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पत्रकारों से खबर तो चाहिए पर उनकी कोई खबर नहीं लेता

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दुनिया भर में जो पत्रकार, लोगों की खबर लेते और देते रहते हैं वो कब खुद खबर बन जाते हैं इसका पता नहीं चलता है। पत्रकारिता के परम्परगत रेडियो, प्रिंट और टीवी मीडिया से बाहर, ख़बरों के नए आयाम और माध्यम बने हैं। जैसे जैसे ख़बरों के माध्यम का विकास हो रहा है, ख़बरों का स्वरूप और पत्रकारिता के आयाम भी बदल रहे हैं। फटाफट खबरों और 24 घंटे के चैनल्स में कुछ एक्सक्लूसिव दे देने की होड़, इतनी बढ़ी हैं कि ख़बरों और विडियो फुटेज के संपादन से ही खबर का अर्थ और असर दोनों बदल जा रहा है। पत्रकारों और पत्रकारिता में रूचि रखने वालों के लिए ब्लॉग, वेबसाइट, वेब पोर्टल, कम्युनिटी रेडियो, मोबाइल न्यूज़, एफएम, अख़बार, सामयिक और अनियतकालीन पत्रिका समूह के साथ-साथ आज विषय विशेष के भी चैनल्स और प्रकाशन उपलब्ध हैं। कोई ज्योतिष की पत्रिका निकल रहा है तो कोई एस्ट्रो फिजिक्स की, कोई यात्रा का चैनल चला रहा है तो कोई फैशन का। फिल्म, संगीत, फिटनेस, कृषि, खान-पान, स्वास्थ्य, अपराध, निवेश और रियलिटी शो के चैनल्स अलग-अलग भाषा में आ चुके हैं। धर्म आधारित चैनल्स के दर्शकों की संख्या बहुतायत में होने का परिणाम ये हुआ कि पिछले 10-15 वर्षों में, दुनिया के लगभग सभी धर्मों के अपने अपने चैनल्स की बाढ़ आ गई। जैसे-जैसे दर्शक अपने पसंद के चैनल्स की ओर गए, जीवन में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं के विज्ञापन भी उसी तर्ज़ पर अलग-अलग चैनल्स और भाषा बदल कर उन तक पहुँच गए। संचार क्रांति के आने और मोबाइल के प्रचार-प्रसार से ख़बरों का प्रकाश में आना आसान हो गया है। सोशल मीडिया के आने से एक अच्छी शुरुआत ये हुयी है कि ख़बरों को प्रसारित करने के अख़बार समूहों और चैनल्स के सीमित स्पेस के बीच आम लोगों को असीमित जगह मिली है। ख़बरें अब देश की सीमाओं की मोहताज नहीं रही हैं। ख़बरों की भरमार है। मोबाइल ने ‘सिटीजन जर्नलिज्म’ को बढ़ावा दिया है और आज मोबाइल रिकॉर्डिंग और घटना स्थल का फोटो, ख़बरों की दुनिया में महत्वपूर्ण दस्तावेज़ की तरह उपयोग में आ रहा है। लेकिन मीडिया की इस विकास यात्रा में, पत्रकारों के जीवन में क्या बदलाव आया है? दुनिया के स्तर पर सबके अधिकारों की बात करने वाले, पत्रकारों पर हमले की घटनाएं बढ़ी हैं। जर्नलिस्ट्स विदाउट बॉर्डर की रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में 66 पत्रकार मारे गए थे और इस तरह पिछले एक दशक में मारे जाने वाले पत्रकारों की संख्या 700 से ऊपर बताई जाती है। 66 मारे गए पत्रकारों में, बड़ी संख्या सीरिया, उक्रेन, इराक़, लीबिया जैसे देशों में मारे गए नागरिक पत्रकार और मीडिया कर्मियों की थी।
आगे पढ़ने के लिए लिंक पर जाएँ- http://samwad24.com/?p=1632

लेख़क-​अश्विनी कुमार मिश्र
पत्रकार, राजगढ़, मीरजापुर!

पतझड़

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close-up photography of brown leaves
Photo by Kristian Seedorff on Unsplash

                    गीत :- पतझड़

20210621 184024 d7967bcbकोकिला की कूक सूनी हूक अंतस् गढ़ बना है।
भाव निर्जन राग नीरव और मन  पतझड़ बना है॥

वेदना की परिधि में खुद को खड़ा पाया था जब
मौन स्मित हो गयी थी बढ़ गयी गोपन व्यथा तब
धूप उच्छृंखल हुई तो छाँव का अवसाद अंतस्
अद्यावधि अधबीच तरणी का वही प्रकरण बना है।
भाव निर्जन राग नीरव और मन पतझड़ बना है॥

थी ह्रदय की चाह हर मौसम उसी के पास बीते
दिन गये सप्ताह  बीते अब्द के  मधुमास रीते
क्षीण सौरभ कर विदारण पुष्प की कोमल लता को
अश्रुकण से सींच जीवित रीति यह अनुक्षण बना है।
भाव निर्जन राग नीरव और मन पतझड़ बना है॥

दूधिया सैलाब आया इंदु जब आयी धरा पर
पर उसी क्षण भाव के प्रासाद ढहके भरभराकर
मध्य रजनी में कहीं एकांत के सूने सदन में
शुष्क रेतीले भूभल में भग्न आकर्षण बना है।
भाव निर्जन राग नीरव और मन पतझड़ बना है॥

पुष्प नें मधुकण संजोये हैं कठिन आयास कर
उत्फुल कली सुर छेड़ती मधुवन में सस्मित हास कर
फ़िर मधुप उद्विग्न क्यों है दोष उसका है भला क्या
जोकि इस पतझड़ के आने का सघन कारण बना है।
भाव निर्जन राग नीरव और मन पतझड़ बना है॥

पढ़कर याद रह जाने वाली किताब- पेपलौ चमार: समीक्षक- राजीव कुमार स्वामी

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एकता प्रकाशन चूरू से प्रकाशित शिक्षक, कवि उम्मेद गोठवाल की राजस्थानी में कविता की पहली ही किताब ’पेपलौ चमार’ दलित जीवन के यातनापूर्ण इतिहास और वर्तमान का दस्तावेज़ी बयान है। दलित विमर्श हिंदी में अब एक स्थापित विषय के रूप में जगह पा चुका है, बावज़ूद इसके दलित जीवन-संघर्ष और शोषण चक्र को इस तरह इतिहास, वर्तमान, राजनीति और धर्म के अनेक कोनों से देखने दिखाने वाली कविता की कोई ऐसी किताब शायद अभी तक हिंदी में भी नहीं है। राजस्थानी में प्रकाशित यह किताब न केवल अपने विषय को व्यापकता प्रदान करती है बल्कि दलित और अछूत कहे जाते रहे समाज की मुक्ति के संघर्ष में एक प्रभावी आवाज़ भी जोड़ती है। जाति आधारित शोषण की विद्रूपताओं को उद्घाटित करती पैनी और मार्मिक कविताओं से भरी यह किताब राजस्थानी साहित्य में मील का पत्थर कही जा सकती है। 
पेपलौ चमार की कविताओं को पढ़ना जहां एक ओर गहरे अवसाद से भर देने वाला है वहीं कुछ कविताओं में बदलाव और चेतावनी का स्वर भी स्पष्ट सुनाई देता है। संकलन की अनेक कविताएं दलित राजनीति की नई समझ की ओर इशारा करती है। कविता को औजार की तरह प्रयोग करने की कवि की सजगता हाशिए की राजनीति के बदलने की ओर संकेत करती है।
संकलन की कविताओं के मुख्य किरदार ’पेपलौ चमार’ का परिचय ही उसके प्रति गहरी सहानुभूति और दुख को जगाने वाला है। कवि की पहली सफलता तो यही है कि वह पेपले के बहाने पूरे दलित समाज की पीड़ा को पाठक तक संप्रेषित कर पाने में बहुत सफल रहा है।
वो एक दुख है / कै मिनख है / कै पछै एक विकार है / वौ समाज रौ हिस्सौ है
कै समाज रौ खंखार है, / वौ छोटै-सै गांव रौ / एक गिणतबायरौ / चमार है।
खंखार के प्रति जुगुप्सा को अछूत और दलित के प्रति सवर्णों की भावनाओं के रूप में समझा जा सकता है। खंखार का यह अकेला बिंब पेपले की सामाजिक पहचान और उसके पीछे के सवर्ण अत्याचार को एकदम नंगा कर देता है। पढ़ने और सुनने वाले को भी दूषित-सा कर देने वाला, भद्रलोक में वर्जित यह भाव सदियों से पेपले के जीवन का हिस्सा है; सोचकर ही मन ग्लानि से भर उठता है। अछूत की पीड़ा का यह बिंब इकलौता नहीं है। पेपले की पीड़ा और यातना भी तो कोई छोटी नहीं है। कवि ने पूरी सहानुभूति से पेपले की यातना को कविता में बांधा है।
वौ जांणै ऊमरकैद री / सज़ा काटै वौ दुखियारां बिचालै / दुख ई बांटै
वौ गांठ है, गूमड़ौ है / गिंधलौ और बेकार है / वौ छोटै-सै गांव रौ / एक गिणतबायरौ चमार है।
उम्मेद जी की कविताओं को पढ़ते हुए कबीर की याद भी बार-बार आती है। ’सुण पेपला’ और ’जी, ग्यानी जी’ जैसे उद्बोधन वाक्य कबीर के ’सुनो भाई साधो’ और ’पांडे कौन कुमति तोहे लागी…’ का अनुवाद सरीखा होकर भी नई भाव-भंगिमा रचते हैं। ’जी, ग्यानी जी’ के तीन शब्दों का इकलौता व्यंग्य इतना नुकीला है कि ज्ञान के दंभ और पाखंड को आर-पार बेध देता है।
जी, ग्यानी जी! / आप जलम सूं ई पूजीजता हौ,
पेट पड़तां ई आपरी / उघड़ जावै मांयली आंख्यां
हाथ आय जावै कैवल्य
ज्ञानी जी को संबोधित कविताओं में ब्राह्मणवाद की जड़ों पर गहरी चोट की गई है। इन कविताओं में ज्ञानी जी के ज्ञान पर एकाधिकार और उसके परवर्ती प्रपंचों की कलई खुलती नजर आती है।
जी, ग्यानी जी! / आपरी व्यवस्था मांय / गाय, गोमूत,गोबर / पूजीजता हुय सकै,
पण नीच जात / वीरै लेखे लात / फगत लात।
सचमुच यह कितना दारुण यथार्थ है कि पशुपक्षियों, जीव-जंतुओं और यहां तक कि निर्जीव पहाड़-नदियों को भी पूजा और आदर करने वाला तथाकथित सर्वाधिक सहिष्णु हिंदू समाज किस तरह अपने ही जैसे हाड़-मांस के कुछ लोगों को छूना तो दूर देखना भी गवारा न करने का गौरवपूर्ण इतिहास रखता है? उनकी छाया भी उन्हें छू नहीं सकती। तभी तो पेपले को आज भी अपनी छाया पर नज़र रखनी पड़ती है।
सुण पेपला! / मिटग्या हुयसी / थारै डील रा वै चकानां, / पण म्हैं अजैई
किणी रै कन्नै / ऊभौ हुवण सूं पैलां / निरखूं हूं / खुद री छीयां।
कवि इन विद्रूपताओं के उद्घाटन के साथ-साथ इनकी मूल वजह की पड़ताल भी करता चलता है और संकलन के आखिर तक आते-आते उनसे मुक्ति का मार्ग भी खोजता है। सवर्णों के देवी-देवताओं, तीज-त्योहारों और शोषण के लिए गढ़ी गई तमाम कहानियों किस्सों को एक-एक कर तर्क से खारिज़ करता हुआ वह अपने समाज को इनसे आगाह करता चलता है। जाति और धर्म के गठबंधन को समझ चुका कवि उसके आक्रमण की हर चाल को काटता है। मूलचंद को मलचंद कहकर उसका मखौल उड़ाने वाली इस शर्मा (बे-शर्मा) मानसिकता को वह पहचान चुका है तभी तो वह उसके भीतर पैठकर उसके मुहावरे की पोल खोलता है। बदलते संदर्भ में सवर्ण की तिलमिलाहट और विवशता देखिए-
’कीं ई हुवौ भलांई / किणी ढेढ रौ / हुकम नीं बजायीजसी।’
परंतु वह जानता है कि इस सवर्ण तंत्र को तोड़ना इतना आसान नहीं है। गांव से शहर तक, सड़क से संसद तक, जाति से धर्म तक और दुकान से बाज़ार तक इसकी जड़ें सर्वत्र फैली हैं। ’अजै ऐन स्यापो है’ शीर्षक कविताओं में कवि वर्तमान के इसी अंधकार की पड़ताल करता है। दलित होने का अपराध किस तरह कदम-कदम पर सज़ा सुनाता है एक बानगी देखिए-
जी, ग्यानी जी! / विकास रै इण नाप-सांधै
ऐन आधुनिक लोगां बिचालै / भाड़ै रौ कमरौ लेवण सारू
परबस / अर लाचार हूं / क्यूंकै / म्हैं चमार हूं।
परंतु चूंकि वह जाति के इस कपटजाल को समझ चुका है इसलिए अगले ही पल वह इस अपराधबोध से मुक्ति की घोषणा भी करता है और ज्ञानी के ज्ञान को चुनौती देता है। कबीर की बात, ’पूछ लीजिए ज्ञान…’ को कुछ-कुछ पलटता हुआ-सा कि पूछ लीजिए जात- तो मैं बताउंगा- और बताता है-
सुणौ ज्ञानी जी! / अबै बूझीजौ कदै / म्हारी जात / वीं कुचरणीगारी मुलक साथै
अबै नीं हांफसी म्हारी सांस, / लगायनै आखौ दम
हलकारै साथै कैयसूं / हां, / हां, म्हैं चमार हूं।
इस संदर्भ में कहा जा सकता है कि कबीर के समय में शिक्षा और सामाजिक जीवन में भागीदारी से वंचित शूद्रों के लिए शायद ज्ञान की धौंस ही प्रमुख रही होगी और इसीलिए कबीर को ज्ञान की चुनौती स्वीकार करनी पड़ी, अन्यथा कोरा ज्ञान कोई बड़ी उपलब्धि नहीं होता है। परिणामस्वरूप कबीर ने अपने अनुभव और परिश्रम से ज्ञान अर्जित किया और पांडे को खुली चुनौती दी। परंतु कबीर के इतने बरस बाद अब जबकि शूद्र पढ़-लिख भी गए हैं फिर भी सवर्ण मानसिकता में कोई विशेष अंतर नहीं आया है तो शायद कवि का यह कहना ठीक ही है कि ज्ञान के साथ मेरी जाति भी पूछ लेना जिसे लेकर अब मुझमें कोई हीन भावना नहीं है।
दलित और अछूत होकर जीना कैसा होता है इसकी मार्मिकता का उद्घाटन करती कई कविताएं संकलन में हैं जिनमें ’चमार हुवण सुं चौखो है!’ कविता विशेष रूप से उल्लेखनीय है। तिल-तिल कर मरने से अच्छा है एक ही दिन में समूचा मर जाना। दलित जीवन की कैसी मार्मिक अभिव्यक्ति इस कविता में हुई है।
सुण पेपला! / चमार हुवण सूं चोखौ है / कीं ई हुवणौ / भलांई भैंरूजी रौ बकरौ हुवणौ
कसाई रौ पाडियौ हुवणौ / पण चमार / कदै नीं हुवणौ। / मौत सारू थरपीजेड़ौ है
एक दिन, / इयां घूंट-घूंट / रोजीनै मरण सूं तौ चोखौ है
एक दिन / समूचौ मर जावणौ।
डा आंबेडकर कहते थे, दलित को दलित होने का अहसास करा दो शेष कार्य वह स्वयं कर लेगा। कवि सदियों से कुचले दलित स्वाभिमान को जगाने का महत्त्व समझता है और दलित समाज को जगाने की हुंकार भरता है। आंबेडकर की ही तरह श्रम और भाईचारे पर आधारित एक नए समाज की आस के साथ वह कहता है-
करड़ ल्यावौ / नाड़ री नसां मांय / जिकी झुकै खुदौखुद / किणी भाठै साम्हीं
बिना कारण री / सिरधा पाण, / निंवण करणौ ई है तौ / वांनै करौ
जिणां रै हजार-हजार हाथां री हथेली / थारी खातर ई खुरदरी है।
ब्राह्मणवादी व्यवस्था को समाप्त करने के लिए उन्हीं के द्वारा बनाए गए सदियों से चले आ रहे मिथकों का भंजन भी उतना ही जरूरी है। ‘यदा यदा ही धर्मस्य…’ का आदि उद्घोषक कौन है और वो कौनसे धर्म की रक्षा के लिए बार-बार आने की ताकीद करता है; पेपले के लिए यह समझना अत्यंत आवश्यक है। ऐसे मिथकों की पोल खोलता कवि अब ज्ञानी जी से अपने पाखंड पर कुछ शर्म करने की बात कहता है।
इतिहास साख भरै / कुणई नीं उतरसी आभै सूं, 
’यदा-यदा ही धर्मस्य’ रौ / अवतारी ई नीं आयसी / थारै जैडै म्लेच्छ खातर।
थूं जांणण लागग्यौ है / कै हरिण्य़कश्यप ई साच है
वीरै कन्नै ई बल है, / नृसिंह भगवांन तौ जथाथितिवाद रौ
सैं सूं बड़ौ छल है। 
ज्ञानी जी शर्म ना भी करें लेकिन पेपले के लिए यही कम उप्लब्धि नहीं है कि वो उनके षडयंत्र को समझ चुका है और अब अपने अधिकारों के प्रति सजग है। सुणों ज्ञानी जी की तर्ज़ पर ही जब वह कहता है, ’सुणों ठाकरां…’ तो एक अकाट्य चुनौती सी देता मालूम होता है।
सुणौ ठाकरां! / थारै गढ़ आगैकर
टिपती बगत / खुद री जूती
नीं धरसूं / सिर माथै,
नीं खुद री भोम / नीं खुद रौ धन / फगत मिणत बेचूं खुद री
म्हारौ पसीनौ ई है / जिकौ सींचै
थारा / गढ़, मिंदर अर खेत।
जाति के इस खोए हुए स्वाभिमान को जगाने के लिए वह दोहरी नीति अपनाता है। एक ओर वह अपनी जाति के दमन और शोषण को प्रतिकार के लिए औज़ार के रूप में काम लेता है तो वहीं दूसरी ओर इसके विपरीत अपनी सीमाओं को तोड़कर साहस की एक नई इबारत लिखता मालूम पड़ता है। शोषण की याद कितनी मारक है- 
स्यालियौ पीसां सट्टै / खेत अडांणै धरायसी / अगाऊ पड़ब्याज पेटै / हलदी चढेड़ी छोरी
रात नै बुलायसी
अगूणै बास मांय / बाजै थाली / आथूणौ बास / मनावै हरख,
जाम्यौ है / एक और हाली!
और फिर अछूत की सीमाओं से आगे निकलने की नई इबारत। सवर्ण लड़की से आंख लड़ाने तक की हद तक। फिर बात तो बिगड़नी ही थी। परंतु ये खतरे उठाने ही होंगे-
आव चाख आव चाख
सरतरियां री / वीं छोरी रै हांसतै होठां / कित्ती मिसरी है।
अगूणै बास रै किणी छोरै री आंख / आथूणै बास री किणी छोरी रै
रूप माथै पड़ग्यी, / बात बिगड़ग्यी।
आरक्षण को जातिवाद का पोषक बताने वालों और इस देश का घुन कहने वालों को भी कवि ने करारा जवाब दिया है। आरक्षण की बैसाखी को छोड़ने को तैयार पेपला ज्ञानी जी को उनका षडयंत्र याद दिलाता है।
जी, ग्यानी जी! / थारै खुद रै सईकां मांय
एकठ पूंजी / थारौ बडमाणसौ / थारौ धरम / थारा देवता आद
सगला पेपलै नै सूंप देवौ / पेपलौ ई थांनै
खुद रौ आरक्षण सूंपै!
संकलन में कई दूसरी राजनीतिक कविताएं भी अत्यंत पठनीय हैं। कवि आंबेडकर के ’शिक्षा, संगठन और संघर्ष के मंत्र को जानते हुए भी इनके बीच पसरे भ्रष्टतंत्र के कारण चिंतित है। सवर्ण मास्टर किस तरह अपने दलित विद्यार्थी का भविष्य पहले ही पढ़ लेता है और अपने साथी दूसरे सवर्ण को चेताता है वह भयावह है।
इणां नै तौ आखी जूंण / मजूरी ई मरणौ है / पढ़-लिखनै इणांनै / के करणौ है,
पढ़-लिखनै थारी ई / अकल खायसी / घुरका करनै थांनै ई / आंख दिखायसी।
ऐसे में कवि अपनों को फिकर करने की सीख देता है और गांव को बदलने के लिए सत्ता और राजनीति की केंद्र दिल्ली को बदलने की बात कहता है। दिल्ली में बदलाव को शासन और नीति निर्माण में भागीदारी के रूप में देखा जा सकता है। तभी तो वह कहता है-
सुण पेपला! / जातवाद री जड़ काटणी पड़सी,
आथूणै बास री / पकड़ करणी हुयसी ढीली,
गांव बदलण खातर
बदलणी पड़सी दिल्ली!
किताब में दलित विमर्श के बीच स्त्री की उपस्थिति भी दर्ज़ की गई है। दलित और स्त्री एक ही गाड़ी में जुते दो बैल हैं जो अलग-अलग होकर भी एक ही हैं। दलित के घर की स्त्री सवर्ण के घर की स्त्री की तुलना में अपने घर के मर्दों से भले ही कम प्रताड़ित हो परंतु स्त्री होने का दुर्भाग्य उसे फिर भी भोगना ही पड़ता है। इस लिहाज़ से स्त्री पर यहां दोहरी मार पड़ती है। दलित के घर की गरीबी, अभाव और अपमान में तो उसका हिस्सा है ही, स्त्री होने की यंत्रणाएं अलग से हैं। दलित की हुई तो क्या हुआ, स्त्री देह का सुख तो दे ही सकती है। देह के स्तर पर उसकी जाति यहां उसका बचाव नहीं करती है। हल्दी चढ़ी हुई युवती का विवाह से पूर्व पैसे के दम पर शोषण कितना दारुण है। क्या कोई आरक्षण, कोई कानून इसकी भरपाई कर सकता है? लाल कपड़ों की ओर घूरती हवसी निगाहें स्त्री होने के अपराध की सज़ा है जिससे उसे दलित होना भी बचा नहीं सकता। उसके बचने का रास्ता भी उसकी कैद ही मैं जाकर खत्म होता है। इस संदर्भ में सवर्ण स्त्री के प्रति दलित पुरुष की मानसिकता अधिक प्रेमपूर्ण है।
थूं लाचार हुयनै
निरदोख चीड़ी नैं इयां बचावै
बूढै नैं हाथ सूंपनै
आखी जूंण सारू
बापड़ी नै पींजरै दाब आवै!
दलित समाज के स्त्री और पुरुष दोनों ही अत्याचार, अपमान और शोषण भोगने के लिए अभीशप्त हैं। पूरी किताब पेपले चमार के बहाने सभी दलितों, शूद्रों अथवा अछूतों की मुक्ति का स्वप्न रचती है। मुक्ति का यह स्वप्न उनके पीढ़ियों के भय से मुक्ति के साथ ही साकार हो सकता है जिसके लिए कहीं से कोई जनार्दन नहीं आने वाला है बल्कि उसके लिए स्वयं पेपले को ही मशाल लेकर इस घुप्प अंधेरे में घुसना पड़ेगा।
थारै साम्हीं / दोय ई मारग
तिल-तिल करनै
नरक मांय मरज्या
कै पछै / लेयनै मसाल
अंधेरै मांय बड़ज्या।
पढ़कर याद रह जाने वाली यह किताब उसी मशाल को जलाने वाली चिंगारी पैदा करती है और उस दिन की आस जगाती है जिस दिन भय से मुक्ति पाकर पेपला खुद शोषण, अन्याय, अत्याचार और असमानता के खिलाफ एक भय बनकर उठ खड़ा होगा। क्योंकि- जिकौ भय नै रचै / वौ खुद डर सूं बचै।
-राजीव कुमार स्वामी

पटना का गोलघर

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बीजापुर के गुम्बद से भी दोगुना ऊँचा है पटना का गोलघर

-प्रदीप श्रीवास्तव 

अप्रैल माह का तीसरा सप्ताह, सूर्य देवता पूरे शबाब पर, एक शादी में शामिल होने पटना आया हूँ, वह भी लगभग तीस साल बाद, जहाँ तक याद आ रहा है सन 1986 में आया था । तब के और आज के पटना में कितना बदलाव आ गया है, गली –मोहल्लों ने कंक्रीट का जंगल अपना लिया है ।जगह -जगह गगन चुम्बी इमारतों ने अपनी पैठ बना ली है ।जो रही सही जगह थी उसे फ्लाई ओवरों ने पूरी कर दी । एक दिन का समय है, सोचा पटना घूमा जाए। मन में आया कि क्या देखें, चलो गोलघर ही देखते हैं । बेली रोड से टेम्पो पकड़ा, वाही डग्गामार (आज भी पटना की सड़कों पर निःसंकोच दौड़ती हैं, जैसे 31 साल पहले ) टैम्पो वाले से  गाँधी  मैदान चलने को कहता हूँ । गोलघर पर उतरना चाहता हूँ तो टेम्पो वाला कहता है कि साहब आज तो बंद है, यह पूछने पर कि क्यों, तो जवाब मिलता है कि आज महावीर जयंती है । लेकिन में यह सोच कर वापस गोलघर लौटता हूँ कि पुरातत्व के अधीन आने वाले स्मारक तो केवल शुक्रवार को छोड़ कर बंद नहीं रहते ।

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 गोलघर के सामने खड़ा हूँ, ऊँचा सा गुम्बद नुमा घर (यही कहें तो ठीक होगा ) सामने दूर गंगा का तट, लगभग गंगा जी यहाँ सूखी   सी दिखाती हैं । टिकट खिड़की से प्रवेश के लिए टिकट लेता हूँ, और अन्दर । परिसर बहुत ही साफसुथरा, मन मोह लेता है, वहां का वातावरण । देखरेख करने वाले कर्मचारियों से गोलघर का इतिहास जानना चाहता हूँ, तो एक टूक जवाब मिलता है की पर्यटन कार्यालय जाइये, वहां आप को जानकारी मिल जायेगी । मजे की बात यह है कि गोलघर स्थित टिकट घर में भी जानकारी की कोई पुस्तक व प्रपत्र नहीं है । गोलघर के प्रांगण में पर्यटक न के बराबर, कुछ युवा जोड़े (स्कूल के ही लड़के-लड़कियां )गलबहियां डाले अपनी दुनिया में मशगूल, मानों सातों जन्म की बातें आज ही कर डालेंगे, जिसे देख कर कर अपना भी छात्र जीवन (इस तरह का तो नहीं ) याद आ जाता है, वहां के एक कर्मचारी से इस बाबत पूछता हूँ तो वह कहता है, कैसे आप इन्हें रोकोगे, घर से निकले तो माँ – बाप ने सोचा होगा कि पढ़ने गएँ होंगे, लेकिन उन्हें क्या पता कि उनके बच्चे तो यहाँ मस्ती कर रहे होंगे, साहब खाना तक साथ लाते और शाम को ही वापस लौटते हैं, ख़ैर ।।

गोलघर के ठीक नीचे खड़ा हूँ, अन्दर खोखला भवन, जिसमे प्रकाश व ध्वनि के माध्यम से गोलघर के इतिहास की जानकारी दी जाती है ।गोलघर के ऊपर जाने के लिए दोनों तरफ से घुमावदार जीने बने  है, जिसके रख-रखाव व रंग रोगन का काम आजकल चल रहा है ।लखोरी ईटों से बने गोलघर की उचाई 96 फीट, व्यास 109 फीट और दीवार की मोटाई 12 फीट 4 ईंच है। जिसपर चढ़ने के लिए दोनों तरफ बने जीनों की संख्या 145 है, जिस पर चढते – चढते हाफा आने लगता है, ऊपर पहुँच कर पटना शहर देखते बनता, सामने गंगा का विशाल तट, पीछे देखें तो पटना शहर, गाँधी मैदान का विशाल प्रांगण, जहाँ सभाएं व रैलियां होती हैं। गुम्बद के बीचो बीच 2 फीट 7 इंच का एक सुराख़ नुमा जगह, जिसे अब बंद किया जा चूका है। कहते हैं कि इसी सुराख़ से अन्दर अनाज डाला जाता था।अनाज निकलने के लिए नीचे के दरवाजों का प्रयोग किया जाता था। लेकिन इस बात की पुष्टि कोई नहीं कर पाता कि वास्तव में कभी ऊपर से अनाज भरा गया हो।कहते हैं कि 1770 में पड़े सूखे के बाद ब्रिटिश कैप्टन जान हास्टिंन ने गोलघर अनाज रखने (ब्रिटिश आर्मी के लिए) के लिए बनवाया था। इसमें 14 लाख टन अनाज रखा जा सकता है। यह 20 जुलाई 1786 में बना था। इसकी मरम्मत 2002 में करवाई गई ।  परिसर में लगे शिलापट्ट पर जगह खाली पड़ी है, पर अंग्रेजी में यह जरुर लिखा है कि ‘ सामान्य योजना के तहत गवर्नर जनरल के आदेश से इस क्षेत्र में पड़ने वाले अकाल से निपटने की लिए इस गल्ला भंडारण का निर्माण किया गया। जिसका निर्माण कैप्टन जॉन गैरस्टीन द्वारा 1784 में शुरू करवाया था जो दो साल बाद 20 जुलाई 1786 में बन कर तैयार हुआ। 

गोलघर को मै अपलक निहार रहा हूँ, विश्वास ही नहीं हो रहा कि बिना बिम्बों के यह गुम्बद बना होगा । वास्तविकता भी यही है कि यह सिर्फ एक गुम्बद हे, किसी ईमारत का हिस्सा नहीं ।बताते हैं कि दुनिया में सबसे ऊँचा माना जाने वाला येरुशलम के गुम्बद ‘’ डोम आफ रॉक’’ से 40 फीट ऊँचा एवं कर्णाटक के बीजापुर गुम्बद से इसकी ऊँचाई दोगुना अधिक है। मुझे इस बात का आश्चर्य हो रहा हे कि अपने आकर -प्रकार से दुनिया में यह गुम्बद अकेला है लेकिन विडम्बना यह है इसे आज तक वह मान्यता नही मिली है, जिसकी यह हक़दार है ।सदियों बाद आज भी गोलघर सरकारी उपेक्षा का शिकार ही है ।गोलघर के भीतर माचिस की तीलियों के जलने की गूंज आप कभी भी जलाकर सुन सकते है ।इसके अन्दर पैदा होने वाली गूंज लखनऊ के भूलभुलैया की याद दिलाने लगती  है।इतिहास के पन्नों को पलटें तो सबसे पहले 1806 में श्रीमती शेरवुड ने इस गूंज का उल्लेख किया था ।श्रीमती शेरवुड ने उस समय इसकी तुलना लन्दन के सेंट पाल गिरजाघर गुम्बद से की थी। उनके बाद 1824 में जब बिशप हेवर पटना आये तो उन्हों ने भी इस गूंज की बात कही, लेकिन हेवर ने इसकी तुलना किसी से नहीं की।कहते हैं कि गोलघर का निर्माण अंग्रेजों द्वारा 1770 में बंगाल में पड़े आकाल के बाद गल्ला भण्डारण की जरुरत को महसूस करते हुए 1786 में किया गया था। गोलघर में ऐसे तो ईंटों का प्रयोग हुआ है लेकिन इसके शिखर पर लगभग तीन मीटर तक ईंट की जगह पर पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। कहा जाता है कि मजदूर एक ओर से अनाज लेकर गोलघर के शीर्ष पर पहुंचते थे और वहां बने दो फीट सात इंच व्यास के छिद्र में अनाज डालकर दूसरी ओर की सीढ़ी से उतरते थे।वैसे बाद में इस छिद्र को बंद कर दिया गया। 145 सीढ़ियों को तय कर गोलघर के ऊपरी सिरे पर पहुंचा जा सकता है। यहां से शहर के एक बड़े हिस्से खासकर गंगा तट के मनोहारी दृश्य को देखा जा सकता है। सरकार ने इस स्मारक पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया। वर्ष 1979 में राज्य संरक्षित स्मारक तो इसे घोषित कर दिया गया परंतु स्मारक के चारों ओर बढ़ी आबादी और सड़कों के निर्माण से स्मारक प्रभावित हुआ। कहते  है कि भवनों के निर्माण से भी गोलघर की नींव और दरारें प्रभावित हुईं।   

19वीं सदी के अंत में डॉ आर वैडल ने संभवतः पहली बार यह बात उठाई कि यह भवन बौध स्तूप की नक़ल है ? तभी से इस बात की चर्चा जोरों से पकड़ ली कि यह भवन वास्तव में स्तूप ही है ।इस बात की पुष्टि 1997 में पटना में आयोजित एक सेमिनार में पटना संग्रहालय के इतिहासकार अरविन्द महाजन ने भी करते हुए इसे “अम्ल्का स्तूप” बताया, जिसकी चर्चा चीनी यात्री फाहियान ने अपनी यात्रा संस्मरण में इसे सम्राट अशोक के पगोड़ा के रूप में की है।वहीँ  ह्वेनसांग ने भी अपने संस्मरण में इसे “अम्ल्का स्तूप” लिखा है । ह्वेनसांग लिखते हैं कि अम्ल्का स्तूप पाटलिपुत्र नगर के दक्षिण –पूर्व में स्थित है। 

गोलघर के परिसर में घूमते – घूमते एक कोने में बने नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बी।पी।कोईराला की मूर्ति के पास पहुंचता हूँ ।जिसे देख कर सोच में पड़ जाता हूँ कि यहाँ पर इस मूर्ति की क्या जरुरत ।कोईराला जी का क्या योगदान था इस जगह के लिए ? अगर इस जगह पर नेपाल के जांबाज जंग बहादुर की मूर्ति लगी होती तो कोई बात थी।कहते हैं कि नेपाल के जंगबहादुर ने घोड़े पर सवार हो कर एक तरफ के जीने से गोलघर के ऊपर चढ़ कर दूसरी तरफ के जीने से उतरने का कारनामा कर दिखाया था । इस बात का उल्लेख 1919 में प्रकाशित बाबू राम लाल सिन्हा की पुस्तक ‘पाटलिपुत्र’ मे मिलता है । प्रांगण से बाहर निकलने की सोच ही रहा था कि पेड के नीचे एक वृद्ध महिला बैठी दिख जाती है।सोचता हूँ की शायद वह यहाँ के बारे में कुछ बता सकें, उनके बगल में जा कर बैठ जाता हूँ। 

फिर शुरू हो जाता है बातचीत का शिलशिला ।।।

अम्मा, आप कब से यहाँ आ रहीं है ?

वह कहने लगती हैं, बेटा बचपन से आ रही हूँ, इसी गोलघर के नीचे अब्बा, दादा सहित परिवार के साथ रात में सोते थे, दादा की रेलवे स्टेशन पर दुकान थी, हम लोग क्या, पूरा मोहल्ला यहीं सोता था, तब तो बिजली थी नहीं, न ही इतने मकान बने थे, सामने गंगा नदी बहती थी, ठंडा रहता था यहाँ पर ।

अम्मा, आप का नाम ?

बेगम खातून मुझे कहते हैं, अब्बा ने यही पर शादी कर दी, यहीं के होकर रह गए, परिवार है लेकिन दिन में एक बार यहाँ आये बिना मन नहीं मानता, इसी लिए चली आती हूँ ।

पूछता हूँ, अन्दर आने के लिए टिकट लेती हैं क्या ?

इतना पूछते ही वह चीख कर वहां काम कर रहे कर्मचारियों की तरफ इशारा करते हुए कहने लगती हैं की कौन मांगेगा टिकट, कुछ गाली के शब्दों का प्रयोग करने लगती है ।जिसे सुनकर कर्मचारी मुस्कराते हुए निकल लेते है ।

फिर पूछता हूँ, आप की उम्र कितना होगी अम्मा ?

वे बोलती हैं, सन वन तो याद नहीं, अंग्रेजों का शासन था, लगभग 103 तो होगी। 

गोलघर के बारे में कुछ बताइए ?

वे कहती हैं इतना याद कि है बैलगाड़ियों में अनाज भर कर आता था और इसी गोलघर में रखा जाता था, बाद में निकाल कर ले जाते थे, कहाँ ले जाते यह नहीं मालूम। इससे अधिक अम्मा कुछ नहीं बताती, बातों को घूमते हुए परिसर से लगे मजारों के विषय में बताने लगती है, जिसका उल्लेख फिर कभी करूँगा ।सूरज पश्चिम दिशा में छिपने को लालायित हैं, और में गोलघर से बाहर  निकल कर टैम्पो की तलाश में सड़क के किनारे खड़ा हो जाता हूँ ।

प्रदीप श्रीवास्तव, ”उदगम”, 537-F /64 A, इंद्रपुरी कॉलोनी , सुभाष चंद्र बोस अकादमी के बगल, आई.आई.एम.-हरदोई रोड , बिठोली  तिराहा, लखनऊ -226013 , उत्तर प्रदेश , सम्पर्क 8604408528

pradeep।srivastava2@gmail।com

पंजाबी की यादगार कहानियाँ (चार खंड : साठ कहानियाँ): सुभाष नीरव

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पंजाबी की यादगार कहानियाँ
(चार खंड : साठ कहानियाँ)

सुभाष नीरव जी के संपादन और अनुवाद में ‘पंजाबी की यादगार कहानियाँ’ पुस्तक चार खंडों में भारत पुस्तक भंडार से प्रकाशित हो रही है। जिसके पहले दो खंड(खंड-1 और खंड-2) प्रकाशित हो गये हैं, शेष दो खंड भी शीघ्र ही प्रकाशित होंगे, संभवत: मई 2017 तक। इस पुस्तक में पंजाबी की प्रथम कथा पीढ़ी के प्रसिद्ध कथाकार नानक सिंह(सन 1940 के आसपास) से लेकर पंजाबी की चौथी और वर्तमान कथा पीढ़ी तक के कुल साठ कहानीकारों की एक-एक यादगार कहानी का चयन किया गया है। हर खंड में 15-15 कहानियाँ हैं। पहले खंड के कथाकार हैं – नानक सिंह, ज्ञानी गुरमुख सिंह मुसाफिर, गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी, सुजान सिंह, संत सिंह सेखों, करतार सिंह दुग्गल, देविंदर सत्यार्थी, कुलवंत सिंह विर्क, संतोख सिंह धीर, अमृता प्रीतम, महिन्दर सिंह सरना, जसवंत सिंह विरदी, रामसरूप अणखी, गुरदयाल सिंह और नवतेज सिंह। दूसरे खंड के कहानीकार हैं – लोचन बख़्शी, प्रेम प्रकाश, अजीत कौर, गुलजार सिंह संधू, दलीप कौर टिवाणा, मोहन भंडारी, गुरबचन सिंह भुल्लर, सुखवंत कौर मान, भूपिंदर सिंह, किरपाल कज़ाक, जसबीर भुल्लर, वरियाम सिंह संधू, खालिद हुसैन, रघुबीर ढंढ़ और मोहम्मद मंशा याद।
प्रकाशक: भारत पुस्तक भंडार 
-सुभाष नीरव

पंचरतंत्र की कथाएँ

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पुस्तक समीक्षा

 तंत्र को अनावृत करती ‘पंचरतंत्र की कथाएँ’

समीक्षक: राहुल देव

व्यंग्य के लगभग पुरुषोचित समझ लिए गए क्षेत्र में नई पीढ़ी की स्त्री व्यंग्यकार भी पूरी मजबूती के साथ बराबरी करते हुए सामने आई हैं। उनके विषय भी केवल सामाजिक नही रह गए हैं बल्कि समय-समाज के राजनीतिक, आर्थिक, साहित्यिक, धार्मिक हालातों में मौजूद विसंगतियों पर भी वे पैनी नज़र रखकर लिख रही हैं। आमतौर पर मैं व्यंग्य लेखिकाओं पर अपनी आलोचनात्मक राय देने से बचता हूँ क्योंकि अधिकांश लेखिकाएं आलोचना को सहजता से नही ले पातीं | अगर कभी-कभार आपकी आलोचना भी हो तो वह इन्हें सकारात्मक भाव से ग्रहण करना चाहिए। उसके लिए विचलित होने की जरूरत नही है। प्रशंसा की तरह आलोचना भी आपकी रचनाशीलता के विकास का एक जरुरी हिस्सा है। आप सभी व्यंग्य लेखिकाएं समकालीन परिदृश्य में हिंदी व्यंग्य का एक उम्मीदों भरा चेहरा उपस्थित करती हैं।

इंद्रजीत कौर का नाम समकालीन महिला व्यंग्यकारों में प्रमुखता से लिया जाता है। वह एक साहसी व्यंग्य लेखिका हैं। इस वर्ष रुझान पब्लिकेशन से उनका दूसरा व्यंग्य संग्रह ‘पंचरतंत्र की कथाएं’ प्रकाशित होकर आया है | इस संग्रह में उनके 56 व्यंग्य संकलित हैं | अपनी बात उन्होंने ‘व्यंग्य में सामयिकता’ पर विचार प्रकट करते हुए की है | व्यंग्य तात्कालिक विसंगतियों पर संवेदनशील मनुष्य की शाब्दिक प्रतिक्रिया होती जरुर है लेकिन उसे रचनात्मक साहित्य में किस तरह ढालें यह सीखना-समझना होता है नही तो एक सामान्य टिप्पणी और एक व्यंग्य रचना में अंतर करना मुश्किल हो जायेगा | इसलिए लेखक को इसकी चिंता छोड़ करके केवल गुणवत्तापूर्ण लेखन पर अपना फोकस करना चाहिए | रचना सामयिक होकर भी भविष्य में प्रासंगिक हो सकती है और रचना शाश्वत का लबादा ओढ़कर भी कूड़ेदान लायक हो सकती है | जब समय अनुकूल होता है तो एक सच्चा लेखक लिखे बगैर रह ही नही सकता है उसकी कलम से रचना फूट ही पड़ेगी |

संग्रह के पहले व्यंग्य को पढ़ते हुए ही अवध की प्रखर व्यंग्य तासीर महसूस होने लगती हैं | इस तासीर के साथ जब पंजाबी फ्लेवर मिलता है तो एक अलग ही आनंद की सृष्टि होती है | इन्द्रजीत के पास सरोकार संपन्न विचारदृष्टि तो है ही जिसके साथ उनका भाषाई शरारत भरा व्यंग्य कौतुक मिलकर रचना को अत्यंत पठनीय बना देता है | इनके व्यंग्यों से गुज़रते हुए लेखिका का अपने परिवेश में व्याप्त विसंगतियों के प्रति गहरी संलग्नता दिखाई देती है | फिर चाहे वह ‘पुरुष सशक्तिकरण वाया फिल इन द ब्लेंक्स’ शीर्षक व्यंग्य हो या ‘होलियानी कविता और तुकबंदी की सा रा रा’ | वह कितने ही मज़े लेकर अपने विषय को शुरू करें लेकिन व्यंग्य के अंतिम उद्देश्य का उन्हें हमेशा स्मरण रहता है | इस कारण उनके व्यंग्य मनोरंजन की सीमित परिधि से निकलकर सार्थक व्यंग्य की परम्परा से जुड़ते हैं | ‘हमारी व्यवस्था की गुरुत्वाकर्षण तरंगें’ शीर्षक व्यंग्य के प्रारंभ में वह लिखती हैं- ‘न्यूटन के पास गुरुत्वाकर्षण सिद्ध करने के लिए एक सेब ही रहा होगा | हमारे पास तो नैतिकता, रुपये का मूल्य, पुलों की कतारें, विद्यालयों की छतें, फैशन परेड के कपड़े आदि कितनी ही चीज़ें हैं इस सिद्धांत को मजबूत करने के लिए |’

व्यंग्यकार को प्रतीक योजना बनाकर व्यंग्य लिखने में तो जैसे महारथ हासिल है | संग्रह का ‘घासतंत्र और रजुआ’ शीर्षक व्यंग्य | मुझे लेखिका के इस संग्रह में कुछ व्यंग्यों के शीर्षक लम्बे मालूम होते हैं | शीर्षक रखने में हमें जल्दबाजी नही करनी चाहिए | रचना का शीर्षक हमेशा संक्षिप्त होना चाहिए तथा उसे सम्पूर्ण व्यंग्य का प्रतिनिधित्व करने वाला होना चाहिए | जैसे ‘ज्यों-ज्यों तबियत बिगड़ने लगी’ शीर्षक व्यंग्य | अपने कंटेंट में यह एक प्रभावशाली व्यंग्य है | इस व्यंग्य से मैं कुछ वक्रोक्तिपूर्ण पंक्तियाँ उदृत करना चाहूँगा –

  • कार्यक्रम वक्त के अनुसार होने के बजाय वक्ताओं के अनुसार शुरू हुआ |
  • माइक पकड़कर वे ख़ुशी से वक्ताये
  • खरखराती हुई आवाज़ में वो वचनाये
  • लोगों ने जितना समझा उस पर तालियाँ बजाईं और जहाँ नही समझा वहां और ज़ोरों से तालियाँ बजायीं |
  • विवादों से सुसज्जित इतिहास के बावजूद महाशय समाचार-पत्रों की सुर्खियाँ नही बटोर पाये थे |

इन्द्रजीत कौर का लेखन बहुआयामी है | व्यंग्य के माध्यम से कहानी बुनने में वह बड़ी ही कुशल हैं | ‘राजा की ऐनक’ उनकी कुछ ऐसी ही व्यंग्यकथा है | इसे पढ़कर पाठक को लेखिका अपनी कल्पनाशीलता से चकित कर जाती है | वर्तमान प्रजातंत्र का इससे अच्छा रचनात्मक ट्रीटमेंट और क्या होगा | ‘एक थे विरोधचंद’ शीर्षक व्यंग्य कथा में लेखिका ने हरदम विरोधी मानसिकता वाले व्यक्तियों की इस प्रवृत्ति पर शानदार व्यंग्य रचा है | इसमें उन्होंने हास्य का अच्छा प्रयोग किया है- ‘वो जब पैदा हुए तो रोकर विरोध कर दिया कि माँ की कोख से क्यूँ जन्म हुआ, पिता से क्यूँ नही ? जब उनके मुँह में दूध की बोतल डाली गयी तो भी रोये थे कि दूध स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है, कोकाकोला पिलाओ |’

इस संग्रह में कुछ व्यंग्य मुझे कुछ अपूर्ण से लगे जिन्हें समय देकर और विस्तार दिया जा सकता था जैसे कि ‘चालाक कौए की सत्यकथा’ और ‘खाली थाली और उनका आभामंडल’  शीर्षक व्यंग्य | बाकी ज्यादातर व्यंग्य संतुलित शब्दसीमा के अंतर रचे गये हैं | ‘कलियुग, कालाधन और कौआ’ शीर्षक व्यंग्य में वह बड़ी सटीक व्यंग्ययोजना बनाकर जनता से किये हुए वादे तोड़ने वाली सत्ता के प्रति सवाल खड़े करती हैं- ‘यह कहा जाता है कि तीन चीज़ें जाने के बाद कभी वापस नही आतीं- मुँह से निकली हुई वाणी, कमान से निकला हुआ तीर और गुजरा हुआ वक्त | इसमें चौथी चीज़ और जोड़ सकते हैं, वो है – देश से बाहर गया हुआ कालाधन |’

आंकड़ों की बाजीगरी से विकास का भ्रम फ़ैलाने वाली सरकार पर लिखा गया अत्यंत सशक्त व्यंग्य है ‘अकड़ के साथ आकड़े दिखाओ’ शीर्षक व्यंग्य | इन्द्रजीत के पास आम बोलचाल की सरल भाषा है जिसमे विट और आयरनी के सटीक प्रयोग से भाषा का अलग ही रूप निकलकर सामने आता है | शैली भी उसी के अनुसार ढली हुई है | ‘आप सच के पुलिंदे हैं सर’ में लेखिका का आक्रोश व्यंग्य की तीव्रता को और तेज कर जाता है- ‘आप जैसे सत्यवादी पर इतना घनघोर इल्जाम ! आप तो हरिश्चंद्र के अग्रज ही नही बल्कि पूर्वज भी हैं | आप सत्य के पास भले ही न जाते हों, सत्य आपके पास दौड़ा चला आता है |’ ‘भरी गगरी छलकत जाय’ शीर्षक व्यंग्य से एक उदाहरण और दृष्टव्य है- ‘वे जागेंगें तो देखेंगें | देखेंगें तो सोचेंगें | सोचेंगें तो बोलेंगें | बोलेंगें तो शोर भी मचा सकते हैं | शोर ज्यादा डेसिबल में हो गया तो तरंगों से कुर्सी हिल सकती है अतः उनका सोना जरुरी है, समझी !’

संग्रह में कुछ व्यंग्य बड़े हल्के फुल्के विषय लगते हुए भी कहीं न कहीं गहरे अर्थ समेटे हुए हैं जैसे कि ‘आंटी की अंटी’ शीर्षक व्यंग्य | इसे पढ़ने हुए ताज्जुब नही होगा कि कहीं बाज़ार के सौन्दर्यजाल में उलझकर लेखिका ने खुद के अनुभव को ही तो शब्द नही दे दिए हैं | इन्द्रजीत व्यंग्य करते हुए किसी को नही बख्शती ‘जीवन के कोटेदार’ शीर्षक व्यंग्य में उन्होंने ऐसे दोमुंहे लोगों पर भरपूर तंज कसा है जो आपके सामने कहते कुछ हैं और आपकी पीठ पीछे करते कुछ हैं | ऐसे फर्जी उपदेशकों की अपने देश में कमी नही है | लेखिका ने अपने इस व्यंग्य में ऐसी प्रजाति के लोगों की जमकर ख़बर ली है |

इन्द्रजीत कौर अपनी कुछ और विशेषताओं के कारण मेरी प्रिय व्यंग्य लेखिकाओं में से एक हैं | उनका लेखन दिनोदिन विकसित हुआ है | संग्रह का ‘रुपये की नाव’ शीर्षक व्यंग्य पढ़कर आप चकित रह जाते हैं | क्या ही दृष्टि और समझबूझ के साथ वह कठिन लगते आर्थिक विषय का निर्वाह करती है ! फिर जो रचना बनकर तैयार होती है वह कठिन नही बल्कि पठनीय हो जाती है | मैं अपने वक्तव्यों में इसे ही व्यंग्य कला कहता हूँ | इन्द्रजीत निश्चय ही जन्मजात प्रतिभासम्पन्न व्यंग्यकार हैं और इस प्रतिभा को उन्होंने घर-परिवार-नौकरी की जिम्मेदारियों के बीच भी जाया नही होने दिया है यह बड़ी बात है | उनका यह व्यंग्य रुपये के अवमूल्यन पर एक तार्किक बहस आमंत्रित करता है | इनके यहाँ मध्यमवर्गीय परिवार की समाजार्थिक समस्याओं को बेहतर स्वर मिला है |

इसके अतिरिक्त इस संग्रह के कुछ अन्य उल्लेखनीय व्यंग्यों में ‘उठो, जागो, लफंगई करो’, ‘देश का बोनसाई पेड़’, ‘गाय, गौरैया और गंगा’, ‘आखिर बसंत मिल गया’, ‘मेरी और उनकी वर्षगांठ’, ‘मन तड़पत बहस करन को आज’, ‘हे अतिथि ! तुम कब आओगे’ आदि का नाम लिया जा सकता है जिन्हें पढ़कर हिंदी व्यंग्य की सार्थकता का एहसास होता है | यह सभी व्यंग्य अपना एक मौलिक मुहावरा गढ़ते हैं | इन्द्रजीत कौर ने इस संग्रह के बाद अपना एक लेवल सेट कर दिया है | हिंदी व्यंग्य को उनसे बड़ी अपेक्षाएं रहेंगी | इस व्यंग्य कथा संग्रह को पढ़ा और सराहा जाना चाहिए |

9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध) जिला-सीतापुर 261203 (उ.प्र.)
मो 8318773947

पंचरतंत्र की कथाएं/ व्यंग्य संग्रह/ इन्द्रजीत कौर/ रुझान पब्लिकेशन्स, जयपुर/ 2019/ पृष्ठ 148/ मूल्य 150/-

 

 

पंकज चतुर्वेदी की रचनाएँ

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अतीत का इस्तेमाल
————————-

सत्ता-पक्ष के बुद्धिजीवी
विपक्ष की आलोचना करते हैं :
आज जो देश का हाल है
वह इसी विपक्ष के
कारनामों का नतीजा है
क्योंकि पहले इनकी सरकार थी

और आज जो कुछ भी है
भ्रष्टाचार, अन्याय, हिंसा :
क्या वह पहले नहीं थी
बल्कि पहले तो अधिक ही थी

सरकार करना तो
बहुत चाहती है
पर सिस्टम इतना
बिगड़ा हुआ मिला है
कि उसे ठीक करने में
बहुत वक़्त लगेगा

इस तरह लोकतंत्र में
अतीत का इस्तेमाल
उससे कुछ सीखने के लिए नहीं
वर्तमान को सह्य बनाने के लिए
किया जाता है

………………………..

असम्मानित
————–

अपमानित करनेवाला
सोचता है
कि वह विजेता है

पर अपकृत्य वह
इसी कुंठा में करता है
कि उसका कोई
सम्मान नहीं है

…………………………….

सौन्दर्य
———

नदी गहन है करुणा से
उत्साह से गतिमान्

उसके प्रवाह का कारण
सजलता है
और इनकी संहति
उसका सौन्दर्य

………………………

न्यूज़ीलैंड में हिंदी शिक्षण: रोहित कुमार ‘हैप्पी’ संपादक, भारत-दर्शन, न्यूज़ीलैंड

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अँग्रेज़ी
और माओरी
न्यूज़ीलैंड की
आधिकारिक भाषाएं है
सामान्यतः अँग्रेज़ी का उपयोग किया जाता है न्यूज़ीलैंड
की लगभग
46
लाख की जनसंख्या में फीजी भारतीयों सहित भारतीयों की कुल संख्या
डेढ लाख से अधिक है।
  2013 की जनगणना के अनुसार हिंदी न्यूज़ीलैंड में सर्वाधिक बोले जाने वाली
भाषाओं में चौथे नम्बर पर है।
  अँग्रेज़ी
,
माओरी व सामोअन के बाद हिंदी सर्वाधिक बोले/समझे जाने वाली
भाषा है।
  2013 की जनगणना के अनुसार 66,309  लोग हिंदी का उपयोग करते हैं।

mn

न्यूज़ीलैंड जनगणना 2013 में
सर्वाधिक बोले जानी वाली शीर्षस्थ
10 भाषाएं


यूं
तो न्यूज़ीलैंड कुल
40 लाख की आबादी वाला छोटा सा देश है, फिर भी हिंदी
के मानचित्र पर अपनी पहचान रखता है। पंजाब और गुजरात के भारतीय न्यूज़ीलैंड में
बहुत पहले से बसे हुए हैं किन्तु
1990 के आसपास बहुत से लोग मुम्बई, देहली, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा
इत्यादि राज्यों से आकर यहां बस गए। फीजी से भी बहुत से भारतीय राजनैतिक तख्ता-पलट
के दौरान यहां आ बसे। न्यूज़ीलैंड में फीजी भारतीयों की अनेक रामायण मंडलियां
सक्रिय हैं। यद्यपि फीजी मूल के भारतवंशी मूल रुप से हिंदी न बोल कर हिंदुस्तानी
बोलते हैं तथापि यथासंभव अपनी भाषा का ही उपयोग करते हैं। उल्लेखनीय है कि फीजी में
गुजराती
,
मलयाली, तमिल, बांग्ला, पंजाबी और
हिंदी भाषी सभी भारतवंशी लोग हिंदी के माध्यम से ही जुडे़ हुए हैं।

न्यूजीलैंड
में मंदिर
,
मस्जिद, गुरुद्वारा, हिंदी सिनेमा, भारतीय
रेस्तरॉ
,
भारतीय
दुकानें
,
हिंदी
पत्र-पत्रिका
,
रेडियो
और टीवी सबकुछ है। यहां दीवाली का मेला भी लगता है और स्वतंत्रता-दिवस समारोह का
आयोजन भी धूमधाम से होता है। यहां बसे भारतीयों को लगता ही नहीं कि वे देश से दूर
हैं।

फीजी
में रामायण ने गिरमिटिया लोगों के संघर्ष के दिनों में हिंदी और भारतीय संस्कृति
को बचाए रखने में महान भूमिका निभाई है। इसीलिए ये लोग तुलसीदास को श्रद्धा से स्मरण
करते हैं। तुलसी कृत रामायण यहां के भारतवंशियों के लिए सबसे प्रेरक ग्रंथ है।
जन्म-मरण
,
तीज-त्योहार
सब में रामायण की अहम् भूमिका रहती है। फीजी के मूल निवासी भी भारतीय संस्कृति से
प्रभावित हैं। भारतीय त्योहारों में फीजी के मूल निवासी भी भारतीयों के साथ मिलकर
इनमें भाग लेते हैं। बहुत से मूल निवासी अपनी काईबीती भाषा के साथ-साथ हिंदी भी
समझते और बोलते हैं। न्यूज़ीलैंड में बसे फीजी मूल के भारतवंशी यहां भी अपनी भाषा
व संस्कृति से जुड़े हुए हैं।
 
न्यूज़ीलैंड
में
1996
में
हिंदी पत्रिका भारत-दर्शन के प्रयास से एक वेब आधारित
हिंदी-टीचरका आरम्भ
किया गया। यह प्रयास पूर्णतया निजी था। इस प्रोजेक्ट को विश्व-स्तर पर सराहना मिली
लेकिन कोई ठोस साथ नहीं मिला। पत्रिका का अपने स्तर पर हिंदी प्रसार-प्रचार जारी
रहा। भारत-दर्शन इंटरनेट पर विश्व की पहली हिंदी साहित्यिक पत्रिका थी।

आज
न्यूज़ीलैंड में हिंदी पत्र-पत्रिका के अतिरिक्त हिंदी रेडियो और टीवी भी है
जिनमें
रेडियो तरानाऔर अपना एफ एमअग्रणी हैं। हिंदी
रेडियो और टी वी अधिकतर मनोरंजन के क्षेत्र तक ही सीमित है किंतु मनोरंजन के इन
माध्यमों को
 आवश्यकतानुसार
हिंदी अध्यापन का एक सशक्त माध्यम बनाया जा सकता है। न्यूज़ीलैंड में हर सप्ताह
कोई न कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम होता है। हर सप्ताह हिंदी फिल्में प्रदर्शित होती
हैं।
1998
में
भारत-दर्शन द्वारा आयोजित दीवाली आज न्यूज़ीलैंड की संसद में मनाई जाती है और इसके
अतिरिक्त ऑकलैंड व वेलिंग्टन में सार्वजनिक रुप से स्थानीय-सरकारों द्वारा दीवाली
मेले आयोजित किए जाते हैं।

औपचारिक
रुप से हिन्दी शिक्षण की कोई विशेष व्यवस्था न्यूज़ीलैंड में नहीं है लेकिन पिछले
कुछ वर्षों से ऑकलैंड विश्वविद्यालय में
आरम्भिकमध्यमस्तर की
हिन्दी

कंटिन्यूइंग
एजुकेशन

के
अंतर्गत पढ़ाई जा रही है ।

ऑकलैंड
का भारतीय हिंदू मंदिर भी पिछले कुछ वर्षों से आरम्भिक हिंदी शिक्षण उपलब्ध करवाने
में सेवारत है। कुछ अन्य संस्थाएं भी अपने तौर पर हिंदी सेवा में लगी हुई हैं।
हिंदी के इस अध्ययन-अध्यापन का कोई स्तरीय मानक नहीं है। स्वैच्छिक हिंदी अध्यापन
में जुटे हुए भारतीय मूल के लोगों में व्यावसायिक स्तर के शिक्षकों का अधिकतर अभाव
रहा है।

हिन्दी
पठन-पाठन का स्तर व माध्यम अव्यावसायिक और स्वैच्छिक रहा है।
  कुछ संस्थाओं द्वारा अपने स्तर पर हिंदी पढ़ाई
जाती है। पिछले कई वर्षों से वेलिंग्टन हिंदी स्कूल में भी आंशिक रुप से हिंदी
पढ़ाई जा रही है
  जिसके लिए
सुश्री सुनीता नारायण की हिंदी सेवा सराहनीय है। वेलिंग्टन के हिंदी स्कूल की
सुनीता नारायण
1995
से
हिंदी पढ़ा रही हैं।  भारत-दर्शन का ऑनलाइन
हिंदी टीचर
1996
से
उपलब्ध है। वायटाकरे हिंदी स्कूल हैंडरसन में हिंदी कक्षाओं के माध्यम से हिंदी का
प्रचार कर रहा है व सुश्री रूपा सचदेव अपने स्तर पर हिंदी पढ़ाती हैं। महात्मा
गांधी सेंटर में भी हिंदी पढ़ाई जाती है। प्रवीना प्रसाद हिंदी लैंगुएज एंड कल्चर
में हिंदी की कक्षाएं लेती हैं। पापाटोएटोए हाई स्कूल एकमात्र मुख्यधारा का ऐसा
स्कूल है जहाँ हिंदी पढ़ाई जाती है
, यहाँ सुश्री अनीता बिदेसी हिंदी का
अध्यापन करती हैं। । इसके अतिरिक्त सुश्री सुशीला शर्मा भी कई वर्ष तक ऑकलैंड
यूनिवर्सिटी की कंटिन्यूइंग एजुकेशन में हिंदी पढ़ाती रही हैं। स्व० एम सी विनोद
ने बहुत पहले ऑकलैंड में हिंदी शिक्षण की व्यवस्था की थी लेकिन समुचित सहयोग न
मिलने के कारण कक्षाएं बंद करनी पड़ी थी। न्यूज़ीलैंड में हिंदी पत्रकारिता में भी
उनका योगदान भुलाया नहीं जा सकता।
1998 में भारत-दर्शन द्वारा आयोजित दीवाली
आज न्यूज़ीलैंड की संसद में मनाई जाती है और इसके अतिरिक्त ऑकलैंड व वेलिंग्टन में
सार्वजनिक रुप से स्थानीय-सरकारों द्वारा दीवाली मेले आयोजित किए जाते हैं।

पिछले
कुछ वर्षों से काफी गैर-भारतीय भी हिंदी में रुचि दिखाने लगे हैं। विदेशों में
हिंदी को बढ़ावा देने के लिए पाठ्यक्रम को स्तरीय व रोचक बनाने की आवश्यकता है।

विदेशों
में हिन्दी पढ़ाने हेतु उच्च-स्तरीय कक्षाओं के लिए अच्छे पाठ विकसित करने की
आवश्यकता है। यह पाठ स्थानीय परिवेश में
, स्थानीय रुचि वाले
होने चाहिए। हिंदी में संसाधनों का अभाव हिन्दी जगत के लिए विचारणीय बात है!

अच्छे
स्तरीय पाठ तैयार करना
, सृजनात्मक/रचनात्मक अध्यापन प्रणालियां
विकसित करना
,
पठन-पाठन
की नई पद्धतियां और पढ़ाने के नए वैज्ञानिक तरीके खोजना जैसी बातें विदेशों में
हिन्दी के विकास के लिए एक चुनौती है।

भारत
की पाठ्य-पुस्तकों को विदेशों के हिंदी अध्यापक अपर्याप्त महसूस करते हैं क्योंकि
पाठ्य-पुस्तकों में स्थानीय जीवन से संबंधित सामग्री का अभाव अखरता है। विदेशों
में हिंदी अध्यापन का बीड़ा उठाने वाले लोगों को भारत में व्यावहारिक प्रशिक्षण
दिए जाने जैसी सक्षम योजनाओं का भी अभाव है। स्थानीय विश्वविद्यालयों के साथ भी
सहयोग की आवश्यकता है। इस दिशा में भारतीय उच्चायोग एवं भारतीय विदेश मंत्रालय
विशेष भूमिका निभा सकते हैं। जिस प्रकार ब्रिटिश काउंसिल अंग्रेजी भाषा को बढ़ावा
देने के लिए काम करता है
, उसी तरह हिंदी भाषा व भारतीय संस्कृति
को बढ़ावा देने के लिए क़दम उठाए जा सकते हैं।

विदेशों
में सक्रिय भारतीय मीडिया भी इस संदर्भ में बी
.बी.सी व वॉयस ऑव
अमेरिका से सीख लेकर
, उन्हीं की तरह हिंदी के पाठ विकसित करके
उन्हें अपनी वेब साइट व प्रसारण में जोड़ सकता है। बी बी सी और वॉयस ऑव अमेरिका
अंग्रेजी के पाठ अपनी वेब साइट पर उपलब्ध करवाने के अतिरिक्त इनका प्रसारण भी करते
हैं।
 इसके साथ ही
सभी हिंदी विद्वान/विदुषियों
, शिक्षक-प्रशिक्षकों को चाहिए कि वे आगे
आयें और हिंदी के लिए काम करने वालों की केवल आलोचना करके या त्रुटियां निकालकर ही
अपनी भूमिका पूर्ण न समझें बल्कि हिंदी प्रचार में काम करनेवालों को अपना
सकारात्मक योगदान भी दें। हिंदी को केवल भाषणबाज और नारेबाज़ी की नहीं सिपाहियों की
आवश्यकता है।

लेखक इंटरनेट पर विश्व की सबसे
पहली हिंदी साहित्यिक पत्रिका
, ‘भारत-दर्शनके
संपादक
हैं।

रोहित कुमार हैप्पी
संपादकभारत-दर्शन
2/156, Universal Drive
Henderson, Waitakere
Auckland, New Zealand
Ph: 0064 9 8377052
Fax: 0064 9 837 8532
E-mail: 
editor@bharatdarshan.co.nz

न्यूज़ीलैंड की हिंदी पत्रकारिता- रोहित कुमार ‘हैप्पी’

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न्यूज़ीलैंड की हिंदी पत्रकारिता

रोहित कुमार ‘हैप्पी’
संपादक, भारत-दर्शन, न्यूज़ीलैंड

न्यूज़ीलैंड की लगभग 46 लाख की जनसंख्या में फीजी भारतीयों सहित भारतीयों की कुल संख्या डेढ लाख से अधिक है। 2013 की जनगणना के अनुसार हिंदी न्यूज़ीलैंड में सर्वाधिक बोले जाने वाली भाषाओं में चौथे नम्बर पर है। 
यूँ तो न्यूजीलैंड में अनेक पत्र-पत्रिकाएँ समय-समय पर प्रकाशित होती रही हैं सबसे पहला प्रकाशित पत्र था ‘आर्योदय’ जिसके संपादक थे श्री जे के नातली, उप संपादक थे श्री पी वी पटेल व प्रकाशक थे श्री रणछोड़ क़े पटेल। भारतीयों का यह पहला पत्र 1921 में प्रकाशित हुआ था परन्तु यह जल्दी ही बंद हो गया।
एक बार फिर 1935 में ‘उदय’ नामक पत्रिका श्री प्रभु पटेल के संपादन में आरम्भ हुई जिसका सह-संपादन किया था कुशल मधु ने। पहले पत्र की भांति इस पत्रिका को भी भारतीय समाज का अधिक सहयोग नहीं मिला और पत्रिका को बंद कर देना पड़ा।
उपरोक्त दो प्रकाशनों के पश्चात लम्बे अंतराल तक किसी पत्र-पत्रिका का प्रकाशन नहीं हुआ। 90 के दशक में पुनः संदेश नामक पत्र प्रकाशित हुआ व कुछ अंकों के प्रकाशन के बाद बंद हो गया। इसके बाद द इंडियन टाइम्स, इंडियन पोस्ट, पेस्फिक स्टार, ईस्टएंडर और द फीजी-इंडिया एक्सप्रैस का प्रकाशन हुआ किन्तु एक के बाद एक बंद हो गए।
90 के दशक में आई इन पत्र-पत्रिकाओं में से अधिकतर बंद हो गई। न्यूजीलैंड की भारतीय पत्रकारिता में हिन्दी का अध्याय 1996 में ‘भारत-दर्शन’ पत्रिका के प्रकाशन से आरम्भ हुआ। 1921 से 90 के दशक का न्यूजीलैंड भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का गहन अध्ययन करने के पश्चात पुनः एक हिन्दी लेखक व पत्रकार ने ‘भारत-दर्शन’ पत्रिका के प्रकाशन व संपादन का बीड़ा उठाया। न्यूजीलैंड भारतीय पत्रकारिता में हिन्दी प्रकाशन का अध्याय यद्यपि ‘द इंडियन टाइम्स’ में 1992 में हस्तलिखित हिन्दी रिर्पोटों के प्रकाशन से आरम्भ होता है तथापि वास्तविक हिन्दी प्रकाशन का श्रेय ‘भारत-दर्शन’ पत्रिका को जाता है चूंकि यही पत्रिका पूर्ण रूप से न्यूजीलैंड का पहला हिन्दी प्रकाशन है।
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1996 में प्रकाशित भारत-दर्शन का पहला अँक
हिन्दी भाषा का प्रेम व भारतीय समाज की आवश्यकताओं हेतु यह नन्हीं सी यह पत्रिका निरंतर प्रयासरत रहती है। बिना किसी सरकारी या गैर-सरकारी आर्थिक सहायता के पत्रिका का प्रकाशन यदि असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है लेकिन हिन्दी प्रेमियों का स्नेह हर दिन नई उर्जा उत्पन्न करता रहा है।
1996-97 में ‘भारत-दर्शन’ का इंटरनेट संस्करण उपलब्ध करवाया गया, इसके साथ ही पत्रिका को ‘इंटरनेट पर विश्व की पहली हिन्दी साहित्यिक पत्रिका’ होने का गौरव प्राप्त हुआ और विश्वभर में फैले भारतीयों ने ‘भारत-दर्शन’ की हिन्दी सेवा की सराहना की। 1997 में पहली बार सभी भारतीयों को ‘भारतीय स्वतंत्रता दिवस के स्वर्ण जयंती समारोह’ में इसी पत्रिका ने एक मंच प्रदान किया।
‘इंटरनेट पर आधारित हिन्दी-टीचर’ विकसित करके भारत-दर्शन ने हिन्दी जगत में एक नया अध्याय जोड़ा। हमारे लिए बडे़ गर्व कि बात है कि आज भारत-दर्शन विश्व के अग्रणी हिन्दी अन्तरजालों ( इंटरनेट साइट ) में से एक है।
पहली बार न्यूजीलैंड में ‘दीवाली मेले’ का आयोजन 1998 में महात्मा गांधी सेंटर में ‘भारत-दर्शन’ व एक गैर-भारतीय न्यूजीलैंडर के सह-आयोजन से आरम्भ हुआ जो बाद में इतना प्रसिद्व हुआ कि ऑकलैंड सिटी कौंसिल ने इसके प्रबंधन की जिम्मेवारी स्वयं उठा ली। ‘भारत-दर्शन’ के इस मेले के आयोजन का ध्येय हिन्दी व अन्य भाषाओं का प्रचार करना भी था।
हिन्दी का प्रचार-प्रसार करने में कुछ अन्य संस्थाओं में हिन्दी रेडियो तराना, अपना एफ एम, प्लैनेट एफ एम ( पूर्व में एक्सेस कम्युनिटी रेडियो ) और ट्रायंगल टी वी का योगदान भी सराहनीय रहा है।
विश्व हिन्दी मानचित्र पर न्यूजीलैंड का नाम ‘भारत-दर्शन’ ने अंकित किया है। भारत-दर्शन इस समय हिंदी की सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली ऑनलाइन पत्रिका है।

न्यू मीडिया में हिंदी साहित्य की उभरती प्रवृत्तियाँ: शैलेश

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न्यू मीडिया में हिंदी साहित्य की उभरती प्रवृत्तियाँ

– शैलेश 
हिंदी अधिकारी, सिक्किम विश्वविद्यालय, गंगटोक, सिक्किम एवं 
पीएचडी शोध छात्र, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग
महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक, हरियाणा 

विषय परिचय

आज की पीढ़ी सूचना-विस्फोट के युग में जी रही है. और आज का हिंदी साहित्यकार यदि स्वयं को इस सूचना क्रांति से अलग रखता है तो वह स्वयं अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारता है. जो साहित्यकार – लेखक, कवि, कहानीकार, नाटककार आदि इस सूचना तकनीक का लाभ उठाते हुए इसके माध्यम से अपने द्वारा रचित साहित्य को अभिव्यक्त कर रहे हैं वे निश्चित रूप से ऐसा न करने वालों के तुलना में अधिक पाठकों तक पहुँच रहे हैं. इस सूचना क्रांति का प्रयोग व्यक्तिगत और संस्थागत, दोनों ही स्तरों पर, एक हथियार के तौर पर किया जा रहा है जो कि इस जीवन-समर के लिए लगभग अनिवार्य हो चला है. 
सूचना विस्फोट के साथ ही वर्तमान युग सूचना-आक्रमण, सूचना-आघात और सूचना-प्रतिघात का भी है. अब मात्र सूचना जैसे हथियार से बड़ी-से-बड़ी लड़ाई और बड़े-से-बड़ा युद्ध लड़ा जा सकता है. आज के साहित्यकार, साहित्य एवं पत्रकारिता के छात्र और पेशेवर सूचना नाम के इस नए हथियार का प्रयोग जितनी कुशलता से सीखेंगे उतनी ही अधिक सफलता वे पा सकते हैं. हालाँकि, वो और बात है कि इस हथियार को वे मिशनरी साहित्य एवं मिशनरी पत्रकारिता के आदर्श स्थापित करने के लिए एक आदर्श सेनापति बनकर चलाएँ या घी में डूबी रोटी और मनमाफिक-मोटी-बोटी सुनिश्चित करने के लिए लाभ-केन्द्रित व्यावसायिक मीडिया समूहों की सूचना-सेना के प्यादे मात्र बनकर या फिर राजनैतिक-आर्थिक स्वार्थ साधने लिए किसी व्यक्ति या पार्टी विशेष के भोंपू बनकर. 
वर्तमान युग में सूचना नामक इस हथियार से तेजी से लक्ष्य भेदने के लिए तीव्र- मिसाइल का काम किया है इन्टरनेट आधारित न्यू मीडिया ने. इस न्यू मीडिया ने जहाँ एक ओर सूचना को तेज रफ़्तार से पहुँचाना संभव किया वहीँ यह भी सुनिश्चित किया है कि सूचना के इस हथियार का प्रयोग अधिकाधिक लोग कर सकें. अब सूचना कुछ गिने-चुने सम्पन्न लोगों के इशारे पर चलने वाला प्यादा नहीं रहा. सूचना का जोरदार तरीके से लोकतंत्रीकरण हो रहा है और सूचना अब उन्मुक्त रूप से विचरण कर रही है. सूचना की इस उन्मुक्तता को इस स्तर तक संभव बनाया है ‘न्यू मीडिया’ ने. 
न्यू मीडिया क्या है?
“न्यू मीडिया क्या है?” इस सवाल का जवाब जानने के लिए जब न्यू मीडिया को ही खंगाला गया तो हिदी में इस सवाल के जवाब में न्यू मीडिया के गूगल गुरु की खोज में 26,20,000 (छब्बीस लाख बीस हजार) परिणाम प्राप्त हुए. यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि यही प्रश्न जब गूगल खोज में अंग्रेजी भाषा में (What is New Media) पूछा गया तो 1,61,00,00,000 (एक अरब इकसठ करोड़) परिणाम प्राप्त हुए. गौरतलब है कि हिंदी के मुकाबले अंग्रेजी में प्राप्त होने वाले परिणाम 614 गुना ज्यादा हैं. कारण बिलकुल स्पष्ट है कि फ़िलहाल इस न्यू मीडिया जगत में अंग्रेजी का वर्चस्व कायम है. हालाँकि, न्यू मीडिया का प्रयोग करने वाले उपकरण बनाने वाली कम्पनियां अब अपने उपकरणों में अधिक-से-अधिक भाषाओँ में उपयोग करने की सुविधा दे रही हैं. खैर यह एक अलग विषय है.
न्यू मीडिया का एक बहुत ही महत्वपूर्ण मंच और अब तक के मानव इतिहास का सबसे बड़ा, सबसे ज्यादा लोगों द्वारा तैयार किया गया, सबसे अधिक भाषाओँ में उपलब्ध, और सब से अधिक पढ़ा जाने वाला इनसाइक्लोपीडिया – ‘विकीपीडिया’ हिंदी खोज में पहले नंबर पर और अंग्रेजी में दूसरे नम्बर पर रहा. अंग्रेजी में (What is New Media) खोजने पर परिणामों में पहले नंबर पर www.newmedia.org का लिंक www.newmedia.org/what-is-new-media.html रहा. वो और बात है कि न्यू मीडिया का परिभाषा के लिए इस वेबसाईट को भी विकिपीडिया की शरण में जाना पड़ता है. 
विकिपीडिया (हिंदी) के अनुसार “इंटरनेट के प्रचार-प्रसार और निरंतर तकनीकी विकास ने एक ऐसी वेब मीडिया को जन्म दिया, जहाँ अभिव्यक्ति के पाठ्य, दृश्य, श्रव्य एवं दृश्य-श्रव्य सभी रूपों का एक साथ क्षणमात्र में प्रसारण संभव हुआ। यह वेब मीडिया ही ‘न्यू मीडिया’ है, जो एक कंपोजिट मीडिया है, जहाँ संपूर्ण और तत्काल अभिव्यक्ति संभव है, जहाँ एक शीर्षक अथवा विषय पर उपलब्ध सभी अभिव्यक्‍तियों की एक साथ जानकारी प्राप्त करना संभव है, जहाँ किसी अभिव्यक्ति पर तत्काल प्रतिक्रिया देना ही संभव नहीं, बल्कि उस अभिव्यक्ति को उस पर प्राप्त सभी प्रतिक्रियाओं के साथ एक जगह साथ-साथ देख पाना भी संभव है। इतना ही नहीं, यह मीडिया लोकतंत्र में नागरिकों के वोट के अधिकार के समान ही हरेक व्यक्ति की भागीदारी के लिए हर क्षण उपलब्ध और खुली हुई है। (न्‍यू मीडिया ‘कंपोजिट मीडिया’ है : देवेन्‍द्र कुमार देवेश(
पत्रकारिताजगत.वर्डप्रेस.कॉम के अनुसार वेब मीडिया ही ‘न्यू मीडिया’ है, जो एक कंपोजिट मीडिया है, जहाँ संपूर्ण और तत्काल अभिव्यक्ति संभव है, जहाँ एक शीर्षक अथवा विषय पर उपलब्ध सभी अभिव्यक्यिों की एक साथ जानकारी प्राप्त करना संभव है, जहाँ किसी अभिव्यक्ति पर तत्काल प्रतिक्रिया देना ही संभव नहीं, बल्कि उस अभिव्यक्ति को उस पर प्राप्त सभी प्रतिक्रियाओं के साथ एक जगह साथ-साथ देख पाना भी संभव है। इतना ही नहीं, यह मीडिया लोकतंत्र में नागरिकों के वोट के अधिकार के समान ही हरेक व्यक्ति की भागीदारी के लिए हर क्षण उपलब्ध और खुली हुई है।
‘न्यू मीडिया’ पर अपनी अभिव्यक्ति के प्रकाशन-प्रसारण के अनेक रूप हैं। कोई अपनी स्वतंत्र ‘वेबसाइट’ निर्मित कर वेब मीडिया पर अपना एक निश्चित पता आौर स्थान निर्धारित कर अपनी अभिव्यक्तियों को प्रकाशित-प्रसारित कर सकता है। अन्यथा बहुत-सी ऐसी वेबसाइटें उपलब्ध हैं, जहाँ कोई भी अपने लिए पता और स्थान आरक्षित कर सकता है। अपने निर्धारित पते के माध्यम से कोई भी इन वेबसाइटों पर अपने लिए उपलब्ध स्थान का उपयोग करते हुए अपनी सूचनात्मक, रचनात्मक, कलात्मक अभिव्यक्ति के पाठ्य अथवा ऑडियो/वीडियो डिजिटल रूप को अपलोड कर सकता है, जो तत्क्षण दुनिया में कहीं भी देखे-सुने जाने के लिए उपलब्ध हो जाती है।
विकिपीडिया (अंग्रेजी) पर न्यू मीडिया (New Media) के बारे में दी गई जानकारी के अनुसार “न्यू मीडिया सामान्यत: वह सामग्री है जो इन्टरनेट के माध्यम से जब चाहो तब उपलब्ध हो जाती है, जिस तक किसी भी डिजिटल उपकरण के माध्यम से पहुंचा जा सकता है, और इसमें आमतौर पर प्रयोक्ता की ओर से अंतर्क्रियात्मक फीडबैक और सृजनात्मक भागीदारी होगी है. न्यू मीडिया के आम उदाहरणों में ऑनलाइन समाचार पत्र, ब्लॉग, विकी, विडियो गेम, कंप्यूटर मल्टीमीडिया, सीडी रोम, डीवीडी और सोशल मीडिया जैसी वेब साईट शामिल हैं. न्यू मीडिया की एक खास विशेषता संवाद है. न्यू मीडिया संपर्कों और वार्तालाप के माध्यम से सामग्री प्रसारित करता है. यह विश्व भर के लोगों को विभिन्न विषयों पर विचारों को साझा करने, उन पर टिपण्णी करने और चर्चा करने में सक्षम बनाता है. पुरानी तकनीको से बिलकुल अलग, न्यू मीडिया अंतर्क्रियात्मक समुदाय पर आधारित है.”
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि न्यू मीडिया वह संवादात्मक डिजिटल मीडिया है जिसे इन्टरनेट का प्रयोग करते हुए कंप्यूटर और मोबाइल जैसे डिजिटल उपकरणों के माध्यम से प्रयोग में लाया जाता है. इसके प्रयोक्ता को सामग्री का सृजन करने, सुधार करने, चयन करने, प्रतिक्रिया करने की सुविधा होती है. 
न्यू मीडिया में हिंदी साहित्य 
इन्टरनेट पर विश्व की सबसे पहली हिंदी साहित्यिक पत्रिका –‘भारत-दर्शन’ न्यूजीलैंड से रोहित कुमार (हैप्पी) ने शुरू की. दैनिक जागरण ने न्यू मीडिया पर अपने आरम्भिक दौर में साहित्य के अंतर्गत कुछ समय तक भारत-दर्शन की कड़ी (लिंक) जोड़े रखी थी. यह बड़ा रोचक विषय है कि हिंदी वेब साहित्यिक-पत्रकारिता विदेश से आरंभ हुई और इसको आगे बढ़ाने वाली अन्य मुख्य पत्र-पत्रिकाएँ भी विदेश की धरती से ही वेब पर आईं. भारत-दर्शन के बाद बोलो जी (अमरीका) तदोपरांत अनुभूति अभिव्यक्ति (शारजहा) का प्रकाशन आरंभ हुआ.
आज का सहित्यकार इन्टरनेट पर मौजूद न्यू मीडिया के विभिन्न मंचों – पॉडकास्ट, आर एस एस फीड, सोशल नेटवर्क फेसबुक, वाट्सऐप, इन्स्टाग्राम, माई स्पेस, ट्वीटर, ब्लाग्स, विक्किस, इत्यादि का प्रयोग करते हुए अपनी रचना को विश्व भर में फैले अपने पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों तक पहुंचा सकता है. अभिव्यक्ति के इतने अधिक प्रारूप समकालीन साहित्यकार के पास मौजूद हैं कि बिलकुल नया साहित्यकार भी अपने द्वारा रचित साहित्य को यदि अभिव्यक्ति के इन विभिन्न प्रारूपों में व्यक्त करे तो उसकी पहुँच एक पारंपरिक साहित्यकार की तुलना में कहीं अधिक हो सकती है. 
न्यू मीडिया में समकालीन हिंदी साहित्य की पहुँच विश्व के हर उस हिस्से तक हो गई है जहाँ पर इन्टरनेट के माध्यम से हिंदी साहित्य का सृजनकर्ता साहित्यकार या पाठक मौजूद है. और यही कारण है कि समकालीन हिंदी साहित्य विश्व के तमाम देशों से लिखा जा रहा है और तमाम देशो में पढ़ा जा रहा है. और यकीनन आप सब इस बात से सहमत होंगे कि समकालीन हिंदी साहित्य की इतनी व्यापक पहुँच बनाने में न्यू मीडिया एक खासी भूमिका निभा रहा है.
गूगल पर हिंदी साहित्य खोजने पर 3,95,000 ( तीन लाख पिचानवे हजार) परिणाम प्राप्त होते हैं. हिंदी कविता खोजने पर 5,23,000 (पांच लाख तेईस हजार), हिंदी गीत खोजने पर 4,90,000 (चार लाख नब्बे हजार), हिंदी ग़ज़ल खोजने पर 1,37,000 (एक लाख सैंतीस हजार), हिंदी कहानी खोजने पर 5,61,000 (पांच लाख इकसठ हजार), हिंदी उपन्यास खोजने पर 8,650 (आठ हजार छ: सौ पचास), हिंदी नाटक खोजने पर 10,20,000 (दस लाख बीस हजार), हिंदी व्यंग्य खोजने पर 4,66,000 (चार लाख छियासठ हजार) परिणाम प्राप्त होते हैं. हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं से सम्बंधित पेजों की ये संख्याएं न्यू मीडिया के माध्यम से हिंदी साहित्य की वैश्विक पहुँच को दर्शाती हैं. ये संख्याएं तब और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं जब हम हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं की पुस्तकों और पत्रिकाओं की प्रकाशित होने वाली प्रतियों की संख्या से इसकी तुलना करते हैं.
हिंदी साहित्य आधारित वेबसाइट्स 
समकालीन हिंदी साहित्य साहित्य का प्रचार प्रसार करने और विश्वभर में उसकी पहुँच बनाने में हिंदी साहित्य से सम्बंधित वेबसाईट महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहीं हैं. साहित्यकार को पाठकों तक और पाठकों को साहित्यकारों तक, पाठकों को पाठकों तथा साहित्यकारों को साहित्यकारों तक पहुँचाने का काम यही वेबसाईट कर रहीं हैं. हिंदीइन्टरनेट.कॉम (http://www.hindiinternet.com/2008/08/blog-post_4275.html) के मुताबिक हिंदी साहित्य की प्रमुख वेबसाइट्स निम्नलिखित हैं 
1. अभिव्यक्ति, एक पत्रिका – http://www.abhivyakti-hindi.org
2. हिन्दी नेस्ट – http://www.hindinest.com/index.htm
3. भारत दर्शन – http://www.bharatdarshan.co.nz/
4. यह भी खूब रही – http://pryas.wordpress.com
5. उद्गम – http://www.udgam.com/
6. वर्चुअल हिन्दी – http://www.nyu.edu/gsas/dept/mideast/hindi/
7. मल्हार – http://www-personal.umich.edu/~pehook/mindex.html
8. बच्चों की कहानियाँ – http://www.4to40.com/folktales/default.asp?article=folktales_index
9. साहित्य कुञ्ज – http://www.sahityakunj.net
10. तद्भव पत्रिका – http://www.tadbhav.com
11. पिटारा – बच्चों का कहानियाँ – http://www.pitara.com/talespin/story_hindi.asp
बच्चों की कहानियों का संग्रह।
12. उज्ज्वल भट्टाचार्य – http://www.geocities.com/ujjwalkr/
13. हिन्दी की सभी साहित्यिक विधाओं की रचना स्थल-http://www.srijangatha.com
14. कलायन पत्रिका – http://www.kalayan.org
15. सी डॅक चल पुस्तकालय – http://mobilelibrary.cdacnoida.com/indexHindi.html
16. हिन्दी इलेक्ट्रौनिक साहित्य मैगज़ीन – http://www.hindielm.co.uk
17. साहित्य अमृत – http://indianabooks.com/sahityaamrit/book.html
18. अन्यथा – http://www.anyatha.com
19. कफ़न – http://www-personal.umich.edu/~pehook/kafan.html
20. कविताएँ और उपन्यास – http://www.childplanet.com/hindi/index.html
21. हिन्दीसेवा.कॉम – http://www.hindisewa.com/
22. ताप्तिलोक – http://taptilok.com
23. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और उनकी पत्रकारिता – http://sampadakmahoday.blogspot.com/
24. हिन्दी साहित्य – http://krishnashankar.wordpress.com/
25. याहू गुट : हिन्दी फ़ोरम – http://groups.yahoo.com/group/hindi-forum/
26. साहित्य संग्रह – http://www.iiit.net/ltrc/script_html/
27. भगवद्गीता – http://www.geocities.com/simplypari_m/
28. अट्टहास – http://www.avadh.com/atthas/index.htm
29. ललित निबंधों का संग्रह स्थल – http://jayprakashmanas.info
30. वेबदुनिया साहित्य – http://www.webdunia.com/literature/
31. सुकीर्ति शेखर – http://sukirti-shekhar.blogspot.com
32. शून्य – http://hindionlinenovel.blogspot.com
33. छाया – http://www.angelfire.com/poetry/chaya/ 
34. याहू गुट : विश्वभाषा – http://groups.yahoo.com/group/vishwabhasha/
इनके अतिरिक्त भी तमाम ऐसी वेबसाइट्स हैं जो इस सूची में नहीं हैं. इन वेबसाइट्स के साथ-साथ फेसबुक जैसी सोशल मीडिया वेबसाईट पर हिंदी साहित्य लिखने-पढ़ने वालों के छोटे-बड़े सैकड़ों की संख्या में समूह हैं. इनमे से प्रमुख हैं – साहित्यकार संसद, हिंदी साहित्य, साहित्यशिल्पी, साहित्यिक मधुशाला – हाइकु कार्यशाला, साहित्य सृजन, नवोदित साहित्यकार मंच, साहित्य नभ, साहित्य सलिला आदि. फेसबुक के इन समूहों में सदस्यों की संख्या एक हजार से चौदह हजार तक है.
व्हाट्सऐप पर भी साहित्यिक समूह सैकड़ों-हजारों की संख्या में हैं. पर इस विषय में विश्वसनीय रूप से कुछ भी कहना इस लिए मुश्किल है कि हम व्हाट्सऐप के केवल उसी समूह के बारे में जान सकते हैं जिसके हम सदस्य हैं. भले ही वो हमने स्वयं बनाया हो अथवा किसी साथी ने समूह बनाकर हमें उसमे शामिल किया हो. भले ही व्हाट्सऐप के साहित्यिक समूहों की संख्या और उनके नामों की सूचि बनाना संभव नहीं है लेकिन फिर भी हमें यह तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि व्हाट्सऐप के माध्यम से सैकड़ों-हजारों साहित्यकार और उनके पाठक आपस में जुड़े हुए हैं और अपनी रचनाओं को साझा कर रहे हैं.
वेबसाइट्स और सोशल मीडिया पर समूहों की संख्या और उनके सदस्यों की संख्या से ही इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि न्यू मीडिया के माध्यम से समकालीन साहित्य की पहुँच का कितना अधिक विस्तार हो रहा है.
न्यू मीडिया में समकालीन साहित्य की उभरती प्रवृत्तियाँ 
देशकाल.कॉम पर संजय द्विवेदी लिखते हैं, “नई तकनीक ने साहित्य का कवरेज एरिया तो बढ़ा ही दिया ही साथ ही साहित्य के अलावा ज्ञान-विज्ञान के तमाम अनुशासनों के प्रति हमारी पहुंच का विस्तार भी किया है। दुनिया की तमाम भाषाओं में रचे जा रहे साहित्य और साहित्यकारों से अब हमारा रिश्ता और संपर्क भी आसान बना दिया है। भारत जैसे महादेश में आज भी श्रेष्ठ साहित्य सिर्फ महानगरों तक ही रह जाता है। छोटे शहरों तक तो साहित्य की लोकप्रिय पत्रिकाओं की भी पहुंच नहीं है। ऐसे में एक क्लिक पर हमें साहित्य और सूचना की एक वैश्विवक दुनिया की उपलब्धता क्या आश्चर्य नहीं है। हमारे सामने हिंदी को एक वैश्विक भाषा के रूप में स्थापित करने की चुनौती शेष है।“ 
न्यू मीडिया एक नया माध्यम है. इसे प्रयोग करने वाले भी अधिकांशत: नई पीढ़ी के नए लोग या फिर फिर पुरानी पीढ़ी के नई सोंच वाले लोग हैं. इसके माध्यम से मिलने वाले अभिव्यक्ति के मंच – वेबसाईट, ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर आदि भी नए हैं. तो इस नए माध्यम ‘न्यू मीडिया’ के द्वारा उपलब्ध करवाए गए नए मंचो पर अधिकांशत: नए प्रयोक्ताओं द्वारा जिस साहित्य का सृजन, पठन, श्रवण और दर्शन हो रहा है उसमे उभरने वाली अधिकांश प्रवृत्तियाँ भी निसंदेह नई ही हैं फिर चाहे वो कथ्य के स्तर पर हो या फिर शिल्प के स्तर पर, भाषा के स्तर पर हो या फिर पहुँच के स्तर पर. न्यू मीडिया में समकालीन साहित्य में उभरती हुई कुछ मुख्य प्रवृत्तियाँ निम्नलिखित हैं :-
1. प्रकाशक/संपादक पर निर्भरता से मुक्ति : न्यू मीडिया का प्रयोक्ता साहित्यकार आज जब चाहे, जैसे चाहे, जिस भाषा में चाहे अपनी रचना का प्रकाशन कर सकता है. उसे किसी संपादक के आगे दीन-हीन बनने या निवेदन करने की आवश्यकता नहीं है. न्यू मीडिया की इस प्रवृत्ति ने सैकड़ों-हजारों युवा लेखकों, कवियों, पत्रकारों को मंच प्रदान किया है. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के समय में यदि न्यू मीडिया होता या ‘निराला’ आज के समय में होते तो उन्हें अपनी कविता ‘जूही की कली’ को सरस्वती के संपादक द्वारा प्रकाशन योग्य न समझ के लौटा दिए जाने का दुःख यकीनन न होता. और न ही केदार नाथ सिंह को अपनी कविता ‘पांडुलिपियाँ’ में नए कवि की अप्रकाशित कविता की वेदना लिखनी पड़ती.
2. नितांत नए विषयों पर रचनाओं की स्वतंत्रता : न्यू मीडिया का प्रयोक्ता साहित्यकार अपनी रचना के लिए विषय चुनने को लेकर जितना स्वतंत्र आज है निश्चित रूप से वह इतना स्वतंत्र कभी नहीं था. अभिव्यक्ति में खतरे तो बाद की बात है पहले तो अपने चुनाव के विषय पर अभिव्यक्ति का मंच मिलना आवश्यक है. यह मंच दिया है न्यू मीडिया ने. और इस मंच पर ऐसे तमाम विषयों पर लिखा-पढ़ा जा रहा है जो पारंपरिक मीडिया में नितांत वर्जित विषय माने जाते रहे हैं.
3. विभिन्न प्रारूप : न्यू मीडिया के माध्यम से साहित्य को पाठ, ऑडियो, वीडियो आदि प्रारूपों में साहित्य तैयार किया जा सकता है और संप्रेषित किया जा सकता है. एक ही साहित्यिक कृति को कई फोर्मट्स का प्रयोग करके सुविधा पूर्वक अभिव्यक्त किया जाना न्यू मीडिया ने संभव किया है. इस स्वतंत्रता से जहाँ साहित्य को विभिन्न प्रारूपों में तैयार करने में आसानी होती है वहीँ विभिन्न प्रारूपों में एवं उनके मिश्रण से तैयार यह साहित्य आकर्षक और अधिक प्रभावशाली बन पड़ता है. डॉ चन्द्रप्रकाश मिश्र अपने लेख ‘नया मीडिया बनाम पुराना मीडिया’ में कहते हैं, – “नया मीडिया व्यापक है. वह पाठ्य, दृश्य और श्रव्य तीनों से युक्त है और समवेत प्रभाव अपने प्रयोक्ताओं पर डालता है जबकि पुराने मीडिया में इस संबंध में सीमा रेखा है.”
4. विभिन्न लिपियों में एक साथ प्रकाशन : न्यू मीडिया में यह एक विशेष उल्लेखनीय बात है कि बहुत से रचनाकार अपनी रचनाओं को एक से अधिक लिपियों में प्रकाशित कर रहे हैं. इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि ऐसा करने से रचना उन सभी पाठकों तक पहुँच जाती है जो उन विभिन्न लिपियों में से एक को भी जानता समझता है. रेख्ता.ओर्ग (rekhta.org) इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण वेबसाइट है जिस पर विभिन्न रचनाकारों की रचनाएं तीन लिपियों देवनागरी, रोमन और अरबी में प्रकाशित की जा रही हैं. 
5. तीव्र और आसान : मिसाईली गति की सूचना वाले इस न्यू मीडिया के युग में साहित्य को मूर्त रूप देना इतना आसान है की कोई भी साहित्यकार मात्र कुछ ही घंटों के प्रशिक्षण से इस योग्य हो जाता है कि वो न्यू मीडिया का उपभोक्ता होने के साथ-साथ उत्पादक भी बन सके. अपने लिखे साहित्य को ब्लॉग या वेबसाईट पर पोस्ट कर के ग्रुप ईमेल और सोशल नेटवर्किंग साईट्स के माध्यम से उसके प्रचार प्रसार के द्वारा अपनी रचना को अधिकाधिक ऑडियंस तक पहुँचाना अब बच्चों के खेल जैसा है. और ये खेल विद्यालय, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र रचनाकार भी कुशलतापूर्वक खेल रहे हैं. 
6. भौतिक सीमा-बंधन से मुक्ति : न्यू मीडिया के युग में पत्रकारिता एवं साहित्य रचना कहीं से भी बैठ कर जा सकती है. अब ये अनिवार्य नहीं कि साहित्यकार अपनी रचना को अपने पाठकों तक पहुंचाने के लिए प्रकाशकों के दफ्तर के चक्कर लगता रहे या फिर पत्राचार करता रहे. पाठकों तक अपनी रचना पहुंचाने का यह काम अब साहित्यकार अपने घर के ड्राईंग-रूम, बैड-रूम, यहाँ तक कि वाश-रूम में बैठकर भी कर सकता है. न्यू मीडिया के इस दौर में एक साहित्यकार विश्वभर में फैले अपने पाठकों तक अपनी रचना पालक झपकते ही पहुंचा सकता है। 
7. तत्काल प्रतिक्रिया : साहित्यकार की किसी रचना पर उसके पाठकों क़ी क्या प्रतिक्रिया रही, पारंपरिक मीडिया में ये जानना तत्काल संभव नहीं था. प्रतिक्रिया या प्रभाव जानने में काफी समय और संसाधनों की आवश्यकता होती थी. परन्तु न्यू मीडिया ने साहित्य पर तत्काल प्रतिक्रिया जानना संभव बना दिया है. साहित्यिक रचना के पोस्ट होते ही उस पर प्रतिक्रियाएँ आने लगती है. ‘जनशब्द’ नामक ब्लॉग पर देवेन्द्र कुमार देवेश कहते हैं, – “…जहाँ एक शीर्षक अथवा विषय पर उपलब्ध सभी अभिव्यक्‍तियों की एक साथ जानकारी प्राप्त करना संभव है, जहाँ किसी अभिव्यक्ति पर तत्काल प्रतिक्रिया देना ही संभव नहीं, बल्कि उस अभिव्यक्ति को उस पर प्राप्त सभी प्रतिक्रियाओं के साथ एक जगह एक साथ देख पाना भी संभव है.”
8. पाठक तक पाठक की पहुँच : आज के पाठक को किसी रचना पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए डाक खाने से पोस्ट कार्ड या अंतर्देशीय पत्र लाने और उसे पत्र-पेटिका में डालने जाने का कष्ट उठाने की आवश्यकता नहीं रही. न्यू मीडिया का एक विशेष गुण यह है कि इसके माध्यम से किसी रचना का पाठक उस रचना के अन्य पाठकों क़ी व्यक्त प्रतिक्रियाओं और विचारों को भी जान सकता है जो कि पारंपरिक मीडिया में संभव नहीं था. इसका फायदा और नुकसान अपनी जगह है. रचना पर प्रतिकृया देना अब आसान है और त्वरित भी। 
9. एक साथ कई मंच : न्यू मीडिया का प्रयोगकर्ता साहित्यकार अपनी रचना को न्यू मीडिया के कई मंचों के माध्यम से अपने पाठकों एवं श्रोताओं तक पहुंचा सकता है. उदहारण के लिए न्यू मीडिया का प्रयोगकर्ता साहित्यकार अपनी रचना को ब्लॉग पर पोस्ट करके उसे फेसबुक, व्हाट्सऐप और ट्विटर के माध्यम से जुड़े हुए लोगों तक पहुंचा सकता है.
10. साहित्य-अतिरेक : आज न्यू मीडिया के प्रयोक्ता पाठक के पास साहित्य-अतिरेक की स्थिति है. साहित्यिक रचनाएँ इतनी अधिक हैं कि पाठक के लिए यह तय कर पाना दुष्कर हो जाता है कि किस रचना को पढे और किसे छोड़े?. इस कारण अधिकांश ऐसी रचनाएँ होती हैं जो कि बहुत कम पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
11. साहित्यिक चोरी : समकालीन साहित्यकार को न्यू मीडिया में अक्सर साहित्यिक चोरी का शिकार होना पड़ता है. अक्सर यह सुनने में आता है कि किसी एक की रचना किसी दूसरे ने अपने नाम से पोस्ट कर दी. बहुत से मामलों में तो यह पता ही नहीं लग पाता कि रचना का वास्तविक लेखक लेखक कौन है. इस शोध-पत्र का लेखक स्वयं न्यू मीडिया में हो रही इस साहित्यिक चोरी का शिकार हुआ है. 
12. साहित्य के साथ छेड़-छाड़ : साहित्य के साथ छेड़-छाड़ करना न्यू मीडिया ने काफी आसन कर दिया है. न्यू मीडिया में साहित्यकार द्वारा रचित रचना के साथ छेड़-छाड़ के मामले भी सामने आते हैं. रचना को कुछ ऐसे आपत्तिजनक बदलाव कर दिए जाते हैं जिससे रचनाकार को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है. जिस किसी ने आमिर खान अभिनीत हिंदी फिल्म 3 इडियट्स देखी है उन्हें अवश्य याद होगा कि दो शब्दों को बदल देने से कैसे अर्थ का अनर्थ हो गया था. 
13. साहित्य का गिरता स्तर : हालांकि इस बारे में कोई एक राय नहीं है कि न्यू मीडिया में आने वाला समकालीन साहित्य निम्न स्तर का है और पारंपरिक मीडिया के माध्यम से सामने आने वाला साहित्य उच्च स्तर का. एक बात जो गौर करने वाली है वो यह कि करीब एक दशक पहले जब हिंदी रचनाकार न्यू मीडिया में साहित्य रचना शुरू कर रहे थे तो ऐसे कई स्थापित साहित्यकार थे जिन्होंने उस न्यू मीडिया के माध्यम से अभिव्यक्त होने वाले साहित्य को निम्न स्तर का कहा. वो और बात है कि समय बीतते-बीतते उन स्थापित साहित्यकारों में से अधिकांशत: खुद भी न्यू मीडिया की शरण में आ गए और दिल्ली के एक कवि, लेखक और शिक्षक डॉ हरीश अरोड़ा को लिखना पड़ा ‘ब्लॉगम शरणम गच्छामि’ 
सन्दर्भ :
1. पत्रकारिता का बदलता स्वरुप और न्यू मीडिया, डॉ हरीश अरोड़ा (स.), पृष्ठ : 16 व 18
2. वही, पृष्ठ : 50
3. हिंदी ब्लॉगिंग स्वरुप व्याप्ति और संभावनाएँ, डॉ मनीष कुमार मिश्रा (स.) पृष्ठ : 83
4. www.google.com
5. www.hi.wikipedia.org/wiki/न्यू_मीडिया, 19 मार्च 2016, 14:10
6. https://patrakaritajagat.wordpress.com/2012/11/16/न्यू-मीडिया-क्या-है
7. https://en.wikipedia.org/wiki/New_media, 19 मार्च 2016, 14:14
8. www.newmedia.org/what-is-new-media.html, 4 मार्च 2016, 10:02
9. www. hi.wikipedia.org/wiki/समकालीन , 4 मार्च 2016, 11:10 
10. www.hi.wikipedia.org/w/index.php?search=समकालीन+साहित्य&title=विशेष%3Aखोज&fulltext=1, 4 मार्च 2016, 11:12
11. www.hi.wikipedia.org/w/index.php?search=समकालीन+हिंदी+साहित्य&title=विशेष%3Aखोज&fulltext=1, 4 मार्च 2016, 11:14
12. http://www.hindiinternet.com/2008/08/blog-post_4275.html
13. http://samixa.blogspot.in/2011/07/blog-post_15.html
14. http://mukulmedia.blogspot.in
15. http://janshabd.blogspot.in/2011/06/blog-post_29.html
16. http://www.deshkaal.com/Details.aspx?nid=17820098385597
[साभार: जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका]