ऋषि कपूर और इरफ़ान खान के हवाले से कुछ बातचीत- प्रकाश के रे
Prakash K Ray
Posted by AaghaaZ on Thursday, April 30, 2020
फिल्म अभिनेता शशि कपूर एवं इरफान खान को याद करते वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश के रे
फाँस : उपेक्षित भारतीय किसान की मूक चीख- राजश्री सिंह
भारतीय किसान की मूक चीख
हिंदी विभाग
होने को है। राजनीति करवट ले रही है। विकास और तकनीक लोगों को लुभा रहे हैं।
कभी-कभी तो लगता है कि सचमूच भारत मीडिया और राजनेताओं के कहे अनुसार भारत हो गया
है परंतु जब-जब हम देखते हैं आत्महत्या को मजबूर किसानों को, रिक्शा चलाते मजदूरों को, मछुवारों को तो लगता है —
बदलाव और विकास की बातें राजनीति का मुद्दा भले ही हों, लोगों
के जीवन को परिवर्तित नहीं कर सका।
देश रहा है। आजादी के इतने वर्षों बाद भी भारत की अर्थ-व्यवस्था मुख्य रूप से कृषि
पर ही आधारित है, लेकिन सच्चाई तो यह है कि कृषि से जुड़ा
हुआ किसान आज अपनी पूर्वावस्था से ज्यादा दयनीय अवस्था में जी रहा है। शायद ही ऐसा
कोई दिन होगा जहाँ समाचार पत्रों में कृषक आत्महत्याओं का उल्लेख न हो। उत्पादन का
आधार कृषक है और कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था
की रीढ़ है। सभी व्यवस्थाएँ अर्थव्यवस्था से जुड़ी हैं। हालात यह है कि सभी
व्यवस्थाएँ मजबूत होती जा रही हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था के इस दौर में किसानी
व्यवस्था ही हाशिए पर ढकेल दी गई है।
में किसानों की सतत उपेक्षा, किसानों का किसानी से पलायन,
आत्महत्याओं का भयावह आँकड़ा केवल एक समस्या नहीं है बल्कि भविष्य
के लिए एक चेतावनी भी है। इस चेतावनी को प्रेमचंद के बाद किसी ने गहराई से समझा तो
वे हैं –कथाकार संजीव। संजीव एक ऐसे कथाकार के रूप में पहचाने जा रहे हैं जो एक
विषय पर पहले अइनुसंधान करते हैं फिर उस अनुसंधान को अपनी सृजनात्मकता के आधार पर
पाठक को सौंप देते हैं। आज 70 फीसदी से ज्यादा कृषि आधारित
व्यवस्था मुनाफा कमा रहे हैा लेकिन इस खाद्य
श्रृंखला में किसान ही है जिसकी स्थिति अत्यंत दयनीय है। ऐसे में कथाकार
“संजीव‘ पाँच साल के गहन शोध एवं अथक परिश्रम से देश के
किसानों की समस्याओं, आत्महत्याओं की इस सतत् त्रासदी पर
“फाँस‘ जैसा उपन्यास लेकर हमारे सामने आते हैं एवं इस
पूरे प्रकरण की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक
और राजनैतिक पेंचीदगियों की सूक्ष्म पड़ताल करते हुए भारत के इस ज्वलंत और बुनियादी
समस्या को सशक्त रूप से उठाते हैं।
में है “विदर्भ‘ और विदर्भ के माध्यम से समूचे देश के
किसानों की समस्याएँ ओर इन समस्याओं को उकेरते हुए अनेक ऐसी समस्याएँ और तथ्य
जिन्हें हम जैसे लोग जो प्रत्यक्ष रूप से कृषि से जुड़े नहीं है, अनभिज्ञ हैं, सामने आए हैं, “फाँस‘ की कहानी आरंभ होती है विदर्भ के यवतमाल जिले
के बनगाँव के एक किसान परिवार शिबू और शकून तथा उनकी दो बेटियों की अपनी
दुख-तकलीफों, सपनों की दुनियाँ से और धीरे-धीरे किसानों के
जीवन के कई अंधेरे-उजाले कोनों में झाँकते हुए आगे बढ़ती है। “फाँस‘ एक किसान, एक घर, एक खेत,
एक दुस्वप्न, एक आत्महत्या से शुरू होने वाली
कहानी में आशा वानखेड़े, सुनील, माधव
आदि कई किसान, कई घर, कई खेत, अनगिनत नष्ट फसलें और अनगिनत टूटे सपने, अनगिनत
आत्महत्याओं की कहानियाँ जुड़ते-जुड़ते यह देश-भर के लिए अन्न उपजाने वाले किसानों
की हत्याओं और उनके साथ की जाने वाली साजिशों की महागाथा बन जाती है।
निर्भर है। आज भी लाखों भूमिपुत्र का जीविकोपार्जन खेती पर ही निर्भर है। विडंबना
यह है कि सुबह से शाम खेती के लिए अपना जीवन होम करने वाले किसानों को पेट भरने के
लिए दो जून की रोटी भी नसीब नहीं होती। कृषि उनके गले की फाँस बन गई है –जिसे
अपनी प्रवृत्ति और मजबूरी के कारण न छोड़ पाते हैं न ही उसमें खुश रह पाते हैं। ये
प्रवृत्ति और मजबूरी के कारण न छोड़ पाते हैं न ही उसमें खुश रह पाते हैं। ये प्रवृत्ति
और मजबूरियाँ अनेक हैं जिन्हें हम उपन्यास में स्पष्ट रूप से देख सकते हैं।
किसानों के खेती न छोड़ पाने के प्रमुख दो कारण है –एक कृषि दासता तो दूसरा अन्य
कोई विकल्प का न होना। शिबू अपनी इसी मजबूरी को बयां करता है –“”अकेला
होता तो चला भी जाता कहीं … नागपुर, नासिक, मुंबई, दिल्ली … लेकिन ये दो-दो मुलगियाँ, बायको इन सबको लेकर कहाँ जाऊँ।”1 इसके जवाब में
कलावती कहती है –“”तुम ही नहीं, इस देश के सौ में
से चालीस शोतकरी आज ही खेती छोड़ दें अगर उनके पास कोई दूसरा चारा हो। 80 लाख ने तो किसानी छोड़ भी दी।”2 आगे किसानी
मानसिकता को बयां करते हुए कलावती कहती है –“”एक विद्वान ने कहा है कि
खेती कोई धंधा नहीं, बल्कि एक लाइफ स्टाइल है जीने का तरीका,
जिसे किसान अन्य किसी भी धंधे के चलते नहीं छोड़ सकता।”3
व्यवस्था को बचाए-बनाए रखा है पर सोचने की बात यह है कि तरक्की और विकास के तमाम
दावों के बावजूद किसान आज विपन्न है और कर्ज के बोझ और प्रकृति की मार ने उसे
आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया है और 1990 के दशक के बाद
से यह आँकड़ा बढ़ता ही चला जा रहा है। राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय के आँकड़ों
के अनुसार –“”भारत भर में 1995 ई. से 2011 के बीच 17 वर्षों में 7 लाख,
50 हजार, 860 किसानों ने आत्महत्या की है।
भारत में धनी और विकसित कहे जाने वाले महाराष्ट्र में अब तक आत्महत्याओं का आंकड़ा
50 हजार 830 तक पहुँच चुका है। 2011 में मराठवाड़ा में 435, विदर्भ में 226 और खान देश (जलगाँव क्षेत्र) में 133 किसानों ने
आत्महत्याएं की हैं। आँकड़े बताते हैं कि 2004 के पश्चात
स्थिति बद से बदतर होती चली गई। 1991 और 2001 की जनगणना के आँकड़ों को तुलनात्मक देखा जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि
किसानों की संख्या कम होती चली जा रही है। 2001 की जनगणना के
आँकड़े बताते हैं कि पिछले दस वर्षों में 70 लाख किसानों ने
खेती करना बंद कर दिया। 2011 के आँकड़े बताते हैं कि पाँच
राज्यों क्रमश: महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश
और छत्तीसगढ़ में कुल 1534 किसान अपने प्राणों का अंत कर
चुके हैं।”4
हैं जिन्हें वे अपनी सूची में शामिल ही नहीं करते। मरता है किसान कर्ज से ही यदि
कर्ज से न भी मरे तो उसी से उत्पन्न हुए परिस्थिति से मरता है पर सरकार के
नुमाइंदें उसे “पात्र-अपात्र‘ बनाने में लग जाते हैं।
उपन्यास में महिला शेतकरी “आशा वानखेड़े‘ की मौत तो
कर्ज के कारण हुई लेकिन उसे मुआवजा देने के बदले रिपोर्ट में यह लिखा जाता है
–“”लिखा गया –शराबी पति आए दिन के घरगुती के झगड़े से आजिज आकर उसने
ज़हर पी लिया।”5
बनाया जा सकता है जब किसी नेता से पहचान हो या घूस दो। शिबू के मामले में यही बात
है –“”पोस्टमार्टम, पंचनामा … घूस की डिमांड
–पैसे दे दो इन्हें “पात्र‘ बना दे वरना।”6 यही नहीं मुआवजे के रुपये भी पूरे नहीं मिलते। एक किसान अपने इसी दर्द को
बयां करता है –“”बाप के नाम जमीन, मरा बेटा!
आत्महत्या अपात्र! कारण जमीन तो उसके नाम थी ही नहीं।”7 “”सरकार कृपया हम किसानों को यह बताए कि आत्महत्या करते वक्त किन-किन बातों
का ख्याल रखा जाए –कब और कैसे की जाती है आत्महत्या? किस पंडित से पूछकर …? यह भी सिखाया जाए कि कैसे लिखी जाती है सुइसाइडल नोट!”8 यही नहीं अधिकांश आँकड़ें महिला किसान के आत्महत्या को दर्शाता ही नहीं,
या यूँ कहें उन्हें किसान ही नहीं मानता जबकि महिलाएँ बड़ी संख्या
में किसानी से जुड़ी हैं। यह विडंबना ही है कि देश के एक बड़े समूह के लिए जीवन जीने
का विकल्प ही नहीं बचा है उनके लिए एकमात्र विकल्प मौत है। उस पर भी अधिकारियों का
पात्र-अपात्र करना उनकी बदनीयति को ही व्यक्त करता है।
पहले से ज्यादा मजबूत हो गया है। 1990 के आस पास से ही
बाजारवादी शक्तियों को खुली छूट मिलने लगी। इन शक्तियों का एकमात्र उद्देश्य है
लाभ कमाना। “फाँस‘ उपन्यास बार-बार इस सत्य को उद्घाटित
करता है और मनरेगा, आदर्श ग्राम योजना आदि पर सीधी चोट करते
हुए सरकार की नीतियों का पर्दाफ़ाश करता है। सरकार जनता को लुभाने के लिए ढ़ेर
सारी योजनाएं बनाती है पर सच्चाई तो यह है कि न तो वह जमीनी हकीकत से जुड़ी है न
ही किसानों की बुनियादी समस्याओं से। प्रश्न तो यह है कि संपूर्ण ग्रामीण रोजगार
योजना, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना, मनरेगा, प्रधानमंत्री ग्रामोदय जैसी किसानोन्मुखी
योजनाओं के बावजूद किसान क्यों आत्महत्या करने पर विवश है? इसका
सीधा जवाब यह है कि ये योजनाएँ किसानों को ध्यान में रखकर बनाए ही नहीं गए। इसका
सीधा लाभ बिचौलियों को मिलता है जिसमें कृषि के नाम पर ऋण देने वाला बैंक, सेठ, साहूकार, महाजन यहाँ तक
कि पुलिस अधिकारी सभी आते हैं।
का हथियार बन गई है। वास्तव में उनका भला कोई नहीं चाहता। प्रेमचंद के समय से
किसानों की समस्या उठी पहले जमींदार लुटते थे अब योजनाओं के आड़ में चेहरे बदलती
सरकारें। योजनाएँ तो बनती हैं पर किसानों के लिए नहीं अपने कायदे के लिए ताकि
इन्हें दिखाकर वोट बटोरा जा सके और विरोधी पार्टी पर तेज कसा जा सके। “फाँस‘
में नाना कहता है, “”किसानों के नाम पर अरबों रुपये लूटना है तो कृषक
आत्महत्या, अपनी चीनी मिल लगाने का बहाना ढूढँना है तो कृषक
आत्महत्या, विरोधी पार्टी को दागना है तो कृषक आत्महत्या
बहुत कारगर है। कृषक आत्महत्या बहुत कारगर है। कृषक आत्महत्या की तोप! …
घंटे-घंटे भर ड्रेस बदलने वाले गृहमंत्री करोड़ों-अरबों में खेलने वाले राजनेता,
फिल्मी लोग, दलाल, व्यापारी,
क्रिकेट और बिल्डर्स इनके लिए खेल हो गई है। 3
लाख किसानों की आत्महत्या! बर्फ के गोले-सा उठा-उठाकर मारते हैं एक दूजे पर। आरोप
छर्र! सफाई छर्र!”9 दिल्ली में ही बैठकर योजनाएं बना लेने
वाली सरकार के कई प्रतिनिधि नेताओं को खेती के बारे में साधारण-सी बाते मालूम
नहीं। “फाँस‘ का पात्र “विजयेंद्र‘ कहता है –“”कई नेता तो जानते भी नहीं कि आलू ऊपर फलता है या
नीचे, खेती धान की होती है, चावल की
नहीं कि सरपत और गन्ने के पौधे में क्या फर्क है!”10 यही
नहीं केवल लाभ कमाने की मानसिकता रखने वाली सरकार बिना परीक्षण, बिना प्रभाव जाने सीधे-साधे किसानों को लालच देकर बी टी काटन जैसे नकदी
फसल बोने के लिए महँगे बीज खरीदवाया। इसके लिए ऋण भी दिया और आश्वासन दिया कि न ही
बीज लेने होंगे और नहीं कीटनाशक पर समस्या घटने के बजाय विकराल रूप धारण कर लिया।
दूसरी बार में ही फसल चौपट हो गई। फिर से खाद, नये जन्में
कीटों के लिए और अधिक महंगे कीटनाशक, फिर से मजदूरी, फिर से कर्ज। किसान फिर लुट गया। बैंक और साहुकार सूद वसुलने के लिए सिर
पर सवार हो गये। धरती बंजर हो गई। कई किसान आत्महत्या करते, कई
आंदोलन में अपना जीवन बर्बाद। जोशी जैसे नेता आंदोलन के दम पर नेता बन जाते हैं और
फिर अपने भाई-बंधुओं को नहीं पूछते। सरकारें दबाव में या यूँ कहें चुनाव के बदले
कर्ज माफ करने की घोषणा भी करती है पर अफसोस यह कर्ज माफी भी एक छलावा ही है
क्योंकि पहली बात तो बैंक ऋण बहुत कम देता है। खेती के लिए लोन लेना है तो पहले
अपना सबकुछ बेचकर बीज खरीदो, खेती से संबंधित व्यवस्था करो
तब कहीं लोन की आशा रखो। जाधव बैंक की नीति को उजागर करते हुए कहता है
–“”हम लोग सभी जगह गये थे, कहीं से लोन-वोन नहीं
मिला। बोले, हीरो होंडा लेना है तो बोलो। खेती के लिए कितना
लोन मिलेगा?”11 तो दूसरी बात यह है कि किसान इन पचड़ों से
बचने के लिए प्राइवेट एजेंसियों और देसी बनियों से ऋण लेते हैं जिसका अर्थ यह हुआ
कि सरकार ने तो सरकारी बैंकों से लिया हुआ कर्ज माफ किया और सरकारी कर्ज तो सभी को
मिलें ही नहीं। अत: बात यह हुई कि सरकार
ने पुन: किसानों के बहाने बैंकों का ही उद्धार किया।
कर्ज में ही मरता है। हरियाणा आदि के कुछ बड़े किसानों को छोड़ दें
तो पूरे भारत के अन्य राज्यों चाहे वह तेलगांना हो या विदर्भ या यू.पी या
मध्यप्रदेश सभी किसानों की समस्या लगभग एक है। सभी कर्ज के फाँस में फंसे है। जो
धीरे-धीरे उन्हें आत्महत्या की ओर ले जाती है पर अफसोस की बात है कि आई. एम. एफ.
के इशारे पर चलने वाली सरकार कृषक विरोधी है। यही कारण है कि खेती में सब्सिडी
देने के बदले कर्ज का मकड़जाल फैलाती है, जिसमें बेचारा
किसान फँसता चला जाता है। संजीव ने उपन्यास में कई बार अन्य देशों का उदाहरण देकर
यह स्पष्ट किया है कि किसानों को सब्सिडी मिलनी ही चाहिए। “खेतिहर संकट‘
लेख में भी यही बात कही गई है –“”सुविधाएं भी उन्हें
नहीं मिल रही। भारत में किसानों को सब्सिडी
दी जाती है लेकिन आर्गनाइजेशन फॉर योरोपीयन इकॉनॉमिक को ऑपरेशन के देशों
में किसानों को जितनी सब्सिडी हासिल है उससे तुलना करें तो पता चलेगा कि भारत के
किसान को मिलने वाली सब्सिडी इन देशों के किसानों को मिलने वाली सब्सिडी के सतांश भी नहीं है। (भारत के प्रति किसान
सब्सिडी 66 डॉलर है जबकि जापान में 26
हजार उालर, अमेरिका में 21 हजार डॉलर
और आर्गनाइजेशन फॉर योरोपीयन इकॉनॉमिक को ऑपरेशन के देशों में 11 हजार डॉलर)।”12
कारपोरेट वाले, बिल्डर्स, दूसरे सेठ,
फिल्म वालों का कब्जा होने लगा है। कृषि योग्य भूमि छिनती चली जा
रही है। “फाँस‘ में मोहन जब नाना से कहता है कि उसे कोई
काम चाहिए तब नाना कहता है –“”बालू, मिट्टी र्इंट
या खाद की ढुलाई। सड़कों के किनारे सारी खेती वाली जमीनें बिक चुकी हैं। मकान बन
रहे हैं। आने वाले दिनों में सिर्फ बिÏल्डगें होंगी, चमचमाती सड़के होंगी और चमचमाती गाडियाँ। न हमारे तुम्हारे जैसे लोग होंगे,
न खेती, न हमारी-तुम्हारी बैलगाडि़याँ।”13 इस तरह भूमि अधिग्रहण के मुद्दा को भी संजीव ने “फाँस‘ में उठाया है।
भी आज सफलता व लाभ के भँवर में ऐसा फँसा है कि उसे किसानों की आत्महत्या की खबरें
महज एक हेडलाइन से ज्यादा कुछ नहीं लगती। किसान, मजदूर,
कभी खबर के केंद्र में नहीं हैं। केंद्र में है तो राजनीति, नेता, कलाकार आदि की खबरें। संजीव ने अपने उपन्यास
में जगह-जगह ये बातें उठाई है –“”मीडिया की हजार-हजार आत्महत्याएं कोई
खबर नहीं बन पाती। खबर बनती है मुंबई में चल रही लक्में फैशन वीक की प्रतियोगिता। 512 खबरिया चैनल जुटे हैं उसे कवर करने को। मात्र 512 …।”14
आता तो हम उसकी स्थिति का सहज अनुमान लगा सकते हैं। जितनी उपज मिलती है उसके
अनुपात में लागत ओर मेहनत का आकलन किया जाए तो उससे ऊपर ही होती है। यानी किसान को
कुछ नहीं मिलता। आलम यह है कि 1970 में मजदूरी और टीचर का
वेतन लगभग एक समान था आज शिक्षकों का वेतन बढ़ गया है। यही नहीं राजनेताओं की भी
तनख्वाह की बात कहीं जाए तो वह आसमान छू रही है पर अफसोस की बात है कि किसान,
मजदूर की स्थिति वैसी ही रह गई। यह अंतर भयावह है। उपन्यास में इसी
सत्य को उद्घाटित करते हुए आंध्र का एक किसान प्रतिनिधि कहता है –“”नये
मुख्यमंत्री को कृषक आत्महत्याओं की कोई चिंता नहीं, जबकि
एम. एल. एज. की तनख्वाह 95,000 से बढ़ाकर दो लाख करने जा रहे
हैं, किसान तो हर तरफ से ठगे गये।”15
यूँ कहे तो किसानों से बेहतर मजदूरों की स्थिति है। कम से कम उन्हें रुपया हाथ में
मिलता है और किसानों को नकदी तुरंत मिलने की आशा भी नहीं रहती। यही नहीं यदि वे
अपने जीविकोपार्जन के लिए जंगल पर निर्भर करते हैं तो सरकारी कारिंदे सरकार का डर
दिखाकर उन पर अत्याचार करते हैं। विकास के नाम पर आदिवासियों का उनसे सब कुछ छीन
लिया गया है। यह विडंबना ही है कि जंगल के फल, फूल जानवरों
के लिए तो हैं पर मनुष्यों के लिए नहीं। वे अपनी स्थिति से मुक्ति पाने के लिए
अपने बच्चे को सब कुछ बेचकर पढ़ाते हैं। पर शिक्षा उन्हें इस हद तक संस्कृतिविहिन
बना देती है कि वे पढ़-लिखकर खेतों में काम करना नहीं चाहते। शिक्षाविद् भी इस ओर
ध्यान नहीं देते पर संजीव ने विजयेंद्र के माध्यम से इस समस्या को भी सामने रखा है
–“”देयर इज नो सब्स्टीच्यूट ऑफ हाई वर्क! कड़ी मेहनत करके तुम्हें
डॉक्टर बनना है, इंजीनियर, साइंटिस्ट,
इकोनोमिस्ट, इडस्ट्रियलिस्ट बनना है …।”16 तब एक स्टुडेंट धीरे से उठा –“”एंड ह्वाई नॉट ए फारमर,
एन एग्रिकल्चरिस्ट सर?”17 यह प्रश्न अपने आप
में बहुत बड़ा है शिक्षा में भी जमीनी हकीकत की उपेक्षा मिलती है। किसान को वहाँ
भी जगह नहीं। यदि बच्चे पढ़ लिख गये तो भी रि·ात के बिना
नौकरी नहीं और यदि नौकरी मिल गई तो, वे घर छोड़कर चले जाते
हैं और नगरों, महानगरों का आकर्षण उन्हें गाँव लौटने नहीं
देता। इन सब परिस्थितियों ने किसान को लाचार बना दिया है। उनके लिए अपने परिवार का
भरण-पोषण करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में मौसम की मार और कर्ज उसे ऐसी स्थिति
में लाता है कि वे आत्महत्या करने को बाध्य हो जाते हैं। “सेवासदन‘ के चेतू से लेकर “गोदान‘ के होरी की मृत्यु
स्वाभाविक नहीं बल्कि एक हत्या है, जिसकी जिम्मेदार सिर्फ और
सिर्फ हमारी व्यवस्था है। “”सरकारी नीतियाँ, बैकों
की पॉलिसी, उद्योगपतियों की स्वार्थभावना, मौसम की प्रतिकूलता आदि ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से किसानों के जीवन में
दुखों का अंबार टूट पड़ता है और वे आत्महत्या करने के लिए विवश हो जाते हैं।”18 गाँवों में मूलभूत सुविधाएँ आजादी के इतने वर्षों बाद भी नहीं पहुँची।
आश्चर्य की बात है कि कलावती के पास फोन है पर गाँव में बिजली नहीं। गन्ने के
खेतों के लिए सभी सामग्री है पर पानी नहीं। ऐसे में किसान या तो नक्सलाइट बनते हैं
या आत्महत्या कर लेते हैं। बाजारीकरण का ऐसा प्रभाव है जिसने सच्चाई पर पर्दे डाल
झूठ को बेचना शूरू किया है। यही कारण है कि राम जी दादा जी द्वारा खोजे एच. एम.
टी. धान के बीज को विश्वविद्यालय ने अपना कहकर ऊँचे दामों पर बेचना शुरू कर दिया।
पेटेंट मिलना तो दूर सरकार ने जो सोने का मेडल दिया वह भी नकली निकला जबकि मंदिरों
में असली सोना चढ़ाया जाता है। उदारीकरण के फलस्वरूप कृषि क्षेत्र की स्थिति क्या
होगी? राजकिशोर द्वारा संपादित “विनाश को निमंत्रण : नई
अर्थनीति‘ में देख सकते हैं –“”किसानों की
स्वायत्तता समाप्त होगी। वह सिर्फ अपने परिवार के श्रम के पारिश्रमिक का हकदार
होगा। अंग्रेजों के जमाने में नील की खेती निलहों के आदेश से होती थी, आने वाले दिनों में उसी प्रकार की व्यवस्था बाजार की शक्तियों द्वारा की
जाएगी। दोनों का अंजाम एक-सा होगा।”19
बस उसे समझकर अभिव्यक्त करने की दृष्टि होनी चाहिए। संजीव के पास
यही दृष्टि है, किसानों के आत्महत्या के कारणों को बारीकी से
समझा है, उसका मनोवैज्ञानिक अध्ययन भी प्रस्तुत किया है।
सरकारी नीतियों, कॉर्पोरेट जगत, अर्थ केन्द्रित
अन्य पेशा तथा उससे मिलने वाली सुविधाओं का आकर्षण, किसानी
समाज में उसकी प्रतिष्ठा आदि तो उन कारणों में है ही इसके अलावा शराब भी एक वजह है
जिसने आशा जैसे अनेक घर बर्बाद किए हैं। शकुन जैसी स्त्रियाँ इसके विरोध में खड़ी
भी होती हैं। अनेक बार शराब माफियों के लोग बुरी तरह पीटते हैं, वे पुलिस के शरण में जाती है पर उपन्यास में ऐसे तथ्य सामने आते हैं जो
पाठक को सोचने पर मजबूर कर देते हैं। पुलिस छोड़ों सरकार के प्रतिनिधि भी इसमें
मिले होते हैं। एक उदाहरण देखिए –“”ये कितने ताकतवर हैं, इसका एक उदाहरण यहीं आपके सामने है। आपने अखबारों में पढ़ा ओर टी. वी. में
देखा होगा कि हजारों मैट्रिक टन गेहूँ खुले में सड़ गया। अपने यहाँ भी यही हुआ।
दरअसल वह सड़ नहीं गया, बल्कि उसे सड़ जाने दिया गया। क्यों
…? सड़े हुए गेहूँ से शराब बनती है। लग गयी बोली। उस सड़े
हुए गेहूँ को सस्ते में उन्हीं लोगों ने ले लिया जिन्होंने उसे खुले में छोड़कर
नष्ट किया था। पहले सड़ाया, फिर शराब बना दी –सस्ते में
खरीदकर। ट्रिपल क्राइम।”20
समझे दूसरे को समझा नहीं जा सकता। अंतरजातीय प्रेम हो या ब्राह्मणवादी हिंदू आचार
संहिताओं का पीढि़यों से शिकार रहे दलितों का धर्मांतरण, स्त्रियों
की स्थिति हो या सामाजिक प्रतिष्ठा बचाए रखने की कवायद सभी समस्याओं का चित्रण
संजीव ने बहुत बारीकी से किया है।
आखिर बाबा साहेब अंबेडकर और दूसरे लोग पचास के दशक में बौद्ध धर्म की तरफ क्यों गए?
पहले आजादी का इंतजार किया और हारकर धर्म छोड़ना पड़ा। बराबरी की
चाह, भूख की व्याकुलता, जाति व्यवस्था
से बाहर आने की बेचैनी उन्हें ले गई बौद्ध धर्म की शरण में।
में ही समाज की एक प्रवृत्ति सामने आती है और वह है लड़कियों पर तरह-तरह के
प्रतिबंध लगाने की। यहाँ भी हिंदी प्रांतों वाली नजरिया देखने को मिलती है। शिबू
की छोटी मुलगी (बेटी) सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए अपने सखी के गाँव क्या चली जाती
है अफवाहों का सिलसिला चल पड़ता है। इससे परेशान शिबू स्कूल न जाने की फरमान जारी
कर देता है –“”और पढ़ाओ, मुलगियों को, जैसे पढ़-लिखकर बैरिस्टर बनेंगी।”21 पढ़ाई बंद करा
कर यदि शादी की बात भी कोई सोचता है तो सामने आती है दहेज की समस्या। विवाह का
होना “डिमांड‘ पर निर्भर करता है। “”मुलगे का
पिता –अपनी तो कोई डिमांड नहीं लेकिन आपका इतना देखना तो फर्ज बनता है कि आपकी
मुलगी जहाँ आए, सुखी रहे। रेट तो सबको मालूम है –एक हीरो
होंडा, एक लाख नगद।”22 यही नहीं विवाह
में जाति व्यवस्था भी अहम भूमिका निभाती है। इन सब के बावजूद विवाह हो गया तो
तरह-तरह के पाबंदियाँ। चाहे बौद्ध धर्म हो या हिंदू सभी धर्मों में अशिक्षा के
कारण स्त्रियों की स्थिति एक-सी है। इसके अतिरिक्त वे अंधविश्वास, भेदभाव, सामंती कहर, विदेश ले
जाने वाले अनैतिक चैनलों आदि समस्याओं को भी उठाया है और साथ ही कीटनाशक आदि के
प्रयोग से किस तरह प्रकृति और प्राणी दोनों प्रभावित होते हैं, इसकी भी विस्तार से चर्चा की है।
विडंबनाओं की ही बात नहीं करते, उसके समाधान का विकल्प या
मॉडल भी प्रस्तुत करते हैं। वह “मंथन‘ के माध्यम से सभी
कृषि विशेषज्ञों और किसानों को एक मंच पर ला खड़ा करते हैं और प्राथमिक जरूरतों को
रेखांकित करते हैं –जल संरक्षण, संपूर्ण मद्य का निषेध,
जी. एम. बीजों के स्थान पर देशी बीजों का प्रयोग, विदेशी खादों की जगह देशी कम्पोस्ट, कीटनाशकों के
देशी विकल्प का प्रयोग ताकि मिट्टी, पानी प्रदूषित न हो और
मित्र पक्षियों तथा प्रकारांतर में मानव जीवन को बचाया जा सके। यही नहीं सरकारी
बैंकों से ऋण लेने देने की व्यवस्था को किसानोपयोगी बनाए जाने की बात कहते हैं। मौत
को रोकने का प्रयास किया जाए और भ्रष्टाचार को कम करके मुआवजों में एकरूपता लाई
जाए। किसान अपने उत्पाद की कीमत खूद लगाये कोई बिचौलिया न हो, पर यह तो संजीव ने समाधान बताया, होता है इसके ठीक
उल्टा। राजकिशोर ने “उदारीकरण की राजनीति‘, “कृषि
का भविष्य‘ में इसी स्थिति को अभिव्यक्त किया है
–“”भारतीय किसानों को छोड़कर विश्वका प्रत्येक उत्पादक अपने उत्पाद की
कीमत अपनी लागत और मुनाफे को ध्यान में रखकर तय करता है। वहीं भारतीय किसानों के
अनाज की कीमत या तो सरकार तय करती है या फिर इसे पूंजीपतियों या खरीददारों पर छोड़
दिया जाता है, यह किसानों की मजबूरी है कि वह अपना उत्पाद
मूल्य तय किए बिना बेच रहा है, जिससे कि उनकी स्थिति भयावह
हो जाती है।”23
उपन्यास को एक सामाजिक दस्तावेज बनाया है जिसमें तथ्य पर तथ्य खूलता जाता है और
पाठक नये-नये सच्चाइयों से अवगत होता चला जाता है बावजूद इसके उपन्यास पाठक को
अन्य कृतियों की तरह बाँधकर नहीं रख पाता। उपन्यास के कई हिस्से अत्यधिक
विवरणात्मक और सूचनात्मक हो जाते हैं जिसके कारण रचनात्मक सुंदरता बाधित होती है।
हालांकि संवेदनात्मक स्तर पर यह पाठकों को उपन्यास से जोड़ती है। छोटी, सिंधु ताई, शंकुतला, अशोक,सुनील, विजयेंद्र आदि पात्र पाठ के दौरान और बाद तक
भी हमारे जेहन में रह जाते हैं। कई मर्मांतक स्थल मन को भीतर से झकझोर देता है
परंतु पाठक की उपन्यास के बंधाव को लेकर आकांक्षा कुछ ज्यादा की होती है। लगभग 42 अध्याय और 255 पृष्ठों में लिखे इस उपन्यास में
संजीव ने पाठकों को अवसादग्रस्त होने से बचाने के लिए हैप्पी एंडिंग करने की कोशिश
की है जो पाठक में एक सकारात्मक सोच पैदा करता है, जो
साहित्य की दृष्टि से सकारात्मक पहलू है।
कह सकते हैं कि संजीव ने एक कड़वे, कठोर सच को पाठकों के
सामने रखने के लिए भाषा और शिल्प भी सीधा और भेद के रख देने वाला चूना है। चूँकि
उपन्यास की पृष्ठभूमि महाराष्ट्र है इसलिए उपन्यास में बहुतायत मराठी शब्द
प्रयुक्त हुए हैं। जैसे –मुलगा (लड़का), मुलगी (लड़की),
बायको (पत्नी), नवरा (पति), हल्या (भैंस), वडील (पिता), बटाटा
(आलू), कांदा (प्याज), शेत (खेत),
श्ोतकरी (किसान) आदि जो धीरे-धीरे हिंदी में हिल-मिल जाते हैं और
सारे शब्द परिचित जान पड़ते हैं। अंग्रेजी शब्दों के भी प्रयोग हुए हैं पर उनका
प्रयोग स्वाभाविक लगता है। आजकल के प्रचलित गानें, उनका
प्रयोग जैसे “आज मैं ऊपर आसमां नीचे‘, “यारा
सीली-सीली‘ आदि पात्रों के कथन को अधिक स्वाभाविक बनाते हैं।
कुल मिलाकर कह सकते हैं कि इसके पात्र अपने कथनों से अपना अलग ही शिल्प गढ़ते हैं।
को पढ़ना आज के समय में देश की सबसे अवसादपूर्ण घटना से, हादसों की एक लंबी श्रृंखला से गुजरना, सामना करना
है। यह एक ऐसे विषय को सामने लाता है जिसे हम लगातार अनदेखा कर देते हैं। उदारीकरण
के बाद हमारी सरकारें किसके हित में काम कर रही है यह स्पष्ट हो जाता है। यह
उपन्यास उन सभी आत्महत्याओं का साक्षी बनकर आता है जिनके परिवार अपने परिजन को
खोने के बाद खेती से तौबा कर लेते हैं। उनके द्वारा की गई आत्महत्या स्वीटजरलैंड
की मर्सी कीलिंग नहीं बल्कि उन पर लादी गई व्यवस्था की बोझ है जो आत्महत्या के नाम
पर उनकी हत्या कर रही है। “फाँस‘ वैश्वीकरण, हमारी कृषि नीति पर, सामाजिक, राजनीतिक,
धार्मिक, आर्थिक ढाचें पर सवाल खड़ा करता है,
आखिर क्यों बाजार में कृषि उत्पादों की दलाली करने वाले मालामाल हैं,
जबकि किसानों के हाथ खाली हैं। आजादी के पहले से बनी ये समस्याएं आज
राजनैतिक उपेक्षा और भ्रष्टाचार के कारण नासूर बन गई है जिनका इलाज असंभव-सा लगता
है। ये सामाजिक दस्तावेज एक चेतावनी है जिससे पता चलता है कि यदि हालात न बदले तो
ऐसा समय भी आएगा जब दुनिया का हर आदमी उपभोक्ता होगा, वह
अपने मनपसंद उत्पाद को खरीदने की कोई भी कीमत देने को तैयार होगा, पर पैदा करने, उपजाने वाला कोई न होगा।
है न आसमां के लिए
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ – 17
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ – 17
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ – 17
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ – 145
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ – 105
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ – 116
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ – 116
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ – 153
संजीव, फाँस, वाणी
प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015,
पृष्ठ – 109
संजीव, फाँस, वाणी
प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015,
पृष्ठ – 47
http://www.imtchange.org/hindi/खेतिहर-संकट/खेतिहर-संकट-70 html
संजीव, फाँस, वाणी
प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015,
पृष्ठ – 36
संजीव, फाँस, वाणी
प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015,
पृष्ठ – 183
संजीव, फाँस, वाणी
प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015,
पृष्ठ – 247
संजीव, फाँस, वाणी
प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015,
पृष्ठ – 112
संजीव, फाँस, वाणी
प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015,
पृष्ठ – 112
अग्रवाल, प्रमोद कुमार, भारत
के विकास की चुनौतियाँ, “भारतीय कृषि‘, लोकभारती प्रकाशन, दिल्ली, पहला
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कृषि नाश का अचूक नुस्खा, राजकिशोर द्वारा
संपादित, “विनाश को निमंत्रण : नई अर्थनीति‘ में संकलित, वाणी प्रकाशन, नई
दिल्ली, संस्करण : 1994, पृष्ठ – 83
संजीव, फाँस, वाणी
प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015,
पृष्ठ – 200
संजीव, फाँस, वाणी
प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015,
पृष्ठ – 11
संजीव, फाँस, वाणी
प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015,
पृष्ठ – 94
राजकिशोर, उदारीकरण की राजनीति, “कृषि का भविष्य‘, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण 1998, आवृत्ति 2009, पृष्ठ – 82
संजीव, फाँस, वाणी
प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015,
पृष्ठ – 106
[जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के अंक 23 में प्रकाशित]
फणीश्वरनाथ रेणु के साहित्य में आंचलिक सैद्धांतिकी का सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन-सपना दास
फणीश्वरनाथ रेणु के साहित्य में आंचलिक सैद्धांतिकी का सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन
सपना दास
शोधार्थी, हिंदी विभाग
दिल्ली विश्वविद्यालय
सम्पर्क-7044355873
मेल- sapna070295@gmai।.com
सारांश
सौंदर्यशास्त्र, वास्तव में कला एवं साहित्यिक सौंदर्य जैसे कल्पना, कार्य निर्माण स्थल, इंद्रिय बोधगम्यता, अनुभूति, मनोदशा, विश्वास आदि के अध्ययन करने की एक विशिष्ट शाखा है। यह अध्ययन एक ओर जहाँ कला व साहित्यिक सौंदर्य हेतु स्वाद और आनंद का मिलाप है वहीं दूसरी ओर कला को महसुस करता है और संस्कृति के महत्वपूर्ण तत्वों को प्रतिबिंबित कर साहित्य एवं समाज को प्रभावित करता है। वस्तुत: किसी भी वस्तु विशेष अथवा सकारात्मक विशिष्टताओं के कारण, प्राप्त होने वाले अनुभूतियों को व्यक्ति अपने भीतर आत्मसात करता है तभी सौंदर्यानुभूति की प्राप्ति होती है। सौंदर्यानुभूति अर्थात् सुंदर अथवा विशिष्ट तत्वों की प्राप्ति हेतु सुंदर अनुभूति। जबकि सौंदर्यशास्त्र, सौंदर्य+शास्त्र दो शब्दों के मेल से बना है। चूँकि, शास्त्र का सीधा अर्थ ‘ज्ञान की शाखा’ से है। इस प्रकार, रेणु के साहित्य के सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन में बिम्ब, प्रतीक तथा कल्पनाओं को प्रमुख श्रेणी के अंतर्गत रखा जाता है।
बीज शब्द: शास्वत, सौंदर्य, सौंदर्यीकरण, सौंदर्यानुभूति, सौंदर्यबोध, सौंदर्यशास्त्र
शोध आलेख
सौंदर्यशास्त्र, वास्तव में कला एवं साहित्यिक सौंदर्य जैसे कल्पना, कार्य निर्माण स्थल, इंद्रिय बोधगम्यता, अनुभूति, मनोदशा, विश्वास आदि के अध्ययन करने की एक विशिष्ट शाखा है। यह अध्ययन एक ओर जहाँ कला व साहित्यिक सौंदर्य हेतु स्वाद और आनंद का मिलाप है वहीं दूसरी ओर कला को महसुस करता है और संस्कृति के महत्वपूर्ण तत्वों को प्रतिबिंबित कर साहित्य एवं समाज को प्रभावित करता है। वस्तुत: किसी भी वस्तु विशेष अथवा सकारात्मक विशिष्टताओं के कारण, प्राप्त होने वाले अनुभूतियों को व्यक्ति अपने भीतर आत्मसात करता है तभी सौंदर्यानुभूति की प्राप्ति होती है। सौंदर्यानुभूति अर्थात् सुंदर अथवा विशिष्ट तत्वों की प्राप्ति हेतु सुंदर अनुभूति। जबकि सौंदर्यशास्त्र, सौंदर्य+शास्त्र दो शब्दों के मेल से बना है। चूँकि, शास्त्र का सीधा अर्थ ‘ज्ञान की शाखा’ से है। इस प्रकार, रेणु के साहित्य के सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन में बिम्ब, प्रतीक तथा कल्पनाओं को प्रमुख श्रेणी के अंतर्गत रखा जाता है।
हिन्दी साहित्य में लोकप्रिय आंचलिक लेखको के क्रम में सर्वोपरी स्थान फणीश्वरनाथ रेणु का है। जीवन-अनुभव के परिपक्व होने के साथ-साथ उनका चिंतन, दृष्टिकोण एवं यथार्थबोध भी बदलता है, जिसका प्रतिफलन उनकी रचनाओं में स्पष्ट है। उनका पहला उपन्यास ‘मैला आंचल’ आंचलिक जीवन बोध के रचनात्मक कसौटी पर एकदम खरा उतरता है। यथार्थ के अन्वेषण की दिशा में यह उपन्यास स्पष्टत: स्तुत्य प्रयास कहा जा सकता है। रेणु के साहित्य में सौंदर्य वह कलात्मक अनुभूतियाँ है, जिसके द्वारा कला एवं साहित्य व इन्द्रियों के सुसज्जित ज्ञान की अभिव्यक्ति का बोध सारगर्भित रूप से होता है। इस धरती पर दिखाई देने वाले प्रत्येक वस्तु में कला का निरूपण है, बशर्तें उस कला को अनुभव करने के लिए पारखी नज़र हो। ठीक उसी प्रकार सौंदर्यशास्त्रीय संरचना मुख्यरूप से शील एवं शक्ति से हुई है। यानी इस धरती की संरचना में शील, शक्ति एवं सौंदर्य का सम्मिश्रण है। “सत्यम्, शिवम, सुन्दरम्” से लेकर “वसुधैव कुटुम्बकम्” तक की प्रक्रिया भी इसी सृष्टि के अंतर्गत निहित है।
शताब्दी वर्ष बाद रेणु के साहित्य में सौंदर्य और आंचलिकता बोध को जानने व समझने हेतु निम्नलिखित बिंदुओं की ओर ध्यान केंद्रित करना होगा, जो इस प्रकार हैं-
‘अंचल’ बनाम ‘आंचलिकता’
देश या प्रांत का एक भू-भाग जिसे ‘अंचल’ की संज्ञा दी जाती है। यानी किसी एक प्रांत व देश की भौगोलिक सीमा के आस-पास के भाग व क्षेत्र को अंचल कहा जाता है। ‘अंचल’ शब्द की निष्पति मूल रूप से संस्कृत के ‘अच्’ धातु में ‘अलंच्’ प्रत्यय के लगने से हुई है। ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी के अनुसार “अंचल से अभिप्राय इस भूमि खंड, देश या किसी सीमा तक परिभाषित भाग से है, जो कुछ आकृतियों आकारों, जलवायु सम्बन्धी दशाओं, विशेष जीवन वनस्पति के कारण भिन्न रहता है।”1
आंचलिकता शब्द की व्युत्पत्ति
आंचलिकता शब्द की व्युत्पत्ति ‘अंचल’ से हुई है। ‘अंचल’ शब्द में गुणवाचक तद्धित प्रत्यय ‘ईक’ के योग से ‘आंचलिकता शब्द की निर्मिति हुई है। ‘आंचलिक’ शब्द से ही ‘आंचलिकता’ शब्द का रूपायन हुआ है। अंग्रेजी में ‘आंचलिकता’ के लिए ‘लोकल’ या ‘रिजन’ शब्द का प्रयोग मूलत: रूढ़ हो गया है। यानी ‘रिजन’ से ‘रिजनल’ और ‘रिजनल’ से ‘रिजनलिज्म’ शब्द का आविर्भाव हुआ है।
आंचलिक व आंचलिकता का अर्थ
अंग्रेजी के रिजन, रीजनल, रिजनलिज्म का ही हिंदी रूपांतरण है- अंचल, आंचलिक व आंचलिकता, तथा आंचलिकतावाद व आंचलिकता बोध।
इस प्रकार, एक सौ एक वर्ष बाद फणीश्वरनाथ रेणु के साहित्य में आंचलिक सैद्धांतिकी बोधगम्य का परिदृश्य को निम्नलिखित टूल्स के आधार पर जान सकते हैं, जो इस प्रकार से हैं-
आंचलिक सैद्धांतिकी बोधगम्यता के आधार पर-
क्षेत्र विशेष के विशेष भौगोलिक खंड विशेष जहाँ मानव अपनी लोक संस्कृति को उजागर कर जमीन से जुड़ा रहता है। साथ ही अपने गाँव व अंचल विशेष की तथाकथित गतिविधियों द्वारा भारतीय संस्कार का उजागर होता है। साथ ही नयी पीढ़ी, वर्ग, समुदाय में नवीनतम संचार करता है। डॉ. मृत्युंजय उपाध्याय ने आंचलिकता शब्द को पारिभाषित करते हुए लिखा है- “आंचलिकता एक बड़ा व्यापक अभियान है, जिसके अंतर्गत आंचलिक जीवन से संबंधित ग्राम्य जीवन की आशा-आकांक्षाएं, उनके रीति-रिवाज, पर्व-त्यौहार, धर्म-दर्शन, रुढ़ि, अंधविश्वास, बोली, लोकगीत भी आ जाते हैं। यह सर्वथा नवीन वस्तु नहीं है, वरन् दृष्टिकोण की नवीनता अवश्य है।”2 अत: आंचलिकता एक विशिष्ट प्रतिपाद्य है जबकि आंचलिकता बोध मौलिक दृष्टिकोण है।
साहित्यिक सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन के आधार पर-
हमारे आस-पास दिखाई देने वाले समस्त वस्तुओं में कला विद्यमान है और उस कला में आकर्षण द्वारा ही सौंदर्यानुभूति किया जा सकता है। यह सौंदर्य शिलालेख, पर्वतमालाएं, ऊँचे-ऊँचे पहाड़ में बखूबी अनुभव किया जा सकता है। सौंदर्य के संबंध में जयशंकर प्रसाद लिखते हैं-
“है यही सौंदर्य में सुषमा बड़ी
लौह-हिय को आंच इसकी ही कड़ी।
देखने के साथ ही सुंदर वदन,
दीख पड़ता है सजा सुखमय सदन।”3
यदि कोई व्यक्ति सुंदर वस्तु को देख कर भी अनदेखा कर रहा हो तो ऐसे में सौंदर्य की कलाभिव्यक्ति या उसकी आकर्षण शक्ति कम नहीं हो जाती। यदि वह व्यक्ति उस सौंदर्य को देखना ही नहीं चाहता तो इसमें सौंदर्य का क्या कसूर? इस सौंदर्य की सुंदर अभिव्यक्ति करते हुए केदारनाथ अग्रवाल लिखते हैं-
“असीम सौंदर्य की एक लहर
नदी से नहीं..
समुंद्र से नहीं,
देखते ही देखते…..
उमड़ी तुम्हारे शरीर से,
छाप कर छा गई,
फ़ैल गई मुझ पर।”4
भारतीय के ग्रामीण समाज में जाति व्यवस्था राजनीतिक व्यवहार को काफी प्रभावित करती है। ‘मैला आंचल’ उपन्यास में जाति व्यवस्था का बहुत बारीक चित्रण किया गया है। बावनदास, बलदेव से कहता है- “सब चौपट हो गया है यह पटनिया रोग है। अब तो और धूमधाम से फैलेगा। भूमिहार, राजपूत, कैथ, हरिजन, सब लड़ रहे हैं। अगले चुनाव में तिगुना चुने जाएंगे। किसका आदमी ज्यादा चुना जाएगा इसी की लड़ाई है। यदि राजपूत पार्टी के लोग ज्यादा आए तो सबसे बड़ा संतरी भी राजपूत होगा, परसों बात हो रही थी आसरम में।”5
राजनीति के माध्यम से जाति-व्यवस्था, जो केंद्र में है, अंचल विशेष के प्रमुख तत्व विधान को दर्शाती है। इसी के चलते रेणु के साहित्य के सौंदर्य को सहजता से समझा जा सकता है। ‘परती-परिकथा’ में भी राजनीतिक भ्रष्टाचार को ‘लुत्तो’ के चरित्र के माध्यम से रेखांकित किया गया है।
अतीत व वर्तमानकालीन शैक्षिक अनुकम्पा के आधार पर-
कला का द्वितीय क्षण तब जागृत होता है जब लेखक में शब्द और संवेदनाएं जागृत होती हैं, वह विषय तत्वों को व्यक्त करने लगता है। यह क्रिया समन्वित होने पर परिस्थितियां निर्मित हो जाती है। सौंदर्य हमारे इर्द-गिर्द मौजूद है। यही कारण है कि प्राचीन, मध्यकालीन एवं आधुनिक कवियों ने इसकी अभिव्यक्ति अपनी कविताओं में की है-
“पूर्णिमा का सौंदर्य बोधी चाँद,
मन-भीतर पिघलकर
रुपहला समुद्र बनकर
समा जाता है ,
आँखों की पृथ्वी में
अपनी जगह बनाते हुए,
महासागरों की तरह।”6
इस पंक्ति में कहीं-न-कहीं उस सौंदर्य की कल्पना की गयी है, जो उपस्थित न होकर भी दर्पण के समान प्रत्यक्ष है। इसके अलावा ‘रेणु का एक सपना’ में रेणु ने गाँव के स्कूली बच्चों के माध्यम से गाँव की शिक्षा-व्यवस्था को लेकर प्रश्न उठाया है। वहीं दूसरी ओर शहरी शिक्षा व्यवस्था या रहन-सहन को लेकर खुश नहीं दिखाई देते। मनमोहन के पिता बार-बार एक बात को दोहराते हुए नजर आते है- “शहर जाकर बिगड़ मत जाना- बीड़ी सिगरेट मत पीना।”7 मुख्य रूप से शैक्षिक दर दर्शना ही मुख्य उद्देश्य है।
लोक-गीत परम्परा के आधार पर-
लोकगीत में लोक-जीवन व आंचलिकता बोध स्पन्दित होता है। रेणु के गीतों ने खल-खलियान से उठाकर अपनी रचनाओं के साथ जोड़ा है। ‘मैला आँचल’ में मेरीगंज वासियों के रग-रग में संगीत रचा-बसा हुआ है। यहाँ ऐसा कोई भी प्रसंग नहीं है, जो कि ढोल से दमकता न हो। उत्सव-पर्व के गीतों में मौज-मस्ती एवं रंग-गुलाल उड़ते हैं। वहीं वसंत ऋतुओं में नारी-वेदना के बोल भी मिलते हैं। वर्ष के समय विरहिणी की वेदना के बोल कुछ इस प्रकार है-
“चढती जवानी मोरा अंग-अंग फड़के रे
कब होई गवना हमार रे भउजिया।”8
‘मैला आंचल’ में बिहार के पूर्णिया जिले की आंचलिकता को ध्यान में रखते हुए लेखक ने भारतीय लोक-गीत परम्परा का सौंदर्यीकरण किया है।
नैतिक मूल्यों की अभिव्यक्ति के आधार पर-
समस्त ग्रामीण जीवन को दर्शाने के लिए मेरीगंज की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक आदि विविध आयामों को उजागर करने का प्रयास किया है, जिससे पिछड़ा वर्ग को प्रकाश में लाया जा सके। “मेरीगंज गाँव में एक जीवंत चित्र की तरह हमारे सामने है, जिसमें वहाँ के लोगों के हंसी-मजाक, प्रेम-घृणा, सौहार्द्र-वैमनस्य, इर्ष्या-द्वेष, संवेदना-करुणा, संबंध-शोषण, अपने समस्त उतार-चढ़ाव के साथ उकेरा है। इसमें एक ओर जहाँ नैतिकता के प्रति तिरस्कार का भाव है तो वहीं दूसरी ओर नैतिकता के लिए छटपटाहट भी है। परस्पर मान्यताओं के बीच कहीं-न-कहीं जीवन के प्रति गहरी आस्था भी है-मैला आँचल में।”9
यहाँ रचनाकार ने मनमोहन के बहाने आजादी के बाद भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों की शिक्षा व्यवस्था के उपर जो प्रश्न उठाए हैं, कहीं-न-कहीं एकदम सटीक बैठता है। क्योंकि आज भी हम शिक्षा को लेकर कोई बड़ा परिवर्तन नहीं कर पाए हैं। शिक्षा से देश की दिशा एवं दशा तय होती है, फिर देश और शहरी शिक्षा व्यवस्था में इतना अंतर-भेद आखिर क्यों? यह भी विचारणीय प्रश्न है।
देशभक्ति व राष्ट्र-अभिव्यंजना के आधार पर-
रेणु की पहली कहानी ‘बट बाबा’ बरगद के प्राचीन पेड़ के इर्द-गिर्द घूमती है। इस कहानी में ‘साहू’ नामक एक पात्र जो खुद बिमारी से कंकाल हो गया है और उसे जानलेवा खांसी भी है, जब सुनता है कि “बड़का बाबा सुख गईल का? और गाँव वाले जब उसे बताते हैं कि हाँ पेड़ सुख गया है तो निरधन साहू कहता है- अब ना बचम हो राम!”10
रेणु बताते हैं कि हिमालय और भारतवर्ष का जो संबंध है वही संबंध उस बरगद के पेड़ और गाँव का था। सैकड़ों वर्षों से गाँव की पहरेदारी करते है यही बट बाबा, पर ऐसा क्या हुआ कि पूरे गाँव को अपने स्नेह से लगातार सींचने वाला बट वृक्ष अचानक सुख गया? बहुत ही मार्मिक ढंग से रेणु एक जीवंत चित्र गढ़ते हैं।
अंचल विशेष के भाषिक प्रयुक्ति के आधार पर-
ग्राम्य वातावरण के यथार्थ स्वरूप को रेखांकित करने में अंचल विशेष हेतु प्रयुक्त लोक भाषिक प्रयोगों का विशिष्ट महत्व रहा है। रेणु ने अपनी रचनाओं में तत्सम, देशज आदि शब्दों के द्वारा ग्रामीण जन-जीवन के यथार्थ को यथावत् दर्शाने का प्रयास किया है। उदाहरणस्वरूप- ‘मैला आंचल’ में ‘दुर्बोध’ शब्द का प्रयोग हुआ है। सही मायने में लेखक ने इस शब्द को ठीक कर फुटनोट में ‘सुबोध’ बताया है। यहाँ तक कि ‘विधवा’ के लिए ‘बेवा’ शब्द का प्रयोग भी किया गया है। इसके अलावा लोक शब्द जैसे ‘चुमैना’ के लिए ‘सगाई’ शब्द को लेखक ने फुटनोट में बताया है। वहीं ‘भउजिया’ के लिए ‘भाभी’ बताया है। इन सभी शब्दों का प्रयोग कर रेणु ने अंचल विशेष की भाषिक इकाई को यथार्थ रूप में परिणत किया है। भारतीय लोक शब्दों में जो अपनापे की भावना दिखाई देती है, वह अन्यत्र नहीं। वास्तव में किसी भी भाषा अथवा साहित्य को समझने, जानने के लिए सुंदर मन होना चाहिए, आन्तरिक सौंदर्य अगर न रहे तो बाह्य सारी वस्तुएं दिखावा मात्र बनकर रह जाती है। इसिलिए तो क्रोंचे ने लिखा है- “The beauty is not physica। fact, beauty does not be।ong to things, its be।ongs to the human aesthetic activity and menta। and spiritua। fact.”11
निष्कर्ष
निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि सौंदर्य आनंद की अनुभूति का नाम है, जिसका रस पान किया जाता है, वस्तु मात्र की सार्थकता सौंदर्य के कारण है। सुंदर वस्तुएं तो अनेक हो सकती है, किन्तु सौंदर्य एक है यानी अनेकता में एकता है। बाकी की सारी वस्तुएं इच्छा शक्ति पर निर्भर करती है। आंतरिक सौंदर्य मुख्यरूप से वाह्य सौंदर्य का विधायक है। कालिदास के प्रेमी पंडितों को पहली बार इस रहस्योद्धाटन से अवश्य ही धक्का लगा होगा कि जिस कवि को अब तक अपनी आर्य संस्कृति का महान नायक समझते आ रहे थे वह यक्ष, किन्नर आदि आर्येतर जातियों के विश्वासों और सौंदर्य कल्पनाओं का सबसे अधिक उदाहरण है। वैसे तो भारत को ‘महामानव सागर’ कहने वाले रवीन्द्रनाथ ठाकुर एक अरसे से यह बतलाते आ रहे थे कि जिसे हम हिन्दू रीति-नीति कहते हैं, वह अनेक आर्य और आर्येतर उपादानों का मिश्रण है। यानी जिस गुण का अनुभव हम करते हैं वास्तव में वह सौंदर्य है जिसकी संकल्पना अनुभव की अभिव्यक्ति के द्वारा ही संभव है। रेणु की रचनाएँ साहित्यिक कला वस्तु के आधार पर हो या सौंदर्याभिव्यक्ति के आधार पर, चाहे लोक भाषिक प्रयुक्त शब्दावलियों के आधार पर ही क्यों न हो..वस्तुत: कालजयी और निरंतर गतिमान है। पठन-पाठन के दृष्टिकोण के आधार पर नई संभवनाओं को जन्म देने वाली है। अंतत: कहा जा सकता है कि रेणु ने अपनी रचनाओं में साहित्य के विविध आयामों को केंद्र में रखते हुए लोक की महत्ता को प्रतिपादित किया है।
संदर्भ सूची
- विलियम, द ऑक्सफ़ोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी, वोल्यूम-viii, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नवीन सं. प्रकाशन वर्ष-1887, मूल प्रकाशन वर्ष-1884, पृष्ठ-371
- डॉ. मृत्युंजय उपाध्याय, हिंदी के आंचलिक उपन्यास, चित्रलेखा प्रकाशन, इलाहाबाद, प्रकाशन वर्ष-1989, पृष्ठ-13
- www.kavitakosh.org/जयशंकर_प्रसाद_है _यही_सौंदर्य/
- www.hindikavitakosh.com/केदारनाथ_अग्रवाल_असीम_सौंदर्य_की_एक_लहर/
- फणीश्वरनाथ रेणु, मैला आँचल, राजकमल प्रकाशन, प्रकाशन वर्ष-1954, नवीन सं.-2016, पृष्ठ-378
- www.kavitakosh.org/पूर्णिमा_का_सौंदर्य_बोध_चाँद
- फणीश्वरनाथ रेणु, रेणु रचनावली, राजकमल प्रकाशन, सं-2012, पृष्ठ-233
- www.hindisamay.com/चढ़ती_जवानी_मोरा_अंग_अंग_फड़के_रे_फणीश्वरनाथ_रेणु_मैला_आँचल
- www.m.bharatdiscovery.org/india_मैला_आँचल _फणीश्वरनाथ_रेणु_पेजेस=4
- www.।iveaaryaavat.com/2014/03
- डॉ, रामसजन पाण्डेय, विद्यापति का सौन्दय बोध, दिनमान प्रकाशन, प्रकाशन वर्ष-हार्ड कापी 2019, दिल्ली, पृष्ठ-15
प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय रचित ‘जयशंकर प्रसाद: महानता के आयाम’ की विश्वमानवता की भूमिका रचती सूक्तियाँ- डॉ. सुशीलकुमार पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’
पुस्तक समीक्षा
प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय रचित ‘जयशंकर प्रसाद: महानता के आयाम’ की विश्वमानवता की भूमिका रचती सूक्तियाँ
-डॉ. सुशीलकुमार पाण्डेय ‘साहित्येन्दु’
ग्रन्थ-जयशंकर प्रसाद: महानता के आयाम
ग्रन्थकार-प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय
प्रकाशक-राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली।
संस्करण-प्रथम, 2022
मूल्य– रु0 1495/-
पृष्ठ-463 (सजिल्द)
सूक्ति का आशय है अच्छी उक्ति, बढ़िया बात। अच्छी उक्ति प्रसन्नता प्रदायक होती है, बढ़िया बात दिल में घर कर जाती है। सूक्तियाँ ‘रस’ का स्रोत तथा ‘आनन्द’ की स्रोतस्विनी होती हैं। किसी ग्रन्थ की उत्तमता और लोकप्रियता में उसकी सूक्तियों का विशेष योगदान होता है। कालिदास तुलसीदास और जयशंकर प्रसाद की सूक्तियों ने ही उन्हें जन-जन का कण्ठहार बना दिया है। मुम्बई विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो0 करुणाशंकर उपाध्याय ने एकतीस वर्षों तक निरन्तर प्रसाद साहित्य सागर का तपोनिष्ठ आलोडन विलोडन कर ‘‘जयशंकर प्रसाद: महानता के आयाम’’ नामक 463 पृष्ठों का ग्रन्थ रचा है, जिसकी सूक्तिसुधा में ज्ञान का उन्मेष, प्रज्ञा का प्रकाश तथा मेधा का माहात्म्य समाहित है। इन सूक्तियों के पारायण से चिन्तन के नवीन गवाक्ष और मनन के नूतन परिसर परिलक्षित होते हैं। भारतीय साहित्य में सूक्तियों की महत्ता प्राचीनकाल से ही रही है। योगवाशिष्ठ का कथन है कि-‘महान व्यक्तियों की सूक्तियां अपूर्व आनन्द को देने वाली, उत्कृष्टतर पद पर पहुँचाने वाली और मोह को पूर्णतया दूर करने वाली होती हैं।1’’

प्रो0 उपाध्याय के पास शब्दसम्पदा तथा अर्थगौरव का अमेय भण्डार है। वे बहुश्रुत तथा बहुपठित हैं। उनका स्वाध्याय संसार विपुल है। वे लिखते हैं कि- ‘यदि जयशंकर प्रसाद का संवेदनात्मक व्यक्तित्व कालिदास, भारवि और भवभूति का समन्वित रूप है तो उनका बौद्धिक व्यक्तित्व बृहस्पति की मेधा, शुक्राचार्य की कुशाग्रता, बुद्ध की करुणा, चाणक्य की तेजस्विता, शंकराचार्य की तर्कशक्ति एवं दार्शनिकता का संश्लेषण है’ (पृ0-99)। इस वाक्य में भारतीय सांस्कृतिक, साहित्यिक तथा ऐतिहासिक जगत् का लेखा-जोखा है। इस कथन में वर्णित विषय अपूर्व आनन्ददायक, ज्ञानपिपासा को तीव्र करने वाला तथा व्यर्थ के सांसारिक प्रपंचों के मोह से मुक्ति दिलाने वाला है। सूक्तियों का रस पान करने के लिए सहृदयता की आवश्यकता होती है। विष्णु के समान हृदय को कोमल एवं विशाल बनाना पड़ता है। बाणभट्ट ने कहा है कि-‘‘जैसे अमृत भी राहु के कंठ से नीचे नहीं उतर पाता, वैसे ही निर्मल मनोहर सूक्तियाँ भी दुष्टों के गले नहीं उतर पाती, किन्तु हृदय पर निर्मल कौस्तुभमणि धारण करने वाले भगवान विष्णु के समान सज्जन उन्हें ही अपने हृदय में धारण कर लेते हैं।2
प्रो0 उपाध्याय ने प्रसादसाहित्यसागर में डूब उतरा कर उसके सूक्तिरत्नों का अन्वेषण किया है। प्रसाद का साहित्य तो स्वयं में सूक्तियों का अनन्त आकाश है पर प्रो0 उपाध्याय की लेखनी जब प्रसाद साहित्य की समीक्षा करती है तो वह स्वयं सूक्तिपरक हो जाती है। यह सूक्ति प्रसादसाहित्य के लिए उपयोगी परन्तु ग्रन्थ की महत्ता संवर्धन में परम उपयोगी हैं। कुछ सूक्तियाँ तो सीधे हृदय में उतर जाती है जैसे- ‘प्रतिभाएँ विरल होती हैं। और प्रतिभा को सराहना सबसे कठिन कार्य है’ (पृ0-1)। प्रतिभा को पहचानने वाला भी विरल होता है। मणि विरल होता है पर पारखी जौहरी भी अति विरल होते हैं। प्रसाद की बहुज्ञता पर प्रो0 उपाध्याय लिखते हैं कि ‘इनका (प्रसाद का) सृजन और चिन्तन, दोनों ही बृहदफलकीय और गहनस्तरीय है’ (पृ0-19)। यहाँ सृजन और चिन्तन शब्द अपने साधारण अर्थों से आगे के अर्थ, अर्थात उनकी विलक्षणता के द्योतक हैं। प्रो0 उपाध्याय की मान्यता है कि ‘स्वप्न देखना बड़े मनुष्य और व्यक्तित्व का लक्षण है’। (पृ0-21) ‘जयशंकर प्रसाद भारतीय मनीषा के रससिद्ध मनीषी हैं’। (पृ0-22)

स्वप्न को यथार्थ में बदलने वाला ही ‘पुरुष’ है। मनीषा से युक्त को मनीषी कहते हैं। प्रो0 उपाध्याय ने मनीषा और मनीषी के माध्यम से ज्ञान और ऋषि तत्व में नूतन गरिमा का संचार किया है। सूक्तियों से रचना का स्थायीत्व संवर्धित होता है। सूक्तियाँ पाठक पर जादू का असर डालती हैं, सम्मोहित कर लेती है। नीलकंठ दीक्षित ने लिखा है कि- ‘जिस प्रकार बालू में पड़ा हुआ पानी वहीं सूख जाता है, उसी प्रकार संगीत भी केवल कान तक पहुँच कर सूख जाता है। परन्तु कवि की सूक्ति में ही ऐसी शक्ति है कि वह सुगन्धयुक्त अमृत के समान हृदय के अन्तस्तल तक पहुँच कर मन को सदैव आनन्दित करती रहती है।’3
प्रो0 उपाध्याय ने प्रसाद साहित्य का मनोयोग पूर्वक पारायण, भक्तिपूर्वक पाठ, विवेकपूर्वक नीरक्षीर विवेचन तथा गहन समीक्षण किया है। यही कारण है कि उनकी सूक्तियाँ सीधे पाठक के हृदय में उतर जाती हैं। वे लिखते हैं कि ‘प्रसाद का व्यक्तित्व निरन्तर विकासमान-सुसंगठित और गत्यात्मक है’ (पृ0 103)। ‘प्रसाद जी अन्तर्दृष्टि और विश्व संदृष्टि सम्पन्न कवि हैं जिनका काव्य-विकास समूचे आधुनिक हिन्दी काव्य की विकास-यात्रा का सार-संक्षेप जैसा है’ (पृ0 113)। प्रसाद की संवेदना इतनी तीव्र थी कि वह स्वयं उनके लिए एक समस्या हो उठती थी’ (पृ0-119)।
इन वाक्यों में आचार्य का चिन्तन है, जिज्ञासु की जिज्ञासा का समाधान है। ‘गत्यात्मक’, ‘अन्तर्दृष्टि’ तथा ‘संवेदना’ ऐसे शब्द हैं जो सरस्वती की वीणाध्वनि की ओर संकेत करते हैं। नपे-तुले शब्दों में अथाह भावभरित सूक्तियों की रचना करना प्रो0 उपाध्याय की मेधा की पहचान है। सूक्तियाँ एक ओर ज्ञान गरिमा गागर हैं तो दूसरी ओर आनन्द का अगाध सागर भी। चाणक्य का कथन है कि – संसार रूपी कटु वृक्ष के यह दो फल अमृत के समान हैं-एक तो सुभाषित का रसास्वादन और दूसरा सज्जनों का समागम।4 आचार्य उपाध्याय ने जब इस ग्रन्थ को लिखने को सोचा होगा तब उन्हें प्रसाद साहित्य परिसर के अगाध विस्तार का अनुमान हुआ ही होगा पर प्रशंसनीय है उनका धैर्य जो उन्हें निरन्तर बल संबल देता रहा और पथ विचलन से बचाता रहा। जब लेखक समर्पित भाव से ‘तदाकाराकारित’ होकर लिखता है तब उसकी लेखनी कालजयी बन जाती है। इतिहास की समीक्षा और वर्तमान की परीक्षा कर स्वर्णिम भविष्य की पृष्ठभूमि रचती है।
प्रो0 उपाध्याय लिखते हैं कि- ‘प्रसाद की विश्वदृष्टि अपने वैश्विक परिदृश्य के प्रति अतिशय सचेष्ट थी’ (पृ0-26)। ‘प्रसाद का सम्पूर्ण साहित्य गहन सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकार और अंग्रेजी सत्ता के प्रति दाहक विद्रोह का समुच्चय है’ (पृ0-31)। जयशंकर प्रसाद का संपूर्ण साहित्य-भारतीयता के संधान और निर्माणक तत्त्वों से परिपूर्ण है (पृ0-39)। विश्व दृष्टि वैश्विक परिदृश्य’ ‘दाहक विद्रोह’ आदि शब्द सूक्तियों को प्राणवंत कर देते हैं। ये वाक्य प्रसाद के साहित्यप्रसाद के आधार स्तम्भ है।
सूक्तियों की रसवत्ता से लोकमन सिचिंत हो जाता है। एक परम्परागत कथन है कि- ‘सुभाषित के रस के आगे द्राक्षा म्लानमुखी हो गई, शर्करा सूख कर पत्थर जैसी या किरकिरी हो गई और सुधा भयभीत होकर स्वर्ग को चली गयी’।5 भले ही उक्त कथन में किसी को अतिरंजना लगे परन्तु उसमें यथार्थता का पूर्ण समावेश है। सूक्तियों से जो परमानन्द की अनुभूति होती हैं, वह अवर्णनीय है। इसी परिप्रेक्ष्य में काव्य के उद्देश्य के प्रकरण में आचार्य मम्मट ने ‘‘सद्यः परनिर्वृत्तये’’ शब्द का प्रयोग किया है। काव्य तत्काल आनन्द देने वाला होता है। अंगूर और शर्करा की मधुरता तात्कालिक होती है। सुधा कब मिले, न मिले कौन जानता है ? सुधा प्राप्ति के लिए सागर मंथन करना पड़ेगा पर सूक्ति तो तत्काल आनंद देती है। प्रो0 उपाध्याय के शब्दों में ‘इनके (प्रसाद के) काव्य के सभी रूपों में उसके अन्तरंग और बहिरंग का जो सर्वांगपूर्ण ऐश्वर्य प्रस्तुत हुआ है वह हिन्दी साहित्य की अनमोल निधि है’ (पृ0-43)। ‘प्रसाद का संपूर्ण लेखन विश्वस्तरीय एवं सार्वभौम शाश्वत महत्त्व का है’ (पृ0-44)। ‘प्रसाद जी राष्ट्र प्रेम, मानवीय प्रेम, नारी सौन्दर्य और पलपल परिवर्तित प्रकृति वेश के अप्रतिम चित्रकार हैं’ (पृ0-48)।
प्रो0 उपाध्याय ने ‘अनमोल निधि’ कह कर प्रसाद साहित्य की जो गुरुता स्थापित कर दी वह बस अनुभव के योग्य है। ‘विश्वस्तरीय’ तथा ‘अप्रतिम चित्रकार’ शब्द तो सूक्ति सागर के मोती हैं। प्रो0 उपाध्याय जब समालोचना लिखते हैं तब अनुकूल शब्द स्वयमेव उपस्थित जाते हैं, यही भावयित्री प्रतिभा का चरमोत्कर्ष है। अमेय शब्दसम्पदा लेखक को तपोनिष्ठ सतत सारस्वत श्रम से मिलती है। लोकोक्ति है कि ‘‘इहे मुँह पान खिलावे और इहे पनही’’ अर्थात यदि वाणी में मधुरता है, सूक्ति है तो पान (सम्मान) मिलेगा और यदि नहीं तो पनही (जूता-अपमान) मिलेगा। सूक्तियों के आनंद को रेखांकित करते हुए लोककथन है कि‘ मधुर सूक्तियाँ प्रिया के अधर-सुधा-रस के समान आस्वाद में मधुर होती हैं। आम्रमंजरी का आस्वाद लिये बिना कोयल मधुर ध्वनि में नहीं गाती।6
प्रसादसाहित्य आम्रमंजरी है और प्रो0 उपाध्याय की लेखनी कोकिल की मधुर ध्वनि। यहाँ कुमारसंभव का एक श्लोक उद्धरणीय है ‘आम की मंजरियाँ खा लेने से जिस कोकिल का कंठ स्वर मीठा हो गया था, जब वह मीठे स्वर में कूकता था तो उसे सुनकर रूठी हुई स्त्रियों को रूठना भूल जाता था।’ कामायनी के स्वप्न स्वर्ग में ‘कोकिल की काकली’ का प्रयोग किया गया है। प्रो0 उपाध्याय की सूक्तियों में अधर-सुधा-रस इस तरह व्याप्त है कि वे पाठकों के अधरों पर मानों छायी रहती है। कुछ उदाहरण है- ‘मानव के भौतिक विकास के साथ साथ उसके हृदय का विकास नहीं हो सका’ (पृ0-189)। ‘कामायनी में आह्लादक लीला भाव समारोह पूर्वक उपस्थित है’ (पृ0-206)। कामायनी भावनात्मक गहराई और संवेदनात्मक औदात्य की दृष्टि से महाकाव्य माना जा सकता है। ‘आह्लादक लीला’ में कोकिल की काकली का रस है, अधरसुधारस की ध्वनि है, सौन्दर्य की मीमांसा और आकर्षण का मनोविज्ञान है।
किसी के पास शब्द है तो भाव नहीं। किसी के पास भाव है पर उसे व्यक्त करने को उपयुक्त शब्द नहीं है। जिनके पास शब्द और अर्थ का भण्डार हो, विवेक तथा हृदय का उचित समन्वय हो उन्हीं की उक्तियाँ सूक्तियाँ बनती हैं कहा जाता है कि ‘किन्हीं लोगों की वाणी में सूक्तियाँ तोते की तरह रटी हुई होती हैं और किन्हीं का हृदय सूक्तिमय होता है किन्तु उनकी वाणी प्रस्फुटित नहीं होती। ऐसे कोई विरले ही होते हैं जिनके हृदय से वाणी तक सरस सूक्तियों की परम्परा प्रवाहित होती है’।7
जिस प्रकार प्रसाद जी ने गम्भीर स्वाध्याय किया था कुछ उसी प्रकार प्रो0 उपाध्याय जी ने भी किया है। साथ ही उनकी मेधा में चमत्कृति और प्रतिभा में अलंकृति है। यही कारण है कि प्रो0 उपाध्याय की भाषा शैली में उसकी सूक्तियों ने चारचाँद लगा दिये हैं। उदाहरण के लिए ‘प्रसाद जी प्रेम, सौन्दर्य और प्रकृति के अनन्त रमणीय चित्रकार बनकर उभरते हैं’ (पृ0-50)। ‘प्रसाद जी का प्रेम-दर्शन अत्यन्त व्यापक है’ (पृ0-48)। ‘प्रसाद के सम्पूर्ण साहित्य में आन्तरिक सामंजस्य और एकाग्रचित्त मस्तिष्क की तीव्र संवेदनात्मक प्रतिक्रिया दिखायी पड़ती है’ (पृ0-62) आदि।

प्रसाद के प्रेम की मीमांसा, सौन्दर्य का विश्लेषण और प्रकृति की अतुलित शोभा का उपस्थापन सरल नहीं है। प्रसाद ने जिस मनायोग से साहित्य सर्जना की है, उसी मनोयोग और निष्ठा से प्रो0 उपाध्याय ने उसकी अन्तरात्मा के दर्शन का सफल प्रयत्न भी किया है। सूक्तियाँ मात्र सुन्दर शब्दों का संजाल नहीं होती है प्रत्युत् उनमें ज्ञान का भण्डार भरा होता है। हमारी परम्परा कहती है कि- ‘सूक्तियाँ उचित विचार से सुन्दर बनती हैं जैसे जानने योग्य तत्त्व के ज्ञान से मनीषियों की विद्या’।8
प्रकृत पुस्तक की सूक्तियों की गुणवत्ता का अनुमान निम्न सूक्तियों से सरलता से किया जा सकता है- ‘प्रसाद इतिहास के माध्यम से भारतीय अस्मिता और जीवन मूल्यों का अन्वेषण करते हैं’ (पृ0-321)। ‘प्रसाद जी अतीन्द्रिय जगत् के द्रष्टा कलाकार हैं’ (पृ0-349)। ‘प्रसाद का लेखन अपने दार्शनिक विचारों के कारण विशेष महत्त्व का अधिकारी हैं’ (पृ0-353)। भारतीय अस्मिता का अन्वेषण मनीषी से ही सम्भव है। अतीन्द्रिय जगत् के द्रष्टा की कला को कोई पराप्रतिभा सम्पन्न महाप्राण ही समझ सकता है। सुभाषित ज्ञान के, नूतन क्षितिजों के सुप्रकाशक होते हैं। सृष्टि के रहस्यों के उद्गाता होते हैं। सुत्तनिपात का मत है कि ‘सुभाषित ज्ञान का सार होते हैं।’9
जब हम विवेच्य ग्रन्थ की सूक्तियों के रहस्यों का अनावरण करते हैं तब उसमें दर्शन की मीमांसा, सौन्दर्य का सार और प्रेम की पराकाष्ठा के दर्शन होते हैं, जैसा कि प्रसाद ने कामायनी के लज्जा और काम सर्ग में किया है। अग्रलिखित पंक्तियाँ मात्र सूक्तियाँ नहीं है ये ज्ञान के समास की रूपरेखाएँ हैं। कामायनी दार्शनिक गरिमा, भावनात्मक गहराई और संवेदनात्मक औदात्य की दृष्टि से भी अप्रतिम कलाकृति है’ (पृ0-247)। ‘कामायनी स्वर-लिपियों का अभिसार करने वाला महाकाव्य है’ (पृ0-253)। ‘प्रसाद का सम्पूर्ण साहित्य भारत-भूमि, यहाँ की सभ्यता, गौरव, मर्यादा और भारतीय मनुष्यता की पहचान कराने वाला एक व्यापक प्रलेख है’ (पृ0-383)। ‘प्रसाद की कथा-भाषा अपनी बिम्बधर्मी काव्यात्मकता के कारण अपना प्रतिमान आप ही है’ (पृ0-378)।
भावनात्मक गहराई, संवेदनात्मक औदात्य स्वर ‘लिपियों का अभिसार’ ‘भारतीय मनुष्यता’ आदि शब्द संयोजन वाणी की पराभावभूमि को व्यक्त करते हैं जहाँ गोस्वामी जी के शब्दों में ‘‘गिरा अनयन नयन बिनु बानी’’10 चरितार्थ होने लगती है। जब कालिदास पार्वती की सुन्दरता का वर्णन कर चुके तब भी उनका मन नहीं भरा तो वे लिखते हैं कि ‘मानो विधाता ने सारे उपमानों को एक साथ देखने के लिए ही पार्वती का निर्माण किया है।’11 उपमानों की दुनियाँ कितनी अनन्त है कौन कह सकता है ? जो पाठक ग्रन्थ को मनोयोग से पढ़ता है और आत्मसात् करता है उसे सूक्तियाँ स्मरण हो जाती है। वह ग्रन्थ को बारबार पढ़ना चाहता है। जातक में ठीक कहा गया है कि- जिस प्रकार अग्नि तृण-काष्ठ को जलाती हुई कभी सुप्त नहीं होती और सागर नदियों को पाकर कभी तृप्त नहीं होता, उसी प्रकार हे राजश्रेष्ठ! पंडितजन सुभाषितों से कभी तृप्त नहीं होते।12
‘आँसू कवि संवेदनाओं की आत्यंतिक तीव्रता का काव्य है’ (पृ0-120)। ‘जयशंकर प्रसाद राष्ट्रीय सांस्कृतिक जागरण के कवि हैं’ (पृ0-137)। ‘प्रसाद जी का यह अनन्त रमणीय सौन्दर्य बोध उनके सम्पूर्ण कृतित्व का मेरुदण्ड है’ (पृ0-152 उर्वशी)। ‘कामायनी का प्रलयवर्णन प्रकृति के भीषण रुप का स्तवन है’ (पृ0-164)। ‘प्रसादजी नारी मनोविज्ञान के गहन अध्येता रहे हैं’ (पृ0-179)। ‘प्रसादजी रुपकों में सोचने वाले कवि हैं’ (पृ0-180)।
इन सूक्तियों की गुणवत्ता की इयत्ता पर कौन सारस्वत मुग्ध नहीं होगा ? किस विद्वान् को ये पंक्तियाँ आनन्द नहीं देंगी ? कौन विद्यार्थी इन्हें बार बार पढ़ना नहीं चाहेगा ? ये वाक्य तृप्त ही नहीं करते, इस ग्रन्थ को बार बार पढ़ने की इच्छा जाग्रत करते रहते हैं। सूक्तियों का संसार वाक् सौन्दर्य का समास होता है। सुभाषितों की गुणवत्ता के विषय में मुंशी प्रेमचन्द लिखते हैं कि-‘सैकड़ों दलीलें एक तरफ और एक चुटैल सुभाषित एक तरफ। वह प्रतिद्वन्द्वी को निरुत्तर कर देता है, उसके जबाब में उसकी जबान नहीं खुलती। उसका पक्ष कितना ही प्रबल हो, पर सुभाषितों में कुछ ऐसा जादू होता है कि मानो वह एक फूँक से दलीलों को उड़ा देता है।13
प्रसाद साहित्य की मीमांसा अनेक दृष्टियों से विद्वानों ने की है। कुछ को प्रसादजी का साहित्य ‘गड़े मुर्दे का उत्खनन’ प्रतीत होता है तो किसी को ‘ब्राह्मणवाद’ का पोषक और किसी को वे सांसारिक दायित्व से विलग होते हुए प्रतीत होते हैं। इन प्रकरणों का उत्तर प्रकृत व ग्रन्थ की ये सूक्तियाँ देती हैं। ‘कहानीकार जयशंकर प्रसाद हिन्दी कहानी के आकाशदीप हैं’ (पृ0-71)। ‘कामायनी महाकाव्य यूनेस्को के विश्वविरासत की सूची में सम्मिलित है’ (पृ0-80)। ‘कामायनी अपने जटिल अन्तर्विधान और बहुस्तरीय गतिशील अर्थवत्ता के कारण अपने युग का ही नहीं युग-युगान्तर का महाकाव्य है’ (पृ0-89)।
‘आकाशदीप’ सबके लिए होता है। सूर्य, चंद्र तथा नक्षत्रादि सबका मार्ग दर्शन करते हैं। आकाश सबको समान रूप से लाभान्वित करता है। जब कामायनी यूनेस्को की विश्वविरासत में सम्मिलित है तब वह ‘विश्वनिधि’ बन गयी है। इस बहाने यूनेस्को ने प्रसाद को विश्वकवि स्वीकार ही कर लिया। बाकी रही कोर कसर तो प्रो0 उपाध्याय ने अपने सटीक तर्कों से सिद्ध कर दिया है कि प्रसाद विश्व कवि के रूप में अग्रगण्य हैं।
सूक्तियों की अर्थवत्ता पर विचार करते हुए माधव स0 गोलवलकर लिखते हैं कि- ‘लालित्य, चमत्कृति तथा शब्द एवं अर्थ के अलंकारों से रुचिपूर्ण और साथ ही जीवन में मार्गदर्शन करने वाले तत्त्व को व्यक्त करने से ‘सुभाषित’ कहना उचित होगा’।14 विवेचनीय ग्रन्थ की सूक्तियों में अक्षर लालित्य, विचित्रचमत्कृति तथा अलंकार आकर्षण का समन्वित रूप दर्शनीय है। ये मात्र बुद्वि को ही संतुष्ट नहीं करते प्रत्युत् हृदय को तृप्त करते हैं। यथा ‘प्रसाद भारतीय-ज्ञान परम्परा के सबल प्रतीकों को उभारकर उसे पाश्चात्य सिद्धान्तों की समकक्षता में उपस्थित करते हैं। इस कार्य में भारत का स्वर्णिम इतिहास उनका सहयोगी था’ (पृ0-359)। ‘कामायनी का जीवन-दर्शन प्रसाद को कवि से ऋषि बना देता है’ (पृ0-385)। ‘प्रसादजी ऐसे विरले रचनाकारों में से एक हैं, जिन्होंने कारयित्री प्रतिभा सम्पन्न होने के साथ-साथ भावयित्री प्रतिभा के क्षेत्र में भी अपनी विलक्षण गति का परिचय दिया है’ (पृ0-387)।
इन सूक्तियों में भारतीय ज्ञान परम्परा का संतुलित निदर्शन है, भारत के स्वर्णिम इतिहास पुनरावतरण है, जीवन दर्शन के कवि की ऋषि कोटि में स्थापना की मान्यता है। ये पंक्तियाँ अनायास ही नहीं जन्म लेती है जब किसी पराशक्ति की कृपा होती है तभी ऐसी पंक्तियाँ मानस को सूझती हैं। सूक्तियाँ अनुभव कोश तथा ज्ञान का आकर होती हैं। ये सांस्कृतिक इतिहास की धरोहर होती हैं। काका कालेलकर ने ठीक ही कहा है कि ‘शास्त्र-वचनों के पीछे ऋषि-मुनियों के धर्मानुभव का प्रभाव होता है। सुभाषितोें के पीछे जातीय हृदय की मान्यता होती है।’15
प्रो0 उपाध्याय जब प्रसाद साहित्य का पठन करते हैं तब उनमें विद्यार्थी भाव और जब पाठन करते हैं तब उनमें गुरुत्व भाव अनायास आ ही जाता है पर जब वे प्रसाद साहित्य की समीक्षा-टीका करते हैं तब उनमें मल्लिनाथ, सायण आदि की समीक्षात्मा प्रवेश कर जाती है जिससे वे अमूल लिखते नहीं और मूल छोड़ते नहीं। इन पंक्तियों की अर्थवत्ता मौलिक चिन्तन आयामों की सर्जना करती हैं। ‘कामायनी भी आधुनिक भारतीय एवं विश्व सभ्यता का सांस्कृतिक महाकाव्य है’ (पृ0-455)। ‘कामायनी विश्व का ऐसा कलात्मक और आलंकारिक महाकाव्य है जो महाकाव्यात्मक उदात्तता और भव्यता के साथ उसे सर्वोच्च कला के चरम उत्कर्ष तक ले जाता है। (पृ0-455)। ‘प्रसाद का सम्पूर्ण साहित्य भारत भूमि, यहाँ की सभ्यता, संस्कृति, गौरव, मर्यादा और भारतीय मनुष्यता की पहचान कराने वाला एक व्यापक प्रलेख है’ (पृ0-415)।
‘विश्वसभ्यता का सांस्कृतिक महाकाव्य’, ‘सर्वोच्च कला का चरम उत्कर्ष’ आदि शब्द सूक्तिकार के ऋषित्व के प्रमाण हैं। उसके हस्तलेख सारस्वत काल के भाल के शिलालेख हैं। सूक्तियों से नूतन ज्ञान की जानकारी मिलती है। इसलिए विंस्टन चर्चिल का विचार है कि-‘अशिक्षित व्यक्ति के लिए सूक्तियों का अध्ययन अच्छी बात है।’16
प्रकृत ग्रन्थ की सूक्तियों के विषय में यह कहना पर्याप्त है कि जिन्हे अभी प्रसादसाहित्य का अध्ययन प्रारम्भ करना है उनके लिए पथ प्रदर्शिकाएँ हैं और बहुपठित के लिए चिन्तन के नवीन आयामों की सर्जिकाएँ हैं। ‘प्रसाद ने कालिदास को आत्मसात कर लिया है’ (पृ0-436)। ‘यदि कवितापन को भी कसौटी माना जाय तो जो स्थान संस्कृत साहित्य में कालिदास का है, हिन्दी साहित्य में वही स्थान प्रसादजी का हो जाएगा’ (पृ0-417)।
कालिदास और प्रसाद की काव्यात्मा भारतीय साहित्य चिन्तन परम्परा का सत्यं शिवं सुन्दरम् है तथा ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ और ‘‘सर्वेभवन्तु सुखिनः’’ का प्रमाणपत्र है। मेरी पुस्तक है ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम् एवं कामायनी के तुलनात्मक संदर्भ’। इसकी भूमिका प्रो0 उपाध्याय ने लिखी है। मैंने इन दोनों ग्रन्थों के अनेक संदर्भों की तुलना कर यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि दोनों महाकवियों की मेधा प्रतिभा, योग्यता एवं क्षमता में विलक्षण समता है।
निष्कर्ष रुप में कहा जा सकता है कि प्रो0 उपाध्याय की सुदीर्घ विलक्षण सारस्वत तपस्या का सुफल ‘जयशंकर प्रसाद: महानता के आयाम’ की सूक्तियों में ऋषिवत् संस्कार झलकता है जो प्रसाद को महान् विश्वकवि की पंक्ति में अग्रगण्य प्रमाणित करते हैं साथ ही मानव जीवन को सुसंस्कृत बनाने के गुणसूत्र परिलक्षित होते हैं। ये सूक्तियाँ प्रसाद साहित्य पर पुनर्चिन्तन की रुपरेखा प्रस्तुत करती हैं तथा विश्वमानवता की भूमिका रचती हैं।
निवास-पटेलनगर, कादीपुर, सुलतानपुर उ0प्र0-228145
पूर्व संस्कृत विभागाध्यक्ष
संत तुलसीदास स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कादीपुर, सुलतानपुर उ0प्र0-228145
मो0-9532006900
सन्दर्भ सूची
- योगवाशिष्ठ 5-45।
- बाणभट्ट-कादम्बरी कथामुख।
- नीलकंठ दीक्षित-शिवलीलापर्व।
- चाणक्य नीति।
- अज्ञात।
- अज्ञात।
- अज्ञात।
- अज्ञात।
- सूत्रनिपात -21-6 (पालि)।
- रामचरितमानस।
- सर्वोपमाद्रव्यसमुच्चयेन। कुमारसंभव प्रथम सर्ग।
- जातक (महासुत सोम जातक पालि)।
- प्रेमचन्द विविध प्रसंग पृ0-487।
- माधव स0 गोलवलकर (पत्र रुप श्री गुरुजी पृ0-320।
- काका कलेलकर मंगल देव शास्त्री कृत सुभाषित सप्तशती की भूमिका।
- It is a good thing for an uneducated to read books of quotations विंस्टन चर्चिल (माई अर्ली लाइफ, अध्याय-2)
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सद्य: प्रकाशित ग्रंथ ‘जयशंकर प्रसाद : महानता के आयाम’ आमेजान, फ्लिप कार्ट और राजकमल प्रकाशन के संलग्न लिंक पर उपलब्ध है।
प्रेमचंद के उपन्यास साहित्य में चित्रित पत्रकारिता संदर्भ -डा. पवनेश ठकुराठी

प्रेमचंद के उपन्यास साहित्य में चित्रित पत्रकारिता संदर्भ -डा. पवनेश ठकुराठी
शोध सार
प्रेमचंद के उपन्यासों की पत्रकारिता विभिन्न समाचार पत्रों–पत्रिकाओं के संपादन एवं उनमें प्रकाशित होने वाले समाचार नोटिस आदि को व्यक्त करती है। इनके उपन्यासों में व्यक्त पत्रकारिता से पता चलता है कि आजादी से पूर्व के भारतीय समाचार– पत्र जनता एवं ब्रिटिश सरकार की गतिविधियों को प्रसारित करने का कार्य किया करते थे। ज्यादातर पत्रों में देशभक्ति और स्वदेश को महत्व दिया जाता था। प्रेमचंद के उपन्यासों में कमला, सरस्वती, जगत, हिंदुस्तान–रिव्यू, गौरव, आर्य–जगत्, प्रजा–मित्र बिजली आदि पत्रों के संपादन से संबंधित प्रसंग व्यक्त हुए हैं।
बीज शब्द: प्रेमचंद, उपन्यास, पत्रिकाएँ, संपादक, कहानी, पत्रकारिता
शोध विस्तार:
एक ऐसा कथाकार जो स्वयं एक सफल पत्रकार रहा हो, उसके कथा साहित्य में पत्रकारिता से संबंधित संदर्भ व्यक्त न हों, ऐसा कम ही देखने में आता है। कथाकार प्रेमचंद एक सफल पत्रकार रहे थे, यही कारण है कि उनके कथा साहित्य में पत्रकारिता से संबंधित विविध संदर्भ व्यक्त हुए हं। प्रेमचंद के उपन्यास और कहानी साहित्य दोनों में पत्रकारिता से जुड़े विविध संदर्भ दिखाई देते हैं।
प्रेमचंद के प्रेमा, वरदान, सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि, गोदान आदि उपन्यासों में पत्रकारिता से संबंधित विविध संदर्भों का निरूपण हुआ है। इनके ‘प्रेमा’ उपन्यास में अमृतराय के समाचार पत्रों में सामाजिक सुधार पर लेख लिखने का उल्लेख हुआ है: ‘‘इसके उपरांत उन्होंने देहातों में जा-जाकर सरल-सरल भाषा में व्याख्यान देना शुरू किया और समाचार पत्रों में समाजिक सुधार पर अच्छे-अच्छे लेख भी लिखे।’’1 इसी उपन्यास में मुंशी बदरीप्रसाद और बाबू अमृतराय के अखबार पढ़ने का भी उल्लेख हुआ है। संबंधित उदाहरण दृष्टव्य हैं-
- कई मिनट तक मुंशी बदरीप्रसाद अखबार पढ़ते रहे।2
- अखबार पढ़ते-पढ़ते सो गये।3
इनके ‘वरदान’ उपन्यास में ‘कमला’ और ‘सरस्वती’ नामक पत्रिकाओं से संबंधित संदर्भ व्यक्त हुए हैं। ‘कमला’ में ‘भारत महिला उर्फ विरजन’ की कविताएं प्रकाशित होती निरूपित हुई हैं। दो उदाहरण दृष्टव्य हैं –
- प्रयाग से उन दिनों ‘कमला’ नाम की अच्छी पत्रिका निकलती थी। प्राणनाथ ने ‘प्रेम की मतवाली’ को वहां भेज दिया।4
- अब प्रतिमास ‘कमला’ के पृष्ठ विरजन की कविता से सुशोभित होने लगे और ‘भारत महिला’ के लोकमत ने कवियों के सम्मानित पद पर पहुंचा दिया।5
विरजन की लोकप्रियता से प्रभावित होकर ही प्राणनाथ ‘भारत महिला’6 के शीर्षक से एक प्रभाव पूरित लेख लिखता है। इसी प्रकार बालाजी उर्फ प्रतापचंद्र विरजन की कविताओं की समालोचना ‘सरस्वती’ में लिखता है: ‘‘वे अपनी प्रभावशालिनी वक्तृताओं और लेखों में बहुधा उसी के वाक्यों का प्रमाण दिया करते थे, उन्होंने ‘सरस्वती’ में एक बार उसके संग्रह की सविस्तार समलोचना भी लिखी थी।’’7 वस्तुतः ‘सरस्वती’ पत्रिका प्रेमचंद के काल में प्रकाशित होती थी किंतु ‘सरस्वती’ की स्थापना 1900 ई0 में हुई थी और 1903 से 1920 तक इस पत्रिका का संपादन महावीर प्रसाद द्विवेदी ने किया और इसे लोकप्रियता के उत्कर्ष तक पहुंचाया।
इनके ‘सेवासदन’ उपन्यास के चरित्र प्रभाकर राव का परिचय कथाकार ने हिंदी पत्र ’जगत’8 के संपादक के रूप में कराया है। वेश्या समस्या से संबंधित प्रस्ताव पर लेखमाला वे अपने इसी पत्र में निकालते हैं: ‘‘लेकिन महीना पूरा भी न हो पाया था कि प्रभाकर राव ने अपने पत्र में इस प्रस्ताव के संबंध में एक लेखमाला निकालनी आरंभ कर दी। उसमें पद्मसिंह पर ऐसी ऐसी मार्मिक चोटें करने लगे कि उन्हें पढ़कर वह तिलमिला जाते थे।’’9 इस उपन्यास का युवा चरित्र सदनसिंह भी अपने लेख प्रकाशित करने के लिए ‘जगत’ के संपादक के नाम भेजता है:‘‘उसने दो-तीन लेख लिखे और प्रभाकर राव के पास डाक द्वारा भेजे। कई दिन तक प्रकाशित होने की आशा करता रहा।’’10 जब लंबे समय बाद भी उसके लेख प्रकाशित नहीं होते, तो वह स्वयं ‘जगत’ के संपादक को धमकाने उनके कार्यालय पहुंच जाता है: ‘‘संध्या समय एक मोटा-सा सोटा लिए हुए ‘जगत’ कार्यालय में पहुंचा। कार्यालय बंद हो चुका था। पर प्रभाकर राव अपने संपादकीय कुटीर में बैठे हुए कुछ लिख रहे थे।’’11 प्रभाकर राव द्वारा उसकी शंका का समाधान होने पर ही वह वापस घर लौटता है। वस्तुतः सदनसिंह को शक होता है कि प्रभाकर राव ने द्वेष भाव के कारण उसके लेखक नहीं छापे।
इनके ‘प्रेमाश्रम’ उपन्यास का उच्चवर्गीय चरित्र ज्ञानशंकर जब अपने विचारों को एक अंग्रेजी पत्रिका में प्रकाशित कराता है, तो पूरे नैनीताल में हलचल मच जाती है: ‘‘किंतु जब ज्ञानशंकर ने अपने विचारों को एक प्रसिद्ध अंग्रेजी पत्रिका में प्रकाशित कराया तो सारे नैनीताल में हलचल मच गई।’’12 इस उपन्यास में एक अंग्रेजी पत्र में दवाओं के मनोरंजक विज्ञापन छपे होने का उल्लेख भी हुआ है: ‘‘एक अंग्रेजी पत्र लेकर पढ़ना चाहा पर उसमें जी न लगा। दवाओं के विज्ञापन अधिक मनोरंजक थे। दस मिनट में उन्होंने सभी विज्ञापन पढ़ डाले।’’13 वस्तुतः जिस अंग्रेजी समाचार पत्र में ज्ञानशंकर का लेख छपा होता है, उस अंग्रेजी समाचार पत्र का नाम ‘हिंदुस्तान रिव्यू’ होता है और इसी समाचार पत्र में छपे लेख को पढ़कर प्रेमशंकर विदेश से भारत लौट आता है; तभी तो वह ज्ञानशंकर से कहता है: ‘‘… ‘हिंदुस्तान रिव्यू’ में तुमने नैनीताल के जीवन पर जो लेख लिखा था उसे पढ़कर मैंने आने का निश्चय किया।’’14 इस उपन्यास में ‘तिलक’ नामक समाचार पत्र की कार्यप्रणाली और रूढ़िवाद को पोषित करने की प्रवृत्ति का निरूपण करते हुए कथाकार लिखता है: ‘‘‘तिलक’ एक स्थानीय समाचार पत्र था। उसमें इस विषय पर खूब जहर उगला जाता था।’’15 वस्तुतः यह विषय ज्ञानशंकर द्वारा भाई प्रेमशंकर पर लगाये गये झूठे आरोपों एवं आक्षेपों का पुलिंदा मात्र था।
इस उपन्यास में सैयाद ईजाद हुसैन उर्फ मिर्जा साहब भी अपने ‘इत्तहादी यमतीखान’े की प्रशंसा अखबारों में तलाशते निरूपित हुए हैं: ‘‘इसके बाद समाचार पत्रों की बारी आई, लेकिन मिर्जा की निगाह लेखों या समाचारों पर न थी। वह केवल ‘इत्तहादी अनाथालय की प्रशंसा के इच्छुक थे। पर इस विषय से उन्हें बड़ी निराशा हुई। किसी पत्र में भी इसकी चर्चा न दीख पड़ी।’’16 इस उपन्यास में गायत्री द्वारा सनातन धर्म सभा को पचास हजार के गहने दान में देने की खबर का समाचार पत्रों में छपने का उल्लेख हुआ है: ‘‘उसने ज्ञानशंकर को, जो सभा के मंत्री थे, बुलाया और अपने गहनों का संदूक देकर बोली, इसमें पचास हजार के गहने है, मैं इन्हें सनातन धर्म सभा को समर्पण करती हूँ। समाचार पत्रों में यह खबर छप गई। तैयारियाँ हो लगी।’’17 इतना ही नहीं सनातन धर्म महोत्सव का समाचार भी अखबार में प्रमुखता से छपता है: ‘‘एक दिन संध्या समय प्रेमशंकर बैठे हुए समाचार पत्र देख रहे थे। गोरखपुर के सनातन धर्म महोत्सव का समाचार मोटे अक्षरों में छपा हुआ दिखाई दिया। गौर से पढ़ने लगे।’’18 सनातन धर्म महोत्सव की खबर के अलावा अदालत में होने वाली कार्यवाहियों का समाचार भी अखबारों में छपने का उल्लेख इस उपन्यास में हुआ है: ‘‘ज्यों ही दशहरे की छुट्टियों के बाद हाईकोर्ट खुला, अपील दायर हो गई और समाचार पत्रों के कालम उसकी कार्यवाही से भरे जाने लगे।’’19 इस उपन्यास के समझदार और सजग बाल चरित्र मायाशंकर का लेख भी एक पत्र में छपता निरुपित हुआ है: ‘बारहवें दिन उन्होंने पत्र खोला तो मायाशंकर का लेख नजर आया। आद्योपांत पढ़ गए।’’20 इसके अलावा इस उपन्यास में काशी के समाचार पत्र ’गौरव’ द्वारा डाक्टर प्रियनाथ की प्रशंसा करने का उल्लेख हुआ है: ‘‘काशी का प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘गौरव’ उनका पुराना शत्रु था। पहले उन पर खूब चोटें किया करता था। अब वह भी उनका भक्त हो गया। उसने अपने एक लेख में यह आलोचना की: ‘काशी के लिए यह परम सौभाग्य की बात है कि बहुत दिनों के बाद उसे ऐसा प्रजावत्सल, ऐसा सहृदय, ऐसा कर्तव्यपरायण डाक्टर मिला। चिकित्सा का लक्ष्य धनोपार्जन नहीं, यशोपार्जन होना चाहिए और महाशय प्रियनाथ ने अपने व्यवहार से सिद्ध कर दिया है कि वह इस उच्चादर्श का पालन करना अपना ध्येय समझते हैं।’’21
इनके ‘रंगभूमि’ उपन्यास में प्रभु सेवक द्वारा अपनी बहन सोफिया के गायक होने की सूचना समाचार पत्रों में देने का उल्लेख हुआ है: ‘‘पुलिस के दफ्तर में दिन-भर में दस-दस बार जाता और पूछता कुछ पता चला? समाचार पत्रों में भी सूचना दे रखी थी। वहां भी रोज कई बार जाकर दरियाफ्त करता।’’22 इस उपन्यास में सोफिया द्वारा विनयसिंह की माता रानी जान्हवी को समाचार-पत्र सुनाने और राजा महेन्द्र कुमार सिंह उर्फ राजा साहब के पत्र पढ़ने का उल्लेख भी हुआ है। संबंधित उदाहरण नीचे दिए जा रहे हैं –
- एक दिन रात को भोजन करने के बाद सोफिया रानी जाह्नवी के पास बैठी हुई कोई समाचार पत्र सुना रही थी कि विनयसिंह आकर बैठ गए।23
- दूसरे दिन राजा साहब ने दैनिक पत्र खोला तो उसमें सेवकों की यात्रा का वृतांत बड़े विस्तार से प्रकाशित हुआ था।24
इसके अलावा इस उपन्यास में प्रभु सेवक द्वारा ‘हिंदुस्तान-रिव्यू’ में कविता लिखने, इंदु के समाचार पत्र पढ़ने और अफसर साहब के समाचार-पत्र पढ़कर एक-दो बजे घर जाने का उल्लेख हुआ है। संबंधित उदारण दृष्टव्य हैं –
- प्रभु सेवक ने हास्य भाव से कहा सच पूछिए, तो यह उस कविता का फल है जो मैंने ‘हिंदुस्तान रिव्यू’ में लिखी थी।25
- तब आज का समाचार-पत्र खोलकर देखने लगी। पहली ही शीर्षक था-’शास्त्रीजी की महत्वपूर्ण वक्तृता।’26
- तखमीने के अफसर साहब बारह बजे घर से आते, अपने कमरे में दो-चार सिगार पीते, समाचार-पत्र पढ़ते, एक-दो बजे घर चल देते।27
इसके ‘कायाकल्प’ उपन्यास के नायक चक्रधर के ‘सरस्वती’ नामक पत्रिका में लेखक छपा करते थे; इसीलिए तो यशोदानंदन उनके एक लेख को पढ़कर उनसे कहते हैं: ‘‘अबकी ‘सरस्वती’ में आपका लेख देखकर चित्त बहुत प्रसन्न हुआ। इस वैषम्य को मिटाने के लिए आपने जो उपाय बताए हैं, वे बहुत ही विचारपूर्ण हैं।’’28 इनके इस उपन्यास में ठाकुर साहब के समाचार-पत्र पढ़ने और मनोरमा द्वारा आगरे के समाचार अखबारों में पढ़ने का भी उल्लेख हुआ है। संबंधित उदाहरण दृष्टव्य हैं –
- ठाकुर साहब धूप में बैठे एक पत्र पढ़ रहे थे।29
- मैं पत्रों में रोज ही वहां का समाचार देखती थी और सोचती थी कि आप यहां आयेंगे, तो आपकी पूजा करूंगी।’’30
इस उपन्यास के नायक चक्रधर और उनकी पत्नी अहिल्या दोनों समाचार पत्रों में लेख लिखकर अपने परिवार की आजीविका चलाते चित्रित हुए हैं। प्रारंभ में चक्रधर दो-तीन समाचार पत्रों में लेख लिखकर अपनी जरूरत पूरी कर लेते थे, किंतु बाद में उनके लेख विदेशों के पत्रों में भी छपने लगे थे, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होने लगी थी: ‘‘उन्हें काफी धन मिलता था। योरप और अमेरिका के पत्रों में भी उनके लेख छपते थे।’’31 इसी तरह उनकी पत्नी अहिल्या भी ‘एक मासिक पत्रिका में अपनी एक सहेली का लेख’32 देखकर लेखन हेतु प्रेरित होती है और स्वयं भी पत्रिका को लेख भेजती है। पति चक्रधर के पूछने पर वह उन्हें बताती है: ‘‘… अबकी मैंने ‘आर्य-जगत्’ को दो लेख भेजे थे। उसी के पुरस्कार के तीस रुपये मिले। आजकल एक और लेख लिख रही हूँ।’’33
इनके ‘गबन’ उपन्यास में कथानायक रमानाथ के घर से गायब होने पर उनका विज्ञापन प्रयाग के दैनिक पत्र में छापा जाता है: ‘‘प्रयाग के सबसे अधिक छपने वाले दैनिक पत्र में एक नोटिस निकल रहा है, जिसमें रमानाथ को घर लौट आने की प्रेरणा दी गई है; और उनका पता लगा लेने वाले आदमी को पंच सौ रुपये इनाम देने का वचन दिया गया है; मगर अभी कहीं से कोई खबर नहीं आई।’’34 रमानाथ कलकत्ता में इस विज्ञापन को पढ़कर आश्चर्य में पड़ जाता है: ‘‘हां, जब खूब अंधेरा हो जाता है तो वह एक बार मुहल्ले के वाचनालय में जरूर जाता है। अपने नगर और प्रांत के समाचारों के लिए उसका मन सदैव उत्सुक रहता है। उसने यह नोटिस देखी जो दयानाथ ने पत्रों में छपवाई थी; पर उस पर विश्वास न आया।’’35 इस उपन्यास की नायिका जालपा अपने पति रमानाथ का पता लगाने हेतु एक शतरंज के नक्शे को हिंदी दैनिक पत्र में छपवाती है: ‘‘यह नक्शा वहां के एक हिंदी दैनिक पत्र में छपा था और उसे हल करने वाले को पचास रुपये इनाम देने का वचन दिया गया।’’36 इस उपन्यास में रमानाथ और देवीदीन के वार्तालाप के माध्यम से भी ‘प्रजामित्र’ अखबार और उसके संपादक के व्यक्तित्व का उद्घाटन हुआ है: ’‘देवीदीन अभी आग सुलगा रहा था कि रमानाथ प्रसन्न मुख आकर बोला दादा, जानते हो, ‘प्रजा मित्र’ अखबार का दफ्तर कहां है? देवी-जानता क्यों नहीं हूँ। यहां कौन अखबार है जिसका पता मुझे न मालूम हो। ‘प्रजा मित्र’ का संपादक एक रंगीला युवक है, जो हरदम मुंह में पान भरे रहता है। मिलने जाओ, तो आंखों से बातें करता है; मगर है हिम्मत का धनी। दो बेर जेहल हो आया है।’’37
इसी तरह रतन और जालपा के संभाषण भी ‘प्रजामित्र’ अखबार की स्थिति को उद्घाटित करते हैं। वस्ततुः जालपा ‘प्रजामित्र’ में शतरंज का एक नक्शा छपवाना चाहती है-’वहां तो प्रजामित्र की बड़ी चर्चा थी। पुस्तकालयों में अक्सर लोग उसी को पढ़ते नजर आते थे।’
’तो प्रजामित्र को ही लिखूंगी; लेकिन रुपए हड़पकर जाए और नक्शा न छापे तो क्या हो?’38
इस प्रकार जालपा ‘प्रजामित्र’ अखबार में जब नक्शा छपवाती है, तो रमानाथ उस नक्शे का हल निकाल लेता है। तब जालपा के पास प्रजामित्र कार्यालय से पत्र और रमानाथ के हस्ताक्षर युक्त रुपयों की रसीद आती है: ‘प्रजामित्र कार्यालय का पत्र भी दिखाया। पत्र के साथ रुपयों की एक रसीद थी, जिस पर रमानाथ का हस्ताक्षर था।’’39 जालपा को रमानाथ से संबंधित मुकदमे का फैसला भी एक दैनिक समाचार पत्र के माध्यम से पता चलता है: ‘‘आज बड़े सवेरे घर के काम-धंधों से फुर्सत पाकर जालपा दैनिक पत्र वाले की आवाज पर कान लगाये बैठी थी, मानो आज उसी का भाग्य निर्णय होने वाला है। इतने में देवीदीन ने पत्र लाकर उसके सामने रख दिया। जालपा पत्र पर टूट पड़ी और फैसला पढ़ने लगी। फैसला क्या था, एक ख्याली कहानी थी, जिसका प्रधान नायक रमानाथ था। जज ने बार-बार उसकी प्रशंसा की थी।’’40 वस्तुतः रमानाथ को न्याय दिलाने में समाचार-पत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समाचार-पत्र ही जालपा और जोहरा का बयाना छापते हैं और इनके बयान पुलिस की बखिया उधेड़ देते हैं: ‘‘एक पत्र ने जालपा से मुलाकात की और उसका बयान छाप दिया। दूसरे ने जोहरा का बयान छाप दिया। इन दोनों बयानों ने पुलिस की बखिया अधेड़ दी।’’41
इनके ‘कर्मभूमि’ उपन्यास के अमरकांत का राजनैतिक ज्ञान समाचार- पत्रों को पढ़कर ही विकसित होता है: ‘‘दैनिक समाचर-पत्रों के पढ़ने से अमरकांत के राजनैतिक ज्ञान का विकास होने लगा। देशवासियों के साथ शासक मण्डल की कोई अनीति देखकर उसका खून खौल उठता था। जो संस्थाएं राष्ट्रीय उत्थान के लिए उद्योग कर रही थीं, उनसे उसे सहानुभूति हो गई। वह अपने नगर की कांग्रेस कमेटी का मेम्बर बन गया और उसके कार्यक्रम में भाग लेने लगा।’’42 अमरकांत की सास रेणुका देवी भी अमरकांत से खबरें पढ़वाकर सुनती थी: ‘‘दैनिक समाचार और सामयिक साहित्य से भी उसे रुचि थी, विशेषकर इसलिए कि रेणुका रोज-रोज की खबरें उससे पढ़वाकर सुनती थी।’’43 अमरकांत की पत्नी सुखदा पति-पत्नी के बदलते रिश्तों और रूढ़ियों पर पत्रों में लेख लिखती है: ‘‘अब कोई इस भ्रम में न रहे कि पति चाहे जो करे उसकी स्त्री उसके पांव धो-धोकर पीयेगी, उसे अपना देवता समझेगी, उसके पांव दबायेगी और वह उससे हंसकर बोलेगा, तो अपने भाग्य को धन्य मानेगी। वह दिन लद गये। इस विषय पर उसने पत्रों में कई लेख भी लिखे है।’’44 इस उपन्यास के शांतिकुमार नगरपालिका की समस्या के निदान हेतु समाचार-पत्रों एवं व्याख्यानों द्वारा जनक्रांति करने पर बल देते हैं । इसीलिए तो वे सुखदा से कहते हैं: ‘‘अब तो समाचार-पत्रों और व्याख्यानों से आंदोलन करना होगा।’’45 इस उपन्यास के लाला समरकांत सुखदा से गांव की क्रांतिकारी गतिविधियों की खबर समाचार-पत्रों में छपने की बात कहते हैं: ‘‘अब तो वहां का हाल समाचार-पत्रों में भी छपने लगा।’’45
इनके ‘गोदान’ उपन्यास में पडित ओंकारनाथ का परिचय कथाकार ‘बिजली’ दैनिक पत्र के संपादक के रूप में देता है: ‘‘आप दैनिक पत्र ‘बिजली’ के यशस्वी संपादक हैं, जिन्हें देश चिंता ने घुला डाता है।’’46 इस उपन्यास में प्रेमचंद ने संपादक ओंकारनाथ के बहाने तत्कालीन समय में प्रकाशित होने वाले ‘स्वराज’, ‘स्वाधीन भारत’ और ‘हंटर’47 पत्र-पत्रिकाओं का भी उल्लेख किया है। संपादक ओंकारनाथ मजदूरों की हड़ताल आदि से संबंधित खबरंे अपने ‘बिजली’ पत्र में छापते हैं, यही कारण है कि मजदूरों के बीच उनके पत्र की लोकप्रियता बढ़ती जाती है: ‘‘ मिल में असंतोष के बादल घने होते जा रहे थे। मजदूर ‘बिजली’ की प्रतियां जेब में लिए फिरते और जरा भी अवकाश पाते, तो दो-तीन मजदूर मिलकर उसे पढ़ने लगते। पत्र की बिक्री खूब बढ़ रही थी। मजदूरों के नेता ‘बिजली’ के कार्यालय में आधी रात तक बैठे हड़ताल की स्कीमें बनाया करते और प्रातःकाल जब पत्र में यह समाचार मोटे-मोटे अक्षरों में छपता तो जनता टूट पड़ती और पत्र की कापियाँ दूने-तिुगने दाम पर बिक जाती।’’48
इस प्रकार प्रेमचंद के उपन्यासों की पत्रकारिता विभिन्न समाचार पत्रों-पत्रिकाओं के संपादन एवं उनमें प्रकाशित होने वाले समाचार नोटिस आदि को व्यक्त करती है। इनके उपन्यासों में व्यक्त पत्रकारिता से पता चलता है कि आजादी से पूर्व के भारतीय समाचार- पत्र जनता एवं ब्रिटिश सरकार की गतिविधियों को प्रसारित करने का कार्य किया करते थे। ज्यादातर पत्रों में देशभक्ति और स्वदेश को महत्व दिया जाता था। प्रेमचंद के उपन्यासों में कमला, सरस्वती, जगत, हिंदुस्तान-रिव्यू, गौरव, आर्य-जगत्, प्रजा-मित्र बिजली आदि पत्रों के संपादन से संबंधित प्रसंग व्यक्त हुए हैं। इनके उपन्यासों में व्यक्त सरस्वती, हिंदुस्तान-रिव्यू, आर्य-जगत्, प्रजा-मित्र आदि पत्र तो प्रेमचंद के काल में प्रकाशित होते थे। सरस्वती, आर्य-जगत्, प्रजा-मित्र आदि पत्र तो भारतीय जनता को जागृत करने और उनकी आवाज को मुखरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे, जबकि हिंदुस्तान-रिव्यू एक अंग्रेजी दैनिक पत्र था। यह उच्च वर्ग में अधिक लोकप्रिय था।
संदर्भ सूची-
- मंगलाचरण, पृ0159
- वही, पृ0177
- वही, पृ0222
- वरदान, पृ098
- वही, पृ098
- वही
- वही, पृ0103
- सेवासदन, पृ0121
- वही, पृ0185
- वही, पृ0188
- वही, पृ0189
- प्रेमाश्रम, पृ083
- वही, पृ088
- वही, पृ089
- वही, पृ093
- वही, पृ0207
- वही, पृ0208
- वही, पृ0238
- वही, पृ0291
- वही, पृ0326
- वही, पृ0232
- रंगभूमि, पृ036
- वही, पृ078
- वही, पृ0134
- वही, पृ0207
- वही, पृ0284
- वही, पृ0368
- कायाकल्प, पृ014
- वही, पृ035
- वही, पृ040
- वही, पृ0197
- वही, पृ0195
- वही, पृ0195
- वही, पृ0196
- गबन, पृ011
- वही, पृ0116
- वही, पृ0127
- वही, पृ0129
- वही, पृ0151
- वही, पृ0165
- वही, पृ0225
- कर्मभूमि, पृ022
- वही, पृ021
- वही, पृ0142
- वही, पृ0181
- गोदान, पृ041
- वही, पृ052
48. वही, पृ0222
–डा. पवनेश ठकुराठी,
अल्मोड़ा (उत्तराखण्ड) – 263601
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वेबसाइट- www.drpawanesh.com
प्रेमचंद के आलोचक और आलोचकों के प्रेमचंद-सुशील द्विवेदी
प्रेमचंद के आलोचक और आलोचकों के प्रेमचंद
-सुशील द्विवेदी
प्रेमचंद पर विचार करते हुए इस बात पर भी बहस जरुरी है कि आलोचकों ने प्रेमचंद को किस रूप में पढ़ा है | उनके प्रेमचंदीय –पाठ ने हिन्दी आलोचना के संवर्धन में कितनी श्रीवृद्धि की है | हमें उनके मूल्यों पर भी विचार करना होगा | यह आवश्यक नहीं है कि प्रेमचंद पर लिखी गयी प्रत्येक कृति नई मान्यताओं को स्थापित करेगी | प्रायः यह देखा गया है कि अधिकांश कृतियाँ अपने पूर्व पाठ की पुनरावृत्ति भर होती हैं | उनमें नई मान्यताओं का सर्वथा अभाव होता है | ऐसे में, क्या हम उस कृति को प्रेमचंदीय –पाठ की शृंखला में रख सकते हैं? यदि ऐसा नहीं, तो हमें कृतियों और कृतिकारों के मोह जाल से बचना होगा | हमें यह भी समझना होगा कि उनकी शाब्दिक प्रदीप्ति व उनके आभा-मंडल से उत्पन्न ऊष्मा नई पौध को साहित्य-परिसर में किस रीति से पल्लवित करेगी | हम कब तक पश्चिम के आँचल में मुँह छिपाए स्तैन्य होंगे | क्या हमारी मनीषा इतनी पैरासाइट हो गयी है कि हमें कृतियों के पाठ के लिए पश्चिम के व्योम की ओर ताकना पड़ रहा है | हमें साहित्य के नये निकष विकसित करने होंगे | किन्तु उसकी जमीन पूर्णतया भारतीय होनी चाहिए | भारतीय होने का अर्थ भारत की विभिन्न भाषाओँ, उसके साहित्य और विमर्शों के परस्पर संवाद व ज्ञान के आवागमन से है | जितनी जल्दी संभव हो सके, हमें यह समझना होगा कि हम एक दूसरे के बिना कितने एकांगी हैं | हमें अहं ब्रह्मास्मि के मिथ्या अभिमान से बचना होगा | हम भारत के वट वृक्ष हैं, साहित्य और संस्कृति इसकी शाखाएँ हैं | एक शाखा के अपल्लवित, अपुष्पित होने से वृक्ष की जो छवि आपके मानस में अंकित होगी, उसकी कल्पना आप स्वयं कर सकते हैं | उसे विवृत्य करने की आवश्यकता नहीं है |
प्रेमचंद के आलोचकों को जिनमें पाठकीय प्रतिक्रिया और अकादमिक पाठ दोनों शामिल हैं, को श्रेणीबद्ध करने की आवश्यकता है | साथ ही पाठकीय प्रतिक्रिया को जिसमें तात्कालिकता और भावनात्मक आवेग की प्रबलता का संकट अधिक होता है, उसे संग्रहीत करने की आवश्यकता है | और तो और अकादमिक पाठ की पेउंदा-तुरपाई-प्रवित्ति की छटनी भी होनी चाहिए | प्रेमचंद का अर्थ दुनिया के उन क्रांतिकारियों के सन्दर्भ में समझना चाहिए, जिन्हें पुरानी घिसी पिटी लकीरों में चलना पसंद न था | वे नवीन मार्गों के अन्वेषक थे जिसके बदले में उन्हें जीवन भर अपने समाज का दंश झेलना पड़ा | किन्तु वे विचलित नहीं हुए और आजीवन नवीन मूल्यों का सृजन करते रहे | वे सही मायनों में सृष्टा थे |
आरम्भ में प्रेमचंद के आलोचक केवल रेडिकल ब्राह्मणवादी नहीं थे, उनमें वे भी शामिल थे, जिन्हें उनके लेखन से खतरा था, वे हिन्दू नहीं थे,न भारतीय, वे ब्रिटिश थे | उन्हें प्रेमचंद से इसलिए खतरा था कि उनके लेखन से युवा प्रभावित होंगे और यदि राष्ट्र के हित में वे खड़े हो जायेंगे, परिणामस्वरूप ब्रिटिश यहाँ शासन नहीं कर पाएंगे | इसलिए 1907 ई. में प्रकाशित उनके कहानी संग्रह सोजे वतन को अँग्रेज सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया | हालाँकि बाद के प्रेमचंद में वैसा स्वर न था जैसा स्वर सोजे वतन के नवाब राय में है | नवाब राय का प्रेमचंद में परिवर्तित होने की घटना भी कोई सामान्य नहीं है | उनका गमन हिन्दी प्रदेश में आदर्श से यथार्थ के ककरीले मार्गों पर हुआ है | जहाँ वे किरमिच के जूते पहनकर नहीं बल्कि नंगे पाँव चले हैं | इसलिए आरम्भ में उनकी आदर्शात्मक रीति के कारण ही आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने गार्हस्थ्य जीवन का साहित्यकार माना है | वे अपने इतिहास ग्रन्थ में प्रेमचंद की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं | निम्न और मध्यम श्रेणी के जीवन का यथार्थ चित्रण के कारण उच्च वर्गीय आलोचक उनसे नाराज भी रहे | इनमें श्री नारायण सिंह का नाम लिया जा सकता है | वे प्रेमचन्द के निम्न वर्ग की पक्षधरता व ब्राह्मण समाज के पाखंड का पर्दाफाश के कारण नाखुश हुए | उन्होंने प्रेमचंद को घृणा का प्रचारक तक कह दिया | प्रेमचंद सम्बन्धी छुटपुट लेख उनके समकालीन कृतिकारों के भी हैं किन्तु उनमें सर्वथा एकांगी दृष्टिकोण है | इससे नंददुलारे वाजपेयी भी अछूते नहीं रहे | उन्होंने प्रेमचंद की प्रगतिशीलता सम्बन्धी अवधारणा में साहित्य मत के शाश्वत लक्षण को अंगीकार किया किन्तु उनकी साहित्य सम्बन्धी उद्देश्यता को प्रोपेगेंडा कहा |
प्रेमचंद का समुचित मूल्यांकन डॉ. रामविलास शर्मा ने किया | उन्होंने प्रेमचंद को कबीर, तुलसी व भारतेंदु की परम्परा से जोड़ा ही नहीं बल्कि व्यापक राष्ट्रीय सन्दर्भों के परिप्रेक्ष्य में लेनिन – गोर्की, तोलेस्ताय व गाँधी के चिंतन को उनके सर्जना के बरक्स रखा | डॉ. इन्द्रनाथ मदान सरीखे आलोचकों ने उनकी सीमाओं को रेखांकित किया | प्रकाशचंद गुप्त ने प्रेमचंद को रवीन्द्रनाथ और शरतचन्द्र की संवेदना के तुल्य माना | इसके बाद आगे के तीन आलोचकों -नामवर सिंह, नित्यानंद तिवारी और मैनेज़र पाण्डेय प्रेमचंद का मूल्यांकन गाँधी, अम्बेडकर व दलित प्रश्न, वोल्सेविक क्रांति व मार्क्सवाद नये परिप्रेक्ष्य के सन्दर्भ में किया |
विमर्शों के उभार ने प्रेमचंद का नये सिरे से मूल्यांकन किया | दलित विमर्शकारों की उग्र वैचारिकी ने प्रेमचंद की दलित सम्बन्धी अनुभूतियों को ख़ारिज किया | मनुस्मृति-दहन के तर्ज पर रंगभूमि-दहन किया गया | इसमें बहुत से दलित विमर्शकार प्रकाश में आये किन्तु उनमें तल्ख़ टिप्पणी के अतिरिक्त प्रेमचंद के मूल्यांकन का कोई वृहद सन्दर्भ न था | बावजूद इसके कुछ दलित विमर्शकारों ने प्रेमचंद का नया मूल्यांकन किया – इनमें डॉ. धर्मवीर, ओमप्रकाश वाल्मीकि, कँवल भारती, नैमिशराय का नाम लिया जा सकता है | इसके समनांतर डॉ. पी.एन. सिंह, डॉ. शम्भुनाथ, वीरभारत तलवार, वीरेन्द्र यादव, बजरंग बिहारी तिवारी, अपूर्वानंद का नाम उल्लेखनीय है | साथ ही अब्दुल बिल्मिल्लाह, काशीनाथ सिंह, चौथीराम यादव, गोपेश्वर सिंह, चंद्रदेव यादव, जितेन्द्र श्रीवास्तव आदि का नाम लिया जा सकता है | इनके अतिरिक्त बहुत से आलोचक हैं जिनका उल्लेख करना यहाँ नहीं किया जा सकता है , उनका उल्लेख अन्य किसी आलेख में अवश्य करूंगा | मूल्यांकन का तीसरा पक्ष स्त्री वैचारिकी का है – इनमें निर्मला जैन, सुमन राजे, रंजना अड़गड़े, रोहिणी अग्रवाल, रमणिका गुप्ता का नाम विशेष उल्लेखनीय है | इस सभी आलोचकों ने प्रेमचंद की रचना धर्मिता को नये सिरे से मूल्यांकन किया है | इनके मूल्यांकन में अपने समय की खोज के साथ-साथ उनके नायकों की उपस्थिति भी है | किसी ने प्रेमचंद के हवाले से गाँधी, टैगोर, तोलेस्ताय की तलाश की तो किसी ने मार्क्स, लेनिन, गोर्की, तो किसी ने अम्बेडकर, सावित्रीबाई फुले की | आलोचकों के प्रेमचंद ने अपने समय को नायकों के गवाक्ष से समझा जबकि प्रेमचंद के आलोचकों ने समय के गवाक्ष से नायकों को | यह एक ही क्रिया की दो विपरीत अभिक्रियाएँ हैं | हमें इनके घटकों को समझने की आवश्यकता है | इनमें से एक घटक अपने अपने प्रेमचंद (पी.एन. सिंह) है | यह पुस्तक 2019 में प्रकशित हुई है | सामान्य अर्थ में यह पुस्तक प्रेमचंदीय-पाठ की शृंखला का उत्तर मार्क्सवादी पाठ भर है | किन्तु पाठ की गहराई में उतरते ही आपको नाना प्रकार के तंतुजाल मिलेंगे | जिनमें कहीं कहीं आलोचना के अमेरिकी-पाठ की झाँकी दिखेगी तो कहीं लेनिनवाद की | किन्तु धेय वह नहीं है, वह केवल साधन है | साध्य समाजवाद के बहाने प्रेमचंद की तलाश करना है |
पी. एन. सिंह विमर्शकाल की पीढ़ी के आलोचक हैं | यद्यपि हिंदी में उनका आगमन बहुत बाद में हुआ | पहले वे विचारक के रूप में धाक जमा चुके थे, उस समय उन्होंने नायपाल का भारत, गाँधी, अम्बेडकर, लोहिया, भारतीय वाल्तेयर एवं मार्क्स : बी.आर अम्बेडकर, गाँधी और उनका वर्धा जैसी पुस्तक लिख चुके थे | इनके चिंतन में कॉडवेल, मार्क्स,लेनिन, गाँधी,लोहिया, अम्बेडकर, इलियट, तोलोस्तॉय, गोर्की की सुदीर्घ वैचारकी स्पष्ट परिलक्षित होती है | वे कला कला के लिए के आग्रही नहीं हैं, बल्कि कला की सोद्देश्यता के विचारवान पक्षधर हैं | इसीलिए इस किताब की भूमिका में प्रो. सदानंद साही ने लिखा है – शेक्सपियर, मिल्टन,बर्नार्ड शॉ से लेकर तोलोस्तॉय,गोर्की, दोस्त्योवस्की,लुशून की नक्षत्र माला के बीच रमने वाले पी. एन. सिंह की पहली भेंट ही प्रेमचंद से तब होती है जब 1980-82 के दौर में प्रेमचंद की जन्म शती मनाई जा रही थी | इस घटना से पूर्व पी. एन. सिंह किस रूप में प्रेमचंद को देखते थे, यह विचारणीय बात है | हालाँकि जैसा की मैंने ऊपर जिक्र किया है कि प्रेमचंदीय-पाठ के इस समय विभिन्न और परम्परागत पाठ ही चलन में थे | पी. एन. सिंह ने आलोचना को इस परिपाटी को मुक्त किया | उन्होंने प्रेमचंद के सन्दर्भ में लिखा है – यह एक विचित्र साहित्यिक यात्रा है | वैचारिक स्तर पर यह यात्रा आर्यसमाज के समाज सुधार से शुरू होती हुई गाँधीवादी सत्याग्रह तक जाती है और अंततः मार्क्सवाद को लिए दिए रेडिकल हो जाती है | रामविलास शर्मा अपनी पुस्तक प्रेमचंद और उनका युग में प्रेमचंद के रचना के सन्दर्भ में लिखा है – प्रेमचंद हिंदुस्तान की नई राष्ट्रीय जनवादी चेतना के प्रतिनिधि साहित्यकार थे | जब उन्होंने लिखना शुरू किया था, तब संसार पर पहले महायुद्ध के बादल मंडरा रहे थे | जब मौत ने उनके हाथ से कलम छीन ली, तब दूसरे विश्व युद्ध की तैयारियां हो रही थी | इन दोनों अभिमतों से प्रेमचंद के रचना-समय और रचना की वैचारिकी का स्पष्ट मुआयना हो जाता है | दोनों आलोचकों के लिए प्रेमचंद का महत्व अपने समय की वैचारिकी की तलाश करना है | रामविलास शर्मा ने जहाँ आधुनिकता के गर्भ में से मार्क्सवादी पाठ को महत्व दिया वहीँ पी. एन. सिंह के चिंतन में प्रेमचंद का उत्तर आधुनिक पाठ है | वे संरचनात्मक पाठ से आगे जाकर नया और मानवतावादी पाठ तैयार करते हैं | उन्होंने लिखा है – बहुत सारे लोग यहाँ हो सकते हैं जो साहित्य को मात्र शब्द संरचना मानते हों | उनके लिए प्रेमचंद की कोई भी कृति मात्र अभिव्यक्ति है, सम्प्रेषण नहीं | इसी के आगे वे बाद पर बल देते हैं कि प्रेमचंद के लेखन का आयाम मूलतः संप्रेषण है | हालाँकि यह बात संरचनावादी योकोब्सन के काव्यशास्त्री भाषिकी से तुलनीय है | उन्होंने डी. सस्यूर के आधार पर भाषा के तंत्र को नया अर्थ दिया है | उनका मत है कि सृजनात्मक भाषा चयन और विन्यास दोनों का उपयोग करती है | विन्यास रचना की प्रतीकात्मकता, सांकेतिकता और अर्थ की बहुस्तरीयता के ताने बाने से निर्मित होती है | योकोब्सन ने रचना के सम्प्रेषणीयता को उद्घाटित किया है | उनकी तरह ही डॉ. पी.एन. सिंह ने पाठ के सम्प्रेषण-प्रक्रिया पर बल दिया है | पाठ की संप्रेषणीयता उसके विन्यास में नहीं, अपितु उसके अर्थ में निहित है | इसलिए अर्थ को ध्यान में रखते हुए उन्होंने प्रेमचंदीय-पाठ का आरम्भ यकोब्सन-प्रणाली से किया | सही मायने में प्रेमचंद को इसी अर्थ में पाठ किया जाना चाहिए |
1928 ई. में व्लादिमीर प्रॉप ने अपनी पुस्तक मोर्फ़ोलोजी ऑफ़ फ़ॉकटेल्स में लोक कथाओं के पात्रों और उनके क्रियाकलाप को इसी संरचना के रूप में देखा है | ठीक वैसे ही जैसे प्रेमचंद पंचपरमेश्वर, ईदगाह, बड़े भाई साहब या उपन्यासों के जरिये पाठकों पर छाप छोड़ते हैं जैसे पाठकों के व्यक्तित्व का रेखांकन प्रेमचंद ने बड़े सलीके से किया हो | पी. एन. सिंह प्रेमचंद के इसी व्यक्तित्व के कायल हैं | वे प्रेमचंद को भारतेंदु गोर्की और बर्नार्ड शॉ की श्रेणी में रखते हैं – प्रेमचंद ने भी देशी भारतेंदु और विदेशी गोर्की और बर्नार्ड शॉ की तरह ही लिखा है और इसके लिए खतरे उठाये | वे तुलसी और टैगोर वाले अभिमत को नहीं मानते | टैगोर को जब नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा था ठीक उसी समय सोज़े वतन को जब्त कर लिया गया था | उनके लिए टैगोर से अधिक प्रेमचंद महत्वपूर्ण हैं | वे लिखते हैं कि रवीन्द्रनाथ मूलतः कवि हैं जो कथाकारों की जटिल दुनिया में अक्सर भटक जाया करते थे | संकल्पजीवी कथाकार प्रेमचंद ने काव्यलोक में भटकने का कभी जोखिम नहीं उठाया | इसी आलेख में वे प्रेमचंद और टैगोर, शरतचंद्र वाले अभिमत का नकार करते हैं | यह नकार दरअसल प्रकाशचंद्र गुप्त के प्रेमचंदीय-पाठ का नकार है जिसके बहाने पी. एन. सिंह ने प्रेमचंद के त्रासद व्यक्तित्व की तलाश की है | उन्होंने रचनाकार के बरक्स कथाकार और नाटककार के बरक्स कथाकार के रूपक का प्रयोग किया है | वे केवल बर्नार्ड शॉ के कोरे बौद्धिक उलझाव से प्रेमचंद की तुलना नहीं करते बल्कि बर्नार्ड शॉ के अति बौद्धिक उलझाव से प्रेमचंद को आगे ले जाते हैं –बर्नार्ड शॉ का सामाजिक उलझाव निरा बौद्धिक है, प्रेमचंद का उलझाव जितना बौद्धिक है ,उतना भावनात्मक भी | अतः बर्नार्ड शॉ के प्रतिनिधि नारी अथवा पुरुष पात्रों में बौद्धिक निस्संगता है जो उनके व्यंग्य एवं उपहास का स्रोत है | प्रेमचंद का यथार्थ से भावनात्मक उलझाव उपहास का सहारा नहीं ले सकता था | अतः वह उन्हें विडंबना ट्रेजिक विजन की ओर ले जाता है |
प्रेमचंद के चिंतन में नैतिक मान्यताओं, धार्मिक आग्रहों का रैखिक विकास है | रामलीला के नायकों के प्रति सम्मोहन से लेकर धार्मिक फांसीवाद के क्रिटीक तक का फलक प्रेमचंद में है | हालाँकि वे बाद में प्रगतिशीलता के हैजटैग में शामिल हुए | उन्होंने संस्कृति, साम्प्रदायिकता और धार्मिक पाखण्डवाद का जमकर विरोध भी किया | अपने निबंध साम्प्रदायिकता और संस्कृति में उन्होंने संस्कृति को गैर जरुरी बताया | इस मामले में अपने अंतर्विरोधात्मक चिंतन के कारण प्रेमचंद आलोचकों की वाम-दृष्टि के शिकार भी हुए | डॉ. पी.एन. सिंह ने आलोचकों की इस वाम-दृष्टि पर दृष्टिपात किया है – अपनी मूलगामी सामाजिक आलोचना के लिए प्रेमचंद की पारंपरिक कोनों से सख्त आलोचना हुई | अमृतराय ने अपनी सुपरिचित पुस्तक कलम का सिपाही में इसकी सविस्तार चर्चा की है | जुलाई-दिसम्बर 1926 की सरस्वती के अंक में श्री राम अवध उपाध्याय नामक व्यक्ति ने प्रेमचंद को नकलची सिद्ध करते हुए कहा था कि रंगभूमि थैकरे के वैनिटी फेयर की नक़ल है | इसी प्रकार एक कहानी पंडित मोटेराम शास्त्री के विरोध में प्रेमचंद के ब्राह्मण विरोधी होने का इल्जाम लगाते हुए मुकदमा दायर किया | इसी प्रकार प्रेमचंद की व्यंग्य कला पर उनकी कहानी रसिक सम्पादक के हवाले से शिवदान सिंह चौहान ने लिखा कि जब सम्पादक की काल्पनिक प्रेयसी कामाक्षा देवी काली-कलूटी निकली तो सम्पादक का गुस्सा अश्लील व्यंग्य प्रहारों में फूट पड़ा | लेकिन प्रेमचंद जब सामाजिक राजनीतिक अनीति और शोषण का जिक्र करते हैं तब उनके व्यंग्य बड़े तीखे और मार्मिक हो जाते हैं | स्त्री संबंधी विवरणों में डॉ.पी. एन. सिंह ने प्रेमचंद की प्रशंसा की है | प्रेमचंद के स्त्रीपात्र पुरुष पात्र की अपेक्षा अधिक सशक्त हैं | उनमें ढुलमुल प्रवित्ति नहीं है और न ही वे दोस्तोएवस्की के ब्रदर्स- कारमाज़ोव की स्त्री पात्रों की तरह झगड़ालू | उन्होंने प्रेमचंद के स्त्री पात्रों के बहाने स्त्री विमर्श की सशक्त लेखिकाओं की तलाश की है |
पी.एन.सिंह विमर्शों की वैचारिकी से सीधे-सीधे टकराते हैं | कई बार वे दलित आन्दोलन कर्मियों के क्रियाकलाप से क्षुब्ध होते हैं तो कई बार प्रसन्न भी | प्रसन्नता उनके यहाँ इकहरी नहीं है और ना केवल भावनात्मक आवेग, बल्कि प्रसन्नता आत्मचिंतन व गहरे आत्मबोध लिए हुए है | वे उनसे संवाद करते हुए चलते हैं | प्रो.सदानन्द साही ने लिखा है कि डॉ. सिंह मार्क्सवाद में आस्था रखने वाले उन विरल लोगों में हैं जिनके पास मार्क्सवाद की गहरी समझ है | इसलिए उनके मस्तिष्क के खिड़की दरवाज़े खुले हुए हैं, जिनसे गाँधीवाद, अम्बेडकरवाद और लोहियावाद की वैचारिकी का आवागमन होता रहता है | डॉ. साहब सही मायने में संवादधर्मी लेखक हैं | इसलिए वे अम्बेडकरवाद से वैसे ही संवाद करते हैं जैसे लोहियावाद या गाँधीवाद से | वे पूरब पश्चिम के गवाक्ष को खोलकर रिज का काम करते हैं | प्रायः बहुत कम आलोचकों में देखने सुनने को मिलता है | ऐसा कोई विरला ही होता है | पी.एन.सिंह उन विरले आलोचकों में से हैं | संवाद उनके यहाँ बड़ी साफगोई से आता है, उलझाव लिए हुए नहीं | वह चाहे कोई सामान्य बात हो या विशिष्ट | पुस्तक के नामकरण से लेकर कई ऐसे सन्दर्भ हैं जहाँ वे किसी बात की परवाह किये बिना सीधे सीधे अपनी बात कह देते हैं | उनमें कबीर जैसा साहस है | वे आलोचना के कबीर हैं | उनमें स्वीकृति का भाव भी जबरदस्त है | एक नमूना देखिए- डॉ. भगवान सिंह ने अपने-अपने राम पुस्तक लिखी है | इसलिए मैंने भी अपनी पुस्तक का नाम अपने-अपने प्रेमचंद रख लिया | यह बहुत सामान्य दिखती है,किन्तु है नहीं |
वर्ष 2004 में 31 जुलाई, दिन शनिवार को ‘भारतीय दलित साहित्य अकादमी’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सोहनपाल सुमनाक्षर व ‘गुरू रविदास जन्मोत्सव कमेटी’ के अध्यक्ष मनोज कुमार ने सामूहिक रूप से दिल्ली के जंतर-मंतर में रंगभूमि का दहन किया | रंगभूमि का दहन कोई सामान्य घटना नहीं थी | इसने अकादमिक आलोचना को गहरे तक प्रभावित किया | पूरे वर्ष पक्ष-विपक्ष की तात्कालिक टिप्पणियों से गहमा-गहमी मची रही | इसी दौरान सदानंद साही द्वारा सम्पादित पुस्तक दलित साहित्य की अवधारणा और प्रेमचंद का प्रकाशन हुआ | यह पुस्तक प्रेमचंदीय-आलोचना का पुनर्पाठ है | इसमें प्रेमचंद की सामाजिक अनुभूति, दलित अस्मिता के प्रश्न को गाँधी-अम्बेडकर और लोहिया के चिंतन के परिप्रेक्ष्य में पढ़ा गया | दरअसल इस समय प्रेमचंद के हवाले से इन चिंतकों की तलाश की गयी | किसी के लिए गाँधी महत्वपूर्ण हुए तो किसी के लिए अम्बेडकर | नामवर सिंह ने रंगभूमि के सूरदास को गाँधी के परिप्रेक्ष्य में देखा, वहीँ अम्बेडकरवादी आलोचकों जैसे सूरजपाल, कँवल भारती, नैमिशराय,डॉ. धर्मवीर ने अम्बेडकर के हवाले से जातीयता के प्रश्न, अनुभूति की सांद्रता पर सवाल किये | इन गहमा-गहमी के बीच पी.एन.सिंह बड़ी गंभीरता से विचार करते हैं | उन्होंने सुमनाक्षर जैसे लोगों के क्रियाकलाप की भर्त्सना की तो कँवल भारती द्वारा उठाये गये सवाल पर विचार करने के लिए कहा – कँवल भारती अपनी टिप्पणी में सर्वाधिक माडरेट हैं, वैसे वे अपने बड़बोलेपन के लिए सर्वाधिक चर्चित हैं | वे सावधान हैं और रंगभूमि को जलाये जाने का उल्लेख किये बगैर कुछ एक सकारात्मक एवं संवादी परिप्रेक्ष्यों पर बल देते हैं | वे प्रेमचंद को गाँधीवादी, साम्यवादी या ब्राह्मण-विरोधी मानने वालों को सतही बताते हुए उन्हें प्रगतिशील और आम आदमी के पक्षकार घोषित करते हैं |
डॉ. पी. एन. सिंह अपने समकालीनों में सर्वाधिक संवादधर्मी आलोचक हैं | उन्होंने प्रेमचंद का पाठ गहमा-गहमी के आवेग में बहकर नहीं,बल्कि ठहरकर किया है | वे रचनाकार और चिन्तक, चिन्तक और पाठक, पाठक और पाठ के बीच संवाद के आग्रही हैं | यही उनकी विशेषता है और उनका व्यक्तित्व भी | इसीलिए अपने विराट आलोचक-व्यक्तित्व से वे सहज ही आकर्षण के केंद्र बन जाते हैं |
सम्पर्क – ए -33,द्वितीय तल, सराय जुलेना,
न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी, नई दिल्ली 110025
ईमेल susheeld.vats21@gmail.com
मो. 9015603769










