘खाली थाली और उनका आभामंडल’  शीर्षक व्यंग्य | बाकी ज्यादातर व्यंग्य संतुलित शब्दसीमा के अंतर रचे गये हैं | ‘कलियुग, कालाधन और कौआ’ शीर्षक व्यंग्य में वह बड़ी सटीक व्यंग्ययोजना बनाकर जनता से किये हुए वादे तोड़ने वाली सत्ता के प्रति सवाल खड़े करती हैं- ‘यह कहा जाता है कि तीन चीज़ें जाने के बाद कभी वापस नही आतीं- मुँह से निकली हुई वाणी, कमान से निकला हुआ तीर और गुजरा हुआ वक्त | इसमें चौथी चीज़ और जोड़ सकते हैं, वो है – देश से बाहर गया हुआ कालाधन |’

आंकड़ों की बाजीगरी से विकास का भ्रम फ़ैलाने वाली सरकार पर लिखा गया अत्यंत सशक्त व्यंग्य है ‘अकड़ के साथ आकड़े दिखाओ’ शीर्षक व्यंग्य | इन्द्रजीत के पास आम बोलचाल की सरल भाषा है जिसमे विट और आयरनी के सटीक प्रयोग से भाषा का अलग ही रूप निकलकर सामने आता है | शैली भी उसी के अनुसार ढली हुई है | ‘आप सच के पुलिंदे हैं सर’ में लेखिका का आक्रोश व्यंग्य की तीव्रता को और तेज कर जाता है- ‘आप जैसे सत्यवादी पर इतना घनघोर इल्जाम ! आप तो हरिश्चंद्र के अग्रज ही नही बल्कि पूर्वज भी हैं | आप सत्य के पास भले ही न जाते हों, सत्य आपके पास दौड़ा चला आता है |’ ‘भरी गगरी छलकत जाय’ शीर्षक व्यंग्य से एक उदाहरण और दृष्टव्य है- ‘वे जागेंगें तो देखेंगें | देखेंगें तो सोचेंगें | सोचेंगें तो बोलेंगें | बोलेंगें तो शोर भी मचा सकते हैं | शोर ज्यादा डेसिबल में हो गया तो तरंगों से कुर्सी हिल सकती है अतः उनका सोना जरुरी है, समझी !’

संग्रह में कुछ व्यंग्य बड़े हल्के फुल्के विषय लगते हुए भी कहीं न कहीं गहरे अर्थ समेटे हुए हैं जैसे कि ‘आंटी की अंटी’ शीर्षक व्यंग्य | इसे पढ़ने हुए ताज्जुब नही होगा कि कहीं बाज़ार के सौन्दर्यजाल में उलझकर लेखिका ने खुद के अनुभव को ही तो शब्द नही दे दिए हैं | इन्द्रजीत व्यंग्य करते हुए किसी को नही बख्शती ‘जीवन के कोटेदार’ शीर्षक व्यंग्य में उन्होंने ऐसे दोमुंहे लोगों पर भरपूर तंज कसा है जो आपके सामने कहते कुछ हैं और आपकी पीठ पीछे करते कुछ हैं | ऐसे फर्जी उपदेशकों की अपने देश में कमी नही है | लेखिका ने अपने इस व्यंग्य में ऐसी प्रजाति के लोगों की जमकर ख़बर ली है |

इन्द्रजीत कौर अपनी कुछ और विशेषताओं के कारण मेरी प्रिय व्यंग्य लेखिकाओं में से एक हैं | उनका लेखन दिनोदिन विकसित हुआ है | संग्रह का ‘रुपये की नाव’ शीर्षक व्यंग्य पढ़कर आप चकित रह जाते हैं | क्या ही दृष्टि और समझबूझ के साथ वह कठिन लगते आर्थिक विषय का निर्वाह करती है ! फिर जो रचना बनकर तैयार होती है वह कठिन नही बल्कि पठनीय हो जाती है | मैं अपने वक्तव्यों में इसे ही व्यंग्य कला कहता हूँ | इन्द्रजीत निश्चय ही जन्मजात प्रतिभासम्पन्न व्यंग्यकार हैं और इस प्रतिभा को उन्होंने घर-परिवार-नौकरी की जिम्मेदारियों के बीच भी जाया नही होने दिया है यह बड़ी बात है | उनका यह व्यंग्य रुपये के अवमूल्यन पर एक तार्किक बहस आमंत्रित करता है | इनके यहाँ मध्यमवर्गीय परिवार की समाजार्थिक समस्याओं को बेहतर स्वर मिला है |

इसके अतिरिक्त इस संग्रह के कुछ अन्य उल्लेखनीय व्यंग्यों में ‘उठो, जागो, लफंगई करो’, ‘देश का बोनसाई पेड़’, ‘गाय, गौरैया और गंगा’, ‘आखिर बसंत मिल गया’, ‘मेरी और उनकी वर्षगांठ’, ‘मन तड़पत बहस करन को आज’, ‘हे अतिथि ! तुम कब आओगे’ आदि का नाम लिया जा सकता है जिन्हें पढ़कर हिंदी व्यंग्य की सार्थकता का एहसास होता है | यह सभी व्यंग्य अपना एक मौलिक मुहावरा गढ़ते हैं | इन्द्रजीत कौर ने इस संग्रह के बाद अपना एक लेवल सेट कर दिया है | हिंदी व्यंग्य को उनसे बड़ी अपेक्षाएं रहेंगी | इस व्यंग्य कथा संग्रह को पढ़ा और सराहा जाना चाहिए |

9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध) जिला-सीतापुर 261203 (उ.प्र.)
मो 8318773947

पंचरतंत्र की कथाएं/ व्यंग्य संग्रह/ इन्द्रजीत कौर/ रुझान पब्लिकेशन्स, जयपुर/ 2019/ पृष्ठ 148/ मूल्य 150/-

 

 

विषपायी होता आदमी

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पुस्तक समीक्षा

अन्याय के खिलाफ क्रांति के स्वर

समीक्षक: राहुल देव

एक संवेदनशील मनुष्य जब व्यवस्था में मौजूद विसंगतियों को देखकर चुप नही रह पाता तब उसकी कलम से जो शब्द रचना निकलती है वह ‘व्यंग्य’ का रूप धारण करती है। जो चीज़ें हम अपने आसपास सीधे सीधे नही बदल सकते उनके बदलाव के लिए हम छटपटाते रहते हैं। उसके पीछे उसके अपने अनुभव हो सकते हैं। मन के किसी कोने में पलता यही क्षोभ या आक्रोश व्यवस्था को सुधारने की नीयत लिए होता है और यह इसे पाठक तक संप्रेषित करने का काम व्यंग्य साहित्य के माध्यम से करता रहा है। जैसे जैसे हमारे समाज में विसंगतियां बढ़ रही हैं उसी गति से व्यंग्यकार भी बढ़ रहे हैं। यह अलग बात है कि उनमे से किसकी कलम को पाठक अपने सिर माथे रखते हैं और किसे समय भूलकर भी याद रखना नही चाहता। हिंदी पट्टी में मध्य प्रदेश न जाने किन विशिष्ट कारणों से व्यंग्य लेखकों के उत्पादन में अग्रणी है। इस क्रम में इंदौर के व्यंग्यकार सुधीर कुमार चौधरी का दूसरा व्यंग्य संग्रह ‘विषपायी होता आदमी’ प्रकाशित होकर आया है। उनके इस व्यंग्य संग्रह में 65 व्यंग्य शामिल किये गये हैं।

संग्रह के प्रारंभ में अपनी बात के अंतर्गत लेखक के विचार पढ़कर व्यंग्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता झलकती है। वह व्यंग्य को उम्मीद की मशाल के रूप में देखते हैं। एक पंक्ति में कितनी सटीक परिभाषा उन्होंने दे दी है कि- ‘अपने भीतर के कबीर को मुखरित करना ही व्यंग्य है।’ ऐसे में उनके इस संग्रह से गुजरना मेरे लिए एक ज़िम्मेदार पाठकीय अनुभव से रूबरू होना रहा। सुधीर जी व्यंग्य क्षेत्र में पूरी तैयारी के साथ आए हैं। आपके व्यंग्य विषय सामान्य जनजीवन से लेकर सामाजिक, राजनीतिक, पर्यावरणीय विषयों पर केन्द्रित हैं। संग्रह के व्यंग्यों की भाषा-शैली सरल-सहज है। सुधीर जी यहाँ भाषा के खेल भले ही न हों लेकिन एक गंभीर वैचारिक पक्ष उनके पास हमेशा मौजूद रहा है। ऐसे व्यंग्यों पर अमूमन सपाटबयानी का खतरा मंडराता रहता है क्योंकि पूरे संग्रह की एकरसता पठनीयता को प्रभावित करती है। स्पष्ट है कि लेखक के लिए व्यंग्य मनोरंजन की विषयवस्तु नही है। उसका व्यंग्य विवेक सामाजिक सुधार की भावना लिए हुए है। संग्रह की रचनाओं से गुज़रते हुए यह भी लगता है कि यह व्यंग्य उनके विभिन्न अख़बारों में छपने वाली रचनाओं का संकलन है। मेरे विचार से इन पर किताब रूप में लाने से पहले थोड़ा और कार्य किया जा सकता है जिससे यह रचनाएँ साहित्यिक व्यंग्य के रूप में और ज्यादा उभर सकती थीं। यथार्थ के सीधे-सीधे प्रस्तुतीकरण में लेखकीय कल्पना का समावेश न होने से कहीं न कहीं यह रचनाएँ एक परिपक्व व्यंग्य रचना का रूप नही ले सकी हैं। संग्रह में कहीं-कहीं लेखक थोड़े में बड़ी बात कह जाते हैं लेकिन पूरे व्यंग्य में केवल एक या दो पंक्ति व्यंग्य की होने से पूरे व्यंग्य के साथ न्याय नही होने पाता। इन कमियों के बावजूद संग्रह की रचनाओं की उपयोगिता से इंकार नही किया जा सकता।

राजनीति सुधीर जी का प्रिय विषय है। अपनी सम्पूर्णता में वह मुझे मौलिक लगे। सत्ता प्रतिष्ठान पर व्यंग्य करते हुए वे बेहद मुखर हो उठे हैं। कहीं कहीं तो उन्होंने नाम ले लेने से भी कोई गुरेज नही किया है। यह उनके साहसी होने का प्रमाण है। लेखन में किसी हस्तक्षेप को वे सहन नही करते। उनका अपना पक्ष आम जनता का पक्ष है।

संग्रह से कुछ उल्लेखनीय व्यंग्य पंक्तियाँ आपके लिए प्रस्तुत हैं-

  • सरकार की चिंता पर्यावरण से ज्यादा गिनीज बुक में वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने की थी। (तथाकथित विकास का विषारोपण बनाम वृक्षारोपण)
  • जिस तरह मानव की विकास यात्रा में पूंछ लुप्त हो गयी है, उसी तरह मोबाइल की विकास यात्रा में टेलीफोन का तार विलुप्त हो गया है। (सब जपें मोबाइल के गुण, बिन सेल्फी सब सून)
  • लोटा, कढ़ाई, करछुल रसोईघर में ही कैद रहे, जबकि चम्मच सत्ता के ड्राइंगरूम में बैठकर ऐश कर रहे हैं। (सर्वव्याप्त चम्मचों की चमत्कारी माया)
  • शहर इतना साफ़ है कि आवारा पशु भी इसकी सफाई को निहारने के लिए सड़कों पर खुलेआम विचरण करने लगे हैं। (स्वच्छता अभियान और व्यवस्था की सतह पर बिखरी गंदगी)
  • इस देश में कुछ भी चोरी हो सकता है। सरकारी सड़क चोरी हो जाती है। सरकारी नहर लापता हो जाती है। कागजों पर खोदे गये कुँए जमीन से चोरी चले जाते हैं। कभी बिजली गायब हो जाती है तो कभी नल से पानी। सरकारी अस्पताल से डॉक्टर और सरकारी स्कूल से मास्टर अदृश्य हो जाते हैं। चुनाव जीतने के बाद नेता नदारद हो जाते हैं। बढती महँगाई में गरीब की थाली से रोटी गायब हो जाती है। आम आदमी के सपने तक चोरी हो जाते हैं। (सरकार की कार का चोरी हो जाना)
  • समाचार यह है कि अच्छे दिन बुलेट ट्रेन पर सवार होकर आने वाले हैं। (बुलेट ट्रेन पर सवार अच्छे दिन)
  • जूते, चप्पल और सैंडिल प्रजातान्त्रिक गुस्से की अभिव्यक्ति का सर्वाधिक सशक्त माध्यम हैं। इनके बगैर प्रजातंत्र गूंगा है। (प्रजातंत्र की पैकिंग में लिपटे जूते-चप्पल)
  • भारत एक अमीर देश है जहाँ गरीब लोग बसते हैं। (अमीर देश के गरीब वासी)
  • घर में आटे से ज्यादा जरुरी मोबाइल का डाटा हो गया है। (सब जपें मोबाइल के गुण, बिन सेल्फी सब सून)

जहाँ एक ओर ‘फेसबुक पर फाल्गुन’ शीर्षक व्यंग्य की प्रतीक योजना गज़ब की है। तो वहीँ दूसरी ओर ‘दुल्हन वही जो मोबाइल चलाये’ तथा ‘मोर्निग वाक बनाम कैट वाक’ जैसे व्यंग्यों में उन्होंने हास्य का भी बड़ा अच्छा पुट दिया है। संग्रह के अन्य कुछ महत्वपूर्ण व्यंग्यों में ‘क्रिकेट के कोलाहल में सिमटा राष्ट्रवाद’, ‘बाबा शरणम् गच्छामि’, ‘माइक, मंच, मीटिंग, मुर्गा और प्रजातंत्र’, ‘चाय, खिचड़ी, पकौड़े और प्रजातंत्र’, ‘राजनीति का खेल’ आदि हैं। पुस्तक का आवरण उपयुक्त तथा छपाई त्रुटिरहित तथा गुणवत्तापूर्ण है। पाठकों को अब लेखक से आगे और अच्छी व्यंग्य रचनाओं की उम्मीद रहेगी। मेरी शुभकामनाएं !

मो. 9454112975

विषपायी होता आदमी/ व्यंग्य संग्रह/ सुधीर कुमार चौधरी/ पुष्पांजलि प्रकाशन, दिल्ली/ 2019/ पृष्ठ 151/ मूल्य 395/-

 

पीठ पर रोशनी

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समय की रोशनी में खिलता जीवन का चेहरा

समीक्षक: राहुल देव

 

‘पीठ पर रोशनी’ युवा कवि नीरज नीर का दूसरा कविता संग्रह है जिसे मुंबई के प्रलेक प्रकाशन ने सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रकाशित किया है। संग्रह की शुरुआत में ही कवि अपनी काव्यप्रक्रिया के बारे में स्पष्ट कर देता है, ‘मेरी कवितायेँ मेरे नितांत निजी अनुभवों, संवेदनाओं की अभिव्यक्ति हैं, जो व्यष्टि से समष्टि की ओर उन्मुख होने का प्रयत्न करती है।’ वह ईमानदारी के साथ आगे कहता है, ‘मेरे लिए मेरी कवितायेँ उदासियों के अँधेरे घेरे से बाहर उजाले में निकलने की जीवंत कोशिश है।’ कवि की यह साफगोई आगे उसकी कविताओं में भी साफ़ झलकती है।

इस कविता संग्रह की कविताओं को पांच भागों में बांटा गया है- आग की कवितायेँ, पानी की कवितायेँ, वायु की कवितायेँ, आकाश की कवितायेँ, क्षितिज की कवितायेँ जोकि कहीं न कहीं जीवन के लिए आवश्यक पंच महाभूतों- क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा को प्रदर्शित करती हैं। यह सारे खंड कहीं न कहीं एक दूसरे से माला के मोतियों जैसे जुड़े हुए से प्रतीत होते हैं। कवि ने बड़ी कुशलता से इन्हें कविता की शक्ल दे दी है।

नीरज नीर के इस नए संग्रह की कविताओं से गुज़रते हुए अक्सर स्मृतियों के बियाबान का सन्नाटा अपना मौन तोड़ता नज़र आता है। उसकी चिंताओं में मनुष्य की मनुष्यता को बचाया जाना हरदम शामिल रहा है। जैसे वर्ग वैषम्य को दर्शाती ‘अलग-अलग चिंताएं’ शीर्षक कविता। प्रेम, मानवीय रिश्ते और भावनाएं, जीवन जगत और प्रकृति जगत के कुछ सुलगते हुए प्रश्न हमारे समकालीन सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने का सहज विश्लेषण करते हैं। अपनी ‘बाज़ार’ शीर्षक कविता में कवि बाजारवाद की भयावहता को लक्ष्य करते हुए मानो हमें चेतावनी देते हुए सा कहता है, ‘बाज़ार ने पैदा की है/ नई नस्ल/ जो स्वयं बाज़ार से दूर रहकर/ बाज़ार को पहुंचा रहा है/ हमारे घरों के अन्दर’। आगे संग्रह की ‘भूख और युद्ध’ शीर्षक कविता में नीरज लिखते हैं, ‘हम जिस दिन समझ जायेंगें/ भूख, युद्ध से बड़ी चुनौती है/ समाप्त हो जायेगा/ युद्ध का भय’।

संग्रह में स्त्री को लेकर कुछ बेहतरीन कविताएँ पढ़ने को मिलती हैं। हालाँकि इसके बावजूद संग्रह में कुछ औसत कविताएँ भी शामिल हैं। आदिवासी विमर्श की अधिकांश कविताओं को पढ़ते हुए एक सामान्य विसंगति मुझे अक्सर देखने को मिलती है वह है विकास की दुहाई देते हुए विकास कार्यो को कोसने की प्रवृत्ति। इस कंट्राडिक्शन से नीरज भी नही बच सके हैं। संग्रह की ‘जंगल का विकास वाया सड़क’ तथा ‘पीठ पर रोशनी’ शीर्षक कविता ऐसी ही है। ‘पीठ पर रोशनी’ के पहले पैरा और अंतिम पैरा पढ़कर मेरी बात की पुष्टि की जा सकती है। शायद नक्सल समस्या को क्रांतिकारिता की इकहरी दृष्टि से देखने के कारण हमारे साहित्यकार इसके दूसरे पक्ष से सर्वथा अनभिज्ञ नज़र आते हैं।

इसके बावजूद कवि नीर की काव्य कहन-शैली बिलकुल भी कठिन नही है। कविता में भाषा की कूट रचना कवि को कतई पसंद नही। अपने भाव-भाषा-शिल्प में वे स्वयंसिद्ध होती हैं। विचार और भाव का सुन्दर समन्वय इन कविताओं की विशेषता है। अपनी ‘चिड़ियाँ और शिकारी’ शीर्षक कविता में कवि कहता है- ‘तोप से नही बरसेंगें फूल/ तोप के मुँह में घोंसला बना लेने से,/ तोप नहीं समझता है/ प्रेम की भाषा…’। संग्रह की अन्य उल्लेखनीय कविताओं की बात करूँ तो उनमे ‘बन्दर हांक रहा शेरों को’, ‘मीडिया’, ‘सीखना आदमी से’, ‘खून का स्वाद’, ‘मतलब’, ‘महानगर’, ‘आज़ादी’, ‘भक्ति’, ‘हत्यारे’ का नाम लिया जा सकता है।

अपनी ‘शह के बात मात’ शीर्षक कविता में कवि मनुष्यद्रोहियों को चेतावनी देते हुए कहता है, ‘शहर में आग लगाने से पूर्व/ देख लीजिये/ आपका घर शहर के बीचो-बीच तो नही।’ यह पंक्तियाँ पढ़कर राहत इन्दौरी का चर्चित शेर याद आता है कि, ‘लगेगी आग तो आयेंगें सभी ज़द में/ यहाँ पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है।’ तो वहीँ रोने की कला नामक कविता में वह तल्ख होकर कह उठता है, ‘हत्यारे रोने की कला में/ माहिर होते हैं’।

नीरज नीर हिंदी कविता के उन युवा हस्ताक्षरों में हैं जिन्हें अभी लम्बी यात्रा तय करनी है। उनके कविता संग्रह की इन कविताओं में हमारा समकालीन समय सांस लेता हुआ हमेशा जिंदा मिलता है। इस कविता संग्रह का हिंदी के कविता प्रान्त में खुलकर स्वागत किया जाना चाहिए।

पीठ पर रोशनी/ कविता संग्रह/ नीरज नीर/ प्रलेक प्रकाशन, मुंबई/ 2021/ पृष्ठ 152/ मूल्य 200/-

बिगड़ती हुई आबोहवा

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बिगड़ती हुई आबोहवा

समीक्षक- राहुल देव

समकालीन कविता की एक पीढ़ी वह भी है जो नई कविता आन्दोलन के बाद उभरी। उस पुरानी पीढ़ी के कुछ कवि आज भी कविताएँ लिख रहे हैं। इनकी कविताओं में बदलते हुए समय सन्दर्भों को भी सहज ही लक्षित किया जा सकता है। डॉ रणजीत उसी परम्परा के वरिष्ठ प्रगतिशील कवि हैं। ‘बिगड़ती हुई आबोहवा’ कवि रणजीत का 11वां कविता संग्रह है। जिसे उन्होंने सेल्फ पब्लिशिंग के तहत नोशन प्रेस, चेन्नई से प्रकाशित किया है। इस संग्रह में उनकी सन 2000 से 2020 के बीच लिखी गई कुल 59 कविताएं शामिल की गई हैं।

डॉ रणजीत एक जनपक्षधर कवि रहे हैं। कवि एक लंबे समय से कविता लिखता चला रहा है। उन्होंने प्रतिरोध की कुछ बेहतरीन कविताएं लिखी हैं। नई सदी के आने के बाद मनुष्य के जीवन में जिस तरह बाजार और उत्तरआधुनिकता की घुसपैठ हुई है, जिस तरह विकास के नाम पर सत्ता और पूंजी के गठजोड़ ने मनुष्यता के रास्ते में कांटे बिछाने का ही काम किया है। ऐसे तमाम विषयों की गहराई में जाकर कवि पाठक के सामने अपनी कविता के माध्यम से वैचारिक आधारभूमि निर्मित करता है। संग्रह की पहली कविता प्रश्न करते हुए मानो पूछती है कहां है असली आजादी- ‘विषम खेल है/ नियम उन्हीं के/ वह निर्णायक वही प्रतियोगी/ हैं वही भाग्य विधायक/ शुरू हुआ अब खुला खेल फर्रुखाबादी/ देखे कब तक बचती है अपनी आजादी’

समीक्षा के क्रम में संग्रह की ‘मिल्कियत’ शीर्षक कविता उल्लेखनीय है। यह कविता परंपरागत सामाजिक ताने-बाने की पड़ताल करती हैं। डॉ रणजीत की कविताओं का मुख्य स्वर आक्रोशजनित व्यंग्य प्रतीत होता है लेकिन इसे व्यक्त करते हुए कवि हमेशा विवेकी व संयत मुद्रा में रहे हैं। डॉ रणजीत अपनी छोटी कविताओं में ज्यादा सशक्त रूप से उभर कर सामने आए हैं। संग्रह की अपेक्षाकृत कुछ बड़ी कविताओं में शब्द व्यय के कारण कथ्य की काव्यात्मकता धूमिल सी प्रतीत होती है। संग्रह में कवि की कुछ साधारण कविताएं भी शामिल है जैसे ‘इंसानियत का पैगाम’, ‘दर्द का सम्मान’ तथा ‘परेशान मत करो बच्चों’ जैसी कविताएं। उम्र के इस पड़ाव पर ऐसी कविताओं को संग्रह में शामिल करने का तर्क समझ में नहीं आया। लंबी कविताओं पर भी थोड़ा और काम किया जा सकता था वे सपाटबयानी का शिकार मालूम होती हैं जैसे ‘किन्नरों की जीत पर’,  ‘एक बेलाग बात’ तथा ‘अच्छी बातों की चर्चा’ शीर्षक कविताएं।

यह संग्रह थोड़ा जल्दबाजी में प्रकाशित किया गया है, ऐसा लगता है। प्रूफ रीडिंग की कुछ गलतियां अखरती हैं। जिन पर अगले संस्करण में ध्यान दिया जाना अपेक्षित होगा। इसी तरह भीतरी कंटेंट के फोंट को भी बेहतर रूप दिया जा सकता था। हालाँकि कतिपय त्रुटियों से संग्रह की कविताओं की महत्ता कम नहीं हो जाती। एक छोटी कविता ‘नई पीढ़ी से कवि का आह्वान’ है- ‘न चंट चालाक बनो/ न भोले ना दान बनो/ न रूढ़िवादी हिंदू बनो/ न बंद दिमाग मुसलमान बनो/ नई पीढ़ी के किशोरों और नौजवानों/ बन सकते हो तो/ थोड़े और बेहतर इंसान बनो।‘ कवि का यह मानववादी दृष्टिकोण संग्रह की मूल थीम है। संग्रह की एक और अच्छी कविता है ‘मेरे बस की बात’ जिसमें कवि बिगड़ चुके सामाजिक ताने-बाने को सुधारने के लिए सामूहिक सहयोग का आह्वान करता है। यह किसी एक व्यक्ति के बस की बात नहीं। इसी तरह ‘लोग’ शीर्षक कविता भी परिवेश की विसंगतियों पर भरसक प्रहार करती है। कवि की स्त्रीविषयक संवेदना ‘प्यार करती हुई स्त्री’ शीर्षक कविता में उमड़ पड़ी है। लेकिन कवि अपने सामाजिक उद्देश्य के प्रति सजग है और भावविगलित न होते हुए अगली कविता में वह ‘असली  क्रांति’ की बात करता मिलता है। स्त्री को लेकर ‘एक दुविधाग्रस्त महिला का अंतर्द्वंद’ कविता भी अपने उद्दात्त भावों के कारण बेहद प्रभावी बन पड़ी है।

संग्रह की एक और बेहतरीन कविता का जिक्र करना चाहूंगा जिसका शीर्षक है ‘लोग हैं बेशर्म’। इस कविता में कवि लिखता है- ‘लोग हैं बेशर्म, बोलो क्या करें/ कुटिल इनके कर्म, बोलो क्या करें/ द्वेष इनका देश है और घृणा इन की जाति है/ ढोंग इनका धर्म, बोलो क्या करें/  जीतकर मासूम हिरणों को अरे ये भेड़िए/ ओढ़ते मृगचर्म, बोलो क्या करें/ जुल्म का भांडा लबालब भर चुका/ और लोहा गर्म, बोलो क्या करें?’ जिसे पढ़ने के बाद पाठक के मुंह से यही निकलता है कि शायद यही समय सही है उस गर्म लोहे पर चोट देने का।

कुछ और महत्वपूर्ण कविताएँ को रेखांकित करूँ तो उनमे संग्रह की ‘मौत’ शीर्षक एक छोटी सी कविता दृष्टव्य है- ‘मौत जिंदगी की मंजिल है/ मौत से तो फिर डरना क्यों/ मौत आए तब बैठ कर मरना/ कतरा-कतरा मरना क्यों’। कवि कविता की तथाकथित मुख्यधारा का निर्धारण करने वाले अशोक बाजपेई स्कूल के कलावादियों पर पर भी तंज करता है। कवि के इस संग्रह में जो कविता मुझे सबसे ज्यादा पसंद आई वह है ‘हो सारा संसार बराबर’ कुछ पंक्तियां देख ले- ‘आर बराबर, पार बराबर/ हो सारा संसार बराबर/ मालिक और मंजूर बराबर/ बामन और चमार बराबर/ एक-एक को दस-दस बंगले/ यह अन्य अपार बराबर/ रोटी, कपड़ा, घर, इलाज पर/  सबका हो अधिकार बराबर’। इसी टक्कर की ‘बयान’ शीर्षक कविता भी है जिसकी अंतिम कुछ पंक्तियां देखते चलें, ‘कैसी विडंबनापूर्ण स्थिति है कि/ सबसे बुरे लोग सबसे ज्यादा संगठित हैं/  कम बुरे कम संगठित/ और अच्छे लोग सबसे कम संगठित’। ‘लष्टम-पस्टम’ शीर्षक कविता और उधृत करने का लोभ संवरण नही हो रहा, इसे भी देखें- ‘सब कुछ लष्टम-पस्टम है/ बिगड़ा पूरा सिस्टम है/ कमजोरों को गोली मारो/ यही यहां का कस्टम है/ सत्य, न्याय, ईमान, अहिंसा/ मूल्य मान सब नष्टम है/ जनसेवा व्यवसाय सियासत/ मुजरिम सब में रुस्तम है/ चोर-लुटेरे प्रथम पंक्ति में/ भले आदमी अष्टम है’। पीढ़ियों के टकराव को सामने रखती कविता ‘अगर आपको’, सत्ता पक्ष के लिए प्रश्न पूछती ‘संसद में कैसे घुस आए’ शीर्षक कविता और ‘लेट जा, भई लेट जा’ शीर्षक जैसी कुछ अन्य रोचक कविताएं भी इस संकलन की उपलब्धि है।

कुल मिलाकर यहां एक महत्वपूर्ण कविता संग्रह है जिसकी कविताएँ आपको भाव और विचार दोनों स्तरों पर उद्वेलित करती हैं। कवि ने अपने समय-समाज के कड़वे सच को कहने से कहीं भी गुरेज नही किया है। वह अपने देश और देश के लोगों से बहुत प्रेम करता है। उसे किसी सर्टिफिकेट की जरुरत नही है, उसकी कविताएँ ही उसका अंतिम बयान हैं; उसका अपना पक्ष हैं। यह कविताएं परिवेश में व्याप्त हर तरह के आडंबर का विरोध करती हैं तथा हमें दिनों दिन कम होते जा रहे हैं इंसानियत का पाठ पढ़ाती हैं।

बिगड़ती हुई आबोहवा/ कविता संग्रह/ डॉ रणजीत/ नोशन प्रेस, चेन्नई/ 2021/ पृष्ठ 99/ मूल्य 150/-

 

जी-मेल एक्सप्रेस । G-male Express

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पुस्तक समीक्षा                                                 

पुरुष वेश्यावृत्ति और यौनाचार पर केन्द्रित विशिष्ट समकालीन उपन्यास ‘जी-मेल एक्सप्रेस

समीक्षक : डॉ. विजय कुमार मिश्र

हिंदी संसार में सुपरिचित कथाकार-कवयित्री अलका सिन्हा का हाल में प्रकाशित उपन्यास ‘जी-मेल एक्सप्रेस’ पिछले दिनों समीक्षकों-आलोचकों के द्वारा काफी सराहा गया है। अपने इस पहले उपन्यास के लिए सृजनलोक कृति सम्मान से सम्मानित अलका जी की इससे पहले छह और पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें कविता संग्रहों में ‘काल की कोख से’, ‘मैं ही तो हूँ ये’, ‘तेरी रोशनाई होना चाहती हूँ’; कहानी–संग्रहों में ‘सुरक्षित पंखों की उड़ान’, ‘मुझसे कैसा नेह’ तथा नेशनल बुक ट्रस्ट की नवसाक्षर साहित्यमाला के अंतर्गत प्रकाशित कहानी पुस्तक ‘खाली कुरसी’ शामिल हैं।

प्रेम, परिवार, प्रकृति और प्रयोगधर्मिता से युक्त उनकी समस्त रचनाएं उन्हें विशिष्ट बनाती हैं। अलका जी ने अपनी रचनाओं में सामाजिक विसंगतियों और विद्रूपताओं को बेहद संजीदगी के साथ सामने रखते हुए समाज की रूचि के परिष्कार का निरंतर प्रयास किया है। उनका उपन्यास ‘जी-मेल एक्सप्रेस’ अपने कथन और शिल्प में अनूठा है और यह पाठकों को चौंकाता है। यह अपने शीर्षक के अनुरूप किसी तकनीकी विषय पर आधारित न होकर यौनाचार, युवाओं की महत्वाकांक्षा और उसके भटकते मन के साथ ही उनके द्वारा किए जाने वाले समझौतों के कारण उपजी परिस्थिति से बनी फांस पर आधारित है और लेखिका ने उसके विभिन्न आयामों को बड़ी ही बारीकी के साथ प्रस्तुत किया है।

ऐसा उन्होंने अनेक शोधपरक तर्कों और तथ्यों के सहारे एक विशिष्ट कुतूहल और कथा कौशल के साथ किया है। इस उपन्यास में पुरुष वेश्याओं की निर्मिति और उसके मकरजाल से उबरने की छटपटाहट को लेखिका ने बड़े ही साहस और संयम के साथ सामने लाया है। उन्होंने उन विषयों पर खुली चर्चा की है जिन पर बात करने से लोग या तो कतराते हैं या फिर छिपकर और खुद को छिपाकर बात करते हुए दिखाई देते हैं। उन्होंने शोषण को जेंडर आधारित सीमा से बड़ी ही मजबूती के साथ बाहर लाने का कार्य किया है। अलका जी ने अपने उपन्यास के आरंभ में ही लिखा है –

“मगर आज के समय में पुरुषों को कोई दलील रखने का हक़ कहाँ है? वे तो स्त्री-विद्रोही, स्त्री-शोषक हैं। उनसे कैसी सहानुभूति? कभी-कभी मन होता है कि पुरुष-विमर्श पर भी कुछ लिखा जाना चाहिए, उनकी चिंताएं, उनका दबाव, उनका शोषण। स्त्रियों के लिए तो न जाने कितनी सरकारी-गैर सरकारी संस्थाएं लपककर खड़ी हो जाती हैं मगर हमारे लिए कौन खड़ा होगा? जरा ना-नुकुर की नहीं कि स्त्रियाँ विमर्श का झंडा लेकर खड़ी हो गईं।”

स्त्री विमर्श की समकालीन बयार के बीच पुरुषों की पीड़ा को सामने रखते हुए इस प्रकार के विमर्शों के जेंडर बायस्ड होने की प्रवृत्ति पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करने वाला यह उपन्यास एक नई जमीन तैयार करता हुआ दिखाई देता है। आज की नई जीवनशैली और स्त्रियों की तथाकथित उन्मुक्त उड़ान के बीच इस ओर ध्यान आकृष्ट किया गया है कि किस प्रकार ऊंचे ओहदों पर बैठी स्त्रियाँ पुरुषों का भी उसी तरह शोषण कर रही हैं जिस तरह पुरुष स्त्रियों का करते हैं। दफ्तर के माहौल के जरिए लेखिका ने इसे बताने का सफल प्रयास किया है। यहाँ उसकी एक बानगी देखी जा सकती है –

“इंटर्न लड़कियाँ यह सोचकर धमेजा को पटाती रहती हैं कि क्या पता वह उनकी स्थायी नियुक्ति में मदद कर दे। धमेजा की चलती भी बहुत है। वह हर किसी से बनाकर रखता है और अपनी बात मनवाने में तो वह माहिर है। इसी लालच में ये लड़कियाँ अपनी मोहक अदाओं से ऐसे धमेजाओं को रिझाने में लगी रहती हैं। मजे की बात तो यह है कि धमेजा भी इन बातों को खूब समझता है और मौके का फायदा उठाने से नहीं चूकता। लड़कियाँ बात-बात पे उसे गिफ्ट देती हैं, लिफ्ट देती हैं और समझती हैं कि वह दाना चुग रहा है।”

इस उपन्यास में यौन शोषण के व्यापक पक्ष को सामने रखा गया है। इसका व्याप इस विषय पर लिखी गयी पहले की पुस्तकों से कहीं अधिक बड़ा है, कहीं अधिक प्रभावशाली है। बेटे-बेटियों के एक जैसे यौन स्वभाव को अलग-अलग परिप्रेक्ष्य में देखने की मानसिकता और आने वाले समय के संकटों के प्रति आगाह करने वाला यह उपन्यास पति-पत्नी के संबंधों में आने वाली शिथिलता और इसे दूर करने के लिए, इसमें ताजगी बनाए रखने के कुछ सहज समाधानों की ओर भी इशारा करता है। लेखिका ने स्त्रियों की यौन पिपासा और इससे उपजे सवालों से बचने की जगह उसका सामना किया है और कई बड़े और जरूरी  प्रश्न उपस्थित किया है। मसलन –

एक लंबी चुप्पी के बाद स्त्रियों ने अपनी प्यास को पहचाना है और वे इसकी तृप्ति चाहती हैं तो क्या यह अनैतिक है? अग्नि परीक्षाएं या लक्ष्मण रेखाएं हमेशा सीता के लिए ही क्यों तैयार की जाती हैं? दैहिक सुख की कामना करने वाली स्त्रियां बदचलन और आवारा क्यों समझी जाती हैं?”

अपने इस उपन्यास में अलका जी ने बेहद अनछुए और दुरूह विषय को अत्यंत ही संयमित भाषा से साधने का काम किया है। कथाकार के साथ ही उनके कवयित्री होने का लाभ भी इस उपन्यास को मिला है और नितांत एकांत के क्षणों को, संभोग के चित्रण को काव्यात्मक काया प्रदान कर लेखिका ने न केवल मर्यादा की रक्षा की है बल्कि इससे उसका प्रभाव और गहन हो गया है। इस सम्बन्ध में वरिष्ठ लेखक आदरणीय राम दरश मिश्र जी का यह कथन महत्त्वपूर्ण है –

“अलका के पास उम्दा गद्य है। इस उपन्यास में भी उस गद्य की छवि दिखाई पड़ती है। कथा को कथा से जोड़ने में, मार्मिक स्थलों के विधान के लिए काव्यात्मकता का प्रयोग करने में अलका का गद्य विविध रूप धारण करता है। नर-नारी के दैहिक संबंधों को, उनकी यौन क्रियाओं को गंदे या फूहड़ रूप में नहीं उभारा गया है, बल्कि यह अलका की काव्यात्मक सांकेतिकता का ही कमाल है जिससे यह चित्रण बहुत ही सौम्य ढंग से उभर कर आया है।“

बहरहाल, अपने उपन्यास के मूल कथ्य तक पहुँचने के लिए लेखिका इसका एक परिदृश्य खड़ा करती हुई आज के दौर में कार्यालयों में व्याप्त विसंगतियों का बेहद सजीव चित्रण करती हैं। धमेजा ऑफिस के एक ठेठ चरित्र के रूप में सामने आता है। ‘यौन-संबंधों’ में आए बिखराव के बीच देवेन और विनीता के दाम्पत्य जीवन का सौन्दर्य बेहद उल्लास और उमंग पैदा करने वाला है। उनके संबंधों के सौंदर्य के माध्यम से दांपत्य जीवन के मूलाधारों को उभारने में लेखिका को पर्याप्त सफ़लता मिली है। अंततः ये सारी चीजें मूल कथ्य में अंतर्भुक्त हो जाती हैं और शिल्प की विशिष्टता यह कि ऐसा मालूम पड़ता है मानो जैसे ये सारे एक दूसरे में अंतर्ग्रंथित हों।

पुरुष वेश्यावृति और यौन इच्छाओं के उभार से उपजी परिस्थिति पर केन्द्रित इस उपन्यास में लेखिका ने मुख्य  कथा सूत्र को शुरू से अंत तक बखूबी पकड़े रखा। लेकिन अपने रचना शिल्प में एक बात से दूसरी बात को सहजता से निकालने में माहिर लेखिका ने समकालीन जीवन की बहुत सारी विसंगतियों और विद्रूपताओं को भी जगह-जगह पर उद्घाटित किया है। आधुनिक जीवन शैली में यौन व्यवहार के बदलते मानदंड के साथ ही दूसरे कई पहलुओं की ओर भी उन्होंने ध्यान खींचा है। इस क्रम में दिल्ली की जीवन शैली पर तंज कसते हुए लेखिका लिखती हैं –

“हड़बड़ी तो दिल्ली की फितरत में शुमार है। यहाँ के लोग देर रात तक टीवी देखेंगे, देर से सोएंगे, उठेंगे देर से, देर तक कमोड पर बैठकर अखबार पढ़ेंगे, मगर सड़क पर उतरते ही पता नहीं कैसी रेस में शामिल हो जाते हैं। मुझे बड़ी कोफ़्त होती है, दिल्ली की इस हड़बड़ाहट से।”  

इस उपन्यास में कई जगह लेखिका के चिंतनशील व्यक्तित्व के साथ ही शब्दों की बारीकियों पर उनकी पकड़ भी देखने को मिलती है। लेखिका भीतर की कशमकश को अभिव्यक्त करते हुए एकांत और अकेलेपन के अंतर को बड़ी ही सहजता से सामने रख देती हैं –

“कितने नजदीकी शब्द हैं – एकांत और अकेलापन, पर कितनी अलग-अलग फितरत है दोनों की। एकांत में ठहराव है, कुछ हद तक संतुष्टि भी, जबकि अकेलेपन में बेचैनी है, खालीपन का अहसास है।”

बाजार के बढ़ते प्रभाव और उपभोक्तावादी संस्कृति के इस युग में हमारे मानस पर खासकर आज के युवकों और युवतियों पर विज्ञापन के असर को भी इस उपन्यास के विषय से सम्बद्ध करते हुए लेखिका ने बड़ी खूबसूरती के साथ चित्रित किया है। युवाओं की उन्मुक्त यौन इच्छाओं के कारणों की ओर इशारा करते हुए लेखिका लिखती हैं –

“बच्चों को सही-गलत की शिक्षा देने के बदले, माँ-बाप अंजाम से बचने की तैयारी करने लगे हैं। यानी अनचाहा गर्भ न ठहरे, बस। बाकी चाहे कुछ भी होता रहे, कितनी भी बार, किसी के भी साथ। आजकल टीवी पर प्रचार भी तो इसी प्रकार के दिखाए जाने लगे हैं। कॉन्ट्रासेप्टिव्स का प्रचार अब परिवार-नियोजन के तौर पर नहीं बल्कि सावधानी के तौर पर किया जाता है, इसीलिए नई उम्र की लड़कियाँ इस ओर और तरह से ध्यान देने लगी हैं।”

गर्भ निरोधक गोलियों के बेजा इस्तेमाल और उससे पैदा होने वाली स्वास्थ्यजनित समस्याएँ, इन्टरनेट पर उपलब्ध यौन उत्तेजनाओं से सम्बंधित वीडियो और फिल्मों तथा उसके उपयोग से यौन संबंधी व्यवहार में आने वाले बदलाव, अर्ली मैच्यूरिटी, बहुत कुछ पाने की ललक और कम उम्र में बड़े आवेग के साथ ‘चरमोत्कर्ष’ तक जाने की कामना जैसे विविध पक्षों को समेटती हुई लेखिका समकालीन समस्याओं के साथ ही उनके कारणों और निदान को भी सामने रखती हैं।

बढ़ती यौन इच्छाओं से बनते समाज में इसका एक बड़ा बाजार हमारे इर्द-गिर्द किस तरह खड़ा हुआ जा रहा है और इससे अनभिज्ञ हो हम कैसे अपने परिवेश की वास्तविक स्थिति से परिचित नहीं हो पाते हैं, लेखिका ने इसे भी बताने का कार्य किया है। जिगोलो के रूप में काम वासना की तुष्टि का जो नया बाजार पिछले दशकों में खड़ा हुआ है, वह कम चिंताजनक नहीं है। पूर्णिमा के फार्महाउस सहित कई ठिकानों पर पड़े छापे के सन्दर्भ में धमेजा के द्वारा किया गया रहस्योद्घाटन चौंकाने वाला है।

“किस बारे में बात कर रहे हो यार, जरा खोलकर बताओ न।”

आखिर मेरी बेचैनी से उसका मन पसीजा और वह असल मुद्दे पर आया।

“उसके हाईटेक पार्लरों में बॉडी-स्पा के नाम पर जिगोलो का धंधा चलता था…”

“जिगोलो?”

“कीमत लेकर स्त्रियों की कामवासना को संतुष्ट करने वाले लड़के जिगोलो कहलाते हैं। मेल प्रॉस्टिट्यूट! धमेजा अपनी कुर्सी को दाएं बाएं घुमा रहा था।”

लेखिका ने बदलते हुए समय में गर्भपात जैसी समस्याओं को बड़ी ही संवेदना के साथ प्रस्तुत किया है –

“समय भी तो कितना बदल गया है। अब चारित्रिक दृढ़ता जैसी संकल्पनाएँ मायने नहीं रखतीं। किसी क्लिनिक में अविवाहित लड़की का गर्भपात कराना हैरानी या शर्मिन्दगी से नहीं, बल्कि इतनी सहजता से देखा जाता है जैसे आप कील-मुंहासों का इलाज करवाने आए हों, चाहे बार-बार आएं, इसमें शर्म कैसी?”

आज के परिवेश में मीडिया की भूमिका और उसकी कम होती विश्वसनीयता से हम सब परिचित हैं। सनसनी पैदा करने की सनक और न्यूज़ ब्रेक करने की हड़बड़ाहट ने मीडिया को कहाँ से कहाँ लाकर खड़ा कर दिया है, यह सर्वविदित है और सार्वजनिक बहसों के केंद्र में है। स्थिति ऐसी हो गयी है कि हम एक-एक कर चैनल बदलते चले जाते हैं और काम की चीज कहीं नहीं दिखाई देती है। लेखिका ने इन सारी चीजों को सामने रखते हुए मीडिया में व्याप्त अतिरेक और भाषाई कदाचार को भी उघाड़ने का काम किया है। शब्दों का चयन सही ढंग से न होने पर कैसे अर्थ का अनर्थ हो जाता है, इसको भी उन्होंने बखूबी सामने रखा है।

“किसी और चैनल पर कोई धुरंधर ऐसी स्त्रियों की मानसिकता के प्रति अपनी-अपनी उदारतापूर्ण राय दे रहा था। उसके मंतव्य का सार समझाते हुए एंकर स्पष्ट कर रही थी कि ऐसी अधिकांश महिलाओं के भीतर उनके पति अथवा प्रेमियों द्वारा उपेक्षित रखे जाने की तड़प उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित करती है।

मुझे कोफ़्त होती है, कैसी भाषा इस्तेमाल करते हैं मीडिया वाले! प्रेरित शब्द तो किसी ‘नेक’ काम के लिए किया जाता है, ऐसे कामों के लिए तो ‘बढ़ावा’ शब्द का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। दरअसल, बात शब्द की नहीं है, बदलते समय की बदलती भाषिक संरचनाओं की है। … मीडिया को ही ले लो, इनका उद्देश्य इस घटना के प्रति लोगों को जागरूक करना नहीं, सनसनी फैलाना है। देखते नहीं, कैसे एक ही सांस में सारी घटना बयान कर देना चाहते हैं कि कहीं उनसे पहले कोई दूसरा चैनल न उसे बोल दे। घटना से जुड़ी कोई क्लिपिंग्स दिखाते हैं तो दस बार ‘इक्सक्लूसिव’ की मोहर पीटते हैं। खबर से बड़ा तो इस बात का दावा होता है कि इस तरह की जानकारी देने वाला उनका ही पहला और एकमात्र चैनल है।” 

कथ्य के साथ ही अपने शिल्प की दृष्टि से भी यह उपन्यास बेहद आकर्षक और अनूठा है। इस उपन्यास की कथा निर्मति में डायरी की ख़ास भूमिका है। कंप्यूटर के जरिए डायरी को एक वैज्ञानिक स्वरूप दिया गया है जिसकी सांकेतिकता धीरे-धीरे खुलती जाती है और आसपास के लोगों से जुड़ती जाती है।

इसके साथ ही युवाओं के मन में देशभक्ति की प्रबल भावना को ‘अभिषेक’ के असामान्य चित्त और उसमें लीन सुखोई के माध्यम से सामने लाया गया है। इसमें आधुनिक जीवन शैली की कई नई चीजों का निदर्शन हुआ है। लेखिका कभी शॉपिंग की नई शैली तो कभी डिजिटल क्रांति के प्रभाव से पाठकों को  परिचित कराती हैं।

बदलते समय का सीटी स्कैन करता यह उपन्यास ऐसे कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर एक ख़ास आलोचना दृष्टि के साथ बहस और विश्लेषण की मांग करता है। पुरुष वेश्या को पहली बार रूपायित करने वाला यह उपन्यास ‘जी-मेल एक्सप्रेस’ समकालीन हिंदी उपन्यासों में खास स्थान रखता है। इस उपन्यास का कथ्य और कथा शिल्प का वैशिष्ट्य अलका सिन्हा को अपने समकालीन उपन्यासकारों के मध्य खास बनाता है।

पुस्तक का नाम -  ‘जी-मेल एक्सप्रेस’ (उपन्यास)
कुल पृष्ठ – 176
मूल्य – 300/- रु.
प्रकाशक – किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली  
83102211 1069610916734334 4236503827504693248 n
डॉ. विजय कुमार मिश्र 
सहायक प्रोफेसर, हिंदी विभाग, हंसराज कॉलेज
मो. – 8585956742
ई-मेल – vijayvijaymishra@gmail.com

मध्यकालीन हिंदी कविता का आवश्यक पुनर्पाठ

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मध्यकालीन हिंदी कविता का आवश्यक पुनर्पाठ- प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय

समीक्षक: अनुराग सिंह

आलोचना को मूल्यांकन की कला कहा जाता है। आलोचना किसी कृति की सीधे व्याख्या नहीं करती अपितु उस कृति को समझने के बहुत से टूल्स हमें मुहैया कराती है।हम पारम्परिक तरीक़े से साहित्य को पढ़ने पढ़ाने वाली विधियों के आदी विद्यालयी जीवन से हो गए हैं, परंतु आलोचना ठहर जाने वाली दृष्टि से संचालित होने का कार्य नहीं है। वह स्वयं में गतिशील है, वह अपने आप को लगातार बदलती रहती है। किसी कृति को आज से सौ वर्ष पहले जिस दृष्टिकोण से देखा गया यदि आज भी उसी तरह से देखा जा रहा है तो इसका तात्पर्य यह है कि हम आलोचना अर्थात् मूल्यांकन की कला कोविकसित नहीं कर पाए। एक उत्कृष्ट आलोचना समय के साथ बदलती हुई आगे बढ़ती है। मध्यकालीन कविता के प्रारम्भिक दौर से अब तक लगभग छः सौ वर्षों के बीत जाने के क्रम में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक तौर पर न जाने कितने परिवर्तन हो गए। एक वैश्विक ग्राम की परिकल्पना आज साकार रूप ले चुकी है, ऐसे में जब कविता का संदर्भ  बदल गया तो उसके देखने का तरीक़ा भी कुछ बदला अवश्य होगा। हिंदी साहित्य के इतिहास में मध्यकाल एक बड़े कैनवस पर उकेरा गया वृहद् चित्र हमारे सामने प्रस्तुत करता है जिसमें रंगों के वैविध्य से शानदार कलाकारी नज़र आती है। मध्यकाल में भक्तिकाल को हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग कहा गया। जिस युग की कविताओं के कारण उसे स्वर्ण युग कहा जा रहा है, उस कविता के पाँच-छः सौ वर्षों के बाद भी क्या वह उसी महत्ता और प्रासंगिकता के साथ आगे बढ़ रही है या उसमें कुछ ह्रास हुआ है या वह और अधिक प्रभावी या   प्रासंगिक हो गयी? इन सबके विश्लेषण के लिए वह पुनर्पाठ की माँग करती है। हिंदी आलोचना के वर्तमान समय में प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय ने इस विधा में बड़े सम्यक् तरीके से कार्य करते हुए अपनी प्रबल उपस्थिति दर्ज करायी है। आलोचना का उनका फलक काफ़ी व्यापक है। उन्होंने भारतीय और पाश्चात्य काव्य  चिंतन, मध्यकालीन कविता के साथ-साथ आधुनिक कविता, हिंदी कथा साहित्य, सर्जना के तमाम पहलुओं केसाथ-साथ सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों को लेकर अपने आलोचना कर्म को आगे बढ़ाया है और अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। उनकी हाल में हीप्रकाशित पुस्तक ‘मध्यकालीन कविता का पुनर्पाठ’ उनकी आलोचनात्मक समझ को हमारे सामने रखती है जिसके माध्यम से हम मध्यकाल को एकनए नज़रिए से देख पाने में सफल होते हैं। बहुत से ऐसे पहलू हैं जिनपर एकदम मौलिक दृष्टिकोण से इस पुस्तक में चिंतन नज़र आता है।

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आलोचना की बहुत सी पद्धतियों में से एक पद्धति पाठ केंद्रित भी है। इस पूरी पुस्तक में इसी की मदद से इसके तमाम आयामों को देखने की कोशिश की गयी है। उत्तर आधुनिक समीक्षा पद्धितियों ने हमें जो नए उपकरण दिए हैं उसकी मदद से यह देखना और आवश्यक भी हो गया है। आलोचक ने इसकेपहले ही अध्याय में ‘भक्तिकाव्य और उत्तर आधुनिकता’ में इस बात को स्पष्ट भी किया है। भक्तिकाल को लोकोन्मुखी व प्रगतिशीलता तथा आधुनिकता की तमाम कसौटियों पर लगातार कसा जा चुका है परंतु उत्तर आधुनिक तरीक़े से उसकी पड़ताल का दायरा सीमित था जिसे यहाँ एक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। भक्तिकाव्य को इस दृष्टिकोण से देखा जाना ही इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में माना जाएगा।

नामदेव भक्तिकाव्य के प्रारम्भिक दौर के रचनाकार हैं और आलोचक ने उनके काव्य की सार्थकता वर्तमान समय की वैश्वीकृत संसार में हमारे समक्ष रखी है। ये दिखाता है कि इस पुनर्पाठ में आलोचक ने बहुत से विषयों पर एकदम नए तरह से विचार किया है। किसी कृति और पाठक के मध्य आलोचक का कार्य सेतु निर्माण का होता है ताकि वह पाठकों को कृति समझाते हुए उसके पार ले जाए। इसलिए उसका दायित्व और अधिक महत्वपूर्ण होता है। प्रो . करुणाशंकर इस पुस्तक में पुराने हो चुके सेतु की न सिर्फ़ मरम्मत करते हुए नज़र आते हैं अपितु पाठकों को जहाँ पर नए सेतु की आवश्यकता महसूस होती है वहाँ नए सेतुओं का निर्माण करते हुए भी आगे बढ़ते हैं। कबीर का जितना साहित्य समाज व सामाजिक रूढ़ियों पर केंद्रित है उससे कहींअधिक व विपुल मात्रा में उन्होंने योग साधना आदि पर लिखा है परंतु कबीर को हमने सामान्यीकृत कर उनके ऊपर समाज सुधारक का तमग़ा लगा दियाहै, इस पुस्तक में उसके दूसरे पहलू ‘भारतीय योग परम्परा और कबीर’ में  उस पहलू को भी सामने रखा है। कबीर पर अभी भी इस दृष्टि से और अधिक कार्य करने की आवश्यकता है, आलोचक ने यहाँ इस ओर संकेत भी किया है। कृति की आलोचना के क्रम में आलोचक उसकी समस्त आंतरिक प्रक्रियाओं से होकर भी गुजरता है और उसका सारा नक़्शा पाठक के सामने उपस्थित करता है। इस रूप में एक आलोचक कृति का मर्म उद्घाटित करने की दृष्टि से अत्यंत ही जटिल कार्य का निर्वहन करता है। कबीर पर हज़ारीप्रसाद द्विवेदी की पुस्तक आ जाने के बाद से हिंदी के श्रेष्ठ आलोचक रामचंद्र शुक्ल पर यह आरोप- प्रत्यारोप शुरू हो गया कि उन्होंने तुलसीदास को ऊपर दिखाने के क्रम में कबीर का समुचित मूल्यांकन नहीं किया। इस पुस्तक में‘रामचंद्र शुक्ल के कबीर सम्बन्धी मूल्यांकन  का पुनर्पाठ’ प्रस्तुत करते हुए प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय ने इस दिशा में उठे सभी प्रश्नों एवं रामचंद्र शुक्ल की पैनी दृष्टि का भी उल्लेख किया है जो सभी आरोपों के तार्किक उत्तर प्रस्तुत करने का सफल प्रयास है। भक्तिकाव्य में सूफ़ी काव्यधारा का अपनाविशेष महत्व है। उस समय की सामाजिक संरचना का अध्ययन आज के समाजशास्त्रीय उपकरणों के माध्यम से यहाँ प्रस्तुत किया गया है।

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समाज चाहे जब का हो, किसी समय-कालखंड का हो, एक तार्किक व समझदार व्यक्ति सदैव बेहतर समाज की परिकल्पना करता है। ऐसे में ‘रामराज्य’ एक सामाजिक अवधारणा के रूप में भारतीय उपमहाद्वीप में प्रस्तुत हुआ जहाँ सब लोग सुखी, सम्पन्न व प्रसन्न हैं।आज आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों वाली सरकारों में भी हम ऐसी स्थितियों को प्राप्त नहीं हो पाए हैं।  मध्यकाल व उससे पूर्व ही यह अवधारणा हमारे समाज के चिंतकों ने प्रस्तुत की। इस पुस्तक में ‘रामायण और रामचरितमानस में प्रतिष्ठित मूल्यों की सार्वभौमिकता’, ‘रामचरितमानस: आदर्श सामाजिक व्यवस्था का महाकाव्य’ व ‘सामाजिक प्रतिबद्धता  का लोकवृत्त’ लेखों में इसे समकालीन संदर्भों के साथ जोड़कर आदर्श सामाजिक व्यवस्था का रूप हमारे सामने प्रस्तुत किया है। लोकतंत्र ‘दैहिक दैविक भौतिक तापों’ से बचाने की बात नहीं करता लेकिन भक्तिकाल के कवियों ने अपनी भक्ति व सामाजिक समझ से इन सबको हर डालने की बात करते हुए नज़र आते हैं। कृतिकार के निगूढ़तम मंतव्यों और संदेशों को अतीव सरल और सहज रूपों में पाठक के लिए संवेद्य बनाने का दायित्व आलोचक पर अवलम्बित होता है। वह पाठक की काव्य रुचियों और साहित्य संस्कारों को प्रगतिशील और स्वस्थ दिशाओं कीओर उन्मुख करता है न कि उसे और अधिक जटिल बनाकर उसे ग़लत दिशा की ओर मोड़ दे। इस हिसाब से यह पुस्तक अद्वितीय है। प्रो. उपाध्याय ने तुलसीदास के ऊपर अनेक हमलों को अपने काव्यशास्त्रीय समझ व परम्परा की गहरी व पैनी दृष्टि की ढाल से रक्षा की है। तुलसीदास संभवतः एक ऐसे कवि हैं जो जितने अधिक लोक में विख्यात हैं, जितने अधिक उनके पाठक हैं, उतनी ही बड़ी संख्या में उन पर हमलावर भी हैं। ‘ढोल गंवार शूद्र पशु नारी’ यह पंक्ति न जाने कितनी ही बार उद्धृत कर उनको नारी के प्रति पिछड़ी दृष्टि के साथ और बहुत से अप्रगतिशील मूल्यों का पोषक  कहा जाता है। इस पुस्तक में ‘हिंदी के पहले नारीवादी कवि हैं तुलसी’ लेख में बहुत ही सहजता से इस बात को सिद्ध किया कि तुलसी पर लगने वाले ऐसे आरोपों का आधार नहीं है। कुपाठ कर यह दुष्प्रचार किया गया है। प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय की विशेषता यह है कि ऐसे पहलुओं जो कि विवादित हैं और सामान्य लोग उससे बचने की कोशिश करते हैं, वे ऐसे विषयों को छोड़ते नहीं अपितु ऐसे विषयों को खोजकर उस पर सार्थक दृष्टि डाल पाठकों को उलझन से तार्किक रूप से बाहर भी लाते है जो कि एक आलोचक का दायित्व भी है। इस मामले में वे एक सफल व सुलझाऊ आलोचक हैं न कि उलझाऊ। मध्यकाल की स्थापत्य कला की बात पूरे भारत में बहुत गर्व से की जाती है,हम ताजमहल को दूसरों को दिखाते हुए नहीं थकते। परंतु अपने कवियों और काव्यों में स्थापत्य कला के जो विशाल भवन निर्मित किए गए हैं, उन पर शायद ही आज तक किसी ने दृष्टिपात किया हो। प्रो. उपाध्याय ‘तुलसीदास और ताजमहल’ लेख में हमें इस ओर भी सोचने का इशारा करते हैं। इस ओर दृष्टि अभी तक शायद ही किसी आलोचक ने डाली है,इसलिए यह पूर्णतःमौलिक दृष्टि भी है।

आज जबकि सारी दुनिया पर्यावरणीय चिंताओं से घिर गयी है। रियो डी जेनेरियो से लेकर पेरिस समझौते की गूंज समूची दुनिया में सुनाई दे रहीहैं ,ऐसे में पर्यावरण एक महत्वपूर्ण विषय बनकर हमारे सामने आया है। जब हमने अपने आस-पास व परिवेश को दूषित कर दिया, हमें यह बात तब जाकर समझ आई। यदि मध्यकालीन कविता के इन संदर्भों को हमने समझने की कोशिश की होती तो शायद हम आज ज़्यादा जागरूक होते, यदि इसे व्यवहार में उतारा गया होता तो आज इस तरह के संकट से हम न जूझ रहे होते। ‘भारतीय पर्यावरणीय दृष्टि और संत जांभोजी का चिंतन’ लेख मेंआलोचक ने इन्हीं समकालीन मुद्दों से जोड़कर संत जांभो जी के काव्य को समझने का प्रयास किया है।

‘मध्यकालीन साहित्य अपनी पूर्णता में विचार, भाव, भक्ति, आदर्श, यथार्थ, समय-समाज, व्यष्टि-समष्टि, शास्त्र-लोक, उच्चतर नैतिक मूल्य व चराचर जगत के सभी चिंताओं का बहुरंगी समुच्चय है। इसमें जीवन और जगत की ऐसी कोई गति तथा ऐसा कोई प्रश्न नहीं जिससे जूझते हुए हमारे कवि उन अनुगूँजों  तथा उन आशयों तक न पहुँचे हों जो मनुष्य मात्र के उज्ज्वल भविष्य के प्रति विवेकपूर्ण संकेत करते हैं।’ इस पुस्तक की यह पंक्ति महज़ उदाहरण है कि देखे जाने की दृष्टि कितनी व्यापक है। आलोचक प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय ने अपने श्रम को सार्थक रूप दिया है। यह पुस्तक मध्यकाल से जुड़े विविध पहलुओं पर मौलिक चिंतन करती है,इसलिए मध्यकाल के पाठकों के लिए अब से यह पुस्तक ‘अवश्य ही पढ़े जाने वाली’ पुस्तकों की श्रेणी में अपना स्थान बना पाने में सफल होगी। इसमें विषयों पर चिंतन महज़ मौलिक ही नहीं अपितु गहन और तार्किक भी है जो इसको और धार देते हैं। यह पुस्तक मध्यकाल के पाठकों के लिए नई खिड़कियाँ खोलती है जिससे एक ही दृश्य को अलग-अलग तरीक़े से तो देखा ही जा सकता है, साथ ही उस कोण से कुछ नए दृश्य भी देखने को मिलते हैं। ये नए दृश्य ही इस पुस्तक की सार्थकता व आलोचक के श्रम को सार्थक करते हैं।

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अनुराग सिंह
असिस्टेंट प्रोफ़ेसर
श्यामा प्रसाद मुखर्जी महिला महाविद्यालय
दिल्ली विश्वविद्यालय
मो 8285468788
ईमेल-anuragsinghshekhar@gmail.com