लेख़क-अश्विनी कुमार मिश्र
पत्रकार, राजगढ़, मीरजापुर!
पत्रकारों से खबर तो चाहिए पर उनकी कोई खबर नहीं लेता
पतझड़

गीत :- पतझड़
कोकिला की कूक सूनी हूक अंतस् गढ़ बना है।
भाव निर्जन राग नीरव और मन पतझड़ बना है॥
वेदना की परिधि में खुद को खड़ा पाया था जब
मौन स्मित हो गयी थी बढ़ गयी गोपन व्यथा तब
धूप उच्छृंखल हुई तो छाँव का अवसाद अंतस्
अद्यावधि अधबीच तरणी का वही प्रकरण बना है।
भाव निर्जन राग नीरव और मन पतझड़ बना है॥
थी ह्रदय की चाह हर मौसम उसी के पास बीते
दिन गये सप्ताह बीते अब्द के मधुमास रीते
क्षीण सौरभ कर विदारण पुष्प की कोमल लता को
अश्रुकण से सींच जीवित रीति यह अनुक्षण बना है।
भाव निर्जन राग नीरव और मन पतझड़ बना है॥
दूधिया सैलाब आया इंदु जब आयी धरा पर
पर उसी क्षण भाव के प्रासाद ढहके भरभराकर
मध्य रजनी में कहीं एकांत के सूने सदन में
शुष्क रेतीले भूभल में भग्न आकर्षण बना है।
भाव निर्जन राग नीरव और मन पतझड़ बना है॥
पुष्प नें मधुकण संजोये हैं कठिन आयास कर
उत्फुल कली सुर छेड़ती मधुवन में सस्मित हास कर
फ़िर मधुप उद्विग्न क्यों है दोष उसका है भला क्या
जोकि इस पतझड़ के आने का सघन कारण बना है।
भाव निर्जन राग नीरव और मन पतझड़ बना है॥
पढ़कर याद रह जाने वाली किताब- पेपलौ चमार: समीक्षक- राजीव कुमार स्वामी
पटना का गोलघर
बीजापुर के गुम्बद से भी दोगुना ऊँचा है पटना का गोलघर
-प्रदीप श्रीवास्तव
अप्रैल माह का तीसरा सप्ताह, सूर्य देवता पूरे शबाब पर, एक शादी में शामिल होने पटना आया हूँ, वह भी लगभग तीस साल बाद, जहाँ तक याद आ रहा है सन 1986 में आया था । तब के और आज के पटना में कितना बदलाव आ गया है, गली –मोहल्लों ने कंक्रीट का जंगल अपना लिया है ।जगह -जगह गगन चुम्बी इमारतों ने अपनी पैठ बना ली है ।जो रही सही जगह थी उसे फ्लाई ओवरों ने पूरी कर दी । एक दिन का समय है, सोचा पटना घूमा जाए। मन में आया कि क्या देखें, चलो गोलघर ही देखते हैं । बेली रोड से टेम्पो पकड़ा, वाही डग्गामार (आज भी पटना की सड़कों पर निःसंकोच दौड़ती हैं, जैसे 31 साल पहले ) टैम्पो वाले से गाँधी मैदान चलने को कहता हूँ । गोलघर पर उतरना चाहता हूँ तो टेम्पो वाला कहता है कि साहब आज तो बंद है, यह पूछने पर कि क्यों, तो जवाब मिलता है कि आज महावीर जयंती है । लेकिन में यह सोच कर वापस गोलघर लौटता हूँ कि पुरातत्व के अधीन आने वाले स्मारक तो केवल शुक्रवार को छोड़ कर बंद नहीं रहते ।

गोलघर के सामने खड़ा हूँ, ऊँचा सा गुम्बद नुमा घर (यही कहें तो ठीक होगा ) सामने दूर गंगा का तट, लगभग गंगा जी यहाँ सूखी सी दिखाती हैं । टिकट खिड़की से प्रवेश के लिए टिकट लेता हूँ, और अन्दर । परिसर बहुत ही साफसुथरा, मन मोह लेता है, वहां का वातावरण । देखरेख करने वाले कर्मचारियों से गोलघर का इतिहास जानना चाहता हूँ, तो एक टूक जवाब मिलता है की पर्यटन कार्यालय जाइये, वहां आप को जानकारी मिल जायेगी । मजे की बात यह है कि गोलघर स्थित टिकट घर में भी जानकारी की कोई पुस्तक व प्रपत्र नहीं है । गोलघर के प्रांगण में पर्यटक न के बराबर, कुछ युवा जोड़े (स्कूल के ही लड़के-लड़कियां )गलबहियां डाले अपनी दुनिया में मशगूल, मानों सातों जन्म की बातें आज ही कर डालेंगे, जिसे देख कर कर अपना भी छात्र जीवन (इस तरह का तो नहीं ) याद आ जाता है, वहां के एक कर्मचारी से इस बाबत पूछता हूँ तो वह कहता है, कैसे आप इन्हें रोकोगे, घर से निकले तो माँ – बाप ने सोचा होगा कि पढ़ने गएँ होंगे, लेकिन उन्हें क्या पता कि उनके बच्चे तो यहाँ मस्ती कर रहे होंगे, साहब खाना तक साथ लाते और शाम को ही वापस लौटते हैं, ख़ैर ।।
गोलघर के ठीक नीचे खड़ा हूँ, अन्दर खोखला भवन, जिसमे प्रकाश व ध्वनि के माध्यम से गोलघर के इतिहास की जानकारी दी जाती है ।गोलघर के ऊपर जाने के लिए दोनों तरफ से घुमावदार जीने बने है, जिसके रख-रखाव व रंग रोगन का काम आजकल चल रहा है ।लखोरी ईटों से बने गोलघर की उचाई 96 फीट, व्यास 109 फीट और दीवार की मोटाई 12 फीट 4 ईंच है। जिसपर चढ़ने के लिए दोनों तरफ बने जीनों की संख्या 145 है, जिस पर चढते – चढते हाफा आने लगता है, ऊपर पहुँच कर पटना शहर देखते बनता, सामने गंगा का विशाल तट, पीछे देखें तो पटना शहर, गाँधी मैदान का विशाल प्रांगण, जहाँ सभाएं व रैलियां होती हैं। गुम्बद के बीचो बीच 2 फीट 7 इंच का एक सुराख़ नुमा जगह, जिसे अब बंद किया जा चूका है। कहते हैं कि इसी सुराख़ से अन्दर अनाज डाला जाता था।अनाज निकलने के लिए नीचे के दरवाजों का प्रयोग किया जाता था। लेकिन इस बात की पुष्टि कोई नहीं कर पाता कि वास्तव में कभी ऊपर से अनाज भरा गया हो।कहते हैं कि 1770 में पड़े सूखे के बाद ब्रिटिश कैप्टन जान हास्टिंन ने गोलघर अनाज रखने (ब्रिटिश आर्मी के लिए) के लिए बनवाया था। इसमें 14 लाख टन अनाज रखा जा सकता है। यह 20 जुलाई 1786 में बना था। इसकी मरम्मत 2002 में करवाई गई । परिसर में लगे शिलापट्ट पर जगह खाली पड़ी है, पर अंग्रेजी में यह जरुर लिखा है कि ‘ सामान्य योजना के तहत गवर्नर जनरल के आदेश से इस क्षेत्र में पड़ने वाले अकाल से निपटने की लिए इस गल्ला भंडारण का निर्माण किया गया। जिसका निर्माण कैप्टन जॉन गैरस्टीन द्वारा 1784 में शुरू करवाया था जो दो साल बाद 20 जुलाई 1786 में बन कर तैयार हुआ।
गोलघर को मै अपलक निहार रहा हूँ, विश्वास ही नहीं हो रहा कि बिना बिम्बों के यह गुम्बद बना होगा । वास्तविकता भी यही है कि यह सिर्फ एक गुम्बद हे, किसी ईमारत का हिस्सा नहीं ।बताते हैं कि दुनिया में सबसे ऊँचा माना जाने वाला येरुशलम के गुम्बद ‘’ डोम आफ रॉक’’ से 40 फीट ऊँचा एवं कर्णाटक के बीजापुर गुम्बद से इसकी ऊँचाई दोगुना अधिक है। मुझे इस बात का आश्चर्य हो रहा हे कि अपने आकर -प्रकार से दुनिया में यह गुम्बद अकेला है लेकिन विडम्बना यह है इसे आज तक वह मान्यता नही मिली है, जिसकी यह हक़दार है ।सदियों बाद आज भी गोलघर सरकारी उपेक्षा का शिकार ही है ।गोलघर के भीतर माचिस की तीलियों के जलने की गूंज आप कभी भी जलाकर सुन सकते है ।इसके अन्दर पैदा होने वाली गूंज लखनऊ के भूलभुलैया की याद दिलाने लगती है।इतिहास के पन्नों को पलटें तो सबसे पहले 1806 में श्रीमती शेरवुड ने इस गूंज का उल्लेख किया था ।श्रीमती शेरवुड ने उस समय इसकी तुलना लन्दन के सेंट पाल गिरजाघर गुम्बद से की थी। उनके बाद 1824 में जब बिशप हेवर पटना आये तो उन्हों ने भी इस गूंज की बात कही, लेकिन हेवर ने इसकी तुलना किसी से नहीं की।कहते हैं कि गोलघर का निर्माण अंग्रेजों द्वारा 1770 में बंगाल में पड़े आकाल के बाद गल्ला भण्डारण की जरुरत को महसूस करते हुए 1786 में किया गया था। गोलघर में ऐसे तो ईंटों का प्रयोग हुआ है लेकिन इसके शिखर पर लगभग तीन मीटर तक ईंट की जगह पर पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। कहा जाता है कि मजदूर एक ओर से अनाज लेकर गोलघर के शीर्ष पर पहुंचते थे और वहां बने दो फीट सात इंच व्यास के छिद्र में अनाज डालकर दूसरी ओर की सीढ़ी से उतरते थे।वैसे बाद में इस छिद्र को बंद कर दिया गया। 145 सीढ़ियों को तय कर गोलघर के ऊपरी सिरे पर पहुंचा जा सकता है। यहां से शहर के एक बड़े हिस्से खासकर गंगा तट के मनोहारी दृश्य को देखा जा सकता है। सरकार ने इस स्मारक पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया। वर्ष 1979 में राज्य संरक्षित स्मारक तो इसे घोषित कर दिया गया परंतु स्मारक के चारों ओर बढ़ी आबादी और सड़कों के निर्माण से स्मारक प्रभावित हुआ। कहते है कि भवनों के निर्माण से भी गोलघर की नींव और दरारें प्रभावित हुईं।
19वीं सदी के अंत में डॉ आर वैडल ने संभवतः पहली बार यह बात उठाई कि यह भवन बौध स्तूप की नक़ल है ? तभी से इस बात की चर्चा जोरों से पकड़ ली कि यह भवन वास्तव में स्तूप ही है ।इस बात की पुष्टि 1997 में पटना में आयोजित एक सेमिनार में पटना संग्रहालय के इतिहासकार अरविन्द महाजन ने भी करते हुए इसे “अम्ल्का स्तूप” बताया, जिसकी चर्चा चीनी यात्री फाहियान ने अपनी यात्रा संस्मरण में इसे सम्राट अशोक के पगोड़ा के रूप में की है।वहीँ ह्वेनसांग ने भी अपने संस्मरण में इसे “अम्ल्का स्तूप” लिखा है । ह्वेनसांग लिखते हैं कि अम्ल्का स्तूप पाटलिपुत्र नगर के दक्षिण –पूर्व में स्थित है।
गोलघर के परिसर में घूमते – घूमते एक कोने में बने नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बी।पी।कोईराला की मूर्ति के पास पहुंचता हूँ ।जिसे देख कर सोच में पड़ जाता हूँ कि यहाँ पर इस मूर्ति की क्या जरुरत ।कोईराला जी का क्या योगदान था इस जगह के लिए ? अगर इस जगह पर नेपाल के जांबाज जंग बहादुर की मूर्ति लगी होती तो कोई बात थी।कहते हैं कि नेपाल के जंगबहादुर ने घोड़े पर सवार हो कर एक तरफ के जीने से गोलघर के ऊपर चढ़ कर दूसरी तरफ के जीने से उतरने का कारनामा कर दिखाया था । इस बात का उल्लेख 1919 में प्रकाशित बाबू राम लाल सिन्हा की पुस्तक ‘पाटलिपुत्र’ मे मिलता है । प्रांगण से बाहर निकलने की सोच ही रहा था कि पेड के नीचे एक वृद्ध महिला बैठी दिख जाती है।सोचता हूँ की शायद वह यहाँ के बारे में कुछ बता सकें, उनके बगल में जा कर बैठ जाता हूँ।
फिर शुरू हो जाता है बातचीत का शिलशिला ।।।
अम्मा, आप कब से यहाँ आ रहीं है ?
वह कहने लगती हैं, बेटा बचपन से आ रही हूँ, इसी गोलघर के नीचे अब्बा, दादा सहित परिवार के साथ रात में सोते थे, दादा की रेलवे स्टेशन पर दुकान थी, हम लोग क्या, पूरा मोहल्ला यहीं सोता था, तब तो बिजली थी नहीं, न ही इतने मकान बने थे, सामने गंगा नदी बहती थी, ठंडा रहता था यहाँ पर ।
अम्मा, आप का नाम ?
बेगम खातून मुझे कहते हैं, अब्बा ने यही पर शादी कर दी, यहीं के होकर रह गए, परिवार है लेकिन दिन में एक बार यहाँ आये बिना मन नहीं मानता, इसी लिए चली आती हूँ ।
पूछता हूँ, अन्दर आने के लिए टिकट लेती हैं क्या ?
इतना पूछते ही वह चीख कर वहां काम कर रहे कर्मचारियों की तरफ इशारा करते हुए कहने लगती हैं की कौन मांगेगा टिकट, कुछ गाली के शब्दों का प्रयोग करने लगती है ।जिसे सुनकर कर्मचारी मुस्कराते हुए निकल लेते है ।
फिर पूछता हूँ, आप की उम्र कितना होगी अम्मा ?
वे बोलती हैं, सन वन तो याद नहीं, अंग्रेजों का शासन था, लगभग 103 तो होगी।
गोलघर के बारे में कुछ बताइए ?
वे कहती हैं इतना याद कि है बैलगाड़ियों में अनाज भर कर आता था और इसी गोलघर में रखा जाता था, बाद में निकाल कर ले जाते थे, कहाँ ले जाते यह नहीं मालूम। इससे अधिक अम्मा कुछ नहीं बताती, बातों को घूमते हुए परिसर से लगे मजारों के विषय में बताने लगती है, जिसका उल्लेख फिर कभी करूँगा ।सूरज पश्चिम दिशा में छिपने को लालायित हैं, और में गोलघर से बाहर निकल कर टैम्पो की तलाश में सड़क के किनारे खड़ा हो जाता हूँ ।
प्रदीप श्रीवास्तव, ”उदगम”, 537-F /64 A, इंद्रपुरी कॉलोनी , सुभाष चंद्र बोस अकादमी के बगल, आई.आई.एम.-हरदोई रोड , बिठोली तिराहा, लखनऊ -226013 , उत्तर प्रदेश , सम्पर्क 8604408528
पंजाबी की यादगार कहानियाँ (चार खंड : साठ कहानियाँ): सुभाष नीरव
पंजाबी की यादगार कहानियाँ
(चार खंड : साठ कहानियाँ)
पंचरतंत्र की कथाएँ
पुस्तक समीक्षा
तंत्र को अनावृत करती ‘पंचरतंत्र की कथाएँ’
समीक्षक: राहुल देव
व्यंग्य के लगभग पुरुषोचित समझ लिए गए क्षेत्र में नई पीढ़ी की स्त्री व्यंग्यकार भी पूरी मजबूती के साथ बराबरी करते हुए सामने आई हैं। उनके विषय भी केवल सामाजिक नही रह गए हैं बल्कि समय-समाज के राजनीतिक, आर्थिक, साहित्यिक, धार्मिक हालातों में मौजूद विसंगतियों पर भी वे पैनी नज़र रखकर लिख रही हैं। आमतौर पर मैं व्यंग्य लेखिकाओं पर अपनी आलोचनात्मक राय देने से बचता हूँ क्योंकि अधिकांश लेखिकाएं आलोचना को सहजता से नही ले पातीं | अगर कभी-कभार आपकी आलोचना भी हो तो वह इन्हें सकारात्मक भाव से ग्रहण करना चाहिए। उसके लिए विचलित होने की जरूरत नही है। प्रशंसा की तरह आलोचना भी आपकी रचनाशीलता के विकास का एक जरुरी हिस्सा है। आप सभी व्यंग्य लेखिकाएं समकालीन परिदृश्य में हिंदी व्यंग्य का एक उम्मीदों भरा चेहरा उपस्थित करती हैं।
इंद्रजीत कौर का नाम समकालीन महिला व्यंग्यकारों में प्रमुखता से लिया जाता है। वह एक साहसी व्यंग्य लेखिका हैं। इस वर्ष रुझान पब्लिकेशन से उनका दूसरा व्यंग्य संग्रह ‘पंचरतंत्र की कथाएं’ प्रकाशित होकर आया है | इस संग्रह में उनके 56 व्यंग्य संकलित हैं | अपनी बात उन्होंने ‘व्यंग्य में सामयिकता’ पर विचार प्रकट करते हुए की है | व्यंग्य तात्कालिक विसंगतियों पर संवेदनशील मनुष्य की शाब्दिक प्रतिक्रिया होती जरुर है लेकिन उसे रचनात्मक साहित्य में किस तरह ढालें यह सीखना-समझना होता है नही तो एक सामान्य टिप्पणी और एक व्यंग्य रचना में अंतर करना मुश्किल हो जायेगा | इसलिए लेखक को इसकी चिंता छोड़ करके केवल गुणवत्तापूर्ण लेखन पर अपना फोकस करना चाहिए | रचना सामयिक होकर भी भविष्य में प्रासंगिक हो सकती है और रचना शाश्वत का लबादा ओढ़कर भी कूड़ेदान लायक हो सकती है | जब समय अनुकूल होता है तो एक सच्चा लेखक लिखे बगैर रह ही नही सकता है उसकी कलम से रचना फूट ही पड़ेगी |
संग्रह के पहले व्यंग्य को पढ़ते हुए ही अवध की प्रखर व्यंग्य तासीर महसूस होने लगती हैं | इस तासीर के साथ जब पंजाबी फ्लेवर मिलता है तो एक अलग ही आनंद की सृष्टि होती है | इन्द्रजीत के पास सरोकार संपन्न विचारदृष्टि तो है ही जिसके साथ उनका भाषाई शरारत भरा व्यंग्य कौतुक मिलकर रचना को अत्यंत पठनीय बना देता है | इनके व्यंग्यों से गुज़रते हुए लेखिका का अपने परिवेश में व्याप्त विसंगतियों के प्रति गहरी संलग्नता दिखाई देती है | फिर चाहे वह ‘पुरुष सशक्तिकरण वाया फिल इन द ब्लेंक्स’ शीर्षक व्यंग्य हो या ‘होलियानी कविता और तुकबंदी की सा रा रा’ | वह कितने ही मज़े लेकर अपने विषय को शुरू करें लेकिन व्यंग्य के अंतिम उद्देश्य का उन्हें हमेशा स्मरण रहता है | इस कारण उनके व्यंग्य मनोरंजन की सीमित परिधि से निकलकर सार्थक व्यंग्य की परम्परा से जुड़ते हैं | ‘हमारी व्यवस्था की गुरुत्वाकर्षण तरंगें’ शीर्षक व्यंग्य के प्रारंभ में वह लिखती हैं- ‘न्यूटन के पास गुरुत्वाकर्षण सिद्ध करने के लिए एक सेब ही रहा होगा | हमारे पास तो नैतिकता, रुपये का मूल्य, पुलों की कतारें, विद्यालयों की छतें, फैशन परेड के कपड़े आदि कितनी ही चीज़ें हैं इस सिद्धांत को मजबूत करने के लिए |’
व्यंग्यकार को प्रतीक योजना बनाकर व्यंग्य लिखने में तो जैसे महारथ हासिल है | संग्रह का ‘घासतंत्र और रजुआ’ शीर्षक व्यंग्य | मुझे लेखिका के इस संग्रह में कुछ व्यंग्यों के शीर्षक लम्बे मालूम होते हैं | शीर्षक रखने में हमें जल्दबाजी नही करनी चाहिए | रचना का शीर्षक हमेशा संक्षिप्त होना चाहिए तथा उसे सम्पूर्ण व्यंग्य का प्रतिनिधित्व करने वाला होना चाहिए | जैसे ‘ज्यों-ज्यों तबियत बिगड़ने लगी’ शीर्षक व्यंग्य | अपने कंटेंट में यह एक प्रभावशाली व्यंग्य है | इस व्यंग्य से मैं कुछ वक्रोक्तिपूर्ण पंक्तियाँ उदृत करना चाहूँगा –
- कार्यक्रम वक्त के अनुसार होने के बजाय वक्ताओं के अनुसार शुरू हुआ |
- माइक पकड़कर वे ख़ुशी से वक्ताये
- खरखराती हुई आवाज़ में वो वचनाये
- लोगों ने जितना समझा उस पर तालियाँ बजाईं और जहाँ नही समझा वहां और ज़ोरों से तालियाँ बजायीं |
- विवादों से सुसज्जित इतिहास के बावजूद महाशय समाचार-पत्रों की सुर्खियाँ नही बटोर पाये थे |
इन्द्रजीत कौर का लेखन बहुआयामी है | व्यंग्य के माध्यम से कहानी बुनने में वह बड़ी ही कुशल हैं | ‘राजा की ऐनक’ उनकी कुछ ऐसी ही व्यंग्यकथा है | इसे पढ़कर पाठक को लेखिका अपनी कल्पनाशीलता से चकित कर जाती है | वर्तमान प्रजातंत्र का इससे अच्छा रचनात्मक ट्रीटमेंट और क्या होगा | ‘एक थे विरोधचंद’ शीर्षक व्यंग्य कथा में लेखिका ने हरदम विरोधी मानसिकता वाले व्यक्तियों की इस प्रवृत्ति पर शानदार व्यंग्य रचा है | इसमें उन्होंने हास्य का अच्छा प्रयोग किया है- ‘वो जब पैदा हुए तो रोकर विरोध कर दिया कि माँ की कोख से क्यूँ जन्म हुआ, पिता से क्यूँ नही ? जब उनके मुँह में दूध की बोतल डाली गयी तो भी रोये थे कि दूध स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है, कोकाकोला पिलाओ |’
इस संग्रह में कुछ व्यंग्य मुझे कुछ अपूर्ण से लगे जिन्हें समय देकर और विस्तार दिया जा सकता था जैसे कि ‘चालाक कौए की सत्यकथा’ और ‘खाली थाली और उनका आभामंडल’ शीर्षक व्यंग्य | बाकी ज्यादातर व्यंग्य संतुलित शब्दसीमा के अंतर रचे गये हैं | ‘कलियुग, कालाधन और कौआ’ शीर्षक व्यंग्य में वह बड़ी सटीक व्यंग्ययोजना बनाकर जनता से किये हुए वादे तोड़ने वाली सत्ता के प्रति सवाल खड़े करती हैं- ‘यह कहा जाता है कि तीन चीज़ें जाने के बाद कभी वापस नही आतीं- मुँह से निकली हुई वाणी, कमान से निकला हुआ तीर और गुजरा हुआ वक्त | इसमें चौथी चीज़ और जोड़ सकते हैं, वो है – देश से बाहर गया हुआ कालाधन |’
आंकड़ों की बाजीगरी से विकास का भ्रम फ़ैलाने वाली सरकार पर लिखा गया अत्यंत सशक्त व्यंग्य है ‘अकड़ के साथ आकड़े दिखाओ’ शीर्षक व्यंग्य | इन्द्रजीत के पास आम बोलचाल की सरल भाषा है जिसमे विट और आयरनी के सटीक प्रयोग से भाषा का अलग ही रूप निकलकर सामने आता है | शैली भी उसी के अनुसार ढली हुई है | ‘आप सच के पुलिंदे हैं सर’ में लेखिका का आक्रोश व्यंग्य की तीव्रता को और तेज कर जाता है- ‘आप जैसे सत्यवादी पर इतना घनघोर इल्जाम ! आप तो हरिश्चंद्र के अग्रज ही नही बल्कि पूर्वज भी हैं | आप सत्य के पास भले ही न जाते हों, सत्य आपके पास दौड़ा चला आता है |’ ‘भरी गगरी छलकत जाय’ शीर्षक व्यंग्य से एक उदाहरण और दृष्टव्य है- ‘वे जागेंगें तो देखेंगें | देखेंगें तो सोचेंगें | सोचेंगें तो बोलेंगें | बोलेंगें तो शोर भी मचा सकते हैं | शोर ज्यादा डेसिबल में हो गया तो तरंगों से कुर्सी हिल सकती है अतः उनका सोना जरुरी है, समझी !’
संग्रह में कुछ व्यंग्य बड़े हल्के फुल्के विषय लगते हुए भी कहीं न कहीं गहरे अर्थ समेटे हुए हैं जैसे कि ‘आंटी की अंटी’ शीर्षक व्यंग्य | इसे पढ़ने हुए ताज्जुब नही होगा कि कहीं बाज़ार के सौन्दर्यजाल में उलझकर लेखिका ने खुद के अनुभव को ही तो शब्द नही दे दिए हैं | इन्द्रजीत व्यंग्य करते हुए किसी को नही बख्शती ‘जीवन के कोटेदार’ शीर्षक व्यंग्य में उन्होंने ऐसे दोमुंहे लोगों पर भरपूर तंज कसा है जो आपके सामने कहते कुछ हैं और आपकी पीठ पीछे करते कुछ हैं | ऐसे फर्जी उपदेशकों की अपने देश में कमी नही है | लेखिका ने अपने इस व्यंग्य में ऐसी प्रजाति के लोगों की जमकर ख़बर ली है |
इन्द्रजीत कौर अपनी कुछ और विशेषताओं के कारण मेरी प्रिय व्यंग्य लेखिकाओं में से एक हैं | उनका लेखन दिनोदिन विकसित हुआ है | संग्रह का ‘रुपये की नाव’ शीर्षक व्यंग्य पढ़कर आप चकित रह जाते हैं | क्या ही दृष्टि और समझबूझ के साथ वह कठिन लगते आर्थिक विषय का निर्वाह करती है ! फिर जो रचना बनकर तैयार होती है वह कठिन नही बल्कि पठनीय हो जाती है | मैं अपने वक्तव्यों में इसे ही व्यंग्य कला कहता हूँ | इन्द्रजीत निश्चय ही जन्मजात प्रतिभासम्पन्न व्यंग्यकार हैं और इस प्रतिभा को उन्होंने घर-परिवार-नौकरी की जिम्मेदारियों के बीच भी जाया नही होने दिया है यह बड़ी बात है | उनका यह व्यंग्य रुपये के अवमूल्यन पर एक तार्किक बहस आमंत्रित करता है | इनके यहाँ मध्यमवर्गीय परिवार की समाजार्थिक समस्याओं को बेहतर स्वर मिला है |
इसके अतिरिक्त इस संग्रह के कुछ अन्य उल्लेखनीय व्यंग्यों में ‘उठो, जागो, लफंगई करो’, ‘देश का बोनसाई पेड़’, ‘गाय, गौरैया और गंगा’, ‘आखिर बसंत मिल गया’, ‘मेरी और उनकी वर्षगांठ’, ‘मन तड़पत बहस करन को आज’, ‘हे अतिथि ! तुम कब आओगे’ आदि का नाम लिया जा सकता है जिन्हें पढ़कर हिंदी व्यंग्य की सार्थकता का एहसास होता है | यह सभी व्यंग्य अपना एक मौलिक मुहावरा गढ़ते हैं | इन्द्रजीत कौर ने इस संग्रह के बाद अपना एक लेवल सेट कर दिया है | हिंदी व्यंग्य को उनसे बड़ी अपेक्षाएं रहेंगी | इस व्यंग्य कथा संग्रह को पढ़ा और सराहा जाना चाहिए |
9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध) जिला-सीतापुर 261203 (उ.प्र.) मो 8318773947
पंचरतंत्र की कथाएं/ व्यंग्य संग्रह/ इन्द्रजीत कौर/ रुझान पब्लिकेशन्स, जयपुर/ 2019/ पृष्ठ 148/ मूल्य 150/-
पंकज चतुर्वेदी की रचनाएँ
अतीत का इस्तेमाल
————————-
सत्ता-पक्ष के बुद्धिजीवी
विपक्ष की आलोचना करते हैं :
आज जो देश का हाल है
वह इसी विपक्ष के
कारनामों का नतीजा है
क्योंकि पहले इनकी सरकार थी
और आज जो कुछ भी है
भ्रष्टाचार, अन्याय, हिंसा :
क्या वह पहले नहीं थी
बल्कि पहले तो अधिक ही थी
सरकार करना तो
बहुत चाहती है
पर सिस्टम इतना
बिगड़ा हुआ मिला है
कि उसे ठीक करने में
बहुत वक़्त लगेगा
इस तरह लोकतंत्र में
अतीत का इस्तेमाल
उससे कुछ सीखने के लिए नहीं
वर्तमान को सह्य बनाने के लिए
किया जाता है
………………………..
असम्मानित
————–
अपमानित करनेवाला
सोचता है
कि वह विजेता है
पर अपकृत्य वह
इसी कुंठा में करता है
कि उसका कोई
सम्मान नहीं है
…………………………….
सौन्दर्य
———
नदी गहन है करुणा से
उत्साह से गतिमान्
उसके प्रवाह का कारण
सजलता है
और इनकी संहति
उसका सौन्दर्य
………………………
न्यूज़ीलैंड में हिंदी शिक्षण: रोहित कुमार ‘हैप्पी’ संपादक, भारत-दर्शन, न्यूज़ीलैंड
और माओरी न्यूज़ीलैंड की
आधिकारिक भाषाएं है। सामान्यतः अँग्रेज़ी का उपयोग किया जाता है। न्यूज़ीलैंड
की लगभग
46
लाख की जनसंख्या में फीजी भारतीयों सहित भारतीयों की कुल संख्या
डेढ लाख से अधिक है। 2013 की जनगणना के अनुसार हिंदी न्यूज़ीलैंड में सर्वाधिक बोले जाने वाली
भाषाओं में चौथे नम्बर पर है। अँग्रेज़ी,
माओरी व सामोअन के बाद हिंदी सर्वाधिक बोले/समझे जाने वाली
भाषा है। 2013 की जनगणना के अनुसार 66,309 लोग हिंदी का उपयोग करते हैं।
न्यूज़ीलैंड जनगणना 2013 में
सर्वाधिक बोले जानी वाली शीर्षस्थ 10 भाषाएं
यूं
तो न्यूज़ीलैंड कुल 40 लाख की आबादी वाला छोटा सा देश है, फिर भी हिंदी
के मानचित्र पर अपनी पहचान रखता है। पंजाब और गुजरात के भारतीय न्यूज़ीलैंड में
बहुत पहले से बसे हुए हैं किन्तु 1990 के आसपास बहुत से लोग मुम्बई, देहली, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा
इत्यादि राज्यों से आकर यहां बस गए। फीजी से भी बहुत से भारतीय राजनैतिक तख्ता-पलट
के दौरान यहां आ बसे। न्यूज़ीलैंड में फीजी भारतीयों की अनेक रामायण मंडलियां
सक्रिय हैं। यद्यपि फीजी मूल के भारतवंशी मूल रुप से हिंदी न बोल कर हिंदुस्तानी
बोलते हैं तथापि यथासंभव अपनी भाषा का ही उपयोग करते हैं। उल्लेखनीय है कि फीजी में
गुजराती,
मलयाली, तमिल, बांग्ला, पंजाबी और
हिंदी भाषी सभी भारतवंशी लोग हिंदी के माध्यम से ही जुडे़ हुए हैं।
न्यूजीलैंड
में मंदिर,
मस्जिद, गुरुद्वारा, हिंदी सिनेमा, भारतीय
रेस्तरॉ,
भारतीय
दुकानें,
हिंदी
पत्र-पत्रिका,
रेडियो
और टीवी सबकुछ है। यहां दीवाली का मेला भी लगता है और स्वतंत्रता-दिवस समारोह का
आयोजन भी धूमधाम से होता है। यहां बसे भारतीयों को लगता ही नहीं कि वे देश से दूर
हैं।
फीजी
में रामायण ने गिरमिटिया लोगों के संघर्ष के दिनों में हिंदी और भारतीय संस्कृति
को बचाए रखने में महान भूमिका निभाई है। इसीलिए ये लोग तुलसीदास को श्रद्धा से स्मरण
करते हैं। तुलसी कृत रामायण यहां के भारतवंशियों के लिए सबसे प्रेरक ग्रंथ है।
जन्म-मरण,
तीज-त्योहार
सब में रामायण की अहम् भूमिका रहती है। फीजी के मूल निवासी भी भारतीय संस्कृति से
प्रभावित हैं। भारतीय त्योहारों में फीजी के मूल निवासी भी भारतीयों के साथ मिलकर
इनमें भाग लेते हैं। बहुत से मूल निवासी अपनी काईबीती भाषा के साथ-साथ हिंदी भी
समझते और बोलते हैं। न्यूज़ीलैंड में बसे फीजी मूल के भारतवंशी यहां भी अपनी भाषा
व संस्कृति से जुड़े हुए हैं।
न्यूज़ीलैंड
में 1996
में
हिंदी पत्रिका भारत-दर्शन के प्रयास से एक वेब आधारित ‘हिंदी-टीचर’ का आरम्भ
किया गया। यह प्रयास पूर्णतया निजी था। इस प्रोजेक्ट को विश्व-स्तर पर सराहना मिली
लेकिन कोई ठोस साथ नहीं मिला। पत्रिका का अपने स्तर पर हिंदी प्रसार-प्रचार जारी
रहा। भारत-दर्शन इंटरनेट पर विश्व की पहली हिंदी साहित्यिक पत्रिका थी।
आज
न्यूज़ीलैंड में हिंदी पत्र-पत्रिका के अतिरिक्त हिंदी रेडियो और टीवी भी है
जिनमें ‘रेडियो तराना‘ और ‘अपना एफ एम‘ अग्रणी हैं। हिंदी
रेडियो और टी वी अधिकतर मनोरंजन के क्षेत्र तक ही सीमित है किंतु मनोरंजन के इन
माध्यमों को आवश्यकतानुसार
हिंदी अध्यापन का एक सशक्त माध्यम बनाया जा सकता है। न्यूज़ीलैंड में हर सप्ताह
कोई न कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम होता है। हर सप्ताह हिंदी फिल्में प्रदर्शित होती
हैं। 1998
में
भारत-दर्शन द्वारा आयोजित दीवाली आज न्यूज़ीलैंड की संसद में मनाई जाती है और इसके
अतिरिक्त ऑकलैंड व वेलिंग्टन में सार्वजनिक रुप से स्थानीय-सरकारों द्वारा दीवाली
मेले आयोजित किए जाते हैं।
औपचारिक
रुप से हिन्दी शिक्षण की कोई विशेष व्यवस्था न्यूज़ीलैंड में नहीं है लेकिन पिछले
कुछ वर्षों से ऑकलैंड विश्वविद्यालय में ‘आरम्भिक‘ व ‘मध्यम’ स्तर की
हिन्दी
‘कंटिन्यूइंग
एजुकेशन‘
के
अंतर्गत पढ़ाई जा रही है ।
ऑकलैंड
का भारतीय हिंदू मंदिर भी पिछले कुछ वर्षों से आरम्भिक हिंदी शिक्षण उपलब्ध करवाने
में सेवारत है। कुछ अन्य संस्थाएं भी अपने तौर पर हिंदी सेवा में लगी हुई हैं।
हिंदी के इस अध्ययन-अध्यापन का कोई स्तरीय मानक नहीं है। स्वैच्छिक हिंदी अध्यापन
में जुटे हुए भारतीय मूल के लोगों में व्यावसायिक स्तर के शिक्षकों का अधिकतर अभाव
रहा है।
हिन्दी
पठन-पाठन का स्तर व माध्यम अव्यावसायिक और स्वैच्छिक रहा है। कुछ संस्थाओं द्वारा अपने स्तर पर हिंदी पढ़ाई
जाती है। पिछले कई वर्षों से वेलिंग्टन हिंदी स्कूल में भी आंशिक रुप से हिंदी
पढ़ाई जा रही है जिसके लिए
सुश्री सुनीता नारायण की हिंदी सेवा सराहनीय है। वेलिंग्टन के हिंदी स्कूल की
सुनीता नारायण 1995
से
हिंदी पढ़ा रही हैं। भारत-दर्शन का ऑनलाइन
हिंदी टीचर 1996
से
उपलब्ध है। वायटाकरे हिंदी स्कूल हैंडरसन में हिंदी कक्षाओं के माध्यम से हिंदी का
प्रचार कर रहा है व सुश्री रूपा सचदेव अपने स्तर पर हिंदी पढ़ाती हैं। महात्मा
गांधी सेंटर में भी हिंदी पढ़ाई जाती है। प्रवीना प्रसाद हिंदी लैंगुएज एंड कल्चर
में हिंदी की कक्षाएं लेती हैं। पापाटोएटोए हाई स्कूल एकमात्र मुख्यधारा का ऐसा
स्कूल है जहाँ हिंदी पढ़ाई जाती है, यहाँ सुश्री अनीता बिदेसी हिंदी का
अध्यापन करती हैं। । इसके अतिरिक्त सुश्री सुशीला शर्मा भी कई वर्ष तक ऑकलैंड
यूनिवर्सिटी की कंटिन्यूइंग एजुकेशन में हिंदी पढ़ाती रही हैं। स्व० एम सी विनोद
ने बहुत पहले ऑकलैंड में हिंदी शिक्षण की व्यवस्था की थी लेकिन समुचित सहयोग न
मिलने के कारण कक्षाएं बंद करनी पड़ी थी। न्यूज़ीलैंड में हिंदी पत्रकारिता में भी
उनका योगदान भुलाया नहीं जा सकता। 1998 में भारत-दर्शन द्वारा आयोजित दीवाली
आज न्यूज़ीलैंड की संसद में मनाई जाती है और इसके अतिरिक्त ऑकलैंड व वेलिंग्टन में
सार्वजनिक रुप से स्थानीय-सरकारों द्वारा दीवाली मेले आयोजित किए जाते हैं।
पिछले
कुछ वर्षों से काफी गैर-भारतीय भी हिंदी में रुचि दिखाने लगे हैं। विदेशों में
हिंदी को बढ़ावा देने के लिए पाठ्यक्रम को स्तरीय व रोचक बनाने की आवश्यकता है।
विदेशों
में हिन्दी पढ़ाने हेतु उच्च-स्तरीय कक्षाओं के लिए अच्छे पाठ विकसित करने की
आवश्यकता है। यह पाठ स्थानीय परिवेश में, स्थानीय रुचि वाले
होने चाहिए। हिंदी में संसाधनों का अभाव हिन्दी जगत के लिए विचारणीय बात है!
अच्छे
स्तरीय पाठ तैयार करना, सृजनात्मक/रचनात्मक अध्यापन प्रणालियां
विकसित करना,
पठन-पाठन
की नई पद्धतियां और पढ़ाने के नए वैज्ञानिक तरीके खोजना जैसी बातें विदेशों में
हिन्दी के विकास के लिए एक चुनौती है।
भारत
की पाठ्य-पुस्तकों को विदेशों के हिंदी अध्यापक अपर्याप्त महसूस करते हैं क्योंकि
पाठ्य-पुस्तकों में स्थानीय जीवन से संबंधित सामग्री का अभाव अखरता है। विदेशों
में हिंदी अध्यापन का बीड़ा उठाने वाले लोगों को भारत में व्यावहारिक प्रशिक्षण
दिए जाने जैसी सक्षम योजनाओं का भी अभाव है। स्थानीय विश्वविद्यालयों के साथ भी
सहयोग की आवश्यकता है। इस दिशा में भारतीय उच्चायोग एवं भारतीय विदेश मंत्रालय
विशेष भूमिका निभा सकते हैं। जिस प्रकार ब्रिटिश काउंसिल अंग्रेजी भाषा को बढ़ावा
देने के लिए काम करता है, उसी तरह हिंदी भाषा व भारतीय संस्कृति
को बढ़ावा देने के लिए क़दम उठाए जा सकते हैं।
विदेशों
में सक्रिय भारतीय मीडिया भी इस संदर्भ में बी.बी.सी व वॉयस ऑव
अमेरिका से सीख लेकर, उन्हीं की तरह हिंदी के पाठ विकसित करके
उन्हें अपनी वेब साइट व प्रसारण में जोड़ सकता है। बी बी सी और वॉयस ऑव अमेरिका
अंग्रेजी के पाठ अपनी वेब साइट पर उपलब्ध करवाने के अतिरिक्त इनका प्रसारण भी करते
हैं। इसके साथ ही
सभी हिंदी विद्वान/विदुषियों, शिक्षक-प्रशिक्षकों को चाहिए कि वे आगे
आयें और हिंदी के लिए काम करने वालों की केवल आलोचना करके या त्रुटियां निकालकर ही
अपनी भूमिका पूर्ण न समझें बल्कि हिंदी प्रचार में काम करनेवालों को अपना
सकारात्मक योगदान भी दें। हिंदी को केवल भाषणबाज और नारेबाज़ी की नहीं सिपाहियों की
आवश्यकता है।
पहली हिंदी साहित्यिक पत्रिका, ‘भारत-दर्शन‘ के
संपादक हैं।
संपादक, भारत-दर्शन
2/156, Universal Drive
Henderson, Waitakere
Auckland, New Zealand
Ph: 0064 9 8377052
Fax: 0064 9 837 8532
E-mail: editor@bharatdarshan.co.nz
न्यूज़ीलैंड की हिंदी पत्रकारिता- रोहित कुमार ‘हैप्पी’
न्यू मीडिया में हिंदी साहित्य की उभरती प्रवृत्तियाँ: शैलेश
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विषय परिचय
















