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यूजीसी केयर सूची हिंदी । UGC CARE LIST HINDI

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यूजीसी केयर में शामिल पत्रिकाओं की सूची

UGC CARE LIST HINDI

यूजीसी केयर परिचय 

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्चतर शिक्षा संस्थानों में मानकों को बनाए रखने के लिए उत्तरदायी शीर्ष नियामक निकाय के रूप में शोध की गुणवत्ता में सुधार करने और प्रकाशन आचारनीति की रक्षा के लिए कड़े कदम उठाए हैं। इस प्रयोजन के लिए यूजीसी ने 14 जनवरी, 2019 की अधिसूचना द्वारा  गुणवत्तापूर्वक संदर्भ सूची’ तैयार करने और रखरखाव के लिए ‘शैक्षिक और शोध आचारनीति सह-संघर्ष (केयर) की स्थापना है।  केयर का मुख्य कार्य भारतीय विश्वविद्यालयों में शोध की गुणवत्ता के साथ-साथ प्रकाशन आचारनीति को बढ़ावा देना है।

यूजीसी केयर सूची में शामिल हिंदी पत्रिकाएँ (HINDI MAGAZINE IN UGC CARE LIST)

यूजीसी केयर द्वारा जारी सूची को आप यूजीसी केयर की वेबसाइट पर जाकर देख सकते हैं। यह सूची वर्ष में तीन बार संशोधित की जाती है। यूजीसी केयर के सदस्यों द्वारा शोध के मानकों को ध्यान में रखकर गुणवत्तापूर्वक पत्रिकाओं का चयन किया जाता है।

यहाँ केवल यूजीसी केयर सूची में शामिल हिंदी भाषा में प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं की जानकारी है अन्य विषय एवं भाषा की पत्रिकाओं के लिए आप यूजीसी केयर की वेबसाइट पर विजिट करें।

यूजीसी केयर सूची में अंतिम बदलाव जुलाई 2021 में किया गया है। 

यूजीसी केयर सूची में शामिल हिंदी साहित्यिक पत्रिकाएँ (Hindi Literature Magazine in UGC CARE LIST)

पत्रिका का नाम  प्रकाशक प्रिंट/ऑनलाइन  ISSN/E-ISSN  वेबसाईट 
आधुनिक साहित्य आधुनिक साहित्यप्रिंट2277-7083देखें
अपनी माटी अपनी माटी संस्थानऑनलाइन2322-0724देखें
आलोचना दृष्टिआलोचना दृष्टि प्रकाशनप्रिंट2455-4219देखें
आश्वस्तभारती दलित साहित्य अकादमी मध्यप्रदेशप्रिंट 2456-8856देखें
अक्षरा मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समितिप्रिंट2456-7167देखें
आलोचनाराजकमल प्रकाशनप्रिंट2231-6329
अनुवादभारतीय अनुवाद परिषदप्रिंट0003-6218देखें
बहुवचनमहात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्रप्रिंट2348-4586देखें
बनास जननॉटनल प्रकाशनप्रिंट2231-6558 
भाषाकेंद्रीय हिंदी निदेशालयप्रिंट0523-1418देखें
चिंतन सृजनआस्थाभारती दिल्लीप्रिंट0973-1490देखें
दस्तावेज़केंद्रीय हिंदी संस्थानप्रिंट2348-7763 
संग्रथनहिंदी विद्यापीठ, केरलप्रिंट2278-6880देखें
गगनांचलभारतीयसंस्कृति सम्बन्ध परिषद्, दिल्लीप्रिंट0971-1430देखें
गवेषणाकेंद्रीय हिंदी संस्थानप्रिंट0435-1460देखें
हंसअक्षर प्रकाशनप्रिंट2454-4450देखें
हिंदी अनुशीलनभारतीय हिंदी परिषदप्रिंट2249-930Xदेखें
लमहीनॉटनल प्रकाशनप्रिंट2278-554X 
मधुमतीराजस्थान साहित्य अकादमीप्रिंट2321-5569देखें
मध्य भारतीडॉ. हरीसिंह गौड़ विश्वविद्यालयप्रिंट0974-0066देखें
मीरायनमीरा स्मृति संस्थानप्रिंट2455-6033 
नमनवासुदेव सिंह स्मृति न्यासप्रिंट2229-5585देखें
नटरंगनटरंग प्रतिष्ठानप्रिंट0971-0825देखें
नया ज्ञानोदयभारतीय ज्ञानपीठप्रिंट2278-2184देखें
पहलपहल, जबलपुरप्रिंट देखें
प्रज्ञाबनारस हिन्दू विश्वविद्यालयप्रिंट0554-9884देखें
प्रवासी जगतकेंद्रीय हिंदी संस्थानप्रिंट2581-6985देखें
पुस्तक-वार्तामहात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्रप्रिंट2349-1809देखें
राजभाषा भारतीराजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकारप्रिंट देखें
रंग प्रसंगराष्ट्रीय नाट्य विद्यालयप्रिंट देखें
साहित्य अमृतसाहित्य अमृतप्रिंट 2455-1171देखें
समकालीन भारतीय साहित्यसाहित्य अकादमीप्रिंट0970-8367देखें
समन्वय पश्चिमकेंद्रीय हिंदी संस्थानप्रिंट2582-0907देखें
समयांतरस्वीट होम प्रकाशकप्रिंट2249-0469देखें
समीचीननमन प्रकाशनप्रिंट2250-2335देखें
समसमायिक सृजनसमसमायिक सृजनप्रिंट2320-5733देखें
संवाद पथकेंद्रीय हिंदी संस्थानप्रिंट2581-7353 
शोध दिशाहिंदी साहित्य निकेतनप्रिंट0975-735Xदेखें
तद्भवतद्भवप्रिंट  
वागार्थभारतीय भाषा परिषदप्रिंट2394-1723देखें
विश्व हिंदी पत्रिकाविश्व हिंदी सचिवालयप्रिंट1694-2477देखें
द्विभाषी राष्ट्रसेवक असम नेशनल लेंगवेज़ प्रमोशन कमिटीप्रिंट2321-4945देखें

यूजीसी केयर सूची में शामिल अन्य अनुशासन की हिंदी भाषा में प्रकाशित होने वाली पत्रिकाएँ 

पत्रिका का नाम  प्रकाशक प्रिंट/ऑनलाइन  ISSN/E-ISSN  वेबसाईट 
अधिगमशिक्षा राज्य संस्थानप्रिंट2394-773Xदेखें
आजकल उर्दूसूचना प्रसारण मंत्रालयप्रिंट0971-846Xदेखें
भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिकाNational Institute of Science Communication and Information Resourcesप्रिंट0771-7706/0975-2412देखें
भारतीय आधुनिक शिक्षाNational Council of Educational Research and Trainingप्रिंट0972-5636देखें
भारतीय समाजशास्त्र समीक्षासेगे प्रकाशनप्रिंट2349-1396देखें
दार्शनिकीदर्शन विभाग, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठप्रिंट2230-7435देखें
दार्शनिक त्रैमासिकअखिल भारतीय दर्शन परिषद 0974-8849देखें
धर्मदूतमहा बोधि भारतीय संस्थान 2347-3428देखें
धीमहिChinmaya International Foundation Shodha Sansthanप्रिंट0976-3066देखें
गोमतीराष्ट्रीय संस्कृत संस्थानप्रिंट0976-349Xदेखें

आपकी सहायता के लिए यहाँ कुछ पत्रिकाओं के नाम दिए गए हैं परंतु पूरी इनके अतिरिक्त भी कई पत्रिकाएँ हैं जो यूजीसी केयर सूची में शामिल है जिसके लिए आप यूजीसी केयर वेबसाइट पर विजिट करें। वहाँ सर्वप्रथम आपको लॉगिन करना होगा उसके उपरांत सर्च विकल्प पर क्लिक करें। आप वहाँ पत्रिका के नाम, issn, भाषा इत्यादि के आधार पर पत्रिकाओं को खोज सकते हैं। इसके अतिरिक्त सूची में अन्य कटेगरी भी है, जिनमें स्कोपस (scopus) एवं वेब ऑफ साइंस (web of science) में शामिल जर्नल की सूची है।

यूजीसी केयर क्या है एवं इसमें जर्नल को कैसे शामिल किया जाता है ?

यूजीसी केयर के संदर्भ में अधिक जानकारी के लिए आप यूजीसी केयर पर केन्द्रित ई पुस्तक को पढ़ें।

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यूजीसी केयर सूची में पत्रिका को शामिल करने की प्रक्रिया

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(UGC CARE LIST) यूजीसी केयर सूची में पत्रिका को शामिल करने की प्रक्रिया

यूजीसी केयर क्या है 

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्चतर शिक्षा संस्थानों में मानकों को बनाए रखने के लिए उत्तरदायी शीर्ष नियामक निकाय के रूप में शोध की गुणवत्ता में सुधार करने और प्रकाशन आचारनीति की रक्षा के लिए कड़े कदम उठाए हैं। इस प्रयोजन के लिए यूजीसी ने 14 जनवरी, 2019 की अधिसूचना द्वारा  गुणवत्तापूर्वक संदर्भ सूची’ तैयार करने और रखरखाव के लिए ‘शैक्षिक और शोध आचारनीति सह-संघर्ष (केयर) की स्थापना है।  केयर का मुख्य कार्य भारतीय विश्वविद्यालयों में शोध की गुणवत्ता के साथ-साथ प्रकाशन आचारनीति को बढ़ावा देना है।

यूजसी केयर सूची में पत्रिकाएँ कब शामिल की जाती है ?

यह सूची वर्ष में तीन बार संशोधित की जाती है। यूजीसी केयर के सदस्यों द्वारा शोध के मानकों को ध्यान में रखकर गुणवत्तापूर्वक पत्रिकाओं का चयन किया जाता है।

ugc care list

यूजीसी केयर में पत्रिका शामिल करने हेतु आवेदन कैसे करना है ? (Apply for Ugc Care)

केवल विश्वविद्यालयों के शिक्षण संकाय निर्धारित प्रस्तुत करने की प्रक्रिया का पालन करने के पश्चात पत्रिकाओं की संस्तुति कर सकते हैं। पत्रिका शीर्षक/कों की संस्तुति विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के माध्यम से निम्नानुसार की जाएंगीः
विश्वविद्यालयः विश्वविद्यालय के आईक्यूएसी प्रकोष्ठ संबंधित क्षेत्र यूजीसी-केयर विश्वविद्यालय को पत्रिका के शीर्षक/कों की संस्तुति कर सकते हैं।
संबद्ध महाविद्यालयः महाविद्यालय आईक्यूएसी प्रकोष्ठ पत्रिका के शीर्षक/कों की संस्तुति कर सकते हैं, अगर उन्हें मूल विश्वविद्यालय के आईक्यूएसी प्रकोष्ठ के लिए उपयुक्त पाया गया है। मूल विश्वविद्यालय का आईक्यूएसी प्रकोष्ठ संस्तुत पत्रिका शीर्षक को अग्रेशित कर सकता है, यदि संबन्धित क्षेत्रीय यूजीसी-केयर विश्वविद्यालय के लिए उपयुक्त पाया जाता है।
व्यक्ति विशेष कोई भी व्यक्ति विशेष निकटतम महाविद्यालय अथवा विश्वविद्यालय के आईक्यूएसी प्रकोष्ठ के माध्यम से केवल शिक्षण संकाय की संस्तुति के साथ निर्धारित प्रस्तुतीकरण प्रक्रिया का पालन करके यूजीसी-केयर विश्वविद्यालय को पत्रिका शीर्षक/कों की संस्तुति कर सकता है।प्रकाशक प्रकाशक सम्बद्ध महाविद्यालय के आईक्यूएसी प्रकोष्ठ अथवा विश्वविद्यालय के आईक्यूएसी प्रकोष्ठ के माध्यम सेशिक्षण संकाय की संस्तुति के साथ निर्धारित प्रस्तुतीकरण प्रक्रिया का पालन करके पत्रिका शीर्षक/कों की संस्तुतिकर सकते हैं।

Apply for ugc care


यूजीसी-केयर विश्वविद्यालय 

  1. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली (उत्तरी क्षेत्र)
  2. एम.एस. बड़ौदा विश्वविद्यालय, वडोदरा (पश्चिमी क्षेत्र)।
  3. हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद (दक्षिणी क्षेत्र)
  4. तेजपुर विश्वविद्यालय, असम (पूर्वी क्षेत्र)

यूजीसी केयर में आवेदन हेतु आवेदन पत्र 

आप इस लिंक पर क्लिक करें – आवेदन पत्र करके फॉर्म डाऊनलोड कर  सकते हैं और नजदीक के कॉलेज अथवा विश्वविद्यालय द्वारा प्रेषित कर सकते हैं।

इसके अतिरिक्त आप ऑनलाइन आवेदन भी कर सकते हैं।

यूजसी में शामिल पत्रिकाओं को कहाँ देखें 

यूजीसी केयर सूची (UGC CARE LIST) को आप पुणे विश्वविद्यालय के अधीन यूजीसी केयर की वेबसाइट पर देख सकते हैं। 

ugc care journal list

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युवा हूँ मैं

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“युवा हूँ मैं”

कुछ कर जाने को आतुर हूँ
मैं पल-पल होता व्याकुल हूँ,

नव भारत का धुरा हूँ मैं,
युवा हूँ मैं इक युवा हूँ मैं…

हैं मेरे सपने बड़े- बड़े
ना होंगे पूरे खड़े- खड़े,

मुझे आगे- आगे बढ़ना है
मुझे कठिन तपस्या करना है,

कुछ इसके सिवा अरमान नहीं
ये सफर मगर आसान नहीं,

फिर भी राहों पर डटा हूँ मैं,
युवा हूँ मैं इक युवा हूँ मैं…

इस वतन की सब ज़िम्मेदारी
मेरे कांधों पर है भारी,

मुझे देश को आगे करना है
और हर कमजोरी से लड़ना है,

चाहे खुद भी उस से जुड़ा हूँ मैं,
युवा हूँ मैं इक युवा हूँ मैं…

मानाकि अब तक हारा हूँ
मैं विवशताओं का मारा हूँ,

फिर भी उम्मीदें पाले हूँ
खुद को संघर्ष में डाले हूँ,

कई बार गिरा फिर खड़ा हूँ मैं,
युवा हूँ मैं इक युवा हूँ मैं…

इक दिन मुझको विजय मिले
मेरी आंखों में भी खुशी पले,

जीत को मैं सिरमौर करूँ
देश को कुछ आगे और करूँ,

बस इसी आस पर जुटा हूँ मैं,
युवा हूँ मैं एक युवा हूँ मैं…!

Priyanka Katare ‘priraaj’

युवा सृजन पत्रिका (प्रवेशांक) प्रकाशित

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सृजनलोक प्रकाशन द्वारा युवा सृजन पत्रिका का यह ऑनलाइन आगाज़ है...हमेशा युवाओं को प्रोत्साहित करने के लिए सृजनलोक दक्षिण में कई वर्षों से काम कर रहा है - इस पत्रिका के आगाज़ के साथ ही आप सभी के लिए एक घोषणा भी है -हर्ष के साथ आपसे साझा कर रहे हैं -आपकी कहानी, कविताएं, लघुकथा, निबंध, संस्मरण और पेंटिंग, रेखाचित्र ..को साल भर में देखा-परखा जाएगा और प्रधान संपादक, निर्णयक मण्डल, सम्पादक मण्डल सभी की सहमति से उनको वार्षिक अंक के लिए चुना जाएगा जिसे सृजनलोक पत्रिका का विशेषांक के रूप में निकाला जाएगा।
साथ ही इनमें से कहानी, कविता, रेखा चित्र और पेंटिंग्स का चुनाव भी होगा - इसमे जो चुनाव होगा वह सीधा-सीधा ईमेल के आधार पर होगा...आपकी कहानी, कविता और पेंटिंग्स साथ ही रेखा चित्र को सृजनलोक सम्मान भी दिया जाएगा -नकद राशि -1500 रु+ मोमेंटो+ शाल, आपके खाने-रहने की व्यवस्था भी की जाएगी (ये आपको सृजनलोक के वार्षिक आयोजन में ससम्मान प्राप्त होगा।)। विशेष बात यह भी है कि अगर आपका रेखांकन या पेंटिंग्स हमे पसन्द आती है तब हम सृजनलोक द्वारा प्रकाशित पुस्तक के मुखपृष्ठ के लिए रखेंगे और साथ ही आपको ससम्मान 500₹ भेंट स्वरूप दिया जाएगा।
आप सभी से यह भी आग्रह है कि हमे सहयोग करने और हमारे हिंदी और साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने के अभियान में हमारे साथ जुड़े और साथियों को जोड़ें।
हमारी प्रिंटेड सृजनलोक त्रैमासिक पत्रिका की सदस्यता ले।
साथ ही हमे सहयोग करने के लिए हमारे ऑनलाइन पत्रिका को भी सहयोग राशि जरूर दें। जिससे कि हम मजबूती से काम कर सकें।

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युद्ध -श्रेष्ठ्तम , निकृष्ततम

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  -ओंम प्रकाश नौटियाल
आश्रम में प्रवेश करते ही पार्थ ने नीम  वृक्ष के चबूतरे पर बैठे गुरू जी के चरण स्पर्श करते हुए प्रश्न कर दिया ।
“गुरूदेव प्रणाम । गुरूदेव कृपया बतायें कि इस संसार में कितने  प्रकार के युद्ध होते रहे हैं और  हो रहे हैं ?” गुरूदेव प्रश्न सुनकर मुस्कराये और बोले, ” पार्थ , विभिन्न विषयों के प्रति तुम्हारी  उत्सुकता से मैं अत्यंत प्रसन्न हूं ।तुम्हारी बाल सुलभ जिज्ञासा  मुझे बहुत भाती है ।सुनो पार्थ , इस संसार में आदि काल से अलग अलग स्तर के, अलग अलग पैमाने के,अलग अलग अवधि के युद्ध  विभिन्न कारणों से लडे जाते रहे हैं । युद्धों का वर्गीकरण उसके कारणों , प्रतिद्वंदियों की क्षमता, समय काल परिस्थिति तथा युद्ध के औचित्य आदि के अनुसार विभिन्न श्रेणियों में किया जा सकता है ।”
”  गुरूदेव , मैं जानना चाहूंगा की विश्व में  कहीं न कहीं होते रहने वाले इन युद्धों के पीछे क्या कारण रहे हैं ?”
” पार्थ , युद्ध होने के अनेक कारण हो सकते हैं । अधिकतर कारणों के पीछे युद्धस्थ पक्ष के नायकों का निहित स्वार्थ है ।स्वार्थ अनेक तरह का हो सकता है ,इसमें राज्य विस्तार , संपत्ति हड़पने के  लिये विलय करने की लिप्सा,अहं तुष्टि के लिये प्रभु सत्ता स्वीकार करवाने की मंशा, दूसरे पक्ष की सुंदर स्त्री पर कुद्दष्टि रख कुछ बनावटी कारण खड़े कर के प्रारंभ किये गये युदध आदि आदि । आधुनिक युग में तो शस्त्र उद्योग को बढ़ावा देने का स्वार्थ भी युद्ध और आतंकी गतिविधियों का कारण रहता है ।कभी कभी अपनी प्रभुसत्ता और स्वतंत्रता बचाने के लिये न चाहते हुए भी युद्ध करना पड़ जाता है ।
“गुरूदेव आपने बहुत उपयोगी जानकारी दी है । अब कृपया यह भी बता दें कि संसार में श्रेष्ठतम युद्ध कौन सा है ?”
“पार्थ, यह तुमने बहुत ही सुंदर प्रश्न किया है । इससे पहले कि मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूं मै तुम्हे यह बताना आवश्यक समझता हूं कि संसार में निकृष्टतम युद्ध कौन सा है ।पार्थ ,इस  संसार में चुनावी युद्ध सबसे अनैतिक और निम्न स्तर का है क्योंकि यह सिर्फ झूठ की बुनियाद पर लड़ा जाता है । इस युद्ध में भाग लेने वाले सभी प्रतिद्वंदी पक्ष जनता को यह बतलाते हैं कि वह उनकी भलाई के लिये लड़ रहे हैं जबकि सच्चाई यह है कि यह युद्ध  वह मात्र अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिये लड़ते  हैं । दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस युद्ध में वाणी से ऐसे विषैले गाली वाण चलाये जाते हैं जिनके लिये कोई रक्षा कवच उपलब्ध नहीं है ।  अब मैं तुम्हारे मूल प्रश्न पर आता हूं ।सुनों,पार्थ इस संसार में पति पत्नी के बीच  लड़ा जाने वाला युद्ध ही श्रेष्ठतम है । इसमे दोनों पक्षों का कोई भी स्वार्थ न होते हुए भी यह युद्ध उम्र भर अपनी गति और प्रवाह बनाये रखने में सक्षम  है । इस युद्ध से किसी अन्य तीसरे पक्ष की हानि होने की संभावना भी नगण्य रहती है। इस युद्ध की निरंतरता से  दोनों के प्रेम की बुनियाद मजबूत होती चली जाती है । दोनों को जीने का ध्येय मिल जाता है ।युद्धश्रम से  दोनों पक्षों का स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है, परिवार और पड़ोस के अन्य लोगों का मनोरंजन अलग से होता है । एक दूसरे पर तीखे किंतु हानि रहित शब्दवाणों का प्रयोग शब्द ज्ञान बढ़ाता है । वाणी और बुद्धि की कुशाग्रता बढती है ।इसलिये हे पार्थ मेरी द्दष्टि में निस्वार्थ भाव से लड़ा जाने वाला यह युद्ध बहुत ही कल्याणकारी है अतः श्रेष्ठतम है। यदा कदा यदि कभी शस्त्र का प्रयोग किसी पक्ष द्वारा कर भी लिया जाता है तो वह शस्त्र गृह कार्य में प्रयुक्त होने वाला अशस्त्र की श्रेणी वाला मामूली शस्त्र होता है । ऐसी स्थिति में यदि किसी को कभी हल्की चोट पहँच भी जाती है तो अशस्त्र चलाने वाला ही तुरंत प्रतिद्वंदी को घरेलू उपचार से ठीक कर देता है । प्रेम की प्रगाढ़ता बढाने के लिये इक्का दुक्का ऐसी घटनायें रामवाण सिद्ध होती हैं । “
“मैं धन्य हुआ गुरूदेव । मेरी यह जिज्ञासा तो शान्त हुई किंतु गुरूदेव  मैं यह भी जानना चाह रहा था …”
“बस पार्थ , शेष फिर कभी , अभी मुझे मतदान के लिये जाना है ।”
“धन्यवाद गुरूदेव ।”
-ओंम प्रकाश नौटियाल
बडौदा,मोबा. 9427345810

याद तो होगी आपको

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याद तो होगी आपको
उन दिनों की लम्हे
तितलियों जैसी
पंख फैलाए दूर-दूर
नीले गगन से उडकर
रंग-बिरंगे फूलों की
वादियों में खोजाना ।

याद तो होगी आपको
हम दोनों की नैन में नैनों को
अपलक डूबकर
खो गए थे
सपनों की दुनिया के
काल्पनिक भावनाओं में
जहाँ से लौट भी आ नहीं पाए हम ।

याद तो होगी आपको
मधुर होंठ की जादुई मुस्कान से
हमें मदहोश कर दी थी
मधुशाला की मदिरा नशे जैसे
कहाँ लौटा होश आजतक
इतने दिनों से ।

याद तो होगी आपको
हमने लिखीं थी
कितनी कविताएँ
आपके खातिर
जमीन से लेकर
चाँद पर बैठाया था हमने ।

मनजीत मोहन ‘मयंक’

यात्रा साहित्य : स्वरूप एवं तत्त्व- ओप्रकाश सुंडा

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06 05 1399285130 livingrootbridgeed
यात्रा साहित्य :
स्वरूप एवं तत्त्व
ओप्रकाश सुंडा
शोधार्थी
हिंदी विभाग
राजस्थान केन्द्रीय
विश्वविद्यालय
बांदरसिंदरी, किशनगढ़,
अजमेर – 305817
मेल आईडी – opsunda2408@gmail.com



आज जातीयता के उच्च सौपान पर पहुँचा ये
मानव अपनी आदिम अवस्था में कैसा रहा होगा इसकी कल्पना ही की जा सकती है। शायद उस
समय उसके पास रहने को घर भी नहीं होगा
? वह पागल की तरह इधर उधर भटकता फिरता होगा ? आस पास के जंगली पेड़ पौधों
और छोटे – मोटे कीट पतंगों को खाकर अपनी उदर पूर्ति करता होगा
? शायद उसमे विवेक शून्य होगा ? पर प्राकृतिक वातावरण
और जलवायु ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी होगी कि वह आने वाले संकट का सामना करने के
लिए उपाय सोचने लगा होगा
? समय ने उसे चलना सिखाया और वह एक
स्थान दूसरे स्थान की ओर जाने लगा । स्थान परिवर्तन के दौरान उसका जीवन जगत के
अनेक अनुभवों और वातावरणीय विविधताओं से पाला पड़ा होगा
? इस
वैविध्य ने ही उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा दी होगी
? अब उसके
सामने अनंत आकाश पड़ा था और घूमने के लिए सारी दुनिया। मानव का ये तब से चला
सिलसिला आज भी अनवरत जारी है।
यात्राशब्द
संस्कृत की
याधातु में ष्ट्रन + टाप
प्रत्यय के योग से बना है जिसका अर्थ है जाना
, गति, सफर।1 एक स्थान से दुसरे स्थान तक तक
जाने की क्रिया सफर।
2 डॉ हरदेव बाहरी हिंदी शब्द
कोश में इसका अर्थ बताते है
– ‘एक स्थान से दूसरे स्थान को
जाना
, प्रस्थान या प्रयाण, यात्रा
व्यवहार (जैसे जीवन यात्रा )।
3  जैनाचार्ये श्री विजय धर्म सूरि
की दृष्टि में यात्रा शब्द गमन या प्रस्थान आदि का बोध करता है। वे उल्लेख करते है
प्रस्थीयते स्थानाच्चलते
प्रस्थानाम्। गम्यते गमनं।। व्रजनं
व्रज्या।। आस्यारि। इति क्ययं।। आभिनिर्यायायतेदभिनिर्माण
, प्रयायते
प्रयानाम् स्वार्थे के प्रयाणंक
…. “ यात्यस्या यात्रा
हु यामा इति।”4 
विभिन्न शब्द कोशों में यात्रा का अर्थ घूमने या स्थान
परिवर्तन के अर्थ में आता ही है। शब्द कोश में प्रयोजन के संदर्भ में अलग – अलग
अर्थ मिलते है। जीवन निर्वाह
, व्यवहार, उपाय, उत्सव, प्रस्थान,
प्रयाण, तीर्थ यात्रा; एक
स्थान से दूसरे स्थान को जाने की क्रिया
; यात्रियों का
देवदर्शन या देवपूजन के लिए प्रस्थान
, चढाई, युद्ध यात्रा।5  डॉ हरदेव बाहरी ने संस्कृतहिंदी शब्द कोश में यात्राशब्द
का प्रयोग अटन
, देशाटन, पर्यटन,
विचरण, भ्रमण, सफर,
अतिक्रमण तथा गति के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। यायावरी भी
यात्रा के पर्याय रूप में प्रयुक्त होता है।
6 सदैव
घुमने
फिरने वाले को साधारणतः यायावर कहा जाता है और
क्रिया को यायावरी। मुसाफिरी भी इसी अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसके अन्य पर्यायो
में खानाबदोश
, घुमक्कड़, फेरीवाला,
बंजारा, सन्यासी, आदि
शब्द भी प्रयुक्त होते हैं।7
वृत्तान्त का आशय है एक
वृत्त का अंत। यात्रा में एक परिवृत की दुनिया गोल है अर्थात हम घूम
फिर कर एक वृत्त पूरा करते हैं। इस प्रकार दुनिया का चक्कर (वृत) पूरा
करना
यात्रावृत है। यात्रा के लिये प्रत्येक भाषा में अलग
अलग शब्द हैं। जो घूमने फिरने व एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने की
क्रिया में प्रयुक्त होते हैं :
हिंदी यात्रा;  बंगला यात्रा, सफर, गमन; गुजराती
यात्रा; मलयालम यात्रा; पंजाबी पेंडा; उर्दू सफर; संस्कृत यात्रा; मराठी प्रवास; तमिल प्रयाणं। अँगरेजी में टूरिज्मयात्रा का पर्याय है। लेटिन के टूअरसे टूरिज्मका निर्माण हुआ। लैटिन
का ही एक और  शब्द है
–‘टोरंसजिसका अर्थ एक औजार से है जो पहिये की तरह
गोलाकार होता है। शायद इसी से
यात्राचक्रया पैकेज टूअरका विचार
सृजित हुआ होगा।
1643 ई० के आसपास विभिन्न क्षेत्रों और
राष्ट्रों के भ्रमण के लिये इसका प्रयोग किया गया।
वर्तमान में हिंदी में प्रचलित शब्द
पर्यटन भी इसी का द्योतक है। पर्यटन विस्तृत भू
भाग में किया जाने
वाला भ्रमण। पर् – परिधि
, अटन घूमना
फिरना अर्थात एक परिधि विशेष में घूमनाफिरना।
संस्कृत साहित्य में बाणभट्ट के लिये आवारा शब्द का प्रयोग किया गया है। यहाँ
आवारा से तात्पर्य गृहस्थ जीवन को छोड़कर इधर
उधर भटकने
वाला आवारा है।
चरैवेति-चरैवेति-चरैवेति अर्थात चलते
रहो
चलते रहो चलते रहो …। वैदिक युग का सूत्र वाक्य
गुरुकुलों में ऋषियों द्वारा अपने शिष्यों को ज्ञान देने के लिये चलते रहने का
सन्देश देने के लिये किया था। विद्यार्थी दुनिया भर में सैर करके ज्ञान प्राप्त
करते थे। यात्रा शब्द जीवन जगत के अनेक अर्थों को अपने में समेटे हुए है। जीवन एक
यात्रा है। धार्मिक अर्थों में मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत यात्रा करता
रहता है। संसार मिथ्या ज्ञान है, इसको पार करने के लिये यात्रा करनी पड़ती है । परमात्मा
तक पहुँचने की क्रिया इसी यात्रा द्वारा निष्पन्न होती है। दार्शनिक दृष्टि से
यात्रा का आशय है कि व्यक्ति जीवन भर यात्रा करता है और मरने के बाद कहते है कि
इहलोक की यात्राकर गया और समस्त जीवन क्रिया का ही
नाम पड़ गया
जीवन यात्रा ।
            यात्रा शब्द सामान्यत: प्रवास के अर्थ
में प्रयुक्त होता है। प्रवास अर्थात अपने घर से दूर बसना या वास करना । ये लोग
प्रवासी कहलाते हैं । संचरणशीलता मनुष्य मात्र की प्रवृत्ति है। यात्रा का
उद्देश्य भिन्न भिन्न हो सकता है जैसे  
  व्यापार, ज्ञान,
मनोरंजन, विलास आदि। व्यक्ति द्वारा एक परिवृत
एक निश्चित समय में किया गया भ्रमण यात्रा है तथा यात्रा के समय किये गये अनुभव
,
संवेदनात्मक अनुभूति, समाज के साथ निर्विकार
जुड़ाव का भाव
, समाजगत चेतना का यथार्थ बोध तथा अन्य
संवेदनात्मक तत्त्व यात्राकार के व्यक्तित्व में पचकर लेखनी के सहारे जब कलात्मक
रूप धारण करते है तो यात्रा साहित्य का निर्माण होता है ।
सभ्यता विकासक्रम के प्रथम सोपान में
आदिम और जंगली मनुष्य वनों में इधर
उधर की खाक छानता फिरता होगा
। भोजन की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान
पता नहीं
कितनी लम्बी दूरी तय की होगी ।
प्राकृतिक आदिम मनुष्य परम
घुमक्कड़ था । खेती बागवानी तथा घर द्वार से मुक्त वह आकाश के पक्षियों की भांति
पृथ्वी पर सदा विचरण करता था। जाड़े में यदि इस जगह था तो गर्मियों में वहाँ से दो
कोस दूर ।
8 सामाजिक जीवन
में प्रवेश हुआ और वह नियत स्थान पर घर बनाकर रहने लगा। शायद सुरक्षा की
विचार-भावना और एक ही जगह भोजन की उपलब्धता ने ऐसी प्रेरणा दी होगी। सामाजिक जीवन ने
उन्हें बहुत सी सुविधाएँ और सुरक्षा प्रदान की
, परन्तु
सामाजिक नैतिकता ओर नियमों में आबद्ध मनुष्य का मन मुक्ति के लिये छटपटाने लगा।
इसी मुक्ति की कामना को हृदय में संजोये मनुष्य ने फिर घर छोड़ा होगा, परन्तु उसे
वापस लोटना पड़ता क्योंकि सामाजिक दायित्वों से मुक्ति नही मिली। घुमक्कड़ी के समय
उसे अत्यंत रोमांच ओर आनंद की अनुभूति हुई होगी। अब यात्रा पर निकलना उसकी
स्वाभाविक प्रवृति हो गई। व्यक्ति जब भी जीवन की समस्याओं
, संसार
के दुखों
, कष्टों ओर मानसिक संताप से घिरा उसने घुमक्कड़ी
अपनाई। वह वापस लौटकर यात्रा के अनुभव अन्य लोगों को सुनाता होगा ।
दैनिक साहसिक यात्रा के अनुभव का आत्मश्लाघा से पूर्ण वर्णन कदाचित उनकी
पहली अभिव्यक्ति रही होगी ।
9
जब लोगों में शिक्षा ग्रहण करने की
प्रवृति जगी। लोग एक दूसरे से मिलकर अपने अनुभव बाँटने लगे। उस समय आज की भांति
शायद अत्याधुनिक साधन नही थे परन्तु
सभ्यता के इस युग में भी लोग
प्राय: यात्रायें किया करते थे। जल और स्थल दोनों प्रकार की यात्राएँ होती थी
……लोगों के पास जहाज थे। वे दुनिया का भौगोलिक वृतांत भी खूब जानते थे। वे
सभ्य शिक्षित
, उदार, साहसी, व्यापार कुशल, कला निपुण अद्यवसायी थे। ….हमारे साहित्य के ग्रन्थ इस काल की यात्राओं से भरे पड़े हैं । वैदिक और
लौकिक संस्कृत भाषा के ग्रंथों से भरे पड़े हैं ।
10 वैदिक सूक्तो में अनेक देवताओं की यात्राओं का उल्लेख मिलता है ।
मनुष्य का इन यात्राओं के पीछे का
प्रयोजन मात्र आत्मिक शांति ही नहीं बल्कि भौतिक क्रियाएँ भी रही हैं। समाज
निर्माण के साथ ही व्यक्ति को अपनी आवश्कताओं की पूर्त्तता हेतु अन्य मनुष्यों से
संपर्क साधना पड़ा। भय ने मनुष्य को प्रकृति पूजक भी बना दिया। वह किसी व्यक्ति या
स्थान विशेष के प्रति कृतज्ञ होता गया और मन में श्रद्धा-भक्ति का भाव उमड़ पड़ा। इस
प्रकार किसी तीर्थ या देवस्थान की यात्रा का चलन सामने आया। लोग झुण्डों में किसी
उत्सव की भांति यात्राएँ किया करते थे। उनके द्वारा ये यात्राएँ अपने आराध्य के
प्रति भक्ति भाव की अभिव्यक्ति थी। तीर्थाटन को पाप शमन का साधन माना जाने लगा और
यात्राओं सिलसिला सा चल पड़ा ।
मनुष्य की व्यापारिक प्रवृति ने भी
यात्राएँ करने के लिये बाध्य किया। वह छोटी से छोटी चीज से लेकर बड़ी से बड़ी चीजों
का आदान

प्रदान करने के लिये, स्वयं द्वारा निर्मित
चीजों के वितरण
, सामान खरीदने तथा अन्य विनिमय का कार्य करने
के लिये इधर – उधर भागने लगा। एक दूसरे से बढ़ते 
संपर्क ने मनुष्य के व्यक्तिगत संबंधों को विस्तार प्रदान किया । दूर

दूर वैवाहिक संबंध स्थापित किये जाने लगे । एक समय ऐसा भी रहा होगा
जब वरयात्रा कई महीनों तक मीलों लंबी दूरी तय करके पहुँचती  होगी 
प्राचीन काल में आज की भांति गली कूंचे
में शिक्षा संस्थान उपलब्ध नहीं थे और न ही आज की सी शिक्षा पद्धति थी। मीलों
लम्बे क्षेत्र में कहीं – कहीं गुरुकुल हुआ करते थे। विद्यार्थी ज्ञान प्राप्ति के
लिए दुनिया का भ्रमण करता था। शिक्षक भी ज्ञान प्राप्ति और अनुभव के लिये लम्बी
यात्राएँ किया करते थे। शंकराचार्य जैसे दार्शनिक द्वारा देश के चारों कोनों की
यात्राएँ की गई और चार ज्ञान केंद्र स्थापित किये गए।
इस प्रकार प्राणी जगत पृथ्वी की
उत्पत्ति से लेकर आज तक चरेवैति – चरेवैति
चरेवैति का आदर्श निभाता आ
रहा है। पुरातत्व खोजों में मिले गिरिकंदराओं के कोटरों में मनुष्य वास के प्रमाण
,
समुद्र व पृथ्वी में समाहित सभ्यताओं की निशानियाँ तथा काल की ये
अंतहीन चाल मनुष्य की घुमक्कड़ी के प्रथम बीज बिंदू से लेकर आज तक की कहानी सप्रमाण
कहती है। यात्रा मार्ग में मनुष्य को प्रकृति के प्रांगण में फैले अंतहीन सौंदर्य
ने अभिभूत किया होगा । धीरे
धीरे प्रकृति के इन आकर्षक
दृश्यों
कल कल करती नदियों, विराट
पर्वत शिखर
, विहँसते झरने, विशाल जंगल,
उमड़ता सागर, गिरिकंदराएँ व एकांत में अगणित
तारा पंक्तियों से चमकता नील गगन आदि को आत्मसात करके मनुष्य उनके साथ एकाकार हो
लगा। इन दृश्यों से हृदयगत भावनाओं का उमड़ता ज्वार मनुष्य को और भी निकट ले गया।
प्रकृति से उनकी दैनिक जीवन की आवश्कताओं की पूर्ति तो होती ही थी, साथ ही साथ
प्राकृतिक दृश्यों के आत्मसात एवम् विशिष्ट अनुभूति की यह मानव भावना और
आकर्षण ही वस्तुतः यात्रा साहित्य की मूल भित्ति है ।
11 
कहा जा सकता है कि मनुष्य की स्वभावगत
विशेषता चंचलता
,
आत्मतुष्टि की खोज तथा भौतिक आवश्कताओं ने उसमें सौंदर्य बोध की
दृष्टि विकसित की
, परिणामस्वरूप वह अपनी अभिव्यक्ति के लिये
यात्रा साहित्य को कलात्मक रूप देने लगा । उसके व्यक्तित्व
, ज्ञान,
संस्कार और अनुभव ने मिलकर आज के यात्रा साहित्य का भवन तैयार किया
स्वरूप                                                            
चलना मनुष्य का धर्म है जिसने
इसको छोड़ा वह मनुष्य होने का अधिकारी नहीं है।
12  शास्त्र भी यही बात अनुमोदित
करते हैं कि चलते रहो
चलते रहो
चलते रहो। मनुष्य स्वभावतः ही संचरणशील है। स्थान की आबद्धता उब पैदा करती है।
व्यक्ति जीवन में सुख और आनंद चाहता है। व्यक्ति के समस्त कार्यकलाप इसी आनंद को
पाने के लिये प्रायोजित हैं। समाज और परिवार की निर्मिति
, नियम,
और कायदे, व्यक्तित्व पर नैतिक बंधन आदि समस्त
प्रायोजित या स्वाभाविक कार्यवृत्तियाँ व्यक्ति को जीवन में सुख देने के लिये हैं।
इन सुखों की कामना और प्राप्त करने के भौतिक प्रयास व्यक्ति मन को थका देते हैं।
इस थके हुए मन की विश्रांति किसी ऐसी जगह है जहाँ समस्त दायित्वों से मुक्ति मिले
और मनुष्य आत्म की पड़ताल में व्यस्त हो जाये। एकांत यात्रा देती हैं।
यात्रा यायावर को तठस्थ दृष्टि देती है। वह रोज के द्वंद्व पूर्ण जीवन में
रहकर प्राप्त नहीं होती। अपने जीवन के निकट वातावरण से हटकर निजी परिस्थितियों के
दबाव से मुक्त होकर मन में कोई कुंठा नहीं रहती।
13 वह स्वयं को स्वतंत्र महसूस करता है। यात्री बनकर जब व्यक्ति निकलता है
तो उसे प्राकृतिक सौंदर्य
, नया समाज नई जगह का इतिहास और
भूगोल
, विभिन्न व्यक्तियों के भिन्न भिन्न
आचरण
, रहन सहन, शिक्षा, व्यवस्थाएँ आदि आकर्षित करते हैं। वहाँ के
जीवन संग व्यतीत समय अनुभव प्रदान करता है। उसे अनेक चीजे पसंद आती हैं। अनेक
स्वभाव के प्रतिकूल भी होती है। वह मात्र उपरी चीजों को देखता भर नहीं
, साथ साथ उनके विश्लेषण की प्रक्रिया भी चलती रहती
है। वह उस परिवेश से एकतान होकर इतिहास के झरोखों से देखता हुआ उनका सांस्कृतिक और
मनोवेज्ञानिक विश्लेषण भी करता है। वह उन सबको एक क्षण अनुभव करके जी लेना चाहता
है। वहाँ की समस्याएँ निजी बन जाती हैं। एक साहित्यिक यात्री चीजों को देख और
विश्लेषण करके नहीं छोड़ देता अपितु तथ्य और सौंदर्य के सहारे उसके शब्द वहाँ का
जीवन राग अलापने लगते हैं ।
यात्रावृत्त में देशविदेश की प्राकृतिक रमणीयता, नर नारियों के विभिन्न जीवन सन्दर्भ, प्राचीन एवं नवीन
चेतना की कलाकृतियों की भव्यता तथा मानवीय सभ्यता के विकास के द्योतक अनेक वस्तु
चित्र यायावर लेखक के मानस रूप में रूपायित होकर व्यक्तिक रागात्मक उषा से दीप्त
हो जाते हैं।
14 उन निजी
अनुभूतियों को लेखक ऐसी कलात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करता है कि पाठक मानसिक धरातल
पर अपना अस्तित्व विस्मृत कर देता है और वहाँ की सैर करने लगता है ।
यात्रावृत्त अकाल्पनिक गद्य विधा है ।
इसमें यात्राकार सामना की गई परिस्थितियों के यथार्थ अंकन का प्रयास करता है।
हालाँकि कलात्मक अभिव्यक्ति होने के कारण कल्पना से नकारा नहीं जा सकता परन्तु
यात्रावृत्त में चित्रित प्रत्येक दशा यात्रकार की निजी अनुभूति होती है
, अनुभूतियों
को वह यथातथ्य सिद्ध कर सकता है। कल्पना का संयोग उसे रोचक बना देता है। लेखक की
भावनाएँ उस परिवेश और वहाँ के मनुष्य की जीवनगत संवेदना को आत्मसात करती है
,
वह यात्रावृत्त मानों वहाँ का मानवीय इतिहास हो। जिसमें घटनाओं के
साथ
साथ व्याक्तिचेतना, संस्कार,
सांस्कृतिक जीवन, सामाजिक और आर्थिक क्रियाएँ,
राजनीतिक और भौगोलिक स्थितियाँ, विचार तथा
धारणायें समाहित होती हैं ।
इस प्रकार यात्रा साहित्य मनुष्य के
उड़न-छू मन द्वारा की गई सैर की निजगत अनुभूतियों से आप्लावित ऐसी अभिव्यक्ति है जो
पाठक को उस परिवेश और समय के साथ यात्रा कराती है …अनुभव कराती है…उस जीवन की
संवेदनाएँ तथा जीवन को उल्लास व उमंग से भर देती है ।
तत्व     
किसी भी विधा की बनावट के मूल में कोई
न कोई ऐसी चीज होती है जो उसे अन्य विधाओं से अलगाती है और वो है मूलभूत तत्व । उन
तत्वों के आधार पर निर्णय किया जाता है कि वो साहित्यिक है या नहीं । यात्रा
वृत्तान्त भी एक साहित्यिक विधा है। अगर उसमें वे तत्व निहित हैं जो उसे साहित्य
बनाते हो। यात्रा साहित्य में हम संख्या गिनकर तत्व निर्धारित नहीं कर सकते
क्योंकि उसका ढांचा जीवन की भांति अत्यंत विस्तृत है। हम नहीं कह सकते कि वहाँ या
कल्पना
,
या तो तथ्य, या तो वैयक्तिकता,या तो चित्रात्मकता से काम चल जाएगा । यात्राकार के सम्पूर्ण जीवन के
अनुभव से लेकर समसामयिक घटनाओं की सृष्टि उसमें समाहित होती है। फिर भी सामान्यत:
कुछ तत्व निर्धारित किए जा सकते हैं। यथा :-
यात्रावृतांत की रचना करते समय स्थान
विशेष की भौगोलिक परिस्थितियों
, आचारविचार, रीति रिवाज, इतिहास,
संस्कृति, परिवेश, प्रकृति,
जीवनकला-दर्शन आदि को दिखाया जाता है।
स्थानीयता वह तत्व है जिसके चारों ओर सम्पूर्ण यात्रावृतांत घूमता है। वर्णित
स्थान का चयन लेखक की दृष्टि और पसंद पर निर्भर करता है। कोई चीज उसके लिये प्रिय
हो सकती है तो कोई उसकी दृष्टि में निकृष्ट कोटि की। यात्रा वृतान्त्त में यात्रा
किये गये स्थान की वस्तुस्थिति का चित्रण आवश्यक है अन्यथा बिना उसके अन्य
स्थितियों का चित्रण असंभव हैं।तथ्य इतिहास या भूगोल का विषय है, परन्तु यात्रा
साहित्य की प्रमाणिकता उसकी तथ्यात्मकता में ही निहित है । लेखक द्वारा दिए गये
तथ्य कोई आँकड़े या घटना भर नहीं होते बल्कि उनको अन्य स्थितियों से इस प्रकार
संबद्ध किया जाता है कि वे बुद्धि पर बोझ न रहकर सहज ही कथ्य के भाग बन जाते हैं।
कल्पना के बिना साहित्य नहीं लिखा जा
सकता । यात्रा साहित्य में भी बिना कल्पना के वह साहित्यिक विधा नही बन सकती
क्योंकि
लिखते समय अतीत को वर्तमान एवम् अप्रत्यक्ष को प्रत्यक्ष करने की क्षमता
इसी कल्पना तत्व में निहित है ।
15 आत्मीयता ही ऐसा तत्त्व है जो पाठक को रचना से जोड़े रखता है । यात्रा में
मिला प्रत्येक व्यक्ति महत्वपूर्ण होता है
, यात्री का लगाव
उनसे मात्र औपचारिक ही नहीं होता अपितु संवेदनात्मक और आत्मीय होता है । यात्रा
साहित्य में उस आत्मीयता पूर्ण व्यवहार का वर्णन ही रचना को आत्मीय बना देता है।
यात्रा में पड़ने वाले कुछ क्षण के
मेहमान मार्ग
, जंगल, पर्वत, व्यक्ति और
सामाजिक जीवन-यात्री इनमें डूबता उतरता चलता जाता है। इन सब को वह अपने नजरिये से
देखता है। यहाँ यात्रा व्यक्ति द्वारा होती है। यात्रा वृत्तान्त में वर्णन नितांत
व्यक्तिगत दृष्टि से होता है। “यात्रा के समय उसका व्यक्तित्व ओर भी हावी हो जाता
है क्योंकि व्यक्ति को अपनी अभिरुचि यथा-खानपान
, वेशभूषा, पारिवारिक सुख सुविधा आदि का जितना तीव्र बोध प्रवास के क्षणों में होता
है उतना परिजनों और आत्मीय बंधुओं के साथ रहते नहीं होता !”16
वर्णन की रोचकता यात्रावृतान्त्त का
मूल तत्व है। पढ़ते समय जो चीज मन में रोमांच पैदा कर दे तथा पाठक की जिज्ञासा
शब्द-दर-शब्द बढती ही जाये। रोचकता ही ऐसा तत्व है जो यात्रा साहित्य की पुस्तक को
पर्यटन पुस्तिकाओं से अलगाता है। यात्री का उद्देश्य समय निकलने के लिये घूमना
फिरना
नहीं होता। वह सैर किए गए क्षणों को अनुभव करता हैं उनसे आत्मीयता स्थापित करता
है। यात्राकार का जुड़ाव इस कदर गहरा होता है कि वहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य जनजीवन
,
समस्याएँ आदि से वह संवेदना के गहरे स्तर पर तादात्म्य तो स्थापित
करता ही है साथ ही साथ एक कलाकार की भेदक दृष्टि द्वारा कलात्मक वर्णन से वहाँ के
दृश्यों को प्रत्यक्ष कर देता है। संवेदना के गहरे स्तर पर जुड़कर सौन्दर्य दृष्टि
वृत्तान्त को साहित्यिक रूप देती है। 
लेखक का ज्ञान और अनुभव यात्रा में
पड़ने वाली प्रत्येक चीज को समझने में सहायक होता है। वह अपने अनुभवों के आधार पर
निष्कर्ष निकालता है
, तुलना करता है और कारणों की खोज करता है। ज्ञान और अनुभव के बिना यात्रा
फीकी लगने लगती है और वह वस्तु वर्णन सा प्रतीत होने लगता है। लेखक के अनुभव ही
महत्वपूर्ण नहीं होते बल्कि अभिव्यंजना कोशल भी महत्वपूर्ण होता है। भाषा और शैली
का प्रयोग ही वर्णन की रुक्षता से बचाता है। लेखक प्राय: लोटकर स्मृति के आधार पर
या यात्रा में लिखी गई डायरी के माध्यम से ही बाद में संपादित करके यात्रावृत्त की
रचना करते हैं। वे यात्रा के समय अपने परिजनों या परिचितों को लेखे गये पत्रों को
यात्रानुभवों के रूप में काम में लेते हैं। इससे शैली में आत्मीयता या रोचकता आ
जाती है।
सामान्य घटनाओं के वर्णनों में बोलचाल की भाषा की
सहजता
, प्रकृति या भावनात्मक क्षणों के वर्णन में कलात्मकता, दृश्यों के मूर्तिकरण में चित्रात्मकता और बिम्बधर्मिता, विचारों की अभिव्यक्ति में गाम्भीर्य तथा स्थितियों के विश्लेषण में भाषा
का प्रोढ़
, प्रांजल और बोधगम्य रूप दिखाई पड़ता है !17  शैली
की ही विशेषता है कि पाठक निरंतर जुड़ा रहता है !
किसी दृश्य का मूर्तिकरण करना
चित्रात्मकता या बिम्बधर्मिता है। लेखक द्वारा यात्रा स्थल का वर्णन इस प्रकार
करना की पढ़ते समय दृश्य आँखों के सामने जीवंत हो जाये। बिंब निर्माण करना किसी
यात्रा लेखक की सबसे बड़ी सफलता है। यात्रा वृत्त का एक और महत्त्वपूर्ण तत्त्व जो
उसका आधार है
समसामयिकता। उपर्युक्त तत्त्वों के बिना तो यात्रावृत्त का निर्माण हो ही
सकता
, परन्तु उसमे कालगत बोध स्वभाविकता ला देता है। इससे यह
अहसास नहीं होता कि हम इतिहास की कोई घटना पढ़ रहे है। हम समय के साथ
साथ यात्रा करने लगते हैं।
संदर्भ
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वामन शिवराम आप्टे, संस्कृत
हिंदी शब्द कोश
, कमल प्रकाशन, नवीन
संस्करण  
2.     
वृहत प्रमाणिक हिंदी कोश, लोकभारती
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3.     
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4.     
डॉ संध्या शर्मा, हिंदी
यात्रा साहित्य की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
, बुक पब्लिकेशन,
2015 पृष्ठ – 15
5.     
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6.     
डॉ संध्या शर्मा, हिंदी
यात्रा साहित्य की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
, बुक पब्लिकेशन,
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7.     
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8.     
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9.     
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यात्रा वृत्तों में सांस्कृतिक सन्दर्भ
, के.के. पब्लिकेशन 2009,
पृष्ठ – 1   
10. 
सुरेन्द्र माथुर,हिंदी
यात्रा साहित्य का उद्व और विकास
, 1962 , पृष्ठ – 12
11. 
डॉ संध्या शर्मा, हिंदी
यात्रा साहित्य की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
, 
बुक पब्लिकेशन, 2015 पृष्ठ –29 
12. 
 राहुल सांकृत्यायन, घुमक्कड़ शास्त्र, हिंदी समय.कॉम से
13. 
 मोहन राकेश,परिवेश,
भारतीय ज्ञानपीठ 1967 पृष्ठ-75
14. 
 रामचंद्र तिवारी, हिंदी का गद्य साहित्य, विश्वविद्यालय प्रकाशन,
2015 पृष्ठ – 527
15. 
 डॉ हरिमोहन, साहित्यिक विधाएं : पुनर्विचार, वाणी प्रकाशन 2005 पृष्ठ – 276
16. 
 डॉ संध्या शर्मा, हिंदी यात्रा साहित्य की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, बुक
पब्लिकेशन
, 2015 पृष्ठ – 22
17. 
 डॉ हरसिमरन कोर भुल्लर, समकालीन यात्रा वृत्तों में सांस्कृतिक सन्दर्भ,के.के.
पब्लिकेशन
2009,  पृष्ठ-
25



[साभार: जनकृति के अप्रैल 2019 अंक में प्रकाशित]

यात्रा साहित्य : स्वरूप एवं तत्त्व yatra sahitya

0
silhouette of man walking along field leading to mountain
Photo by Mukuko Studio on Unsplash

यात्रा साहित्य : स्वरूप एवं तत्त्व

ओप्रकाश सुंडा

शोधार्थी हिंदी विभाग

राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय

बांदर सिंदरी, किशनगढ़, अजमेर – 305817

मेल आईडी – opsunda2408@gmail.com

आज जातीयता के उच्च सौपान पर पहुँचा ये मानव अपनी आदिम अवस्था में कैसा रहा होगा इसकी कल्पना ही की जा सकती है। शायद उस समय उसके पास रहने को घर भी नहीं होगा? वह पागल की तरह इधर – उधर भटकता फिरता होगा ? आस पास के जंगली पेड़ पौधों और छोटे – मोटे कीट पतंगों को खाकर अपनी उदर पूर्ति करता होगा ? शायद उसमे विवेक शून्य होगा ? पर प्राकृतिक वातावरण और जलवायु ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी होगी कि वह आने वाले संकट का सामना करने के लिए उपाय सोचने लगा होगा? समय ने उसे चलना सिखाया और वह एक स्थान दूसरे स्थान की ओर जाने लगा । स्थान परिवर्तन के दौरान उसका जीवन जगत के अनेक अनुभवों और वातावरणीय विविधताओं से पाला पड़ा होगा? इस वैविध्य ने ही उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा दी होगी? अब उसके सामने अनंत आकाश पड़ा था और घूमने के लिए सारी दुनिया। मानव का ये तब से चला सिलसिला आज भी अनवरत जारी है।

यात्रा अर्थ एवं परिभाषा

‘यात्रा’ शब्द संस्कृत की ‘या’ धातु में ष्ट्रन + टाप प्रत्यय के योग से बना है जिसका अर्थ है जाना, गति, सफर।1 एक स्थान से दुसरे स्थान तक तक जाने की क्रिया सफर।2 डॉ हरदेव बाहरी हिंदी शब्द कोश में इसका अर्थ बताते है – ‘एक स्थान से दूसरे स्थान को जाना, प्रस्थान या प्रयाण, यात्रा व्यवहार (जैसे जीवन यात्रा )। जैनाचार्ये श्री विजय धर्म सूरि की दृष्टि में यात्रा शब्द गमन या प्रस्थान आदि का बोध करता है। वे उल्लेख करते है – प्रस्थीयते स्थानाच्चलते
प्रस्थानाम्। गम्यते गमनं।। व्रजनं व्रज्या।। आस्यारि। इति क्ययं।। आभिनिर्यायायतेदभिनिर्माण, प्रयायते प्रयानाम् स्वार्थे के प्रयाणंक…. “ यात्यस्या यात्रा” हु यामा इति।”4  विभिन्न शब्द कोशों में यात्रा का अर्थ घूमने या स्थान परिवर्तन के अर्थ में आता ही है। शब्द कोश में प्रयोजन के संदर्भ में अलग – अलग अर्थ मिलते है। जीवन निर्वाह, व्यवहार, उपाय, उत्सव, प्रस्थान, प्रयाण, तीर्थ यात्रा; एक स्थान से दूसरे स्थान को जाने की क्रिया; यात्रियों का देवदर्शन या देवपूजन के लिए प्रस्थान, चढाई, युद्ध यात्रा।5  डॉ हरदेव बाहरी ने संस्कृत – हिंदी शब्द कोश में ‘यात्रा’ शब्द का प्रयोग अटन, देशाटन, पर्यटन, विचरण, भ्रमण, सफर, अतिक्रमण तथा गति के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। यायावरी भी यात्रा के पर्याय रूप में प्रयुक्त होता है।6 सदैव घुमने – फिरने वाले को साधारणतः यायावर कहा जाता है और क्रिया को यायावरी। मुसाफिरी भी इसी अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसके अन्य पर्यायो में खानाबदोश, घुमक्कड़, फेरीवाला, बंजारा, सन्यासी, आदि शब्द भी प्रयुक्त होते हैं।7वृत्तान्त का आशय है – एक वृत्त का अंत। यात्रा में एक परिवृत की दुनिया गोल है अर्थात हम घूम – फिर कर एक वृत्त पूरा करते हैं। इस प्रकार दुनिया का चक्कर (वृत) पूरा करना – यात्रावृत है। यात्रा के लिये प्रत्येक भाषा में अलग – अलग शब्द हैं। जो घूमने फिरने व एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने की क्रिया में प्रयुक्त होते हैं :– हिंदी – यात्रा;  बंगला – यात्रा, सफर, गमन; गुजराती – यात्रा; मलयालम – यात्रा; पंजाबी – पेंडा; उर्दू – सफर; संस्कृत – यात्रा; मराठी – प्रवास; तमिल – प्रयाणं। अँगरेजी में ‘टूरिज्म’ यात्रा का पर्याय है। लेटिन के ‘टूअर’ से ‘टूरिज्म’ का निर्माण हुआ। लैटिन का ही एक और  शब्द है –‘टोरंस’ जिसका अर्थ एक औजार से है जो पहिये की तरह गोलाकार होता है। शायद इसी से ‘यात्राचक्र’ या ‘पैकेज टूअर’ का विचार सृजित हुआ होगा। 1643 ई० के आसपास विभिन्न क्षेत्रों और राष्ट्रों के भ्रमण के लिये इसका प्रयोग किया गया।वर्तमान में हिंदी में प्रचलित शब्द पर्यटन भी इसी का द्योतक है। पर्यटन विस्तृत भू – भाग में किया जाने वाला भ्रमण। पर् – परिधि, अटन – घूमना – फिरना अर्थात एक परिधि विशेष में घूमना – फिरना। संस्कृत साहित्य में बाणभट्ट के लिये आवारा शब्द का प्रयोग किया गया है। यहाँ आवारा से तात्पर्य गृहस्थ जीवन को छोड़कर इधर – उधर भटकने वाला आवारा है।चरैवेति-चरैवेति-चरैवेति अर्थात चलते रहो – चलते रहो – चलते रहो …। वैदिक युग का सूत्र वाक्य गुरुकुलों में ऋषियों द्वारा अपने शिष्यों को ज्ञान देने के लिये चलते रहने का सन्देश देने के लिये किया था। विद्यार्थी दुनिया भर में सैर करके ज्ञान प्राप्त करते थे। यात्रा शब्द जीवन जगत के अनेक अर्थों को अपने में समेटे हुए है। जीवन एक यात्रा है। धार्मिक अर्थों में मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत यात्रा करता रहता है। संसार मिथ्या ज्ञान है, इसको पार करने के लिये यात्रा करनी पड़ती है । परमात्मा तक पहुँचने की क्रिया इसी यात्रा द्वारा निष्पन्न होती है। दार्शनिक दृष्टि से यात्रा का आशय है कि व्यक्ति जीवन भर यात्रा करता है और मरने के बाद कहते है कि ‘इहलोक की यात्रा’ कर गया और समस्त जीवन क्रिया का ही नाम पड़ गया – जीवन यात्रा ।            

यात्रा साहित्य का विकास

यात्रा शब्द सामान्यत: प्रवास के अर्थ में प्रयुक्त होता है। प्रवास अर्थात अपने घर से दूर बसना या वास करना । ये लोग प्रवासी कहलाते हैं । संचरणशीलता मनुष्य मात्र की प्रवृत्ति है। यात्रा का उद्देश्य भिन्न भिन्न हो सकता है जैसे  –  व्यापार, ज्ञान, मनोरंजन, विलास आदि। व्यक्ति द्वारा एक परिवृत एक निश्चित समय में किया गया भ्रमण यात्रा है तथा यात्रा के समय किये गये अनुभव, संवेदनात्मक अनुभूति, समाज के साथ निर्विकार जुड़ाव का भाव, समाजगत चेतना का यथार्थ बोध तथा अन्य संवेदनात्मक तत्त्व यात्राकार के व्यक्तित्व में पचकर लेखनी के सहारे जब कलात्मक रूप धारण करते है तो यात्रा साहित्य का निर्माण होता है ।सभ्यता विकासक्रम के प्रथम सोपान में आदिम और जंगली मनुष्य वनों में इधर – उधर की खाक छानता फिरता होगा । भोजन की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान – पता नहीं कितनी लम्बी दूरी तय की होगी । “प्राकृतिक आदिम मनुष्य परम घुमक्कड़ था । खेती बागवानी तथा घर द्वार से मुक्त वह आकाश के पक्षियों की भांति पृथ्वी पर सदा विचरण करता था। जाड़े में यदि इस जगह था तो गर्मियों में वहाँ से दो कोस दूर ।”8 सामाजिक जीवन में प्रवेश हुआ और वह नियत स्थान पर घर बनाकर रहने लगा। शायद सुरक्षा की विचार-भावना और एक ही जगह भोजन की उपलब्धता ने ऐसी प्रेरणा दी होगी। सामाजिक जीवन ने उन्हें बहुत सी सुविधाएँ और सुरक्षा प्रदान की, परन्तु सामाजिक नैतिकता ओर नियमों में आबद्ध मनुष्य का मन मुक्ति के लिये छटपटाने लगा। इसी मुक्ति की कामना को हृदय में संजोये मनुष्य ने फिर घर छोड़ा होगा, परन्तु उसे वापस लोटना पड़ता क्योंकि सामाजिक दायित्वों से मुक्ति नही मिली। घुमक्कड़ी के समय उसे अत्यंत रोमांच ओर आनंद की अनुभूति हुई होगी। अब यात्रा पर निकलना उसकी स्वाभाविक प्रवृति हो गई। व्यक्ति जब भी जीवन की समस्याओं, संसार के दुखों, कष्टों ओर मानसिक संताप से घिरा उसने घुमक्कड़ी अपनाई। वह वापस लौटकर यात्रा के अनुभव अन्य लोगों को सुनाता होगा । “दैनिक साहसिक यात्रा के अनुभव का आत्मश्लाघा से पूर्ण वर्णन कदाचित उनकी पहली अभिव्यक्ति रही होगी ।”9जब लोगों में शिक्षा ग्रहण करने की प्रवृति जगी। लोग एक दूसरे से मिलकर अपने अनुभव बाँटने लगे। उस समय आज की भांति शायद अत्याधुनिक साधन नही थे परन्तु “सभ्यता के इस युग में भी लोग प्राय: यात्रायें किया करते थे। जल और स्थल दोनों प्रकार की यात्राएँ होती थी ……लोगों के पास जहाज थे। वे दुनिया का भौगोलिक वृतांत भी खूब जानते थे। वे सभ्य शिक्षित, उदार, साहसी, व्यापार कुशल, कला निपुण अद्यवसायी थे। ….हमारे साहित्य के ग्रन्थ इस काल की यात्राओं से भरे पड़े हैं । वैदिक और लौकिक संस्कृत भाषा के ग्रंथों से भरे पड़े हैं ।”10 वैदिक सूक्तो में अनेक देवताओं की यात्राओं का उल्लेख मिलता है ।मनुष्य का इन यात्राओं के पीछे का प्रयोजन मात्र आत्मिक शांति ही नहीं बल्कि भौतिक क्रियाएँ भी रही हैं। समाज निर्माण के साथ ही व्यक्ति को अपनी आवश्कताओं की पूर्त्तता हेतु अन्य मनुष्यों से संपर्क साधना पड़ा। भय ने मनुष्य को प्रकृति पूजक भी बना दिया। वह किसी व्यक्ति या स्थान विशेष के प्रति कृतज्ञ होता गया और मन में श्रद्धा-भक्ति का भाव उमड़ पड़ा। इस प्रकार किसी तीर्थ या देवस्थान की यात्रा का चलन सामने आया। लोग झुण्डों में किसी उत्सव की भांति यात्राएँ किया करते थे। उनके द्वारा ये यात्राएँ अपने आराध्य के प्रति भक्ति भाव की अभिव्यक्ति थी। तीर्थाटन को पाप शमन का साधन माना जाने लगा और यात्राओं सिलसिला सा चल पड़ा ।मनुष्य की व्यापारिक प्रवृति ने भी यात्राएँ करने के लिये बाध्य किया। वह छोटी से छोटी चीज से लेकर बड़ी से बड़ी चीजों का आदान – प्रदान करने के लिये, स्वयं द्वारा निर्मित चीजों के वितरण, सामान खरीदने तथा अन्य विनिमय का कार्य करने के लिये इधर – उधर भागने लगा। एक दूसरे से बढ़ते  संपर्क ने मनुष्य के व्यक्तिगत संबंधों को विस्तार प्रदान किया । दूर – दूर वैवाहिक संबंध स्थापित किये जाने लगे । एक समय ऐसा भी रहा होगा जब वरयात्रा कई महीनों तक मीलों लंबी दूरी तय करके पहुँचती  होगी  ।प्राचीन काल में आज की भांति गली कूंचे में शिक्षा संस्थान उपलब्ध नहीं थे और न ही आज की सी शिक्षा पद्धति थी। मीलों लम्बे क्षेत्र में कहीं – कहीं गुरुकुल हुआ करते थे। विद्यार्थी ज्ञान प्राप्ति के लिए दुनिया का भ्रमण करता था। शिक्षक भी ज्ञान प्राप्ति और अनुभव के लिये लम्बी यात्राएँ किया करते थे। शंकराचार्य जैसे दार्शनिक द्वारा देश के चारों कोनों की यात्राएँ की गई और चार ज्ञान केंद्र स्थापित किये गए।इस प्रकार प्राणी जगत पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर आज तक चरेवैति – चरेवैति – चरेवैति का आदर्श निभाता आ रहा है। पुरातत्व खोजों में मिले गिरिकंदराओं के कोटरों में मनुष्य वास के प्रमाण, समुद्र व पृथ्वी में समाहित सभ्यताओं की निशानियाँ तथा काल की ये अंतहीन चाल मनुष्य की घुमक्कड़ी के प्रथम बीज बिंदू से लेकर आज तक की कहानी सप्रमाण कहती है। यात्रा मार्ग में मनुष्य को प्रकृति के प्रांगण में फैले अंतहीन सौंदर्य ने अभिभूत किया होगा । धीरे – धीरे प्रकृति के इन आकर्षक दृश्यों – कल कल करती नदियों, विराट पर्वत शिखर, विहँसते झरने, विशाल जंगल, उमड़ता सागर, गिरिकंदराएँ व एकांत में अगणित तारा पंक्तियों से चमकता नील गगन आदि को आत्मसात करके मनुष्य उनके साथ एकाकार हो लगा। इन दृश्यों से हृदयगत भावनाओं का उमड़ता ज्वार मनुष्य को और भी निकट ले गया। प्रकृति से उनकी दैनिक जीवन की आवश्कताओं की पूर्ति तो होती ही थी, साथ ही साथ “प्राकृतिक दृश्यों के आत्मसात एवम् विशिष्ट अनुभूति की यह मानव भावना और आकर्षण ही वस्तुतः यात्रा साहित्य की मूल भित्ति है ।”11 कहा जा सकता है कि मनुष्य की स्वभावगत विशेषता चंचलता, आत्मतुष्टि की खोज तथा भौतिक आवश्कताओं ने उसमें सौंदर्य बोध की दृष्टि विकसित की, परिणामस्वरूप वह अपनी अभिव्यक्ति के लिये यात्रा साहित्य को कलात्मक रूप देने लगा । उसके व्यक्तित्व, ज्ञान, संस्कार और अनुभव ने मिलकर आज के यात्रा साहित्य का भवन तैयार किया ।

स्वरूप    

“चलना मनुष्य का धर्म है जिसने इसको छोड़ा वह मनुष्य होने का अधिकारी नहीं है।”12  शास्त्र भी यही बात अनुमोदित करते हैं कि चलते रहो – चलते रहो – चलते रहो। मनुष्य स्वभावतः ही संचरणशील है। स्थान की आबद्धता उब पैदा करती है। व्यक्ति जीवन में सुख और आनंद चाहता है। व्यक्ति के समस्त कार्यकलाप इसी आनंद को पाने के लिये प्रायोजित हैं। समाज और परिवार की निर्मिति, नियम, और कायदे, व्यक्तित्व पर नैतिक बंधन आदि समस्त प्रायोजित या स्वाभाविक कार्यवृत्तियाँ व्यक्ति को जीवन में सुख देने के लिये हैं। इन सुखों की कामना और प्राप्त करने के भौतिक प्रयास व्यक्ति मन को थका देते हैं। इस थके हुए मन की विश्रांति किसी ऐसी जगह है जहाँ समस्त दायित्वों से मुक्ति मिले और मनुष्य आत्म की पड़ताल में व्यस्त हो जाये। एकांत यात्रा देती हैं। “यात्रा यायावर को तठस्थ दृष्टि देती है। वह रोज के द्वंद्व पूर्ण जीवन में रहकर प्राप्त नहीं होती। अपने जीवन के निकट वातावरण से हटकर निजी परिस्थितियों के दबाव से मुक्त होकर मन में कोई कुंठा नहीं रहती।”13 वह स्वयं को स्वतंत्र महसूस करता है। यात्री बनकर जब व्यक्ति निकलता है तो उसे प्राकृतिक सौंदर्य, नया समाज नई जगह का इतिहास और भूगोल, विभिन्न व्यक्तियों के भिन्न – भिन्न आचरण, रहन – सहन, शिक्षा, व्यवस्थाएँ आदि आकर्षित करते हैं। वहाँ के जीवन संग व्यतीत समय अनुभव प्रदान करता है। उसे अनेक चीजे पसंद आती हैं। अनेक स्वभाव के प्रतिकूल भी होती है। वह मात्र उपरी चीजों को देखता भर नहीं, साथ – साथ उनके विश्लेषण की प्रक्रिया भी चलती रहती है। वह उस परिवेश से एकतान होकर इतिहास के झरोखों से देखता हुआ उनका सांस्कृतिक और मनोवेज्ञानिक विश्लेषण भी करता है। वह उन सबको एक क्षण अनुभव करके जी लेना चाहता है। वहाँ की समस्याएँ निजी बन जाती हैं। एक साहित्यिक यात्री चीजों को देख और विश्लेषण करके नहीं छोड़ देता अपितु तथ्य और सौंदर्य के सहारे उसके शब्द वहाँ का जीवन राग अलापने लगते हैं । “यात्रावृत्त में देश–विदेश की प्राकृतिक रमणीयता, नर – नारियों के विभिन्न जीवन सन्दर्भ, प्राचीन एवं नवीन चेतना की कलाकृतियों की भव्यता तथा मानवीय सभ्यता के विकास के द्योतक अनेक वस्तु चित्र यायावर लेखक के मानस रूप में रूपायित होकर व्यक्तिक रागात्मक उषा से दीप्त हो जाते हैं।”14 उन निजी अनुभूतियों को लेखक ऐसी कलात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करता है कि पाठक मानसिक धरातल पर अपना अस्तित्व विस्मृत कर देता है और वहाँ की सैर करने लगता है ।यात्रावृत्त अकाल्पनिक गद्य विधा है । इसमें यात्राकार सामना की गई परिस्थितियों के यथार्थ अंकन का प्रयास करता है। हालाँकि कलात्मक अभिव्यक्ति होने के कारण कल्पना से नकारा नहीं जा सकता परन्तु यात्रावृत्त में चित्रित प्रत्येक दशा यात्रकार की निजी अनुभूति होती है, अनुभूतियों को वह यथातथ्य सिद्ध कर सकता है। कल्पना का संयोग उसे रोचक बना देता है। लेखक की भावनाएँ उस परिवेश और वहाँ के मनुष्य की जीवनगत संवेदना को आत्मसात करती है, वह यात्रावृत्त मानों वहाँ का मानवीय इतिहास हो। जिसमें घटनाओं के साथ–साथ व्याक्तिचेतना, संस्कार, सांस्कृतिक जीवन, सामाजिक और आर्थिक क्रियाएँ, राजनीतिक और भौगोलिक स्थितियाँ, विचार तथा धारणायें समाहित होती हैं ।इस प्रकार यात्रा साहित्य मनुष्य के उड़न-छू मन द्वारा की गई सैर की निजगत अनुभूतियों से आप्लावित ऐसी अभिव्यक्ति है जो पाठक को उस परिवेश और समय के साथ यात्रा कराती है …अनुभव कराती है…उस जीवन की संवेदनाएँ तथा जीवन को उल्लास व उमंग से भर देती है ।

यात्रा साहित्य के तत्व     

किसी भी विधा की बनावट के मूल में कोई न कोई ऐसी चीज होती है जो उसे अन्य विधाओं से अलगाती है और वो है मूलभूत तत्व । उन तत्वों के आधार पर निर्णय किया जाता है कि वो साहित्यिक है या नहीं । यात्रा वृत्तान्त भी एक साहित्यिक विधा है। अगर उसमें वे तत्व निहित हैं जो उसे साहित्य बनाते हो। यात्रा साहित्य में हम संख्या गिनकर तत्व निर्धारित नहीं कर सकते क्योंकि उसका ढांचा जीवन की भांति अत्यंत विस्तृत है। हम नहीं कह सकते कि वहाँ या कल्पना, या तो तथ्य, या तो वैयक्तिकता,या तो चित्रात्मकता से काम चल जाएगा । यात्राकार के सम्पूर्ण जीवन के अनुभव से लेकर समसामयिक घटनाओं की सृष्टि उसमें समाहित होती है। फिर भी सामान्यत: कुछ तत्व निर्धारित किए जा सकते हैं। यथा :-यात्रावृतांत की रचना करते समय स्थान विशेष की भौगोलिक परिस्थितियों, आचार–विचार, रीति – रिवाज, इतिहास, संस्कृति, परिवेश, प्रकृति, जीवन–कला-दर्शन आदि को दिखाया जाता है। स्थानीयता वह तत्व है जिसके चारों ओर सम्पूर्ण यात्रावृतांत घूमता है। वर्णित स्थान का चयन लेखक की दृष्टि और पसंद पर निर्भर करता है। कोई चीज उसके लिये प्रिय हो सकती है तो कोई उसकी दृष्टि में निकृष्ट कोटि की। यात्रा वृतान्त्त में यात्रा किये गये स्थान की वस्तुस्थिति का चित्रण आवश्यक है अन्यथा बिना उसके अन्य स्थितियों का चित्रण असंभव हैं।तथ्य इतिहास या भूगोल का विषय है, परन्तु यात्रा साहित्य की प्रमाणिकता उसकी तथ्यात्मकता में ही निहित है । लेखक द्वारा दिए गये तथ्य कोई आँकड़े या घटना भर नहीं होते बल्कि उनको अन्य स्थितियों से इस प्रकार संबद्ध किया जाता है कि वे बुद्धि पर बोझ न रहकर सहज ही कथ्य के भाग बन जाते हैं।कल्पना के बिना साहित्य नहीं लिखा जा सकता । यात्रा साहित्य में भी बिना कल्पना के वह साहित्यिक विधा नही बन सकती क्योंकि “लिखते समय अतीत को वर्तमान एवम् अप्रत्यक्ष को प्रत्यक्ष करने की क्षमता इसी कल्पना तत्व में निहित है ।”15 आत्मीयता ही ऐसा तत्त्व है जो पाठक को रचना से जोड़े रखता है । यात्रा में मिला प्रत्येक व्यक्ति महत्वपूर्ण होता है, यात्री का लगाव उनसे मात्र औपचारिक ही नहीं होता अपितु संवेदनात्मक और आत्मीय होता है । यात्रा साहित्य में उस आत्मीयता पूर्ण व्यवहार का वर्णन ही रचना को आत्मीय बना देता है।यात्रा में पड़ने वाले कुछ क्षण के मेहमान मार्ग, जंगल, पर्वत, व्यक्ति और सामाजिक जीवन-यात्री इनमें डूबता उतरता चलता जाता है। इन सब को वह अपने नजरिये से देखता है। यहाँ यात्रा व्यक्ति द्वारा होती है। यात्रा वृत्तान्त में वर्णन नितांत व्यक्तिगत दृष्टि से होता है। “यात्रा के समय उसका व्यक्तित्व ओर भी हावी हो जाता है क्योंकि व्यक्ति को अपनी अभिरुचि यथा-खानपान, वेशभूषा, पारिवारिक सुख सुविधा आदि का जितना तीव्र बोध प्रवास के क्षणों में होता है उतना परिजनों और आत्मीय बंधुओं के साथ रहते नहीं होता !”16वर्णन की रोचकता यात्रावृतान्त्त का मूल तत्व है। पढ़ते समय जो चीज मन में रोमांच पैदा कर दे तथा पाठक की जिज्ञासा शब्द-दर-शब्द बढती ही जाये। रोचकता ही ऐसा तत्व है जो यात्रा साहित्य की पुस्तक को पर्यटन पुस्तिकाओं से अलगाता है। यात्री का उद्देश्य समय निकलने के लिये घूमना–फिरना नहीं होता। वह सैर किए गए क्षणों को अनुभव करता हैं उनसे आत्मीयता स्थापित करता है। यात्राकार का जुड़ाव इस कदर गहरा होता है कि वहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य जनजीवन, समस्याएँ आदि से वह संवेदना के गहरे स्तर पर तादात्म्य तो स्थापित करता ही है साथ ही साथ एक कलाकार की भेदक दृष्टि द्वारा कलात्मक वर्णन से वहाँ के दृश्यों को प्रत्यक्ष कर देता है। संवेदना के गहरे स्तर पर जुड़कर सौन्दर्य दृष्टि वृत्तान्त को साहित्यिक रूप देती है। लेखक का ज्ञान और अनुभव यात्रा में पड़ने वाली प्रत्येक चीज को समझने में सहायक होता है। वह अपने अनुभवों के आधार पर निष्कर्ष निकालता है, तुलना करता है और कारणों की खोज करता है। ज्ञान और अनुभव के बिना यात्रा फीकी लगने लगती है और वह वस्तु वर्णन सा प्रतीत होने लगता है। लेखक के अनुभव ही महत्वपूर्ण नहीं होते बल्कि अभिव्यंजना कोशल भी महत्वपूर्ण होता है। भाषा और शैली का प्रयोग ही वर्णन की रुक्षता से बचाता है। लेखक प्राय: लोटकर स्मृति के आधार पर या यात्रा में लिखी गई डायरी के माध्यम से ही बाद में संपादित करके यात्रावृत्त की रचना करते हैं। वे यात्रा के समय अपने परिजनों या परिचितों को लेखे गये पत्रों को यात्रानुभवों के रूप में काम में लेते हैं। इससे शैली में आत्मीयता या रोचकता आ जाती है। “सामान्य घटनाओं के वर्णनों में बोलचाल की भाषा की सहजता, प्रकृति या भावनात्मक क्षणों के वर्णन में कलात्मकता, दृश्यों के मूर्तिकरण में चित्रात्मकता और बिम्बधर्मिता, विचारों की अभिव्यक्ति में गाम्भीर्य तथा स्थितियों के विश्लेषण में भाषा का प्रोढ़, प्रांजल और बोधगम्य रूप दिखाई पड़ता है !”17  शैली की ही विशेषता है कि पाठक निरंतर जुड़ा रहता है !किसी दृश्य का मूर्तिकरण करना चित्रात्मकता या बिम्बधर्मिता है। लेखक द्वारा यात्रा स्थल का वर्णन इस प्रकार करना की पढ़ते समय दृश्य आँखों के सामने जीवंत हो जाये। बिंब निर्माण करना किसी यात्रा लेखक की सबसे बड़ी सफलता है। यात्रा वृत्त का एक और महत्त्वपूर्ण तत्त्व जो उसका आधार है–समसामयिकता। उपर्युक्त तत्त्वों के बिना तो यात्रावृत्त का निर्माण हो ही सकता, परन्तु उसमे कालगत बोध स्वभाविकता ला देता है। इससे यह अहसास नहीं होता कि हम इतिहास की कोई घटना पढ़ रहे है। हम समय के साथ–साथ यात्रा करने लगते हैं।
संदर्भ1.      वामन शिवराम आप्टे, संस्कृत हिंदी शब्द कोश, कमल प्रकाशन, नवीन संस्करण  2.      वृहत प्रमाणिक हिंदी कोश, लोकभारती प्रकाशन, 2012 पृष्ठ – 7853.      हरदेव बाहरी, हिंदी शब्द कोश, राजपाल प्रकाशन 2013 पृष्ठ – 681 4.      डॉ संध्या शर्मा, हिंदी यात्रा साहित्य की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, बुक पब्लिकेशन, 2015 पृष्ठ – 155.      अद्यतन हिंदी शब्द सागर, साहित्यागार प्रकाशन पृष्ठ –7826.      डॉ संध्या शर्मा, हिंदी यात्रा साहित्य की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, बुक पब्लिकेशन, 2015 पृष्ठ – 15 77.      सहज समांतर कोश, राजकमल प्रकाशन, 2015 पृष्ठ – 7468.      राहुल सांकृत्यायन, घुमक्कड़ शास्त्र, हिंदी समय.कॉम से9.      डॉ हरसिमरन कोर भुल्लर, समकालीन यात्रा वृत्तों में सांस्कृतिक सन्दर्भ, के.के. पब्लिकेशन 2009, पृष्ठ – 1   10.  सुरेन्द्र माथुर,हिंदी यात्रा साहित्य का उद्व और विकास, 1962 , पृष्ठ – 1211.  डॉ संध्या शर्मा, हिंदी यात्रा साहित्य की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि,  बुक पब्लिकेशन, 2015 पृष्ठ -29 12.   राहुल सांकृत्यायन, घुमक्कड़ शास्त्र, हिंदी समय.कॉम से13.   मोहन राकेश,परिवेश, भारतीय ज्ञानपीठ 1967 पृष्ठ-7514.   रामचंद्र तिवारी, हिंदी का गद्य साहित्य, विश्वविद्यालय प्रकाशन, 2015 पृष्ठ – 52715.   डॉ हरिमोहन, साहित्यिक विधाएं : पुनर्विचार, वाणी प्रकाशन 2005 पृष्ठ – 27616.   डॉ संध्या शर्मा, हिंदी यात्रा साहित्य की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, बुक पब्लिकेशन, 2015 पृष्ठ – 2217.   डॉ हरसिमरन कोर भुल्लर, समकालीन यात्रा वृत्तों में सांस्कृतिक सन्दर्भ,के.के. पब्लिकेशन 2009,  पृष्ठ- 25[साभार: जनकृति के अप्रैल 2019 अंक में प्रकाशित]