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हिंदी साहित्येतिहास लेखन में जातिवाद, संस्कृति और डॉ अम्बेडकर का सामाजिक चिंतन

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हिंदी साहित्येतिहास लेखन में जातिवाद, संस्कृति और डॉ अम्बेडकर का सामाजिक चिंतन

डॉ. कर्मानंद आर्य 

 

साहित्य के बिना समाज और समाज के बिना साहित्य की कल्पना असंभव है. समाज एक सामूहिक इकाई है और साहित्य भी बहुत सारी इकाइयों से मिलकर बनता है. यह तथ्य सृजन के हर क्षेत्र में लागू होता है. हिंदी साहित्य का अपना सात-आठ सौ वर्षों का इतिहास है. लेखन की एक बड़ी संख्या में इसमें आमद रही है. साहित्य की बहुत सी विधाओं का अब तक जन्म हो चुका है और कुछ काल के गाल में खुद को समाहित करने से नहीं रोक पायी हैं. प्रतिरोध के साहित्य ने वैसे अनेक मुकाम हासिल किये हैं पर साथ की एक जाति विशेष की कृपा के कारण इस का समुचित विकास नहीं हो पाया. पर इन सात-आठ सौ वर्षों का साहित्य क्या एकान्मुखी नहीं है? साहित्य उन अर्थों में प्रजातान्त्रिक नहीं हो पायी जहाँ उसे समाज के अन्य वर्गों का भी समुचित योगदान प्राप्त होता. होना तो यह चाहिए था कि उसमें सब वर्गों की भागीदारी होती. पर ऐसा हुआ नहीं. ऐसा क्यों नहीं हुआ, क्या साहित्य के बीज में ही कुछ ऐसा है जो उसके पेड़ में प्रकट होता रहता है? अपनी पुस्तक आलोचना और विचारधारामें डॉ. नामवर सिंह लिखते हैं कि आलोचना की दुनिया विचारों की दुनिया है. और विचार के लिए चाहे गुरु-शिष्य परंपरा हो या विदग्ध लोगों का समुदाय, उनके बीच बातचीत और शास्त्रार्थ जरुरी है. बहस के जरिये एक पीढ़ी में जो सवाल उठते हैं उनके जबाब अगली पीढ़ी को देने होते हैं. पर यह बात-चीत बहुत लंबा अंतराल गुजरा और हुई नहीं. यहाँ लगभग संवादहीनता की स्थिति है.

साहित्य समाज का दर्पण है पर वह किस समाज का दर्पण है यह विषय विचारणीय है. जैसे ही हम उस दर्पण रूपी समाज की पहचान करने लगते हैं साहित्य की पोल खुलती चली जाती है. आपको उसमें सीधे-सीधे फांक नजर आने लगता है. साहित्य में जो प्रतिबिंबित होता है, वो असल में एक छोटे समाज की सामाजिक वास्तविकता है. जिस समाज का अंतर्विरोध साहित्य में है वह समाज केवल शिक्षित समुदायों का है. उससे समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग अलग है. जिसकी चिंताएं आवश्यकतायें बिलकुल अलग हैं. समाज में अगर समरूपता नहीं है तो साहित्य में भी आप समरूपता खोजेंगे तो नजर नहीं आयेगी. आप सबजेक्टिव ढंग से उसे प्रोजेक्ट नहीं कर सकते. भारत में साहित्य भले ही मानवमात्र के कल्याण का दावा करता हो परन्तु उसका मूलचरित्र असमानता बोधक है. वह भी जाति, वर्ण, स्थान के प्रभाव से मुक्त नहीं है. यहाँ तक कला और संस्कृति भी जातियों समुदायों के द्वारा पोषित होती हैं. वहां भी कुछ जातियों का वर्चश्व है तो कुछ जातियां हासिये पर धकेल दी गई हैं. साहित्यिक अभिव्यक्तियों में जाति, वर्ण, समुदाय के नुकीले नखदन्त हमें चारो तरफ दिखाई देते हैं. इतिहास बताता है कि एक बड़े समुदाय के लिए पठन पाठन का अधिकार भारत में बहुत क्षीण रहा. कई हजार सालों तक यहाँ की लगभग अस्सी प्रतिशत जनता ने स्कूल का मुख तक नहीं देखा. इसलिए साहित्य समाज में उनकी भागीदारी न के बराबर रही. सैकड़ों वर्षों तक गरीबों और अमीरों की बोली भाषा में बहुत अंतर रहा. शारीरिक श्रम को यहाँ हेय दृष्टि से देखा गया और बुद्धिवाद पर कुछ ख़ास समुदायों का कब्ज़ा जमा रहा. 

अंग्रेजी कहावत है कि जब आपके कमरे में कोई हाथी घुस जाए तो हाथी पर बात करना ज्यादा ठीक होता है. डॉ. अम्बेकर जिन प्रश्नों से लगातार जूझते रहे वे आजादी के पचास साल बाद भी प्रासंगिक बने हुए हैं इसलिए आज इस बात की आवश्यकता अधिक है की हम उन मुद्दों पर खुलकर बात करें. आरक्षण का विरोध तो हर कोई आसानी से कर लेता है पर सामाजिक भागीदारी की बात कोई नहीं करता. समाज और साहित्य में भयानक सामाजिक असमनाता है. उसको आज के परिदृश्य में समझना बहुत जरुरी है. साथ ही यह भी समझना जरुरी है कि डॉ. आंबेडकर को किन परिस्थियों ने बनाया. वे किससे प्रेरणा प्राप्त करते रहे. उनके इतने विराट व्यक्तित्व में और किन लोगों क व्यक्तित्व शामिल है. एक अस्पृश्य परिवार में जन्म लेने के कारण उन्हें सारा जीवन नारकीय कष्टों में बिताना पड़ा. उस समय एक दलित के रूप में जन्म लेना पशु होने से भी नीच कर्म था. अस्पृश्यता के कारण एक पशु तो तालाब का पानी पी सकता था पर एक दलित नहीं. बाबासाहेब आंबेडकर ने अपना सारा जीवन हिंदू धर्म की चतुवर्ण प्रणाली और भारतीय समाज में सर्वव्यापित जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में बिता दिया. चाहे समाज हो चाहे साहित्य उनका समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का सपना नहीं पूरा हो पाया. मुक्तिबोध अपनी पुस्तक ‘मध्ययुगीन भक्ति आन्दोलन का एक पहलू’ में लिखते हैं कि ‘किसी भी साहित्य को हमें तीन दृष्टियों से देखना चाहिए. एक तो यह कि वह किन सामाजिक और मनोवैज्ञानिक शक्तियों से उत्पन्न है अर्थात वह किन शक्तियों के कार्यों का परिणाम है. किन सामाजिक, संस्कृत क्रियाओं का परिणाम है. दूसरा इसका अंतर्स्वरूप क्या है? किन प्रेरणाओं और भावनाओं ने उसके आंतरिक शब्द निरुपित किये हैं. तीसरे उसके प्रभाव क्या हैं? किन सामाजिक शक्तियों ने उसका सदुपयोग या दुरुपयोग किया है और क्यों? साधारण जन के किन मानसिक तत्वों को उसने विकसित या नष्ट किया है? आज के हिंदी साहित्य हमें इसी नजरिये से देखने की महती जरूरत है.

 

हिंदी-साहित्य और इतिहास दृष्टि : hindi-sahitya aur itihas drishti

राजेन्द्र यादव ने लिखा है कि सत्रहवी-अठारहवी उपनिवेश बनाने की शताब्दी थी, उन्नीसवीं उसके वैचारिक विस्तार की. बीसवीं इस मानसिक, भौगोलिक उपनिवेशों को तोड़ने की. इक्कीसवीं सदी सूचना साम्राज्यवाद की सदी है जिसमें विचार सूचना में बदल चुका है. ऐसी सूचना जिससे लड़ा नहीं जा सकता, केवल स्वीकार किया जा सकता है. जाति के आवरण में वाद ने हर तरफ घेरा डाला हुआ है. फिर चाहे आचार्य रामचंद्र शुक्ल हों, आचार्य द्विवेदी हो, रामविलास शर्मा हों, नामवर हों या चौथीराम यादव. सभी आलोचकों पर उनकी जाति हावी होती दिखाई देती है. वस्तुतः जाति को नकारने वाला सबसे अधिक जातिवाद फैलाता है. वह भ्रम का ऐसा संजाल फैलाता है कि जाति का कोई अस्तित्व नहीं है पर वह अपना सारा खेला उसी जाति को संज्ञान रखकर खेलता है. ‘मैनेजर पांडे लिखते हैं कि ‘साहित्य का अस्तित्व समाज से अलग नहीं होता है. इसलिए साहित्य का विकास समाज से काटकर नहीं हो सकता. साहित्य सामाजिक रचना है. साहित्यकार की की रचनाशील चेतना उसके सामाजिक अस्तित्व से निर्मित होती है. साहित्यिक कर्म की पूरी प्रक्रिया सामजिक व्यवहार का ही एक विशिष्ठ रूप है. इसलिए साहित्य का इतिहास समाज के इतिहास से अनेक रूपों में जुड़ा हुआ होता है. साहित्य का मूल्यांकन करने पर इसके विपरीत स्थितियां मिलती हैं. नामवर सिंह अपने एक निबंध में लिखते हैं कि ‘इतिहास लिखने की ओर कोई जाति तभी प्रवृत्त होती है जब उसका ध्‍यान अपने इतिहास के निर्माण की ओर जाता है. यह बात साहित्‍य के बारे में उतनी ही सच है जितनी जीवन के. हिंदी में आज इतिहास लिखने के लिए यदि विशेष उत्‍साह दिखाई पड़ रहा है तो यही समझा जाएगा कि स्‍वराज्‍य-प्राप्ति के बाद सारा भारत जिस प्रकार सभी क्षेत्रों में इतिहास-निर्माण के लिए आकुल है उसी प्रकार हिंदी के विद्वान एवं साहित्‍यकार भी अपना ऐतिहासिक दायित्‍व निभाने के लिए प्रयत्‍नशील हैं’ हिंदी साहित्य के इतिहास में हायरार्की आफ वैल्यूजको कायम करने की बात है. हिंदी साहित्य में शताधिक हिंदी साहित्य के इतिहास ग्रन्थ लिखे गए हैं पर उनमें ब्राह्मणवाद का वर्चस्व होने के कारण अन्य समुदायों को ठीक से जगह नहीं मिल पायी है. द्रष्टव्य है कि रामचंद्र शुक्ल जिस कवि या रचनाकार का नाम उल्लेख करते हैं उसकी जातिगत पहचान सबसे पहले कराते हैं. वे अपने पसंद के रचनाकारों को अधिक तरजीह देते हैं और जो उनकी विचारधारा में फिट नहीं बैठता है उसकों ख़ारिज करते हुए चलते हैं. हिंदी का यहीं इतिहास ग्रन्थ जो जातिवाद, क्षेत्रवाद से भरा हुआ है अन्य साहित्येतिहास ग्रन्थ इसी को आधार बनाकर लिखे गए हैं. इस इतिहास ग्रन्थ में बहुत सारी कमियां और भी है.यह केवल पूर्वी उत्तरप्रदेश के कुछ जिलों और बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान के कुछ जिलों के साहित्यकारों को ही शामिल करता है. 

हिंदी जो राष्ट्रभाषा होने का दावा करती है उसका सम्पूर्ण चरित्र की पड़ताल इस इतिहास ग्रन्थ में की जा सकती है. समय के साथ इनकी पड़ताल होनी चाहिए. पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी का हिंदी-साहित्‍य : उसका उद्भव और विकासप्रकाशित हुआ तो अनेक लोगों का धीरज टूट गया और बहुतों की ओर से शिकायत आई कि इति‍हास द्विवेदीजी के गौरव के अनुकूल नहीं है, वैसे ज्‍यादातर लोगों को उनके सम्यक अद्यतन न हो पाने का कष्‍ट था. यह जानते हुए भी कि इतिहास घोषित रूप से छात्रों के उपयोगार्थ लिखा गया है, किसी का ध्‍यान उसके युग-सापेक्ष साहित्यिक बोध की नवीनता एवं सीमा की ओर नहीं गया. शुक्‍लजी के इतिहास के साथ उसे मिलाकर किसी ने यह देखने की कोशिश नहीं की कि दोनों इतिहासों में जो एक पीढ़ी का अंतर है उसके कारण परंपरा के निरूपण एवं मूल्‍यांकन में कहाँ-कहाँ अंतर आ गया है! हिंदी साहित्य के लगभग इतिहासों का जातिवादी अध्ययन किया जाए तो स्थितियां बहुत साफ़ नजर आती हैं. हिन्दी साहित्य के मुख्य इतिहासकार और ग्रन्थ इसी बात की पुष्टि करते हैं. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य का इतिहास लिखते हुए कवि लेखकों की जाति का नाम जरुर दिया है और कहीं कहीं गोत्र का भी. 

आज भी हिंदी में पुराने और बड़े साहित्यकारों के नामों के साथ पण्डित, लाला और बाबू जैसे जातिसूचक संबोधन जोड़ने की प्रथा चलती है. यहाँ कवि की प्राथमिक पहचान उसकी जाति से जुड़ी हुई है. हालाँकि १९ वी सदी की इन जातिसभाओं का इतिहास सिलसिलेवार बहुत कम मिलता है क्योंकि इनमें से ज्यादातर सभायें बेअसर थीं. लड़कों की शिक्षा जैसे मुद्दों को छोड़कर ब्राह्मण और क्षत्रिय सभाओं ने तो अक्सर महत्वपूर्ण सुधारों का विरोध ही किया. जातीय द्वेष के एक मामले में आचार्य शुक्ल स्वयं लिखते हैं कि सिद्धों और योगियों का इतना वर्णन करके इस ओर हम ध्यान दिलाना आवश्यक समझते हैं कि उनकी रचनाएं तांत्रिक विधान, योगसाधना, आत्म निग्रह, श्वास निरोध, भीतरी चक्रों और नादियों की स्थिति, अंतर्मुखी साधना के महत्व इत्यादि की स्वाभाविक अनुभूतियों और दशाओं से उनका कोई सम्बन्ध नहीं. अतः वे शुद्ध साहित्य के अंतर्गत नहीं आती हैं. क्या हम पूछ सकते हैं उनके प्रिय कवि तुलसी,जायसी में यही सब तत्व मौजूद हैं पर उनकी वाणी इसपर एक शब्द नहीं बोलती है. ब्राह्मणी व्यवस्था हर किसी को ब्राह्मण बनाए रखना चाहती है. यह खेल वह किसी महापुरुष के जन्म के साथ टैग कर देती है. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कबीर के बारे में लिखते हैं कि कबीर: ज्ञानाश्रयी शाखा, इनकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक प्रकार के प्रवाद प्रचलित है. कहते हैं काशी में स्वामी रामानंद का एक भक्त ब्राह्मण था जिसकी किसी विधवा कन्या को स्वामी जी ने पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दे दिया था. फल यहाँ हुआ कि उसे एक बालक उत्पन्न हुआ जिसे वह लहरतारा के ताल के पास फेक आयी. अली या नीरू नाम का जुलाहा उस बालक को अपने घर उठा लाया और पालने लगा. यही बालक आगे चलकर कबीरदास हुआ. यहाँ रामचंद्र शुक्ल दर्शाना चाहते हैंकि कबीर को चाहे आप कुछ भी कहिये पर वह हैं विशुद्ध ब्राह्मण का खून.

 

साहित्य का इतिहास और भेदभाव sahitya ka itihas aur bhedbhav

हिंदी साहित्य के अधिकतम इतिहास ग्रन्थ सामान्य वितरण के खिलाफहै. हिंदी में वर्णवादी, जातिवादी आचार्य रामचंद्र शुक्ल का इतिहास प्रतिमान है तब सुमन राजे का इतिहास प्रतिमान कैसे हो सकता है? एक पंडित द्वारा हिन्दू मन से लिखा गया हिंदी का इतिहास धर्म और आस्था से कैसे अलग हो सकता है. दुनिया की जितनी महान कृतियाँ हैं वे दो सिरों की बात करती हैं. अभी एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी पाठ्यक्रम में अस्मितामूलकसाहित्य को स्थान देने के लिए एक लम्बी बहस छिड गई. प्रश्न था किस साहित्यकार को पाठ्यक्रम में जगह दी जाय और किसे छोड़ दिया जाय. पाठ्यक्रम में जगह बनाने के लिए किसी रचना अथवा रचनाकार में क्या योग्यता होनी चाहिए? क्यों कुछ लोगों को दिनकर, निराला, नामवर से बड़ा लेखक दूसरा नजर नहीं आता? वे आज भी ओमप्रकाश बाल्मीकि, प्रो. तुलसीराम, तेज सिंह, डॉ. धर्मवीर, डॉ. चौथीराम यादव, जयप्रकाश कर्दम, अनीता भारती, रमणिका गुप्ता, निर्मला पुतुल, विमल थोराट आदि से क्यों बचना चाहते हैं? क्या पाठ्यक्रम का कोई अपना चरित्र है या वह पाठ्यक्रम बनाने वाले के चरित्र पर ही निर्भर है. हिंदी की दलित धारा साहित्य में राधावाद, विष्णुवाद, कलावाद और भोंथरे मार्क्सवाद को एक सिरे से नकारती है क्योंकि साहित्य में इन ब्राह्मणी मूल्यों का केवल दुरुपयोग हुआ है. जनवादी आलोचक वीरेंद्र यादव अपने आलेख बहुजन समाज और साहित्य कि मुख्यधारामें याद दिलाते हैं की रामविलास शर्मा जैसे हिंदी के आलोचक रेणुकि कृतियों को नकारने का दुस्साहस क्यों करते हैं? क्या कारण है कि अपनी रचनात्मक मेधा से आमजन के सरोकारों पर लिखने वाला कोई दलित, ओबीसी रचनाकार उनके रडार पर नहीं आ पाता है. वे प्रेमचंद की कहानियों, उपन्यासों में आने वाले उन बहुजन नायकों की चर्चा उठाते हैं जो दलित और बहुजन हैं पर आये वे एक विशेष हिकारभाव से ही. निम्न वर्ग से आने वाले पात्रों कि रचना करते समय प्रेमचंद कि सावधानी का जिक्र भी इस आलेख में है. डॉ. मैनेजर पांडे अपनी किताब में लिखते हैं कि परंपरा और परिवर्तन में द्वंद्वात्मक सम्बन्ध होता है. परिवर्तन की व्याख्या का एक उद्देश्य नए परिवर्तनों को प्रेरित करना और दिशा देना भी होता है. साहित्य के परिवर्तन और विकास के मूल में समाज का परिवर्तन और मूल होता है. इतिहास निर्मित करने वालों को स्वयं इतिहास ने निर्मित किया होता है.

 

हिंदी लेखकों की जाति और उसका जातिवादी नामकरण : hindi lekhakon ki jati

 

इस ज्ञान- युग का “महाभारत” शस्त्र से नहीं, स्याही से लड़ा जाएगा. तुलसीदास ने अपनी किसी भी रचना में अपनी जाति का उल्लेख नहीं किया, लेकिन पेट भर कर जातिवादी रचनाएं लिखीं. शुद्रों को ताड़न का अधिकारी बताया. तुलसीदास नहीं बताते कि उनकी जाति क्या है और यह लिखते हैं- अधम जाति में विद्या पाए, भयहु यथा अहि दूध पिलाए. अर्थात जिस प्रकार से सांप को दूध पिलाने से वह और विषैला (जहरीला) हो जाता है, वैसे ही शूद्रों (नीच जाति वालों) को शिक्षा देने से वे और खतरनाक हो जाते हैं. जबकि जाति का विरोध करने वाले कबीर स्पष्ट लिखते हैं कि संत कबीर कहते हैं “जाति जुलाहा, नाम कबीरा” और फिर वे जातिवाद पर कसकर प्रहार करते हैं. गुरु रविदास लिखते हैं “कहि रविदास खलास चमारा” औऱ देखिए कि बे-गम-पुरा यानी भेदभाव से मुक्त शहर की कामना करते हैं औऱ जाति को बराबर निशाने पर लेते हैं. इसलिए कोई “कास्ट ब्लाइंड” बनने का नाटक कर रहा है और कह रहा है कि मेरी कोई जाति नहीं है, मैं तो हिंदुस्तानी मात्र हूं, तो उस पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता. को न परयौ एहि जाल में ? जाति के जाल में सभी फँसे हैं .आप फँसे तो क्या ? आप देखिए न भारतेंदु हरिश्चंद्र को ? वे तो युग प्रवर्तक कवि हैं .हिंदी साहित्य में उनके नाम पर ” भारतेंदु युग ” है.भारतेंदु ने किसका इतिहास लिखा ? अपनी जाति का इतिहास लिखा.अग्रवालों का इतिहास लिखा – अग्रवालों की उत्पत्ति( 1871).भारतेंदु ने किसका संगठन बनाया ? अपनी जाति का संगठन बनाया.वैश्यों का संगठन बनाया – वैश्य हितैषिणी सभा (1874 ).अपनी जाति का इतिहास लिखना और अपनी जाति का संगठन कायम करना हिंदी साहित्य में कोई नई बात थोड़े न है ? अवध के लोगों में यथोचित जानकारी का अभाव है ’इसकी एक अहं वजह जातिभेद की प्रथा है’ जिनके साहित्य में मिलने वाले की चेतना को ‘हिंदी नवजागरण कहा जाता है’ वास्तव में वे इन्हीं सनातन संस्थाओं से जुड़े हुए व्यक्ति थे. लेकिन पश्चिमोत्तर प्रान्त में बनी सभाएं इन सबसे अलग ढंग की थी. यहाँ जाति सभायें खुद ब्राह्मणों ने और दूसरी द्विज जातियों ने ही बनाई. यहाँ जाति सभायें ब्राह्मण वर्चश्व के खिलाफ उत्पीड़ित जातियों ने नहीं बनाई. साहित्य में शुक्ल युग, द्विवेदी युग, शुक्लोत्तर युग आदि क्या इंगित करते हैं?

 

 

अछूत की शिकायत :

शम्बूक, एकलव्य और कर्ण अपनी योग्यता, दक्षता और क्षमता में किससे कम थे परन्तु सिर्फ इसलिए उनका शारीरिक मानसिक वध किया गया कि उनके उत्थान से ब्राह्मणपुत्रों और राजपुत्रों की रोजी-रोटी समाप्त होती थी. उनका सम्मान छिनता था. उनके ऊपर आने का मतलब था दुनिया का नरक में डूबना. जहाँ उत्थान और उन्नति के सारे अवसरों पर प्रवेश-निषेधकी तख्तियां लगी हैं (यहाँ कुत्तों और शूद्रों का प्रवेश वर्जित). बारहवीं सदी में करुणा को ही धर्म और श्रम को पूजा समझने वाले एक ब्राह्मण बसवराजेश्वर ने कन्नड़ क्षेत्र के दलितों और अपने स्वजातियों के बीच विवाह संबंधों की रेडिकल परंपरा शुरू करने का दुसाहस किया था लेकिन बदले में उन्हें हताश मृत्यु का वरण करना पड़ा. उसने निचली जातियों में से जो वीरशैव गढ़े थे द्विज परम्परा ने लिंगायत के रूप में अपना लिया जिनका दलितों के खिलाफ प्रथम आक्रामक पंक्ति की तरह दोहन किया जाता है.  हिंदी में एक अछूत को अपनी शिकायत दर्ज करनी पड़ी क्योंकि उसकी आवाज को अनसुना कर दिया गया. इतिहास में दाखिल होना तो और दूर की कौड़ी हो गई. इस पद के माध्यम से हम हासिये के एक बड़े समुदाय की पीड़ा को समझ सकते हैं. 

हमनी के इनरा के निगिचे न जाईला जा 

पांके में से भरि-भरि पियतानी पानी|

पनही से पिटि पिटि हाथ गोड़ तुरि दैले 

हमनी के एतना काहे के हलकानी ||

यह बीसवीं सदी का दूसरा दशक था जब १९१४ में महावीर प्रसाद द्विवेदी की यशस्वी पत्रिका में दलित कवि हीरा डोम रचित अछूत की शिकायतप्रकाशित हुई थी.  इसके बाद क्रांति, लोकतंत्र, आधुनिकता और मानवाधिकारों को समर्पित पूरी शताब्दी में अछूत अपनी शिकायत के निराकरण की प्रतीक्षा करते रहे. उन्होंने शिकायत करने के हर जरिये का इस्तेमाल किया. उन्होंने परम्परा के दरबार में हाजिरी लगाईं और अन्त्यज से शूद्र बनने की कोशिश करके जाति के दायरे के भीतर ऊपर उठना चाहा. भक्ति आन्दोलन से बहले वे ईश्वर के दरबार से बहिष्कृत थे. संत कवियों ने उन्हें ईश्वर को उलाहना देना सिखाया था.

 

ब्राह्मणवाद ने कैसे एक दूसरे को पोषा :

 

नामवर सिंह ने भी एक उक्ति दे डाली कि घोड़े पर लिखने के लिए क्या घोड़ा होना होगा?’ यहां उत्तर हां में होगा. घोड़े पर कसी गई जीन का वजन और उसकी कसावट का बंधन, उसके मुंह में लगाई गई लगाम का स्वाद, उस पर पड़ते कोड़े की फटकार का दर्द, उसके खुर में ठोंकी गई नाल का दंश घोड़ा ही बता सकता है, कोई और नहीं. परंतु यह भी सत्य है कि मनुष्य घोड़े की सवारी करना, उसकी दुलत्ती खाना, उसके रंग, उसकी हिनहिनाट की आवाज, उसकी सरपट चाल के साथ उससे सहानुभूति करता हुआ उसकी तकलीफ पर जरूर लिख सकता है, अभी घोड़ा नहीं लिख सकता. जिस विचारधारा ने भारत में ब्राह्मणों को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया है, जिनके पास सत्ता को संचालित करने का अधिकार था और सबसे बड़ी बात जिनके पास अध्ययन-अध्यापन का अधिकार था, वे ही लेखन कार्य में भी लगे हुए थे. वेदों को अपौरूषेय सिद्ध किया जाता है, लोक वांङ्मय को जाने किस श्रेणी में रखा जाएगा? पौराणिक कृतियों के अतिरिक्त लौकिक रचनाओं के रचनाकारों के जो ज्ञात नाम हैं, ये सब कौन थे? उपनिषद, स्मृतियां, काव्यशास्त्र संस्कृत के ग्रंथ आदि की रचनाएं किनके द्वारा की जा रही थीं? स्वाभाविक है कि यही रचनाकार आलोचना कर रहे थे और कर रहे हैं. अब अपनी मानसिकता के साथ वे जैसी आलोचना कर रहे हैं, उसी खाचें में सबको खचित करना चाहते हैं, और सबसे यही अपेक्षा करते हैं. 

यह वहीं नामवर हैं जो पिछले दिनों दिल्ली में दस पुस्तकों के विमोचन के अवसर पर लगभग चेतावनी देते हुए कहा था कि यदि साहित्य में आरक्षण दिया गया, तो जैसे राजनीति गन्दी हो गई, वैसे ही साहित्य का क्षेत्र भी गन्दा हो जायेगा. हिंदी साहित्य लेखन में जिस तरह की गुटबंदी और चाटुकारिता का आलम है वह काबिले गौर है. शिष्य बनाने की सनातन परम्परा हिंदी में आकर कैसे टूटती? हर मठाधीश अपने दो चार गुर्गे जरुर पालकर चलता है. वे गुर्गे श्वान की भाँती उनके चारो तरफ दुम हिलाते फिरते हैं और बदले में गुरु का बचा हुआ पाते हैं. मध्यकाल की तरह यहाँ सत्ता और भोक्ता के बीच गुरु नाम का एक मिडियोकर जरुर है. वह अपने चेलों को भोग की सारी सामग्री उपलब्ध कराता है. हिंदी में जो भी आलोचना और इतिहास लेखन विकसित हुआ वह इसी चेलावाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद के आधार पर हुआ. इन्हीं आलोचकों ने हिंदी का सबसे ज्यादा नुकसान किया है. इतिहास ग्रंथों में अपने रिश्तेदारों को प्रश्रय, अपनी जाति को प्रश्रय, अपने चेलों को बढ़ावा और देशज शब्दों में कहें तो तू मेरी खुजा हैं तेरी खुजाओं की रीति पर सब हुआ. इसी परंपरा के पोषक सच्चे मैनेजर ‘मैनेजर पांडे’ अपनी पुस्तक ‘साहित्य और इतिहास दृष्टि’ में लिखते हैं कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा ने अपने अपने इतिहास और आलोचना सम्बन्धी लेखन में पुरान्पंथियों, रीतिवादियों आधुनिकतावादियों और रूपवादियों के तरह-तरह के जनविरोधी और इतिहास विरोधी दृष्टिकोण के विरुद्ध संघर्ष किया. आज जब हम जनविरोधी और इतिहास विरोधी दृष्टिकोणों से संघर्ष करना चाहते हैं और जनता के मुक्ति संघर्ष में सहायक हिंदी साहित्य तथा उनके इतिहास की पक्षधर भूमिका की पहचान विकसित करना चाहते हैं तो यह आवश्यक है कि हम आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा के ऐसे संघर्षों को याद करें. अब सोचने वाली बात है कि इनमें से सभी आलोचक पुराणपंथी और यथास्थितिवादी है तब ऐसी परम्परा को क्या नाम दिया जा सकता है. साहित्य में इससे बड़ा झूठ और क्या हो सकता है. 

 

डॉ. आंबेडकर का सामाजिक चिंतन :

आंबेडकर एक समाजशास्त्री और राजनीतिज्ञ, समाज-सुधारक, अर्थ शास्त्री और कानूनविद थे, लेकिन सामान्य अर्थों में साहित्यकार नहीं थे. कहने भर के लिए माना जा सकता है कि आम्बेडकर की आत्मकथा ‘मी कसा झालो’ (मैं कैसे बना) से प्रेरणा लेकर दलित साहित्यकारों ने आत्मकथा की विधा विकसित की. आंबेडकर में ही दलित साहित्य के स्रोत दिखाने के लिए उदाहरण दिया जाता है. लेकिन साहित्य के क्षेत्र में आंबेडकर का असली महत्व कुछ और था.एक पथ-प्रदर्शक और मनोवैज्ञानिक मुक्ति के द्वार पर दलितों को खड़ा कर देने का महत्व. किसी भी विचारक पर चिंतन करते हुए यह आवश्यक हो जाता है कि हम यह सोचें कि वृहत्तर समाज के विकास में उस विचारक का योगदान सकारात्मक है या नकारात्मक. नि:संदेह यहां हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि डॉ. आंबेडकर अपनी सामाजिक चिंतक की भूमिका किन मुद्दों को ध्यान में रखते हुए निर्वाह कर रहे थे? उनके लिए महत्त्वपूर्ण क्या था? वह किस दृष्टिकोण से समाज को देख रहे थे? चिंतन की दार्शनिक भूमिका तक चलकर वह क्यों आए थे? इन सारे प्रश्नों का एक ही उत्तर है जाति के दंशसे उपजी सामाजिक असमानता को निराधार करना. जाति भेद की जड़ें खोदना, जाति प्रथा की चूलें हिला देना. सामाजिक असमानता के जितने भी कारण उन्हें दिखाई दे रहे थे, उन्हें समूल नष्ट करने हेतु वह साक्ष्य जुटा रहे थे. दूसरी तरफ डॉ. आंबेडकर से असहमति व्यक्त करने वाले लोग चूंकि स्थापित व्यवस्था के पोषक थे अत: डॉ. आंबेडकर से स्वभावत: अपनी असहमति प्रदर्शित कर रहे थे. यह भी सच है कि चाहे कितने ही संतुलित और निष्पक्ष होने के प्रयास किए जाएं पर अनायास ही हमारे संस्कार हमें अपने पक्ष में खड़ा कर लेते हैं. इसका यह आशय नहीं कि ये प्रयास विफल हो गए, आशय यह है कि इतनी यात्रा तो हो गई और आगे भी संभावनाएं बनी रहेंगी. ‘गौरव का लोकगीत:समकालीन दलित विश्वास के तीन घटक’ में दलित आन्दोलन पर विस्तृत काम करने वाले इलिअनर जिलिअट ने अपने आलेख में बाबा साहेब द्वारा मराठी में लिखी गई तीन पंक्तियों के अंग्रेजी अनुवाद में लिखा है कि :

हिन्दुओं को चाहिए थे वेद, इसलिए उन्होंने व्यास को 

बुलाया जो सवर्ण नहीं थे|

हिन्दुओं को चाहिए था एक महाकाव्य, इसलिए उन्होंने 

वाल्मीकि को बुलाया जो खुद अछूत थे|

हिन्दुओं को चाहिए था एक संविधान, और उन्होंने 

मुझे बुला भेजा||

 

आंबेडकर की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा धर्माधारित हिंसा को उद्घाटित और विश्लेषित करने में खर्च हुआ. दलित साहित्य में धर्मशास्त्रीय हिंसा पर प्रभूत सामग्री संचित है. सिर्फ शंबूक प्रसंग पर भारतीय भाषाओं में दलित रचनाकारों द्वारा लिखी कविताओं, कहानियों को इकट््ठा किया जाए, तो एक वृहद् ग्रंथ बन जाएगा! उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध के समाजसुधारकों और फुले-आंबेडकर जैसे सामाजिक क्रांतिकारियों के सतत प्रयासों ने उम्मीद बंधाई थी कि आजाद भारत में हिंसा के दुश्चक्र पर विराम लगेगा. कहने की जरूरत नहीं कि यह उम्मीद धूल-धूसरित हुई.

डॉ आंबेडकर कबीर, रैदास, दादू, नानक, चोखामेला, सहजोबाई आदि से प्रेरित हुए. कबीर को डॉ. आंबेडकर अपना दूसरा गुरु बताया. आधुनिक युग में ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले, रामास्वामी नायकर पेरियार, नारायण गुरु, शाहूजी महाराज, गोविन्द रानाडे आदि ने सामाजिक न्याय को मजबूती के साथ स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.  डॉ. आंबेडकर ने ज्योतिबा फुले को अपना तीसरा गुरु बताया और अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तकहू वर दी शुद्राजउनको समर्पित की. अपने समर्पण में 10 अक्तूबर १९४६ को आंबेडकर ने लिखा जिन्होंने हिन्दू समाज की छोटी जातियों से उच्च वर्णों के प्रति उनकी गुलामी की भावना के सम्बन्ध में जागृत किया और उन्होंने विदेशी शासन से मुक्ति पाने में भी सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना अधिक महत्वपूर्ण है, इस सिद्धांत की स्थापना की, उस आधुनिक भारत के महान राष्ट्रपिताज्योतिराव फुले की स्मृति को सादर समर्पित. डॉ आंबेडकर यह मानते थे कि फुले के जीवन दर्शन से प्रेरणा लेकर ही वंचित समाज की मुक्ति दे सकती है.

 

 

हिंदी साहित्य, साहित्येतिहास में आंबेडकर कहाँ ? 

डॉ.अम्बेडकर कहते हैं कि मनुष्यमात्र को एक तर्कशील जमात बनाना होगा. मनुष्य को मनुष्य बनना होगा जिसमें प्रेम, सहिष्णुता, करुणा और मेहनत करने का माद्दा हो. जिसमें आत्मसम्मान हो और दूसरों को सम्मान देने की आदत हो, जो छद्म से दूर एक खुली किताब हो . अठारवीं सदी से पहले भारत की शिक्षा व्यवस्था पर यदि नजर डालें तो स्थिति बिलकुल शून्य है. अनपढ़ों की एक बड़ी जमात दिखाई देती ही. देश के चार या पांच प्रतिशत पुरुषों को ही पढ़ने का अधिकार रहा है. वे भी शिक्षा गुरुकुल या घर पर अध्यापक रखकर की जाने वाली शिक्षा रही है. शिक्षा के नाम पर तो यदि कोई स्त्री या दलित शास्त्रवचनों को सुन ले तो उसके कान में शीशा घोलकर डाल देने की बात यहाँ के विधि ग्रंथों में रही है. यानि केवल उस समुदाय के पास शिक्षा है जो या तो लूटकर्म में संलिप्त है या उसमें सहायक हो रहा है. डॉ. वीरभारत तलवार लिखते हैं कि कुल मिलाकर उन्नीसवीं सदी का नवजागरण हर दृष्टि से बड़े शहरों के आधुनिक शिक्षाप्राप्त भद्रवर्ग का सांस्कृतिक आन्दोलन था जिसका सम्बन्ध व्यापक अशिक्षित जनता से और गैर द्विज जातियों से बहुत कम था. एक युद्ध जिसे १९३० के आसपास बिहार के कुछ जिलों में दलित, खेतिहर और शिल्पकार जातियों के लोग लड़ते हैं और उसका कोई प्रत्यक्ष प्रभाव हिंदी के पंडितों को दिखाई नहीं देता है तो इसका कारण क्या है? मधुकर सिंह के उपन्यास कथा कहो कुन्तो माईका प्रसंग इन्हीं सन्दर्भों में आता है. जाति-व्यवस्था को तोड़ने के लिए गौतम बुद्ध से लेकर ज्योतिबा फुले, कबीर, भीमराव आंबेडकर आदि ने आजीवन संघर्ष किया और वैज्ञानिक और ऐतिहासिक दृष्टि को अपनाने की सीख दी. हिंदी दलित लिटरेचर एंड द पॉलिटिक्स ऑफ रिप्रेजेंटेशन. के पहले दो अध्यायों में उत्तरप्रदेश में बीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में प्रकाशित दलित पर्चों की विवेचना की गई है. सार्वजनिक जीवन से अलग-थलग रहने को मजबूर दलितों में से कुछ ने अपने छापेखाना स्थापित किए. ऐसे ही एक उत्साही थे चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु. लखनऊ में सन 1899 में एक निम्न जाति (ओबीसी) परिवार में जन्मे जिज्ञासु ने 1930 के दशक में कल्याण प्रकाशनकी स्थापना की. शुरूआत में वे अपने लेखन द्वारा राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार करते थे परंतु जल्दी ही उनका मुख्यधारा के राष्ट्रवादी आंदोलन से मोहभंग हो गया क्योंकि वह समाजसुधार के मुद्दे को पूरी तरह नजरअंदाज कर रहा था. बाद में वे आदि हिंदू आंदोलन के अछूतानंद और आंबेडकर के संपर्क में आए और उन्होंने अपनी प्रेस का नाम हिंदू समाज सुधार कार्यालय’. से बदलकर बहुजन कल्याण प्रकाशन’. रख दिया. जिज्ञासु की सोच में जिस तरह का परिवर्तन आया, कुछ वैसा ही परिवर्तन 20वीं सदी के प्रारंभिक वर्षों के कई दलित-ओबीसी लेखकों के विचारों में भी हुआ. उन्होंने हिंदू धर्म को पूरी तरह नकारना शुरू कर दिया. बहुजन लेखकों ने पर्चों का इस्तेमाल सामाजिक कार्य के औजारबतौर करना शुरू कर दिया. सन 1920 के आसपास उनने दलितों के लिए अपने एक अलग सामाजिक क्षेत्र का निर्माण किया. उनके निशाने पर था हिंदू धर्म और उनका लेखन जाति, अछूत प्रथा, दलित इतिहास और भेदभाव से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित था. हिंदी के किसी भी इतिहासकार ने हिंदी साहित्य पर आंबेडकर के प्रभाव को स्वीकार नहीं किया है जबकि वे गांधी के साथ एक केन्द्रीय व्यक्तित्व थे. 

 

 

क्या कहते हैं हिंदी के गैर ब्राह्मण लेखक, आलोचक :

पिछले दो दशकों में सबाल्टर्न साहित्य के अध्ययन की तरफ लोगों का रुझान बढ़ा है. इसी का परिणाम है कि वर्तमान समाज में अस्मितावादी साहित्य ने व्यापक रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है. दलित समाज शोषण और उपेक्षा का शिकार रहा है जिसके अनेक कारणों में मुख्य कारण हैं उसका अशिक्षित होना. लेकिन इसके साथ ही दलित विमर्श की लिखित एवं वाचिक परंपराओं का भी तीव्र विकास हुआ है. भारत में मार्क्सवाद और जनवादी साहित्य पर वर्णवादी लोगों का कब्ज़ा यह दर्शाता है उसका भारतीय करण कर दिया गया है. हिन्दी रचनाजगत में दलित लेखकों की सक्रियता तीन क्षेत्रों में सामने आई. उन्होंने बड़े पैमाने पर रचनात्मक साहित्य लिखा. दलित लेखकों की कविताएँ और कथाकृतियाँ प्रकाशित हुईं. निचली गहराइयों से उछल-उछल कर आने वाली ये तस्वीरें इतनी खौफनाक हैं कि सारे समाज को दहलाकर रख देती हैं. डॉ. राजेन्द्र यादव अपने जातीय पहचान के बारे में लिखते हैं कि हुआ यूं कि मेरे अस्सी वर्ष पूरे होने पर अशोक वाजपेयी ने रजा फाउंडेशन की ओर से मेरा सम्मान किया. वहां उदय प्रकाश ने पिछड़ी जातियों के उत्थान की बात करते हुए कुछ ऐसी बातें कहीं जो मुझे सुरुचि पूर्ण नहीं लगीं. सन् 1952-54 तक मेरे तीन कहानी-संग्रह और एक उपन्यास आ चुके थे और मुझे शायद ही कभी याद आया हो कि मेरे नाम के पीछे लगा यादव समाजिक पिछड़ेपन का संकेत है हो सकता है पारिवारिक पस्थितियों के कारण या व्यक्तिगत उद्यम के चलते.  वर्ण-व्यवस्था में ब्राह्मïण शक्ति और सत्ता का प्रतीक है-(क्योंकि ज्ञान ही सत्ता है) वह अपने ज्ञान से सत्ताधारियों को नचाता रहा है, उधर बाकी सब सत्ता के याचक हैं. अगर औरों से छीनकर पूंजी पर एकाधिकार बनाये रखने और श्रम के सहारे जीविका अर्जित करने वालों के दो वर्ग हो सकते हैं तो ज्ञान के वर्चस्व और ऐंद्रिक अनुभवों के माध्यम से सृष्टि का साक्षात्कार करने वालों के दो वर्ग क्यों नहीं हो सकते? दोनों ही विभाजनों में एक वर्ग परोपजीवी है, इसलिए कला, आध्यात्म, जीव-ब्रह्मï के अमूर्तनों में आनंदानुभूति करता रह सकता है-वह काव्य, शास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम का कीर्तन नहीं करेगा तो क्या वह करेगा जो खून-पसीने से रोटी कमाता है या जमीन के नीचे और सागर के तूफानों में बीवी-बच्चों के लिए भोजन तलाशता है? उसे ही तो बलपूर्वक ज्ञान से दूर रखा गया है. अगर पूंजीपति को धन-पिशाच कहा जाता है तो इस ब्राह्मïण को ज्ञान-पिशाच क्यों नहीं कहा जाना चाहिए?  समाज की यह भी सचाई है कि जातियों के बजाय बात विचारधारा की होनी चाहिए-सामाजिक न्याय की विचारधारा. विभाजन सामाजिक न्याय की विचारधारा के समर्थन और विरोध के आधार पर होना चाहिए. क्योंकि कोई भी जाति एक समरूप समुदाय नहीं है. उसके अंदर विभिन्न वर्ग, गुट और विचारधारायें होती हैं और इन्हीं के मुताबिक उसके अंदर से कई तरह की राजनीति और नेतृत्व उभरता है. इससे एक जाति के अंदर और विभिन्न जातियों के बीच भी टकराहट पैदा होती है. इसलिए विभाजन और संगठन सामाजिक न्याय की विचारधारा के आधार पर होना चाहिए, न कि जातियों के आधार पर. समस्या यह है कि हम जातिवाद से ग्रस्त समाज से कैसे लड़ें ? जातिवाद से ग्रस्त समाज,ऐसे समाज से भी बुरा है जिसमें गुलामी का प्रचलन हो, यह रंगभेद से भी बदतर है. यह एक ऐसा समाज है, जो यह हिंदी साहित्य में एक ही धारा है ब्राह्मणवाद : जिसे आप मुख्यधारा कहते हैं, वह दरअसल साहित्य की ब्राह्मणवादी धारा है. इस धारा के सभी रचनाकार ब्राह्मण थे, जिन्होंने वर्णव्यवस्था और हिन्दू संस्कृति के पुनरुत्थान को साहित्य की मुख्यधारा के रूप में स्थापित किया था. इस धारा ने वर्णव्यवस्था का खण्डन करने वाली किसी भी प्रगतिशील धारा को स्वीकार नहीं किया. समतावादी और मौलिक समाजवाद की धारा भारतेन्दु से पहले भी और उनके बाद भी , लगभग हर दौर में मौजूद थी. 

 

 

भारतीय साहित्य-संस्कृति, सांस्कृतिक अवरोध :

भारतीय संस्कृति ने अपनी लम्बी विकास यात्रा तय की है, जिसमें वैचारिकता, जीवन-संघर्ष, विद्रोह, आक्रोशनकारप्रेमसांस्कृतिक छदमराजनीतिक प्रपंच, वर्ण- विद्वेषजाति के सवाल, साहित्यिक छल आदि विषय बारबार दस्तक देते हैं. वस्तुतः आजतक जिसे भारतीय संस्कृति कहा जाता रहा है वह एक ख़ास समुदाय और जाति विशेष की संस्कृति है. यानी कि लोक और शिष्ट का भेद पहले से ही होता आया है. शोषकों की एक लयबद्ध संस्कृति को अभी तक भारतीय संस्कृति कहकर प्रचार-प्रसार किया जाता रहा है. यदि संस्कृति का ठीक से अध्ययन किया जाए तो पता चलेगा कि उसमें से भारत की सत्तर प्रतिशत जनता का हिस्सा गायब है. वे लगातार हासिये पर धकेले गए हैं. उनकी संस्कृति को संस्कृति माना ही नहीं गया. उच्च वर्णस्थ जातिवादी मानसिकता ने ग्राम्य या देशज कहकर नकार दिया गया. मूलतः यह संस्कृति नहीं अपितु विकृति है. शोषण, दमन, छुआछूत, जातिवाद, क्षेत्रवाद पर आधारित इस संस्कृति को मूलतः ब्राह्मण संस्कृति तो कहा जा सकता है भारतीय संस्कृति नहीं. किसी देश की संस्कृति तो वहां के निवासियों का आइना होती है. समाज, साहित्य, कला, जीवन में जिसे भारतीय संस्कृति कहा जाता रहा है उनका अब पुनर्पाठ होना चाहिए. जिस विषमतामूलक समाज में एक दलित संघर्षरत हैं, वहां मनुष्य की मनुष्यता की बात करना अकल्पनीय लगता है. इसी लिए सामाजिकता में समताभाव को मानवीय पक्ष में परिवर्तित करना दलित की आंतरिक अनुभूति है, जिसे अभिव्यक्त करने में गहन वेदना से गुजरना पडता है. भारतीय जीवन का सांस्कृतिक पक्ष दलित को उसके भीतर हीनता बोध पैदा करते रहने में ही अपना श्रेष्ठत्व पाता है. लेकिन एक दलित के लिए यह श्रेष्ठत्व दासता और गुलामी का प्रतीक है. जिसके लिए हर पल दलित को अपने स्वकी ही नहीं समूचे दलित समाज की पीड़ादायक स्थितियों से गुजरना पड़ता है. दलित चेतना दलित कविता को एक अलग और विशिष्ट आयाम देती है. यह चेतना उसे डा. अम्बेडकर जीवनदर्शन और जीवन संघर्ष  से मिली है. 

यह एक मानसिक प्रक्रिया है जो इर्द-गिर्द फैले सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, शैक्षणिक, आर्थिक छदमों से सावधान करती है. यह चेतना संघर्षरत दलित जीवन के उस अंधेरे से बाहर आने की चेतना है जो हजारों साल से दलित को मनुष्य होने से दूर करते रहने में ही अपनी श्रेष्ठता मानता रहा है. इसी लिए एक दलित चेतना और एक तथाकथित उच्चवर्णीय चेतना में गहरा अंतर दिखाई देता है. भारत की सामासिक संस्कृति की बुनावट को रेखांकित करते हुए उच्च वर्णस्थ और नेहरु के पिछलग्गू रामधारी सिंह दिनकर अपनी पुस्तक संस्कृति के चार अध्यायमें भारतीय संस्कृति को रेखांकित करते हुए लिखते है कि भारतीय संस्कृति में चार बड़ी क्रांतियाँ हुई हैं और हमारी संस्कृति का इतिहास उन्हीं चार क्रांतियों का इतिहास है. पहली क्रांति तो तब हुई जब आर्य भारतवर्ष में आये अथवा जब भारतवर्ष में उनका आर्येत्तर जातियों से संपर्क हुआ. दूसरी क्रांति तब हुई जब महावीर और गौतमबुद्ध ने इस स्थापित धर्म या संस्कृति के विरुद्ध विद्रोह किया तथा उपनिषदों की चिन्ताधारा को खींचकर वे अपनी मनोवांछित दिशा की ओर ले गए. इस क्रांति ने भारतीय संस्कृति की अपूर्व सेवा की, किन्तु अंत में, इसी क्रांति के सरोवर में शैवाल भी उत्पन्न हुए और भारतीय धर्म और संस्कृति में जो गंदलापन आया, वह काफी दूर तक इन्हीं शैवालों का परिणाम था. तीसरी क्रांति उस समय हुई जब इस्लाम विजेताओं के धर्म के रूप में भारत पहुंचा और इस देश में हिंदुत्व के साथ उसका संपर्क हुआ. चौथी क्रांति हमारे समय में हुई जब भारत में यूरोप का आगमन हुआ.  इसे वे चार सोपान कहते हैं. अब मान्य दिनकर जी से पूछा जाना चाहिए कि क्या भारत सिर्फ युद्धों या बर्बरों की संस्कृति को मानता है?

 दिनकर जिस संस्कृति कह रहे हैं वह किन लोगों की संस्कृति है? क्या यह आदिवासियों, मूलनिवासियों, दलितों, पिछड़ों की संस्कृति है? क्या इसमें कुछ हिस्सा दक्षिण, उत्तर-पूर्व के लोगों का भी है? कुछ लोग भारतीय संस्कृति को विरुद्धों का सामंजस्य के तौर पर देखते हैं और उनमें तुलसी परंपरा के रामचंद्र शुक्ल सबसे आगे हैं. प्रभुत्वशाली संस्कृति अपनी सुरक्षा के लिए पुनरुत्थानका रास्ता अख्तियार करती है. प्रभुत्वशाली संस्कृति के दो काम होते हैं- एक स्वयं कि रक्षा और दूसरा प्रतिवाद’  प्रसिद्ध मानवशास्त्री राबर्ट रेडफील्ड संस्कृति के सम्बन्ध में जिसे ग्रेट ट्रेडिशनतथा लिटिल ट्रेडिशनकहते हैं नामवर सिंह अपनी पुस्तक दूसरी परंपरा कि खोजमें उन्हीं प्रवृत्तियों के प्रतिनिधित्व के लिए शास्त्र और लोक शब्द का प्रयोग कहते हैं.  लोक के मन में शास्त्र के लिए हमेशा हीन ग्रंथि इन्फ़िरियर कोम्प्लेक्सहोता है. माग्रेट मीड की कृति सेक्स एण्ड टेम्परामेंट इन थ्री प्रिमिटीव सोसाईटीज यह स्पष्ट करती है कि जैविक भिन्नता नहीं बल्कि समाज और संस्कृति, पुरुषों और स्त्रियों के लिए भिन्न-भिन्न मानदंड तय करती है. उस मानक के हिसाब से समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा उनका अनुकूलन करती है. यह जैविक भिन्नता नहीं समाज और संस्कृति तय करती है कि किसके जन्म लेने पर काँसे की थाली बजेगी और किसके जन्म लेने पर उदासी की भाँय-भाँय गूँजेगी. कहते हैं किसी को गुलाम बनाना हो तो उसे सांस्कृतिक रूप से गुलाम बना दीजियेउसके अतीत को इतना बिगाड़ दीजिये की वो कभी अपनी जड़े न खोज पाये. देर ही सही  इन पर से पर्दा उठने का कार्य प्रारम्भ हो गया जिसे संघ परिवार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहता है वह वस्तुतः पश्चिमी उपनिवेशवादियों द्वारा दिया ओरियंटलिज्म है. अपनी सामाजिक बनावट में वह शुद्ध सामंती है क्योंकि गैर बराबरी और शोषण दमन को धार्मिक आधार देता है. स्त्रियाँ दलित और पिछड़े ऊपर उठने की कोशिश न करें. इसके लिए धार्मिक आदेश और जन्मान्तर के कठोर नियम हैं. कुछ जातियां न ऊपर उठें न अपनी स्थिति बदलें क्योंकि यह व्यवस्था ईश्वरीय है. अपनी स्थिति के लिए वे नहीं उनके पूर्वजों, पूर्वजन्मों के कर्म जिम्मेदार हैं. यथास्थिति बनाये रखने के लिए प्रारब्ध एक ऐसी व्यवस्था है जिसके खिलाफ कोई विद्रोह नहीं किया जा सकता. कभी कर्म से बनीं होंगी हिन्दू धर्म कि जातियां मगर वे हजारो सालों से आज जन्म से ही निर्धारित होती हैं.

 

इतिहास की तीन महान सामाजिक क्रांतियाँ :

हिंदी के सुविचारित आलोचक चौथीराम यादव ने कहा था भारत में प्रमुख रूप से तीन सामाजिक क्रांतियाँ हुई है. एक भगवान बुद्ध की क्रांति, दूसरी भक्ति आन्दोलन या कबीर रैदास की क्रांति और तीसरी बाबा साहेब आंबेडकर की सामाजिक क्रांति. ये सब परिवर्तन कामी क्रांतियाँ थीं. कबीर और रैदास का सम्बन्ध बनारस से था. यह वही बनारस है जो सामंतों, पंडों, पुजारियों और वर्णपूजकों का गढ़ है. यहाँ न कबीर की सुनी गई न रैदास की. रैदास पंजाब में ज्यादा सुने गए. कबीर भी इधर उधर ज्यादा सुने गए उन्हें बनारस ने कम पूछा गया. बनारस या पूर्वांचल में कौन सुना गया यह जानना बहुत जरुरी है. ब्राह्मणों और तथाकथित आलोचकों के बीच तुलसीदास अधिक सुने गए. तुलसी दास के लिए आलोचकों में हुंवा, हुंवा का स्वर प्रबल है जबकि रैदास और कबीर के लिए ‘भों, भों, का स्वर सुनाई देता है. यह अकारण नहीं है. यह बताता है कि हुंवा-हुंवा का स्वर करने वाले लोग यथास्थितिवाद के समर्थक थे. वे स्टेटस बरकरार रखना चाहते थे. वे चाहते थे वर्णक्रम और जातिक्रम बना रहे. साम्रदायिकता बनी रहे. भों-भों का स्वर में वर्ण, जाति के विरुद्ध लिखने वाले लोग थे. मध्यकाल पर ध्यान दें तो एक बड़ी बात निकलती है मित्रों. गुरुग्रंथ साहिब में संत रैदास के पद मिलते हैं, कबीर के पद मिलते हैं, अन्य भाषाओँ समुदायों के स्वर मिलते हैं पर वर्णवादीयों के प्यारे, सबसे अधिक पूज्य तुलसीदास के पद हमें नहीं मिलते. वर्णवादी आलोचकों जैसे रामचंद्र शुक्ल, नामवर, रामविलास शर्मा जैसों का मानना है संत पढ़े लिखे नहीं थे इसलिए उनके पास समाज का कोई माडल नहीं था. वे तुलसी के रामराज्य में विश्वास करते हैं जिसमें दलितों, पिछड़ों, महिलाओं, आदिवासियों के लिए के लिए कोई जगह नहीं है. यदि कोई तुलसीदास के साथ खड़ा है तो वह दलितों, मुसलमानों, महिलाओं, आदिवासियों क ए साथ न्याय कैसे कर सकता है? 

 

 

भाषा व्यवहार में भेदभाव :  

 

प्रसिद्ध विचारक राजेन्द्र प्रसाद लिखते हैं कि सिंह  गुरु घंटाल बौद्ध संत थे. इनकी याद में गुरु पद्म संभव ने 8 वीं सदी में गुरु घंटाल मंदिर की स्थापना की थी. यह मंदिर हिमाचल- प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में है. ब्राह्मण और बौद्ध संस्कृति के आपसी टकराव के कारण ” गुरु घंटाल ” का अर्थापकर्ष हुआ है. आर्य और द्रविड़ संस्कृति के आपसी टकराव के कारण भी कई शब्दों का अर्थापकर्ष हुआ है जिसमें एक शब्द ” पिल्ला ” भी है. तमिल में ” पिल्ला ” मनुष्य के बच्चे को कहा जाता है ,जबकि आर्य भाषाओं में यह कुत्ते के बच्चे का बोधक शब्द है. जैन और ब्राह्मण संस्कृति के आपसी टकराव के कारण ” जिन” का अर्थ ” भूत- प्रेत” हो गया है.ऐसे तो भाषाविज्ञान कोश में कई ऐसी भाषाओं के नाम दर्ज हैं जो भूत- प्रेत से संबंधित हैं, मिसाल के तौर पर “भूत भाषा”, “प्रेत भाषा” , “पिशाच भाषा”, “चंडाल भाषा” आदि. ऐसी भाषाओं के नाम आस्ट्रिक और आर्य संस्कृति के आपसी टकराव के कारण है.बाहर से आई जातियों का भी अर्थापकर्ष हुआ है, मिसाल के तौर पर “हुड़हा” (लूटेरा), “उजबुक” (मूर्ख), ” कजाक” (डाकू) आदि.ये क्रमशः हूण (मंगोलियन), उजबेक (उजबेकिस्तान), कजाक (कजाकिस्तान) के बोधक शब्द हैं. आदिवासियों का एक तबका असुर है, जो झारखंड में निवास करता है और जिसका प्रमुख पेशा लोहा गलाने का है. असुर का अर्थ/प्रयोग तो हिन्दी शब्दकोष में जगजाहिर है, पर हिन्दी की आदिवासी विरोधी मानसिकता ने अन्य कई आदिवासी तबकों के नामों को घृणास्पद अर्थों से बढकर स्खलित किया है. जैसे असुरआदिवासियों का तबका है, वैसे चुहाड़, चाईं, चुतिया भी आदिवासियों के तबके हैं. इनका प्रयोग भी हिन्दी में किसी को अपमानित करने के लिए ही किया जाता है. लाख की चूड़ियां बनाने वाले कारीगर के लिए “लखेड़ाशब्द प्रचलित है, पर भोजपुरी में लखेड़ा का अर्थ आवाराहोता है. ऐसे ही न जाने कितने जातिसूचक शब्दों को शुद्धतावाची आचार्यों ने दूसरे अर्थों से भरकर गंदा और घृणास्पद बनाने का काम किया है. 

 

अस्सी के दशक के बाद हिंदी में नया जातिवाद :

हिंदी में पिछले दो दशकों के दौरान दलित साहित्य की अवधारणा को जगह मिली है, लेकिन इसके प्रारंभिक दो विरोधाभास हैं. पहला यह स्वीकृत ‘हासिये का साहित्य’ है यानी मुख्यधारा कोई और है. इसी कोई और साहित्य को प्रगतिशील ‘जनवादी’ साहित्य कहते हैं. राजेन्द्र यादव समेत बहुत सारे लेखकों का मत है कि जो दलित साहित्य नहीं है वह द्विज साहित्य है. दलित साहित्य प्रमुखतः अम्बेडकरवादी साहित्य है. यह अभिजन साहित्य के रूपवादी अभिजन, कला वादी सिद्धांतों को नकारता है. कुछ हद तक यह मार्क्स, एंगेल्स और फ्रायड से जुड़ता है. यह साहित्य जातिवाद, वर्णवाद को एक सिरे से ख़ारिज करता है. यह सामाजिक मुक्ति पर विश्वास करता है. यह प्रतिरोध का साहित्य है. यह साहित्य में आरक्षण के सवाल को उठाता है और इस बात की मुखालफत करता है कि साहित्य पर केवल सवर्णों का कब्ज़ा रहे. 

पुरस्कारों का जातिवादी इतिहास :

 

आधुनिक युग का समाज स्थूल से सूक्ष्म हुआ है , विज्ञान सूक्ष्म हुआ है , संस्कृति सूक्ष्म हुई है और जातिवाद भी पहले से अधिक सूक्ष्म हुआ है. स्थूल जातिवाद से सूक्ष्म जातिवाद कई गुना अधिक खतरनाक है. खबरों में , पुरस्कारों में , नामांकनों में , फाइलों में , सर्विस बुकों में , प्रोन्नतियों में , अधिसूचनाओं में , न्याय और प्रशासन – तंत्र में बड़ी सूक्ष्मता के साथ सूक्ष्म जातिवाद लिपटा हुआ है.इसे देखने के लिए स्थूल नहीं , सूक्ष्म आँख की जरूरत है.राज करने कई भेष बदलकर आएगा बहुरूपिया ! कभी साधु बनकर , कभी बालक बनकर , कभी सुधारक बनकर. हर बार ठगे जाइएगा .हर भेष नया होगा.भारत की जाति – प्रथा वह खजाना है , जिसे बाहरी आक्रमणकारियों ने लूटा नहीं , बल्कि और भर दिया कि खाओ जितना कम है एवं जियो जितना दम है.जाति तुम तो अजीब सम्पत्ति हो , भाई ! ऐसी सम्पत्ति जिसे राजा हरण नहीं कर सकता है , चोर चुरा नहीं सकता है और भाई बाँट नहीं सकता है. भारतीय ज्ञानपीठ  जो भारत सरकार का उपक्रम है और भारत में नोबल के बराबर है में भी भारतीय इतिहास की तरह जातिवाद चरम पर है. वहां भी सवर्णवाद हावी है. यहाँ केवल हिंदी विषय की सूची संलग्न है : सन १९६८ में सुमित्रानंदन पन्त, जाति ब्राह्मण, १९७२ में रामधारी सिंह दिनकर, जाति भूमिहार ब्राह्मण, १९७८ में सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय, जाति ब्राह्मण, १९८२ महादेवी वर्मा, जाति कायस्थ, १९९२ में नरेश मेहता, जाति ब्राह्मण, १९९९९ में निर्मल वर्मा जाति खत्री, २००५ में कुंवर नारायण, जाति बनिया, २००९ में अमरकांत कायस्थ, २००९ में श्रीलाल शुक्ल, जाति ब्राह्मण. साहित्य के वर्चस्व की तरह यहाँ भी घोर जातिवादी नामों को देखकर लगता है कि हिंदी जगत कितना घोर असमानतावादी और जातिपोषक है. 

 

 

डॉ. कर्मानंद आर्य 

सहायक प्राध्यापक 

भारतीय भाषा केंद्र 

दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय, गया 

बिहार-८२३००१ 

 मो. ०८०९२३३०९२९ 

 

 

 

 

 

हिंदी साहित्य का इतिहास, भाषा इतिहास की पुस्तकें

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हिंदी साहित्य का इतिहास, भाषा इतिहास की पुस्तकों की सूची

Hindi Sahitya ka Itihas, Bhasha Itihas

यहाँ हिंदी साहित्य का इतिहास, भाषा इतिहास से संबधित पुस्तकों की सूची है, जिसे आप ऑनलाइन पढ़ सकते हैं।

 Hindi Sahitya Ka Barat Itihas Part 1 (1957)
 Hindi Sahitya Ka Brihat Itihas Vol 6 (1957)
 Hindi Sahitya Ka Vrhat Etihas Vol-16
 Hindi Sahitya Ka Vrhat Etihas Vol-4
 Hindi Sahitya Ka Vrhat Etihas Vol-6
 Kangres Ka Itihas (1935)
 Sanskrit Ka Sahitya Itihas; 1948
Aadhunik Hindi Sahitya Ka Itihas
Aadhunik Hindi-sahitya Ka Itihas
Aandhar Ka Samagik Itihas
Aaurved Ka Vrat Itihas
Afghanistan Ka Itihas
Amerika Sahitya Ka Sunk Ship Itihas
Amriki Sahitya Ka Samkshipt Itihas
Andhra Ka Samajik Itihas
Angrejee Sahitya Ka Itihas
Ashop Ka Itihas
Bangla Sahitya Ka Itihas Ed. 1st
Bharat Ka Dharmik Itihas
Bharat Varsh Ka Brihad Itihas Vol-1
Bharatiya Nav Jagran Ka Itihas
Bharatiya Svadhinta Sangram Ka Itihas (1960)
Bharatiya Swadhinata Sangram Ka Itihas
Bhasha Vigyan Evam Hindi Bhasha Ka Itihas
Bodh Purav Ka Bhartiya Itihas
Braj Ka Itihaas
Braj Ka Itihas Khand-i
Budh Purav Ka Bhartiya Itihas Bharat Ka Itihas Part -i
Charan Sahitya Ka Itihas Bhag-2
Charan Sahitya Ka Itihas Bhag-2
Congress Ka Itihas (vol–i)
Congress Ka Itihas (vol–ii)
Congress Ka Itihas (vol–iii)
Congress Ka Itihas 1885-1935
Congress Ka Itihas 1943 To 1947
Congress Ka Itihas Khand-ii
Dakkhini Sahitya Ka Alochnatmak Itihas
Dakkhini Sahitya Ka Alochnatmak Itihas
Dakshin Bharat Ke Hindi Prachar Andolan Ka Sameekshatmak Itihas
Duniya Ka Rang Mach Vishav Itihas Ki Jhalak
Europ Ka Itihas -part-ist
Europe Ka Itihas Part-i
Europe Ka Itihas Vol. – Ii
Europe Ka Itihas Vol. – Iii
Hindi Bhasha Aur Sahitya Ka Itihas (1946)
Hindi Jain Sahitya Ka Sanshipt Itihas
Hindi Natak Sahitya Ka Itihas
Hindi Sahitya Ka Aalochanatmak Itihas
Hindi Sahitya Ka Alochanatmak Itihas
Hindi Sahitya Ka Bahut Itihas Part Ii Hindi Basha Ka Vikas
Hindi Sahitya Ka Brahid Itihas (ratikal) Vol-6
Hindi Sahitya Ka Brahid Itihas (ratikal) Vol-6
Hindi Sahitya Ka Braht Itihas Part 1 (1957)
Hindi Sahitya Ka Brihat Itihas ( Part-trayodas )
Hindi Sahitya Ka Brihat Itihas (vol-viii)
Hindi Sahitya Ka Brihat Itihas Bhag-16 Hindi Ka Loksahitya
Hindi Sahitya Ka Brihat Itihas Bhag-16 Hindi Ka Loksahitya
Hindi Sahitya Ka Brihat Itihas Bhag-17 Me
Hindi Sahitya Ka Brihat Itihas Bhag-17 Me
Hindi Sahitya Ka Brihat Itihas Of Dr. Nirmala Jain Vol. 16 ( Katha Sahitya) Nagari Pracharini Sabha Varanasi
Hindi Sahitya Ka Brihat Itihas Part -1
Hindi Sahitya Ka Brihat Itihas Vol 13 (1920 40)
Hindi Sahitya Ka Brihat Itihas Vol 4 (1957)
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Hindi Sahitya Ka Brihut Itihas Vol 13 Ac 4669
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Hindi Sahitya Ka Brihut Itihas Vol 6 Ac 4668
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Hindi Sahitya Ka Etihas
Hindi Sahitya Ka Itihas
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HINDI SAHITYA KA ITIHAS – HINDI
Hindi Sahitya Ka Itihas (1967) Ac 404
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Hindi Sahitya Ka Itihas [ Aadi Kaal,veer Gatha Kaal ]
Hindi Sahitya Ka Itihas Bhag-1
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Hindi Sahitya Ka Saral Itihas 1940 Dr. Yadunandan Mishra
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Hindi Sahitya Ka Subodh Itihas
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Jain Sahitya Ka Barhadu Itihas Bhag-1 ( Angbah Agam )
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jain Sahitya Ka Brihad Itihas (1966) Ac 4104 Part 1
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Jain Sahitya Ka Brihat Itihas Bhag-1
Jain Sahitya Ka Itihas
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Jammu Kashmir Ke Hindi Sahitya Ka Itihas By Dr. Ashok Jerath JK Culture Academy
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Pali Sahitya Ka Itihas
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Pali Sahitya Ka Itihas Ac 407
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Sanskrit Ka Sahitya Itihas; 1948
Sanskrit Sahitya Ka Alochanatmak Itihas Dwiteey Bhag
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Sanskrit Sahitya Ka Sankshipta Itihas (1960)
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SP 9872 Sahitya Ka Saral Itihas By Yadu Nanadan Mishra 1940 Hindi Pusta Agency Calcutta
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हिंदी साहित्य और सिनेमा-अजय कुमार चौधरी

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हिंदी साहित्य और सिनेमा

अजय कुमार चौधरी

पहले मैं आपको दो बातें स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि सिनेमा और साहित्य का धरातल अलग-अलग है | सिनेमा शुध्द मनोरंजन प्रधान होता है जिसमें दर्शकों के मांग का ख्याल रखा जाता है, दर्शक को जो चाहिए फिल्म इंडस्ट्री वहीं परोसता है जिसका सीधा संबंध व्यवसाय से होता है,जबकि साहित्य संवेदना और अनुभूति प्रधान होता है, साहित्य दर्शकों के मांग पर नहीं बल्कि साहित्यकार अपनी निजी संवेदना और अनुभूति को केंद्र में रखकर समाज के यथार्थ रूप को सामने लाने का प्रयास करता है | दो धरातल पर होने के बावजूद साहित्य और सिनेमा कई विंदुओं पर मिल भी जाता है | सिनेमा कल्पना प्रधान है ,भावों की अभिव्यक्ति के लिए ऐसे दृश्यों का निर्माण कर दिया जाता है जो शब्दों के द्वारा संभव नहीं है | वहीं साहित्य शब्दों के माध्यम से जिस वातावरण का निर्माण करता है उसे दृश्यरुप में लाना फ़िल्मकारों के लिए कभी –कभी चुनौती भी बन जाती है | साहित्यकार शब्दों के जिस वातावरण का निर्माण करता है उसे पाठक अपनी-अपनी कल्पना द्वारा अलग-अलग भाव और दृश्य मन में बनाते हैं |जबकि फ़िल्मकर द्वारा तैयार किया गया वातावरण दर्शकों के लिए एक जैसा होता है | फ़िल्मकार अपने अनुभव के द्वारा साहित्य से ली गई सामाग्री का ज्यों का त्यों रूपान्तरण नहीं कर पता है या करना नहीं चाहता है क्योंकि वह साहित्य को फिल्म के रूप से परोसना चाहता और साहित्य फिल्म के साँचे में पूर्णरूप से उतार नहीं पता और यहीं से साहित्य और सिनेमा का अंतर्संबंध में विलगाव उत्पन्न हो जाता है |फिल्म समीक्षक विमलेंदु विमलेंदु जी ने साहित्य और सिनेमा के अंतर्संबंध को स्पष्ट करते हुए कहते है कि1 “साहित्य और सिनेमा का सम्बंध भी दो पड़ोसियों की तरह रहा. दोनो एक दूसरे के काम तो आते रहे लेकिन यह कभी सुनिश्चित नही हो पाया कि इनमे प्रेम है या नही.|”

सिनेमा ने अपने आरंभिक चरण में साहित्य से ही प्राण-तत्व लिया. यह उसके भविष्य के लिए ज़रूरी भी था. दरअसल सिनेमा और साहित्य की उम्र में जितना अधिक अंतर है, उतना ही अंतर उनकी समझ और सामर्थ्य में भी है. विश्व सिनेमा अभी सिर्फ 117 साल का हुआ है. साहित्य की उम्र से इसकी तुलना की जाय तो यह अभी शिशु ही है साहित्य के सामने.” उदाहरण के लिए अभी हाल ही में एक मूवी आई थी ‘बाहुबली’ | इस फिल्म में जिस तकनीक के प्रयोग से जिस वातावरण का निर्माण किया गया है उसे हूबहू साहित्य में उतार पाना बड़े से बड़े लेखकों के चुनौती है |ऐसे जगह पर आकार ही साहित्य अपनी सीमा का जान पाती है |

प्रेमचन्द के ‘ गोदान ‘ पर बनी फिल्म को छोड़ दें तो रेणु की कहानी पर बनी ‘तीसरी कसम’ ने दुनिया को कुछ अमर पात्र दिये. महाश्वेतादेवी की कहानी पर बनी ‘रुदाली’ के दृश्य अविस्मरणीय हैं. विमल मित्र के उपन्यास पर बनी ‘साहब,बीवी और गुलाम’, टैगोर की कहानी-‘नष्टनीड़’ पर सत्यजीत राय की फिल्म ‘चारुलता’, सृजन के नये आयामों की तलाश करती हैं.

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सिनेमा को मण्टो का साथ लेना पड़ा. मण्टो की लेखनी से ‘किसान कन्या’, ‘मिर्ज़ा गालिब’, ‘बदनाम’ जैसी फि़ल्में निकलीं. प्रेमचंद और अश्क भी इस दौर में सिनेमा से जुड़े और मोहभंग के बाद वापस साहित्य की दुनिया में लौट गए. बाद में ख्वाजा अहमद अब्बास, पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र, मनोहरश्याम जोशी, अमृतलाल नागर, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, रामवृक्ष बेनीपुरी, भगवतीचरण वर्मा, राही मासूम रज़ा, सुरेन्द्र वर्मा, नीरज, नरेन्द्र शर्मा, कवि प्रदीप, हरिवंशराय बच्चन, कैफी आज़मी, शैलेन्द्र, मज़रूह सुल्तानपुरी, शकील बदायूँनी इत्यादि ने भी समय-समय पर हिन्दी सिनेमा में किसी न किसी रूप में अपनी आमद दर्ज कराई.

बांग्ला लेखक शरतचंद्र के उपन्यास ‘देवदास’ पर हिन्दी में चार फिल्में बनीं और कमोबेश सभी सफल रहीं. प्रेमचन्द की कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर सत्यजीत रॉय ने इसी नाम से फिल्म बनाई, जो वैश्विक स्तर पर सराही गई. भगवतीचरण वर्मा के अमर उपन्यास ‘चित्रलेखा’ पर भी फिल्में बनीं, जिनमें एक सफल रही. बाद में साहित्यिक कृतियों पर आधारित फिल्मों को आर्ट फिल्मों के खांचे में रखकर इनका व्यावसायिक और हिट फिल्मों से अलगाव कायम करने का प्रयास किया गया, जिससे ऐसी फिल्मों का आर्थिक पहलू प्रश्नचिह्नांकित हो गया और फिल्मकारों ने साहित्यिक कृतियों पर फिल्म बनाने से परहेज करना शुरू कर दिया.

. हालांकि अमिताभीय युग में भी सत्यजीत रॉय, मृणाल सेन, कमाल अमरोही, ऋषिकेश मुखर्जी, बासु भट्टाचार्य, श्याम बेनेगल, एम. एस. सत्थू, एन. चंद्रा, मुजफ्फर अली, गोविन्द निहलानी, आदि ने अपने-अपने स्तर से साहित्य, सिनेमा और समाज का त्रयी में सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया लेकिन ये सभी चाहे-अनचाहे ‘आर्ट सिनेमा’ में बँधने को बाध्य हुए.

एक कारण और भी था कि इस दौरान साहित्यिक कृतियों पर बनने वाली फिल्में एक-एक कर असफल होने लगी थीं. प्रेमचंद की रचनाओं पर बनीं ‘गोदान’, ‘सद्गति’, ‘दो बैलों की कथा’, फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास पर बनी ‘तीसरी कसम’, मन्नू भंडारी की रचनाओं पर आधारित ‘यही सच है’, ‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’, शैवाल की कहानी पर आई फिल्म ‘दामुल’, धर्मवीर भारती के उपन्यास पर आधारित ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’, चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की कहानी पर आधारित ‘उसने कहा था’, संस्कृत की रचना ‘मृच्छकटिकम्’ पर आधारित ‘उत्सव’, राजेंदर सिंह बेदी के उपन्यास पर बनी ‘एक चादर मैली सी’ आदि का असफल होना सिनेमा और साहित्य से दूरी की एक बड़ी वजह बन गया.

साहित्य और सिनेमा के अन्तर्सम्बन्धों पर गुजराती फिल्म समीक्षक बकुल टेलर ने बेहद सारगर्भित टिप्पणी की है. उनका कहना है, “साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्म अपने आप अच्छी हो, ऐसा नहीं होता. वास्तविकता यह है कि साहित्यिक कृति का सौन्दर्यशास्त्र और सिनेमा का सौन्दर्यशास्त्र अलग-अलग हैं और सिनेमा सर्जक भी साहित्यकृति के पाठक रूप में साहित्यिक आस्वाद तत्वों पर मुग्ध होकर उनका सिनेममेटिक रूपांतरण किए बगैर आगे बढ़ जाते हैं.“

बंकिमचंद्र की कृति पर बनी ‘आनंदमठ’, विमल मित्र कृत ‘साहब बीबी और गुलाम’, आर. के नारायण के अंग्रेज़ी उपन्यास पर बनी ‘गाइड’, उडि़या लेखक फकीरमोहन सेनापति की रचना पर बनी ‘दो बीघा ज़मीन’ और मिर्ज़ा हादी की उर्दू कृति पर बनी ‘उमराव जान’ फिल्मों की सफलता का सबसे बड़ा कारण परिवेश की समनुरूपता रहा है

चलचित्र और साहित्य के अंतर्सम्बन्ध पर अनेक विचारकों ने अपने मत दिए हैं:-

उमेश राठौर लिखते हैं, ‘फिल्म और साहित्य‘ के परस्पर लगाव का प्रश्न सदैव से ही जीवन्त रहा है। इस सम्बन्ध को विकसित करने में गीत, कविता, नाटक और उपन्यास की चर्चा भी अक्सर होती रही है, लेकिन फिल्में केवल उपन्यासों पर ही नहीं बनी-कथाओं पर भी निर्मित की गई।7

सम्पादक ‘मार्यर शामसी‘ ने चलचित्रों को ‘यांत्रिकी, कला और तकनीकी‘ का मेल मानते हुए लिखा है,“Cinema is a highly mechanical medium. It uses many mechanical devices like cameras, microphones, dubbing machines, editing machines etc. Film is a product of intraction between machines, artistic and technical people”. 8

वे आगे लिखे हैं, “In the beginning, it was considered as a medium of cheep entertainment, but now it was come to be considered as art form. Interactual and serious thinkers have associated themselves with cinema”. 9

‘जयदेव तनेजा‘ के शब्दों में, ‘‘कला प्रयास है, प्रयोग है, सृष्टि है, जीवन है-वस्तु नहीं है। रंग कला भी इसी अर्थ में एक उत्सव है, एक अनुष्ठान है- जीवनमय है, जीवनदायी है।‘‘10

वे पुनः लिखते हैं, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं कि अनेक कथा-कृतियाँ रंगमंच और सिनेमा के माध्यमों से सफलतापूर्वक रूपांतरित हुई हैं।‘‘11

रंगमंच और सिनेमा के प्रबुद्ध अभिनेता बलराज साहनी का कथन है, ‘‘फिल्म-कला को ‘आॅपरेशन टेबल‘ पर रखिए और उसकी चीरफाड़ कीजिए तो पता चलेगा कि फिल्म-कला दरअसल एक कला का नाम नहीं, बल्कि अनगिनत कलाओं के समूह का नाम है।‘‘12

सम्पादक डाoनाल्ड एच0 जान्सटान के अनुसार, “Cinematic adaptation of books, players, poems, diaries and comics demonstrate films profuse influence on print media”. 13

पुनश्च, “In addition to book adaptations, film is, able to extend the run of a play indefinitely through its climatic adaptation of it.” 14

पुनश्च, “Hence, film has a profound influence on print media, giving them a visual dimension that extends the original text’s popularity and scope”. 15

‘सुधीर ‘सुमन‘‘ के शब्दों में, ‘‘सिनेमा मनुष्य के कला के साथ अंतर्सम्बन्ध का दृश्यरूप है। मनुष्य के जीवन में जो सुंदर है उसके चुनाव के विवेक का नाम सिनेमा है।‘‘16

इस प्रकार अनेक विद्वानों ने चलचित्र एवं साहित्य के मध्य गहन अंतर्सम्बन्ध स्वीकार किए हैं। एक सत्य यह भी है कि चलचित्र में विविध कलाओं का समाहार सरलता से सम्भव है। यदि हम साहित्य के चलचित्र रूपांतरण का अध्ययन करे तो भी चलचित्र की उपादेयता स्वयं सिद्ध होती है।

हिंदी शोध

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brown wooden book shelves in library
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हिंदी साहित्य में हुए शोध

वर्ष 1978
डॉ आभा सक्सेनाविषय: “हिंदी कारकों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन “शोध निर्देशक -डॉ भोलानाथ तिवारीवर्ष -1978, 
विश्वविद्यालय: दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

वर्ष 1979

डॉ. भारती पारिजात.विषय:छायावादोत्तर हिन्दी काव्य में बिम्बविधान.निर्देशक : डॉ. ताराचन्द शर्माविश्वविद्यालय: आगरा विश्व विद्यालय, आगरा
वर्ष:1979.

वर्ष 1980

सन्त राम वैश्यशीर्षक – सूर की सांस्कृतिक चेतना और उनका युगबोधनिर्देशक – डॉक्टर त्रिभुवन सिंहवर्ष -1980
उपाधि -पीएचडी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय , वाराणसी

वर्ष 1982
डॉ रामसजन पाण्डेयपीएच. डी.: विद्यापति का सौन्दर्यबोधनिर्देशक- डॉ. रामशंकर त्रिपाठी 1982 ई.अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद

वर्ष  1987

शिवजी श्रीवास्तवशोध विषय-“कविवर मदन मोहन द्विवेदी’मदनेश’-व्यक्तित्व एवम् कृतित्व”शोध निर्देशक-डॉ. जगदीश सहाय उपाध्याय।प्रवक्ता हिंदी विभागबुन्देलखण्ड महाविद्यालय झाँसी।शोध वर्ष-1987विश्वविद्यालय-बुंदेलखण्ड विश्विद्यालय झाँसी।

डॉ गायत्री सिंहशीर्षक आधुनिक हिन्दी कविता में कृषि सांस्कृतिक मूल्यनिर्देशक डॉ विद्या चौहानकानपुर विश्वविद्यालय1987

वर्ष  1989

रवीन्द्रनाथ मिश्रशोध शीर्षक डॉ शिवमंगल सिंह सुमन की कृतियों का समीक्षात्मक अध्ययननिर्देशक: डॉ अरविंद कुमार पांडेयविश्वविद्यालय: मुंबई विश्वविद्यालय
वर्ष: 1989


वर्ष  1992

सफीउल्लाह अंसारीविषय: मोहन राकेश का उपन्यास शिल्प सफीउल्लाह अंसारी,शोध निदेशक:  डा. त्रिभुवन ओझा,विश्वविद्यालय: राँची विश्वविद्यालय,राँची.
वर्षः1992.

रामप्रताप सिंहशोध विषय-सुल्तानपुर जनपद के कवि एवं लेखकनिर्देशक- डा ज्ञानशंकर पांडेयविश्वविद्यालय: लखनऊ विश्वविद्यालय
वर्ष-1992
रामप्रताप सिंहशोध विषय-सुल्तानपुर जनपद के कवि एवं लेखकनिर्देशक- डा ज्ञानशंकर पांडेयविश्वविद्यालय: लखनऊ विश्वविद्यालय
वर्ष-1992
वर्ष 1993

डी.लिट्. : भक्तिकालीन हिन्दी निर्गुण काव्य का सांस्कृतिक अनुशीलनकानपुर विश्वविद्यालय ,कानपुर1993 ई.

डॉ. गणेश नारायण शुक्ल
पी- एच.डी.  1993
शोध-शीर्षक : ‘शम्भुनाथ मिश्र और उनका काव्य ‘
निदेशक – प्रोफेसर डॉ.सूर्य प्रसाद दीक्षित
लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ


वर्ष 1995

शम्भुनाथ तिवारीपीएच.डी.(1995 में एवार्डेड )संस्थान- जे.एन.यू. नई दिल्लीशोध निर्देशक-प्रोफ़ेसर नामवरसिंहशोधकार्य का शीर्षक -“मिश्रबंधु के आलोचनाकर्म का पुनर्मूल्यांकन”

शम्भुनाथ तिवारी पीएच.डी.संस्थान- #जे.एन.यू. नई दिल्लीशोध निर्देशक: प्रोफ़ेसर नामवर सिंहशोधकार्य का शीर्षक: “मिश्रबंधु के आलोचनाकर्म का पुनर्मूल्यांकन
वर्ष: 1995

वर्ष 1996

राकेश कुमार शुक्ल,विषय – नई कविता में उदात्त तत्व,निर्देशक – डॉ. एस पी तिवारीसंस्थान: आर एस जी यू पी जी कॉलेज पुखरायाँ, कानपुर, कानपुर विश्व विद्यालय कानपुर ,
वर्ष – 1996

वर्ष  1998

डॉ पुनीत बिसारियाशोध शीर्षक राय कृष्णदास की सौंदर्यशास्त्रीय अवधारणाशोध निर्देशक प्रोफेसर सूर्यप्रसाद दीक्षितवर्ष 1998लखनऊ विश्वविद्यालय


वर्ष 1999

शोधार्थी- राजेश कुमार तिवारी ,विषय- हिन्दी ” बीसवीं शताब्दी के हिन्दी प्रबन्ध काव्यों मे छायावादी अवधारणा” ;निर्देशक- आचार्य सेवक वात्स्यायनविश्वविद्यालय: छत्रपति शाहूजीमहाराज विश्वविद्यालय, कानपुर ;
वर्ष- 1999 

वर्ष 2000

जयप्रकाश कर्दमपीच.डी: ‘ श्रीलाल शुक्ल कृत रागदरबारी का समाजशास्त्रीय अध्ययन’. शोध निर्देशक- डॉ. एल.बी.राम अनंत, वर्ष 2000, विश्वविद्यालय: चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ


वर्ष 2001

डॉ मीता शर्माशीर्षक: सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का काव्य, जीवन सत्य और दर्शन ।वर्ष–2001शोध निर्देशक-प्रो.(डॉ.)सुरेन्द्र उपाध्याय
विश्वविद्यालय- राजस्थान विश्वविद्यालय,जयपुर।

गिरधारीलाल जयपालविषय: मेघवंशी समाज के लोकगीतों का सांस्कृतिक अध्ययनशोध निर्देशक -डॅा ० सोहनदान चारणविश्वविद्यालय – जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय,जोधपुर
वर्ष 2001
डॉ मीता शर्माशीर्षक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का काव्य, जीवन सत्य और दर्शन ।वर्ष–2001शोध निर्देशक-प्रो.(डॉ.)सुरेन्द्र उपाध्याय
विश्वविद्यालय- राजस्थान विश्वविद्यालय , जयपुर-

डॉ. गिरीश काशिदनवम दशक के हिंदी उपन्यासों में चित्रित आंचलिक जीवनशोध निर्देशक -डॉ पी. एस. पाटीलवर्ष- 2001शिवाजी विश्वविद्यालय,कोल्हापुर

वर्ष  2002

डॉ हरीश अरोड़ागुरु गोबिंद सिंह के काव्य में राष्ट्रीय अस्मितागाइड : प्रो पूरन चन्द टण्डनवर्ष : 2002विश्वविद्यालय : दिल्ली विश्वविद्यालय
डॉ राकेशनारायण द्विवेदीडॉ राही मासूम रज़ा के उपन्यासो में पात्र परिकल्पना डॉ भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय आगरा 2002शोध निर्देशक  डॉ श्याम लाल यादव
बृजेश कुमार पाण्डेयआचार्य नन्ददुलारे बाजपेयी की समीक्षा दृष्टि। गाइड प्रोफेसर रंगनाथ पाठकवर्ष -2002 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी
डॉ प्रमोद कुमारडा.राही मासूम रजा के उपन्यासों में राष्ट्रीय दृष्टिकोण निदेशक: डा.मान्धाताराय वि वि.–वी.ब.सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय,जौनपुर(उ.प्र.)
वर्ष 2002

वर्ष 2003

डॉ बलजीत श्रीवास्तवडॉ सत्येंद्र : व्यक्तित्व और कर्तृत्व निदेशक प्रोफेसर जितेंद्र नाथ पाण्डेय । जमा 27 दिसंबर 2002  उपाधि प्राप्ति  2003। लखनऊ विश्वविद्यालय

डॉ शर्ली बेबीविषय : स्वछन्दतावादी कवि रामनरेश त्रिपाठी: एक विषलेषणात्मक अध्ययननिर्देशक : डॉ. चेरियन जॉर्जवर्ष 2003
विश्वविद्यालय: महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, केरल
शीर्षक-आचार्य तुलसी की काव्य साधनाशोध निर्देशक-डॉ देव कोठारी जनार्दन राय नागर मान्य
विश्वविद्यालय उदयपुर, राजस्थान वर्ष-2003
डॉ राजेन्द्र सिंघवीशीर्षक-आचार्य तुलसी की काव्य साधनाशोध निर्देशक-डॉ देव कोठारी जनार्दनराय नागर मान्य विश्वविद्यालय उदयपुर, राजस्थानवर्ष-2003
निर्देशक: प्रो. तारकनाथ बालीशोधार्थी : चंद्रकला ‘साठोत्तरी हिंदी नाटकों में सामाजिक द्वंद्व’हिंदी विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली2003

वर्ष 2004

रविशंकर प्रताप रावआचार्य केशवदास के काव्य का काव्यशास्त्रीय प्रतिमान निर्देशक डॉ उमा शंकर तिवारी पूर्वांचल विश्व विद्यालय जौनपुर जमा हुआ 20 दिसम्बर 2002 उपाधि मिला जनवरी 2004
डॉ कुमारेन्द्र सिंह सेंगरडाॅ0 वृन्दावनलाल वर्मा के उपन्यासों में अभिव्यक्त सौन्दर्य का अनुशीलनहिन्दी साहित्यगाइड – डाॅ0 दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तववर्ष 2002 में जमा, 2004 में एवार्डबुन्देलखण्ड विवि, झाँसी

वर्ष 2005

डा० चन्द्र शेखर शर्मा
शोध शीर्षक: गिरिराज किशोर के उपन्यासों में युग-चेतना
शोध निर्देशक: डा० रमेश चन्द्र शर्मा
वर्ष:2005
विश्व विद्यालय: डा० भीमराव अम्बेडकर आगरा
डॉ चंदा सोनकरआपताकालोत्तर अस्तित्ववादी हिंदी कहानी का दार्शनिक एवं कलात्मक मूल्यांकनशोध निर्देशक- डॉ सुनीलकुमार लवटे2005
शिवाजी विश्वविद्ययालय, कोल्हापुर

वर्ष 2008

डॉ जितेन्द्र कुमारहिंदी की प्रमुख दलित आत्मकथाएं : एक विश्लेषण”शोध निर्देशक : डॉ. संतोष भादूशोध निर्देशक : डॉ. सन्तोष भदौरिया 2008जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर (म.प्र.)

डॉ अजीत प्रियदर्शीत्रिलोचन की काव्य संवेदना के अंत:स्रोत और उनका कलात्मकविन्यासगाईड :श्री दूधनाथ सिंहइलाहाबाद वि०वि०वर्ष 2008

वर्ष 2009

डॉ परितोष मालवीयशोध शीर्षक – “स्वातंत्रयोत्तर ग़ज़ल में पर्यावरण चेतना”गाइड : डॉ. जी. के. सक्सेनाविश्वविद्यालय : जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियरवर्ष : 2009

डॉ दिग्विजय कुमार शर्मापीएच डी 2009विषय – जैनेन्द्र की नारी दृष्टि: उनके कथा साहित्य के सन्दर्भ में।निर्देशक- डॉ रेखा पतसारिया ।
डॉ भीम राव अम्बेडकर वि वि आगरा।
डॉ विजय महादेव गडेविषय हिन्दी प्रेमकाव्य लेखन परंपरा में नीरज का प्रदेय निर्देशक  डॉ राजेन्द्र शाह शिवाजी यूनिवर्सिटी, कोल्हापुर
2009


वर्ष 2010

संतोष येरेवारविषय  — शरद जोशी के साहित्य में  व्यंग्यविश्वविघालय — स्वामी  रामानांद तीर्थ मराठवाडा विश्वविघालयवर्ष — २०१०गाईड का नाम — डाॅ.शोभा देशपांडे

उमेशचन्द्र सिरसवारीविश्वविद्यालय: अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय अलीगढ़।।विषय – हिंदी कविता में स्त्री-विमर्शवर्ष: (१९८०-२०१०)
शोध निर्देशक- प्रो. आरिफ़ नज़ीर

डॉ. सनु तोमस
शोध विषय: विष्णु प्रभाकर के कथा साहित्य में सामाजिक यथार्थ
शोध निदेशिका: डां मिनि जार्ज
महात्मा गांधी विश्वविद्यालय,केरल
वर्ष : 2010
नाम-सत्येन्द्र राय,शोध विषय-औपनिवेशिक शोषण का प्रतिरोध और हिंदी कहानी,शोध-निर्देशक – डॉ. सत्यपाल शर्मा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय,वाराणसी शोध कार्य जारीवर्ष 2010


वर्ष 2011

डॉ आशुतोष त्रिपाठीशोध शीर्षक–समकालीन नाटक और ज्ञानदेव अग्निहोत्री की रचनाधर्मिता,वर्ष–2011,गाइड नाम–डॉ.शिवशंकर त्रिवेदी(से.नि.प्राचार्य,अर्मापुर पी.जी.कॉलेज,कानपुर)वि.वि.–छत्रपति शाहू जी महाराज वि.वि.कानपुर
डॉ. उमा डी. मेहता
पीएच.डी. शोध शीर्षक – ‘वीरेन्द्र जैन के उपन्यासों में युग चेतना’शोध निर्देशक  – डॉ. एस. डी. भाभोरवर्ष – दिसम्बर 2011
विश्वविद्यालय – सौराष्ट्र युनिवर्सिटी ,राजकोट, (गुजरात ) 

वर्ष 2012

डॉ धर्मेन्द्र प्रताप सिंहनव  औपनिवेशिकरण के परिपेक्ष्य में उदय प्रकाश के साहित्य का मूल्यांकनगाइड डॉ कैलाशदेवी सिंह 2012लखनऊ विश्वविद्यालय

डॉ महेंद्र प्रसाद कुशवाहाविषय-रामस्वरूप चतुर्वेदी का आलोचना-कर्मशोध निर्देशक-डॉ0 शेष आनंद मधुकरविश्वविद्यालय-विनोबा भावे विश्वविद्यालय,हजारीबाग,झारखण्ड
वर्ष:2012

डॉ. राम भरोसेशीर्षक – दलित चेतना के संदर्भ में प्रेमचंद के साहित्य का अनुशीलननिर्देशन- प्रो. भगवान देव पाण्डेयविश्विद्यालय- गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार
वर्ष 2012
डॉ महेंद्र प्रसाद कुशवाहाविषय-रामस्वरूप चतुर्वेदी का आलोचना-कर्मशोध निर्देशक-डॉ0 शेष आनंद मधुकरविश्वविद्यालय-विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग,झारखण्ड
2012

वर्ष 2014

समीर कुमार पाठकशोधार्थी(स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग) जयप्रकाश विवि,छपरा, बिहारशीर्षक- “हिन्दी की प्रगतिशील काव्य परम्परा और नागार्जुन”प्रवेश वर्ष- २०१४निर्देशक- डाॅ0 सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ( एसोसिएट प्रोफेसर) शोधकार्य अभी चल रहा है|
हुकुम सिंहशोध विषय:कामायनी में मानवाधिकारों का विश्लेषण : प्राचीन एवं नवीन संदर्भनिर्देशक : डॉ पुनीत बिसारियावर्ष 2014विश्वविद्यालय: बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी

डॉ. प्रदीप कुमार शर्माविषय – हिंदी साहित्य (समकालीन हिंदी काव्य के परिप्रेक्ष्य में प्रमोद वर्मा की कविताओं का अनुशीलन)निर्देशक – डॉ. श्रीमती वंदना कुमार
वर्ष: 2014 पं. रविशंकर शुक्ल व विश्वविद्यालय, रायपुर
चन्दन चौधरी विषय  नयी कविता के प्रवर्तन में अज्ञेय एवं मुक्तिबोध की भूमिका निर्देशक प्रोफेसर हरिशंकर मिश्र लखनऊ विश्वविद्यालय 
वर्ष 2014 
शोधार्थी- डॉ विजेन्द्र प्रताप सिंह
शोध विषय- हिंदी तथा ओड़िया का व्यतिरेकी विश्लेषण
शोध निर्देशक,- डॉ सुधीर शर्मा
शोध संस्थान- दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबादवर्ष 2014 
शोधार्थी : सिराज
शोध विषय : समकालीन हिंदी कहानी में मुस्लिम नारी विद्रोह
शोध निर्देशक : डॉ.जी.वी रत्नाकर
विश्वविद्यालय : मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद
वर्ष : 2014 
डा सविता टाकप्रेमचन्द के नारी पात्रों का जीवन मूल्यों के आलोक मे एक अध्ययन”महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय , अजमेरशोध निर्देशिका-डा विमला सिंहल
वर्ष- 2014
नाम-  शबनम तब्बसुम
शोध निर्देशिका- डॉ नाज़िश बेगम पंजीयन – 6.02.2014.टॉपिक – “स्वातंत्र्योत्तर भारत में ग्रामीण जनजीवन की बदलती स्थितियां और रेणु का कथा – साहित्य”  
हिंदी विभाग, अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ, उत्तर प्रदेश
मो रियाज़ खान (Mohd Riyaz Khan)
हिंदी पीएचडी विषय: राजेश जोशी के काव्यों में समसामयिक समस्याएं।
निर्देशक: डॉ नीता हिरेमठ एवं डॉ इस्फाक अली।
-दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास। बैंगलोर
वर्ष 2014

वर्ष 2015

श्वेता रिछारियाशोध विषय: उत्तर छायावादी काव्य धारा के परिप्रेक्ष्य में बच्चन का काव्यनिर्देशक : डॉ पुनीत बिसारियावर्ष 2015विश्वविद्यालय: बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी
डॉ.पुखराज जयपालविषयः हिन्दी-परचई काव्यःपरम्परा और मूल्यांकननिर्देशक -विभागाध्यक्ष एवं प्रो.डॉ.देवेन्द्र कुमार सिंह गौतमपीएच.डी. सन्-2010-2015विश्वविद्यालय:जयनारायण व्यास वि.वि.जोधपुर ,राजस्थान

डॉ जय शंकर तिवारीशोध- विषय : विभूति नारायण राय का रचना संसार :एक अनुशीलनशोध निर्देशक- डॉ सुरेन्द्र नारायण सक्सेनाविश्वविद्यालय: बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी
वर्ष: 2015
तरुणा दाधीचशोध विषय – डॉ.बालशौरी रोड्डी के उपन्यासों में चित्रित समाज ‘शोध निर्देशिका – डॉ. गीता कपिल विश्वविद्यालय – बनस्थली यूनिवर्सिटी, टोंक, राजस्थान
वर्ष -2015

वर्ष 2016

डा० सन्तोष कुमार पान्डेय  पी एच० डी० शोध शीर्षक  ” श्रीलाल शुक्ल  का लेखन : स्वातन्त्र्योत्तर यथार्थ  का अन्वेषण” 2016 फरवरी,  जे० एन० यू ० नई  दिल्ली से । शोध निर्देशक प्रारम्भ में  डा० पुरुषोत्तम अग्रवाल । इनके सेवा से अलग हो जाने के कारण जमा  किया डा० ओम प्रकाश सिंह के निर्देशन में।
डॉ. दयारामविषय: रामदरश मिश्र के काव्य मे यथार्थ के विविध आयामशोध निर्देशक: डॉ. अन्नाराम शर्मावर्ष:  2016
विषय: महाराजा गंगासिह विश्वविद्यालय बीकानेर राजस्थान

मोनिका देवीविषय: अंतिम दशक की कहानियों में वैचारिक संघर्षशोध निर्देशिका: डॉ आर, इंदिरा शांताविश्वविद्यालय :ओस्मानिया विश्वविद्यालय हैदराबादवर्ष 2016

वर्तमान में जारी

सुनील कुमारमेरा शोध शीर्षक : सरोकारों के सन्दर्भ में महिला उपन्यास लेखन (कृष्णा सोबती, मृदुला गर्ग और मधु कांकरिया)मेरे शोध निदेशक का नाम : डॉ. ओम प्रकाश नारायण द्विवेदीवर्ष : शोध जारी 2017 में पूर्ण होना सम्भावित।विश्वविद्यालय : जम्मू विश्वविद्यालय, जम्मू।

नरेन्द्र पाटीलशीर्षक- “हिंदी के प्रमुख समीक्षकों की आत्मकथाओं का अनुशीलन” (रामविलास शर्मा, रामदरश मिश्र,विश्वनाथ त्रिपाठी और डॉ देवेश ठाकुर के सम्बन्ध में)शोध निर्देशक- डॉ मोहसिन ख़ानविश्वविद्यालय: मुम्बई विश्वविद्यालय, मुम्बई।

उदयप्रताप सिंह”वैश्वीकरण का समय और 21वीं सदी के हिन्दी कथा साहित्य में हाशिए का समाज”निर्देशक डॉ बृजेश कुमार पाण्डेयबुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी
शोध जारी

* हिंदी भाषा में विज्ञान के क्षेत्र में हुए शोधहिंदी भाषा में कला के क्षेत्र में हुए शोध* हिंदी भाषा में तकनीकि के क्षेत्र में हुए शोधहिंदी भाषा में इतिहास के क्षेत्र में हुए शोध* हिंदी भाषा में राजनीतिक विज्ञान के क्षेत्र में हुए शोधहिंदी भाषा में मिडिया के क्षेत्र में हुए शोधहिंदी भाषा में शिक्षा शास्त्र के क्षेत्र में हुए शोध


आप ऊपर दिए गए प्रारूप के अनुसार शोध की जानकारी  puneetbisaria8@gmail.com एवं vishwahindijan@gmail.com, पर मेल करें. आप अपने संस्थान से हिंदी भाषा में हुए शोध की सूची भेज सकते हैं.

संकलन: डॉ. पुनीत बिसारिया 

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हिंदी शिक्षण में रचनात्मकता : नवीन अनुप्रयोग

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brown wooden table and chairs
Photo by Ivan Aleksic on Unsplash

हिंदी शिक्षण में रचनात्मकता : नवीन अनुप्रयोग

लेखक –मनीष खारी

ईमेल manishkharibnps@gmail.com

सार – पहली भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण से जुडी स्थितियों पर दृष्टि डालते हुए यहाँ हिंदी भाषा शिक्षण से जुड़ी समस्यायों को देखने का प्रयास किया गया है | यह लेख भाषा सीखने की जरुरत स्थापित करने की बात से आरम्भ कर पढने – पढ़ाने के रचनात्मक तरीकों को रखता है | रचनात्मक और गतिविधि शब्दों को समझने से लेकर रचनात्मक भाषा कक्षा के आयाम और गतिविधियों के उदहारण सामने रखता है |

भाषा शिक्षण अधिगम : सामान्य स्थिति –

तर्क आधारित समझ के बूते ये बात जानी जा सकती है कि कुछ भी सीखने के लिए भीतर से सीखने की जरुरत होना आवश्यक है | बिन प्यास तो अमृत भी बेकार है फिर पीया भी क्यूँ जाये जब प्यास न हो | सीखने के सिद्धांत भी सीखने के लिए तत्पर (law of readiness by thorndike )[1] होने की बात कहते आये है | पियाजे प्रदत संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत भी किसी विचार या क्रिया के सीखने से पहले उससे सम्बंधित मानसिक असंतुलन होने को आवश्यक कहता है तभी सीखने वाला संतुलन प्राप्त करने के लिए अग्रसर होगा और सीखने की क्रिया होगी | ये समझ भाषा शिक्षण पर भी लागू होती है | हिंदी प्रथम भाषा के रूप में पढाई जाती है | बच्चे विद्यालय आने से पूर्व ही काफी कुछ इसपर महारत ले चुके होते है | वेन्द्रिय के शब्दों में कहें तो “भाषा एक तरह का संकेत है | संकेत से आशय उन प्रतीकों से है जिनके द्वारा मानव अपने विचार दूसरों पर प्रकट करता है | ” संकेतों की यह व्यवस्था पूर्णतः यादृच्छिक है / मानवनिर्मित है यही से भाषा का सामाजिक स्वरुप प्रकट होता है | प्रत्येक बालक में जन्मजात किसी भी भाषा को सीखने और प्रयोग करने की शारीरिक और संज्ञानात्मक क्षमता मौजूद रहती है |” अपनी बात मनवाना , घटनाओं में अतिरिक्त विवरण जोडकर कहना , कहानियां गढ़ना , स्पष्टीकरण देना इत्यादि मौखिक क्रियाएँ साफ़ तौर पर बच्चे की मानसिक रूप से भाषा पर पकड़ को सिद्ध करती है | गौरतलब है कि ऐसी क्रियाओं को कर पाने वाले हजारों बच्चे पढने और लिखने की बेसिक क्षमताओं से जूझते रहते है और नही भी सीख पाते (ASAR REPORT 2106[2] ) | तो ऐसी स्थिति और और आंकड़े इस कारन से भी है कि संभव है कि हम बच्चे की जरुरत और स्तर के अनुरूप नही पढ़ा पा रहे | अगर जो हम पढ़ा रहे है और जो बच्चों की जररत भी है तो फिर परिणाम सफल होते | किन्तु हिंदी के समबन्ध में आंकड़े तो क्या रुझान की भारी कमी भी कुछ और ही कहती है | यह परचा पहली भाषा शिक्षण के रूप में हिंदी कक्षाओं की दयनीय और उबाऊ स्थिति (आंकड़ों से प्रदर्शित व् अपने शिक्षण कार्यकाल के दौरान स्वं अनुभव की गई ) को रचनात्मकता के दृष्टिकोण से देखने का प्रयास है | परिणाम ठीक न होना प्रमाण है कि कक्षाओं में जो हो रहा है उसपर नवीन दृष्टि डालने की जरुरत है | आवश्यकता की बेसिक थ्योरी से देखें तो अमूमन बच्चे हिंदी कक्षाओं में ऊब जाते है | कदाचित वे ठीक भी है कि उन्हें उतनी हिंदी आती है जितनी उन्हें जरुरत है फिर वे क्यों हिंदी पढ़ें ? और सिर्फ लिखकर ही क्यों सबकुछ करे ? हिंदी कक्षा का क्या प्रयोजन है ? सोचने का विषय है कि यदि सीखने वाले की रूचि और जरुरत के अनुसार उन्हें कक्षा में कुछ न मिले तो वे ऊब ही जायेंगे | हमारी शिक्षा का ये चिंतन योग्य पक्ष और भी शोचनीय हो जाता है जब बी एड कार्यक्रम में इंटर्नशिप के दौरान शिक्षक – छात्र भी कक्षा में इसी समस्या से जूझते है जहाँकि उनसे अपेक्षित है कि वे बच्चों को रचनात्मक रूप से संलग्न करें | बच्चों की जरुरत को समझते हुए रचनात्मक शिक्षण युक्तियों की बात उठती आवश्य है किन्तु ऐसी पुस्तके भी नाममात्र के लिए है जो हिंदी शिक्षण के रचनात्मक और नए तरीकों पर बात करती हो | देखा जाये तो एक कक्षा में देखकर ,सुनकर ,करके सीखने वाले यानि हर तरह के विद्यार्थी होते है तो फिर हम जब हर बात केवल बोलकर बताने और लिखकर सीख लेने की उम्मीद करते है तो निश्चित रूप से यह नाकाफी है | इन्ही सवालों पर अनुचिंतन करते हुए हिंदी शिक्षण में गतिविधियों को जानने ,समझने की जरुरत पड़ती है | भाषा में रचनात्मकता को समझते हुए ये तय कर पाना भी आवश्यक है कि क्या कुछ गतिविधियाँ करा लेना ,बच्चों से बुलवा देना ही रचनात्मकता है ? क्या रचनात्मकता याद करके कुछ करवा पाना है ? गतिविधियों से होने वाले कक्षा chaos के बीच कौनसे उद्देश्य पूरे हो रहे है और हमारी कितनी आस्था है इनपर ? बच्चों से भरे भारतीय कक्षाओं में रचनात्मक गतिविधियों की बात पर अध्यापक क्यों विवशता व् तनाव अनुभव करते है ? ऐसे प्रश्नों के लिए यह परचा एक दृष्टिकोण देने का प्रयास है | रचनात्मकता अर्थात सृजन कर पाने की क्षमता | भाषा एक कौशलों से युक्त कला है | भाषा शिक्षण का उद्देशय भी है कि सृजन शीलता बढे | भाषा मात्र कौशलों और उनके द्वारा भाषा – उत्पादन का विषय नही है अपितु यह अर्जन और उससे नवीन सृजन का की कला है | अतः भाषा शिक्षण को यांत्रिकता ( औपचारिकता से याद करना ,लिखकर दिखाना ) से बचाना चाहिए | बच्चों में रचनात्मकता या उनके साथ रचनात्मक शिक्षण के लिए शिक्षक के भीतर यह समझ आवश्यक है कि वह बच्चों के सीखने के जरुरत और तरीकों की पहचान कर पाए और गतिविधियाँ सृजन की समझ रखता हो | शिक्षक शिक्षा में क्या होता है और क्या स्कोप है के क्षेत्र में न जाकर यहाँ हम हिंदी शिक्षण के सन्दर्भ में ही कुछ गतिविधियाँ देखेंगे |

रचनात्मकता की संकल्पना और भाषा –

रचनात्मक सोच पाना अर्थात आवश्यकता अनुसार हम गतिविधियां स्वम गढ़ सकें क्योकि सीख ली गई गतिविधियां भी पर्याप्त नही हो ; यही कक्षा परिदृश्य की चुनौती भी है | जिसके लिए गतिविधि को भी समझने की जरुरत है | बच्चों के सीखने के तरीकों की पहचान ,गतिविधि को समझना , खुद गतिविधि करना ,गतिविधियों का निर्माण करना और फिर एक गतिविधि भंडार विकसित करने की तरफ बढ़ाने के उद्देश्यों के साथ यह परचा अपना विस्तार देखता है |बहुत साधारण और निजी समझ के अनुसार गतिविधि यानि जहाँ मानसिक ,शारीरिक ,भावनात्मक गति ,संलग्नता हो | ऐसी संलग्नता होगी तभी जब सीखने वालों की जरूरतों के अनुसार सिखाने की विधि में स्कोप हो | जब ऐसे सोच के साथ तरीके निकले जायेंगे तो यही रचात्मक गतिविधि है | भाषा शिक्षण की पूर्णता के लिए सीखने वाले छात्र / बच्चे को शिक्षण प्रक्रिया में उसका सहभागी बनाना चाहिए | उसकी भाषा सीखने की जिम्मेदारी उसकी होनी चाहिए | परिवार व् अध्यापक इस प्रक्रिया में आवश्यक व् अन्य भगीदार के रूप में होने चाहिए | ( ब्रायन कैम्बोर्न) अधिगमकर्ता अनुमानात्मक कौशल के आधार पर भाषा सीखने की प्रक्रिया में जुड़े ,ये सुनिश्चित करना आवश्यक है |इसलिए रचनात्मक गतिविधियाँ स्पष्ट रूप से सिखाने की विधियों में बच्चों की भूमिका को बढ़ाते जाने का गुण तो रखेंगी है साथ ही अध्यापक द्वारा सहयोग और स्पष्ट निर्देशों वाली योजना की मांग करती है | गतिविधियाँ सृजन व् उपयोग के लिए विषयवस्तु की प्रकृति को ध्यान में रखना भी एक बात है | गद्य ,पद्य ,व्याकरण के लिए एक ही तरह की गतिविधियाँ हुई तो निश्चित रूप से रचनात्मकता स्वं ही गौण हो सकती है | १. उदहारण के लिए – संज्ञा सिखाने के लिए नाम ,वस्तु ,स्थान ,भाव का खेल एक मनोरंजनात्मक तरीका है | हालांकि इसकी सफलता इसकी सटीक योजना पर टिकी है कि खेल के निर्देश क्या होंगे , कब संकल्पना को मौखिक रूप से बच्चे गतिविधी के दौरान सीखेंगे फिर अंत में संकल्पना की निजी समझ लिखना और कक्षा की साझी परिभाषा तक पहुंचना जिसमे सीखने वालों के संदेहों , प्रश्नों को हल करना /करवाना कैसे – कैसे हो | रचनात्मक भाषा शिक्षण कक्षा को समग्रता में देखा जाये तो इसके कई आयाम हो सकते है –

१.भित्ति प्रिंट – समृद्ध वातावरण (कक्षा में चल रहे कार्यों या अन्य से जुड़ा लेखन और चित्र बनाने से जुड़े चार्ट )

२. भाषा के विविध उपयोगों को सुनना व् देखना (रेडियो सुनना ,अख़बार का कोई संदर्भानुकूल हिस्सा साझे रूप से पढना इत्यादि )

३. कभी – कभी निजी जीवन से जुडी बातचीत और अनुभव साझा करने के लिए स्थान व् समय होना

४. कक्षा में दैनिक रूप से कोई आवश्यक सन्देश व् सूचना लेखन (पहले अध्यापक फिर विद्यार्थियों द्वारा या फिर आज की कक्षा में क्या क्या करना है लिखना पट पर इत्यादि )

५.. लिखित सामग्री का कोना और उसे देखने व् उसके साथ संलग्नता केलिए सप्ताह में एक या बार का नियत समय जो हिंदी कक्षा में से लिया जा सकताहै (जो और जितनी किताबे हो सकें ,रोज़ का अख़बार ,कोई पत्रिका घर में जिसका उपयोग न हो यहाँ लाकर रखी जा सकती है बच्चे योगदान दे जैसा भी हो )

६. कहानी सुनाने और नाटक खेलने की आदत और जगह (सप्ताह ,पन्द्रह दिन या महीने में इसमें से कुछ किया जा सकता है )

७ . विषयवस्तु से जुडी गतिविधियाँ और उनके बाद के काम की योजना (जिससे कक्षा में वाले संगठित रूप से विषयवस्तु भी आगे बढ़े )

८. कक्षा में जो काम मौखिक व् लिखित हो उनकी सन्दर्भ सहित आवश्यकता भी स्थापित हो और सीखने वालों का भी निर्णय लेने में हिस्सा हो

९. आंकलन की विधियाँ भी इसके अनुरूप होना अति आवश्यक है हालांकि यह परचा इस क्षेत्र पर केंद्र नही करता अत यहाँ इनकी विवरण सहित चर्चा नही है

१० अति आवश्यक रूप से लेखन कार्य के दौरान विषय चयन में सीखने वालों की भागीदारी ,लिखने का ऑथेंटिक उद्देश्य होना साथ ही लेखन से पूर्व मस्तिष्क उद्वेलन ( विषय से जुड़े विचार साझा करना या तस्वीरे उकेरना या कुछ पढना ) से सम्बंधित विषय को स्थापित करना लिखने वाले को विषय से जोड़ता है | लेखन के समय शिक्षक भी अवश्य अपना लेख लिखे और साझा करे (इस तरह से लेखन कौशल से जूझने वाले विद्यार्थी सहयोग और रुझान ले पाएंगे जैसे कि भीड़ भरी मेट्रो यात्रा के बारे में लिखने से पहले सोचना और बात करना कि इससे जुड़े अनुभव क्या – क्या है ?इसमें क्या क्या विचार हो सकते है ? इत्यादि )

इन सभी आयामों का एक साथ होना जरुरी नही किन्तु इनमे से चुनाव करके रचनात्मक शिक्षण की समग्रता की तरफ बढ़ा जा सकता है | रचनात्मक कक्षा कोई याद करके किये जाने वाले कार्यों का समुच्चय नही हो सकता अपितु नित नयी सम्भावनाये तलाशने का नाम है | उपर्युक्त आयामों में से रचनात्मक कक्षा जो अपने हर तरह के विद्यार्थी के लिए कुछ न कुछ अवसर देती हो की झलक अवश्य मिल सकती है | इन आयामों को आगे और समझने केलिए हम कुछ गतिविधियों के उदहारण लेंगे और चर्चा करेंगे |

जैसा कि हम रचनात्मक भाषा शिक्षण की बात करते हुए आयामों को देख रहे थे उसी में से प्रिंट को लें तो – सीखी जाने वाली भाषा में “भाषा से घिराव वाला वातावरण”, “अपने सीखने की जिम्मेदारी स्वं लेना” इत्यादि (7 conditions of language learning by brian cambourn )[3] को मद्देनज़र रखते हुए बात करें तो रचनात्मक भाषा शिक्षण गतिविधियों में कक्षा का प्रिंट अति महत्वपूर्ण है | गतिविधि की और सब खत्म ऐसा न हो और गतिविधियों पर काम होता रहे इसके लिए प्रिंट बहुत बड़ी भूमिका निभा सकता है | जीवंत प्रिंट के साथ बच्चे संलग्न रहते है और उनकी सीखने की क्रिया चलती रहती है | २. उदहारण के लिए – विशेषण सिखाने के दौरान कक्षा में एक चार्ट लगा सकते है जिसमे सप्ताह के नाम से विशेषण जोड़ें और फिर उससे सम्बंधित घटना ,अनुभव लिखे

विशेषण सप्ताह का दिन
शरारती सोमवार क्या हुई शरारत तुम्हारे साथ ? / जब की मैंने शरारत ? / शरारत से जुड़े अन्य शब्द इत्यादि
मजेदार /

मुहावरेदार

मंगलवार मज़ा बहुत आया जब तुमको ….

आज की मजेदार बात …

मुहावरे में करे मजेदार बात ……..

…………………………… बुधवार

इस प्रकार से अनेकों बच्चों को संलग्न करने वाला प्रिंट उपयोग में लाया जा सकता है | ३. उदाहरन पढ़ी गई किसी कविता को आगे बढ़ना , उसमे चित्र बनाना जैसे काम बच्चों को भाषा में सृजनात्मक रूप से संलग्न कर सकते है| छात्र / छात्राएं अक्सर विषयवस्तु और अवसर अनुकूल भाषा न बोल पाने (अभिव्यक्ति में कमतर ) से जूझते है | कक्षा में १५ से २० मिनट की एक श्रवण गतिविधि का उपयोग इसमें प्रभावशाली सिध्ध हो सकती है | ४. उदाहरन भाषा को विविधता से अनुभव कराने के लिए कक्षा में फ़ोन या रेडियो जो भी हो पर कोई बातचीत , समाचार , वाद – विवाद, कोई वर्णन ,कहानी , साक्षात्कार इत्यादि को सुना जा सकता है और इनकी भाषा में क्या फर्क है ? पर चर्चा करके मौखिक भाषा उपयोग में विविधता के जीवंत अनुभव द्वारा सुनने , बोलने के कौशलों पर काम किया जा सकता है | कक्षा में भाषा के जिस प्रकार के उपयोग को हम सीखना चाहे उसे सुन सकते है यह प्राथमिक कार्य किया जा सकता है | इसी तर्ज़ पर कुछ और रचनात्मक गतिविधियाँ सुझाई जा रही है –

विषयवस्तु / उद्देश्य गतिविधि ध्यान रखने योग्य बिंदु
कहानी – शिक्षण कुछ स्थितियां दर्शाने वाले चित्र लेकर, उनको आपस में जोड़ते हुए उनपर कहानी बनाना

कहानी को पढने से पहले कहानी के मूल विचार को लेकर विद्यार्थियों से अनुभव या उनकी समझ लेना ,

अनुमान लगाते हुए शीर्षक की व्याख्या करना

चित्र देखकर अनुमान लगाना

कहानी में दिए हुए या न भी हो तो google से सम्बंधित चित्र लेकर चित्रों की प्रतियाँ करके कक्षा में लगाना और उन्ही से कहानी को समझना

फिर अंशों में कहानी पढना

इसमें एक जैसे चित्रों से अलग अलग कहानियां मिल सकती है जो रचनाशीलता को सबल करेंगी

किसी कहानी का मूल विचार जैसे – शरारत या फिर कठिन काम करने का साहस इत्यादि को ठीक से पकड़ना होगा तभी उससे सम्बंधित स्थिति को लेकर सटीक और अर्थपूर्ण बात हो सकती है | ऐसी बात से कहानी को समझने में सहायता हो जाती है क्योकि पढने से पहले सम्बंधित मानसिक क्षमता और विचार जागृत हो जाते है |

कविता – शिक्षण १.पढ़ी जाने वाली कविता को अंशों में बांटकर स्लिप्स बनाकर समूह में देना , विद्यार्थी उसे अपने अनुसार एक क्रम देंगे अर्थपूर्ण हो

सभी समूहों की कविता सुने और इसी क्रम में लगाने की प्रक्रिया और कारन पर बात करें ; इसी में अर्थ भी प्रकट होगा |

२. कविता को पूरा पढना ,फिर अंशों में रुक – रुक कर पढना और जो भी चित्र दिमाग में बने उन्हें उकेरना

कक्षा में श्याम/ श्वेत पट पर सामूहिक रूप से कर सकते है या सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से भी ..

फिर उकेरे हुए चित्र या चित्रों को देखते हुए सामूहिक चर्चा – कविता की मूल बात क्या हो सकती है ?

सहायक विचार क्या क्या है ?

इसमें मूल कविता विद्यार्थियों ने न देखि पढ़ी हो |

क्रम की नवीनता से बनी कविताओं को सही गलत की भावना से परे रखकर कक्षा में सुने व् अर्थ पर बात करें

इस गतिविधि में कविता पढना मूल क्रिया है लगभग पूरी कक्षा के दौरान हर सहभागी और अध्यापक कविता को पढ़ते रहेंगे |

जिनको चित्र बनाने में सुविधा न हो वे भी सामूहिक रूप से कुछ योगदान दे पाएं ऐसा अवसर मुहैया कराएँ

बने हुए चित्र पर किसी ऐसे व्यक्ति की प्रतिक्रिया ले सकते है जो गतिविधि में न हो जिसने कविता न सुनी और और फिर उससे सुनना कि इससे क्या लगता है कि कविता किस बारे में है ?

( एक मजेदार काम होगा प्रतिक्रिया सुनना )

निष्कर्ष – पहली भाषा में रचनात्मक शिक्षण की युक्तियाँ उबाऊपन से निजात दिलाने के साथ – साथ समग्रता से भाषा के कौशलों सुनना ,बोलना , पढना ,लिखना को भी संबोधित कर सकती है | सुनने – बोलने के कौशलों में विद्यार्थी यूँ भी काफी अनुभव रखते है इसलिए इसमें उन्हें उच्च स्तरीय चुनौतियां देने के साथ ही पढने और लिखने में गहन संलग्नता सुनिश्चित करने में चिंतन और सृजन की काफी गुंजाइश है जिसका एक सूक्ष्म प्रयास यहाँ किया गया है |

सन्दर्भ पुस्तकें –

  1. https://archive.org/stream/science71898mich#page/818/mode/2up
  2. The eleventh Annual Status of Education Report (ASER 2016) was released in New Delhi, 18 January 2017
  3. Cambourne, Brian. (1995) “Toward An Educationally Relevant Theory Of Literacy Learning: Twenty Years Of Inquiry”. The Reading Teacher, Vol. 49, No. 3.

हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय

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एम.ए. हिंदी पाठ्यक्रम

सत्रप्रश्न पत्र शीर्षक 
प्रथम सत्र101- हिंदी साहित्य का इतिहास (आदिकाल से रीतिकाल तक) 
 102- आदिकालीन हिंदी काव्य 
 103- भक्तिकालीन हिंदी काव्य 
 104- हिंदी कथा साहित्य 
 105- भारतीय काव्यशास्त्र 
द्वितीय सत्र201- रीतिकालीन हिंदी काव्य 
 202- आधुनिक हिंदी काव्य-1 
 203- हिंदी नाटक 
 204- सामान्य भाषाविज्ञान 
तृतीय सत्र301- आधुनिक हिंदी काव्य- 2 
 302- हिंदी आलोचना 
 303- हिंदी के अनेक गद्य रूप 
 304- हिंदी साहित्य का इतिहास (आधुनिक काल) 
 305- पाश्चात्य काव्यशास्त्र 
 202- आधुनिक हिंदी काव्य-1 
 203- हिंदी नाटक 
 204- सामान्य भाषाविज्ञान 

प्रथम सत्र [प्रश्न पत्र- 1] [101- हिंदी साहित्य का इतिहास (आदिकाल से रीतिकाल तक)]

इकाई – 1: इतिहास-दर्शन

 इतिहास और आलोचना, इतिहास और अनुसंधन

 साहित्येतिहास-दर्शन के समकालीन सिद्धान्त

 साहित्येतिहास-लेखन की प्रमुख अवधरणाएँ: मध्ययुगीनता, पुनर्जागरण और आधुनिकता

 हिंदी साहित्य के इतिहासों का इतिहास

 काल-विभाजन और उसकी समस्याएँ

इकाई – 2: आदिकाल

 नामकरण की समस्या, पृष्ठभूमि: विभिन्न परिस्थितियाँ

 रासोकाव्य-परंपरा, प्रमुख प्रवृत्तियाँ

 प्रमुख कवि (चंदबरदाई, जगनिक, अमीर खुसरो, विद्यापति)

इकाई – 3: भक्तिकाल

पृष्ठभूमि एवं प्रवृत्तियाँ

प्रमुख एवं गौण कवि तथा उनका काव्य (कबीर, रविदास, दादू, सुंदरदास, कुतुबन, मंझन, जायसी,

तुलसीदास, सूरदास, नंददास )

निर्गुण एवं सगुण काव्यधराएँ: प्रमुख विशेषताएँ

इकाई – 4: रीतिकाल

नामकरण की समस्या

पृष्ठभूमि एवं प्रवृत्तियाँ

प्रमुख एवं गौण कवि तथा उनका काव्य (केशव, बिहारी, देव, मतिराम, घनानंद, बोध, आलम, ठाकुर,

गुरुगोविंद सिंह, रज्जब)

रीतिबद्ध और रीतिमुक्त काव्यधराओं की विभेदक विशेषताएँ

प्रस्तावित पुस्तकें-

हिंदी साहित्य का इतिहास: रामचंद्र शुक्ल

हिंदी साहित्य की भूमिका: हजारीप्रसाद द्विवेदी

रीतिकाव्य की भूमिका: डॉ. नागेंद्र

हिंदी साहित्य का इतिहास: संपादक डॉ. नागेंद्र

साहित्य का इतिहास दर्शन: नलिन विलोचन शर्मा

हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास: रामकुमार वर्मा

अन्य सहायक पुस्तकें

साहित्य और इतिहास दृष्टि: मैनेजर पाण्डेय

मध्यकालीन बोध् का स्वरूप: हजारीप्रसाद द्विवेदी

हिंदी साहित्य का अतीत (भाग 1, 2): विश्वनाथ प्रसाद मिश्र

हिंदी साहित्य का इतिहास: पूरनचंद टंडन, विनीता कुमारी

अप्रभ्रंश साहित्य: हरिवंश कोछड़

आदिकालीन हिंदी साहित्य की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि: राममूर्ति  त्रिपाठी

हिंदी साहित्य के इतिहास पर कुछ नोट्स: रसाल सिंह

प्रथम सत्र [प्रश्न पत्र- 2] [102- आदिकालीन हिंदी काव्य]

इकाई 1: दोहाकोश: (सं.) राहुल सांकृत्यायन

षड्दर्शन खंडन-ब्राह्मण: दोहा 1, 2

करुणा सहित भावना: दोहा-17

चित्त: दोहा-24, 25

सहज, महासुख: दोहा-42, 43, 44

परमपद: 49

देह ही तीर्थ: 96

(कुल: 10)

इकाई 2; गोरखबानी: (सं) पीतांबरदत्त बड़थ्वाल

पद-1 से 20 तक

इकाई 3:  पृथ्वीराज रासो: (सं) माता प्रसाद गुप्त

कयमासवध् (संपूर्ण)

इकाई 4: विद्यापति की पदावली: (सं) रामवृक्ष बेनीपुरी

पद: 1, 2, 5, 10, 18, 23, 27, 29, 36, 42 (कुल;10 पद)

प्रस्तावित पुस्तकें

हिंदी साहित्य का आदिकाल: हजारी प्रसाद द्विवेदी

अपभ्रंश साहित्य: हरिवंश कोछड़

नाथ संप्रदाय: हजारीप्रसाद द्विवेदी

हिंदी के विकास मे अपभ्रंश का योग: नामवर सिंह

पृथ्वीराज रासो की भाषा: नामवर सिंह

अन्य सहायक पुस्तकें

प्राकृत-अपभ्रंश साहित्य और उसका हिंदी पर प्रभाव: राम सिंह तोमर

सिद्ध-साहित्य: धर्मवीर भारती

अपभ्रंश भाषा और साहित्य: राजमणि शर्मा

विद्यापति: शिव प्रसाद सिंह

आदिकालीन हिंदी साहित्य: अध्ययन की दिशाएँ: अनिल राय

गोरखनाथ और उनका युग: रांगेय राघव

प्रथम सत्र [प्रश्न पत्र- 3] [103- [भक्तिकालीन हिंदी काव्य]

इकाई – 1: कबीर

कबीर: हजारीप्रसाद द्विवेदी

पद स संख्या: 35, 108, 112, 123, 126, 134, 153, 168, 181, 206, 250 (कुल 11)

साखी स संख्या: 103, 113, 139, 157, 190, 191, 199, 200, 201, 231, 237 (कुल 11)

इकाई – 2: जायसी

जायसी-ग्रंथावली: रामचन्द्र शुक्ल (सं.)

नागमती वियोग खंड

इकाई – 3: सूरदास

भ्रमरगीतसार: रामचन्द्र शुक्ल (सं.)

पद संख्या: 3, 4, 7, 9, 11, 16, 18, 21, 22, 24, 30, 34, 37, 42, 45, 52, 62, 75, 85, 100,

 125, 133 (कुल 22)

इकाई – 4: तुलसीदास

विनय पत्रिका: (सं.) वियोगी हरि

पद स संख्या: 90, 101, 102, 105, 111, 112, 115, 116, 117, 119, 120, 121, 123, 124, 162,

 167, 172, 174, 198, 201 (कुल 20)

प्रस्तावित पुस्तकें

गोस्वामी तुलसीदास: रामचंद्र शुक्ल

तुलसी आधुनिक वातायन से: रमेश कुंतल मेघ

लोकवादी तुलसीदास: विश्वनाथ त्रिपाठी

तुलसी काव्य-मीमांसा: उदयभानु सिंह

गोसाईं तुलसीदास: विश्वनाथ प्रसाद मिश्र

सूरदास: रामचन्द्र शुक्ल

सूर साहित्य: हजारी प्रसाद द्विवेदी

अन्य सहायक पुस्तकें

महाकवि सूरदास: नंद दुलारे वाजपेयी

सूर और उनका साहित्य: हरवंशलाल शर्मा

सूरदास: ब्रजेश्वर वर्मा

कबीर: हजारी प्रसाद द्विवेदी

कबीर की विचारधरा: गोविंद त्रिगुणायत

कबीर साहित्य की परख: परशुराम चतुर्वेदी

त्रिवेणी: रामचन्द्र शुक्ल

जायसी: विजयदेव नारायण साही

हिंदी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, एम.ए. (हिंदी) पाठ्यक्रम

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एम.. (हिंदी) पाठ्यक्रम

पाठ्यक्रमों का सत्रानुसार विवरण

एम00 (हिंदी) प्रथम वर्ष

पहला सत्र (पावस सत्र)

पहला प्रश्नपत्र                   –           छायावादी काव्य

दूसरा प्रश्नपत्र                   –           निबंध और नाटक

तीसरा प्रश्नपत्र                  –           भाषा विज्ञान एवं हिंदी भाषा

चैथा प्रश्नपत्र                    –           हिंदी साहित्य का इतिहास (आरंभ से रीतिकाल तक)

दूसरा सत्र (शीतकालीन सत्र)

पांचवाँ प्रश्नपत्र                 –           छायावादोत्तर काव्य

छठा प्रश्नपत्र                    –           कथा-साहित्य

सातवां प्रश्नपत्र                 –           हिंदी साहित्य का इतिहास (भारतेंदु युग से अब तक)

आठवां प्रश्नपत्र (वैकल्पिक)-           कोई एक मूलभाषा (संस्कृत/प्राकृत/पालि/अपभ्रंश) अथवा आधुनिक भारतीय भाषा (बंगला/मराठी/तेलुगु/ कन्नड़/उर्दू/ तमिल)।

एम00 (हिंदी) द्वितीय वर्ष

तीसरा सत्र (पावस सत्र)

नवाँ प्रश्नपत्र                                 –           आदिकालीन एवं निर्गुणकाव्य

दसवाँ प्रश्नपत्र                               –           सगुण भक्ति काव्य

ग्यारहवां प्रश्नपत्र                           –           संस्कृत काव्यशास्त्र

बारहवाँ प्रश्नपत्र                            –           आधुनिक भारतीय साहित्य

चैथा सत्र (शीतकालीन सत्र)

तेरहवाँ प्रश्नपत्र                 –           रीतिकाव्य

चैदहवाँ प्रश्नपत्र                –           पाश्चात्य साहित्य-सिद्धांत

पन्द्रहवाँ प्रश्नपत्र                –           हिंदी समीक्षा

सोलहवाँ प्रश्नपत्र (वैकल्पिक)-         किसी एक साहित्यकार (जायसी/सूर/तुलसी/भारतेन्दु

हरिश्चन्द्र/प्रेमचंद/प्रसाद/निराला/ रामचन्द्र शुक्ल/ हजारीप्रसाद द्विवेदी/ अज्ञेय/ मुक्तिबोध/ यशपाल/जैनेन्द्र/ अमृतलाल नागर) अथवा किसी एक साहित्य प्रवृत्ति (संतकाव्य/रीतिकाव्य/ आधुनिक  हिंदी साहित्य 1919- 1947/ स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य) अथवा किसी एक भाषापरक या अन्य विषय (हिंदी भाषाशिक्षण /अनुवाद: सिद्धांत एवं प्रयोग/प्रयोजनमूलक हिंदी/ बोली विज्ञान एवं सर्वेक्षण पद्धति/हिंदी पत्रकारिता – इतिहास, सिद्धांत और प्रयोग/हिंदी नाटक एवं रंगमंच/हिंदीतर एवं देशांतर क्षेत्रों का हिंदी साहित्य/भारतीय साहित्य/लोक साहित्य) का विशेष अध्ययन ।

एम. ए. (हिंदी) प्रथम वर्ष

पहला प्रश्नपत्र: छायावादी काव्य

पाठ्यांश:

1- कामायनी: जयशंकर प्रसाद (चिंता, आशा एवं श्रद्धा सर्ग)

2- अनामिका: निराला (राम की शक्तिपूजा, सरोजस्मृति)

3- तारापथ: सुमित्रानंदन पंत (बादल, भावी पत्नी के प्रति, नौका विहार, अनामिका के कवि के प्रति, आः धरती कितना देती है)

4- दीपशिक्षा: महादेवी (पंथ होने दो अपरिचित, सब बुझे दीपक जला लूँ, जब यह दीप थके तब आना, यह मंदिर का दीप, जो न प्रिय पहचान पाती, मोम सा तन घुल चुका, सब आँखों के आँसू उजले, मैं पलकों में पाल रही हूँ, पूछता क्यों शेष कितनी रात, अलि मैं कण कण को जान चली)

 

अनुशंसित ग्रंथ:

1- जयशंकर प्रसाद – नंददुलारे वाजपेयी, भारती भंडार, इलाहाबाद

2- कामायनी – एक पुनर्विचार – मुक्तिबोध, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

3- निराला की साहित्य साधना (तीन भाग) – रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली

निराला की साहित्य साधना खंड 1, निराला की साहित्य साधना खंड – 2, निराला की साहित्य साधना खंड 3

4- सुमित्रानंदन पंत: डॉ. नगेन्द्र

5- छायावाद: नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली

6- महादेवी वर्मा: जगदीश गुप्त, नई दिल्ली, 1994

7- छायावाद की प्रासंगिकता: रमेशचन्द्र शाह, नई दिल्ली, 1973

8- छायावाद और नवजागरण: महेन्द्रनाथ राय, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली

 

दूसरा प्रश्नपत्र

निबंध और नाटक

पाठ्यांश:

अनुशंसित ग्रंथ:

 

तीसरा प्रश्नपत्र

भाषा विज्ञान एवं हिंदी भाषा

पाठ्यांश:

  1. भाषा: परिभाषा, तत्त्व, अंग, प्रकृति और विशेषताएं । भाषा परिवर्तन के कारण एवं दिशाएं ।
  2. भाषाविज्ञान – परिभाषा एवं स्वरूप, अंग, प्रमुख अध्ययन-पद्धतियाँ ।
  3. स्वनविज्ञान – परिभाषा, स्वन, संस्वन और स्वनिम । औच्चारणिक स्वनविज्ञान (स्वनयंत्र और स्वन उत्पादन प्रक्रिया), स्वनभेद, मानस्वर, स्वनपरिवर्तन के कारण एवं दिशाएं ।
  4. स्वनिमविज्ञान – परिभाषा, स्वनिम के भेद – स्वनिम और उपस्वनिम, स्वनिमवितरण के सिद्धांत ।
  5. रूपिमविज्ञान – शब्द और रूप (पद), संबंध तत्त्व और अर्थतत्त्व, रूप, संरूप, रुपिम और स्वनिम, रूपिमों का स्वरूप, रूपिमों का वर्गीकरण ।
  6. वाक्यविज्ञान – वाक्य की परिभाषा, संरचना, निकटस्थ अवयव, वाक्य के प्रकार, वाक्य-रचना में परिवर्तन – कारण एवं दिशाएं ।
  7. अर्थविज्ञान – शब्दार्थ सम्बन्ध विवेचन, अर्थपरिवर्तन के कारण एवं दिशाएं
  8. भाषाविज्ञान की प्रमुख शाखाएं – समाजभाषा विज्ञान, शैलीविज्ञान और कोशविज्ञान का सामान्य परिचय ।
  9. संपर्क भाषा एवं राजभाषा के रूप में हिंदी
  10. नागरी लिपि का मानकीकरण । 

अनुशंसित ग्रंथ:

  1. भाषा विज्ञान की भूमिका – देवेन्द्र नाथ शर्मा, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली
  2. भाषा विज्ञान – भोलानाथ तिवारी, किताब महल, इलाहाबाद ।
  3. सामान्य भाषाविज्ञान- बाबूराम सक्सेना, हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग
  4. हिंदी भाषा का उद्भव और विकास – उदयनारायण तिवारी, भारती भंडार, इलाहाबाद ।
  5. भाषा और समाज – रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
  6. राष्ट्रभाषा हिंदी: समस्याएं और समाधान – देवेन्द्रनाथ शर्मा, लोकभारती, इलाहाबाद ।
  7. भारत की भाषा समस्या – रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
  8. संपर्क भाषा हिंदी – सं0 सुरेश कुमार, ठाकुर दास, केन्द्रीय हिंदी संस्थान, आगरा ।
  9. राजभाषा हिंदी: प्रचलन और प्रसार – डॉ. रामेश्वर प्रसाद, अनुपम प्रकाशन, पटना
  10. नागरी लिपि: हिंदी और वर्तनी – अनंत चैधरी, दिल्ली माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली
  11. समसामयिक हिंदी में रूपस्वानिमिकी – सुधाकर सिंह