चित्रा और सुदीप सच और सपने के बीच की छोटी-सी खाली जगह में 10 अक्टूबर 2010 को मिले और अगले 10 साल हर 10 अक्टूबर को मिलते रहे। एक साल में एक बार, बस। अक्टूबर जंक्शन के ‘दस दिन’ 10/अक्टूबर/ 2010 से लेकर 10/अक्टूबर/2020 तक दस साल में फैले हुए हैं।
एक तरफ सुदीप है जिसने क्लास 12th के बाद पढ़ाई और घर दोनों छोड़ दिया था और मिलियनेयर बन गया। वहीं दूसरी तरफ चित्रा है, जो अपनी लिखी किताबों की पॉपुलैरिटी की बदौलत आजकल हर लिटरेचर फेस्टिवल की शान है। बड़े-से-बड़े कॉलेज और बड़ी-से-बड़ी पार्टी में उसके आने से ही रौनक होती है। हर रविवार उसका लेख अखबार में छपता है। उसके आर्टिकल पर सोशल मीडिया में तब तक बहस होती रहती है जब तक कि उसका अगला आर्टिकल नहीं छप जाता।
हमारी दो जिंदगियाँ होती हैं। एक जो हम हर दिन जीते हैं। दूसरी जो हम हर दिन जीना चाहते हैं, अक्टूबर जंक्शन उस दूसरी ज़िंदगी की कहानी है। ‘अक्टूबर जंक्शन’ चित्रा और सुदीप की उसी दूसरी ज़िंदगी की कहानी
किन्नर जीवन : एक दर्द भरा दास्तान-पूजा सचिन धारगलकर
किन्नर जीवन : एक दर्द भरा दास्तान
पूजा सचिन धारगलकर इ.डब्ल्यू.एस 247, हनुमान मंदिर के पास, हाउसिंग बोर्ड रुंमदामोल दवर्लिम सालसेत (गोवा) -403707 संपर्क – 9356437855 ईमेल- pujadhargalkar7@gmail.com
शोध सार
स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श, दलित विमर्श, किसान विमर्श, बाल विमर्श लेकिन किन्नर विमर्श यह ज्वलंत विषय ही और इसी विषय के जरिए हम उनके दुख को काम तो नहीं कर सकते लेकिन हम इससे रूबरू अवश्य होंगे। किन्नर समाज जिसके साथ बिल्कुल उपेक्षित सा व्यवहार किया जाता है, उपहास उड़ाया जाता है, उसको आज सम्मान की दरकार है। वे आम आदमी की तरह जीने का अधिकार रखते हैं। आज साहित्य उनकी पीड़ा की अभिव्यक्ति के लिए तरस रहा है, किंतु उसको उचित अभिव्यक्ति नहीं मिल पा रही है।
बीज शब्द: किन्नर, विमर्श, समाज, सम्मान, अधिकार
शोध विस्तार:
‘किन्नर’ नाम सुनते ही आपके दिमाग में अवश्य लज्जा का भाव आया होगा। लेखन तो दूर, नाम लेने मात्र से लोग कतराते हैं। शायद आपने भी यह भाव महसूस किया हो। ‘किन्नर’ शब्द सुनते ही हमारे मस्तिष्क में एक मनोग्रन्थि बन जाती है। ‘किन्नर’ शब्द पर मैंने इसलिए विशेष ज़ोर दिया ताकि आपका ध्यान आकर्षित हो सके और आप इस शब्द से परे जाकर सोचने और समझने की दृष्टि उत्पन्न कर सके। किन्नर समाज जिसके साथ बिल्कुल उपेक्षित सा व्यवहार किया जाता है, उपहास उड़ाया जाता है, उसको आज सम्मान की दरकार है। वे आम आदमी की तरह जीने का अधिकार रखते हैं। आक उनकी व्यथा-कथा, समस्याएँ, उपेक्षा और तकलीफ से हमारे समाज को रूबरू होने की अवश्यकता है। उनको भी समाज की मुख्य धारा, मुख्य समाज में रहने, जीने का अधिकार है। आज साहित्य उनकी पीड़ा की अभिव्यक्ति के लिए तरस रहा है, किंतु उसको उचित अभिव्यक्ति नहीं मिल पा रही है।
सामाजिक पूर्वाग्रह से युक्त हमारा तथा-कथित समाज इस प्रजाति को हेय और गृणित दृष्टि से देखता है। ऐसे कई अवसर आते हैं, जब उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखा जाता है। चाहे विद्यालय हो, प्रशिक्षण संस्थान हो या फिर नौकरी देने की बात हो, उनके साथ उपेक्षित व्यवहार किया जाता है। हमारे गरिमामय भारतीय संविधान में इस बात का साफ-साफ उल्लेख है कि जाति, धर्म, लिंग के आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा। लेकिन फिर भी इन लोगों के साथ यह भेदभाव क्यों किया जाता है।
इस संसार में नर-नारी के अलावा और भी एक अन्य वर्ग है जो न पूरी तरह नर होता है और न नारी होते है, जिसे लोग ‘हिजड़ा’, ‘किन्नर’ या फिर ‘थर्ड जेंडर’ के नाम से भी जानते है। ‘हिजड़ा’ जिनके बारे में जानने की उत्सुकता हमेशा लोगों के अंदर होती है। शास्त्र की बात करे तो ऐसा माना जाता है की किन्नर की पैदाइश अपने पूर्व जन्म के गुनाहों की वजह से होती है।
वैसे देखा जाए तो सभी नाम एक दूसरे के पृथक है या कहे की समानांतर है। फिर भी अध्ययन करने पर उसमें भेद किया जा सकता है। किन्नर एक जाति का भी नाम है जो हिमालय के कनौर प्रदेश (हिमवत और हेमकूटी) में रहते हैं। उनकी भाषा ‘कनौरी’ है। “हिजड़ा उर्दू शब्द है और किन्नर हिन्दी शब्द है। आज के समय में सरकार एवं सामाजिक संगठन ने इसे ‘ट्रांसजेंडर’ नाम दिया है यानि की तीसरा लिंग अर्थात तृतीय प्रकृति के लोग। हर राज्य में उन्हें अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है जैसे ‘तेलगु-नपुंसकुडु, कोज्जा या मादा, तमिल – थिरु नंगई, अरावनी, अंग्रेजी में – Eunuch / Hermaphrodite / LGBT, गुजरती-पवैय्या, पंजाबी – खुसरा, कन्नड-जोगप्पा भारत के अन्य जगह पर हिजरा, छक्का, किन्नर, खोजा, नपुंसक, थर्डजेंडर आदि”1।
वैसे इनका इतिहास काफी पुराना है रामायण महाभारत के समय से हिजड़ों का इतिहास चला आ रहा है। रामचरितमानस में भी किन्नरों का उल्लेख मिलता है। वनवास जाते समय श्री राम अपने पीछे आए छोटे भाइयों सहित सभी स्त्री एवं पुरुष वापस लौट जाने के लिए कहते हैं। आदेश का पालन करते हुए सभी स्त्री एवं पुरुष वापस अयोध्या लौट आने को कहते हैं, किन्तु मध्य लिंगी अर्थात हिजड़े वापस नहीं लौटते। 14 वर्षों के बाद वनवास से वापस लौटते समय श्रीराम ने उनसे वहाँ रुके रहने का कारण पूछा, तन श्रीराम के कथन को किन्नरों ने स्पष्ट किया कि प्रभु आपने नर और नारी को वापस जाने की अनुमति दी थी, किनती हमारे संबंध में कोई आदेश नहीं किया था। इस प्रसंग का उल्लेख रामचरितमानस में तुलसीदासजी करते हैं –
“जथा जोगु करि विनय प्रनामा, बिदा किए सब सानुज रामा।
नारि पुरुष लघु मध्य बडेरे, सब सनमानि कृपानिधि फेरे॥
इसका उल्लेख ‘किन्नर कथा’ उपन्यास में महेंद्र भीष्म ने भी किया है। कहा जाता है कि हिजड़ों की इस निश्चल एवं निस्वार्थ भक्ति भावना को देखकर श्रीराम ने उन्हें वरदान किया कि कलयुग में तुम्हारा ही राज होगा और तुम लोग जिसको भी आशीर्वाद दोगे, उसका अनिष्ट नहीं होगा। रामचरितमानस में ही श्रीराम की भक्ति के संबंध में पात्रता का उल्लेख करते हुए लिखा कि –
पुरुष नपुंसक नारि वा, जीव चराचर कोई।
सर्व भाव भज कपत तजि, मोहि परम प्रिय सोई॥
अर्थात चराचर जगत में कोई भी जीव हो, चाहे वह स्त्री, पुरुष, नपुंसक, देव, दानव, मानव तिर्यक इत्यादि हो। अगर वह सम्पूर्ण कपट को त्यागकर मुझे भजता है, वह मुझे प्रिय है। रामायण काल में किन्नर वर्ग की विशेष उपस्थिती थी।
महाभारत में किन्नर के रूप में शिखंडी तथा बृहन्नला (अर्जुन) का उल्लेख मिलता है। अर्जुन ने शिखंडी को ढाल बनाकर ही भीष्म पितामह का वध करने में सफलता पायी थी। शिखंडी को सामने देखकर भीष्म पितामह ने कहा कि वह एक नपुंसक से युद्ध नहीं कर सकते और अपने शस्त्र नीचे डाल दिए थे”2।
मुगल काल में राजा युद्ध जाने पर रानियों की देखभाल किन्नर करते थे। पहले कभी उनका अनादर नहीं हुआ। पौराणिक ग्रन्थों, वेदों, पुराणों और साहित्य तक भी किन्नर हिमालय के क्षेत्र में बसने वाली अति प्रतिष्ठित व महत्त्वपूर्ण आदिम जाति हैं।
किन्नर की शव यात्रा रात्री के समय निकलती है, किन्नर मुर्दों को जलाया नहीं जाता बल्कि उन्हें दफ़नाया जाता है। चौका देने वाली बात यह है कि वह किसी दूसरे किन्नर से नहीं बल्कि वह अपने भगवान से शादी करते हैं। जिन्हें अरावन के नाम से भी जाना जाता हैं। उन्हें शव पर किसी कि भी नज़र न पड़े यह मान्यता है। उनके शव पर चप्पलों से मारा जाता है क्यों पिछले जन्म के जो भी पाप है वह सब मीट जाए। उनके गुरु ही उनका परवर है। गुरु से ही वह शिक्षा पाते है।
किन्नर कहलाना किसी मर्द को अच्छा नहीं लगता, वह शब्द पिघला शीशा सा कानों में उतरना है और किन्नर को हिजड़ा कहने से उन्हें गाली लगती क्योंकि यह अपमान करने वाला शब्द है, पर कहीं अंतस तक उसके मन में कचोट जरूर होती है। आखिर ईश्वर ने उसके साथ अन्याय क्यों किया? क्यों हम उन्हें अपने से दूर सामाजिक दायरे से बाहर हाशिए पर रखते चले आ रहे हैं, उनके प्रति हमारी सोच में अश्लीलता का चश्मा क्यों चढ़ा रहता है, किसी हत्यारोपी के साथ बेहिचक घूमने, टहलने या उसे अपने ड्राईंग रूम में बैठकर उसके साथ जलपान करने से हम नहीं हिचकते हैं, फिर किन्नर तो ऐसा कोई काम नहीं करता, जो कि एक हत्यारोपी करता है तो हम किन्नरों से क्यों हिचकते हैं। वे हमारी तरह अपनी माँ की कोख से जन्मे अपने पिता की संतान हैं। वे ज्यादा नहीं मांग रहे हैं। ‘हमें किन्नर नहीं, इंसान समझा जाए। बस इतनी से मांग है।
स्त्री पुरुष की संरचना प्रकृति प्रदत्त है। जैविक आधार ने स्त्री-पुरुष और तृतीय लिंगी को शारीरिक-मानसिक भिन्नता प्रदान की है। मानव समाज में परस्पर भिन्न लिंगी मनुष्य एक-दूसरे के पूरक और सहयोगी रहे हैं, किन्तु मानव सभ्यता के विकास से ही लिंग भेद के कारण दमन, अन्याय, शोषण और असमानता का लंबा इतिहास भी है, विशेषकर तृतीय लिंगी समुदायों को एक समान नागरिक अधिकार प्राप्त हैं। उन्हें समाज या परिवार से वंचित नहीं रहना पड़ता है, क्योंकि सार्वजनिक और सरकारी कार्यों में उन्हें दोयम दर्जे से नहीं देखा जाता। पुरुष सत्तात्मक भारतीय समाज में लिंगविहीन लोगों को बहिष्कृत किया जाता है तथा उसके साथ मनुष्य कि तरह व्यवहार भी नहीं किया जाता, बल्कि उन्हें क्रूरता, मर्मात्मक पीड़ा और दर्दनाक स्थितियों का सामन करना पड़ता है। नयी सदी की कहानियों में तृतीय लिंगी समुदाय का ध्यान आकर्षक होना तथा उनकी अस्मिता को उद्घाटित करना नए यथार्थ की शरुआत है। हम भी इंसान है किन्नरों पर आधारित कहानियों का विशिष्ट संग्रह है। किन्नर समुदाय का परंपरागत पेशा अपनाना उनकी विवशता है। उनके पास शिक्षा के साधन नहीं है और न रोजगार प्राप्त करने के अवसर मिल पाते हैं। उन्हें मानवीय अधिकारों से वंचित रखा जाता था। अपमान और अलिंगी देह को लेकर उनका संघर्ष जन्म से लेकर मृत्यु तक चलता है। उन्हें स्वतंत्र जीवन जीने का अधिकार ही नहीं है बचपन में जब उन्हें किन्नर होने का पता चल जाता है तब उन्हें किन्नर समुदाय में भेजा जाता है। सबसे बड़ा गुन्हा उनके साथ होता है।
इस प्रकार का भेद भाव पशु-प्राणियों में नहीं है मनुष्य एक घातक प्राणी है, मौका देखकर वार करता है किसी को ऊपर उठने नहीं देता बल्कि और नीचे दफनाने की कौशिश करता है। अपने ही अपनों के द्वारा घिराये जाते है। किसी के प्रति कोई संवेदना नहीं है। हम किसी के दुख का सहारा नहीं बनते बल्कि किसी के दुख को और कैसे बढ़ाया जाए बस इसी का मौका हम तलाशते रहते है। हर किसी को अपने हिसाब से जीने का अधिकार है किसी का दूसरों पर कोई अधिकार नहीं है, लेकिन अपने अहं के कारण हम दूसरों पर वर्चस्व करते है। अपना अधिकार जताते है। आज हम फॉर्म भरते है उसमें स्त्री, पुरुष तथा अन्य ऐसे लिखा होता है हमने अन्य में उन्हें जगह दी लेकिन हमने अपने साथ स्वीकार नहीं किया।
‘किन्नर’ शब्द को पढ़ा जाए तो मुश्किल से एक या दो सेकंड लगेंगे और समझने की कोशिश की जाए तो पंद्रह-बीस मिनट में कोई जानकार यह आसानी से समझा देगा कि किन्नर कौन होते हैं? वही किन्नर जिन्हें हम हिजड़ा या छक्का कहते है। मगर शायद ही हम इस दर्द को जानते हो। इसी दर्द को किन्नर को अपने सीने में दबाकर आम लोगों के सामने हथेली पीटने हुए नाचते हैं, दूसरों का मनोरंजन करते है। दूसरों को आशीर्वाद देते है और उसके बदले अपने हिस्से में दर्द दुख बटोरते है। लोगों से नफरत प्रताड्ना सुनते है लेकिन चेहरे पर हमेशा हँसी होती है। दो वक्त की रोटी के लिए ठुमका लगाते और ताली पीटते। समाज से बहिष्कृत कर दिया गया, अपना एक ही धर्म मान लिया गया नाचना, गाना, ताली पीटना।
‘नाला सोपारा’ उपन्यास के माध्यम से हिजड़ों के जीवन से संबन्धित व्यक्तिगत एवं सामाजिक सरोकारों को पाठक के सामने परत खोलते हुए प्रस्तुत करने का प्रयास हैं। इस उपन्यास के लेखन के संदर्भ में ‘चित्रा मुद्गल’ कहती है “लंबे समय से मेरे मन में पीड़ा थी। एक छटपटाहट थी, आखिर क्यों हमारे इस अहम हिस्से को अलग-थलग किया जा रहा है। हमारे बच्चों को क्यों हमसे दूर किया जा रहा है। आजादी से लेकर अभी तक कई रूढ़ियाँ टूटी लेकिन किन्नरों के जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आया। उपन्यास एक बड़ा प्रश्न उठता है कि लिंग-पूजक समाज लिंगविहीनों को कैसे बर्दाश्त करेगा? उपन्यास इस प्रश पर गंभीरता से सोचने को विवश करता है कि आखिर एक मनुष्य को सिर्फ इसलिए समाज बहिष्कृत क्यों होना पड़े कि वह लिंग दोषी है?
समाज में मनुष्यता आज हाशिये पर है और हाशियाकरण की यह प्रक्रिया लंबे समय से मानवाधिकारों के हनन के रूप में सामने आती है। गुलाम मंडी उपन्यास में समाज ऐसा है जिसे अक्सर हम देखना पसंद नहीं करते। परंतु क्या यह समस्या का समाधान है क्या कबूतर के आँख बंद कर लेने से बिल्ली उसे नहीं खाएगी। उसी तरह हमारा आँखों को बंद कर लेना भर मानव तस्करी, यौन शोषण और यौन कर्मियों की समस्या का समाधान नहीं होगा। अक्सर लड़कियां इसमें फँसने के बाद बाहर आने का प्रयास नहीं करती और करती भी है तो इस डर से आगे नहीं आती, कि समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा। उपन्यास में जानकी के माध्यम से लेखिका इस समस्या पर रोशनी डालती हैं और समाज की मानसिकता में बदलाव की बात करती है ताकि यह लड़कियां वापस आ सके और सम्मानपूर्वक जीवन जी सके।
1974 में जे. बी लेखिका उस व्यक्ति से मिली और उन्होंने अपने जीवन की व्यथा बताई लूले, लंगड़े बहरे होते है उन्हें घर से कोई बाहर नहीं निकालता लेकिन किन्नर जब लिंग से विकलांग पैदा होते ही उन्हें घर से बाहर निकाल दिया जाता है बिना कोई दोष के। किन्नर समाज के लोग अपनी अलिंगी देह को लेकर जन्म से मृत्यु तक अपमानित, तिरस्कृत और संघर्षमयी जीवन व्यतीत करते है तथा आजीवन अपनी अस्मिता की तलाश में ठोकरे खाते हैं। असीम यतनाओं की सजा उन्हें क्यों दी जाती है। यह लोग परिवार और समाज के साथ नहीं रह सकते इनके लिए शिक्षा, स्वास्थ सेवाओं और सार्वजनिक स्थानों पर पहुँच प्रतिबंधित है। अभी तक उन्हें सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में प्रभावी ढंग से भाग लेने से बाहर रखा गया है। राजनीति और निर्णय लेने की प्रक्रिया उनकी पहुँच से बाहर है।
2014 में एक ऐतिहासिक फैसले में सर्वोच न्यायालय में उन्हें अधिकार देने कि बात कही, लेकिन कहा उन्हें उनका अधिकार मिला। शरीर एक पुरुष का, भावनाएँ एक नारी की अपनी असल पहचान स्थापित करने के लिए सहसपूर्ण संघर्ष की अद्भुत जीवन यात्रा जो 23 सितंबर, 1964 में शुरू होती है। जब दो बेटियों के बाद चित्तरंजन बंद्योपाध्याय के घर बेटा पैदा हुआ। बेटे सोमनाथ के जन्म के साथ ही पिता के भाग्य ने बेहतरी की ओर तेजी से ऐसा कदम बढ़ाया की लोग हँसते हुए कहते कि अक्सर बेटियाँ पिता के लिए सौभाग्य लाती हैं, लेकिन इस बार तो बेटा किस्मत वाला साबित हुआ। वे कहते हे चित्त! यह पुत्र तो देवी लक्ष्मी है। सोमनाथ जैसे-जैसे बड़ा होता गया उसमें लड़कियों जैसे हरकते, भावनाएँ पैदा होने लगी और लाख कोशिश करने के बाद दबा नहीं सकीं। बिना माता-पिता को बताए घर से बाहर निकल पड़ी।
बेशक, भारत में कानूनन तौर पर थर्ड जेंडर को मान्यता मिल गयी हो मगर भारतीय समाज ने अभी भी तीसरे लिंग वर्ग को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है। आज भी समाज में तिरस्कार, हिन भावना और अपमान की नज़रों से देखा जाता है। देश की पहली ट्रान्सजेंडर महिला प्रिन्सिपल बनी जिन्होंने विपरीत सामाजिक परिस्थितियों में अपने संघर्ष के बूते पर मुकाम हासिल किया। वर्तमान में मनोबी पश्चिम बंगाल के कृष्ण महिला कॉलेज में बतौर प्रिन्सिपल कार्यरत है।
5-6 साल की उम्र में लड़कियों के कपड़े पहनना अच्छा लगता था। वह कपड़े पहनने से माँ डाँटती लेकिन वह कपड़े पहनकर तृप्त सी हो जाती। जब स्कूल में पढ़ती थी तब तो उनसे कोई दोस्ती नहीं करता था यदि स्कूल नहीं जाती तो बीते दिन की पढ़ाई के बारे में नहीं बताता। ग्रेजुएशन में दाखिला लेने पर भी मज़ाक बनाया गया। 1995 में उन्होंने पढ़ाना शुरू किया। बच्चों ने नहीं सताया उतना अन्य शिक्षकों ने उन्हें दुख दिया। ट्रांसजेंडरों के लिए पहली पत्रिका निकली थी ‘ओब-मानब’ जिसका हिन्दी में अर्थ है ‘उप-मानव’। 2003 साल में उन्होंने सेक्स बदल दिया। 2006 में पी.एच.डी की। तिरस्कार का घूंट पल-पल पिती रही। उनकी मदद कोई नहीं करता। उन्होंने रवीन्द्रनाथ टैगोर से बहुत कुछ सीखा है। ट्रांसजेंडर सामाजिक भेदभाव के कारण पढ़ाई से दूर हो जाते है और पूरी जिंदगी नाचकर ही गुजारा करते है। लेकिन कभी भी जीवन में हार नहीं मानी एक बच्चे को गोद लिया ‘देबाशीश’ नाम है। उन्हें जीवन दिया एक माँ को बच्चा मिला और एक बच्चे को उसकी माँ। अपना जीवन एक कैद की तरह जीने के लिए मजबूर है। रोज आँसू के घूंट पीते है। क्या क्या नाम नहीं दिया उन्हें कोई कहता हिजड़ा, किन्नर छक्का, थर्ड जेंडर, आदि।
“अधूरी देह क्यों मुझको बनाया
बता ईश्वर तुझे ये क्या सुहाया
किसी का प्यार हूँ न वास्ता हूँ
न तो मंजिल हूँ मैं न रास्ता हूँ
अनुभव पूर्णता का न हो पाया
अजब खेल यह रह-रह धूप छाया”3
हिजड़ों का न आवाज है, न नाम है ना परिवार, इतिहास, प्यार, सोच, ना खुशी, ना गम, ना हक ना व्यक्तित्व। किन्नर अदृश्य है न केवल हमारे मुख्यधारा के समाज में बल्कि समाज के मन-मस्तिष्क के भीतर भी।
जीवन में मनुष्य आदमी बनकर जन्म लेता है इसमें स्त्री और पुरुष दोनों आते है लेकिन मनुष्य के कर्म चाहे वह अच्छाई हो या बुराई लेकिन अपने कर्मों से मनुष्य से इंसान बनते है और यही से इंसानियत शुरू होती है। एक स्त्री को हमेशा से उपेक्षित किया गया है और हम आधुनिक समाज में इस बात को भले बदलने की कोशिश करे अगर हम ऐसा सोचते है तो हम गलत है।
कुछ समाज में ऐसे भी लोग है जिनकी ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया वह है ‘किन्नर समाज’। देवता को भी जन्म लेने के लिए स्त्री का गर्भ चाहिए ईश्वर भी स्त्री का ऋणी होता है, लेकिन हम स्त्री के अस्तित्व को बार-बार भूलते है क्यों? यह प्रश्न पूरे मानव समाज से है।
किन्नर नाम सुनते ही लोग हँसते है, मुँह फेरते है देखकर भागते है उन्हें अपशब्द कहते है लेकिन हम यह क्यों भूल जाते है कि यह हमारे ही तरह साधारण इंसान है उन्हें भी जीने का और एक सम्मान का अधिकार है, लेकिन सम्मान की तो बात दूर हम आज भी उन्हें मनुष्य के रूप में अपना नहीं सके हम दूसरे ग्रह से कोई अजनबी की तरह बुरी नज़र से देखते है। लेकिन हम बार-बार क्यों भूल जाते है हम किसी को सुख दे नहीं सकते तो दुख देने का भी हमे अधिकार नहीं है किसी को अच्छे शब्द बोल नहीं सकते तो बुरा भी बोलने का हमें अधिकार नहीं है।
जानवर स्वावलंबी होते है लेकिन मनुष्य ऐसा प्राणी है जो जन्म से लेकर मृत्यु तक परस्वावलंबी होता है, लेकिन फिर भी अपने आप को महान समझते है। अक्सर हम कहते है इस संसार की रचना ईश्वर ने की है हम ईश्वर के संतान है लेकिन हम ईश्वर की रचना पर संदेश कर रहे है।
‘xy cromosones’ से ‘पुरुष’ और ‘xx cromosones’ से ‘स्त्री’ का जन्म होता है, लेकिन ‘xxx,yy,oo’ यह ‘cromosone disorder’ है। इससे किन्नर का जन्म होता है क्या इस तरह जन्म होना उनकी गलती है फिर घृणा दुख पीड़ा उन्हें क्यों? विज्ञान चिकित्सकों ने बताया है कि रक्त स्त्राव और cromones की मात्र समान होने पर किन्नर का जन्म होता है।
हमने अपने बच्चियों को मार दिया कूडे दान में फ़ेक दिया भ्रूण हत्या की। लेकिन उन्होंने बच्चियों को कूड़े दान से उठाकर उन्हें सुरक्षा प्रदान की। उन्हें पनाह दी उन्हें पढ़ाया, लिखाया समाज में रहने के काबिल बनाया। अपने पराए हो गए लेकिन अजनबी ने उन्हें नाम दिया। सिर्फ जन्म देने वाली माँ नहीं होती। पुरुष को भी उतना ही अधिकार है वह भी बच्चों को पाल सकते है।
हम शादी, बच्चे के जन्म पर उन्हें घर बुलाते है, क्योंकि वह आशीर्वाद देते है नाचते है लेकिन इनका जन्म सिर्फ इसी लिए हुआ है। यहाँ तक भीख मांगने के मार्ग तक पहुंचा दिया क्यों हम भील जाते है ऊँठा जन्म सिर्फ इसी के लिए नहीं हुआ। उन्हें भी स्वतंत्र जीवन जीने का अधिकार है। कोई उन्हें नौकरी घर नहीं देता, अपना घर परिवार होते हुए भी अपने उन्हें नहीं अपनाते। कोई किराए का घर भी नहीं देता झोपड़ियों में रहने के लिए विवश है। स्टेशन, घर-घर रास्ते पर भिख मांगते है लेकिन, लोग वहाँ पर भी धिक्कारते है। डरते कहते है “ताई मला बघून तुम्ही नाराज़ तर झाले नहीं नाआ” और लोग भागते है गालियाँ देते है मुह पर दरवाजा बंद करते हैं। हमारे समाज में रहने वाले भाई, पिता, चाचा, मामा उनके पास जाते है लेकिन ‘sex worker’ का ठप्पा उनपर क्यों? वह अभिशप्त जीवन जीने के पीछे जिम्मेदार कौन है?
किसी भी तरह का आवेदन फार्म भरते समय एक कॉलम आता है जेंडर यानि लिंग का, जिसमें विकल्प होता है महिला, पुरुष और अन्य। ‘अन्य’ के रूप में जगह मिल गयी लेकिन समाज में उन्हें जगह नहीं मिली। किन्नरों की यह शोचनीय स्थिति, आधुनिकता, समानता और मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता का दम भरने वाले समाज के मुँह पर जोरदार तमाचा है।
भले हम आज अपने आप को मॉडर्न आधुनिक कहे लेकिन सोच विचारों से हम आज भी पिछड़े है। कोई खिलाड़ी जब गेंद को बेट से हिट करता तब सब छक्का मारा कहते है लेकिन इस बात को सकारात्मकता से देखते है लेकिन हमे छक्का यह शब्द गाली की तरह नकारात्मक दृष्टि से क्यों देखा जाता हैं। मनोबी ने बचपन में यह प्रश्न अपनी माँ से पूछा था, तब माँ ने उत्तर दिया था उनका बॉल बाउंड्री से बाहर जाना सकारात्मक है लेकिन यह शब्द तुम्हारे लिए mainstream boundary से बाहर कर दिया जाना हैं। उनके साथ कितने शोषण होते है लेकिन कोई उनके दुख को नहीं समझता। अपने जीवन को अभिशाप की तरह जीने के लिए मजबूर है। दर-दर भटकने के लिए मजबूर है। हम अपने देह को लेकर बहुत इतराते है लेकिन समझ, संवेदना, दुखकातरता नहीं है। हमने अपने बेटियों जन्म के बात कूड़ेदान में फेंक दिया। वही वे लोग बच्चे को पाने के लिए तरसते है। उन्हें घर, परिवार देते है, प्यार देते है नयी जिंदगी देते है शिक्षा देते है। सुभ अवसर पर उनकी जरुरत होती है उनका आशीर्वाद हमारे लिए मूल्यवान है लेकिन वह नहीं। अगर देखा जाए तो बुराई उनमें नहीं हम में है हमारे दृष्टिकोण विचारों में है हमने उनके प्रति हमारे मस्तिष्क में गलत विचारधारा बनाई है।
किन्नरों ने दिया शाप लगता है ऐसे लोग कहते है लेकिन यह सही है जिनको हमने जन्म से दुख दिया दुखी आत्मा के हृदय से निकला शाप तो जरूर लगेगा। वह एक दुखी आत्मा है। ईश्वर अर्धनारीश्वर शिव को हम पूजते है लेकिन उनको नहीं अपनाते। जितनी प्रताड्ना उनको पहले नहीं हुई उतना दुख हम आज उन्हें दे रहे है। कोई ठीक से नहीं बोलता, साथ में कोई नहीं बैठता जब किसी आम व्यक्ति के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है तब कितना बुरा लगता है। किसी ने कुछ कहा हम सहन नहीं कर सकते फिर वह तो दिन-रात लोगों की नफरत सहते है। उनकी शव यात्रा रात में निकलती है ताकि किसी भी मनुष्य की नज़र उन पर ना पड़े अन्यथा अगले जनम में फिर से किन्नर का जन्म होता है। मृत्यु के समय उन्हें चप्पल से मारा जाता है। अपने जीवन में वे कितना दर्द सहते है। मृत्यु के बाद भी। कितने होशियार होते है कितनी कलाएं उन्हें आती है वे गाते है नाचते है और भी कई चिजे उन्हें आती है लेकिन हमने उन्हें सामने आने का कभी मौका ही नहीं दिया।
कोई भाड़े का घर भी नहीं देते आज हमने झुग्गी बस्ती में रहने के लिए विवश कर दिया है। पैसे मांगने पर लोग कहते है पैसे नहीं कमा सकता भिख मांगने की आदत पद चुकी है लेकिन इस बात पर विचार किया जाए तो मुफ्तखोरी भी हमीने उन्हें सिखायी हैं। अगर कोई काम नौकरी घर परिवार नहीं रहा तो कोई व्यक्ति क्या करगा जो दूसरों को आशीर्वाद देते है उन्हें आशीष देते है उनकी झोली भर देते है लेकिन उनके दुख को कोई नहीं समझता। कितना बुरी तरह सुलुग किया जाता है हम उन्हें मरने के कगार पर पहुँचा दिया है। उसके आँसू किसी को नहीं दिख रहे कि वह किस परिस्थिति से गुजर रहे है। स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श, दलित विमर्श, किसान विमर्श, बाल विमर्श लेकिन किन्नर विमर्श यह ज्वलंत विषय ही और इसी विषय के जरिए हम उनके दुख को काम तो नहीं कर सकते लेकिन हम इससे रूबरू अवश्य होंगे।
संदर्भ सूची
- http://hi.m.wikipedia.org/wiki/किन्नर
- पुरुष तन में फंसा मेरा नारि मन, – मनोबि बंदोपाद्याय
राजपाल अँड सन्ज
1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली -110006
प्रथम संस्करण – 2018
- थर्डजेंडर विमर्श – संपादक शरद सिंह
सामयिक प्रकाशन
3320-21, जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग
दरियागंज, नई दिल्ली – 110002
संस्करण – 2019
4 चित्रा मुद्गल, पोस्ट बॉक्स नं नलसोपारा, सामयिक पपेरबॉक्स, नई दिल्ली 2017
हिंदी सिनेमा में हाशिये के लोग – शबनम मौसी के संदर्भ में: वैष्णव पी वी
हिंदी सिनेमा में हाशिये के लोग – शबनम मौसी के संदर्भ में
वैष्णव पी वी
सामाजिक व्यवस्था के अनुसार तीसरी दुनिया का होना बेमतलब है। मानव जाति की पूर्वधारणा है कि लिंग के दो घटक है। वे हैं– स्त्री और पुरुष। जब कोई बच्चा माँ की कोख से नवलोक में पाव रखता है तब उस पर लिंग–व्यवस्था का अतिक्रमण हो जाता है। निरीह एवं बेसुध मन में चिंता उगती है कि वह पुरुष है या स्त्री। अगर कोई हमारे अस्तित्व पर उँगली उठाएँगे तो हमें कैसा लगेगा? जहाँ हमें कोई स्त्री और पुरुष के रूप में नहीं मानते तो हमारी मानसिक–दशा कैसी होगी? यह एक अलग दुनिया की कहानी नहीं है। किन्नर सामाजिक यथार्थ और सच्चाई है। यह पुराण से लेकर वर्तमान तक का सच है। अगर पुरुष पहली श्रेणी है, स्त्री दूसरी है तो इनको लिंग व्यवस्था में तीसरी श्रेणी का दर्जा प्राप्त होना ज़रूरी है। किन्नर अलग दुनिया का प्राणी नहीं बल्कि इसी समाज का अटूट हिस्सा है।
तृतीय लिंग के व्यक्ति को ‘किन्नर’ या ‘ट्रांसजेंडर’ के रूप में अभिहित किया गया है। किन्नर विभाग की समस्या वर्तमान समय में स्त्री–पुरुष वर्ग के सामने एक प्रश्न चिन्ह के रूप में खड़ा रहता है। अपनी अस्मिता की तलाश और अस्तित्व को कायम रखने के लिए समाज में अपनों के बीच संघर्ष कर रहे हैं।
फिल्म निर्माण नई विचारधारा और नवीन विषय को उजागर करके लोकप्रिय होने लगे। नारी समस्या, दलित समस्या, निम्न वर्ग की समस्याएँ एवं प्राकृतिक समस्याएँ फिल्म के केंद्र में आई। स्त्री, दलित, निर्वासित वर्ग, पिछड़े वर्ग आदि पर फिल्म निर्माताओं की नज़र जल्दी पहुँच गयी। लेकिन सामाजिक रूढ़ियों से त्रस्त किन्नर या ट्रांसजेंडर को फिल्म निर्माताओं ने नज़र-अंदाज़ किया। अगर नज़र गयी भी तो गौण रूप में स्थान दिया जाता रहा।
वर्तमान समय में किन्नर जीवन को लेकर हिंदी साहित्य जगत में अनेक प्रकार की साहित्यक रचनाएँ लंबे अंतराल के बाद पुनः विकास की पथ पर है। साहित्य से अधिक हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा की फिल्म में किन्नर या ट्रांसजेंडर की मानसिकता और जीवन संघर्ष का चित्रण होने लगा है। किन्नर समाज सामाजिक व्यवस्था के लिए वर्जित होने के कारण फिल्म ने भी उनकी यथार्थ को अनदेखा किया। इक्कीसवीं सदी में साहित्य से अधिक मीडिया सामाजिक समस्याओं को ध्यान देने लगा। पुराने ज़माने में साहित्य में व्याप्त किन्नर समुदाय अचानक लुप्त हो गया। लेकिन मीडिया और फिल्म इनकी समस्याओं को उजागर करने लगे। फिल्म और मीडिया के आरंभिक दशक में इन्हें गलत रूप में चित्रित करने का प्रयास किया गया। इनकी हँसी-मज़ाक करके इन्हें उपहास का पात्र बनाया गया। कभी उनको क्रूर चित्रित किया गया। उन्हें छोटे किरदार दिए जाते थे। जैसे- बच्चे के जन्म की खुशी में नाचकर पैसे कमाने वाले, ट्रेन से पैसे हड़पने वाले के रूप आदि। इसी वजह से किन्नर के प्रति जो नकारात्मक भाव मीडिया ने शुरुआती दौर पर अपनाया था उससे किन्नर के प्रति समाज का विद्रोह और नापसंदी बढ़ गयी। समाज में पितृसत्तात्मक एवं मातृसत्तात्मक व्यवस्था होने के कारण किन्नर या ट्रांसजेंडर पर उसका प्रभाव तथा विचार हर कहीं छा गया। इसी वजह से फिल्म में किन्नर विमर्श काफ़ी कम पाया गया। भारतीय समाज में बॉलीवुड फिल्म का महत्वपूर्ण स्थान है। बॉलीवुड में परंपरागत विषयों से हटकर काम करने का बहुत अवसर है। लेकिन ट्रांसजेंडर, गे, लेस्बियन, बेयसेकश्युल के विषयों पर गंभीर सोच न के बराबर है।
विश्व फिल्म में किन्नर से संबंधित काफ़ी फ़िल्में बनी हैं। इसकी तुलना में उसी समय भारतीय फिल्मों में किन्नर समस्या को जितना महत्व मिलना था वह न के बराबर रह गया। लेकिन समय के साथ-साथ फिल्म निर्माताओं की सोच में भी बदलाव आया और हाल में जितनी फिल्म निकली है उसमें किन्नर के प्रति सकारात्मक विचार देखने को मिला है। इनकी जीवन-गाथा को चित्रित करते हुए सामाजिक स्तर पर होने वाली समस्याओं का चित्रण गंभीरता के साथ होने लगा है। समाज की पूर्व परंपरा और अलिखित नियमों के प्रति उनका रोष, सामाजिक हक की लड़ाई का चित्रण फिल्मों में होने लगा।
सन् 1991 में किन्नर समाज के सान्निध्य की घोषणा के रूप में महेश भट्ट के निर्देशन में ‘सड़क’ नामक फिल्म दर्शकों के सामने आई। प्रमुख अभिनेता ‘सदाशिव अमरापरकार’ ने खलनायक, जो एक किन्नर की भूमिका अदा किया था। फिल्म के हिजड़ा पात्र महारानी खलनायक के रूप में अभिनेता रवि और अभिनेत्री पूजा के प्रेम में बाधा डालता है। महारानी की भूमिका तथा उनकी लफ्ज स्त्री-पुरुष और रूढ़िगत विचारधारा पर प्रश्न चिन्ह है। सन् 1996 में अमूल पाटेकर की फिल्म ‘दायरा’ बनी। इसमें निर्मल पांडे ने एक ट्रांसजेंडर चरित्र को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। सन् 1997 में चित्रित ‘दरमियाँ’ कल्पना लाजमी की फिल्म है जिसमें किन्नर के प्रति सहानुभूति दिखाया है। किन्नर होने के कारण समाज और परिवार से निष्कासित मन की व्यथा है। महेश भट्ट की फिल्म ‘तमन्ना’ (1997) किन्नर संवेदना का प्रतिफलन है। किन्नर के प्रति सामान्य जनता की अवधारणा का पोल खोलने का प्रयास फिल्म के ज़रिए निर्देशक ने किया है। फिल्म के दो किन्नर पात्र है- ‘टीकू’ और ‘तमन्ना’, वे समाज फैली लिगंगत अवधारणा पर प्रश्न चिन्ह उठाते हैं। समाज की अनदेखेपन के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद किया है। इसकी पटकथा मुंबई के एक हिजड़े समुदाय की वास्तविक कहानी पर आधारित है। हमारी संस्कृति एवं परंपरा प्राचीन काल से ही गौरवान्वित रही है। हमारे वातावरण और संस्कृति को अलग नहीं किया जा सकता। समाज की रूढ़िगत मान्यताओं को मजबूत बनाने के प्रयास से हिजड़ों के प्रति भेदभाव हो रहा है। इन्हें बचपन से लेकर जीवनपर्यंत रूढ़िग्रस्त समाज के अन्याय का शिकार होना पड़ता है। इसमें किन्नरों की समस्याओं का खुला चित्रण है। अशुतोष राना किन्नर की भूमिका में ‘संघर्ष’ (1999) नामक फिल्म में दर्शकों के सामने आते हैं। लज्जा शंकर पाण्डे नामक एक ट्रांसवुमन की किरदार इसमें अदा किया है जो काली माता की पूजा करती है। इसके अतरिक्त और भी हिंदी फिल्मों में किन्नरों का चित्रण मिलता है लेकिन वह कुछ समय के दृश्य तक सीमित है। इन फिल्मों में ‘क्या कूल है हम’ (1995), ‘स्टाइल’ (2001), ‘मस्ती’ (2004), ‘पार्टनर’ (2007) आदि महत्वपूर्ण हैं। हाल ही में निकली फिल्म ‘अलिग्रह’ और ‘कपूर आण्ट सन्स’ में एलजीबीटी का भूमिका है।
सन् 2005 में योगेश भारद्वाज द्वारा चित्रित फिल्म ‘शबनम मौसी’ किन्नर के यथार्थ जीवन पर आधारित है। मध्यप्रदेश के सुहागपुर विधानमंडल से जीतकर विधायक बनी। ‘शबनम मौसी’ समाज में होने वाले अन्याय, किन्नर के प्रति लोगों की मानसिकता, राजनीतिक चाल पर खुला व्यंग है। सन् 2008 में श्याम बेनेगाल द्वारा चित्रित फिल्म ‘वेलकम टु सज्जनपुर’ हिजड़ा समस्या को उजागर करने वाली फिल्म है। इसमें फिल्म निर्माता किन्नर समाज की समस्या को नया मोड़ देकर, उस पर सोचने के लिए दर्शक को मजबूर करते हैं। राजनीति में हिजड़ा लोग वर्जित होते जा रहे हैं। राजनीति में इन्हें नहीं अपनाया गया जिसे जेंडर पोलिटिक्स के नाम से पुकारा जाता है। फिल्म के पात्र महादेव और मुन्नी भाई के बीच होने वाले संवाद से समाज में व्याप्त जेंडर पोलिटिक्स की गंभीर समस्या हमारे सामने आती है- “तुझे सपोर्ट किस जात से मिलेगा, मतलब ब्राह्मण? पटेल? दलित? इस्लाम? कौन? कौन है तेरे साथ।”
हिंदी में ‘बुलेट राजा’, ‘रज्जो’, ‘एस. एम.’, ‘क्यून द डेस्टिनी ऑफ डांस’, ‘राजा हिंदुस्तानी’, ‘नटरंग’, ‘नर्तकी’, ‘ट्राफिक सिग्नल’ आदि फिल्म में भी किन्नर की भूमिका है। ‘क्यून द डेस्टिनी ऑफ डान्स’ पूरी तरह किन्नर पर आधरित है। नाच को फोकस में रखकर बहुसंख्यक समाज से लड़ने वाली अल्पसंख्यकीय किन्नर जीवन की त्रासदीय क्षणों को प्रस्तुत किया गया है।
सन् 2005 में योगेश भरद्वाज के निर्देशन में शबनम मौसी नामक फिल्म दर्शकों के सामने आयी। फिल्म मध्यप्रदेश के सुहागपुर के पूर्व विधायक किन्नर शबनम बानु के निजी और भौतिक जीवन पर आधारित है। शबनम बानु के जन्म से लेकर चुनाव तक की समस्याओं का चित्रण इसमें किया गया है। एक पात्र को केंद्र में रखकर अत्यंत गंभीरता एवं रोचकता के साथ कथा आगे बढ़ती है। फिल्म की शुरुआत में पच्चीस साल तक मुबंई में शबनम के जीवन और बाद के अनूपपुर के जीवन का विवेचनात्मक अध्ययन हमारे सामने रखने का प्रयास किया है। जिस गर्भ से पूर्ण स्त्री और पूर्ण पुरुष का जन्म होता उसी गर्भ से किन्नर शबनम का भी जन्म हुआ। शहर के पुलिस अफसर के घर में जन्म शबनम की बधाई में आए किन्नर उसे जबरदस्ती लेकर जाते हैं क्योंकि हलीमा और संघ समझ गया था कि जिसके बधाई के लिए वह नाचने आए हैं वह एक किन्नर है। बच्चे को बिरादरी में ले जाने के बाद हलीमा बच्चे का पालन पोषण करती है। हलीमा उसको शबनम नाम रखती है। जब बच्चे को पालने का सौभाग्य मिल जाता है उसके अंदर छुपी मातृत्व की भावना धारा की तरह फूट निकलती है। हलीमा गुरु से कहती है- “हलीमा को आज तुमने वह दर्जा दिया, जो दर्जा खुदा भी देने में बेबस्ता है। माँ का दर्जा हलीमा माँ तेरे इज़्जत के से खयामत तक शुक्र गुज़ारेगी अम्मा।” आधी औरत और आधा मर्द होने के कारण बच्चा पैदा करना इनके वश की बात नहीं है। यह भी दूसरों की तरह मन में माँ बनने की, बच्चे-वच्चे पालने की चाह रखती है।
शबनम की देख-रेख बिरादरी में अच्छी तरह हुई। शिक्षा, संगीत एवं नृत्य में तालीम दिया। तालीम की पूर्ति के बाद कहीं काम नहीं मिला क्योंकि वह किन्नर थी। जहाँ भी गया उनको यही जवाब मिला- “कभी हिजड़े को किसी ऑफिस में काम करते देखा है।” इसलिए वह अपनी परंपरागत काम करने के लिए मजबूर हो जाती है। शबनम को इकबाल से हुए प्यार को त्याग देना पड़ता है क्योंकि इनके प्यार को समाज की मान्यता नहीं मिलेगी।
आज के सामाजिक जीवन में धन को महत्वपूर्ण पहलू के रूप में मान्यता मिल चुकी है। अपने परंपरागत पेशे से ऊबकर पैसे के लालच में किन्नर गलत मार्ग की ओर जाता है। बिरादरी के गुरु शबनम को पैसे की लालच देने का प्रयास करती हैं, इससे हलीमा रुठ जाती है- “मैं इतनी गिरी नहीं हूँ कि अपनी बेटी की पीठ बेचकर अपनी अपनी भूख मिटाऊँ।” बीच में हुई धक्का-मुक्की के कारण हलीमा का जान चली जाती है। गुरु आत्म-रक्षा हेतु मौत के ज़िम्मेदार शबनम को टहलाकर पुलिस से गिरफ्तार करवाती है। हलीमा के दाह संस्कार पर आए शबनम सच्चाई को सामने लाती है और पुलिस को धोखा देकर भाग जाती है। पुलिस से बचकर वह मध्यप्रदेश के अनूपपुर गाँव में पहुँचती है। गँवार राघव की बेटी की जान बचाकर उसके घर में रहने लगती है। विधायक रतन सिंह के आदमी पर हाथ रखने पर शबनम को मारने के लिए लल्लू नामक गुण्डा आज्ञा अनुसार गाँव आ जाता है। वह शबनम को नंगा करके पीटने की कोशिश करता है। अपनी मान को कलंकित करने की कोशिश करने वाले लल्लू पर प्रतिवार करती हुई लोगों की मानसिकता पर शबनम व्यंग्य करती है- “मैं इस उम्मीद के साथ मार खायी थी, शायद एक हिजड़े को पिटता देखकर इन मर्दों की मर्दानगी जाग जाए।” शबनम आम जनता की निकृष्ट सोच और उनके डर एवं सहानुभूति पर वार करती है ताकि उनमें मानवता जाग उठे। शबनम लोगों की मानसिकता को निहारती हुई कहती है- “अपने डर और कायरता को सहनशीलता का नाम देकर पहले जागने वालों, आज यह हिजड़ा तुम लोगों में अपना अंश देख रहा है। मैं अपनी बिरादरी छोड़कर आयी थी यह सोचकर कि तुम जैसे इंसान के बीच रहूँगी, मगर मुझे क्या पता था कि मेरी किस्मत में हिजड़ों के बीच रहना ही लिखा था। अगर मैं तन से हिजड़ा हूँ तो तुम मन से हिजड़ा हो। तन का हिजड़ा तो फिर भी ताली पीटकर जीवन जी लेता है, लेकिन मन का हिजड़ा ताली पीटते हुए भी डरता है।” लल्ला अपना आदमी होकर भी रतन सिंह शबनम मौसी को बधाई देता है। ताकि चुनाव में गाँव वालों को अपने साथ रख सके। रतन सिंह को पार्टी उम्मीदवार बनाने के कारण विनोद कुपित होकर उसके खिलाफ़ चाल चलता है। शबनम मौसी को अपने वश में करके रतन सिंह के खिलाफ खड़ा लेता है। स्वार्थी विनोद के मामले को कैसे निपटाए यह रतन बाबू अच्छी तरह जानता था। विनोद दुबारा आकर शबनम से नामांकन वापस लेने को कहता है। शबनम को राजनीति की कुतंत्रो का पता होने से वह पीछे हटने से हिचकती है। शबनम विनोद और सिंह साहब को सख्त जवाब देती है- “मैं जानना चाहता हूँ राजनीति कुत्ती है या राजनेता।” शबनम की राजनीति में उन्नति और लोगों के साथ की हेल-मेल से रतन सिंह अपनी हार को सामने देखता है। इसी डर के मारे शबनम को मारने की सुपारी मदन पंडित को देता है। मारने की उम्मीद रखकर आए मदन शबनम की वाणी की सच्चाई से रूबरु हो जाता है और धंधा छोड़कर शबनम के साथ जुड़ जाती है। शबनम की उन्नति से देखकर गुरु अपने किए पर पछतावा करता है। गुरु और पिता शबनम से मिलते हैं। चुनाव में रतन सिंह की हार हो जाती है। किन्नर की जीत के साथ एक नया इतिहास बन जाता है।
भारतीय फिल्म में कितनी शबनम है? अगर किन्नर की कथा हो रही है तो उसमें कितने किन्नर भूमिका पेश करती है। हिंदी फिल्म में हाशिये समाज कभी-कभी स्थान पा रहा है। लेकिन स्थायित्व कहाँ है। समाज में किन्नर की समस्या को पेश करने में भरद्वाज जी ने जो प्रयास किया है वह सराहनीय है। हाशिये लोग की दशा को फिल्म में प्रस्तुत करने के साथ किन्नर का सान्निध्य भी पक्का करना है। फिल्म की बातों से परे इनकी जीवन क्या है इसे परखना ज़रूरी है। हिंदी फिल्म में किन्नर का चित्रण कम हुआ है। लेकिन समय के साथ बदलाव ज़रूर है। सशक्त रूप में इनकी जीवन पलों को फिल्म अंकित किया है। जो अंकन किन्नर को लेकर हुआ है इसकी वास्तविकता को भी परखना ज़रूरी है।
हिंदी फिल्म के साथ अन्य मीडिया में भी किन्नर का चित्रण आने लगा। ध्यान देने की बात ‘रेड लेबल’ चाय पत्ती के विज्ञापन में किन्नरों ने खुद अभिनय किया है। फिल्म अभिनेता के रूप में किन्नर अंजली का नाम रोशन हुआ है जो केरल से है। इसी तरह हिंदी फिल्म में किन्नर का छाप दिखने लगा है। मीडिया में चित्रित किन्नर जीवन की दुहरा चेहरा है उसे परखने का दात्यित्व हरेक सहृदय का है। किन्नर जो समाज में हाशिये में धकेले गए हैं उसे समाज की मुख्यधारा में स्थान दिलाने में फिल्म अपने ओर से कोशिश कर रहे हैं।समाज की नज़िरए बदल रही है। इसका उदाहरण है- किन्नर जीवन पर आधारित बॉलीवुड़ फिल्म ‘हंसा एक सहयोग’ में अंबिकापुर के ‘किन्नर मुस्कान’ को एक किरदार मिला है। इसी फिल्म की गान में शबनम बानु भी किरदार पेश कर रही है। समाज के विकास में किन्नर भी अपना योगदान दे सकता है। लेकिन समाज की नीच दृष्टि से ये परेशान है। इन हाशिये ज़िंदगी की व्यथा को जनता तक पहुँचाने में साहित्य के साथ फिल्म भी अपना योगदान दे रहा है। किन्नर की हक और जिंदगी का जीवंत चित्र जनता तक पहुँचाने की कोशिश में हैं।
वैष्णव पी वी, एम० ए० हिंदी, स्थान-कण्णूर, केरला, मोबाइल नं- 9496248718
ई मेल – vyshnavpvknr1705@gmail.com
सिनेमा और समाज में वृद्ध-भावना सरोहा
सिनेमा और समाज में वृद्ध
भावना सरोहा
व्यक्ति से परिवार और परिवार से समाज बनता है और इस समाज का एक अहम् हिस्सा बुजुर्गों का है फिर भी वे युवा पीढ़ी से कटे कटे रहने पर मजबूर होते हैं .हमारा संसार विभिन्न धर्मों, जातियों, नस्लों आदि में बटां हुआ है किन्तु इन सब को वृद्धावस्था अपने भीतर समेट लेती है, क्योंकि इस धरती पर जो भी जीव उत्पन्न हुआ है उसे एक न एक दिन बूढ़ा होना ही पड़ता है .इंसान जो कि धरती का सबसे बुद्धिमान और शक्तिशाली प्राणी माना जाता है एक उम्र के बाद उसे भी कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ता है जैसे कि शारीरिक, मानसिक, गिरता स्वास्थ्य, आर्थिक, पारिवारिक व सामाजिक, अकेलापन और कभी-कभी घर व समाज में अनादर आदि . इन समस्याओं के कुछ कारण हैं जैसे कि – संयुक्त परिवार का विघटन, भौतिक सुख सुविधाओं में वृद्धि, नई पुरानी पीढ़ी में फासला, धन का महत्व, पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव, महंगाई का बढ़ना, सामाजिक सुरक्षा का अभाव आदि.
“सिनेमा, कला का वह सशक्त माध्यम है जो अपने दर्शकों को किसी ख़ास विषय-वस्तु पर आधारित कथा को दिखाता है, बताता है और मनोरंजन करते हुए दर्शकों के हृदयों में गहरे उतर जाने की अभूतपूर्व क्षमता रखता है” (पृष्ट १५, प्रसून सिन्हा, भारतीय सिनेमा, श्री नटराज प्रकाशन, दिल्ली-५३, प्रथम संस्करण २००६ )
सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जिसके जरिये अनपढ़ से लेकर पढ़े लिखे लोग इससे जुड़ जाते हैं . सिनेमा के द्वारा दिए गए सन्देशों से कई लोगों का हृदय परिवर्तन भी हुआ है . सिनेमा समाज की छायाप्रति है. सिनेमा ने समाज के बढती उम्र वाले लोगों के हिस्से को बखूब दिखाया है… सभी को एक न एक दिन वृद्धावस्था से गुज़रना पड़ता है. उस अवस्था का पूरा अध्ययन करके सिनेमा वृद्धों की प्रत्येक स्थिति को दिखाता है.
“मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस” फिल्म में एक बूढ़े सफाई कर्मचारी को दिखाया है. फिल्म में उसे झुंझलाते हुए दिखाया गया है जो सुबह से लेकर शाम तक झाड़ू पोछा करता है और लोग साथ-साथ उसे गन्दा भी करते रहते हैं मगर जैसे ही उसे थोड़ा सा प्यार मिलता है, उसे मुन्ना प्यार से गले लगाता है तो वह एकदम भावुक हो जाता है और उसका दिल खिल उठता है . जिससे कभी किसी ने प्यार से बात नहीं की उसे जब थोड़ी इज्ज़त और प्यार मिलता है तो वह कहता है “अच्छा ठीक है अब रुलाएगा क्या” .गले लगाने के बाद जब मुन्नाभाई बूढ़े कर्मचारी की सफाई गन्दी करता है तो वह ख़ुशी-ख़ुशी कहता है “कोई नहीं साफ़ हो जायेगा” बल्कि एक पल पहले वह युवाओं को कोस रहा होता है कि उसकी सफाई को सब गन्दा कर रहे हैं तथा कोई उसकी बात नहीं सुनता . घर हो या बाहर हमारे वृद्धों को बचे हुए दिन काटने के लिए सुख सुविधाएं से अधिक थोड़ी इज्ज़त और प्यार की जरुरत है .
भूमंडलीकरण और पश्चिमी सोच का प्रभाव कई फिल्मों में दिखाया गया है . “भूतनाथ” में पिता को रोता हुआ छोड़कर बेटा मुहं मोड़कर चला जाता है .पीछे से पिता के गिरने और चिल्लाने की चीख तक उसे सुनाई नहीं देती .पिता के मरने की खबर सुनने पर भी वह नहीं आता, उसका मकसद एक ही है- “उस घर को बेच देना” .
“लगे रहो मुन्ना भाई” फिल्म में दिखाया गया है की बच्चे अपने माँ-बाप को आश्रम भेज कर अपने को मुक्त समझते हैं . एक बेटा खूब पैसे वाला है मगर एक शहर में होते हुए भी पिता से मिलने का वक़्त नहीं है और न ही बहू उनकी शक्ल देखना चाहती है. फिल्म में जब मुन्ना उसे प्यार से समझाता है कि तुम्हारे पिता अपने जन्मदिन पर अपने बेटे को देखकर बहुत खुश होंगे सिर्फ पांच मिनट के लिए आ जाना तो वह साफ मना कर देता है मगर जब मार मुन्ना द्वारा उसे पड़ती है और अपनी जान पर आती है तो वह भाग कर पिता से मिलने जाता है. आज की पीढ़ी बहुत ही स्वार्थी होती जा रही है. जायदाद की बात आती है तो माता जी-पिता जी और जब जायदाद मिल जाती है तो बूढा-बुढ़िया बन जाते हैं . यही हमें “अवतार”, “अमृत” और “बागवान” फिल्म में देखने को मिलता है .यह कितनी घटिया बात है हमें पाल-पोसकर बड़ा करने वाले को हम खुद ही भूखा मारने की कोशिश करते हैं. इन तीनों फिल्मों में बच्चों द्वारा दिए गए धोखे और अपमान के बाद शोषित होते हुए भी वे बेचारे नहीं बनते. मेहनत करने में विश्वास रखते हैं और दोबारा शून्य से अपना जीवन फिर शुरू करते हैं और कामयाब होते हैं. ऐसा ही एक दृढ़ पात्र उपन्यास “ढलती शाम” में मिलता है जो कि रामावतार द्वारा लिखित है. .
“बूढ़ी काकी” कहानी और “वाटर” फिल्म में दो ऐसी बूढ़ी स्त्रियों को दिखाया गया है जिनका अच्छा खाना मिलना ही बहुत बड़ा सपना बन जाता है . एक तरफ जहाँ काकी को पकवान खाने की लालसा है और उसी को पाने के लिए बेटे बहू से गालियां खाती हैं वहीँ दूसरी ओर बूढ़ी विधवा है जिसकी शादी बचपन में हो गयी थी और उस समय उसे लड्डू खिलाया गया था. अब वह मरने की कगार पर है और लड्डू खाने का सपना रोज़ देखती है…..हमारे समाज में बुजुर्गों की ऐसी स्थिति है जहाँ खाने के लिए तो मिलता नहीं तो दवा क्या ख़ाक मिलेगी ???
“रूई का बोझ” फिल्म में भी अच्छा खाने-पीने पहनने से एक बुज़ुर्ग को वंचित रखने की कोशिश की जाती है . बच्चों द्वारा जायदाद लेने के बाद बूढ़े पिता की दुर्गति दिखाई है..कायदे से देखा जाये तो घर के बूढ़े माँ-बाप रुई के सामान होते हैं जिनका बोझ नहीं होता है ..मगर अधिकतर संतानें इतनी नालायक हो गयी हैं कि वे माँ-बाप को गीली रुई का बोझ समझती हैं और उसे उतार फेकना चाहती हैं.
“शोले” और “शराबी” फिल्मों में हमे ऐसे बुज़ुर्ग मिलते हैं जो शारीरिक रूप से जरूर थोड़े कमजोर हो गये हों लेकिन मानसिक रूप से बहुत मजबूत हैं . शोले फिल्म में एक मुस्लिम (A K HUNGAL ) बुज़ुर्ग पात्र है वह अपने एक मात्र बुढ़ापे का सहारा अपने बेटे को गाँव वालों के भविष्य के लिए कुर्बान कर देता है और वह मंशा रखता है कि यदि और पुत्र होते तो मै उन्हें भी कुर्बान कर देता . दूसरी ओर “शराबी” में मुंशी जी को विजय की शराब की वजह से तड़प नहीं देखी जाती है और कमजोर शरीर होते हुए भी बोझा ढोने निकल पड़ते है और काम करते-करते बेहोश भी हो जाते है. “मदर इंडिया” फिल्म में भी जब राधा के सामने एक स्त्री की लाज का सवाल आता है तो वह भी संघर्ष से पाले हुए, बुढ़ापे के सहारे बिरजू को अपने हाथों से गोली मार देती है . “शोले” और “मदर इंडिया” फिल्मों में हमें ऐसे पुरुष और स्त्री बुज़ुर्ग पात्र मिलते हैं जो समाज के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हैं .
बॉलीवुड में कई पारिवारिक फ़िल्में ऐसी भी हैं जिनमे घर के बुजुर्गों की घर में अहमियत व महत्ता दिखाई गई है जैसे-‘कभी ख़ुशी कभी गम’, ’देवदास’, ’कुछ कुछ होता है’ आदि .
शारीरिक और मानसिक समस्याओं को ध्यान में रखते हुए भी फ़िल्में बनाई गयीं हैं जैसे-पीकू. “पिकू” जैसी फिल्म में बुजुर्गों की बेहद आम ‘कब्ज़ की समस्या’ को दिखाया गया है . यह आम समस्या होते हुए भी आम नहीं होती है. यह अत्यंत दुखद और पीड़ादायक होती है .पिता और बेटी के आपसी सम्बन्ध को बखूबी दिखाया गया है . बेटी पिता की हर बात, दवा से लेकर उनकी हर जरुरत, का ख्याल रखती है किन्तु फिर भी कई बार अपने पिता पर झुंझला जाती है . जिसमें एक कारण है पिता की वजह से उसकी शादी नहीं होना. पिता भास्कर बैनर्जी कई बार बेटी के साथ स्वार्थ से भरा व्यवहार कर बैठते हैं, उन्हें डर है कि यदि बेटी पीकू की शादी हो गई तो उनका ख्याल कौन रखेगा . उनका मानना है कि पति की सेवा और सेक्स के लिए शादी करनी है तो उससे अच्छा है माता-पिता की सेवा की जाए. जब उन्हें लगता कि कोई लड़का पीकू में रुचि ले रहा है तो वह बेटी के सामने ही बोलते है कि “पीकू वर्जिन नहीं है ”. यहाँ पिता-बेटी में बेवजह भावुक संबंध न दिखाते हुए दोनों के बीच खुला व दोस्ताना व्यवहार दिखाया गया है . पिता उसके जीवन में पूरी तरह रमे हुए हैं, हर एक बात वह बेटी को बताते हैं और बेटी ध्यानपूर्वक सुनती है. पिता की तबियत व जरुरत की हर चीज़ का वह ख्याल रखती है. पिता उसे कई बार ऑफिस में भी कॉल करते हैं. सिर्फ यह बताने के लिए कि उनको आज पोटी आयी या नहीं और आयी भी तो किस रंग की; क्योंकि इसी कारण वह अपने जीवन में बहुत पीड़ा झेलते हैं और यही बात उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण है. भास्कर बैनर्जी अपनी पोटी को लेकर चिंतित रहते हैं और सेमी सॉलिड या मैंगो पल्प से लेकर उसके रंग की चर्चा खाने की मेज़ पर पिता-बेटी करते हैं .पिता के लिए सुबह-सुबह एक बेहतरीन मोशन होना दुनियां के बड़े सुखों में से एक है. दूसरा कारण कई बार बूढा पिता अपने मन की सुनता है तथा मनमानी करता है. फिल्म के अंत में भी वे किसी को बिना बताए साईकिल पर लम्बी सैर पर चले जाते हैं और बेटी उनकी कमज़ोर हड्डियों की समस्या को लेकर चिंतित रहती है कि कहीं गिर गए तो हड्डी टूट सकती है. यहाँ बूढ़े पिता का किरदार मजबूत है जो अपनी सुनता है . इससे ही मिलता-जुलता किरदार “मुक्तिभवन” फिल्म में है. जिसकी पत्नी की मृत्यु हो चुकी है और वह पूरे परिवार में खुद को अकेला महसूस कर रहा है . उसे एक दिन आभास होता है कि वह मरने वाला है . घर में वह महसूस करता है कि बेटा और बहू के पास उसके लिए समय नहीं है . बेटा ऑफिस से लौटने के बाद जरुरी कॉल पर लगा रहता है और बहू भी अब पहले की तरह उसका ध्यान नहीं रखती और न ही उनको पसंद करती है . इसलिए वह चाहता है कि अपने अंतिम दिनों को काशी में “मुक्तिभवन” आश्रम में बिताएं, वहीं से उसे मुक्ति मिलेगी. घर में बूढ़ा व्यक्ति अपनी पोती के नज़दीक दिखाया गया है. दोनों एक ही रूम में रहते हैं .बेटा भी पिता की अंतिम इच्छा मानकर काशी ले जाता है. इस फिल्म में युवा की मजबूरी को प्रदर्शित किया है कि आजकल की नौकरी के कारण युवा चाहकर भी अपने घर के बुजुर्गों को समय नहीं दे पाते हैं. वे उनके प्रति सम्मान और प्रेम तो रखते हैं फिर भी अपने व्यस्त जीवन और महंगाई के कारण न चाहकर भी बदसलूकी कर बैठते हैं.
“कपूर एंड संस” फिल्म में भी “मुक्तिभवन” की तरह ही बुज़ुर्ग की मनोदशा को दिखाया गया है . घर के सबसे बड़े सदस्य को अपने बुढ़ापे में अकेलापन महसूस होता है. वैसे तो घर में बेटा, बहू, पोते आदि हैं किन्तु फिर भी उन्हें लगता है की उनपर ध्यान नहीं दिया जा रहा है . उन्हें लगता है कि किसी भी वक्त मृत्यु आ सकती है इसलिए वह हर समय मरने का ही अभ्यास करते रहते हैं .इस बुज़ुर्ग सदस्य का एक ही सपना है कि मरने से पहले एक बार समस्त परिवार के साथ फोटो खिंचवा ले.
कुछ फिल्मों में बुजुर्गों के युवा स्त्रियों के प्रति आकर्षण को भी विषय बनाया गया है. जैसे कि जोगेर्स पार्क, निशब्द, चीनी कम, द शौकींस आदि. यदि हम सामान्य जीवन में इसे देखते हैं तो बोल देते है ये बूढ़ा चिपकू, ठरकी है किन्तु इसके पीछे छिपा कारण अति संवेदनशील है. यहाँ यह साफ़ कह देना उचित है कि मैं चरित्रहीन लोगों की बात नहीं कर रही हूँ .सामान्यतः आकर्षण का कारण यह है की वह पीढ़ी धीरे धीरे पीछे खिसकती जा रही है. वे लोग नए लोगो से जुड़ना चाहते हैं …तभी कोई जबरदस्ती बात करने की कोशिश करता है तो कोई युवा के प्रति आकर्षित हो जाता है ..हर आदमी के अन्दर एक उम्र के बाद बढती उम्र और मौत के प्रति डर बढ़ने लगता है . इसी कारण वे जवानी की तरफ दोबारा बढ़ना चाहते हैं और युवाओं के प्रति आकर्षित होते हैं केवल उनका जवान शरीर ही आकर्षित नहीं करता है . वे डर से दूर भागना चाहते है, जवानी की तरफ बढ़ना चाहते हैं किन्तु ऐसा हो नहीं सकता. ये सच है कि वे अपनी दुनियादारी के चक्कर में इतना फंस जाते हैं कि ज़िन्दगी के असली मायने खुश रहना को ही भूल जाते हैं और शायद इसी वजह से कभी कभी जवान लोगों के रहन-सहन पर इर्ष्या भी होती है क्योंकि वे उनकी तरह खुशियों का आनंद लेने की काबिलियत खो देते हैं. “द शौकींस” फिल्म में ६० वर्षीय तीन वृद्ध हैं तथा तीनों चरित्र के दोषी नहीं हैं .सामान्य मानव की तरह उनके भीतर शारीरिक सुख पाने की भावनाएं रखते हैं . तीनों में से एक की पत्नी भगवान् की भक्ति में लग जाती है जो अपने पति की इच्छाओं को अनदेखा करती है . एक की पत्नी बहुत पहले ही स्वर्ग सिधार गयी होती है और तीसरा वृद्ध इसीलिए शादी नहीं करता क्योंकि वह अपने दोस्त की बहन से प्रेम करता था और तीनों ही दोस्तों ने आपस में बचपन में यह वादा यह किया था की हम एक दूसरे की बहन पर नज़र नहीं डालेंगे, इसलिए वह पूरी उम्र कुवारा रहता है. तीनों की ज़िन्दगी में निरसता है . तीनों चाहते है कि जो अभी तक उन्होंने अपनी युवावस्था में मौजमस्ती नहीं की वह अब करें. सारी ख्वाईशें पूरी करें. इसी मकसद के साथ वे छुट्टियाँ बिताने मॉरिशस जाते हैं और वहां उनकी मुलाकात ‘आहना’ नाम की लड़की से होती है . आहना ‘अक्षय कुमार’ की बहुत बड़ी प्रशंसक है तथा वह अक्षय से मिलना चाहती है . आहना का कहना है कि जो भी उसे अक्षय से मिलवायेगा उसके लिए वह कुछ भी कर सकती है .बस फिर क्या तीनों वृद्ध उसे अपने-अपने तरीके से लुभाने लगते हैं, तीनों में प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है कि पहले अक्षय से आहना को कौन मिलवायेगा . तीनों को लड़की का साथ रहना अच्छा लगता है . अगर इन लोगों के चरित्र में दोष होता तो उस अकेली नायिका के साथ तीनों मिलकर कोई भी दुष्कर्म कर सकते थे. किन्तु वे बहुत ही संकोच रूप से आगे बढ़ते हैं और कुछ गलत नहीं करते हैं. जितना वह लड़की खुद आगे बढती है उतना ही उनके लिए बहुत होता है . उनके भीतर कहीं भी हमें हवस नहीं दिखती है. अंत में वे तीनों अपनी-अपनी जिंदगी में खुश दिखाए गए हैं . ‘निशब्द’ फिल्म में अधिक उम्र वाले व्यक्ति को बेटी की सहेली से प्यार हो जाता है. युवा लड़की का छोटे कपड़े पहनना, बिंदास व्यवहार, खुल कर जीवन जीने का तरीका, अपनी भावनाओं को निसंकोच व्यक्त करना उसे आकर्षित करता है. ‘जोगर्स पार्क’ फिल्म में भी इसी तरह का आकर्षण एक सेवानिवृत वकील का एक युवा लड़की से दिखाया गया है. ‘चीनी कम’ फिल्म में एक अलग तरह का प्रेम दिखाया गया है . यहाँ दोनों लोगों में उम्र का काफी अंतर है किन्तु लड़की भी यहाँ परिपक्व है. बाहरी आवरण से अधिक यहाँ दोनों को एक – दूसरे की समझदारी आकर्षित करती है . दोनों लोग अकेले और अविवाहित होते हैं दोनों को एक-दूसरे का साथ पसंद आता है और दोनों शादी करने का निर्णय लेते हैं .
बुजुर्गों को समस्या का सामना हर जगह करना पड़ता है . चाहे व्यक्ति किसी भी देश का हो हर व्यक्ति का शरीर एक समान ही बूढ़ा होता है . किन्तु सामाजिक ढांचे व परिवेश के कारण उनकी स्थिति में थोडा बहुत अंतर तो हो सकता है किन्तु शरीर के मामले में सबकी एक जैसी ही समस्याएँ हैं . हमारे देश में जहाँ पारिवारिक रिश्तों में बुजुर्गों को केन्द्रित किया जाता है वहीँ विदेशी फिल्मों में उसके अस्तित्व पर जोर दिया गया है . बुज़ुर्ग क्या करना चाहता है और वह क्या कर सकता है या उसकी आखिरी इच्छा क्या है आदि . जैसे harry & tonto(1974) फिल्म में न्यू यॉर्क में रहने वाला सेवानिवृत बूढ़ा व्यक्ति हैरी का जब अपार्टमेंट तोड़ दिया जाता है तो वो पूरी ज़िन्दगी अपनी प्यारी बिल्ली टोंटो के साथ विभिन्न कठिनाइयों का सामना करते हुए देशव्यापी यात्रा पर निकल जाता है . Kotch(1971) में joseph kotcher सेवानिवृत विक्रेता है जो नर्सिंग होम में न रहकर अपने बेटे के घर में अपने अंतिम दिन बिताना चाहता है, the bucket list (2007) में दो कैंसर के मरीज अस्पताल से भाग जाते हैं क्योंकि उनकी इच्छा है की मरने से पहले वे एक रोड ट्रिप करें. The trip to bountiful(1985) में बूढी औरत की इच्छा की मरने से पहले वह अपने बचपन के घर जाये . driving miss daisy (1989), grumpy old men(1993) , grumpier old men(1995), tribute(1980), the straight story (1999), one golden pond(1981), the bridges of Madison country (1995), venus(2006) and old man and the sea आदि बुजुर्गों पर आधारित फ़िल्में हैं . इन फिल्मों में बुजुर्गों को कुंठित नहीं दिखाया है क्योंकि वे अपनी ज़िन्दगी खुद जीते है, अपनी मर्ज़ी का करते है चाहे उन्हें किसी साथी का चुनाव करना हो या किसी खास लक्ष्य तक पहुंचना हो. वे समाज व परिवार की चिंता छोड़ अपने जीवन के हर एक पल पर खुद का अधिकार समझते हैं.
सिनेमा ने सिर्फ बुजुर्गों को शोषित या दबते हुए ही नहीं दिखाया उन्हें हर स्थिति में अलग अलग भूमिका निभाते हुए दिखाया है . कई बार देखा जाता है कि सब कुछ होने के बाद भी बुज़ुर्ग अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं . ऐसा अक्सर होता है कि दोनों साथी में से एक छोड़कर चला जाता है . उपरोक्त सब समस्याओं के उपचार के अलावा सबसे ज्यादा जरुरी है कि वह अपने जीतेजी अपनी जायदाद किसी को न दें तथा अपना दुःख सुख बाँटने के लिए एक साथी का चुनाव करें. हमारे समाज में ये आसानी से स्वीकार नहीं किया जायेगा मगर जब बच्चे पश्चिमी विचारों का अनुसरण कर सकते है तो बुज़ुर्ग क्यों नहीं . हमें इस विषय पर विचार करना चाहिए.
मधुर भंडारकर का सिनेमा और स्त्री विमर्श-दुगमवार साईनाथ गंगाधर
मधुर भंडारकर का सिनेमा और स्त्री विमर्श
दुगमवार साईनाथ गंगाधर
शोधार्थी, हिंदी विभाग,
राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय, अजमेर
Email id: dugamwarsainath@gmail.com
Mob. 7276848456
यह सर्वविदित है कि सिनेमा आधुनिक समय का एक सशक्त कला माध्यम समाज का दर्पण बनकर समकालीन यथार्थ को यथावत पेश करने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण सशक्त संचार माध्यम है । फ़िल्मकार अपने सिनेमा में घटनाओं, संवादों, प्रसंगों, पात्रों के माध्यम से जीवन की किसी न किसी समस्याओं, उलझनों-सुलझनो को रेखांकित करता है और पात्रों को किसी विशेष वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत करता है । हिंदी सिनेमा अपने आरंभिक दौर से निरंतर अब तक उन्नति के अनेक शिखर पार कर इक्कीसवी सदी में आ धमका । इक्कीसवी सदी के फिल्मकारों ने सिनेमा को दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, समलैंगिक विमर्श, स्त्री विमर्श आदि विविध विमर्शों से जोड़ दिया है । विमर्श से तात्पर्य है- गहन-सोच, विचार, समीक्षा, परीक्षण, चिंतन-मनन करना ‘मानक हिंदी कोश’ में विमर्श से तात्पर्य है-“(1) सोच विचार कर तथ्य या वास्तविकता का पता लगाना । (2) किसी बात या विषय पर कुछ सोचना-समझना विचार करना ।” विमर्श किसी भी विषय पर हो सकता है या यूँ कह सकते हैं कि समाज, जाति, धर्म, व्यक्ति, लिंग आदि कोई भी विषय विमर्श का हो सकता है । अनादिकाल से स्त्री पर होने वाले अन्याय, शोषण, अत्याचार, दमन-दलन के प्रति स्त्री चेतना ने ही स्त्री विमर्श को जन्म दिया है । शिक्षा, विज्ञान प्रगति के कारण स्त्री को अधिकार, अस्मिता और अस्तित्व बोध ने ही विमर्श को प्रेरणा दी है । स्त्री –विमर्श एक ऐसी जीवन दृष्टि है –जिसमे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और बौद्धिक आदि क्षेत्रो में समानाधिकार, मनुष्य के रूप में सभी को सम्मान, न्याय, अधिकार, प्रतिष्ठा बहाल करने वाली व्यवस्था है । पुरुष प्रधान समाज व्यवस्था में स्त्री की स्थिति (दशा और दिशा ) को दर्शाने का प्रयास फिल्मकार मधुर भंडारकर ने किया है ।

इक्कीसवी सदी के प्रथम दशक के सर्वश्रेष्ठ तीन राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्माता, निर्देशक, पटकथाकार, नायिका प्रधान सिने फ़िल्मकार मधुर भंडारकर ये नाम भारतीय सिनेमा जगत (दर्शक सहित) के लिए कोई नया नहीं हैं ।‘चाँदनी बार’(2001), ‘सत्ता’(2003), ‘आन मैन एट वर्क’(2004), ‘पेज-3’(2005), ‘कोर्पोरेट’(2006), ‘ट्रैफिक सिग्नल’(2007), ‘फैशन’(2008), ‘जेल’(2009), ‘दिल तो बच्चा है जी’(2011), ‘हिरोइन’(2012), ‘कैलेण्डर गर्ल्स’(2015) आदि में कुछ एक दो सिनेमा को छोड़ दिया जाए तो बाकि सभी सिनेमा नायिका प्रधान हैं । मधुर भंडारकर की स्त्री पात्रों में अन्याय, अत्याचार, हिंसा, शोषण,दमन-दलन के प्रति विद्रोही तेवर दिखाई देते हैं । चाहे ‘चांदनी बार’ की मुमताज (तब्बू) हो, ‘सत्ता’ की अनुराधा सहगल (रवीना टंडन) हो या ‘फैशन’ की मेघना माथुर (प्रियंका चोपड़ा) या फिर पेज-3 की माधवी शर्मा (कोंकण सेन शर्मा) या फिर कैलेण्डर गर्ल्स की शारण पिंटो, मयूरी चोहान, नाजनीन खालिद, नंदिता मेनन,परोमा घोष । सवर्ण हो या दलित स्त्री अपमानित, शोषित ही रही है परंतु आज की स्त्री मूक-मौन न हो कर मुखर दिखाई देती है ।
आर्थिक आत्मनिर्भरता और स्त्री – पुरुष समानता स्त्री विमर्श का मूल स्वर है, जो इन के सिनेमा में अभिव्यक्त हुआ है । ‘सत्ता’ की अनुराधा, ‘कोर्पोरेट’ की निशि, ‘हिरोइन’ की माही अरोड़ा, ‘चांदनी बार’ की मुमताज, ‘फैशन’ की मेघना माथुर, ‘पेज-3’ की माधवी शर्मा और पर्ल, ‘कैलेण्डर गर्ल्स’ की शारण पिंटो, मयूरी चोहान, नाजनीन खालिद और परोमा घोष आदि अपना निर्वाहन खुद करती हैं, ये सभी कामकाजी स्त्रियाँ हैं । कोई मॉडलिंग का काम करती है तो कोई प्रबंधक का, कोई अभिनय, संवाददाता-पत्रकारिता का कार्य करती है तो कोई समाज सेवा और राजनीति-सेवा कर रही हैं, मतलब प्रत्येक तबके की और लगभग हर पेशे की स्त्री यहाँ मौजूद है । आज की स्त्री महत्वाकांक्षी स्त्री है और इसे पाने के लिए संघर्ष करती हुई, अपनी अस्मिता, अस्तित्व की लड़ाई लड़ती हुई और हर उस रोड़े को उखाड़ कर फेकती हुई दिखाई देती है, जो उस के इस पथ में बाधा उत्पन करता हो । किसी भी प्रकार से सफलता हासिल करना चाहती हैं । ‘फैशन’ सिनेमा में मध्य वर्गिय चंड़ीगढ़ शहर की मेघना माथुर सफलता के लिए हर प्रकार की संघर्ष करती है साथ ही अपने बोस के साथ हमबिस्तर भी होती है, इस को लेकर उस के मन में कोई मलाल नहीं है । हिरोइन की अभिनेत्री माही अरोड़ा सिनेमा में स्थान बनाए रखने के लिए अभिनेता और क्रिकेट ख़िलाड़ी से भी हमबिस्तर होती है साथ ही अपने फिल्म की प्रसिद्धि के लिए वो स्वयं का सेक्स टेप भी लिक करवाती है ।
वर्तमान स्त्री उन रुढियों,परम्पराओं और वर्जनाओं का प्रतिरोध करती हैं, जो पुरुष प्रधान समाज द्वारा उस पर जबरन लादे गये हैं । हमारे समाज में लड़के चाहे रात में घर कभी भी आये-जाये समय की कोई पाबन्दी नहीं हैं पर स्त्री ऐसा नहीं कर सकती । ‘सत्ता’ में विवेक शादी के बाद लड़कियों के साथ ऐय्याशी कर देर रात घर आता है तो माता-पिता उसे कुछ नहीं कहते और जब अनुराधा अपने सहेली के यहाँ से रात में घर आती है तब सास कहती है “यह कोई वक्त है, शरीफ घर के बहु के घर लौटने का ?” अर्थात नहीं, पर अनुराधा के पूछने पर कि “विवेक आ गया ?” सास कहती है “वो लड़का है ।” विवेक अनुराधा को थप्पड़ मारता है तब अनुराधा भी पति विवेक को जांघो पर लात मारती हैं और कहती है “मैं उन लड़कियों में से नहीं हूँ विवेक जो पति का थप्पड़ खाकर किचन में जा कर रोती हैं ।” हमारे यहाँ यह परंपरा रही है कि लड़की का कन्यादान पिता(पुरुष) ही करेगा । शादी के वक्त विवेक की माँ पूछती है, कि “कन्यादान कौन करेगा ?”, “मेरी माँ करेगी”अनुराधा का यह जवाब परंपरा के प्रति प्रतिरोधी स्वर है । भारतीय सामंती सोच हमेशा कला, संस्कृति,राजनीति, आर्थिक, विज्ञान, साहित्य और अन्य क्षेत्र में स्त्री शिरकत के खिलाफ रहा है फिर भी स्त्री इन क्षेत्रों में निरंतर प्रतिरोधी – संघर्ष कर, शिरकत करने में सफल रही है । ‘कैलेण्डर गर्ल्स’ में कलकत्ता की परोमा घोष और लाहौर की नाजनीन खालिद, कैलेण्डर गर्ल्स बनने की चाह के खिलाफ है उनके ही घरवाले फिर नाजनीन अपने प्रेमी इंजमाम को लन्दन में छोड़ के मुंबई आ जाती है और कैलेण्डर गर्ल्स बनती है । तमाम तरह के धोके खा कर भी परोमा घोष निरंतर संघर्ष करते हुए अपने आपको अंततः सफल साबित करती है । ‘पेज 3’ की माधवी शर्मा व्यवस्था में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ अपने कलम की ताकत से जंग छेड़ देती है । मानव तस्करी के खिलाफ, गुन्हेगारी के खिलाफ लड़ाई लड़ती है और उच्च वर्ग, फ़िल्मी चकाचौंध दुनिया के पीछे का नंगा सत्य को उघाड़ती है और बदले में उसे मिलती है, बेरोजगारी, ऐसे में वह हार मानने को तैयार नहीं हैं, उसका संघर्ष जारी हैं । फिर भी बाद में वह पेज-3 (पत्रकारिता की नौकरी) पा ही लेती हैं । पुरुष प्रधान समाज भारतीय समाज में समलैंगिक संबंध, विवाह पूर्व शारीरिक संबंध और विवाहेत्तर शारीरिक संबंध स्त्री के लिए वर्जित माने गये हैं । इस के प्रति प्रस्तुत सिनेमा में प्रतिरोधी स्वर दिखाई देते हैं । विवाह पूर्व संबध,विवाहेत्तर संबंध रखना तो दूर इस पर स्त्रियों का इस पर बोलना भी वर्जित माना जाता है, पर वर्तमान समाज में यह ठीक नहीं लगता स्त्रियों के संदर्भ में । क्योंकि ‘सत्ता’ की अनुराधा अपने ही राजनीतिक गुरु यशवंत वरधे के साथ हमबिस्तर होती है और इसके लिए उसके मन में कोई ग्लानी नहीं हैं, वह इसे आत्म सुख मानती है । ‘कैलेण्डर गर्ल्स’ में नंदिता मेनन, नाजनीन खालिद, परोमा घोष, शारण पिंटो और मयूरी चोहान अपने कैलेण्डर शूटिंग के एक रात पहले कैमरा मैन से अपने अपने विवाह पूर्व संबंधों का अनुभव साझा करती है और परोमा घोष अपने प्रेमी के अलावा अन्य क्रिकेट ख़िलाड़ी के साथ भी शरीर सबंध स्थापित करती है । फैशन की मेघना माथुर विवाह पूर्व गर्भधारण करती है और फिर अपने कैरियर में रोड़ा बन रहा गर्भ का गर्भपात भी करती है । ऐसे में उस मुद्दे की बात आती है जो आज कल देश विदेश में, संसद में संगोष्ठियों में, हो रही हैं,कहीं इस के विरोध में तो कहीं इस के समर्थन में आंदोलन हो रहे है वह मुद्दा है – समलैंगिकता संबंध का । इसे आज कल मानवाधिकार के रूप में भी पेश किया जा रहा हैं । तब एक सृजनात्मक कलाकार कैसे नजर अंदाज कर सकता है । मधुर भंडारकर सिनेमा में भी इस प्रकार के समलैंगिक संबंधी स्त्री और पुरुष दोनों प्रकार दिखाई देती हैं पर यहाँ स्त्री संबंधी समलैंगिक संबंध पर ही चर्चा करेंगे | ‘कैलेण्डर गर्ल्स’ में नंदिता मेनन के अपने सहेली के साथ शारीरिक संबंध है । ‘हिरोइन’ में अभिनेत्री माही अरोड़ा के अपने सह स्त्री कलाकार के साथ समलैंगिक संबंध हैं ।
इस प्रकार स्पष्ट है कि आज स्त्री शिक्षा, साहस, धैर्य, सजगता, शक्ति-संपन्न, समर्थ, स्वतंत्र, आकर्षक व्यक्तित्व को लेकर जीवन के विविध क्षेत्रो में प्रगति कर अपनी विजय पताका फहराती हुई दिखाई दे रही है । पुरुष प्रधान समाज द्वारा थोपी हुई जीवन शैली का, सत्ता का बंधनों का, वर्जनाओं और तमाम उन विचारों-आचारों को नकारती है । मधुर भंडारकर की स्त्री, अन्यायी, अत्याचारी, अयोग्य ‘सत्ता’ परिवर्तन की हिमाकत भी रखती है । स्त्री पुरुष को साथी के रूप में देखना चाहती है, पुरुषी स्वामी रूप वह अस्वीकार करती है । उसके पास अपनी जीवन दृष्टि है और उसे अमल में लाने की माद्दा भी है । अत: हम आत्मविश्वास के साथ कह सकते है, कि मधुर भंडारकर की सिनेमा वर्तमान स्त्री की छवि से रु-ब-रु कराने में सफल रहा है ।
संदर्भ ग्रंथ / सिनेमा :
1. चाँदनी बार(2001)
2. सत्ता(2003)
3. पेज-3 (2005)
4. कोर्पोरेट (2006)
5. ट्राफिक सिग्नल(2007)
6. फैशन(2008)
7.हिरोइन(2012)
8. कैलेण्डर गर्ल्स(2015)
9. हिंदी शब्दकोश- हरदेव बाहरी, राजपाल प्रकाशन, (2012)
चित्र साभार: koimoi
ब्रज के संस्कार लोक-गीतों में निहित नारी वेदना-डॉ. बौबी शर्मा

ब्रज के संस्कार लोक-गीतों में निहित नारी वेदना
डॉ. बौबी शर्मा
सर्वप्रथम ब्रज शब्द का प्रयोग वेदों में दृष्टिगोचर होता है जहाँ उन शब्दों से किसी भौगोलिक सीमा का तो आभास नहीं होता है परन्तु किसी खास क्षेत्र विशेष की ओर अवश्य संकेत करते हैं। ब्रज का शाब्दिक अर्थ है- ‘‘गौशाला, गोष्ठ-गवामय, ‘ब्रज’ वृधि कृष्णव राधौ आद्रिव’’1, ‘‘ब्रज गच्छ गोष्ठम’’2, यत्र गावो भूरि श्रृंगा आयासः’’3 और उन सबसे ब्रज के सन्दर्भ में संस्कृत उक्ति बनी- ’’ब्रजान्ति गावों यस्मिन्निति ब्रज।’’ अर्थात जहाँ गायें विचरण करती हैं या चरती हैं, वह ब्रज है। वस्तुतः ब्रज भगवान् कृष्ण की लीला भूमि का परिचायक है। ब्रज का कृष्ण गोप-गोपी से घनिष्ठ सम्बन्ध है। यही कारण है कि वेद ब्रज को ‘गोलोक’, गोलोकाख्यधाम् गोकुल आदि नामों से सम्बोधित करते हैं।
श्री कृष्ण की लीला-भूमि इस ब्रज का विस्तार कितना है? यह निश्चय करना बड़ा ही मुश्किल है। इसका कारण यह है कि इस सन्दर्भ में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। डॉ. सत्येन्द्र के अनुसार- ‘‘ब्रज की ऐतिहासिक और भौगोलिक सीमाएँ आज भी अनिश्चित एवं विवादास्पद है, किन्तु ब्रज की छाप समस्त भारत पर पड़ी है, इसमें कोई सन्देह नहीं कर सकता।’’4 ब्रज नामकरण से पूर्व इसके कई नाम है, यथा-मध्यदेश, ब्रह्मर्षि- ब्रह्मवर्त, शूरसेन, मथुरा-मण्डल, ब्रज या ब्रज मण्डल आदि। अधिकांश विद्वान ब्रज के केन्द्र में मथुरा को स्वीकारते हैं- ‘‘भारत के उस प्रदेश का नाम ब्रज है जो मथुरा को केन्द्र मानकर चैरासी कोस के बीच स्थित है।’’5 भगवान कृष्ण की ब्रज-संस्कृति से ओत-प्रोत ‘ब्रज-चैरासी’ ही ब्रज क्षेत्र के अन्तर्गत लोकमान्य है और रहेगा।
लोक-कवि अपनी भावाभिव्यक्ति हेतु अनेकानेक तरीकों-धुन – लय- तान आदि का प्रयोग करता है। जिसके लिए वह विभिन्न शैलियों का इस्तेमाल करता है। ये अभिव्यक्तियाँ संक्षिप्त एवं विस्तृत हुआ करती हैं। इनके अतिरिक्त ये अभिव्यक्तियाँ संक्षिप्त एवं विस्तृत हुआ करती हैं। इनके अतिरिक्त ये अभिव्यक्तियाँ गद्य-पद्य एवं मिश्रित तीनों माध्यमों से हुआ करती हैं। इन वैभिन्नयताओं के कारण लोक-काव्य को विभिन्न वर्गों में विभक्त करने की सम्भावनाएँ बनती है जिनके आधार पर लोक-साहित्य के मर्मज्ञ विद्ववानों ने उसे लोक-गीत, लोक-गाथा, लोक-कथा, लोक-नाट्य, मुहावरों, लोकोक्तियों और अन्य प्रकीर्ण विभागों में विभक्त किया है। जिनमें लोक-गीत अंग्रेजी के ‘फोक सांग’ का पर्याय है। यह लोक-साहित्य की सशक्त एवं प्रधान विधा है। लोक-गीत सरल, मधुर एवं गेय हुआ करते हैं जिनमें लय-तान एवं संगीतात्मकता का सरल एवं स्वाभाविक प्रवाह हुआ करता है। लोकगीत सामूहिक जन-चेतना के गर्भ से उद्भूत होते हैं। ये लोक मानस की वे सहज् सरल एवं स्वाभाविक भावाभिव्यक्तियाँ हैं, जिनमें जन-मानस के नैसर्गिक, निश्चल एवं अकृत्रिम जीवन का प्रतिबिम्ब दृष्टिगोचर होता है। इनमें लोक-मानस की कामनाएँ, भावनाएँ, उल्लास और विषाद सब कुछ समाहित है और बगैर जटिलता, गोपनीयता, दुरूहता, अश्लीलता के। भोले-भाले मन की भोली-भाली अभिव्यक्तियाँ लोक-जीवन के सत्य को अनुस्यूत किये हुए हैं, जहाँ ताल-तलैया, पीपर-पनघट, बासंती धानी चुनरी ओढ़े धरा, आम-अमराइयाँ, पर्वत-पठार, नदी-पोखर, कछार, झार-निर्झर, कुंज-निकुंज, कूप-बाबड़ी, अरण्य-प्रान्त, रेगिस्तान, मेघ-मालाएँ, बरसते बादल, होरी, रसिया, फाग, आल्हा, सोहर-विवाह, किंबहुना सम्पूर्ण लोक-जीवन ही समाहित है। यही कारण है कि लोकगीतों के उद्गम स्थल के अन्वेषक डॉ. देवेन्द्र सत्यार्थी लिखते हैं-’’ कहाँ से आते हैं गीत? स्मरण-विस्मरण की आँख मिचैली से। कुछ अठ्ठाहास से। कुछ उदास हृदय से। कहाँ से आते हैं इतने गीत? जीवन के खेत से उगते हैं ये गीत।’’6 लोकगीत जनमानस में अत्यंत प्राचीनकाल से परम्पराबद्ध चले आ रहे हैं। इनका गीतकार अनाम हुआ करता है। इसकी परम्परा मौखिक एवं श्रुत हुआ करती है। युग परिवर्तन के साथ-साथ इनमें भी संशोधन एवं परिवर्तन हुआ करते हैं। डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल का मत है-’’ लोकगीत कभी न छीजने वाले रस के सोते हैं। वे कण्ठ से गाने के लिए और हृदय से आनन्द लेने के लिए हैं।’’7 संगीतात्मकता, सरलता, प्रवाहमयता, सरसता, प्रभावकता, स्वाभाविकता, आकृत्रिमता, परम्परानुगतता, लघुता, लोक-भाषा, अनाम रचनाकार, श्रुति परम्परा आदि लोकगीतों की विशेषताएँ हैं।
ब्रज के लोक-गीतों में वहाँ का सम्पूर्ण जीवन प्रतिबिम्बित होता है। ब्रज क्षेत्र के सुख-दुख, आमोद-प्रमोद, आनन्द उत्साह आदि की अभिव्यक्ति इन लोकगीतों के माध्यम से होती है। जनमानस के सर्वाधिक नैकट्य के कारण लोक-जीवन की जैसी सफल अभिव्यक्ति इन गीतों के माध्यम से होती है वैसी नागरिक गीतों के द्वारा सम्भव नहीं है। सम्पूर्ण ब्रज-प्रदेश भक्ति-भावना से ओत-प्रोत तीज त्यौहारों का प्रदेश है। उत्तर आधुनिक युग में भी ब्रज प्रदेश में पारिवारिक आत्मीयता काफी हद तक विद्यमान है, जिसका दिग्दर्शन सामाजिक जीवन में दृष्टिगोचर होता है। यद्यपि सामाजिक परिवर्तन से कोई भी प्रदेश अछूता नहीं रहता, ब्रज भी इससे विलग नहीं है तथापि ब्रज के लोक के कलाकार इन परिवर्तनों के मध्य भी अपनी वाणी से लोक-मानस का श्रृंगार करते रहे हैं। ब्रज के लोक-गीत विविध प्रकार के होते हैं। यथा-संस्कार गीत, ऋतु गीत, धार्मिक गीत, जाति-गीत, श्रम-गीत, कथागीत आदि।
शास्त्रों में सोलह संस्कारों का वर्णन है। शास्त्रों से वंचित लोक-मानस भी जाने-अनजाने इन संस्कारों में जीता है। गर्भाधान, पुंसवन, जन्म जनेऊ, विवाह और मृत्यु से कौन वंचित है? प्रत्येक संस्कार हेतु जन-मानस ने विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान और उनके लिए लोकगीत बनाये हैं जो विभिन्न अवसरों पर बड़ेहर्षोल्लास सहित गाये जाते हैं। ये लोकगीत संस्कारों के प्रधान अंग हैं। ब्रज भी इनमें असम्पृक्त नहीं है। यहाँ जन्म से मृत्यु पर्यन्त गीत ही गीत है जिनमें नारी हृदय की वेदना के अनेक दृश्य बिखरे पड़े हैं।
आज हम पुरूष-प्रधान समाज में रह रहे हैं, जहाँ नारी को हीन और पराधीन माना जाता है। यह सब कैसे हुआ इस प्रक्रिया से सभी परिचित है। आर्य संस्कृति में माँ को सर्वोच्च पद दिया गया है। ‘मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, परन्तु इतना विशद पद देकर भी पुरूष ने नारी को अपने अधीन बनाये रखने की व्यवस्था की है। ‘‘जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता वास करते हैं, यह घोषण करके भी उसे बचपन में पिता के अधीन, यौवन में पति की दासी और बुढ़ापे में सन्तान पर निर्भर माना जाता है। किसी ने कभी यह घोषण नहीं की, कि बचपन में पुत्री के समान पुत्र भी माता-पिता पर निर्भर रहता है, यौवन में वह पति के बिना जी नहीं सकता। बुढ़ापे में तो पति-पत्नी एक दूसरे के सच्चे मित्र होते हैं।’’8
वस्तुतः यह सच है कि उत्तर आधुनिकता के इस युग में भी नारी पर अत्याचार हो रहे हैं। प्राचीनकाल से लेकर आज तक नारी किसी न किसी मोड़ पर अत्याचारों को सहन कर रही हैं। लोकगीत इसके जीवंत प्रमाण है, जिनमें नारी वेदना को सहज, सरल शब्दों में मार्मिक अभिव्यक्ति दी गयी है।
ब्रज में पुत्र जन्म के अवसर पर लम्बा अनुष्ठान होता है। गर्भाधान से जन्म के मध्य के समस्त संस्कार जन्म संस्कार के अन्तर्गत आते हैं। सामाजिक मान्यता है कि निपूते का मुँह देखना पाप है। पुत्री बेशक ‘लक्ष्मी’ होती है परन्तु वह तो पराया धन होती है। इसके विपरीत पुत्र ही पार (भव-सागर से) लगाता है। बन्ध्या की चहुँ ओर दुर्गति होती है। उसके लिए तो ताल, पोखर नदी, आदि भी सूख जाते हैं, उधर पुत्रवती के समस्त दोष, गुण में बदल जाते हैं। निःसंतान स्त्री को निपूती कहकर अपमानित किया जाता है इसके विपरीत पुरूष के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जाता। ब्रज के एक लोक-गीत में बाँझिनि, सास-ननद के तानों से खिन्न होकर गंगा में डूबने के लिए चल पड़ती है तो गंगा उसे पुत्रवती होने का वरदान देती है-
राजे गंगा किनारे एक तिरिया, सु ठाढ़ी अरज करै।
गंगा एक लहर हमें देउ तौ जामै डूँबि जैऐ, अरे जामै डूबि जैऐं।
कै दुखरी तोयें सासुरी-ससुर को, कै पिया परदेस।
कै दुःखरी तोयें मात-पिता कै, कै तेरे माँ-जाए वीर।
काए दुःख डूबि जैऐ।
ना दुःखरी मोयें सासुरी ससुर कौ, नाऐं मेरे पिया परदेस
………………………………………..
सासु, बहू कहि नां बोलै, ननद भाभी ना कहै
नाहिं राजे, बे हरि बाँझ कहि टेरें तौ छतियाँ जू फटि गई।
जाई दुःख डूबिहों सों जाई दुःख डूबि हौं।9
गंगा उसे वरदान देती है। वह घर लौटकर बढ़ई से काठ का पुत्र बनवाती है और सूर्यदेव से करूण विनती करती है। देव कठपुतले में प्राण डाल देते हैं। फिर क्या? बधाई बजती हैं और मंगल गान होते हैं और उस नारी का मान बढ़ जाता है-’’ धनि धनि गंगे तोई धनि ऐं, तैने बढ़ाई मेरी मान।’’
बाँझ होने के कारण स्त्री को बाघिन तक मारकर खाना पाप समझती है। उसे डर है कि यदि वह बाँझ को खा लेगी तो वह भी बाँझ हो जायेगी। इस अवधी भाषा के लोकगीत में भी निःसंतान स्त्री की इसी मार्मिक वेदना को अभिव्यक्ति मिली है-
घरवाँ से निकरि बाँझिनिया जंगल बिच ठाढ़ी हो,
रामा वन से निकरी बघिनियाँ वो दुख, सुख पूछइ हो।
तिरिया, कौन विपतिया की मारी जंगल बिच ठाढ़ी हो,
सासु मोरी कहेली बाँझिनिया, ननद ब्रजवासिनी हो।
बाघिन जिनकी में बारी बियाही, उइ घर से निकारेनि हों,
बाघिन हमका जो तुम खाइ लेतिउ बिपतिया से छूटित हों,
जइवाँ से तुम आइउ, लउटि उहाँ जाओ तुमहिं नाहीं खइबइ हों,
बाँझिन, तुमका जो हम खाइ लेबइ हमहुँ बाँझिन होबइ हो।10
बाघिन ही नहीं नागिन भी बाँझ स्त्री को डसने के लिए तैयार नहीं होती। बाँझ को हर समय घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। माँ न बनना स्त्री के लिए सब दुखों से बढ़कर है। जब कोई सन्तान न हो, तो इच्छा होती है कि एक कन्या ही जन्म ले ले, किन्तु जब यह भान होता है कि कन्या तो पराया धन है, तब पुत्र जन्म की ही कामना की जाती है। यथा-
मैं तो पहिले जनौंगी धीयरी,
मेरी जो कोख होय कुलच्छिनी।
जाकी गरजति आवैगी बारात री,
पालिकी चढ़ि आवै साजना।
मेरो घरू जो रितो अरू पेटुरी,
मेरी धीयरी जमइया लै गयौ।
मैं तो बहुरि जानोंगी पूतरी
मेरी जो कोखि होय सुलच्छिनी,
जाकी गरजति जाइगी बराइत री।
पालिकी चढ़ि आवै कुलवधू
मेरो घरू तौ भरौ अरू पेटुरी।
मेरी रूनुक-झुनुक डोलै कुलवधू।’’
ब्रज क्षेत्र में विवाह संस्कार के अवसर पर वर अथवा कन्या की मां अपनी भाई के यहांँ भात न्योतने जाती है। उसके इस निमंत्रण पर भाई विवाह से एक-दिन पूर्व या विवाह वाले दिन अपनी बहन तथा उसके ससुराल पक्षवालों के लिए वस्त्रादि लेकर भात पहनाने जाता है और उचित समय पर भात पहनाता है। भात के लिए बहिन की आँखें अपने पीहर की ओर निहारती रहती हैं। जिस बहिन के भाई नहीं होता है उसके लिए तो यह बहुत ही कारूणिक प्रसंग बन जाता है। ब्रज क्षेत्र में एक ऐसा ही भात का गीत है जिसमें एक बहन के भाई नहीं है लेकिन फिर भी वह अपने पति से आग्रह करती है भात नौतने के लिए जाने को। उसका पति जब कहता है कि तुम्हारे तो भाई नहीं है किसको भात का निमंत्रण दोगी तब वह कहती है कि मेरे पीहर में महुए का पेड़ है जिसको में निमंत्रण दूँगी। देखिए एक बहन की वेदना का गीत-
एसौ री होइ कोई कुमर छत्तिरी, हमैं पीहर पहुँचावे जी,
तुम तौरी गोरी जनम की सोगिनि, तिहारे पीहर कहाएँ जी।
हमरे पीहर एकु महुए कौ बिरवां, बापै भात हम नौतेंजी,
एकु बनु नाखि दूजौ बनु नाखियौं, तीजे बन पीहर पहुँचे जी
रोमत-रोमत महुए ढिंग पहुँची, भइया होइ तौ बोलै जी
कौन बिरन पैरी भातु रे माँगियौ, कौन बिरन की हौ बहिना जी।12
……………………………………………………..
महुए ने उस बहन के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। विवाह की तिथि पूछकर आने का आश्वासन दिया। उसने शर्त रखी कि जब तुम भात पहनो तब महुए के पट्टा (पीढ़ा) पर पैर मत रखना। जब वह भात पहनाने आता है तो पहले वह अपनी सास-ननद आदि परिजनों को भात पहनवाती है। जब उसकी बारी आती है तो वह भूलवश महुए के पट्टा पर पैर रख देती है। फिर क्या होता है उसका भाई गायब हो जाता है। सास-ननद ताने मारती हैं कि भूत कहीं भात पहनाते हैं क्या? इस प्रकार दृश्य बहुत ही कारूणिक बन जाता है। बहन रूदन करने लगती है। उसके मन एक ही मलाल रह जाता है कि जी भरके भाई से मिल न सकी।
भारतीय कन्या पराई धरोहर मानी जाती है। विवाह होते ही उसे अपना चिर-परिचत घर और परिवार को छोड़कर जीवन भर के लिए एक दूसरे अनजान घर में चला जाना पड़ता है। बेटी की विदाई के अवसर पर मर्मभेदी व करूणाविगलित करने वाले लोक-गीतों की ब्रज क्षेत्र में भरमार है। प्रत्येक बेटी के माता-पिता का हृदय इन गीतों को सुनकर द्रवित हो उठता है। कारूणिक मनोदशा का जीवन्त चित्र उपस्थित करता एक ब्रज लोक-गीत देखिए-
‘‘छोटे बीरन ने पकड़ी पलकियां
मेरी बहन कहाँ जाइ हो।
छोड़ो बीरन हमारी पलकियां,
हमकूँ तौ छायौ परदेस जी
तुमकूँ तौ छाई बीरन लाल अँटरिया,
हमकूँ तौ छायौ परदेस जी
मइया के रोवे ते नदिया बहति ऐ,
बाबुल के रोवे ते सागर-ताल जी।’’
सामाजिक कर्तव्यों में बँधे माता-पिता भी, जिन्होंने जन्म दिया, पाला पोसा और प्यार के साथ ‘बिटिया’ कहकर पुकारा, उसे अपने पास रखने में अपने को असमर्थ पाते हैं। कन्या अपनी और अपने मांँ-बाप की इस विवशता को भली-भांति समझती है; किन्तु क्या करें उसका हृदय नहीं मानता। बेटी की विदा के अवसर की वेदना की इस लोकगीत में मार्मिक अभिव्यक्ति देखने को मिलती हैं-
तेरा चर्खा सूना होय बाबुल तेरी धीय बिना,
मेरी बहू कातेंगी हे लाड़ो बेटी जाव घराँ।
………………………..
मेरी गाड़ी अटकी रे, बाबुल तेरी गलियों में
दो ईंटें कढ़वा दूँ हे लाड़ो बेटी जाव घराँ।
तुझे बाबुल कौन कहे, बाबुल तेरी धीय बिना
आँसू तो भर आये नैन कि लाड़ो बेटी जाव घराँ।13
वास्तव में बेटी की विदा की स्थिति बड़ी करूणाजनक हो उठती है महाकवि कालिदास कृत ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ में शकुन्तला की विदा के समय महर्षि कण्व कहते हैं- ‘‘आज शकुन्तला विदा होगी। इसलिए मेरा हृदय दुख से भारी हो रहा है। आँसुओं के बहने को रोकने से मेरा गला भर आया है। मेरी दृष्टि चिन्ता के कारण निश्चेष्ट हो गई है। मुझ जैसे वनवासी को शकुन्तला के प्रति स्नेह होने के कारण इस प्रकार का दुख अनुभव हो रहा है, तो गृहस्थ लोग पहली बार पुत्री के वियोग से कितने अधिक दुखित होते होंगे।’’
स्पष्टतः लोक-गीतों का सम्बन्ध लोक-जीवन से होता है। लोक-गीत लोक जीवन के जीवंत चित्र हुआ करते हैं। लोक-जीवन का रहन-सहन, बोली-भाषा, आचार-व्यवहार, शिष्टाचार, धर्म-कर्म, पशु-पक्षी प्रकृति, हर्ष-उल्लास, सुख-दुख, संस्कृति आदि सभी को समाहित किये रहते हैं ये लोक-गीत। सम्पूर्ण ब्रज-मण्डल में लोकगीतों की भरमार है। यहाँ प्रत्येक अवसर के लिए विभिन्न तरह के गीत प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। विभिन्न संस्कारों के अवसर पर गाये जाने वाले ये गीत नारी वेदना को मार्मिकता के साथ अभिव्यक्त करते हैं। इन संस्कार गीतों का सृजनकर्ता कोई पुरूष न होकर अज्ञात महिला समूह ही रहा होगा, जिसके कारण नारी-वेदना के सहज-चित्रों की भरमार इन संस्कारी लोक-गीतों में पग-पग पर मिलती है।
सन्दर्भ-
1. ऋग्वेद – 1.10.7
2. यजुर्वेद – 1.25
3. शुक्ल यजुर्वेद – 6.3
4. डा0 सत्येन्द्र, ब्रज का लोक साहित्य, पृ0-903
5. पोद्दार अभिनन्दन ग्रन्थ में डा0 दीनदयाल गुप्त
6. धरती गाती है – डा0 देवेन्द्र सत्यार्थी, पृ0 178
7. धीरे बहो गंगा – डा0 वासुदेव शरण अग्रवाल, पृ0 9
8. विष्णु प्रभाकरः संस्कृति क्या है, पृ0 51
9. उदघृतः डा0 सत्येन्द्र-पोद्दार अभिनन्दन ग्रन्थ-स0 वासुदेवशरण अग्रवालपृ0 116
10. डा0 गोपाल बाबू शर्माः लोक जीवन में नारी-विमर्श, पृ0 52
11. वही पृ0 57
12. निज संग्रह- अप्रकाशित
13. डा0 गोपाल बाबू शर्माः लोक जीवन में नारी-विमर्श पृ0 35
ग्राम$पो0 – उसरम
तहसील- खैर
जिला-अलीगढ़ (उ0प्र0)
मो0- 8126967718
हिंदी साहित्य और सिनेमा-अजय कुमार चौधरी

हिंदी साहित्य और सिनेमा
अजय कुमार चौधरी
पहले मैं आपको दो बातें स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि सिनेमा और साहित्य का धरातल अलग-अलग है | सिनेमा शुध्द मनोरंजन प्रधान होता है जिसमें दर्शकों के मांग का ख्याल रखा जाता है, दर्शक को जो चाहिए फिल्म इंडस्ट्री वहीं परोसता है जिसका सीधा संबंध व्यवसाय से होता है,जबकि साहित्य संवेदना और अनुभूति प्रधान होता है, साहित्य दर्शकों के मांग पर नहीं बल्कि साहित्यकार अपनी निजी संवेदना और अनुभूति को केंद्र में रखकर समाज के यथार्थ रूप को सामने लाने का प्रयास करता है | दो धरातल पर होने के बावजूद साहित्य और सिनेमा कई विंदुओं पर मिल भी जाता है | सिनेमा कल्पना प्रधान है ,भावों की अभिव्यक्ति के लिए ऐसे दृश्यों का निर्माण कर दिया जाता है जो शब्दों के द्वारा संभव नहीं है | वहीं साहित्य शब्दों के माध्यम से जिस वातावरण का निर्माण करता है उसे दृश्यरुप में लाना फ़िल्मकारों के लिए कभी –कभी चुनौती भी बन जाती है | साहित्यकार शब्दों के जिस वातावरण का निर्माण करता है उसे पाठक अपनी-अपनी कल्पना द्वारा अलग-अलग भाव और दृश्य मन में बनाते हैं |जबकि फ़िल्मकर द्वारा तैयार किया गया वातावरण दर्शकों के लिए एक जैसा होता है | फ़िल्मकार अपने अनुभव के द्वारा साहित्य से ली गई सामाग्री का ज्यों का त्यों रूपान्तरण नहीं कर पता है या करना नहीं चाहता है क्योंकि वह साहित्य को फिल्म के रूप से परोसना चाहता और साहित्य फिल्म के साँचे में पूर्णरूप से उतार नहीं पता और यहीं से साहित्य और सिनेमा का अंतर्संबंध में विलगाव उत्पन्न हो जाता है |फिल्म समीक्षक विमलेंदु विमलेंदु जी ने साहित्य और सिनेमा के अंतर्संबंध को स्पष्ट करते हुए कहते है कि1 “साहित्य और सिनेमा का सम्बंध भी दो पड़ोसियों की तरह रहा. दोनो एक दूसरे के काम तो आते रहे लेकिन यह कभी सुनिश्चित नही हो पाया कि इनमे प्रेम है या नही.|”
सिनेमा ने अपने आरंभिक चरण में साहित्य से ही प्राण-तत्व लिया. यह उसके भविष्य के लिए ज़रूरी भी था. दरअसल सिनेमा और साहित्य की उम्र में जितना अधिक अंतर है, उतना ही अंतर उनकी समझ और सामर्थ्य में भी है. विश्व सिनेमा अभी सिर्फ 117 साल का हुआ है. साहित्य की उम्र से इसकी तुलना की जाय तो यह अभी शिशु ही है साहित्य के सामने.” उदाहरण के लिए अभी हाल ही में एक मूवी आई थी ‘बाहुबली’ | इस फिल्म में जिस तकनीक के प्रयोग से जिस वातावरण का निर्माण किया गया है उसे हूबहू साहित्य में उतार पाना बड़े से बड़े लेखकों के चुनौती है |ऐसे जगह पर आकार ही साहित्य अपनी सीमा का जान पाती है |
प्रेमचन्द के ‘ गोदान ‘ पर बनी फिल्म को छोड़ दें तो रेणु की कहानी पर बनी ‘तीसरी कसम’ ने दुनिया को कुछ अमर पात्र दिये. महाश्वेतादेवी की कहानी पर बनी ‘रुदाली’ के दृश्य अविस्मरणीय हैं. विमल मित्र के उपन्यास पर बनी ‘साहब,बीवी और गुलाम’, टैगोर की कहानी-‘नष्टनीड़’ पर सत्यजीत राय की फिल्म ‘चारुलता’, सृजन के नये आयामों की तलाश करती हैं.

सिनेमा को मण्टो का साथ लेना पड़ा. मण्टो की लेखनी से ‘किसान कन्या’, ‘मिर्ज़ा गालिब’, ‘बदनाम’ जैसी फि़ल्में निकलीं. प्रेमचंद और अश्क भी इस दौर में सिनेमा से जुड़े और मोहभंग के बाद वापस साहित्य की दुनिया में लौट गए. बाद में ख्वाजा अहमद अब्बास, पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र, मनोहरश्याम जोशी, अमृतलाल नागर, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, रामवृक्ष बेनीपुरी, भगवतीचरण वर्मा, राही मासूम रज़ा, सुरेन्द्र वर्मा, नीरज, नरेन्द्र शर्मा, कवि प्रदीप, हरिवंशराय बच्चन, कैफी आज़मी, शैलेन्द्र, मज़रूह सुल्तानपुरी, शकील बदायूँनी इत्यादि ने भी समय-समय पर हिन्दी सिनेमा में किसी न किसी रूप में अपनी आमद दर्ज कराई.
बांग्ला लेखक शरतचंद्र के उपन्यास ‘देवदास’ पर हिन्दी में चार फिल्में बनीं और कमोबेश सभी सफल रहीं. प्रेमचन्द की कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर सत्यजीत रॉय ने इसी नाम से फिल्म बनाई, जो वैश्विक स्तर पर सराही गई. भगवतीचरण वर्मा के अमर उपन्यास ‘चित्रलेखा’ पर भी फिल्में बनीं, जिनमें एक सफल रही. बाद में साहित्यिक कृतियों पर आधारित फिल्मों को आर्ट फिल्मों के खांचे में रखकर इनका व्यावसायिक और हिट फिल्मों से अलगाव कायम करने का प्रयास किया गया, जिससे ऐसी फिल्मों का आर्थिक पहलू प्रश्नचिह्नांकित हो गया और फिल्मकारों ने साहित्यिक कृतियों पर फिल्म बनाने से परहेज करना शुरू कर दिया.
. हालांकि अमिताभीय युग में भी सत्यजीत रॉय, मृणाल सेन, कमाल अमरोही, ऋषिकेश मुखर्जी, बासु भट्टाचार्य, श्याम बेनेगल, एम. एस. सत्थू, एन. चंद्रा, मुजफ्फर अली, गोविन्द निहलानी, आदि ने अपने-अपने स्तर से साहित्य, सिनेमा और समाज का त्रयी में सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया लेकिन ये सभी चाहे-अनचाहे ‘आर्ट सिनेमा’ में बँधने को बाध्य हुए.
एक कारण और भी था कि इस दौरान साहित्यिक कृतियों पर बनने वाली फिल्में एक-एक कर असफल होने लगी थीं. प्रेमचंद की रचनाओं पर बनीं ‘गोदान’, ‘सद्गति’, ‘दो बैलों की कथा’, फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास पर बनी ‘तीसरी कसम’, मन्नू भंडारी की रचनाओं पर आधारित ‘यही सच है’, ‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’, शैवाल की कहानी पर आई फिल्म ‘दामुल’, धर्मवीर भारती के उपन्यास पर आधारित ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’, चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की कहानी पर आधारित ‘उसने कहा था’, संस्कृत की रचना ‘मृच्छकटिकम्’ पर आधारित ‘उत्सव’, राजेंदर सिंह बेदी के उपन्यास पर बनी ‘एक चादर मैली सी’ आदि का असफल होना सिनेमा और साहित्य से दूरी की एक बड़ी वजह बन गया.
साहित्य और सिनेमा के अन्तर्सम्बन्धों पर गुजराती फिल्म समीक्षक बकुल टेलर ने बेहद सारगर्भित टिप्पणी की है. उनका कहना है, “साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्म अपने आप अच्छी हो, ऐसा नहीं होता. वास्तविकता यह है कि साहित्यिक कृति का सौन्दर्यशास्त्र और सिनेमा का सौन्दर्यशास्त्र अलग-अलग हैं और सिनेमा सर्जक भी साहित्यकृति के पाठक रूप में साहित्यिक आस्वाद तत्वों पर मुग्ध होकर उनका सिनेममेटिक रूपांतरण किए बगैर आगे बढ़ जाते हैं.“
बंकिमचंद्र की कृति पर बनी ‘आनंदमठ’, विमल मित्र कृत ‘साहब बीबी और गुलाम’, आर. के नारायण के अंग्रेज़ी उपन्यास पर बनी ‘गाइड’, उडि़या लेखक फकीरमोहन सेनापति की रचना पर बनी ‘दो बीघा ज़मीन’ और मिर्ज़ा हादी की उर्दू कृति पर बनी ‘उमराव जान’ फिल्मों की सफलता का सबसे बड़ा कारण परिवेश की समनुरूपता रहा है
चलचित्र और साहित्य के अंतर्सम्बन्ध पर अनेक विचारकों ने अपने मत दिए हैं:-
उमेश राठौर लिखते हैं, ‘फिल्म और साहित्य‘ के परस्पर लगाव का प्रश्न सदैव से ही जीवन्त रहा है। इस सम्बन्ध को विकसित करने में गीत, कविता, नाटक और उपन्यास की चर्चा भी अक्सर होती रही है, लेकिन फिल्में केवल उपन्यासों पर ही नहीं बनी-कथाओं पर भी निर्मित की गई।7
सम्पादक ‘मार्यर शामसी‘ ने चलचित्रों को ‘यांत्रिकी, कला और तकनीकी‘ का मेल मानते हुए लिखा है,“Cinema is a highly mechanical medium. It uses many mechanical devices like cameras, microphones, dubbing machines, editing machines etc. Film is a product of intraction between machines, artistic and technical people”. 8
वे आगे लिखे हैं, “In the beginning, it was considered as a medium of cheep entertainment, but now it was come to be considered as art form. Interactual and serious thinkers have associated themselves with cinema”. 9
‘जयदेव तनेजा‘ के शब्दों में, ‘‘कला प्रयास है, प्रयोग है, सृष्टि है, जीवन है-वस्तु नहीं है। रंग कला भी इसी अर्थ में एक उत्सव है, एक अनुष्ठान है- जीवनमय है, जीवनदायी है।‘‘10
वे पुनः लिखते हैं, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं कि अनेक कथा-कृतियाँ रंगमंच और सिनेमा के माध्यमों से सफलतापूर्वक रूपांतरित हुई हैं।‘‘11
रंगमंच और सिनेमा के प्रबुद्ध अभिनेता बलराज साहनी का कथन है, ‘‘फिल्म-कला को ‘आॅपरेशन टेबल‘ पर रखिए और उसकी चीरफाड़ कीजिए तो पता चलेगा कि फिल्म-कला दरअसल एक कला का नाम नहीं, बल्कि अनगिनत कलाओं के समूह का नाम है।‘‘12
सम्पादक डाoनाल्ड एच0 जान्सटान के अनुसार, “Cinematic adaptation of books, players, poems, diaries and comics demonstrate films profuse influence on print media”. 13
पुनश्च, “In addition to book adaptations, film is, able to extend the run of a play indefinitely through its climatic adaptation of it.” 14
पुनश्च, “Hence, film has a profound influence on print media, giving them a visual dimension that extends the original text’s popularity and scope”. 15
‘सुधीर ‘सुमन‘‘ के शब्दों में, ‘‘सिनेमा मनुष्य के कला के साथ अंतर्सम्बन्ध का दृश्यरूप है। मनुष्य के जीवन में जो सुंदर है उसके चुनाव के विवेक का नाम सिनेमा है।‘‘16
इस प्रकार अनेक विद्वानों ने चलचित्र एवं साहित्य के मध्य गहन अंतर्सम्बन्ध स्वीकार किए हैं। एक सत्य यह भी है कि चलचित्र में विविध कलाओं का समाहार सरलता से सम्भव है। यदि हम साहित्य के चलचित्र रूपांतरण का अध्ययन करे तो भी चलचित्र की उपादेयता स्वयं सिद्ध होती है।
एल. जी.बी.टी. पर आधारित मराठी नाटक-डॉ. सतीश पावड़े
एल. जी.बी.टी. पर आधारित मराठी नाटक
डॉ. सतीश पावड़े
एल.जी.बी.टी का अर्थ ‘लेसबियन’ (स्त्री-स्त्री संबंध)’ गे‘(पुरूष-पुरूष संबंध), ‘बायसेक्शुएल ‘(स्त्री-स्त्री, स्त्री-पुरूष और पुरूष-पुरूष संबंध) ‘ट्रान्ससेक्शुएल’(अर्थात स्त्री से पुरूष में अथवा पुरूष का स्त्री में लिंग परिवर्तन) आम तौर व्यापक स्तर पर इस प्रकार के व्यक्ति इन चार वर्गो में में विभाजीत किए जाते है।
इन चार वर्गो पर सर्वाधिक अर्थात 30 के करीब नाटक आज मराठी में लिखे गये है। लिंगभाव से संबंधित चरित्र ‘बृहन्नडा’ कृष्णाजी प्रभाकर खाडिलकर ‘संगीत सौभद्र’ मे पहली बार चित्रित किया गया. आधुनिक मराठी रंगमंच मे 1980 के दशक में जानेमाने नाटककार तथा भारतीय रंगमंच के श्रेष्ठतम हस्ताक्षर विजय तेंदुलकर ने अपने ‘मित्राची गोष्ठ’ नाटक द्वारा समलैंगिकता का प्रश्न हाशिये पर लाया । यह नाटक स्त्री समलैंगिकता (लेसबियन)पर आधारित था। उनके पश्चात सतीश आळेकर ने अपने ‘बेगम वर्बे’ नाटक में ‘ट्रान्सजेंडर ’ (एंड्रोजिनी ) के विषय को रखा । हालांकी इस नाटक में ‘स्त्री पार्ट’ करनेवाला पुरूष कलाकार कैसे धीरे धीरे स्त्रीत्व धारण करता है यह बताया है।

इन दो प्रमुख नाटक के अलावा ‘गे’ रिलेशनशीप दुष्यंतप्रिय (सारंग भाकरे), ‘एक-माधवबाग’ (चेतनदातार), ‘पुरूषोत्तम’ तथा ‘पार्टनर’ (बिंदुमाधव खिरे), ‘ऑफबीट’ (जमीर कांबळे), आदी कुछ प्रमुख नाटकों का मंचन राष्ट्रीय स्तर पर किये जा रहे है। ‘ट्रान्सजेंडर’ के रूप में ‘पुन्हा-पुन्हा वस्त्रहरण’ (नाथा चितळे) ‘तो ——ती——ते——‘(सुषमा देशपांडे, जमीर कांबळे), हिजडा (सागर लोधी ),जैसे नाटकों ने हिजडो के प्रश्न पर नाटक लिखे है। इनके अलावा एल.जी.बी.टी. से संबंधित विषयों को लेकर ‘मी पण माझे’ (दैवेंद्र लुटे), ‘छोटयाशा सुटीत’ तथा ‘पुर्णविराम’ ( सचीन कुंडलकर) ‘सहा बोटांचा तळ हात’ (अनिल देशमुख), ‘षस्ठय’ (संजय पवार), ‘बुद्धिबळ आणि झब्बू’ (च.प्र.देशपांडे), ‘अलिबाबा चालिस चोर’ जैसे नाटक अत्यंत गंभीरता से लिखे गये है।
किंतु इसके अलावा पुरूष वेश्याओं के प्रश्नपर लिखा गया ‘ एक चावट संध्याकाळ’, लेस्बियन संबधोपर लिखा गया ‘नवरा हवाय कशाला’ जसे पुरूष लैगिंकता पर लिखा गया ‘ शिश्नाच्या गोष्ठी‘ जैसे स्तरहीन नाटक भी लिखे और खेले गये है । जिन नाटकों का उल्लेख यहा किया गया है यह सभी नाटक केवल एल .जी.बी.टी के विषय पर लिखे गये है ।
कुछ और ऐसे नाटकों का यहा उल्लेख करना मुझे आवश्यक प्रतीत होता है, जो अपनी कथावस्तु और कलात्मक अभिव्यक्ति के स्तर पर विशेष उल्लेखनीय है। यह सभी नाटक सिधे तौर पर एल.जी.बी.टी. के प्रतिनिधित्व नही करते. बर्टोल्ट ब्रेख्त्त कि ‘माता धिराई’ लिंग से तो स्त्री है पर व्यक्तित्व, कर्तृत्व से पुरूष है। और गौरतलब है की यी भूमिका भी भारतीय रंगमंच के जानेमाने एक्टर मनमोहन सिंग ने निभाई थी। दुसरा नाटक है ‘अर्थातरंण्यास’ (रविंद्र इंगळे) जो प्रसिद्ध दलित लेखक बाबुराव बागुल के ‘सुड’नामक लघु उपन्यास पर लिखा गया है । जिसकी नायिका स्त्री लैंगिकता को दफन कर उपरी तौर पुरूष बन कर जीती है। ‘बिन बायांचा तमाशा’ जैसा लावणी का सुपरहीट कार्यक्रम सारे पुरूष कलाकार बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत करते है ।
भारतीय नाटककार नाग बोडस का मराठी में अनुदित नाटक ‘नर-नारी’में नारी भूमिका निभानेवाले नट के नपुंसक होने की मानसिक प्रक्रिया को यह नाटक ‘हशिए’पर लाता है। इवा इन्सलर का मराठी में वंदना खरे द्वारा अनुदित नाटक ‘योनीच्या मनीच्या गुजगोष्ठी’, एल.जी.बी.टी. पर आधारित नाटकों का परिप्रेक्ष्यअधिक चिंतनशील बनाता है । इसके अलावा लिंगभाव के परिप्रेक्ष्य में ‘अवध्य’ (चि.त्र्यं.खानोलकर) ‘घासिराम कोतवाल’, ‘सखाराम बाईंडर’ (विजय तेंडूलकर) ‘वासनाकांड’, ‘गार्बो’, ‘सोनाटा’ (महेश एलकुंचवार) ‘रगतपिति’ (श्याम पेठकर) ‘हयवदन’(गिरीश कर्नाड) ‘चार चौघी’ (प्रशांक दळवी) ‘मी रेवती देशपांडे ’, एग्रेसिव’, ‘आली पाळी गुप चिळी’ ‘आईचे पत्र’, जैसे नाटकों की भी चर्चा की जा सकती है।
‘लिंगभाव’ की जो परिकल्पनाएं, परिभाषाएं तथा सिद्धांत नारीवादी चिंतको द्वारा प्रस्तुत किये गये है, वह क्या’ एल.जी.बी.टी. इन चार वर्गोंपर लागू होते है ? नारीवाद के परिप्रेक्ष्य में कुछ हद तक ‘लेसबियन’वर्ग समाविष्ट करने का प्रयास हुआ है। उदाहरण के तौर पर 1995 में बिजिंग में जो चौथी अंतरराष्ट्रीय महिला परिषद आयोजित की गयी थी, जिसमें एक सत्र लेसबियन स्त्रियों हेतु आयोजित किया गया था। इसके पूर्वभारत में भी ‘तिरूपति’ में 1994 में संपन्न भारतीय स्त्री आंदोजन के अधिवेशन में कैनेंडियन लेसबियन कार्यकर्ता एलिसन ब्रेवर के मुख्य उपस्थिति में ‘लेसबियन’ से संबंधित विषय पर विशेष संगोष्ठी का आयोजन किया गया था। तात्पर्य नारिवादी परिप्रेक्ष्य में एल. अर्थात लेसबियनीटी का अभ्यास, आलोचना, समीक्षा, लिंगभाव (जेंडर) आधार पर संभव है। किंतु ‘गे’ ‘बायसेक्सुएल’ और ट्रान्सजेंडर्स’ से संबंधित प्रश्नों को क्या हम इस ‘लिंगभाव’ अथवा ‘जेंडर’ की दृष्टिकोन से विश्लेषित कर सकते है? ‘गे’ अंत: पुरूष है । ट्रान्सजेंडर भी अपूर्ण स्त्री अथवा पूर्णत: पुरूष है। तो क्या हम इन पूर्व या वर्तमान पुरुषों को जो नारिवादी ‘लिंगभाव’की परिकल्पना एवं परिभाषा में विश्लेषित कर सकते है। क्योंकि यह सारी अवस्थाएं समाल संस्कृति निर्मित नही बल्की जैविक (बायोलॉजीकल)है। और हमारा नारीवादी सिद्धांत ‘लिंगभाव’को जैविक जैविक नही अपितु पुरूषप्रधानता से निर्मित सामाजिक सांस्कृतिक व्यवस्था उपादानों,साधनों-संसाधना से मंडित मानता है।
‘मित्राची गोष्ठ’ नाटक में पहली बार ‘लेसबियन प्रोटोगॉनिस्ट’ चरित्र की रचना तेंडूलकरने की है। यह नाटक उस समय का समय से आगे कहॉ जा सकता है एैसा नाटक था । इस नाटक में तेंडूलकरने नाट्यात्मकता, विषय का अलगपण, तथाकथित विद्रोह आदी के चलते लेसबियनीटी से संबंधित अपेक्षित कर्न्सर्न् को गवा दिया। इसलिए उस नाटक अंत सकारात्मक नही बल्की नकारात्मक पद्धती से किया गया। इसके बावजुद 1980 के दशक के सामाजिक व्यवस्था और अवस्था का दर्शन यह नाटक करवाता है। जिस समय लेसबियानीटी अथवा होमोसेक्सुएलिटी एक विकृति अथवा सामाजिक अपराधसे जादा कुछ नही था। ‘सुमित्रा-नमा’ की यह प्रेमकहाणी को एक अभिशाप के रूप में इस नाटक में प्रस्तुत किया गया ।
समाज में लिंग पर आधारित पहचान के कारण समलैंगीक समुह के अपनी पहचान से वंचित होना पडता है। लिंगपर आधारित पहचान की मांग जमीर कांबळे का नाटक ‘ऑफ बीट’ करता है। सामान्य वर्ग के कलाकार नही मिलने के कारण अतत: यह नाटक समलैंगिक समुह द्वारा खेला गया। माध्यमों द्वारा इस नाटक की काफी सराहना की गयी। नारीवाद में ‘एड्रोजिनी’ संज्ञा का उल्लेख मिलता है। इस संज्ञा के परिप्रक्ष्य में सतीश आळेकर का नाटक ‘बेगम बर्वे ‘ सटीक बैठता है। इस संज्ञा के अनुसार बर्बे नामक चरीत्रमें स्त्री-पुरूष दोनों के गुणविशेष पाये जाते है। इस तरह के चरित्र बायोसेक्शुएल वर्ग में पाए जाते है। आळेकर ने नाट्यात्मक और कलात्मकता के साथ अपने कर्न्सर्न को प्रभावी रूप से अभिव्यक्त किया है।हालही में ‘मी रेवती देशपांडे ‘ नामक प्रोफेशनल नाटक आय है , जिसमे एनड्रोजिनी अथवा बायो सेक्सूअल का तत्व उपरी तौर पर दर्शया गया है , पर यह मूल प्रश्न को स्पर्श तक नाही करता. केवल मनोरंजन के नाम पर एक स्तर्हीन और भोंडापण इस नाटक मे दिखाई देता है ,कारण है लेखक का इस प्रश्न के प्रति कन्सर्न नाही होना ।
‘तो-ती-ते’ तथा ‘पुन्हा पुन्हा वस्त्रहरण’ यह नाटक हिजडों (ट्रान्सजेंडर्स) की सत्यकथा एवं घटनाओं पर आधारित नाटक है । इस में हिजडों के शोषण तथा प्रताडनाओं को अभिव्यक्त किया गया है। दो जेंडर्सके बिच पिसता थर्डजेंडर ‘तृतीयपंथ’ (ट्रान्स जेंडर्स ,नो जेंडर ,अथवा ब्लॅक या ब्लॅक जेंडर.फोर्थ जेन्डर) पर आधारीत यह नाटक बहुतही मर्मस्पशी है। सम लैंगिकता के आंदोलन से जुडे बिंदू माधव खिरे ने पुरूषोत्तम और पार्टनर जैसे नाटक लिखे । यह नाटक निश्चित रुप से कन्सर्न के साथ लिखे गये है। पुरुषोत्तम नाटक मे उन्होने समलैंगिकता कि वकालत ही नही कि बल्की सह जीवन ,विवाह हेतू कानून और समाज के मान्यता का भी आग्रह किया है। ‘ऑफबिट’के लेखक जमीर कांबळे भी अपने आपको जाहिर रुप से इसी वर्ग से मानते है और गौरव के साथ उसके कर्न्सन की घोषणा भी करते है। चर्चित सभी नाटकों में ‘दुष्यंतप्रिय’ यह नाटक नाट्यात्मकता, कलात्म्कता, प्रतिबद्धता और कर्न्सन आदी सभी दृष्टिकोन से एक श्रेष्ठ नाटक माना जा सकता है। यह नाटक ‘ सारंग भाकरे ने लिखा और निर्देशित भी किया है।
मुलत: यह नाटक गे संबंधों के श्रेणी में आता है। इसे ‘लवस्टोरी ऑफ द मॅन’ भी कहा जाता है। दुष्यंत – शंकुतला प्रसिद्ध मिथक अथवा मिथककथा पर इस नाटक की रचना की गयी है। नाटक में भूमिका करनेवाले दो पुरुषों की यह कहाणी है। जिसमें से एक पुरुष प्रॉक्झी के रुप में शंकुतला का रोल कर रहा होता है। प्रेम-प्रणय के दृश्यों को अभिनित करते वे दोनों प्रगाढ प्रेमसूत्र में बंध जाते है। यह नाटक यही पर खत्म नही होता बल्की दृष्यंत शंकुतला की ‘लिजंडरी’ प्रेमकहाणी का परिप्रेक्ष्य समलैंगिकसंबंधों के परिप्रेक्ष्यमें उसके निर्वचन(इंटरप्रिटेशन) के साथ रखा गया है।
अभिज्ञान शांकुतल नाटक के परिप्रेक्ष्य में दृष्यंत- शंकुतला के मिथकीय प्रेमप्रसंग का अन्वयार्थ सर्जनशीलता के साथ नाटककार ने स्पष्ट किया है। वहां स्त्री–पुरूष संबंध है तो यहां पुरूष-पुरूष संबंध है। फिर भी लिंगभाव का एक नया अर्थ देने का प्रयास यह नाटक करता है। अभिज्ञान शांकुतम का नाट्यविधान, कथावस्तु, प्रसंगों को यहां इस नये परिदृश्य में रखा गया है। जैसे दुष्यत- शंकुतलाका प्रेम सार्वजनिक होते ही मुल दुष्यंत के जैसेही इस नाटकमें काम करनेवाला दुष्यंत पुरूष शंकुतला को पहचाननेसे इनकार करताहै। अंतत:अभिज्ञान शांकुतल में जिस तरह’ हैपी एन्डींग’ होता है, उसी प्रकार पुरूष शंकुतला और पुरूष दुष्यंत हमेशा के लिए एक हो जाते है। लिंगभाव से परे जाकर मिथक का यह आधुनिक निर्वचन सर्जनशीलता और गे संबंधों के प्रति कर्न्सन का अच्छा उदाहरण है। ‘सेम मिथिक फ्रेमवर्क’ इस नाटककी खासियत है। प्रेम विरह स्वयं को बचाने का प्रयास दबाब में अस्वीकार की कृति तथा अंत में स्वीकार आदी सूत्रों का यह योग्य तरिके से अनुपालन किया गया है । एक प्रकार से इसे ‘मिथिक प्रर्पोशन ऑफ द टेल’ भी कहा गया है। प्रेम की एक सर्वमान्य श्रेष्ठतम, सर्जनशील साहित्यिकृति के मानदंडो को लेखक द्वारा पुर्नरचना कर उसका गंभीरता के साथ निर्वचनही नही बल्की पूर्ननिर्वचन भी किया है। समलैंगिकता के विषयों को भी गंभीरता और प्रतिबद्धता के साथ वगैरे किती भ्रांति के अभिव्यक्त किया है।
अपने अपने तरिके से यह सभी नाटक एल.जी.बी.बी. सं संबंधित विषयों को कर्न्सन के साथ गंभीरता के साथ अपनी भूमिका के साथ अभिव्यक्त करते है । उनके एल.जी. बी.टी. यथार्थ को स्वीकार कर उसकी सार्वत्रिक रुप से घोषणा करते है। जो लेखक इस श्रेणी में नहीं होने के बाद भी मानवता के आधार पर एल.जी.बी.टी. समुहों के हक और अधिकार का समर्थन करते है। इस संदर्भ में चेतन दातार के ‘एक-माधवबाग’ नाटक का मैं विशेष रुप से उल्लेख करना चाहुंगा। यह एक ऐसे विधवा स्त्री की कहाणी है। जो वगैर पती के अपने बच्चों को बडे जद्योजहद के साथ लालनपालन कर रही है। फिर अचानक उसे पता चलता है कि उसका होनहार बेटा ‘गे ‘,है समलिंगी है। इसके पश्चात वह मॉ की जो भावनिक संघर्ष की यात्रा है वह बहुत प्रभावी है। अतत:अपने बेटे को वह उसके समलैंगिक व्यक्तित्व के साथ हिंमत के साथ स्वीकारती भी है और उसका जैविक, वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समर्थन भी करती है। चेतन दातार न ‘गे’ थे ना किसी ऐसे आंदोलन के वे कार्यकर्ता थे । इसके बावजुद एक कर्न्सन के साथ मानवता के साथ, मानवीय मुल्यों के साथ,प्रतिबद्धता के साथ उन्होंने एक-माधवबाग यह एकल नाट्य प्रयोग के रुप में उसकी रचना की, जिसे मोना आंबेगावकर जैसी मशहुर अभिनेत्री अपने बेजोड अभिनय के साथ देश-विदेश में मंचित करती है।
यह सभी नाटकएक नाटक विधा के रुप में भी परिपूर्ण है। प्रयोग धर्मिता के साथ नाट्यरचना की सभी इकाईयों के साथ नाट्यात्मक मूल्य के साथ नाट्शिल्प और शैली के साथ अपनी पूर्णता के साथ अभिव्यक्त होते है। इसलिए मंचीय क्षमता भी उनमें भरपूर है । लेकीन क्या कभी यह नाटक अपने ‘ब्लाईंड’ अथवा ‘ब्लँक जेंडर’ जैसी स्थिति में मुख्यधारा’के नाटक के रुप में स्वीकारे जाएंगे? या उन्हें भी दर्शक द्वारा प्रचलित सामाजिक मान्यताओं का शिकार होना पडेगा यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
फिर भी कुछ प्रश्न शेष है। नारिवादी विमर्श में सिमॉन बुवा नारी के दोयम दर्जे की श्रेणी कि आलोचना करती है। इस दोयम दर्जे के खिलाफ लढ़ती है, लढने की प्रेरणा देती है। इस परिप्रेक्ष्य में एल जी बीटी को कौन से श्रेणी रखा जाए और क्यो। क्या नारी को एक मनुष्य/मानव समझा जाने की मांगइस समुह के लिए लागू हो सकतीहै। दूसरा प्रश्न है, लिंग पर आधारित श्रम विभाजन के तीन महत्वपूर्ण अंग है, उत्पादन ,पुनरउत्पादन तथा समुदाय सहतत्व, इस वर्ग के साथ एल.जी .बी.टी. को कैसे जोडा जा सकता है।
अत: यह वर्ग भी परंपरागत पितृसत्ता प्रधान, पुरुषसत्ता प्रधान व्यवस्था का शिकार है। सामाजिक मान्यता देने में सबसे बड़ा रोडा यही व्यवस्था है। ऐसे स्थिति में नारिवाद इस अवस्था को कैसे देखता है। इस एल.जी.बी.टी. समाज की और कैसे लिंगभाव से देखा जाना चाहिए। क्या जेंडर ब्लाईड की संज्ञा हंशिए पर आएगी। अथवा सिमांतीकरण का यह एक उपेक्षित प्रश्न रह जाएगा ?उत्पादकता के मुल्यों के आधार पर इस वर्ग की श्रेणी स्थान क्या होगा। गृहिणी, पारिवारिक सदस्य, स्वयत्त उत्पादन के रुप में हम इस वर्ग को कैसे देख सकते है ? यह मुल प्रश्न है ,जिस पर चर्चा होना आवश्यक है ।
संदर्भ – संदर्भ ग्रंथ सूची
- लिंगभाव का मनोवैज्ञानिक अन्वेषण प्रतिच्छेदी क्षेत्र – लिला क्षेत्र वाणीप्रकाशन, नई दिल्ली प्रथम संस्करण -2004
- मी हिजडा—मी लक्ष्मी- लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी मनोविकास प्रकाशन, पुणे प्र.आ. 2012
- भरारी (चवथी जागतिक महिला परिषद, बिजिंग -1995) – डॉ. सीमा साखरे सीमा प्रकाशन, नागपुर प्र.आ. 1995
- लिंगभाव – समजून घेताना –कमला भसीन (भाषांतर श्रृती तांबे) लोकवाड़ प्रकाशन गृह ,मुबंई प्र.आ. 2010
अप्रकाशित नाट्यालेख
- दुष्यतप्रिय – सारंग भाकरे
- एक, माधवबाग – चेतन दातार
- पुरूषोत्तम – बिंदु माधव खिरे
- ऑफ बीट – जमीन कांबळे
- पुन्हा पुन्हा वस्त्रहरण – नाथा चितळे
(इसके अलावा ‘गुगल’से प्राप्त विविध नाटकों की आलोचनाएं व अन्य सुचनाएं )
डॉ. सतीश पावड़े
असिस्टेंट प्रोफेसर
नाट्यकला एवं फिल्म अध्ययन विभाग
म.गां.अं.हि.वि.,वर्धा
भ्रमणध्वनि – 09372150158
सारा का सारा समाज ही ढह रहा है : ‘घासीराम कोतवाल’नाटक की प्रासंगिकता का संदर्भ-हरदीप सिंह
सारा का सारा समाज ही ढह रहा है : ‘घासीराम कोतवाल’नाटक की प्रासंगिकता का संदर्भ
हरदीप सिंह, प्रोफेसर, दूरभाष: 09417717910
‘घासीराम कोतवाल’नाटक को देखते समय अथवा पढ़ते समय दर्शक और पाठक के मन में सहज ही यह बात उतर जाती है कि ‘सारा का सारा समाज ही ढह रहा है, चुक रहा है |’(1) प्रस्तुत शोध पत्र में इसी कथन कि पुष्टि की गई है और विशेष रूप से राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र में नैतिक मूल्यों के क्षरण का आकलन किया गया है| विजय तेंदुलकर के अनुसार,
“‘घासीराम कोतवाल’एक विशिष्ट समाज स्थिति की ओर संकेत करता है | वह समाज स्थिति न पुरानी है और न नई | न वह किसी भौगोलिक सीमा रेखा से बंधी है, न समय से ही | वह स्थल कालातीत है, इसलिए ‘घासीराम’और ‘नाना फड़नवीस’भी स्थल कालातीत हैं | समाज स्थितियां उन्हें जन्म देती हैं, देती रहेंगी |”(2)
इस विशिष्ट स्थल कालातीत स्थिति को ‘जब्बार पटेल’ने निर्देशक का वक्तव्य में और अधिक स्पष्ट है :
“इस नाटक में घासीराम और नाना फड़नवीस का वयक्ति संघर्ष प्रमुख होते हुए भी तेंदुलकर ने इस संघर्ष के साथ – साथ अपनी विशिष्ट शैली में तत्कालीन सामाजिक एवं राजनैतिक स्थिति का मार्मिक चित्रण किया है। परिणामतः सत्ताधारी एव जनसाधारण की सम्पूर्ण स्थिति पर काल – अवस्थापन के अंतर से विशेष अंतर नहीं पड़ता। घासीराम हर काल और समाज में होते है और हर काल और समाज में उसे वैसा बनाने वाले और बनाकर मौका ताक उसकी हत्या करने वाले नाना फड़नवीस भी होते ही है – वह बात तेंदुलकर ने अपने ढंग से प्रतिपादित की है। ” (3)
इसकी प्रासंगिकता की पुष्टि निम्नलिखित बातों से सिद्ध होती है :-
- समाज की अधोगति : आम जनता में झूठ बोलने की प्रवृत्ति:
‘घासीराम कोतवाल ‘नाटक में गिरते हुए मानव मूल्यों को दिखाया गया है। समाज में भोग विलास और व्यभिचार की प्रवृत्ति जब अपने चरम शिखर पर पहुँचती है तो झूठ बोलना आम बात हो जाती है । जिस समाज में लोग कोठे पर जा कर नाच देखने के लिए अपनी घरवालियों से यह कर झूठ बोलते हैं कि हम मंदिर जा रहे हैं उस समाज के नैतिक मूल्यों के पतन का अंदाज़ सहज ही लगाया जा सकता है । एक हिंदी फ़िल्म आई थी जिसमें पुलिस को पुख्ता जानकारी मिलती है कि किसी स्थान पर देह व्यापार का कारोबार चल रहा है । इस जानकारी के आधार पर पुलिस जब वहाँ रेड मरने पहंचती है तो वहाँ सब लोग पहले से ही भगवान् की आरती कर रहे होते हैं । क्योंकि उस देह व्यापार के अड्डे की दीवारों पर पहले से ही धार्मिक चित्रकारी की हुई थी इसलिए पुलिस के आने की सूचना मिलते ही सभी वेश्याएं सर पर पल्लू डाल कर पूजा करने का ढोंग करती हैं । इस नाटक में भी मंदिर जाने का ढोंग करके पुरुष लोग बाबनीखानी के कोठे पर नाच देखने जाते हैं | नाटक के पूर्वार्ध के शुरू में सारे ब्राहम्ण मंदिर जाने के बहाने बावनखनी में गुलाबी का लावणी नाच देखने जाते है, जबकि उनकी पत्नियां घरों में मन मसोस कर रह जाती हैं।
उदाहरण :
“बाम्हन बावनखनी कौं धायौ अरु बाम्हनी घरै रही । बाम्हनी घरै रही, घरई घर में सूल रही । बाम्हनी बात जोवै, आँखिन में रैन नसावै |” (4)
सूत्रधार : ” बावनखनी में बाम्हनी घरें रहबू करै,बाम्हन रमि रह्यौ भजन कीर्तन मैं, जहानम मसान मैं। बाम्हन चितचाव सों दरसन – परसन करैं, तहाँ बाम्हनी वाकी एकांत – सेवन करैं।”
कोठे पर लोग किस प्रकार की चेष्टाएँ करते हैं वह निम्न उधाहरण से स्पष्ट हो जाता है :
‘लोग श्रृंगारिक चेष्टाएँ करते हुए निचली सतह पर उतर आए हैं।’(5) ‘नाच समाप्त होते ही जोर- जोर से सीटियाँ बजाते हैं और पगड़ी उछालते हैं|’(6)
इस प्रकार नाटक में गिरते हुए मानव मूल्यो को दिखाया गया है, यह आम जीवन में नैतिकता के पतनशील समाज का जीवंत चित्रण है |
- पुलिस का भ्रष्टाचार, उत्पीड़न और राक्षसी चेहरा-
‘सेवा, सुरक्षा, शांति’; ‘आपके साथ, आपके लिए, सदैव’; ‘courage, care, commitment’, ‘आपकी सेवा में तत्पर’, पोलिस की हक़ीक़त इन आदर्श वाक्यों से कोसों दूर है । आए दिन पुलिस की ज्यादती से आम नागरिकों का सामना होता है । चाहे मामला निजी न्याय पाने का हो या राजनैतिक, पुलिस मानो एक दमनकारी ताक़त के रूप में अपने ज़ालिम बल प्रयोग की साड़ी हदें पार करती हुई नज़र आती है । विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में पुलिस का खौफ इस कदर हावी है कि एक हमदर्द और न्यायपरायण पुलिस का सपना ख़्वाबों सा दूर लगता है ।
पुलिस देश के आम आदमी के साथ कैसा व्यवहार करती है अपने नाटक में विजय तेंदुलकर इसे सिद्धहस्तता से दर्शाते हैं | घासीराम कन्नौज से पूना नगरी में रोज़गार की तलाश में आया एक आम आदमी है जो गलती से पुलिस के हत्थे चढ़ जाता है । पुलिस उस पर चोरी करने का झूठा आरोप मढ़ती है और उसके साथ दुरव्यवहार करती है | इस बात की पुष्टि निम्न उदाहरण से होती है –
“ब्राहम्ण : आदमी नहीं हजूर,जेबकतरा हता। राँड की औलाद, जिसने मेरी दच्छिना चुराए ली। बिसके हाथ झड़ जाएँ,कीड़े पड़े,बिसके मक्खियाँ भिनके,बिसके—“ (7)
घासीराम का बहुत अधिक अपमान किया जाता है, मारपीट भी की जाती है ‘लहुलुहान घासीराम को दो सिपाही घसीट कर लाते है और पटक देते है।
पहला सिपाही : मर स्साले इसी कुठरिया में –
दूसरा सिपाही : चुप्पचाप ! नहीं तो बना देंगे गठरिया -पुटरिया हड्डियों की। लगाऊँ हरामी की जाँघो के बीच,खस्सी -सा बिबियाएगा स्साला – ‘ (8)
घासीराम को सूअर की औलाद कहकर तिरस्कृत किया जाता है :
“ सिपाही :- चलो स्साला ! चोर कहीं का ,सूअर की औलाद ! फिर कभी इस पवित्तर पुन्न नगरी की तरफ रुख करेगा तो गर्दन उड़ा देंगे,समझा? ले जा काला मूँ हिया से। खबरदार जौ लौट के आया पूना। तेरा साया तक न पड़े इस नगरी पै -चल हट निकल –।“ (9)
पुलिस कर्मियों द्वारा आम जनता का अपमान किया जाता है। किसी भी व्यक्ति को पकड़कर उसे तंग कर मार-पीट करना आदि सब कार्य आज भी होते हैं। अतः यह इस रूप से भी प्रासंगिक प्रतीत होता है।
‘बिला परमिट मुर्दा फूँकना बंद !’(10)
‘नीच जातवारे की रोटी खाना गुन्हाय है — !’(11)
” बिला परमिट खस्सी चीरना, पेट गिराना, खानदानी औरत का छिनाली करना, छिनाल की भड़ुआगिरी करना, बाम्हन का बदकारी करना, कोऊ सो छेड़छाड़ करना, चोरी चपाटी करना, तल्लाकबारी जोरू के साथ घोरबा करना, खसम जीता होय तो यार को घर में घुसाना, अपनी जात छिपाना, जाल सिक्का ढालना, जान देना – सब गुन्हाय है – ” (12)
घासीराम कोतवाल बनने के बाद पूना शहर की परिक्रमा करने लगता है । आम जनता को टोकने, ठोकने, मुश्कें बाँधने, परमिट जांचने का काम शुरू हो जाता है । आम जनता प्रताड़ित होती है । कोई रात को घर से बहार नहीं निकल सकता है :
” घासीराम : कहाँ जा रहा है?
सूत्रधार : ऐसेई सरकार ।
घासीराम : चोरी करने?
सूत्रधार : ने S ई S सिरकार
घासीराम : तो फिर रंडीबाजी करने?
सूत्रधार : नई सिरकार ।
घासीराम : ( तमाचा मारकर ) सच बोल ! ” (13)
औरतों की कोई इज्जत नहीं रहती, महिला उत्पीड़न एक आम बात हो जाती है । एक खानदानी औरत को जबरन घर से बाहर निकाल कर प्रताड़ित किया जाता है :
“ घासीराम : (पैनी आँख से देखकर ) खानदानी हो न ! ( औरत होंठ चबाकर सर झुकाकर ‘हाँ’कहती है )
मंगलसूत्र तो दिखाना । ( वह दिखाती है । ) असली है, या दिखावे का? इसका मालिक यही है या कोई और?”(14)
जहां एक ओर नाना और गौरी रस में आकंठ डूबे हैं वहाँ घासीराम फरमान जरी करता है,
” अपनी बीबी और अपने शौहर को छोड़ कर अगर कोई दीगर मर्द औरतों के साथ रंग खेलता हुआ दिखाई दे तो फ़ौरन हिरासत में ले लो । नैतिकता की रक्षा करनी होगी, हर सूरत में करनी होगी ।” (15)
नाटक में वर्णित सामाजिक स्थिति की अराजकता की इन्तहा तब दिखाई पड़ती है जब किसी की अर्थी की चिता जलाने के लिए भी परमिट माँगा जाता है । और असली परमिट को जाली कह कर झूठ को सच सिद्ध किया जाता है और कहीं भी सुनवाई नहीं होती |
बेगुनाह को चोरी के झूठे आरोप में जेल में डाल दिया जाता है और अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए जबरन अग्नि परीक्षा ली जाती है । यहाँ नाटककार ने पुलिस को क्रूरता की सभी हदें पार करते हुए दिखाया है :
” लाओ जी वो तप हुआ लोहे का गोला । हाथ पकड़ना इसके । कसके । चिल्लाये तो भी न छोड़ना । सिंकने देना पक्का । खाल के जलने की गंध आनी चाहिए, गंध !
ब्राह्मण बिबियाता है …। वह एकदम आर्ट स्वर में चीखता है । गोला छिटकाकर अलग गिराया जाता है । ब्राह्मण लुँज-पुँज होकर गिर पड़ता है, अधमरा-सा । घासीराम यह सब बड़ी दिलचस्पी से देख रहा है, हँस रहा है, मुस्कुरा रहा है, मूँछों पर ताव दे रहा है |” (16) इस तरह पुलिस अपनी कारगुज़ारी दिखने के लिए बेगुनाहों से ज़बरन गुनाह क़ुबूल करवाती है । घासी राम उस ब्राह्मण के दोनों हाथ काट कर पूना शहर के बाहर फिंकवाने का हुकुम जारी करता है । इस तरह घासीराम के खौफ से पूना नगरी थर थर कांपती है |
‘इण्डिया करप्शन एंव ब्राइवरी रिर्पोट’के अनुसार भारत में रिश्वत मांगे जाने वाले सरकारी कर्मचारियों मे 30 प्रतिशत की भागीदारी पुलिस तन्त्र की है। ज्यादातर पुलिस द्वारा रिश्वत प्रथिमिकी दर्ज करवाने, आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज करने मे कोताही बरतने या मामला न दर्ज करने तथा जाँच करते समय सबूतों को नजरदांज करने सम्बन्धी मामलों मे ली जाती है। रसूखदारों के दबाव मे काम करना तथा अवांछित राजनैतिक हस्तक्षेप को झेलना पुलिस अपना कर्तव्य समझने लगी है। हांलाकि पुलिस तन्त्र की स्थापना कानून-व्यवस्था को कायम रखने के लिये की गई थी तथा आज भी सामाजिक सुरक्षा तथा जनजीवन को भयमुक्त एंव सुचारू रूप से चलाना पुलिस तन्त्र का विशुद्ध कर्तव्य है। इस क्षेत्र में पुलिस को पर्याप्त लिखित एंव व्यवहारिक अधिकार भी प्राप्त है। भारत के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक विकास, बढती जनसख्या, प्रौद्योगिकी का विकास, अपराधों का सफेद कॉलर होना इन तमाम परिस्थितियों के कारण पुलिस तन्त्र की जबाव देही के साथ जिम्मेदारी भी बढने लगी है। लेकिन भारतीय समाज में पुलिस की तानाशाहीपुर्ण छवि, जनता के साथ मित्रवत ना होना तथा अपने अधिकारी के दुर्पयोग के कारण वह आरोपो से घिरती चली गई। आज स्थिति यह है कि पुलिस बल समाज के तथा कथित ठेकेदारों, नेताओं तथा सत्ता की कठपुतली बन गई है। समाज का दबा-कुचला वर्ग तो पुलिस के पास जाने से भी डरने लगा है पुलिस वर्ग को तमाम बुराइयों तथा कुरीतियों ने घेर लिया है पुलिस में भ्रष्टाचारी और अपराधी करण के कई मामलें हमारे सामान्य जीवन में सामने आते रहते है। चूंकि पुलिस के पास सिविल-समाज से दूरियाँ बनाये रखने और उनके ऊपर असम्यक प्रभाव बनाये रखने की तमाम व्यवहारिक शक्तियाँ है तो साधारण वर्ग आवाज उठाने की जहमत नही रखता। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार में तो पुलिस भर्ती प्रक्रिया में ही भ्रष्टाचार का बढ़ा मामला सामने आया था तथा बिहार में भी आरोप लगे थे कि कुछ अधीनस्थ पुलिस कर्मचारी प्रोन्नति के लिये अपने उच्च अधिकारियों को खुश करने में रिश्वत का सहारा ले रहे थे।
- पदलोलुप्ता :
पदलोलुप व्यक्ति अपने चरित्र से कितना गिर सकता है इसे दिखने के लिए नाटककार ने घासीराम को अपनी फूल सी बेटी को नाना की हवस का शिकार बनाते हुए दिखाया है । वह कोतवाल के पद की प्राप्ति के लिए अपनी बेटी ललिता गौरी का सौदा नाना के साथ करता है | वह पद प्राप्त करने के लिए इस हद तक गिर जाता है कि अपनी बेटी ललिता गौरी को नाना फड़नवीस के आगे चारे के रूप में इस्तेमाल करता है। वह नाना फडनवीस को अपनी बेटी देने के बदले कोतवाल का पद प्राप्त करता है। इस बात की पुष्टि निम्न उदाहरण से होती है –
“घासीराम :’‘ठीक ! श्रीमान,रिआया का मुँह बंद करने के वास्ते मुझे शहर पूना का कोतवाल मुकर्रर कर दें।“ (17)
नाना : कोई और तरकीब बताओ –
घासीराम : तरकीब हो या तरतीब,जो है,यही है; अगर ये नहीं है तो ललिता गौरी भी नहीं है। वो आइंदा आने वाली नहीं है। ‘‘(18)
पदलोलुप्ता की दृष्टि से भी यह नाटक प्रासंगिक प्रतीत होता है क्योंकि आधुनिक समय में भी वयक्ति पद के लालच में किसी भी हद तक गिर जाता है। अपनी बेटी,पत्नी आदि की इज्ज्त की परवाह नहीं करता।
- नैतिकता का पतन :
नाना फड़नवीस घासीराम की बेटी ललित गौरी को प्राप्त करना चाहता है। जो कि बहुत ही कम उम्र की है। वह कहता है –
‘अरी, तू हमारे लिए बेटी की तरह है,पडोसी की।’(19)
“हमें तुझ पे प्यार आ रहा है। आहाहा ! ये तुम्हारा शरमाना – जान तुम पर निसार है; ये बन्दा तावेदार है वस्ल का तलबगार हूँ; तेरे इश्क में प्यारी बेकरार हूँ. मुझसे बेकली सही ना जाए, आ ! मेरे सीने से लग जा। ” (20)
वह घासीराम को उस लड़की के विषय में पूछता है कि –
“वो मिलेगी? मिलेगी वो? आह क्या कहने है उस पुख्ता ठोस ईमारत के रे ! तूने देखा था उसे? उभारदार, मुलायम,रसभरी और नरम – ओहोहोहो ! इतनी छुई अंग्रेजी पर ऐसी एक नही। इसकी सानी नहीं रे ! कोन थी?
घासीराम कहता है – ‘कोई हो, हुकुम दे तो खिदमत में पेश कर दूँ।“ (21)
इससे घासीराम के चरित्र की नैतिक पतन दृष्टिगोचर होती है। वह पद प्राप्त करने के लिए अपनी बेटी को ज़रिया बनाता है। वह अपने बारे में कहता भी है –
” गौर से देखो, कैसे अपनी लाड़ली बेटी ललिता गौरी को इस दरिन्दे की दावत बनाया है मैंने देखो इस बाप को, जो अपनी पेटजोई बेटी से पेशा करता है। देख लो, कैसे मेरी बिटिया हरजाई हुई जाती है। वो ठूँठ खूसट देखो; कैसे उसकी नरम जवानी को चीथ – चीथकर चांभ रहा है। – थूको- मुंझ पे – मेरे मूँ में पेशाब करो ! चीर के दो कर दो मुझे – मगर मैं छोड़ूगा नहीं। इस पूना शहर में सूअर का राज कायम कर ही दम लूँगा।
” घर फूँक तमाशा देखो, सब लोग ताली बजाओ, ताली बजाओ।” (22)
इस प्रकार बदले की भावना घासीराम को इस कदर अँधा कर देती है कि वह सही – गलत सब जानते हुए भी अपनी बेटी को नाना के हवाले करता है। आज भी इसी प्रकार नाना एवं घासीराम जैसे अनेक वयक्ति है जो इस प्रकार के कार्य करते है नैतिकता का पतन आज भी उसी स्तर पर हो रहा है जैसा पहले हुआ करता था, अतः इस पक्ष से भी यह नाटक प्रासंगिक प्रतीत होता है।
5- राजनेताओं की कामवासना का खुला चित्रण :
नाना आज के राजनेता का प्रतीक है क्योंकि आज भी भारत के कितने ही राजनेता बलात्कार और नारी के शोषण के आरोप में जेल में सजा भुगत रहे हैं लेकिन सजा पाने वालों की संख्या आटे में नमक जितनी है | इस नाटक में नाना की छह पत्नियां होती है। फिर भी वह कम उम्र की ललिता गौरी को अपनी अवश हवस का शिकार बनाता है और अंत में उसे मार देता हैं फिर वह सातवां विवाह करवाता हैं:
यों तो नाना कर चुके छै शादियां,
किस्मत बुरी फलती नहीं छै बीबीयाँ
करना पड़ा है सातवां उनको वियाह
दिल नहीं भरता करें क्या, आह ! (23)
नाना की कामुतरता का इन पंक्तियों से पता चलता है –
उदहारण – ‘‘नाना की वधु एक किनारे कांपती हुई खड़ी हैं।
नाना सदरी उतारता है। कुरते की बांह मोड़ता है।
कामातुर है। वधु के पास जाकर छेड़छाड़ करता है। वह बहुत
डर जाती है। ‘‘(24)
नाना ‘’आऒ प्यारी,आऒ / हमारे पास आऒ, हमारे पहलू में समा
जाओ। (वह नजदीक नही आती ) कितना इंतज़ार कराओगी? वह डर
जाती है,ऒहों,तुम तो बेवजह शरमाती हो,यकीनन हम पै बिजलियां
गिराती हो। नाजुक बदन हो,लाज क्यों ओढ़े फिरो? हटाओ भी
,उतारकर अलग कर दो। ‘‘(25)
6- कुटिल राजनीती की दुनाली बंदूक
घासीराम कोतवाल नाटक नेताओं की धूर्त्तता की अद्भुत मिसाल पेश करता है । राजनेता अपना उल्लू सीधा करने में कितने माहिर हैं यह घासीराम कोतवाल नाटक से सिद्ध हो जाता है । इस सम्बन्ध में नाटक के पूर्वार्ध के अंत में नाना का निम्नलिखित कथन किसी व्याख्या की अपेक्षा नहीं रखता;
“ जाS, घसियारे, कल के छोकरे, तुझे बना दिया हमने कोतवाल ! जाS, नंगा होक नाच, बजा गाल, मगर इस नाना की चाल तू नहीं जानता । अरे मरदूद ! हमने भरी है बंदूक, राजनीतिवाली, दुनाली । पहले धमाके में चित्त हो जाएगी लज़ीज़ लौंडिया तेरी; दूसरे धमाके के साथ नाच उठेगी पुण्यनगरी पूरी । अबे घसिये ! तू बाहरी, परदेसी, हमने तुझे बख्शी है याँ की सबसे ऊंची कुर्सी । जानता है क्यों? ताकि तमाम साजिशें खुद ब खुद कट जाएं, बलबाईयों की धज्जियाँ उड़ जाएं ! अव्वल तो तुम उनमें शामिल हो नहीं सकते, हो भी जाओ तो काबिले एतबार नहीं हो सकते । क्यों? तुम बाहरी आदमी हो, हमारी दहलीज़ के टुकड़खोर कुत्ते हो । तुम्हरी जंजीर हमारे हाथ होगी; तुम्हें भी तो हमारी जरूरत होगी । घासीराम तुम चित्तपावन बम्हनों से बढ़कर ऐंठू होंगे, रॉब गांठोगे, धाक जमाओगे । पुख्ता बंदोबस्त करोगे, यों हमारी फ़िक्र मिटाओगे । हमारी गलतियां, भूलें तुम्हरे नाम होंगी, हम महफूज़ रहेंगे बदनामियाँ तुम्हरी होंगी । करने को हम भुगतने को हमारा कोतवाल |”
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नाटक के अंत में घासीराम के वध का हुकुम पुलिस एनकाउंटर जैसा है –
“ घासीराम का सर मूंड कर सिन्दूर छिड़का जाएगा । उसके बाद ऊँट पै उल्टा बिठाके जुलुस निकला जाएगा, पस्चात हाथी के पाँव से बांधकर घुमवाया जाएगा और सबके अंत में सूली पै चढ़ाया जाएगा |” (27)
इसके बाद नाना का सम्बोधन, ” इस पापी घासीराम की लाश को यहीं पड़ी रहने दो, सड़ने दो । गिद्धों को, कुत्तों को उसे चीथने दो । कीड़ों को खाने दो । उसकी लाश को जो उठाएगा उसे सख्त सजा दी जाएगी |….. इसलिए आज से, अभी से, तीन दिन तलाक शहर पूना में जश्न मनाया जाए, उत्सव मनाया जाए । यह हमारी आज्ञा है – ! ” (28)
निष्कर्ष रूप में यह सामने आता है कि आज के समाज में नाटक लिखने के समय से कोई फर्क नहीं आया है और ही घासीरामों की संख्या और ननाओं की संख्या में तीव्र वृद्धि हो रही है । समाज में तमोप्रधान वृत्तियों का बोलबाला है । ऐसा लगता है कि ईश्वर नहीं अपितु भ्रष्टाचार सर्व व्यापक है । हवा में कामवासना की तीखी ज़हरीली गंध व्यापक है । राजनेताओं की आँखों पर धृतरास्ट्र की तरह पट्टी बंधी है । जिस समाज स्थिति का अंकन तेंदुलकर ने एक अंकुर के रूप में प्रस्फुटित किया था वह अब कलकत्ते के बनियान ट्री की तरह फ़ैल गई है जिसकी जड़ें खोजने का कार्य अब असम्भव है । आज एक दिन भी ऐसा नहीं होता जब कोई दुष्कर्म या किसी भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ नहीं होता । यह स्थिति बहुत ही चिंताजनक है । इसी के लिए कहा गया है कि ‘विनाशकाले विपरीतबुद्धि विनश्यन्ति ‘
references
- ज़ब्बार पटेल, निर्देशक का वक्तव्य, घासीराम कोतवाल, अनुवादक वसंत देव, नई दिल्ली : विद्या प्रकाशन, 2004, पृष्ठ 8
- विजय तेंदुलकर, घासीराम कोतवाल, अनुवादक वसंत देव, नई दिल्ली : विद्या प्रकाशन, 2004, पृष्ठ 6
- ज़ब्बार पटेल, निर्देशक का वक्तव्य, घासीराम कोतवाल, अनुवादक वसंत देव, नई दिल्ली : विद्या प्रकाशन, 2004, पृष्ठ 7
- विजय तेंदुलकर, घासीराम कोतवाल, अनुवादक वसंत देव, नई दिल्ली : विद्या प्रकाशन, 2004, पृष्ठ 30
- वही, पृष्ठ 30
- वही, पृष्ठ 30
- वही, पृष्ठ 39
- वही, पृष्ठ 39
- वही, पृष्ठ 41
- वही, पृष्ठ 57
- वही, पृष्ठ 58
- वही, पृष्ठ 58
- वही, पृष्ठ 60
- वही, पृष्ठ 63
- वही, पृष्ठ 65
- वही, पृष्ठ 71
- वही, पृष्ठ 52
- वही, पृष्ठ 52
- वही, पृष्ठ 45
- वही, पृष्ठ 45
- वही, पृष्ठ 46
- वही, पृष्ठ 48-49
- वही, पृष्ठ 77
- वही, पृष्ठ 79
- वही, पृष्ठ 79-80
- वही, पृष्ठ 53
- वही, पृष्ठ 95
- वही, पृष्ठ 98
भारतीय सिनेमा का चुनिया यानी ‘लवेबल-विलेन’-तेजस पूनियां
भारतीय सिनेमा का चुनिया यानी ‘लवेबल-विलेन’
-तेजस पूनियां





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प्रकाशन- मधुमती राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका, विश्वगाथा गुजरात की पत्रिका, परिकथा दिल्ली से प्रकाशित पत्रिका, जनकृति अंतरराष्ट्रीय बहुभाषी ई पत्रिका, अक्षरवार्ता अंतरराष्ट्रीय मासिक रिफर्ड प्रिंट पत्रिका, परिवर्तन: साहित्य एवं समाज की त्रैमासिक ई पत्रिका, हस्ताक्षर मासिक ई पत्रिका (नियमित लेखक) सहचर त्रैमासिक ई पत्रिका, कनाडा में प्रकाशित होने वाली प्रयास ई पत्रिका, पुरवाई पत्रिका इंग्लैंड से प्रकाशित होने वाली पत्रिका, हस्तक्षेप- सामाजिक, राजनीतिक, सूचना, चेतना व संवाद की मासिक पत्रिका, सबलोग पत्रिका (क्रिएटिव राइटर), आखर हिंदी डॉट कॉम, लोक मंच पत्रिका सर्वहारा ब्लॉग, ट्रू मीडिया न्यूज डॉट कॉम, स्टोरी मिरर डॉट कॉम सृजन समय- दृश्यकला एवं प्रदर्शनकारी कलाओं पर केन्द्रित बहुभाषी अंतरराष्ट्रीय द्वैमासिक ई- पत्रिका तथा कई अन्य प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं, ब्लॉग्स, वेबसाइट्स, पुस्तकों आदि में 200 से अधिक लेख-शोधालेख, समीक्षाएँ, फ़िल्म समीक्षाएं, कविताएँ, कहानियाँ, तथा लेख-आलेख प्रकाशित एवं कुछ अन्य प्रकाशनाधीन। कई राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में पत्र वाचन एवं उनका ISBN नम्बर सहित प्रकाशन।
कहानी संग्रह – “रोशनाई” अकेडमिक बुक्स ऑफ़ इंडिया दिल्ली से प्रकाशित।
सिनेमा आधारित पुस्तक पर शोधरत।






