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जनजातीय समाज और आधुनिक शिक्षा का परिप्रेक्ष्य: धर्मवीर यादव ‘गगन’

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Some Of The Major Tribes Of India

साहित्य
का सामाजिक सरोकार और संस्कृति का वैश्विक परिप्रेक्ष्य
जनजातीय समाज और आधुनिक शिक्षा का परिप्रेक्ष्य
  धर्मवीर यादवगगन’                                       
प्रस्तावनाः
            ‘जनजातिभारत के आदिवासियों के लिए इस्तेमाल होने वाला एक संवैधानिक
शब्द है भारत सरकार के अनुसार किसी समूह को अनुसूचित जनजाति के परिप्रेक्ष्य में
आदिवासीसर्वाधिक उपयुक्त शब्द है जैसे अनुसूचित जाति की जगह दलितशब्द गहरे अर्थ में है उसी प्रकार अनुसूचित जनजाति में आदिवासीजो कि नौकरियों में सन्दर्भ में प्रासंगिक हो सकता है
आदिवासी शब्द उस चेतना का भी प्रतीक है जिसकी मदद से उन्होंने अपने दुःख-दर्दो को
समझा है और जो उन्हें मुक्ति के राह में आगे बढ़ा रही है
आदिवासीपद में एक आंदोलन-धर्मिता है, जो जनजाति में नही है आदिवासी साहित्य की लम्बी मौखिकी और
लगभग एक सदी पुरानी परम्परा में आये समकालीन आदिवासी लेखन एवं विमर्श की शुरूआत
हमें
1991 मे बाद माननी चाहिए।

            आदिवासी साहित्य
अस्मिता की खोज एवं शोषण के विविध रूपों से उद्घटित तथा आदिवासी अस्मिता व
अस्तित्व के संकटो और उसके खिलाफ हो रहे प्रतिरोध का साहित्य है। आदिवासी लेखन और
उसमें स्त्री विमर्श में अभी तक
स्वानुभूति बनाम सहानुभूतिजैसें बहसे केन्द्र से दूर परिधि के इर्द-गिर्द घूम रही है।

            आज हमारे देश में 198 भाषाएँ है जिसमें से अधिकांश आदिवासी भाषाएं खत्म होने के
कगार पर है इनमें से
7 हमारे
झारखण्ड प्रदेश की आदिवासी भाषाएं है हो
, खड़िया, कुडुख, भंडारी, मलतो, बिरहरी और असुरी यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय
संविधान जहाँ आदिवासी अस्मिता
, स्वशासन, रीति-रिवाज, भाषा-संस्कृति की रक्षा के लिए संकल्पबद्ध है वही हमारे देश
नही इन्ही सभी कारणों से आदिवासी राष्ट्रीयताएं सबसे गहरे संकट से गुजर रही है।

            हिन्दी साहित्य में
आदिवासी विषय पर लिखते हुए
पात्रों को साफ-साफ तीन कोटियों में रखा गया है। आदिवासी बेचारेहैं- शोषित और उत्पीड़ित-लेखकीय सहानुभूति के पात्र; नैरेटर मसीहा है जो अपने आदर्शवाद, सिद्धांतवाद और अव्यावहारिकताके चलते सभ्य समाज की आंख का कांटा है। लेखक की सारी
शुभेच्छाएं और संवेदनाएं इसके साथ हैं क्योंकि वह लेखक के अहं का ही विस्तार है।
विशेषकर, आदिवासी स्त्रियों के संदर्भ में तो इस तरह का लेखन और भी
क्रूर दिखाई पड़ता है। जब हम साहित्य में आदिवासी स्त्रियों को सिर्फ स्वच्छंद यौन
की वस्तु के रूप में और उनकी लुटी-पिटी
, नुची और क्षत-विक्षत स्थितियाँ देखने को मिलती हैं। झारखंड
आंदोलन की बौद्धिक अगुवाई करने वाले डॉ. वी
0पी0 केशरी
आहत होकर कहते है
, अनेक बाहरी लेखकों ने तो अहित करने वालों को उद्धाकर और हमारे नायकों को
अपराधी चित्रित किया है। उनका लेखन हमारी औरतों के बलात्कार के बिना उत्कृष्ट और
कलात्मक नहीं होता।

            झारखंड आंदोलन की
अग्रणी विदूषी आदिवासी लेखिका डॉ. रोज केरकेट्टा इस संदर्भ में लिखती हैं
, ‘आदिवासी शिष्ट सात्यि में स्त्री श्रम, सहिष्णुता, ममत्व से पूर्ण तो मिलती है, लेकिन अपने लिए और परिवार के लिए निर्णय लेती हुई कम मिलती
है। वह जीने के लिए कठिन परिश्रम करती है
, देस-परदेस जाती है, सेवा करती है स्वयं को नहीं, दूसरों को प्रसन्न रखने के लिए।’ ‘दूसरों को प्रसन्न रखनेकी सामंती स्त्री प्रवृत्ति आदिवासी समाज में नहीं है। यह
उस बाहरी भाषा और संस्कृतिकरण के जरिए आई है जिसे विकास और मुख्यधारा के नाम पर
आदिवासियों पर लाद दिया गया। क्योंकि यही आदिवासी स्त्री आदिवासी लोककथाओं में
दूसरों को प्रसन्न रखने की बजाय बराबरी की बात करती हुई दिखती है। डॉ. केरकेट्टा
हमें बताती हैं
, ‘जब
आदिवासी समाज में गोत्र कास बंटवारा हुआ
, तब परिवार की अवधारणा बन चुकी थी और परिवार में स्त्री
पत्नी होने के साथ-साथ सहयोगिनी भी होती थी। वह अपने विचार पारिवारिक मामलों में
व्यक्त कर सकती थी। जैसे एक कथा में पति-पत्नी मिलकर तीन रोटियां बनाते है। पति दो
खाना चाहता है
, जिसके
लिए तर्क देता है कि वह चावल लाया है। यह कठिन काम था
, जिसे उसने किया। स्त्री भी कहती है कि वह दो राटी खाने की
हकदार है
,
क्योंकि उसने लकड़ी ढूंढ़ी, चावल पीसा और रोटी पकाई। काम उसने अधिक किए। यानी काम के आधार पर उसे बराबरी का हक मिलना चाहिए।आदिवासी लोककथाओं में स्त्री विमर्श का उल्लेख करते हुए डॉ.
सुश्री शरद सिंह भी इसी मंतव्य की पुष्टि करती हैं। वे कहती हैं
, ‘आदिवासी लोककथाओं में स्त्री की सहज प्रकृति को वर्णित किया
गया है।

            आदिवासी स्त्रियां
साहित्य और फिल्मों में एकसिरे से गायब हैं। क्योंकि आदिवासी स्त्रियां हर क्त
, हर किसी के साथ सहवास के लिए तत्पर रहती हैं क्योंकि उनका
समाज यौन वर्जना से मुक्त समाज है। जबकि गोंड आदिवासी का घोटुल
, मंुडाओं का गितिओड़ा या उरावं आदिवासियों की धुमकुड़िया
आदिवासी जन शिक्षण के केन्द्र रहे हैं और इन वाचिक आदिवासी विश्वविद्यालयों में
सिर्फ यौन क्रियाएं नहीं होतीं। आज देश का पूरा आदिवासी समाज ग्लोबल लूट के पहले
निशाने पर है। देश के आदिवासी इलाके अंतहीन उत्पीड़न और जुझारू संघर्ष के प्रमुख
केन्द्र बन गए हैं और भारतीय राष्ट्र जिन्हें देश की
आंतरिक सुरक्षा के लिए खतराघोषित कर चुका है। औपनिवेशिक समय में शुरू हुई दोहन-लूट एवं
शोषण की इस अंतहीन प्रक्रिया को दर्ज करने की बजाय साहित्य ने सिर्फ आदिवासी
स्त्रियों की बलात्कारी स्थिति को ही फोकस किया है। सही है कि आदिवासी स्त्रियां
बलात्कार झेलती हैं पर यही एकमात्र आदिवासी स्त्री सच नहीं है। वे लड़ रही हैं
, अपने समाज के भीतर मौजूद अंधविश्वासों, कुरीतियों से, बाहरी शोषण-उत्पीड़न से।

            1999 में
पोलटेकनिक करने वाली आदिवासी महिला दीपाली अमृत खलखों आज टे
ªन चला रही है। पुरुषों के लिए सुरक्षित माने जाने वाली
भारतीय सेना में पहली बार शामिल होने वाली देश की पहली महिला जवान एक आदिवासी
स्त्री है। दो बच्चों की मां शांति तिग्गका ने
13 लाख रक्षा बलों में पहली महिला जवान बनने का अनोखा गौरव
हासिल किया है। आदिवासी स्त्रियां आदिवासी लोकगीतों और लोककथाओं में इतिहास को
चुनौती देती समूची ओजस्विता के साथ मौजूद हैं।

            विजय तेंदुलकर को
नाटक
कमलाऔर 1985 में उस पर बनी फिल्म में आदिवासी कमला बेची जाती है, तो मृगया’ (मृणाल सेन, 1976), ‘आक्रोश’ (गोविन्द निहलानी, 1980) और लाल
सलाम

(
गगनबिहारी बारोट,
2002)
की कथा आदिवासी स्त्री के बलात्कार
पर केंद्रित है। फिल्मों में
इज्जतकी जिस
अवधारणा के साथ आदिवासी समाज को वर्णित किया गया है
, वह आदिवासी समाज की अवधारणा बिल्कुल नहीं है। आदिवासी समाज
में स्त्रियां सिर्फ इज्जत की वस्तु नहीं है बल्कि वे पुरुषों की तरह ही संपूर्ण
इंसान है।

            आदिवासी साहित्य
में भी महिलाओं की उपस्थिति नहीं के बराबर है और है भी तो उसी तरह से जैसा कि
गैर-आदिवासी समाज द्वारा रचित साहित्य में। इसे समझने के लिए संताली साहित्य को
देखा जा सकता है। जनंसख्या की दृष्टि से संताल झारखंड का सबसे बड़ा आदिवासी समुदाय
है। यह स्वाभाविक है कि संताली रचनाकारों की संख्या भी अन्य आदिवासी रचनाकारों की
तुलना में अधिक होगी। आज संताली लोक गर्व से कहते हैं कि उनके साहित्यकारों की
सूची दस हजार से लंबी है। पर यदि उनसे यह पूछा जाए कि महिला साहित्यकारों की
संख्या बताइए
, तो वे
पांच का भी नाम नहीं गिना सकते। लेकिन जब लिखित साहित्य की बात आती है तो आदिवासी
महिलाएं दिखती है नहीं। वे एकदम से गायब हो जाती हैं। इसका एक अर्थ तो यह है कि वे
शिक्षा से वंचित हैं इसलिए लिख नहीं सकतीं। दूसरा यह है कि वे लिख-पढ़ रही हैं
, पर छपने-छपाने की जो प्रक्रिया है, वह पुरुषों के अनुकूल है और उनके कब्जे में है। यहट्रेंड भी
आदिवासी समाज के विपरीत है। राजनीति में भी आदिवासी महिलाओं की स्थिति भेदभाव वाली
है।

            आदिवासी समाज में
स्त्री अपनी आजादी में किसी को रोक-टोक स्वीकार नहीं करती है। यदि उसकी मान्यताएं
उसके आड़े आती हैं तो वह उसका विरोध कर सकती है। रांगेय राघव के कब तक पुकारूं
उपन्यास में उनका विद्रोह कम है
, इससे ज्यादा वे शोषण चक्र में बुरी तरह फंसी हैं, उनका आत्म-सम्मान उनसे छिन जाता है। अपने पति को पुलिस से
छुड़वाने हेतु वे अपना सौदा करती हैं। उनके स्वर में कहीं भी आक्रोश नहीं है
, सिर्फ व्यवस्था के आगे घुटने टेकने को विवश हैं, लाचार हैं। उनका विश्वास है- ‘‘जमींदार हुकुम चलाता है- वह हमारा बाप है, हम उनकी रिआया हैं।’’ इस प्रकार व्यवस्था के शोषण तंत्र में आदिवासी समाज की
स्त्री पिसती रही है। मुख्यधारा का समाज उनकी लाचारी
, बेबसी का नाजायाज फायदा उठाता है। उपन्यास में प्यारी अपनी
जातीय अस्मिता से कहीं ज्यादा औरत होने पर खीझ खाती है-
‘‘मुझे उठा ले।

            आदिवासी स्त्री की
भी कुछ इच्छाएं
, आकांक्षाएं
होती हैं-
‘‘मेरे
भीतर कितनी उमंग भरी
, मेरी भी समाज में प्रतिष्ठा हो। मैं बड़ी बन सकूं। ऐतिहासिक उपन्यासों में
कचनार में आदिवासी स्त्री के अस्तित्व का चित्रण मिलता है। जिसमें स्त्री का
आत्म-सम्मान सर्वोपरि है। शैलूष नामक उपन्यास में सावित्री नामक पात्र चाहती है कि
उनकी भी अपनी खुद की जमीन हो जिससे वो गरिमापरक जीवन जी सकें। उपन्यास में आदिवासी
स्त्री भी अपने हक और अधिकारों को पाने की लालसा रखती है। वह अपने तथा बाहरी समाज
के हस्तक्षेप से निपटने हेतु अपने को ताकतवर रखती है। उपन्यासों में आज की वह
आदिवासी स्त्री है जो मुख्यधारा के समाज के सामने अपनी झिझक
, संकोच और चुप्पी को तोड़ती हुई दिखलाई पड़ती है। इन उपन्यासों
में आदिवासी स्त्री अस्तित्व-संघर्ष के स्वर गति पकड़ते हुए दिखलाई पड़ते हैं।
हिन्दी में स्त्री-विमर्श के चैखटों एवं इदों को तोड़ता हुआ इस विमर्श के एक नए
अध्याय की शुरूआत करता है। इस उपन्यास में आदिवासी समाज में अंगड़ाई ले रही स्त्री
में नई चेतना की अभिव्यक्ति है। तेजिंदर का काला पादरी आदिवासी अस्तित्व और
अस्मिता को लेखक लिखा गया उल्लेखनीय उपन्यास है।

            रणेंद्र के शब्दों
में-
‘‘हमारा मानना है कि आदिवासी ने ईसाई, मुसलमान या बौद्ध धार्मिक समुदाय में धर्मांतरित होकर आंशिक
रूप से अपने आदिवासीपन को खोया है।
’’ इसी आदिवासीपन को बरकरार रखने की इच्छा जेम्स खाखा में
दिखाई देती है। संजीव का धार नामक उपन्यास आदिवासी अस्मिता की दृष्टि से
महत्वपूर्ण रचना है। उपन्यास के केंद्र में आदिवासियों की संगठन शक्ति तथा
क्रांतिकारी पहलू को रखा है। उपन्यास में आदिवासी अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए
आंदोलित है। संजीव के धार उपन्यास की नायिका मैना भी अपने अस्तित्व हेतु संघर्ष
करती हुई दिखाई देती है। कोयला माफिया
, ठेकेदार और पुलिस-प्रशासन की मिलीभगत से आदिवासीयों के ऊपर
हो रहे उपन्यास एवं अत्याचार से लड़ने के लिए मैना अपने समाज के बीच संघर्षशील
चेतना के रूप में न केवल उभरती है वरन शोषण के खिलाफ जनजागरण भी करती है। संथाल
विद्रोह आदिवासी समुदाय की अस्मिता को बचाने की बाबत उठ खड़ा हुआ था।

            मैत्रयी पुष्पा
बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक की महत्वपूर्ण कथाकार हैं। अल्मा कबूतरी उनका श्रेष्ठ
उपन्यास है
जो
कबूतरा जनजाति
को
आधार बनाकर लिखा गया है। कबूतरा जनजाति के लोग अपनी जड़ों
, संस्कृति को कभी नहीं भूल पाते हैं क्योंकि इसी से उनकी
अस्मिता जीवित रहती है।

            इस शोध पत्र में
हिन्दी साहित्य में आदिवासी स्त्रियों के तनावों
, दुखों, यातनाओं और इन सबके बावजूद उन्हें जिन्दा रखने की जद्दोजहद
भीड़ में एक अलग पहचान बनाने की इच्छा एवं उनके संघर्ष करने की शक्ति को उजागर किया
है। आदिवासी स्त्रियों के शोषण एवं उनके जीवन पर आधारित कहानी और उपन्यास उनके
सबसे कमजोर पहलू रहे हैं। लेकिन आज पुरानी दास्तान से उभरकर उनकी वर्तमान दशा और
भविष्य के बारे में उनकी सांेच और संवेदना काफी हद तक अन्य जन तक सम्प्रेषित होगी।
जिसमें बुद्धिजीवियों के अध्ययन और शोध आदिवासी साहित्य के विकास में कुछ नयापन
लायेगी। और हमें उम्मीद है कि इस शोध पत्र की दृष्टि से आदिवासी स्त्री का विकास
सम्भव हो सकेगा।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूचि:-
1.         आदिवासी साहित्य
विमर्श-गंगा सहाय मीणा
2.         ग्लोबल गाँव के
देवता-रणेन्द्र
3.         आदिवासी संस्कृति
और साहित्य: स्त्री का दर्जा-केरकेट्टा
, डॉ. रोज
4.         झारखण्ड के
आदिवासियों के बीच-तलवार
, डॉ. वीर भारत
5.         कब तक
पुकारूँ-राँगेय राघव
6.         कचनार-वृँदालाल
वर्मा
7.         शैलूष-शिवप्रसाद
सिंह
8.         जहाँ बांस फूलते
हैं-प्रकाश मिश्र
9.         जंगल जहाँ शुरु
होता है-संजीव
10.       धार-संजीव
11.       अल्मा कबूतरी-मैत्रेयी
पुष्पा
 [जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के अंक 23 में प्रकाशित आलेख]
[चित्र साभार: विवेस पनोरमा]

सत्ता, साम्प्रदायिकता और ध्रुवीकरण की राजनीति बनाम समकालीन हिंदी कविता

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blue, black, and orange abstract painting
Photo by Steve Johnson on Unsplash

सत्ता, साम्प्रदायिकता और ध्रुवीकरण की राजनीति बनाम समकालीन हिंदी कविता

डॉ.गंगाधर चाटे

सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभाग,

अंबिकाबाई जाधव महिला महाविद्यालय,

वज्रेश्वरी(महाराष्ट्र) मोबाईल 9822740020

ईमेल- gangadharchate20@gmail.com

सारांश

‘सत्ता’ यह एक ऐसी शक्ति जिसे हर कोई पाकर शक्तिशाली बन जाता है और जो जीवन के सभी क्षेत्रों को प्रभावित करती है। सत्ता प्राप्ति के लिए साम,दाम दंड,भेद आदि का प्रयोग करना जायज माना जाता है। दरअसल, वह ‘फूट डालो और राज करो’ की कूटनीति से अपने आप को बनाये रखने की नापाक कोशिश करती है। इन दिनों तो सत्ता एक व्यवसायमें तब्दील होती जा रही है, जिसमें इन्वेस्टमेंट करके अनगिनत मुनाफाखोरी की जाती है। इसीलिए इसमें जनहित की संभावना का नितांत अभाव रहा है। समकालीन हिंदी कविता सत्ता के चेहरे और चरित्र की असलियत को उजागर करते हुए उसकी तीखी आलोचना करती है। समकालीन कवि सत्ता, साम्प्रदायिक और ध्रुवीकरण की राजनीति से भलीभांति परिचित है और उसका निर्भीकता से भंडाफोड़ करते हुए दिखाई देते है। वे कविताओं में सत्ता की मनमानी या तानाशाही प्रवृत्ति की कड़ी निंदा करते है और उसकी भ्रष्टाचारी व्यवस्था का पर्दाफाश भी। साथ ही वे सत्ता के अन्यायकारी, अत्याचारी और अराजकतावादी नीतियों का प्ररिरोध करते हुए जनहित की वकालत करते है।

बीज शब्द: सत्ता, सांप्रदायिकता, ध्रुवीकरण, राजनीति, चेहरा, चरित्र, मनमानी, तानाशाही, दमन, शोषण, समकालीन, कविता, कवि, भंडाफोड़,

भूमिका:

सत्ता से तात्पर्य उस सर्वोच्च शक्ति से है जो सभी क्षेत्रों पर न केवल अपना वर्चस्व, एकाधिकार और नियंत्रण स्थापित करती है, बल्कि वह उन सभी क्षेत्रों को बुरी तरह से प्रभावित भी करती है। यहाँ बुरी तरह से प्रभावित करने से अभिप्राय- सत्ता के अनचाहे हस्तक्षेपों, उसकी स्वार्थी, स्वहिताकारी, अहंकारी प्रवृतियों एवं उसकी मनमानी, तानाशाही, दमनकारी, शोषणकारी नीतियों आदि से हैं। इन दिनों ये सारे उपमान सत्ता के चरित्र के आभूषण से बन गये हैं। सत्ता के सिंहसान पर जो भी विराजमान हो जाता है, वह इन आभूषणों को धारण कर अपने आप को सुशोभित करता है। वह जमाना नहीं रहा जिसमें सत्ता का अर्थ अवाम की सेवा, सुरक्षा और सम्पोषण हुआ करता था। आजकल सत्ता तो केवल व्यक्ति के लिए धन की कमाई का एक राजमार्ग, उपभोग का एक साधन और खुद को ताकतवर बनाने का एक जरिया मात्र बनकर रह गई है। सत्ताधारी हमेशा ही अपने आप को अधिक ताकतवर बनाने में और अपने विरोधियों को कमज़ोर बनाने में लगा रहता है। यह कहना भी अनुचित नहीं होगा कि वह अपने विरोधियों का नामोनिशान तक मिटाने की नापाक कोशिश में लगा रहता है। अपनी सत्ता को अजेय, अपराजित और सार्वकालिक बनाना की उसका पहला और अंतिम लक्ष्य बन जाता है। इसीलिए कहा जाता है कि सत्ता चाहे जो भी हो, वह कभी भी लोकतांत्रिक नहीं हो सकती। उसमें ‘लोक कल्याण’ की भावना नहीं होती है, अपितु वह ‘लोक कल्याण’ के नाम पर लोक विरोधी गतिविधियों में हमेशा शामिल रहती है। विडम्बना तो यह है कि वह लोकतंत्र का नकाब पहनकर चारों ओर घुमती – फिरती है। दरअसल, सत्ता के इसी नकाब को उतारकर उसके असली चेहरे और चरित्र को उजागर करके जनता के सामने लाने की जद्दोजहद समकालीन हिंदी कविता कर रही है।

समकालीन कविता के सशक्त हस्ताक्षर कवि एकान्त श्रीवास्तव ने अपनी कविता में सत्ता की मनमानी, तानाशाही और दमन का पर्दाफाश किया है। इस दृष्टि से उनका प्रसिद्ध कविता संकलन ‘बीज से फूल तक’ विशेष उल्लेखनीय है। प्रस्तुत संग्रह की ‘मृत्युदण्ड’, ‘विरूद्ध कथा’ और ‘ताजमहल’ कविताओं में सत्ता की तानाशाही को देखा जा सकता है। आजकल ऐसे व्यक्ति को मृत्युदण्ड दिया जाता है, जो जनतन्त्र का सपना देख रहा है। कवि लिखते है कि यहाँ जनतन्त्र सपना देखना अपराध है। इस अपराध की सजा फँसी है जो मुझे दी जा रही है। कवि कहते है कि इस धरती पहले भाव, शब्द, कंठ पैदा हुए। इसके बाद सूर्य, धरती पैदा हुई। धरती को बसानेवाले जन भी पैदा हुई हुए और फिर इस जन को सताने वाले तंत्र पैदा हुए। कवि ने ‘ताजमहल’ कविता मे सत्ता के दमनकारी रूप को उजागर किया है, “यों भी इतिहास गवाह है/ कि जो ताजमहल बनाता है/ उसके दोनों हाथ काट दिये जाते हैं”।[1] इसतरह कवि ने सत्ता के अन्याय, अत्याचार और अराजकता का अंकन किया है।

कवि कश्यप अपनी कविताओं में सत्ता की अराजकता, मनमानी, तानाशाही और भ्रष्टाचार को रेखांकित करते हैं। कवि ने अपनी कविता ‘पुलिस अधिकारी’ में पुलिस प्रशासन की असलियत को उजागर किया है। दरअसल, इधर के दिनों में पुलिस अधिकारियों के गुंडों के साथ खुले आम रिश्तें होते हैं। गुंडे के अड्डे पर पुलिस अधिकारी दारू पीते हुए दिखाई देते हैं। उनके चरित्र के दोहरे का पर्दाफाश करते हुए कवि कहते हैं कि एक ओर वे पत्रकार परिषद में हत्यारों को पकड़ने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी पत्नी अपराधियों को चाय पिलाती नजर आती हैं। पुलिस प्रशासन के अन्यायकारी व्यवहार पर टिप्पणी करते हुए कवि लिखते हैं, “बलात्कार के बाद मार दी गयी/ शहर की सबसे सुंदर लड़की को/ एक पुलिस अधिकारी जल्दी-जल्दी जला रहा था/ और दूसरा गाड़ी तथा बचे कपड़ों पर से/ रक्त वीर्य और हथेलियों के निशान मिटा रहा था/ ताकि कोई सबूत न बचे/ महाबली बलात्कारियों के खिलाफ”।[2] यह एक क्रूर यथार्थ है कि पुलिस अधिकारी पीड़ित महिला की रपट लिखने से इनकार करते हैं। कवि यह भी कहना नहीं भूलते कि कुछ अच्छे पुलिस अधिकारी भी हैं, किन्तु बाकी सर्वत्र प्रशासनिक अँधेरा है। कवि ने मदन कश्यप ने ‘छवि की चिंता’ कविता में देश की दुर्गति के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। कवि के अनुसार देश की छवि भ्रष्टाचार, जातिवाद, अपहरण, ग़रीबी, अपराध आदि के कारण खराब हो रही हैं। इसीलिए सरकार सोचने पर मजबूर थी और छवि को सुधारने के लिए योजना बना रही थी। जनता को अपनी छवि की चिंता नहीं थी। उन्हें तो दो वक़्त की रोटी जरूरी थी। सरकार ने सामाजिक न्याय का आश्वासन दिया था, लेकिन उसकी गति काफ़ी धीमी थी। दुनिया तेज दौड़ रही थी, लेकिन हमारे देश में बहुत कुछ बरसों से रुका पड़ा था। कवि लिखते हैं, “इस बेहद तेज भागती दुनिया में/ यहाँ बहुत कुछ बरसों से रुका पड़ा था/ और जो थोड़ा कुछ गतिशील था/ उसकी भी चाल ऐसी लँगड़ी थी/ कि देखते ही हँसी आ जाती थी/ जाहिरन इससे भी छवि खराब हो रही थी”।[3] यहाँ कवि ने सरकारी व्यवस्था पर सटीक टिप्पणी की है। इसी तरह मदन की ‘थोड़ा-थोड़ा’ कविता भी वर्तमान राजनीति की तीखी आलोचना करती है। इधर की राजनीति में ऐसे धूर्त लोग भी है जो अपने स्वार्थ को साधने के लिए देश में ध्रुवीकरण करते हैं। वे थोड़ा-थोड़ा हिंदुत्व और थोड़ी-थोड़ी धर्मनिरपेक्षता दिखाकर सत्ता हासिल करना चाहते हैं। कवि ने ‘भारत उदय’ कविता में देश में व्याप्त अराजकता का चित्रण किया है। कवि व्यंग्यात्मक भाषा में कहते हैं कि एक नये भारत का उदय हो रहा है जिसमें भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। उसमें भ्रष्टाचारी खुले आम घूम रहे हैं। धर्मांध होकर लोग दंगे – फ़साद कर रहे हैं। गुंडों को कोई नहीं रोक पा रहा है। इसमें चोर, दलाल और हत्यारे खुश हैं। इसी कड़ी में मदन कश्यप की ‘राहत पैकेज’ कविता सरकारी पैकेज की वास्तविकता को उजागर कर रही है। सरकार बाढ़ पीड़ित लोगों की सहायता के लिए हेलीकॉप्टर भेजती है। हेलीकॉप्टर की आवाज सुनकर लोग सचेत होते हैं और उसकी ओर भागते हैं, भले ही पंखें की तेज हवा उन्हें लाख रोकती रहे सरकारी पैकेज में चिउरा, सत्तू, चने, माचिस, मोमबत्ती, नमक आदि जरूरी चीजें होती हैं। सभी लोग भूख से बचने के लिए पैकेज लेने भागते हैं। इसमें नई दुल्हन भी है जो आसमान से गिरते पैकेटों को लपकने के लिए आँचल फैलाकर दौड़ रही है। इससे पहले उसने कभी घर की दहलीज पार नहीं की है। इसमें वह लड़की भी है जो अपने दुपट्टे को सँभालना भूल जाती है। वे बूढ़े भी है जिनके बस की बात नहीं पैकेज पकड़ना। बाढ़ हर साल आती है, लेकिन हमारी सरकार उस पर ठोस प्रबंध नहीं कर रही है। कवि के शब्दों में, “हर साल आती यह बाढ़/ और हर बार हमें अपनी नजरों में/ कुछ और गिरा जाती है/ कुछ और छोटा बना जाती है”।[4] यहाँ कवि ने सरकारी आपत्ति व्यवस्थापन प्रणाली पर टिप्पणी की है। इसतरह कवि ने वर्तमान सरकार को सवालों के कटघरे में खड़ा किया है।

सत्ता ने न्यायपालिका को काफ़ी प्रभावित किया है। न्याय को भी अपने पक्ष में कर लिया है। न्यायपालिका के जज, वकील आदि क़ानून के दायरे में काम करने के लिए मजबूर हैं। सत्ता संसद में कानून बनाती हैं। वरिष्ठ कवयित्री कात्यायनी ने ‘वकील की कविता’ में न्यायव्यवस्था की विसंगतियों को उजागर किया है। प्रस्तुत कविता में वकील अपनी मजबूरी बताते हुए कहते हैं कि हम नदी में गिरी लाश को हम न्याय नहीं दिला सकते, क्योंकि वह लावारिस होती है। हमें फीस लेकर मुकदमा लड़ना है। जज जी तो इससे भी बड़ी विडंबना है कि उसे धारा अनुच्छेद से जिंदगी तोलनी होती है। उसके हाथ न जाने कितने बेगुनाहों को सजा देकर रक्तरंजित हुए हैं। उसे अपना काम कसाई के काम जैसा लगता है। जज कहता है, “ जजी में क्या रखा है! सोचता हूँ होटलों में मुर्गे की सप्लाई करूँ/ या चमड़े के कारखाने में सुपरवाइजर हो जाऊं”।[5] इस तरह कवयित्री ने न्यायव्यवस्था को प्रश्नांकित किया है। इस दुष्समय में बुध्दिजीवी की स्थिति भी घुटन भरी है। उन्हें विखंडन का शिकार होना पड़ा है। वे चीजों को टुकड़ों – टुकड़ों में जानने को मजबूर हुए हैं।

नब्बे के बाद साम्प्रदायिकता एक प्रमुख समस्या बनकर उभरी है। देश में बाबरी मस्जिद ध्वंस की साम्प्रदायिक घटना ने समकालीन कवियों की चेतना को झकझोर दिया। कई सारे सजग कवि साम्प्रदायिकता के मुद्दें पर कविताएँ लिखने लगें। साम्प्रदायिकता के मुद्दें से ध्रुवीकरण की राजनीति ही सत्ता की असलियत रही है। सत्ता ने हमेशा से ही साम्प्रदायिकता का सबसे कारगर हाथियार के रूप में इस्तेमाल किया है। साम्प्रदायिकता की भावना को भड़काकर सत्ता समाज में विभाजन करती रही है। साम्प्रदायिक सरकारें दंगें – फसाद करके समाज में अशांति फैलाती हैं। ऐसी सरकारें आस्था को बचाये रखते हैं, क्योंकि आस्था में तर्क को कोई स्थान नहीं होता। कात्यायनी की ‘आस्था का प्रश्न’ यह कविता आस्था की राजनीति का पर्दाफाश कर रही है। ऐसी राजनीतिक सरकारें लोगों से कह रही हैं कि यदि इस देश में रहना चाहते हो, तो आस्थावान बनों। ऐसे अतिरेकी विचार उनके राजनीतिक हितों से प्रेरित होते हैं। कात्यायनी रामराज्य की राजनीति का भी भंडाफोड़ करती हैं। रामराज्य में वोट की राजनीति हैं। साम्प्रदायिक सरकारें अपने वोट बैंक को ही इस देश में रखना चाहती है। जो उनके साथ नहीं है, उनके साथ वह कैसे व्यवहार कर रही है देखें – “संदेह करने वालों को उम्रकैद/ तर्क करने वालों को फाँसी/ अल्पमत पर बहुमत का धर्मराज्य/ नास्तिकों को सूली”।[6] जाहिर है कि ऐसी फांसीवादी ताकतें लोकतंत्र के लिए घातक है। धर्म के ठेकेदार भी धर्म का उपयोग अपने स्वार्थसिद्धि के लिए खुले आम कर रहे हैं। कात्यायनी ने अपनी कविता ‘क्या स्थगित कर दे’ कविता में इन स्थितियों पर प्रकाश डाला है। प्रस्तुत कविता में साध्वियों के उन्मुक्त भाषणों का और शंकराचार्य के ध्वजधारी बनने का संदर्भ मिलता है। इसतरह साम्प्रदायिकता के दुष्प्रभाव को कवयित्री अपनी कविताओं में रेखांकित करती हैं।

कवि लीलाधर मंडलोई साम्प्रदायिक ताकतों की विभाजनकरी रणनीति से अच्छी तरह से वाकिफ़ है। कवि के अनुसार ऐसी ताकतें देश का सबसे बड़ा नुकसान कर रही है। कवि ने अपनी कविता ‘सोते में जागते हुए’ में साम्प्रदायिकता का बीभत्स चेहरा उजागर किया है। साम्प्रदायिकता कवि के लेखन पर आक्रमण कर रहा है। मंडलोई ने ‘ईश्वर की शिकस्त’ कविता में धर्मांधता पर कड़ा प्रहार किया है। कवि के अनुसार साम्प्रदायिकता रामराज्य के प्रचार- प्रसार में लगी है, जबकि देश में बच्चे भूखे है। वे रोटी के लिए तरस रहे है। यह इस देश की विड़म्बना है कि यहाँ धर्म की दहशत फैल रही है। इसी तरह कवि ‘अनुपस्थिति’ शीर्षक कविता में धर्म और राजनीति के अपराधीकरण का पर्दाफाश किया है; “मुझे होना चाहिए था संसद में/ मेरी अनुपस्थिति से अब वहाँ अपराधी/ अनुपस्थिति का शाप इतना भयानक/ मन्दिर में इन दोनों कब्जा शैतानों का”।[7] कवि धर्म और राजनीति की मिलीभगत को प्रकाशित करते है। इसीलिए कवि को कबीर का स्मरण हुआ है। कबीर ने ऐसी साम्प्रदायिक शक्तियों के मनसूबे जान लिये थे। उन्होंने साम्प्रदायिकता का डटकर विरोध किया। कवि कहते है कि हमें कबीर की बातों को सूनना चाहिए। हमें आस्था को साम्प्रदायिक ताकतों के हाथों से निकालना चाहिए। आस्था पर कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए। यही भावना कवि ने अपनी कविताओं में प्रकट की है।

भगवत रावत जी जानते है कि समाज में विभाजन करनेवाली कुछ ताकतें मौजूद है। ऐसी ताकतें धर्म एवं जाति के नाम पर समाज का विघटन कर रही है। इसलिए कवि ने साम्प्रदायिकता को अपनी कविता की वस्तु बनाया है। उनकी ‘सुनहू पवनसुत रहिन हमारी’, आपने भी तो, मैं सन सैंतालिस या उसके बाद पैदा नहीं हुआ, इन दिनों आदि कविता में साम्प्रदायिकता पर टिप्पणी की गई है। कवि के अनुसार गुजरात दंगे के बाद हमारे देश में मंदिरों की संख्या बढ़ती गई है। कवि के घर के सामने – पीछे, दाएँ – बायें मोड पर मंदिर ही मंदिर बन गए है। मंदिर पर सुबह से लेकर देर रात तक लाऊडस्पीकर बजता रहता है। कवि को यह धर्मांधता लगती है। बाबरी मस्जिद का ठहाना धर्मांधता का उदाहरण है। कवि ने आयोध्या शहर को हिन्दुत्व का प्रतीक माना है। कवि ने भारत और पाकिस्तान के विभाजन को भी अपनी कविता में संदर्भित किया है। यह सभी विघटन साम्प्रदायिकता की देन है। कवि साम्प्रदायिकता पर व्यंग्य करते हुए कहते है, “मैं मुसलमान नहीं हूँ/ इन दिनों खुश होने के लिए/ यह क्या/ कोई कम बात है”।[8] जाहिर है कि साप्रदायिकता ने हमारे देश का सबसे ज्यादा नुकसान किया है। समाज में कुछ कट्टर संगठन अपने स्वार्थ के लिए धर्म का गलत इस्तेमाल करते है। लोगों में धर्म के नाम से नफरत फैलाते है। इससे समाज में साम्प्रदायिक दंगे होते है। कवि इससे अच्छी तरह वाकिफ है। इसीलिए वह मानव धर्म का समर्थन करता है। भगवत रावत ने समाज में फैली अशांतता के प्रति भी चिंता व्यक्त की है। कवि के अनुसार पहले दुनिया शांत थी, लेकिन अब यहाँ लाऊडस्पीकर, आवाजाही, धौंस – धपर बढ़ रही है। वे अपनी ‘इसके पहले’ कविता में लिखते है: “इतने-इतने संत इतने उपदेश/ इतनी कथा वार्ताएँ, इतने गौरव गान/ इतना गाली-गलौज/ इतना धरम-ईमान/ इससे पहले तो कभी हुआ नहीं”।[9] प्रस्तुत कविता में धर्म में बढ़़ते आडम्बर का चित्रण है। धर्म ने बाहरी दिखावटी रूप धारण किया है। इसमें भक्ति कम और शोर – शराबा ज्यादा है। बौद्ध धर्म को शांति का प्रतीक माना जाता है, लेकिन उसका पतन हो रहा है। कवि रावत जी ‘हुआ तो वही’ कविता में शांति के प्रतीक बौद्ध धर्म के पतन की व्यथा प्रकट की है। कवि कहते है कि मुझे पता नहीं है कि महात्मा बुद्ध ने कभी कहा होगा संघ के जीवन की यह विडम्बना होगी कि उसमें धर्म के विनाशक के हाथ में धर्म का ध्वज होगा। निश्चित ही कवि शांति में सेंध लगानेवालों की तीखी आलोचना करते है। धर्म का विनाश, सांप्रदायिकता बढ़ना, समाज में अशांति आदि समाज के विकास में बाधक है।

कवि अरूण कमल ने साम्प्रदायिकता के दुष्परिणाम को अपनी कविताओं में अधोरेखित किया है। कवि ने पाकिस्तान की धरती पर खड़े होकर अनुभव किया कि साम्प्रदायिता ने दोनों देशों का कितना नुकसान किया है। उनकी ‘दूसरा आँगन’ कविता साम्प्रदायिकता के जन विरोधी चेहरे की परिचय कराती है। प्रस्तुत कविता में कवि ने आठ उपशीर्षकों के अंतर्गत साम्प्रदायिता के परिणामों का चित्रण किया है। ‘जब तुम किसी के करीब आते हो’ उपशीर्षक में कवि नफ़रत फैलानेवाले व्यक्ति को संबोधित कर रहे है। कवि कहते है कि यदि तुम लोगों को धर्म, जाति या देश से जानते हो तो उनमे आसानी से नफ़रत फैला सकते हो। लेकिन तुम्हने यदि उनके करब जाकर देखा तो पता चलेगा कि वे कितने दीन है। तुम्हारे लिए चाय बनाने के लिए उन्हें कितनी मशक्कत करनी पड़ती है। वे कर्ज में दुबे हुए है। इस वास्तविकता को देखकर तुम अपना चाक़ू आस्तीन में खोंसकर वापस आते हो। साम्प्रदायिकता का सबसे बड़ा उदाहरण भारत – पाकिस्तान का विभाजन रहा है। कवि ने ‘दोस्ती’ उपशीर्षक में देश विभाजन की त्रासदी को व्यक्त किया है। भारत – पाक विभाजन के समय कई लोगों को जेल जाना पड़ा था। कवि कहते है कि जिस मुल्क ने आपको पंद्रह साल तक जेल में रखा ,उस मुल्क के आदमी से मिलकर तुम्हें कैसा लगेगा? कवि पाकिस्तान में बशीर भाई से मिले और उनके साथ कई शामें बिताई। उनसे मिलकर कवि को अपराध बोध हुआ। कवि को लगा कि कहीं जेल में कैद मछुआरे,चरवाहे,बंजारे नौजवान के लिए वह तो जिम्मेदार नहीं है? जाहिर है कि साम्प्रदायिकता के शिकार न जाने कितने निर्दोष लोग होते रहे है। ‘शाम को इंतजार’ उपशीर्षक में बिदेस में शाम वर्णन किया है। ‘अनारकली’ उपशीर्षक में शाम के समय सड़क को दस्तरख्वान में बदलते देखा है। कवि को लगता है कि कितना अच्छा होता अगर दुनिया की हर सड़क हर चौक शाम ढलते दस्तरख्वान बन जाए। ‘मैंने लाहौर में एक तोता देखा’ उपशीर्षक में लाहौर के तोते का चित्रण है। कवि को यहाँ के तोते और वहाँ के तोते में समानधर्मिता दिखाई देती है।वह दिखने में एक जैसा था।कवि कहते है कि तोते की कोई जाति या धर्म नहीं होता। “ पर एक बात जो खास लगी वो ये कि/ यहाँ भी वह लोहे के पिंजड़े में बंद था जैसे वहाँ/ और यहाँ भी वो पिंजड़ा काटने की मुहीम में जुदा था जैसे वहाँ”।[10] अरूण कमल ने ‘बिदेस’ उपशीर्षक में देस – बिदेस की तुलना की है। कवि कहते है कि ये कैसा बिदेस है जो देस जैसा लग रहा है कवि को वहाँ कोई भी अजनबी की तरह नहीं देखता। ‘मातृभूमि पर प्यार’ उपशीर्षक में कवि को मातृभूमि पर प्यार उस समय आया जब उसने बाघा सीमा पर झंडे उतरते की परेड में इधर के स्टैंड से अपनी धरती देखी। ‘ जिसने लाहौर देखा’ उपशीर्षक में कवि ने लाहौर शहर का गुणगान किया है। ‘जिंदाबाद’ उपशीर्षक में कवि कहते है कि लोग शहीद भगतसिंह को लाहौर में भूल गये। कवि को दर लगता है कि कल अपने देश में भी ऐसा हो! इसतरह कवि ने जहाँ एक ओर साम्प्रदायिकता का घिनौना चेहरा उजागर किया है, वहीं दूसरी और विश्व मानवता का पुरस्कार किया है।

कवि चेतनक्रान्ति ने भी 2002 ई.में गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगे को अपनी कविता की अंतर्वस्तु बनाया है। ‘शोकनाच’ काव्य संग्रह में ‘हत्यारे साधु जाएँ हत्या करने मेरा यह शाप लेकर’ कविता उन साधुओं पर चेतन ने लिखी है जो तथाकथित दंगे के लिए जिम्मेदार थे। ऐसे धर्म के कट्टर साधुओं को कवि अभिशाप देता है। इन साधुओं ने नरसंहार करके अपने धर्म को खो दिया। ऐसे साधुओं का क्षय हो ये पाताल में जाए , इनकी आत्माओं को कष्ट मिले। इन साधुओं को लाशें दिखाते हुए कवि कहते है कि इनका तुम भोग करो। फिलहाल यह जनतन्त्र तुम्हारा है। शक्ति, सत्ता और पूँजी तुम्हारे पास है । उसका तुम मनचाहा उपयोग करो। राम को छोडकर सबकुछ तुम्हारा है। इस तरह अमानवीय, हिंसा, अत्याचार, हत्या आदि करने का शाप कवि साधुओं को देते है। चेतन की ‘कविता के अंधेरे वक्तों की बानगी’ कविता में भी धर्मान्ध युवकों का चित्रण हुआ है। इन युवाओं के मन में हिंदू धर्म का दंभ है। वह अपने आपको हिन्दू होने का गर्व करते है।उनके लिए धर्म सबसे पहले है, बाद में सब कुछ ,”हमारे मुहल्ले की पास वाली बस्ती में/ एक दिन उन्होंने कसम खाई थी/ कि सबसे पहले धर्म /उसके बाद राष्ट्र उसके बाद/ सेहत और उसके बाद कुछ नहीं।”।[11] इस तरह की प्रवृत्ति देश की अखण्डता को बाधक है। भारत धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है। इसमें सभी धर्म समान है। चेतन ने श्रद्धा, ईर्ष्या, भक्त,ईश्वर आदि धार्मिक शब्दों पर भी कविताएँ लिखी है। कवि के अनुसार श्रद्धा का अनुकरण हो रहा है। हमारे पूर्वजों ने हमें श्रद्धा का जो रूप दिया था,उसका अनुकरण हम आनेवाली पीढ़ी को देंगे। हम अपने उत्तराधिकारी को कम मेहनत में सुविधा देंगे। उन्हें अनुकरण का घोर अनुकरण सिखाएँगें। इस तरह हम श्रद्धा को खोते से जा रहे है। धर्म का अस्तित्त्व डर पर आधारित है।  इसका प्रतिपादन चेतन की ‘भगवान का भक्त’ कविता करती है। इसीलिए कवि ने ईश्वर से डरने का फैसला किया। बिल्ली के अँगडाई लेने से, तीसरी आँख के कैमरो से और डरवानी आवाजों से कवि को कुछ नहीं होता, तो वह भगवान का आभार व्यक्त करता है। इसतरह चेतन ने धर्म,संप्रदाय और आस्था के यथार्थ को अपनी कविताओं में अभिव्यक्त किया है।

कवि राजेश जोशी की कविता में साम्प्रदायिकता के शिकार बने लोगों का मार्मिक चित्रण है।उनकी ‘रफ़ीक मास्टर साहब’ कविता में मास्टर जी का भावनिक स्मरण है। रफ़ीक मास्टर साहब बानवे के दंगे में मारे गये।वे कवि को बिरजीसिया मीडिल स्कूल में गणित पढ़ाते थे।उनकी एक कागज के फूलों की दुकान थी।उन्होंने कवि को कागज के फूल बनाने की तरकीबें के बारे में सिखाया। कवि को आज भी लोहा बाज़ार में रफ़ीक मास्टर साहब और कागज के फूलों की दुकान दिखाई देती है। राजेश की ‘टॉमस मोर’ कविता भी साम्प्रदायिक क्रूरता और निर्दयता का चित्रण करती है।प्रस्तुत कविता में टॉमस मोर का आत्मवृत्त है। टॉमस मोर को धर्मान्ध ताकतों ने मृत्युदण्ड देकर उनका सिर काटकर उन्हें लंदन ब्रिज पर लटका दिया। उनका अपराध देखिए – ”उन्होंने कहा कि मैं राजसत्ता और धर्म के सम्बन्धों का/ विरोध करना बंद कर दूँ/ मैंने इंकार कर दिया/ वो चाहते थे कि मैं राजा को धर्मसभा का अध्यक्ष मान लूँ/ मैंने इंकार कर दिया”।[12] इस तरह टॉमस मोर को अधीनता न स्वीकार करने की सजा मिली। साम्प्रदायिक कट्टरता के इस दुष्यचरित्र कवि ‘पागल’ कविता में उजागर किया है। ऐसे कट्टर लोग सभी को धर्म में बाँटकर देखते है। तभी तो वह एक पागल लड़की से उनका धर्म पूछते है। किसी के बताने पर कि वह पागल है, क्यों वे नहीं मानते। वे बार-बार उसे हिंदू हो या मुसलमान पूछते रहते है। इस पर लड़की जोर-जोर हँस पड़ती है। कवि के अनुसार वे नहीं सोचते कि हर व्यक्ति पहले मनुष्य है। धर्म के ठेकेदार लोगों में साम्प्रदायिक नफरत फैलाकर अपना उल्लू ठीक करवाते है। लोगों को बांटकर दंगे करने में उनका हित छिपा है। इसका पर्दाफाश राजेश की कविता में किया गया है।

समकालीन हिंदी कविता उन तमाम सत्ता, साम्प्रदायिकता और ध्रुवीकरण की राजनीति का प्रतिरोध करती है, जो लोक की दुर्गति, दुर्दशा और अविकास के लिए कारण बनी हुई है। कवि बद्रीनारायण के ‘शब्दपदीयम्’ कविता संकलन की अधिकांश कविताओं में सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध दर्ज किया गया है। कवि के कहते है कि मौजूदा समय में सत्ता ने प्रतिरोध को खत्म करने का बीड़ा उड़ाया है। कवि ने ‘सोचनेवाला आदमी’ कविता में लिखा है, “बात राज्य के गुप्तचर विभाग तक पहुँच गई है/ उन्हें सख्त आदेश है कि पता लगाये/ कौन ऐसे लोगों को ऐसे शब्द/ सप्लाई कर रहा है/ जिससे सृष्टि का जोड़ गड़बड़ा रहा है”।[13] इतना ही नहीं सत्ता प्रतिरोध को दबाने के लिए क्या करना चाहती है; “शब्दों पर लागू हो कोटा – परमिट/ कितना शब्द किसको और कहाँ मिले/ यह राज्य तय करें”।[14] कवि ने ऐसी राज्य संस्था का धिक्कार किया है जो लोगों के खिलाफ़ षडयन्त्र रच रही है। कवि बद्री नारायण की ‘धत् तेरी दिल्ली की’ कविता में यह स्वर सुनाई देता है। आज़ादी के कई सालों बाद भी आम आदमी की स्थिति में सुधार नहीं हुआ। दिल्ली केवल कुछ पूँजीपतियों के विकास का केंद्र बन गई। इसलिए कवि ने दिल्ली को नकारा है। जीतेन्द्र गुप्ता के शब्दों में, “राजनीतिक तौर पर भी स्वतंत्र भारत के 60 वर्षों का अनुभव कहीं से भी कोई सुखद नहीं रहा है। जनता के चुने हुए प्रतिनिधि तो होते है, लेकिन जनता के नहीं। देश की सर्वोच्च संस्था, जिसकी स्वतन्त्रता व स्वायत्त्तता के लिए न जाने कितना खून बहा, कितना परिश्रम किया – उसके गौरव को भी नष्ट कर दिया गया। राजनीतिक नेताओं के कुख्यात षडयन्त्रों के सामने आने के बाद संसद की गरिमा ही क्या रह गई है? संसद  दलालों की खरीद – फरोद मंडी हो गई है”।[15] इसीलिए कवि बद्री नारायण जैसा कवि संसद को धिक्कार रहा है- “बड़ा नाज है/ लो धत् तेरी संसद की”।[16] राजनीति का इससे बड़ा और क्या प्रतिरोध हो सकता है! कवि ने विकास की अवधारणा पर भी हल्ला बोल दिया है। इसीलिए वे विकास के खिलाफ करूणा पाठ कर रहे है, “आधी रात में मैं करना चाहता हूँ/ एक रुलाई का पाठ/ जो शहर की सड़क पर/ उसके वैभव के खिलाफ रोई जा रही हो”।[17] यहाँ रूलाई का निहितार्थ प्रतिरोध है। उपर्युक्त पंक्ति को जीतेन्द्र गुप्ता ने एक आरंभ बिंदु माना है। यहाँ कवि ने सभ्यता के विकास की आलोचना की है। ‘”कवि का रूदन उस सारी अभिजात परंपरा के खिलाफ है, जिसमें स्वार्थगत आधारों पर एक खास वर्ण के सदस्यों ने समाज के बहुसंख्यक हिस्से का निरंतर शोषण किया है और इस शोषण की भौतिक अभिव्यक्ति ‘शहर का वैभव’ है”।[18] कवि ने असफल प्रतिरोध को भी अपनी कविता में स्थान दिया है । उन्होंने ‘कोई ऋषि नहीं,यह कुत्ता लिख रहा है’ कविता में एक बेसहारा औरत के संघर्ष को रेखांकित किया। इस औरत का परिवार दंगे का शिकार हुआ है। वह अपने परिवार को लेकर कलकत्ता भाग जाना चाहता है, लेकिन उसका परिवार इस दुनिया में नहीं है।उसकी चिल्लाहट कोई नहीं सुन रहा। उसे लाइटमैन डाटता है। तभी एक कुत्ते की आँख में आँसू आते है। यहाँ जानवरों में संवेदना बची है, आदमियों में नहीं। कवि बद्री नारायण ने छोटे – छोटे प्रतिरोध को कमजोर कहा है। उन्हें किसी बड़े प्रतिरोध की अपेक्षा है। कवि ने ‘छोटी छोटी इच्छाएँ ‘ कविता में कहा है कि मैंने कुछ कविता लिखकर प्रतिरोध करने की इच्छा को साध लिया है, लेकिन ऐसे प्रतिरोध से मुझे धिक्कार है। कवि को लगता है कि मौजूदा समय में प्रतिरोध का विजय होना मुश्किल है। इस तरह कवि बद्री नारायण ने ‘प्रतिरोध’ अपनी कविता में सर्वाधिक स्पेस दिया है। प्रतिरोध के दोनों पक्षों को विस्तार से प्रतिपादित किया है। इसमें मौजूदा समय की सत्ता और व्यवस्था की निर्ममता, क्रूरता और भयावहता का दर्शन होता है। ऐसे में सामूहिक प्रतिरोध की जरूरत होती है। सामूहिक प्रतिरोध से ही हम बहुसंख्यक लोक जीवन को बचा सकते है।

कुलमिलाकर कहा जा सकता है कि सत्ता के चेहरे और चरित्र में दोगुलापन मौजूद रहा है। बाहर से भले ही उसका चेहरा जनहितकारी दीखता हो, किन्तु भीतर से वह निजी स्वार्थों में लिप्त रहती है। उसके चरित्र में अनैतिकता, भ्रष्टाचार और शोषण का दाग लगा हुआ है। वह अपने अस्तित्व को बचाने के लिए किसी भी हद नीचे गिर सकती है और साम्प्रदायिकता और ध्रुवीकरण की राजनीति से समाज को विखंडित करके राज करती है। विडंबना यह है है कि वह जनता से शक्ति प्राप्त करके उसी शक्ति का इस्तेमाल जन विरोधी गतिविधियों में बड़ी चालाखी से करती है। जरूरत है कि ऐसी सत्ता के चेहरे और चरित्र पहचान करके उसे उखाड़ फेंककर सार्वजनिक लोकतंत्र की स्थापना करने की।

निष्कर्ष:

1 ‘सत्ता’ शब्द अपने निहितार्थ में सर्वोच्च शक्ति को समाहित करता है। वह जीवन के सभी क्षेत्रों को नियंत्रित एवं संचालित करता है।

2 समकालीन हिंदी कविता सत्ता की दमनकारी नीतियों का पर्दाफाश करती है। इन कविताओं में सत्ता की मनमानी और तानाशाही सटीक चित्रण मिलता है।

3 समकालीन कविता वर्तमान राजनीति की तीखी आलोचना करती है। आजकल राजनीति में लोग अपने स्वार्थ को साध्य करने के लिए समाज का ध्रुवीकरण करते है।

4 सत्ता ने न्यायपालिका को बहुत प्रभावित किया है और न्याय को अपने पक्ष में कर लिया है। समकालीन कविता न्यायव्यवस्था की मज़बूरी, कमजोरी और विसंगतियों को उजागर करती है।

5 समकालीन कविता सांप्रदायिकता की समस्या को प्रमुखता से उठाती है। सांप्रदायिकता के दुष्परिणामों चित्रण समकालीन कवियों ने अपनी कविताओं में विशेष रूप में किया है।

6 समकालीन हिंदी कविता ऐसी सत्ता का प्रतिरोध करती है, जो सांप्रदायिकता का इस्तेमाल ध्रुवीकरण की राजनीति के लिए करती है।

7 समकालीन कविता ‘कल्याणकारी राज्य’ की मनोकामना करती है।

संदर्भ

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कात्यायनी, इस पौरुषपूर्ण समय में, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 1999

लीलाधर मंडलोई, काल बाँका तिरछा, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2004

भगवत रावत, ऐसी कैसी नींद, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2004

अरुण कमल, मैं वह शंख महाशंख, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली,प्रथम संस्करण 2012

आर.चेतनक्रान्ति, शोकनाच, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2004

राजेश जोशी, चाँद की वर्तनी, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2006

बद्रीनारायण, शब्दपदीयम्, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2004

पक्षधर,पृ. 135, वर्ष- 3, अंक -8

 

  1. एकांत श्रीवास्तव, बीज से फूल तक, पृ.77, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2003
  2. मदन कश्यप, कुरूज, पृ.57, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2006
  3. मदन कश्यप, कुरूज, पृ.69, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2006
  4. मदन कश्यप, कुरूज, पृ.81, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2006
  5. कात्यायनी, इस पौरुषपूर्ण समय में, पृ.46, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 1999
  6. कात्यायनी, इस पौरुषपूर्ण समय में, पृ.114, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 1999
  7. लीलाधर मंडलोई, काल बाँका तिरछा, पृ.70, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2004
  8. भगवत रावत, ऐसी कैसी नींद, पृ.103, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2004
  9. भगवत रावत, ऐसी कैसी नींद, पृ.20, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2004
  10. अरुण कमल, मैं वह शंख महाशंख, पृ. 33, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली,प्रथम संस्करण 2012
  11. आर.चेतनक्रान्ति, शोकनाच, पृ.92, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2004
  12. राजेश जोशी, चाँद की वर्तनी, पृ.87, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2006
  13. बद्रीनारायण, शब्दपदीयम्, पृ.96, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2004
  14. बद्रीनारायण, शब्दपदीयम्, पृ.97, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2004
  15. पक्षधर,पृ. 135, वर्ष- 3, अंक -8
  16. बद्रीनारायण, शब्दपदीयम्, पृ.54, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2004
  17. बद्रीनारायण, शब्दपदीयम्, शब्दपदीयम्, पृ.11, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2004
  18. पक्षधर,पृ.136, वर्ष- 3, अंक -8

कोश विज्ञान की उपादेयता

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कोश विज्ञान की उपादेयता

कोश विज्ञान क्या है

भाषा विज्ञान किसी भी ज्ञान में सबसे अधिक भूमिका निभाता है । दरअसल शिक्षण, अध्यापन या ज्ञान प्राप्ति का माध्यम ही भाषा है। बिना भाषा के मानव समाज कभी वर्तमान स्वरूप तक नहीं पहुंच सकता था और नहीं वह अपने संचित अनुभव को परंपराओं तक संजो सकता था। इसीलिये किसी भी भाषा में रचा गया ज्ञान जानने के लिये भाषा का ज्ञान होना बहुत जरूरी होता है । और यह ज्ञान भाषा विज्ञान के माध्यम से ही समझा जा सकता है। जैसा कि स्पष्ट है कि भाषा का ज्ञान भी अपने आप में विज्ञान है अर्थात् उसको समझने के लिये विशेष तरीको ] पद्धतियों एवं नियमों का पालन करना होता है। इस अध्ययन के अंतर्गत भाषा नामक इकाई की परिभाषा ] पहचान ] उसके अस्तित्व में आने और विस्तार के तथा उसके घटक तत्वों के बारे में अध्ययन किया जाता है।

भाषा यद्यपि ध्वनि के रूप में नैसर्गिक रूप से विद्यमान रही किंतु उसे अभिव्यक्ति का नियमित माध्यम बनाने के लिये ध्वनि विशेष को संचित करके वर्ण और फिर सभी को संज्ञा देने के लिये शब्दों का निर्माण किया गया है। अतः भाषा के संपूर्ण विस्तार में शब्दों का अत्याधिक महत्व है। और किसी भाषा में सेंकडों वर्षो के प्रयोग के बाद जितने भी शब्दों का निर्माण किया गया हैं उसे जानने के लिये शब्दकोश का निर्माण बहुत जरूरी है। अन्यथा कम उपयोग या उपयोग न होने के कारण शब्द भाषा से गायब हो सकता है जो कि भाषा के लिये अमूल्य संपत्ति होता है।

इसी कोश निर्माण और उसके अध्ययन को कोश विज्ञान के रूप में जाना जाता है। कोश विज्ञान सिर्फ शब्दों का बेतरतीब भंडार या संग्रह नहीं है बल्कि उसे व्यवस्थित बनाकर ही संपूर्ण भाषा को जाना जा सकता है। अतः कोश निर्माण भी अपने आप में अत्यंत श्रमसाध्य प्रक्रिया है अंग्रेजी में केाश विज्ञान को (lexicology) कहा जाता है । कुछ विद्धान इसे (lexicography) भी कहते है। जिसका हिन्दी पर्याय कोश कला है । वास्तव में ये दोनो एक दूसरे के पूरक हैं। एक सैद्धतिक रूप है दूसरा व्यवहारिक या प्रायोगिक रूप है।

कोश विज्ञान तो कोश बनाने का विज्ञान है। इस में उन सिद्धांतों का विवेचन करते है जिनके आधार पर कोश बनते है दूसरी ओर कोश कला उसके प्रयोग को अधिक सुंदरता से प्रयोग करने का तरीका हैं। भाषा विज्ञान के सभी विद्वानां ने दोनो को एक दूसरे का पूरक माना है।

कोश विज्ञान की उत्पत्तिः-

भाषा के जन्म और उसके ज्ञान के विभिन्न घटकों के ज्ञान की भी उत्पत्ति भारत में हुई । वैदिक साहित्य में शब्द कोश या कोश विज्ञान के लिये निघण्टु शब्द का प्रयोग किया जाता है। इतिहासकारों ने उसे 1000 ई- पू- का माना है यद्यपि वेदिक काल की कल्पना को इतिहास के काल खंड में नहीं बांटा जा सकता है क्योंकि यह वस्तुतः साहित्य में वार्णित सभ्यता के आधार पर माना गया है। तथापि 1000 ई-पू- से 1000 ई- के दो हजार वर्षो में भारत में अनके कोशों का निर्माण किया गया जिनमें से कई आज भी उपलब्ध हैं। यूरोप में कोश विज्ञान का आरभ सन 1000 ई- के बाद हुआ परंतु अंग्रेजी भाषा के उल्लेखनीय कोश सोलहवी सदी में ही निर्मित हुऐ जो आज भी काफी प्रचलित है। इन कोशो के अंतर्गत उस भाषा में अब तक प्रयुक्त हुऐ लगभग सभी शब्दों का संग्रह किया गया है किन्तु फिर भी उन्हें अंग्रिम या पूर्ण संग्रह नहीं कहा जा सकता है। इतना अवश्य है कि कोश के ज्ञान के बाद भाषा का लगभग संपूर्ण स्वरूप जाना जा सकता है। किसी भी भाषा को अगर सीखना या समझना है तो उसके तीन घटकों को सीखना पड़ता है। तभी हम उसके विद्वान बन सकते हैं ।

1 व्याकरणः- इसके अंतर्गत उस भाषा के कर्ता ] कर्म] क्रिया और कारकों को लिखने] बोलने का उचित अनुक्रम और विभिन्न कालों और वाक्यों में उसके भीतर परिवर्तन की सीखा जाता है।

2 शब्द कोशः- व्याकरण से भली भांति परिचित होकर शब्द कोश का ज्ञान किया जाता है। यह एक अत्यंत कठिन प्रक्रिया है। शब्द का ज्ञान ] शब्दों के अर्थ] वर्तनी का प्रयोग आदि इस में सीखे जाते हैं।

3- शब्दों के विभिन्न प्रयोग या प्रयोग कलाः- इसके माध्यम से हम भाषा के विभिन्न प्रयोग] प्रभावी प्रयोग और विभिन्न भावों को दर्शाने के लिये जो विभिन्न तरीके जैसे पर्यायवाची] मुहावरे ] गूढ प्रयोग या रहस्यपरक चमत्कारी प्रयोग आदि आते है। इन तीनों प्रकारों को हम प्रतिभा] व्युत्पत्ति और अभ्यास में भी रख सकते है। प्रतिभा अर्थात भाषा संरचना का ज्ञान] व्युत्पत्ति अर्थात शब्द कोश का ज्ञान एवं अभ्यास अर्थात भाषा के विभिन्न प्रयोग के अंतर्गत रख सकते हैं।

कोश निर्माण विधिः-

कोश निर्माण के लिये डॅा. भोलानाथ तिवारी और डॅा. द्वारिका प्रसाद सक्सैना दोनों ने 10 बातों को महत्वपूर्ण माना है।

1- शब्द संग्रह- शब्द संग्रह का आशय भाषा के शब्दों को एकत्रित करके प्रस्तुत करना है। कोशकार का प्रयत्न यह रहता है कि सभी शब्दों का वह संग्रह कर सके किन्तु यह पूर्णतः संभव नहीं है। प्रत्येक भाषा में कई विषयों के शब्द होते हैं जिन्हें एकत्र करने के लिये कोशकार को उस भाषा के विभिन्न विषयों के विद्वानों से भी सहायता लेना हेाता है । शब्द संग्रह काफी श्रम साध्य प्रक्रिया है और इसके लिये काफी शोध और मूल्यांकन की आवश्यकता रहती है। एक ही तरीके से उच्चारित होने वाले शब्द विभिन्न भाषाओं में हो सकते हैं ऐसे में उन्हें अलग करना और सभी अर्थों को बताना भी आवश्यक है कुल मिलाकर कोश निर्माण के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण शब्द संग्रह ही है।

2- वर्तनीः- कोश निर्माण में वर्तनी अर्थात् शब्द को किस प्रकार लिखने से प्रचलित अर्थ प्रकट होता है। वर्तनी में जितनी स्पष्टता होगी] भाषा उतनी ही उपयोगी होगी। देवनागरी लिपि में हर ध्वनि के लिये लिपिचिन्ह की पूर्णता है परंतु अंगे्जी में वर्तनी की समस्या काफी है जिसमें उच्चारण भिन्न हैं किन्तु वर्तनी भिन्न हो जाती है । शब्द कोश में वर्तनी का जो रूप शुद्ध माना है उसका कारण भी बताना चाहिये ताकि उसका शुद्ध रूप ही प्रयुक्त हो। चूंकि कोश प्रमाणित ग्रंथ है। अतः वर्तनी पर विशेष ध्यान होना चाहिये ताकि शब्दों में स्पष्टता बनी रहे।

3- शब्द निर्णय: शब्द निर्णय भी एक आवश्यक प्रक्रिया है । कई बार एक ही तरीके से उच्चरित होने वाले शब्द या सूक्ष्म अंतर रखने वाले शब्द या एक ही भाषा में या भिन्न भाषाओं में प्रयुक्त शब्द होते हैं। ऐसे में किस शब्द को प्राथमिक रखा जाये यह भी आवश्यक है । प्रायः उसी भाषा के शब्द को प्रथम रखा जाता है। यदि एक ही भाषा का शब्द हो तो प्रचलित अर्थ वाले शब्द को ही रखा जाता है।

4- व्युत्पत्ति : – शब्द कोश मे प्रमाणिकता रखने के लिये शब्द की मूल उत्पत्ति] उसका रूप तत्सम] तदभव] देशज या विदेशी को भी बताना चाहिये । हिन्दी की उत्पत्ति संस्कृत से है संस्कृत शब्द धातुओं से बनते हैं जिनमें उपसर्ग प्रत्यय द्वारा कई शब्द बन जाते है । शब्द का प्रयोग करने के लिये व्युत्पत्ति का ज्ञान आवश्यक है।

5- व्याकरण : शब्द कोश में एक ही शब्द शब्दकोश में एक ही शब्द संज्ञा] सर्वनाम] विशेषण आदि के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। कोश में शब्द की प्रकृति के आधार पर स्पष्ट करना होता है कि यह एक सर्वनाम] क्रिया आदि किस में आता है और उसका भिन्न प्रयोग किन परिस्थितियों में होता है, यह भी बताना चाहिये; साथ ही व्याकरण तत्व के लिये भिन्न रूपों का भी वर्णन होना चाहिये ।

6- उच्चारण : कोश में उच्चारण भी स्पष्ट किया जाना चाहिये ताकि उसका व्यवहार उचित रूप में हो । अंग्रेजी में भिन्न अक्षर के भिन्न उच्चारण किये जाते हैं कभी ध्वनि शांत भी रहती है हिन्दी में भी अ ऐ औ ऋ श ज्ञ श्र आदि के संबंध में उच्चारण स्पष्ट किया जाना चाहिये । मिलती जुलती बनावट वाले वर्णों में भी स्पष्टता के लिये उच्चारण करना आवश्यक हैं ।

7- अर्थः- शब्दकोश में शब्द का संचय भिन्न अर्थ को दर्शाने के लिये ही होता है। डॅा. भोलानाथ तिवारी ने वर्णनात्मक कोश में दो प्रकार के अर्थ माने हैं। पर्यायवाची और ऐतिहासिक l डॅा. द्वारिका प्रसाद सक्सैना ने ऐतिहासिक आधार पर शब्द के परिवर्तित रूप के भिन्न अर्थ के आधार पर भी कोश में उसे बताना आवश्यक माना है। प्रत्येक शब्द का अर्थ शब्दकोश में बताना अत्यंत आवश्यक है।

8- प्रयोग : – जहा शब्द के अर्थ में प्रयोग के आधार पर अस्पष्टता हो वहा उस शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुऐ वाक्यों में प्रयोग करके उस शब्द का प्रयोग स्पष्ट करना चाहिये । जहां आवश्यक हो संदर्भों का प्रयोग भी करना चाहिये साथ ही प्रयोग में कालक्रम का संयोजन भी रखना चाहिये ।

9- चित्र : कई शब्दो के लिये उदाहरण देना भी कठिन होता है ऐसे में चित्र के रूप में पहचान करने के लिये चित्र का प्रयोग किया जाना चाहिये । अच्छे शब्दकोश में आवश्यकता रूप से चित्र होना चाहिये ।

10- शब्द क्रमः- शब्दकोश में शब्दों की संख्या काफी अधिक होती है। अतः आवश्यक होने पर उस शब्द को खोजने के लिये शब्दों का संयोजन पद्धति अनुसार होना चाहिये । ताकि शब्द को खोजने वाला अध्येता उसे आसानी से खोज सके ।

डॅा. भीलानाथ तिवारी और द्वारिका प्रसाद सक्सैना ने पाच प्रकार के शब्द क्रम माने है।

1- वर्णानुक्रमः- जिस भाषा में कोश का निर्माण किया जाना है उस भाषा में वर्णमाला के अनुसार ही शब्दों का संचयन किया जाता है । इसमें न सिर्फ प्रथम अक्षर को क्रम से रखा जाता है अपितु शब्द में प्रथम वर्ण के बाद आने वाले शब्दों को भी वर्णमाला के अनुसार रखा जाता है हिंदी में मात्राओं की व्यवस्था है अतः मात्रा के अनुसार भी शब्दों को वर्णक्रम से रखा जाता है। इससे स्वर के साथ ही व्यंजनों को भी सुगमता से खोजा जा सकता है । यह पद्धति काफी सुविधा जनक है और सामान्यतः भाषा के वृहत् कोश में इसी प्रयोग होता है।

2- अक्षर संख्या : इस पद्धति में शब्द में आने वाले वर्ण की संख्या के आधार पर रखा जाता है प्राचीन भारत में इस प्रकार के कोश मिलते हैं। अक्षर संख्या वाली पद्धति में वर्णानुक्रम का प्रयोग किया जाता है। यह पद्धति काफी जटिल है और तकनीकी पद्धति में समस्या भी आती है।

3- विषयक्रमः- कुछ कोशों में विषय के अनुसार शब्दों को रखा जाता है। संस्कृत का अमर कोश इसी श्रेणी का है। इस पद्धति में शब्दों की पुनरावृत्ति हो सकती है क्योंकि कई शब्द विभिन्न विषयों में आ सकते हैं। इस प्रकार के कोश विषय विशेष के लिये उपयुक्त हैं। बृहद्कोश में यह पद्धति त्रुटिपूर्ण है।

4- सुरक्रम : जो भाषाये सुर प्रधान होती है उनके कोशों की रचना इसी प्रकार होती है । इस प्रकार के कोश में एक ही शब्द जो कई प्रकार से बोला जाता है क्रम अनुसार रख दिया जाता है।

5- व्युत्पत्ति के आधार पर-: इस कोश में व्युत्पत्ति के अनुसार शब्दों का क्रम रखा जाता है । अरवी भाषा के कोशों ये यह पद्धति है।

कोश के भेद :

डॅा. द्वारिका प्रसाद सक्सैना ने कोश के चार भेद माने है।

1- व्यक्ति कोश: व्यक्ति कोश में किसी व्यक्ति विशेष के संपूर्ण साहित्य या पुस्तकों में प्रयुक्त शब्दों को रखा जाता है प्रत्येक शब्द का पुस्तक] स्थान] पृष्ठ पर उल्लेख और प्रयुक्त अर्थ रखा जाता है इससे व्यक्ति विशेष के साहित्य और व्यक्तित्व दोनों का ही ज्ञान होता है ।

2- पुस्तक कोशः- इस कोश में किसी पुस्तक में प्रयुक्त सभी शब्दों का संदर्भानुसार उल्लेख किया जाता है।

3- विषयकोशः- इस कोश में किसी विषय के अध्ययन में प्रयुक्त होने वाले सभी शब्दों को संकलित किया जाता है। प्रायः इनमें पारिभाषिक शब्दों का विस्तृत कोश होता है और विषय के अध्ययन में यह काफी महत्वपूर्ण होता है।

4- भाषा कोश: भाषा कोश में संपूर्ण भाषा कोश का संकलन किया जाता है। यह एक भाषा] दो भाषा या अनेक भाषाओं का हो सकता है । प्रायः दूसरी भाषा सीखने सिखाने के लिये द्विभाषा या बहुभाषा कोश ही बनाये जाते है इससे दोनो भाषा का विस्तृत ज्ञान गहन रूप से किया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त सुविधा के लिये विभिन्न प्रकार के कोश भी निर्मित होते हैं या किये जा सकते हैं यथा शब्द परिवार कोश] पर्यायवाची कोश] लोकोक्ति मुहावरा कोश] प्रयोगकोश] लोक भाषा कोश ]पारिभाषिक कोश ] विश्व कोश आदि ।

डॅा. भोलानाथ तिवारी ने भी व्यक्ति कोश, पुस्तक कोश, भाषा कोश, के अतिरिक्त वर्णनात्मक कोश, ऐतिहासिक कोश, तुलनात्मक कोश को भी स्थान दिया है ।

उक्त वर्णन से स्पष्ट होता है कि शब्द कोश का अध्ययन और निर्माण एक कठिन और तकनीकी कार्य है जो काफी श्रमसाध्य एवं महत्वपूर्ण है।

भाषा वि़ज्ञान का महत्व

भाषा विज्ञान के क्षेत्र में हम पूरी तरह शब्द कोश पर ही निर्भर हैं। बिना उसके भाषा का प्रयोग असंभव है। भाषा विज्ञान के अध्ययन के तहत कोश विज्ञान का भी अध्ययन किया जाता है बल्कि देखा जाये तो शब्दकोश का ज्ञान भाषाविज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है।

  1. किसी भाषा का निर्माण] संरचना] परिवर्तन और उसके महत्व आदि का अध्ययन भाषाविज्ञान में किया जाता है किन्तु उस भाषा के विस्तार ] संपूर्ण रचनात्मक प्रयोग का ज्ञान कोश के माध्यम से ही किया जाता है । वस्तुतः आदर्श कोश में भाषाविज्ञान के सभी तत्वों के आधार पर ही उसका निर्माण किया जाता है अर्थात देखा जाये तो कोश के अंतर्गत भाषा विज्ञान के सभी का अध्ययन किया जा सकता है ।
  2. साहित्य में तो सदा ही नवीन शब्द या पर्याय शब्दों का प्रयोग किया जाता है। आवश्यकता के अनुसार शब्द की व्यवस्था तुकान्तता भाव विशेष की अभिव्यक्ति और व्यक्त करने की शैली आदि विभिन्न कारकों के लिये विभिन्न शब्दों की आवश्यकता होती है जो भले ही एक अर्थ प्रस्तुत करते हैं। ऐसे में समृद्ध भाषा में शब्दों का असीम संसार होना आवश्यक है।
  3. कोश विज्ञान का भाषा के साथ साथ संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था में भी अपरिहार्य योगदान है। कोश के माध्यम से कोई भी व्यक्ति अपने अभिव्यक्ति के संसार को विस्तार प्रदान कर सकता है। शिक्षा व्यवस्था] ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों को प्राप्त करना बहुविध कलाओं, शिक्षाओं ओैर विषयों के ज्ञान के लिये उसके शब्दों को जानना आवश्यक है । विभिन्न भाषायें] विभिन्न अनुभव] ज्ञान के साथ ही अपनी पृथक विशेषता भी रखती है ऐसे में भाषाओं की सीमा से परे जाने के लिये विभिन्न भाषाओं को जानना भी जरूरी होता है । विभिन्न प्रकार का ज्ञान संपूर्ण रूप से लेने के लिये सही व स्पष्ट शब्दों का ज्ञान जरूरी है।
  4. प्रायः शब्द का गलत प्रयोग या उच्चारण] अर्थ को पूरी तरह बदल देता है। अतः शब्द के उच्चारण के संबंध में ज्ञान होना अनिवार्य है।
  5. कई बार व्यक्ति को अपनी सुविधा अनुसार शब्दों का निर्माण करना होता है। ऐसे में शब्दों का ज्ञान आवश्यक हो जाता है।
  6. कई बार ऐसी संज्ञाओं] वस्तु का ज्ञान करने के लिये जो देखी नहीं गई हो किन्तु उसका प्रयोग करना हो या सुना हो तब चित्र के माध्यम से अपने ज्ञान को स्पष्ट किया जा सकता है।
  7. किसी भाषा में कई शब्द सुगम होते हैं या अभिव्यक्ति के लिये उपयुक्त होते हैं किंतु प्रयोग न होने के कारण अप्रचलित हो जाते हैं। साथ ही एक ही अर्थ को दर्शाने वाले विभिन्न शब्दों का ज्ञान रखने और कथन विशेष को दर्शाने के लिये विशेषोक्ति के लिये पर्यायवाची और मुहावरा कहावतों का प्रयोग अत्यंत आवश्यक हो जाता है।

उपर्युक्त सभी परिस्थितियों में शब्दकोश की अत्यंत आश्यकता होती है और बिना किसी बृहद् कोश के हम अपने लक्ष्य में सफल नहीं हो सकते अतः शब्दकोश की ज्ञान प्राप्ति ]व्यक्त्वि निर्माण और सभी क्षेत्रों में सफल होने के लिये या सामान्य से हट कर विशेष स्थान पाने के लिये महती आवश्यकता होती है ।

अंततः विस्तृत विवेचन से समझा जा सकता है कि कोश विज्ञान न सिर्फ भाषा विज्ञान में अपितु ज्ञान के समस्त क्षेत्रों में महत्वपूर्ण स्थान और उपादेयता है।

लेखिका

शोध निर्देशकः- डॅा. गीता नायक। शोधार्थीः- श्रीमती अंजू श्रीवास्तव

हिन्दी अध्ययनशाला विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन म-प्र-

C/O LIG/53 शिवानगर शिवपुरी म-प्र- 473551 7566605253

 

गोदान और मैला आँचल

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गोदान और मैला आँचल

शोध आलेख

किसी भी कृति का तुलनात्मक अध्ययन उसके सही और सटीक मूल्यांकन का एक जरूरी पहलू है। यह तुलना किसी कृतिकार के समकालीन परिवेश, युगबोध, परिस्थितियों और कृति की विधागत विशिष्टताओं के संदर्भ में होनी चाहिए। जब हम किसी रचना की आलोचना भी कर रहे होते हैं तो साथ साथ कहीं न कहीं और बहुत हद तक हम उसे अच्छी या बुरी भी साबित कर रहे होते हैं। उस समय निश्चित रूप से उसमें न कहने के बावजूद भी एक तुलनात्मक दृष्टि तो रहती ही है। यहीं तुलना आलोचना कर्म के लिए भी एक विशेष दृष्टि बन जाती है।
तुलनात्मक पद्धति में आलोचना एक विस्तृत साहित्यिक क्षेत्र को अपने में समेट लेती है और साथ ही ज्ञान के अन्य क्षेत्रों और शाखाओं को भी स्वीकार करती चलती है। “मूल्यांकन के बिन्दु पर तुलनात्मक अध्ययन इस बात का भी किया जाता है कि कोई कृति अपनी विधापरक परंपरा में कहाँ पर अवस्थित है। इसमें भी तीन स्थितियाँ हो सकती हैं- कोई कृति केवल परंपरा का अनुवर्तन ही कर रही है,कोई कृति चलती हुई परंपरा में एक प्रस्थान भेद उपस्थित कर रही है या कोई कृति अतीत में प्रत्यावर्तन कर रही है।”1 मेरे विचार से गोदान और मैला आँचल के तुलनात्मक अध्ययन को परंपरा में प्रस्थान भेद या प्रस्थान बिन्दु के अंतर्गत रखा जा सकता है।
गोदान और मैला आँचल की तुलना करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि प्रेमचंद और रेणु के अपने अपने युग संदर्भ रहे। प्रेमचंद के किसान-मजदूर खासकर किसान, साम्राज्यवादी और सामंती दोनों ताकतों से पीड़ित होने की वजह से दोहरे शोषण का शिकार हैं तो वहीं रेणु के किसान-मजदूरों को साम्राज्यवादी शक्तियों का शिकार नहीं होना पड़ता। लेकिन उससे भी भयंकर सामंती ताक़तें उभर कर आती हैं। स्वतन्त्रता से पहले जो जमींदार एक तरह से ब्रिटिश शासन व्यवस्था के निचले पायदान पर था और ब्रिटिशों से प्राप्त अधिकारों के बल पर जनता का शोषण करता था वही जमींदार अब आज़ादी मिलने के बाद सोशल हायरार्की के शीर्ष पर आ गया। वह नयी व्यवस्था का अंग बना और शक्तिशाली होता गया।तभी मैला आँचल में- “जमींदारी प्रथा खतम हुई लेकिन जमींदार जमीन से बेदखल कर रहा है।”2
शोषण करने वाले वही पुराने थे। प्रेमचंद के ही शब्दों में ‘गद्दी पर जॉन की जगह गोविंद आ बैठा था’ लेकिन शोषण के नए हथियारों और नए तरीकों के साथ। गोदान का किसान गुलाम देश के शोषण तंत्र का शिकार था और इस तंत्र से बाहर निकालने के साधन उसके पास नहीं थे। किसान उसे ही अपनी नियति मान बैठा था। होरी अपनी पूरी शक्ति, अपनी पूरे साधन झोंककर संघर्ष करता है लेकिन उस व्यवस्था में पराजित ही होता जाता है तभी तो कहता है- “सब तरफ से किफायत कर के देख लिया भैया, कुछ नहीं होता। हमारा जन्म ही इसलिए हुआ है की अपना रक्त बहाएँ और बड़ों का घर भरें।” होरी का यह कथन पूरे उत्तर भारतीय सामंती परिवेश और उसमें पिसते भारतीय किसानों के घुटन को बयान करता है।
गोदान के टेक्स्ट में प्रत्यक्ष रूप से कोई किसान आंदोलन तो नहीं पर किसान जीवन के हृदयस्पर्शी चित्र के पीछे आंदोलनों का प्रभाव अवश्य है। प्रेमचंद के पास किसानों की दुर्दशा के चित्र मौजूद थे।9 फरवरी 1920 को ‘प्रताप’ में अवध के एक किसान जगदत्त सिंह की चिट्ठी प्रकाशित हुई थी। अपनी चिट्ठी में जगदत्त सिंह ने लिखा था- “अवध की भोली जनता यह पुकार कर कहती है कि काश्तकारान से जमींदार खेत छीन लेते हैं। किसान जब खेती के लिए जमींदार के पास जाते हैं तो जमींदारान किसानों से पूछते हैं कि कितने रुपये नजर दोगे? किसान कहता है कि जो आप फरमावें। इस प्रकार अधिक रुपये लेकर किसी दूसरे किसान पर बेदखली लगकार जमीन छीन कर जमींदार उस किसान को जमीन दे देते हैं और नजर तथा मालगुजारी उससे और अधिक तय कर लेते हैं।…किसान की मृत्यु के बाद जमीन का किसान के लड़के बच्चों से छीन लिया जाना भी अधर्म है। इस प्रकार का अन्याय बाराबंकी, लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली आदि में बहुतायत में दिखलाई पड़ता है”।4 कहने की आवश्यकता नहीं कि जगदत्त सिंह जैसे किसानों की यह आवाज़ प्रेमचंद के गोदान तक सुनाई देती रहती है और सर्वोपरि रहती है।
भूस्वामी वर्ग द्वारा किए जा रहे दमन को मैला आँचल में भी देखा जा सकता है। जहां तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद, रामकिरपाल सिंह, खिलावन यादव जैसे भूस्वामी गाँव और किसान की तकदीर का फैसला करते हैं। तहसीलदार छल से ज़मीनों का संग्रह तो करता ही है, उसे और बढ़ाता भी जाता है। जमींदारी उन्मूलन से अपनी जमीन भी बचा ले जाता है। रेणु ने जमींदारी उन्मूलन आंदोलन और बिहार भूमि सुधार आंदोलन की असफलता, कानून की विसंगतियाँ, सत्ताधीन पार्टी और इनसे उत्पन्न जमींदार-किसान संघर्ष और प्रभावों को दिखाने का प्रयास किया है। “1950 के दशक में ही बटाईदारों के बड़े बड़े संघर्ष हुये। कोशी क्षेत्र के जमींदार दियारा क्षेत्र की विशाल भूमि को हथियाकर उसे पास के दूसरे जिलों से लाये गए पट्टेदारों को लगान पर चढ़ा देते थे। फिर जब वह जमीन उपजाऊ बन जाती तो इन पट्टेदारों को बेदखल कर के उसी भूमि को पहले से अधिक लगान पर दूसरे पट्टेदारों को दे देते थे”।5
प्रेमचंद के समय की स्थितियाँ रेणु के आज़ाद भारत में भी लगभग वही की वही थीं। बिहार टेनेन्सी एक्ट के दफा 40 के तहत आशान्वित होकर बटाईदारों ने कचहरी में अपील की लेकिन उनकी दरख्वास्त खारिज हो गई। “कल गाँव के सभी रैयत आए थे,फैसला सुनकर सभी रोने लगे”।6 उन्हें जमीन नहीं मिली थी। गोदान और मैला आँचल में किसानों की स्थितियों में अंतर सिर्फ इतना है कि गोदान में परतंत्र भारत के किसान हैं तो मैला आँचल में स्वतंत्र भारत के।
गोदान तक आते आते प्रेमचंद पूंजीपति-सामंतों के गठजोड़ को समझ चुके थे। उनके ढोंगी राष्ट्रवादी रूप को पहचान चुके थे। राय साहब के चरित्र के माध्यम से प्रेमचंद तथाकथित राष्ट्रवादियों की पोल खोलते हैं। वहीं मैला आँचल में रेणु नए आर्थिक और सामाजिक सम्बन्धों को उजागर करने के क्रम में ‘संस्कृतिकरण की प्रक्रिया’ की भी झलक देते हैं। आर्थिक स्थितियाँ कैसे पूरे जन जीवन को प्रभावित करती हैं यह दोनों में ही देखा जा सकता है किन्तु यहाँ एक अंतर यह दिखाई देता है कि जहां गोदान में ग्रामीण किसानों की आर्थिक समस्या ही मुख्य रूप से उभरकर सामने आती है वहीं मैला आँचल में रेणु का अंचल अपने पूरे परिवेश के साथ उभर कर सामने आया है। यद्यपि गोदान और मैला आँचल दोनों में ही हम छोटे किसानों को भूमिहीन मजदूर बनने की प्रक्रिया में देखते हैं पर चूंकि रेणु ने आज़ादी के बाद के गाँव का चित्रण किया है इसलिए उनके यहाँ एक सकारात्मक रुख या यूं कहें कि उम्मीद सी दिखाई देती है और वे स्वाधीन भारत में प्रगति,योजना और बदलाव भी देखते हैं। गाँव में मलेरिया सेंटर की स्थापना और डॉक्टर प्रशांत का आगमन उसी परिवर्तन की बयार है।
देश काल की भिन्नता ही रेणु के गांवों को प्रेमचंद के गाँव से अलग करती है। गोदान और मैला आँचल की रचना के बीच का दौर कोई स्थिर दौर था भी नहीं बल्कि भारी राजनीतिक और आर्थिक उथल पुथल से भरा था इसलिए यह अलगाव स्वाभाविक ही है। “रेणु के चित्रित गाँव प्रेमचंद द्वारा चित्रित गाँव से कहीं अलग और कहीं अधिक जटिल हैं।… रेणु का साहित्य वह गुमशुदा कड़ी है जिससे हम प्रेमचंद के गाँवों को आज के गाँवों के साथ मिलाकर समझ सकते हैं”।7 विचारधारा के स्तर पर भी दोनों रचनाकारों की कड़ियाँ कहीं न कहीं जुड़ती दिखाई देती हैं। यह ठीक है कि दोनों के विचारधाराओं के अपने कुछ अंतर्द्वंद्व, कुछ अंतर्विरोध और कुछ सीमाएं भी रही हैं फिर भी दोनों एक स्तर पर पास जरूर आते हैं। प्रेमचंद की विचारधारा क्या थी निर्धारण करना कठिन लगता है। “प्रेमचंद के शुरू के लेखन में तोलस्तोय, गांधी और आर्यसमाज की आदर्शवादी छाप स्पष्ट है लेकिन ज्यों ज्यों अहिंसाधर्मी राष्ट्रीय आंदोलन की कसौटी पर वे जन जीवन के यथार्थ की परख करते गए त्यों त्यों सामंती महाजनी सभ्यता के प्रति उनकी कटुता बढ़ती गई”।8 यही वजह रही कि गोदान तक आते आते ‘हृदय परिवर्तन’ और ‘आश्रम’ से उनका मोहभंग हो जाता है।
रेणु के मैला आँचल में हृदय परिवर्तन होता है और वह भी चामत्कारिक रूप से। उस चमत्कार को देखकर पाठक चौंक सा जाता है। “एक दिन अकस्मात तहसीलदार का हृदय परिवर्तन हो जाता है।हर परिवार को पाँच बीघे जमीन मिल जाएगी….इस हृदय परिवर्तन के लिए किसी सर्वोदयवादी ने प्रयास नहीं किया, स्वयं तहसीलदार ने भी नहीं। पीते काफी थे अचानक एक दिन ज्ञान नेत्र खुल गए”।9 इस ‘ज्ञान नेत्र खुलने’ को लेकर हिन्दी जगत में काफी विवाद रहे हैं। कुछ आलोचक इसे गांधीवादी परिवर्तन मानते रहे हैं तो कुछ तहसीलदार की चालाकी।
जो भी हो दोनों की कोई ना कोई दृष्टि तो है ही। रेणु समाजवादी आंदोलन से जुड़े थे और अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद वह प्रेमचंद के विचारों का ही एक रूप है। रेणु और प्रेमचंद दोनों ने ग्रामीण जीवन को, किसान और मजदूर की इच्छाओं, उनकी आकांक्षाओं और विपन्नताओं को देखा। गोदान में प्रेमचंद जहां एक गंभीर समस्या की ओर इंगित करते हैं वहीं रेणु मैला आँचल में तदयुगीन राजनीतिक परिवेश के कारण शीघ्र निदान बताते हैं। गोदान में प्रेमचंद जहां गांधीवादी आदर्शों से उबरते हैं वहीं मैला आँचल में भी रेणु के मोहभंग को देखा जा सकता है। एक समय के सक्रिय समाजवादी रहे रेणु का सभी राजनीतिक पार्टियों से मोहभंग हो गया लगता है। इसके कारण भी रहे। किसान-मजदूरों (socialist-communist) का संयुक्त मोर्चा तथा किसान आंदोलन का जो उभार 1934-36 में दिखाई देता है, वह 1947-48 में नहीं। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद की असंगत स्थितियाँ, गांधी हत्या, वामपंथी दलों के अंतर्विरोध- ऐसे कई कारण रहे हैं जो रेणु की विचारधारा को आहत करते हैं। आखिर उस समय कौन सी ऐसी पार्टी थी जो शोषितों की पार्टी थी? रेणु मैला आँचल में बावनदास के माध्यम से सोशलिस्टों के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त करते हैं तो साथ साथ गांधीवादी सिद्धांतों को भी बिखरता हुआ दिखाते हैं।
रेणु ने लिखा है- “पानी मैला आँचल के समय अगर मेरी कमर तक था तो मेरी दूसरी किताब के खत्म होने तक सिर के ऊपर से गुजरने लगा। यह कहाँ आकार फंस गया मैं? मैं पसोपेश में था। यह लोकतन्त्र है भी या नहीं, इसमें मुझे संदेह होने लगा।”10 आगे नक्सलबाड़ी से जुड़े लोगों की चर्चा करते हुए कहते हैं- “उन लोगों ने कहा कि यह डेमोक्रेसी-फेमोक्रेसी कुछ नहीं है। उस पर भी मुझे विश्वास होने लगा। वे कहने लगे कि बैलेट के जरिये नहीं बुलेट के जरिये परिवर्तन होगा, वह भी मान लेने का मन करने लगा। लेकिन एक बार मन में हुआ कि नहीं जूता कहाँ काटता है, यह एक बार खुद पहन कर देखना चाहिए।” तभी रेणु 1972 में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ते हैं, चाहे वो हार ही जाते हैं लेकिन जूते का परीक्षण कर लेते हैं। इन सारी बातों के बावजूद यह कहना गलत नहीं होगा कि रेणु सदा समाजवादी विचारों के प्रभाव में रहे।
गोदान के समय गांवों में राजनीतिक दलों का उदय नहीं हुआ था जबकि मैला आँचल में सक्रिय राजनीतिक दलों की गतिविधियां दिखाई पड़ने लगी थीं। इन पार्टियों के संदर्भों के माध्यम से रेणु स्वातंत्रयोत्तर भारत की वास्तविक स्थिति और राजनीतिक भ्रष्टाचार का वर्णन करते हैं। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय दलों एवं शक्तियों के वर्ग-चरित्र व आज़ादी या स्वराज के स्वरूप को रेणु ने बहुत विश्वसनीय ढंग से उकेरा है। दोनों ने ही सोशयो-पोलिटिकल, सोशयो-इकोनोमिकल क्रियाओं प्रतिक्रियाओं का विशद और गंभीर चित्रण किया है। वास्तव में आर्थिक परिस्थितियाँ ही पूरे समाज और राजनीति का निर्माण करती दिखाई देती हैं।
मैला आँचल में समाज में जाति-धर्म और उनके गठजोड़ से चल रही राजनीति का प्रभावी चित्रण है। आर्थिक-राजनीतिक कारणों से धर्म को उपयोग में लाया जाता रहा है। राजनीति में जाति का महत्व और उसके आधार पर हो रही ‘सामाजिक ध्रुवीकरण’ की प्रक्रिया मैला आँचल के आज़ाद भारत से प्रारम्भ हो चुकी थी। जब बलदेव ‘जाति को बड़ी चीज’ मानता है तब जाति का महत्व स्पष्ट दिखाई देता है। मैला आँचल में जातिगत संघर्ष खुल कर सामने आता है। यह जातिगत संघर्ष इस हद तक उभरता है कि वर्ग-संघर्ष का कहीं कोई नामोनिशान नहीं रह जाता और वह महज संथालों का संघर्ष बन कर रह जाता है।
गोदान में किसानों में स्थितियों की समझ तो है लेकिन वर्गीय-चेतना जैसा कुछ भी दिखाई नहीं देता। भोला अपने समाज के रहस्य को समझने का प्रयास कर रहा है- “कौन कहता है,हम तुम आदमी हैं। हममे आदमीयत कहाँ? आदमी वह है जिसके पास धन है अख़्तियार है, इलम है। हम लोग तो बैल हैं और जुटने के लिए पैदा हुए हैं।”11 भोला का यह कथन रोंगटे खड़े कर देने वाला है। शोषण सहते सहते इनकी हिम्मत जवाब दे गई हो जैसे। गोदान के सीलिया-मातादीन प्रसंग को स्त्री-दलित दोनों महत्वपूर्ण प्रश्नों से जोड़कर देखा जा सकता है। प्रेमचंद जब अछूतों की स्थिति दिखाते हैं उस समय अंबेडकर का खयाल आना स्वाभाविक लगता है। मंदिर प्रवेश बिल पर अंबेडकर गांधी जी को पूरी तरह समर्थन नहीं दे रहे थे। उनका मानना था- “पददलित बराबरी और नागरिक अधिकारों के लिए लड़ रहे थे। यदि तुम कहते हो कि आपका धर्म हमारा धर्म है तब आपके अधिकार और हमारे अधिकार बराबर होने चाहिए।क्या यह ऐसा ही है?”12 गोदान में मातादीन के मुंह में हड्डी डालने वाले प्रकरण को इस संदर्भ में व्याख्यायित किया जा सकता है। मैला आँचल में भी अछूतों की समस्या उठाई गई है लेकिन वहाँ गोदान जैसी गंभीरता नहीं।
भाषा और शिल्प के स्तर पर बात करें तो गोदान में किसी स्थानीय या ग्रामीण बोली का प्रयोग तो नहीं लेकिन भाषा की सहजता ही उसकी शक्ति है वहीं मैला आँचल में रेणु पूरी तरह साहित्यिक हिन्दी का भी प्रयोग नहीं करते तो सिर्फ स्थानीय भाषा का भी नहीं। उनकी भाषा जनता की सांस्कृतिक स्मृतियों का नेतृत्व करती लगती हैं। गोदान और मैला आँचल दोनों की अपनी शिल्पगत विशेषताएँ हैं। उनमें अंतर भी हैं। मैला आँचल के गीतों की अपनी विशिष्टता है ये गीत उपन्यास में यथार्थ का एक हिस्सा हैं तो गोदान में गोबर और उसके साथियों द्वारा गयी जाने वाली ‘होली’ और स्वांग सामंती शोषण व्यवस्था का सच बताते हैं।
प्रेमचंद और रेणु के समय की शोषण मूलक व्यवस्था नई शोषण प्रक्रिया के साथ आज भी मौजूद है। बढ़ती महंगाई, कर्ज के बोझ और इसके फलस्वरूप किसानों की आत्महत्या, किसानों के मजदूर बनने की प्रक्रिया और फिर शहरों की ओर पलायन के तथ्यों और आंकड़ों की रौशनी में इस नई और पूंजी आधारित शोषण प्रक्रिया को देखा-समझा जा सकता है। अब भी “किसान कर्ज के बोझ तले ही नहीं दबा है। उसे कई और संकटों से जूझना पड़ रहा है। वह कर्ज के कारण उदासी, विषाद और निराशा का शिकार हो रहा है। वह आत्महत्या कर रहा है”।13 आज पूंजीवादी-सामंती-बाजारवादी शक्तियों ने मिलकर ऐसे हालात पैदा कर दिये हैं- “छोटे उत्पादक, मसलन किसान, दस्तकार, मछुआरे, शिल्पी आदि और छोटे व्यापारी भी शोषण की मार झेलने के लिए छोड़ दिये जाते हैं।…अपनी आजीविका के साधनों से वंचित ये लोग काम की तलाश में शहरों की ओर पलायन करते हैं”।14 साथ ही धर्म, संस्कृति के नाम पर जनता को बेवकूफ बनाकर अब भी कुछ ‘तथाकथित राष्ट्रवादी’ राष्ट्रवाद को फासीवाद के करीब पहुंचाने में जुटे हैं। लेकिन इन बिगड़े हुए हालातों के बीच उम्मीद फिर भी बाकी है। गोदान के अंत में होरी की मृत्यु हो जाती लेकिन गोबर नहीं मरता। “वह नए जमाने की रोशनी देख चुका है। चाहे गाँव में खेती करे या शहर में मजदूरी, वह दूसरों का अन्याय बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं है। होरी के मरने के बाद गोबर मानो पिता के हत्यारों के लिए एक चुनौती की तरह जीवित रहता है।”15 वह संघर्ष करने के लिए,लड़ने के लिए जीवित रहता है क्योंकि ‘लड़ने के बगैर कुछ भी नहीं मिलता’16 इसी नयी चेतना से लैस गोदान का गोबर मानो प्रौढ़ होकर मैला आँचल के कालीचरण में दिखाई देता है।
संदर्भ सूची

  1. तुलनात्मक साहित्य- भारतीय परिप्रेक्ष्य- इन्द्रनाथ चौधुरी, पृ.सं.-10, वाणी प्रकाशन
  2. मैला आँचल- फणीश्वरनाथ रेणु, पृ.सं.-150, राजकमल प्रकाशन
  3. गोदान- प्रेमचंद, पृ.सं.-100, प्रकाशन संस्थान
  4. किसान राष्ट्रीय आंदोलन और प्रेमचंद : 1918-22 (प्रेमाश्रम और अवध के किसान आंदोलन का विशेष अध्ययन)- वीर भारत तलवार, पृ.सं.- 258-59, वाणी प्रकाशन
  5. बिहार के धधकते खेत खलिहानों की दास्तान- पृ.सं.- 23, पीपीएच प्रकाशन
  6. मैला आँचल- फणीश्वरनाथ रेणु, पृ.सं.-250, राजकमल प्रकाशन
  7. रेणु : संस्मरण और श्रद्धांजलि- (सं) रामबचन राय, पृ.सं.- 26,
  8. साहित्य और संस्कृति- मोहन राकेश, पृ.सं.- 44, राधाकृष्ण प्रकाशन
  9. आस्था और सौन्दर्य- रामविलास शर्मा, पृ.सं.- 122, राजकमल प्रकाशन
  10. रेणु रचनावली-5, पृ.सं.- 249, राजकमल प्रकाशन
  11. गोदान- प्रेमचंद, पृ.सं.-10, प्रकाशन संस्थान
  12. डॉ अंबेडकर : लाइफ एंड मिशन- धनंजय कीर, पृ.सं.- 30, पॉपुलर प्रकाशन
  13. जनसत्ता- धर्मेन्द्र पाल सिंह का ‘विदेशी निवेश में कितनी हकीकत’ शीर्षक आलेख, संपादकीय पृष्ठ, 16/10/2015
  14. जनसत्ता- प्रभात पटनायक का ‘नव उदारवाद से उपजी चुनौतियाँ’ शीर्षक आलेख, संपादकीय पृष्ठ, 22/2/2014
  15. प्रेमचंद और उनका युग- रामविलास शर्मा, पृ.सं.- 112, राजकमल प्रकाशन
  16. लहू है कि तब भी गाता है- पाश, पृ.सं.- 111, जनचेतना प्रकाशन

शिप्रा किरण,
मो॰ 8130963690,
ई॰मेल- kiran.shipra@gmail.com
 

हे पिता ! तुम्हारी बहुत याद आती है … (कविता)

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जब जब यह दुनिया ,

पितृ दिवस मनाती है।

जब जब कोई संतान ,

अपने पिता का सानिध्य पाती है ।

वो खुशनसीब है संतान ,

जिनको माता -पिता दोनों की ,

सेवा -सत्कार नसीब होता है।

जब -जब कोई पुत्री /पुत्र

अपना मनचाहा पुरस्कार लेने ,

अपनी ज़िद पूरी करवाने का सौभाग्य पाता है।

जब- जब कोई पिता अपनी संतान को

कंधों पर बैठाकर /उंगली पकड़कर ,

सैर को जाता है।

पितृ दिवस पर अपने पिता को जब कोई तोहफा और

बधाई देता है।

और बदले में अपार स्नेह ,दुलार और आशीष पाता है।

मैं क्या करूँ मुझे हर पल ,हर क्षण तुम्हारी याद आती है।

तुम्हारे स्नेह ,तुम्हारा दुलार और तुम्हारे साथ बिताई ,

जीवन के हर घड़ी की याद आती है।

मैं जानती हूँ ,मुझे एहसास है ,तुम्हारा स्नेह ,दुलार और आशीष ,

अब भी हमारे साथ है ।

तुम न होते  हुए भी आज भी हमारे साथ हो ,

यह भी एहसास है।

मगर फिर भी !! हे पिता ! मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है।

 

 

 

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साभार: डॉ. राजेश पासवान जी 
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D दस्तावेज 101, बेतियाहाता, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश. सं. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी Yes 2348-7763 0551-2335067
D दृश्यान्तर दूरदर्शन महानिदेषालय, कमरा नं.-1026, बी. विंग कोपरनिकस मार्ग, नई दिल्ली-110001. सं. अजित राय Yes
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H हिन्दीटेक Centre for Endangered Languages, Visva-Bharati Santiniketan, Bolpur अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी No 2231-4989 TDIL, MIT GOI 88005459243
H हस्ताक्षर हिन्दू कालेज , नई दिल्ली रचना सिंह
I इंद्रप्रस्थ भारती हिन्दी अकादमी, दिल्ली, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली सरकार, समुदाय भवन, पद्म नगर, किशनगंज, दिल्ली-07. मैत्रेयी पुष्पा Yes
I इतिहास भारतीय इतिहास अनुसंधान परिशद, नयी दिल्ली-110001. सं. इशरत आलम/एस.एम. मिश्रा Yes
I इंडिया एलाइव 4/447, विजयन्त खंड, गामतीनगर, लखनऊ. सं. डॉ. आशीश सिंह Yes
I उत्तर प्रदेश सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार, लखनऊ 47282/88 011-236931118
I इन्डियन स्कॉलर ग्वालियर म.प्र डॉ जीतेन्द्र अरोलिया No 2350-109X No No No Quarterly 9926223649 researchscholar2013@gmail.com
I जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका जनकृति संस्था, मा.गां.अं.हि.वि. वर्धा, महाराष्ट्र कुमार गौरव मिश्रा NO 2454-2725 NO CITEFACTOR, IFSIJ, DRJI, MONTHLY 8805408656
I इतिहास बोध लाल बहादुर वर्मा -बी-२३९,चंद्र शेखर आजाद नागर,तेलियर गंज,इलाहबाद -211004 लाल बहादुर वर्मा yes
I इस्पात भाषा भारती स्टील अथोरिटी ऑफ़ इंडिया , नई दिल्ली बी आर सैनी
I इंडियन जर्नल ऑफ़ सोशल कंसर्न्स डॉ. राजनारायण शुक्ला,एस.एच,ऐ-5,कवि नगर,गाज़ियाबाद डॉ. राजनारायण शुक्ला yes ISSN-2231-5837 Yes 9910777969 harisharanverma1@gmail.com
J जर्नल ऑफ़ सोशियो एकोनिमिक रिभ्यु ma. kanshi ram sodh peeth, CCS University Meerut U.P. Dr. Dinesh kumar yes, Half Yearly journal 2321-8479 yes
J झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा तेलंगा खड़िया भाशा एवं संस्कृति केन्द्र द्वारा प्यारा केरकेट्टा फाउण्डेशन, चेषायर होम रोड, बरियातु, रांची-834009. सं. वंदना टेटे Yes
J जनपथ सेण्ट्रल को-ऑपरेटिव बैंक, मंगल पाण्डेय पथ, आरा (बिहार)–802301 सं. अनन्त सिंह Yes 2277-6583 Yes 9431847568 janpathpatrika@gmail.com
j जन मीडिया – जन मीडिया -संपादक -अनिल चमड़िआ -सी -२,पीपल वाला मोहल्ला,बादली एक्सटेंशन,दिल्ली -४२. अनिल चमड़िआ yes 2277-2847 janmedia.editor@gmail.com
J जन मीडिया सी -२,पीपल वाला मोहल्ला,बादली एक्सटेंशन,दिल्ली -४२. अनिल चमड़िआ
J जर्नल ऑफ़ ह्युमिनीटीज एंड कल्चर Anil Kumar, Varanasi Yes No 2393-8285 Yes Multi-Subject and Multi-Disciplinary
J जन मीडिया सी-2, पीपलवाला मोहल्ला, बादली एक्सटेंशन दिल्ली-110042 सं. अनिल चमड़िया Yes 2277-2847 Multi-Subject and Multi-Disciplinary
J ज्योतिर्मय Madhumay Educational And Research Foundation,Anand Vihar Colony, House no.- 40, in front of Dr. RMLA universit:y, Faizabad- 224001 (Uttar Pradesh) Editor-in-chief- Dr. Neeraj Tiwari,yes No 2454-6070 yes indexd by- ISI, IIJIF, ISRA, I2OR, SJIF Impact factor – 1.901 (IIJIF) Multi-Subject and Multi-Disciplinary, bilingual, biannual 9305746945 jrjoe24546070@gmail.com
K कथा ए.डी.-2, एकाकी कुंज, 24 म्योर रोड इलाहाबाद-01 सं. मार्कण्डेय Yes
K कथादेश सहयात्रा प्रकाशन प्रा.लि., सी-52/जेड-3 दिलशाद गार्डन, दिल्ली-1100095. सं. हरिनारायण Yes 1143522783 kathadeshnew@gmail.com
K कथाक्रम 3, ट्रांजिस्ट हॉस्टल, वायरलैस चौराहे के पास, महानगर, लखनऊ-226006 सं. शैलेन्द्र सागर Yes
K कृति संस्कृति संधान बी-2/51, रोहिणी सेक्टर-16, दिल्ली, 110085. सं. सुभाष गाताडे Yes
K कथन 107 साक्षर अपार्टमेंट्स ए-3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली-110063. सं. रमेश उपाध्याय, संज्ञा उपाध्याय Yes
K कृति ओर सी-133, वैशाली नगर, जयपुर-302021, राजस्थान. सं. विजेन्द्र Yes
K कदम 12/224, एस.सी.डी. फ्लैट, सेक्टर-20, रोहिणी, नई दिल्ली-110086. स. कैलाश चंद चौहान Yes
K कृतिका उड़यी, जालौन, उत्तर प्रदेश . सं. डॉ.वीरेंद्र सिंह यादव Yes
K कल के लिए जयनारायण, बहराइच. Yes
K कोलाज कला चर्च रोड, जिंसी जहांगीराबाद, भोपाल-462008 (म. प्र.). Yes
K कौटिल्य शासकीय, टी.आर.एस. महाविद्यालय, रीवा, मध्य प्रदेश . Yes
K जनपथ मासिक, सं. अनंत कुमार सिंह, द्वारा सेंट्रल कॉपरेटिव बैंक, मंगल पांडे पथ, आरा, जिला भोजपुर, बिहार 802301. Yes
K कला पूर्णिया , बिहार कलाधर
K कादम्बिनी हिंदुस्तान टाईम्स ग्रुप , नई दिल्ली
K क्रियटिव्ह स्पेस एकलव्य प्रकाशन, 40, रामनगर, टिम्बवाडी बायपास, मधुरम, जुनागढ़ (गुजरात) सं. डॉ.हरेश परमार Yes 2347-1689 Yes 0.678 9408110030 creativespaceip@gmail.com
L लमही 3/343, विवेक खण्ड, गोमती नगर, लखनऊ (226010). सं. विजयराय Yes 2278554X Lemahi Yes 9454501011 vijairai.lamahi@gmail.com
L लोकचेतना विमर्श ई-1, किशोर एन्क्लेव, पटेल नगर, हरमु, राँची, झारखण्ड-834002 रविरंजन Yes (Biannually) 2277-5013 YES NO YES 9470311115 lokchetna.ranchi@gmail.com
L लोकबिंब ई-पत्रिका D-124, GALI NO-6, LAXMI NAGAR, NEW DELHI-110092 गोविन्द यादव Yes Yes प्रवेशांक लोककला एवं लोक साहित्य केन्द्रित त्रैमासिक 9910773493 lokbimbpatrika@gmail.com
M माध्यम हिंदी साहित्य सम्मेलन, सम्मेलन मार्ग, इलाहाबाद-211001. Yes
M मित्र महाराजा हाथा, कटिरा, आरा, बिहार राश्ट्रभाशा परिशद, पटना (बिहार). मिथिलेश्वर Yes
M मूक आवाज पांडिचेरी Yes
M मीडिया विमर्श 428, रोहित नगर, फेज प्रथम, भोपाल. सं. डॉ.श्रीकांतसिंह Yes
M मूल प्रश्न 3 न्यू अहिंसापुरी, ज्यांति स्कूल के पास फतेहपुरा, उदयपुर-313001 राजस्थान. Yes
M मुक्तांचल कोलकाता 2350-1065 9831497320 muktanchalquaterly214@gmail.com
M मोर्चा 9990448490 morchahindi@gmail.com
M मूक आवाज़ हिंदी विभाग, पांडिचेरी विश्वविद्यालय प्रमोद मीणा No 2320-835X Yes Quarterly 7320920958 mookaawazhindi@gmail.com
M मध्य भारती डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर अम्बिकादत्त शर्मा
M माध्यम हिन्दी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद
M मुक्तिबोध साहित्य कुटीर, टिकरीपारा, जिला-राजनांदगाव (छ.ग.) सं. मांघीलाल यादव Yes 07743- 296853 raju.kashyap48@yahoo.com
N नटरंग वी-31, स्वास्थ्य विहार, विकास मार्ग, दिल्ली-1100092. सं. अशोक वाजपेयी, रश्मि वाजपेयी. Yes
N नया पथ जनवादी लेखक संघ, 8 विट्ठल भाई पटेल हाउस, नई दिल्ली-110003. सं. चंचल चौहान Yes 9818859545
N नया ज्ञानोदय भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीटयूटशनल एरिया, लोदी रोड, पो.वो. नं. 3113, नई दिल्ली-110003. लीलाधर मंडलोई Yes 2278-2184 9818291188 nayagyanoday@gmail.com
N नया मानदंड शोध संस्थान, दुर्गाकुंड वाराणसी. कुसुम चतुर्वेदी Yes
N नागफनी दून व्यू कॉलेज, स्प्रिंग रोड, मसूरी-248179 (उत्तराखण्ड). सं. सपना सोनकर Yes
N नारी उत्कर्ष राजीव कुमार, सी-165,पाण्डव नगर,दिल्ली-92 9599444761 nariutkarsh@gmail
N निरुप्रह लखनऊ, उत्तर प्रदेश अरविन्द कुमार Yes 2394-2223 NO Quarterly 9721200282 drdivyanshu.kumar6@gmail.com
N नवनीत भारतीय विद्याभवन, क.मा.मुंशी मार्ग, मुम्बई-400007
N निरंजना ए-2, त्रिभुवन शांति एन्क्लेव, रोड नं. 1, राजेन्द्र नगर, पटना-800016
N नई धारा सूर्यपुरा हाउस, बोरिंग रोड, पटना-800001 शिवनारायण
N नागरी पत्रिका नागरी प्रचारिणी सभा , वाराणसी पद्माकर पाण्डेय
p प्रगतिशील वसुधा मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ, भोपाल राजेन्द्र शर्मा yes 2231-0460 0755-2761253 vasudha.hindi@gmail.com
P पक्षधर बी-2, तीसरा फ्लोर, महेन्द्र एन्क्लेव, स्टेडियम रोड, नई दिल्ली-33. सं. विनोद तिवारी Yes 2231-1173
P पहल पहल, जबलपुर, 101, रामनगर, आधारताल, जबलपुर (मं.प्र.)-482 004 सं. ज्ञानरंजन Yes Yes 9893017853 editorpahal@gmail.com
P प्रतिमान विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सी एस डी एस), 29, राजपुर रोड, दिल्ली-110054. सं. अभय कुमार दुबे Yes
P प्रगतिशील वसुधा निराला नगर, दुष्यंत मार्ग, भदभदा मार्ग भोपाल. सं. राजेन्द्र शर्मा Yes
P पल-प्रतिपल आधार प्रकाशन, एससीएफ 207, सेक्टर-10, पंचकूला-134133, हरियाणा. सं. देश निर्मोही Yes
P पाती टैगोर नगर, सिविल नगर, सिविल लाइन्स, बलिया-277001 (उ. प्र.). सं. अशोक द्विवेदी Yes
P परिचय 909,काशीपुरम कालोनी,सीरगोवर्धन,डाफी, वाराणसी-221011 सं. श्रीप्रकाश शुक्ल Yes 2229-6212 9415890513 parichay909@gmail.com
P पुस्तक वार्ता महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा. सं. गिरीश्र्वर मिश्र, विमल झा Yes 2349-1809 Yes 9910186568 pustakvimal@gmail.com
P परिकथा 96, बेसमेंट, फेज-3, इरोज गार्डन, सूरजकुंड, रोड, नई दिल्ली-110044. सं. शंकर Yes 2320-1274 Yes 8826011824 parikatha.hindi@gmail.com
P प्रस्थान ए-317 सूरजपुर कॉलोनी, गोरखपुर (उ.प्र.) सं. दीपक प्रकाश त्यागी Yes 2229-3876 Yes 9415824589 dpt_ddu@yahoo.com
P पारसमाला 3 / 16, कबीर नगर दुर्गाकुंड वाराणसी-221005 सं. : हरिहर प्रसाद चतुर्वेदी Yes 9415269874 parasmalavns@gmail.com
P पाखी इंडिपेंडेंट मीडिया इनिशिऐटिव सोसायटी बी-107, सेक्टर-63, नोएडा-201301, उ.प्र. प्रेम भारद्वाज Yes 2393-8129 0120-4060300 pakhi@pakhi.in
P प्रगतिशील इरावती गाँव बल्ह, डाकघर-मौंहीं, तहसील व ज़िला-हमीरपुर-177030 (हिमाचल प्रदेश). प्रगतिशील इरावती Yes
P पूर्वापर लाहिड़ीपुरम, सिविल लाइंस, गोण्डा-271001 (उ. प्र.). सं. सूर्यपाल सिंह Yes
P पंचशील शोध समीक्षा फिल्म कॉलोनी, चौड़ा रास्ता, जयपुर, राजस्थान हेतु भारद्वाज Yes 0975-2587 Quarterly 0141-2315072,2314172 info@panchsheelprakashan.com
P परिषद् पत्रिका बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, प्रेमचंद मार्ग, पटना, बिहार सत्येन्द्र कुमार Yes 2320-5342 Yes Quarterly
P प्रज्ञा और हिमालयीय संस्कृति सेण्ट्रल इन्स्टीट्यूट ऑफ़ हिमालयन कल्चर स्टडीज़, दाहुंग (अरुणाचल प्रदेश) 2347-8535
P प्रगति‍वार्ता प्रगति‍भवन, साहि‍बगंज, झारखण्‍ड 816109 डॉ. रामजन्‍म मि‍श्र ISSN 2229-5062 9431551682 pragativarta@yahoo.co.in
P परिशोध PANJAB UNIVERSITY PRESS, CHANDIGARH AND DEPARTMENT OF HINDI, PANJAB UNIVERSITY CHANDIGARH DR. ASHOK KUMAR, DR. GURMEET SINGH YES (ANNUALLY) ISSN 2347-6648 YES No No 0172-2534616 hindidep@pu.ac.in
परिन्दे 79 ए, दिलशाद गार्डन, दिल्ली- 95 राघव चेतन राय Yes Bimonthly
p परमिता N1/61-R-1 शाशिनगर कॉलोनी नगवां लंका , वाराणसी-5 डॉ. अवधेश दीक्षित yes 0974-6129 9161122848 parmita.com@gmail.com
p प्रत्यय 134 गालिबपुर मऊनाथ भंजन, उ.प्र. 275101 डॉ. शर्वेश पाण्डेय yes 0975-7821 9415219227 spdck.mau@gmail.com
प्रगतिशील वसुधा मायाराम सुरजन स्मृति भवन शास्त्री नागर, पी एंड ती चौराहा
भोपाल- 462003 सम्पर्क-09425392954
स्वयं प्रकाश yes Trimonthly
p पर्सपेक्टिव ऑफ़ सोशल साइंस एंड ह्युमिनीटीज herambh welfare society Narottam pur,BHU, tikari Road Varanasi-5 Dr. Hemant Kumar Singh yes yes 2322–0325 yes mail@pssh.in
P पाण्डुलिपि विमर्श प्रमोद वर्मा संस्थान, रायपुर विश्वरंजन
P परिशीलन सुरुचि कला समिति, वाराणसी अंजनी कुमार मिश्र yes 0974-7222 yes Quarterly 9450016201 suruchikalas@yahoo.in
भाषा केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, नई दिल्ली
R नटरंग राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली. प्रयाग शुक्ल Yes
नया पथ 42 अशोक रोड नयी दिल्ली-110001 मुरली मनोहर प्रसाद सिंह
युद्धरत आम आदमी 1516,1st Floor,Wazirnagar,Kotla Mubarakpur
New delhi-110003
Ramnika Gupta
R रंगकर्म आठले हाउस, सिविल लाइंस दरोगा, पारा, रायगढ़ (छत्तीसगढ़) सं. उषा आठले, युवराज सिंह Yes
R रचना कर्म आनंद, गुजरात. सं. डॉ.माया प्रसाद पाण्डेय Yes
R रसप्रसंग राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली 011-23389138 rangprasang@gmail.com
R रिसर्च एनालिसिस एंड इवैल्यूएशन ए-215,मोती नगर ,गली नंबर -7,क्वीन्स रोड ,जयपुर ,राजस्थान-302021 सं. डॉ कृष्ण बीर सिंह Yes 0975-3486 Yes
R रिसर्च स्ट्रेटेजी 196, GANGA NAGAR, HOUSING SOCIETY, (Patrakar Puram), Kanpur Dr. R.K. CHAURASIA yes 2250-3927 yes Yes Only Geographical and Environmental Research Paper Accepted Annual Journal, 9450274378 Chaurasiark890@gmail,com
R रिसर्च स्कॉलर Gwalior (M.P.) Dr. Jitendra Arolia No 2320-6101 Yes ROAD COSMOS No No Quarterly 9926223649 jitendraarolia@gmail.com
R रिदम C-97, Rama Park, Utta Nagar, New delhi 110059 बलराज सिंहमार No 2455-9113 Yes Quarterly 9408110030 ridamindia@gmail.com
R रेतपथ रेत पथ, कोथल कलां, महेंद्रगढ़-123028 (हरियाणा) अमित मनोज yes 2347-6702 Half Yearly 9992885959 retpath2013@gmail.com
R रिसर्च डिस्कोर्स South Asia Research And Development Institute,B. 28/70,Behind Manas Mandir,Durgakund,Varanasi(U.P.)221005,India Dr.Anish kumar verma Yes No 2277-2014 yes Multi-Subject and Multi-Disciplinary, bilingual, quarterly, 9453025847 researchdiscourse2012@gmail.com
R रिसर्च लाइन डॉ.उपेन्द्र विश्वास,208,पत्रकार कॉलोनी,विनय नगर सेक्टर ३,ग्वालियर,M.P डॉ.उपेन्द्र विश्वास Yes ISSN-2321-2993 Yes 94065-80200,089826-42665 researchlinejournal@gmail.com/upendra.viswas@gmail.com
वागर्थ भारतीय भाषा परिषद् 36-ए ,शेक्सपीयर सरणी,कोलकाता-17 प्रो. शंभुनाथ yes yes
S स्त्रीकाल थोरात कॉम्प्लेक्स, सेवाग्राम रोड, वर्धा, महाराष्ट्र-442001 सं. संजीव चंदन Yes
S समकालीन भारतीय साहित्य साहित्य अकादमी, रवीन्द्र भवन, 35ए फिरोजशाह रोड, दिल्ली. रणजीत साहा Yes 0970-8367
S समकालीन सृजन 20 बालमुकुंद मक्कर रोड, कोलकाता-700007 सं. डॉ.शंभुनाथ Yes
S संवेद बी-3/44, तीसरा तल, सेक्टर-16, रोहिणी, दिल्ली-110089. सं. किशन कालजयी Yes
S संवाद खरगपुर, झंझौर, वाराणसी, उत्तर प्रदेश सं. अमित कुमार पाण्डेय Yes 2231-4156 Half yearly 7376563499 samvaad.bhu@gmail.com
साहित्य वर्तिका वाराणसी सं. अमित कुमार पाण्डेय Yes
S सृजन संवाद ई-64, ए साउथ सिटी, गोमती नगर, लखनऊ. सं. ब्रजेश Yes
S शब्दयोग 280, डोभाल वाला, देहरादून (उत्तराखंड). रमण सिन्हा Yes
S शोध-धारा शैक्षिक एवं अनुसंधान संस्थान उरई, जालौन (उ.प्र.). . डॉ.राजेश चंद्र पाण्डेय Yes
S शोध-संचयन 409, शांतिवन अपार्टमेंट, 2 ए/244ए, आजाद नगर, कानपुर (उ.प्र.). डॉ. योगेन्द्रप्रताप सिंह Yes
S संचेतना एच.108, शिवाजी पार्क, पंजाबी बाग, नई दिल्ली. सं. महीप सिंह Yes
S समकालीन सृजन कोलकाता. डॉ.शंभुनाथ Yes
S साक्षात्कार मध्यप्रदेश पत्रिका, बाणगंगा चौक, भोपाल-3. सं. हरि भटनागर Yes
S साहित्य भारती उ.प्र. हिंदी संस्थान, 6-महात्मा गाँधी मार्ग, हजरतगंज, लखनऊ-226001. Yes
S साखी एच – 1/2 नरिया, बी.एच.यू. वाराणसी. सं. केदारनाथ सिंह/सदानंद साही Yes 2231-5187
S संबोधन रवीन्द्र भवन, 35, फिरेाजषाह रोड, नई दिल्ली, 110001. सं. कमर मेवाड़ी, चांदपोल, और प्रभाकर श्रेणिक Yes
S सेतु आश्रय, खलीनी शिमला-171002 (हि. प्र.). सं. डॉ.देवेन्द्र गुप्ता Yes
S समयांतर 79 ए, दिलशाद गार्डन, दिल्ली-95. सं. पंकज बिष्ट Yes 2249-0469 9868302298 samayantar.monthly@gmail.com
S समन्वय पूर्वोत्तर केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, ओल्ड डी.आई.ऐ.ऐ बिल्डिंग, दीमापुर, नागालैण्ड. Yes
S समालोचन Yes
S सृजन सन्दर्भ बी-2/304 लार्ड शिवा पैराडाइज, कल्याण ( पश्चिम ठाणे )ठाणे सं. सतीश पाण्डेय, संजीव दुबे Yes 0976-7290 Yes 8140241172 dubesanjeev@gmail.com
S समुच्चय अंग्रेजी एवं विदेषी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद. Yes
S संवेद (वाराणसी) 64-डी, गणेश धाम कालोनी, सुंदरपुर, वाराणसी (उ.प्र.). कमला प्रसाद मिश्र Yes
S शुक्रवार के-25, सेक्टर-18, अट्टा मार्केट, नोएडा, गौतमबुद्धनगर (उत्तर प्रदेश )-201301. सं. विष्णु नागर Yes
S शोध संविद राजनीति विज्ञान विभाग, मगध महिला कॉलेज, पटना- ८००००१ सं. डॉ. तेलानी मीना होरो / डॉ. रूपम Yes 2393-980X Yes N.A N.A Hindi / Eng. Half Yearly 9955950162 shodh.samvid@gmail.com
S शोध समीक्षा और मूल्यांकन ए-215, मोतीनगर, स्ट्रीट नं. 7, क्वीन्स रोड, जयपुर, राजस्थान-302021. सं. डॉ.कृष्णवीर सिंह Yes
S समय सरोकार नई दिल्ली सं. प्रेमचंद पातंजलि Yes
S समकालीन तीसरी दुनिया क्यू,-63, सेक्टर-12, नोएडा (गौतमबुद्ध नगर) पिन. 2013101 सं. आनन्द स्वरूप वर्मा Yes
S सम्यक भारत सी1/98, रोहिणी सेक्टर-5, नई दिल्ली-85. सं. के.पी. मौर्य Yes
S संघर्ष/स्ट्रगल # 191, सेक्टर-19 B, DDA मल्टी स्टोरी फ्लैट्स, संस्कृति अपार्टमेन्टस, द्वारका,नई दिल्ली-110075 सं. डॉ. प्रमोद कुमार Yes Yes 2278-3059/2278-3067 2278-3059/2278-3067 Yes 0.793 Multi-Subject and Multi-Disciplinary 9408110030/9868012202 editorsangharsh@gmail.com/hareshgujarati@gmail.com
S समकालीन अभिव्यक्ति फ्लैट नं. 05, तृतीय तल, 984, वार्ड नं. 7, महरौली, नई दिल्ली-30. सं. उपेन्द्र कुमार मिश्र Yes
S समय माजरा राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिन्दी, भवन, आगरा, रोड जयपुर, 302003. Yes
S संकल्य हिंदी अकादमी, हैदराबाद Yes
S संचारिका महाराष्ट्र हिंदी प्रचार सभा, एम.के. अग्रवाल, हिंदी भवन, शहागंज, औरंगाबाद (महाराष्ट्र)-431001 संपा. नारायण वाकळे/ डॉ. भारती गोरे Yes 0976-3775 240-2362350 / 9422347678 maharashtrahindi2gmail.com/drbharatigore@gmail.com
S समकालीन जनमत 171, कर्नलगंज (स्वराज भवन के सामने) इलाहाबाद (211002). सं. सुधीर सुमन Yes
S समसामयिक सृजन लॉक, मकान नं. 189, विकासपुरी, नई दिल्ली-110018. सं. महेन्द्र प्रजापति Yes
S सामयिक सरस्वती सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाडा, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-110002 सं. महेश भरद्वाज/शरद सिंह Yes 2454-2911 011-23282733 samayikprakashan@gmail.com
S शेष साइकिल मार्केट के पास, लोहारपुर, जोधपुर-342002, राजस्थान. सं. हसन जमाल, पन्ना निवास Yes
S शोध संचार बुलेटिन 448/119/76, कल्याणपुरी, ठाकुरगंज चैक, लखनऊ-226003 (यू.पी.). प्रधान सं. विनय कुमार शर्मा Yes
S साखी 2231-5187 7376647097 saakhee2000@gmail.com
S सदानीरा 2321-1474 7552424126 agneya@hotmail.com
S सत्राची डॉ. रूपम / आनन्‍द बिहारी, केशव कुंज, कदमकुआँ, पटना – ८००००३ सं. डॉ. रूपम / डॉ. आनन्‍द बिहारी Yes 2348-8425 Yes N.A No Hindi / Eng. Quaterly 9470738162 satraachee@gmail.com
S समास 011-46526269
S शीतलवाणी 9412131404 sheetalvani.com
S सार संसार 2320-3277 literature@saarsansar.com
S साहित्य कुंज Sahitya Kunj,3421 FENWICK CRESCENT, MISSISSAUGA, ON, L5L N 7 CANADA सुमन कुमार घई NO 22 92 -97 54 YES garbhanal@ymail.com
S साहित्य यात्रा ई – 112 , श्रीकृष्णपुरी , पटना – 800001 ( बिहार ) डा . कलानाथ मिश्र yes 2349 – 19 06 no
S शोध हस्तक्षेप सोसाइटी फॉर एजुकेशनल एम्पावरमेंट,वाराणसी, उ.प्र. डॉ सत्यपाल शर्मा yes 2231- 4644 yes बहुभाषी और बहुविषयक अर्धवार्षिक शोध जर्नल 9936180064 hastakshep.irj@gmail.com
S 1990, सिग्निफ़ायर ऑफ चेंज 4था क्रास, न्यू बसारगढ़ कॉलोनी, हटिया, रांची, झारखंड सं.धीरज कुमार मिश्रा / उप संपादक प्रकाश चन्द्र yes 2321-4465 in plan for upgarde Multi disciplinery 00821029750139/+917042616767 1990sfc@gmail.com
S शिखर सामयिक शिमला, हिमाचल प्रदेश इंद्र सिंह ठाकुर Yes 2249 – 9199 Yes Half yearly 9418464899 shikharjournals@gmail.com
s शोध सामयिक अलवर, राजस्थान डॉ.अनुपमा यादव, मनीष कुमार यादव yes 2321-6727
S समीक्षा एच-2, यमुना, इग्‍नू, नई दि‍ल्‍ली 110068 प्रो. सत्‍यकाम ISSN 2349-9354 Yes 989682626 satyakamji@gmail.com
S साखी एच-1/2,वीडीए फ्लैट्स,नरिया (बी.एच.यू),वाराणसी,उत्तर प्रदेश-221005 प्रो. सदानन्‍द साही ISSN 2231-5187 9450091420 sadanandshahi@gmail.com
S शोध दिशा हिंदी साहित्य निकेतन,16 कला विहार, बिजनौर(उ.प्र.) गिरिराजशरण अग्रवाल त्रैमासिक 0975-735X yes 01342-263232 shodhdisha@gmail. com
s संधान संधान -लाल बहादुर वर्मा,सुभाष गाताडे -बी-२/५१,सेक्-१६ ,रोहिणी दिल्ली , लाल बहादुर वर्मा,सुभाष गालाल बहादुताडे yes
S सौराष्ट्रीय Saurashtra University, Rajkot R. N. Kathad, Rajkot Yes NO 2249-4383 Yes Multi-Subject and Multi-Disciplinary 9687692951 surashtriya@yahoo.com
S साहित्य सेतु Dr. Naresh Shukl, Ahmedabad No Yes 2249-2372 Yes Multi-Subject and Multi-Disciplinary
S समाज दर्शी 1245 BANK COLONY CHAMARI ROAD HAPUR UP 245101 SAMPDAK DR. BABLU SINGH/DR. AJAY KUMAR YES 2395-0374 9412619392 samajdarshishodhpatrika@gmail.com
s श्री प्रभु प्रतिभा प्रतिभा प्रकाशन, त्रिवेणी सेवा समिति, इलाहाबाद प्रबुद्ध मिश्रा yes 0974-522x 9415646402 shriprabhu@gmail.com
S सामयिक मीमांसा नई दिल्ली विजय मिश्र
S संवदिया अररिया , बिहार
S शोध समवाय स्वपन पब्लिकेशन , नई दिल्ली महेश्वर yes 0976-2010 Quarterly 9968012866 shodhsamavay@gmail.com
S शोध History & History Writing Association,U.P. , Varanasi शैलेन्द्र कुमार yes 9701745 Quarterly 9415256496 shodhjournal@sify.com
S शोध मीमांसा Kusum jankalyan samiti,Deoria,U.P. Dr.Rakesh Kumar Maurya yes no 2348-4624 yes quarterly, bilingual 9415842611 shodhmimansa@gmail.com
S संघर्ष 34/15, प्रथम तल, ईस्ट पटेल नगर, नई दिल्ली-8.
T तद्भव 18-201, इंदिरा नगर, लखनऊ-226016. सं. अखिलेश Yes 0522-2345301 akhilesh_tadbhav@yahoo.com
T तनाव 57- मंगलवारा, पिपरिया-461775. Yes
T तीसरा पक्ष सं. देवेश चैधरी देव मासिक, 3734/23 ए त्रिमूर्तिकार, दमाहेनावा, जवलपुर-482002, म.प्र.. Yes
T ट्रांसफ्रेम प्रवीण सिंह चौहान, 55A/103 एकता नगर कांदीवली वेस्ट मुंबई-400067 मेघा आचार्य, प्रवीण सिंह चौहान no Yes 2455-0310 yes yes DJRI under evaluation JIF BIMONTHLY 9763706428 contact@transframe.in/ transframemagazine@gmail.com
T द दिल्ली जर्नल ऑफ़ ह्युमिनितिज एंड सोशल साइंस Sangharsh, New Delhi Devendra Tanwar Yes No Yes Multi-Subject and Multi-Disciplinary 97167 54057
U उद्भावना (मासिक) ए-21, झिलमिल इंडस्ट्रियल एरिया जी. टी. रोड, शाहदरा, दिल्ली-110095 सं. अजेय कुमार Yes uphin369876 9415554128 editor.udbhav@gmail.com
U उत्तर प्रदेश सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, पार्क रोड, लखनऊ सं. कुमकुम शर्मा Yes 9453703921 upmasik@gmail.com/sharmak229@gmail.com
U उम्मीद ए-2/604, समरपाम सोसायटी, सेक्टर-86, फरीदाबाद सं. जितेन्द्र श्रीवास्तव Yes 2347-5803 Yes 9818913798 ummeed13@gmail.com/jitendra82003@gmail.com
U उत्‍तरवार्ता 204, डीए9, एनके हाउस, मेन विकास मार्ग, शकरपुर, लक्ष्मीनगर, दिल्ली-110092 अमलेश प्रसाद ISSN 2455-3859 9716314047, 9031943641 uttarvarta@gmail.com/amalesh.article@gmail.com
V वाक् वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली, 110002. सं. सुधीश पचैरी Yes 2320-818k 11232273167 vaniparkashan@gmail.com
V वागर्थ भारतीय भाषा परिषद, 26ए , शेक्सपियर सारणी, कोलकाता-700017. विजय बहादुर सिंह Yes 2394-1723 3322900977 vagarth.hindi@gmail.com
V वचन सं. प्रकाश त्रिपाठी, 52 तुलाराम बाग, इलाहाबाद. सं. प्रकाश त्रिपाठी, Yes
V वर्तमान साहित्य 28 एमआईजी, अवंतिका-1, रामघाट रोड, अलीगढ़ 202001. नमिता सिंह Yes 40342/83 9643890121 vartmansahitya.patrika@gmail.com
V विन्ध्य भारती हिन्दी विभाग, ए.पी.एस. विश्वविद्यालय , रीवा, मध्य प्रदेश . Yes
V परिप्रेक्ष्य न्यूपा, अरविन्द मार्ग, दिल्ली सुभाष शर्मा Yes
V वाद संवाद 103, मनोकामना भवन, गली न-2, कैलाशपुरी] पालम, नई दिल्ली-110045 प्रधान संपादक राम रतन प्रसाद Yes 2348 – 8662 Yes 9871423939 vaadsamvaad@gmail.com
v विमल विमर्श मीरजापुर, उत्तर प्रदेश विनय कुमार शुक्ल yes 2348-5884
v वाक् सुधा रुपेश कुमार चौहान दलवीरसिंह चौहान yes yes Quarterly 8287473549 vaaksudha@gmail.com
V वरिमा लखनऊ नलिन रंजन सिंह
W वाग्प्रवाह लखनऊ, उत्तर प्रदेश डॉ. अनिल कुमार विश्वकर्मा Yes 0975-5403 Yes Half yearly 9412881229 editoranil.hindi@gmail.com
w प्रज्ञा एवं हिमालयीय संस्कृति (विजडम एंड हिमालयन कल्चर) सेन्ट्रल इन्स्टीट्यूट ऑफ़ हिमालयन कल्चर स्टडीज़, दाहुंग, अरुणाचल प्रदेश Geshe Ngawang Tashi Bapu yes 2347-8535 YEARLY 8256903634 cihcspub@gmail.com
w वर्ल्ड ट्रांसलेशन C2 Satendra Kumar Gupta Nagar, Lanka, Varanasi Surendra Kumar Pandey yes 2278-0408 Half Yearly 9454820806 worldtranslation@gmail.com
Y युद्धरत आम आदमी ए-221, डिफेंस, कॉलोनी, भूतल, नई दिल्ली-110021. सं. रमणिका गुप्ता Yes 23200359 8860843164 yudhrataamaadmi@gmail.com
Y युग तेवर 1587/1 उदय प्रताप कालोनी, बढ़ैयावीर, सिविल लाईन्स-2, सुल्तानपुर, 228001. सं. कमल नयन पाण्डेय Yes 2349-7513
Y युवा संवाद सं. ए. के. अरूण Yes
Y युग परिबोध वसंत कुञ्ज , नई दिल्ली आनंद प्रकाश 9811262848 yugpribodhhindi@gmail.com
Y युगशिल्पी डॉ. राजनारायण शुक्ला,एस.एच,ऐ-5,कवि नगर,गाज़ियाबाद डॉ. राजनारायण शुक्ला yes No ISSN-0975-4644 YES 9 9910777969 yug_shilpi@yahoo.com
वीक्षा लोकायत प्रकाशन, वाराणसी सदानंद शाही yes no 0975-3788
संभाष्य अखिल भारतीय साहित्य समन्वय समिति, वाराणसी डॉ. ज्ञानप्रकाश चौबे, डॉ. रविकांत राय yes no 2229-4066
शोध दृष्टि सृजन समिति पब्लिकेशन, वाराणसी डॉ.वशिष्ठ अनूप yes no 0976-6650
International Journal of Hindi Research Gupta Publications (Delhi) Yes Yes 2455-2232 Yes Google Scholar RJIF 5.22
अनुकृति सृजन समिति पब्लिकेशन, वाराणसी डॉ. रामसुधार सिंह yes no 2250-1193
जनपक्ष जनवादी लेखक संघ, वाराणसी इकाई डॉ. रामसुधार सिंह yes no
भारतीय आधुनिक शिक्षा एन.सी.ई.आर.टी, दिल्ली
I माध्यम हिन्दी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद ्सत्यप्रकाश मिश्र YES NO 2348-1757 YES Indexed 0.565 GIF AUSTRALIA YES YES
T THE OPINION SRIJAN SAMITI PUBLICATION VARANASI YES 2277-9124
J JOURNAL OF SOCIO-EDUCATIONAL & CULTURAL RESEARCH ANJANI JAN SEVA SAMITI VARANASI YES 2394-2878 YES
N NAV JYOTI SRIJAN SAMITI PUBLICATION VARANASI YES 2249-7331
R Research Journal of Indian Cultural Stream 0973-8762
P Parmita Research Journal 0974-6129
P Parsheelan, Research Journal 0974-7222
S Samanbhuti Research Journal 2229-5771
P Punj (Research Journal of Arts and Social Sciences) 2229-7871
अन्वेषिका एन.सी.टी.ई., दिल्ली
अनामा भगवती कॉलोनी हाजीपुर, बिहार आशुतोष पार्थेश्वर Yes 2348-8506 No Yes Quarterly 9934260232 anamahindi@gmail.com
पंचशील शोध समीक्षा फिल्म कॉलोनी, चौड़ा रास्ता, जयपुर, राजस्थान हेतु भारद्वाज Yes 0975-2587 No Quarterly 0141-2315072,2314172 info@panchsheelprakashan.com
परिषद् पत्रिका बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, प्रेमचंद मार्ग, पटना, बिहार सत्येन्द्र कुमार Yes 2320-5342 No Yes Quarterly
मूक आवाज़ हिंदी विभाग, पांडिचेरी विश्वविद्यालय प्रमोद मीणा No 2320-835X YES 2320-835X Yes Quarterly 7320920958 mookaawazhindi@gmail.com
सहचर नई दिल्ली आलोक रंजन पाण्डेय No Yes 2395-2873 No 9313809165 sahcharpatrika@gmail.com
मध्यभारती डॉ.हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय,सागर
ग्लोबल रिसर्च कैनवास MANOJ KUMAR ,3 JUNIOR MIG, 2ND FLOOR, ANKUR COLONY, SHIVA JI NAGAR, BHOPAL-462016 MANOJ KUMAR Yes No 2394-5427 No 9425017322 k.manojnews@gmail.com
राजीव गाँधी यूनिवर्सिटी रेफ्रीड जर्नल (RGURJ) राजीव गाँधी वि.वि., रोनो हिल्स, ईटानगर (अरुणाचल प्रदेश)
समागम KRITI AGRAWAL,3 JUNIOR MIG, 2ND FLOOR ANKUR COLONY, SHIVA JI NAGAR, BHOPAL-462016 Manoj Kumar Yes Yes 2231-0479 No 9300469918 samagam2016@gmail.com
कदम पत्रिका 12/224, एम.सी.ड़ी.फ्लैट, सैक्टर-20, रोहिणी, दिल्ली-110086 कैलास चंद चौहान YES YES 2348-5671 YES 9212026999 kadamhindi@gmail.com
Contemparory Social Issues हरियाणा डॉ. राजेश कुमार yes no 2454-6992
AMAR हरियाणाा डॉ. हरिश कुमार रंगा yes no 2348-1323
विश्व हिन्दी पत्रिका विश्व हिन्दी सचिवालय, स्विफ्टलेन, फारेस्ट साइड, मॉरीशस yes
DEEPAK HARYANA S. BHARDWAJ YES NO 2394-6563
सबलोग 14 बी, सूर्या अपार्टमेंट, खसरा नम्बर- 476, शालीमार पैलेस के पास,स्वरूप नगर रोड़, बुराड़ी, दिल्ली- 110084 किशन कालजयी YES NO 2277-5897 YES MONTHLY 9990199514 sablogmonthly@gmail.com
अरुणप्रभा हिन्दी विभाग, राजीव गाँधी वि.वि., रोनो हिल्स, ईटानगर -791112
भाषा भारती राजभाषा प्रकोष्ठ,डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर
चिन्तन-सृजन आस्था भारती, ईस्ट ऐण्ड अपार्टमेंट, मयूर विहार,फ़ेस–1 विस्तार,दिल्ली
वरिमा नलिन रंजन सिंह, लखनऊ
संवाद वाराणसी अमित कुमार पाण्डेय,
अरुणागम जवाहरलाल नेहरु महाविद्यालय, पासीघाट,अरुणाचल प्रदेश –791103
आजकल प्रकाशन विभाग, सूचना भवन, सी. जी.ओ.कॉम्प्लेक्स, लोदी रोड, नई दिल्ली –110003
इतिहासबोध बी-239, चन्द्रशेखर आज़ाद नगर,तेलियरगंज,इलाहाबाद-4 लालबहादुर वर्मा,
समकालीन भारतीय साहित्य
मुक्तांचल आधुनिक अपार्टमेण्ट,6/2/1,आशुतोष मुखर्जी लेन,सलकिया, हावड़ा-711106
साहित्य वर्तिका
फ़ारवर्ड प्रेस साहित्य वार्षिकी नेहरु प्लेस, दिल्ली
शिक्षा-विमर्श दिगन्तर शिक्षा एवं खेलकूद समिति, जगतपुरा,जयपुर
शोधश्री दयालबाग एजुकेशनल इन्स्टीट्यूटआगरा
शीतल वाणी सहारनपुर वीरेन्द्र आज़म
समकालीन तीसरी दुनिया आनन्दस्वरूप वर्मा, क्यू-63,सेक्टर-12,नोएडा-1
अपेक्षा वैशाली, गाज़ियाबाद तेजसिंह
दस्तावेज 101, बेतियाहाता, गोरखपुर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,
कथन 107,साक्षर अपार्टमेण्ट्स, ए-3,पश्चिम विहार, दिल्ली रमेश उपाध्याय
समकालीन भारतीय साहित्य साहित्य अकादेमी, दिल्ली
वागर्थ भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता
शोध सृजन ए.पी. एन . पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज बस्ती 271001 डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव YES NO 9753362 YES N0 NO 9451087259 drbaljeetsrivastava@gmail.com
SHODH SAMIKSHA RESEARCH EDUCATIONAL SOCIATY LUCKNOW, PRASHRAY 610/191 A, KESHAWNAGAR, SITAPUR ROAD LUCKNOW DR. BALJEET KUMAR SRIVASTAVA YES NO 22491597 YES NO NO 9451087259 drbaljeetsrivastava@gmail.com
अभिनव इमरोज सभ्या प्रकाशन, वसन्तकुंज, नई दिल्ली-110064 देवेन्द्र कुमार बहल YES NO 23211105 YES NO NO
9910497972 dk.bahl1942@gmail.com

UGC NET परीक्षा पुस्तक सूची

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यहाँ आप यूजीसी नेट से संबधित महत्वपूर्ण पुस्तकें प्राप्त कर सकते हैं। NTA द्वारा वर्ष में दो बार यह परीक्षा आयोजित की जाती है। यूजीसी नेट एक पात्रता परीक्षा है, जो विश्वविद्यालय एवं कॉलेज में शिक्षक नियुक्ति हेतु आवश्यक है।

सामान्य अध्ययन से संबधित पुस्तकें

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग विनियम 2018 के अनुसार पीयर रिव्यू जर्नल हेतु नियम

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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में शिक्षकों और अन्य शैक्षिक कर्मचारियों की नियुक्ति हेतु न्यूनतम अर्हता तथा नियुक्ति हेतु न्यूनतम अर्हता तथा उच्चतर शिक्षा में मानकों के रखरखाव हेतु अन्य उपाय उच्चतर शिक्षा में मानकों के रखरखाव हेतु अन्य उपाय संबंधी विनियम, 2018) संबंधी विनियम,

2018- UGC 2018 GUIDLINE

पीयर-रिव्यू जर्नल किसे कहते हैं ?

पीयर- रिव्यू जर्नल का अर्थ है वह पत्रिकाएँ जिसमें प्रकाशित सामग्री को प्रकाशन से पूर्व विषय विशेषज्ञ द्वारा जांचा जात है। इन पत्रिकाओं में विषयानुसार विषय विशेषज्ञों की एक समिति होती है, जिसका कार्य पत्रिका हेतु प्राप्त शोध आलेखों को पत्रिका मानकों, विषय सामग्री इत्यादि के आधार जाँचना होता है। समिति सदस्य प्रत्येक आलेख पर अपनी टिप्पणी देते हैं।

पीयर-रिव्यू जर्नल में प्रकाशित शोध आलेख  क्या नियुक्ति हेतु मान्य है ?

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के यूजीसी राजपत्र नियमानुसार शिक्षकों की नियुक्ति हेतु यूजीसी केयर के अतिरिक्त पीयर-रिव्यू जर्नल में प्रकाशित शोध आलेख भी मान्य है। UGC 2018 Guideline में प्रत्येक शोध आलेख के 2 अंक निर्धारित किए गए हैं और अधिकतम 5 शोध आलेख स्वीकृत ही किए जाते हैं, जो कि यूजीसी केयर अथवा पीयर रिव्यू/रेफ्रीड जर्नल में प्रकाशित होने चाहिए। इन शोध आलेखों पर कुल 10 अंक दिए जाते हैं।

journal

प्रमोशन हेतु पीयर रिव्यू जर्नल में प्रकाशित शोध आलेख मान्य है –

हिंदी की पीयर-रिव्यू पत्रिकाएँ-

यहाँ आप हिंदी में प्रकाशित होने वाली पीयर-रिव्यू पत्रिकाओं की सूची देख सकते हैं। प्रत्येक पत्रिका के साथ वेबसाइट का लिंक उपलब्ध है आप लिंक के माध्यम से पत्रिका की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं

पत्रिका का नामइंपेक्ट फेक्टरISSN/RNIवेबसाइट
शिक्षण संशोधन3.8712561-6241वेबसाइट
जनकृतिअनुसंधान 3.882454-27252456-0510वेबसाइटवेबसाइट
IJHR 2455-2232वेबसाइट
शोध समीक्षा एवं मूल्यांकन5.9012320-5474वेबसाइट
साहित्य-संहिता6.62454-2695वेबसाइट
शोध इंटरनेशनल 2581-3501वेबसाइट
शोध समागम 2581-6918वेबसाइट

 यूजीसी केयर में शामिल पत्रिकाएँ- 

यदि आप यूजीसी केयर सूची में शामिल हिंदी पत्रिकाओं की जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं तो लिंक देखें- 

यूजीसी केयर सूची 

 सूची में नाम जोड़ें 

इस सूची को विस्तार देने में आप सहायता कर सकते हैं आप यदि इस सूची में किसी जर्नल को शामिल करना चाहते हैं तो नीचे कमेन्ट बॉक्स में जर्नल का नाम, लिंक, issn नंबर भेजें। 

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केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा हिंदी सेवी सम्मान हेतु आवेदन आमंत्रित

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hindi sevi samman
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हिंदी सेवी सम्मान वर्ष 2020 के लिए नामांकन प्रस्ताव आमंत्रित

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के विकास, प्रचार-प्रसार और प्रोत्साहन में केंद्रीय हिंदी  संस्थान की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हिंदी राष्ट्रीय एकता, सदभाव और समन्वय की महत्वपूर्ण कड़ी है। राजभाषा, राष्ट्रभाषा और संपर्कभाषा के रूप में इस पर विभिन्न भारतीय भाषाओं में आपसी संवाद को बढ़ाते हुए भारत की समावेशी संस्कृति के विकास की भी ज़िम्मेदारी है। यही तथ्य केंद्रीय हिंदी संस्थान की स्थापना और इसके हर कार्यक्रम के मूल में विद्यमान रहा है। संस्थान विदेशों में हिंदी भाषा और उसके माध्यम से आधुनिक भारत की चेतना और उसके लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रसारित करने के लिए भी संकल्पित है। इसी दायित्व-बोध के साथ संस्थान द्वारा सन् 1989 में हिंदी सेवी सम्मान योजना का आरंभ किया गया। इस योजना के अंतर्गत 12 पुरस्कार श्रेणियों के अंतर्गत निर्धारित क्षेत्रों में हिंदी के उन्नयन, विकास एवं प्रचार-प्रसार हेतु उत्कृष्ट कार्य करने वाले 22 हिंदी सेवी विद्वानों को प्रति वर्ष सम्मानित किया जाता है।

हिंदी सेवी सम्मान योजना की अद्यतन पुरस्कार श्रेणियाँ निम्नलिखित हैं –

पुरस्कारक्षेत्रसंख्या
     
गंगाशरण सिंह पुरस्कारहिंदी प्रचार-प्रसार व हिंदी प्रशिक्षण के क्षेत्र में उल्‍लेखनीय कार्य के लिए4
गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार(i) हिंदी पत्रकारिता तथा (ii) जनसंचार के क्षेत्र में उल्‍लेखनीय कार्य के लिए2
आत्माराम पुरस्कार(i) विज्ञान तथा (ii) चिकित्‍सा विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के  क्षेत्र में उल्‍लेखनीय कार्य के लिए2
सुब्रह्मण्यम भारती पुरस्कार(i) सर्जनात्‍मक एवं (ii) आलोचनात्‍मक क्षेत्र में उल्‍लेखनीय कार्य के लिए2
महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कारहिंदी माध्‍यम से ज्ञान के विविध क्षेत्र, पर्यटन एवं पर्यावरण से संबंधित क्षेत्र में मौलिक अनुसंधान के लिए2
डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन पुरस्कारविदेशी विद्वान को विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय कार्य के लिए2
पद्मभूषण डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कारआप्रवासी भारतीय विद्वान को विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार एवं लेखन में उल्‍लेखनीय कार्य के लिए2
सरदार वल्‍लभ भाई पटेल पुरस्‍कार(i) कृषि विज्ञान एवं (ii) राष्‍ट्रीय एकता के क्षेत्र में उल्‍लेखनीय लेखन कार्य के लिए2
दीनदयाल उपाध्‍याय पुरस्‍कार(i) मानविकी के क्षेत्र में एवं (ii) कला, संस्‍कृति एवं विचार की भारतीय चिंतन परंपरा के क्षेत्र में उल्‍लेखनीय कार्य के लिए2
स्‍वामी विवेकानंद पुरस्‍कारभारतविद्या (इंडोलॉजी) के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए2
पंडित मदन मोहन मालवीय पुरस्‍कार(i) शिक्षाशास्‍त्र एवं (ii) प्रबंधन में हिंदी माध्‍यम से उल्‍लेखनीय लेखन कार्य के लिए2
राजर्षि पुरुषोत्‍तम दास टंडन पुरस्‍कार(i) विधि एवं (ii) लोक प्रशासन के क्षेत्र में हिंदी भाषा में उल्‍लेखनीय कार्य के लिए2

हिंदी सेवी सम्मान वर्ष 2020 के लिए नामांकन प्रस्ताव आमंत्रित।

अंतिम तिथि – 21 मई 2021 वेबसाईट – https://khsindia.org/

Hindi Sevi Samman
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[सूचना एवं जानकारी केन्द्रीय हिन्दी संस्थान की वेबसाइट से ली गयी है]

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