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मदारीपुर जंक्शन:बालेन्‍दु द्विवेदी- समीक्षा: ओम निश्चल

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मदारीपुर जंक्शन:बालेन्‍दु द्विवेदी

व्यंग्यात्मक उपन्यासों की कड़ी में एक और सशक्त किस्सागोई:ओम निश्चल

कभी ‘राग दरबारी’  आया था तो लगा कि यह एक अलग सी दुनिया है। श्रीलाल शुक्‍ल ने ब्‍यूरोक्रेसी का हिस्‍सा होते हुए उसे लिखा और उसके लिए निंदित भी हुए पर जो यथार्थ उनके व्‍यंग्‍यविदग्‍ध विट से निकला, वह आज भी अटूट है; गांव-देहात के तमाम किरदार आज भी उसी गतानुगतिकता में सांस लेते हुए मिल जाएंगे। तब से कोई सतयुग तो आया नही है बल्‍कि घोर कलियुग का दौर है । इसलिए न भ्रष्‍टाचार पर लगाम लगी, न भाई भतीजावाद, न कदाचार पर , न कुर्सी के लिए दूसरों की जान लेने की जिद कम हुई। इसलिए आज भी देखिए तो हर जगह ‘राग दरबारी’ का राग चल रहा है। कहीं द्रुत-कहीं विलंबित । लगभग इसी नक्‍शेकदम पर चलने का साहस युवा कथाकार बालेन्‍दु द्विवेदी का उपन्‍यास ” मदारीपुर जंक्‍शन” करता है। मदारीपुर जंक्‍शन जो न गांव रहा न कस्‍बा बन पाया। जहां हर तरह के लोग हैं जुआरी, भंगेडी, गंजेड़ी, लंतरानीबाज, मुतफन्‍नी, ऐसे-ऐसे नरकट जीव कि सुबह भेंट हो जाए तो भोजन नसीब न हो।

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मदारीपुर पट्टियों में बँटा है। अठन्‍नी, चवन्‍नी और भुरकुस आदि पट्टियों में। यहां लोगों की आदत है हर अच्‍छे काम में एक दूसरे की टांग अड़ाना। लतखोर मिजाज और दैहिक शास्‍त्रार्थ में यहां के लोग पारंगत हैं। गांव है तो पास में ताल भी है जो जुआरियों का अड्डा है। पास ही मंदिर है जहां गांजा क्रांति के उदभावक पाए जाते हैं। एक बार इस मंदिर के पुजारी भालू बाबा  की ढीली लंगोट व नंगई देख कर औरतों ने पनही-औषधि से ऐसा उपचार किया कि फिर वे जीवन की मुख्‍य धारा में लौट नहीं पाए। याद आए काशीनाथ सिंह रचित ‘रेहन पर रग्‍घू’  के ठाकुर साहब जिनका हश्र कुछ ऐसा ही हुआ। हर उपन्‍यास की एक केंद्रीय समस्‍या होती है। जैसे हर काव्‍य का कोई न कोई प्रयोजन । हम सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ की ज़मीन पर ‘मैला आंचल’ पढ चुके हैं,  राजकृष्ण मिश्र का ‘दारुलसफा’ व ‘सचिवालय’ पढ़ चुके हैं, विभाजन की ज़मीन पर ‘आधा गांव’ पढ चुके हैं।  गांव और कस्‍बे जहां जहां सियासत के पांव पड़े हैं, ग्राम प्रधानी,ब्‍लाक प्रमुखी और विधायकी के चुनावों के बिगुल बजते ही हिंसा व जोड तोड शुरु हो जाती है। हर चुनाव में गांव रक्तरंजित पृष्ठभूमि में बदल जाते हैं। इसलिए कि परधानी में लाखों का बजट है, पैसा है, लूट है। सो मदारीपुर जंक्‍शन के भी केंद्र में परधानी का चुनाव है।

परधानी का चुनाव मुद्दा है तो अवधी कवि विजय बहादुर सिंह अक्‍खड़ याद हो आए –’कब तक बुद्धू बनके रहबै अब हमहूँ चतुर सयान होब। हमहूं अबकी परधान होब।’

एक कवि ने लिखा है, ‘नहर गांव भर की पानी परधान का।‘ सो इस गांव में भी भूतपूर्व प्रधान छेदी बाबू, वर्तमान प्रधान रमई, परधानी का ख्‍वाब लिये बैरागी बाबू, उनकी सहायता में लगे वैद जी, दलित वोट काटने में छेदी बाबू के खड़े किये चइता, केवटोले कें भगेलूराम, छेदी बाबू के भतीजे बिजई —सब अपनी अपनी जोड तोड में होते हैं। ऐसे वक्‍त गांव में जो रात रात भर जगहर होती है, दुरभिसंधियां चलती हैं, तरह तरह के मसल और कहावतें बांची जाती हैं वे पूरे गांव की सामाजिकी के छिन्‍न-भिन्‍न होते ताने बाने के रेशे-रेशे उधेडती चलती हैं। श्रीलाल शुक्‍ल ने ‘रागदरबारी’ में कहा था—‘यहां से भारतीय  देहात का महासागर शुरु होता है ।’ यह उसी देहात की बटलोई का एक चावल है।

कभी समाजशास्‍त्री पी सी जोशी ने कहा था कि ‘रागदरबारी’ या ‘मैला आंचल’ जैसे उपन्यासों को समाजशास्‍त्रीय अध्‍ययन के लिहाज से क्‍यों नही पढा जाना चाहिए?आजादी के मोहभंग से बहुत सारा लेखन उपजा है। ‘राग दरबारी’ भी,मैला आंचल भी,विभाजन के हालात पर केंद्रित ‘आधा गांव’ भी।बालेन्दु का मदारीपुर भी गंगोली गांव, शिवपालगंज या मेरीगंज से बहुत अलग नहीं है ।इसलिए यह कहा जा सकता है कि समाजशास्त्रीय अध्ययन के लिए मदारीपुर जंक्शन भी एक सहयोगी उपन्यास हो सकता है।

विमर्शों के लिहाज से देखें तो दलित विमर्श, स्‍त्री विमर्श दोनों मदारीपुर में  नजर आते हैं। एक सबाल्‍टर्न विमर्श भी है कि आज भी सवर्ण समाज की दुरभिसंधियां आसानी से दलितों को सत्‍ता नही सौंपना चाहतीं, लिहाजा वह उनके वोट किधर जाएं, कैसे कटें, इसके कुलाबे भिड़ाता रहता है। यहां परधानी के चुनाव में बुनियादी तौर से दो दल हैं एक छेदी बाबू का दूसरा बैरागी बाबू का। पर चुनाव के वोटों के समीकरण से दलित वर्ग का चइता भी परधानी का ख्‍वाब देखता है और भगेलू भी। पर दोनों छेदी और बैरागी के दांव के आगे चित हो जाते हैं। चइता को छेदी के भतीजे ने मार डाला तो बेटे पर बदलू शुकुल की लडकी को भगाने के आरोप में भगेलू को नीचा देखना पड़ा ।पर राह के रोड़े चइता व भगेलू के हट जाने पर भी परधानी की राह आसान नहीं। हरिजन टोले के लोग चइता की औरत मेघिया को चुनाव में खड़ा कर देते हैं । दलित चेतना की आंच सुलगने नहीं बल्‍कि दहकने लगती है जिसे सवर्ण जातियां बुझाने की जुगत में रहती हैं।— और संयोग देखिए कि वह दो वोट से चुनाव जीत जाती है। पर चइता की मौत की ही तरह उसका अंत भी बहुत ही दारुण होता है। लिहाजा जब जीत की घोषणा सुन कर पिछवाड़े पति की समाधि पर पहुंचती है पर  जीत कर भी हरिजन टोले के सौभाग्‍य और स्‍वाभिमानी पीढ़ी को देखने के लिए जिन्‍दा नही रहती। शायद आज का कठोर यथार्थ यही है।

कहना यह कि सत्‍ता की लड़ाई में दलितों की राह आज भी आसान नहीं।  वे आज भी सवर्णों की लड़ाई में यज्ञ का हविष्‍य ही बन रहे हैं।आज गांव किस हालात से गुजर रहे हैं,यह उपन्यास इसका जबर्दस्त जायज़ा लेता है। बालेन्‍दु द्विवेदी गंवई और कस्‍बाई बोली में पारंगत हैं। गांव के मुहावरे लोकोक्‍तियों सबमें उनकी जबर्दस्‍त पैठ है। चरित्र चित्रण का तो कहना ही क्‍या। पढ़ते हुए कहीं श्रीलाल शुक्‍ल याद आते हैं, कहीं ज्ञान चतुर्वेदी तो कहीं परसाई भी । कहावतें तो क्‍या ही उम्‍दा हैं :’घर मा भूंजी भांग नहीं ससुरारी देइहैं न्‍योता।’

कुल मिला कर दुरभिसंधियों में डूबे गांवों के रूपक के रुप में मदारीपुर जंक्‍शन इस अर्थ में याद किया जाने वाला उपन्‍यास है कि दलित चेतना को आज भी सवर्णवादी प्रवृत्‍तियों से ही हांका जा रहा है।सबाल्‍टर्न और वर्गीय चेतना भी आजादी के तीन थके हुए रंगों की तरह विवर्ण हो रही है। गांवों को सियासत ने बदला जरूर है पर गरीब दलित के आंसुओं की कोई कीमत नहीं।बालेन्‍दु द्विवेदी ने यहां लाचार आंसुओं को अपने भाल पर सहेजने की कोशिश बड़ी ही पटु भाषा में की है,इसमें संदेह नहीं।

[29/05, 16:38] Balendu Dwivedi: उपन्यास अंश


मंदिर के ठीक सामने एक गहरा तालाब स्थित था जिसके बारे में यह कहा जाता था कि यह इतना गहरा था कि इसमें सात हाथियों की ‘थाह’ भी न मिले.बहरहाल इसकी ख्याति दूसरे कारण से थी.किंवदंती थी कि एक बार कोई राजा,जो पुरानी और लगभग असाध्य कोढ़ का शिकार था,लड़ाई के मैदान से विजय प्राप्त कर वापस लौट रहा था.रास्ते में उसे पाख़ाना लगा.राजा ने पहले तो इसे अपने स्तर पर ही रोकने की कोशिश की;फिर बेसब्र होने पर अपने इस ‘दीर्घ और तीव्र आवेग’ के बारे में मंत्री आदि से मंत्रणा की.मंत्री ने राजा को सुझाया –

‘मान्यवर..!!आपकी धोती से बड़ी है आपकी इज्ज़त! और वह मुख़्तसर इसी धोती के संरक्षण में है.अगर एक बार वह प्रजा के बीच में खुल गई तो आपका और आपके राज्य का सारा वैभव जाता रहेगा.इसलिए सरकार! धोती भले ही ख़राब हो जाए पर उसे यूँ सरेआम खोलना युद्ध में पराजय स्वीकार करने जैसा और कदाचित उससे भी विनाशकारी सिद्ध होगा.’

राजा अपने मंत्री की बात पर अमल तो करना चाहता था,पर उसकी आंतें उसे निरंतर किसी नए विध्वंश की ओर धकेल रही थीं. जब तक राजा को मंत्री की बात समझ में आती,उसके पहले ही यह तालाब दिखाई पड़ा.राजा के पास अपने को हल्का करने के अलावा और कोई चारा नहीं था.मल-त्याग के बाद राजा ने जब पानी-छूने के लिए हाथ तालाब में डाले तो उसके हाथों की कोढ़ अचानक से सूखने लगी.राजा हतप्रभ रह गया.उसने झट अपने मंत्री को यह बात बताई और फिर खुश होकर,एक योगी साधक  को यहाँ की ज़मींदारी दे दी.बस यहीं से मदारीपुर के वैभव की शुरुआत मानी गई थी.

तहसील की खतौनी में दर्ज़ इन्द्राज़ के मुताबिक़ शिवमंदिर चवन्नी पट्टी की संपत्ति मानी जाती थी.इसलिए इस मंदिर-परिसर में लगे पेड़ों से टपकने वाले एक-एक आम से लेकर खर-पतवार बीनने आने वाली कन्याओं तक पर पहला अधिकार इसी पट्टी का बनता था.ऐसे तमाम अन्य अघोषित ‘प्रशासनिक अधिकार’ भी फिलहाल इसी पट्टी के पास सुरक्षित थे.मसलन पट्टी के युवा इस चीज़ की जानकारी प्राप्त में लगे रहते थे कि कौन सी कन्या ने सोलह बरस का आँकड़ा पार कर लिया है;कौन फिलहाल कौमार्य-भंगापेक्षिणी है;किसे अरहर की खेतों में उन्मुक्त अठखेलियाँ करने का शौक है;किसके गवने की तारीख़ नज़दीक आ गई है;कौन अभी-अभी अपने साजन के पास से लौटी है-आदि-आदि.’अज्ञात के प्रति जिज्ञासा’ रूपी इस शोध और संधान के मूल में अपने निजी भावनाओं की तृप्ति के साथ-साथ संभवत: विदा के कगार पर खड़े चवन्नी पट्टी के पुरुषों की अंतिम इच्छा के पूरे किये जाने का सद्प्रयास भी सम्मिलित था.


सड़क कहे जाने वाले इन मार्गों का एक अतिरिक्त लाभ यह भी था कि यदि इनसे होकर इलाके की किसी गर्भवती स्त्री को प्रसव हेतु अस्पताल ले जाया जाता तो वह अस्पताल पहुँचाने से पहले ही बच्चा जन देती थी.इस प्रकार ये सड़कें अघो षित तौर पर न केवल डॉक्टर-वार्डब्वाय- अस्पताल की सामूहिक जिम्मेदारी निभाती थीं बल्कि सरकारी मुलाज़िमों को ‘अनावश्यक के सिरदर्द’ से मुक्त रखने की कोशिश भी करती थीं.’संसार के आठवें आश्चर्य’ के रूप में घोषित होने की अपेक्षा लिए ये सड़कें फिलहाल सरकारी अभिलेखों में राजमार्ग का दर्ज़ा धारण किये हुए थीं और इस ऐतिहासिक राजमार्ग से होकर जब भारी सामानों से लदा हुआ कोई वाहन गुज़रता था तो मदारीपुर और आस-पास  के तमाम गाँवों  के निवासी उस वाहन के बोझ को हल्का करने का कोई अवसर नहीं चूकते थे.

एक बार ऐसा वाक़या हुआ बताते हैं कि एक रात को इस रास्ते से गुज़रते हुए काजू-किशमिश-बादाम से लदे एक ट्रक के पहियों ने थक-हारकर और आगे चलने में असमर्थ होकर,बीच-सड़क में अपने हाथ खड़े कर दिए.फिर क्या था! इलाके के लोगों ने इस स्वर्णिम अवसर का लाभ उठाने की नीयत से वाहन के ड्राइवर-क्लीनर के ऊपर सामूहिक हल्ला बोल दिया और इस आपसी-प्रतिस्पर्धा में लग गए कि कौन शख्स कम-से-कम समय में,ज्यादा-से-ज्यादा माल पार कर सकता है..!हालांकि अमावस की रात के घुप्प अँधेरे की वजह से इस प्रतिस्पर्धा के वास्तविक विजेताओं के सम्बन्ध में अंतिम निर्णय तो नहीं हो सका किन्तु इतना जरूर हुआ कि इलाके की मज़दूर और मेहनतकश कही जाने वाली महिलाओं ने अपने पतियों-बेटों के साथ मिलकर उनके इस पवित्र कर्म में जमकर हाथ बँटाया.कुछ महिलाओं ने तो बोरों और झोलों के अभाव में अंत:वस्त्र कहे जाने वाले अपने ‘पेटीकोट’ के मुँह को एक ओर से बंद कर तात्कालिक तौर पर न केवल झोलों का विकल्प प्रस्तुत किया बल्कि उसमें काजू-किशमिश-बादाम ठूँस-ठूँसकर और सिर पर लादकर अपने घर ले आयीं.इस अभूतपूर्व और अविस्मरणीय आंदोलन का क्रांतिकारी परिणाम यह हुआ कि इलाके के जिन घरों में अनाज के अभाव में कई दिनों तक चूल्हा तक नहीं जलता था;उन घरों के बच्चे अब आठों पहर काजू-किशमिश-बादाम का सेवन करने लगे और  इलाके की कुपोषण की समस्या रातों-रात उड़न-छू हो गई.यही नहीं,दिन भर कटोरे लेकर सड़कों पर घूमने वाले छोटे बच्चों से लेकर भीख माँगने वाले बूढ़े-महीनों तक अपने घर से नहीं निकले और चोरी की घटनाओं में भी गिरावट देखी गई.दरअसल कुछ ही समय के लिए ही सही,पूरे इलाके के कोलाहल भरे वातावरण में अचानक से ‘सम्पन्नता का छद्म सन्नाटा’ सा छा गया था.लोगों के इस छोटे से सद्प्रास का एक प्रभाव यह भी हुआ कि देखते-ही-देखते यह इलाका अब जिले के सबसे समृद्ध इलाके के रूप में गिना जाने लगा था और सबसे बढ़कर सरकार के मुलाजिमों ने हमेशा की तरह इस बार भी इस बदलाव को अपने दिन-रात के संघर्ष का परिणाम बताना नहीं छोड़ा.


डॉक्टर साहब अभी ऑपरेशन थियेटर में थे और संभवत: गाँव के ही  केवटोली के मोहन नामक किसी युवा मरीज़ के गंभीर ऑपरेशन में व्यस्त थे.ऑपरेशन थियेटर को बाहर से देखने पर यह अपने नाम को चिढ़ाता हुआ ही लगता था.दरअसल इसमें थियेटर जैसा कुछ भी न था.डॉक्टर साहब के कमरे के भीतर ही एक कोने में एक सरकारी चारपाई डाल दी गई थी और एक सफ़ेद चादर को बगल के दीवार की खिड़की के सहारे से एक आड़ का रूप दे दिया गया था.सफ़ेद कहे जाने वाले चादर पर खून के इतने धब्बे थे कि कई बार उसके रंगीन होने का भ्रम हो जाता था और फैली हुई चादर में इतने छेद थे कि यदि वह हटा भी दी जाती तो भी वस्तुस्थिति में कोई ख़ास अंतर नहीं आता! लेकिन इसे बनाए रखना भी एक प्रकार की पेशेगत-मजबूरी थी.

ऑपरेशन थियेटर के भीतर चार-पाँच मुस्टंड आदमी,मरीज़ के हाथ और पैरों को इस कदर कसकर पकडे हुए थे जैसे किसी ‘बलि के बकरे’ को हलाल करने के पहले पकड़ा जाता होगा.कायदे से वे सभी बेहोशी की दवा का मुकम्मल विकल्प प्रस्तुत कर रहे थे. ‘बेड’ कहे जाने वाले बिस्तर पर ‘मोहन’ नामक  मरीज़ लेटा हुआ था और निरंतर चिल्ला रहा था.इस क्रम में उन सभी मुस्टंडों के बाप-दादाओं का बारी-बारी से नाम लेता जाता था.साथ ही उनके साथ देशी गालियाँ अभिधान के रूप में जोड़ता जाता था और कई बार वह मुस्टंडों और उनके पुरखों के आपसी रिश्ते को भी गड्ड-मड्ड कर दे रहा था,जैसे-‘हरे सारे! सुकुलवा के दमाद..!’,’का रे फोफियाs..!’,’तोहरे महतारी केs..!’ आदि-आदि.पर मुस्टंडे भी जैसे इस प्रकार के  अवसरों के लिए अभ्यस्त थे और शायद सहनशीलता जैसे भावों को कब का आत्मसात कर चुके थे.इसलिए ज्यों ही मरीज़ कोई ऐसा उदगार व्यक्त करता था,सभी एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा देते थे.इस पर मरीज़ का तेवर और उच्चारण का स्वर और अधिक आक्रामक हो जाता.लगभग दस मिनट के रगड़-घस्स के बाद डॉक्टर साहब के द्वारा ऑपरेशन की सफलता की घोषणा की गई.मरीज़ चिल्ला-चिल्ला कर पस्त हो चुका था.अब जाकर उसने डॉक्टर की ओर थोड़ा संकोच की नज़र से देखा. डॉक्टर ने आँखों-ही-आँखों में उसे नीचे पड़े बाल्टी की ओर देखने को कहा, मानो कहना चाहते हों कि-‘मोहन बेटा..!जब थैले में ढाई पसर मवाद लेकर घूमोगे तो ऑपरेशन तो कराना ही पड़ेगा!फिर चाहे जितना चिल्लाओ..!!’

दंगों की व्यथा-कथा का मर्मस्पर्शी पाठ-प्रोमिला

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दंगों की व्यथा-कथा का मर्मस्पर्शी पाठ

पुस्तक-पिघले चेहरे (उपन्यास)
लेखक- सच्चिदानंद चतुर्वेदी
प्रकाशन-2018
प्रकाशक-अमन प्रकाशन,104A/80c,
रामबाग, कानपुर-208012
मूल्य-395

भारतीय राजनीति, धर्म और साम्प्रदायिकता का त्रिकोण ऐसा है जिसकी नाप-तोल सरल नहीं और ना ही खतरों से खाली है। ‘अधबुनी रस्सी-एक परीकथा’, और ‘मझधार’ के बाद सच्चिदानंद चतुर्वेदी का ‘पिघले चेहरे’ 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों पर लिखा गया नया उपन्यास है जो राजनीति और धर्म की आड़ में खेले जा रहे साम्प्रदायिकता के खेल की नब्ज की सही टटोल के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार, सिख हिस्ट्री और 1984 के घटनाक्रमों पर केंद्रित कई पुस्तकों के अध्ययन के पश्चात रचा गया है।( पुस्तकों की सूची लेखक ने आभार में ही दे दी है जो उपन्यास की शोधपरकता को प्रमाणित करते हुए इसे और अधिक मजबूत बनाती है।) संवेदनशील मन और वैचारिक दृष्टि का तालमेल इस उपन्यास में एक नई किस्सागोई रचता है। उपन्यास को पढ़ते समय पाठक को यह एहसास बना रहता है कि वह जिस कथा संसार में प्रवेश कर चुका है, वहां ग्रामीण और नगरीय जीवन के अनुभवों की एक गहरी बुनावट है और उस बुनावट की नींव में बिना किसी लाउडनेस के सत्ता समीकरणों की प्रश्नाकूल पड़ताल है। पर क्या यह उपन्यास केवल 1984 तक सीमित है? नहीं, इस समाज व्यवस्था में जब तक राजनीतिक स्वार्थ हैं, जब तक दंगें इन स्वार्थों की पूर्ति का ईंधन हैं, जब तक मनुष्य में पशुत्व है, तब तक यह उपन्यास सामयिक है। क्योंकि सामयिकता लेखक के दृष्टिकोण और घटना या समस्या को वैज्ञानिक  क्रम में खंगालने से जुड़ती है और यह उपन्यास तो अपने परिवेश में एक बड़ी सच्चाई को लेकर चलता है। लेखक कहता है, ‘दंगों के दौरान जो सिख मारे गए हैं, वे वास्तव में मारे नहीं गए हैं, वरन प्रजातंत्र द्वारा ठगे गए हैं, और अपने ही देशवासियों के विश्वासघात का शिकार हुए हैं।’ (पृ.105)

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इस उपन्यास में रचनाकार प्रजातांत्रिक व्यवस्था के राजनीतिक, धार्मिक,  प्रशासनिक, न्यायिक, सामाजिक, आर्थिक क्षेत्रों में व्याप्त विकृतियों और उनके दुष्परिणामों को ना केवल बखूबी रेखांकित करता है बल्कि पलटन बाबा, मास्टर रुद्रदेव, नन्दा  कौर आदि के विचारों एवं उनकी गतिविधियों के माध्यम से उन मानवीय मूल्यों को भी सहेजता है, जिससे मनुष्य में मनुष्य का विश्वास बना रहे। जाहिर है, इस विश्वास को कायम रखना आसान नहीं और तब तो और भी नहीं जब धर्म का नाम लेकर भड़काए दंगों में जीवन को बचाए रखना ही बड़ी चुनौती हो। लेकिन बावजूद इसके लेखक का विश्वास है कि आपसी सौहार्द और बंधुत्व-भाव, पक्के इरादे और अंतहीन संघर्ष ही मानवीय मूल्यों को बचाए रखने के उपादान बन सकते हैं।

कृपाचार्य बाजपेई, विधायक दुर्जन सिंह और आचार्य धर्माधिकारी जैसे चरित्रों के माध्यम से लेखक प्रजातांत्रिक व्यवस्था में व्याप्त अवसरवाद और राजनीति के अपराधीकरण तथा साम्प्रदायिकता की पूरी मानसिक प्रक्रिया पर खुलकर विचार करता है। इस व्यवस्था में  देवदत्त जैसे चरित्र का जुड़ जाना स्वभाविक है। ‘मुसलमान हिन्दुओं के दुश्मन होते हैं’ (पृ.21) वाली सोच से संचालित होकर बचपन में ही रहमान चाचा को मौत के घाट उतार देने वाला देवदत्त उपन्यास के अंत तक एक खलनायक के रूप में उभरता है। देवदत्त की बहन देवयानी का चरित्र स्त्री-स्थिति पर विचार करने को विवश करता है तो समाज में आदर के साथ देखे जाने वाले मास्टर लोगों के चरित्र का भंडाफोड़ ठाकुर जगमोहन और उसके आसपास बुने कथा प्रसंगों से होता है।

उपन्यास में लेखक 1984 के समाज और उसकी व्यवस्था के प्रायः सभी प्रमुख प्रश्नों से टकराता है। साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक मनोवृति के कुत्सित चरित्र तथा उसके प्रतिरोध को उभारने में पूरी सफलता पाता है। लेखक के मन, मस्तिष्क में एकदम स्पष्ट है कि साम्प्रदायिकता धार्मिक संकीर्णता के माध्यम से छुटभैए नेताओं से लेकर कांग्रेस जैसी पार्टियों के लिए एक राजनीतिक कार्यक्रम है और जटिल एवं कुटिल स्वार्थ पर आधारित स्पर्धा ने समय-समय पर साम्प्रदायिकता की आग में मनुष्य की गरिमा एवं अर्थवत्ता का गला घोटा है। इस घृणा ने प्रतिशोध, लूटपाट, दंगों और हत्या को जन्म दिया है। इसमें निहित ‘अन्य’ की वैचारिकी ने अचानक से पड़ोसियों के संबंधों तक हो अनुदार बनाया है। उपन्यास से एक बानगी प्रस्तुत है, “मास्टर साहब को देखकर ठाकुर साहब उत्साहित होकर बोल उठे-‘… आप तो चंडीगढ़ वालों के यहां बहुत दिनों से ट्यूशन पढ़ा रहे हैं, इसलिए उनके घर की कुछ अंदरूनी बातें भी जानते होंगे? उनके घर पर चढ़ाई करने में आप हमारे बड़े काम आ सकते हैं।… यह सब भिंडर वाले हैं, इनका कानपुर से सफाया होना बहुत ही जरूरी है।’” (पृ.98)

वास्तव में, उपन्यास के फलक का भौगोलिक विस्तार तो कन्नौज से लगभग 4 मील दूर गंगा नदी के दक्षिणी तट पर बसे एक बहुत छोटे से गांव बागसर से शुरू होकर कानपुर और शाहजहांपुर तक जाता है किंतु इसका वैचारिक भूगोल काफी विस्तृत और राष्ट्रीय है। पंजाब, दिल्ली, कानपुर, बोकारो आदि शहरों में हुई सिखों की हत्या और लूटपाट के प्रसंग इसके वैचारिक भूगोल के दायरे का विस्तार करते हैं। बागसर के एक निर्धन भक्त नामक ब्राह्मण के परिवार, विशेष रूप से उसके दो बच्चों देवदत्त और देवयानी के आसपास से निर्मित  हुई कथा का ताना-बाना इब्राहिम पट्टी के रहमान चाचा से होते हुए सुल्तानपुर निवासी, बकौल कृपाचार्य बाजपेई चमट्टा बभ्रुवाहन और देवयानी के पति लोमहर्ष से होते हुए मास्टर रुद्रदेव के बेटे सत्यदेव और नन्दा कौर के विवाह तक को समेटता है। पर कथा सूत्रों में ना तो कहीं कोई फांक है और ना ही टूटन। कथा को गुँथने में लेखक को अद्भुत सफलता मिली है।

इस उपन्यास में पठनीयता एक अंतर्धारा की तरह आद्योपांत व्याप्त है। ‘विपन्नता वैसे भी कभी किसी गांव में ऊपर छलकती दिखाई नहीं पड़ती, उसी प्रकार जैसे  घर का कवाड़ कभी बैठक में नहीं दिखाई पड़ता।’ (पृ.10) या ‘पर वे शायद यह भूल गए थे कि सपने केवल सपने होते हैं और एक हल्के से हवा के झोंके से मकड़ी के जाले की भांति टूट जाते हैं।’ (पृ.16) जैसे कलात्मक वाक्यों से होते हुए उपन्यास अपने अंतिम कथन- ‘सुना है कि तिलचट्टे लाखों साल जीवित रहते हैं। यदि वह सही है तो हमारे देश के प्रजातंत्र को अभी लाखों साल तक कोई खतरा नहीं है।’ में भीषण हो चुकी राजनीतिक सच्चाई से पर्दा उठता है। सही है कि धर्म, साम्प्रदायिकता, दंगे, हत्याएं, लूटपाट और आगजनी की राजनीति करने वाली पार्टियां आज हमारे राष्ट्रीय फलक पर ज्यादा प्रभावी हैं।

‘पिघले चेहरे’ के लेखक में चित्रण करने और सवाल उठाने की अद्भुत कला है। यूं तो पूरे उपन्यास में जहां-जहां दृश्यों, स्थितियों, दंगों षड्यंत्रों और तिकड़मों का चित्रण किया है, वे सभी स्थल ध्यान आकर्षित करते हैं लेकिन पाठक का विशेष ध्यान वहां जाता है जहां लेखक दंगे शुरू होने के बाद बागसर आने वाले रास्ते पर खड़े ट्रकों के सिख ड्राइवरों की सुरक्षा के लिए तत्पर गांव वालों के प्रसंग के संदर्भ में नगर और शहर का अंतर वर्णित करता है। वह लिखता है, ‘नगर लोगों की पीढ़ी के अलावा और कुछ नहीं होते। इंसानियत वहां मरुस्थल में जल की भांति सूख जाती है। वहां के अमीर और गरीब इंसान न रह कर, भावना-शून्य यंत्र बन जाते हैं, जो पदे-पदे भावनाएं रखने का ढोंग रचते हैं। नगर और गांव के गरीबों और उनकी गरीबी में कोई अंतर नहीं होता, अंतर होता है, उनकी पहचान का। नगर के गरीब देश की जनगणना के आंकड़े मात्र होते हैं, जिनकी कोई पहचान नहीं होती। लेकिन गांव के गरीबों की गरीबी अपने में स्वयं एक पहचान होती है। वह गांव भर का चाचा-ताऊ वगैरा होता है। इसीलिए नगर के पहचान खोए हुए  गरीब कुंठा और अवसाद में डूबकर, अपनी ही प्रजाति के लोगों को निगलने के लिए तत्पर हो जाते हैं। यही लोग राजनीतिक दलों के इशारे पर नाचते हैं।’ (पृ.111) निश्चित तौर पर यह अंतर ग्रामीणों की मानवीयता और नगर के लोगों में पसरी संवेदनहीनता के कारणों तथा परिणामों पर बड़ी टिप्पणी बनता है और इतनी तार्किकता के साथ आता है कि इसे लेखक का नॉस्टेलजिया कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार पृ. 104 पर आया अपराध और दंगे का अंतर लेखक की सूक्ष्म विश्लेषण शक्ति और सामाजिक बोध का परिचय देता है।

उपन्यास में देवयानी और नन्दा कौर समाज में स्त्री-स्थिति की प्रतीक बनकर उभरती हैं। ‘अबला तेरी यही कहानी’ की टेक पर जीवन जीती देवयानी कभी पिता की ‘चिट्ठी लिखना-पढ़ना भर सीख ले’ वाली आकांक्षा पूरी करने, कभी पति की लखपति बनने की प्रतिज्ञा पूर्ती में सहायता हेतु एल.एल. बी. के लिए लखनऊ जाने, कभी वकालत करने, कभी बार काउंसिल के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने, कभी नगरपालिका परिषद के अध्यक्ष पद का पर्चा भरने की अनगिनत (पति) इच्छाओं को पूरा करते-करते ‘रेस की घोड़ी’ बनी आखिरकार नर्वस ब्रेकडाउन का शिकार होकर, बिना इलाज अस्पताल में जिंदगी हार जाती है। आखिरी समय में ना भाई आगे आता है और ना पति। लोमहर्ष कहता है, ‘और इतने में तो एक नई घोड़ी खरीदी जा सकती है।… उसे खूंटे पर बांध कर चारा कौन खिलाएगा?’ (पृ.170) पलटन बाबा के कहने पर गांव वाले जरूर अपनी सामुदायिक संवेदना को समेटे पैसा जोड़ते हैं पर उसमें भी बहुत देर हो जाती है। निश्चित ही समय के सापेक्ष स्त्री के मनोभावों, उसके अंतर्द्वंद्वों, उसकी रोजमर्रा की  लड़ाइयों, स्त्री-मन में गहरे पैठे मूल्यों आदि को लेखक अत्यंत बारीकी से पकड़ता है। देवयानी से इतर वह नन्दा कौर को एक जुझारू चेतना संपन्न और आत्मनिर्भर स्त्री के रूप में दर्शाता है जो अपने निर्णय स्वयं लेती है और पूरे उपन्यास में साम्प्रदायिकता का प्रतिरोध रचती एक बड़ा वाक्य कहती है, ‘किसी भी धर्म या जाति के सभी लोग कभी बुरे नहीं होते।’ (पृ.159) नन्दा कौर का चरित्र स्त्री-विमर्श के उत्कृष्ट आदर्श को सामने रखता है। स्वतंत्र स्त्री की सही और खरी-खरी परिभाषा गढ़ता है।

 

कुल मिलाकर ‘पिघले चेहरे’ अपने ढब और रंग में विशेष है। शब्दों का चयन और प्रयोग अत्यंत मार्मिक बन पड़ा है। उपन्यास में वाक्य की संरचना ध्यान आकर्षित करती है, जैसे- ‘उसने अपनी रिहाई के लिए धन्यवाद दिया था भारतीय प्रजातंत्र को और उसकी न्याय व्यवस्था को जहां अंधे पीसते हैं और कुत्ते खाते हैं।’ (पृ.164) भाषा की अशुद्धियां इस उपन्यास में अवश्य खटकती हैं और कई बार पढ़ने का क्रम भी खंडित करती हैं पर लेखक की इस बात के लिए प्रशंसा की जानी चाहिए कि यह उपन्यास क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा?’ कहानी के साथ मजबूती से खड़ा दिखता है। 1984 के दंगे का वस्तुगत और ऐतिहासिक आधार प्रस्तुत करता है। बहुत से प्रश्न उठाता है पर कहीं भी मनुष्य और मनुष्यता में अपना विश्वास नहीं खोता।

प्रोमिला

असिस्टेंट प्रोफेसर,हिन्दी विभाग

अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय,

हैदराबाद-500605

मो.-8977961191

समीक्षा/ जिंदगी की जद्दोजहद और दुश्वारियों का आईना है उपन्यास ‘मैं शबाना’-फारूक आफरीदी

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समीक्षा/ जिंदगी की जद्दोजहद और दुश्वारियों का आईना है उपन्यास ‘’मैं शबाना’’

-फारूक आफरीदी

मुस्लिम परिवेश और उसमें भी महिलाओं की स्थिति को लेकर हिंदी उपन्यास यों तो पहले भी खूब लिखे जाते रहें हैं किन्तु युसूफ रईस का ताजा उपन्यास ‘’मैं शबाना’’ मुस्लिम औरत की जद्दोजहद भरी जिंदगी से सीधा रूबरू कराता है। यह रईस का पहला ही उपन्यास है लेकिन इसकी भाषा शैली, कथ्य और शिल्प से ऐसा नहीं लगता कि वह किसी स्तर पर कमजोर है।

शबाना इस उपन्यास का मुख्य किरदार है और सारी कथा इसके इर्दगिर्द ही घूमती दिखाई देती है।इसकी कथा को कुछ इस तरह बुना गया है जिसके जरिए मुस्लिम स्त्रियों के अधिकारों पर कुठाराघात, उनके प्रति समाज के गैर जिम्मेदार और उपेक्षापूर्ण रवैये और सामाजिक सोच को बखूबी समझा जा सकता है।उपन्यासकार ने इसे आज के तीन दशक पहले के हवाले से रचते हुए मौजूदा दौर तक ला खड़ा किया है।

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शबाना एक अच्छे खासे खाते-पीते जागीरदार परिवार की महिला है।उसकी तालीम और परवरिश भी उसी के अनुरूप हुई और व्यस्क होने पर एक बराबर के ही खानदान के नौजवान असलम से उसका निकाह हो जाता है । वह अपने होने वाले शौहर और उसके खानदान के बारे में पहले से कुछ नहीं जानती । शादी से पहले वह अपनी माँ से सवाल पूछती है- ‘’मैं जिस घर में जा रही हूँ, वहां के लोग कैसे हैं ? क्या मुझे ये जानने का हक़ नहीं था ? आपने मेरे हक़ में बेहतर ही किया होगा लेकिन मैं कोई बेजान खिलौना तो नहीं;जिसे आप सजा कर जिसे चाहें सौंप दें?’’ माँ जवाब देती है- ‘’ये औरतों की बदकिस्मती है कि वो अपनी जिंदगी का कोई फैसला नहीं कर सकती है।‘’ शबाना का शक सही निकलता है क्योंकि ससुराल पहुँचने पर उसे पता चलता है कि जिससे उसका निकाह हुआ वह शख्स किसी दूसरी लड़की से मोहब्बत करता है मगर उसकी मर्जी को तवज्जो देने का तो वहां कोई रिवाज ही नहीं था। सुहागरात के दिन से ही उसके और शबाना के बीच दांपत्य जीवन के वे तार नहीं जुड़े जिनकी दाम्पत्य जीवन की नींव में जरुरी दरकार होती है। इससे शबाना बिलख पडती है किन्तु उसने प्रण कर लिया है कि वह एक दिन असलम का दिल जीतने में कामयाब हो जाएगी।उसे अपनी फूफी जान की यह बात याद आ गई कि ‘’मर्द भले ही दिन भर काबू में ना आए लेकिन बिस्तर पर उसे शीशे में उतारा जा सकता है।’’ मगर उसे वह तरकीब मालूम ना थी। संयोगवश इन कोशिशों के बीच शबाना की माँ के दुर्घटना के हादसे ने दोनों को एक दूसरे के करीब लाने में मदद की जिससे दोनों में मोहब्बत के पुष्प पल्लवित होने लगे। माँ की दुर्घटना के दौरान ही शबाना को अपने और पराए के बीच के रिश्तों की पहचान होती है । घर में उसके मूक बधिर छोटे भाई जुबैर की देखभाल करने को लेकर चिंता और गहरी हो जाती है । एक भाई अपनी पढाई में मशगूल है ।ऐसे ही समय में शबाना अपने ससुराल की एक अजब कहानी से भी रूबरू होती है। असलम, उसके पिता और बड़े भाइयों में आपस में सदभाव का कोई रिश्ता ही नहीं है। सब अपने-अपने फायदों के लिए जी रहे हैं। सब एक बड़ी हवेली में तो जरूर रहते हैं लेकिन उनके दिलों में अप्रत्यक्ष दीवार खींची हुई है।किसी का भी एक दूसरे से सलाम दुआ के अलावा कोई वास्ता नहीं है। शबाना की चूंकि सास नहीं है इसलिए उसके ससुर ने ही बहुओं को रसोई की जिम्मेदारी बाँट रखी है और वे ही तमाम फैसलों के खुद मुख़्तार हैं। ऐसे में शबाना अपने ससुराल में ‘’उस गुलदान की तरह थी, जो घर के एक कोने में नुमाइश के लिए तो रखा जाता है, लेकिन उसमें कभी फूल नहीं सजाए जाते हैं।‘’

शबाना को अपनी जेठानी के जरिये यह बात मालूम होती है कि उसके सबसे बड़े जेठ जुल्फिकार चरित्र के मामले में हद दर्जे तक गिरे हुए एक गलीच किस्म के इन्सान हैं और अपनी ही साली तक को हवश का शिकार बना चुके हैं, जिसने बाद में आत्म हत्या कर ली और इसके बाद उनकी पत्नी उन्हें छोड़कर हमेशा-हमेशा के लिए उनकी जिंदगी से जा चुकी है। यह सुनकर शबाना बुरी तरह घबरा जाती है । वह जब दुल्हन बनकर हवेली में आई तभी से जुल्फिकार उस पर बुरी नज़र रखने लगे, लेकिन वह उससे बचने की हर चन्द कोशिश करती रही ताकि कोई अनहोनी ना हो जाए। सब कुछ पटरी पर चल रहा होता है और उसको पहला बच्चा भी हो जाता है किन्तु शबाना की किस्मत को कुछ और ही मंजूर था और एक दिन अचानक मौका पाकर जुल्फिकार अपनी अश्लील हरकत कर बैठता है ।शबाना इस घटना के बाद भीतर तक आहत हो जाती है । सौहर असलम ने जब यह किस्सा सुना तो वह अपने भाई की जलील हरकत पर इतना आग बबूला होता है कि काटो तो खून नहीं लेकिन शबाना उन्हें ऐसा कोई कदम उठाने से रोक लेती है जिससे उनकी रुसवाई हो। इस घटना के बाद जुल्फिकार घर से नदारद हो जाता है। इस स्थिति में दोनों अगले ही दिन हवेली छोड़ने का फैसला कर लेते हैं । अन्य व्यवस्था होने तक असलम अपनी पत्नी शबाना को उसके पिता के घर छोड़ आते हैं और किराये का घर तलाशने निकल पड़ते है। वे घर तलाश भी कर लेते हैं लेकिन वह इतना जर्जर होता है कि उसमें दाखिल होने से पहले ही छज्जे से गिरकर उनकी मौत हो जाती है। इस तरह शबाना पर यह दूसरा पहाड़ टूट पड़ता है। इसके बाद तो शबाना के लिए जैसे क़यामत ही आ गई।

उपन्यास की भाषा, शैली, कथ्य और शिल्प को लेकर कहा जा सकता है कि उपन्यासकार ने बहुत सावधानी बरती है। भाषा की रोचकता इतनी प्रभावी बन पड़ी है कि पाठक एक बार पढ़ना प्रारम्भ कर दे तो उसे बीच में छोड़ना नहीं चाहेगा। उपन्यास इस खूबी से भरा हुआ है कि पाठक की उत्सुकता निरंतर बनी रहती है कि उसमें आगे क्या होने वाला है। उपन्यास की एक विशेषता यह भी है कि वह अनुमान नहीं लगा सकता कि उसका अंत कैसे और कहाँ होगा अन्यथा कई फिल्मो को देखते हुए या उपन्यासों को पढ़ते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कहानी अब क्या मोड़ लेने वाली है। उपन्यास चूँकि मुस्लिम परिवेश से जुडा हुआ है तो स्वाभाविक है कि मुस्लिम समाज के रीति रिवाजों और संस्कारों से भी परिचित कराता है। इस उपन्यास में नायिका को लेकर कई मोड़ आते हैं जो उसकी त्रासदी से जुड़े हुए हैं। यह उपन्यास मूलतः नायिका के विषादों और आंसुओं की गाथा है जिसमें खुशियों के पल तो कभी कभार रेगिस्तान में बारिश की आंधी भरी बूंदों की तरह आते हैं।उपन्यास की नायिका के जीवन में दुखों के पहाड़ ही पहाड़ खड़े हैं। जीवन में कहीं यदि नदियाँ हैं भी तो वे भी एकदम सूखी हुई हैं । नायिका की बागडोर ऊपर वाले के हाथ में है और उसे संघर्षों से निरंतर जूझते हुए दरिया को पार करना है। कभी-कभी उसे किसी तिनके का सहारा भी मिल जाता है जिसकी वह कल्पना भी नहीं कर सकती।उसे अपनी अस्मिता को बचाए रखने के लिए पग-पग पर इम्तहान से गुजरना पड़ता है।उसके लिए ना कोई रिश्ते हैं ना नाते। जीवन में उसे शून्य बिंदु से आगे बढ़ना है और जीने के लिए खुद ही को नए रिश्ते गड़ने हैं। हर मोड़ पर उसे एक अंधी गली से गुजरते हुए अपनी मंजिल तलाश करनी है। उसे अपनी बदनसीब जिंदगी को नसीब में बदलने की आकांक्षा के साथ बिना थके एक तपते हुए रेगिस्तान में मीलों चलना और अपना बिना किसी मार्गदर्शक या सहारे के अपना गंतव्य तलाशना है। नायिका कई बार टूटती-बिखरती है। अपने वुजूद को मिटाकर समाज की दर-दर ठोकरें खाने और फिर संभलते रहना ही उसकी नियति है। उसे अपनी जिन्दगी से कोई प्यार या लगाव नहीं रह गया है अपितु वह अपने दो बच्चों के भविष्य को संवारने के यज्ञ में आहुति दे रही है। उसकी जीवटता और जिजीविषा ही उसे जिन्दा रखे हुए है। वह हारती नहीं है जबकि जिंदगी और समाज उसे पल-पल हराने की हौड़ में लगा हुआ है।जिंदगी के खौफनाक हादसे शायद उसका हर वक्त इम्तहान लेते रहते हैं किन्तु वह हर बार लडखडाती हुई उठ खड़ी होती है। उसने अपने सारे सुखों को एक गठरी में बांधकर मानो समंदर में फेंक दिया है।

‘’मैं शबाना’’ का एक दर्दनाक पहलू यह भी कि है जब पिता के चाहने पर अपनी विधवा पुत्री को वे अपनी जमीन जायदाद का एक चौथाई हिस्सा देना चाहते हैं तब सगा भाई कदीर और भाभी ताहा उसके दुश्मन बन जाते हैं और दबाव बनाकर उस दुखयारी बहन से अपना हक़ छोड़ देने के कागजातों पर दस्तखत करवाकर उसे घर से बेदखल तक कर देते हैं । अपने ससुराल हारी और धक्के खाने के बाद उसे अपने उस घर से भी निकाल दिया जाता है, जहाँ वह पैदा हुई,पली-बढ़ी हुई और ससुराल गई। इससे बड़ा सदमा एक औरत के लिए और क्या हो सकता है। यह सदमा भी उसने रोते बिलखते झेला लेकिन किसी को उसक हालत पर रत्ती भर तरस नहीं आया। अपने पिता और भैया भाभी के होते हुए भी उसे फिर एक अँधेरी गुफा की तरफ बढ़ना पड़ा जहाँ उसके सामने कोई राह नहीं थी। जिंदगी की उधेड़बुन में वह बिना कुछ सोचे समझे एक ट्रेन में चढ़ जाती है जिसमें हाथ की कारीगर कुछगरीब परिवार की देहाती महिलाएं सफ़र कर रही होती हैं । शबाना उन्हीं के बीच संवाद बनाकर अपनी जिंदगी की अगली राह चुनने लगती है।वह अपने सारे अरमानों को यादों की संदूक में कैद कर एक साधारण मजदूर बनकर उनके साथ रहने लगती है, जिसमें उन अनपढ़ और गंवाई महिलाओं का उसे भरपूर सहयोग मिलता है। यहीं उसे अकेले जीने का बड़ा हौसला मिलता है। यहीं उसे इस बेदर्द दुनिया से अपनी भाषा और शैली के साथ अपना जीवन जीने का सलीका मिलता है। अंतत वह एक स्लम बस्ती में अपना डेरा डाल कर अपने बच्चों की परवरिश करने लगती है।उसने यहाँ रहकर फिर पलटकर कभी अपनी पिछली जिंदगी की ओर नहीं झाँका। अभावों की जिंदगी को ही वह अपनी ताकत लेती है।

एक बार नायिका अपनी बेटी के गंभीर रूप से बीमार हो जाने पर उसका जीवन बचाने और इलाज के लिए अपने जीवन का सौदा तक करने को भी राजी हो जाती है, हालाँकि उसके साथ ऐसा वैसा हादसा नहीं होता है जिसकी कल्पना करना औरत लिए भयावह है। बावजूद इसके उसके द्वारा हाँ कहना ही उसकी जिंदगी का नासूर बन जाता है जिसकेके पश्चाताप की आग में जलते हुए वह अपनी जवान युवती के लिए मौत का फंदा बन जाती है। यह उसके जीवन की सबसे घातक और दर्दनाक और जीवन भर सालते रहने वाली घटना के रूप में सामने आती है जो उसके जीते जी अवसाद भरी है। यह ऐसी दुर्घटना है जो उसको हमेशा के लिए किसी अंधे कुए में धकेलने जैसी साबित होती है। नायिका ने अपने बच्चो के भविष्य को लेकर जिन अरमानों के साथ जिंदगी की लम्बी जंग लड़ी, बिटिया को पढाया-लिखाया और जवान किया उसके हाथ पीले नहीं कर सकी और हमेशा के लिए उसे खो दिया। जिंदगी भर जो औरत वह बड़े से बड़े और कड़े से कड़े इम्तहानों में पास होती रही वही अपने आखिरी इम्तहान में हार गई।

यह उपन्यास आज के समाज के नंगे सच को बयान करता है। इस नंगे सच से मुस्लिम समाज की अनेक शबानाएं ही नहीं बल्कि भारतीय समाज की अन्यानेक औरतें भी इन्हीं हादसों से गुजरती हैं। समाज भले ही आधुनिकता का दावा करे किन्तु औरतों के प्रति हमारी धारणाएँ आज भी बहुत अधिक नहीं बदली हैं। महिलाओं के हितों पर आज भी जबरदस्त कुठाराघात होता है जिसका खामियाजा उनके मासूम और बेकसूर बच्चों को भी भुगतान पड़ता है। हमारे सारे नियम भले ही महिला और बाल अधिकारों की वकालत करते हों, लेकिन उनको वास्तविक अधिकारों की प्राप्ति अभी भी दूर की कौड़ी है। समाज में बदलावों की गति अभी भी बहुत मंथर है।ऐसे में पीड़ित महिलाएं या तो अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेती हैं या नारकीय जीवन जीने को विवश हैं। पुरुष सत्तात्मक समाज का घिनौना चेहरा इस उपन्यास में साफ साफ नज़र आता है।

उपन्यासकार युसूफ रईस ने ‘’मैं शबाना’’ के जरिये समाज के रीति रिवाजों की बजाय मनुष्य के चेहरे के पीछे छिपे चेहरे को बेनकाब करने की कोशिश की है । इन अर्थों में यह उपन्यास झकझोर देने वाला है। यह उपन्यास इन मायनों में भी महत्वपूर्ण है कि इसमें कहानियों का कोई गुम्फन भर नहीं है बल्कि नायिका को केंद्र में रखकर आगे बढ़ता जाता है और समाज के ओछेपन, टुच्चेपन, स्वार्थ, अहंकार और हीनता की परत दर परत खोलता है। यह उपन्यास सम्पूर्ण समाज को निश्चय ही उद्वेलित करेगा और पाठक इसका ह्रदय से स्वागत करेंगे।

शबाना एक थकी हारी महिला के रूप में अपनी जिंदगी से निहत्थी रहकर अकेली लड़ाई लड़ती हुई प्रतीत होती है। ‘’मैं शबाना’’ जीवन से हारी हुई एक बेसहारा औरत उथल-पुथल और संघर्ष भरे जीवन की अमर गाथा है जो हारकर भी जीती है। उसकी हार समाज और व्यवस्था की हार नहीं बल्कि उस पर एक तमाचा है।यह एक यथार्थपरक उपन्यास है जो पाठक को बार-बार रुला देता है और यही इसकी एक बड़ी कामयाबी है। आज जब साम्प्रदायिकता को लेकर अनेक चुनौतियां हैं तब यह उपन्यास इसे ख़ारिज करता हुआ कहता है कि असली चुनौती, गरीबी, भूख हाशिये पर जा चुके परिवारों को संबल प्रदान करने की है जिन पर किसी का ध्यान नहीं जाता। सामाजिक समानता के ढोंग और इन्सान की घटिया सोच इसके लिए जिम्मेदार है। ये चुनोतियाँ महिलाओं की दशा को लेकर और भी भयावह हैं।

फारूक आफरीदी, बी-70/102, प्रगति पथ,बजाजनगर,

जयपुर-302015 mob : 94143 35772/ 92143 35772

ईमेल: faindia2015@gmail.com

farooqgandhi@gmail.com

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मैं शबाना : उपन्यास

संस्करण: 2018 पृष्ठ: 182 मूल्य 199 रु.

प्रकाशक ; नोशन प्रेस ओल्ड नंबर 38,

न्यू नंबर 6, मेक निकोलस रोड़, चेटपेट,

चैन्नई-600031

हिंदी कहानी संग्रह : आत्‍माएँ बोल सकती हैं (डॉ. ललित सिंह राजपुरोहित)-समीक्षक: सुश्री डेल्‍सी एलिजाबेथ

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पुस्‍तक समीक्षा

word image 1 कविता संग्रह प्रकाशित होने के बाद डॉ. ललितसिंह की दूसरी पुस्‍तक का नाम है ‘’आत्‍माएँ बोल सकती हैं।‘’ यह एक कहानी संग्रह है, पुस्‍तक के नाम से ऐसा लगता है जैसे ‘भूतहा दुनिया’ में ले जाने वाली कोई किताब। मगर, ऐसा नहीं है, इस पुस्‍तक में 14 कहानियों को समेटा गया है। कहानियॉं जो हमारे आसपास के संसार को बुनती है। डॉ. मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियों के चर्चित होने का मुख्‍य कारण था उनकी कहानियॉं तत्‍कालीन सामाजिक परिवेश से जुड़ी होती थीं और कहानियों के पात्र भी समाज के प्रतिबिंब होते थे। ‘’आत्‍माएँ बोल सकती हैं‘’ पुस्‍तक की सभी कहानियॉं आज के समय में समाज का आइना दिखाती हैं। इन कहानियों के पात्र वे लोग हैं जो हमारे आस-पास रहते हैं। पाठक, कहानियों के साथ अपना तादात्‍मय पाते हैं।

पुस्‍तक हाथ में आते ही सबसे पहले दिमाग में प्रश्‍न आया कि पुस्‍तक का नाम‘’आत्‍माएँ बोल सकती हैं‘’ क्‍यों रखा गया है? शायद पाठकों को आकर्षित करने लिए..! लेकिन सभी कहानियों को पढ़ने के बाद पता चलता है कि लेखक अपने पात्रों को एक आत्‍मा मानकर चलता है जो प्रत्‍येक कहानी में अपने अनुभवों को पाठकों के साथ साझा करती दिखायी पड़ती है। इसलिए पुस्‍तक का नाम ‘’आत्‍माएँ बोल सकती हैं‘’ सार्थक प्रतीत होता है।

हिंदी कहानी संग्रह ‘’आत्‍माएँ बोल सकती हैं‘’ की टैगलाइन बाहर की दुनिया देख, मन के भीतर उपजती नई कहानियाँ सो फीसदी सटीक है। समाज और आस-पास घटने वाली घटनाओं को केंद्र में रखकर रची गई कहानियों की विशेष बात यह है इनकी भाषा शैली सरल है जो सीधे पाठक के मन में उतरती है। लेखन में नई विधा का प्रयोग है, यह पाठक के स्‍वाद पर निर्भर करता है कि वे इस विधा को रुचिकर लेते हैं या अरुचिकर। ये कहानियाँ किसी एक पाठकवर्ग के लिए नहीं बल्‍कि यह हर उम्र के पाठकवर्ग के लिए रची गई हैं, जो पाठक नई कहानियाँ पढ़ना चाहते हैं और नई कहानियों की तलाश में हैं, उनके लिए यह पुस्‍तक उपयुक्‍त और बजट में भी है।

हिंदी कहानी संग्रह : आत्‍माएँ बोल सकती हैं

लेखक : डॉ. ललित सिंह राजपुरोहित

प्रकाशन : ब्लूरोज पब्लिशर्स, नई दिल्‍ली

कीमत : 149रु. पृष्‍ठ सं. 154

समीक्षक

सुश्री डेल्‍सी एलिजाबेथ

मलवली ग्राम, मैसूरु, कर्नाटक

(9071183980) 

तूने सबकुछ ही दिया है जिन्दगी : ग़ज़ल कविता सप्तक (साझा संग्रह)-समीक्षक :एम.एम. चन्द्रा

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तूने सबकुछ ही दिया है जिन्दगी : ग़ज़ल कविता सप्तक (साझा संग्रह)

समीक्षक :एम.एम. चन्द्रा


​नए रचनाकारों को लेकर हमेशा से ही छींटा-कसी , उठा-पटक का दौर चलता रहा है लेकिन सृजन की जमीन से जुड़ा रचनाकार समय के साथ हमेशा अपने  को परिष्कृत करता हुआ आगे बढ़ता है. जिसने अपने समय को नहीं पहचाना वह स्वयं  ही विदा हो जाता है  लेकिन जिनके रचनाएं अपने समय का प्रतिनिधित्व करती है. उनको हर युग में गया  याद किया जाता है.नवीन कविता ग़ज़ल सप्तक भी एक ऐसा ही संकलन है जो हमारे समय के  विभिन्न रचनाकारों को पाठक के सामने लाता है

 ‘पार्वती प्रकाशन’ इंदौर से प्रकाशित सप्तक सिरीज की पुस्तक कविता ग़ज़ल ( सप्तक )  भी मुझे एक प्रयोग से कम नहीं लगी जिसमें सामूहिक रचनाकर्म सामुहिक प्रकाशन. वैसे भी यह प्रयोग कोई नया तो नहीं है. लेकिन प्रकाशक ने भी एक प्रयोग किया है. नव रचनाकारों ने सप्तक में निर्भय  होकर सर्जनात्मक पहल करने का साहस करके, एक अलग पह्चान बनाने की सफल कोशिश की है.

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‘ ग़ज़ल-कविता सप्तक’ के प्रथम रचनाकार ‘श्रीश’ अपनी गजलों द्वारा मानवीय संवेदना में आई गिरावट का बारीकी से मुआयना करते हुए  मुकम्मल गजल कहते हैं. इसिलए किसी भी नए रचनाकारों को पढ़कर मुझे उत्साह मिलता है. साथ ही इस बात पर बल मिलता है कि नए रचनाकार बदलते समाज को देख रहे हैं और उन चुनौतियों को पाठक वर्ग के सामने ला रहे हैं.

मासूम बेगुनाहों के सीने पे गोलियां,

सुनकर के उनकी आह कैसे बेअसर हुए.

मृणालिनी घुले की गज़लें पाठकों को उजालों की तरफ इशारा करती हुई धुंध को साफ करके,  घने काले स्याह रंग को अपनी  गजलों से रोशन कर देती है.

जो किया अच्छा किया है जिन्दगी

तूने सबकुछ ही दिया है जिन्दगी ……

रातें तो हमारी भी हो रोशन

गर एक सितारा मिल जाये…………..

हो गयी है शाम चरागों को जलालो पहले

गीत बन जायेगा साजो जो मिला लो पहले ….

 राम कृष्ण श्रीवास्तव जी की कविताएँ सामाजिक सरोकार के ताने बाने में रची बसी छंद मुक्त कविताएँ हैं जो गैर  बराबरी  पर आधारित व्यवस्था को चुनौती ही नहीं देती बल्कि पाठको को सामाजिक सरोकार तक ले हुए भी  अपने कार्यभार को चिन्हित करती है. इनकी कवितायें वैचारिक दृष्टि से काफी उन्नत है जो पाठक को उद्वेलित करती है-

चलना है मुझे अपनी ही जमीन पर

जैसी भी हो ऊबड़ खाबड़ पथरीली

गड्ढे वाली …

अकेलापन खुद को खुद से ,

सिखाता है प्यार करना ———

भीड़ में खड़ा व्यक्ति भले ही भ्रम में रहे

सूरज फिर भी सूरज है

सबको जीवन देते हुए भी

वह कितना अकेला है

नितांत अकेला ……

और हो भी क्यों न

जो दूसरों के लिए जीते हैं

अपने लिए पाते हैं

सदैव अकेलापन …..

उमा गुप्त की कविताएँ परम्परावादी मूल्यों को तोड़ती हुई नई पीढ़ी का आवाहन करती है . अनंत आकाश में  खुली हवा जैसा अहसास कराती है कि  अपने पंख फैलाओ बिना डरे, दिन हो या रात विचरण करो , कठिनाइयों का सामना करो, ये दुनिया तुम्हारी है….

तुम शक्ति को  पहचानो अपनी,

जो उचित है आवश्यक है , सत्य है

बस वही है मात्र सहारा

फिर देखो होगा , आज तुम्हारा

और कल भी तुम्हारा

मनोज चौहान पिछले एक वर्ष से  मीडिया में अपनी जगह बनाए में कामयाब हुए है यह भी पिछले कई वर्षों से साहित्य समाज में हो रहे नये परिवर्तन का नतीजा है.जिससे नए रचनाकारों का उद्भव हुआ वरना हम कभी भी मनोज चौहान जैसे रचनाकारों से हमेशा अनजान रहते.

 मनोज चौहान की रचनाएं, व्यक्ति के अंतर्मन के द्वंद्व  को पाठक के सामने प्रस्तुत करती है. कविताएँ समय और व्यक्ति के द्वंद्व को उकेरती हुई  अपने से संवाद और संघर्ष करती है. अधिकतर रचनाएं  एक आदमी की आशा, निराशा, चुनौतियाँ, संवेदनाएं , उसका अलगाव, जैसी  तमाम अभिव्यक्तियों को पाठक तक पहुंचती है-

झनझनाहट के साथ

थम जाता है

फिर उफान

में लौट आता हूँ

पुनः

उसी जगह !

एक तरफ वंदना  सहाय के हायकू चुटीलापन, व्यंग्यनुमा और तीखापन लिए हुए तीन लाइना है, जो एक सम्पूर्ण कथन कह जाते हैं जो गागर में सागर भर देने जैसी कहावत को चरितार्थ करती है-

कैसे ये नेता

कुर्सी से करें वफा

देश से जफा.

वहीँ दूसरी तरफ डॉ. सोना सिंह गंभीर से गंभीर राजनीतिक, वैचारिक, सांस्कृतिक समस्या चिह्नित ही नहीं करती  बल्कि उन सब का समाधान भी खोजती है-

टोपी पर क्रांति से लिखने से

नहीं आयेगी क्रांति, उसके लिए

दुनिया बदलो

दुनिया बदलनी है तो खुद

पहले सोच को बदलो

 

हरिप्रिया की कविताएँ प्रेम की कविताएँ हैं . उन्होंने प्रेम के विभिन्न पक्षों , संबंधों , विसंगतियों, अहसास व्यक्त और अव्यक्त प्रेम की अभिव्यक्तियों का चित्रण बेबाकी से करती हैं. उनकी कविताएँ एक तरफ प्रेम का संदेश देती हैं, तो दूसरी तरफ जो प्रेम नहीं है, वे अभिव्यक्तियां भी पाठक के सामने आती हैं-

उनके नाम थे

प्रेमी… प्रेम आकाश … प्रेम सिंह.. प्रेमनाथ

प्रीति… स्नेहा… प्रेमा…

लेकिन वे अपने नाम के विपरीत

बाँट रहे थे नफरत

जहाँ ढूंढ़ा प्रेम वह वहाँ नहीं था

जब भीतर ढूंढ़ा उसे

 

 पुस्तक :गजल कविता सप्तक (साझा संग्रह )

संपादक :जितेन्द्र चौहान

प्रकाशक :पार्वती प्रकाशन, इंदौर

कीमत :100

 

 

लौटना है फिलवक्त जहाँ हूँ-अनिरुद्ध उमट

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C:\Users\admin\Desktop\10641249_747778581930238_5262565336712881072_n.jpgलौटना है फिलवक्त जहाँ हूँ

अनिरुद्ध उमट
ईमेल-anirudhumat1964@gmail.com

“कोई कवि यशः प्रार्थी कवि है या नहीं, इसे जाँचने की मेरे पास एक ही कसौटी है। यदि वह मुझ से कहता है कि मेरे पास कुछ महत्व की बातें है जिन्हें कहने के लिए मैं कविता करता हूँ, तो मुझे उसके कवित्व पर सन्देह हो जाता है। किन्तु यदि वह कहता है कि मैं तो शब्द का पीछा करता हूँ– शब्द पर कान लगाकर उसकी बात सुनने की कोशिश करता हूँ, तो मुझे यकीन हो जाता है कि हाँ, यह आदमी जरूर कवि बन सकता है।” 

-ऑडेन

किसी भी कला में आग्रह का अतिरेक अक्सर उस की सहज प्रकृति को भंग कर देता है. यह प्रकृति उस कला माध्यम के साथ के हमारे रिश्ते हमारी संलग्नता को प्रकट करती है. सृजन के क्षणों में अपनी बात को व्यक्त करने की तीव्रता के दबाव के चलते यह भी संयम आवश्यक होता है कि हम खुद उस माध्यम की ग्रहणशीलता और स्वायत्तता के प्रति भी विवेकवान रहें, उसके प्रति आवश्यक रूप से हम में सहज उदारता रहनी चाहिए. यह संतुलन ही कला और कलाकार के आपसी सम्बन्ध को वांछित रूप ग्रहण कर पाने में सबसे आवश्यक होता है. किसी कलाकार के सृजन में यह संतुलन कितना सध पाता है यह उसकी कृति से रूबरू होने पर प्रकट हो जाता है. अपने माध्यम के प्रति यह निष्ठा, धैर्य ही उस कलाकार को वयस्कता प्रदान करता है. ऐसी कला किसी भी समय में हमेशा अपनी अर्जित भूमि पर फलती रहती है. उसे किसी भी समय के बाहरी दबाव तब अपनी तात्कालिकता से प्रभावित नहीं कर सकते.

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कोई भी कलाकार कला के इस आंतरिक, सहजावस्था के प्रस्फूटन के क्षणों में अपनी अनुभूति को कितना स्थगित रख पाता है, कितना किसी अव्यक्त को व्यक्त हो पाने का अवकाश अपनी कला में उपलब्ध करा पाता है, उसका यह बोध ही उसकी रचना में समग्रता से भिन्न-भिन्न रूपों में छवि पाता है. जितनी ही यह छवि नैसर्गिक होती है उतनी ही आत्मीय उसकी अनुभूति भी. जो ह्मारे संवेदन को उसकी गहराई में अपनी प्राकृतिक अवस्था में अंगीकार करती है.

पारुल पुखराज के पहले कविता संग्रह ‘जहाँ होना लिखा है तुम्हारा’ को पढ़ते हुए उस अव्यक्त को भाषा में रूपायित होते हुए देखा जा सकता है. इसे पढ़ते हुए हमारे मन में मौन  की लय और लय का मौन व्यापने लगता है. शब्द यहाँ वाहक भी है वहन भी. वे कभी खुद कुछ कहते हैं कभी कहने को सुनने में लीन हो जाते हैं.

भाषा को पारुल की कविताओं में अपनी तरह से व्यापने का अवकाश मिलता है जो इस मंशा का अपनी नैसर्गिकता में स्वीकार है कि कहने से अधिक कहने को सुनना है. दिखाने से अधिक दृश्य को खुद दृश्य होते रहने की आकांक्षा में घटित होने देना है.

अपनी सृजनात्मकता में ये कविताएँ चीजों को उनकी स्थिति से उनके मूल से विछिन्न नहीं करती बल्कि जैसी वे हैं उसी में कुछ और हो जाने की संभावना की प्रतीक्षा करती है. वे इसमें अपनी ओर से जाहिर होता-सा कोई हस्तक्षेप नहीं करती बल्कि अपने हर तरह के जतन को वे संकोच में अप्रकट होते देने में अधिक सहज रहती है.

यह उनकी काव्य प्रतिभा का बहुत महत्वपूर्ण पक्ष है कि उनके यहाँ बाहर को भीतर पर और भीतर को बाहर के अतिरेक में हावी नहीं होने दिया गया है. उनका स्वर अपनी रचना में पृथक से नहीं बल्कि उसके होने में ही खुद को घुला देता है. ऐसा करने के लिए निश्चय ही कवि में अपनी अनुभूति, संवेदना और माध्यम के प्रति गहरी निष्ठा का भाव आवश्यक होता है जो पारुल के काव्य कर्म में बेहद संजीदगी से निभाया जाता है.

‘प्रतीक्षा’ एक शब्द है जो इन कविताओं में अदृश्य रहते हुए कई-कई रंगों, रूपों, ध्वनियों में प्रकट होता है. हर क्षण की स्वायत्तता में वह अपनी हर बार पृथक ही छटा में, नियति, विडंबना, कामना, स्वप्न, मौन में प्रवेश करता है. उस क्षण के उस बसाव में वह नितांत अछूता, प्रथम प्रस्फूटन में खुद को होने देता है. जीवन के इस नितांत भीतरी अनुभव को उसके अपने ही अँधेरे में सीढ़ी दर सीढ़ी उतरने का आश्वासन इस कवि के यहाँ मिलता है. इसलिए वह अपनी आदिम नैसर्गिकता में उन्मुक्त हो शब्दों में व शब्दों के आसपास के मौन और राग में घुलने लगता है. जहाँ वह नहीं भी दिखता प्रतीत होता है वहां भी वह सांस थामे, अपलक मंद धडकनों के आवागमन में बैठा होता है. यह इस संग्रह की काया का मुख्य गान है, स्वर है- जो गहराती शाम में उठते धुंए सा आकाश में विलीन होने लगता है. कोई है जो अज्ञात है मगर उसका होना इस भाषा के अदीखे किसी स्थल में इस गान के विलम्बन में किसी कनात सा तनता जाता है. इस गान के उठते-बहते प्रवाह में अजाने से स्थल पलके खोलने लगते हैं.

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किसके हाथ उठाते हैं कौर

कौन जीमता है

थाल से

अदृश्य

रसोई में

उमगती कंठ में

हिचकी

काँपता जल पात्र

 

वह अज्ञात है, अदृश्य है मगर वह है- प्रतीक्षा की देह लिए भिन्न-भिन्न रूपों, आवाजों में. प्रतीक्षा और अज्ञात एक जगह किसी एक क्षण में एक-दूजे में घुल जाते हैं और पृथक न रह एक देह में सांस लेने लगते हैं. यह देह में इस तरह एकल हो जीवन में उसका विचरना, रूप लेना, स्पर्श करना, सुनना, स्पन्दित होना, स्वप्न हो जाना, हिचकी में घुट जाना, बेसुध हो हर कुछ का अतिक्रमण कर जाना कला के ताल पर किसी बिसरे वृक्ष की छाया सा अपने सूने में भीगता-काँपता हमारे भीतर हमें पुकारता है. इस पुकार को खुद में महसूस करते हम देखते हैं कि उस एक क्षण में ही हम अपने स्व से कुछ संवाद कर पाए हैं. ऐसे संवाद को जो अक्सर पूरे जीवन में हमें अपने स्मरण में ही नहीं आता, न अपनी उपस्थिति में, न अपनी अनुपस्थिति में.

जाना है

जहाँ

हो रही मेरी प्रतीक्षा

लौटना है

फिलवक्त जहाँ हूँ

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मुक्त होना

मुक्त करना है

उस अज्ञात की सुध में

वह बावड़ी का अँधेरा भी थी कहीं

‘अवकाश’ और ‘मौन’ वे दो और शब्द हैं जो पारुल की कविताओं में बसने पर हमें अपने जगत में उतरने का अवसर देते हैं. एक-दूजे में अपनी सम्पूर्ण सत्ता में स्थिर रहते ये दो शब्द एक-दूजे में प्रविष्ट होते हैं और काव्य में उनका वह प्रकट रूप नितांत प्रथम घटित के अनुभव में हमारे भीतर उतरने लगता है. भीतर के उस समस्त जाने-पहचाने भूगोल पर उसकी छाया पसरने लगती है और इसी दरमियान उसकी आवाज वह नहीं रह जाती जो ऐन इस क्षण से पूर्व थी.

विरह जो है वह विरह ही नहीं. कुछ और भी है. क्या है वह, इसे कविता किसी सरलीकृत सुविधा में नहीं देखती, न ही सुझाती है बल्कि उसकी समस्त भीतरी संश्लिष्टता में खुद गुंथती, उलझती है. कंटीली झाड़ी में किसी परछाई सी. पारुल के काव्य में जो है वह वह नहीं है वह कुछ और होने की संभावना में, असमंजस में, ठिठकता-झिझकता, संशय में लिथड़ा अपने से बाहर कभी-कभी झाँकने का उपक्रम करता है. और कभी इस उपक्रम के विपरीत अतल में यूँ धंसने लगता है कि जो नहीं है वह नहीं ही नही कुछ और भी हो सकता है, संभावनाओ की चट्टानों को दरकाता खुद को विस्फोट होने देता सा.

निषिद्ध

हैं कुछ शब्द

जीवन में

जैसे कुछ

जगहें

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अंधी कोई

बावड़

जैसे

सिसकी अधूरी

सूना

आकाश

व्यक्त हो जिनमें तुम

जहाँ होना लिखा है तुम्हारा

कवि आलोचक रमेशचन्द्र शाह के शब्दों में, ‘जीने का आस्वाद ही नहीं जीने का सबब ढूँढने की बेकली से प्रेरित पारुल की कविताओं के बारे में कहना कठिन है, कि यहाँ राग की खींच ज्यादा प्रबल है, या कि विराग की? राग और विराग दोनों के मेल-अनमेल से ही अपना रूपाकार रचती और पाती हैं ये कविताएँ.’ अपने उपलब्ध अति आग्रही यथार्थ और समय के मध्य स्थित कवि के भीतर कोई गहरी सांस्कृतिक समृद्धि की ठोस भूमि है जो उसे तुमुल कोलाहल या अतिरेक से बचाए मन की बात में अवस्थित रहने देती है. अपनी भाषा के वैविध्यपूर्ण अतीत और उसके गहरे संस्कार उसे विचलित होने से बचाए रखते हैं. किसी भी तरह की चकाचौंध से अविचलित यह काव्य अपनी जड़ों की गहराई और वहाँ से ग्रहण किए जाते जीवन रस से विकसित होता है. उसके यहाँ जीवन अपनी सघनता और सतत नैरन्तर्य में सूक्ष्मता से अनुभव की प्रगाढ़ता को ग्रहण करता है. उसके संशय, उसके आश्चर्य, उसकी स्तब्धता उसके काव्य की प्राण शक्ति है. यह हर दृश्य से तादात्म्य हो जाने की बजाय दृष्टा भाव में प्रतिष्ठित होते जाना किसी योगी की चरम सिद्धि से पृथक नहीं.

प्रीत करेगा

छुएगा नहीं

उदासी

निःशब्द

गुजर जाएगा

एकांत से

बिना फेंके

अपनी आवाज का

कंकर

मौन में

तुम्हारे

खिलाता है परिचय

अपने ही अपरिचित मन से

मौन

कहीं जोग है

कहीं तप

कहीं

रास साधक का

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रचा कुछ भी जा सकता है

आत्माओं के मौन में

अनुभव को उसकी शाब्दिक देह से बाहर ले आ उसे उसकी निरावरण दैहिकता में कुछ क्षणों के लिए अवाक होने देना और खुद ही की देह को स्पर्श कर पाने का निसंकोच धरातल दे पाना किसी भी रचनाकर्म की दीर्घ यात्रा के बाद का ही पड़ाव या विराम स्थल होता है. एक ऐसी यात्रा जिसमें आप यात्री नहीं खुद यात्रा होने में घटित होने लगें. वहाँ सब कुछ होता है, किन्तु सब कुछ न होने की भी नियति में खुद को विलीन होते स्वीकारता वह अपनी मंथरता में प्रगाढ़ प्रवाह की देह लिए किसी चरम बिंदु में अंततः समाहित हो जाता है.

जीवन के हाहाकार में आवाज के बियाबान में पारुल की कविता में कोई दाना दाना पाप चुगता है.जहाँ ‘पुकार’ अपने होने बल खाती देखती है कि-

खोजना

याद करना है

याद करने पर

याद करने की आवाज

नही होती

एक ऐसी बंजर नींद इन कविताओं अपनी जाग में विकल है जिसमें कोई एक भी ऐसा स्वप्न नहीं जिस पर जीवन का दाँव खेला जा सके, जहाँ ‘दुःख/क्षण भर भी/ हरा रहता नहीं’. पारुल की कविताओं में शब्द आते हैं पर ऐन किसी क्षण अपने आने को स्थगित करते लगभग विस्मृत हो चुके स्थल की चुप्पी को अपने स्वर में उभरने का अवसर देते हैं. इन कविताओं में ‘कोरी रह गई डूब’ का अहसास अपने घने एकांत में हरा होने लगता है. उनकी कविता बुदबुदाती है कि, ‘ढांप पलकें / सदियों की जाग पर / हरा एकांत / मेरा / और हरे.’ जिसमें ‘खुलते संकोच के धागों में / आहिस्ता-आहिस्ता / आवाज की गिरह भी ढीली पड़ती है’. उनकी कविता के व्योम में ये पंक्तियाँ गूंजने लगती है-

नदी की धार पर विशाल बजरा

तन उसका

मध्य रात्रि

जिसके पाल खुल कर हवा में सरगोशी कर रहे थे

उस

बेला

 

…….

…….

उस अज्ञात की सुध में

वह बावड़ी का अँधेरा भी थी कहीं

अपने होने की विकलता और उसका अवगुंठन कला में किसी आजीवन प्रतीक्षित क्षण में अपना स्वर, रूप ग्रहण करने की तरलता महसूस करने लगता है. ‘उस बेला वह कुछ भी हो सकती थी’ सरीखी पंक्ति लिखने में, न लिखने में अपना आप खुद लिखती है. इन कविताओं में जहाँ, जिसका, ‘होना’ लिखा है की नियति को अपने निर्जन और अतल में विकसने का अवकाश उपलब्ध है. वे प्रार्थना करती हैं कि, ‘हे प्रभु / विचरने दो इच्छा के देवालय में / निर्भय उसे.’ कामना, स्वप्न, राग, स्मृति के छोर यहाँ एक बिंदु पर उस देह का भेद मिटाते एक दूजे में घुल जाते हैं.

पीठ पर लिए कब से चल रहा कोई

अथक

किसी का स्वप्न

समापन बिंदु किए अदेखा निरंतर

१०

गतिमान

पृथ्वी के अंतिम छोर तक

सुर साधे

शिथिल पाँव

निश्चित है उसकी अनूठी यात्रा

पीठ पर जिसकी किसी अन्य के स्वप्न का भार

यह ‘पीठ’ किसी और की नही खुद कला ही वह रूप है. जो कलाकार के सुर साधने पर वांछित रूप में रूपायित हो जाती है. हिंदी कविता में ऐसा बहुत कम देखने में आता है जहाँ खुद कवि के पास कहने, जताने के अपने आग्रह के आधिक्य में यह स्मरण कहीं पीछे छूट जाता है कि खुद भाषा के समीप मौन बैठना भी स्वयं में एक पूर्ण अनुभव होता है. ऐसे ही अनुभव के क्षण हेतु कवि-आलोचक नन्दकिशोर आचार्य का कथन याद आता है कि. ‘कविता मूलतः संवेदनात्मक या अनुभूत्यात्मक अन्वेषण होती है…कविता की सार्थकता किसी विचार में घटा दिए जाने में नहीं, बल्कि अपने ग्रहीता को चेतना की उस भूमि पर लाने में है, जिसमें कोई भी अनुभूति स्वयं ही अपना अर्थ होती है.’

पारुल पुखराज का यह संग्रह अत्यंत वाचाल, राजनीतिक आग्रहों के घटाटोप में रचनात्मकता के प्रति स्वयं के होने को समर्पित होने में सार्थकता तलाशता एक संकोची कदम है. जोसेफ ब्रोड्स्की ने कभी कहा था कि ‘स्मृति विस्मृति की संगिनी है’. ये कविताएँ उस संगीनी के संग छाया-सी चलती हैं और किसी मध्य के सेतु को तलाशती है जिस पर से गुजरते उसे सदियों से जब्त रूदन का बे-आवाज फूटना दिखता है. अक्सर कला में कहने का आग्रह अपने निराग्रही रूप से अपरिचित रह जाता है. इन कविताओं का ‘कहना’ अगर कुछ ‘कहता-सा दिखता है’ तो पाठ के समय व उसके पश्चात के दीर्घ स्मरण में वह दिखना भी रचनाकार की विवशता जान पड़ता है, शब्दों और कवि के साथ ये अजीब नियति-

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यातना होती है कि वे कहने के लिए बने होते हैं पर अक्सर वे अपने इस होने का भार त्यागना चाहते हैं. पारुल की कविताओं में यह महसूस होता है कि जैसे कहना भी कोई विवशता है, यदि कवि के राग में ऐसा कोई ईश्वरीय क्षण संभव होता हो जहाँ इसे भी न कहा जा सके तो वे उतना भी न प्रकट करें.

समीक्षक पता: माजी सा की बाड़ी,

राजकीय मुद्रणालय के समीप,

बीकानेर ३३४००१

कविता संग्रह- ‘जहाँ होना लिखा है तुम्हारा’

लेखक- पारुल पुखराज

प्रकाशक- सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर

वर्ष- २०१५

मूल्य – १५० रुपये

 

 

 

 

नाच्यो बहुत गोपाल-अनुराग कुमार पाण्डेय

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नाच्यो बहुत गोपाल

अनुराग कुमार पाण्डेय
पी-एच.डी. समाजशास्त्र
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी

‘नाच्यो बहुत गोपाल’ साहित्यकार अमृतलाल नागर द्वारा लिखित उपन्यास है। इसे राजपाल एंड सन्स, दिल्ली द्वारा सन् 2010 में प्रकाशित किया गया है। इसमें एक मेहतर (अछूत जाति) या ब्राह्मणी के मेहतर बनने के जीवन की सम्पूर्ण कथा को चित्रित किया गया है। इसमें समाज के संरचनागत ढांचे से सामाजिक-आर्थिक-मनोवैज्ञानिक और न-जाने कितने पक्षों में मिले यातनाओं व उपेक्षाओं का वर्णन किया गया है। अमृतलाल नागर के इस उपन्यास को पढ़ने से निःसन्देह यह कहा जा सकता है कि वे साहित्य जगत के मूर्धन्य व यशस्वी साहित्यकारों में से एक हैं। उनकी लेखन शैली इतनी प्रभावी है मानो लगता है कि यह पूरा घटनाक्रम आँखों के सामने ही घटित हो रहा हो। अमृतलाल नागर के अन्य उपन्यास भी अपने-आप में एक अनूठी लिए हुये हैं। ‘बूँद और समुद्र’, ‘अमृत और विष’, ‘मानस का हंस’ तथा ‘खंजन नयन’ ने उन्हें हिन्दी-साहित्य जगत का महत्वपूर्ण स्तम्भ बना दिया।

इस उपन्यास की रूप-रेखा तैयार होने में ढाई से तीन सालों का समय लग गया। इसमें उन्होने उपन्यास लिखने की प्रेरणा के बारे में भी लिखा है। उन्होने एक कथा सुनी थी कि एक धनी ब्राह्मण की पत्नी एक मेहतर युवक के साथ भाग गयी थी और वह अपने साथ काफी सारे गहने-जेवरात भी लेकर भागी थी। दो दिन बाद ही वह अपने प्रेमी सहित पकड़ी भी गयी थी। इस संबंध में उपन्यासकार को कोई अन्य जानकारी प्राप्त न हो सकी और उसकी जिज्ञासा व कल्पना इस उपन्यास के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत हुई। इसके लिए अमृतलाल नागर ने कई मेहतरों के इंटरव्यू भी लिए और इसमें उनके प्रति आभार भी प्रकट किया गया है।

यूं तो ये कहानी निर्गुण की है, उसकी संवेदनाओं की है, उसके यातनाओं की है जो की उसके महिला मात्र होने पर अमानवीय अत्याचारों को बखूबी बयान करती है पर साथ ही साथ एक और पक्ष भी रहता है जो कि जाति और उसके संस्तरण से संबन्धित है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी संस्तरण के आधार पर नायिका के जीवन में बदलाव लगातार होते रहे और उसकी प्रस्थिति भी समाज में परिवर्तित होती रही। वह कैसे ब्राह्मण से मेहतर तक के सफर को तय करती है और उसके इस सफर के दौरान यह खोखली जाति व्यवस्था भी अपने रूप को बदलते रहती है।

यह कहानी कई खण्डों में चलती रहती है। कभी साहित्यकार और निर्गुण के संवाद तो कभी निर्गुण के अतीत के जीवन से संबन्धित संवाद चलते रहते हैं। साहित्यकार की लेखन शैली के प्रवाह ने इन किरदारों व उनके भाव-आवेश को जीवंत कर देने सा प्रयास किया है। इस कहानी के मूल में है निर्गुण जो की एक ब्राह्मणी हैं। निर्गुण का जन्म संवत् 1962 में एक ऊंचे ब्राह्मण कुल में हुआ था। निर्गुण का पालन-पोषण उनके नाना-नानी के यहाँ हुआ। नाना-नानी के गुजर जाने के बाद निर्गुण के पिता उसे अपने साथ हवेली ले गए जहां वे मालकिन के रखैल थे। यहीं से निर्गुण के जीवन के उतार-चढ़ाव का सिलसिला जारी होता है। उस हवेली का माहौल बहुत गंदा था वहाँ रहने वाले सभी अपने-अपने स्तर पर अश्लीलता में लिप्त रहते थे। इस अश्लीलता ने निर्गुण को भी अपने आगोश में ले लिया। उसका जीवन एक पहेली बन चुका था जिसे सुलझाने के लिए तो सभी तैयार थे लिकिन वे उसे और भी उलझा ही जाते थे, चाहे वह अम्मां (हवेली की मालकिन) हों या नौकर खड़गबहादुर हो या बबुआ सरकार हों या मास्टर बसन्तलाल हों। सभी ने उसके साथ अपने-अपने स्वार्थ साध रखे थे। इनमें से बसन्तलाल मास्टर ही एक ऐसा किरदार था जो कि उसके प्रति कुछ सचेत था पर आगे चलकर वह भी पतित ही हो गया। इसी बीच वह बबुआ सरकार से गर्भवती होती है और उसके गर्भ को नष्ट किया जाता है। बबुआ सरकार के साथ प्रेम-प्रसंग में निकटता देखकर मालकिन ने उसका विवाह 75 साल के बूढ़े मसुरियादिन ब्राह्मण से करा दिया। वह निर्गुण को चारदीवारी में कैद रखता था और बूढ़े हो जाने के कारण निर्गुण की यौन-इच्छाओं को तृप्त भी करने में असंतुष्ट था। एक मेहतरानी आती थी जो मल-मूत्र साफ करती थी और उसी से निर्गुण बात किया करती थी। निर्गुण और बाहरी समाज के बीच वह एक माध्यम के रूप में थी। फिर मेहतरानी के छुट्टी पर जाने के एवज में उसका बेटा मोहन घर साफ-सफाई के लिए आने लगा। जिसे देखकर निर्गुण का यौवन जाग उठा। उसने जात-पात के बंधनों को तोड़ दिया और उसके साथ भाग गई। मोहन की माँ के दुत्कार देने के बाद वे मोहन के मामा-मामी के पास गए। वहाँ उसके मामा ने तो किसी तरह उसे स्वीकार लिया पर मामी के मन में उसके प्रति द्वेष की भावना सदा ही बनी रही। उससे जितना बन सका उसने निर्गुण (जो अब निरगुनिया बन चुकी थी) को सताया, कष्ट दिये, उत्पीड़न किए। शुरू-शुरू में तो मोहन ने भी मामी का साथ दिया और उसके कुकृत्यों में बराबर का भागी बना रहा। बाद में उसने इसका विरोध किया और अपनी मामी को खरी-खोटी भी सुनाई। निरगुनिया के मस्तिष्क में एक अलग ही द्वंद चल रहा था ब्राह्मणी और मेहतरानी का। वह मोहन के साथ रहकर मेहतरानी तो बन चुकी थी पर अन्तर्मन से अभी भी ब्राह्मणी ही थी। पर कब तक? लेखक के पुछने पर निरगुनिया बोलती हैं “मार से भूत भाग जाता है। फिर मन के ब्राह्मणपन की भला क्या विसात?” (नागर, 2010, 89)

मोहना कप्तान जैक्सन के बैंड में काम करता था और दोनों का संबंध भी घनिष्ठ था। बैंड में एक नया लड़का आता है-माशूक हुसैन। जो पहले वहीदा डाकू के गिरोह में था। वह एक भरे पूरे बदन का आकर्षक लड़का था। जैक्सन ने हुसैन को ईसाई बनाया और उसे नया नाम दिया डेविड। डेविड के प्रति जैक्सन को अपार प्रेम था परंतु यह प्रेम मोहना से उसके संबंध को भेद नहीं पाया। यद्यपि इसका प्रयास तो डेविड ने बहुत किया। जैक्सन ईसाई बनाने का काम भी किया करता था और उसने मोहना और उसकी बीवी (निरगुनिया) को भी यह सलाह दी। निरगुनिया इसके बिलकुल खिलाफ थी। वह तो वैसे भी किसी जात कि नहीं बची (ब्राह्मणी, नौकरानी, ठाकुरानी, मेहतरानी) तो धर्म परिवर्तन का आखिर क्या प्रयोजन। निरगुनिया के निवेदन पर मोहना जैक्सन से बैंड खरीदना चाहता है। तभी वहीदा डाकू मोहना से मिलता है और उसे बताता है कि माशूक ने उसके एक बेशकीमती हार की चोरी की है और उसे लेकर भाग गया है। तुम्हें यह पता लगाना है कि वह हार कहाँ है? मोहन ने वही किया और वहीदा को बताया की हार जैक्सन के घर में है। वहीदा डाकू वहां आता और जैक्सन को मार देता है और हार की खोज-बिन में लग जाता है। मोहना डेविड को मार-मार कर हार का पता लगता है और हार को वहीदा डाकू को सौप देता है। इसी बीच डेविड को मरा हुआ देखकर मोहना हड़बड़ा जाता है। वहीदा डाकू जाते-जाते मोहना को भी अपने साथ लिए जाता है। वहां पुलिस आती है। बसन्तलाल, जो अब दरोगा बन चुका है, निरगुनिया को पहचान लेता है और उसे थाने ले जाता है। दरोगा बसन्तलाल, निरगुनिया के गहने-जेवर ले लेता है और उसके साथ छेड़खानी करता है। निरगुनिया उससे मींठी-मींठी बातें करके वह से बच के निकल जाती है और बीमार होने के कारण सड़क पर ही कहीं बेहोश होकर गिर जाती है। मसीताराम, जो कि मोहन का नातेदारी में चाचा लगता है, उसे उठाकर अपने घर ले जाता है। निरगुनिया का इलाज करवाने के बाद वह 3-4 दिन में स्वस्थ्य हो गई। मसीताराम के साथ उसकी दोस्त गुल्लन चाची भी वही रहती थी और उसने भी निरगुनिया के इलाज में मदद की थी। निरगुनिया वहीं रहने लगी और कुछ महीने बाद पता चला कि मोहना डाकू बन गया है। उधर बसन्तलाल दरोगा, निरगुनिया को परेशान किया करता था। इस पर मसीताराम व गुल्लन ने उसे स्वामी वेद प्रकाशानन्द जी के वेद मंदिर चले जाने का सुझाव दिया और स्वामी जी से उसे मिलवाया। सारी व्यथा सुनाने के बाद वह मंदिर में रहने चली गयी। वेद मंदिर में ऋषिदेवी और वेदवती दो बहने रहती थी जिनसे निरगुनिया को काफी स्नेह और अपनापन मिला। वे दोनों ही यतनाओं व उत्पीड़न की मार से गुजर चुकी थीं। कुछ समय बीतने के बाद मोहना डाकू, निरगुनिया से मिलने आता है और उसके प्रति अपने प्रेम के दीपक को पुनः प्रज्वलित करता है। मोहना डाकू द्वरा मिले पैसे से निरगुनिया अपने अर्थात मसीताराम के घर व आर्थिक अस्त-व्यस्तता को नियोजित करती है। फिर एक किताब ‘रंगीला रसूल’ के कारण शहर में दंगा हो जाता है। इसके अतिरिक्त एक अन्य पुस्तक ‘तलकीने मजहब’ ने भी दंगे में अत्यंत वेग उत्पन्न कर दिया। इसके पृष्ठ 21 पर लिखा है, ‘सीता चौदह बरस रावन के कब्ज़े में रहने की वजह से उसकी गर्वीदा हो गई थी, इस वजह से सीता के रावन का कत्ल होना सख्त सदमे का वाइस हुआ। सीता अपने आशिके कद्रदान की मूरत बनाकर रोजाना पूजा करती थी।” (वही, 2010, 246) वहीं योगेश्वर श्रीकृष्ण के संबन्ध में 49वें पृष्ठ पर यह लिखा है, “नतीजा यह हुआ कि जिस तरह उसने बेशुमार बेगुनाहों का कत्ल किया था, उसका भी कत्ल हुआ और द्वारका की जमीन पर मुफ़्सिद-पर्दाज़ जानी से पाकोसाफ हो गई।” (वही, 2010, 246) इसके कारण हिन्दू लोगों का खून खौल उठा और प्रत्युत्तर के रूप में भीषण दंगा बन के उभरा। उसमें मोहना के मामा-मामी मारे जाते हैं। इसी बीच निरगुनिया को एक बेटी होती है जिसका नाम शकुंतला रखा गया। मोहना डाकू बेटी के पैदा होने के चार महीने बाद निरगुनिया और अपनी बेटी से मिलता है। मोहना हमेशा उसे आर्थिक सहायता देता रहता था। गुल्लन के बेटे नब्बू को मोहना डाकू द्वारा पीते जाने के कारण गुल्लन में मोहना व निरगुनिया के प्रति रोष व्याप्त हो रहा था। बसन्तलाल ने दरोगा की नौकरी छोड़ कर प्राइवेट जासूस का धन्धा खोल लिया पर वो मोहना डाकू की तलाश में लगा रहा। डेढ़ साल बाद मोहना डाकू, निरगुनिया से मिलने आया और अपने चाचा, बेटी शकुन्तला के लिए पैसे भी दिये। मोहना डाकू पर 5 हजार का इनाम भी सरकार ने रखवा दिया है। रिपुदमन सिंह चौहान वहां के नए दरोगा थे। इसके लालच और द्वेष में गुल्लन ने उसके ठिकाने को पुलिस में जा कर बता दिया। परिणामस्वरूप मोहना डाकू मारा गया और निरगुनिया की रही-सही आस भी इसी के साथ खत्म हो गयी।

अगर इस उपन्यास के पूरे विमर्श को देखें तो यह जाति, वर्ग, लिंग और उसकी शक्ति (सत्ता) के आस-पास घूमता रहता है। वास्तव में ये सभी विमर्श, एक मसलें के रूप में उनके लिए हैं जो स्वयं तो एक ऐसे स्तर पर विराजमान हैं जिन्हे न तो इस विमर्श के परिणाम से कोई फर्क है और न ही इसकी कोई आवश्यकता। क्योंकि जो स्वयं सत्ता-संरचना में है उसके लिए क्या नियमावली और क्या मान्यता? वे तो स्वयं में ही कानून हैं। जो कोई इस सत्ता-संरचना को चुनौती देता है वो या तो मिटा दिया जाता है या तो सत्ता-संरचना उसे अपने में मिला लेती है। (वेबर, 1905) जिसके कारण न तो नियमों में बदलाव आता है और न ही इसके लिए प्रयास ही हो पता है। इस विमर्श और उसकी समस्या से दिक्कत तो उन लोगों को होगी जो कि हाशिये पर के लोग हैं। इस साहित्य के माध्यम से कई गंभीर मसलों पर विचार किया गया है। किस प्रकार का जीवन निर्गुण (ब्राह्मण) का था? किस प्रकार की जीवन-शैली निरगुनिया (मेहतरानी) का था? इस संबंध में समाज का रवैया किस प्रकार का था? महिलाओं के प्रति समाज का रूप कैसा था? इत्यादि प्रकार के गंभीर सवालों का जवाब साहित्यकार ने बड़ी ही स्वच्छता व सफलता से दिया है। अमृतलाल नागर ने उपन्यास के माध्यम से आजादी से पहले के समाज में हो रही घटनाओं का अच्छा परिवेश प्रस्तुत किया है। उन्होने उस समय में जाति के वर्चस्व के साथ-साथ शक्ति के अस्तित्व को भी सूचित किया है। जब निरगुनिया का पति मोहना, डाकू बन जाता है तो स्वतः समाज में उसकी स्थिति में परिवर्तन होता है। यह उसके लिए एक बेंचमार्क जैसे प्रयोग होता है।

साहित्यकार के अनुसार निरगुनिया का जीवन एक ऐसे बेपेंदी के लोटे के समान बन चुका था कि जो बस यहाँ से वहाँ नाचता ही रहे और अपने स्थिर होने की कल्पना मात्र ही कर सके। पर या संभव होना भी अपने-आप में एक संशय का मसला है।

अब मैं नाच्यो बहुत गुपाल।

काम क्रोध को पहिर चोलना कण्ठ विषै की माल।।

अब मैं नाच्यो बहुत गुपाल।…

वैश्विक परिदृश्य में दलित साहित्य-अनिता जायसवाल

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woman in green and yellow sari standing on green grass field during daytime
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वैश्विक परिदृश्य में दलित साहित्य

अनिता जायसवाल

हिन्दी दलित साहित्य की पहली कहानी कौन-सी है यह विवाद रहता है परंतु प्रसध्दि दलित समीक्षक डॉ एन.सिह सहित अनेक साहित्यकारों का यह मानना रहा है अर्थात जयप्रकाश कर्दम का उपन्यास है।‘ छापर’ हिन्दी दलित साहित्य का प्रथम उपन्यास है। यही स्थिती हिन्दी कहानी की भी है। समस्या पर लिखी यह है कि हम दलित समस्या पर लिखी पहली कहानी किसे माने। संतीश द्वरा रचित हिन्दी की दलित कहानी ‘वचनबद्द’ है जो अप्रैल 1975 में ‘मुक्ति’ स्मारिका में प्रकाशित हुई थी उसके बाद डॉ ‘मीनू’ मोहनदास नैमिशराय की कहानी ‘सबसे बड़ा सुख’ और ओमप्रकाश वाल्मीकि कहानी ‘अंधेरी बस्ती’ का हैं। में कहानीयां क्रमशः कथालोक में 1978 में और निर्णायक भी (दलित पत्रिका) में अगस्त 1980 के अंक में प्रकाशित हुई थी।

हिन्दी के दलित कहानीकारों की वरिष्ठ पीढ़ी में ओमप्रकाश, वाल्मीकि, मोहनदास, नैमिषशराय, सूरजपाल चौहान ,जयप्रकाश कर्दम, बुध्दशरण हंस, कुसुम मेघालय के नाम विशेष उल्लेखनीय है। तो नयी पीढ़ी में पुरन सिहं, अनिता भारती रजतरानी ‘मीनू’ रजनी दिसोदिया, मुकेश मानस उमेशकुमार सिहं, सूरज बडजात्या आदि के नाम उल्लेखनीय है ।

सही मायने में देखे तो 1980 के बाद से हिन्दी साहित्य में कहानी लेखन कर प्रति सजगता दिखाई देनी शुरू होती है 1990 के बाद इस दिशा में उत्साहजनक गतिशीलता आई और फुटकर कहनियों के अलावा अनेक कहानिकारों के कहानी संग्रह प्रकाशित हुई संग्रहों में मोहनदास नैमिशराय का आवाजे ओमप्रकाश वाल्मीकि का सलाम डॉ ठाकुर प्रसाद राही का संग और अन्य कहानियाँ संग और अन्य कहानियाँ सत्यप्रकाश का चंद्रमोलि का रक्तबीज,सूरजपाल चौहान का हैरी कब आएगा कुसुम वियोगी का चार इंच की कलम,डॉ सुशील टाकभौर के दो कहानी संग्रह टूटता बहम और अनुभूति के धेरे तथा युवा लेखक विपिन बिहारी के तीन कथा संग्रह अपना मकान पुनर्वास और आधे पर अंत विशेष रूप से उल्लेखनीय है ।

अध्ययन की दृष्टि से हिन्दी की दलित कहानियों को तीन भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है यथा-आदर्शवादी कहानियाँ, यथार्थपरक कहानियाँ और चेतना मूलक कहानियाँ । यह कहने की आवश्कता नहीं है कि दलित साहित्य का प्रेरणा-स्त्रोत बाबा साहब ने जातिविर्दान और वर्ग विहीन समाज के रूप में ऐसे समाज की कल्पना की जो समता,न्याय, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व पर आधारीत हो उँच-नीच छुआछुत आदि के लिए कोई जगह नहीं हो हिन्दी में ऐसे कई दलित कहानियाँ मिलती है । जिनमे समाज- परिवर्तन का आदर्श कई रूपों में देखने में मिलता है ।

ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी है पच्चीस चौका डेढ़ सौ। अशिक्षित जनसमुदाय का शोषण किस प्रकार युग-युगों से किया जा रहा ही । इस कहानी में मिलता है । सुदीप नामक दलित बालक पढ़ लिखकर नौकरी प्राप्त कर लेता है। पहली तनख्वाह लेकर वह घर वापस आ रहा है । घर आकर उसने अपने पिता को नोट गिनकर समझाता है कि पच्चीस चौका सौ है डेढं सौ नहीं तब भी वह दलित पिता इस पर विश्वास करने के लिए तैयार हो जाता है कि पच्चीस चौका सौ डेढ़ सौ नहीं जैसे कि उसके मालिक चौधरी ने उसे समझाया था। इस पहचान से उसके मन में चौधरी को लेकर जो विश्वास रूढ़ हो चुका था । वह हमेशा के लिए बिखर जाता है। और उसका मन घृणा और प्रतिशोध की भावना से भर जाता है । तब वह कहता है। कीड़े पड़ेगे चौधरी……. को पानी देने वाला भी नहीं बचेगा यह कहानी प्रेमचन्द की सवा सेर गेहूँ की याद दिलाने वाली कहानी है । इस कहानी में सौ रुपया कर्ज लेकर सुदीप का पिता अपनी पत्नी का इलाज करवाता है। जिसके लिए उसे जिन्दगी भर कर्जदार बने रहना पड़ता है। वह उस कर्ज को चुकाने के लिए दिन-रात मेहनत करता पर ऋणमुक्त नहीं हो पाता है। इसलिए वह चौधरी को कोसता है और श्राप देता है इसके आगे कहने के लिए उससे बढ़कर चौधरी के खिलाफ कुछ करने की क्षमता नहीं । फिर भी इस कथन से पूरे विरोध और प्रतिशोध की आवाज़ मुखर हो उठती है।

इस तरह अंगारा में जमना नामक सत्रह वर्षीय चमार लड़की पर अत्याचार होता है मोहनदास नैमिशराय की कहानी अपना गाँव कबूतरी नामक दलित युवती की कथा प्रस्तुत करते हुए ठाकुरों के अत्याचारों का पर्दाफाश किया है। इसके अलवा भी बहुत सी कहानियाँ है जो इसी भाव पर आधारित है। यह दलितों की मानसिकता स्पष्ट है। वे अन्याय,अत्याचार,अपमान के खिलाफ संघर्ष करके अपने को विजयी देखना चाहते है दलित साहित्य में अधिकांश कहानियाँ यथार्थपरक है । इन कहानियों में सवर्ण हिन्दू समाज के सामवादी चरित्र और दलितों के प्रति उनके व्यवहार का सहज और यथार्थ रूप चित्रित किया गया है। डॉ. श्यौरजसिंह वेचैन की कहानी भी इसी विषय पर केन्द्रीत है ।

इस कहानी में सवर्ण प्राध्यापक अपने पर्यवेक्षण में शोध कार्य कर रही दलित छात्रा का दैहिक शोषण कर उसे गर्भवती बना देता है जो बाद में एक पुत्र को जन्म देकर कुँवारी माँ बनने को अभिशप्त होती है ।हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में दलित आलोचनाग्रंथ, दलित शोधग्रंथ समीक्षात्मकग्रंथ भी लिखे गये है । यदि देखा जाए तो दलित चेतना को जीवित स्तर तक पहुँचाने में महात्मा ज्योतिराव फुले एवं सावित्रीबाई फुले का बड़ा योगदान है।

दलित विमर्श की चर्चा समाजिक, राजनीतिक एवं साहित्यिक संदर्भ तलाशे जायें तो सभी मूल स्वर मुख्य धारा से अलग रहने की छटपटाहट अभिव्यक्त करता है ।

संदर्भ ग्रंथ –

  • हिशिए से बाहर- डॉ. रजत रानी मीनु
  • यातना की परछाई-डॉ.ड एन सिंह
  • हिन्दी समकालीन कहानी विविध विमर्श-डॉ दयानन्द तिवारी
  • दलित साहित्य दो हाजार-जयप्रकाश संदर्भ
  • समकालीन दलित- डॉ. कुसुम वियोगी

शोध छात्रा

अनिता जायसवाल

मोबाइल न.9821541336

श्री जगदीश प्रसाद झाबरमल टीबड़ेवाला विश्वविद्याल

विद्यानगरी, चुरूरोड़,झुन्झुनु, राजस्थान।

दलित कहानी की वैचारिकी-ओमप्रकाश मीना

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woman carrying pot on her head
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दलित कहानी की वैचारिकी

ओमप्रकाश मीना (शोधार्थी)

भारतीय भाषा केंद्र, ज.ने.वि.,नई दिल्ली -110067

हिंदी कहानी का आरम्भ उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण से माना जाता है। इसका आरम्भ लोककथा शैली से होता है क्योंकि भारत में लोककथा शैली की एक प्राचीन परम्परा रही है। प्रेमचन्द और प्रसाद युग में आकर कहानी सुगठित रूप में सामने आती है। तब से लेकर हिंदी कहानी नई कहानी, अकहानी, सचेतन कहानी, सहज कहानी, समांतर कहानी, जनवादी कहानी, सक्रिय कहानी के दौर से गुजरती है लेकिन इस दौर की कहानियों की विडम्बना यह है कि इनमें दलित समाज लगभग गायब रहा है। प्रेमचन्द की ‘सद्गति’, ‘दूध का दाम’, ‘ठाकुर का कुआँ’ जैसी कहानियों में दलित चेतना एवं संघर्ष के संकेत देखने को मिलते हैं। सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के यहाँ भी सुगबुगाहट के संकेत मात्र ही देखने को मिलते हैं, लेकिन उनके यहाँ भी दलित चेतना की प्रखर अभिव्यक्ति नहीं दिखाई पड़ती है। इस दौर की गैर-दलित कहानियाँ गाँधीवादी और मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित रहीं है, जो कि दलित समाज की संवेदना को समझने में कारगर साबित नहीं होती हैं। सही मायने में साहित्य में दलित समाज की उपस्थिति हाशिए पर रही है। इसलिए साहित्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए दलित साहित्यकार सामने आए। इसके साथ ही हिंदी में दलित साहित्य परम्परावादी साहित्य से अपनी अलग पहचान बनाता है। हिंदी में दलित साहित्य नब्बे के दशक में एक साहित्यिक आंदोलन के रूप में सामने आता है, जिनमें दलित साहित्यकारों ने अपनी अग्रणी भूमिका निभाई। इस तरह पारम्परिक साहित्य से अलग होकर अपने समाज की अस्मिता को लेकर दलित वर्ग के लेखकों ने सशक्त भूमिका निभाई।

1990 के बाद दलित कहानी लेखन में गतिशीलता आती है और फुटकर कहानियों के अलावा दलित कहानीकारों के अनेक कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं। दलित कहानी की विकास यात्रा में सशक्त भूमिका निभाने वालों में– ‘ओमप्रकाश वाल्मीकि, डॉ. प्रेमशंकर, रजत रानी ‘मीनू’, मोहनदास नैमिशराय, डॉ.कुसुम वियोगी, डॉ.सुशीला टाकभौरे, सुमन प्रभा रजनी, वंदिता कमलेश्वर, डॉ.जयप्रकाश कर्दम, डॉ.श्यौराज सिंह ‘बेचैन’, प्रेम कपाड़िया, विपिन बिहारी, सत्यप्रकाश, डॉ.दयानन्द बटोही, बी.एल.नैयर, डॉ.कुसुम मेघवाल, सी.बी.भारती, कर्मशील भारती, तेजपाल सिंह ‘तेज’, उमराव सिंह ‘जाटव’, रत्नकुमार सांभरिया, डॉ.शत्रुघ्न कुमार, डॉ.कालीचरण सनेही, डॉ.हेमलता महीश्वर, रूपनारायण सोनकर, अनीता भारती, डॉ.अजमेर सिंह काजल, डॉ.सूरज बड्त्या, राजेंद्र बडगुजर, डॉ.कौशल पंवार और सुजाता पारमिता आदि हैं। इन कहानीकारों ने दलित कहानी के माध्यम से दलित समाज की संवेदनाओं को बारीकी से उकेरा हैं। इनकी कहानियां शोषणकारी व्यवस्था के खात्मे के लिए दलितों में हीनताबोध को तोड़ती हुई दलितों को संघर्ष के लिए अभिप्रेरित करती हैं, साथ ही महात्मा ज्योतिबा फुले एवं बाबा साहब के प्रगतिशील विचारों से रूबरू कराती हुई दलितों का मार्गदर्शन करती हैं। दलित कहानी की वैचारिकी के संदर्भ में डॉ.राम चंद्र लिखते हैं- “हिंसा और घृणा आधारित हिन्दू व्यवस्था की जगह समता एवं करुणा की आकांक्षा दलित वैचारिकी का आधार स्तम्भ है जो बुद्ध से डॉ.अम्बेडकर तक के लम्बे इतिहास की देन है। अम्बेडकरवादी विचारधारा की मौजूदगी दलित कहानी की मूल संवेदना है,जिससे दलित चेतना की निर्मिति हुई है। अस्मिताबोध दलित कहानियों का मूल कथ्य हैं।”1 दलित कहानियों में आक्रोश, प्रतिक्रिया एवं संघर्ष के स्वर विद्यमान है, शोषणकारी व्यवस्था का खात्मा कर समता, बंधुता एवं भाईचारे की स्थापना करना दलित कहानी का उद्देश्य है। सही मायने में दलित कहानी एक साहित्यिक आंदोलन के रूप में सशक्त रूप से सामने आती है, जिसे वैचारिक ऊर्जा बुद्ध के दर्शन, महात्मा फुले एवं बाबा साहब डॉ.अम्बेडकर के जीवन संघर्ष एवं विचारों से मिलती है।

संवैधानिक सुरक्षा एवं अधिकारों की प्राप्ति के बाद बाबा साहब के विचारों से प्रेरित समाज के निचले तबके के लोग शिक्षित होकर जातिगत पेशों से मुक्त होने लगे हैं। शिक्षा से दलितों, महिलाओं और तमाम निचले तबकों में चेतना आई है। वे अपने अधिकारों के लिए संघर्ष हेतु प्रेरित हुए हैं और अपने अस्तित्व एवं अस्मिता के लिए उठ खड़े हुए हैं। बाबा साहब का मूल मंत्र- ‘शिक्षित बनो’, ‘संगठित हो’ और ‘संघर्ष करो’ एवं ‘अप्पो दीपो भव’ अर्थात् ‘अपना दीपक स्वयं बनो’! इन मूल मंत्रों ने सदियों से शोषित दलितों में हीनताबोध को तोड़कर उनमें संघर्ष एवं चेतना के बीज बोये। इस संदर्भ में बाबा साहब लिखते हैं- “प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षित किया जाना चाहिए। हर एक व्यक्ति में अपनी रक्षा की क्षमता होनी चाहिए। अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए, प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह बहुत जरुरी भी है।”2 यानी शिक्षा ही एक ऐसा अस्त्र है, जिससे सामाजिक भेदभाव और शोषणकारी व्यवस्था को खत्म किया जा सकता है। शिक्षित होने से दलित समाज सदियों से चली आ रही शोषणकारी व्यवस्था को समझ सकता है और अपने संवैधानिक एवं मानवीय अधिकारों के प्रति जागरूक हो सकेगा। शिक्षा ही उनके अन्दर बैठे हीनताबोध व धर्मशास्त्रों के आतंक को तोड़ पायेगी। इसी संदर्भ में शिक्षा की महत्ता के बारे में महात्मा ज्योतिबा फुले लिखते हैं- “विद्या के न होने से बुद्धि नहीं, बुद्धि के न होने से नैतिकता न रही, नैतिकता के न होने से गतिमानता, गतिमानता के न होने से धन-दौलत न मिली, धन-दौलत न होने से शूद्रों का पतन हुआ। इतना अनर्थ एक अविद्या से हुआ।”3 इससे स्पष्ट होता है कि शिक्षित न होने के कारण दलितों का सामाजिक-आर्थिक-धार्मिक शोषण किया जाता रहा है, अज्ञानतावश वे जाति-वर्ण व्यवस्था को नियति मान बैठे और अपने अधिकारों से अनभिज्ञ रहे।

संवैधानिक अधिकारों की प्राप्ति के बाद फुले एवं बाबा साहब के विचारों से प्रेरित दलित समाज शिक्षित होने लगा है और अपने अधिकारों को जानने लगा है। दलित कहानियों के मद्देनजर देखा जाए तो दलित कहानी शिक्षा के प्रति महात्मा फुले एवं बाबा साहब के दिए गए विचारों से पाठकों को अभिभूत कराती है। डॉ.सुशीला टाकभौरे की कहानी ‘सिलिया’ में सिलिया इस भेदभाव आधारित समाज में बराबरी एवं इज्जत का दर्ज़ा पाने के लिए संघर्ष करती है और शिक्षित होकर समाज में बदलाव लाने के लिए प्रतिबध्द होती है- “सिलिया सोचने लगी थी कि कैसे मात किया जा सकता है इस हालात को? कैसे हम अपनी इज्जत और बराबरी का दर्ज़ा पा सकते हैं? ….हीनता और दीनता के भाव न जाने कब के जा चुके थे? वह मन ही मन सोच रही थी झाड़ू नही कलम। हाँ कलम ही उसके समाज का भाग्य बदलेगी।”4 इस तरह सिलिया कलम के माध्यम से दलित समाज की प्रगति एवं विकास के लिए प्रतिबध्द होती है। शिक्षा के माध्यम से वह शोषणकारी समाज में बदलाव लाना चाहती है। वह दृढ़ संकल्प लेती है- “मैं बहुत आगे तक पढूंगी, पढ़ती रहूंगी, उन सभी परम्पराओं के मूल कारणों का पता लगाऊँगी, जिन्होंने हमें समाज में अछूत बना दिया है । मैं विद्या, बुद्धि और विवेक से अपने आपको ऊँचा साबित करके रहूंगी, किसी के सामने झुकूंगी नहीं, न ही कभी अपमान सहन करुँगी।”5 बाबा साहब ने सामाजिक आदोंलनों के माध्यम से सोये हुए दलित समाज में शिक्षा की अलख जगाई, क्योंकि उनका विश्वास था कि सामाजिक बुराईयों और अन्याय के खात्मे के लिए शिक्षा ही प्रभावकारी अस्त्र है।

बाबा साहब लड़का-लड़की की शिक्षा के समान अवसर के लिए अभिभावकों को प्रेरित करते हैं। बाबा साहब का मानना था कि ‘स्त्री शिक्षा के बगैर दलित समाज ब्राह्मणवाद के विरुद्ध जीती हुई लड़ाई हार जायेगा। सही मायने में सामाजिक विकास की यात्रा में स्त्री की सहभागिता के लिये स्त्री शिक्षा बहुत आवश्यक है। इसी संदर्भ में सन् 1913 में न्यूयार्क में पढ़ते हुए डॉ.अम्बेडकर ने अपने पिता के एक मित्र को जवाब देते हुए पत्र में लिखा था- “यह गलत है कि माँ-बाप बच्चों को जन्म देते हैं कर्म नहीं देते। माँ-बाप बच्चों के जीवन को उचित मोड़ दे सकते हैं, यह बात अपने मन पर अंकित कर यदि हम लोग अपने लड़कों की शिक्षा के साथ ही लड़कियों की शिक्षा के लिए भी प्रयास करें तो हमारे समाज की उन्नति तीव्र होगी। इसलिए आपको नजदीक रिश्तेदारों में यह विचार तेजी से फैलाना चाहिए।”6 इस तरह बाबा साहब समाज की उन्नति के लिए पुरुष के साथ-साथ स्त्री शिक्षा को भी अत्यंत आवश्यक मानते हैं। बाबा साहब की स्त्री शिक्षा के प्रति इस वैचारिकी को रजत रानी ‘मीनू’ ‘सुनीता’ कहानी में दर्शाती हैं। कहानी में सुनीता के माँ-बाप लड़की को पराया धन समझकर पढ़ाने के पक्ष में नहीं होते है, लेकिन सुनीता हार नहीं मानती और अपनी माँ को समझाती है- “माँ चमार और भंगी को इसलिए पुश्तों से शिक्षा से दूर रखा गया ताकि ये लोग अपना सफाई का,चमड़े का पुश्तैनी धंधा न छोड़ें। अगर पढ़ेगे तो ये बोलने लगेंगे। यह अपने हक़ की बात करने लगेंगे और उन्हें पाने लायक बन जायेंगे।”7 एक दिन सुनीता उच्च शिक्षा प्राप्त कर राजनीति में दलित समाज का प्रतिनिधित्व करती है और अपने माँ-बाप एवं समाज का नाम गौरवान्वित करती है। तब उसके पिता को अपनी इस पुरुषवादी मानसिकता पर शर्मिंदगी महसूस होती है कि लड़की को पढ़ाकर क्या करेगे, यह तो पराया धन है। इस तरह कहानी वर्णव्यवस्था के साथ-साथ पितृसत्ता को चुनौती देती है और बदलाव के लिए सोचने को विवश करती है। बाबा साहब के विचारों के चलते आज स्त्री सभी क्षेत्रों अपनी योग्यता के बल पर सहभागिता निभा रही हैं।

बाबा साहब के विचारों से प्रभावित होकर स्त्री हर क्षेत्र के विकास में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। दलित समाज की स्त्री शिक्षा के प्रति तो जागरूक हुई है, लेकिन उसे कदम-कदम पर इस पुरुषसत्ता एवं वर्णव्यवस्था से जूझना पड़ रहा है। दलित छात्रा ही नहीं दलित छात्रों को भी उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव का शिकार होना पड़ रहा हैं, क्योंकि शिक्षण संस्थानों में मनुवादी मानसिकता से ग्रसित सवर्ण लोग उच्चे पदों पर आसीन है, वे नहीं चाहते कि दलित समाज पढ़-लिखकर उन्नति करें, क्योंकि इससे उनके वर्चस्व के खात्मे का भय है। शिक्षण संस्थानों में आज भी दलित छात्र-छात्राओं का मानसिक-शारीरिक शोषण होता है। इसी संदर्भ में ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘घुसपैठिये’ कहानी शिक्षण संस्थाओं में दलित छात्रों के साथ जातिगत भेदभाव के आधार पर हो रहे जुल्म एवं अत्याचारों का पर्दाफाश करती है। कहानी में दलित छात्र सुभाष सोनकर को सवर्ण छात्र प्रणव मिश्रा मारपीट करके अधमरा कर देता है। प्रणव मिश्रा के अंजाम पर कोई कार्यवाही नहीं होती है। डीन महोदय को दलित छात्रों का आना घुसपैठ लगता है। वह आरक्षण के विरोध में जहर उगलता है और दलित छात्रों को आरक्षण मिलना सवर्ण छात्रों के साथ नाइंसाफी मानता है, इसीलिए दलित छात्रों पर सवर्ण छात्रों की ज्यादतियों को उचित मानता है। इसके चलते दलित छात्र-छात्राएँ अपनी पढाई बीच में छोड़ देते हैं या आत्महत्या का विकल्प चुनते हैं। जो दलित छात्र विरोध करते हैं उन दलित छात्रों की हत्या तक कर दी जाती है। इस संदर्भ में लेखक लिखते हैं:- “सोनकर को पहली ही परीक्षा में फेल कर दिया गया था। क्योंकि उसने प्रणव मिश्रा के खिलाफ़ पुलिस में नामजद रपट लिखाने का दुस्साहस किया था, डीन और अन्य प्रोफेसरों तक शिकायत पहुँचाने की हिमाकत की थी, यह भूलकर कि वह इस चक्रव्यूह में अकेला फंस गया है, जहाँ से बाहर आने के लिए उसे कौरवों की कई अक्षैहिण सेना और महारथियों से टकराना पड़ेगा। परीक्षाफल का व्यूह भेदकर सोनकर बाहर नहीं आ पाया था। कई महारथियों ने निहत्थे सोनकर की हत्या कर दी थी।”8 इसी तरह जयप्रकाश कर्दम की ‘सूरज’ कहानी में दलित छात्र सूरज की हत्या को आत्महत्या कहकर प्रचारित किया जाता है। सूरज कॉलेज में अम्बेडकर जयंती मनाने के जरिये दलित छात्रों में संगठित चेतना एवं संघर्ष का बीज बोता है। इसकी प्रतिक्रिया में कुछ सवर्ण छात्र सूरज की हत्या कर देते हैं, क्योंकि इससे इनके जातिगत वर्चस्व एवं श्रेष्ठता को चुनौती मिलती है। इस तरह दलित कहानी शिक्षण संस्थानों में व्याप्त जातिगत भेदभाव के क्रूर एवं असंवेदनशील चेहरे को सामने लाती है और शिक्षण संस्थाओं पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है।

आज दलित वर्ग के छात्र-छात्राएँ अपने अधिकारों के प्रति सचेत हैं, उन्हें किसी द्रोणाचार्य का एकलव्य बनना मंजूर नहीं हैं। कावेरी ‘द्रोणाचार्य एक नहीं’ कहानी में शिक्षण संस्थानों में हो रहे भेदभाव को दर्शाते हुए दलितों में संघर्ष एवं चेतना के स्वर को अभिव्यक्त करती हैं। कहानी में दलित छात्र सुवास स्कूल हैडमास्टर द्वारा पिटाई करने और हरामी कहने पर प्रतिक्रियास्वरूप कहता है- “सर हरामी होगा झूठ बोलने वाला। मैं भीरु एकलव्य नहीं कि आप जैसे द्रोणाचार्य के सामने सब कुछ हार जाऊँ। आपके स्कूल में सिर्फ ऊँचे कहाने वाले ही पढ़ेगे। मुझे नहीं चाहिए ऐसी पढाई।”9 इस तरह दलित छात्र आज एकलव्य बनने को तैयार नहीं है, वह अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो गया है। इसी संदर्भ में ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘कहाँ जाये सतीश?’ कहानी में भी दलित छात्र के संघर्ष को रेखांकित किया गया है। इस कहानी में सतीश बाबा साहब के विचारों से प्रेरित है और मेहनत-मजदूरी करके किताबें खरीदकर पढ़ाई करता है, ताकि वह शिक्षित होकर अपना गांव का विकास कर सके। उनकी ‘पच्चीस चौका डेढ़ सौ’ कहानी में भी अशिक्षित एवं अज्ञानी दलितों के शोषण को दर्शाया गया है, साथ ही शिक्षा से आई उनकी चेतना को भी रेखांकित किया गया है। इस कहानी में सुदीप पढ़-लिखकर नौकरी करता है और अपनी पहली तनख्वाह पिताजी को गिनाकर चौधरी के शोषण का पर्दाफाश करता है, तो उसके पिता में चौधरी के प्रति आक्रोश का भाव पैदा होता है। इस तरह बाबा साहब के विचारों से प्रेरित शिक्षित दलित वर्ग सवर्णों के शोषण तंत्र को समझने लगा है और अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगा है।

उच्च शिक्षण संस्थानों, अकादमिक संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में दलित छात्र-छात्राओं के साथ वर्णव्यवस्था के पुजारी मनुवादी प्रोफ़ेसर उनकी मेहनत और सपनों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। ये लोग दलित छात्रों को अयोग्य घोषित कर उनकी आरक्षित सीटें खाली रखतें हैं। इसी संदर्भ में डॉ.दयानन्द बटोही ‘सुरंग’ कहानी में दर्शाते हैं। कहानी में एक दलित छात्र को रिसर्च करने नहीं दिया जाता है, साक्षात्कार में डॉ.विष्णु सर हिलाते हुए कहता है- “कोई हो, सरकार भले कानून बना दी हो, घोड़े की रस्सी तो हमारे हाथों में हैं। आपका रिसर्च में नही होगा।”10 इस तरह विश्वविद्यालयों में दलित शोधार्थियों के साथ रिसर्च करने में मनुवादी लोग अड़चने पैदा करते हैं, लेकिन दलित वर्ग अपने अधिकारों के प्रति सचेत है और शोषण एवं भेदभाव के खिलाफ़ प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगा है। कहानी में दलित शोधार्थी इस भेदभाव के खिलाफ़ प्रतिक्रिया व्यक्त करता है- “डॉ.साहब आप भूल जाये कि मैं हरिजन हूँ, गुलाम हूँ। पराधीनता की जंजीर टूटनी है। आज तक आप जैसे तानाशाह ने अँधेरे में हम लोगों को रखा है। अब मैं पूछता हूँ-आप क्यों रिसर्च नहीं करने देगें? ….डॉ.साहब यह भूल जाइये कि आपसे दया की भीख मांग रहा हूँ। मैं पूछता हूँ आप लोग हरिजन कल्याण का ढ़िंढ़ोरा क्यों पिटते हैं, आरक्षण कहाँ दे रहे हैं।”11 इस तरह कहानी उच्च शिक्षण संस्थानों में मनुवादी मानसिकता से ग्रसित ऊँचे पदों पर पदासीन सवर्णों के शोषण का प्रतिकार करती है और शिक्षित दलित समाज में बदलाव की बेचैनी को दर्शाती है। अम्बेडकरवादी विचारों से प्रेरित दलित शिक्षार्थी एकलव्य बनने की भूल नहीं करते हैं, बल्कि अपने शैक्षिक हक़ के लिए संघर्ष करते हैं एवं शोषण का प्रतिकार करते हैं|

बाबा साहब ने दलितों में शिक्षा के प्रति चेतना जाग्रत की है। इसी के चलते शिक्षा से दलितों में हीनताबोध की भावना ख़त्म होने लगी और उनमें स्वाभिमान, संघर्ष एवं चेतना का स्वर मुखरित हुआ हैं। इसके चलते दलित समाज शोषणकारी एवं अपमानजनक पुश्तैनी धंधों को त्यागकर नए रोजगार पाने की ओर उन्मुख हुआ है। इसी संदर्भ में सूरजपाल चौहान की ‘परिवर्तन की बात’ दलितों में व्याप्त चेतना को दर्शाती है। कहानी में दलित किसना मरे जानवर उठाने वाला पुश्तैनी धंधा का त्यागकर दूसरा धंधा अपनाने की पहल करता है। इस संदर्भ में वह थानेदार से कहता है- “क्या आप यही चाहते हैं कि हम जीवन भर गाँव के मरे जानवर ही उठाते रहें। अब समय बदल रहा है, लोग अपना पुश्तैनी धंधा छोड़कर दूसरे कार्य करने लगे हैं। हम दूसरा अन्य कोई भी काम कर अपना पेट भर लेंगे, लेकिन मरा जानवर हम नहीं उठायेंगे।”12 उनकी ‘साजिश’ कहानी भी इसी ओर संकेत करती है, कहानी में जब बैंक मैनेजर नत्थू को बेबकूफ बनाकर टेम्पों के लिये ऋण ना देकर सूअर फॉर्म के लिए ॠण दे देता है। नत्थू की पत्नी शांता बैंक मैनेजर की साजिश का पर्दाफ़ाश करती है और नत्थू के साथ दलित युवकों को लेकर बैंक के बाहर इकट्ठा होकर बैंक मैनेजर के खिलाफ आवाज उठाती है। अंत में बैंक मैनेजर को नत्थू के लिये ट्रांसपोर्ट का लोन सैक्शन करना पड़ता है। यह कहानी शिक्षित दलित समाज में संगठित चेतना को दर्शाती है। यह बदलाव की ऊर्जा बाबा साहब एवं फुले के विचारों एवं संघर्ष से मिल रही हैं। उनके विचारों एवं संघर्ष से प्रेरित होकर दलित समाज पारम्परिक शोषणकारी व्यवस्था के बदलाव लिए एकजुट होकर संघर्षरत हो गया है। दलितों ने शोषण के तमाम तरीकों को समझ लिया हैं, जिसे वे संगठित होकर बेनकाब कर रहे हैं। हालांकि इस बदलाव के लिए उन्हें काफी कठिनाईयाँ एवं संघर्ष झेलने पड़ते हैं, विशेषकर गाँवों में बदलाव कड़ी चुनौती है, लेकिन इस चुनौती को दलितों की संगठित चेतना ने स्वीकार कर लिया है।

स्त्री वर्षों से पुरुषसत्तात्मक व्यवस्था की शिकार रही है, उसकी इच्छाएं-आकांक्षायें, सुख-दुःख सब पुरुष पर निर्भर रही हैं। स्त्री को भोग्य-विलासिता की वस्तु समझा जाता रहा है। हिन्दू धर्म में तो अजीब विडम्बना देखने को मिलती है-एक तरफ़ स्त्री को माँ दुर्गा, काली, सरस्वती, लक्ष्मी आदि देवियों के रूप में पूजा जाता रहा है, दूसरी तरफ स्त्री पुरुषसत्तात्मक व्यवस्था की शिकार हो रही है, उन्हें भोग्य की वस्तु समझा जाता रहा है। नब्बे के दशक में स्त्री विमर्श स्त्री की समस्याओं को लेकर सामने आया। मैत्रेयी पुष्पा, मन्नू भंडारी, प्रभा खेतान, डॉ.सुमन राजे, नासिरा शर्मा, ममता कालिया आदि स्त्री साहित्यकारों ने स्त्री साहित्य में सशक्त भूमिका निभाई। शोषणकारी पुरुषसत्तात्मक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का स्वर उभरकर सामने आया। लेकिन दलित स्त्री का स्वर इनके यहाँ भी दबा ही रहा। इसी के चलते दलित स्त्री लेखन सामने आया है, क्योंकि यहाँ समस्या सहानुभूति-स्वानुभूति को लेकर है। स्त्री लेखिका स्त्री की व्यथा को समझ सकती है, लेकिन सवर्ण स्त्री लेखिका एक दलित स्त्री की व्यथा को ठीक से अभिव्यक्त नहीं कर पा रही है। दलित साहित्य ने गैर एवं दलित स्त्रियों की व्यथा एवं वेदना का चित्रण बारीकी से किया है। दलित और गैर-दलित जीवन में मौजूद पितृसत्ता पर सवाल करना दलित कहानी का महत्त्वपूर्ण मुद्दा रहा है। दलित स्त्री लेखन में दलित समाज के अंतर्विरोधों पर प्रकाश डाला गया है | दलित साहित्य में स्त्री और पुरुष लेखन का वैचारिक आधार फुले-अम्बेडकरवाद ही है। बाबा साहब डॉ.अम्बेडकर ने नारी के चहुमुंखी विकास के लिए स्वतंत्र भारत के पहले विधि मंत्री के रूप में ‘हिन्दू कोड़ बिल’ का प्रारूप बनाया। परन्तु पुरुषवादी मानसिकता के चलते संसद में यह बिल पास न हो सका और इससे आहत होकर उन्होंने मंत्रीपद से त्यागपत्र दे दिया। हालांकि बाद में ‘हिन्दू कोड़ बिल’ चार भागों में बांटकर कानून में शामिल कर लिया गया है, जिनमें बाबा साहब के ‘हिन्दू कोड़ बिल’ सिद्धांत शामिल है। इस तरह बाबा साहब ने महिलाओं की दशा सुधारने में अथक प्रयास किये हैं।

बाबा साहब समाज की उन्नति के लिए महिलाओं की उन्नति को आवश्यक मानते हैं- “मैं समाज की उन्नति का अनुमान इस बात से लगता हूँ कि उस समाज में महिलाओं की कितनी प्रगति हुई है। नारी की उन्नति के बिना समाज एवं राष्ट्र की उन्नति असम्भव है।”13 इस तरह वे समाज की उन्नति एवं निर्माण में नर-नारी की समान सहभागिता पर जोर देते हैं। उन्होंने महिलाओं की उन्नति के लिए स्त्री शिक्षा को आवश्यक माना, साथ ही दलित समाज की प्रगति का पैमाना दलित स्त्री की प्रगति से माना। इस संदर्भ में उनका मानना था कि ‘यदि लड़कों के साथ-साथ लड़कियों की शिक्षा की ओर भी ध्यान देने लग जाए तो हम अतिशीघ्र प्रगति कर सकते हैं।’ शिक्षा के कारण आज स्त्री हर क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी है, कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रहा है।

दलित स्त्री दोहरे शोषण की मार झेल रही है। बाबा साहब के विचारों से प्रेरित होकर गैर-दलित एवं दलित स्त्रियाँ शिक्षित होकर उन्नति कर रही हैं और दुनिया के हर क्षेत्र में अपनी भागीदारी निभा रही हैं। वे अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो गयी हैं, लेकिन अभी तक स्त्री के प्रति पुरुषवादी समाज की सोच नहीं बदली है। वह स्त्री को भोग्य-विलासिता की वस्तु के रूप में देखता आ रहा है और इसी सोच की शिकार अधिकतर दलित वर्ग की स्त्री होती रही हैं। हर रोज दलित स्त्रियों का शारीरिक—मानसिक शोषण होता रहा है। यहाँ तक की वह दलित समाज में भी पितृसत्ता के शोषण की शिकार होती हैं।

आज स्त्री किसी भी रिश्ते के छत के नीचे पूर्णरूपेण सुरक्षित नहीं है क्योंकि खून के रिश्तों में भी यौन शोषण की बू आने लगी है। इसलिए बाबा साहब ने कहा था कि ‘समाज की उन्नति स्त्री की उन्नति के बिना संभव नहीं है। जिस दिन स्त्री बैखोफ होकर स्वतंत्र, उन्मुक्त जीवन जीने लगेगी, उस दिन से सही मायने में समाज उन्नति करने लगेगा’। पुरुषसत्तात्मक समाज में आज भी स्त्री सुरक्षित नहीं है, इसलिए दलित एवं गैर-दलित स्त्री को अपने अधिकारों एवं सुरक्षा का बीड़ा स्वयं उठाना होगा। बाबा साहब के मूल मंत्र- ‘अप्पो दीपो भव’। अर्थात् ‘अपना दीपक स्वयं बनो’ से प्रेरित होकर अपना निर्णय खुद लेना होगा। इसके लिए स्त्री को उच्च शिक्षा प्राप्त करनी होगी, ताकि आत्मनिर्भर बनकर स्वाभिमान एवं गौरव की जिन्दगी जी सके। दलित स्त्री एवं पुरुष कथाकारों की कहानियों में श्रम से जुड़ी यौन समस्या, पुरुषसत्तात्मक एवं वर्ण-व्यवस्था के विरुद्ध आक्रोश, समाज में बराबरी के लिए संघर्ष, शिक्षा के प्रति जाग्रति बड़ी जीवंतता के साथ प्रकट हुई है। इस संदर्भ में ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘फेमनिस्ट’ कहानी प्रमुख है, जिसमें श्वेता अपने पुरुषवादी पति व समाज का प्रतिकार करती है। वह पुरुषोत्तम राम एवं भीष्म पितामह पर सवाल खड़ा करती है- “और जानती हूँ तुम्हारे मर्यादा पुरुषोत्तम राम को जो वास्तव में घोर मर्दवादी थे। उस राम को जानती हूँ जो सीता जैसी पतिव्रता नारी को भी शंका की निगाह से देखा था। और अंततः अग्नि परीक्षा तक ली थी। उस राम को,जो सूर्पनखा के नाक-कान काटकर कुरूप बनाया था।…“नहीं, सिर्फ राम ही नहीं, तुम्हारे दूसरे महापुरुष भीष्म पितामह को भी मैं दंभी, दुराचारी और मर्दवादी ही मानती हूँ। …हाँ भीष्म पितामह भी मर्दवादी ही थे, दुराचारी थे। वरना क्या जरुरत थी अपने रिश्तेदारों के लिए अम्बा, अम्बिका और अंबालिका को अपने बाजू की ताकत से अगवाकर उन्हें सौपने की। आज की सही भाषा में उन्होंने ‘किडनैप’ ही तो किया था।”14 यह कहानी शोषणकारी परम्परा के आदर्श एवं प्रतीकों के नकारती है। इसमें पुरुषसत्तात्मक व्यवस्था के प्रति नकार की अभिव्यक्ति देखने को मिलती है, साथ ही स्त्री के अस्तित्व एवं अस्मिता की लड़ाई भी। बाबा साहब के विचारों से प्रेरित श्वेता स्त्री की दासता एवं शोषण के लिए बनाए गए प्रतिमानों, आदर्शों, नैतिक बंधनों, धार्मिक एवं सामाजिक मूल्यों को तोड़ती है और अपने अस्तित्त्व एवं अस्मिता के लिए पुरुषवादी पति से लड़ाई लड़ती है।

बाबा साहब के विचारों से प्रेरित होकर दलित स्त्री में सामाजिक सहभागिता की आकांक्षाएं जाग्रत हुई हैं। वह हर क्षेत्र में बराबरी के लिए संघर्ष कर रही हैं। इसी संदर्भ में जयप्रकाश कर्दम की ‘मूवमेंट’ कहानी में सुनीता हर क्षेत्र में बराबरी की बात करती है। वह अपने पति के मूवमेंट पर सवाल खड़ा करती है- “तुम बराबरी की बात करते हो न, बराबरी का मतलब है हर क्षेत्र में हर स्तर पर बराबरी। हर किसी की अवसर की स्वतंत्रता और समानता। मेरी सारी जिन्दगी तो परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए घर की चारदीवारी की भेंट चढ़ रही है। मेरे लिए कौनसा अवसर है इस पर नहीं सोचोगे तुम कभी। यही तो सबसे बड़ी दिक्कत है। मैं पूछती हूँ क्या यही प्रगतिशीलता है तुम्हारी कि बाहर जाकर अन्याय और असमानता के खिलाफ भाषण झाड़ों और खुद घर में असमानता का व्यवहार करो? यही मूवमेंट है तुम्हारा?’’15 यह कहानी दलित समाज के उस अन्तर्विरोध को उजागर करती है, जहाँ दलित कार्यकर्त्ता, दलित साहित्यकार बातें तो स्त्री मुक्ति की करते हैं। अपने भाषणों एवं लेखन में स्त्री-पुरुष समानता की बात करते हैं लेकिन अपने परिवार में उनकी पुरुषवादी मानसिकता हावी रहती है। इस तरह कहानी समाज की उन्नति के लिए स्त्री-पुरुष सहभागिता पर जोर देती है।

दलित स्त्री का शारीरिक शोषण जमींदारों, मिल कारखानों के मालिकों द्वारा होता रहा है। लेकिन बाबा साहब के विचारों से प्रेरित दलित स्त्री शोषण का प्रतिकार करने लगी है। जयप्रकाश कर्दम की ‘सांग’ कहानी में चंपा का बीमार पति भुल्लन मुखिया के खेत पर काम कर पाने की स्थिति में नहीं है| थोडा मन बहलाने के लिये वह सांग का खेल देखने चला जाता है| इस पर मुखिया नाराज हो जाता है और बेरहमी से भुल्लन को पीट-पीटकर मार देता है। पति के मरने के कुछ वर्ष बाद गाँव में फिर से सांग खेला जाता है| शीला के जिद करने और अपने पति की हत्या एवं शोषण के खिलाफ़ प्रतिक्रिया व्यक्त करने चंपा सांग देखने जाती है। इस पर मुखिया चंपा को गाली-गलौच देता हुआ उसे मारने के लिए हाथ उठाता है तो चंपा अपने हाथ में पकड़े गंडासे से मुखिया के सिर के दो टुकड़े कर देती है। यह कहानी हिंसा को प्रेरित नहीं करती है, बल्कि इस वर्णवादी एवं पुरुषवादी व्यवस्था का प्रतिकार करती हैं। दलित स्त्री की हत्या और बलात्कार जैसी घटनाएँ आज भी हर-रोज बेलगाम घटित हो रही है। इसी तरह गौरीशंकर नागदंश की ‘जंगल की आग’ कहानी में विधायक फुलतोड़ती देवी बसमतिया का बलात्कार कर रहे मंत्री जगनलाल की हत्या कर देती है। उसे जेल हो जाती है, वह एक वाक्य बार-बार दुहराती है- “मैंने जंगल में आग लगा दी, मैंने जंगल में…।”16 यानी फुलतोड़ती देवी ने स्त्री वर्ग में शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ़ प्रतिरोध, आक्रोश एवं संघर्ष की आग लगा दी है। उसके स्वर में आक्रोश एवं प्रतिक्रिया के जज्बात विद्यमान है।

इसी क्रम में हुबलाल राम अकेला की कहानी ‘किसके हो तुम’ समाज में दहेज़ समस्या को रेखांकित करती है। कहानी में सरिता यमराज से कहती है- “महामहिम हमारे देश में कुछ लड़कियों की शादी उनकी मर्ज़ी के मुताबिक नहीं होती हैं।…हमारे देश में नौकरी पाने के लिए नौजवान लाखों रुपये रिश्वत में देते हैं बदले में आठ-दस घंटे प्रतिदिन काम कर चार-पांच अंकों में तनख्वाह पाते हैं। परन्तु एक दुल्हन लाखों रूपये दहेज़ लेकर आने के बावजूद ससुराल की ऐसी अवैतनिक लौंडी बना दी जाती है। जिसका शारीरिक और मानसिक शोषण जीवनपर्यंत होता रहता है।”17 यह कहानी देश की भ्रष्टाचारी व पुरुषसत्ता पर सवाल खड़ा करती है। इस तरह दलित कहानी शोषणकारी व्यवस्था का पर्दाफाश करती हुई उसके प्रति आक्रोश एवं चेतना के स्वर को रेखांकित करती है।

दलित कहानी बाबा साहब के अंतर्जातीय विवाह संबंधी विचारधारा को सामने लाती है। बाबा साहब डॉ.अम्बेडकर जातिप्रथा के खात्मे के लिए अंतर्जातीय विवाह पर जोर देते हुए कहते हैं- “मुझे भरोसा है कि अंतर्जातीय विवाह ही इसका वास्तविक उपचार है। रक्त के एकीकरण से ही आपसी भाईचारे की भावना पैदा की जा सकती है और जब तक यह बंधुत्व की भावना नहीं होगी, संबंधी होने, जुड़े होने की भावना सर्वोपरि नहीं होगी, जाति द्वारा पैदा की गयी अलगाव की भावना, भिन्न होने की भावना समाप्त नहीं होगी। …जातिप्रथा समाप्त करने के लिए वास्तविक उपचार अंतर्जातीय विवाह है। जातिप्रथा के निर्मूलन के रूप में कोई अन्य व्यवस्था कारगर नहीं हो पायेगी।”18 बाबा साहब का मानना था कि कानूनी तौर पर समानता तो मिल चुकी है, लेकिन समाज में जातिगत भेदभाव बना हुआ है, इसलिए वे सामाजिक स्तर पर समानता लाने के लिए रोटी-बेटी के संबंध बनाने पर जोर देते हैं। इसी संदर्भ में राज वाल्मीकि की ‘इस समय में’ कहानी इसी विचारधारा पर आधारित है। कहानी में मिली अपनी पिताजी से कहती है- “पापा आज हम सब एक साथ मिलकर शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। पढ़-लिखकर जागरूक बनेंगे, अच्छा कैरियर बनायेगें, इंटर कास्ट मैरिज करेंगे तो धीरे-धीरे जाति का फैक्टर डिमोलिश हो जायेगा। पति कहेगा, मैं बच्चों के साथ अपना टाइटल लगाऊंगा और पत्नी कहेगी मैं अपना टाइटल लगाऊँगी। अंत में निर्णय लिया जायेगा कि किसी का टाइटल न लगाया जाए। इस तरह जाति का विनाश हो जायेगा।”19 कहानी बाबा साहब की वैचारिकता को दर्शाती है, साथ ही लोगों को अंतर्जातीय विवाह के लिए प्रेरित करती है। इस कहानी में शिक्षित नई पीढ़ी का अंतर्जातीय विवाह के प्रति रुझान को दर्शाया गया है। इसी संदर्भ में ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘मैं ब्राह्मण नहीं हूँ’ कहानी सुनीता के माध्यम से बाबा साहब के विचारों को प्रतिष्ठापित करती है। कहानी में जब गुलजारी लाल शर्मा मोहनलाल मिरासी के बेटे अमित के साथ अपनी बेटी सुनीता की शादी तय करता है, लेकिन जब गुलजारी लाल को मोहनलाल की मिरासी जाति होने का पता चलता है तो वह अपनी बेटी की अमित के साथ शादी करने से मना कर देता है। लेकिन सुनीता इसका प्रतिकार करती है- “पापा …आप बने रहिये श्रेष्ठ …ब्राह्मण …मिरासी से ऊँचे। लेकिन मैंने कभी भी अपने आपको ब्राह्मण नहीं माना …यह सच्चाई है। न मैंने ‘शर्मा’ होने की आड़ में कभी ब्राह्मण बनने की कोशिश की। मेरे लिए ब्राह्मण होना ही इंसान की श्रेष्ठता का प्रतीक नहीं है। यह एक भ्रम है जिसमें सभी ऊँच-नीच का खेल खेल रहे हैं। आप जितना मातम मनाएं …मैं शादी अमित से ही करुँगी। उसके पुरखों का मिरासी होना मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता …।”20 कहानी शिक्षित दलित-गैर दलित युवकों-युवतियों में अंतर्जातीय विवाह के प्रति बढ़ते रुझान की ओर संकेत करती है। जाति को लेकर शिक्षित गैर-दलित वर्ग की भी सोच बदलने लगी है। इसी तरह राज वाल्मीकि की ‘खुशबू अचानक’ कहानी अंतर्जातीय विवाह के प्रति नई पीढ़ी के दृढ़ संकल्प को रेखांकित करती है। कहानी का पात्र रोहित दलित और मोहिनी राजपूत समाज से है, दोनों एक-दूसरे को प्रेम करते हैं और तमाम बाधाओं का अनुमान होते हुए भी शादी करने का दृढ़ संकल्प करते हैं। रोहित मोहनी को खाप पंचायत एवं उसके कट्टर परम्परावादी राजपूत पिता की अडचनों के बारे में ध्यान दिलाता है, लेकिन मोहिनी बिना डरे व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए पहल करती है। कहानी अंतर्जातीय विवाह की पहल के लिए युवाओं को प्रेरित करती है और जाति व धर्म के बंधन को तोड़कर स्वतंत्र जीवन जीने के लिए प्रेरणा देती है।

लेकिन अंतर्जातीय विवाह को सामाजिक रूप से स्वीकृति नहीं मिली है। सवर्णों की नज़र में अंतर्जातीय विवाह का मतलब दलितों के साथ वैवाहिक संबंध बनाने से नहीं, बल्कि सवर्णों के बीच के वैवाहिक संबंध से है। जयप्रकाश कर्दम की ‘नो बार’ कहानी इसी ओर संकेत करती है। कहानी में अनीता के पिता को राजेश के दलित होने का अहसास होता है तो वह अपनी बेटी से उसकी जाति के बारे में पूछता है। इस पर अनिता जाति के औचित्य को दरकिनार करती है, लेकिन अनीता का पिता अपनी बात कहता है- “वह सब तो ठीक है कि हम जाति-पांति को नहीं मानते और हमने मैट्रोमोनियल में ‘नो बार’ छपवाया था। लेकिन फिर भी कुछ चीजे तो देखनी होती है। आखिर ‘नो बार’ का यह मतलब तो नहीं कि किसी चमार-चूहड़े के साथ …।”21 कहानी सैध्दांतिक एवं व्यावहारिक जीवन में अंतर का पर्दाफाश करती है। सवर्णवादी समाज के लिए अंतर्जातीय विवाह का संबंध ब्राह्मण-वैश्य-क्षत्रिय समाज से है, न कि दलितों के साथ। सवर्ण समाज अंतर्जातीय विवाह दलित समाज के साथ करना ही नहीं चाहता है। इसी तरह सूरजपाल चौहान की ‘हैरी कब आएगा?’ कहानी इसी यथार्थ को उजागर करती है। कहानी का पात्र हैरी मोनिका पर मुग्ध होकर उससे शादी करने का फैसला करता है। यहाँ तक इस संबंध में वह अपने माँ-बाप से भी बात कर लेता है। लेकिन जैसे ही हैरी को मोनिका के दलित जाति से होने का पता चलता है तो वह मोनिका से शादी करने का निर्णय बदल लेता है और मोनिका से मुंह मोड़ लेता है। यहाँ तो जातिप्रथा के चलते परस्पर प्यार और स्नेह का अर्थ ही बदल जाता हैं।

आज प्रेम विवाह के चलते अंतर्जातीय विवाह में बढ़ोतरी तो हुई है, लेकिन सामाजिक तौर पर अनुमति नहीं मिल पा रही है। इसमें समाज काफी अड़चने पैदा करता है, क्योंकि हमारा समाज पूर्वाग्रह से ग्रसित है और रुढिगत परम्पराओं में बंधा हुआ है, जिसके चलते प्रेम विवाह को ख़ारिज करता है। उनकी नज़र में प्रेम विवाह समाज के लिए अभिशाप जैसा कार्य है। यहाँ तक की समाज के परम्परावादी लोग अमानवीयता की हद पार करते हुए अंतर्जातीय विवाह करने वाले प्रेमी युगल को मौत के घाट उतार देते हैं। इस संदर्भ में भागीरथ मेघवाल की ‘सूरज की चिता’ कहानी अंतर्जातीय विवाह के प्रति सवर्णवादी समाज की अमानवीय मानसिकता को दर्शाती है। कहानी की नायिका चंदा गाँव के जमींदार ठाकुर की बेटी है, जो अपने गाँव के दलित युवक के साथ शहर भागकर पति-पत्नी के रूप में रहने लगती है। लेकिन चंदा के भाई द्वारा दोनों को धोखे से गाँव बुलाया जाता है और सरेआम सूरज को जिन्दा जला दिया जाता है।

अंतर्जातीय विवाह में जाति एक दीवार के रूप में खड़ी है। जाति-व्यवस्था को बनाए रखने में धर्म एवं शास्त्रों की अहम भूमिका रही हैं, क्योंकि हिन्दू समाज जाति को धर्म से जोड़कर देखता है। इस संदर्भ में बाबा साहब लिखते हैं- “अंतर्जातीय भोज एवं विवाह उन आस्थाओं और सिध्दांतों के प्रतिकूल हैं जिन्हें हिन्दू पवित्र मानते हैं। जातिप्रथा ईंट की दीवार या कांटेदार तारों की पंक्ति जैसी भौतिक वस्तु नहीं है जो हिन्दुओं को आपस में रोक रही हो, इसलिए उसे गिराना ही होगा।”22 इसलिए बाबा साहब अंतर्जातीय विवाह के लिए समाज को शास्त्रों एवं धर्म के आतंक से मुक्त कराने की बात करते हैं- “अंतर्जातीय विवाह और भोज कृत्रिम तरीके से जबरदस्ती घुट्टी पिलाने की तरह है। प्रत्येक स्त्री व पुरुष को शास्त्रों की गुलामी से मुक्त करना होगा। लोगों के मस्तिष्क को शास्त्रों पर आधारित घातक धारणाओं से स्वतंत्र करना होगा। तब ये सभी स्त्री-पुरुष आपके बताये बिना ही अंतर्जातीय भोज व विवाह करेंगे।”23 यही वजह है कि समाज धर्म एवं शास्त्रों के आतंक से मुक्त नहीं है और वह जाति-व्यवस्था में जकडा हुआ है, क्योंकि समाज में धर्म की पवित्रता के नष्ट होने से अनिष्ट की आशंका डर समाया हुआ है। इसलिए सबसे पहले इस डर को निकालना होगा, वरना जातिप्रथा के खात्मे के लिए अंतर्जातीय भोज एवं विवाह का अभियान सफल नहीं हो पायेगा। यही कारण है कि सैध्दांतिक जीवन में समानता की बात करने वाला सवर्ण समाज व्यावहारिक जीवन में जातिप्रथा से मुक्त नहीं हो पाया है। इसके लिए समाज को धर्म एवं शास्त्रों की घातक धारणाओं से निजात दिलानी होगी। अंतर्जातीय विवाह को लेकर लिखी गई दलित कहानी बाबा साहब डॉ.अम्बेडकर के विचारों को सही ढंग से व्याख्यित करती है, साथ ही अंतर्जातीय विवाह के संबंध में समाज की सोच को बारीकी से सामने रखती है।

दलित कहानी दलित आंदोलन की प्रमुख चुनौतियों से टकराती है। दलित आंदोलन में बड़ी चुनौतियां दलित समाज में आपसी अंतर्विरोध, उपजातियों में विभाजन, रूढ़ियों एवं आडम्बरों और शिक्षित दलित वर्ग में व्याप्त ब्राह्मणवादी मानसिकता, जातीय हीनताबोध एवं समाज के प्रति उनकी उदासीनता आदि हैं। ये समस्याएँ दलित आन्दोलन को कमजोर बना रही हैं। दलित आन्दोलन को आगे बढ़ाने के लिए इन चुनौतियों से निपटना अत्यंत आवश्यक है। दलित समाज भी उपजातियों में बंटा हुआ है। उनमें आपसी अंतर्विरोध बार-बार उभरकर सामने आता है । बाबा साहब ने ‘संगठित रहने’ पर जोर दिया था ताकी एकजुट होकर इस शोषणकारी वर्ण-व्यवस्था का खात्मा किया जा सके। दलित कहानी उनके बीच आपसी अन्तर्विरोधों से अवगत कराती हुई बाबा साहब के विचारों के मद्देनजर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करती है। जयप्रकाश कर्दम की ‘गोष्ठी’ कहानी बुद्धिजीवी दलित लेखकों के आपसी अन्तर्विरोध का पर्दाफाश करती है। कहानी भंगी और चमार जाति के लेखकों में जातीय-भेदभाव को दर्शाती है- “डॉ.समिपी ने बेझिझक कहा, “वह भंगी लगता है। देखो न अपने प्रत्येक लेख में वह ओमप्रकाश वाल्मीकि का उल्लेख जरुर करता है और वाल्मीकि को ही समस्त दलित लेखकों में सबसे ऊपर रखता है।”24 कहानी में दलित लेखक डॉ.समीपी का यह वाक्य उसकी संकीर्ण सोच को दर्शाता है। कुमार आदित्य डॉ.समीपी की इस संकीर्ण सोच पर अफ़सोस व्यक्त करता है- “कुमार आदित्य, डॉ.सुमन समीपी को, बौद्ध और अम्बेडकरवादी आन्दोलन से जुड़ा होने के कारण समन्वयवादी व्यक्ति समझते थे। डॉ.समीपी के मुख से इस तरह की संकीर्णतापूर्ण बातें सुनकर उनको धक्का सा लगा और वह सोचने को विवश हुए कि यह कैसा अम्बेडकरवाद है? बाबा साहब अम्बेडकर ने जीवन-भर जाति का विरोध किया और जाति-विहीन समाज के निर्माण के लिए संघर्षरत रहे। फिर कैसे उनका कोई अनुयायी जाति-संकीर्णता की बात कर सकता है?”25 इस तरह के दलितों में व्याप्त उपजातिगत भेदभाव जाति एवं वर्ण व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। समानता, समता, बंधुत्व की बातें करने वाले दलित बौद्धिक वर्ग व्यवहार में उपजातिगत भेदभाव से ग्रसित हैं। दलित आंदोलन का उद्देश्य भेदभाव रहित, समानता पर आधारित समाज की स्थापना करना है। इसके लिए दलितों को उपजातिगत भेदभाव त्यागकर संगठित संघर्ष करना होगा। इस संदर्भ में कुमार आदित्य के माध्यम से जयप्रकाश कर्दम कहानी में दर्शाते हैं- “सबसे पहले हम भंगी और चमार, सभी पढ़े-लिखे और समझदार लोगों को यह समझाने का प्रयास करेंगे कि हमारी आर्थिक दुर्दशा और सामाजिक पिछड़ेपन का कारण हमारी जाति हैं। हमें जाति व्यवस्था का विरोध करना चाहिए। हमारी उन्नति और विकास जाति-व्यवस्था के नाश पर टिका हुआ है। हमें जातिवाद से ऊपर उठना चाहिए और इसके लिए हमें चाहिए कि हम अपने अन्दर से जाति-भेद की दूरी को मिटायें।…हम लोगों को बताए कि वे आपस में रोटी-बेटी के संबंध बनायें। रक्त संबंध बनाने से अपने आप नजदीकियां आ जाएगी।”26 कहानी डॉ. अम्बेडकर के रोटी-बेटी के संबंध की वैचारिकी के माध्यम से दलितों को जाति-वर्ण व्यवस्था के नाश के लिए संगठित संघर्ष के लिए आह्वान करती है। आवश्यक कि सबसे पहले दलित समाज में व्याप्त उपजातिगत भेदभाव को ख़त्म करें। शिक्षित वर्ग को प्रेम विवाह के माध्यम से उपजातिगत भेदभाव को खत्म करने की ओर कदम उठाने चाहिए।

इसी क्रम में ओमप्रकाश वाल्मीकि ‘शवयात्रा’ कहानी दलितों में भंगी और चमार जाति के आपसी अंतर्विरोधों को सामने लाती हैं। कहानी में सुरजा बल्हार शहर से पैसा कमाकर लाता है और वह पक्का मकान बनाना चाहता है। लेकिन चमारों द्वारा उसका पक्का मकान नहीं बनने दिया जाता है। चमारों की निष्ठुरता का दूसरा उदाहरण सुरजा की दस वर्षीय पोती, कल्लन की बेटी सलोनी की डॉक्टर द्वारा न देखने के कारण मृत्यु हो जाती है और बीमार पोती के इलाज में अपेक्षित मदद नहीं मिलती है। यहाँ तक उस बच्ची के दाह-संस्कार के लिए चमार अपने श्मशान घाट के प्रयोग की अनुमति नहीं देते हैं। चमारों का भंगी समाज के प्रति संवेदनशून्य होना दलित समाज की सामूहिक दुर्बलता की ओर संकेत करता है। दलितों में व्याप्त उपजातियां दलितों में सामूहिकता की भावना को पनपने नहीं दे रही हैं। यह कहानी दलितों में व्याप्त कोरे अम्बेडकरवाद का भी फर्दाफाश करती है। यह कहानी दलितों को गंभीरता से विचार करने पर विवश करती है, अन्यथा उनकी शक्ति विघटित रहेगी और वे मुक्ति की चाह को मूर्त रूप नहीं दे सकेंगे। इस संदर्भ में डॉ.पूरणसिंह की ‘अंतर्कलह’ कहानी भी दलित समाज में व्याप्त भेदभाव को उजागर करती है। इसमें जाटव और वाल्मीकि समाज में आपसी मतभेद को दर्शाया गया है। दलितों में आपसी अन्तर्विरोध ब्राह्मणवाद, जातिवाद के खिलाफ उनकी लड़ाई को कमजोर बना रहा है।

लेकिन ये सोचनीय है कि दलितों में भी यह उप-जातिगत भेदभाव आख़िर पनपा कैसे? इसे समझना होगा कि दलितों में भी उपजातियां क्यों और कैसे पनपी? इसकी तह में जाने पर हम जानेगें कि समाज में वर्ण-जाति सवर्णों ने बनाये, उन्होंने ही दलितों को भी उपजातियों में बाँट दिया, ताकी दलित इस जाति-वर्णव्यवस्था के खिलाफ़ संगठित न हो पाए। इस संदर्भ में महात्मा ज्योतिबा फुले ‘गुलामगिरी’ में लिखते हैं- “जब से ब्राह्मणों ने शूद्रादि-अतिशूद्रों में जातिभेद की भावना को पैदा किया, बढ़ावा दिया, तब से उन सभी के मन-मस्तिष्क आपस में उलझ गए और घृणा से अलग-अलग हो गए। ब्राह्मण-पुरोहित अपने षडयंत्र में कामयाब हुए। उनको अपना मनचाहे व्यवहार करने की पूरी स्वतंत्रता मिल गयी। इस बारे में एक कहावत प्रसिद्ध है कि ‘दोनों का झगड़ा और तीसरे का लाभ’। मतलब यह कि ब्राह्मण-पंडा-पुरोहित ने शूद्रादि-अतिशूद्रों के आपस में नफरत के बीज जहर की तरह बो दिए और खुद उन सभी की मेहनत पर ऐशों-आराम कर रहे हैं।”27 इस संदर्भ में डॉ.सुरेश मारुतिराव मुले की ‘गुरु देवो भव’ कहानी सवर्णों की साजिशों का पर्दाफाश करती है। कहानी में ब्राह्मण शिक्षक दलित शिक्षकों में फूट डालने के फ़िराक में लगे रहते हैं। गणित का प्राध्यापक एक दलित शिक्षक पर कॉलेज की प्राध्यापिका के सामने टिप्पणी करता है, तो वह उसकी ब्राह्मणवादी मानसिकता पर प्रहार करती है- “वह अगर अब्राहम लिंकन है तो तुम क्या हिटलर हो? हम जो एकता से रहते हैं सो सुहाता नहीं? तुम लोग युगों-युगों से दलितों में फूट डालते आए हो और आज आधुनिक युग में भी ऐसा काम करते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती? जब शिक्षित दलितों का ही तुम लोग आज तक शोषण कर रहे हो। तो क्या हमारे अशिक्षित और कमजोर मासूम दलितों को जीने दोगे? होशियार? आइन्दा ऐसी बाते होगी तो मुंह की खानी पड़ेगी।”28 कहानी सवर्णों की दलितों में फूट डालने की साजिश को बेनकाब करती है और उनकी असलियत का पर्दाफाश करती है। साथ ही दलितों को संगठित संघर्ष के लिये प्रेरित भी करती है|

दलितों में आपसी अंतर्विरोध एवं भेदभाव के अतिरिक्त कतिपय शिक्षित दलित युवकों में पनप रहे ब्राह्मणवाद एवं जाति को लेकर हीनताबोध और समाज के प्रति उदासीनता दलित आन्दोलन की नींव को कमजोर कर रही है। शिक्षित दलित युवक अच्छे ओहदों पर पहुंचकर अपनी ही समाज को हेय की दृष्टि से देखते हैं। वे समाज में अपना स्टेटस बनाए रखने के लिए अपनी जाति को छिपाते हैं, इसके चलते वे अपनी बिरादरी से नाता तोड़कर अपनी जाति छिपाकर ब्राह्मणवादी जीवन जी रहे हैं। वे भूल जाते हैं कि जिस जातिप्रथा एवं ब्राह्मणवाद के विरुद्ध बाबा साहब ने लड़ाई लड़ी और उनके संघर्षों के चलते आज उन्हें सम्माननीय जीवन जीने के अधिकार मिले हैं, उसी ब्राह्मणवाद और भेदभाव को ये दलित युवक बढ़ावा दे रहे हैं। दलित कहानी इस यथार्थ को सामने लाती है कि आज का शिक्षित दलित वर्ग इस ब्राह्मणवाद के कुचक्र में फंस रहा है। इस संदर्भ में डॉ.उमेश कुमार सिंह की ‘माफ़ी’ कहानी दलितों में व्याप्त ब्राह्मणवाद को दर्शाती है। ‘माफ़ी’ कहानी में दलित पात्र कप्तान रघुनाथ परवार अपने आपको अपनी बिरादरी से अलग समझता है। अपने ऊँचे पद एवं संपन्नता के चलते वह अपनी जाति-बिरादरी के प्रति उत्तरदायित्व से विमुख हो गया, यहाँ तक कि अपने ही समाज के प्रति हेय दृष्टिकोण अपनाते हुये उनका अपमानित तक करता है। जब गाँव का पीड़ित वृद्ध सखाराम परवार जब उसके यहाँ बंगले पर जाता है, तो उसे अपमानित करके बंगले से निकलवा देता है। वह गाँव का नाम सुनते ही गुस्से में आकर उस पर बरस पड़ता है- “शर्म नहीं आती है तुम्हें, बिना बात शिकायत लेकर चले आते हो। नहा धोकर नहीं आ सकते हैं। कम से कम नए कपड़े पहनकर आते। साले भंगी चमारों की तरह चले आते हैं। अपने बाप का घर समझ रखा है।”29 जिस समाज ने रघुनाथ को अच्छे पद पर पहुँचने के काबिल बनाया, आज उसी समाज के प्रति उनका नजरिया ब्राह्मणवादी हो गया है। इस तरह कहानी नौकरीपेशा दलितों में व्याप्त ब्राह्मणवादी मानसिकता को दर्शाती है।

इसी क्रम में सत्यप्रकाश ‘दलित ब्राह्मण’ कहानी में दलितों में व्याप्त ब्राह्मणवादी मानसिकता को दर्शाते हुये चिंता जाहिर करते हैं। कहानी में दलित विजय रंजन कुरील भारत सरकार का उच्चाधिकारी है, लेकिन दलितों के प्रति हेय दृष्टि रखता है तथा समाज के प्रति उत्तरदायित्व से विमुख रहता है। इससे चिंतित शिवदत साहब उसे समझाते है- “देखिये बंधु, आज मैं या आप जिस पद पर है हमें वहां पहुँचाने में समाज ने भी त्याग किया। उसका भी योगदान है इसमें। अहम भूमिका निभाई है समाज ने उसमें। हमें अपने सामाजिक दायित्वों को कदापि न भूलना चाहिए। उसके हितों की रक्षा के प्रति कटिबद्ध होना चाहिए।”30 कहानी में माहेश्वरी साहब भी उनके कोरे अम्बेडकरवाद पर सवाल खड़ा करता है। अगर शिक्षित दलित समुदाय दलित समाज का उचित प्रतिनिधित्त्व नहीं करता है तो वह भी दलितों की नज़र में शोषक ही कहलायेगा। ऐसे में ब्राह्मणवादी समाज और उनमें कोई फ़र्क नहीं रह जाता है। यह कहानी ब्राह्मणवादी शिक्षित दलित वर्ग को कठघरे में खड़ा करती है। बाबा साहब अम्बेडकर ने लम्बे संघर्ष के दौरान दलित समाज को अधिकार दिलवाए, बावजूद ये लोग उनके त्याग एवं संघर्ष को भूल जाते हैं। ये अपने ही समाज के प्रति ब्राह्मणवादी रवैया अपनाते हैं। कहानी में कतिपय दलितों में पनप रही ब्राह्मणवादी मानसिकता का यथार्थ चित्रण किया गया है। इसी तरह ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘अंधड़’ कहानी शिक्षित दलित वर्ग की मानसिकता को उजागर करती है, साथ ही उसमें बदलाव की और भी संकेत करती है। कहानी के नायक मिस्टर लाल वैज्ञानिक पद पर आसीन है। कई वर्षों बाद वह अपनी छोटी बच्ची पिंकी को लेकर अपने माँ-पिताजी के घर आता है, तो उसकी बच्ची पिंकी उन्हें असभ्य और गंदा कहती है। इस पर मिस्टर एस.लाल पश्चाताप करता हैं कि उसने एक झूठी जिन्दगी को सच मानकर अपने माता-पिता के योगदान को ही भूला दिया। कहानी कतिपय शिक्षित वर्ग की इस संकीर्ण मानसिकता का चित्रण कराती है, साथ मानसिक बदलाव की ओर संकेत करती है। इस तरह दलित कहानी बाबा सहाब डॉ.अम्बेडकर के लम्बे संघर्ष और त्याग के बारें में शिक्षित दलित युवकों को अवगत कराती है। दलित कहानी शिक्षित दलित समुदाय को आत्मशोध के लिए विवश करती है और संकीर्ण ब्राह्मणवादी मानसिकता के प्रति सचेत करती है, साथ ही दलित समाज की उन्नति के लिए उत्तरदायित्व की भावना के लिए प्रेरित करती है।

दलित कहानी की वैचारिक प्रतिबद्धता घृणा, हिंसा और प्रतिशोध के स्थान पर समता, करुणा, भातृत्व और प्रतिरोध पर आधारित है। ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी ‘मुंबई कांड’ में यह वैचारिक प्रतिबद्धता साकार होती है। कहानी का दलित पात्र मुंबई कांड के प्रतिक्रियास्वरूप महात्मा गाँधी की मूर्ति पर जूते की माला पहनाने के लिए उठ खड़ा होता है, लेकिन ऐसा करने से पूर्व उसके कदम रुक जाते है और वह सोचता है- “अरे! मैं यह क्या कर रहा हूँ। मुंबई में किसी ने मेरे विश्वास पर चोट की और मैं यहाँ की आस्था पर चोट करने जा रहा हूँ। कुछ गांधीजी को ‘बापू’ कहते हैं और कुछ अम्बेडकर को ‘बाबा’; वहाँ ‘बाबा’ कहने वाले मारे गए, यहाँ बापू वाले मारे जा सकते हैं। ‘बाबा’ कहने वालों पर भी गाज गिर सकती है। जो भी मरे तो निर्दोष ही मारे जायेगे …नहीं …यह रास्ता न बुद्ध का है और न ही अम्बेडकर का।”31 कहानी प्रतिशोध और प्रतिरोध की बारीकियों को स्पष्ट करती है। बाबा साहब ने वर्णव्यवस्था के खात्मे के लिए मनुस्मृति दहन किया, चावदार तालाब का पानी पिया और कालाराम मंदिर में प्रवेश करने जैसे क्रांतिकारी कदम उठा़ये और दलितों में संगठित चेतना जाग्रत की। उन्होंने प्रतिक्रियास्वरूप कभी भी हिंसक कदम उठा़ने के लिए प्रेरित नहीं किया। यह कहानी बाबा साहब के इन विचारों को बारीकी से समझाती है। इसी तरह रूपनारायण सोनकर की ‘होली का बल्ला तरे तरे’ कहानी बाबा साहब की वैचारिकी को दर्शाती है। कहानी में सवर्ण समाज होली के अवसर पर दलित स्त्रियों को गाली देता है, जिसकी प्रतिक्रिया में दलित समाज भी सवर्ण स्त्रियों को गाली देता है। दोनों तरफ़ से ही औरतें ही जलील होती हैं, इस पर ब्लॉक प्रमुख बलवंत यादव फटकार लगाता है-“न कोई उच्च है और न कोई नीच है। विश्व के किसी भी देश में त्यौहारों में किसी भी औरत को गाली देने की प्रथा नहीं है।”32 इससे प्रभावित दलित समाज सोचने को विवश होता हैं और किसी भी औरत को इस तरह लज्जित न करने का संकल्प लेता है- “संगीलाल, सैद्धालाल व अन्य युवक इस प्रकार की गंभीर सामाजिक बुराईयों को दूर करने के लिए कोई ऐसा रास्ता खोज रहे थे जहाँ किसी भी औरत को इस तरह सरेआम लज्जित न होना पड़े।”33 प्रतिशोध की भावना से समस्या का समाधान सतही ही होगा और इससे समाज में द्वेष एवं घृणा का भाव फैलने लगेगा। कहानी में पुरुषवादी मानसिकता को भी दर्शाया गया है। भारतीय समाज खासकर हिन्दुओं में औरतों के नाम पर गाली-गलौच किया जाता रहा है, चाहे औरत किसी भी समाज की हो। औरतें सदियों से पुरुषवादी मानसिकता की शिकार रही है। उनका सदियों से शोषण होता रहा है। किसी भी सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन हिंसा तथा प्रतिशोध से नहीं किया जा सकता, इससे समस्या को जड़ से खत्म नहीं कर सकते। हमारे सामने देश विभाजन के समय हिन्दू–मुस्लिम दंगों का इतिहास गवाह है कि इस प्रतिशोध की आग में ना जाने कितनी बेगुनाह हिन्दू–मुस्लिम औरतों की अस्मिता तार-तार हुई और कितने ही मासूम बच्चे और औरतें अपनों से दूर बिछुड़ गये। इस प्रतिशोध की आग में त्रासदी के अलावा कुछ प्राप्त नहीं हुआ। इसलिए बाबा साहब व्यक्ति की बजाय व्यवस्था के विरुध्द प्रतिरोध करने पर जोर देते हैं। उनका मानना हैं कि ‘असली दुश्मन ये भेदभाव आधारित धर्म-शास्त्र है और समाज इनके बंधन में बंधा हुआ है’।

प्रतिशोध की भावना से लिखी गयी दलित कहानी को दलित साहित्य के दायरे अंतर्गत नहीं रखा जा सकता है। इसी संदर्भ में रत्नकुमार सांभरिया की ‘शर्त’ कहानी है, जिसमें दलित पानाराम की बेटी के साथ गावं के मुखिया जसवीर का बेटा बलात्कार करता है। मुखिया जसवीर पानाराम से इस घटना पर दुःख व्यक्त करता है और पानाराम की कुछ भी शर्त मानने के लिए तैयार होता है। तो पनाराम मुखिया के सामने शर्त रखता है- “मुखिया साब, इज्जत का सवाल है यह। आपकी इज्जत सो मेरी इज्जत। आपकी लड़की मेरे लड़के के साथ रात रहेगी।”34 कहानी में पानाराम बेहूदी शर्त रखता है कि लड़की की बेआबरू का बदला मुखिया की लड़की को बेआबरू करना। पानाराम और जसबीर दोनों की बेटी बेकसूर हैं, लेकिन इस प्रतिशोध की आग में वह मुखिया जसबीर की बेटी को बेआबरू करवाने की शर्त रखता है। इस तरह की कहानी को दलित कहानी के दायरे के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता। इस तरह का साहित्य दलित आंदोलन एवं बाबा साहब के आदर्श समाज के लिए मददगार साबित नहीं हो सकता है। दलित कहानी डॉ.अम्बेडकर व महात्मा फुले की वैचारिकी को लेकर आगे बढ़ती है और उनकी वैचारिकी में घृणा व प्रतिशोध का भाव कहीं नहीं आता है।

भारतीय मार्क्सवादी दलितों की समस्या को आर्थिक दृष्टि के मद्देनज़र देखते हैं। वे अन्य सुधारों की तुलना में आर्थिक सुधारों को प्राथमिकता देते हैं, जबकि दलितों की मूल समस्या जाति की समस्या है। इस विषय पर बाबा साहब लिखते हैं- “जाति एक ऐसा राक्षस है जो आपका रास्ता काटेगा। जब तक आप इस राक्षस को नहीं मारते तब तक आप न तो कोई राजनीतिक सुधार कर सकते हैं और न ही आर्थिक सुधार कर सकते है।”35 यानी जाति-व्यवस्था एवं वर्णव्यवस्था का खात्मा किये बगैर सुधार लाना संभव नहीं है। मार्क्सवादी मानते हैं कि जाति-वर्णव्यवस्था की समस्या श्रम के विभाजन से जुड़ी हुयी है| लेकिन जातिव्यवस्था के चलते श्रम विभाजन ही नहीं, श्रमिकों का भी विभाजन होता है। लाल झंडे वाले मार्क्सवादी संगठन व्यवस्था में परिवर्तन की बात करते हैं, बगैर इस वर्णव्यवस्था का खात्मा किये। इस विषय पर बाबा साहब लिखते हैं- “आर्थिक क्रांति के लिए श्रमिकों में उत्साह भरने के लिए कार्ल मार्क्स ने उनसे कहा,‘आपके पास बेड़ियों के अलावा खोने के लिए कुछ नहीं है।’ लेकिन जातिप्रथा के विरुद्ध हिन्दुओं को जगाने के लिए कार्ल मार्क्स का यह नारा बिलकुल बेकार है। क्योंकि हिन्दुओं के बीच सामाजिक एवं आर्थिक अधिकार बड़ी सुन्दरता से बंटे हुए है। कुछ जातियों के पास कम और कुछ के पास अधिक है।”37 सही मायने में हिन्दुत्ववादी भारतीय समाज में मार्क्सवादी विचारधारा जातिगत-भेदभाव को खत्म करने में कामयाब नहीं दिखायी पड़ती है| दूसरी सबसे बड़ी समस्या यह है कि भारतीय मार्क्सवादी अपने पूर्वाग्रह से ग्रसित है| यानी मार्क्सवाद के नाम पर छलावा भी कर रहे है| अपने आप को प्रगितशील मानने वाले भीतर से ब्राह्मणवादी मानसिकता में जकड़े हुये है| इसी सन्दर्भ में ओमप्रकाश वाल्मीकि ‘प्रमोशन’ कहानी में मार्क्सवादियों के दोहरे चरित्र का पर्दाफ़ाश करते हैं। कहानी में दलित पात्र सुरेश की स्वीपर पद से कामगार के पद पर पदोन्नति होती है, इससे खुश सुरेश अपनी पत्नी से कहता है ‘अब हम भंगी नहीं रहे, मजदूर हो गये है और मजदूर-मजदूर भाई-भाई होते हैं।’ मजदूर बनने के बाद वह ‘लाल झंडा यूनियन’ का सदस्य बन जाता है, लेकिन मजदूर-यूनियन के सदस्य सुरेश के साथ जातिगत भेदभाव करते हैं। यानी ये मार्क्सवादी संगठन मजदूरों, किसानों के हित की बात तो करते हैं, लेकिन ये व्यवहार में हिंदुत्व के रक्षक बने बैठे हैं। जब सुरेश की ड्यूटी केमिकल प्लांट में मजदूरों को दूध वितरण करने में लगती है तो उसके साथी मजदूर इसका विरोध करते हैं। उसका साथी मजदूर अब्दुल कादिर कहता है- “साहब आपको पता नहीं …सुरेश स्वीपर है …उसके हाथ की कोई चीज कैसे खा पी सकता है।”38 इस तरह सुरेश मजदूर बनकर भी स्वीपर ही रहता है। मार्क्स के सिद्धांत पर ‘मजदूर-मजदूर भाई- भाई’ के नारे देने वाले मार्क्सवादी संगठन एवं पार्टियाँ दलित मजदूरों का वही स्थान रखते हैं, जो बाह्मणवादी समाज में निश्चित है। यह कहानी भारतीय मार्क्सवाद के असली चेहरे का पर्दाफाश करती है, जो विचारधारा के स्तर पर समाजवाद की बात करता है, लेकिन व्यवहार में वर्ण-व्यवस्था के पोषक बने हुए हैं। जब तक मार्क्सवादी जाति एवं वर्णव्यवस्था को प्रमुख मुद्दे के रूप में नहीं उठायेंगे, तब तक वे दलितों के हितेषी नहीं बन सकते हैं।

इसी क्रम में डॉ.जयप्रकाश कर्दम की ‘कामरेड का घर’ कहानी भारत में मार्क्सवादियों के दोहरे चरित्र का पर्दाफाश करती है। कहानी में कॉमरेड अभय तिवारी मार्क्सवाद का चोला ओढ़े हिंदुत्व को संरक्षण देता है, तो उसका साथी असलम उसके इस दोगलेपन का प्रतिकार करता है- “मेरे यहाँ रुकने का अब कोई औचित्य नहीं है। मैं तो यह मानकर चल रहा था कि आप लोग सच में प्रगतिशील है और परिवर्तन के अपने संकल्प के प्रति ईमानदार है। इसलिए मैं आप लोगों के साथ जुड़ा था। लेकिन आप लोग तो अन्दर से हिन्दू धार्मिकवाद में पूरी तरह से जकड़े हुए है और उसकी रक्षा कर रहे हैं। ऐसे आपसे कोई उम्मीद करना बेमानी है। आपके सिद्धांत और व्यवहार के दोगलेपन ने मुझे निराश किया है। मैं इस दोगलेपन के साथ नहीं रह सकता।”36 कहानी मार्क्सवादियों के छद्म वेश की पोल खोलती है और उनके अन्दर व्याप्त ब्राह्मणवादी मानसिकता को बेनकाब करती है। भारतीय मार्क्सवादी व्यवहारिक जीवन में पहले हिन्दू है और बाद में मार्क्सवादी। वे अपने व्यवहारिक जीवन में जाति-व्यवस्था, वर्णव्यवस्था को अपनाते हैं और सिध्दांतों में मार्क्सवाद की बात करते हैं। इस तरह ये मार्क्सवाद और ब्राह्मणवाद दोनों को एक साथ लेकर चलते हैं।

दलितों का शोषण धर्म एवं शास्त्रों की आड़ में होता रहा है। शोषणकारी धर्म एवं शास्त्रों की पवित्रता एवं श्रेष्ठता के चलते सदियों से दलितों का शोषण होता रहा है। डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने इस वर्णव्यवस्था के खात्मे के लिए शास्त्रों, वेदों, उपनिषदों व ईश्वर का नकार किया। बाबा साहब धर्म एवं शास्त्रों की पवित्रता एवं श्रेष्ठता के भ्रम को तोड़ते हैं और दलितों को आह्वान करते हुए लिखते हैं- “आपको तर्क न मानने वाले और नैतिकता को नकारने वाले वेदों व शास्त्रों को बारूद से उड़ा देना होगा। श्रुति एवं स्मृति के धर्म को खत्म करना होगा। इसके अलावा और कुछ करना लाभदायक नहीं होगा। इस मामले में मेरा यही मत है।”39 बाबा साहब जाति व्यवस्था का असली शत्रु शास्त्रों को मानते हैं। इस संदर्भ में वे लिखते हैं- “हिन्दू इसलिए जातिप्रथा का पालन नहीं करते क्योंकि वे अमानुषिक हैं या असंतुलित मस्तिष्क के हैं। वे जातिप्रथा को मानते हैं, क्योंकि वे धर्म को गंभीरता से लेते हैं। जातिप्रथा का पालन करने वाले लोग गलत नहीं है । मेरी राय में जाति की धारणा से धर्म को जोड़ना गलत है। यदि यह ठीक है तो जिस असली शत्रु से हमें जूझना है वे शास्त्र हैं जो जाति का धर्म सिखाते हैं, न कि वो लोग जो जातिप्रथा का पालन करते हैं।…शास्त्रों की पवित्रता में लोगों के विश्वास को ख़त्म करना वास्तविक उपचार है। …शास्त्रों की सत्ता को चुनौती न देकर, लोगों को उनकी पवित्रता व स्वीकृति में विश्वास देने की अनुमति देकर, उनकी आलोचना करना उनको कर्मों के लिए अमानुषिक व विवेकहीन कहकर कोसना, सामाजिक सुधार का बड़ा बेतुका तरीका है।”40 दलित कहानी इस वर्णव्यवस्था के खात्मे के लिए शोषणकारी हिंदू धर्मशास्त्रों का नकार करती है। ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘सपना’ कहानी बाबा साहब की इसी वैचारिकी को दर्शाती है। कहानी में दलित पात्र गौतम मंदिर के निर्माण में दिन-रात मेहनत करता है और जब मंदिर में पूजा अनुष्ठान होता है, तो उसे मंदिर के बाहर बैठने को कहा जाता है। गौतम जब इसका विरोध करता, तो नटराजन शास्त्रों की पवित्रता एवं सामाजिक नियमों के हवाला देते हुये कहता है कि गौतम दलित है, इसलिए इसे पूजा-अनुष्ठानों में नहीं बैठाया जा सकता है। कहानी शास्त्रों की पवित्रता एवं सामाजिक नियमों के आड़ में हो रहे भेदभाव का पर्दाफाश करती है। कहानी का सवर्ण पात्र ऋषिराज शास्त्रों एवं नियमों की पवित्रता एवं श्रेष्ठता को तोड़ता है। गौतम भी इन अनुष्ठानों का बहिष्कार करता है- “चलो ,भाई हम लोग घर चलते है। ऐसे अनुष्ठानों में बैठकर क्या होगा, जहाँ आदमी को आदमी की तरह न समझा जाए।”41 कहानी में ऋषि नामक पात्र गौतम को परिस्थिति से लड़ने के लिए प्रेरित करता है। ‘सपना’ कहानी वर्णव्यवस्था के विरुद्ध सीधी कार्यवाही के लिए प्रेरित करती है, साथ ही धर्मशास्त्रों-धार्मिक अनुष्ठानों की पवित्रता एवं श्रेष्ठता का निषेध करती है।

ऐसा नहीं है कि बाबा साहब समाज के लिए धर्म की आवश्यकता को नकारते हैं, बल्कि वो समाज के लिए लोकतांत्रिक धर्म की आवश्यकता पर जोर देते हैं- “आप अपने धर्म को अनिवार्य रूप से सैद्धांतिक आधार दें- एक ऐसा आधार जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का पर्याय हो- तात्पर्य यह है कि जो आपके धर्म को लोकतांत्रिक आधार दें।”42 इस तरह वे स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित धर्म की वकालत करते हैं। डॉ.जयप्रकाश कर्दम ‘मंदिर’ कहानी में रंगलाल धर्म के नाम पर कर रहे अनैतिक और गैर-कानूनी कार्य कर रहे लोगों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करता है- “मेरे बारे में आप कोई भी धारणा बना सकते हैं। आप लोग इसके लिए स्वतंत्र हैं, मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करूँगा। किन्तु, यदि अनैतिक और गैर-क़ानूनी काम करना धर्म है तो अच्छा है मुझे अधार्मिक ही मानिये। धर्म यदि यह सब सिखाता है तो मैं कभी धार्मिक नहीं होना चाहूँगा। और यदि अन्याय और अनैतिकता का साथ न देना असामाजिकता है तो मैं स्वयं को असामाजिक माना जाना पसंद करूँगा।”43 इस तरह कहानी धर्म के नाम पर अनैतिकता और अन्याय का विरोध करती है। इसी संदर्भ में सत्यप्रकाश की ‘बिरादरी भोज’ कहानी में निरर्थक परम्पराओं एवं रीति-रिवाजों का प्रतिकार किया गया है। कहानी में दलित पात्र निरर्थक मृत्युभोज परम्परा का बहिष्कार करता है और पिता के मृत्युभोज पर मिले कर्ज़ से खेतों की सिचाई के लिए इंजन खरीद लाता है। इसी तरह ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘सलाम’ कहानी वर्षों से चली आ रही अपमानजनक सलाम प्रथा को तोड़ती है। इसी तरह डॉ.कुसुम वियोगी की ‘मुंडन’ कहानी भी धार्मिक कर्मकांडों का खंडन करती है, कहानी का पात्र दिनेश अपनी बच्ची के बाल गंगा घाट पर बैठे पाखंडी पंडों द्वारा न उतरवाकर नाई के द्वारा उतरवाता है। इस प्रकार दलित कहानी शोषण के तमाम धार्मिक-ग्रंथों, धार्मिक-अनुष्ठानों, परम्पराओं एवं रीति-रिवाजों को तोड़ती है और दलितों को परिवतर्न के लिये प्रेरित करती है।

धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर स्वार्थी लोग समाज में दंगे-फसाद फैलाते रहे हैं। इस सन्दर्भ में बाबा साहब डॉ.भीमराव अम्बेडकर लिखते हैं- “जाति ने हालांकि एक काम किया है। इसने हिन्दू समाज को पूरी तरह से असंगठित और अनैतिक अवस्था में ला दिया है। …यह तो जातियों का समूह मात्र है। प्रत्येक जाति अपने अस्तित्व के प्रति सचेत है। इनका अस्तित्व जाति-व्यवस्था के जारी रहने का कुल परिणाम है। जातियां एक संघ भी नहीं बनाती। कोई जाति दूसरी जातियों से जुड़ने की भी भावना नहीं रखती, सिर्फ़ हिन्दू-मुस्लिम दंगे के समय ये आपस में जुडती है।”44 रूपनारायण सोनकर की ‘सद्गति’ कहानी धर्म के नाम पर स्वार्थी लोगों द्वारा फैलाये जा रहे धार्मिक-उन्मांद और भेदभाव पर कुठाराघात करती है। कहानी का पात्र मियां शब्बीर अंततः ग्लानि महसूस करता हुआ कहता है- “मैंने गुनाह किये हैं। मैं मानवता को भूल गया था। स्वार्थ, अँधा धर्म और मजहब ने मुझे बिलकुल अंधा कर दिया था। हम दोनों समुदाय के लोग भाई-भाई हैं। मैंने अपने भाइयों को मारकर बहुत बड़ा अपराध किया है। मुझे सजा मिलनी चाहिए।”45 इसी संदर्भ में डॉ.पूरण सिंह की ‘यूज एंड थ्रो’ कहानी धर्म के नाम पर दंगा फ़ैलाने वाले स्वार्थी लोगों से सचेत करती है। कहानी में दलितों एवं गरीबों को धर्म के पुजारी धर्म के नाम पर इस्तेमाल करते हैं। जैसा कि बाबा साहब ने कहा कि ‘विभिन्न जातियों में बंटे लोग हिन्दू-मुस्लिम दंगों के समय एक हो जाते हैं’। कहानी इसी तरफ इशारा करती है कि दलित श्यामलाल पर सवर्णों ने अमानवीय व्यवहार किया। फिर भी धर्म के नाम पर वह उनके जाल में फंस जाता है और उनका साथ देता है। श्यामलाल की पत्नी उन्हें इस चालाकी के प्रति सचेत करती है कि इन मुसलमानों ने तुम्हें कभी अपमानित नहीं किया फिर तुम इन धूर्त ब्राह्मणों की बातों में आकर उनकी जान के दुश्मन क्यों बने हो। लेकिन श्यामलाल चुपके से रात को इस स्वार्थी धर्म के ठेकेदारों के साथ चला जाता है और दंगे के बलि चढ़ जाता है। जब शांडिल्य साहब श्यामा को हिन्दू-मुस्लिम लड़ाई में फंसाना चाहता है, उसकी माँ उसे रोकती है और कहती है- “ये धर्म सम्प्रदाय! और झूठ तथा ढोंग के सहारे लोगों को धोखा देने वाले लोग, तुम्हें कभी चैन से नहीं सोने देंगे।”46 इस तरह कहानी धर्म एवं सम्प्रदाय के नाम पर दंगा फ़ैलाने वाले स्वार्थी लोगों का पर्दाफाश करती हुई सचेत करती हैं। ये स्वार्थी लोग धर्म के नाम पर दंगा करवाकर राजनीतिक दांवपेंच खेलते हैं और इनके चलते बेगुनाह लोग दंगों बलि चढ़ जाते हैं।

दलितों की स्थिति सुधारने के लिए डॉ.अम्बेडकर राजनीतिक ताकत को महत्वपूर्ण मानते हैं। उनका मानना था कि ‘राजनीतिक अधिकारों के जरिये दुर्बल वर्ग सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक अधिकार प्राप्त करेंगे’। इस संदर्भ में उन्होंने प्रथम गोलमेज सम्मलेन में कहा था कि -“हमें बार-बार याद दिलाया जाता है कि दलित वर्गों की समस्या सामाजिक समस्या है और उसका समाधान राजनीति में नहीं है। हम इस विचार का जोरदार विरोध करते हैं। हम यह महसूस करते हैं कि जब तक दलित वर्गों के हाथों में राजनीतिक सत्ता नहीं आती, उनकी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।”47 बाबा साहब ने इसी आवश्यकता को महसूस किया, इसलिए उन्होंने 1936 में ‘स्वतंत्र मजदूर पक्ष’, 1942 में ‘रिपब्लिकन पार्टी’ की स्थापना की। उनका मानना था कि राजनैतिक शक्ति ही दलितों के सर्वांगीण विकास की चाबी है। इसी वैचारिकी को डॉ.जयप्रकाश कर्दम ‘रास्ते’ कहानी में दलित छात्रों की पार्टी ‘स्टूडेंट्स फेडरेशन’ के माध्यम से दर्शाते हैं। दलित छात्र संगठन की आवश्यकता के संदर्भ में लेखक पार्टी अध्यक्ष ब्रहमसिंह के माध्यम से अपना दृष्टिकोण रखते हैं। इस संदर्भ में ब्रहमसिंह कहता है- “यहाँ पर एन.एस.यू.आई. और ए.बी.वी.पी का दबदबा है। छात्र संघ के चुनावों में इन्हीं दोनों संगठनों में कभी कोई एक संगठन विजयी होता है और कभी दूसरा। हम इनमें से ही किसी एक संगठन के साथ मिलकर चुनाव लड़ सकते हैं। लेकिन हमारी समस्या यह है कि इन दोनों में से कोई भी संगठन दलित समर्थक या दलित हितों के प्रति पॉजिटिव नहीं है। किसी भी संगठन के साथ चुनावी तालमेल के लिए आवश्यक है कि उनकी नीतियों का भी हमारी नीतियों के साथ तालमेल हो। जिन संगठनों की नीतियाँ ही दलित विरोधी हों, उनके साथ हमारा तालमेल कैसे हो सकता है।”48 शिक्षण संस्थानों में दलित छात्र-छात्राओं के साथ जातिगत भेदभाव होते रहते हैं। उनकी आवाज प्रशासन भी नहीं सुनता है, क्योंकि वहां भी ब्राह्मणवादी लोग बैठे हुए हैं। छात्र-सगठनों पर अधिकांशत सवर्णों का बोलबाला है। इसलिए शिक्षण संस्थानों में दलित छात्र-संगठनों का होना आवश्यक है, ताकी संगठित होकर जातिगत भेदभाव के खिलाफ आवाज उठा सकें। छात्र राजनीति ही नहीं भारतीय राजनीति में दलितों के प्रतिनिधित्व के लिए दलित पार्टी एवं संगठनों की आवश्यकता है। भाजपा, कांग्रेस एवं समाजवादी-मार्क्सवादी आदि पार्टियों ने दलित समाज की समस्याओं को मुख्य मुद्दा कभी नहीं बनाया। दलितों एवं बहुसंख्यक वर्ग की पार्टी बसपा दलितों समाज की समस्या को मुख्य मुद्दे के रूप में सामने लाती है।

आज सत्ता के लिए पार्टी नेता किसी भी स्तर तक गिर जाते हैं। राजनीति में सत्ता के लिये अपराधीकरण बढता जा रहा है। वोट बैंक की राजनीति के चलते भ्रष्ट नेता देश में जातिगत भेदभाव एवं सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे रहे हैं। भारत में सरकार का अलोकतांत्रिक रूप दिनोंदिन उभरकर सामने आ रहा हैं। सरकार अपने स्वार्थ के चलते लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रही है। बाबा साहब ने लोकतांत्रिक सरकार के संदर्भ में लिखा हैं- “यह भाईचारा ही है जो लोकतंत्र का एक मात्र दूसरा नाम हो सकता है। लोकतंत्र केवल सरकार का एक रूप भर नहीं है। यह बुनियादी रूप से संगठित रूप में रहने तथा संयुक्त रूप में बातचीत के अनुभव का एक तरीका भी है। निश्चित रूप से यह अपने साथ के लोगों के प्रति सम्मान तथा प्रतिष्ठा का रवैया है।”49 दलित कहानी डॉ.अम्बेडकर के इन्हीं लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रतिष्ठापित करती है, साथ ही राजनीति में लोकतंत्रिक मूल्यों के पतन का पर्दाफाश भी करती हैं। रत्नकुमार सांभरिया की ‘बाढ़ में वोट’ कहानी राजनीति विसंगति को उजागर करती है। कहानी में बाढ़ की स्थिति से पीड़ित लोगों की समस्याओं से बेफिक्र नेता आका के चरित्र का पर्दाफाश किया गया है। वह वोट बैंक की राजनीति के लिए बाढ़ का दौरा करता है और चुनावी जोड़-तोड़ बैठाता है- “देशी मुर्गे के भुने गोश्त के साथ सिप-सिप पी जा रही विदेशी शराब का नशा ज्यों-ज्यों चढ़ता गया था, आका में क्रोध बढ़ता गया था, “वह तो उसकी बस्ती पैसे में आ गई, उस रात, वरना…। बीस वोटों की जीत, जीत हुई। नाक बची, कटते।”50 कहानी गिरते हुये राजनीतिक मूल्यों के पतन का पर्दाफाश करती है, साथ ही लोगों में पनप रही राजनीतिक चेतना से भी अवगत कराती है। कहानी में बलवीर के नौ साल का लड़का प्रतिक्रिया व्यक्त करता है- “बलवीर का नौ साल का लड़का शूरवीर चौथी कक्षा में पढ़ता था। उसने रेत का लड्डू बनाकर आका के माथे पर मारा था, तानकर।”51 यानी नई पीढ़ी इन राजनीतिक दांवपेचों को समझ चुकी हैं। इस तरह दलित कहानी राजनेताओं के दोहरे चरित्र का पर्दाफाश करती है, साथ ही उनके दांवपेचों व षडयंत्रों को बेनकाब करती है।

दलित कहानी आदिवासी समाज की संवेदनाओं को भी अपनी कथावस्तु का विषय बनाती है। आज भूमंडलीकरण और उदारीकरण के दौर में इनका शोषण और ज्यादा बढ़ गया है। ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘जंगल की रानी’ कहानी में ठेकेदारों एवं प्रशासनिक अधिकारियों (दिकुओं) द्वारा हो रहे आदिवासी स्त्री के शोषण को दर्शाया गया है। अपने जल, जंगल, जमीन से विस्थापित कर दिए जाने से आदिवासी स्त्रियां कारखानों एवं मीलों में मजदूरी करती हैं, जहाँ उनका दिकुओं द्वारा शारीरिक शोषण होता है। इसी शोषण का शिकार कहानी में आदिवासी स्त्री कमली होती है। हालाँकि कमली अपने अस्तित्व एवं अस्मिता के लिए संघर्ष करती है और प्रतिरोध करते हुए शहीद हो जाती है। इस तरह आदिवासी स्त्री दिकुओं के शोषण का शिकार बन हो रही है। यहाँ तक कि प्रशासनिक अधिकारी एवं पुलिस प्रशासन भी रक्षक बनने की बजाय भक्षक बने बैठे हैं, वे भी आदिवासी औरतों के शोषण में लिप्त होते हैं। कहानी व्यवस्था के क्रूरतम चेहरे को उजागर करती है। आदिवासी स्त्री का शोषण दिकुओं द्वारा ही नहीं होता है, बल्कि वे अपने समाज में व्याप्त अंधविश्वास एवं सामाजिक विसंगतियों के चलते भी शोषित होती है। हालाँकि आदिवासी स्त्री मर्यादाओं व आदर्शो के बंधन में उस तरह नहीं बंधी है, जैसा की हिन्दू समाज में स्त्री मर्यादाओं व आदर्शो के बंधन में बंधी होती है। फिर भी गोनेंग प्रथा (दहेज प्रथा), डायन प्रथा जैसी कुप्रथाओं के चलते बेबस एवं दयनीय जिन्दगी जी रही हैं। डॉ.सी.बी.भारती की ‘भूख’ कहानी जनजाति समुदाय में स्त्री के शोषण को दर्शाती है कि किसनी को उसका बाप पैसों के लालच में गैर-आदिवासी के हाथों बेच देता है। इस तरह यह कहानी आदिवासी समाज में व्याप्त स्त्री शोषण को उजागर करती है। विदित है कि भारत में दहेज़ की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी हैं, जिसकी तपिश में औरत की अस्मिता एवं अस्तित्व दाँव पर लगा हुआ है।

आदिवासी समाज का विकास के नाम पर बाहरी लोगों (दिकुओं) द्वारा शोषण किया जाता रहा है। उन्हें उनके जल, जंगल एवं जमीन से बेदखल करके उनकी सभ्यता एवं संस्कृति को नष्ट किया जा रहा है। आज आदिवासी समाज शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार एवं मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित है। इसका जिम्मेदार हिन्दू समाज रहा है, जिसने कभी उसे ऊपर उठने ही नहीं दिया। इस संदर्भ में डॉ.अम्बेडकर लिखते हैं- “संभवतः वे ये मानने को तैयार न हो कि आदिवासी आदिम (जंगली) रह गये क्योंकि उनको सभ्य बनाने, चिकित्सा सहायता देने, उनमें सुधार करने और सभ्य नागरिक बनाने के लिए प्रयास नहीं किये गए।…आदिवासियों को सभ्य बनाने का अर्थ है उन्हें अपनाना, उनके बीच रहना, भाईचारे की भावना पैदा करना, संक्षेप में कहा जाए तो उन्हें प्यार करना। किसी हिन्दू के लिए यह सब कैसे संभव होगा। उसका सम्पूर्ण जीवन अपनी जाति को बचाने में खप जाता है।”52 इसी वैचारिकी को ओमप्रकाश वाल्मीकि ‘शाल का पेड़’ कहानी में रेखांकित करते हुए लिखते हैं- “आदिवासियों के विकास उनकी शिक्षा को लेकर भी कभी सोचते हो? ..उनकी आर्थिक स्थिति कैसी है? ठेकेदारों द्वारा उनका कैसे शोषण होता है? वहां की प्राकृतिक संपदा का दोहन करने वाले लोग कौन है? जिन्हें वे आदिवासी ‘दिकू’ कहकर बुलाते हैं, जिन्होंने इनकी जमीनों पर कब्ज़ा कर लिया है। वे कोई बाहरी लोग नहीं हैं। इसी देश धर्म के लोग हैं।”53 यानी दिकुओं द्वारा देश के विकास के नाम पर आदिवासी समाज का शोषण किया जा रहा है। कभी इन्होंने आदिवासी समाज को शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सुविधाएँ मुहैया नहीं करायी, बल्कि उनकी जमीन हड़पकर उन्हें विस्थापित कर दिया। इन विस्थापित आदिवासियों का ना राशन कार्ड में नाम है और ना ही मददाता सूची में नाम है, यानी वे भारतीय नागरिकता से ही वंचित हैं। मेरा मानना है कि इन सवर्णों से ज्यादा असभ्य कोई नहीं है, जिस प्रकृति की रक्षा के लिए आदिवासी समाज लड़ रहा है, उसे ये लोग नष्ट करने पर तुले हैं। राष्ट्रीय विकास के नाम पर जंगल काटे जा रहे हैं। कहानी इसी समस्या को उठाती हैं। कहानी में मनुवादी पात्र तिवारी अपने अधिकारी को शाल का पेड़ कटवाने की सलाह देता है, जिसका आदिवासी अगरिया तार्किक विरोध करता है- “सर! यह बहुत खतरनाक सुझाव है। जिसे विध्वसंक या विनाशकारी कहना ज्यादा सही होगा। भला कोई इतने विशाल और खुबसूरत पेड़ को काट देने की सलाह कैसे दे सकता है। समथिंग रांग विथ तिवारी। और हाँ, मि. तिवारी आप जानते हैं ये पेड़ प्रतिदिन कितनी प्राणवायु हमें देता हैं? प्रकृति का तोहफा है यह पेड़ … और तुम इसे काट देने की बात कह रहे हो।”54 कहानी में आदिवासी समाज के जल, जंगल, जमीन की समस्या को उठाया गया है और आदिवासियों की विस्थापन की समस्या, ठेकेदारों द्वारा शोषण को कथावस्तु का विषय बनाया है, साथ ही आदिवासी संघर्ष एवं प्रतिरोध की भावना को भी विकसित किया है। ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी डॉ.अम्बेडकर के विचारों से प्रभावित है, साथ ही आदिवासी आंदोलन की वैचारिकी से भी प्रभावित है।

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि दलित कहानी समन्वयवादी एवं सृजनात्मक दृष्टिकोण को अपनाती है। भेदभाव आधारित शोषणकारी मनुवादी समाज में व्याप्त उन तमाम शोषणकारी हथकंडों से प्रताड़ित दलित जीवन की व्यथा एवं संवेदना को उकेरती है। साथ ही संघर्ष, चेतना एवं स्वाभिमान की भावना से परिपूरित होकर तमाम शोषण के हथकंडों को बेनकाब करती है। दलित कहानी में दया, बेबसी एवं लाचारी का भाव न होकर संघर्ष, स्वाभिमान, एवं संगठित चेतना का भाव विद्यमान है। दलित समाज में शिक्षा से आई चेतना ने सदियों से व्याप्त हीनताबोध को तोड़ते हुए आत्मसम्मान एवं स्वाभिमान का भाव जागृत किया है। दलित कहानी जातिवाद, वर्णव्यवस्था एवं पितृसत्तात्मक व्यवस्था के पोषक हिन्दू धर्म के शास्त्रों, धार्मिक कर्मकांडों, रीति-रिवाजों एवं परम्पराओं का निषेध करती है। हिंसा और घृणा पर आधारित व्यवस्था की जगह समता, करुणा एवं मैत्री की भावना को कथावस्तु में व्यंजित करती है। इस तरह दलित कहानियां बाबा साहब के आदर्श समाज की परिकल्पना को साकार रूप देने में अहम भूमिका निभाती हैं। स्त्री-पुरुष की समाज में समान सहभागिता की आवश्यकता पर जोर देते हुए दलित समाज की उन्नति एवं विकास का मार्ग प्रशस्त करती है। गैर-दलित वर्ग की सहभागिता के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाती है। साथ ही आदिवासी समाज एवं अल्पसंख्यक वर्ग के शोषण की दास्ताँ को बयां करती हुई उनके संघर्ष एवं चेतना के स्वर को अभिव्यंजित करती है। समग्र रूप से दलित कहानी फुले एवं अम्बेडकरवादी दृष्टिकोण को अपनाती है।

संदर्भ स्त्रोत:-

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  54. वही, पृ. 61

संपर्क

ओमप्रकाश मीना (शोधार्थी)

भारतीय भाषा केंद्र , जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

नई दिल्ली-110067

मोबाइल- +91 9968545904

ई मेल – omi.meena1992@gmail.com

 

हिंदी मराठी दलित उपन्यासों के संदर्भ में एक तुलनात्मक विवेचन-माधनुरे श्यामसुंदर

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woman sitting on concrete bench
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‘सांस्कृतिक अस्मिता और दलित बस्तियां’

(हिंदी मराठी दलित उपन्यासों के संदर्भ में एक तुलनात्मक विवेचन)

– माधनुरे श्यामसुंदर

संस्कृति कहते ही भारतीय समाज में उत्सवधर्मी चेतना मूर्त हो जाती है। संस्कृति का एक स्थूल सा अर्थ त्यौहार, धार्मिक उत्सव, मिथकों व् इश्वर का प्रभा मंडल, कर्म कांड नैतिकताओं और आध्यात्मिकता के संदर्भ में समझा, समझाया जाता है। लेकिन क्या संस्कृति का दायरा मात्र इतना ही है? क्या संस्कृति केवल धर्म व अध्यात्म तक ही सीमित है? यदि हम संस्कृति और उसके कार्यों का अन्य अनुसंधान और वैचारिक सरणियों के जरिये देखे तो उसके अर्थ व परिभाषा बेहद विस्तृत हो जाती है।

ई. बी. टायलर ने संस्कृति को परिभाषित करते हुए लिखा है कि– “संस्कृति वह जटिल समग्रता है जिसमे ज्ञान, विश्वास, कलाएं, नैतिकताएं, विधि प्रश्न तथा अन्य और क्षमताएं और आदते है जिन्हें मनुष्य ने समाज के रूप में अर्जित किया है”।[1] स्पष्ट हो जाता है कि संस्कृति मात्र धार्मिकता नहीं है। वह अपने जटिलता में मनुष्य के संपूर्ण जीवन को समाहित किए हुई है। इसी प्रकार क्लाइड क्लुकहान संस्कृति को जीवन की समस्त गतिविधियों से जोड़ते है – “हर विशिष्ट संस्कृति में जीवन की समस्त गतिविधियों की एक रूपरेखा होती है”।[2]

इसी प्रकार प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर संस्कृति को मानव विकास के साथ जोड़कर देखती है – “संस्कृति का अर्थ सबसे पहले स्वभाविक बुद्धि को बढ़ावा देना है। हाल के समय इस अर्थ का विस्तार हुआ है और यह मानव मन को विकसित करने का अर्थ देने लगा है। …संस्कृति में सभी व्यवहार–प्रतिमानों और जीवन शैलियों को समेट लिया गया है। …संस्कृति से आराम व्यवहार प्रतिमानों से है, भाषा परम्परा रीतिरिवाज और संस्थाएं इस में शामिल है”[3]। इस प्रकार संस्कृति को समाज से जोड़कर देखने के उपकृम में मुक्तिबोध लिखते है– “ जीवन जैसा है उसे अधिक सुंदर उदात्त और मंगलमय बनाने की इच्छा आरंभ से ही मनुष्य में रही है। यही इच्छा जब सामाजिक स्तर पर खा लेती है तब संस्कृति कहलाती है”।[4] स्पष्ट हो जात है कि संस्कृति का महत्त्वपूर्ण पक्ष जीवन को सुंदर व मंगलमय बनाना है लेकिन हम जब भारतीय (या हिन्दू) संस्कृति को देखते है तो पाते है कि उसमे (हिन्दू या ब्राह्मण संस्कृति) 15 प्रतिशत जनता के जीवन को तो सुन्दर व उदात्त बनाया है। लेकिन 85 प्रतिशत का जीवन यातना व शोषण से भर दिया। और ऐसा इसलिए हुआ कि संस्कृति को आज धर्म व नैतिकताओं विधि व नियमों तक सीमित कर दिया। जीवन को बेहतर बनाने वाली ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को गौण कर दिया तथा उसे कर्म फल, विधि विधान तथा भाग्यवाद के खाते में डाल दिया।

सार रूप में कह सकते है कि संस्कृति जो कि मानव जीवन के संपूर्ण को समाहित करती है। मानव को मात्र जाति, धर्म अध्यात्म तक सीमित कर दिया है। संस्कृति का वास्तविक अर्थ प्रकृति समाज तथा जीवन जगत को जानना व वेहतर बनाना है। वैज्ञानिक व तार्किक ढंग के दृष्टिकोण के आधार पर ऐसा किया जा सकाता है। श्रम, समता तथा सह अस्तित्ववाली संस्कृति से जीवन बेहतर बन सकता है न कि यह पण्डे पुजारियों, ओझा सयानों द्वारा घालमेलकर पैदा की गई अप संस्कृति से।

भारत में दलित बस्तियों की क्या स्थिति है हम सब जानते है। उत्तर भारत में जिसे चमार और डोम कहते है वही महाराष्ट्र में महारों के नाम से जाने जानी वाली दलित बस्तियां गाँव की सीमा के बाहर होती है। एक तरफ सवर्ण रहते है तो एक तरफ दलित। दोनों की संस्कृति और दुनिया अलग अलग है। इसका चित्रण मोहनदास नैमिशराय के उपन्यास ‘मुक्तिपर्व’ में देखने को मिलता है। उपन्यास की कहानी एक दलित बस्ती की कहानी है, जहां के लोगों की लुगाई एक ही कमरे में है। वे सुबह ही घर से बाहर निकल पड़ते है और दिन भर खटने के बाद घर आते है। सभी गरीब है मुश्किल से दो वक्त की रोटी जुटा पाते है। लेखक ने जिस तरह से सामाजिक वातावरण का विस्तार से वर्णन किया है उससे दलित मुक्ति का संघर्ष एक चलचित्र की तरह पाठक के समक्ष चलता है। यह सब कुछ इतना सजीव है कि दलितों को वह आज भी अपने इर्द-गिर्द महसूस होता है, और गैर दलित पाठक भी दलित सवर्ण के बिच मौजूद मौलिक अंतर तथा दलित यातना को देखकर अनुभव कर सकते है। नैमिशराय वर्णन करते है– “चमार और डोम शहर की सीमा के इस तरफ थे। उस तरफ सवर्ण रहते थे तो इस तरफ दलित। दोनों की दुनिया अलग थी उधर बाग़ बगीचे थे तो इधर जंगल। उधर बाज़ार थे, पनघट थे, मंदिर थे, इधर श्मशान, कूड़ाघर, कलालों की दुकाने। दोनों तरफ के अपने – अपने संस्कार थे और अपनी – अपनी संस्कृति। जब वे दुसरे से टकराते थे तो मारकाट होती सवर्ण लटिया बल्लम चलाते हुए गलिया देते, खुले आम पेशाब करते और अपनी उदंड संस्कृति का परिचय देते फिर भी वे शहर के सभ्य कहलाते”।[5] इस उदंड संस्कृति के धनी सिर्फ सवर्ण ही नहीं थे, वरण उच्च वर्गीय मुसलमान भी थे। उपन्यास में नवाब अली वर्दी खां का जिक्र है उसी की हवेली में बंसी नौकरी करता है। नवाबी संस्कृति की अनेक झलकियाँ उपन्यास में है। ऐसी संस्कृति के सन्दर्भ में डॉ. तेज सिंह कहते है – “ मेरी निश्चित धारना है कि समाज में जिन सामाजिक वर्गों का वर्चस्व होता है, सत्ता भी उन्हीं सामाजिक वर्गों के हाथों में केन्द्रित होती है और उनकी असली लड़ाई सत्ता पर काबिज होने के लिए ही होती है ता कि समाज पर अपना सांस्कृतिक-वैचारिक वर्चस्व कायम किया जा सके। ऐसी स्थिति में सत्ता की अवधारणा का महत्त्व असंदिग्ध है। सत्ताएं तिन तरह की होती हैं –एक ज्ञान सत्ता दूसरी राजसत्ता और तीसरी धर्म सत्ता। जिस सामाजिक वर्ग के पास ये तीनों सत्ताएं होती है, वही वर्ग प्रभुत्वशाली होता है और अपना सांस्कृतिक वैचारिक वर्चस्व कायम करता है”।[6] जिस संस्कृति की तरफ तेज सिंह इशारा कर रहे है ये वही उदंड संस्कृति है जो नवाबे अली में देख सकते है। लिहाजा आज इस तरह की संस्कृति को ही ज्यादा तर रूप में देखा जा सकता है।

एक दूसरा उपन्यास ‘थमेगा नहीं विद्रोह’ उमराव सिंह जाटव का है इस में दलित संस्कृति को देख सकते हैं। इस उपन्यास में जो तथ्य आये है संभवतः 2000 इ.स. के आस पास के है क्योंकि उपन्यास के अनुसार यह जागृति उनमे स्वर्गीय बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर द्वारा दिए गए अमोघ मंत्र ‘शिक्षित बनों, संगटित हो, संघर्ष करो’ के कारन है। अम्बेडर के कारण ही जाटव मोहल्ले में किसी बौद्ध विहार और किसी बौद्ध भंते के अभाव में ये लोग बुद्धधर्म के स्वतः अनुयायी है। लेकिन असंख्य देवी-देवताओं का पूजा-पाठ करते है। शीतलामाता, भुमियामायी माता, अहोई माई, छट पीर, चामुंडा माई आदि उनके जीवन में केन्द्रीय महत्त्व रखते है और ये लोग लांगुरिया के गीत गाते है ज्वालाजी और हिंगलाज की जात लगाते है सैकड़ों कोस भटकते है।

इसी को मध्य नजर रखते हुए अरुण साधू का उपन्यास झिपय्या जो मराठी का उपन्यास है इसमे जिस संस्कृति को बताया गया है शायद 65 साल के स्वतंत्रता के बावजूद भी कोई परिवर्तन नहीं आया। लेखक के शब्दों में ही – “पच्चीस पैसे का दो चम्मच दूध और चार चम्मच शक्कर लेकर झिपप्या भागता हुआ वापस आया। तब तक माँ ने मिटटी के चूले पर पानी से भरा एल्युमिनियम का बर्तन रख दिया था और चूले को जलने के लिए कागज़ के टुकडे, बढई की दूकान से लाए लकड़ी के छोटे टूकडे और भूसा, धज्जियां – जो भी उसके हाथ लगता था सब डाल रही थी और चूले को फूंकते हुए अभी भी गहरी नींद में खोई लीला पर बरस रही थी, “उठ ओ घोड़े, उठ! इत्ती बड़ी हो गयी पेड़ के माफिक फिर भी यहाँ खर्राटे मारती सो रही है। उठ और उस ब्लाउज को ठीक कर ले। इत्ती बड़ी हो गई है फिर भी जरा भी लाज शर्म नहीं है मुई को। दिन तो इतना निकल आया, अब लाइन पर कब जायेगी तू। आं? अब उठती है या दू एक लात कमर पे”?[7] उक्त विवेचन के बाद यह काहाँ जा सकता है कि दलितों की अपनी संस्कृति होती है। लिहाजा उनकी अपनी अस्मिता है। इसलिए दलित बस्तियों में होते हुए भी दलित समाज अपनी अस्मिता बनाये रखता है।

भारतीय गावों की रचना तथा समाज रचना देखने के बाद यह आश्चर्य होता है कि यहाँ के गाँवों की तथा समाज की रचना इतनी एक जैसी कैसी है? शहरों में ऐसा चित्र नहीं है। लेकिन गाँवों की रचना एक जैसी ही है। चाहे महाराष्ट्र हो या मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश या अन्य प्रदेशों में भी गाँवों की वैचारिक पहचान अलक होगी लेकिन रचना अलग नहीं है। यहाँ जाति के आधार पर गाँव की रचना होती है। मुख्य गाँव में सभी सवर्ण रहते है। अवर्ण गाँव के बाहर रहते है। गाँव में जाति के अधार पर गलियां बनती है जैसे- ब्राह्मण गली, राजपूत गली आदि। यह एखाद गाँव में अथवा राज्य में होता तो समज सकते है। परन्तु पुरे भारतीय गांवों की रचना इस पद्धति की ही हैं। सवर्ण के घर मजबूत, आकर्षक तो अवर्ण के घर घास-फूस के होते है गाँव तथा घर मानव निर्मित है इस कारण ऐसा भेदभाव है। छप्पर में मातापुर भी ऐसा ही एक गाँव है। यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आता है। मातापुर की रचना भी तमाम भारतीय गाँवों जैसी ही है। ‘गंगा के तट पर बसा पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा गाँव मातापुर। अन्य भारतीय गाँवों की तरह मातापुर में भी थोड़े से सुखी और संपन्न शेष दीन और दरिद्र है। सुखी संपन्न लोगों में सवर्ण कहलाने वाले ब्राह्मण, पुरोहित, ठाकुर, जमीदार तथा लाल-साहूकार हैं। दूसरे गाँवों की तरह सवर्ण लोग उपर की तरह तथा अवर्ण कहे जानेवाले गंगा की ओर निचान में बसें हैं। नीचन की ओर गंगा के इस छोर का आखिरी घर सुखा का हैं और फिर कुड़ी-बिठौड़े शुरू हो जाते हैं ’।[8]

इस तरह इन उपन्यासों की तुलना करने के बाद जिन बस्तियों का जिक्र हुआ है इस से साफ़ हो जाता है कि दलितों की संस्कृति और सवर्णों की संस्कृति में कितना अंतर है। इस संदर्भ में तेज सिंह कहते है – “इस दृष्टी से संस्कृति के दो रूप उभरकर सामने आ जाते है एक, सामान्य तो दूसरा विशिष्ट। सामान्य रूप में संस्कृति जनता की संस्कृति यानी जन संस्कृति होती है, जिसमे समाज के विभिन्न समुदायों की आदतों-रुचियों, रीती-रिवाजो, प्रथाओं, विश्वाशों, धारणाओं और विचारों में कुछ समानता होती है तो दूसरी तरफ विशिष्ठ रूप में संस्कृति वर्गीय संस्कृति होती है जिसे वर्चस्ववादी संस्कृति कहना जादा ठीक है उसका सीधा संबंध राजसत्ता से होता है यानी वह राजसत्ता की चाकरी करनेवाली संस्कृति होती है जो धर्म सत्ता से लेकर साम्प्रदायिक रूप धारण कर लेती है। यह संस्कृति का सबसे विनाशकारी रूप होता है जिसमे एक विशेष समुदाय और धर्म का हित सर्वोपरि होता है”।[9]

ऊपर युक्त उपन्यासों की तुलना के बाद बाद दलितों की और सवर्णों की संस्कृति में कितना अंतर है यही दिखाने का पर्यास रह है।

– माधनुरे श्यामसुंदर

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संदर्भ :-

1. अपेक्षा – सं. तेज सिंह – अक्तूबर, दिसंबर 2013

2. मुक्तिपर्व – मोहनदास नैमिशराय – अनुराग प्रकाशन नई दिल्ली, 2011

3. प्रतिरोध की बहुजन संस्कृति – डॉ. तेज सिंह – बुक्स इंडिया दिल्ली, 2011

4. झिपय्या – अरुण साधू – राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली,1998

5. छप्पर – जय प्रकाश कर्दम – राहुल प्रकाशन, दिल्ली, 2007

6. थमेगा नहीं विद्रोह – उमराव सिंह जाटव – वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, प्र.स. 2008

  1. अपेक्षा – सं.तेज सिंह, अक्तूबर – दिसंबर – 2013, पृ. स. 52

  2. अपेक्षा – सं.तेज सिंह अक्तूबर – दिसंबर – 2013, पृ. स. 52

  3. अपेक्षा – सं.तेज सिंह अक्तूबर – दिसंबर – 2013, पृ. स. 52

  4. अपेक्षा – सं.तेज सिंह अक्तूबर – दिसंबर – 2013, पृ. स. 53

  5. मुक्तिपर्व –मोहनदास नैमिशराय – पृ.सं. 65

  6. प्रतिरोध की बहुजन संस्कृति डॉ. तेज सिंह पृ.सं. 05

  7. झिपय्या – अरुण साधू – पृ.सं. 15

  8. छप्पर – जय प्रकाश कर्दम – पृ.सं. 05

  9. प्रतिरोध की बहुजन संस्कृति –डॉ. तेज सिंह पृ.सं. 09