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रात

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रात -ओम प्रकाश नौटियाल
दूर दूर फैली रही, तिमिर ढकी वह रात
भोर किरण की टोह में , खिसकी सिसकी रात

कुटिया में दम तोडती ,उस वृद्धा की साँस
उसकी पीर न हर सकी,सरकी भटकी रात

मेघ नाद संवेग से, दिया कलेजा चीर
रो बैठी बरसात में , हिचकी ले ले रात

लुप्त गुप्त थी चाँदनी, ना तारों की दीद
अंबुद की ओढे चुनर , सहमी कँपती रात

अंगना में कुम्हार के , साये घने घनेर
माटी चिपकी चाक पर, थकती तकती रात

इस अँधियारे घोर में , जुगनु जिये औकात
लेट नीम की डाल पर , पत्ते गिनती रात
-ओंम प्रकाश नौटियाल, बड़ौदा , मोबा.9427345810

राजेंद्र यादव : साहित्य-सरोवर का ‘हंस’: ओमप्रकाश कश्यप

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Rajendra.yadav


राजेंद्र यादव : साहित्य-सरोवर का ‘हंस’

ओमप्रकाश कश्यप

‘‘विडंबना यह है कि नितांत अधार्मिक साधन ही धर्म की रक्षा करते हैं, मानवता को बचाए रखने के लिए निरंकुश अमानवीयता का इस्तेमाल करना पड़ता है, नैतिकता की शुचिता बनाएरखने के लिए न जाने कितनी अनैतिकताओं का सहारा लेना पड़ता है. गांधी जी की ‘गरीबी’ कितनी महंगी पड़ती थी—इसे खुद सुशीला नैयर ने बताया है….सही है कि साध्य ही साधनों को ‘जस्टीफाई करता है, मगर साध्य स्वयं इतना ‘महान’ है कि उसके लिए हर तरह का साधन सही है, तो सवाल उठेगा कि साध्य की महानता तय करने वाले कौन हैं? रावण गलत है, राम सही या कौरव अधार्मिक हैं, पांडव धार्मिक—यह तय करने वाले राम और पांडव ही हैं न, बल्कि उनसे भी ज्यादा उनकी विजय उन्हें सही बनाती है. एक ही धर्म के दो संप्रदाय एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं, क्योंकि दोनों अपने-अपने कॉज के प्रति सच्चे होते हैं….अगर हम साध्य और साधन के सवाल को सिर्फ नैतिक या बौद्धिक स्तर पर ही रखेंगे, तो शायद कहीं नहीं पहुंच पाएंगे. या तो साध्य(कॉज) ही हवाई लगने लगेगा या सारे साधन अनैतिक.’’ —राजेंद्र यादव, खंड-खंड पाखंड, पृष्ठ 21. 
खुद को ‘हंस’ का पुराना पाठक मानता हूं. इधर कुछ महीनों से संबंध टूटा हुआ था. इसलिए नहीं कि राजेंद्र यादव(अगस्त 28 1929, आगरा—अक्टूबर 28 2013, मयूरविहार, दिल्ली) के लेखन या उनके द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों में अविश्वास था. बस इसलिए कि लेखन-पाठन की प्राथमिकताओं में बदलाव था. ‘हंस’ ही क्यों दूसरी साहित्यिक पत्रिकाओं के संपर्क में भी कम ही रहा. इसका कभी, कोई मलाल भी नहीं हुआ. क्योंकि सामाजिक बदलाव के जिन मुद्दों पर ‘हंस’ बात करता था, या जिन विषयों को राजेंद्र यादव अपने संपादकीय में उत्तेजक बहस के रूप में उठाते थे, उनमें भी वे जिनमें मेरी विशेष रुचि थी—उन्हें विस्तार देती दूसरी और महत्त्वपूर्ण सामग्री आसानी से अन्यत्र उपलब्ध थी. पत्रिका के रूप में ‘हंस’ की जो सीमा थी, उसमें राजेंद्र जी की तमाम सदाशयता और प्रतिबद्धता के बावजूद वैचारिक सामग्री कम ही आ पाती थी. कहानी की पत्रिका के रूप में प्रतिष्ठित ‘हंस’ को, उसके बड़े पाठक-लेखक वर्ग से काटकर विशुद्ध वैचारिक पत्रिका में बदल देना संभव भी नहीं था. वैसे भी राजेंद्र यादव का प्रथम अनुराग कहानी से था. साहित्य में उनकी प्रतिष्ठा नई कहानी आंदोलन के प्रवर्त्तक के रूप में भी थी. लेकिन कहानी, विशेषकर नई कहानी के नाम पर पिछले कुछ दशकों में जो लिखा जा रहा था, वह अपन के गले नहीं उतरता था.
स्वयं राजेंद्र यादव यह मानते थे कि हिंदी कहानी, कहानी की मूल विशेषता कहानीपन को बिसराकर अधिक से अधिक वर्णनात्मक होती जा रही है. इस व्यतिक्रम से कहानी ने न केवल अपने बंधे-बंधाए पाठक खोए हैं, बल्कि उसकी कसावट एवं प्रभाव में भी कमी आई है. प्रतिष्ठित कहानी-पत्रिका के संपादक की यह निराशा विचारणीय थी. इसके बावजूद ‘हंस’ अपनी सर्वाधिक चहेती पत्रिका बनी थी, तो केवल अपने लेखों तथा उनसे भी अधिक राजेंद्र जी के संपादकीय के नाते. उसमें वे ज्वलंत मुद्दों को पूरी बेबाकी और लेखकीय निष्ठा के साथ उठाते थे. ‘हंस’ के लेखों में मैं हमेशा एक अलंघ्य ऊंचाई पाता रहा. शायद इसीलिए उसमें न तो कभी छपा, न ही एकाध अवसर को छोड़कर कोई रचना प्रकाशन के लिए भेजी. उसपर ठसक यह कि ‘हंस’ या किसी अन्य पत्रिका में न छपने का कभी मलाल भी नहीं हुआ. कहानी विधा में अरुचि के बावजूद ‘हंस’ को नियमित खरीदता और पढ़ता जरूर रहा.
विचारों की डोर कहीं न कहीं ‘हंस’ की वैचारिकी से जुड़ती थी, इसलिए कभी निराश नहीं होना पड़ता था. कुछ और चाहे न हो, ‘हंस’ का संपादकीय मन को अनूठी तृप्ति दे जाता था. कुछ वर्ष पहले ‘हंस’ में आत्मस्वीकृतियों का दौर चला था. ईसाई धर्म में आत्मस्वीकृति को धार्मिक मान्यता प्राप्त है. गिरजाघर में पादरी के सामने जाकर व्यक्ति अपने अपकर्मों को स्वीकार कर बोझ मुक्त हो सकता है. आदमी देवता नहीं है. देवता नामक मिथ उसने मनुष्यता के आदर्श के रूप में गढ़े हैं. अपनी सीमाओं के चलते मनुष्य गलती भी करता है. उन गलतियों से कई बार सबक लेता है, कई बार नहीं भी लेता. फिर भी जाने-अनजाने हुई गलती या अपराध की आत्मस्वीकृति मानव-मन से अनावश्यक विकारों को दूर कर उसे तनावमुक्त करती है. ‘आत्मस्वीकृति’ अथवा ‘अपराध-स्वीकृति’ के मूल में यही अवधारणा है. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि पश्चिम में धर्मों का विकास अध्यात्मपरक होने से ज्यादा तत्वपरक ढंग से हुआ है. भारतीय दर्शनों में जो स्थान ब्रह्म का है, यूनानी दर्शन में वही ‘शुभ’ का है. उसके अनुसार ‘शुभ’ नैतिक उत्थान की सर्वोच्च अवस्था है. अपने जीवन को ‘शुभता’ की ओर निरंतर अग्रसर करना, मानव-मात्र का लक्ष्य है. इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य को अपनी कमजोरियों की जानकारी हो. उन गलतियों का बोध हो जो उसने जाने-अनजाने की हैं. उनके लिए क्षमा-याचना और पुन: न दोहराने का संकल्प ही आत्मस्वीकृतियों को सार्थक बनाता है. आत्मस्वीकृतियों के पीछे निहित यह दर्शन मनुष्य को अपनी दुर्बलताओं को स्वीकारने का साहस जगाकर उनमें बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा जगाता है. हिंदू धर्म में यह काम ईश्वर भरोसे छोड़ दिया जाता है. 
भारतीय प्रज्ञा ने दर्शन की अनेक ऊंचाइयों को छुआ, अपनी उपलब्धियों से विश्व-भर को चमत्कृत भी किया है. इसके बावजूद यदि समग्र रूप से देखें तो उसमें आस्था का अनुपात कुछ ज्यादा ही रहा है. अपनी उपलब्धि पर गुमान करने, आत्मश्लाघा की प्रवृत्ति वैदिक मनीषियों में आरंभ से ही थी. ऋग्वेद की ऋचाओं के अस्तित्व में आने में जो समय लगा सो लगा. बाद के मनीषियों की सारी की सारी मेहनत उन्हें सहेजने तथा उनका कर्मकांडीकरण करने में नजर आती है. मौलिकता और ज्ञान के विस्तार पर बहुत कम ध्यान गया है. वैदिक ऋचाओं का गायन कैसे हो, यह सामवेद में समझाया गया. यजुर्वेद में उसके कर्मकांड पक्ष को विस्तार दिया गया. यज्ञों के प्रकार तथा उनके आयोजन पर विस्तार से लिखा गया. अथर्ववेद सहित बाकी उपनिषदों में भी उसी को आगे बढ़ाया गया है. कई स्थानों पर तो मौलिकता की चिंता किए बगैर ऋग्वेद के मंत्रों को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर दिया गया है.
आस्था को रूढ़ि अथवा जीवन की अनिवार्यता के रूप में थोपने का दुष्परिणाम यह हुआ कि मनुष्य को चलने के लिए बंधी-बंधाई लीक मिली. जिसमें आदमी के अपने विवेक, निर्णय-सामर्थ्य, रुचि, स्वभाव आदि का हस्तक्षेप अनपेक्षित था. इसका कुफल यह हुआ कि सामाजिक-सांस्कृतिक मामलों में मनुष्य विवेक के उपयोग से निरंतर कटता गया. धार्मिक आडंबरवाद के चलते गलतियों को सार्वजनिक रूप में स्वीकारने के बजाए उनपर पर्दा डालने की परंपरा बनी रही. जबकि धार्मिक रूप में स्वीकार्य होने के कारण पश्चिम में पश्चाताप और अपराध-स्वीकृति को साहित्यिक मान्यता प्राप्त हुई. रूसो के बाकी लेखन के साथ उसकी आत्मस्वीकृतियां भी पर्याप्त चर्चित रही हैं. भारत में ऐसे विषय उठाने की परंपरा न होने के बावजूद ‘हंस’ ने उसकी शुरुआत की थी. ये राजेंद्र जी ही थे जो नई पहल से घबराते नहीं थे. न आलोचकों की कभी परवाह करते थे. उनमें गजब का लोकतांत्रिक साहस था. अभिव्यक्ति और विचार के लिए बड़े से बड़ा खतरा उठाने को वे हरदम तैयार रहते थे. उनके सत्साहस के फलस्वरूप ‘हंस’ हिंदी-पट्टी की अनेक बौद्धिक-सामाजिक जड़ताओं पर प्रहार करने में कामयाब हुई, विशेषकर दलित और स्त्री-मुक्ति के सवालों को लेकर. इसके लिए राजेंद्र जी को सार्वजनिक तथा व्यक्तिगत रूप से यथास्थितिवादियों की आलोचनाओं, यहां तक कि व्यक्तिगत हमलों का शिकार भी होना पड़ा. लेकिन वे अपने मोर्चे पर अडिग रहे. उनके समय में नई और उत्तेजक बहसों को जितना वैचारिक स्पेस ‘हंस’ ने दिया, हिंदी की दूसरी पत्रिकाएं शायद वैसा कर सकीं. 
‘हंस’ की उस बहुचर्चित श्रंखला में कई नामी-गिरामी लेखक-लेखिकाओं की आत्मस्वीकृतियां छपी थीं. तथाकथित शुद्धतावादियों को उसमें ‘अनर्थ’ ही दिखा था. आत्मस्वीकृति का साहस दिखाने वाले लेखक भी सर्वथा निर्दोष न थे. वे नैतिक और सामाजिक अपराधों को तो थोड़े-बहुत स्पष्टीकरण के साथ स्वीकारने का साहस दिखा रहे थे, किंतु कानूनी और आर्थिक भ्रष्टाचार के प्रति आत्मस्वीकृति का साहस पूरी तरह गायब था. कुल मिलाकर आत्मस्वीकृतियों का वह सिलसिला लेखिकाओं की ‘बोल्डनेस’ तथा लेखकों के विचलन तक सिमटा हुआ था. शायद इसीलिए भी आलोचकों को सवाल उठाने का अवसर मिला था. आत्मस्वीकृतियों का सिलसिला ज्यादा लंबा नहीं चल सका. यूं भी अपने अपकर्म सार्वजनिक करने के लिए शेर का कलेजा चाहिए, जो भारतीय परिवेश में कदाचित असंभव है. बहरहाल, शुद्धतावादियों के बीच राजेंद्र जी की उस पहल की भी वैसी ही आलोचना हुई जैसी ‘हंस’ के दूसरे प्रयासों को लेकर होती थी. नाराजगी के असली कारण दूसरे थे. बहाना देह-संबंधों पर बेबाक लेखन को बनाया गया. आलोचकों में अधिकांश वही थे जो अजंता-एलोरा की गुफाओं में भारतीयता का गौरव खोजते आए हैं, ‘गीत-गोविंद’ की प्रशंसा करते न अघाते थे; और जिनके लिए भारतीय कविता का श्रेष्ठतम हिस्सा ‘रीतिकाल’ से आता है. जिनके लिए वर्ण-भेद समर्थक तुलसी हिंदी के सबसे बड़े कवि हैं. 
दरअसल जिस सामाजिक न्याय के प्रति ‘हंस’ समर्पित था, उसका ठोस संवैधानिक आधार था. एक संवैधानिक प्रतिबद्धता की ओर से आंखें मोड़ लेने का एकमात्र हथियार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का हो सकता था. इसलिए जब-जब ‘हंस’ और राजेंद्र यादव पर उंगली उठी, मामला ‘संस्कृति पर खतरा‘ बताया गया. इसके बावजूद उनके नेतृत्व में ‘हंस’ दमित अस्मिताओं के उभार के लिए निरंतर पहल करता रहा. स्त्री और दलित स्वाभिमान की लड़ाई को उसने हिंदी पट्टी पर सबसे बड़ा मंच दिया. इससे यथास्थितिवादी शक्तियां उसके विरुद्ध लामबंध होती गईं. ‘अक्षर प्रकाशन’ और ‘हंस’ के जमाने से जो मित्र उनके साथ लगे थे, वे अपने लिए सुरक्षित कोना देखकर उसमें समाने लगे. हंस कार्यालय को ‘एक ऐसा षड्यंत्र कक्ष कहा गया, जहां हर समय किसी को उठाने-गिराने, पटाने-मिटाने की खुराफातें होती रहती हैं….’ उसे ‘अपराध डैन(मांद)’ की संज्ञा दी गई, ‘जहां काला चश्मा चढ़ाए, पाइप फूंकता एक माफिया-डॉन ठेठ फिल्मी अंदाज में साहित्यिक जालसाजियों का संचालन करता रहता है.’ इसके बावजूद अपनी लेखकीय प्रतिबद्धताओं के साथ राजेंद्र जी डटे रहे. इससे उन्हें नए मित्र और संगी-साथी मिले. फलस्वरूप कारवां बढ़ता गया. राजेंद्र जी के संपादन में ही ‘हंस’ ने कांतिकुमार जैन के संस्मरण सिलसिलेवार छापे थे, जो खूब चर्चित हुए. उनके अलावा समाजविज्ञान पर योगेंद्र यादव जी ने उसमें लिखा. स्त्री, दलित अस्मिता तथा अल्पसंख्यक मुद्दों पर ज्वलंत सामग्री ‘हंस’ में लगातार आती रही, जिसने हिंदी पट्टी में वैचारिक आंदोलनों को गति दी.
कोई भी पत्रिका अपने समय के आंदोलनों, समाजार्थिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों से निरपेक्ष नहीं रह सकती. साहित्यिक पत्रिका पर तो यह नियम और भी गंभीरता से लागू होता है. राजेंद्र यादव के नेतृत्व में ‘हंस’ ने सदैव समसामयिक विषयों को विमर्श का मुद्दा बनाया. प्रेमचंद के जन्मदिन 31 जुलाई 1986 से इस पत्रिका ने राजेंद्र यादव के संपादन में जब दुबारा दस्तक दी तो उसने बहुत जल्दी अपना विशिष्ट पाठक-वर्ग बना लिया. एक साहित्यिक पत्रिका की खूबी पाठक की बौद्धिक क्षुधा को शांत करना-भर नहीं है, बल्कि उसे नई परिस्थितियों और चुनौतियों को समझने तथा और उनका समाधान खोजते रहने की समझ देना भी है. ‘हंस’ ने यही किया, इसलिए वह समाज में बड़े बौद्धिक आयोजनों की गवाह और उत्प्रेरक बन सकी. आलोचकों के कटाक्ष, ‘हंस’ कार्यालय को ‘छज्जु का चौबारा’, ‘राजदरबार’ तथा वहां आनेवालों को ‘राजदरबारी’ कहने के बावजूद यह पत्रिका गत 27 वर्ष की अपनी पुनः-प्रकाशन अवधि में, जनसरोकारों से शायद ही कभी दूर गई हो. प्रेमचंद का नाम लिए बिना ही राजेंद्र जी उनकी परंपरा को निरंतर विस्तार देते रहे. जनसरोकारों के प्रति ‘हंस’ की प्रतिबद्धता का क्या कोई ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य भी है? यह जानना भी जरूरी है, इसके लिए स्मृति में तत्कालीन दौर की कुछ यादें ताजा करनी होंगी.
भारत का स्वतंत्रता आंदोलन कई मायने में अनूठा था. यह बोध कि देश के जमींदार, साहूकार, व्यापारी और पुरोहित वर्ग के स्वार्थ अंग्रेजों से जुड़े हैं, और वे सरकार के विरोध में जाने वाले नहीं हैं—जनसाधारण के संगठित विद्रोह की प्रेरणा बना था. यह वर्ग सामाजिक-राजनीति मुक्ति की आस लेकर आंबेडकर और गांधी के नेतृत्व में स्वाधीनता संग्राम में उतरा था. उसे अंग्रेजों से उतनी शिकायत न थी, जितनी अपने ही देश के धर्म के ठेकेदारों तथा जाति के अलंबरदारों से जो हजारों वर्षों से उनका शारीरिक-मानसिक शोषण करते आए थे. उन्हें लगता था कि देश की आजादी उनके लिए राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक मुक्ति का संदेश भी लेकर आएगी. लेकिन आजादी मिलते ही जनता को किनारे कर वर्चस्वकारी शक्तियां पुनः सत्ता पर सवार हो गईं. इससे जनाक्रोश बढ़ना स्वाभाविक था. सत्ताओं के खेल में उनके साथ हमेशा छल हुआ है—यह एहसास उन्हें लामबंद कर रहा था. जयप्रकाश नारायण ने ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया तो वे नई स्फूर्ति एवं प्रेरणाओं के साथ पुनः एकजुट होने लगीं. उस आंदोलन फलस्वरूप अस्तित्व में आई ‘जनता पार्टी’ अपने प्रमुख नेताओं के वर्गीय सोच का शिकार थी. असल में इंदिरा विरोध के नाम पर लोकतंत्र विरोधी, सत्ता की भूख से आकुल-व्याकुल, प्रतिक्रियावादी ताकतें एकजुट हुई थीं. उनके लिए राजनीतिक सत्ता वर्षों पुराने सांस्कृतिक वर्चस्व को बनाए रखने का माध्यम थी. इस वर्ग के नेताओं द्वारा सामूहिक हितों पर स्वार्थ को वरीयता देने के कारण संपूर्ण क्रांति का लक्ष्य पूरा न हो सका. क्रांति-संकल्प के साथ तेजी से उभरी ‘जनता पाटी’ कांतिविहीन होकर बिखर गई. देश को बेहतर राजनीतिक विकल्प देने का जनता पार्टी का प्रयोग असफल हुआ था. 1984 में कांग्रेस का पुनः सत्ता में आना, इंदिरा गांधी की हत्या, राजीव गांधी का प्रधानमंत्री बनना, फिर उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार और नाकारापन के आरोप, तत्कालीन उथल-पुथल से भरपूर भारतीय राजनीति की ये प्रमुख घटनाएं थीं. इससे भारत के राजनीतिक हलकों में थोड़ी-बहुत अस्थिरता पनपी, किंतु सकारात्मक परिणाम यह हुआ कि सहस्राब्दियों से शोषण, उत्पीड़न, तिरष्कार और उपेक्षा का दंश झेलती आई जातियों में आत्मसम्मान और स्वाभिमान की भूख जागने लगी थी. अभी तक दूसरों के आदेश अथवा इशारों पर मतदान करने वाले लोग अपने नफा-नुकसान को देख स्वतंत्र निर्णय लेने लगे. विशेषकर स्त्री और दलित, लोकतांत्रिक माहौल का फायदा उठाने के लिए एकजुट हो रहे थे. उसके फलस्वरूप शरद यादव, मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, मायावती, एच. डी. देवगौड़ा, रवि राय, रामविलास पासवान, चौ. चरण सिंह, देवीलाल जैसे हाशिये के अनेक नेता अचानक महत्त्वपूर्ण हो उठे थे. लेकिन बहुमत के आधार पर सत्ता-शिखर पर पहुंचना एक बात है तथा शिखर पर रहकर देश का नेतृत्व करना दूसरी. शताब्दियों से शासित होते इन वर्गों में शासन करने का कोई संस्कार न था. उनकी संस्कृति ही ऐसी थी, जो सत्ता से अनुकूलन करना सिखाती थी. इसलिए लोकतंत्र के सहारे सत्ता-शिखर पहुंचे उत्पीड़ित वर्गों के नेताओं की हैसियत, विशेषकर उत्तर और मध्य भारत के राज्यों में दूसरे दर्जे की थी. यदा-कदा अवसर भी मिलता था तो अनुभव और आत्मविश्वास की कमी से सरकार चला पाने में नाकाम सिद्ध होते थे. लोकतंत्र की सफलता सामान्य सहमति और विरोधों के समाहार पर टिकी होती है, उसके लिए आवश्यक अनुभव उन्हें न था. दक्षिण भारत में सांस्कृतिक वर्चस्व के विरुद्ध संघर्ष अपेक्षाकृत पहले शुरू हो चुका था, इसलिए वहां के हालात में किंचित सुधार था. तत्कालीन परिवर्तनकामी राजनीति की वह स्वाभाविक विडंबना थी.
ऐसे ही चुनौतीपूर्ण समय में ‘हंस’ का पुनर्प्रकाशन आरंभ हुआ. एक प्रबुद्ध साहित्यकार के रूप में राजेंद्रजी सामाजिक-राजनीतिक हलचल को बहुत करीब से देख रहे थे. वे समझ भी रहे थे कि वैकल्पिक राजनीति को मुख्यधारा की राजनीति बनाने के लिए जमीनी तैयारी की जरूरत है. यह कार्य स्त्री, दलित, अल्पसंख्यक सहित अन्य वंचित जमातों के प्रबोधीकरण तथा उनके आत्मविश्वास को लौटाने के साथ ही संभव है. दरअसल सांस्कृतिक पूर्वाग्रह प्रायः इतने जटिल होते हैं, कि एक बार उनके चंगुल में फंस जाने के बाद व्यक्ति की हालत अनुसरणकर्ता जैसी हो जाती है. इसके विपरीत अभिजात संस्कृति का समस्त तामझाम सत्ता से अनुकूलन पर टिका होता है. वहां शिखर पर बने रहने हेतु आवश्यक समझौता की अंदरूनी छूट होती है. ग्राम्शी ने समानता और स्वतंत्रता हेतु अभिजन वर्गों के सांस्कृतिक वर्चस्व से मुक्ति को जरूरी माना है. इसके लिए उसने अभिजन संस्कृति के समानांतर जनसंस्कृति के उभार पर जोर दिया है. उसके अनुसार दास इसलिए दास होता है, क्योंकि उसकी संस्कृति उसको दास होना सिखाती है. डॉ. आंबेडकर का कहना था कि गुलाम को उसकी गुलामी का एहसास करा दो, वह क्रांति कर देगा. राजनीतिक चेतना सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना की अनुगामी है. इसलिए अंबेडकर और ग्राम्शी दोनों, सामाजिक-सांस्कृतिक मुक्ति को राजनीतिक स्वतंत्रता जितनी ही महत्त्वपूर्ण मानते थे. ‘हंस’ द्वारा उठाए गए प्रमुख मुद्दों में स्त्री, दलित, अल्पसंख्यक आदि प्रमुख थे. राजेंद्र यादव ने पिछड़े वर्ग को छुआ तक नहीं था. न ही कभी पिछड़े साहित्य की मांग को आगे रखा था. राजेंद्र यादव स्वयं पिछड़े वर्ग से आते थे; और उनकी दमदार उपस्थिति को यदि पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व स्वीकार लिया जाए तो यह परिकल्पना आसान हो सकती है कि सदियों से उत्पीड़न का शिकार रहे वर्गों यथा पिछड़ों, स्त्री, अल्पसंख्यक आदि को लेकर ब्राह्मणवाद के विरुद्ध बड़ा मोर्चा बनाने का संकल्प ‘हंस’ की शुरुआत से ही उनके मन में था. जिस तरह से उन्होंने अकेले ही ब्राह्मणवाद के विरुद्ध मोर्चा साधा, उसके आधार पर उन्हें हिंदी का वाल्तेयर कहा जा सकता है.   
राजेंद्र यादव राजनेता न थे. उन्हें हम लेखक-विचारक कह सकते हैं, किंतु उनका पहला प्यार रचनात्मक साहित्य से था. प्रेमचंद ने लिखा था—‘साहित्य राजनीति के आगे जलने वाली मशाल है.’ यही सूत्र राजेंद्रजी का मार्गदर्शक, पथप्रदर्शक सिद्ध हुआ. उम्मीदों को बचाए रखने, नए सपनों को गढ़ने की चाहत, अपने बूते आगे बढ़ने का आत्मविश्वा, घोर नैराश्य के विरुद्ध आशाबाद उनके आरंभिक उपन्यास ‘प्रेत बोलते हैं(सारा आकाश)’ की भूमिका में रामधारी सिंह दिनकर की कविता-पंक्ति के माध्यम से कुछ यों प्रकट हुआ था—‘सेनानी करो प्रयाण अभय भावी इतिहास तुम्हारा है/ये नखत अमा के बुझते हैं, सारा आकाश तुम्हारा है.’ यह अनायास न होकर भविष्य की कार्ययोजना का प्रेरणा बिंदू था. अपने लेखों, संपादकियों के माध्यम से राजेंद्र यादव दमित वर्गों को इसी प्रयाण-यात्रा के लिए अनुप्रेत करते रहे.
प्रेमचंद को आदर्श मानने वाला, साहित्य को समाज और राजनीति की मशाल बनाने को उद्धत कलम का एक योद्धा यही कर सकता था. कह सकते हैं कि राजेंद्र यादव को कहानीकार आजादी के बाद के युवामन के सपनों और समाज के कड़वी हकीकतों ने बनाया था, किंतु उनके संपादक को गढ़ने में प्रेमचंद के अलावा जयप्रकाश नारायण के संघर्ष तथा उनके ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन का भी योगदान था. ‘हंस’ से पहले उन्होंने ‘अक्षर प्रकाशन’ की शुरुआत अपने कुछ मित्रों के साथ की थी. हिंदी में जहां पुस्तकों का सीधा बाजार न हो, जहां प्रकाशकों को सरकारी खरीद पर निर्भर रहना पड़ता हो, वहां एक लेखक के लिए जिसकी अपनी नैतिक प्रतिबद्धताएं भी होती हैं, प्रकाशन चलाना हंसी खेल न था. प्रकाशन की असफलता और नौकरी न करने की जिद के बीच ‘हंस’ की स्थापना, ऐसे ही संघर्षपूर्ण जिजीविषा की देन थी. आगे जैसा कि सभी जानते हैं, अपनी स्थापना के बाद ‘हंस’ ने जो डगर पकड़ी, उसकी सही-सही परिकल्पना संभवतः राजेंद्रजी को भी नहीं रही होगी. लेखकों-विचारकों के मामले में प्रायः ऐसा होता है. वे किसी नई कृति या विचार को जन्म देकर, उसे अपनी तरह विस्तार देने के लिए आगे बढ़ते हैं. मगर एक स्थिति ऐसी आती है, जब कथानक स्वयं आगे बढ़ने लगता है. लेखक की भूमिका उसकी डोर पकड़कर पीछा करने तक सिमट जाती है. यही बात विचार के भी साथ है. उसका बीज तत्व मानस में उमगता है. उसके बाद विचारक को ज्यादा कुछ नहीं करना पड़ता. दिमाग में पहले से मौजूद प्रत्ययों, अवधारणाओं तथा तर्कशक्ति के ताने-बाने के बीच वह स्वयं विस्तार लेने लगता है. ‘हंस’ के साथ भी यही हुआ था. एक कहानी के रूप में आरंभ हुई पत्रिका ने अपने विशिष्ट सरोकार के साथ जैसे ही जनमानस में अपनी पहचान निर्मित की, उसे वहीं से खाद-पानी मिलने लगा. उसके बाद ‘हंस’ के संपादक मंडल का काम पत्रिका को चेतना-संपन्न पाठकों की इच्छा और जनसरोकारों से जोड़कर आगे बढ़ाते रहने तक सिमट गया.
भारत में जाति व्यवस्था का प्रभाव या कहो कि कुप्रभाव इतना गहरा है कि बड़े से बड़ा लेखक विचारक उसके प्रभाव में आ ही जाता है. बचपन से बड़ा होने तक व्यक्ति जिन जातीय संस्कारों के बीच वह पलता और बड़ा होता है, उनसे एकाएक मुक्त हो पाना असंभव होता है. यदि बचना भी चाहे तो दूसरे लोग उसकी पहचान जाति नाम के पुच्छल्ले से जोड़कर करने लगते हैं. इसलिए आजाद भारत के निर्माण को जाति और संप्रदाय के प्रभावों से दूर रखने हेतु आवश्यक व्यवस्थाएं संविधान निर्माताओं द्वारा की गई थीं. इसके बावजूद कुछ जातियों की सत्ता पर पकड़ इतनी गहरी थी कि वे लोकतंत्र को भी अपने स्वार्थ और सुविधा के अनुसार हांक सकती थीं. लेकिन विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार द्वारा मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करना एक ऐसा निर्णय था, जिससे जाति-व्यवस्था जो अभी तक बहुसंख्यक वर्गों के शोषण का माध्यम थी—परिवर्तन का उपकरण बनने लगी. जिस जाति के नाम पर दलितों और पिछड़ों का शोषण होता आया था उसी को हथियार बनाकर लोग संगठित होने लगे. दूसरों के लिए, दूसरों के कहने पर मतदान करते आई दमित जातियों के मतदाताओं ने पहली बार अपने जाति/वर्ग के नेताओं को संसद और विधानसभा में पहुंचाना आरंभ कर दिया. संख्या में बहुसंख्यक होने के नाते उन्हें यह अधिकार भी था. जरूरत इस अधिकार चेतना को जन-जन तक पहुंचाने की थी.
बहरहाल, मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद जो देश-भर में उपद्रव हुए, उसके विरोध में जैसी राजनीतिक लाठियां भांजी गईं, उससे ‘हंस’ को परिवर्तनकामी शक्तियों के बीच पैठ बनाने में मदद की. हालांकि इसकी उन्हें कीमत भी चुकानी पड़ी. आरंभ में पत्रिका के साथ ऐसे बहुत से लेखक जुड़े जो राजेंद्रजी के कहानीकार को तो महत्त्व देते थे, किंतु परिवर्तनकामी विचारधारा या साहित्य की पत्रिका को वैचारिक प्रतिबद्धता जोड़ना उन्हें स्वीकार न था—वे धीरे-धीरे उनसे किनारा करने लगे. राजेंद्र यादव को उसकी कोई चिंता न थी. इस मामले में गजब के लोकतांत्रिक थे. दूसरों की असहमतियों का सम्मान करना उन्हें आता था. असहमतियों के बीच अपनी वैचारिक निष्ठा को सुरक्षित रखने हेतु उनमें पर्याप्त आत्मविश्वास भी उनमें था. उनके नेतृत्व में दमित चेतनाओं को स्वर देने की जो डगर ‘हंस’ ने पकड़ी, उसपर साथ देने के लिए नए और समर्पित यायावार पहले से ही प्रतीक्षारत थे.
1991 के बाद देश में आर्थिक उदारीकरण के नाम पर पूंजी और कारपोरेट घरानों का जल-जंगल और जमीन को लूटने का खेल चला. नतीजा यह हुआ कि पूंजीवादी ताकतें समाज और सरकार पर अपनी पकड़ बनाने लगीं. मनुष्य का अवमूल्यन कर उसको महज ‘उपभोक्ता’ मान लिया गया. यह साम्राज्यवाद का नया रूप था, जिसमें राष्ट्रों को तलवार के बजाय आर्थिक नीतियों द्वारा योजनाबद्ध तरीके से समर्पण के लिए मजबूर किया जाता था. ‘हंस’ ने इस मोर्चे पर भी काम किया. जहां जरूरी लगा, राजेंद्रजी ने कथित उदारीकरण के नाम पर कारपोरेटीकरण का जमकर विरोध किया.
राजेंद्र यादव के ‘हंस’ की विशेषता थी कि उसमें जो छपता था, वह विमर्श की दृष्टि से नया, बेबाक और बेलाग होगा था. उसकी गमक दिलो-दिमाग पर देर तक सवार रहती थी. चाहे वह विषय के चयन को लेकर हो या भाषा को, राजेंद्रजी सभी में मौलिक नजर आते थे. उन्होंने ‘हंस’ में महिला और दलित साहित्यकारों को खुलकर स्थान दिया. इसके लिए उन्हें लंबा विरोध भी झेलना पड़ा. ‘हंस’ को बदनाम करने के लिए लोगों ने उनपर अश्लीलता के आरोप लगाए. उसे सांस्कृतिक अपसंस्करण का वाहक कहा गया. तमाम किस्म के दबावों के बीच राजेंद्रजी अपने मूल्यों पर अडिग बने रहे. दलित-अस्मिता के संघर्ष में उन्होंने सदैव दलित साहित्यकारों, विचारकों का साथ दिया. ओमप्रकाश बाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ को शीर्षक देने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है.
राजेंद्र यादव और ’हंस’ के सरोकारों को केवल स्त्री और दलित तक सीमित कर देना, उनके योगदान को कम करके आंकना होगा. हालांकि ’हंस’ तो इतने भर से भी साहित्यिक पत्रिकाओं में शीर्ष पर बना रह सकता है. ‘हंस’ की प्रतिबद्धता पूरे जनसमाज के प्रति थी. ‘हंस’ ने जिस तरह धर्म के आडंबरवाद पर चोट की, उतनी मुखरता से शायद ही किसी और पत्रिका ने आवाज उठाई हो. राजेंद्र यादव हिंदी में स्त्री-विमर्श के सूत्रधारों में से थे. उन्होंने प्रभा खेतान को सीमोन दा बोउआर की कृति ‘दि सेकिंड सेक्स’ का हिंदी अनुवाद करने के लिए प्रेरित किया, जो हिंदी में ‘स्त्री-उपेक्षिता’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ. हिंदी में स्त्री विमर्श को आगे बढ़ाने में जितना योगदान इस अकेली पुस्तक का है, उतना शायद ही किसी और पुस्तक का होगा. निश्चय ही इसका श्रेय राजेंद्र यादव को जाता है. भारत में लड़की को होश संभालते ही समझाया जाता है, तुम्हारा शरीर तुम्हारा नहीं है. उसपर तुम्हारे पति का अधिकार होगा. और जब तक विवाह नहीं हो जाता तब तक तुम पिता के संरक्षण में हो. राजेंद्र का स्त्री विमर्श इसी विसंगति पर केंद्रित था. वे मानते थे कि व्यक्ति होने के नाते अपने शरीर पर सबसे पहला अधिकार स्त्री का होता है. पुरुष समाज को स्त्री के इस अधिकार का सम्मान करना चाहिए.
राजेंद्र यादव के आलोचक भी कम न थे. कुछ तो मृत्यु के कुछ दिन पहले तक भी भड़ास निकालते रहे. उनपर तरह-तरह के लांछन लगाते रहे. यह उनकी मजबूरी है—यह हकीकत को राजेंद्र जी भी जानते थे. इसलिए आलोचकों की बातों की परवाह किए बगैर वे अपने काम में लगे रहते थे. इसी लिए वे राजेंद्र यादव थे. अंत में बस इतना कि राजेंद्र यादव के आलोचक आज चाहे जितना दंभ कर लें, समय की छननी में उनके नाम कहीं दूर बिला जाएंगे, मगर राजेंद्र यादव साहित्य-जगत में दीपस्तंभ की भांति रहेंगे, उनके संपादकीय अपने युग की आवाज की तरह पढ़े जाएंगे.

opkaashyap@gmail.com
[जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के ‘हिंदी पत्रिका विशेषांक’ में प्रकाशित लेख]

राजभाषा हिन्दी : समृद्ध इतिहास और भावी चुनौतियाँ

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राजभाषा हिन्दी : समृद्ध इतिहास और भावी चुनौतियाँ

2.डॉ विमलेश शर्मा
सहायक आचार्य,हिन्दी
राजकीय कन्या महाविद्यालय,
अजमेर,राजस्थान

1.डॉ के.आर.महिया
सहायक आचार्य, संस्कृत
राजकीय कन्या महाविद्यालय
अजमेर,राजस्थान

भारतीय ऋषियों, चिंतकों,महर्षियों व मनीषियों ने शब्द को ब्रह्म कहा है। उसे नित्य, शाश्वत व सनातन माना है; वाक् को देवी कहा , सरस्वती कहा तथा उसकी उपासना की बात इन शब्दों में कही-

“वाचमुपास्व”1

वस्तुतः भाषा(शब्द) ही वह माध्यम है जिसके कारण अल्प आयास से विशालतम व्यापार की सिद्धि हो जाती है-

“अणीयस्तवाच्च शब्देन संज्ञाकरणं व्यवहारार्थ लोके।”2

मनुष्य जाति की समस्त लोकयात्रा इसी भाषा रूपी प्रासाद पर अवलम्बित है, आश्रित है। भाषा ही इस लोकयात्रा में शाब्दिक अभिव्यक्ति हेतु एकमात्र सशक्त आधार है।

“इहशिष्टानुशिष्टानां

शिष्टानामपि सर्वथा

वाचामेव प्रसादेन

लोकयात्रा प्रवर्तते।।”3

कल्पना कीजिए हमारी जिन्दगी से एक दिवस के लिए भी भाषिक अवकाश हो जाए तो, कैसा होगा हमारा जीवन? हजारों सूर्य मिलकर भी इस भुवन को दीप्त नहीं कर पाएँगें, कितनी भयावह है यह कल्पना ही, कि विचार अभिव्यक्त ही ना हो। इसी तथ्य को उद्घाटित करते हुए संस्कृत साहित्यशास्त्र के सुप्रसिद्ध आलंकारिक आचार्य दण्डी ने भाषा के अभाव से जन्मी उस विभीषिका की ओर संकेत करते हुए कहा है कि शब्द रूपी ज्योति के अभाव में यह समस्त भुवनत्रय अंधकार में निमग्न रहता-

“इदमन्धतमः कृतस्नं जायेत भुवनत्रयम्।

यदि शब्दाह्वयं ज्योतिरासंसारं दीप्यते।।” 4

भाषा संजीवनी है, प्राण शक्ति का आधार है, साथ ही हमारे अस्तित्व व अस्मिता की पहचान और अभिधान भी। भाषा प्रवहमान निर्झर है अतः इसका सतत् प्रवाहमान होना आवश्यक है। हमारे समग्र विकास को , संस्कृति और चिंतन परंपरा की विरासत को यदि किसी माध्यम से प्रतिबिंबित किया जा सकता है तो वह भाषा है । आज हमारी अस्मिता पर जितने भी प्रश्नचिन्ह लगे हैं वे सब भाषा को नकारने और उसे सामान्य भाव से व हल्के रूप में लेने के कारण ही है । विचारणीय है कि हिन्दी को कभी संस्कृत, पाली, अरबी, फारसी या अंग्रेजी की तरह राज्याश्रय नहीं मिला। इसके पीछे कारण भी यही हैं कि “ तमगा बनने की उसकी इच्छा कभी रही ही नहीं, अलबत्ता वह देश की बाँसुरी, तलवार और ढाल ज़रूर बनी है। जब भी देश को एक सूत्र में पिरोने की ज़रूरत पड़ी, जब भी उसके विद्रोह को वाणी देने की आवश्यकता हुई ; हिन्दी ने पहल की है।”5

हालांकि स्थितियाँ सुखद भी हैं, आज हिन्दी विश्व की भाषा है, वैश्विक बाज़ार की भाषा है औऱ इसका कारण यहाँ का विशाल जन समूह है। सार्क देशों में तो व्यापार परिवर्धन के लिए हिन्दी को सम्पर्क भाषा बनाए जाने की माँग भी उठने लगी है। परन्तु इसी के साथ ही अनेक चुनौतियाँ है जिसका सामना व्यक्ति मात्र के प्रयोग और सहयोग से ही हिन्दी कर सकती है। “आज भी हिन्दीभाषी दूसरे नम्बर का नागरिक है। दफ्तरों में, रेलवे में, बैकों में, व्यापार-व्यवसाय में अंग्रेजीभाषी विशिष्ट और सभ्य माना जाता है और उसका काम त्वरित होता है। इसीलिए हिन्दी तथा अन्य भाषा-भाषी भी अपनी भाषा में अंग्रेजी की खिचड़ी पकाकर सभ्य औऱ पढ़े-लिखे होने का बोध करना चाहते हैं।”6 बचपन से ही भाषायी श्रेष्ठता का बीज हम बालमन में रोप देते हैं, इसके पीछे बाजारवादी मानसिकता है , जिसमें हम सदैव आगे रहना चाहते हैं। हिन्दी लोकप्रियता और प्रयोग की दृष्टि से श्रेष्ठ होने के बाद भी इस दृष्टि से दोयम क्यों है, इस पर हमें मिल बैठकर ही विचार करना होगा।

भारत विश्व में सर्वाधिक विविधताओं वाला देश है। यह बात भाषाई दृष्टि से भी स्वतः सिद्ध है। यहाँ 22 बोलियाँ (संविधान की आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट) अपने-अपने भाषायी सौष्ठव के साथ मौजूद है, हाँ! पर हिन्दी अपने वर्चस्व के कारण राष्ट्रभाषा और एकांगी रूप से राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित है । इसका एक कारण यह भी है कि भारत में हिन्दी सम्पर्क भाषा भी रही है । सम्पर्क भाषा होने के कारण ही यह लोकप्रियता के उन सोपानों को छू सकी जिसे छूने में अन्य लोक भाषाएँ असमर्थ रही। इस लोकप्रियता के पीछे अनेक संत, महात्मा, कवि व लेखकों का अप्रतिम योगदान दृष्टिगोचर होता है। निःसंदेह यह हिन्दी की जन्मकुंडली के राजयोग व अन्यान्य सुयोगों का ही प्रतिफल है कि हिन्दी भाषा को इतने सशक्त व आत्मोन्नत श्रेष्ठ पुरुषों की संगति प्राप्त हुई।

हिन्दी का जो स्वरूप आज हम देख रहें हैं वह वस्तुतः आठवीं शताब्दी में प्रस्फुटित हुआ और कालांतर में पल्लवित हुआ।हिंदी की विकासयात्रा की चर्चा किए बिना हिंदी की बात करना बेमानी होगी। वस्तुतः हिन्दी का जो स्वरूप हम आज देख रहे हैं इसे अपना यह स्वरूप प्राप्त करने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है । लम्बी पराधीनता के बाद जो भी देश आज़ाद हुए हैं उनमें राष्ट्रभाषा के प्रश्न पर प्रायः विवाद हुए हैं। जन-जन की भाषा कही जाने वाली हिंदी का वास्तविक संघर्ष 1850 के पश्चात् दिखाई देता है । तात्कालिक हिंदी साहित्य इस बात का साक्षी है; जिसने अपने अथक प्रयासों से इस भाषा का परचम दिग्दिगंतमेंलहरानेकी ठान ली थी। अंग्रेजों ने जब हिन्दी के स्थान पर उर्दू को राजभाषा के पद पर आसीन करवाने की चाल चली तो देश के हिन्दू औऱ मुसलमान दोनों भ्रमित हुए। “1857 के बाद तो इस विषय पर बाकायदा खुलकर संघर्ष होने लगा। अंग्रेजों की फूट डालो और राज्य करो वाली नीति काम कर गई। भाषा की कटुता जातियों में फैल गई। भाषा जातीयता तथा धार्मिकता का सशक्त प्रतीक बन गई। अंग्रेजों ने इसका भरपूर लाभ उठाया। इसी संघर्ष के दौरान अंग्रेजों ने चालाकी से रोमन लिपि को भी न्यायालयों में प्रचलित करके अंग्रेजी भाषा के लिए सशक्त राह खोल दी। ”7 इस चाल का व्यवहार आज तक चला आ रहा है। आज भी कई बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि हिन्दी के लिए रोमन लिपि रहे तो बेहतर होगा। यह ठीक वैसा ही होगा; जैसे भारतीय आत्मा को पाश्चात्य देह में लपेट दिया गया हो ऐसे में हमारी व हमारी भाषा की क्या दशा होगी सुधिजन विचार कर लें।

स्वाधीनता आंदोलन के साथ-साथ हिंदी भी पली- बढ़ी। पहली लड़ाई इसकी लिपि के लिए थी । जिसके लिए भी कैथी लिपि,मुड़िया लिपि और नागरी लिपि में संघर्ष छिड़ा । परन्तु उन्नीस सौ में तमाम विरोधो के बाद भी इसकी लिपि देवनागरी स्वीकार की गई। स्वतंत्रता पूर्व की परिस्थतियों में राजभाषा हिन्दी के लिए जितना काम स्व.सेठ गोविंददास ने किया है; उतना शायद ही किसी अन्य ने किया हो। “ सन् 1927 से ही उन्होंने कौंसिल ऑफ स्टेट में भारतीय विधान मंडल में हिन्दी या उर्दू में भाषण करने(देने)की अनुमति पाने के लिए जोरदार माँग की। आगे चलकर स्व. सेठ ने स्वतंत्र भारत के लिए संविधान बनाने वाली संविधान सभा की कार्रवाई हिन्दी में कराने पर ज़ोर दिया। परंतु उनकी आवाज़ सुनी नहीं गई थी।”8

नागरी लिपि के उत्थान और इसे वर्तमान स्वरूप(परिष्कृत) में पहुँचाने के लिए अनेक भाषाविज्ञों और साहित्यकारों का महनीय योगदान रहा है। इन्हीं तपोनिष्ठ विद्वानों के पवित्र श्रम के कारण आज हिन्दी हमारी संपर्क भाषा , संचार भाषा , तकनीकी भाषा , व्यापार की भाषा व विज्ञापन और राजभाषा तथा राष्ट्रभाषा बनी हुई है । इसे हम यूँ भी कह सकते हैं कि भारतीयों की आत्मिक व मानसिक अनुभूतियों के प्रकटीकरण हेतु यही संपर्क भाषा सशक्त उपादान है। हिन्दी को एक सर्व सम्मत औऱ मानक रूप देने में इसकी सहयोगी भाषाओँ ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उर्दू हो फारसी, मैथिली हो या भोजपूरी , बांग्ला हो या कन्नड़, बिहारी हो या राजस्थानी सभी भाषाओँ के प्रभाव ने हिन्दी को एक गरिमामय सौष्ठव प्रदान किया है। हमारे संविधान के अनुच्छेद 351 में कहा गया है कि – “ संघ का कर्तव्य होगा कि वह हिन्दी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे , जिससे भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्त्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुस्तानी में और आठवीं अनुसूची में निर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली औऱ पदों को आत्मसात् करते हुए और जहाँ आवश्यक या वांछनीय हो वहाँ उसके शब्द भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।” भारत की सामासिक संस्कृति वह संस्कृति है, जो न हिन्दू है, ना मुसलमान, ना सिख ना इसाई। “ जिस प्रकार अमरीका में विभिन्न संम्प्रदायों जातियों को मिलाकर अमेरीकन संस्कृति बनी ठीक उसी प्रकार भारत की बहुरंगी भेद सहित अभेदमयी संस्कृति को समष्टि रूप में भारतीय संस्कृति कह सकते हैं; और उस सतरंगी संस्कृति की भाषा को भारती।” 9 “शायद यह नाम देश हित में भी होता क्योंकि हिन्दी नाम से न केवल हिंदी भाषियों में एक व्यर्थ का अहं भाव उत्पन्न होता है वरन् अहिंदीभाषियों में भी ग़लतफ़हमी पैदा होती है।” 10 तमाम वैपरीत्य के बाद भी अनुच्छेद 351 में उल्लिखित हिंदी भारत की सामासिक संस्कृति की संपर्क भाषा ही है जो भारतीयों के बीच सशक्त भावनात्मक व सामाजिक संपर्क स्थापित करती है।

भारत के संविधान निर्माण से पूर्व प्रश्न राष्ट्रभाषा को लेकर था, संविधान ने ही पहले-पहल राजभाषा नाम दिया। जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया वैसे-वैसे हिन्दी के रचनाकार एवं भाषाविज्ञ राजभाषा शब्द व उसकी परिभाषा से परिचित होते गए। राजभाषा की अनेक एकपक्षीय परिभाषाएँ हैं परन्तु इसके व्यापक अर्थ ग्रहण की दृष्टि से रामबाबू शर्मा की परिभाषा महत्त्वपूर्ण है। डॉ रामबाबू शर्मा ने ‘हिन्दी भाषा का राजकाज में प्रयोग ’ में उल्लिखित किया है -“ राजभाषा वह व्यापक भाषा होती है जिसका प्रयोग केन्द्र सरकार द्वारा समन्वय की दृष्टि से अंतर प्रांतीय स्तर पर होता है। यह भाषा इतनी समृद्ध , व्यापक और समन्वयकारी होती है कि संपूर्ण देश तथा उसकी विभिन्न प्रांतीय भाषाओं को सांस्कृतिक, साहित्यिक राजनीतिक, प्रशासनात्मक शब्दावली, वाक्य योजना एवं लिपि आदि की दृष्टि से एक सूत्र में आबद्ध कर राज्य एवं उसकी नीतियों के अनुसार उस देश को सुदृढ़ बनाती है। यह भाषा इतनी व्यापक होती है कि इसके माध्यम से देश के विभिन्न भाषा-भाषी लोगों से संपर्क स्थापित होता है इसलिए इसे संपर्क भाषा भी कहते हैं। अंग्रेजी में इसे लिंगुआ फ्रेंका, केंद्र, राज्य और देश के विभिन्न निकायों के संपर्क के माध्यम के कारण राजभाषा, एकतंत्रात्मक शासन में इसे राजा की भाषा, प्रजातंत्र प्रणाली में इसे राज्य की भाषा (राजभाषा) या संघभाषा भी कहते हैं। … भारत जैसे बड़े देशों में केन्द्रीय स्तर पर प्रयुक्त होने वाली मुख्य राजभाषा के अंतर्गत विभिन्न राज्यों में प्रयुक्त होने वाली क्षेत्रीय भाषाओं को भी राजभाषा की संज्ञा के नाम से अभिहित करते हैं। वास्तव में क्षेत्रीय राजभाषाएँ केन्द्रीय भाषा की पूरक होती हैं। इससे राजभाषा के विशाल रूप का उद्घाटन होता है।” 11 इसके इतर अगर संक्षेप में हम राष्ट्रभाषा की बात करें तो चूँकि हिन्दी भारत में छोटे-बड़े पैमाने में बोली समझी जाती है , इसलिए महात्मा गाँधी ने उसे राष्ट्रभाषा कहा और देश में उसका प्रचार करने की प्रेरणा दी। सुखद आश्चर्य यह भी है कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा और राजभाषा बनाने का स्वप्न भी हिन्दीभाषियों का नहीं था, इसकी आवश्यकता भी पहले-पहल अहिन्दीभाषियों ने ही महसूस की। राष्ट्रभाषा कहें या राजभाषा अगर हम उसे खारिज करते हैं तो अपनी पहचान खोने लगते हैं, अपने अस्तित्व से इनकार करने लगते हैं।

हिन्दी आज समस्त नकारात्मक प्रचार के बावजूद प्रत्येक क्षेत्र मे अपना निर्विकल्प वर्चस्व स्थापित कर चुकी है । भाषिक दृष्टि से हिन्दी अशक्त नहीं है। इसका व्याकरण निर्दोष, ग्रहणशील और परिवर्द्धिमान है। लेखन औऱ उच्चारण में साम्य होने के कारण यह विश्व की सर्वाधिक सरल भाषाओं में से एक है। संस्कृत की समृद्ध विरासत के बावजूद इसने विगत एक शती में ही अन्य भाषाओं, उपभाषाओं, बोलियों के असंख्य शब्दों को आत्मसात् करते हुए अपने शब्दकोश को परिवर्द्धित किया है; अभिव्यक्ति की श्रेष्ठता प्रतिपादित की है। सभी प्रांतों में कमोबेश बोली जाने के कारण हिन्दी भारत को एक सूत्र में बाँधने की क्षमता रखती है। या यूँ कहें कि हिन्दी भारतीयों की सामाजिक, सांस्कृतिक व धार्मिक विरासत की अक्षुण्ण एकता की संवाहक भाषा है ; आवश्यकता इसको परिष्कृत, परिमार्जित व परिशोधित करने की है।

संचार माध्यमों के हर तेवर व फ़न में अपना सहज विस्तार पाने के कारण हिन्दी ने सशक्त लोकतांत्रिक हैसियत जो पूर्व से ही थी उसमें औऱ इज़ाफा कर लिया है। कहना होगा कि आज हिन्दी जनभाषा है , संसदीय भाषा है और इससे बढ़कर हर मन की भाषा है; तो कहीं ना कहीं अन्य सहयोगी भाषाओं के आत्मोत्सर्ग से, नहीं तो हजारों वर्षों की बोलियों के स्थान पर खड़ी बोली का बहुजन की भाषा औऱ आज वैश्विक भाषा बन पाना लगभग असम्भव था। यही बात केन्द्र में रखते हुए डॉ रामविलास शर्मा कहते हैं- “हिन्दी को केन्द्रीय भाषा’ बनाने का यह अर्थ नहीं है कि प्रादेशिक भाषाओं के अर्थ मारे जाएं।”12

तमाम विकसनशील तत्त्वों के होते हुए आज भी कुछ सवाल अनुत्तरित हैं । ये सवाल दरअसल निहित स्वार्थों और उनसे उत्पन्न पूर्वाग्रहों के कारण हैं   । आज संचार माध्यमों में हिन्दी का जो रूप है वह पूर्णतः बाजारसापेक्ष है, जिसे बहुत अधिक तोड़ मरोड़ दिया गया है; यही कारण है कि वह कहीं ना कहीं अपनी मूल संस्कृति से विमुख हो गई है। यह सही है कि आज हिन्दी इतनी सक्षम है कि सूचना विस्फोट से उत्पन्न हुई अफ़रातफ़री को संभाल सकती है, संवरण कर सकती है परन्तु स्वयं हिन्दी को संभालने के लिए अनेक सबल हाथों की आवश्यकता है। हिन्दी का भविष्य अन्य देश भाषाओं के भविष्य से जुड़ा है। उनका अविकसित रहना हिन्दी का कमजोर होना है। हिन्दी की जड़ें संस्कृत में है। नई पीढ़ी को उस भाषा की और लौटाना होगा जिसमें हमारी संस्कृति फली- फूली है। यह सुकृत्य सामूहिक उत्तरदायित्व से ही संभव है। यदि हमने (भाषाविज्ञों) नई पीढ़ी की वैचारिकता को भाषा का माहात्म्य का पाठ पढ़ा दिया, तो निश्चय ही हिन्दी का स्वर्णिम भविष्य भाषाप्रेमियों को आह्लादित तो करेगा ही साथ ही दृष्टिगत भी होगा।

हिन्दी अपनी वैज्ञानिकता के कारण ही स्वयंसिद्ध भाषा है जो त्वरित गति से जीवन के हर क्षेत्र में छा रही है । संचार माघ्यमों की त्वरा के अनुरूप इसके शब्दकोश में भी नए शब्दों का तथा व्याकरण में नवीन वाक्यों , अभिव्यक्तियों और वाक्य संयोजन की विधियों का समावेश हुआ है। इस सबसे हिन्दी भाषा के सामर्थ्य में अभिवृद्धि हुई है; फलत: हिन्दी सहज रूप से ज्ञान विज्ञान और आधुनिक विषयों से जुड़ रही है। यही कारण है कि वह वर्तमान वैज्ञानिक युग में हिन्दी की उपादेयता को विकसित कर रही है। यद्यपि भारत के कुछ प्रान्तों में हिन्दी व्यवहार की भाषा है, लेकिन 872 भाषाओं औऱ बोलियों के इस देश में वह ऐसी अकेली भाषा है जिसके सहारे आप पूरे देश में यात्राएँ कर सकते हैं। अनिवासी भारतीय सम्पूर्ण विश्व में फैले हुए हैं। विदेशों में 40 से अधिक देशों के 600 से अधिक विश्वविद्यालयों और स्कूलों में हिन्दी पढाई जाती है।

हिन्दी खाड़ी देशों (पाकिस्तान, नेपाल, भूटान,बांग्लादेश, म्यांमार, श्री लंका और मालदीव) के साथ-साथ अनेक देशों में भी बोली जा रही है। इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, चीन, मंगोलिया, कोरिया तथा जापान भारतीय संस्कृति की सराहना करते हैं, यही कारण है कि वहाँ हिन्दी बोली औऱ समझी जाती है। अनेक देशों यथा-अमेरिका, आस्ट्रेलिया,कनाडा और यूरोप के अनेक देशों में हिन्दी को आधुनिक भाषा के रूप में पढ़ाया जाता है। अरब और अन्य इस्लामी देशों में भी हिन्दी बोली व समझी जाती है । इस तरह स्पष्ट है हिन्दी अपने अप्रवासी जनसमूह के साथ विश्वजनमत का निर्माण करने में सक्षम है ; इस भाषा का सामर्थ्य बेलाग है, फिर भी जो प्रश्न अनुत्तरित हैं वे इसके अस्तित्व हेतु ज़रूरी जान पड़ते हैं ।

हिन्दी को आज भारतेन्दु सरीखे क्रांतिकारियों की जरूरत है जो उसी तरह कह सके कि- ‘भीतर तत्व न झूठी तेजी। क्यों सखि सज्जन ! को अंग्रेजी?’ वस्तुतः हिन्दी को संगोष्ठियों और दिन विशेष पर दिए जाने वाले वक्तव्यों और शोक प्रस्तावों की आवश्यकता नहीं है बल्कि ऐसे कामों की ज़रूरत है जिससे वह समृद्ध होती है और उसका माथा ऊँचा होता है। शिक्षा संस्थान इस दिशा में सार्थक पहल कर सकते हैं। अनेक गतिविधियों व दैनिक प्रयोग के माध्यम से शिक्षक छात्रों को मातृभाषा, राजभाषा से जोड़ सकते हैं। शिक्षा संस्थानों को विद्यार्थियों में पढ़ने की आदत उन पुस्तकों के माध्यम से विकसित करनी होगी जो भारतीय संस्कृति की थाती रही हैं। भाषा की प्रामाणिकता, शुद्धिकरण और मानकीकरण के लिए भाषाविज्ञों को श्रम करना होगा क्योंकि हिन्दी में मानक आदर्श पुस्तकों का अभाव है। अनेक देशों में ( मिसाल के तौर पर इटली) सार्वजनिक स्थानों पर अशुद्ध भाषा लिखना दण्डनीय अपराध है, लेकिन हम हमारी भाषा से खिलवाड़ करना नहीं छोड़ते हैं। हिन्दी के शुद्ध प्रयोग के लिए हर व्यक्ति को सजग होना पड़ेगा और ऐसे में शिक्षाविदों की जिम्मेदारी कुछ औऱ बढ़ जाती है। हिन्दी में आज साहित्य तो बहुत लिखा जा रहा है परंतु मानविकी, विज्ञान, चिकित्सा,मनोविज्ञान, इतिहास,समाजशास्त्र आदि की उच्च स्तरीय मौलिक पुस्तकें नगण्य हैं। इसके मूल में प्रकाशन और क्रय करने वाली संस्थाओं की मानसिकता भी है। इसके उपचार के लिए ज्ञान के इन क्षेत्रों में हिन्दी के मौलिक साहित्य के प्रकाशन को बढ़ावा देना होगा।

हिन्दी के विकास में अनुवाद महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है अतः अनुवाद को सर्वोच्च महत्त्व का काम समझते हुए, अनुवादकों का सही चयन और प्रशिक्षण देकर भाषायी श्रेष्ठ साहित्य को प्रकाश में लाकर सर्वसुलभ बनाना होगा। हिन्दी की प्रकृति जनवादी है, जबकि ज्यादातर अनुवाद क्लिष्ट और दूभर है अतः अनुवाद की इस भ्रांति को दूर करना होगा। इसके साथ ही सभी विषयों की मानक शब्दावली का संस्कार और एकमात्र शब्द का निर्धारण करना होगा, जिससे भाषागत एकरूपता का निर्माण होगा। हिन्दीभाषी प्रदेशों में आज भी हिन्दी वह वास्तविक सम्मान प्राप्त नहीं कर पाई है , जिसकी वह अधिकारिणी है अतः इन क्षेत्रों में राज-काज, शिक्षा आदि सभी स्तरों पर ईमानदारी व प्रतिबद्धता के साथ हिन्दी की वास्तविक प्रतिष्ठा करनी होगी। हिन्दी ग्रंथ अकादमियों को अधिकाधिक गतिशील बनाना होगा जिससे श्रेष्ठ ग्रंथों का प्रकाशन व अनुवाद संभव हो सके। इन उपायों से न केवल हिन्दी को व्यावहारिक प्रतिष्ठा मिलेगी वरन् अहिन्दीभाषियों में भी भाषा के प्रति गहरा सम्मान और विश्वास पैदा होगा। हिन्दी को राष्ट्रव्यापी भाषा बनाने और उसमें श्रेष्ठ साहित्य औऱ ज्ञान को संजोने के लिए जिस अध्यवसाय की ज़रूरत है उसका अभाव विश्वविद्यालयों में दिखता है। उल्लेखनीय है कि कई विश्वविद्यालय ऐसे भी हैं जहाँ हिन्दी विषय ही स्वीकृत नहीं है। हिन्दी में हो रहे शोध गुणवत्ता को खो रहे हैं। इन सभी दिशाओं में सोचकर सार्थक कदम उठाने होंगे जिससे हिन्दी की उन्नति व्यावहारिक धरातल पर हो सके।

आज यह भी प्रचारित किया जा रहा है कि हिन्दी रोज़गार देने में सक्षम नहीं है और इसलिए यह जीवन की विविध अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरती है ।संभवतः यही कारण है कि हमारी नई पीढ़ी युवा हिन्दी माध्यम से पढ़ने औऱ जुड़ने को लालायित नही रहते और जो हिन्दी से उच्चशिक्षा प्राप्त करते हैं, उनमें भी सबल आत्मविश्वास उत्पन्न नहीं हो पाता। वे स्वयं को कम आंक कर हीन महसूस करते हैं । दरअसल यह एक भ्रांति है कि हिन्दी रोजगार सुलभ नहीं है। आज हिन्दी में रोजगार के अनेक अवसर उपलब्ध हैं। अनुवाद, प्रिंट व सोशल मीडिया, भाषा विशेषज्ञ तथा प्रशासनिक सेवाओं जैसे प्रतिष्ठित अवसर हिन्दी सुलभ कराती है। अब तो कम्प्युटर के लिए भी दुनिया की सर्वश्रेष्ठ और वैज्ञानिक लिपि देवनागरी मानी जाती है। जो लिपि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य होने लगी है उस पर अपने मूल स्थान पर ही प्रश्नचिह्न लगाना चौंकाता है। विडम्बना यह है कि हम अपनी स्वयंसिद्धा व सर्वसमावेशी भाषा की शक्ति को नकारते हैं, उसकी महत्ता व उपादेयता का ठीक ढंग से आकलन नहीं कर पाते हैं। जिसके कारण अपने ही घर में हमारी सांस्कृतिक विरासत व मूल्यों को सहेजने वाली हिन्दी हेय होती जा रही है। आज बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हिन्दी की अहमियत को समझ रही है । भले ही हिंग्लिश के प्रयोग के साथ ही परन्तु वे हिन्दी को अपना रही हैं क्योंकि हिन्दी का एक बहुत बड़ा वैश्विक बाज़ार है औऱ इसी बाज़ार के कारण एक और प्रश्न समानान्तर खड़ा हो गया है कि क्या हिन्दी बाज़ार की भाषा है औऱ अगर हिन्दी बाज़ार की भाषा बन रही है तो यह बात निःसंदेह चौकाने वाली है और अतिरिक्त सतर्कता के प्रति आगाह करने वाली है क्योंकि तब हमें इसके मानकीकरण की तरफ ठोस कदम उठाने होंगें। क्योंकि बाज़ार भाषा के प्रति जवाबदेही तय नहीं करता वह केवल भाषा का अपने हिसाब से प्रयोग करता है। वहाँ महज़ व्यावसायिकता का बोलबाला होता है। कई बार लचीलेपन की ओट में उस के शब्दों और व्याकरण के साथ भी खिलवाड़ करने की कोशिश करता है। वर्तमान में प्रिंट मीडिया इसका सजग उदाहरण है। अतः यह निःसंदेह खुशी और सम्मान की बात है कि हिन्दी वैश्विक धरातल पर अपनी पहचान बना रही है परन्तु साथ ही इस पहचान को कायम रखने और हिन्दी के वास्तविक स्वरूप को सहेजने की जिम्मेदारी भी हमें ही वहन करनी है। अगर हिन्दी को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनानी है तो अपनी मौलिकता को बरकरार रखना होगा और इसके लिए हिन्दी के प्रति नव पीढ़ी का रूझान भी उतना ही मायने रखता है। यह तय है कि इस दुर्निवार भूमंडलीकरण के युग में भाषा में बदलाव आएँगें; परन्तु तकनीक के भँवरजाल में कुछ सहजताओं और लचीलेपन को अपनाते हुए अगर हम हिन्दी के वास्तविक स्वरूप को अक्षुण्ण रख पाते हैं तो यह निःसंदेह हमारे लिए औऱ हमारी भाषा के सहेजन के लिए एक उपलब्धि होगी। हम जानते हैं कि हिन्दी को अभी भी एक लम्बी दूरी, सफर तय करना है, लेकिन दूरियाँ चलने से ही तय होंगी,यह विश्वास कायम रखना होगा। भाषा को लेकर हमारे पूर्वजो में एक जुनून रहा है , उस संघर्ष की लाज हिन्दी के अधिकाधिक एवं शुद्ध प्रयोग से करनी होगी। हिन्दी के लिए उत्सर्ग और संघर्ष करने वालों को सलाम करते हुए ही संभवतः निराला ने लिखा होगा-

‘मेरी राख को हिन्दुस्तान के कोने-कोने में बिखेर दिया जाए

ताकि लोग उसे रौंदे, लेकिन हिन्दी को गलत न समझे।’

संदर्भ सूची-

  1. छांदोग्यपनिषद्-729
  2. यास्क – निरूक्त, प्रथम अध्याय, प्रथम पाद
  3. दण्डी-काव्यादर्श-113
  4. दण्डी-काव्यादर्श- प्रथम अध्याय, चतुर्थ श्लोक)
  5. हिन्दी दशा और दिशा- प्रभाकर श्रोत्रिय- हिमाचल पुस्तक भंडार, दिल्ली-पृ.13, प्रथम संस्करण-1995
  6. यथोपरि- पृ.34
  7. राजभाषा के संदर्भ में हिंदी आंदोलन का इतिहास- उदयनारायण दुबे-पृ.-100
  8. राजभाषा हिन्दी-डॉ सेठ गोविंद दास – हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग,(1965)( कौन सभा में संविधान की कार्रवाई चलेगी- शीर्षक से अध्याय)
  9. रिपोर्ट ऑफ द ऑफिशियल लैंग्वेज कमीशन ( 1956) भारत सरकार, पृ.286
  10. राजभाषा भारती- अप्रेल-जून-1979, अंक-5, दीक्षांत भाषण कृपानारायण सचिव, राजभाषा विभाग, पृ.11
  11. हिन्दी भाषा का राजकाज में प्रयोग,डॉ रामबाबू शर्मा शोध ग्रंथ(आगरा विश्वविद्यालय),पृ.11-12
  12. डॉ. रामविलास शर्मा, भाषा और समाज,पृ.457

रवीन्‍द्रनाथ और निराला : कितने दूर, कितने पास

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रवीन्‍द्रनाथ और निराला : कितने दूर, कितने पास

अरुण प्रसाद रजक पश्चिम बंगाल शिक्षा सेवा (W.B.E.S) के अंतर्गत सहायक प्राध्यापक गोरुबथान राजकीय महाविद्यालय, दार्जीलिंग उच्चतर शिक्षा विभाग, पश्चिम बंगाल सरकार

छायावादी काव्‍यधारा में निराला का काव्‍य रवीन्‍द्रनाथ से अत्‍यधिक प्रभावित है। निराला हिन्‍दी के पहले ऐसे कवि हैं जिन्‍होंने हिन्‍दी साहित्‍य को रवीन्‍द्र से परिचित करवाया। ‘रवीन्‍द्र कविता- कानन’ जैसी भावनापूर्ण और आधिकारिक समालोचना लिखकर निराला ने हिन्‍दी साहित्यिकों का ध्‍यान टैगोर की ओर आकर्षित किया। इस आलोचनात्‍मक कृति का साहित्यिक एवं ऐतिहासिक महत्‍व है। इसमें रवि बाबू के काव्‍य के सामाजिक संदर्भों, रहस्‍यवाद, रहस्‍यवाद के लौकिक पक्ष एवं उनकी मानवीय संवेदना पर विवेचन किया गया है। इसमें निराला ने रवीन्‍द्रनाथ को भारत के महान राष्‍ट्रीय कवि के रूप में देखा है। इसके साथ ही रवीन्‍द्र काव्‍य पर कुछ प्रश्‍न चिह्न भी लगाया गया है। रवीन्‍द्र काव्‍य पर आक्षेप बंगला के अनेक साहित्‍यकारों ने भी लगाया है।

निराला की काव्‍य-साधना का प्रारंभ कलकत्‍ते से हुआ था। उस दौरान रवीन्‍द्रनाथ भारतीय साहित्य-जगत के शिखर-पुरुष थे। निराला अपने आपको रवीन्‍द्र प्रभाव से बचा नहीं पाए। उनकी आरंभिक कविताओं पर रवीन्‍द्रनाथ का प्रभाव स्‍पष्‍ट दिखाई देता है। निराला ने स्‍वयं यह स्‍वीकार किया है कि उन्‍होंने रवीन्‍द्रनाथ की कुछ कविताओं का रूपांतरण किया है। ‘परिमल’ की अनेक कविताएं गीतांजलि से प्रभावित हैं। लेकिन यहां कवि निराला ने अपनी विशिष्‍ट संवेदना द्वारा उसे एक अलग रूप दे दिया है। एक तरह से निराला की सृजनात्‍मक –प्रेरणा का उत्‍स रवीन्‍द्र को मानते हुए डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सटीक टिप्‍पणी की है कि “निराला जो महान कवियों में से हैं, जिनका पालन-पोषण बंगाल में हुआ, ने विद्रोह का झंडा ऊँचा रखा। उन्‍होंने रवीन्‍द्र की कुछ कविताओं का अनुवाद किया और रवीन्‍द्र साहित्‍य का पूर्ण अध्ययन और मनन किया। मुझे गलत न समझा जाए। निराला को किसी प्रकार से रवीन्‍द्रनाथ की ‘कार्बन-कॉपी’ नहीं कहा जा सकता। निराला भिन्‍न हैं, किंतु उनकी सर्जनात्‍मक प्रतिभा रवीन्‍द्र-काव्‍य से अत्‍यधिक प्रभावित थी।”

निराला की आरंभिक कविताएं (रहस्‍यवादी) रवि बाबू से प्रभावित हैं। अनामिका की प्रसिद्ध कविता ‘क्षमा-प्रार्थना’ रवि बाबू के ‘जीवन-देवता’ के भावों के आधार पर रचित हैं। रवि बाबू कहते हैं — “जे सुरे बांधिले ए वीणार तार, नामिया नामिया गेछे बारबार ।”

निराला रवीन्‍दनाथ की ही तरह कहते हैं –

“बांधे थे तुमने जिस स्‍वर में तार, उतर गये उससे ये बारम्‍बार ।”

‘मतवाला’ में प्रकाशित उनकी कविताओं पर रवीन्‍द्र–छाया को लेकर जो साहित्यिक वाद-विवाद चला था, उसका विस्‍तृत विवरण रामविलास शर्मा ने ‘निराला की साहित्‍य-साधना’ के पहले खण्‍ड में दिया है। डॉ. रामविलास शर्मा निराला पर रवीन्‍द्र के प्रभाव के बारे में लिखते हैं– “निराला पर रवीन्‍द्रनाथ के रहस्‍यवाद का प्रभाव आंशिक रूप से सन् 1930 तक रहता है। ‘परिमल’ के दूसरे खण्‍ड की पहली कविता ‘भर देते हो’ में जो ‘देव’ निरंतर उनके अंतर में आते हैं, वह रवीन्‍द्रनाथ के काव्‍य -देवता हैं।” निराला पर रवीन्‍द्र का प्रभाव एक सीमा तक रहता है। जब तक उनका प्रभाव निराला पर हावी रहा, तब तक निराला ‘निराला’ न हो पाए। रामविलास शर्मा लिखते हैं — “रहस्‍यवाद से अधिक निराला पर रवीन्‍द्रनाथ की रूमानी कविताओं का प्रभाव है। यह प्रभाव पहले चरण में अधिक है, दूसरे में बहुत कम, तीसरे में नगण्‍य। निराला ने कुछ कविताएं रवीन्‍द्रनाथ की रचनाओं के आधार पर लिखी थीं, जिनकी आलोचना ‘भावों की भिड़ंत’ लेख में हुई थी। उस लेख का सुफल यह हुआ कि वह रवीन्‍द्रनाथ की पूरी कविताओं को आधार मान कर नया कुछ लिखने से विरत हुए। यह भी सही है कि सन् 1923-24 की ही उनकी बहुत-सी रचनाएं न केवल रवीन्‍द्रनाथ के प्रभाव से मुक्‍त है वरन् उस प्रभाव की विरोधी दिशा में चलती है।”

यह सही है कि निराला रवीन्‍द्रनाथ की काव्‍य-प्रतिभा पर मुग्‍ध थे। लेकिन वे रवीन्‍द्रनाथ के अंध-भक्‍त नहीं थे। उन्‍होंने रवीन्‍द्रनाथ की आलोचना भी की है। वे तुलसीदास के त्‍याग के सामने रवीन्‍द्रनाथ के वैभव को क्षुद्र मानते थे और स्‍वयं को तुलसीदास की परंपरा का मानते थे। आर्थिक हैसियत की दृष्टि से निराला और रवीन्‍द्रनाथ की कोई तुलना नहीं है। निराला आजीवन पारिवारिक संकटों के साथ आर्थिक अभावों से भी जूझते रहे जबकि रवीन्‍द्रनाथ एक बड़े जमींदार कुल के वारिस थे और उनके साथ एक भरा-पूरा परिवार भी था। रवीन्‍द्रनाथ जिस दुनिया को खिड़की से देखते थे, निराला उसी दुनिया के उपज थे। बहरहाल, जिस दौर में बंगला के अनेक साहित्‍यकार रवीन्‍द्र प्रभामंडल में अपना अस्तित्‍व खो चुके थे, उस दौर में निराला ने उस प्रभामंडल को तोड़कर एक अलग रास्‍ता अख्‍तीयार किया। महाकवि निराला जानते थे कि भूख क्‍या चीज है, दारिद्रय क्‍या है। उनके साहित्‍य में जो यथार्थ है वह उनका अपना भोगा हुआ यथार्थ है। निराला की यह काव्‍य-पंक्तियां बेहद मार्मिक हैं — ”वह तोड़ती पत्‍थर

देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर – वह तोड़ती पत्‍थर, न कोई छायादार पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्‍वीकार ।”

रवीन्‍द्रनाथ भी करुणा के असाधारण गायक हैं। निराला की तरह रवीन्‍द्रनाथ ने भी लिखा है—

“ओरा काज करे देश-देशान्‍तरे, अंग-बंग कलिंगेर, समुद्र-नदीर घाटे-घाटे, पंजाबे बोम्‍बाई गुजराते।”

यहां निराला की कविता जिस तरह चाबुक की तरह प्रहार करती है, वैसी रवीन्‍द्रनाथ की नहीं। भावों की प्रखरता निराला की विशेषता है और भावों की उदात्‍तता रवीन्‍द्रनाथ का वैशिष्‍ट्य है। विशुद्ध काव्‍य-सौंदर्य की दृष्टि से यदि विचार किया जाए तो रवीन्‍द्रनाथ निश्चित रूप से निराला से श्रेष्‍ठ हैं। लेकिन दूसरी ओर क्रांतिकारी चेतना की प्रखरता की दृष्टि से निराला रवीन्‍द्रनाथ से आगे निकल जाते हैं।

तात्‍पर्य यह है कि रवीन्‍द्रनाथ निराला के श्रद्धेय एवं प्रेरक पुरुष थे, लेकिन रवि बाबू को आत्‍मसात करते हुए निराला ने उनसे पृथक सशक्‍त व्‍यक्तित्‍व बनाकर स्‍वयं को हिन्‍दी का महाकवि सिद्ध किया।

संपर्क : 20, पी. बी. एम. रोड,

चॉंपदानी, हुगली पिन- 712222मो.- 08100935197

रँगरेज़ा की थापें

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घर में जब से स्वच्छंद विचारधारा वाली बहू सभ्यता, ब्याहकर आई थी तब से घर की रंगत ऐसी बदली कि अपने भी अपनों को पहचानने से इनकार करने लगे थे |

हर छोटी-बड़ी वस्तु में स्वयं को नया बनाने की होड़ पैदा हो गयी थी | पुरखों के हाथ की चीजों को या तो एंटीक बना कर घर के कोनों में सजा दिया गया था या स्टोर-रूम के अँधेरे को सौंप दिया गया था |

सदरद्वार के पाँवदान से लेकर शयनकक्ष के दीये तक सभी अपनी नई मालकिन की ख़िदमत में लगकर सौभगय मना रहे थे।
ये देखते हुए सास कभी डरते-डराते अपने लाडले बेटे विकास से शिकायत करने का मन बनाती तो वह अति व्यस्त होने का राग सुनाकर माँ को ही शांत करा देता।
निष्कंटक राज्य का सुख परलोकगामी सास की बहू इतना नहीं मनाती… जितना ज़िंदा-लाचार सास की जमी-जमाई गृहस्थी में अपने मन के कँगूरे काढ़ने वाली बहू मनाती है |

इस बहू ने भी घर की हर छोटी-बड़ी परम्पराओं और चाबियों पर अपना आधिपत्य जमाकर सभी को अपनी पाज़ेब की झंकार से झंकृत कर दिया था।

अब हाल ये था कि सास कुछ भी कहने के लिए अपना मुँह खोलती तो बहू आँखों ही आँखों में कुछ ऐसा कह देती की सास सन्न रह जाती | जल्द ही नई दलीलों और न्याय-नीतियों के साथ बहूरानी ने सास की वसीयत उनके हाथों के नीचे से अपने नाम करवाकर उन्हें दो कोड़ी का बना दिया था।

माता-पिता के उच्च विचारों से सजे-धजे मनबढ़ बच्चों ने भी अपनी दादी और बुआ को गैल पड़ा कंकड़ ही समझ लिया था । दादी के लाख कहने पर भी वे बड़ों को झुक कर न अभिवादन करते और न वेद-मंत्रों को अपनी जुबान से छूने देते ।
अपने जीवन की धज्जियाँ उड़ते देख वह बिलख पड़ती लेकिन कोई कान तक न देता |
पहनावा-ओढ़ावा ऐसा बदला कि दादी तौबा कर अपनी आँखें मींच लेती। न खाना खाने का समय निश्चित होता और न ही स्थान।

बुआ पवित्रता को तो उसकी माँ के सामने ही सिरे से भुला दिया गया था।
अपनी बनी-बनाई साख़ मिट्टी में मिलते देख सास ने अपनी क्वारी बेटी के साथ इच्छामृत्यु को याद करना शुरू कर दिया था ।
फिर एक दिन अचानक सूरज उन दोनों के मनपसंद रंगों से उनका घर-आँगन रंगने लगा । ऐसी आशा तो उन्होंने कभी की ही नहीं थी सो रंगरेजा की कूँची की थापें माँ-बेटी को सुकून से जब भरने लगी तब उनके मन की इन्द्रधनुषी आभा में घर के सारे लोग एक साथ बैठने-उठने के लिए मजबूर हो गए |
उनका खाना-पीना ,वाद-व्यवहार, परिधान सब कुछ बदलने लगा | सड़कों पर घूमते अधनंगे दिन-रात ने भी अपने को ठीक से ढंकना शुरू कर दिया ।होटलों में ताला पड़ गया ।लोग”दाल -रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ”वाली नीति पर चल पड़े ।

ये देखकर संस्कृति का बेटा विकास कोमा में चला गया तो बहूरानी सभ्यता, असहनीय पीड़ा से भर कर कराह उठी | चीख़-चीख़कर उसने अपने बच्चों को पुराना ढर्रा न छोड़ने के लिए खूब-खूब कहा लेकिन आदमी मौके की नज़ाक़त को अच्छी तरह समझता है ।

जिस माँ ने अपने बच्चों को कितनी नाज़-ओ-नज़ाक़त से पाला था आज वही बच्चे उसको लोभान का धुँआ दिखा रहे थे और ये देख संस्कृति अपनी बेटी के साथ मंद-मंद मुस्कुरा उठी थी ।

कल्पना मनोरमा
रचनाकाल 17.5.2020

रंग होली का -ओंम प्रकाश नौटियाल

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होली की हार्दिक शुभकामनाएं !!

HOLI2BGITIKA2B2017

योग

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योग
माया के लोभी नहीं  
बड़भागी वह लोग,
तन ,मन सदा स्वस्थ रहे, 
करते हैं नित योग
करते हैं नित योग , 
डाह से दूर सदा हैं
चैन , प्रेम, संतोष , 
हृदय  में रचा बसा है
कहें ’ओ्म’ कविराय , 
भाग्य से दिन फिर आया
विश्व करेगा योग, 
इसी मे ब्रह्म समाया !
-ओम प्रकाश नौटियाल

ये सफर था कि मकाम था: मैत्रयी पुष्पा- समीक्षा: प्रज्ञा

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ये सफर था कि मकाम था: मैत्रयी पुष्पा 
साहित्य में संस्मरण का अपना महत्वपूर्ण स्थान है। ये संस्मरण व्यक्ति,समय को परखते हैंऔर इनके बीच कभी कभी आत्मसाक्षात्कार की मुद्रा में भी होते हैं। मैत्रयी पुष्पा की इस वर्ष प्रकाशित ये किताब उनकी रचनायात्रा के सहचर,उनके गुरु और सखा राजेन्द्र यादव के इर्द- गिर्द रची गई है। हालांकि उसका बहुत बड़ा हिस्सा मैत्रयी जी की आत्मकथा ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ में भी आया है। किताब में गुरु-शिष्य सम्बन्ध का हिस्सा है पर कम है । मुझे ये किताब दो दोस्तों की साहित्यिक और निजी जिंदगी का हिस्सा अधिक लगी। दोस्त जिनमें कोई दीवारें नहीं और दोस्त जो अपनी-अपनी दीवारों में हैं और दीवारें जो खूब मज़बूत हैं। जहां खूब सर फुटव्वल भी है। 
दोस्ती के अनेक रंग हैं। जहां दोस्ती में दोनों के रचनात्मक विवेक का परस्पर समृद्ध होना है, दोस्ती का स्वस्थ जनतंत्र है,जहां खूब ठहाके भी हैं तो खूब झगड़े हैं। वहां दूसरी ओर खूब सैद्धान्तिक झगड़े हैं। कथाकार मैत्रयी पुष्पा स्त्री विमर्श के पैरोकार राजेन्द्र यादव से जुड़े अनेक प्रसंगों को सामने लाती हैं जहां वे विचार और व्यवहार की फांक और गहरे अंतर्विरोधों को उदघाटित करती हैं। जिनका गवाह साहित्य जगत रहा। किताब बताती चलती है कि इस पूरी लड़ाई की ख़ासियत दोनों का अपने मत पर अडिग होना, लड़ाई लड़ते हुए भी रचनाशील होना, तोहमतों और आरोपों का सार्वजनिक किया जाना और सबसे अधिक अलगाव होते हुए भी लगाव की रेखाओं का धुंधलाते हुए भी न मिटना है। कथाकार का द्वंद्व भी शीर्षक से सामने आता है कि वो सफर था कि मकाम था। इस मित्रता का एक लंबा सफर है जिसमें सीखना, जानना, समझना शामिल है। इसी सफर की खुराक है सीख, जान और समझकर विरोधाभासों को चिह्नित करना और एक तार्किक पक्ष रखना। ये मकाम तो नहीं सफर ही कहा जा सकता है। और मकाम में भी मंजिल और पड़ाव दोनों अर्थछवियां जुड़ी हैं। पर ये मंजिल तो नहीं ही है क्योंकि राजेन्द्र जी की मृत्यु तो मकाम नहीं ही हो सकती। रिश्ते के बहुत तीखे-नुकीले, लहूलुहान कर देने वाले पत्थर हैं तो साथ ही उन्हें घिस देने वाली पानी की धार भी है। लेखिका का अपना चिंतन भी है और एक भावुक मन भी। जो एक क्षण झंझावात में घिरता है तो फिर आत्ममंथन करता है। एक तरफ कुछ ठोस निर्णय लेता है तो दूसरी ओर पुरानी दोस्ती का पास रखता है। तर्क और भावना का द्वंद्व साफ दिखता है किताब में ठीक उसी तरह जिस तरह आस्थाओं का चरमरा कर ढह जाना दिखाई देता है। बहुत से आत्मस्वीकार है, बहुत पीड़ा है, एक सतत बेचैनी है। जैसे इस सफर का ठहर कर मूल्यांकन करना हो। 
कुछ निजी प्रसंग भी हैं दोनों के परिवारों के। तोहमतों का समृद्ध संसार भी है पर उससे जरूरी है एक दोस्ती जो तमाम विरोधों के बाद भी चुकती और खत्म नहीं होती। इस दोस्ती में कई प्रसंग स्पष्टीकरण की नैतिक जिम्मेदारी सरीखे भी हैं। कितना पाया- कितना खोया का विश्लेषण भी। हंस की दुनिया भी, रचनात्मक यात्राएं और गोष्ठियां भी शामिल हैं। इन सबको सांमने लाने वाले हंस के सम्पादकीय के हिस्से, पत्र, किताबों के ब्लर्ब प्रमाण सरीखे हैं। हर बार राजेन्द्र यादव को नई संज्ञाओं से सम्बोधित किया जाना और घटनाओं से उनकी पुष्टि करना भी किताब का हिस्सा हैं। राजेन्द्र यादव के द्वारा दिये गए सम्बोधन भी किताब का जीवंत हिस्सा हैं।
इस सफर को परखने के लिये पाठक स्वतन्त्र है। वो भी जो उस दौर के साक्षी हैं और वो भी जिनके पास साक्ष्य हेतु यही किताब है। रचनाकार अनेक हिस्सों में अपनी अकुंठ अभिव्यक्ति से पाठक को छूता जरूर है। खासकर दो दृश्य एक राजेन्द्र जी की आंखों के इलाज का समय और एक मृत्यु से पूर्व उनके कमरे में जन्मदिन की भेंट लेकर जाने वाला दृश्य। आंखों के सामने साकार होते पल हैं जिनमें कथाकार की कलम सिद्धहस्त है।