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राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में शिक्षक शिक्षा अपेक्षा, चुनौतियाँ एवं समाधान-डॉ. दिनेश कुमार गुप्ता

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राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में शिक्षक शिक्षा अपेक्षा, चुनौतियाँ एवं समाधान

डॉ. दिनेश कुमार गुप्ता

प्रवक्ता, अग्रवाल महिला शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय, गंगापुर सिटी

जिला- सवाई माधोपुर (राजस्थान) 322201

दूरभाष: 9462607259

ईमेल: dineshg.gupta397@gmail.com

सारांश

इक्कीसवीं सदी की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाई गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है जो भारत की वर्तमान चनुौतियों, समस्याओं और भविष्य की ज़रूरतों की पूर्ति में सहायक होगा। शिक्षा की प्रक्रिया में कई कारक शामिल होते हैं, जिनमें शिक्षक की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। इक्कीसवीं सदी के भारत की शिक्षा नीति के स्वरूप को दर्शाने वाली इस शिक्षा नीति में कुल 27 प्रमुख बिंदुओं की विस्तार से चर्चा की गई है| इन 27 बिंदुओं में से बिंदु संख्या 15 में शिक्षक शिक्षा से संबंधित महत्वपूर्ण सिफ़ारिशें शामिल हैं। वर्तमान शिक्षा नीति का शुभ परिणाम, इसे अमल में लाने के लिए तैयार की जाने वाली कार्य-योजना की उत्कृष्टता, संबंधित कार्य योजना पर अमल करने की दृढ़ इच्छाशक्ति और शिक्षा प्रक्रिया में शामिल व्यक्तियों की प्रतिबद्धता पर निर्भर होगा। इस लेख में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के आलोक में शिक्षक शिक्षा से संबंधित समस्याओं वर्तमान चुनौतियों तथा उनके संभावित समाधान की चर्चा की गई है|

बीज शब्द: शिक्षा, नीति, भविष्य, कार्य, योजना, प्रक्रिया

शोध आलेख

इक्कीसवीं सदी की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाई गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है जो भारत की वर्तमान चनुौतियों, समस्याओं और भविष्य की ज़रूरतों की पूर्ति में सहायक होगा। शिक्षा की प्रक्रिया में कई कारक शामिल होते हैं, जिनमें शिक्षक की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। इक्कीसवीं सदी के भारत की शिक्षा नीति के स्वरूप को दर्शाने वाली इस शिक्षा नीति में कुल 27 प्रमुख बिंदुओं की विस्तार से चर्चा की गई है| इन 27 बिंदुओं में से बिंदु संख्या 15 में शिक्षक शिक्षा से संबंधित महत्वपूर्ण सिफ़ारिशें शामिल हैं। वर्तमान शिक्षा नीति का शुभ परिणाम, इसे अमल में लाने के लिए तैयार की जाने वाली कार्य-योजना की उत्कृष्टता, संबंधित कार्य योजना पर अमल करने की दृढ़ इच्छाशक्ति और शिक्षा प्रक्रिया में शामिल व्यक्तियों की प्रतिबद्धता पर निर्भर होगा। इस लेख में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के आलोक में शिक्षक शिक्षा से संबंधित समस्याओं वर्तमान चुनौतियों तथा उनके संभावित समाधान की चर्चा की गई है|

शिक्षा प्रत्येक राष्ट्र की एक अनिवार्य आवश्यकता है। मानव की उपलब्धियों में शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है। इसलिए प्रत्येक देश अपनी सांस्कृतिक, सामाजिक, भौगोलिक और ऐतिहासिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षा व्यवस्था में समयानुसार सुधारात्मक परिवर्तन करता है। यह बात भारत पर भी लागू होती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ डॉ. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में 1948 में विश्वविद्यालय आयोग, लक्ष्मी शंकर मुदालियर की अध्यक्षता में माध्यमिक शिक्षा पर माध्यमिक शिक्षा आयोग (1952) और सन् 1964 में दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में पहले राष्ट्रीय शिक्षा आयोग की स्थापना, इस संबंध में शिक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को व्यक्त करती है। सन् 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति और राममूर्ति की अध्यक्षता में समीक्षा समिति (1992) की सिफ़ारिशों ने भारतीय शिक्षा की दशा और दिशा को सुधारने और आधुनिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति शिक्षा प्रणाली के लिए एक ऐतिहासिक घटना है। इक्कीसवीं सदी की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाई गई यह शिक्षा नीति एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है जो भारत की वर्तमान चुनौतियों, समस्याओं और भविष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक होगा। वास्तव में, वर्तमान शिक्षा नीति कितनी प्रभावी होगी, यह तैयार की जाने वाली कार्य योजना, संबंधित कानून और शिक्षा प्रक्रिया में शामिल व्यक्तियों की प्रतिबद्धता पर निर्भर करेगा। शिक्षा की प्रक्रिया में कई कारक शामिल होते हैं, जिनमें शिक्षक की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। इक्कीसवीं सदी के भारत की शिक्षा नीति के स्वरूप को दर्शाने वाली, इस शिक्षा नीति में कुल 27 प्रमुख बिंदुओं की विस्तार से चर्चा की गई है जिसमें बिंदु क्रमांक 15 में शिक्षक शिक्षा से संबंधित महत्वपूर्ण सिफ़ारिशें शामिल हैं। इसके साथ ही इस शिक्षा नीति के विद्यालयी शिक्षा से संबंधित बिंदुओं पर अनुसंधान में भी शिक्षक और शिक्षक शिक्षा से संबंधित मामलों पर चर्चा की गई है। इस लेख में शिक्षक शिक्षा के सम्प्रत्यय एवं आवश्यकता पर चर्चा की गई है। इसके साथ ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र में दिए गए महत्वपूर्ण सुझाव एवं अमल के दौरान आने वाली चुनौतियों तथा उसके संभावित समाधानों पर भी चर्चा की गई है।

शिक्षक शिक्षा— शिक्षक शिक्षा, दो शब्दों, शिक्षक एवं शिक्षा का समेकित रूप है, जिसमें शिक्षक शब्द का अर्थ सीखने एवं सिखाने वाले के रूप में तथा शिक्षा शब्द का अर्थ अध्यापन एवं ज्ञानाभिग्रहण के रूप में किया गया है। यहाँ दोनों ही शब्दों की उत्पत्ति संस्कृत के ‘शिक्ष्’ धातु से हुई है, जिसका शब्दकोशीय अर्थ है, सीखना, अध्ययन करना तथा ज्ञानार्जन करना (आप्टे, 1999, पृष्ठ संख्या 1015)। इस प्रकार शिक्षक शिक्षा का सामान्य अर्थ उस व्यक्ति की शिक्षा से है, जो सीखने एवं सिखाने का कार्य करता है। शिक्षक का समानार्थी शब्द गुरु है, जो प्राचीन और वर्तमान भारत में अध्यापन करने वाले व्यक्तियों के लिए उपयोग किया जाता है। प्राचीन भारत में शिक्षकों का प्रशिक्षण गुरुकुलों में स्वाभाविक रूप से अध्ययन-अध्यापन के दीर्घकालिक अनुभव के आधार पर होता था, जिसमें प्रज्ञा के साथ ही साथ उत्तम चरित्र का होना अनिवार्य शर्त थी। समयांतर में समाज में औपचारिक शिक्षा की बढ़ती माँग ने पेशेवर शिक्षकों के विकास की अवधारणा को बल दिया और शिक्षक शिक्षा की औपचारिक शुरुआत के लिए शिक्षक संस्थानों की स्थापना हुई। शिक्षक शिक्षा, शिक्षाशास्त्रीय प्रक्रम में उन युवाओं हेतु एक व्यावसायिक तैयारी है जो शिक्षण व्यवसाय में प्रवेश करना चाहते हैं। यह व्यावसायिक तैयारी अनेक प्रकार की हो सकती है, परंपरागत अथवा वस्तुनिष्ठता से युक्त एवं आबद्ध, जिसका लक्ष्य है— विद्वता एवं खुलेपन के लिए समर्पित प्रगतिशील शिक्षक वर्ग की उपलब्धि, जो विद्यार्थियों की व्यक्तिपरकता अथवा आत्मनिष्ठा के प्रति अभिमुख हो (शर्मा एवं शर्मा, 2015, पृष्ठ संख्या 4)। शिक्षक शिक्षा की व्यापक परिभाषा देते हुए कुमार (2016, पृष्ठ संख्या 1) लिखते हैं कि, “अध्यापक शिक्षा एक शैक्षिक आयोजन है जिसमें विभिन्न स्तरीय एवं वर्गीय अध्यापकों को इस तरह से शिक्षित करने का प्रयत्न किया जाता है कि वे आने वाली पीढ़ी को ज्ञान एवं विकासात्मक दायित्वों को ग्रहण तथा वहन करने में सक्षम हो सकें । उनमें तकनीकी कुशलता, वैज्ञानिक चेतना, संसाधन सम्पन्नता तथा नवाचारिता के साथ सांस्कृतिक उद्दीपन एवं मानवता बोध का समन्वयात्मक विकास करना संभव हो सके ।”

शिक्षक शिक्षा की आवश्यकता- प्राचीन काल से ही शिक्षक का समाज में महत्वपूर्ण स्थान है, जो उसके समाज के प्रति निर्वहन किए जाने वाले महत्वपूर्ण कर्तव्यों के संदर्भ में देखा जाता है। प्राचीन कालीन शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक के कर्तव्य को इंगित करते हुए अलतेकर (2014, पृष्ठ संख्या 41) लिखते हैं कि, “अध्यापन के अतिरिक्त आचार्य के और भी कर्तव्य होते हैं। उसे शिष्य का मानस पिता माना गया था । अतः नैतिक दृष्टि से शिष्य के समस्त दोषों का उत्तरदायित्व उस पर था । शिष्य के चरित्र का सर्वदा ध्यान रखना उसका कर्तव्य था” राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में शिक्षक को समाज की स्थिति का मानदंड मानते हुए स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि समाज में शिक्षक की स्थिति समाज की सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों की परिचायक है, क्योंकि कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति अपने शिक्षक से अधिक विकसित नहीं हो सकता है। (मानव संसाधन विकास मंत्रालय, 1998, पृष्ठ संख्या 31) इसलिए ज़रूरी है कि शिक्षक शिक्षा के प्रति ध्यान दिया जाए तथा ज्ञानी, कुशल, दक्ष, संवेदनशील एवं चरित्रवान शिक्षकों का विकास किया जाए।

सीखना एवं सिखाना यद्यपि एक-दूसरे के निकट है, किंतु दोनों में प्रक्रियागत एक महत्वपूर्ण भेद है, जहाँ सीखने की प्रक्रिया भूल-सुधार एवं सतत अभ्यास के सिद्धांत का अनुगम करती है, वहीं सिखाने की प्रक्रिया में भूल एवं सुधार के सिद्धांत को लागू करना एक गंभीर परिणाम को जन्म दे सकता है। इसलिए इसमें गहन शिक्षण एवं प्रशिक्षण प्राप्त अध्यापक की आवश्यकता है। शिक्षार्थी की शिक्षा की गुणवत्ता और उसकी शैक्षिक उपलब्धि का स्तर शिक्षक की दक्षता, संवेदनशीलता और प्रेरणा से निर्धारित होता है। साथ ही यह सर्वमान्य धारणा है कि शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए शिक्षक के पढ़ाए जाने वाले विषय की समझ एवं व्यावसायिक क्षमता, सीखने के आवश्यक वातावरण का निर्माण करती है (नेशनल काउंसिल फ़ॉर टीचर एजुकेश‍न, 2009, पृष्ठ संख्या 1)। इसलिए शिक्षक शिक्षा को आवश्यक माना जाता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में शिक्षक को राष्ट्र निर्माता के रूप में स्वीकार करते हुए कहा गया है कि, ‘शिक्षक वास्तव में बच्चों के भविष्य को आकार देते हैं इसलिए वे हमारे राष्ट्र के भविष्य के निर्माता हैं इस महान योगदान के कारण शिक्षक भारतीय समाज के सबसे सम्मानित सदस्यों में से एक थे और केवल सर्वश्रेष्ठ विद्वान ही शिक्षक बनते थे (शिक्षा मंत्रालय, 2020, पृष्ठ संख्या 30)। वर्तमान शिक्षा नीति जहाँ शिक्षकों में प्राचीन भारतीय मूल्यों एवं सांस्कृतिक गौरव को जीवंत रखना चाहती है वहीं इस नीति में शिक्षक को आधुनिक शैक्षिक तकनीकी एवं संसाधनों के उपयोग में भी दक्ष बनाने की बात पर बल दिया गया है वास्तव में कोई भी शैक्षिक उद्देश्य तब तक प्राप्त नहीं किया जा सकता, जब तक कि इन उद्देश्यों को प्राप्त कराने वाला प्रेरक स्वयं दक्ष न हो। इसलिए यह ज़रूरी है कि शिक्षकत्व के पूर्ण विकास के लिए एक सुनियोजित शिक्षा की योजना निर्धारित हो। शिक्षक शिक्षा की आवश्यकता को सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में तेज़ी से आ रहे परिवर्तन के साथ कदम-ताल मिलाने, सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति, कौशलयुक्त मार्गदर्शन, तकनीकी ज्ञान की प्राप्ति एवं आंतरिक अभिप्रेरणा के विकास के संदर्भ में देखे जा सकते हैं (कुमार, 2016, पृष्ठ संख्या 3)।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में शिक्षक की परिकल्पना- राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षक की एक आदर्श अवधारणा प्रस्तुत की गई है, जो प्राचीन भारतीय शिक्षकों की तरह विद्वता, नैतिक आचरण, कर्तव्यपरायणता और विश्व के कल्याण के लिए सतत प्रयत्नशील शिक्षक की कार्य प्रणाली की याद दिलाती है। इसके साथ ही यह नीति मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों, सूचना-संचार की तकनीकों और अत्याधुनिक उपकरणों का कुशलतापूर्वक उपयोग करने में समर्थ तथा आधुनिक नवाचारों एवं ज्ञान-विज्ञान में दक्ष शिक्षकों की अवधारणा प्रस्तुत करती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के बिंदु क्रमांक 15.1 में कहा गया है कि, “अगली पीढ़ी को आकार देने वाले शिक्षकों की एक टीम के निर्माण में अध्यापक शिक्षा की भूमिका महत्वपूर्ण है। शिक्षकों को तैयार करना एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके लिए बहु-विषयक दृष्टिकोण और ज्ञान की आवश्यकता के साथ बेहतरीन मेंटरों के निर्देशन में मान्यताओं और मूल्यों के निर्माण तथा उनके अभ्यास की भी आवश्यकता होती है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अध्यापक शिक्षा और शिक्षण प्रक्रियाओं से संबंधित अद्यति‍त प्रगति के साथ भारतीय मूल्यों, भाषाओं ज्ञान, लोकाचार और परंपराओं (जनजातीय परंपराओं सहित) के प्रति भी जागरूक रहें।” इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए इक्कीसवीं सदी की शिक्षक शिक्षा से अपेक्षा की गई है कि ये शिक्षक शिक्षा संस्थान ऐसे शिक्षकों को विकसित करें, जिनमें निम्नलिखित अपेक्षाओं को पूर्ण करने की दक्षता हो —

1. शिक्षक को अपने विषय की विशेषज्ञता के साथ-साथ अन्य विषयों का सामान्य ज्ञान होना चाहिए ताकि वह समग्र शिक्षण की अवधारणा को मूर्तरूप दे सकें ।

2. शिक्षक को अध्ययन-अध्यापन की प्रक्रिया की समझ होनी चाहिए।

3. शिक्षक, आजीवन सीखने वाले की भूमिका में होना चाहिए ताकि वह लगातार स्वयं को विकसित कर सके।

4. अध्ययन-अध्यापन की प्रक्रिया के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण और रुचि होनी चाहिए।

5. भारतीय संस्कृति और विरासत को समझें और इसके प्रति गौरव की भावना रखें।

6. आधुनिक सूचना-संचार प्रौद्योगिकी और शैक्षिक नवाचारों के साथ-साथ इन्हें उपयोग करने की क्षमता की भी समझ होनी चाहिए।

7. अध्ययन, शिक्षण, अनुभव और अनुसंधान के माध्यम से स्वयं को प्रासंगिक बनाए रखने एवं कौशलात्मक सुधार के लिए उत्सुक होना चाहिए।

8. कम से कम तीन भाषाओं में दक्ष होना चाहिए ताकि वे विश्वासपूर्वक और लगन से त्रिभाषा नीति के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरा कर सकें ।

9. संवैधानिक एवं नैतिक मूल्यों के पालन को जीवन का अंग बनाने वाला होना चाहिए।

10. अध्ययन-अध्यापन के क्षेत्र में नवाचारों की खोज एवं तदनुरूप स्व-अध्ययन शैली में परिवर्तन के प्रति तत्पर होना चाहिए।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की शिक्षक शिक्षा के संबंध में दिए गए महत्वपूर्ण सुझाव

इक्कीसवीं सदी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए तैयार इस शिक्षा नीति में शिक्षक शिक्षा में सुधार लाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं, जिनके अनुपालन से न केवल शिक्षक शिक्षा में गुणात्मक बदलाव लाया जा सकता है, बल्कि इसके साथ ही विद्यालयी शिक्षा में गुणात्मक सुधार को गति दी जा सकती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में शिक्षा से संबंधित प्रत्येक पहलू पर विचार किया गया है इसमें शिक्षक-प्रशिक्षण की चर्चा भी शामिल है शिक्षक शिक्षा पर न्यायमूर्ति वर्मा आयोग (2012) की चिंताओं एवं शिक्षक-प्रशिक्षण के क्षेत्र की समस्याओं तथा उपरोक्त शिक्षक शिक्षा संबंधी अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए निम्नलिखित महत्वपर्णू सुझाव दिए गए हैं —

1. शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम केवल बहु-विषयक शैक्षिक संस्थानों में ही आयोजित किए जाएँ।

2. वर्ष 2030 तक केवल शैक्षिक रूप से सुदृढ़, बहु-विषयक और एकीकृत अध्यापक शिक्षा कार्यक्रम ही कार्यान्वित हों।

3. वर्ष 2030 से एकीकृत बी.एड. का अध्ययन केवल बहु-विषयक, गुणवत्ता युक्त एवं निर्धारित मानकों के आधार पर संचालित संस्थानों में ही किया जा सकता है।

4. एकल विषय आधारित शैक्षणिक संस्थानों का वर्ष 2030 तक बहु-विषयक संस्थानों के रूप में उन्नयन करना, जो संस्थान ऐसा करने में असफल होंगे उन्हें बंद कर दिया जाए।

5. चार वर्षीय शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम, दो वर्षीय शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम और एकवर्षीय शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम को स्वीकृति, लेकिन केवल उन्हीं बहु-विषयी संस्थान को दो वर्षीय शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम और एक वर्षीय शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम चलाने की स्वीकृति मिले, जो सफलतापूर्वक चार साल के शिक्षक शिक्षा के कार्यक्रम को चला रहे हों।

6. जिनके पास स्नातक की डिग्री है, उनके लिए दो वर्षीय शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम एवं जिनके पास विशिष्ट विषय के साथ चार वर्षीय स्नातक की डिग्री है, उनके लिए एकवर्षीय शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम चलाया जा सकता है।

7. समाज की आवश्यकताओं को साकार करने वाली नई माँग आधारित शिक्षण संस्थानों की स्थापना की जानी चाहिए।

8. प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को आकर्षित करने के लिए विद्यार्थीवृत्ति की व्यवस्था के साथ ही साथ ज़रूरतमन्द प्रशिक्षुओं की मदद करना।

9. गुणवत्ता की प्राप्ति के लिए राष्ट्रीय परीक्षण संस्थान द्वारा आयोजित विषय और शिक्षक योग्यता परीक्षा के आधार पर शिक्षक शिक्षा संस्थानों में प्रवेश।

10. पीएच.डी. कार्यक्रम में नए नामांकित विद्यार्थियों को अपने शोध (शिक्षाशास्त्र या अध्ययन अथवा पाठ्यक्रम विकास) के लिए प्रासंगिक विषय में क्रेडिट आधारित अध्ययन करना होगा।

11. शिक्षकों के रूप में काम करने वाले सभी शिक्षकों को अपने व्यावसायिक विकास को जारी रखने के लिए प्रेरणा और सुविधाएँ दी जाएँ।

12. स्वयं और दीक्षा जैसे प्रौद्योगिकी आधारित शिक्षक शिक्षा पाठ्यक्रमों से जुड़कर आत्म-विकास के अवसर पैदा करना।

सुझावों के कार्यान्वयन से संबंधित चुनौतियां और समाधान

किसी भी नीति की सफलता इसके कुशल और व्यावहारिक कार्यान्वयन में निहित है। नीति या योजना कितनी व्यावहारिक और फलदायी होती है, यह कार्यान्वयन की योजना और निष्पादक के साथ-साथ कार्यकर्ता पर निर्भर करता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में शिक्षक शिक्षा के स्वरूप में आमूलचूल परिवर्तन की तैयारी की गई है, परंतु यह नीति प्रस्तावित सुधारों के कार्यान्वयन की स्पष्ट योजना या कानूनी प्रावधानों को स्पष्ट रूप से दिशा-निर्देशित नहीं करती है। नीति, केवल इस बात पर चर्चा करती है कि क्या किया जाएगा या क्या होने की उम्मीद है, लेकिन इस नीति को अमल में कैसे लाया जाएगा, का कोई उल्लेख नहीं है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में उल्लि‍खित शिक्षक शिक्षा से संबंधित सिफ़ारिशों के कार्यान्वयन में आने वाली प्रमुख चुनौतियाँ और इसके समाधान निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर समझे जा सकते हैं —

1. संरचनात्मक अस्थिरता संबंधित चुनौती- शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र में की गई सिफ़ारिशों में संरचनात्मक परिवर्तन सबसे महत्वपूर्ण है। इस सिफ़ारिश को लागू करने से कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। पिछले 10 वर्षों में, शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र में इतने प्रयोग हुए हैं, जितने पूरी शिक्षा प्रणाली में नहीं हुए। एकवर्षीय बी.एड. कार्यक्रम को परिवर्तित कर दो वर्षीय बी.एड. कार्यक्रम बना दिया गया। बदलाव इतनी जल्दबाजी में किए गए कि कोई भी शोधार्थी या संस्थान इस संरचनात्मक परिवर्तन की सफलता या विफलता को माप नहीं पाया। अभी यह परिवर्तन सही से ‍‍क्रियान्वित भी नहीं हुआ था कि सेमेस्टर सिस्टम लागू कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप फिर से आनन-फानन में नए पाठ्यक्रमों की संरचना की गई। अभी इस योजना पर अमल हो ही रहा था कि अब इस नीति के माध्यम से चार वर्षीय एकीकृत शिक्षक शिक्षा की बात लागू कर दी गई है। इस क्षेत्र में इन लगातार बदलावों का पूरी शिक्षक शिक्षा पर गहरा नकारात्मक असर पड़ा है। ये परिवर्तन अपने-आप में एक चुनौती है। यदि शिक्षक शिक्षा को गुणवत्ता युक्त बनाना है तो सर्वप्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में किए गए ये परिवर्तन स्थायी होने चाहिए और कम से कम 10 साल तक चलते रहना नितांत आवश्यक है, अन्यथा इस परिवर्तन का भी शिक्षक शिक्षा की गुणवत्ता में कोई खास योगदान नहीं होगा। मात्र सत्ता के परिवर्तन अथवा सरकार के मनस्वी विचार के आधार पर नहीं, बल्कि होने वाला कोई भी परिवर्तन शोध आधारित होना चाहिए।

2. स्वरूपगत परिवर्तन से संबंधित चुनौती- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, चार वर्षीय बी.एड. कार्यक्रम पर बल देती है, लेकिन इसके साथ ही दो वर्षीय और एकवर्षीय बी.एड. कार्यक्रम को फिर से स्थापित करने की पहल की गई है। अंतर यह है कि ये सभी कार्यक्रम अब केवल बहु-विषयक स्वायत्त कॉलेजों या विश्वविद्यालयों में चलाए जा सकते हैं। वर्तमान स्थिति में शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र में एकल पाठ्यक्रम आधारित कॉलेजों की संख्या बहुत बड़ी है। इसमें भी निजी संस्थानों की संख्या बहुत अधिक है। ऐसी स्थिति में बहुत बड़ी संख्या में बहु-विषयक संस्थानों की आवश्यकता होगी। ऐसे में नवीन संस्थानों की स्थापना एवं अपग्रेडेशन का कार्य कैसे होगा? आवश्यक पूँजी कहाँ से आएगी जैसे प्रश्न अपने आप में बहुत बड़ी समस्या है। वित्तीय, भौतिक और मानवीय सुविधाओं के अभाव में एकल सरकारी या निजी संस्थान के लिए खुद को बहु-विषयक संस्थान में बदलना एक बड़ी समस्या होगी। यदि आज के निजी संस्थान स्वयं को बहु-विषयक संस्थानों में विकसित नहीं कर पाएँगे तो, शायद यह संस्थान बंद हो जाएँगे। इन चुनौतियों को पूरा करने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकार समय-समय पर समाज की ज़रूरतों की जाँच करे और आनुपातिक रूप से नए संस्थान खोलने की पहल करने के साथ ही अच्छी तरह से कार्य कर रहे निजी संस्थानों को भी अनुदान प्रदान कर उन्हें बहु-विषयक संस्थान के रूप में विकसित करने में मदद करें। यदि निजी क्षेत्र के संस्थान इस क्षेत्र में काम करना चाहते हैं तो उन्हें इस शर्त के साथ अनुमति दी जानी चाहिए कि वे, इस कार्य से मुनाफ़ा कमाने की न सोचें और शिक्षक शिक्षा से संबंधित नीतियों का सख्ती से पालन करें। साथ ही स्वरूपगत परिवर्तनों से संबंधित चुनौतियों का सामना करने के लिए स्पष्ट नीति बने। सरकार वित्तीय एवं संसाधनों की उपलब्धता के प्रति अपनी जवाबदेही को निभाए तथा निजी क्षेत्र के संस्थान इसे सेवा कार्य मानते हुए आर्थिक उपार्जन की क्षुद्र भावना से ऊपर उठते हुए नीति -नियमों का पालन कर शिक्षक शिक्षा की गुणवत्ता को बनाए रखें।

3. संसाधनों की कमी- राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र में सुझाई गई गुणवत्ता की प्राप्ति के लिए आवश्यक भौतिक संसाधनों की भारी कमी दिखाई देती है प्रत्येक संगठन को सुविधाओं के मामले में एक आदर्श संगठन के रूप में विकसित किया जाना है। शैक्षिक संसाधनों की उपलब्धता शिक्षण प्रक्रिया को आसान, सुविधाजनक और प्रभावी बनाती है। बच्चों के चहुँमुखी, समन्वित और पूर्ण विकास के लिए व्यक्तित्व के हर पहलू का विकास आवश्यक है भावी शिक्षक के मानसिक विकास के लिए कक्षा, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, गतिविधि कक्ष एवं समिति कक्ष के साथ-साथ शारीरिक विकास के लिए एक खेल का मैदान और व्यायामशाला की आवश्यकता होगी। वर्तमान परिदृश्य में, अधिकांश सरकारी और निजी संस्थानों में इन सुविधाओं का अभाव है अगर सभी सुविधाओं की पूर्ति करनी है तो अधिकांश निजी संस्थानों को ट्यूशन फ़ीस बढ़ानी होगी, जिससे पहले से ही महँगी निजी शिक्षा और अधिक महँगी हो जाएगी। इसलिए यह आवश्यक है कि सरकार शिक्षक शिक्षा को एक आवश्यक सेवा माने तथा प्रत्येक शिक्षक शिक्षा संस्थान को इन सभी सुविधाओं को निःशुल्क स्थापित करने में मदद करे। शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का लगभग चार प्रतिशत खर्च करके इन सुविधाओं को उपलब्ध नहीं कराया जा सकता है। ऐसी स्थिति में मज़बूत इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए, सरकार को अगले तीन वर्षों में शिक्षा पर व्यय का प्रतिशत बढ़ा कर छह प्रतिशत करना होगा और इसे 2035 में अमल में लाने के बजाय आज से ही ‍क्रियान्वित करना चाहिए। सभी शिक्षक शिक्षा की संस्थाओं चाहे वे सरकारी हों या निजी, दोनों के लिए समान नीति नियम लागू हों। इसके साथ ही भौतिक और मानव संसाधन संबंधी खर्चों को सरकार स्वयं वहन करें।

4. शिक्षक-प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण के संबंध में अस्पष्टताराष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षकों को तैयार करने के बारे में चर्चा की गई है, लेकिन यह नहीं बताया गया है कि ऐसे शिक्षकों को तैयार करने वाले शिक्षक-प्रशिक्षक कैसे प्रशिक्षित होंगे। नीति में एम.एड. (शिक्षक-प्रशिक्षक तैयार करने वाले पाठ्यक्रम) के बारे में कोई उल्लेख नहीं है। शिक्षक-प्रशिक्षकों की दक्षता पर भविष्य के शिक्षकों के प्रशिक्षण का दायित्व होता है जो शिक्षक की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। शिक्षक-प्रशिक्षण, वस्तुतः एक समग्र और जटिल प्रक्रिया है, जिसमें विद्यार्थी और शिक्षक एवं उन्हें प्रशिक्षित करने वाले शिक्षक-प्रशिक्षक एक बढ़ते क्रम में योजनाबद्ध रूप से आपस में जुड़े होते हैं। शिक्षक शिक्षा में गुणवत्ता स्थापित करने के लिए पहली आवश्यकता प्रशिक्षकों (जो एम.एड. में पढ़ा सकते हैं।) की तैयारी है, जो शिक्षक-प्रशिक्षकों को प्रशिक्षित कर सकते हैं, क्योंकि शिक्षक, केवल प्रशिक्षक की क्षमता और ज्ञान के अनुसार तैयार किए जा सकते हैं। इन शिक्षक-प्रशिक्षकों की दक्षता भविष्य के प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों की क्षमता को प्रभावित करेगी, जो अंततोगत्वा विद्यार्थियों के समग्र विकास को प्रभावित करेगी। क्या और कैसे सिखाना है? की तैयारी के लिए विद्यार्थी से लेकर शिक्षक-प्रशिक्षक स्तर के सभी संबंधित व्यक्तियों को विचार करना होगा। शिक्षक-प्रशिक्षक की तैयारी के लिए सुविधाएँ, पाठ्यक्रम और योजनाएँ तत्काल तैयार की जानी चाहिए। इसी तरह वर्तमान में प्रशिक्षण कार्य में लगे व्यक्तियों को भी सेवाकालीन प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी। इस चुनौती के निस्तारण के लिए तत्काल शिक्षक-प्रशिक्षक पाठ्यक्रम का निर्माण एवं कार्यान्वयन इस योजना की ज़रूरत है।

5. शिक्षाशास्त्र में अप्रशिक्षित व्यक्ति से गुणवत्तायुक्त प्रशिक्षण संबंधी अपेक्षा — राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार सभी एकल शिक्षक शिक्षा संस्थानों को बहु-विषयक संस्थानों के रूप में विकसित करना है। इसके लिए उन विषय-विशेषज्ञों को भी नियुक्त करने की सिफारिश की गई है, जिन्होंने शिक्षक-प्रशिक्षकों के रूप में प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया है। जबकि शिक्षक-प्रशिक्षण कार्यक्रम एक विशेषीकृत कार्यक्रम है, जिसमें बाल-व्यवहार एवं मनोविज्ञान, अध्ययन-अध्यापन की तकनीक एवं शिक्षणशास्त्र, आकलन अथवा मूल्यांकन तथा मार्गदर्शन एवं निर्देशन जैसे अनेक विषयों से संबं‍धित विशेषज्ञीय सेवा की आवश्यकता होती है। शिक्षाशास्त्र मात्र विषयों को ही पढ़ाने का नाम नहीं है। ऐसे में सवाल यह है कि ये अप्रशिक्षित एवं मात्र अपने विषय (गणित, अंग्रेज़ी, दर्शनशास्त्र, कला इत्यादि ) में विशेषज्ञता रखने वाले व्यक्ति भावी शिक्षकों को कैसे प्रशिक्षण दे सकते हैं, क्योंकि शिक्षक-प्रशिक्षण का कार्य, क्या सीखना है, से ज़्यादा कैसे सिखाना है, पर ज़ोर देता है। वर्तमान स्थिति में ऐसे शिक्षक केवल विषय ज्ञान प्रदान कर पाएँगे, जो सूचना क्रांति के समय में इंटरनेट से भी आसानी से खोजा जा सकता है। वास्तव में, आदर्श स्थिति यह है कि जो कोई भी इस क्षेत्र से जुड़े, उसे विषय के साथ ही अध्ययन-अध्यापन से संबंधित तीनों शिक्षणशास्त्रों (पेडागॉजी अर्थात् बाल-शिक्षणशास्त्र, एंड्रागॉजी अर्थात् प्रौढ़-शिक्षणशास्त्र एवं हेट्रागॉजी अर्थात् स्व-निर्देशित शिक्षणशास्त्र) की समझ एवं प्रशिक्षण अपरिहार्य है, जहाँ विषय-विशेषज्ञों को प्रशिक्षण के बिना शिक्षक शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण कार्य कराने की अनुमति दी गई है, वहीं राष्ट्रीय शिक्षा नीति में पीएच.डी. करने वाले शोधार्थियों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने विषय से संबंधित शिक्षणशास्त्र से संबंधित कोर्स भी करें, जिससे आगे चलकर उन्हें पढ़ाने में कठिनाई न हो, जो एक अच्छी पहल है। अगर पीएच.डी. करने वाले शोधार्धी से यह अपेक्षा रखी जाती है, तो शिक्षक शिक्षा जैसे विशेषीकृत कार्यक्रम में मात्र अपने विषय का ज्ञान रखने वाले व्यक्ति भविष्य के शिक्षक कैसे तैयार करेंगे, यह एक व्यावहारिक समस्या है। इसलिए शिक्षक शिक्षा संस्थान में शामिल होने वाले व्यक्ति के लिए शिक्षाशास्त्र में कुशल होना आवश्यक किया जाए और यह महत्वपूर्ण निर्णय, बनाई जाने वाली कार्ययोजना में अवश्य शामिल किया जाए।

6. प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को आकर्षित करने की चुनौती- राष्ट्रीय शिक्षा नीति में अपेक्षा की गई है कि प्रतिभाशाली या उच्च श्रेणी प्राप्त करने वाले विद्यार्थी-शिक्षक बनने के प्रति आकर्षित हों। प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को आकर्षित करने के लिए विद्यार्थीवृत्ति की व्यवस्था की गई है (अंक संख्या 15.5, पृष्ठ सं. 70)। यद्यपि विद्यार्थीवृत्ति का सुझाव प्रशंसनीय कदम है, लेकिन पर्याप्त नहीं है। वास्तव में, प्रतिभा संपन्न व्यक्तियों को किसी भी व्यवसाय में आकर्षित करने के लिए उस क्षेत्र में शामिल होने के समान अवसर, सम्मानजनक वेतनमान, समाज में प्रतिष्ठा और उस व्यवसाय में काम करने के तरीके के साथ-साथ आगे बढ़ने के अवसर की अनुकूलता आवश्यक है। वर्तमान में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो किसी व्यक्ति को (केवल सरकारी या सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों में मिलने वाले वेतनमान को छोड़कर) शिक्षक बनने के लिए प्रेरित करता हो। सरकारी विद्यालयों में अध्यापन के साथ-साथ शिक्षक से जिस तरह का काम लिया जाता है, वह व्यवसाय की गरिमा और समाज में इसकी प्रतिष्ठा को गंभीर रूप से नुकसान तो पहुँचाता ही है, इसके साथ ही साथ उसके विद्यालयी कार्यों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। शिक्षकों का शैक्षणिक कार्यों से इतर कार्य करने के कारण सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की शैक्षिक प्रगति प्रभावित होती है वहीं निजी संस्थाओं में शिक्षकों का वेतनमान इतना कम है कि इस तरह कोई भी प्रतिभाशाली विद्यार्थी मात्र मजबूरी में ही शिक्षक बनने की सोच सकता है। दूसरी बात माँग एवं आपूर्ति के नियमों की अवहेलना कर जिस तरह से पिछले दशक में बी.एड. एवं डी.एल.एड. की निजी संस्थाओं को खोला गया, वह एक गंभीर चिंता का विषय है। कम गुणवत्ता वाले प्रशिक्षण (केवल कागज़ पर) प्रदान करे या वितरण के कारण दोयम दर्जे के शिक्षकों की फौज खड़ी हो गई है, जिसके परिणामस्वरूप डिग्री होने के बावजूद काम करने का अवसर न मिलने तथा मनरेगा की तुलना से भी कम (यहाँ तक कि 2500 से 4000 प्रतिमाह) वेतन पर शिक्षक बनने के लिए कोई भी प्रतिभाशाली व्यक्ति आकर्षित नहीं होगा। अतः अगर हम वास्तव में इस क्षेत्र में प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को आकर्षित करना चाहते हैं, तो हमें इस क्षेत्र में शामिल होने के लिए समान अवसर, सम्मानजनक वेतनमान, समाज में क्षेत्र की प्रतिष्ठा और उस व्यवसाय में काम करने के तरीके के साथ-साथ आगे बढ़ने के अवसर को भी सुनिश्चित करना होगा। अनावश्यक गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त कर शिक्षकों को शिक्षण का सम्मानजनक वातावरण प्रदान करना होगा।

7. नए पाठ्यक्रम को डिज़ाइन करने की चुनौती- राष्ट्रीय शिक्षा नीति में विद्यालय की शिक्षा संरचना को 5 + 3 + 3 + 4 (तीन से 18 साल के विद्यार्थियों के लिए) में बदल दिया गया है। मनोविज्ञान के अनुसार, मानव विकास के सात मुख्य चरण हैं— (शैशवावस्था, बाल्यावस्था, उत्तर बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था) इन चरणों में युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था के चरण का संबंध जीवन के लगभग 82 वर्ष (18 वर्ष से 100 वर्ष ) से है, जिसमें वैचारिक और शारीरिक परिपक्वता को छोड़कर कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं होता है, जबकि जन्म से लेकर 18 वर्ष की आयु तक मानव व्यक्तित्व में एक तेज़ और बहुआयामी परिवर्तन होता है, जो बच्चे की शारीरिक वृद्धि तथा मानसिक, सांवेगिक एवं सामाजिक विकास को प्रभावित करता है। इस काल को ही सीखने का सर्वोत्तम काल माना जाता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षा की संरचना मनोविज्ञान के सिद्धांतों को ध्यान में रखकर की गई है, लेकिन पाठ्यक्रम के प्रारूप के संबंध में कोई विशेष दिशा निर्देश नहीं है। बाल्यावस्था में बच्चे के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्तर (3 से 8 वर्ष ), उत्तर बाल्यावस्था (9 से 12) और किशोरावस्था (13 से 18) में होने वाले शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक परिवर्तनों के मद्देनज़र पाठ्यक्रम संरचना के लिए स्पष्ट मार्गदर्शन का अभाव अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति को तुरंत लागू करने के लिए आवश्यक है कि नए पाठ्यक्रम का निर्माण तुरंत किया जाए। शिक्षक की भूमिका में एक बड़ी तब्दीली आई है, उसे अब तक ज्ञान के स्रोत के केंद्र रूप में स्थान मिलता रहा है और वही समूची सीखने-सिखाने की प्रक्रिया का संरक्षक एवं प्रबंधक रहा है। अब उसकी भूमिका ज्ञान के स्रोत के बदले एक सहायक की होगी, जो सूचना को ज्ञान अथवा बोध में बदलने की प्रक्रिया में विविध उपायों से शिक्षार्थियों को उनके शैक्षणिक लक्ष्यों की पूर्ति में मदद करे (एन.सी.एफ़. 2005, पृष्ठ सं. 122)। इस चुनौती से निपटने के लिए रचनात्मक अधिगम पर आधारित शिक्षक-प्रशिक्षण पाठ्यक्रम की आवश्यकता होगी, जिसके लिए विशेषज्ञों की टीम गठित की जानी चाहिए तथा सी.बी.एस.ई., एन.सी.ई.आर.टी. एवं एस.सी.ई.आर.टी. आदि संस्थानों का सहयोग लेकर पाठ्यक्रम निर्माण की प्रक्रिया को अभियान की तरह निश्चित समय सीमा में पूर्ण किया जाना चाहिए, जिसमें नीति के साथ ही साथ विद्यार्थियों के विकास एवं वृद्धि के विभिन्न चरणों में होने वाले परिवर्तन, उनकी अभिक्षमता एवं उनके हितों के साथ -साथ समाज की ज़रूरतों और सांस्कृतिक विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए पाठ्यक्रम को निर्मित किया जाए।

8. शिक्षक शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता को बनाए रखने की चुनौती- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुसार माध्यमिक स्तर तक ड्रॉप आउट दर को शून्य प्रतिशत पर ला देना, उच्च शिक्षा में विद्यार्थियों का नामांकन 50 प्रतिशत तक बढ़ाना तथा प्रत्येक एकल शिक्षक शिक्षा की संस्थाओं को बहु-विषयी संस्था के रूप में विकसित करना है वर्ष 2030 तक सभी एकल संस्थाओं को बहु-विषयी संस्था के रूप में परिवर्तित करने का लक्ष्य रखा गया है। वर्ष 2030 के बाद मात्र बहु-अनुशासनात्मक संस्थानों में ही शिक्षक शिक्षा से संबंधित पाठ्यक्रम चलाए जा सकते हैं वर्तमान में भौतिक एवं मानवीय संसाधनों की उपलब्धता को देखते हुए यह लक्ष्य अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। स्वाभाविक रूप से इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, बड़ी संख्या में माध्यमिक विद्यालयों के साथ-साथ उच्च शिक्षा संस्थानों को खोलना होगा, जिसमें प्रशिक्षित शिक्षकों की आवश्यकता होगी। इसमें शिक्षकों के साथ -साथ भौतिक सुविधाओं की आवश्यकता होगी, जिसकी पूर्ति के लिए अधिक धन की आवश्यकता होगी। केंद्र सरकार आज सकल घरेलू उत्पाद का लगभग चार प्रतिशत ही खर्च कर रही है, जो उपरोक्त लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बहुत कम है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में इस समस्या को समाप्त करने के लिए बजट का छह प्रतिशत खर्च करने का सुझाव दिया गया है, जिस पर अमल करने की समय सीमा 2035 रखी गई है। साथ ही निजी क्षेत्र से धन के प्रबंधन के साथ -साथ संसाधनों के प्रबंधन की बात भी की गई है। वास्तव में केवल छह प्रतिशत के साथ उपरोक्त लक्ष्य को प्राप्त करना असंभव है। अगर निजी क्षेत्र को आज की तरह ही शैक्षिक संस्थाओं के संचालन की अनुमति दी जाती है, तो गुणवत्ता पर प्रश्न-चिह्न लग जाएगा। शिक्षक शिक्षा की वर्तमान स्थिति के पीछे विभिन्न कारणों में अधिकांश निजी संस्थानों में व्याप्त भ्रष्टाचार और मुनाफ़ाखोरी सबसे अधिक ज़िम्मेदार है। बेशक, कुछ निजी शैक्षणिक संस्थान अच्छा काम कर रहे हैं। ऐसे में निजी क्षेत्र से पूंजी की प्राप्ति, बड़ी मात्रा में वित्तीय प्रबंधन, गुणवत्ता का सुनिश्चितीकरण और निजी संस्थाओं पर नियंत्रण एक बड़ी चुनौती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के कार्यान्वयन के लिए तैयार की जाने वाली योजना को उपरोक्त चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया जाना चाहिए। शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी नियामक संस्थाएँ निडर होकर काम करती हैं, तो इस चुनौती को पार करने में कोई विशेष बाधा नहीं होगी। मज़बूत इच्छाशक्ति, स्पष्ट कार्य योजना और पर्याप्त वित्तीय सहायता की आवश्यकता की पूर्ति के लिए सरकार, शिक्षक, प्रबंधन समिति एवं समाज सबकी निश्चित भूमिकाओं के निर्वाह की ज़रूरत है।

निष्कर्ष- शिक्षा, शिक्षार्थी और शिक्षक सभी का एक-दूसरे के साथ बहुत गहरा संबंध है, जहाँ शिक्षा, विकास की एक प्रक्रिया है, सीखने वाला उस विकास का लाभार्थी है तो शिक्षक इस पूरी प्रक्रिया का समन्वयक, निर्माता और प्रशासक है। इसीलिए शिक्षा की प्रक्रिया को गुणात्मक और प्रभावी बनाने के लिए इक्कीसवीं सदी की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तैयार की गई है, जिसने शिक्षक शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया है। शिक्षक शिक्षा को एक नई दिशा देने के लिए जो सिफ़ारिशें और अपेक्षाएँ की गई हैं, उन्हें पूरा करने में कई चुनौतियाँ होंगी, जिनकी ऊपर चर्चा की जा चुकी है। यदि शिक्षा प्रक्रिया में शामिल सभी लोग पूरी ईमानदारी के साथ काम करते हैं, तो उपरोक्त चुनौतियों का हल ढूँढकर भारतीय शिक्षा प्रणाली को फिर से विश्वस्तरीय बनाया जा सकता है। इसके लिए सिर्फ़ सरकार, समाज, शिक्षक, प्रबंध समिति एवं विद्यार्थियों के प्रयासों की ज़रूरत है।

सन्दर्भ सूची-

  1. अलतेकर, ए. एस. 2014. प्राचीन भारतीय शिक्षण पद्धति. अनुराग प्रकाशन, वाराणसी.
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  4. नेशनल काउंसिल फ़ॉर टीचर एजुकेशन. 2009. नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क फ़ॉर टीचर एजुकेशन. एन.सी.टी.ई., नयी दिल्ली.
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  8. 2010. पर्सपेक्टिव ऑन नई तालीम. रा.शै.अ.प्र.प., नयी दिल्ली.
  9. शर्मा , वी.पी और आर. शर्मा. 2015. अध्यापक प्रशिक्षण तकनीक. अर्जुन पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली.
  10. शिक्षा मंत्रालय. 2020. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020. भारत सरकार, नयी दिल्ली. 12 दिसंबर, 2020 को https://www.mhrd.gov.in/sites/upload_files/mhrd/files/NEP_final_HINDI_0.pdf से प्राप्‍त किया गया.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत चार वर्षीय बी.ए. हिंदी पाठ्यक्रम

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उत्तर प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत चार वर्षीय बी.ए. हिंदी पाठ्यक्रम 2021-2022

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PROGRAMME SPECIFIC OUTCOMES

बी. ए. प्रथम वर्ष प्रथम सेमेस्टर के ‘हिंदी काव्य’ प्रश्नपत्र के अंतर्गत भारतीय ज्ञान परंपरा में हिंदी साहित्य के विभिन्न कालों के प्रतिनिधि कवियों की कविताओं के विषय में जानकारी देना तथा हिंदी काव्य के इतिहास की संक्षिप्त जानकारी देकर विद्यार्थियों को हिंदी कविता के विकास क्रम से अवगत कराना।

बी. ए. प्रथम वर्ष द्वितीय सेमेस्टर के ‘कार्यालयी हिंदी और कम्प्यूटर’ प्रश्नपत्र के अंतर्गत हिंदी के विद्यार्थियों को कार्यालय के कार्यों की मूलभूत जानकारी प्रदान करना ताकि वे कार्यालय के समस्त कार्यों को सुगमतापूर्वक कर सकें एवं उन्हें कम्प्यूटर का मूलभूत ज्ञान देकर कम्प्यूटर पर हिंदी में कार्य करने में सक्षम बनाना ताकि वे समुचित रोज़गार प्राप्त कर सकें।

बी. ए. द्वितीय वर्ष तृतीय सेमेस्टर के ‘हिंदी गद्य’ प्रश्नपत्र के अंतर्गत विद्यार्थियों को हिंदी गद्य की सभी विधाओं का सम्यक ज्ञान देना तथा उन्हें हिंदी के प्रतिनिधि उपन्यासकारों, कथाकारों, नाटककारों, एकांकीकारों, निबंधकारों एवं अन्य गद्य विधाओं के लेखकों के महत्त्वपूर्ण प्रदेय से परिचित कराना, ताकि विद्यार्थी इन सभी विधाओं से परिचित हो सकें और इस क्षेत्र में करियर बनाने के इच्छुक विद्यार्थी को इस हेतु तैयार करना ।

बी. ए. द्वितीय वर्ष चतुर्थ सेमेस्टर के ‘हिंदी अनुवाद’ प्रश्नपत्र के अंतर्गत विद्यार्थियों को हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी की प्रारंभिक जानकारी प्रदान करते हुए उन्हें वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करने में सक्षम बनाना तथा भारतीय संस्कृति और साहित्य के वैश्विक प्रचार प्रसार में सहायक बनाना और इस क्षेत्र में करियर बनाने के इच्छुक विद्यार्थी को इस हेतु तैयार करना।

बी.ए. तृतीय वर्ष पंचम सेमेस्टर सेमेस्टर के प्रथम प्रश्नपत्र ‘साहित्यशास्त्र और हिंदी आलोचना’ के अंतर्गत विद्यार्थी को साहित्यशास्त्र एवं आलोचना के अर्थ, महत्व और विषय क्षेत्र से परिचित कराना तथा उन्हें हिंदी आलोचना के रूप में भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र के आधुनिक विकास के विविध रूपों और दिशाओं का साक्षात्कार कराना |

बी.ए. तृतीय वर्ष पंचम सेमेस्टर सेमेस्टर के द्वितीय प्रश्नपत्र ‘हिंदी का राष्ट्रीय काव्य’ के अंतर्गत हिंदी साहित्य एवं सिनेमा की राष्ट्रीय काव्य चेतना से जुड़े कवियों की रचनाओं के माध्यम से विद्यार्थियों में राष्ट्र के प्रति अनुराग जाग्रत करना और उन्हें भारतीय संस्कृति की विशिष्टता और महानता के विविध पक्षों से अवगत कराना और इस क्षेत्र में करियर बनाने के इच्छुक विद्यार्थी को इस हेतु तैयार करना।

बी. ए. तृतीय वर्ष षष्ठ सेमेस्टर सेमेस्टर के प्रथम प्रश्नपत्र ‘भाषा विज्ञान, हिंदी भाषा तथा देवनागरी लिपि’ के अंतर्गत विद्यार्थियों को भाषा के अंगों, हिंदी भाषा के उद्भव तथा विकास और देवनागरी लिपि के स्वरूप की जानकारी कराना एवं उन्हें हिंदी की वैज्ञानिक एवं संवैधानिक स्थिति से परिचित कराना।

बी. ए. तृतीय वर्ष षष्ठ सेमेस्टर सेमेस्टर के द्वितीय प्रश्नपत्र ‘लोक साहित्य एवं लोक संस्कृति के अंतर्गत भारतीय संस्कृति में जनश्रुति से निर्मित साहित्य के महत्वपूर्ण योगदान से विद्यार्थियों को परिचित कराना तथा लोक संस्कृति के विकास क्रम से विद्यार्थियों को अवगत कराना।

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बीए प्रथम वर्ष: प्रथम सत्र

हिंदी काव्य (कोड: A010101T)

Course outcomes:

हिंदी काव्य के प्रतिनिधि कवियों की कविताओं के विषय में जानकारी देना तथा हिंदी काव्य के संक्षिप्त इतिहास की जानकारी देकर विद्यार्थियों को हिंदी कविता के विकास क्रम से अवगत कराना ।

भारतीय ज्ञान परंपरा के अंतर्गत आदिकालीन एवं मध्यकालीन हिंदी काव्य का इतिहास : इतिहास लेखन की परंपरा एवं विकास:

भारतीय ज्ञान परंपरा और हिंदी साहित्य, हिंदी साहित्य का काल विभाजन, नामकरण एवं साहित्यिक प्रवृत्तियाँ । सिद्ध साहित्य, जैन साहित्य, रासो साहित्य, नाथ साहित्य और लौकिक साहित्य| भक्ति आंदोलन के उदय के सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारण,भक्तिकाल के प्रमुख संप्रदाय और उनका वैचारिक आधार, निर्गुण और सगुण कवि और उनका काव्य । रीति काल की सामाजिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, नामकरण, प्रवृत्तियाँ एवं परिप्रेक्ष्य । रीतिकालीन साहित्य के प्रमुख भेद (रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीति मुक्त, प्रमुख कवि और उनका काव्य) ।

आधुनिक कालीन काव्य का इतिहास :

सामाजिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, नामकरण एवं प्रवृत्तियाँ, 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम और पुनर्जागरण, हिंदी नवजागरण, भारतेंदु युग, द्विवेदी युग एवं छायावाद की प्रवृत्तियाँ एवं अवदान । उत्तर छायावाद की विविध वैचारिक प्रवृत्तियाँ, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, समकालीन कविता, एवं उनकी रचनाएँ और साहित्यिक विशेषताएँ। प्रमुख कवि

आदिकालीन कवि :

विद्यापति :

(विद्यापति पदावली – संपा. : आचार्य रामलोचन शरण)

क. राधा की वंदना, ख. श्रीकृष्ण प्रेम (35), ग. राधा प्रेम – ( 36 )

गोरखनाथ :

(गोरखबानी : संपादक पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल गोरखबानी सबदी (संख्या 2,4,7,8,16), पद (राग रामश्री 10, 11)

अमीर खुसरो :

(अमीर खुसरो – व्यक्तित्व एवं कृतित्व : डॉ. परमानन्द पांचाल) कव्वाली – घ (1), गीत-ड़ (4), (13), दोहे – च (पृष्ठ 86 ), 05 दोहे – गोरी सोवे,खुसरो रैन,देख मैं, चकवा चकवी, सेज सूनी|

भक्तिकालीन निर्गुण कवि :

कबीर :

(कबीरदास – संपा. श्यामसुंदर दास)

क. गुरुदेव को अंग -01, 06, 11, 17, 20 ख – बिरह कौ अंग – 04, 10, 12, 20, 33

मलिक मोहम्मद जायसी :

(मलिक मोहम्मद जायसी – संपा. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल)

मानसरोदक खंड (01 से 06 पद तक)

भक्तिकालीन सगुण कवि :

सूरदास :

(भ्रमरगीत सार-संपा. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल)

(पद संख्या 07, 21, 23, 24, 26)

गोस्वामी तुलसीदास :

(श्रीरामचरित मानस-गोस्वामी तुलसीदास, गीता प्रेस गोरखपुर)

अयोध्या काण्ड-दोहा संख्या 28 से 41

रीतिकालीन कवि:

केशवदास :

(कविप्रिया ( प्रिया प्रकाश ) – लाला भगवानदीन)

तृतीय प्रभाव – 1, 2, 4, 5

बिहारीलाल :

(बिहारी रत्नाकर – जगन्नाथ दास रत्नाकर)

प्रारंभ के 10 दोहे

घनानंद :

(घनानंद ग्रन्थावली-संपा., विश्वनाथ प्रसाद मिश्र) सुजानहित- 1, 4, 7

आधुनिककालीन कवि :

भारतेंदु हरिश्चंद्र : मातृभाषा प्रेम पर दोहे, रोकहूँ जो तो अमंगल होय, ब्रज के लता पता मोहि कीजे

जयशंकर प्रसाद : कामायनी के श्रद्धा सर्ग के प्रथम दस पद, आंसू के प्रथम पांच पद

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ : वर दे वीणा वादिनि वर दे, तुलसीदास (प्रारंभ के दस पद), वह तोड़ती पत्थर

सुमित्रानंदन पन्त : मौन निमंत्रण, प्रथम रश्मि, यह धरती कितना देती है

महादेवी वर्मा : बीन हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ, फिर विकल हैं प्राण मेरे, यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो

छायावादोत्तर कवि और हिंदी साहित्य में शोध :

अज्ञेय : नदी के द्वीप, नया कवि : आत्म स्वीकार, नंदा देवी – 6 (नंदा बीस तीस- एक मरु दीप)

नागार्जुन : अकाल और उसके बाद, बादल को घिरते देखा है

धर्मवीर भारती : बोआई का गीत, कविता की मौत (दूसरा सप्तक, सम्पादक अज्ञेय)

शमशेर : 1 बात बोलेगी हम नहीं, भेद खोलेगी बात ही 2 काल तुझसे होड़ है मेरी (कविता)

दुष्यंत: 1 हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए,

2 तो तय था चिरागा हर एक घर के लिए।

सन्दर्भ ग्रन्थः

1. डॉ. नगेंद्र, (संपा.), हिंदी साहित्य का इतिहास, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, 1976

2. बच्चन सिंह, हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 1996 3. शुक्ल, रामचंद्र, हिंदी साहित्य का इतिहास, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2019

4. तिवारी, रामचंद्र, हिंदी गद्य का इतिहास, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 1992

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8. ओझा, डॉ. दुर्गाप्रसाद, आधुनिक हिंदी कविता, प्रकाशन केंद्र, लखनऊ, 2011

9. ओझा, डॉ. दुर्गाप्रसाद एवं कुमार, डॉ. राजेश, आधुनिक काव्य प्रतिनिधि रचनाएँ, प्रकाशन केंद्र, लखनऊ, 2014

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14.सिंह, डॉ. शिवप्रसाद, विद्यापति, हिंदी प्रचारक पुस्तकालय, वाराणसी, 1957

15.वर्मा, रामकुमार, संत कबीर, साहित्य भवन लिमिटेड, इलाहाबाद, 1943

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25.सिन्हा डॉ. अरविन्द नारायण, विद्यापति : युग और साहित्य, विनोद पुस्तक मन्दिर, आगरा

26. डॉ. नगेन्द्र, हिंदी साहित्य का इतिहास, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली

27.चतुर्वेदी रामस्वरूप, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली

28. त्रिगुणायत गोविन्द, कबीर की विचारधारा, साहित्य निकेतन, कानपुर

29.उपाध्याय विशम्भर नाथ,सूर का भ्रमरगीत : एक अन्वेषण, विनोद पुस्तक मन्दिर, आगरा

30. किशोरीलाल, घनानन्द : काव्य और आलोचना, साहित्य भवन, इलाहाबाद

31.भटनागर रामरतन, केशवदास : एक अध्ययन, किताब महल, इलाहाबाद, 1947

32.शर्मा किरणचन्द्र, केशवदास : जीवनी, कला और कृतित्व, भारती साहित्य मन्दिर, दिल्ली, 1961

33. डॉ. नगेन्द्र, कामायनी के अध्ययन की समस्याएँ, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नयी दिल्ली, 1962

34. शर्मा, रामविलास, निराला की साहित्य साधना, भाग-2, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 1981, द्वितीय

संस्करण

35.गौड़, राजेंद्र सिंह, आधुनिक कवियों की काव्य साधना, श्रीराम मेहता एंड संस, आगरा, 1953

36. सक्सेना, द्वारिका प्रसाद, हिंदी के आधुनिक प्रतिनिधि कवि, विनोद पुस्तक मन्दिर, आगरा

37. कुमार विमल, छायावाद का सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली,

38. तिवारी, भोलानाथ, प्रसाद की कविता, साहित्य भवन, प्रयागराज

39. डॉ. नगेन्द्र, सुमित्रानंदन पन्त, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नयी दिल्ली, 1962

40. शर्मा, रमेश, पन्त की काव्य साधना, साहित्य निकेतन, कानपुर

41. तिवारी, विश्वनाथ प्रसाद, समकालीन हिंदी कविता, राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली

42.चतुर्वेदी, रामस्वरूप, अज्ञेय का रचना संसार, राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली

43.सिंह, विजयबहादुर, नागार्जुन का रचना संसार, सम्भावना प्रकाशन, हापुड़, 1982

44. अष्टेकर, कटघरे का कवि धूमिल, पंचशील प्रकाशन, जयपुर

45. नवल, नंदकिशोर, मुक्तिबोध, साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली

46. त्रिपाठी, डॉ. हंसराज, आत्मसंघर्ष की कविता मुक्तिबोध, मानस प्रकाशन, प्रतापगढ़

47. सिंह, शम्भूनाथ, छायावाद युग, सरस्वती मन्दिर प्रकाशन, वाराणसी, 1962

48. अज्ञेय, दूसरा सप्तक, प्रगति प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रतीक प्रकाशन माला, 1951

49.सिंह, डॉ, उदयप्रताप, नाथ पंथ और गोरखबानी, आर्यावर्त्त संस्कृति संस्थान, दिल्ली, 2001

50. डॉ. प्रेमशंकर, प्रसाद का काव्य

51. डॉ. रामविलास शर्मा, निराला की साहित्य साधना, भाग 1, 2, 3, 4

राष्ट्रीय अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित डोगरी साहित्यकार यशपाल निर्मल से बंदना ठाकुर की बातचीत (साक्षात्कार)

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यशपाल
निर्मल
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डोगरी एवं हिंदी भाषा
के युवा लघुकथाकार
, कथाकार, कवि, आलोचक,लेखक, अनुवादक, भाषाविद् एवं सांस्कृतिककर्मी  यशपाल निर्मल का जन्म 15
अप्रैल
1977 को जम्मू कश्मीर के सीमावर्ती क्षेत्र छंब
ज्यौडियां के गांव गड़ी बिशना में श्रीमती कांता शर्मा एवं श्री चमन लाल शर्मा के
घर पर हुआ।
आपने जम्मू
विश्वविद्यालय से डोगरी भाषा में स्नातकोतर एवं एम.फिल. की उपाधियां प्राप्त की।
आपने वर्ष
2005 में जम्मू विश्वविद्यालय से डोगरी भाषा
में स्लेट एवं वर्ष
2006 में डोगरी भाषा में यू.जी.सी. की
नेट परीक्षा उतीर्ण की । आपको डोगरी
,हिन्दी,पंजाबी, उर्दू एवं अंग्रेज़ी भाषाओं का ज्ञान है। आप
कई भाषाओं में अनुवाद कार्य कर रहें है। आपने सन्
1996 में
एक प्राईवेट स्कूल टीचर के रूप में अपने व्यवसायिक जीवन की शुरुआत की। उसके उपरांत
“दैनिक जागरण”
, “अमर उजाला” एवं
“विदर्भ चंडिका” जैसे समाचार पत्रों के साथ बतौर संवाददाता कार्य किया।
वर्ष
2007 में आप नार्दन रीजनल लैंग्वेज सैंटर ,पंजाबी यूनिवर्सिटी कैंपस,पटियाला में डोगरी भाषा
एवं भाषा विज्ञान के शिक्षण हेतु अतिथि ब्याख्याता नियुक्त हुए और तीन वर्षों तक
अध्यापन के उपरांत दिसंबर
2009  से जम्मू कश्मीर कला,संस्कृति
एवं भाषा अकैडमी में शोध सहायक के पद पर कार्यरत हैं।
आपने लेखन की शुरुआत
वर्ष
1994 में की और सन 1995 में श्रीमद्भागवत पुराण को डोगरी
भाषा में अनूदित किया।
सन् 1996 में आपका पहला डोगरी कविता संग्रह ” अनमोल जिंदड़ी” प्रकाशित
हुआ।
अब तक हिन्दी , डोगरी एवं अंग्रेजी भाषा में विभिन्न विषयों पर 25
पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आपके अनुवाद कार्य
, साहित्य
सृजन
,समाज सेवा,पत्रकारिता और
सांस्कृतिक क्षेत्रों  में अतुल्निय योगदान
हेतु आपको कईं मान सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं जिनमें प्रमुख हैं:-
1. नाटक
“मियां डीडो” पर वर्ष
2014 का साहित्य अकादेमी,
नई दिल्ली का राष्ट्रीय अनुवाद पुरस्कार।
2. पत्रकारिता
भारती सम्मान(
2004)
3. जम्मू
कश्मीर रत्न सम्मान (
2010)
4. डुग्गर
प्रदेश युवा संगठन सम्मान (
2011)
5. लीला देवी
स्मृति सम्मान(
2012)
6. महाराजा
रणबीर सिंह सम्मान(
2013)
आपकी  चर्चित पुस्तकें हैं:-
1. अनमोल
जिंदड़ी (डोगरी कविता संग्रह
, 1996)
2. पैहली गैं
( कविता संकलन संपादन
,2002)
3. लोक धारा (
लोकवार्ता पर शोध कार्य
,2007)
4. आओ डोगरी
सिखचै(
Dogri Script, Phonetics and Vocabulary,2008)
5. बस तूं गै
तूं ऐं (डोगरी कविता संग्रह
,2008)
6. डोगरी
व्याकरण(
2009)
7. Dogri Phonetic
Reader(2010)
8. मियां डीडो
( अनुवाद
,नाटक,2011)
9. डोगरी भाषा
ते व्याकरण(
2011)
10. पिण्डी
दर्शन (हिन्दी
,2012)
11. देवी पूजा
विधि विधान: समाज सांस्कृतिक अध्ययन ( अनुवाद
, 2013)
12. बाहगे
आहली लकीर ( अनुवाद
, संस्मरण 2014)
13. सुधीश
पचौरी ने आक्खेआ हाँ ( अनुवाद
, कहानी संग्रह,2015)
14. दस लेख
(लेख संग्रह
,2015)
15. मनुखता दे
पैहरेदार लाला जगत नारायण ( अनुवाद
, जीवनी,2015)
16. घड़ी (
अनुवाद
, लम्बी कविता, 2015)
17. समाज-भाशाविग्यान
ते डोगरी (
2015)
18. साहित्य
मंथन ( हिन्दी आलोचना
, 2016)
19. डोगरी
व्याकरण ते संवाद कौशल (
2016)
20. गागर (
लघुकथा संग्रह
, प्रकाशनाधीन)
इसके इलावा सैंकड़ो
लेख
,
कहानियां लघु कथाएं एवं कविताएँ समय समय पर राज्य एवं राष्ट्र स्तर
की पत्रिकाओं में प्रकाशित।
कई राश्टरीय स्तर की
कार्यशालाओं
, संगोश्ठिओं, सम्मेलनों,
कवि गोश्ठिओं एवं साहित्यक कार्यक्रमों में भागीदारिता।
आप कई साहित्यक
पत्रिकाओं में बतौर सम्मानित संपादक कार्यरत हैं जिनमें से प्रमुख हैं:-
1. अमर सेतु
(हिन्दी)
2. डोगरी
अनुसंधान (डोगरी)
3. सोच
साधना(डोगरी)
4. परख
पड़ताल(डोगरी)
आपको कई साहित्यक एवं
सांस्कृतिक संस्थाओं ने सम्मानित किया हुआ है जिनमें प्रमुख हैं:-
1. राष्ट्रभाषा
प्रचार समिति
2. राष्ट्रीय
कवि संगम
3. डुग्गर मंच
4. डोगरी भाषा
अकैडमी
5.डोगरी कला
मंच
6. तपस्या कला
संगम
7. त्रिवेणी
कला कुंज
8. हिंद
समाचार पत्र समूह
9. जम्मू
कश्मीर अकैजमी आफ आर्ट
, कल्चर एंड लैंग्वेजिज।
पता:- 524,
माता रानी दरबार, नरवाल पाईं, सतवारी, एयरपोर्ट रोड, जम्मू-180003.
मोबाइल- 9086118736
Email- yash.dogri@gmail.com

राष्ट्रभाषा हिन्दी और जनपदीय बोलियाँ

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राष्ट्रभाषा हिन्दी और जनपदीय बोलियाँ

सुरेखा शर्मा

इस विषय पर अपनी बात मैं कवि ‘गोपाल सिंह नेपाली’ जी की पंक्तियों से शुरु करना चाहूंगी-‘ दो वर्तमान को सत्य सरल , सुंदर भविष्य के सपने दो,

हिन्दी है भारत की बोली,तो अपने आप पनपने दो।

बढ़ने दो इसे सदा आगे,हिन्दी जन -मन की गंगा है,

यह माध्यम उस स्वाधीन देश का,जिसकी ध्वजा गिरंगा है।

हिन्दी है भारत की बोली,इसे अपने आप पनपने दो।”

राष्ट्रभाषा हिन्दी व उनकी सभी बोलियों का मूल स्रोत संस्कृत भाषा है।वैदिक साहित्य की भाषा के विश्लेषण से ये संकेत तो स्पष्ट मिलते हैं कि उस काल में बोलचाल में तीन प्रकार की बोलियां थीं-पश्चिमोत्तरी, मध्यवर्ती तथा पूर्वी

बाद में बोलचाल की भाषा संस्कृत का विकास जब पाली भाषा के रूप में हुआ,जिसमें बौद्ध धर्म के बहुत से ग्रंथ लिखे गये। इसके बाद स्थानीय बोलियां बढ़ती गयी।पाली के बाद भाषा का जो जन प्रचलित रूप था उनके कुछ रूप इनमें अधिक विकसित हुए जैसे गुजरात,राजस्थान, हरियाणा,हिमाचल प्रदेश,दिल्ली,पश्चिमी तथा उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश।

हिन्दी क्षेत्र की भाषा हिन्दी है तथा उस क्षेत्र में पांच उपभाषाएं अर्थात् बोली वर्ग हैं,,जैसे- राजस्थानी,पश्चिमी हिन्दी, पूर्वी हिन्दी, पहाड़ी,बिहारी।

हिन्दी भाषा की बोलियां तीन रूपों में विभक्त हैं—

क.हिन्दी प्रदेश की-ब्रजभाषा,अवधी,भोजपुरी,

ख.हिन्दीत्तर प्रदेशों की-दक्खिनी हिन्दी,बम्बइया हिन्दी,कलकत्तिया हिन्दी।

ग.विदेशों में बोले जाने वाली बोलियां-सूरीनाम हिन्दी,फिज़ी हिन्दी,मारीशस हिन्दी।

भारत के बाहर की प्राय:सभी बोलियां मूलत: भोजपुरी पर आधारित हैं।जिन पर उन स्थानों की अपनी भाषाओं तथा यूरोपीय भाषाओं का प्रभाव पड़ा है।

भारतीय हिन्दीत्तर की बोलियों में तत्व तो खड़ी बोली,भोजपुरी, राजस्थानी आदि के हैं।संभवत: उनका आधार खड़ी बोली को ही मान सकते हैं।

ब्रजभाषा,कनौजी,बुंदेली,अवधी, बघेली,छत्तीसगढ़ी,हिमाचली,कुमायुंनी,गढवाली,भोजपुरी,मगही,मैथिली।

देश,विदेश में प्रचलित उपर्युक्त हिन्दी बोलियां भी अपने क्षेत्रों में खूब प्रचलित हैं ।देखा जाए तो दक्खिनी हिन्दी की ही लगभग बारह उपबोलियां हैं-जो गोलकुंडा, औरंगाबाद,अहमदाबाद,अरकाट, बीजापुर,अन्नामलाई कोचीन आदि जगह पर बोली जाती हैं।इसी प्रकार भोजपुरी के कुछ रूप विदेशों में भी हैं।

इस प्रकार राष्ट्रभाषा हिन्दी की जनपदीय बोलियों का विस्तार काफी दूर तक फैला हुआ है।

अब यहां प्रश्न यह है कि हिन्दी भाषा और जनपदीय बोलियों का आदान-प्रदान का।

हिन्दी भाषा का जन्म तो एक हजार ई.में हो गया था,किंतु साहित्य में प्रयोग बाद में हुआ।जिसे हम अदिकालीन हिन्दी भी कहते हैं।

भाषा की तुलना में बोलियों का ही मुहावरों व लोकोक्तियों में प्रयोग अधिक हुआ है।आधुनिक काल में आकर हिन्दी भाषा के स्थान पर खड़ीबोली कहा जाने वाला रूप ही आसीन हो गया,और यही रूप साहित्य की भाषा,शिक्षा की,राज काज की भी भाषा है।

जहां तक आधुनिक काल में हिन्दी भाषा एवं जनपदीय बोलियों से आदान- प्रदान का संबन्ध है तो विश्व की सभी भाषाओं और उनकी बोलियों में भी आदान- प्रदान चलता रहता है।

भाषा और बोलियों में मुख्यत: दो प्रकार के सम्बंध होते हैं।एक ऐतिहासिक व दूसरा सांस्कृतिक।ये बोलियां हिन्दी भाषा या मानक हिन्दी से विकसित नहीं हैं,बल्कि विभिन्न प्रकार की अपभ्रशों से इनका विकास हुआ है। इसलिए ‘हिन्दी की बोली ‘कहे जाने का आधार यह है कि पूरा हिन्दी प्रदेश एक सांस्कृतिक सूत्र में बंधा हुआ है।हिन्दी क्षेत्र के हिन्दी भाषा बोलने वालों ने इस क्षेत्र के ब्रज,अवधी,भोजपुरी आदि भाषा रूपों को हिन्दी की बोलियां स्वीकार किया है।

आधुनिक काल में हिन्दी का केन्द्र बनारस रहा है।इस दृष्टि से प्रसाद, भारतेन्दु, प्रेमचंद ,शुक्ल,राहुल सांकृत्यायन,विद्यानिवास मिश्र,नामवर सिंह,हजारी प्रसाद. द्विवेदी,कुबेरनाथ राय आदि के नाम लिए जा सकते हैं।सभी मूलत: भोजपुरी क्षेत्र से ही रहे हैं।अवधी में भी बहुत से साहित्यकारों का साहित्य मिलता है।ब्रज भाषा की गंध जिनमें आती है वे हैं- रांघेय राघव, कमलेश्वर आदि।

मैथिली-दिनकर,नागार्जुन की भाषा रही ,पहाड़ी शिवानी,शैलेश मटियानी और बुंदेली मैथिलीशरण गुप्ता और वृन्दावन लाल वर्मा का नाम लिया जाता है।

यह तो थी हिन्दी क्षेत्र और वहां की जनपदीय बोलियों के विषय में,लेकिन हिन्दी प्रदेश से बाहर की जनपदीय बोलियों ने भी हिन्दी भाषा को समृद्ध बनाया है।उदाहरण के लिए यदि जगदम्बा प्रसाद दीक्षित के ‘मुरदाघर’ की हिन्दी ‘बंबइया हिन्दी’ के प्रयोंगों से युक्त है। “और नदी बहती रही ” तथा “खामोशी के चीत्कार ” आदि पुस्तकों की हिन्दी मारिशस की भोजपुरी के प्रयोगों से युक्त है।

रांगेयराघव का प्रसिद्ध उपन्यास ”कब तक पुकारूं” में भरतपुरी ब्रज के शब्द और मुहावरों का अधिकतर प्रयोग हुआ है।जैसे–गबरू,दारी,झाई मारना,मंत्र डोलना आदि।इसी प्रकार अमृतलाल नागर के प्रसिद्ध उपन्यास “मानस का हंस” में अवधी का प्रयोग बखूबी किया गया है।जैसे -औचक,बप्पा,सुतवां,बड़कऊ,चक्करघिन्नी,धरतिन ,व्याहुली आदि।

यदि हम मुहावरों व लोकोक्तियों की बात करें तो हम पाएंगे कि मूलत:फारसी से आए हैं जो अधिकांश बोलियों की ही देन हैं।

इसी प्रकार मानक हिन्दी,बोलियों में प्रयुक्त बूझना, पैठना,बिसरना पोसना,लुकना आदि क्रियाओं का प्रयोग नहीं करती।इनके सगथान पर समझना,घुसना,भूलना,पालना,छिपना आदि क्रियाओं का प्रयोग करती है।

जहां तक हिन्दी की बोलियों के हिन्दी से लेने का प्रश्न है,यह धयान देने की बात है कि प्रत्येक बोली अपने भाषाभाषियों की सभी प्रकार की अभिव्यक्तियों की दृष्टि से सम्पन्न और समर्थ होती है।जहां तक शब्द लेने का प्रश्न है,प्राय:कोई भी बोली अपनी उस भाषा से ही शब्द लेती है,जिसकी वह बोली होती है।

यब अपवाद भी है यदि बोली किसी ऐसे क्षेत्र में बोली जाती हो,जहां किसी और भाषा की भी सीमा लगती हो ,तो उससे भी शब्द ले लेती है।हिन्दी की कई बोलियों ने इस दृष्टि से पंजाबी, गुजराती,मराठी,उड़िया,बंगला से शब्द लिए हैं।

यहां कुछ शब्द हैं जो कुछ बोलियों में आम तौर पर बोले जाते हैं- हरियाणवी में एक खाद्य पदार्थ को राबड़ी कहते हैं,जबकि यह दूध की बनी रबड़ी से अलग होती है।कहने का अभिप्राय यह है कि ये बोली के शब्द हैं।

जो डाल जल्दी टूट जाए उसे भोजपुरी में ‘अरर’ कहते हैं। इस प्रकार बहुत शब्द ऐसे हैं जो हिन्दी की बोलियों में हैं ।हिन्दी भाषा इनको लिए बिना पूरे हिन्दी प्रदेश की भाषिक अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती।यदि मानकता की बात करें तो प्रत्येक क्षेत्र के लोग अपने-अपने क्षेत्र के शब्दों का प्रयोग मानक हिन्दी बोलने में भी करते हैं।उदाहरण के लिए एक प्रकार की सब्जी को हिन्दी में “तौरी ” तो कहीं ‘तरोई’, कहीं “नेनुआ” तो कही “घेवड़ा ” कहते हैं,लेकिन कोई भी शब्द ऐसा नहीं जो हिन्दी प्रदेश में समझा जा सके।इसी प्रकार इसको कहीं पेठा,कहीं काशीफल,कद्दू, सीताफल कहा जाता है।

आशय यह है कि बोलियों से इस प्रकार सारे शब्दों को एकत्र कर अपेक्षाकृत बड़े क्षेत्र में प्रयुक्त शब्दों को मानक हिन्दी को अपना लेना चाहिए ।जिससे शक्ति तो बढ़ेगी ही मानकता को भी बल मिलेगा।

सुरेखा शर्मा

हिन्दी सलाहकार सदस्या नीति आयोग

६३९/१०-ए,सेक्टर गुरुग्राम-१२२००१

०९८१०७१५८७६.

राष्ट्र ,आख्यान एवं राष्ट्रवाद की परिधि में जेंडर के प्रश्न: सुप्रिया पाठक

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राष्ट्र ,आख्यान एवं राष्ट्रवाद की परिधि में जेंडर के प्रश्न
सुप्रिया पाठक 
साहयक प्रोफ़ेसर, स्त्री अध्ययन विभाग
म.गां.अं.हिं.वि.वर्धा, महाराष्ट्र  
पिछले दिनों एक अकादमिक कार्यक्रम में अपने विचार रखने का अवसर प्राप्त हुआ जिसका विषय था “ राष्ट्र बनाम आख्यान” यह विषय अत्यंत दिलचस्प था जिसके तीन अति महत्वपूर्ण पक्षों : राष्ट्र , उसका आख्यान और राष्ट्रवाद पर विमर्श की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद थीं। हालांकि यह शब्द बहुत हद तक समान होते हुए भी अपनी प्रवृति में भिन्न हैं । खासतौर पर जब बात स्त्रियों की हो , तब यह बहस कई नए आयामों से सोचने पर भी प्रेरित करती है कि हम राष्ट्र की परिकल्पना में स्त्रियों को कैसे देखते हैं ? राष्ट्र के आख्यान को रचने के क्रम में स्त्रियों की कोई भूमिका रही है ? राष्ट्रवाद की शक्ल में उभरी प्रवृति ने राष्ट्र को व्याख्यायित करते हुए स्त्रियों को किस रूप में ‘एजेण्डे’ में शामिल किया तथा 21 वीं सदी में राष्ट्रवादी विमर्शों के समक्ष जो चुनौतियां आई हैं उन्होनें स्त्रियों से जुडे प्रश्नों तथा उनकी अपेक्षित भूमिकाओं का कैसा खाका खींचा है ? ऐसे कई महत्वपूर्ण प्रश्न हैं जिसे राष्ट्र के आख्यान को समझने एवं उसपर कोई राय कायम करने के क्रम में प्रस्थान बिंदू के रूप में देखा जाना प्रासंगिक होगा । प्रस्तुत आलेख इन समस्त विमर्शजन्य प्रश्नों पर नारीवादी हस्तक्षेप का प्रयास मात्र है । 
राष्ट्र : एक संकल्पना के रूप में हाल के कुछ वर्षों में भारत राष्ट्र के विचार को लेकर कई महत्वपूर्ण आलोचनाएं सामने आई हैं जिसमें दो पुस्तकें ‘नेशनलिश्म विदाउट ए नेशन इन इंडिया’ (एलॉयसियस, 1999)[1] तथा ‘ डीब्राहमनाजिंग हिस्ट्री’ ((ब्रज रंजन मणि, 2006)[2] प्रासंगिक हैं क्योंकि ये दोनों ही उत्पीडितों की दृष्टी से राष्ट्र के विचार को नए सिरे से प्रस्तुत करते हैं । एलॉयसियस अन्य विद्वानों की अपेक्षा जो भारत राष्ट्र को एक बहुराष्ट्रीय राज्य के रूप में समझते हैं , के बरक्स इसकी संकल्पना को अधिक व्यापक बनाते हुए उन सभी समूहों को भी शामिल करते हैं जो किसी ना किसी रूप में अवधारणा के स्तर पर भारत राष्ट्र की कल्पना कर रहे थे । उनकी दृष्टी में राष्ट्र दरअसल उन चंद लोगों का समूह था जिसमें बुर्जुआ ,अंग्रेजींदा लोग , सरकारी अधिकारी एवं नये व्यापारी थे जिनका राष्ट्रवाद निहायत परंपरागत, सांप्रदायिक एवं उनके सीमित हितों की पूर्ति के साथ जुडा हुआ मसला था। जिसमें समाज की आम जनता (स्त्रियां,दलित समुदाय तथा अल्पसंख्यक समूह) की भागीदारी लगभग अदृश्य थी। हालांकि एलॉयसियस उस संकीर्ण सबल्टर्न समझ की भी आलोचना करते हैं जो राष्ट्र और राष्ट्रवाद को सत्ता एवं संस्कृति सापेक्ष समझने की बजाए सिर्फ ब्राहम्णवादी रूप में देख रहा था । बावजूद इसके उनकी आलोचना नए विमर्शों के लिए एक पुख्ता जमीन उपलब्ध कराती है । अब यदि हम पुनः राष्ट्र की अवधारणा पर विचार करें कि राष्ट्र क्या है? यह राष्ट्र – राज्य की संकल्पना के साथ कैसे जुडता है तो हम पाते हैं कि वस्तुतः प्रारंभिक दौर से ही राष्ट्र – राज्य की बहस में राष्ट्र की अवधारणा हमेशा बदलती रही है । साहित्य तथा समाज शास्त्र की अन्य विधाओं ने राष्ट्र को एक अनिवार्य हिंसक ईकाइ के रूप में परिभाषित किया है । यूरोपीयन तथा अफ्रीकन समाजों में हुए अध्ययन यह बताते है कि राष्ट्र की निर्मिति दरअसल समाज के कई समूहों के हाशियाकरण,उनकी आवाजों,उनकी तकलीफों और उनके संघर्षों को दरकिनार करते हुए होती है जो हिंसक ,असमानतामूलक है ।[3]
राष्ट्रवाद एवं राष्ट्र राज्य की अवधारणाओं पर बहस का इतिहास हमें गेल्नर तथा हॉब्सबॉम के लेखन में भी देखने को मिलता है जिसमें वे बताते हैं हि आरंभिक दौर में राष्ट्रवाद अपने मूल से जुडे रहने की कवायद था जो उस समूह विशेष के इतिहास ,संस्कृति तथा उसके भौगौलिक अस्तित्व से गहरे रूप में गुंथा हुआ था । यह भावनात्मक स्तर पर तो स्वीकार्य था परंतु राष्ट्र की यथार्थपरक निर्मिति में असफल था। इस शब्द की उत्त्पति लैटिन शब्द ‘Natio’ से हुई थी जिसका अर्थ था “जो पैदा हुआ हो” । खासतौर पर यह शब्द अपने प्रारंभिक दौर में उन विदेशियों के लिए प्रयुक्त किया जा रहा था जो रोमन लोगों से निम्न श्रेणी के माने जा रहे थे।[4] ग्रीनफिल्ड ने इस राष्ट्र की अवधारणा को उन विद्यार्थियों के समूह के साथ भी जोड कर देखा है जो सुदूर देशों से उच्च शिक्षा के लिए पाश्चात्य देशों के महान विश्वविद्यालयों में जा रहे थे । ये विश्वविद्यालय ही विद्यार्थियों के लिए राष्ट्र का पर्याय थे जिसके कारण राष्ट्र की संकल्पना में और इजाफा हुआ और अब राष्ट्र किसी समूह विशेष में जन्म के अस्तित्व से जुडा ना होकर वैचारिक एवं उद्देश्यगत रूप से समान समुदाय का द्योतक था जो सीमित दायरे में था । जिस राष्ट्र के हम नागरिक हैं, वह ‘भारत’ अपने भौगौलिक , राज्नीतिक , सामाजिक तथा अवधारणात्मक रूप में हमेशा से एक ही रूप में मौजूद नहीं था । अन्य देशों की तरह भारत के राष्ट्रनिर्माण कार्य में भी विभिन्न प्रवृतियां , कामनाएं और प्रयास आपस में टकराए कुछ विजयी हुए तो कुछ पराजित लेकिन हमारे राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया पर इस द्वदं की छप हमेशा बनी रही । 
भारत में आधुनिक अर्थों में राष्ट्र की अवधारणा का विकास 19वीं सदी के आरंभ में होना आरंभ हुआ । अंग्रेजों के अधीन जब राष्ट्र निर्माण की कोशिशें शुरु हुई तब जिस चीज की सर्वाधिक आवश्यकता थी वह थी राष्ट्र निर्माण के प्रतीक तथा उसके इतिहास की । इस काल में धर्मनिरपेक्ष या वर्गीय दायरे में सीमित ना रह कर एक विशुद्ध हिंदूवादी तथा मुस्लिम विरोधी छवि की आवश्यकता थी इसलिए प्रतीकों का चुनाव भी अत्यंत सावधानीपूर्वक किया गया । इस समय पृथ्वीराज ,महाराणा प्रताप ,शिवाजी , रत्नसेन ,पद्मावती,हम्मीर समेत कई ऐतिहासिक एवं कल्पित हिंदू राजाओं को हिंदू राष्ट्र के निर्माण के लिए आदर्श प्रतीकों के रूप में खडा किया गया । इन हिंदू राजाओं को ब्राह्मण्वादी विश्वासों का संरक्षक दिखाकर जिस प्रकार उनका महिमामंडन किया गया उससे यह जाहिर होता है कि इस अपार विविधता से भरे भारतीय राष्ट्र का प्रतीक बनाने के प्रयास कितने स्वार्थ केंद्रित थे जिसमें समाज के एक छोटे हिस्से को ही संतुष्ट किया जा सकता था । [5]
किसी भी समुदाय या समाज के गठन में जिसमें राष्ट्र भी शामिल है ,केवल अभिजात्य या कोई सांप्रदायिक वर्ग ही शामिल नहीं होता और ना ही किसी राष्ट्र का इतिहास सिर्फ उसके अभिजात्य वर्ग का इतिहास होता है । परंतु दुर्भाग्यवश, इतिहास लेखन की अपनी परंपरा भी निहायत सत्ता केन्द्रित ,ब्राहमणवादी और पौरुषपूर्ण रही जिसने समाज के अन्य तबके (गरीब किसान , मजदूर, दलित जातियां एवं विशेषतौर पर स्त्रियां ) कभी उस बनते हुए राष्ट्र की परिकल्पना का भी हिस्सा नहीं बनने दिया । हाँ, यह जरूर हुआ कि इस राष्ट्र के प्रति वफादार बने रहने और आनेवाली पीढियों को सामाजिक- सांस्कृतिक तौर पर राष्ट्र एवं उसके गौरवगान से लागातार परिचित कराते रहने की अनिवार्य जिम्मेवारी इस तबके के लोगों खासतौर पर माताओं को दी गई । जो बेशक राष्ट्र की निर्माता नहीं थी और ना ही उसके लिए पैदा किए जा रहे उन्माद का नेतृत्व कर रही थी परंतु संस्कृति की रक्षक एवं सामाजिक मूल्यों के पुनरुत्पादक के रूप में अपनी प्रदत्त भूमिकाओं में वे में बच्चों में रीति रिवाजों तथा मिथकीय कथाओं के माध्यम से राष्ट्रीय अस्मिता बोध पैदा कर रही थीं ।[6] दूसरे शब्दों में कहें तो गीतों, कहानियों,चित्रों और किंवदंतियों के माध्यम से बच्चे अपने नायकों के शौर्य और पराक्रम की गाथाएं सीख रहे थे और उनमें अपने राष्ट्र के प्रति हमेशा वफादार बने रहने का विचार भी विकसित हो रहा था । जो आगे चल कर मातृभूमि या देश जो स्त्री का ही पर्याय था, के रक्षा निर्भीक योद्धाओं और नागरिकों के रूप में करने वाले थे। 
उदाहरण के लिए ,कई राष्ट्रवादियों ने ‘मातृभूमि ‘अथवा ‘भारतमाता’ की रक्षा के विचार को ही आम लोगों के बीच सर्वाधिक जोर शोर से उठाया । जिसके फलस्वरूप राष्ट्र के सम्मान की रक्षा का प्रश्न माता के सम्मान की रक्षा के साथ इस कदर जुड गया कि जाने अनजाने स्त्रियां राष्ट्रवादी विमर्श के केंद्र में आ गईं । जहां वे स्वयं महत्वपूर्ण नहीं थी जितना जेंडरगत अवधारणा में लिपटा हुआ उनका ‘सम्मान’ महत्वपूर्ण हो गया । इसलिए स्त्री शरीर के प्रति हिंसा को एक राजनीतिक हथियार के रूप में देखा गया जो शत्रु राष्ट्र को पराजित करने का अचूक हथियार था। इस प्रकार यह एक दिलचस्प प्रस्थान बिंदू है जिसके जरीए जेंडर को एक सामाजिक सांस्कृतिक निर्मिति समझते हुए यह देखा जा सकता है कि स्त्रियां किस प्रकार माँ, पत्नी, सेविका तथा प्रेमिका के रूप में पौरुषपूर्ण राष्ट्र के विचार की वाहक बनीं।[7] तनिका सरकार ने अपनी पुस्तक ‘ हिन्दू वाइफ हिंदू नेशन’[8] तथा उर्वशी बुटलिया ने ‘वुमेन एंड हिंदू राइटस’ में इस प्रक्रिया तथा इसमें अंतर्निहित प्रवृति पर विशद चर्चा की है। एंडरसन ने (1983) हालांकि राष्ट्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता को बहुत हद तक आधुनिक समय में सामाजिक सांस्कृतिक संदर्भों में देखने की कोशिश की परंतु उनकी इस संकल्पना में लैंगिक पूर्वाग्रह निहित हैं । वे जिस ‘कल्पित समुदाय’ को व्याख्यायित कर रहे थे उनमें महिलाओं को कभी भी इस एक रेखीय भाईचारे में शामिल ही नहीं किया गया(राय,1994)। हालांकि तब भी वे महिलाओं के सांकेतिक प्रतिनिधित्व(चित्रण)[9] के रूप में ही राष्ट्र की कल्पना कर रहे थे । उदाहरण के लिए नेहरु ने भी अपने कई वक्तव्यों में भारत को ‘भारतमाता’ के रूप में देखा बावजूद इसके कि राष्ट्र के अंदर स्त्रियों की अपनी कोई स्वायतत्ता नहीं थी। कुमकुम संगारी और सुदेश वैद्य ने अपनी पुस्तक ‘रिकास्टींग वुमेन’ में स्त्रीत्व के इन्हीं पक्षों की चर्चा करते हुए लिखा है:“Womanhood is often part of an asserted or desired, not an actual cultural continuity”[10]
आख्यानों की दुनिया : आखिर किसका राष्ट्र ?
“It is imagined because the members of even the smallest nation will never know most of their fellow members, meet them, or even hear of them, yet in the minds of each lives the image of their communion” (Anderson, 1983, p. 63)
उपरोक्त पंक्तियां किसी भी राष्ट्र के निवासियों के संदर्भ में बिल्कुल सटीक प्रतीत होती हैं कि आखिरकार राष्ट्र की अनुभूति को महसूस करते हुए समाज का हर वर्ग स्वयं को उसके साथ कैसे जोडता है ? मुझे बचपन की एक घटना याद आती है जब मैं अपनी दादी से देश की आजादी के बारे में कोई सवाल कर रही थी और उन्होंने जो जबाब दिया वो अब तक मेरे जेहन में बना रहा। उन्होंने अपनी बोली में मुझे समझाते हुए कहा: ज्यादा कुछ तो याद नहीं बचिया बाकि ई याद बा कि सब लोगे ‘बामदेब बातरम(वंदे मातरम ) बोलत रहत रहे आउर परभात फेरी निकलत रहे , देखे में बडा नीक लगत रहे आ एगो बाबा रहले गान्ही उनका कहला में सबे लोग रहे मरद,मेहरानू, लइका ,बच्चा रहे । आ उनके लइअकिया(इंदिरा गांधी ) बाद में परधान मन्तरी बनल”। 
मैं आज भी सोचती हूँ कि आखिर क्यों उनकी बातें मेरे दिमाग में बसी रह गई ? ऐसा क्या खास था उनकी कहानी में ? तो पाती हूँ कि शायद मेरा खुद का भी स्त्री मन इस बात से आश्चर्यचकित था कि कैसे एक अति साधारण ,घूंघट डाले हुई ,अनपढ एवं गांव की स्त्री इतनी सहजता से देश की आजादी के बारे में इतनी बातें कैसे कर रही थी ? जिसके जीवन का दायरा सिर्फ घर के आंगन तक सिमटा हुआ था उसके अनुभव का वितान इतना वृहद कैसे था ? कहने का तात्पर्य यह कि राष्ट्र ,उसका आख्यान तथा उसके प्रति लगाव (भक्ति?) की अभिव्यक्ति समाज के हर तबके के पास होती है जो उसके सामाजिक सांस्कृतिक पदानुक्रमों (जाति, वर्गीय स्थिति, लैंगिक पहचान ,धर्म इत्यादि ) की स्थिति के अनुरूप अभिव्यक्त होती है । 
राष्ट्रवादी विमर्श एवं जेंडर के प्रश्न : 
राष्ट्रवादी विमर्श एवं जेन्डर के अंतर्संबधों पर चिंतन कर रहे लगभग सभी विद्वानों पार्थ चटर्जी, तनिका सरकार, कुमकुम संगारी, एवं सुदेश वैद्य इत्यादि ने यह स्थापित किया है कि महिला प्रश्नों का उदय राष्ट्रवाद की अपनी परिकल्पना के साथ ही हुआ। 19वीं सदी में भारत में उभरे राष्ट्रवाद के केंद्र में ‘स्त्री प्रश्न’ थे । हालांकि ऐसा नहीं था कि उसके पूर्व भारत में महिला प्रश्नों पर चर्चा नहीं हो रही थी ।भारत में स्त्री विमर्श का इतिहास बहुत पुराना है । इसकी झलक हमें बुद्ध और उनके शिष्य आनंद के उस वैचारिक बहस में देखने को मिलती है जिसमें वो गौतम बुद्द से संघ में स्त्रियों को प्रवेश देने की अनुमति मांगते हैं और बुद्ध उन्हें इसके लिए चेतावनी देते हुए कह्ते हैं कि जो संघ 5000 साल चल सकता था वो इस निर्णय से 500 साल तक सीमित हो सकता है । इसके बाद संघ में महिलाओं का प्रवेश गौतमी के रूप में होता है। इस लिहाज से आनंद को भारत का पहला स्त्रीवादी कहा जा सकता है। अर्थात स्त्री विमर्श कोई नई अवधारणा नहीं है बल्कि इसकी जडें हमारे सामाजिक सांस्कृतिक इतिहास में छुपी हुई हैं ,लेकिन एक निर्धारित ‘ एजेण्डे’ के रूप में स्त्री प्रश्न पहली बार राष्ट्र्वादी विमर्श में आकार ग्रहण करता है। 
पार्थ चटर्जी ने भी अपने कई आलेखों में इसका उल्लेख किया है कि 19वीं सदी के प्रारंभ से ही स्त्रियों की सामाजिक एवं राजनीतिक स्थिति बहस के केंद्र में थी। राष्ट्रवादी विमर्श के प्रथम चरण में, महिला प्रश्नों का उद्भव नए शिक्षित मध्यम वर्ग के बीच एक प्रकार के पहचान की संकट के तौर पर हुआ। यह वो मध्यम वर्ग था जो औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था का प्रथम उत्पाद था । भारत की पराधीन एवं पीडित महिला छवि के प्रति सहानुभूति का छद्म रचकर औपनिवेशिक सत्ता भारत की सांस्कृतिक परंपरा को दमनकारी एवं बर्बर रूप में प्रस्तुत करने के लिए लगातार नये तर्कों का सहारा ले रही थी । इसी सदी में जेम्स मिल की हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया (1817) प्रकाशित हुई जिसमें मिल ने समूचे भारतीय इतिहास का हिंदू काल, मुस्लिम काल और अंग्रेजी काल में विभाजन कर भारत की एक संप्रदायिक छवि भी निर्मित की ।[11] मिल ने भारतीय अतीत की कटु आलोचना के आधार पर भारत के अंग्रेजों के हाथों पराधीन होने के तर्कसंगत बताने के प्रयास किया। साथ ही, उसने हिंदुओं को उनके अतीत या वर्तमान में सभ्य मानने से इंकार कर दिया। यह एक औपनिवेशिक दृष्टी थी जो अपनी सत्ता को जायज ठहराने के लिए उन समस्त पहलूओं पर प्रहार कर रही थी जो भारतीय समाज की विकृत छवि बना रही थी। आलोचना के बिंदू का सबसे बडा आधार सती प्रथा के रूप में मिला जो 1829 में इस प्रथा के उन्मूलन के लिए कानून बनाने वाले गवर्नर जेनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक के शब्दों में ‘ उनकी प्रथाओं में सर्वाधिक अपराधपूर्ण प्रथा ‘ थी। [12] 19 वीं सदी में भारत और इंग्लैंड के बीच सांस्कृतिक टकराव के केंद्र में भारतीय एवं पाश्चात्य स्त्रियां थीं जिनकी तुलना के माध्यम से भारत को निकृष्टतम बताया जा रहा था । यह औपनिवेशवादी दृष्टीकोण पूरे भारत के पौरुषवादी राष्ट्रवादी मानसिकता को बेहद आहत करने वाला था । यह स्थिति किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं थी कि कोई बाहरी व्यक्ति या सत्ता भारतीयों के आंतरिक मसलों में हस्तक्षेप करे यहीं से शुरुआत होती है स्त्री प्रश्नों पर अपनी अलग अलग प्रतिक्रिया देने की। 
राष्ट्रवाद के बैनर तले विभिन्न राष्ट्रवादी प्रवृतियां जिस प्रकार स्त्री प्रश्नों को व्याख्यायित कर रही थीं उन सभी प्रवृतियों में स्त्रियों के प्रश्न तो थे पर स्वंय महिलाएं नहीं थीं,उन प्रश्नों को उठाने वाले भी पुरुष थे और समाधान प्रस्तुतकरने वाले भी पुरुष थे । ऐसे कई समाज सुधारक थे जैसे राजा राममोहनराय, ईश्वरचंद विद्यासागर, माइकल मधुसूदन दत्त ने जिन्होंने सती प्रथा, विधवा पुनर्विवाह ,बेमेल विवाह इत्यादि स्त्री विषयक मुद्दों को उठायाऔर इसे स्त्रियों की स्थिति में सुधार के दृष्टी से देखा गया। परंतु इसका प्रतिनिधित्व महिलाएं नहीं कर रहीं थीं । एक और तबका भी था स्त्री प्रश्नों के साथ ताल से ताल मिला रहा था जिसे आमतौर पर बंगाली बुर्जुआ भद्रलोक के नाम से जाना जाता था ये वो तबका था जिसे स्त्री प्रश्नों को हल करने में इसलिए रुचि नहीं थी क्योकिं इस समाज स्त्रियां वास्तव में अत्यंत कठिन दौर से गुजर रहींथीं,बल्कि इसलिए था क्योंकि विक्टोरियन सभ्यता जहाँ पति पत्नी पार्टनर के रूप में रहते थे उसके बरक्स भारतीय समाज बहुत हद तक पिछडा हुआ था क्योकि यहाँ पत्नियां पार्टनर नहीं बल्कि धर्मपत्नी के रूप में थीं । ऐसी स्त्रियों को क्लब या सोसाइटी में साथ ले जाना संभव नहींथा । अतः उनका ‘आधुनिक’होना आवश्यक था । इसलिए शासक वर्ग की जीवन शैली, पहनावा, भाषा इन्यादि का अनुकरण कर एक ऐसी भारतीय स्त्री गढने की कोशिश की गई जो मूलतः भारतीय नहीं थी बल्कि पाश्चात्य स्त्री का मुखौटा थी। यह दोनों ही प्रवृतिया स्त्रियों की इच्छा या दृष्टी से तय की जा रही यात्रएं नहीं थीं बल्कि यह राष्ट्रवाद की अपनी जरुरत थी और उन जरुरतों के परिपेक्ष्य में स्त्री प्रश्नों को देखा जा रहा था । शिक्षित मध्यम वर्ग विभिन्न कुरीतियों को जैसे विधवाओं के साथ किया जाने वाला व्यवहार, बाल-विवाह, महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखना, सती-प्रथा, आदि को समाज में एक धब्बे के रूप में देख रहा था । इन आलोचनाओं की वजह से इन मुद्दों को काफी गंभीरता से लिया गया समाज सुधारकों की प्रथम पीढ़ी ने इन कुप्रथाओं को मिटाने के आम जन के बीच लगातार प्रयत्न जारी रखा | हालाँकि इनमे से कुछ सुधारक ही ऐसे थे जो पाश्चात्य संस्कृति की नक़ल से परे जाकर महिलाओं की अधीनता, गुलामी को अलग नजरिए से व्याख्यायित कर रहे थे। 19व़ी शताब्दी की अंतिम दशकों में महिलाओ से जुडे प्रश्न सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और पुनरुत्थानवादी रंग में भी रंगे नज़र आये, जो पश्चिम के प्रभाव और उनके मूल्यों का जवाब देने के लिए तैयार किये गये थे ।[13]
राष्ट्रवादी सोच में भौतिक / आध्यात्मिक ; बाहरी/ भीतरी दुनिया के भेद ने एक विशेष स्थान ग्रहण किया । [14] राष्ट्रीय संस्कृति के आध्यात्मिक गुणों का स्थान घर था अतः उसकी रक्षा और पोषण का दायित्व महिलाओं को वहन करना था । बाहरी परिस्थिति में पुरुषों को दुनिया के दबाव का सामना करना था इसलिए महिलाओं की चारित्रिक आध्यात्मिकता पर खास जोर दिया गया। इस प्रकार बाहरी दुनिया भले ही औपनिवेशिक राज्य के सुपूर्द हो पर ‘भीतरी क्षेत्र’ राष्ट्रवादियों की जीत का प्रतीक बना । पुरुष राष्ट्रवादियों ने घर तथा स्त्री की घरेलू भूमिकाओं का महिमामंडन किया । इसने यह स्पष्ट किया कि राष्ट्रवादी प्रवृति ने औपनिवेशिक सत्ता से वैचारिक लडाई के दरम्यान महिलाओं की भूमिका को रणनीति के तौर पर तो इस्तेमाल किया लेकिन उसने अपनी स्त्रियों को घरों के अंदर रहने का संदेश भी दिया। उसे महिलाओं की अधीनस्थ भूमिका ही स्वीकार्य थी । इसी दृष्टीकोण ने स्त्रियों को पुरुषों के साथ ही समाहित माना जिसके कारण उनका कोई स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व नहीं बन पाया। इस परिभाषा में नई स्त्री को एक नए किस्म की पितृसत्तात्मक प्रवृति का सामना करना था जिसकी मुक्ति इस बात में निहित थी कि वे अपनी कोशिशों से राष्ट्र की संस्कृति और आध्यात्मिक अक्षुण्ता को बरकरार रखें। वस्तुतः समाज में स्त्रियों की स्थिति को सुधारने की आवश्यकता इसलिए नहीं हुई कि वे बहुत कठिन दौर से गुजर रही थी बल्कि उनकी स्थिति में सुधार उनके पति एवं बच्चों के लिए आवश्यक था । स्त्रियों की माँ की भूमिका को ही सर्वाधिक स्वीकार्य थी । इसके महत्व को रेखांकित करते हुए कहा गया कि: 
“जिन स्थितियों में स्त्रियां शिशुओं को जन्म देती हैं और जिन परिस्थिति में बच्चे पलते हैं ,वे इतने दयनीय हैं कि ‘भारतीय मूल’ पूरी तरह विकृत हो जाता है। माताओं द्वारा बच्चों की उपेक्षा तथा कंजूसी से भारतीयों की एक पूरी पीढी अपनी ‘उद्यमशीलता ’खो चुकी है अतः भारतीय राष्ट्र के लिए यह आवश्यक है कि उसके बच्चे उत्तम परिस्थितियों में पलें बढें।“ [15]
इस प्रकार सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों द्वारा एक नये प्रकार की अवधारणा की शुरुआत की गयी और महिलाओं के प्रश्नों को सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षक की अवधारणा से जोड़ दिया गया। 
सुधारवादी स्वदेशी परम्पराओं को बचाने के लिए महिला शिक्षा को भी समर्थन दे रहे थे | वे रुढ़िवादियो की खिलाफत कर रहे थे उनका मानना था की महिला शिक्षा के माध्यम से हम हम स्वदेशी संस्कृति को बढ़ावा दे सकते हैं जिसमें परिवार जैसी संस्थाएं उपयोगी साबित होगी और महिलाओं की भूमिका बेहद महत्तवपूर्ण होगी । उनका मानना था कि महिलाओं की शिक्षा परिवार में संवादहीनता को समाप्त करने का काम करेगी ।शिक्षा के माध्यम से परिवार में महिलाओं की स्थिति में सुधार होगा और वे युवाओं के मन से पाश्चत्य प्रभाव को हटाने का काम करेगी | दूसरे चरण में ही, 1890 के दौरान जयोतिबा फुले ने अपने लेखन के माध्यम से ये बताया कैसे उच्च वर्ग के वर्चस्व और भारतीय समाज में ब्राह्मण प्रभुत्व को स्थापित रखने में महिला की अधीनता को साधन के रूप में प्रयोग किया जाता है | इसी समय बी.एम.मालाबारी ने सामाजिक अभियान में प्रेस की वृहद् भूमिका को रेखांकित करने का काम किया। सर्वप्रथम टाइम्स ऑफ़ इंडिया के पाठकों ने उन महिलाओं की सच्ची घटनाओं और उनकी आपबीती को पढ़ा जो अपने पतियों के हाथों यातना का शिकार हुई |
भारतीय साहित्यकारों और पश्चिमी साहित्यकारों द्वारा भारतीय महिलाएं चाहे वह हिन्दू हो या मुस्लिम, की दबी-कुचली छवि को प्रस्तुत किया गया, लेकिन उन लाखों महिलाओं के बारे कोई चिंता नही व्यक्त की गयी जो भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी की तरह थी और उन पर औपनिवेशिक व्यवस्था का अत्यंत बुरा प्रभाव पड़ा और यह प्रभाव पुरषों की तुलना में महलों पर ज्यादा पड़ा । सिर्फ बंगाल में ही सूत कातने के व्यवसाय में लगी 30 लाख महिलाएं बुरी तरीके से प्रभावित हुईं। ये पूरी जनसंख्या की 1/5 भाग थीं । 19व़ी शताब्दी तक इनकी संख्या में और बढोतरी हुई |[16] यही स्थिति भारत में विभिन क्षेत्रों में कार्यरत उन महिलाओं की भी थी जो सिल्क व्यवसाय एवं कुटीर उद्योगों में कार्यरत थीं । 1920 के आरम्भ में सूरत में एक स्थानीय संगठन ने ग्रामद्योगों महिलाओं की गिरती आर्थिक और सामान्य स्थिति का पता लगाने का प्रयास किया | जूट उद्योग में कार्यरत 50% महिलाएं अपने उद्योगों को छोड़कर गांवों से आजीविका की तलाश में शहर की तरफ पलायन कर गयीं । यही स्थिति उन आदिवासी महिलाओं की भी देखी गयी जो चाय बागानों एवं कोयला खाद्यानों में श्रमिक के रूप में काम कर रही थीं , उनको भी पलायन का शिकार होना पड़ा । 
वस्तुतः स्त्रियां पहली बार सार्वजनिक जीवन में राजनीतिक रूप से गांधी जी के प्रयासों के कारण सक्रिय हुईं ।यह स्त्री आंदोलन एवं स्वंय स्त्री की चेतना के विकास के लिए भी प्रस्थान बिंदू की तरह था । नारीवादी विमर्श भी गांधी जी को महिलाओं को राजनीतिक रूप से इतना सक्रिय करने का श्रेय देता है। गांधी जी के बनते हुए राष्ट्र की परिकल्पना जो संकीर्ण ना होकर विश्वव्यापी था जिसमें सैद्धांतिक स्तर पर वे सबको शामिल करने के हिमायती थे । उस राष्ट्रवाद की परिकल्पना में देश को स्वाधीनता दिलाने के आंदोलन का नेतृत्व किसके हाथ में हो ,इसे लेकर उनकी राय बिल्कुल स्पष्ट थी । उन्होंने इस आंदोलन के लिए जिन दो मूल्यों को अपनाया वे थे ‘सत्य’एवं ‘अहिंसा’ । बकौल गांधी जी ये दोनोंही मूल्य पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं ज्यादा बेहतर ढंग आगे बढा सकती थीं । उन्होंने भारतीय स्त्रियों को संबोधित करते हुए कहा था कि उन्हें विक्टोरियन स्त्री की तरह बनने की आवश्यकता नहीं थी बल्कि पूरे विश्व की स्त्रियों को भारतीय स्त्रियां बहुत कुछ सीखा सकती थीं । लता सिंह ने अपने आलेख ‘राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाएं’ में राष्ट्रीय आंदोलन के विभिन्न चरणों में महिलाओं की भागीदारी का वर्णन करते हुए लिखा है कि : 
“ गांधी जी की व्यक्तिगत छवि संत महात्मा की होने के कारण उनके नेतृत्व में शुरु हुए देशभक्ति आंदोलन की राजनीतिक और धार्मिक ,मिली जुली छवि बनी। उसका क्षेत्र राजनीति से ऊपर उठकर धार्मिक हो गया। देशभक्ति को धर्म माना गया और देश को देवी मां की उपाधि दी गई। इन सबका असर यह हुआ कि महिलाओं को शक्ति मांकर उनका एक नए ढंग से शोषण शुरु हुआ। राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं को बार बार यह कहके जोडा गया कि जबतक भीतरी शक्ति बाहर नहीं आयेगी ,बलिदान अधूरा रहेगा।“ [17]
यह तथ्य गांधी जी के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है कि उन्होंने रणनीतिक रूप से भी “ राष्ट्रीय आंदोलन का स्त्रीकरण(Feminization of National movement) कर दिया । उन्होंने आंदोलन का धार्मिक रूप कायम रखते हुए उसे अहिंसात्मक आंदोलन बनाया जिसमें धैर्य ,त्याग, पीडा, सत्य और अहिंसा इत्यादि सर्वोपरि थे ,जो महिलाओं के गुण माने जाते हैं । उन्होंने महिलाओं को यह विश्वास दिलाया कि देश को उनके नेतृत्व की आवश्यकता है एवं उनकी भागीदारी के बिना देश की आज़ादी संभव नहीं। गांधी जी ने समाज सुधारकों एवं पुनरुथांवादियों की स्त्री विषयक चिंता की दिशा बदलते हुए भारतीय स्त्री की एक नई परिभाषा दी जो अबला, शोषित,सुधार किए जाने योग्य की समझ से विपरीत एक आत्म्बल से भरपूर नैतिक व्यक्तित्व थी । मधु किश्वर ने गांधी जी के विचारों की सराहना करते हुए लिखा है कि उन्होंने सार्वजनिक जीवन में स्त्रियों के अंदर एक नया आत्मसम्मान ,एक नया विश्वास और एक नई आत्मछवि दिलाई । वे निष्क्रीय से सक्रिय नागरिक बनीं ।[18] उन्होंने स्त्री मुद्दों को समर्थन दिलाया । राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं को बडी संख्या में शामिल करने के गांधीजी के ऐतिहासिक कृत्य से इंकार नहीं किया जा सकता बावजूद इसके, महिलाओं के जिन गुणों की सराहना करते हुए उन्होंने सार्वजनिक जीवन में प्रवेश कराया उससे महिला आंदोलनों का अपना दायरा सीमित हुआ । यह भी विडंबनापूर्ण बात है कि इतिहासकारों ने राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान महिलाओं की भागीदारी की प्रंशसा तो की लेकिन इसको महात्मा गाँधी के चमत्कारिक व्यक्तित्व के साथ जोड़ कर ही देखा । उनसे परे जाकर महिलाओं की भागीदारी को रेखांकित नही किया गया । 
एक बनते हुए राष्ट्र में स्त्रियों की भूमिका क्या थी इसकी पडताल यदि हम शुरुआती दौर से करें तो पाते हैं कि एक बहुत अलग अलग तस्वीर सामने आती है। जहाँ राष्ट्रवाद के प्रारंभिक दौर में स्त्रीप्रश्न केंद्र में होते हुए भी महिलाओं कीअपनी भूमिका सिर्फ संस्कृति की वाहक,एक आदर्श माता के रूप में ,एक आदर्श पत्नी के रूप में और राष्ट्र की बेटी के रूप में और राष्ट्रमाता की संकल्पना को आगे ले जाने वाली संस्कृति की एक वाहक के रूप में देखा गया जिसकी चर्चा उस दौर के कई महत्व्पूर्ण लेखकों ने अपनी रचनाओं में की । रवींद्रनाथ टैगोर के बंगला उपन्यास ‘घरे बायरे ‘ की बिमला हो या बंकिंमचंद्र चटर्जी की आनंदमठ या दुर्गेशनंदिनी सभी उपन्यासों की स्त्री पात्र अपनी प्रदत्त भूमिकाओं का निर्वाह कर रही थीं। उसके समक्ष दूसरी प्रवृति जो गांधी दृष्टी थी उसमें महिलाएं आंदोलन का नेतृत्व कर रहीं थीं । इस दूसरी प्रवृति ने स्त्रियों में राजनीतिक रूप से जबर्दस्त चेतना पैदा की । ये वह दौर नहीं था जब स्त्री प्रश्नों को पुरुष उठा रहे थे बल्कि यह वो दौर था जब महिलाएं धीरे धीरे ही सही पर अपने मुद्दों को स्वयं उठा रही थीं । जैसे रक्माबाई का केस। रक्माबाई एक ऐसी महिला थीं जो ‘सहमति की आयु’ की बहस को सार्वजनिक बहस के केद्र में लाईं । उन्होंने एक बेमेल विवाह को अस्वीकार करते हुए अपने पति भीकाजी दादाजी के साथ जाने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि बौद्धिक तौर पर वे उनसे मेल नहीं खाते । चूकिं यह विवाह मेरी मर्जी से नहीं हुआ इसलिएमैं इस विवाह को अस्वीकार करती हूँ[19]। 
रक्माबाई की असहमति ने सिर्फ एक आम धारणा को चुनौती ही नहीं दी थी बल्कि हिंदू स्त्री धर्म और हिंदू विवाह के मान्यआधार पर ही सवाल उठा दिए । इसकेसाथही’स्त्री शिक्षा कैसी हो ‘ औरत क्यों पढें ‘ उनके दिए जा रहे शिक्षा का नतीजा क्या होगा’ इस तरह के प्रश्नों पर भी सुधारवादी पुरुषों एवं राष्ट्रवादी गुटों के बीच बहस छिड गई। उस दौर की कट्टर राष्ट्रवादी प्रवृतियों ने इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए बहुत आक्रमक रुख अपनाया। बाल गंगाधर तिलक ने इसे स्त्री शिक्षा के दुष्परिणाम के रूप में देखा । उनकी दृष्टी में ये सारे स्त्री विषयक मुद्दे उस समय बहस के केंद्र में थे जब सारे राष्ट्र के लोगों को एकजुट होकर देश को आजाद कराना था। ऐसे में निहायत व्यक्तिगत और घरेलू समझे जाने वाले मुद्दों को भारतीय स्त्रियां उठा रही थीं । यह राष्ट्रहित में नहीं था । उन्होंने लिखा: 
‘स्त्री शिक्षा के बहाने हमारे प्राचीन धर्म पर हमला बोला जा रहा है और रक्माबाई के नेतृत्व में चलने वाला शिक्षा अभियान दरअसल हमारे शाश्वत धर्म को जड से मिटाने का षडयंत्र है।[20]
‘ यही वह दौर था जब न्यूयार्क में विवेकानंद से यह सवाल किया गया कि जिस भारत देश की सर्वश्रेठ संस्कृति और सभ्यता का आप महिमामंडन कर रहे हैं उसी देश से आई एक महिला पंडिता रमाबाई अपनी पुस्तक ‘हाई कास्ट हिंदू वुमेन’ के जरीए अपने देश की बेसहारा विधवा महिलाओं के लिए चंदा एकत्र कर रही हैं । विवेकानंद के लिए रमाबाई का यह कृत्य अत्यंत निंदनीय था । उनकी दृष्टी में रमाबाई ‘हिंदूधर्म’ के प्रचारक के रूप में ज्यादा बेहतर कार्य कर सकती थीं।[21] यह हस्तक्षेप राष्ट्रवादियों को कतई स्वीकार्य नहीं था कि एक पराधीन राष्ट्र में अंग्रेजों के हस्तक्षेप को घर के अंदरुनी मामलों में प्रवेश करने दिया जाए ।
इस प्रकार स्त्री प्रश्न हर बार राष्ट्रीय आन्दोलन से गुंथे हुए स्वरूप में हमारे सामने प्रस्तुत हुए । स्वंत्रता आन्दोलन में शामिल महिलाओं ने धीरे धीरे ही सही पर अपनी उपस्थित का आभास करा दिया था । अब सभी किस्म के आंदोलनों में बड़े पैमाने पर महिलाओं की लामबंदी और भागीदारी देखी गयी एवं महिलाओं से जुड़े बुनियादी प्रश्नों को भी को उठाया जाने लगा ।इस अवधि में कई महिला संगठन एवं उनके नेटवर्क भी बने ताकि आंदोलन में महिलाओं की भूमिका सुनिश्चित की जा सके । 1927 में आयोजित हुए ऑल इंडिया वुमेन कॉफ्रेंस में भी महिलाओं की भरपूर उपस्थिति देखने को मिली जिसमें महिलाओं के जीवन स्तर एवं घरेलू जीवन में उनकी जिम्मेवारियों पर व्यापक चर्चा हुई। यह भी गौरतलब है कि जहां एक तरह महिलाएं सविनय अवग्या और असहयोग आंदोलनों में सक्रिय हो रहीं थीं वहीं दूसरी तरफ काफी संख्या में क्रांतिकारी आंदोलनों से भी जुड रही थीं । 1930 के अंतिम वर्षों में कई कम्युनिस्ट महिलाएं नारीवादी विमर्श का भी हिस्सा बनने लगी थीं । 
1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी, भारत के सामाजिक सांस्कृतिक ,आर्थिक एवं राजनीतिक ढांचे पर पितृसत्तात्मक प्रवृति का ही प्रभुत्व था। हालांकि संविधान निर्माण के बाद काफी सारी समस्याओं का समाधान हो गया जैसे महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिला जिससे उन्हें राजनीतिक समानता की प्राप्ति हुई ,सार्वजनिक सेवाओं में प्रवेश मिला, व्यवसायों आदि में भी महिलाओं को अधिकार मिला | इस दृष्टीकोण से यह समय मध्यम वर्ग की महिलाओं के लिए अत्यंत सफल समय रहा जिसमें महिलाएं बड़ी संख्या में लाभान्वित हुई | इस दौरान महिला संगठनों ने भी महिलाओं की समनाता और अधिकार के लिए युद्ध स्तर पर जुझारू तरीके से कार्य किया और सरकार ने भी सामाजिक कल्याण के लिए अनुदान आदि दिए । 
1971-74 में गठित ‘भारत में महिलाओं की स्थिति’ का पता लगाने वाली समिति ने अपने रिपोर्ट (Towards equality) में यह निष्कर्ष दिया कि अर्थव्यवस्था में महिलाओं की स्थिति हाशिये पर हैं । आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं की यह स्थिति आज़ादी से पहले भी थी, इन परेशान करने वाला तथ्यों को कुछ अधिकारी एवं समाज वैज्ञानिकों के द्वारा भी पहचाना गया लेकिन वे इस मुद्दे की तरफ सबका ध्यान आकर्षित करने में असफल रहे। 70 के दशक में ,भारत में नियोजित विकास कार्यक्रम की वजह से भारत परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था । तमाम समाज वैज्ञानिक विभिन्न आयामों से और इन जटिल प्रक्रियाओं विशलेषण करने की कोशिश कर रहे थे | समिति ने अपने जनसांख्यिकीय रुझानों में पाया कि पुरुषों और महिलाओं के जीवन प्रत्याशा और मृत्यु दर में असमानता की खाई बहुत ज्यादा हो गयी । ये सारी स्थितियां उन मूल्यों के विपरीत थीं जिन मूल्यों और आदर्शों के साथ हमारे सविंधान निर्माताओं ने संविधान का निर्माण किया था जिस राजनीतिक अधिकार, , क़ानूनी समानता और शिक्षा को विश्वसनीय साधन माना गया वे सिर्फ कुछ महिलाओं तक ही सिमट कर रह गए और हाशिये पर मौजूद महिलाओं की पहुँच से बाहर ही रहे | साथ ही पितृसत्ता ने भी पहले की अपेक्षा ज्यादा मजबूती से अपनी पकड़ बनाई । इसी दौरान समिति ने अपनी रिपोर्ट में कुछ सवाल भी पेश किये इसी दौरान महिला आन्दोलन की नयी लहर ने भी समाज को प्रभावित किया । यह एक प्रकार से स्त्री प्रश्नों का विकास था जो महिला आंदोलन का रुप धारण करते हुए स्त्री अध्ययन जैसी गंभीर अकादमिक विधा तक का सफर तय कर चुका है । 
लेकिन अगर हम आज के दौर की बात करें जिस दौर में हम इक्कीसवीं सदी के राष्ट्रवाद की चुनौतियों पर चर्चा कर रहे हैं तो पाते हैं कि विगत कुछ वर्षों में फिर नये किस्म की कुछ राष्ट्रवादी प्रवृतियां पैदा हुईं जिन्होंने एक बार फिर से हमें यह सोचने पर मजबूर किया है कि आज से 250 साल पहले का समय जिस समय में स्त्रियां स्वयं को अभिव्यक्त कर पाने की स्थिति में नहीं थीं,जस समय में महिलाएं घरों के अंदर कैद थीं ,जिस समय में स्त्री प्रश्नों को पुरुष वर्ग उठा रहा था उस समय और वर्तमान समय जिसमें साध्वी प्राची जैसी राष्ट्रवादियों का यह बयान देना कि देश को कितने बच्चों की आवश्यकता है और इस नए पुनर्व्याख्यायित नये राष्ट्र में महिलाओं कीअब नई भूमिका क्या होगी । एक वह दौर जिसमें हमरे जेंडर प्रश्नों पर बाहर के हस्तक्षेप हो रहे थे अंग्रेजी सत्ता के माध्यम से और दूसरा यह दौर जिसमें आंतरिक तत्वों द्वारा हस्तक्षेप किया जा रहा है। जिसके जरीए महिलाओं की यौनिकता,यौनिक शुचिता , उनकी प्रजनन क्षमता, राष्ट्र में उनकी भूमिका, उनको क्याअधिकार दिए जाएंगे इन सारे मुद्दों पर नये सिरे से चर्चा शुरु हुई ।इस बार भी सिर्फ एक ही प्रवृति नहीं है जिसे हम हिंदुत्व कह दें बल्कि बहुत सारी अलग अलग प्रवृतियां उभार ले रहीं हैं जो महिलाओं को एक बार फिर उसी जकडबंदी में कसने की कोशिश कर रही हैं जिससे निकलने में उन्हें 200 साल लगे । यह प्रवृतियां कभी हमें साध्वी प्राची के उस बयान में दिखती हैं जिसमें वे राष्ट्र की महिलाओं को संबोधित करते हुए कहती हैं: 
“If there is one child, where all will you send him? To protect the border… or make him a scientist or he will take care of business…. So, we need four children. One can go to protect the borders, one can serve the society, give one to the saints and one to VHP to serve the nation and protect the culture. This is very important”[22]
अब इस तरह की विचारधाराओं और 19वीं सदी में उभरे कट्टर हिंदू राष्ट्रवाद के मध्य एक समानता दिखती है । विचारधाराओं की यात्रा लगभग एक जैसी ही दिखती है जब लव ज़िहाद जैसी परिकल्पना हमारे सामने आती है । जिसके बारे में कहा जा रहा है कि : 
“ लव जिहाद या रोमियो जिहाद एक अभिकथित षड्यंत्र है जिसके तहत युवा मुस्लिम लड़के और पुरुष गैर-मुस्लिम लड़कियोंके साथ प्यार का ढोंग करके उनका धर्म-परिवर्तन करते हैं” । यहां बड़ा सवाल यह भी उठता है कि आखिर मुस्लिम लड़कों में ऐसा क्या होता है जो हिन्दू लड़कियां उसके मोहपाश में फंस जाती हैं और शादी करने व धर्म परिवर्तन तक का फैसला कर लेती हैं। कुछ समाज विज्ञानियों का मानना है कि हिन्दू लड़कियां जानती हैं कि दुनिया में सिर्फ मुस्लिम कौम ही ऐसी है जो सबसे कम शराब पीती हैं क्योंकि धार्मिक रूप से उनपर सख्त पाबन्दी है, वे जानती हैं कि मुस्लिम कौम ही ऐसी कौम है जो सबसे कम मक्कारी करती है क्योंकि धार्मिक रूप से उन पर सख्त पाबन्दी है, वे यह भी जानती हैं कि मुस्लिम कौम ही ऐसी कौम है जो सच्चाई की खातिर अपनी जान भी कुर्बान कर सकती है। कहने का मतलब यह कि मुस्लिमों में धार्मिक कट्टरता ज्यादा होती है और धर्म के प्रति निष्ठा भी। हिन्दू धर्म उसके मुकाबले उदार है और हिन्दुओं में धर्म के प्रति निष्ठा भी उतनी नहीं होती जितना मुस्लिमों में। इसलिए मेरी दृष्टि में दुनियाभर में फैले हिन्दू संगठनों को हिन्दुओं में धर्म के प्रति कट्टरता का भाव जगाना होगा। यह कहने से काम नहीं चलेगा कि हिन्दुत्व जीवन जीने का एक तरीका है।[23]
केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ओमान चांडी ने बकायदा इस पर सदन में एक रिपोर्ट रखी। उन्होंने लव जिहाद को लेकर चिंता भीजताई । 25 जून 2014 को मुख्यमंत्री चांडी ने विधानसभा में जानकारी दी थी कि 2667 युवतियां 2006 से लेकर अब तक प्रेम विवाह के बाद इस्लाम कबूल कर चुकी हैं। वहीं केरला कैथोलिक बिशप काउंसिल ने इससे पहले 2009 में ये आंकड़ा 4500 बताया था। इसके अलावा एक अन्य संस्था ने कर्नाटक में 30 हजार लड़कियों के लव जिहाद की शिकार होने की बात कही थी। श्री नारायण धर्म परिपालन समिति के महासचिव वेलापल्ली नतेसन ने कहा था कि उनकी संस्था को पाकिस्तान और यूके में भी इसी तरह की कोशिशों की कई शिकायतें परिवारों की तरफ से आई । चारु गुप्ता ने अपनी पुस्तक ‘ स्त्रीत्व से हिंदुत्व तक’ में औपनिवेशिक काल से ही मुसलमानों के प्रति भडकाई जा रही धार्मिक भावना का उल्लेख करते हुए बताया है कि : 
“ इस दौर में हिंदू प्रचारक हिंदू पुरुषार्थ साबित करने की कोशिशें तो कर ही रहे थे ,पर वो इसके साथ एक ‘कमुक’मुस्लिम की तस्वीर भी मजबूत कर रहे थे । हिंदू पुरुषत्व का निर्माण ‘दूसरे’ के बरक्स करना था। इसलिए वासना से भरपूर ,कामुक मुसलमान पुरुष का हौवा आक्रमक रूप से खडा किया गया। इस प्रक्रिया में मुस्लिम पुरुष को विशेष रूप से एक अपहरणकर्ता के रूप में पेश किया गया । साथ ही, हिंदू प्रचारकों ने एक सामूहिक ‘शत्रु’ के भय को पहचानने और बढावा देने के लिए पीडित और अपहृत हिंदू महिला की छवि का इस्तेमाल किया” ।[24]
विभिन्न लेखों, कहानियों एवं पत्रिकाओं के जरीए एक आम धारणा सामने आई कि पर्दा प्रथा, सत्ती प्रथा, बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं के लिए मुस्लिमों का व्याभिचारी चरित्र जिम्मेवार है। यह कहा जाने लगा कि लडकी को किसी हिंदू को सौंप देना बेहतर है ,न कि उसके उसके युवती बनने का इंतजार किया जाए जब उनके रूप की झलक देखकर बुरे और क्रूर यवन उसे अपना शिकार बना सकें।हिंदू युवकों से बार बार यह अपील की गई कि वे हिंदू स्त्रियों की रक्षा के लिए आगे आयें। उनके पुरुषत्व को ललकारते हुए यह अह्वान किया गया कि : 
“ हम देखते हैं कि सैकडों हिंदू स्त्रियां गुंडो द्वारा बहकाई और भगाई जाती हैं परंतु हिंदू चीखने और चिल्लाने के सिवाय कुछ भी नहीं करते! क्या यह सब देखते रहना मर्दानगी है? क्या पुरुष का पौरुष इसी में है कि उसकी स्त्रियां बलात छीनी जाएं और जाकर दूसरे के शरीरों का आलिंगन करें……” ।[25]
आज का यह दौर जिसमें ‘बहू लाओ बेटी बचाओ’ का नारा दिया जा रहा है जिसका का मुख्य मकसद लव जिहाद के खिलाफ मुहिम शुरु करना है। इस तरह के प्रयासों के जरीए लगातार इस मिथक को स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है कि आज भी भारत को सर्वाधिक खतरा उन मुसलमानों पुरुषों से है जो हमारी लडकियों से प्रेम कर रहे हैं, उनके साथ विवाह कर रहे हैं ,अपहरण कर रहे हैं । अतः फिर से देश को मुसलमानों से बचाने की आवश्यकता है। यह अत्यंत चिंताजनक स्थिति है जो अंततः इस देश के मुसलमानों को ‘अन्य’और ‘ शत्रु’ के रूप में ही प्रचारित करती है और स्त्रियों को सदैव ‘ रक्षण’ किए जाने योग्य । विगत 200 सालों में स्त्रियों की स्थिति में कोई परिवर्तन हुआ हो ,ऐसा कत्तई प्रतीत नहीं होता । तब इस नई सदी में राष्ट्र की परिकल्पना क्या है? उसके वैध नागरिक कौन हैं ? समाज का शत्रु माना जाने वाला मुस्लिम समुदाय तथा रक्षण योग्य स्त्रियां राष्ट्र के आख्यान में स्वयं को कैसे परिभाषित करते हैं तथा राष्ट्र्वाद पुनः स्त्री प्रश्नों को कैसे गढ रहा है ? यह समस्त प्रश्न ज्यों के त्यों बने हुए हैं । 
[1] G Aloysius , Nationalism without a Nation in India Dehli: Oxford University Press, 1998) 265pp. Index. Bibl. ISBN 019564104 3 
[2] Braj Ranjan Mani , Debrahmanising History: Dominance and Resistance in Indian Society, Manohar Publishers & Distributors, 2005 
[3] Shiv Visvanathan Interrogating the Nation Author(s): Economic and Political Weekly, Vol. 38, No. 23 (Jun. 7-13, 2003) 
[4] E Hobsbawm ‘The Nations and Nationalism since 1870 
[5] वैभव सिंह , इतिहास और राष्ट्रवाद , आधार प्रकाशन , 2007, पृ. 248 
[6] Sikata Banerjee, GENDER AND NATIONALISM: THE MASCULINIZATION OF HINDUISM AND FEMALE POLITICAL PARTICIPATION IN INDIA Women’s Studies International Forum, Vol. 26, No. 2, pp. 167 – 179, 2003 
[7] Tanika Sarkar, & Urvashi Butalia (Eds.), Women and the Hindu Right (pp. 58– 81). New Delhi: Kali for Women. 
[8] Sarkar Tanika, Hindu wife Hindu Nation ,Parmanent black , 2001 
[9] यहां प्रतिनिधित्व का अर्थ राजनीतिक हैं जिसकी चर्चा गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक अपने लेख ‘ कैन सबल्टर्न स्पीक?’में करती हैं । 
[10] Kumkum sangari ,Sudesh Vaidya, Recasting Women: Essays in colonial History , kali for women , 1989 
[11] वैभव सिंह , इतिहास और राष्ट्रवाद , आधार प्रकाशन , 2007, पृ. 226 
[12] शाहिद अमीन एवं ग्यानेंद्र पाण्देय,निम्नवर्गीय प्रसंग भाग 2, राजकमल प्रकाशन , 2002 
[14] शाहिद अमीन एवं ग्यानेंद्र पाण्देय,पार्थ चटर्जी, राष्ट्र एवं उसकी महिलाएं निम्नवर्गीय प्रसंग भाग 2, राजकमल प्रकाशन , 2002 
[15] दयाराम गिडुमल, ‘द स्टेट्स ऑफ वुमेन इन इंडिका, बंबई ,1889
[16] Mazumdaar Veena , Emergence of the Women’s Question in India and the Role of Women’s Studies, RePEc:ess:wpaper:id:2861, Institutional Papers, Sep 2010
[17] नारीवादी राजनीति: संघर्ष एवं मुद्दे , संपा. जिनी लोकनीता, निवेदिता मेनन, साधना आर्या , हिंदी माध्यम कार्यांवयन निदेशालय, नई दिल्ली, 2001,पृष्ठ संख्या, 156 
[18] नारीवादी राजनीति: संघर्ष एवं मुद्दे , संपा. जिनी लोकनीता, निवेदिता मेनन, साधना आर्या , हिंदी माध्यम कार्यांवयन निदेशालय, नई दिल्ली, 2001,पृष्ठ संख्या, 156 
[19] Janaki nair, Women and law in colonial India, 
[20] बाल गंगाधर तिलक ,कर्नाटक प्रकाशन, 4 अप्रैल ,1887 
[21] पूर्वा भारद्वाज, भय नाही खेद नाही, निरंतर , 2014 
[22] Saumya Dadoo ,Sour Milk: Women and the Hindu Nationalist Movement in India Annandale-on-Hudson, New ork May 2015 
[23] प्रवीण कुमार लव-जिहाद : समझो तो अमृत वरना जहर , जी न्यूज ,,24 अगस्त ,2014 
[24] चारु गुप्ता, स्त्रीत्व से हिंदुत्व तक , राजकमल प्रकाशन, 2012 
[25] चारु गुप्ता, स्त्रीत्व से हिंदुत्व तक , राजकमल प्रकाशन, 2012 कृष्णानंद, हिंदुओं की उन्नति का उपाय अर्थात शुद्धि एवं संगठन संबंधी उपदेश , शाहजहांपुर 1927 ,पृष्ठ 198 ,42
[साभार: युवा संवाद पत्रिका में प्रकाशित लेख]
[चित्र: गूगल साभार]

रामायण पर आधारित पुस्तकें

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रामायण पर आधारित पुस्तकें

आत्मरामायण
आदित्य हृदय स्तोत्र
आर्यसमाज और श्री राम Prem Bhikshu Ji
उत्तरकाण्ड प्रसङ्ग एवं संन्यासाधिकार विमर्श : Uttara Kanda Prasanga Evam Samnyasadhikar Vimarsha
उभय प्रबोधक रामायण
कृत्तिवासी बंगला रामायण और रामचरितमानस का तुलनात्मक अध्ययन
जैन रामायण
तुलसीकृत रामायण
तुलसीदासकृत रामायण की मानसदीपिका
बालमीकि रामायण अयोध्याकांड
मद्वाल्मिकी रामायण
मानस-हंस अथवा तुलसीरामायणरहस्य
राम गीता – Shri Ram Gita By Maharshi Vashishth
रामचरितमानस
रामचरितमानस का संक्षिप्त संस्करण
रामायण जगदीश्वरानन्द सरस्वती
रामायण दर्पण
रामायण महाभारत काल मीमांसा श्री करपात्रिजी
रामायण: अयोध्याकाण्ड
रामायणमहाभारते
वाल्मीकि रामायण – गीता प्रेस
वाल्मीकि रामायण – द्वारका प्रसाद शर्मा
वाल्मीकि रामायण – हिंदी
वाल्मीकि रामायण तथा आयुर्वेद
श्री जैन पद्य-रामायण
श्रीमद् वाल्मिकीयरामायण
श्रीमद्वाल्मीकि रामायण तात्पर्य निर्णय
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण अरण्यकाण्ड
संक्षिप्त जैन रामायण
संक्षिप्त रामायण
सप्तकाण्ड रामायण

रानी केतकी की कहानी

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रानी केतकी की कहानी: इंशा अल्ला खाँ ‘इंशा’

अनुक्रम

यह वह कहानी है कि जिसमें हिंदी छुट।
और न किसी बोली का मेल है न पुट॥

सिर झुकाकर नाक रगडता हूं उस अपने बनानेवाले के सामने जिसने हम सब को बनाया और बात में वह कर दिखाया कि जिसका भेद किसी ने न पाया। आतियां जातियां जो साँ सें हैं, उसके बिन ध्यान यह सब फाँ से हैं। यह कल का पुतला जो अपने उस खिलाडी की सुध रक्खे तो खटाई में क्यों पडे और कडवा कसैला क्यों हो। उस फल की मिठाई चक्खे जो बडे से बडे अगलों ने चक्खी है।

देखने को दो आँखें दीं ओर सुनने को दो कान।
नाक भी सब में ऊँची कर दी मरतों को जी दान।।

मिट्टी के बसान को इतनी सकत कहाँ जो अपने कुम्हार के करतब कुछ ताड सके। सच हे, जो बनाया हुआ हो, सो अपने बनाने वाले को क्या सराहे और क्या कहें। यों जिसका जी चाहे, पडा बके। सिर से लगा पांव तक जितने रोंगटे हैं, जो सबके सब बोल उठें और सराहा करें और उतने बरसों उसी ध्यान में रहें जितनी सारी नदियों में रेत और फूल फलियां खेत में हैं, तो भी कुछ न हो सके, कराहा करें। इस सिर झुकाने के साथ ही दिन रात जपता हूं उस अपने दाता के भेजे हुए प्यारे को जिसके लिए यों कहा है- ब्याह उसके घर हुआ, उसकी सुरत मुझे लगी रहती है। मैं फूला अपने आप में नहीं समाता, और जितने उनके लड़के वाले हैं, उन्हीं को मेरे जी में चाह है। और कोई कुछ हो, मुझे नहीं भाता। मुझको उम्र घराने छूट किसी चोर ठग से क्या पड़ी! जीते और मरते आसरा उन्हीं सभों का और उनके घराने का रखता हूँ तीसों घड़ी।

डौल डाल एक अनोखी बात का

एक दिन बैठे-बैठे यह बात अपने ध्यान में चढ़ी कि कोई कहानी ऐसी कहिए कि जिसमें हिंदवी छुट और किसी बोली का पुट न मिले, तब जाके मेरा जी फूल की कली के रूप में खिले। बाहर की बोली और गँवारी कुछ उसके बीच में न हो। अपने मिलने वालों में से एक कोई पढ़े-लिखे, पुराने-धुराने, डाँग, बूढ़े धाग यह खटराग लाए। सिर हिलाकर, मुँह थुथाकर, नाक भी चढ़ाकर, आँखें फिराकर लगे कहने – यह बात होते दिखाई नहीं देती। हिंदवीपन भी न निकले और भाखापन भी न हो। बस जैसे भले लोग अच्छे आपस में बोलते चालते हैं, ज्यों का त्यों वही सब डौल रहे और छाँह किसी की न हो, यह नही होने का। मैंने उनकी ठंडी साँस का टहोका खाकर झुँझलाकर कहा – मैं कुछ ऐसा बड़बोला नहीं जो राई को परबत कर दिखाऊँ और झूठ सच बोलकर उँगलियाँ नचाऊँ, और बे-सिर बे-ठिकाने की उलझी-सुलझी बातें सुनाऊँ, जो मुझ से न हो सकता तो यह बात मुँह से क्यों निकालता? जिस ढब से होता, इस बखेड़े को टालता।

इस कहानी का कहनेवाला यहाँ आपको जताता है और जैसा कुछ उसे लोग पुकारते हैं, कह सुनाता है। दहना हाथ मुँह पर फेरकर आपको जताता हूँ, जो मेरे दाता ने चाहा तो यह ताव-भाव, राव-चाव और कूद-फाँद, लपट झपट दिखाऊँ जो देखते ही आप के ध्यान का घोड़ा, जो बिजली से भी बहुत चंचल अल्हड़पन में है, हिरन के रूप में अपनी चौकड़ी भूल जाय।

टुक घोड़े पर चढ़ के अपने आता हूँ मैं।
करतब जो कुछ है, कर दिखता हूँ मैं।।
उस चाहनेवाले ने जो चाहा तो अभी।
कहता जो कुछ हूँ, कर दिखाता हूँ मैं।।

अब आप कान रख के, आँखें मिला के, सन्मुख होके टुक इधर देखिए, किस ढंग से बढ़ चलता हूँ और अपने फूल के पंखड़ी जैसे होठों से किस किस रूप के फूल उगलता हूँ।

कहानी के जीवन का उभार और बोलचाल की दुलहिन का सिंगार

किसी देश में किसी राजा के घर एक बेटा था। उसे उसके माँ-बाप और सब घर के लोग कुँवर उदैभान करके पुकारते थे। सचमुच उसके जीवन की जोत में सूरज की एक स्रोत आ मिली थी। उसका अच्छापन और भला लगना कुछ ऐसा न था जो किसी के लिखने और कहने में आ सके। पंद्रह बरस भरके उसने सोलहवें में पाँव रक्खा था। कुछ यों ही सी मसें भीनती चली थीं। पर किसी बात के सोच का घर-घाट न पाया था और चाह की नदी का पाट उसने देखा न था। एक दिन हरियाली देखने को अपने घोड़े पर चढ़के अठखेल और अल्हड़पन के साथ देखता भालता चला जाता था। इतने में जो एक हिरनी उसके सामने आई, तो उसका जी लोट पोट हुआ। उस हिरनी के पीछे सब छोड़ छाड़कर घोड़ा फेंका। कोई घोड़ा उसको पा सकता था? जब सूरज छिप गया और हिरनी आँखों से ओझल हुई, तब तो कुँवर उदैभान भूखा, प्यासा, उनींदा, जँभाइयाँ, अँगड़ाइयाँ लेता, हक्का बक्का होके लगा आसरा ढूँढने। इतने में कुछ एक अमराइयाँ देख पड़ी, तो उधर चल निकला; तो देखता है वो चालीस-पचास रंडियाँ एक से एक जोबन में अगली झूला डाले पड़ी झूल रही है और सावन गातियाँ हैं।

ज्यों ही उन्होंने उसको देखा – तू कौन? तू कौन? की चिंघाड़ सी पड़ गई। उन सभों में एक के साथ उसकी आँख लग गई।

कोई कहती थी यह उचक्का है।
कोई कहती थी एक पक्का है।

वही झूलेवाली लाल जोड़ा पहने हुए, जिसको सब रानी केतकी कहते थीं, उसके भी जी में उसकी चाह ने घर किया। पर कहने-सुनने को बहुत सी नाँह-नूह की और कहा –

इस लग चलने को भला क्या कहते हैं! हक न धक, जो तुम झट से टहक पड़े। यह न जाना, यह रंडियाँ अपने झूल रही हैं। अजी तुम तो इस रूप के साथ इस रव बेधड़क चले आए हो, ठंडे ठंडे चले जाओ।”

तब कुँवर ने मसोस के मलीला खाके कहा – “इतनी रूखाइयाँ न कीजिए। मैं सारे दिन का थका हुआ एक पेड़ की छाँह में ओस का बचाव करके पड़ा रहूँगा। बड़े तड़के धुँधलके में उठकर जिधर को मुँह पड़ेगा चला जाऊँगा। कुछ किसी का लेता देता नहीं। एक हिरनी के पीछे सब लोगों को छोड़ छाड़कर घोड़ा फेंका था। कोई घोड़ा उसको पा सकता था? जब तलक उजाला रहा उसके ध्यान में था। जब अँधेरा छा गया और जी बहुत घबरा गया, इन अमराइयों का आसरा ढूँढकर यहाँ चला आयाहूँ। कुछ रोक टोक तो इतनी न थी जो माथा ठनक जाता और रूका रहता। सिर उठाए हाँपता चला आया। क्या जानता था – वहाँ पदि्मिनियाँ पड़ी झूलती पेगै चढ़ा रही हैं। पर यों बदी थी, बरसों मैं भी झूल करूँगा।”

यह बात सुनकर वह जो लाल जोड़ेवाली सब की सिरधरी थी, उसने कहा –  “हाँ जी, बोलियाँ ठोलियाँ न मारो और इनको कह दो जहाँ जी चाहे, अपने पड़ रहें, और जो कुछ खाने को माँगे, इन्हें पहुँचा दो। घर आए को आज तक किसी ने मार नहीं डाला। इनके मुँह का डौल, गाल तमतमाए, और होंठ पपड़ाए, और घोड़े का हाँपना, और जी का काँपना, और ठंडी साँसें भरना, और निढाल हो गिरे पड़ना इनको सच्चा करता है। बात बनाई हुई और सचौटी की कोई छिपती नहीं। पर हमारे इनके बीच कुछ ओट कपड़े लत्ते की कर दो।”

इतना आसरा पाके सबसे परे जो कोने में पाँच सात पौदे थे, उनकी छाँव में कुँवर उदैभान ने अपना बिछौना किया और कुछ सिरहाने धरकर चाहता था कि सो रहें, पर नींद कोई चाहत की लगावट में आती थी? पड़ा पड़ा अपने जी से बातें कर रहा था। जब रात साँय-साँय बोलने लगी और साथवालियाँ सब सो रहीं, रानी केतकी ने अपनी सहेली मदनबान को जगाकर यों कहा
– “अरी ओ, तूने कुछ सुना है? मेरा जी उसपर आ गया है; और किसी डौल से थम नहीं सकता। तू सब मेरे भेदों को जानती है। अब होनी जो हो सो हो; सिर रहता रहे, जाता जाय। मैं उसके पास जाती हूँ। तू मेरे साथ चल। पर तेरे पाँवों पड़ती हूँ, कोई सुनने न पाए। अरी यह मेरा जोड़ा मेरे और उसके बनानेवाले ने मिला दिया। मैं इसी जी में इस अमराइयों में आई थी।”

रानी केतकी मदनबान का हाथ पकड़े हुए वहाँ आन पहुँची, जहाँ कुँवर उदैभान लेटे हुए कुछ कुछ सोच में बड़बड़ा रहे थे।
मदनबान आगे बढ़के कहने लगी – “तुम्हें अकेला जानकर रानी जी आप आई हैं।”

कुँवर उदैभान यह सुनकर उठ बैठे और यह कहा – “क्यों न हो, जी को जी से मिलाप है?”
कुँवर और रानी दोनों चुपचाप बैठे; पर मदनबान दोनों को गुदगुदा रही थी। होते होते रानी का वह पता खुला कि राजा जगतपरकास की बेटी है और उनकी माँ रानी कामलता कहलाती है। “उनको उनके माँ बाप ने कह दिया है – एक महीने पीछे अमराइयों में जाकर झूल आया करो। आज वही दिन था; सो तुम से मुठभेड़ हो गई। बहुत महाराजों के कुँवरों से बातें आईं, पर किसी पर इनका ध्यान न चढ़ा। तुम्हारे धन भाग जो तुम्हारे पास सबसे छुपके, मैं जो उनके लड़कपन की गोइयाँ हूँ, मुझे अपने साथ लेके आई है। अब तुम अपनी बीती कहानी कहो – तुम किस देस के कौन हो।”

उन्होंने कहा – “मेरा बाप राजा सूरजभान और माँ रानी लछमीबास हैं। आपस में जो गँठजोड हो जाय तो कुछ अनोखी, अचरज और अचंभे की बात नहीं। योंही आगे से होता चला आया है। जैसा मुँह वैसा थप्पड़। जोड़ तोड़ टटोल लेते हैं। दोनों महाराजों को यह चितचाही बात अच्छी लगेगी, पर हम तुम दोनों के जी का गँठजोड़ा चाहिए।”

इसी में मदनबान बोल उठी – “सो तो हुआ। अपनी अपनी अँगूठियाँ हेर फेर कर लो और आपस में लिखौती लिख दो। फिर कुछ हिचर मिचर न रहे।” कुँवर उदैभान ने अपनी अँगूठी रानी केतकी को पहना दी; और रानी ने भी अपनी अँगूठी कुँवर की उँगली में डाल दी; और एक धीमी सी चुटकी भी ले ली।

इसमें मदनबाल बोली – “जो सच पूछा तो इतनी भी बहुत हुई। मेरे सिर चोट है। इतना बढ़ चलना अच्छा नहीं। अब उठ चलो और इनको सोने दो; और रोएं तो पड़े रोने दो। बातचीत तो ठीक हो चुकी।” पिछले पहर से रानी तो अपनी सहेलियों को लेके जिधर से आई थी, उधर को चली गई और कुँवर उदैभान अपने घोड़े को पीठ लगाकर अपने लोगों से मिलके अपने घर पहुँचे। पर कुँवर जी का रूप क्या कहूँ। कुछ कहने में नहीं आता। न खाना, न पीना, न मग चलना, न किसी से कुछ कहना, न सुनना। जिस स्थान में थे उसी में गुथे रहना और घड़ी घड़ी कुछ सोच सोच कर सिर धुनना। होते होते लोगों में इस बात का चरचा फैल गई।

किसी किसी ने महाराज और महारानी से कहा – “कुछ दाल में काला है। वह कुँवर बुरे तेंवर और बेडौल आँखें दिखाई देती हैं। घर से बाहर पाँव नहीं धरना। घरवालियाँ जो किसी डौल से बहलातियाँ हैं, तो और कुछ नहीं करना, ठंडी ठंडी साँसें भरता है। और बहुत किसी ने छेड़ा तो छपरखट पर जाके अपना मुंह लपेट के आठ आठ आँसू पड़ा रोता है।”

यह सुनते ही कुँवर उदैभान के माँ-बाप दोनों दौड़े आए। गले लगाया, मुँह चूम पाँव पर बेटे के गिर पड़े, हाथ जोड़े और कहा – ‘जो अपने जी की बात है, सो कहते क्यों नहीं? क्या दुखड़ा है जो पड़े पड़े कराहते हो? राज-पाट जिसको चाहो, दे डालो। कहो तो, क्या चाहते हो? तुम्हारा जी क्यों नहीं लगता? भला वह क्या है जो हो नहीं सकता? मुँह से बोलो, जी को खोलो। जो कुछ कहने से सोच करते हो, अभी लिख भेजो। जो कुछ लिखोगे, ज्यों की त्यों करने में आएगी। जो तुम कहो कूएँ में गिर पड़ो, तो हम दोनों अभी गिर पड़ते हैं। कहो – सिर काट डालो, तो सिर अपने अभी काट डालते हैं।”

कुँवर उदैभान, जो बोलते ही न थे, लिख भेजने का आसरा पाकर इतना बोले – “अच्छा आप सिधारिए, मैं लिख भेजता हूँ। पर मेरे उस लिखे को मेरे मुँह पर किसी ढब से न लाना। इसीलिए मैं मारे लाज के मुखपाट होके पड़ा था और आप से कुछ न कहना था।” यह सुनकर दोनों महाराज और महारानी अपने स्थान को सिधारे। तब कुँवर ने यह लिख भेजा – “अब जो मेरा जी होठों पर आ गया और किसी डौल न रहा गया और आपने मुझे सौ सौ रूप से खोल और बहुत सा टटोला, तब तो लाज छोड़ के हाथ जोड़ के मुँह फाड़ के घिघिया के यह लिखता हूँ –

चाह के हाथों किसी को सुख नहीं।
है भला वह कौन जिसको दुख नहीं।।

उस दिन जो मैं हरियाली देखने को गया था, एक हिरनी मेरे सामने कनौतियाँ उठाए आ गई। उसके पीछे मैंने घोड़ा बगछुट फेंका। जब तक उजाला रहा, उसकी धुन में बहका किया। जब सूरज डूबा मेरा जी बहुत ऊबा। सुहानी सी अमराइयाँ ताड़ के मैं उनमें गया, तो उन अमराइयों का पत्ता पत्ता मेरे जी का गाहक हुआ। वहाँ का यह सौहिला है। कुछ रंडियाँ झूला डाले झूल रही थीं। उनकी सिरधरी कोई रानी केतकी महाराज जगतपरकास की बेटी हैं। उन्होंने यह अँगूठी अपनी मुझे दी और मेरी अँगूठी उन्होंने ले ली और लिखौट भी लिख दी। सो यह अँगूठी उनकी लिखौट समेत मेरे लिखे हुए के साथ पहुँचती है। अब आप पढ़ लीजिए। जिसमें बेटे का जी रह जाय, सो कीजिए।”

महाराज और महारानी ने अपने बेटे के लिखे हुए पर सोने के पानी से यों लिखा – “हम दोनों ने इस अँगूठी और लिखौट को अपनी आँखों से मला। अब तुम इतने कुछ कुढ़ो पचो मत। जो रानी केतकी के माँ बाप तुम्हारी बात मानते हैं, तो हमारे समधी और समधिन हैं। दोनों राज एक हो जायेंगे। और जो कुछ नाँह-नूँह ठहरेगी तो जिस डौल से बन आवेगा, ढाल तलवार के बल तुम्हारी दुल्हन हम तुमसे मिला देंगे। आज से उदास मत रहा करो। खेलो, कूदो, बोलो चालो, आनंदें करो। अच्छी घड़ी, सुभ मुहूरत सोच के तुम्हारी ससुराल में किसी ब्राह्मन को भेजते हैं; जो बात चीतचाही ठीक कर लावे।’ और सुभ घड़ी सुभ मुहूरत देख के रानी केतकी के माँ-बाप के पास भेजा।

ब्राह्मन जो सुभ मुहूरत देखकर हड़बड़ी से गया था, उस पर बुरी घड़ी पड़ी। सुनते ही रानी केतकी के माँ-बाप ने कहा – “हमारे उनके नाता नहीं होने का! उनके बाप-दादे हमारे बापदादे के आगे सदा हाथ जोड़कर बातें किया करते थे और टुक जो तेवरी चढ़ी देखते थे, बहुत डरते थे। क्या हुआ, जो अब वह बढ़ गए, ऊँचे पर चढ़ गए। जिनके माथे हम बाएँ पाँव के अँगूठे से टीका लगावें, वह महाराजों का राजा हो जावे। किसी का मुँह जो यह बात हमारे मुँह पर लावे!” ब्राह्मण ने जल-भुन के कहा – “अगले भी बिचारे ऐसे ही कुछ हुए हैं।

राजा सूरजभान भी भरी सभा में कहते थे – हममें उनमें कुछ गोत का तो मेल नहीं। यह कुँवर की हठ से कुछ हमारी नहीं चलती। नहीं तो ऐसी ओछी बात कब हमारे मुँह से निकलती।” यह सुनते ही उन महाराज ने ब्राह्मन के सिर पर फूलों की चँगेर फेंक मारी और कहा – “जो ब्राह्मण की हत्या का धड़का न होता तो तुझको अभी चक्की में दलवा डालता।” और अपने लोगों से कहा – “इसको ले जाओ और ऊपर एक अँधेरी कोठरी में मँूद रक्खो।” जो इस ब्राह्मन पर बीती सो सब उदैभान के माँ-बाप ने सुनी। सुनते ही लड़ने के लिये अपना ठाठ बाँध के भादों के दल बादल जैसे घिर आते हैं, चढ़ आया। जब दोनों महाराजों में लड़ाई होने लगी, रानी केतकी सावन-भादों के रूप रोने लगी; और दोनों के जी में यह आ गई – यह कैसी चाहत जिसमें लोह बरसने लगा और अच्छी बातों को जी तरसने लगा।

कुँवर ने चुपके से यह कहला भेजा – “अब मेरा कलेजा टुकड़े टुकड़े हुआ जाता है। दोनों महाराजाओं को आपस में लड़ने दो। किसी डौल से जो हो सके, तो मुझे अपने पास बुला लो। हम तुम मिलके किसी और देस निकल चलें; होनी हो सो हो, सिर रहता रहे, जाता जाय।”

एक मालिन, जिसको फूलकली कर सब पुकारते थे, उसने उस कुँवर की चिट्ठी किसी फूल की पंखड़ी में लपेट लपेट कर रानी केतकी तक पहुँचा दी। रानी ने उस चिट्ठी को अपनी आँखों लगाया और मालिन को एक थाल भर के मोती दिए; और उस चिट्ठी की पीठ पर अपने मुँह की पीक से यह लिखा – “ऐ मेरे जी के ग्राहक, जो तू मुझे बोटी बोटी कर के चील-कौंवों को दे डाले, तो भी मेरी आँखों चैन और कलेजे सुख हो। पर यह बात भाग चलने की अच्छी नहीं। इसमें एक बाप-दादे के चिट लग जाती है; और जब तक माँ-बाप जैसा कुछ होता चला आता है उसी डौल से बेटे-बेटी को किसी पर पटक न मारें और सिर से किसी के चेपक न दें, तब तक यह एक जो तो क्या, जो करोड़ जी जाते रहें तो कोई बात हमें रूचती नहीं।”

वह चिठ्ठी जो बिस भरी कुँवर तक जा पहुँची, उस पर कई एक थाल सोने के हीरे, मोती, पुखराज के खचाखच भरे हुए निछावर करके लुटा देता है। और जितनी उसे बेचैनी थी, उससे चौगुनी पचगुनी हो जाती है। और उस चिठ्ठी को अपने उस गोरे डंड पर बाँध लेता है।

आना जोगी महेंदर गिर का कैलास पहाड़ पर से और कुँवर
उदैभान और उसके माँ-बाप को हिरनी हिरन कर डालना

जगतपरकास अपने गुरू को जो कैलास पहाड़ पर रहता था, लिख भेजता है – कुछ हमारी सहाय कीजिए। महाकठिन बिपताभार हम पर आ पड़ी है। राजा सूरजभान को अब यहाँ तक वाव बँहक ने लिया है, जो उन्होंने हम से महाराजों से डौल किया है।

सराहना जोगी जी के स्थान का

कैलास पहाड़ जो एक डौल चाँदी का है, उस पर राजा जगतपरकास का गुरू, जिसको महेंदर गिर सब इंदरलोक के लोग कहते थे, ध्यान ज्ञान में कोई ९० लाख अतीतों के साथ ठाकुर के भजन में दिन रात लगा रहता था। सोना, रूपा, ताँबे, राँगे का बनाना तो क्या और गुटका मुँह में लेकर उड़ना परे रहे, उसको और बातें इस इस ढब की ध्यान में थीं जो कहने सुनने से बाहर हैं। मेंह सोने रूपे का बरसा देना और जिस रूप में चाहना हो जाना, सब कुछ उसके आगे खेल था। गाने बजाने में महादेव जी छूट सब उसके आगे कान पकड़ते थे। सरस्वती जिसकी सब लोग कहते थे, उनने भी कुछ कुछ गुनगुनाना उसी से सीखा था।
उसके सामने छ: राग छत्तीस रागिनियाँ आठ पहर रूप बँदियों का सा धरे हुए उसकी सेवा में सदा हाथ जोड़े खड़ी रहती थीं। और वहाँ अतीतों को गिर कहकर पुकारते थे – भैरोगिर, विभासगिर, हिंडोलगिर, मेघनाथ, केदारनाथ, दीपकसेन, जोतिसरूप सारंगरूप। और अतीतिनें उस ढब से कहलाती थीं – गुजरी, टोड़ी, असावरी, गौरी, मालसिरी, बिलावली। जब चाहता, अधर में सिधासन पर बैठकर उड़ाए फिरता था और नब्बें लाख अतीत गुटके अपने मुँह में लिए, गेरूए वस्तर पहने, जटा बिखेरे उसके साथ होते थे। जिस घड़ी रानी केतकी के बाप की चिठ्ठी एक बगला उसके घर पहुँचा देता है, गुरू महेंदर गिर एक चिग्घाड़ मारकर दल बादलों को ढलका देता है।
बघंबर पर बैठे भभूत अपने मुँह से मल कुछ कुछ पढंत़ करता हुआ बाव के घोड़े भी पीठ लगा और सब अतीत मृगछालों पर बैठे हुए गुटके मुँह में लिए हुए बोल उठे – गोरख जागा और मुंछदर भागा। एक आँख की झपक में वहाँ आ पहुँचता है जहाँ दोनों महाराजों में लड़ाई हो रही थी। पहले तो एक काली आँधी आई; फिर ओले बरसे; फिर टिड्डी आई। किसी को अपनी सुध न रही। राजा सूरजभान के जितने हाथी घोड़े और जितने लोग और भीड़ भाड़ थी, कुछ न समझा कि क्या किधर गई और उन्हें कौन उठा ले गया। राजा जगत परकास के लोगों पर और रानी केतकी के लोगों पर क्योड़े की बँूदों की नन्हीं-नन्हीं फुहार सी पड़ने लगी। जब यह सब कुछ हो चुका, तो गुरूजी ने अतीतियों से कहा –
छमीबास इन तीनों को हिरनी हिरन बना के किसी बन में छोड़ दो; और जो उनके साथी हों, उन सभों को तोड़ फोड़ दो।”

जैसा गुरूजी ने कहा, झटपट वही किया। विपत का मारा कुँवर उदैभान और उसका बाप वह राजा सूरजभान और उसकी माँ लछमीबास हिरन हिरनी वन गए। हरी घास कई बरस तक चरते रहे; और उस भीड़ भाड़ का तो कुछ थल बेड़ा न मिला, किधर गए और कहाँ थे बस यहाँ की यहीं रहने दो। फिर सुनो। अब रानी केतकी के बाप महाराजा जगतपरकास की सुनिए। उनके घर का घर गुरूजी के पाँव पर गिरा और सबने सिर झुकाकर कहा – “महाराज, यह आपने बड़ा काम किया। हम सबको रख लिया। जो आज आप न पहुँचते तो क्या रहा था। सब ने मर मिटने की ठान ली थी।

इन पापियों से कुछ न चलेगी, यह जानते थे। राज पाट हमारा अब निछावर करके जिसको चाहिए, दे डालिए; राज हम से नहीं थम सकता। सूरजभान के हाथ से आपने बचाया। अब कोई उनका चचा चंद्रभान चढ़ आवेगा तो क्योंकर बचना होगा? अपने आप में तो सकत नहीं। फिर ऐसे राज का फिट्टे मुँह कहाँ तक आपको सताया करें।” जोगी महेंदर गिर ने यह सुनकर कहा – “तुम हमारे बेटा बेटी हो, अनंदे करो, दनदनाओ, सुख चैन से रहों। अब वह कौन है जो तुम्हें आँख भरकर और ढब से देख सके। वह बघंबर और यह भभूत हमने तुमको दिया। जो कुछ ऐसी गाढ़ पड़े तो इसमें से एक रोंगटा तोड़ आग में फूंक दीजियो। वह रोंगटा फुकने न पावेगा जो बात की बात में हम आ पहुँचेंगे। रहा भभूत, सो इसलिये है जो कोई इसे अंजन करै, वह सबको देखै और उसे कोई न देखै, जो चाहै सो करै।

जाना गुरूजी का राजा के घर

गुरू महेंदर गिर के पाँव पूजे और धनधन महाराज कहे। उनसे तो कुछ छिपाव न था। महाराज जगतपरकास उनको मुर्छल करते हुए अपनी रानियों के पास ले गए। सोने रूपे के फूल गोद भर-भर सबने निछावर किए और माथे रगड़े। उन्होंने सबकी पीठें ठोंकी।

रानी केतकी ने भी गुरूजी को दंडवत की; पर जी में बहुत सी गुरू जी को गालियाँ दी। गुरूजी सात दिन सात रात यहाँ रह कर जगतपरकास को सिंघासन पर बैठाकर अपने बघंबर पर बैठ उसी डौल से कैलाश पर आ धमके और राजा जगतपरकास अपने अगले ढब से राज करने लगा।

रानी केतकी का मदनबान के आगे रोना और पिछली बातों का ध्यान कर जान से हाथ धोना।

दोहरा

(अपनी बोली की धुन में)

रानी को बहुत सी बेकली थी।
कब सूझती कुछ बुरी भली थी।।
चुपके चुपके कराहती थी।
जीना अपना न चाहती थी।।
कहती थी कभी अरी मदनबान।
है आठ पर मुझे वही ध्यान।।
याँ प्यास किसे किसे भला भूख।
देखूँ वही फिर हरे हरे रूख।।
टपके का डर है अब यह कहिए।
चाहत का घर है अब यह कहिए।।
अमराइयों में उनका वह उतरना।
और रात का साँय साँय करना।।
और चुपके से उठके मेरा जाना।
और तेरा वह चाह का जताना।।
उनकी वह उतार अँगूठी लेनी।
और अपनी अँगूठी उनको देनी।।
आँखों में मेरे वह फिर रही है।
जी का जो रूप था वही है।।
क्योंकर उन्हें भूलूँ क्या करूँ मैं।
माँ बाप से कब तक डरूँ मैं।।
अब मैंने सुना है ऐ मदनबान।
बन बन के हिरन हुए उदयभान।।
चरते होंगे हरी हरी दूब।
कुछ तू भी पसीज सोच में डूब।।
मैं अपनी गई हूँ चौकड़ी भूल।
मत मुझको संुघा यह डहडहे फूल।।
फूलों को उठाके यहाँ से लेजा।
सौ टुकड़े हुआ मेरा कलेजा।।
बिखरे जी को न कर इकट्ठा।
एक घास का ला के रख दे गट्ठा।।
हरियाली उसी की देख लूँ मैं।
कुछ और तो तुझको क्या कहूँ मैं।।
इन आँखों में हैं फड़क हिरन की।
पलकें हुई जैसे घासवन की।।
जब देखिए डब-डबा रही है।
ओसें आंसू की छा रही हैं।।
यह बात जो जी में गड़ गई है।
एक ओस-सी मुझ पै पड़ गई है।
इसी डौल जब अकेली होती तो मदनवान के साथ ऐसे कुछ मोती पिरोती।

रानी केतकी का चाहत से बेकल होना और मदनवान का साथ देने से नाहीं करना और लेना उसी भभूत का, जो गुरूजी दे गए थे, आँख-मिचौबल के बहाने अपनी माँ रानी कामलता से।

एक रात रानी केतकी ने अपनी माँ रानी कामलता को भुलावे में डालकर यों कहा और पूछा – “गुरूजी गुसाई महेंदर गिर ने जो भभूत मेरे बाप को दिया है, वह कहाँ रक्खा है और उससे क्या होता है?”
रानी कामलता बोल उठी – आँख-मिचौवल खेलने के लिये चाहती हूँ। जब अपनी सहेलियों के साथ खेलूँ और चोर बनूँ तो मुझको कोई पकड़ न सके।”

महारानी ने कहा – “वह खेलने के लिये नहीं हैं। ऐसे लटके किसी बुरे दिन के सँभालने को डाल रखते हैं। क्या जाने कोई घड़ी कैसी है, कैसी नहीं।” रानी केतकी अपनी माँ की इस बात पर अपना मुँह थुथा कर उठ गई और दिन भर खाना न खाया। महाराज ने जो बुलाया तो कहा मुझे रूच नहीं। तब रानी कामलता बोल उठीं- “अजी तुमने सुना भी, बेटी तुम्हारी आँख मिचौवल खेलने क लिये वह भभूत गुरूजी का दिया माँगती थी। मैंने न दिया और कहा, लड़की यह लड़कपन की बातें अच्छी नहीं। किसी बुरे दिन के लिये गुरूजी गए हैं। इसी पर मुझ से रूठी है। बहुतेरा बहलाती हूँ, मानती नहीं।”

महाराज ने कहा – “भभूत तो क्या, मुझे अपना जी भी उससे प्यारा नहीं। मुझे उसके एक पहर के बहल जाने पर एक जी तो क्या, जो करोर जी हों तो दे डालें।”

रानी केतकी को डिबिया में से थोड़ा सा भभूत दिया। कई दिन तलक आँख मिचौवल अपने माँ-बाप के सामने सहेलियों के साथ खेलती सबको हँसाती रही, जो सौ सौ थाल मोतियों के निछावर हुआ किए, क्या कहूँ, एक चुहल थी जो कहिए तो करोड़ों पोथियों में ज्यों की त्यों न आ सके।

रानी केतकी का चाहत से बेकल होना और मदन बान का साथ देने से नहीं करना

एक रात रानी केतकी उसी ध्यान में मदनबान से यों बोल उठी – “अब मैं निगोडी लाज से कुट करती हूँ, तू मेरा साथ दे।” मदनबान ने कहा – क्यों कर? रानी केतकी ने वह भभूत का लेना उसे बताया और यह सुनाया –
“यह सब आँख-मिचौवल के झाई झप्पे मैंने इसी दिन के लिये कर रक्खे थे।”

मदनबान बोली – “मेरा कलेजा थरथराने लगा। अरी यह माना जो तुम अपनी आँखों में उस भभूत का अंजन कर लोगी और मेरे भी लगा दोगी तो हमें तुम्हें कोई न देखेगा। और हम तुम सब को देखेंगी। पर ऐसी हम कहाँ जी चली हैं। जो बिन साथ, जोबन लिए, बन-बन में पड़ी भटका करें और हिरनों की सींगों पर दोनों हाथ डालकर लटका करें, और जिसके लिए यह सब कुछ है, सो वह कहाँ? और होय तो क्या जाने जो यह रानी केतकी है और यह मदनबान निगोड़ी नोची खसोटी उजड़ी उनकी सहेली है। चूल्हे और भाड़ में जाय यह चाहत जिसके लिए आपकी माँ-बाप का राज-पाट सुख नींद लाज छोड़कर नदियों के कछारों में फिरना पड़े, सो भी बेडौल। जो वह अपने रूप में होते तो भला थोड़ा बहुत आसरा था।

ना जी यह तो हमसे न हो सकेगा। जो महाराज जगतपरकास और महारानी कामलता का हम जान-बूझकर घर उजाड़ें और इनकी जो इकलौती लाडली बेटी है, उसको भगा ले जायें और जहाँ तहाँ उसे भटकावें और बनासपत्ति खिलावें और अपने घोड़ें को हिलावें। जब तुम्हारे और उसके माँ बाप में लड़ाई हो रही थी और उनने उस मालिन के हाथ तुम्हें लिख भेजा था जो मुझे अपने पास बुला लो, महाराजों को आपस में लड़ने दो, जो होनी हो सो हो; हम तुम मिलके किसी देश को निकल चलें; उस दिन न समझीं। तब तो वह ताव भाव दिखाया। अब जो वह कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप तीनों जी हिरनी हिरन बन गए। क्या जाने किधर होंगे। उनके ध्यान पर इतनी कर बैठिए जो किसी ने तुम्हारे घराने में न की, अच्छी नहीं। इस बात पर पानी डाल दो; नहीं तो बहुत पछताओगी और अपना किया पाओगी। मुझसे कुछ न हो सकेगा। तुम्हारी जो कुछ अच्छी बात होती, तो मेरे मुँह से जीते जी न निकलता। पर यह बात मेरे पेट में नहीं पच सकती। तुम अभी अल्हड़ हो। तुमने अभी कुछ देखा नहीं। जो ऐसी बात पर सचमुच ढलाव देखूँगी तो तुम्हारे बाप से कहकर यह भभूत जो बह गया निगोड़ा भूत मुछंदर का पूत अवधूत दे गया है, हाथ मुरकवाकर छिनवा लूँगी।”

रानी केतकी ने यह रूखाइयाँ मदनबान की सुनकर हँसकर टाल दिया और कहा – “जिसका जी हाथ में न हो, उसे ऐसी लाखों सूझती है; पर कहने और करने में बहुत सा फेर है। भला यह कोई अँधेर है जो माँ बाप, रावपाट, लाज छोड़कर हिरन के पीछे दौड़ती करछालें मारती फिरूँ। पर अरी तू तो बड़ी बावली चिड़िया है जो यह बात सच जानी और मुझसे लड़ने लगी।”

रानी केतकी का भभूत लगाकर बाहर निकल जाना

और सब छोटे बड़ों का तिलमिलाना दस पन्द्रह दिन पीछे एक दिन रानी केतकी बिन कहे मदनबान के वह भभूत आँखों में लगा के घर से बाहर निकल गई। कुछ कहने में आता नहीं, जो माँ बाप पर हुई। सब ने यह बात ठहराई, गुरूजी ने कुछ समझकर रानी केतकी को अपने पास बुला लिया होगा। महाराज जगतपरकास और महारानी कामलता राजपाट उस वियोग में छोड़ छाड़ के पहाड़ को चोटी पर जा बैठे और किसी को अपने आँखों में से राज थामने को छोड़ गए। बहुत दिनों पीछे एक दिन महारानी ने महाराज जगतपरकास से कहा – “रानी केतकी का कुछ भेद जानती होगी तो मदनबान जानती होगी। उसे बुलाकर तो पँूछो।” महाराज ने उसे बुलाकर पूछा तो मदनबान ने सब बातें खोलियाँ। रानी केतकी के माँ बाप ने कहा – “अरी मदनबान, जो तू भी उसके साथ होती तो हमारा जी भरता।
अब तो वह तुझे ले जाये तो कुछ हचर पचर न कीजियो, उसको साथ ही लीजियो। जितना भभूत है, तू अपने पास रख। हम कहाँ इस राख को चूल्हें में डालेंगे। गुरूजी ने तो दोनों राज का खोज खोया – कुँवर उदैभान और उसके माँ-बाप दोनों अलग हो रहे। जगतपरकास और कामलता को यों तलपट किया। भभूत न होती तो ये बातें काहे को सामने आती” ।
मदनबान भी उनके ढूँढने को निकली। अंजन लगाए हुए रानी केतकी रानी केतकी कहती हुई पड़ी फिरती थी।

बहुत दिनों पीछे कहीं रानी केतकी भी हिरनों की दहाड़ों में उदैभान उदैभान चिघाड़ती हुई आ निकली। एक ने एक को ताड़कर पुकारा – “अपनी तनी आँखें धो डालो।” एक डबरे पर बैठकर दोनों की मुठभेड़ हुई। गले लग के ऐसी रोइयाँ जो पहाड़ों में कूक सी पड़ गई।

दोहरा

छा गई ठंडी साँस झाड़ों में।
पड़ गई कूक सी पहाड़ों में।
दोनों जनियाँ एक अच्छी सी छाँव को ताड़कर आ बैठियाँ और अपनी अपनी दोहराने लगीं।

बातचीत रानी केतकी की मदनबान के साथ

रानी केतकी ने अपनी बीती सब कही और मदनबान वही अगला झींकना झीका की और उनके माँ-बाप ने जो उनके लिये जोग साधा था, जो वियोग लिया था, सब कहा। जब यह सब कुछ हो चुकी, तब फिर हँसने लगी। रानी केतकी उसके हंसने पर रूककर कहने लगी –

दोहरा
हम नहीं हँसने से रूकते, जिसका जी चाहे हँसे।
है वही अपनी कहावत आ फँसे जी आ फँसे।।
अब तो सारा अपने पीछे झगड़ा झाँटा लग गया।
पाँव का क्या ढूँढती हा जी में काँटा लग गया।।

पर मदनबान से कुछ रानी केतकी के आँसू पुँछते चले। उन्ने यह बात कही – “जो तुम कहीं ठहरो तो मैं तुम्हारे उन उज़ड़े हुए माँ-बाप को ले आऊँ और उन्हीं से इस बात को ठहराऊँ। गोसाई महेंदर गिर जिसकी यह सब करतूत है, वह भी इन्हीं दोनों उजड़े हुओं की मुठ्ठी में हैं। अब भी जो मेरा कहा तुम्हारे ध्यान चढ़ें, तो गए हुए दिन फिर सकते हैं। पर तुम्हारे कुछ भावे नहीं, हम क्या पड़ी बकती है। मैं इसपर बीड़ा उठाती हूँ”।

बहुत दिनों पीछे रानी केतकी ने इसपर ‘अच्छा’ कहा और मदनबान को अपने माँ-बाप के पास भेजा और चिठ्ठी अपने हाथों से लिख भेजी जो आपसे हो सके तो उस जोगी से ठहरा के आवें।

मदनबान का महाराज और महारानी के पास फिर आना और चितचाही बात सुनना

मदनबान रानी केतकी को अकेला छोड़कर राजा जगतपरकास और रानी कामलता जिस पहाड़ पर बैठी थीं, झट से आदेश करके आ खड़ी हुई और कहने लगी – “लीजे आप राज कीजे, आपके घर नए सिर से बसा और अच्छे दिन आये। रानी केतकी का एक बाल भी बाँका नहीं हुआ। उन्हीं के हाथों की लिखी चिठ्ठी लाई हूँ, आप पढ़ लीजिए। आगे जो जी चाहे सो कीजिए।’

महाराज ने उस बधंबर में से एक रोंगटा तोड़कर आग पर रख के फूँक दिया। बात की बात में गोसाई महेंदर गिर आ पहुँचा और जो कुछ नया सर्वांग जोगी-जागिन का आया, आँखों देखा; सबको छाती लगाया और कहा – “बधंबर इसी लिये तो मैं सौंप गया था कि जो तुम पर कुछ हो तो इसका एक बाल फूँक दीजियो। तुम्हारी यह गत हो गई। अब तक क्या कर रहे थे और किन नींदों में सोते थे? पर तुम क्या करो यह खिलाड़ी जो रूप चाहे सौ दिखावे, जो नाच चाहे सौ नचावे। भभूत लड़की को क्या देना था। हिरनी हिरन उदैभान और सूरजभान उसके बाप और लछमीबास उनकी माँ को मैंने किया था। फिर उन तीनों को जैसा का तैसा करना कोई बड़ी बात न थी। अच्छा, हुई सो हुई। अब उठ चलो, अपने राज पर विराजो और ब्याह को ठाट करो। अब तुम अपनी बेटी को समेटो, कुँवर उदैभान को मैंने अपना बेटा किया और उसको लेके मैं ब्याहने चढूँगा।”

महाराज यह सुनते ही अपनी गद्दी पर आ बैठे और उसी घड़ी यह कह दिया “सारी छतों और कोठों को गोटे से मढ़ो और सोने और रूपे के सुनहरे रूपहरे सेहरे सब झाड़ पहाड़ों पर बाँध दो और पेड़ों में मोती की लड़ियाँ बाँध दो और कह दो, चालीस दिन रात तक जिस घर में नाच आठ पहर न रहेगा, उस घर वाले से मैं रूठ रहूँगा, और छ: महिने कोई चलनेवाला कहीं न ठहरे। रात दिन चला जावे।” इस हेर फेर में वह राज था। सब कहीं यही डौल था।

जाना महाराज, महारानी और गुसाई महेंदर गिर का रानी केतकी के लिये फिर महाराज और महारानी और महेंदर गिर मदनबान के साथ जहाँ रानी केतकी चुपचाप सुन खींचे हुए बैठी हुई थी, चुप चुपाते वहाँ आन पहुँचे। गुरूजी ने रानी केतकी को अपने गोद में लेकर कुँवर उदैभान का चढ़ावा दिया और कहा – तुम अपने माँ-बाप के साथ अपने घर सिधारो। अब मैं बेटे उदैभान को लिये हुये आता हूँ।”
गुरूजी गोसाई जिनको दंडित है, सो तो वह सिधारते हैं। आगे जो होगी सो कहने में आवेंगी – यहाँ पर धूम धाम और फैलावा अब ध्यान कीजिये। महाराज जगतपरकास ने अपने सारे देश में कह दिया – “यह पुकार दे जो यह न करेगा उसकी बुरी गत होवेगी। गाँव गाँव में अपने सामने छिपोले बना बना के सूहे कपड़े उनपर लगा के मोट धनुष की और गोखरू, रूपहले सुनहरे की किरनें और डाँक टाँक टाँक रक्खो और जितने बड़ पीपल नए पुराने जहाँ जहाँ पर हों, उनके फूल के सेहरे बड़े बड़े ऐसे जिसमें सिर से लगा पैर तलक पहुँचे, बाँधो।

चौतुक्का

पौदों ने रंगा के सूहे जोड़े पहने। सब पाँव में डालियों ने तोड़े पहने।।
बूटे बूटे ने फूल फूल के गहने पहने। जो बहुत न थे तो थोड़े थोड़े पहने।।

जितने डहडहे और हरियावल फल पात थे, सब ने अपने हाथ में चहचही मेहंदी की रचावट के साथ जितनी सजावट में समा सके, कर लिये और जहाँ जहाँ नयी ब्याही दुलहिनें नन्हीं नन्हीं फलियों की और सुहागिनें नई नई कलियों के जोड़े पंखुड़ियों के पहने हुए थीं। सब ने अपनी गोद सुहाय और प्यार के फूल और फलों से भरी और तीन बरस का पैसा सारे उस राजा के राज भर में जो लोग दिया करते थे, जिस ढब से हो सकता था खेती बारी करके, हल जोत के और कपड़ा लत्ता बेंचकर सो सब उनको छोड़ दिया और कहा जो अपने अपने घरों में बनाव की ठाट करें। और जितने राज भर में कुएँ थे, खँड़सालों की खँडसालें उनमें उड़ेल गई और सारे बनों और पहाड़ तनियाँ में लाल पटों की झमझमाहट रातों को दिखाई देने लगी। और जितनी झीलें थीं उनमें कुसुम और टेसू और हरसिंगार पड़ गया और केसर भी थोड़ी थोड़ी घोले में आ गई। फुनगे से लगा जड तलक जितने झाड़ झंखाड़ों में पत्ते और पत्ती बँधी थीं, उनपर रूपहरी सुनहरी डाँक गोंद लगाकर चिपका दिया और सबों को कह दिया जो सही पगड़ी और बागे बिन कोई किसी डौल किसी रूप से फिर चले नहीं। और जितने गवैये, बजवैए, भांड-भगतिए रहस धारी और संगीत पर नाचनेवाले थे, सबको कह दिया जिस जिस गाँव में जहाँ जहाँ हों अपनी अपनी ठिकानों से निकलकर अच्छे अच्छे बिछौने बिछाकर गाते-नाचते धूम मचाते कूदते रहा करें।

ढूँढना गोसाई महेंदर गिर का कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप को न पाना और बहुत तलमलाना

यहाँ की बात और चुहलें जो कुछ है, सो यहीं रहने दो। अब आगे यह सुनो। जोगी महेंदर और उसके ९० लाख जतियों ने सारे बन के बन छान मारे, पर कहीं कुँवर उदैभान और उसके माँ-बाप का ठिकाना न लगा। तब उन्होंने राजा इंदर को चिठ्ठी लिख भेजी। उस चिठ्ठी में यह लिखा हुआ था – ‘इन तीनों जनों को हिरनी हिरन कर डाला था। अब उनको ढूँढता फिरता हूँ। कहीं नहीं मिलते और मेरी जितनी सकत थी, अपनी सी बहुत कर चुका हूँ। अब मेरे मुँह से निकला कुँवर उदैभान मेरा बेटा मैं उसका बाप और ससुराल में सब ब्याह का ठाट हो रहा है। अब मुझपर विपत्ति गाढ़ी पड़ी जो तुमसे हो सके, करो।’
राजा इंदर चिठ्ठी का देखते ही गुरू महेंदर को देखने को सब इंद्रासन समेट कर आ पहुँचे और कहा – “जैसा आपका बेटा वैसा मेरा बेटा। आपके साथ मैं सारे इंद्रलोक को समेटकर कुँवर उदैभान को ब्याहने चढूँगा।”
गोसाई महेंदर गिर ने राजा इंद्र से कहा – हमारी आपकी एक ही बात है, पर कुछ ऐसा सुझाइए जिससे कुँवर उदैभान हाथ आ जावे।” राजा इंदर ने कहा – जितने गवैए और गायनें हैं, उन सबको साथ लेकर हम और आप सारे बनों में फिरा करें। कहीं न कहीं ठिकाना लग जाएगा।

हिरन हिरनी का खेल बिगड़ना और कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप का नए सिरे से रूप पकड़ना

एक रात राजा इंदर और गोसाई महेंदर गिर निखरी हुई चाँदनी में बैठे राग सुन रहे थे, करोड़ों हिरन राग के ध्यान में चौकड़ी भूल आस पास सर झुकाए खड़े थे। इसी में राजा इंदर ने कहा – “इन सब हिरनों पर पढ़के मेरी सकत गुरू की भगत फूरे मंत्र ईश्वरोवाच पढ़ के एक एक छींटा पानी का दो।” क्या जाने वह पानी कैसा था। छीटों के साथ ही कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप तीनों जनें हिरनों का रूप छोड़ कर जैसे थे वैसे हो गए। गोसाई महेंदर गिर और राजा इंदर ने उन तीनों को गले लगाया और बड़ी आवभगत से अपने पास बैठाया और वही पानी घड़ा अपने लोगों को देकर वहाँ भेजवाया जहाँ सिर मंुडवाते ही ओले पड़े थे।

राजा इंदर के लोगों ने जो पानी के छीटें वही ईश्वरोवाच पढ़ के दिए तो जो मरे थे सब उठ खड़े हुए; और जो अधमुए भाग बचे थो, सब सिमट आए। राजा इंदर और महेंदर गिर कुँवर उदैभान और राजा सूरजभान और रानी लक्ष्मीबास को लेकर एक उड़न – खटोलो पर बैठकर बड़ी धूमधाम से उनको उनके राज पर बिठाकर ब्याह का ठाट करने लगे। पसेरियन हीरे-मोती उन सब पर से निछावर हुए।

राजा सूरजभान और कुँवर उदैभान और रानी लछमीबास चितचाही असीस पाकर फूली न समाई और अपने सारे राज को कह दिया – “जेवर भोरे के मुँह खोल दो। जिस जिस को जो जा उकत सूझे, बोल दो। आज के दिन का सा कौन सा दिन होगा। हमारी आँखों की पुतलियों का जिससे चैन हैं, उस लाडले इकलौते का ब्याह और हम तीनों का हिरनों के रूप से निकलकर फिर राज पर बैठना। पहले तो यह चाहिए जिन जिन की बेटियाँ बिन ब्याहियाँ हों, उन सब को उतना कर दो जो अपनी जिस चाव चीज से चाहें; अपनी गुड़ियाँ सँवार के उठावें; और तब तक जीती रहें, सब की सब हमारे यहाँ से खाया पकाया रींधा करें। और सब राज भर की बेटियाँ सदा सुहागनें बनी रहें और सूहे रातें छुट कभी कोई कुछ न पहना करें और सोने रूपे के केवाड़ गंगाजमुनी सब घरों में लग जाएँ और सब कोठों के माथे पर केसर और चंदन के टीके लगे हों। और जितने पहाड़ हमारे देश में हों, उतने ही पहाड़ सोने रूपे के आमने सामने खड़े हो जाएँ और सब डाँगों की चोटियाँ मोतियों की माँग ताँगे भर जाएँ; और फूलों के गहने और बँधनवार से सब झाड़ पहाड़ लदे फँदे रहें; और इस राज से लगा उस राज तक अधर में छत सी बाँध दो। और चप्पा चप्पा कहीं ऐसा न रहें जहाँ भीड़ भड़क्का धूम धड़क्का न हो जाय। फूल बहुत सारे बहा दो जो नदियाँ जैसे सचमुच फूल की बहियाँ हैं यह समझा जाय।

और यह डौल कर दो, जिधर से दुल्हा को ब्याहने चढ़े सब लाड़ली और हीरे पन्ने पोखराज की उमड़ में इधर और उधर कबैल की टटि्टयाँ बन जायँ और क्यारियाँ सी हो जायें जिनके बीचो बीच से हो निकलें। और कोई डाँग और पहाड़ी तली का चढ़ाव उतार ऐसा दिखाई न दे जिसकी गोद पंखुरियों से भरी हुई न हों। राजा इंदर का कुँवर उदैभान का साथ करनाराजा इंदर ने कह दिया, ‘वह रंडियाँ चुलबुलियाँ जो अपने मद में उड़ चलियाँ हैं, उनसे कह दो – सोलहो सिंगार, बास गूँध मोती पिरो अपने अचरज और अचंभे के उड़न खटोलों का इस राज से लेकर उस राज तक अधर में छत बाँध दो। कुछ इस रूप से उड़ चलो जो उड़न-खटोलियों की क्यारियाँ और फुलवारियाँ सैंकड़ों कोस तक हो जायें। और अधर ही अधर मृदंग, बीन, जलतरंग, मुँहचग, घुँघरू, तबले घंटताल और सैकड़ों इस ढब के अनोखे बाजे बजते आएँ। और उन क्यारियों के बीच में हीरे, पुखराज, अनवेधे मोतियों के झाड़ और लाल पटों की भीड़भाड़ की झमझमाहट दिखाई दे और इन्हीं लाल पटों में से हथफूल, फूलझड़ियाँ, जाही जुही, कदम, गेंदा, चमेली इस ढब से छूटने लगें जो देखनेवालों को छातियों के किवाड़ खुल जायें। और पटाखे जो उछल उछल फूटें, उनमें हँसती सुपारी और बोलती करोती ढल पड़े। और जब तुम सबको हँसी आवे, तो चाहिए उस हँसी से मोतियों की लड़ियाँ झड़ें जो सबके सब उनको चुन चुनके राजे हो जायें। डोमनियों के जो रूप में सारंगियाँ छेड़ छेड़ सोहलें गाओ। दोनों हाथ हिलाके उगलियाँ बचाओ। जो किसी ने न सुनी हो, वह ताव भाव वह चाव दिखाओ; ठुडि्डयाँ गिनगिनाओ, नाक भँवे तान तान भाव बताओ; कोई छुटकर न रह जाओ। ऐसा चाव लाखों बरस में होता है।’ जो जो राजा इंदर ने अपने मुँह से निकाला था, आँख की झपक के साथ वही होने लगा। और जो कुछ उन दोनों महाराजों ने कह दिया था, सब कुछ उसी रूप से ठीक ठीक हो गया। जिस ब्याह की यह कुछ फैलावट और जमावट और रचावट ऊपर तले इस जमघट के साथ होगी, और कुछ फैलावा क्या कुछ होगा, यही ध्यान कर लो।

ठाटो करना गोसाई महेंदर गिर का

जब कुँवर उदैभान को वे इस रूप से ब्याहने चढ़े और वह ब्राह्मन जो अँधेरी कोठरी से मँुदा हुआ था, उसको भी साथ ले लिया और बहुत से हाथ जोड़े और कहा – ब्राह्मन देवता हमारे कहने सुनने पर न जाओ। तुम्हारी जो रीत चली आई है, बताते चलो।

एक उड़न खटोले पर वह भी रीत बता के साथ हो लिया। राजा इंदर और गोसाई महेंदर गिर ऐरावत हाथी ही पर झूलते झालते देखते भालते चले जाते थे। राजा सूरजभान दुल्हा के घोड़े के साथ माला जपता हुआ पैदल था। इसी में एक सन्नाटा हुआ। सब घबरा गए। उस सन्नाटे में से जो वह ९० लाख अतीत थे, अब जोगी से बने हुए सब माले मोतियों की लड़ियों की गले में डाले हुए और गातियाँ उस ढब की बाँधे हुए मिरिगछालों और बघंबरों पर आ ठहर गए। लोगों के जियों में जितनी उमंगे छा रही थी, वह चौगुनी पचगुनी हो गई। सुखपाल और चंडोल और रथों पर जितनी रानियाँ थीं, महारानी लछमीदास के पीछे चली आतियाँ थीं। सब को गुदगुदियाँ सी होने लगीं इसी में भरथरी का सवाँग आया।

कहीं जोगी जातियाँ आ खड़े हुए। कहीं कहीं गोरख जागे कहीं मुछंदारनाथ भागे। कहीं मच्छ कच्छ बराह संमुख हुए, कहीं परसुराम, कहीं बामन रूप, कहीं हरनाकुस और नरसिंह, कहीं राम लछमन सीता सामने आई, कहीं रावन और लंका का बखेड़ा सारे का सारा सामने दिखाई देने लगा कहीं कन्हैया जी की जनम अष्टमी होना और वसुदेव का गोकुल ले जाना और उनका बढ़ चलना, गाए चरानी और मुरली बजानी और गोपियों से धूमें मचानी और राधिका रहस और कुब्जा का बस कर लेना, वही करील की कंुजे, बसीबट, चीरघाट, वृंदावन, सेवाकुंज, बरसाने में रहना और कन्हैया से जो जो हुआ था, सब का सब ज्यों का त्यों आँखों में आना और द्वारका जाना और वहाँ सोने का घर बनाना, इधर बिरिज को न आना और सोलह सौ गोपियों का तलमलाना सामने आ गया। उन गोपियों में से ऊधो क हाथ पकड़कर एक गोपी के इस कहने ने सबको रूला दिया जो इस ढब से बोल के उनसे रूँधे हुए जी को खोले थी।

चौचुक्का
जब छांड़ि करील को कँुजन को हरि द्वारिका जीउ माँ जाय बसे।
कलधौत के धाम बनाए घने महराजन के महराज भये।
तज मोर मुकुट अरू कामरिया कछु औरहि नाते जाड़ लिए।
धरे रूप नए किए नेह नए और गइया चरावन भूल गए।

अच्छापन घाटों का कोई क्या कह सके, जितने घाट दोनों राज की नदियों में थे, पक्के चाँदी के थक्के से होकर लोगों को हक्का बक्का कर रहे थे। निवाड़े, भौलिए, बजरे, लचके, मोरपंखी, स्यामसुंदर, रामसुंदर, और जितनी ढब की नावे थीं, सुनहरी रूपहरी, सजी सजाई कसी कसाई और सौ सौ लचकें खातियाँ, आतियाँ, जातियाँ, ठहरातियाँ, फिरातियाँ थीं। उन सभी पर खचाखच कंचनियाँ, रामजनियाँ, डोमिनियाँ भरी हुई अपने अपने करतबों में नाचती गाती बजाती कूदती फाँदती घूमें मचातियाँ अँगड़ातियाँ जम्हातियाँ उँगलियाँ नचातियाँ और ढुली पड़तियाँ थीं और कोई नाव ऐसी न थी जो सोने रूपे के पत्तरों से मढ़ी हुई और सवारी से भरी हुई न हो। और बहुत सी नावों पर हिंडोले भी उसी डब के थे। उनपर गायनें बैठी झुलती हुई सोहनी, केदार, बागेसरी, काम्हड़ों में गा रही थीं। दल बादल ऐसे नेवाड़ों के सब झीलों में छा रहे थे।

आ पहुँचना कुँवर उदैभान का

ब्याह के ठाट के साथ दूल्हन की ड्योढ़ी पर इस धूमधाम के साथ कुँवर उदैभान सेहरा बाँधे दूल्हन के घर तक आ पहुँचा और जो रीतें उनके घराने में चली आई थीं, होने लगियाँ। मदनबान रानी केतकी से ठठोली करके बोली – ‘लीजिए, अब सुख समेटिए, भर भर झोली। सिर निहुराए, क्या बैठी हो, आओ न टुक हम तुम मिल के झरोखों से उन्हें झाँकें।” रानी केतकी ने कहा – ‘न री, ऐसी नीच बातें न कर। हमें ऐसी क्या पड़ी जो इस घड़ी ऐसी झेल कर रेल पेल ऐसी उठें और तेल फुलेल भरी हुई उनके झाँकने को जा खड़ी हों।” मदनबान उसकी इस रूखाई को उड़नझाई की बातों में डालकर बोली –

बोलचाल मदनबान की अपनी बोली के दोहों में –
यों तो देखो वा छड़े जी वा छड़े जी वा छड़े।
हम से जो आने लगी हैं आप यों मुहरे कड़े।।
छान मारे बन के बन थे आपने जिनके लिये।
वह हिरन जीवन के मद में हैं बने दूल्हा खड़े।।

तुम न जाओ देखने को जो उन्हें क्या बात है।
ले चलेंगी आपको हम हैं इसी धुन पर अड़े।
है कहावत जी को भावै और यों मुड़िया हिले।
झांकने के ध्यान में उनके हैं सब छोटे बड़े।।
साँस ठंड़ी भरके रानी केतकी बोली कि सच।
सब तो अच्छा कुछ हुआ पर अब बखेड़े में पड़े।।

वारी फेरी होना मदनबान का रानी केतकी पर और उसकी बास सूँघना और उनींदेपन से ऊँघना

उस घड़ी मदनबान को रानी केतकी का बादले का जूड़ा और भीना भीनापन और अँखड़ियों का लजाना और बिखरा बिखरा जाना भला लग गया, तो रानी केतकी की बास सँूघने लगी और अपनी आँखों को ऐसा कर लिया जैसे कोई ऊँघने लगता है। सिर से लगा पाँव तक वारी फेरी होके तलवे सुहलाने लगी। तब रानी केतकी झट एक धीमी सी सिसकी लचके के साथ ले ऊठी : मदनबान बोली – ‘मेरे हाथ के टहोके से, वही पांव का छाला दुख गया होगा जो हिरनों की ढूँढने में पड़ गया था।”
इसी दु:ख की चुटकी से रानी केतकी ने मसोस कर कहा – “काटा अड़ा तो अड़ा, छाला पड़ा तो पड़ा, पर निगोड़ी तू क्यों मेरी पनछाला हुई।”
सराहना रानी केतकी के जोबन का केतकी का भला लगना लिखने पढ़ने से बाहर है। वह दोनों भैवों का खिंचावट और पुतलियों में लाज की समावट और नुकीली पलकों की रूँधावट हँसी की लगावट और दंतड़ियों में मिस्सी की ऊदाहट और इतनी सी बात पर रूकावट है। नाक और त्योरी का चढ़ा लेना, सहेलियों को गालियाँ देना और चल निकलना और हिरनों के रूप से करछालें मारकर परे उछलना कुछ कहने में नहीं आता।

सराहना कुँवर जी के जोबन का

कुँवर उदैभान के अच्छेपन का कुछ हाल लिखना किससे हो सके। हाय रे उनके उभार के दिनों का सुहानापन, चाल ढाल का अच्छन बच्छन, उठती हुई कोंपल की काली फबन और मुखड़े का गदराया हुआ जोबन जैसे बड़े तड़के धंुधले के हरे भरे पहाड़ों की गोद से सूरज की किरनें निकल आती है। यही रूप था। उनकी भींगी मसों से रस टपका पड़ता था। अपनी परछाँई देखकर अकड़ता जहाँ जहाँ छाँव थी, उसका डौल ठीक ठीक उनके पाँव तले जैसे धूप थी।

दूल्हा का सिंहासन पर बैठना

दूल्हा उदैभान सिंहासन पर बैठा और इधर उधर राजा इंदर और जोगी महेंदर गिर जम गए और दूल्हा का बाप अपने बेटे के पीछे माला लिये कुछ गुनगुनाने लगा। और नाच लगा होने और अधर में जो उड़न खटोले राजा इंदर के अखाड़े के थे। सब उसी रूप से छत बाँधे थिरका किए। दोनों महारानियाँ समधिन बन के आपस में मिलियाँ चलियाँ और देखने दाखने को कोठों पर चन्दन के किवाड़ों के आड़ तले आ बैठियाँ। सर्वांग संगीत भँड़ताल रहस हँसी होने लगी। जितनी राग रागिनियाँ थीं, ईमन कल्यान, सुध कल्यान, झिंझोटी, कन्हाड़ा, खम्माच, सोहनी, परज, बिहाग, सोरठ, कालंगड़ा, भैरवी, गीत, ललित भैरी रूप पकड़े हुए सचमुच के जैसे गानेवाले होते हैं, उसी रूप में अपने अपने समय पर गाने लगे और गाने लगियाँ। उस नाच का जो ताव भाव रचावट के साथ हो, किसका मुँह जो कह सके। जितने महाराजा जगतपरकास के सुखचैन के घर थे, माधो बिलास, रसधाम कृष्ण निवास, मच्छी भवन, चंद्र भवन सबके सब लप्पे लपेटे और सच्ची मोतियों की झालरें अपनी अपनी गाँठ में समेटे हुए एक भेस के साथ मतवालों के बैठनेवालों के मुँह चूम रहे थे।

बीचो बीच उन सब घरों के एक आरसी धाम बना था जिसकी छत और किवाड़ और आंगन में आरसी छुट कहीं लकड़ी, इंर्ट, पत्थर की पुट एक उँगली के पोर बराबर न लगी थी। चाँदनी सा जोड़ा पहने जब रात घड़ी एक रह गई थी। तब रानी केतकी सी दुल्हन को उसी आरसी भवन में बैठकर दूल्हा को बुला भेजा। कुँवर उदैभान कन्हैया सा बना हुआ सिर पर मुकुट धरे सेहरा बाँधे उसी तड़ावे और जमघट के साथ चाँद सा मुखड़ा लिए जा पहुँचा। जिस जिस ढब में ब्राह्मन और पंडित बहते गए और जो जो महाराजों में रीतें होती चली आई थी, उसी डौल से उसी रूप से भँवरी गँठजोड़ा हो लिया।

अब उदैभान और रानी केतकी दोनों मिले।
घास के जो फूल कुम्हालाए हुए थे फिर खिले।।
चैन होता ही न था जिस एक को उस एक बिन।
रहने सहने सो लगे आपस में अपने रात दिन।।
ऐ खिलाड़ी यह बहुत सा कुछ नहीं थोड़ा हुआ।
आन कर आपस में जो दोनों का, गठजोड़ा हुआ।।
चाह के डूबे हुए ऐ मेरे दाता सब तिरें।
दिन फिरे जैसे इन्हों के वैसे दिन अपने फिरें।।

वह उड़नखटोलीवालियाँ जो अधर में छत सी बाँधे हुए थिरक रही थी, भर भर झोलियाँ और मुठि्ठयाँ हीरे और मोतियाँ से निछावर करने के लिए उतर आइयाँ और उड़न-खटोले अधर में ज्यों के त्यों छत बाँधे हुए खड़े रहे। और वह दूल्हा दूल्हन पर से सात सात फेरे वारी फेर होने में पिस गइयाँ। सभों को एक चुपकी सी लग गई। राजा इंदर ने दूल्हन को मुँह दिखाई में एक हीरे का एक डाल छपरखट और एक पेड़ी पुखराज की दी और एक परजात का पौधा जिसमें जो फल चाहो सो मिले, दूल्हा दूल्हन के सामने लगा दिया। और एक कामधेनू गाय की पठिया बछिया भी उसके पीछे बाँध दी और इक्कीस लांैड़िया उन्हीं उड़न-खटोलेवालियों में से चुनकर अच्छी से अच्छी सुथरी से सुथरी गाती बजातियाँ सीतियाँ पिरोतियाँ और सुघर से सुघर सौंपी और उन्हें कह दिया – “रानी केतकी छूट उनके दूल्हा से कुछ बात चीत न रखना, नहीं तो सब की सब पत्थर की मूरत हो जाओगी और अपना किया पाओगी।” और गोसाई महेंदर गिर ने बावन तोले पाख रत्ती जो उसकी इक्कीस चुटकी आगे रक्खी और कहा – “यह भी एक खेल है। जब चाहिए, बहुत सा ताँबा गलाके एक इतनी सी चुटकी छोड़ दीजै; कंचन हो जायेगा।” और जोगी जी ने सभों से यह कह दिया- “जो लोग उनके ब्याह में जागे हैं, उनके घरों में चालीस दिन रात सोने की नदियों के रूप में मनि बरसे। जब तक जिएँ, किसी बात को फिर न तरसें।”

९ लाख ९९ गायें सोने रूपे की सिगौरियों की, जड़ाऊ गहना पहने हुए, घुँघरू छमछमातियाँ महंतों को दान हुई और सात बरस का पैसा सारे राज को छोड़ दिया गया। बाईस सौ हाथी और छत्तीस सौ ऊँट रूपयों के तोड़े लादे हुए लुटा दिए। कोई उस भीड़भाड़ में दोनों राज का रहनेवाला ऐसा न रहा जिसको घोड़ा, जोड़ा, रूपयों का तोड़ा, जड़ाऊ कपड़ों के जोड़े न मिले हो। और मदनबान छुट दूल्हा दूल्हन के पास किसी का हियाव न था जो बिना बुलाये चली जाए। बिना बुलाए दौड़ी आए तो वही और हँसाए तो वही हँसाए। रानी केतकी के छेड़ने के लिए उनके कुँवर उदैभान को कुँवर क्योड़ा जी कहके पुकारती थी और ऐसी बातों को सौ सौ रूप से सँवारती थी।

दोहरा

घर बसा जिस रात उन्हीं का तब मदनबान उसी घड़ी।
कह गई दूल्हा दुल्हन से ऐसी सौ बातें कड़ी।।
जी लगाकर केवड़े से केतकी का जी खिला।
सच है इन दोनों जियों को अब किसी की क्या पड़ी।।
क्या न आई लाज कुछ अपने पराए की अजी।
थी अभी उस बात की ऐसी भला क्या हड़बड़ी।।
मुसकरा के तब दुल्हन ने अपने घूँघट से कहा।
मोगरा सा हो कोई खोले जो तेरी गुलछड़ी।।
जी में आता है तेरे होठों को मलवा लूँ अभी।
बल बें ऐं रंडी तेरे दाँतों की मिस्सी की घडी।।

बहुत दिनों पीछे कहीं रानी केतकी भी हिरनों की दहाडों में उदैभान उदैभान चिघाडती हुई आ निकली। एक ने एक को ताडकर पुकारा-अपनी तनी आँखें धो डालो। एक डबरे पर बैठकर दोनों की मुठभेड हुई। गले लग के ऐसी रोइयाँ जो पहाडों में कूक सी पड गई।

दोहरा
छा गई ठंडी साँस झाडों में।
पड गई कूक सी पहाडों में।
दोनों जनियाँ एक अच्छी सी छांव को ताडकर आ बैठियाँ और अपनी अपनी दोहराने लगीं। बातचीत रानी केतकी की मदनबान के साथ रानी केतकी ने अपनी बीती सब कही और मदनबान वही अगला झींकना झीका की और उनके माँ-बाप ने जो उनके लिये जोग साधा था, जो वियोग लिया था, सब कहा। जब यह सब कुछ हो चुकी, तब फिर हँसने लगी। रानी केतकी उसके हंसने पर रूककर कहने लगी-

दोहरा
हम नहीं हँसने से रूकते, जिसका जी चाहे हँसे।
हैं वही अपनी कहावत आ फँसे जी आ फँसे॥
अब तो सारा अपने पीछे झगडा झाँटा लग गया।
पाँव का क्या ढूँढती हाजी में काँटा लग गया॥

पर मदनबान से कुछ रानी केतकी के आँसू पुँछते चले। उन्ने यह बात कही-जो तुम कहीं ठहरो तो मैं तुम्हारे उन उजडे हुए माँ-बाप को ले आऊँ और उन्हीं से इस बात को ठहराऊँ। गोसाई महेंदर गिर जिसकी यह सब करतूत है, वह भी इन्हीं दोनों उजडे हुओं की मुट्ठी में हैं। अब भी जो मेरा कहा तुम्हारे ध्यान चढें, तो गए हुए दिन फिर सकते हैं। पर तुम्हारे कुछ भावे नहीं, हम क्या पडी बकती है। मैं इस पर बीडा उठाती हूँ। बहुत दिनों पीछे रानी केतकी ने इस पर अच्छा कहा और मदनबान को अपने माँ-बाप के पास भेजा और चिट्ठी अपने हाथों से लिख भेजी जो आपसे हो सके तो उस जोगी से ठहरा के आवें। मदनबान का महाराज और महारानी के पास फिर आना चितचाही बात सुनना मदनबान रानी केतकी को अकेला छोड कर राजा जगतपरकास और रानी कामलता जिस पहाड पर बैठी थीं, झट से आदेश करके आ खडी हुई और कहने लगी-लीजे आप राज कीजे, आपके घर नए सिर से बसा और अच्छे दिन आये। रानी केतकी का एक बाल भी बाँका नहीं हुआ। उन्हीं के हाथों की लिखी चिट्ठी लाई हूँ, आप पढ लीजिए। आगे जो जी चाहे सो कीजिए।

महाराज ने उस बधंबर में एक रोंगटा तोड कर आग पर रख के फूँक दिया। बात की बात में गोसाई महेंदर गिर आ पहुँचा और जो कुछ नया सर्वाग जोगी-जागिन का आया, आँखों देखा; सबको छाती लगाया और कहा- बघंबर इसीलिये तो मैं सौंप गया था कि जो तुम पर कुछ हो तो इसका एक बाल फूँक दीजियो। तुम्हारी यह गत हो गई। अब तक क्या कर रहे थे और किन नींदों में सोते थे? पर तुम क्या करो यह खिलाडी जो रूप चाहे सौ दिखावे, जो नाच चाहे सौ नचावे। भभूत लडकी को क्या देना था। हिरनी हिरन उदैभान और सूरजभान उसके बाप और लछमीबास उनकी माँ को मैंने किया था। फिर उन तीनों को जैसा का तैसा करना कोई बडी बात न थी। अच्छा, हुई सो हुई। अब उठ चलो, अपने राज पर विराजो और ब्याह को ठाट करो। अब तुम अपनी बेटी को समेटो, कुँवर उदैभान को मैंने अपना बेटा किया और उसको लेके मैं ब्याहने चढूँगा।

महाराज यह सुनते ही अपनी गद्दी पर आ बैठे और उसी घडी यह कह दिया सारी छतों और कोठों को गोटे से मढो और सोने और रूपे के सुनहरे सेहरे सब झाड पहाडों पर बाँध दो और पेडों में मोती की लडियाँ बाँध दो और कह दो, चालीस दिन रात तक जिस घर में नाच आठ पहर न रहेगा, उस घर वाले से मैं रूठा रहूँगा, और छ: महिने कोई चलने वाला कहीं न ठहरे। रात दिन चला जावे। इस हेर फेर में वह राज था। सब कहीं यही डौल था। जाना महाराज, महारानी और गुसाई महेंदर गिर का रानी केतकी के लिये फिर महाराज और महारानी और महेंदर गिर मदनबान के साथ जहाँ रानी केतकी चुपचाप सुन खींचे हुए बैठी हुई थी, चुप चुपाते वहाँ आन पहुँचे। गुरूजी ने रानी केतकी को अपने गोद में लेकर कुँवर उदैभान का चढावा दिया और कहा-तुम अपने माँ-बाप के साथ अपने घर सिधारो। अब मैं बेटे उदैभान को लिये हुए आता हूं। गुरूजी गोसाई जिनको दंडित है, सो तो वह सिधारते हैं। आगे जो होगी सो कहने में आवेंगी-यहाँ पर धूमधाम और फैलावा अब ध्यान कीजिये। महाराज जगतपरकास ने अपने सारे देश में कह दिया-यह पुकार दे जो यह न करेगा उसकी बुरी गत होवेगी। गाँव गाँव में अपने सामने छिपोले बना बना के सूहे कपडे उन पर लगा के मोट धनुष की और गोखरू, रूपहले सुनहरे की किरनें और डाँक टाँक टाँक रक्खो और जितने बड पीपल नए पुराने जहाँ जहाँ पर हों, उनके फूल के सेहरे बडे-बडे ऐसे जिसमें सिर से लगा पैदा तलक पहुँचे बाँधो।

चौतुक्का
पौदों ने रंगा के सूहे जोडे पहने।
सब पाँण में डालियों ने तोडे पहने।।
बूटे बूटे ने फूल फूल के गहने पहने।
जो बहुत न थे तो थोडे-थोडे पहने॥
जितने डहडहे और हरियावल फल पात थे, सब ने अपने हाथ में चहचही मेहंदी की रचावट के साथ जितनी सजावट में समा सके, कर लिये और जहाँ जहाँ नयी ब्याही ढुलहिनें नन्हीं नन्हीं फलियों की ओर सुहागिनें नई नई कलियों के जोडे पंखुडियों के पहने हुए थीं। सब ने अपनी गोद सुहाय और प्यार के फूल और फलों से भरी और तीन बरस का पैसा सारे उस राजा के राज भर में जो लोग दिया करते थे जिस ढण से हो सकता था खेती बारी करके, हल जोत के और कपडा लत्ता बेंचकर सो सब उनको छोड दिया और कहा जो अपने अपने घरों में बनाव की ठाट करें। और जितने राज भर में कुएँ थे, खँड सालों की खँडसालें उनमें उडेल गई और सारे बानों और पहाड तनियाँ में लाल पटों की झमझमाहट रातों को दिखाई देने लगी। और जितनी झीलें थीं उनमें कुसुम और टेसू और हरसिंगार पड गया और केसर भी थोडी थोडी घोले में आ गई।

रात पहेली : इरा का कहानी संग्रह

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रात की तनहाई और सिसकियाँ

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– ओंम प्रकाश नौटियाल
कुछ दिनों पूर्व कि बात है शंघाई शहर के सिंगची गाँव के पंचायती घर के एक कमरे में विद्वान सहित्यकार ली पिंग एक दिन ठहरने के लिये रूके । रात में उन्हें साथ के कमरे से किसी के सिसकने का स्वर सुनाई दिया । वह उठे और  हल्की मोमबत्ती की रोशनी में कराहने की आवाज का स्रोत ढूंढ़ने लगे ।बगल के कमरे में घुसते ही कराहने का स्वर तीव्र हो गया किंतु उन्हें कुछ दिखायी नहीं दिया । कुछ घबराते हुए काँपते स्वर में उन्होंने तेज आवाज में पूछा ,”कौन है यहाँ ,सामने क्यों नहीं आता ?” तभी  ऊँचे स्वर में आवाज आई, ” आप घबराइये नहीं । मैं यहाँ दरवाजे के सामने वाली खिड़की के दायीँ ओर वाले कोने में हूँ मेरा नाम कुंग ची कोरोना है । ईश्वर ने मुझे इतना छोटा बनाया है कि आप मुझे नहीं देख सकते पर मैं आपको देख सकता हूँ ।”
“ठीक है । क्या चाहते हो । रो क्यों रहे हो ?”
“पिंग जी , मैं वर्षों से इस कोने में पडा हूं ।मैं बहुत शक्तिशाली हूँ किंतु मुझे कोई नहीं पूछता। आज वर्षों बाद कोई यहाँ आपकी उपस्थिति का भान हुआ तो आप से अपना दर्द बाँटने का मन हुआ। और आँसुओं का दरिया उमड़ पड़ा । ” कुंग भर्राये गले से बोला ।”
” कुंग बेटा , तुम शायद आज की दुनियाँ से बेखबर हो । केवल गुण संपन्न होना ही काफी नहीं है -अपने गुण दुनियाँ के सामने पेश करने के हथकण्डों में भी शातिर होना चाहिए । हर फन का यही उसूल है । हमारे साहित्यिक जगत में भी चंदा, चाटुकारिता, भोज ,संपर्क आदि साहित्यिक योगदान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है तभी तो हमारे गाँव का चाँग लुई, जिसका साहित्यिक योगदान सरकार के लिये कुछ नारे लिखने तक सीमित रहा है, चीन के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार च्वान से सम्मानित हो गया । इसलिये बेटा ,केवल शक्तिशाली होकर कोने में पड़े रहने से तुम्हें कोई नहीं जानेगा । तुम्हें स्वयं को विश्व में प्रचारित करना होगा । “
” कैसे चाचा, बताइये न क्या करूं ?”
” तुम अब बिल्कुल चिंता मत करो। तुम भाग्यशाली हो कि मुझसे तुम्हारी मुलाकात हो गयी । तुम परसों मेरे साथ चलो मैं तुम्हें शंघाई ले जाऊँगा । वहाँ से चीन और सारे विश्व के द्वार तुम्हारे लिये अपनी शक्ति प्रदर्शन के लिये खुले होंगे ।” पिंग बोले ।
“जी बहुत अच्छा ।मैं तैय्यार हूं ।”
” पर सुनो।कुंग ची कोरोना जैसा लम्बा नाम सफलता में बाधक है । आज से तुम दुनियाँ के लिये केवल कोरोना हो । समझे ।”
दो दिन पश्चात ली पिंग ने कोरोना को शंघाई एयरपोर्ट पर छोड़ दिया ।
“कोरोना बेटे । यहाँ से तुम विश्व भ्रमण पर अपनी शक्ति दिखाने निकल जाओ ।”
“ठीक है चाचा । लेकिन एक बात सुनो। मैं नही चाहता कि मेरे विश्व प्रसिद्ध होने का श्रेय मेरे अतिरिक्त किसी और को मिले  । तुम्हारे माधयम से चीन  में तथा अन्य जगहों पर भी लोग मेरी शक्ति का लोहा मानेंगे पर मुझे दुःख है कि यह देखने के लिये और दुनियाँ को मेरी कहानी सुनाने के लिये तुम  अब जीवित नहीं बचोगे । “
और सचमुच ली पिंग की तीन दिन बाद मृत्यु हो गयी तथा उनके बताये हुए रास्ते पर चलकर शीघ्र ही दुनियाँ कोरोना की शक्ति के आगे नतमस्तक हो गयी । 
-ओंम प्रकाश नौटियाल ,बडौदा , मोबा. 9427345810
(सर्वाधिकार सुरक्षित )