हिंदी साहित्य का इतिहास, भाषा इतिहास की पुस्तकें

हिंदी साहित्य का इतिहास, भाषा इतिहास की पुस्तकों की सूची
अनुक्रम
Hindi Sahitya ka Itihas, Bhasha Itihas
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हिंदी साहित्य और सिनेमा-अजय कुमार चौधरी

हिंदी साहित्य और सिनेमा
अजय कुमार चौधरी
पहले मैं आपको दो बातें स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि सिनेमा और साहित्य का धरातल अलग-अलग है | सिनेमा शुध्द मनोरंजन प्रधान होता है जिसमें दर्शकों के मांग का ख्याल रखा जाता है, दर्शक को जो चाहिए फिल्म इंडस्ट्री वहीं परोसता है जिसका सीधा संबंध व्यवसाय से होता है,जबकि साहित्य संवेदना और अनुभूति प्रधान होता है, साहित्य दर्शकों के मांग पर नहीं बल्कि साहित्यकार अपनी निजी संवेदना और अनुभूति को केंद्र में रखकर समाज के यथार्थ रूप को सामने लाने का प्रयास करता है | दो धरातल पर होने के बावजूद साहित्य और सिनेमा कई विंदुओं पर मिल भी जाता है | सिनेमा कल्पना प्रधान है ,भावों की अभिव्यक्ति के लिए ऐसे दृश्यों का निर्माण कर दिया जाता है जो शब्दों के द्वारा संभव नहीं है | वहीं साहित्य शब्दों के माध्यम से जिस वातावरण का निर्माण करता है उसे दृश्यरुप में लाना फ़िल्मकारों के लिए कभी –कभी चुनौती भी बन जाती है | साहित्यकार शब्दों के जिस वातावरण का निर्माण करता है उसे पाठक अपनी-अपनी कल्पना द्वारा अलग-अलग भाव और दृश्य मन में बनाते हैं |जबकि फ़िल्मकर द्वारा तैयार किया गया वातावरण दर्शकों के लिए एक जैसा होता है | फ़िल्मकार अपने अनुभव के द्वारा साहित्य से ली गई सामाग्री का ज्यों का त्यों रूपान्तरण नहीं कर पता है या करना नहीं चाहता है क्योंकि वह साहित्य को फिल्म के रूप से परोसना चाहता और साहित्य फिल्म के साँचे में पूर्णरूप से उतार नहीं पता और यहीं से साहित्य और सिनेमा का अंतर्संबंध में विलगाव उत्पन्न हो जाता है |फिल्म समीक्षक विमलेंदु विमलेंदु जी ने साहित्य और सिनेमा के अंतर्संबंध को स्पष्ट करते हुए कहते है कि1 “साहित्य और सिनेमा का सम्बंध भी दो पड़ोसियों की तरह रहा. दोनो एक दूसरे के काम तो आते रहे लेकिन यह कभी सुनिश्चित नही हो पाया कि इनमे प्रेम है या नही.|”
सिनेमा ने अपने आरंभिक चरण में साहित्य से ही प्राण-तत्व लिया. यह उसके भविष्य के लिए ज़रूरी भी था. दरअसल सिनेमा और साहित्य की उम्र में जितना अधिक अंतर है, उतना ही अंतर उनकी समझ और सामर्थ्य में भी है. विश्व सिनेमा अभी सिर्फ 117 साल का हुआ है. साहित्य की उम्र से इसकी तुलना की जाय तो यह अभी शिशु ही है साहित्य के सामने.” उदाहरण के लिए अभी हाल ही में एक मूवी आई थी ‘बाहुबली’ | इस फिल्म में जिस तकनीक के प्रयोग से जिस वातावरण का निर्माण किया गया है उसे हूबहू साहित्य में उतार पाना बड़े से बड़े लेखकों के चुनौती है |ऐसे जगह पर आकार ही साहित्य अपनी सीमा का जान पाती है |
प्रेमचन्द के ‘ गोदान ‘ पर बनी फिल्म को छोड़ दें तो रेणु की कहानी पर बनी ‘तीसरी कसम’ ने दुनिया को कुछ अमर पात्र दिये. महाश्वेतादेवी की कहानी पर बनी ‘रुदाली’ के दृश्य अविस्मरणीय हैं. विमल मित्र के उपन्यास पर बनी ‘साहब,बीवी और गुलाम’, टैगोर की कहानी-‘नष्टनीड़’ पर सत्यजीत राय की फिल्म ‘चारुलता’, सृजन के नये आयामों की तलाश करती हैं.

सिनेमा को मण्टो का साथ लेना पड़ा. मण्टो की लेखनी से ‘किसान कन्या’, ‘मिर्ज़ा गालिब’, ‘बदनाम’ जैसी फि़ल्में निकलीं. प्रेमचंद और अश्क भी इस दौर में सिनेमा से जुड़े और मोहभंग के बाद वापस साहित्य की दुनिया में लौट गए. बाद में ख्वाजा अहमद अब्बास, पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र, मनोहरश्याम जोशी, अमृतलाल नागर, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, रामवृक्ष बेनीपुरी, भगवतीचरण वर्मा, राही मासूम रज़ा, सुरेन्द्र वर्मा, नीरज, नरेन्द्र शर्मा, कवि प्रदीप, हरिवंशराय बच्चन, कैफी आज़मी, शैलेन्द्र, मज़रूह सुल्तानपुरी, शकील बदायूँनी इत्यादि ने भी समय-समय पर हिन्दी सिनेमा में किसी न किसी रूप में अपनी आमद दर्ज कराई.
बांग्ला लेखक शरतचंद्र के उपन्यास ‘देवदास’ पर हिन्दी में चार फिल्में बनीं और कमोबेश सभी सफल रहीं. प्रेमचन्द की कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर सत्यजीत रॉय ने इसी नाम से फिल्म बनाई, जो वैश्विक स्तर पर सराही गई. भगवतीचरण वर्मा के अमर उपन्यास ‘चित्रलेखा’ पर भी फिल्में बनीं, जिनमें एक सफल रही. बाद में साहित्यिक कृतियों पर आधारित फिल्मों को आर्ट फिल्मों के खांचे में रखकर इनका व्यावसायिक और हिट फिल्मों से अलगाव कायम करने का प्रयास किया गया, जिससे ऐसी फिल्मों का आर्थिक पहलू प्रश्नचिह्नांकित हो गया और फिल्मकारों ने साहित्यिक कृतियों पर फिल्म बनाने से परहेज करना शुरू कर दिया.
. हालांकि अमिताभीय युग में भी सत्यजीत रॉय, मृणाल सेन, कमाल अमरोही, ऋषिकेश मुखर्जी, बासु भट्टाचार्य, श्याम बेनेगल, एम. एस. सत्थू, एन. चंद्रा, मुजफ्फर अली, गोविन्द निहलानी, आदि ने अपने-अपने स्तर से साहित्य, सिनेमा और समाज का त्रयी में सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया लेकिन ये सभी चाहे-अनचाहे ‘आर्ट सिनेमा’ में बँधने को बाध्य हुए.
एक कारण और भी था कि इस दौरान साहित्यिक कृतियों पर बनने वाली फिल्में एक-एक कर असफल होने लगी थीं. प्रेमचंद की रचनाओं पर बनीं ‘गोदान’, ‘सद्गति’, ‘दो बैलों की कथा’, फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास पर बनी ‘तीसरी कसम’, मन्नू भंडारी की रचनाओं पर आधारित ‘यही सच है’, ‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’, शैवाल की कहानी पर आई फिल्म ‘दामुल’, धर्मवीर भारती के उपन्यास पर आधारित ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’, चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की कहानी पर आधारित ‘उसने कहा था’, संस्कृत की रचना ‘मृच्छकटिकम्’ पर आधारित ‘उत्सव’, राजेंदर सिंह बेदी के उपन्यास पर बनी ‘एक चादर मैली सी’ आदि का असफल होना सिनेमा और साहित्य से दूरी की एक बड़ी वजह बन गया.
साहित्य और सिनेमा के अन्तर्सम्बन्धों पर गुजराती फिल्म समीक्षक बकुल टेलर ने बेहद सारगर्भित टिप्पणी की है. उनका कहना है, “साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्म अपने आप अच्छी हो, ऐसा नहीं होता. वास्तविकता यह है कि साहित्यिक कृति का सौन्दर्यशास्त्र और सिनेमा का सौन्दर्यशास्त्र अलग-अलग हैं और सिनेमा सर्जक भी साहित्यकृति के पाठक रूप में साहित्यिक आस्वाद तत्वों पर मुग्ध होकर उनका सिनेममेटिक रूपांतरण किए बगैर आगे बढ़ जाते हैं.“
बंकिमचंद्र की कृति पर बनी ‘आनंदमठ’, विमल मित्र कृत ‘साहब बीबी और गुलाम’, आर. के नारायण के अंग्रेज़ी उपन्यास पर बनी ‘गाइड’, उडि़या लेखक फकीरमोहन सेनापति की रचना पर बनी ‘दो बीघा ज़मीन’ और मिर्ज़ा हादी की उर्दू कृति पर बनी ‘उमराव जान’ फिल्मों की सफलता का सबसे बड़ा कारण परिवेश की समनुरूपता रहा है
चलचित्र और साहित्य के अंतर्सम्बन्ध पर अनेक विचारकों ने अपने मत दिए हैं:-
उमेश राठौर लिखते हैं, ‘फिल्म और साहित्य‘ के परस्पर लगाव का प्रश्न सदैव से ही जीवन्त रहा है। इस सम्बन्ध को विकसित करने में गीत, कविता, नाटक और उपन्यास की चर्चा भी अक्सर होती रही है, लेकिन फिल्में केवल उपन्यासों पर ही नहीं बनी-कथाओं पर भी निर्मित की गई।7
सम्पादक ‘मार्यर शामसी‘ ने चलचित्रों को ‘यांत्रिकी, कला और तकनीकी‘ का मेल मानते हुए लिखा है,“Cinema is a highly mechanical medium. It uses many mechanical devices like cameras, microphones, dubbing machines, editing machines etc. Film is a product of intraction between machines, artistic and technical people”. 8
वे आगे लिखे हैं, “In the beginning, it was considered as a medium of cheep entertainment, but now it was come to be considered as art form. Interactual and serious thinkers have associated themselves with cinema”. 9
‘जयदेव तनेजा‘ के शब्दों में, ‘‘कला प्रयास है, प्रयोग है, सृष्टि है, जीवन है-वस्तु नहीं है। रंग कला भी इसी अर्थ में एक उत्सव है, एक अनुष्ठान है- जीवनमय है, जीवनदायी है।‘‘10
वे पुनः लिखते हैं, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं कि अनेक कथा-कृतियाँ रंगमंच और सिनेमा के माध्यमों से सफलतापूर्वक रूपांतरित हुई हैं।‘‘11
रंगमंच और सिनेमा के प्रबुद्ध अभिनेता बलराज साहनी का कथन है, ‘‘फिल्म-कला को ‘आॅपरेशन टेबल‘ पर रखिए और उसकी चीरफाड़ कीजिए तो पता चलेगा कि फिल्म-कला दरअसल एक कला का नाम नहीं, बल्कि अनगिनत कलाओं के समूह का नाम है।‘‘12
सम्पादक डाoनाल्ड एच0 जान्सटान के अनुसार, “Cinematic adaptation of books, players, poems, diaries and comics demonstrate films profuse influence on print media”. 13
पुनश्च, “In addition to book adaptations, film is, able to extend the run of a play indefinitely through its climatic adaptation of it.” 14
पुनश्च, “Hence, film has a profound influence on print media, giving them a visual dimension that extends the original text’s popularity and scope”. 15
‘सुधीर ‘सुमन‘‘ के शब्दों में, ‘‘सिनेमा मनुष्य के कला के साथ अंतर्सम्बन्ध का दृश्यरूप है। मनुष्य के जीवन में जो सुंदर है उसके चुनाव के विवेक का नाम सिनेमा है।‘‘16
इस प्रकार अनेक विद्वानों ने चलचित्र एवं साहित्य के मध्य गहन अंतर्सम्बन्ध स्वीकार किए हैं। एक सत्य यह भी है कि चलचित्र में विविध कलाओं का समाहार सरलता से सम्भव है। यदि हम साहित्य के चलचित्र रूपांतरण का अध्ययन करे तो भी चलचित्र की उपादेयता स्वयं सिद्ध होती है।
हिंदी शोध

हिंदी साहित्य में हुए शोध
वर्ष 1978
डॉ आभा सक्सेनाविषय: “हिंदी कारकों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन “शोध निर्देशक -डॉ भोलानाथ तिवारीवर्ष -1978,
विश्वविद्यालय: दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
वर्ष 1979
डॉ. भारती पारिजात.विषय:छायावादोत्तर हिन्दी काव्य में बिम्बविधान.निर्देशक : डॉ. ताराचन्द शर्माविश्वविद्यालय: आगरा विश्व विद्यालय, आगरा
वर्ष:1979.
वर्ष 1980
सन्त राम वैश्यशीर्षक – सूर की सांस्कृतिक चेतना और उनका युगबोधनिर्देशक – डॉक्टर त्रिभुवन सिंहवर्ष -1980
उपाधि -पीएचडी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय , वाराणसी
वर्ष 1982
डॉ रामसजन पाण्डेयपीएच. डी.: विद्यापति का सौन्दर्यबोधनिर्देशक- डॉ. रामशंकर त्रिपाठी 1982 ई.अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद
वर्ष 1987
शिवजी श्रीवास्तवशोध विषय-“कविवर मदन मोहन द्विवेदी’मदनेश’-व्यक्तित्व एवम् कृतित्व”शोध निर्देशक-डॉ. जगदीश सहाय उपाध्याय।प्रवक्ता हिंदी विभागबुन्देलखण्ड महाविद्यालय झाँसी।शोध वर्ष-1987विश्वविद्यालय-बुंदेलखण्ड विश्विद्यालय झाँसी।
डॉ गायत्री सिंहशीर्षक आधुनिक हिन्दी कविता में कृषि सांस्कृतिक मूल्यनिर्देशक डॉ विद्या चौहानकानपुर विश्वविद्यालय1987
वर्ष 1989
रवीन्द्रनाथ मिश्रशोध शीर्षक डॉ शिवमंगल सिंह सुमन की कृतियों का समीक्षात्मक अध्ययननिर्देशक: डॉ अरविंद कुमार पांडेयविश्वविद्यालय: मुंबई विश्वविद्यालय
वर्ष: 1989
वर्ष 1992
सफीउल्लाह अंसारीविषय: मोहन राकेश का उपन्यास शिल्प सफीउल्लाह अंसारी,शोध निदेशक: डा. त्रिभुवन ओझा,विश्वविद्यालय: राँची विश्वविद्यालय,राँची.
वर्षः1992.
रामप्रताप सिंहशोध विषय-सुल्तानपुर जनपद के कवि एवं लेखकनिर्देशक- डा ज्ञानशंकर पांडेयविश्वविद्यालय: लखनऊ विश्वविद्यालय
वर्ष-1992
रामप्रताप सिंहशोध विषय-सुल्तानपुर जनपद के कवि एवं लेखकनिर्देशक- डा ज्ञानशंकर पांडेयविश्वविद्यालय: लखनऊ विश्वविद्यालय
वर्ष-1992
वर्ष 1993
डी.लिट्. : भक्तिकालीन हिन्दी निर्गुण काव्य का सांस्कृतिक अनुशीलनकानपुर विश्वविद्यालय ,कानपुर1993 ई.
डॉ. गणेश नारायण शुक्ल
पी- एच.डी. 1993
शोध-शीर्षक : ‘शम्भुनाथ मिश्र और उनका काव्य ‘
निदेशक – प्रोफेसर डॉ.सूर्य प्रसाद दीक्षित
लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ
वर्ष 1995
शम्भुनाथ तिवारीपीएच.डी.(1995 में एवार्डेड )संस्थान- जे.एन.यू. नई दिल्लीशोध निर्देशक-प्रोफ़ेसर नामवरसिंहशोधकार्य का शीर्षक -“मिश्रबंधु के आलोचनाकर्म का पुनर्मूल्यांकन”
शम्भुनाथ तिवारी पीएच.डी.संस्थान- #जे.एन.यू. नई दिल्लीशोध निर्देशक: प्रोफ़ेसर नामवर सिंहशोधकार्य का शीर्षक: “मिश्रबंधु के आलोचनाकर्म का पुनर्मूल्यांकन
वर्ष: 1995
वर्ष 1996
राकेश कुमार शुक्ल,विषय – नई कविता में उदात्त तत्व,निर्देशक – डॉ. एस पी तिवारीसंस्थान: आर एस जी यू पी जी कॉलेज पुखरायाँ, कानपुर, कानपुर विश्व विद्यालय कानपुर ,
वर्ष – 1996
वर्ष 1998
डॉ पुनीत बिसारियाशोध शीर्षक राय कृष्णदास की सौंदर्यशास्त्रीय अवधारणाशोध निर्देशक प्रोफेसर सूर्यप्रसाद दीक्षितवर्ष 1998लखनऊ विश्वविद्यालय
वर्ष 1999
शोधार्थी- राजेश कुमार तिवारी ,विषय- हिन्दी ” बीसवीं शताब्दी के हिन्दी प्रबन्ध काव्यों मे छायावादी अवधारणा” ;निर्देशक- आचार्य सेवक वात्स्यायनविश्वविद्यालय: छत्रपति शाहूजीमहाराज विश्वविद्यालय, कानपुर ;
वर्ष- 1999
वर्ष 2000
जयप्रकाश कर्दमपीच.डी: ‘ श्रीलाल शुक्ल कृत रागदरबारी का समाजशास्त्रीय अध्ययन’. शोध निर्देशक- डॉ. एल.बी.राम अनंत, वर्ष 2000, विश्वविद्यालय: चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ
वर्ष 2001
डॉ मीता शर्माशीर्षक: सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का काव्य, जीवन सत्य और दर्शन ।वर्ष–2001शोध निर्देशक-प्रो.(डॉ.)सुरेन्द्र उपाध्याय
विश्वविद्यालय- राजस्थान विश्वविद्यालय,जयपुर।
गिरधारीलाल जयपालविषय: मेघवंशी समाज के लोकगीतों का सांस्कृतिक अध्ययनशोध निर्देशक -डॅा ० सोहनदान चारणविश्वविद्यालय – जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय,जोधपुर
वर्ष 2001
डॉ मीता शर्माशीर्षक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का काव्य, जीवन सत्य और दर्शन ।वर्ष–2001शोध निर्देशक-प्रो.(डॉ.)सुरेन्द्र उपाध्याय
विश्वविद्यालय- राजस्थान विश्वविद्यालय , जयपुर-
डॉ. गिरीश काशिदनवम दशक के हिंदी उपन्यासों में चित्रित आंचलिक जीवनशोध निर्देशक -डॉ पी. एस. पाटीलवर्ष- 2001शिवाजी विश्वविद्यालय,कोल्हापुर
वर्ष 2002
डॉ हरीश अरोड़ागुरु गोबिंद सिंह के काव्य में राष्ट्रीय अस्मितागाइड : प्रो पूरन चन्द टण्डनवर्ष : 2002विश्वविद्यालय : दिल्ली विश्वविद्यालय
डॉ राकेशनारायण द्विवेदीडॉ राही मासूम रज़ा के उपन्यासो में पात्र परिकल्पना डॉ भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय आगरा 2002शोध निर्देशक डॉ श्याम लाल यादव
बृजेश कुमार पाण्डेयआचार्य नन्ददुलारे बाजपेयी की समीक्षा दृष्टि। गाइड प्रोफेसर रंगनाथ पाठकवर्ष -2002 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी
डॉ प्रमोद कुमारडा.राही मासूम रजा के उपन्यासों में राष्ट्रीय दृष्टिकोण निदेशक: डा.मान्धाताराय वि वि.–वी.ब.सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय,जौनपुर(उ.प्र.)
वर्ष 2002
वर्ष 2003
डॉ बलजीत श्रीवास्तवडॉ सत्येंद्र : व्यक्तित्व और कर्तृत्व निदेशक प्रोफेसर जितेंद्र नाथ पाण्डेय । जमा 27 दिसंबर 2002 उपाधि प्राप्ति 2003। लखनऊ विश्वविद्यालय
डॉ शर्ली बेबीविषय : स्वछन्दतावादी कवि रामनरेश त्रिपाठी: एक विषलेषणात्मक अध्ययननिर्देशक : डॉ. चेरियन जॉर्जवर्ष 2003
विश्वविद्यालय: महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, केरल
शीर्षक-आचार्य तुलसी की काव्य साधनाशोध निर्देशक-डॉ देव कोठारी जनार्दन राय नागर मान्य
विश्वविद्यालय उदयपुर, राजस्थान वर्ष-2003
डॉ राजेन्द्र सिंघवीशीर्षक-आचार्य तुलसी की काव्य साधनाशोध निर्देशक-डॉ देव कोठारी जनार्दनराय नागर मान्य विश्वविद्यालय उदयपुर, राजस्थानवर्ष-2003
निर्देशक: प्रो. तारकनाथ बालीशोधार्थी : चंद्रकला ‘साठोत्तरी हिंदी नाटकों में सामाजिक द्वंद्व’हिंदी विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली2003
वर्ष 2004
रविशंकर प्रताप रावआचार्य केशवदास के काव्य का काव्यशास्त्रीय प्रतिमान निर्देशक डॉ उमा शंकर तिवारी पूर्वांचल विश्व विद्यालय जौनपुर जमा हुआ 20 दिसम्बर 2002 उपाधि मिला जनवरी 2004
डॉ कुमारेन्द्र सिंह सेंगरडाॅ0 वृन्दावनलाल वर्मा के उपन्यासों में अभिव्यक्त सौन्दर्य का अनुशीलनहिन्दी साहित्यगाइड – डाॅ0 दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तववर्ष 2002 में जमा, 2004 में एवार्डबुन्देलखण्ड विवि, झाँसी
वर्ष 2005
डा० चन्द्र शेखर शर्मा
शोध शीर्षक: गिरिराज किशोर के उपन्यासों में युग-चेतना
शोध निर्देशक: डा० रमेश चन्द्र शर्मा
वर्ष:2005
विश्व विद्यालय: डा० भीमराव अम्बेडकर आगरा
डॉ चंदा सोनकरआपताकालोत्तर अस्तित्ववादी हिंदी कहानी का दार्शनिक एवं कलात्मक मूल्यांकनशोध निर्देशक- डॉ सुनीलकुमार लवटे2005
शिवाजी विश्वविद्ययालय, कोल्हापुर
वर्ष 2008
डॉ जितेन्द्र कुमारहिंदी की प्रमुख दलित आत्मकथाएं : एक विश्लेषण”शोध निर्देशक : डॉ. संतोष भादूशोध निर्देशक : डॉ. सन्तोष भदौरिया 2008जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर (म.प्र.)
डॉ अजीत प्रियदर्शीत्रिलोचन की काव्य संवेदना के अंत:स्रोत और उनका कलात्मकविन्यासगाईड :श्री दूधनाथ सिंहइलाहाबाद वि०वि०वर्ष 2008
वर्ष 2009
डॉ परितोष मालवीयशोध शीर्षक – “स्वातंत्रयोत्तर ग़ज़ल में पर्यावरण चेतना”गाइड : डॉ. जी. के. सक्सेनाविश्वविद्यालय : जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियरवर्ष : 2009
डॉ दिग्विजय कुमार शर्मापीएच डी 2009विषय – जैनेन्द्र की नारी दृष्टि: उनके कथा साहित्य के सन्दर्भ में।निर्देशक- डॉ रेखा पतसारिया ।
डॉ भीम राव अम्बेडकर वि वि आगरा।
डॉ विजय महादेव गडेविषय हिन्दी प्रेमकाव्य लेखन परंपरा में नीरज का प्रदेय निर्देशक डॉ राजेन्द्र शाह शिवाजी यूनिवर्सिटी, कोल्हापुर
2009
वर्ष 2010
संतोष येरेवारविषय — शरद जोशी के साहित्य में व्यंग्यविश्वविघालय — स्वामी रामानांद तीर्थ मराठवाडा विश्वविघालयवर्ष — २०१०गाईड का नाम — डाॅ.शोभा देशपांडे
उमेशचन्द्र सिरसवारीविश्वविद्यालय: अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय अलीगढ़।।विषय – हिंदी कविता में स्त्री-विमर्शवर्ष: (१९८०-२०१०)
शोध निर्देशक- प्रो. आरिफ़ नज़ीर
डॉ. सनु तोमस
शोध विषय: विष्णु प्रभाकर के कथा साहित्य में सामाजिक यथार्थ
शोध निदेशिका: डां मिनि जार्ज
महात्मा गांधी विश्वविद्यालय,केरल
वर्ष : 2010
नाम-सत्येन्द्र राय,शोध विषय-औपनिवेशिक शोषण का प्रतिरोध और हिंदी कहानी,शोध-निर्देशक – डॉ. सत्यपाल शर्मा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय,वाराणसी शोध कार्य जारीवर्ष 2010
वर्ष 2011
डॉ आशुतोष त्रिपाठीशोध शीर्षक–समकालीन नाटक और ज्ञानदेव अग्निहोत्री की रचनाधर्मिता,वर्ष–2011,गाइड नाम–डॉ.शिवशंकर त्रिवेदी(से.नि.प्राचार्य,अर्मापुर पी.जी.कॉलेज,कानपुर)वि.वि.–छत्रपति शाहू जी महाराज वि.वि.कानपुर
डॉ. उमा डी. मेहता
पीएच.डी. शोध शीर्षक – ‘वीरेन्द्र जैन के उपन्यासों में युग चेतना’शोध निर्देशक – डॉ. एस. डी. भाभोरवर्ष – दिसम्बर 2011
विश्वविद्यालय – सौराष्ट्र युनिवर्सिटी ,राजकोट, (गुजरात )
वर्ष 2012
डॉ धर्मेन्द्र प्रताप सिंहनव औपनिवेशिकरण के परिपेक्ष्य में उदय प्रकाश के साहित्य का मूल्यांकनगाइड डॉ कैलाशदेवी सिंह 2012लखनऊ विश्वविद्यालय
डॉ महेंद्र प्रसाद कुशवाहाविषय-रामस्वरूप चतुर्वेदी का आलोचना-कर्मशोध निर्देशक-डॉ0 शेष आनंद मधुकरविश्वविद्यालय-विनोबा भावे विश्वविद्यालय,हजारीबाग,झारखण्ड
वर्ष:2012
डॉ. राम भरोसेशीर्षक – दलित चेतना के संदर्भ में प्रेमचंद के साहित्य का अनुशीलननिर्देशन- प्रो. भगवान देव पाण्डेयविश्विद्यालय- गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार
वर्ष 2012
डॉ महेंद्र प्रसाद कुशवाहाविषय-रामस्वरूप चतुर्वेदी का आलोचना-कर्मशोध निर्देशक-डॉ0 शेष आनंद मधुकरविश्वविद्यालय-विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग,झारखण्ड
2012
वर्ष 2014
समीर कुमार पाठकशोधार्थी(स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग) जयप्रकाश विवि,छपरा, बिहारशीर्षक- “हिन्दी की प्रगतिशील काव्य परम्परा और नागार्जुन”प्रवेश वर्ष- २०१४निर्देशक- डाॅ0 सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ( एसोसिएट प्रोफेसर) शोधकार्य अभी चल रहा है|
हुकुम सिंहशोध विषय:कामायनी में मानवाधिकारों का विश्लेषण : प्राचीन एवं नवीन संदर्भनिर्देशक : डॉ पुनीत बिसारियावर्ष 2014विश्वविद्यालय: बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी
डॉ. प्रदीप कुमार शर्माविषय – हिंदी साहित्य (समकालीन हिंदी काव्य के परिप्रेक्ष्य में प्रमोद वर्मा की कविताओं का अनुशीलन)निर्देशक – डॉ. श्रीमती वंदना कुमार
वर्ष: 2014 पं. रविशंकर शुक्ल व विश्वविद्यालय, रायपुर
चन्दन चौधरी विषय नयी कविता के प्रवर्तन में अज्ञेय एवं मुक्तिबोध की भूमिका निर्देशक प्रोफेसर हरिशंकर मिश्र लखनऊ विश्वविद्यालय
वर्ष 2014
शोधार्थी- डॉ विजेन्द्र प्रताप सिंह
शोध विषय- हिंदी तथा ओड़िया का व्यतिरेकी विश्लेषण
शोध निर्देशक,- डॉ सुधीर शर्मा
शोध संस्थान- दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबादवर्ष 2014
शोधार्थी : सिराज
शोध विषय : समकालीन हिंदी कहानी में मुस्लिम नारी विद्रोह
शोध निर्देशक : डॉ.जी.वी रत्नाकर
विश्वविद्यालय : मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद
वर्ष : 2014
डा सविता टाकप्रेमचन्द के नारी पात्रों का जीवन मूल्यों के आलोक मे एक अध्ययन”महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय , अजमेरशोध निर्देशिका-डा विमला सिंहल
वर्ष- 2014
नाम- शबनम तब्बसुम
शोध निर्देशिका- डॉ नाज़िश बेगम पंजीयन – 6.02.2014.टॉपिक – “स्वातंत्र्योत्तर भारत में ग्रामीण जनजीवन की बदलती स्थितियां और रेणु का कथा – साहित्य”
हिंदी विभाग, अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ, उत्तर प्रदेश
मो रियाज़ खान (Mohd Riyaz Khan)
हिंदी पीएचडी विषय: राजेश जोशी के काव्यों में समसामयिक समस्याएं।
निर्देशक: डॉ नीता हिरेमठ एवं डॉ इस्फाक अली।
-दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास। बैंगलोर
वर्ष 2014
वर्ष 2015
श्वेता रिछारियाशोध विषय: उत्तर छायावादी काव्य धारा के परिप्रेक्ष्य में बच्चन का काव्यनिर्देशक : डॉ पुनीत बिसारियावर्ष 2015विश्वविद्यालय: बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी
डॉ.पुखराज जयपालविषयः हिन्दी-परचई काव्यःपरम्परा और मूल्यांकननिर्देशक -विभागाध्यक्ष एवं प्रो.डॉ.देवेन्द्र कुमार सिंह गौतमपीएच.डी. सन्-2010-2015विश्वविद्यालय:जयनारायण व्यास वि.वि.जोधपुर ,राजस्थान
डॉ जय शंकर तिवारीशोध- विषय : विभूति नारायण राय का रचना संसार :एक अनुशीलनशोध निर्देशक- डॉ सुरेन्द्र नारायण सक्सेनाविश्वविद्यालय: बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी
वर्ष: 2015
तरुणा दाधीचशोध विषय – डॉ.बालशौरी रोड्डी के उपन्यासों में चित्रित समाज ‘शोध निर्देशिका – डॉ. गीता कपिल विश्वविद्यालय – बनस्थली यूनिवर्सिटी, टोंक, राजस्थान
वर्ष -2015
वर्ष 2016
डा० सन्तोष कुमार पान्डेय पी एच० डी० शोध शीर्षक ” श्रीलाल शुक्ल का लेखन : स्वातन्त्र्योत्तर यथार्थ का अन्वेषण” 2016 फरवरी, जे० एन० यू ० नई दिल्ली से । शोध निर्देशक प्रारम्भ में डा० पुरुषोत्तम अग्रवाल । इनके सेवा से अलग हो जाने के कारण जमा किया डा० ओम प्रकाश सिंह के निर्देशन में।
डॉ. दयारामविषय: रामदरश मिश्र के काव्य मे यथार्थ के विविध आयामशोध निर्देशक: डॉ. अन्नाराम शर्मावर्ष: 2016
विषय: महाराजा गंगासिह विश्वविद्यालय बीकानेर राजस्थान
मोनिका देवीविषय: अंतिम दशक की कहानियों में वैचारिक संघर्षशोध निर्देशिका: डॉ आर, इंदिरा शांताविश्वविद्यालय :ओस्मानिया विश्वविद्यालय हैदराबादवर्ष 2016
वर्तमान में जारी
सुनील कुमारमेरा शोध शीर्षक : सरोकारों के सन्दर्भ में महिला उपन्यास लेखन (कृष्णा सोबती, मृदुला गर्ग और मधु कांकरिया)मेरे शोध निदेशक का नाम : डॉ. ओम प्रकाश नारायण द्विवेदीवर्ष : शोध जारी 2017 में पूर्ण होना सम्भावित।विश्वविद्यालय : जम्मू विश्वविद्यालय, जम्मू।
नरेन्द्र पाटीलशीर्षक- “हिंदी के प्रमुख समीक्षकों की आत्मकथाओं का अनुशीलन” (रामविलास शर्मा, रामदरश मिश्र,विश्वनाथ त्रिपाठी और डॉ देवेश ठाकुर के सम्बन्ध में)शोध निर्देशक- डॉ मोहसिन ख़ानविश्वविद्यालय: मुम्बई विश्वविद्यालय, मुम्बई।
उदयप्रताप सिंह”वैश्वीकरण का समय और 21वीं सदी के हिन्दी कथा साहित्य में हाशिए का समाज”निर्देशक डॉ बृजेश कुमार पाण्डेयबुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी
शोध जारी
* हिंदी भाषा में विज्ञान के क्षेत्र में हुए शोध* हिंदी भाषा में कला के क्षेत्र में हुए शोध* हिंदी भाषा में तकनीकि के क्षेत्र में हुए शोध* हिंदी भाषा में इतिहास के क्षेत्र में हुए शोध* हिंदी भाषा में राजनीतिक विज्ञान के क्षेत्र में हुए शोध* हिंदी भाषा में मिडिया के क्षेत्र में हुए शोध* हिंदी भाषा में शिक्षा शास्त्र के क्षेत्र में हुए शोध
आप ऊपर दिए गए प्रारूप के अनुसार शोध की जानकारी puneetbisaria8@gmail.com एवं vishwahindijan@gmail.com, पर मेल करें. आप अपने संस्थान से हिंदी भाषा में हुए शोध की सूची भेज सकते हैं.
संकलन: डॉ. पुनीत बिसारिया
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हिंदी शिक्षण में रचनात्मकता : नवीन अनुप्रयोग

हिंदी शिक्षण में रचनात्मकता : नवीन अनुप्रयोग
अनुक्रम
लेखक –मनीष खारी
ईमेल manishkharibnps@gmail.com
सार – पहली भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण से जुडी स्थितियों पर दृष्टि डालते हुए यहाँ हिंदी भाषा शिक्षण से जुड़ी समस्यायों को देखने का प्रयास किया गया है | यह लेख भाषा सीखने की जरुरत स्थापित करने की बात से आरम्भ कर पढने – पढ़ाने के रचनात्मक तरीकों को रखता है | रचनात्मक और गतिविधि शब्दों को समझने से लेकर रचनात्मक भाषा कक्षा के आयाम और गतिविधियों के उदहारण सामने रखता है |
भाषा शिक्षण अधिगम : सामान्य स्थिति –
तर्क आधारित समझ के बूते ये बात जानी जा सकती है कि कुछ भी सीखने के लिए भीतर से सीखने की जरुरत होना आवश्यक है | बिन प्यास तो अमृत भी बेकार है फिर पीया भी क्यूँ जाये जब प्यास न हो | सीखने के सिद्धांत भी सीखने के लिए तत्पर (law of readiness by thorndike )[1] होने की बात कहते आये है | पियाजे प्रदत संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत भी किसी विचार या क्रिया के सीखने से पहले उससे सम्बंधित मानसिक असंतुलन होने को आवश्यक कहता है तभी सीखने वाला संतुलन प्राप्त करने के लिए अग्रसर होगा और सीखने की क्रिया होगी | ये समझ भाषा शिक्षण पर भी लागू होती है | हिंदी प्रथम भाषा के रूप में पढाई जाती है | बच्चे विद्यालय आने से पूर्व ही काफी कुछ इसपर महारत ले चुके होते है | वेन्द्रिय के शब्दों में कहें तो “भाषा एक तरह का संकेत है | संकेत से आशय उन प्रतीकों से है जिनके द्वारा मानव अपने विचार दूसरों पर प्रकट करता है | ” संकेतों की यह व्यवस्था पूर्णतः यादृच्छिक है / मानवनिर्मित है यही से भाषा का सामाजिक स्वरुप प्रकट होता है | प्रत्येक बालक में जन्मजात किसी भी भाषा को सीखने और प्रयोग करने की शारीरिक और संज्ञानात्मक क्षमता मौजूद रहती है |” अपनी बात मनवाना , घटनाओं में अतिरिक्त विवरण जोडकर कहना , कहानियां गढ़ना , स्पष्टीकरण देना इत्यादि मौखिक क्रियाएँ साफ़ तौर पर बच्चे की मानसिक रूप से भाषा पर पकड़ को सिद्ध करती है | गौरतलब है कि ऐसी क्रियाओं को कर पाने वाले हजारों बच्चे पढने और लिखने की बेसिक क्षमताओं से जूझते रहते है और नही भी सीख पाते (ASAR REPORT 2106[2] ) | तो ऐसी स्थिति और और आंकड़े इस कारन से भी है कि संभव है कि हम बच्चे की जरुरत और स्तर के अनुरूप नही पढ़ा पा रहे | अगर जो हम पढ़ा रहे है और जो बच्चों की जररत भी है तो फिर परिणाम सफल होते | किन्तु हिंदी के समबन्ध में आंकड़े तो क्या रुझान की भारी कमी भी कुछ और ही कहती है | यह परचा पहली भाषा शिक्षण के रूप में हिंदी कक्षाओं की दयनीय और उबाऊ स्थिति (आंकड़ों से प्रदर्शित व् अपने शिक्षण कार्यकाल के दौरान स्वं अनुभव की गई ) को रचनात्मकता के दृष्टिकोण से देखने का प्रयास है | परिणाम ठीक न होना प्रमाण है कि कक्षाओं में जो हो रहा है उसपर नवीन दृष्टि डालने की जरुरत है | आवश्यकता की बेसिक थ्योरी से देखें तो अमूमन बच्चे हिंदी कक्षाओं में ऊब जाते है | कदाचित वे ठीक भी है कि उन्हें उतनी हिंदी आती है जितनी उन्हें जरुरत है फिर वे क्यों हिंदी पढ़ें ? और सिर्फ लिखकर ही क्यों सबकुछ करे ? हिंदी कक्षा का क्या प्रयोजन है ? सोचने का विषय है कि यदि सीखने वाले की रूचि और जरुरत के अनुसार उन्हें कक्षा में कुछ न मिले तो वे ऊब ही जायेंगे | हमारी शिक्षा का ये चिंतन योग्य पक्ष और भी शोचनीय हो जाता है जब बी एड कार्यक्रम में इंटर्नशिप के दौरान शिक्षक – छात्र भी कक्षा में इसी समस्या से जूझते है जहाँकि उनसे अपेक्षित है कि वे बच्चों को रचनात्मक रूप से संलग्न करें | बच्चों की जरुरत को समझते हुए रचनात्मक शिक्षण युक्तियों की बात उठती आवश्य है किन्तु ऐसी पुस्तके भी नाममात्र के लिए है जो हिंदी शिक्षण के रचनात्मक और नए तरीकों पर बात करती हो | देखा जाये तो एक कक्षा में देखकर ,सुनकर ,करके सीखने वाले यानि हर तरह के विद्यार्थी होते है तो फिर हम जब हर बात केवल बोलकर बताने और लिखकर सीख लेने की उम्मीद करते है तो निश्चित रूप से यह नाकाफी है | इन्ही सवालों पर अनुचिंतन करते हुए हिंदी शिक्षण में गतिविधियों को जानने ,समझने की जरुरत पड़ती है | भाषा में रचनात्मकता को समझते हुए ये तय कर पाना भी आवश्यक है कि क्या कुछ गतिविधियाँ करा लेना ,बच्चों से बुलवा देना ही रचनात्मकता है ? क्या रचनात्मकता याद करके कुछ करवा पाना है ? गतिविधियों से होने वाले कक्षा chaos के बीच कौनसे उद्देश्य पूरे हो रहे है और हमारी कितनी आस्था है इनपर ? बच्चों से भरे भारतीय कक्षाओं में रचनात्मक गतिविधियों की बात पर अध्यापक क्यों विवशता व् तनाव अनुभव करते है ? ऐसे प्रश्नों के लिए यह परचा एक दृष्टिकोण देने का प्रयास है | रचनात्मकता अर्थात सृजन कर पाने की क्षमता | भाषा एक कौशलों से युक्त कला है | भाषा शिक्षण का उद्देशय भी है कि सृजन शीलता बढे | भाषा मात्र कौशलों और उनके द्वारा भाषा – उत्पादन का विषय नही है अपितु यह अर्जन और उससे नवीन सृजन का की कला है | अतः भाषा शिक्षण को यांत्रिकता ( औपचारिकता से याद करना ,लिखकर दिखाना ) से बचाना चाहिए | बच्चों में रचनात्मकता या उनके साथ रचनात्मक शिक्षण के लिए शिक्षक के भीतर यह समझ आवश्यक है कि वह बच्चों के सीखने के जरुरत और तरीकों की पहचान कर पाए और गतिविधियाँ सृजन की समझ रखता हो | शिक्षक शिक्षा में क्या होता है और क्या स्कोप है के क्षेत्र में न जाकर यहाँ हम हिंदी शिक्षण के सन्दर्भ में ही कुछ गतिविधियाँ देखेंगे |
रचनात्मकता की संकल्पना और भाषा –
रचनात्मक सोच पाना अर्थात आवश्यकता अनुसार हम गतिविधियां स्वम गढ़ सकें क्योकि सीख ली गई गतिविधियां भी पर्याप्त नही हो ; यही कक्षा परिदृश्य की चुनौती भी है | जिसके लिए गतिविधि को भी समझने की जरुरत है | बच्चों के सीखने के तरीकों की पहचान ,गतिविधि को समझना , खुद गतिविधि करना ,गतिविधियों का निर्माण करना और फिर एक गतिविधि भंडार विकसित करने की तरफ बढ़ाने के उद्देश्यों के साथ यह परचा अपना विस्तार देखता है |बहुत साधारण और निजी समझ के अनुसार गतिविधि यानि जहाँ मानसिक ,शारीरिक ,भावनात्मक गति ,संलग्नता हो | ऐसी संलग्नता होगी तभी जब सीखने वालों की जरूरतों के अनुसार सिखाने की विधि में स्कोप हो | जब ऐसे सोच के साथ तरीके निकले जायेंगे तो यही रचात्मक गतिविधि है | भाषा शिक्षण की पूर्णता के लिए सीखने वाले छात्र / बच्चे को शिक्षण प्रक्रिया में उसका सहभागी बनाना चाहिए | उसकी भाषा सीखने की जिम्मेदारी उसकी होनी चाहिए | परिवार व् अध्यापक इस प्रक्रिया में आवश्यक व् अन्य भगीदार के रूप में होने चाहिए | ( ब्रायन कैम्बोर्न) अधिगमकर्ता अनुमानात्मक कौशल के आधार पर भाषा सीखने की प्रक्रिया में जुड़े ,ये सुनिश्चित करना आवश्यक है |इसलिए रचनात्मक गतिविधियाँ स्पष्ट रूप से सिखाने की विधियों में बच्चों की भूमिका को बढ़ाते जाने का गुण तो रखेंगी है साथ ही अध्यापक द्वारा सहयोग और स्पष्ट निर्देशों वाली योजना की मांग करती है | गतिविधियाँ सृजन व् उपयोग के लिए विषयवस्तु की प्रकृति को ध्यान में रखना भी एक बात है | गद्य ,पद्य ,व्याकरण के लिए एक ही तरह की गतिविधियाँ हुई तो निश्चित रूप से रचनात्मकता स्वं ही गौण हो सकती है | १. उदहारण के लिए – संज्ञा सिखाने के लिए नाम ,वस्तु ,स्थान ,भाव का खेल एक मनोरंजनात्मक तरीका है | हालांकि इसकी सफलता इसकी सटीक योजना पर टिकी है कि खेल के निर्देश क्या होंगे , कब संकल्पना को मौखिक रूप से बच्चे गतिविधी के दौरान सीखेंगे फिर अंत में संकल्पना की निजी समझ लिखना और कक्षा की साझी परिभाषा तक पहुंचना जिसमे सीखने वालों के संदेहों , प्रश्नों को हल करना /करवाना कैसे – कैसे हो | रचनात्मक भाषा शिक्षण कक्षा को समग्रता में देखा जाये तो इसके कई आयाम हो सकते है –
१.भित्ति प्रिंट – समृद्ध वातावरण (कक्षा में चल रहे कार्यों या अन्य से जुड़ा लेखन और चित्र बनाने से जुड़े चार्ट )
२. भाषा के विविध उपयोगों को सुनना व् देखना (रेडियो सुनना ,अख़बार का कोई संदर्भानुकूल हिस्सा साझे रूप से पढना इत्यादि )
३. कभी – कभी निजी जीवन से जुडी बातचीत और अनुभव साझा करने के लिए स्थान व् समय होना
४. कक्षा में दैनिक रूप से कोई आवश्यक सन्देश व् सूचना लेखन (पहले अध्यापक फिर विद्यार्थियों द्वारा या फिर आज की कक्षा में क्या क्या करना है लिखना पट पर इत्यादि )
५.. लिखित सामग्री का कोना और उसे देखने व् उसके साथ संलग्नता केलिए सप्ताह में एक या बार का नियत समय जो हिंदी कक्षा में से लिया जा सकताहै (जो और जितनी किताबे हो सकें ,रोज़ का अख़बार ,कोई पत्रिका घर में जिसका उपयोग न हो यहाँ लाकर रखी जा सकती है बच्चे योगदान दे जैसा भी हो )
६. कहानी सुनाने और नाटक खेलने की आदत और जगह (सप्ताह ,पन्द्रह दिन या महीने में इसमें से कुछ किया जा सकता है )
७ . विषयवस्तु से जुडी गतिविधियाँ और उनके बाद के काम की योजना (जिससे कक्षा में वाले संगठित रूप से विषयवस्तु भी आगे बढ़े )
८. कक्षा में जो काम मौखिक व् लिखित हो उनकी सन्दर्भ सहित आवश्यकता भी स्थापित हो और सीखने वालों का भी निर्णय लेने में हिस्सा हो
९. आंकलन की विधियाँ भी इसके अनुरूप होना अति आवश्यक है हालांकि यह परचा इस क्षेत्र पर केंद्र नही करता अत यहाँ इनकी विवरण सहित चर्चा नही है
१० अति आवश्यक रूप से लेखन कार्य के दौरान विषय चयन में सीखने वालों की भागीदारी ,लिखने का ऑथेंटिक उद्देश्य होना साथ ही लेखन से पूर्व मस्तिष्क उद्वेलन ( विषय से जुड़े विचार साझा करना या तस्वीरे उकेरना या कुछ पढना ) से सम्बंधित विषय को स्थापित करना लिखने वाले को विषय से जोड़ता है | लेखन के समय शिक्षक भी अवश्य अपना लेख लिखे और साझा करे (इस तरह से लेखन कौशल से जूझने वाले विद्यार्थी सहयोग और रुझान ले पाएंगे जैसे कि भीड़ भरी मेट्रो यात्रा के बारे में लिखने से पहले सोचना और बात करना कि इससे जुड़े अनुभव क्या – क्या है ?इसमें क्या क्या विचार हो सकते है ? इत्यादि )
इन सभी आयामों का एक साथ होना जरुरी नही किन्तु इनमे से चुनाव करके रचनात्मक शिक्षण की समग्रता की तरफ बढ़ा जा सकता है | रचनात्मक कक्षा कोई याद करके किये जाने वाले कार्यों का समुच्चय नही हो सकता अपितु नित नयी सम्भावनाये तलाशने का नाम है | उपर्युक्त आयामों में से रचनात्मक कक्षा जो अपने हर तरह के विद्यार्थी के लिए कुछ न कुछ अवसर देती हो की झलक अवश्य मिल सकती है | इन आयामों को आगे और समझने केलिए हम कुछ गतिविधियों के उदहारण लेंगे और चर्चा करेंगे |
जैसा कि हम रचनात्मक भाषा शिक्षण की बात करते हुए आयामों को देख रहे थे उसी में से प्रिंट को लें तो – सीखी जाने वाली भाषा में “भाषा से घिराव वाला वातावरण”, “अपने सीखने की जिम्मेदारी स्वं लेना” इत्यादि (7 conditions of language learning by brian cambourn )[3] को मद्देनज़र रखते हुए बात करें तो रचनात्मक भाषा शिक्षण गतिविधियों में कक्षा का प्रिंट अति महत्वपूर्ण है | गतिविधि की और सब खत्म ऐसा न हो और गतिविधियों पर काम होता रहे इसके लिए प्रिंट बहुत बड़ी भूमिका निभा सकता है | जीवंत प्रिंट के साथ बच्चे संलग्न रहते है और उनकी सीखने की क्रिया चलती रहती है | २. उदहारण के लिए – विशेषण सिखाने के दौरान कक्षा में एक चार्ट लगा सकते है जिसमे सप्ताह के नाम से विशेषण जोड़ें और फिर उससे सम्बंधित घटना ,अनुभव लिखे
| विशेषण | सप्ताह का दिन | |
| शरारती | सोमवार | क्या हुई शरारत तुम्हारे साथ ? / जब की मैंने शरारत ? / शरारत से जुड़े अन्य शब्द इत्यादि |
| मजेदार /
मुहावरेदार |
मंगलवार | मज़ा बहुत आया जब तुमको ….
आज की मजेदार बात … मुहावरे में करे मजेदार बात …….. |
| …………………………… | बुधवार |
इस प्रकार से अनेकों बच्चों को संलग्न करने वाला प्रिंट उपयोग में लाया जा सकता है | ३. उदाहरन पढ़ी गई किसी कविता को आगे बढ़ना , उसमे चित्र बनाना जैसे काम बच्चों को भाषा में सृजनात्मक रूप से संलग्न कर सकते है| छात्र / छात्राएं अक्सर विषयवस्तु और अवसर अनुकूल भाषा न बोल पाने (अभिव्यक्ति में कमतर ) से जूझते है | कक्षा में १५ से २० मिनट की एक श्रवण गतिविधि का उपयोग इसमें प्रभावशाली सिध्ध हो सकती है | ४. उदाहरन भाषा को विविधता से अनुभव कराने के लिए कक्षा में फ़ोन या रेडियो जो भी हो पर कोई बातचीत , समाचार , वाद – विवाद, कोई वर्णन ,कहानी , साक्षात्कार इत्यादि को सुना जा सकता है और इनकी भाषा में क्या फर्क है ? पर चर्चा करके मौखिक भाषा उपयोग में विविधता के जीवंत अनुभव द्वारा सुनने , बोलने के कौशलों पर काम किया जा सकता है | कक्षा में भाषा के जिस प्रकार के उपयोग को हम सीखना चाहे उसे सुन सकते है यह प्राथमिक कार्य किया जा सकता है | इसी तर्ज़ पर कुछ और रचनात्मक गतिविधियाँ सुझाई जा रही है –
| विषयवस्तु / उद्देश्य | गतिविधि | ध्यान रखने योग्य बिंदु |
| कहानी – शिक्षण | कुछ स्थितियां दर्शाने वाले चित्र लेकर, उनको आपस में जोड़ते हुए उनपर कहानी बनाना
कहानी को पढने से पहले कहानी के मूल विचार को लेकर विद्यार्थियों से अनुभव या उनकी समझ लेना , अनुमान लगाते हुए शीर्षक की व्याख्या करना चित्र देखकर अनुमान लगाना कहानी में दिए हुए या न भी हो तो google से सम्बंधित चित्र लेकर चित्रों की प्रतियाँ करके कक्षा में लगाना और उन्ही से कहानी को समझना फिर अंशों में कहानी पढना |
इसमें एक जैसे चित्रों से अलग अलग कहानियां मिल सकती है जो रचनाशीलता को सबल करेंगी
किसी कहानी का मूल विचार जैसे – शरारत या फिर कठिन काम करने का साहस इत्यादि को ठीक से पकड़ना होगा तभी उससे सम्बंधित स्थिति को लेकर सटीक और अर्थपूर्ण बात हो सकती है | ऐसी बात से कहानी को समझने में सहायता हो जाती है क्योकि पढने से पहले सम्बंधित मानसिक क्षमता और विचार जागृत हो जाते है | |
| कविता – शिक्षण | १.पढ़ी जाने वाली कविता को अंशों में बांटकर स्लिप्स बनाकर समूह में देना , विद्यार्थी उसे अपने अनुसार एक क्रम देंगे अर्थपूर्ण हो
सभी समूहों की कविता सुने और इसी क्रम में लगाने की प्रक्रिया और कारन पर बात करें ; इसी में अर्थ भी प्रकट होगा | २. कविता को पूरा पढना ,फिर अंशों में रुक – रुक कर पढना और जो भी चित्र दिमाग में बने उन्हें उकेरना कक्षा में श्याम/ श्वेत पट पर सामूहिक रूप से कर सकते है या सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से भी .. फिर उकेरे हुए चित्र या चित्रों को देखते हुए सामूहिक चर्चा – कविता की मूल बात क्या हो सकती है ? सहायक विचार क्या क्या है ? |
इसमें मूल कविता विद्यार्थियों ने न देखि पढ़ी हो |
क्रम की नवीनता से बनी कविताओं को सही गलत की भावना से परे रखकर कक्षा में सुने व् अर्थ पर बात करें इस गतिविधि में कविता पढना मूल क्रिया है लगभग पूरी कक्षा के दौरान हर सहभागी और अध्यापक कविता को पढ़ते रहेंगे | जिनको चित्र बनाने में सुविधा न हो वे भी सामूहिक रूप से कुछ योगदान दे पाएं ऐसा अवसर मुहैया कराएँ बने हुए चित्र पर किसी ऐसे व्यक्ति की प्रतिक्रिया ले सकते है जो गतिविधि में न हो जिसने कविता न सुनी और और फिर उससे सुनना कि इससे क्या लगता है कि कविता किस बारे में है ? ( एक मजेदार काम होगा प्रतिक्रिया सुनना ) |
निष्कर्ष – पहली भाषा में रचनात्मक शिक्षण की युक्तियाँ उबाऊपन से निजात दिलाने के साथ – साथ समग्रता से भाषा के कौशलों सुनना ,बोलना , पढना ,लिखना को भी संबोधित कर सकती है | सुनने – बोलने के कौशलों में विद्यार्थी यूँ भी काफी अनुभव रखते है इसलिए इसमें उन्हें उच्च स्तरीय चुनौतियां देने के साथ ही पढने और लिखने में गहन संलग्नता सुनिश्चित करने में चिंतन और सृजन की काफी गुंजाइश है जिसका एक सूक्ष्म प्रयास यहाँ किया गया है |
सन्दर्भ पुस्तकें –
- https://archive.org/stream/science71898mich#page/818/mode/2up ↑
- The eleventh Annual Status of Education Report (ASER 2016) was released in New Delhi, 18 January 2017 ↑
- Cambourne, Brian. (1995) “Toward An Educationally Relevant Theory Of Literacy Learning: Twenty Years Of Inquiry”. The Reading Teacher, Vol. 49, No. 3. ↑
हिंदी विभाग, बीएनएमयू (मधेपुरा)
सामग्री साभार: अजय आनंद, सहायक प्राध्यापक
हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय
एम.ए. हिंदी पाठ्यक्रम
| सत्र | प्रश्न पत्र शीर्षक | |
| प्रथम सत्र | 101- हिंदी साहित्य का इतिहास (आदिकाल से रीतिकाल तक) | |
| 102- आदिकालीन हिंदी काव्य | ||
| 103- भक्तिकालीन हिंदी काव्य | ||
| 104- हिंदी कथा साहित्य | ||
| 105- भारतीय काव्यशास्त्र | ||
| द्वितीय सत्र | 201- रीतिकालीन हिंदी काव्य | |
| 202- आधुनिक हिंदी काव्य-1 | ||
| 203- हिंदी नाटक | ||
| 204- सामान्य भाषाविज्ञान | ||
| तृतीय सत्र | 301- आधुनिक हिंदी काव्य- 2 | |
| 302- हिंदी आलोचना | ||
| 303- हिंदी के अनेक गद्य रूप | ||
| 304- हिंदी साहित्य का इतिहास (आधुनिक काल) | ||
| 305- पाश्चात्य काव्यशास्त्र | ||
| 202- आधुनिक हिंदी काव्य-1 | ||
| 203- हिंदी नाटक | ||
| 204- सामान्य भाषाविज्ञान |
प्रथम सत्र [प्रश्न पत्र- 1] [101- हिंदी साहित्य का इतिहास (आदिकाल से रीतिकाल तक)]
इकाई – 1: इतिहास-दर्शन
इतिहास और आलोचना, इतिहास और अनुसंधन
साहित्येतिहास-दर्शन के समकालीन सिद्धान्त
साहित्येतिहास-लेखन की प्रमुख अवधरणाएँ: मध्ययुगीनता, पुनर्जागरण और आधुनिकता
हिंदी साहित्य के इतिहासों का इतिहास
काल-विभाजन और उसकी समस्याएँ
इकाई – 2: आदिकाल
नामकरण की समस्या, पृष्ठभूमि: विभिन्न परिस्थितियाँ
रासोकाव्य-परंपरा, प्रमुख प्रवृत्तियाँ
प्रमुख कवि (चंदबरदाई, जगनिक, अमीर खुसरो, विद्यापति)
इकाई – 3: भक्तिकाल
पृष्ठभूमि एवं प्रवृत्तियाँ
प्रमुख एवं गौण कवि तथा उनका काव्य (कबीर, रविदास, दादू, सुंदरदास, कुतुबन, मंझन, जायसी,
तुलसीदास, सूरदास, नंददास )
निर्गुण एवं सगुण काव्यधराएँ: प्रमुख विशेषताएँ
इकाई – 4: रीतिकाल
नामकरण की समस्या
पृष्ठभूमि एवं प्रवृत्तियाँ
प्रमुख एवं गौण कवि तथा उनका काव्य (केशव, बिहारी, देव, मतिराम, घनानंद, बोध, आलम, ठाकुर,
गुरुगोविंद सिंह, रज्जब)
रीतिबद्ध और रीतिमुक्त काव्यधराओं की विभेदक विशेषताएँ
प्रस्तावित पुस्तकें-
हिंदी साहित्य का इतिहास: रामचंद्र शुक्ल
हिंदी साहित्य की भूमिका: हजारीप्रसाद द्विवेदी
रीतिकाव्य की भूमिका: डॉ. नागेंद्र
हिंदी साहित्य का इतिहास: संपादक डॉ. नागेंद्र
साहित्य का इतिहास दर्शन: नलिन विलोचन शर्मा
हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास: रामकुमार वर्मा
अन्य सहायक पुस्तकें
साहित्य और इतिहास दृष्टि: मैनेजर पाण्डेय
मध्यकालीन बोध् का स्वरूप: हजारीप्रसाद द्विवेदी
हिंदी साहित्य का अतीत (भाग 1, 2): विश्वनाथ प्रसाद मिश्र
हिंदी साहित्य का इतिहास: पूरनचंद टंडन, विनीता कुमारी
अप्रभ्रंश साहित्य: हरिवंश कोछड़
आदिकालीन हिंदी साहित्य की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि: राममूर्ति त्रिपाठी
हिंदी साहित्य के इतिहास पर कुछ नोट्स: रसाल सिंह
प्रथम सत्र [प्रश्न पत्र- 2] [102- आदिकालीन हिंदी काव्य]
इकाई 1: दोहाकोश: (सं.) राहुल सांकृत्यायन
षड्दर्शन खंडन-ब्राह्मण: दोहा 1, 2
करुणा सहित भावना: दोहा-17
चित्त: दोहा-24, 25
सहज, महासुख: दोहा-42, 43, 44
परमपद: 49
देह ही तीर्थ: 96
(कुल: 10)
इकाई 2; गोरखबानी: (सं) पीतांबरदत्त बड़थ्वाल
पद-1 से 20 तक
इकाई 3: पृथ्वीराज रासो: (सं) माता प्रसाद गुप्त
कयमासवध् (संपूर्ण)
इकाई 4: विद्यापति की पदावली: (सं) रामवृक्ष बेनीपुरी
पद: 1, 2, 5, 10, 18, 23, 27, 29, 36, 42 (कुल;10 पद)
प्रस्तावित पुस्तकें
हिंदी साहित्य का आदिकाल: हजारी प्रसाद द्विवेदी
नाथ संप्रदाय: हजारीप्रसाद द्विवेदी
हिंदी के विकास मे अपभ्रंश का योग: नामवर सिंह
पृथ्वीराज रासो की भाषा: नामवर सिंह
अन्य सहायक पुस्तकें
प्राकृत-अपभ्रंश साहित्य और उसका हिंदी पर प्रभाव: राम सिंह तोमर
अपभ्रंश भाषा और साहित्य: राजमणि शर्मा
आदिकालीन हिंदी साहित्य: अध्ययन की दिशाएँ: अनिल राय
गोरखनाथ और उनका युग: रांगेय राघव
प्रथम सत्र [प्रश्न पत्र- 3] [103- [भक्तिकालीन हिंदी काव्य]
इकाई – 1: कबीर
पद स संख्या: 35, 108, 112, 123, 126, 134, 153, 168, 181, 206, 250 (कुल 11)
साखी स संख्या: 103, 113, 139, 157, 190, 191, 199, 200, 201, 231, 237 (कुल 11)
इकाई – 2: जायसी
जायसी-ग्रंथावली: रामचन्द्र शुक्ल (सं.)
नागमती वियोग खंड
इकाई – 3: सूरदास
भ्रमरगीतसार: रामचन्द्र शुक्ल (सं.)
पद संख्या: 3, 4, 7, 9, 11, 16, 18, 21, 22, 24, 30, 34, 37, 42, 45, 52, 62, 75, 85, 100,
125, 133 (कुल 22)
इकाई – 4: तुलसीदास
विनय पत्रिका: (सं.) वियोगी हरि
पद स संख्या: 90, 101, 102, 105, 111, 112, 115, 116, 117, 119, 120, 121, 123, 124, 162,
167, 172, 174, 198, 201 (कुल 20)
प्रस्तावित पुस्तकें
गोस्वामी तुलसीदास: रामचंद्र शुक्ल
तुलसी आधुनिक वातायन से: रमेश कुंतल मेघ
लोकवादी तुलसीदास: विश्वनाथ त्रिपाठी
तुलसी काव्य-मीमांसा: उदयभानु सिंह
गोसाईं तुलसीदास: विश्वनाथ प्रसाद मिश्र
सूर साहित्य: हजारी प्रसाद द्विवेदी
अन्य सहायक पुस्तकें
महाकवि सूरदास: नंद दुलारे वाजपेयी
सूर और उनका साहित्य: हरवंशलाल शर्मा
कबीर की विचारधरा: गोविंद त्रिगुणायत
हिंदी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, एम.ए. (हिंदी) पाठ्यक्रम
एम. ए. (हिंदी) पाठ्यक्रम
पाठ्यक्रमों का सत्रानुसार विवरण
एम0 ए0 (हिंदी) प्रथम वर्ष
पहला सत्र (पावस सत्र)
पहला प्रश्नपत्र – छायावादी काव्य
दूसरा प्रश्नपत्र – निबंध और नाटक
तीसरा प्रश्नपत्र – भाषा विज्ञान एवं हिंदी भाषा
चैथा प्रश्नपत्र – हिंदी साहित्य का इतिहास (आरंभ से रीतिकाल तक)
दूसरा सत्र (शीतकालीन सत्र)
पांचवाँ प्रश्नपत्र – छायावादोत्तर काव्य
छठा प्रश्नपत्र – कथा-साहित्य
सातवां प्रश्नपत्र – हिंदी साहित्य का इतिहास (भारतेंदु युग से अब तक)
आठवां प्रश्नपत्र (वैकल्पिक)- कोई एक मूलभाषा (संस्कृत/प्राकृत/पालि/अपभ्रंश) अथवा आधुनिक भारतीय भाषा (बंगला/मराठी/तेलुगु/ कन्नड़/उर्दू/ तमिल)।
एम0 ए0 (हिंदी) द्वितीय वर्ष
तीसरा सत्र (पावस सत्र)
नवाँ प्रश्नपत्र – आदिकालीन एवं निर्गुणकाव्य
दसवाँ प्रश्नपत्र – सगुण भक्ति काव्य
ग्यारहवां प्रश्नपत्र – संस्कृत काव्यशास्त्र
बारहवाँ प्रश्नपत्र – आधुनिक भारतीय साहित्य
चैथा सत्र (शीतकालीन सत्र)
तेरहवाँ प्रश्नपत्र – रीतिकाव्य
चैदहवाँ प्रश्नपत्र – पाश्चात्य साहित्य-सिद्धांत
पन्द्रहवाँ प्रश्नपत्र – हिंदी समीक्षा
सोलहवाँ प्रश्नपत्र (वैकल्पिक)- किसी एक साहित्यकार (जायसी/सूर/तुलसी/भारतेन्दु
हरिश्चन्द्र/प्रेमचंद/प्रसाद/निराला/ रामचन्द्र शुक्ल/ हजारीप्रसाद द्विवेदी/ अज्ञेय/ मुक्तिबोध/ यशपाल/जैनेन्द्र/ अमृतलाल नागर) अथवा किसी एक साहित्य प्रवृत्ति (संतकाव्य/रीतिकाव्य/ आधुनिक हिंदी साहित्य 1919- 1947/ स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य) अथवा किसी एक भाषापरक या अन्य विषय (हिंदी भाषाशिक्षण /अनुवाद: सिद्धांत एवं प्रयोग/प्रयोजनमूलक हिंदी/ बोली विज्ञान एवं सर्वेक्षण पद्धति/हिंदी पत्रकारिता – इतिहास, सिद्धांत और प्रयोग/हिंदी नाटक एवं रंगमंच/हिंदीतर एवं देशांतर क्षेत्रों का हिंदी साहित्य/भारतीय साहित्य/लोक साहित्य) का विशेष अध्ययन ।
एम. ए. (हिंदी) प्रथम वर्ष
पहला प्रश्नपत्र: छायावादी काव्य
पाठ्यांश:
1- कामायनी: जयशंकर प्रसाद (चिंता, आशा एवं श्रद्धा सर्ग)
2- अनामिका: निराला (राम की शक्तिपूजा, सरोजस्मृति)
अनुशंसित ग्रंथ:
1- जयशंकर प्रसाद – नंददुलारे वाजपेयी, भारती भंडार, इलाहाबाद
2- कामायनी – एक पुनर्विचार – मुक्तिबोध, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
3- निराला की साहित्य साधना (तीन भाग) – रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
निराला की साहित्य साधना खंड 1, निराला की साहित्य साधना खंड – 2, निराला की साहित्य साधना खंड 3
4- सुमित्रानंदन पंत: डॉ. नगेन्द्र
5- छायावाद: नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
6- महादेवी वर्मा: जगदीश गुप्त, नई दिल्ली, 1994
7- छायावाद की प्रासंगिकता: रमेशचन्द्र शाह, नई दिल्ली, 1973
8- छायावाद और नवजागरण: महेन्द्रनाथ राय, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली
दूसरा प्रश्नपत्र
निबंध और नाटक
पाठ्यांश:
- चिंतामणि (भाग एक): रामचंद्र शुक्ल (केवल छह निबंध – भाव या मनोविकार, करुणा, लोभ और प्रीति, कविता क्या है, लोकमंगल की साधनावस्था, रसात्मक बोध के विविध रूप)।
- अशोक के फूल: हजारी प्रसाद द्विवेदी (केवल छह निबंध – बसंत आ गया है, अशोक के फूल, भारतीय संस्कृति की देन, भारतवर्ष की सांस्कृतिक समस्या, साहित्यकार का दायित्व, मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है)।
- अंधेर नगरी: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
- स्कंदगुप्त: जयशंकर प्रसाद
- आषाढ़ का एक दिन: मोहन राकेश
अनुशंसित ग्रंथ:
- रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना – रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
- दूसरी परम्परा की खोज: नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
- रामचन्द्र शुक्ल – मलयज, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
- आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का साहित्य – चौथीराम यादव, हरियाणा ग्रंथ अकादमी
- हिंदी नाटक: उद्भव और विकास – दशरथ ओझा, राजपाल एंड संस, दिल्ली
- हिंदी नाटक – बच्चन सिंह
- रंग दर्शन – नेमिचन्द्र जैन
- जयशंकर प्रसाद के नाटकों का शास्त्रीय अध्ययन – जगन्नाथ शर्मा
- नाटक के रंगमंचीय प्रतिमान – वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी, जगत राम एण्ड संस, दिल्ली
- हिंदी नाट्यशास्त्र का स्वरूप – डॉ. नर्वदेश्वर राय, हिंदी ग्रंथ कुटीर, पटना
तीसरा प्रश्नपत्र
भाषा विज्ञान एवं हिंदी भाषा
पाठ्यांश:
- भाषा: परिभाषा, तत्त्व, अंग, प्रकृति और विशेषताएं । भाषा परिवर्तन के कारण एवं दिशाएं ।
- भाषाविज्ञान – परिभाषा एवं स्वरूप, अंग, प्रमुख अध्ययन-पद्धतियाँ ।
- स्वनविज्ञान – परिभाषा, स्वन, संस्वन और स्वनिम । औच्चारणिक स्वनविज्ञान (स्वनयंत्र और स्वन उत्पादन प्रक्रिया), स्वनभेद, मानस्वर, स्वनपरिवर्तन के कारण एवं दिशाएं ।
- स्वनिमविज्ञान – परिभाषा, स्वनिम के भेद – स्वनिम और उपस्वनिम, स्वनिमवितरण के सिद्धांत ।
- रूपिमविज्ञान – शब्द और रूप (पद), संबंध तत्त्व और अर्थतत्त्व, रूप, संरूप, रुपिम और स्वनिम, रूपिमों का स्वरूप, रूपिमों का वर्गीकरण ।
- वाक्यविज्ञान – वाक्य की परिभाषा, संरचना, निकटस्थ अवयव, वाक्य के प्रकार, वाक्य-रचना में परिवर्तन – कारण एवं दिशाएं ।
- अर्थविज्ञान – शब्दार्थ सम्बन्ध विवेचन, अर्थपरिवर्तन के कारण एवं दिशाएं
- भाषाविज्ञान की प्रमुख शाखाएं – समाजभाषा विज्ञान, शैलीविज्ञान और कोशविज्ञान का सामान्य परिचय ।
- संपर्क भाषा एवं राजभाषा के रूप में हिंदी
- नागरी लिपि का मानकीकरण ।
अनुशंसित ग्रंथ:
- भाषा विज्ञान की भूमिका – देवेन्द्र नाथ शर्मा, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली
- भाषा विज्ञान – भोलानाथ तिवारी, किताब महल, इलाहाबाद ।
- सामान्य भाषाविज्ञान- बाबूराम सक्सेना, हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग
- हिंदी भाषा का उद्भव और विकास – उदयनारायण तिवारी, भारती भंडार, इलाहाबाद ।
- भाषा और समाज – रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
- राष्ट्रभाषा हिंदी: समस्याएं और समाधान – देवेन्द्रनाथ शर्मा, लोकभारती, इलाहाबाद ।
- भारत की भाषा समस्या – रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
- संपर्क भाषा हिंदी – सं0 सुरेश कुमार, ठाकुर दास, केन्द्रीय हिंदी संस्थान, आगरा ।
- राजभाषा हिंदी: प्रचलन और प्रसार – डॉ. रामेश्वर प्रसाद, अनुपम प्रकाशन, पटना
- नागरी लिपि: हिंदी और वर्तनी – अनंत चैधरी, दिल्ली माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली
- समसामयिक हिंदी में रूपस्वानिमिकी – सुधाकर सिंह




