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21 वी शताब्दी में हिंदी साहित्य शिक्षण: मनीष खारी

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Sanskrit boardHINDILITEATURE

21 वी शताब्दी में हिंदी साहित्य शिक्षण
                                                       मनीष खारी
                                            
ईमेल
–manishkharibnps@gmail.com
शोध सार  प्रस्तुत शोध पत्र में हिंदी भाषा शिक्षण और साहित्य के सम्बन्ध की पड़ताल करने
का प्रयास किया गया है। यहाँ जिस साहित्य की बात की जा रही है वह
13-18 आयु वर्ग के बच्चों के लिए प्रयुक्त वास्तविक साहित्य
(समसामयिक समाज की समस्याओं
, प्रश्नों, भावनाओं, त्रासदियों इत्यादि की बात करने वाला मुख्यधारा का साहित्य
न कि किसी साफ-सुथरी तस्वीर में बंधा बच्चों पर आदर्शवाद थोपने वाला कल्पना पर
आधारित साहित्य) है। आज के समाज में मीडिया के माध्यम से बच्चों व् किशोरों के
सामने इतनी विविध सामग्री बिखरी रहती है कि वह मानसिक परिपक्वता के तरफ तेजी से
बढ़ते जाते है और पुरानी पीढ़ी से कहीं अधिक मानसिक जटिलता के साथ बड़े हो रहे है।
ऐसे में यदि उन्हें आदर्शवादी
, काल्पनिक साहित्य ही दिया जायेगा तो वह उनके लिए वास्तविकता
से अलग ,उबाऊ और निरर्थक होगा इसलिए ‘‘वास्तविक साहित्य’’ की गहन भूमिका है।
हालाँकि अपनी   आवश्यकताओं के अनुसार उसमे
से चुनाव करना और उससे कोई अर्थ गढ़ पाना बेहद जटिल प्रक्रिया है। किशोरवय के बालक
यूँ भी शारीरिक
, मानसिक, भावनात्मक ‘‘बदलावों के तूफ़ान और दबाव’’ से गुज़र रहे होते
है। इसी कारण विद्यालयी शिक्षण में उचित मार्गदर्शन की भी अनिवार्य आवश्यकता है।
इस तरह का साहित्य किशोर बालकों को अपनी तरफ आकर्षित करता है और जुड़ने के विविध
आयाम देता है
; जो उसके वास्तविक जीवन के ही आयामों से सम्बंधित होते है।
इस प्रकार के साहित्य से जुड़ाव बच्चों के भाषिक संकाय को प्रबल करता है। और उनकी
तरफ बढ़ने का मनोबल भी देता है। इस साहित्य की भाषा सामाजिक भाषा है और भाषा खुद भी
सामाजिक सरोकार का माध्यम है। अतःइस शोध पत्र में वास्तविक साहित्य शिक्षण से
किशोर बालकों के भाषा अधिगम और  संकल्पनाओं
के संवर्धन पर प्रकाश डाला गया है।
मुख्य शब्दावली- भाषा शिक्षण , मानसिक परिपक्वता , भाषिक संकाय                           
 शोध विस्तार-



समाज के लिए साहित्य अनिवार्य है- यह संभवतः निर्विवादित रूप से स्वीकृत
तथ्यों में से एक है।  हर विकसित समाज में
साहित्य की उपस्थिति इसका प्रमाण है
, कम विकसित जनजाति समुदायों में भी लोकगीत,
लोककथाएँ आदि के रूप में उत्तम साहित्य  मिल जाता है। इससे समाज के लिए साहित्य की
अनिवार्यता अपने आप ही सिद्ध हो जाती है। साहित्य समाज का सशक्त अंग होता है।
मनुष्य को बनाने एवं सँवारने में साहित्य का विशेष योगदान होता है। साहित्य
अर्थात् सबका हित। ’’साहित्य और समाज एक ही सिक्के के दो पहलू होते है। एक के बिना
दूसरे के अस्तित्व की परिकल्पना का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता है। (मुकुन्द
द्विवेदी )’’ [i]
बाल साहित्य के सन्दर्भ में एक समस्या तो यह है की  बच्चों के विकास में साहित्य की भूमिका को हमारी
शिक्षा व्यवस्था में अनदेखा किया गया है। पाठ्यपुस्तकीय ज्ञान को ही हमारी शिक्षा
व्यवस्था
, अभिभावक आदि सर्वोपरि मानते है। एक अन्य समस्या है बाल साहित्य की उपलब्धता से
संबंधित
, बच्चों की आवश्यकता के अनुसार साहित्य की उपलब्धता नही हैं फिर भी औपचारिक शिक्षण
में साहित्य का भारांश बहुत अधिक होता है जिससे यह तो साबित होता है कि शिक्षण में
साहित्य को शिक्षाविद् प्रासंगिक तो मानते है। इस प्रासंगिगता के लिए तर्क दिए
जाते है-         
1-साहित्य हिंदी पाठ्यक्रम में अहम् भूमिका का निर्वाह करता
है। साहित्य संसार के विषय में हमारी अवधारणा को आकार प्रदान करता है और मनुष्य
होने के लिए अनंत संभावनाओं व अंतदृष्टि प्रदान करता है।
2- साहित्य पठन का प्राथमिक उद्देश्य सौंदर्यात्मक अनुभव
(एस्थेटिक एक्सपीरियंस) प्रदान करना है
, विचार व जीवन के अनुभवों को सन्तुष्टि स्तर पर ले जाना,
भाषा के माध्यम से रसानुभूति करवाना,
पठन से उभरी कल्पना/दृश्य/विचार/अवधारणा जनित भावनाओं व तर्क
के जटिल समावेश का अनुभव करना है।
3-साहित्य मानव अनुभवों का विस्तार है। यह पाठकों को अवसर
प्रदान करता है कि वह अपने से भिन्न समय
, घटना, स्थिति, देशकाल-वातावरण आदि का अनुभव प्राप्त कर सकें। पाठक इसके
माध्यम से अन्य लोगों के भावों और भूमिका को ग्रहण/खोज कर पाते है।
4-साहित्य के माध्यम से जनित साधारणीकरण की प्रक्रिया के कारण
कुछ पलों के लिए हो सकता है कि पाठक अपनी वर्तमान स्थिति से अलग हो जाएँ
,
पात्रों, घटना व कथानक की पहचना में स्वयं की पहचान को भूल जाएँ और
ऐसे संसार में प्रेवश कर जाएँ जो वास्तव में उनके लिए कभी था ही नहीं। इस प्रकार
वह यह नई विचारधारा
, दर्शन को अपना सकते है या उनके प्रति रुझान दिखा सकते है।
5-साहित्य में पाठक अपनी स्वयं की छवि पा सकते है उनके समय,
उनके वातावरण, उनकी आयु, उनकी चिंताएँ, खुशी, विचार आदि साहित्य में उन्हें मिल सकतें हैं। साहित्य पाठक
को उनके जीवन को आकार देने व प्रतिभागी के रूप में हिस्सा लेने
,
उन पर चर्चा करने या कहानी में खोकर अन्य लोगों तक पहुँचा
सकती है। ऐसी चर्चा पाठकों को नया कुछ खोजने में सहायता करती है। उदाहरण- दोस्ती
,
प्रेम, भय, नफरत, बदला, ईमानदारी, वफादारी, मानवता, पहचान, एकता, विषमता भेदभाव आदि के उनके स्वयं के भाव,
विचार अन्य लोगों से किस प्रकार सामान और भिन्न है।
6 विशेष,
काल, आयु, प्रान्त, राष्ट्रीय, विदेशी, समसामयिक व प्राचीन साहित्य पाठक को इस बात को इंगित व
मूल्यांकित करने में सहायता करता है कि उनके स्वयं के भाव व विचार कितने स्पष्ट
है। यह उनके लिए साक्ष्य प्रदान करते है व आत्मविश्वास बढाता है। वृहत साहित्यिक
कृतियों का अध्ययन पाठक वर्ग के लिखित अभिव्यक्ति के लिए आदर्श माॅडल/प्रारूप का
काम करता है। पढ़ने के साथ ही पाठक द्वारा पाठ्य सामग्री की भाषिक संरचना
,
ढाँचे, भाव आदि का आत्मसात होता रहता है। साहित्यिक कृतियों का
अध्ययन पाठकों में शब्द संरचना
, प्रारुप व श्रोता वर्ग के महत्त्व को भी स्थापित करता है। 
                      साहित्य के वास्तविक पाठ
        प्रस्तुत शोध पत्र में हिंदी
भाषा शिक्षण और साहित्य के सम्बन्ध की पड़ताल करने का प्रयास किया गया है। यहाँ जिस
साहित्य की बात की जा रही है वह
13-18 आयु वर्ग के बच्चों के लिए प्रयुक्त साहित्य है। आज के
समाज में मीडिया के माध्यम से बच्चों व् किशोरों के सामने इतनी विविध सामग्र्री
बिखरी रहती है कि वह मानसिक परिपक्वता के तरफ तेजी से बढ़ते जाते है और पुरानी पीढ़ी
से कहीं अधिक मानसिक जटिलता के साथ बड़े हो रहे है। ऐसे में यदि उन्हें आदर्शवादी
,
काल्पनिक साहित्य दिया जायेगा तो वह उनके लिए वास्तविकता से
अलग उबाऊ और निरर्थक होगा इसलिए ‘‘वास्तविक साहित्य’’ की गहन भूमिका है। हालाँकि
अपनी आवश्यकताओं के अनुसार उसमे से चुनाव करना और उससे कोई अर्थ गढ़ पाना बेहद जटिल
प्रक्रिया है। किशोर वय के बालक यूँ भी शारीरिक
, मानसिक, भावनात्मक ‘‘बदलावों के तूफ़ान और दबाव’’ से गुज़र रहे होते
है। इसी कारण विद्यालयी शिक्षण में उचित मार्गदर्शन की भी अनिवार्य आवश्यकता है।
इस तरह का साहित्य किशोर बालकों को अपनी तरफ आकर्षित करता है और जुड़ने के विविध
आयाम देता है
; जो उसके वास्तविक जीवन के ही आयामों से सम्बंधित होते है। इस प्रकार के
साहित्य से जुड़ाव बच्चों के भाषिक संकाय को प्रबल करता है। और उनकी तरफ बढ़ने का
मनोबल भी देता है। इस साहित्य की भाषा सामाजिक भाषा है और भाषा खुद भी सामाजिक
सरोकार का माध्यम है। अतः इस शोध पत्र में वास्तविक साहित्य शिक्षण से किशोर
बालकों के भाषा अधिगम और  संकल्पनाओं के
संवर्धन पर प्रकाश डाला गया है। हम जानते है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है
,
इसलिए समाज की यथार्थ तस्वीर कृतियों में अंकित करना
साहित्यकार का परम ध्येय होना चाहिए। साहित्य का उद्देश्य समाज की तस्वीर को रचना
के माध्यम से प्रस्तुत कर जनता को उसकी वास्तविकता का स्वाद कराना तथा सामाजिक
स्थिति पर सोचने को विवश करना है। प्रेमचंद जी के अनुसार- ‘‘साहित्य की बहुत-सी
परिभाषाएँ की गयी है
, पर मेरे विचार से उसकी सर्वोत्तम परिभाषा ‘जीवन की आलोचना
और व्याख्या हैं… साहित्य  उसी रचना को
कहेंगे। जिसमें कोई सच्चाई और अनुभूति प्रकट की गई हो
, जिसकी भाषा प्रौढ़, परिमार्जित, सुंदर हो और जिसमें दिल-दिमाग पर असर डालने का गुण हो,
साथ ही जब जीवन की सच्चाइयों का दर्पण हो’’[ii]  जहाँ तक बाल साहित्य के मानकों की बात है तो
सहज स्वीकृत यही है कि किसी भी कहानी
, कविता या बच्चों के लिए लिखी गई कोई भी रचना कौतूहल ,
जिज्ञासा और आनंद से भरी नही होगी तो बच्चा उसमें दिलचस्पी
नहीे लेगा। सबसे पहले यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि बच्चों के साहित्य पर कभी
गंभीरता से नही सोचा जाता
, बच्चों को विषय बनाकर लिखने की परंपरा तुलसी,
सूर के समय से लेकर आज तक है लेकिन बच्चों के लिए लिखने की
परंपरा लगभग गायब है। हम बच्चों के साथ रचनात्मक भागीदारी करने से बचते है। आखिर
ऐसा क्यों है
? हो सकता है कि हमारी परंपरा में ही ऐसा हो? हमारी मानसिक बनावट में तो नही है इसका कारण?
जिसमें वह सिर्फ एक आदर्ष बेटा या बेटी देखना चाहते है। एक
उत्तम बाल साहित्य अपनी कल्पनाषीलता से कमोवेष परंपरा को तोड़ने की ओर ले जाता है
क्योंकि बाल साहित्य के आधारभूत तत्व वही होते हैं जो कि श्रेष्ट साहित्य के।  अब प्रश्न उठता है कि
21वीं शताब्दी के वैज्ञानिक युग में बच्चों के लिए (माध्यमिक
स्तर) साहित्य कैसा है
? इसका उत्तर देते हुए निकोलस टकर कहते है-
‘‘विश्व के नए बाल साहित्य के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह एक
दम साफ-सुथरा हो
, उसकी कहानियाँ एकदम आदर्शपरक हों और उनका अन्त सदा सुखदायी
ही हो। यह तो वास्तव में अपने समयकाल से जुड़ा प्रश्न है। यदि बाल साहित्य में पाठक
यह समझ लेता है कि इसके पीछे एक सुदृढ़ आग्रह है कि जीवन की कठिनाईयों से जुझने और
जीवन जीने का वही फार्मूला अपनाओं जो हम बता रहे हैं तो वह तत्काल उसे छोड़ देता
है।’’
विज्ञान की प्रगति और उससे हुए सामाजिक परिवर्तनों तथा बदलती जीवनशैली,
बदलते सांस्कृतिक मूल्यों ने इक्क्सवी शताब्दी के बाल
‘साहित्य में समयानुसार बदलाव लाए है। ‘‘मनौवैज्ञानिको
, समाजशास्त्रियों ने भी अनुभव किया कि विश्व के सभी
क्षेत्रों में हो रहे बदलाव से बच्चे अछूते नहीं है और वे इनसे न केवल प्रभावित हो
रहे है
, बल्कि इन्हें किसी न किसी रूप से ग्रहण भी करना चाहते है।’’ [iii]
आज बच्चों को लुभाने में टी.वी सबसे आगे है फिर कंप्यूटर,
इंटरनेट, फिल्में…. आदि उन्हें समय से पहले ही अनेक अनुभव प्रदान
कर रहे हैं। किशोरों के सामने इतनी विविध सामग्री बिखरी रहती है कि वह मानसिक
परिपक्वता की तरफ तेजी से बढ़ते जाते है और पुरानी पीढ़ी से कही अधिक मानसिक जटिलता
के साथ बड़े हो रहे है। ऐसे में यदि उन्हें आदर्शवादी
, काल्पनिक साहित्य दिया जाएगा तो वह उनके लिए वास्तविकता से
अलग उबाऊ और निरर्थक होगा इसलिए ‘वास्तविक साहित्य’ की गहन भूमिका है। ‘वास्तविक
साहित्य’ का अर्थ है जीवन की सच्चाईयों से जुड़ा साहित्य। वह मात्र नैतिकता
,
आदर्ष आदि को संप्रेषित करने के उद्देष्य से ही न लिखा गया
हो ।
‘‘सदी के अंत तक आते-आते बाल साहित्य को अधिक यथार्थपरक होना
पड़ा क्योंकि बच्चे कोरी कल्पना में विश्वास नहीं करना चाहते’’[iv]  पिटी-पिटाई पटकथा आदर्शवादी
,
त्याग भाव, राजा-रानी परियों की निर्मूल कल्पनावाली कहानियों के
विरुद्ध नई आधुनिक  विचार पर बच्चे ज्यादा
विश्वास करते  है।
Jeannes
Chall (1983)
की पुस्तक  Proposal for Reading Stages[v] में वह बताती है कि
पठन स्तर
3 के
बच्चे (आयु
9-14) ‘‘नए अधिगम’’ के लिए पठन करते है। जब पाठक तीसरे स्तर में प्रेवश
करता है तो वह ‘‘नए सीखने’’ की प्रक्रिया का हिस्सा बनता है- नया ज्ञान
,
सूचना, विचार और अनुभव। प्राथमिक स्तर पर बालक ‘‘पढ़ना सीखता’’ है
लेकिन इस स्तर पर वह ‘‘सीखने के लिए’’ पढ़ता है। इसके साथ ही बालकों में
आत्मकेन्द्रीत उद्देश्य से इतर पढ़ने की क्षमता का विकास होने लगता है और वह संसार
के ज्ञान के सैद्धांतिक पक्ष के लिए भी पठन करता है। अतः यह कहा जा सकता है कि
मानसिक दृष्टि से माध्यमिक स्तर के बच्चे गंभीर विचार युक्त साहित्य सामग्री का
अध्ययन अवश्य ही कर सकते है। आज बच्चे अपने आस-पास घटित हो रही बातों से अनभिज्ञ
नहीं है। भ्रष्टाचार वोटों की राजनीति
, आतंकवाद-हर बात से वे परिचित ही नहीं उसके प्रति सजग और सतक
भी है और अपनी तरह से उसके बारे में सोच भी रहे हैं। अनिता रामपाल बच्चों को दुनिया
की हकीकत बताते या छुपाने के विषय में विचार प्रकट करते हुए कहती है- ‘‘हमने यही
तय पाया कि जब हम फंतासी या कल्पना मे ये सारी चीजें दिखा सकते हैं तो हकीकत में
होने वाली मारकाट और आक्रमकता और ऐसी तमाम चीज़ों को भी क्यों न दिखाए। यही तो असली
सवाल है। ज्यादातर लोग अपने बच्चों को ऐेसे सामाजिक यथार्थ से बचाकर रखना चाहते है
जो बर्दाश्त के काबिल नहीं है। दूसरी तरफ लाखों बच्चे है जो इन चीजों को हट रोज
अपनी ज़िदगी में देखते है
, भोगते है।’’ [vi]
      माध्यमिक कक्षा के छात्रों की
विशेषताएँ- अधिगम से संबंद्धित
हम यह मानकर चलते है कि माध्यमिक विभाग में बच्चा एक ‘जटिल व्यक्ति’ होता है।
किशोरवय के बालक यूँ भी शारीरिक
, मानसिक भावनात्मक ‘‘बदलावों के तूफान और दबाव’’ से गुज़र रहे
होते है।
1.         सामाजिक रूप से छात्र माध्यमिक शिक्षा की कालावधि के दौरान ही अपने आस-पास
दुनिया की समझ बनाना शुरु करते है तथा उसमें अपने स्थान
, महत्त्व पर प्रश्न करना भी आरंभ करते हैं।
2.         आलोचनात्मक व जटिल अवधारणाओं का प्रयोग करने योग्य हो जाते है तथा इनके प्रयोग
से ही आलोचनात्मक कौशलों का विकास करते है।
3.         चुनौतीपूर्ण कार्यों में संग्लन रहने पर उच्च उत्पादकता के साथ प्रतिक्रिया
देते है।
4.         स्वयं के व्यक्तित्व में विविधता रहती है।
5.         उनमें अदम्य ऊर्जा व शक्ति रहती है जिसे उचित दिशा व मार्गदर्शन की आवश्यकता
रहती है।
6.         यदि उन्हें सुरक्षित वातावरण व विश्वास मिले तो वह अधिगम हेतु जोखिम लेने में
तत्पर रहते है।
     उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम माध्यमिक कक्षा
के छात्रों (
11-16 वर्ष) हेतु प्रयुक्त साहित्य में निम्न विशेषताएँ देखते है-
1.         वह साहित्य जो उनकी सामाजिक, आर्थिक, नैतिक पृष्ठभूमि के समरूप हो। वह कोरी कल्पना पर आधारित न
हो।
2.         उसमें 21वीं शताब्दी के कौशलों का समावेश हो यथा समस्या निवारण,
निर्णय ले पाना, वैज्ञानिक प्रवृति आदि
3.         जिसमें बच्चे स्वयं के साथ संबंध बनाते हुए अपने प्रश्न,
जिज्ञासा, भाव को देख सके।     
4.     उन पर आर्दशवादी
जीवन जीने की शिक्षा न थौपी जाए
, वह चाहे तो सम्पूर्ण कथानक में वास्तविक स्वरूप में अवश्य
ही प्रकट हो सकती है। उन्हें बताया न जाए
, उन्हें दिखाया व अनुभव करवाया जाए।
5.         सामसामयिक समाज, विश्व के मुद्दों पर आधारित हो। बच्चे इस आयु में अपने
आप-पास की दुनिया की ख़बर रखते है।
6.         उनके भावात्मक, रागात्मक संबंधों की झाँकी उनमें लक्षित हो।
7.         इस तरह का साहित्य जो बालकों को आकर्षित करें व जुड़ने के विविध आयाम देता हो, जो उनके वास्तविक जीवन के आयामों से ही संबंधित हो।
           
   साहित्य शिक्षण  से जुड़े मुख्य बिंदु                   
 साहित्य हिंदी पाठ्यक्रम में एक सूचना,
विशिष्ट पाठ, लेखक व शब्दावली के ढाँचे के रूप में न हो कर एक जीवंत
परंपरा के रूप में हो जिसमें पाठक प्रवेश कर सकता है और उसे पुनः जीवित कर सकता
है। साहित्य एक अनुभव है
, सूचना मात्र नहीं है और पाठक को इसमें प्रतिभागी बनने के
लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए। पाठक की भूमिका साधारण रूप में बाह्य अवलोकनकर्ता
मात्र की नहीं होनी चाहिए।
पाठक को साहित्य अनुभव करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए,
उन्हें अनुमति हो कि वह चित्रण करें,
पाठ्य सामग्री से जुड़े, महसूस करें, विचार-मंथन करें ताकि वह साहित्य के साथ सामंजस्य स्थापित
कर सके व अपने जीवन में साहित्य के महत्त्व को महसूस कर सकें। लेकिन समस्या तो यह
है कि हम यह मानकर चलते है बच्चों को कुछ समझ नही आएगा और यह हमारा दायित्व है की
हम पाठ की व्याख्या करें आवश्यक यह है कि छात्र कुछ सामग्री का विशिष्ट/गहन अध्ययन
खुद करें जो निर्देशित भी हो सकता है व कुछ सामग्री का चुनाव और अध्ययन स्वतंत्र
रूप से भी करें। छात्रों को ऐेसे अवसरों की आवश्यकता होती है जिसमें वह साहित्य के
विशेष मुद्दों पर विश्लेषण/मंथन कर सकें जो उनके जीवन के भी विशेष मुद्दे हों।
दोनों ही उन्हें आनंद देंगें व समझ का विस्तार करेंगे। कोई भी पाठ बच्चों के लिए
तब तक बोझिल नही होता जब तक उन्हें उस पाठ में स्वंय की छवि दिखती रहे।
साहित्यिक शब्दावली का परिचय, साहित्यिक तकनीक आदि का प्रयोग कर पाना स्वयं में कोई अंत
नहीं है। भाषा के लक्षणों को पहचानना
, साहित्यिक शब्दावली में वर्णन व वर्गीकरण कर देना तब तक
निराधार है जब तक यह कोई बड़ा उद्देश्य पूर्ण न करें। विधा
, तकनीक का ज्ञान साहित्य की समझ के लिए आवश्यक हो सकता है
लेकिन अकेले उसका अस्तित्व अधूरा है। शिक्षकों को यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि
उनका उद्देश्य विधा आदि की तकनीक का शिक्षण मात्र नहीं है
, उनका दायित्व छात्रों और पाठ्य को बौद्धिक और भावनात्मकता
स्तर पर उत्पादक रूप के एक साथ लाना है।
शोध सार-    उपर्युकत कौशल का विकास  भी तभी संभव है जब इनको उद्वेलित करने योग्य
साहित्यिक अनुभवों का चयन किया जाए। भारतीय समाज/वैश्विक स्तर पर बाल जीवन को
केन्द्र में रखकर साहित्यिक रचनाएँ सुझाई जा सकती है। जिसमें
21वी सदी के परिप्रेक्ष्य में निर्णय लेने,
समयनियोजन, अन्वेषण, अपने व दुसरों के दृष्टिकोण को समझने की आवश्यकता,
समसामयिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, व नैतिक मुद्दों तथा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व घटना के पाठ
जिनका असर हमारी अवधारणा के निर्माण में किया जाता है। सामाजिक व पारिवारिक
संबंधों व दायित्वों
, अंतर्राष्ट्रीय चिंता के विषयों को केन्द्र में रखा गया है
। साहित्य शिक्षण के जरिए आज के परिवेश में बच्चों को अपने अनुभवों को पाठ से
जोड़ने का मौका दिया जाए और उस पर उनके साथ चर्चा के अवसर दिए जाएँ तो यह बच्चों के
विकास का और साथ ही समझकर पढ़ने का नायाब माध्यम बन जाता है।
            आज के समय में जहाँ छात्रों के पास समय व्यतित करने व ज्ञान
प्राप्त करने के विविध माध्यम है
, वहाँ बच्चों के लिए विशेषता किशोरावस्था के बालकों के लिए
साहित्य का चयन व शिक्षण भी उनके वास्तविक जीवन
, व संसार की अभिव्यक्ति वाला ही होना चाहिए। कहानियाँ उन
चीजों को कहने का रास्ता दिखाती है जिनके बारें में सामान्यता बोला नही जा सकता है
,
और ये  कहानियाँ
बच्चों को अपने आसपास की पेचीदगियों से निबटने में सहायता करने वाले औजार है।
बच्चें साहित्य के साथ तभी जुडंेगे जब उन्हें बहु-आयामी समझदारी से प्रस्तुत किया
जाए । बच्चों को पूर्व निर्धारित ढाँचे में उतार देना उनकी शक्तियों की संभावनाओं
का दमन है।


सन्दर्भ ग्रन्थ      
[i] द्विवेदी मुकुन्दः (2002) भाषा- विमर्श, हिन्दी अकादमी, दिल्ली   
[ii] प्रेमचंद (1967)  साहित्य का उद्देश्य ; हंस प्रकाशन, इलाहबाद
[iii]  देवसरे, हरिकृष्णः (2016) भारतीय बाल साहित्य, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
[iv] देवसरे,
हरिकृष्णः (2016) भारतीय बाल
साहित्य
,
साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
[v] Chall Jeannes (1983) From Ch-2 ” A Proposal For Reading stages” stages
of Reading Development New York, Mc Craw- Hill Book Company pp.9-24
[vi] रामपाल,
अनिता (मई-जून 2014) शिक्षा-विमर्श, दिगंतर, उकसाने वाले पाठ

[आलेख साभार: जनकृति, अंक 33, वर्ष 2018/ चित्र साभार: देशबंधु]

2016 से दस्तख़त नाम से पत्रिका का पुनः प्रकाशन होने जा रहा है: विमलेश त्रिपाठी

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487533 10208140142764291 8559336908703743767 n
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2003 में अनहद के नाम से पत्रिका प्रकाशित हुई थी। उसके बाद उसका कोई दूसरा अंक नहीं आया। 2016 से दस्तख़त नाम से पत्रिका का पुनः प्रकाशन होने जा रहा है। 
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( चेक Bimlesh Kumar Tripathi के नाम पर हो)
यह पोस्ट आपकी जानकारी के लिए है। आपके सुझाव व सहयोग का सदैव स्वागत है।
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12 प्रवासी साहित्यकारों पर प्रकाशित होनी वाली पुस्तक शृंखला की पहली पुस्तक श्री तेजेन्द्र शर्मा पर केंद्रित

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डॉ. रमा और महेंद्र प्रजापति जी के संपादन में लगभग 12 प्रवासी साहित्यकारों पर प्रकाशित होनी वाली पुस्तक शृंखला की पहली पुस्तक शीघ्र ही आप तक पहुंचेंगी। पहला भाग श्री तेजेन्द्र शर्मा पर केंद्रित है., जिसमें देश के प्रतिष्ठित आलोचक, प्राध्यापक एवं शोधार्थी लेखक के रूप में शामिल हैं. 

100 से अधिक हिंदी लेखकों का प्रधानमंत्री को खुला पत्र

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सेवा में,
श्री नरेन्द्र मोदी जी
माननीय प्रधान मंत्री,
भारत सरकार

विषय : भोजपुरी या हिन्दी की किसी भी अन्य बोली को संविधान की #आठवीं_अनुसूची में
शामिल न किया जाय.

10sep39U





महोदय,

हमारी हिन्दी आज टूटने के कगार पर है. निजी स्वार्थ के लिए कुछ लोगों ने भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग तेज कर दी है. भोजपुरी के कलाकार और दिल्ली से भाजपा के सांसद श्री मनोज तिवारी ने संसद और उसके बाहर भी यह माँग दुहराई है. जन भोजपुरी मंच नामक संगठन ने अपनी माँग के पक्ष में जिन 9 आधारों का उल्लेख किया है उनमें से सभी आधार तथ्यात्मक दृष्टि से अपुष्टअतार्किक और भ्रामक हैं. हिन्दी बचाओ मंच ने उनकी व्यापक छानबीन की है और उन सभी आधारों पर क्रमश: अपना पक्ष प्रस्तुत करता है.

1. भाषा विज्ञान की दृष्टि से भोजपुरी भी उतनी ही पुरानी है जितनी ब्रजीअवधीबुन्देलीछत्तीसगढ़ीहरियाणवीकुमायूंनी- गढ़वालीमगहीअंगिका आदि हिन्दी की अन्य बोलियाँ. क्या उन सबको आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाना संभव है?

2. भोजपुरी भाषियों की संख्या 20 करोड़ बताई गई है. यह कथन मिथ्या है. हिन्दी समाज की प्रकृति द्विभाषिकता की है. हम लोग एक साथ अपनी जनपदीय भाषा भोजपुरीअवधीब्रजी आदि भी बोलते हैं और हिन्दी भी. लिखने- पढ़ने का सारा काम हम लोग हिन्दी में करते हैइसीलिए राजभाषा अधिनियम 1976 के अनुसार हमें ’ श्रेणी में रखा गया है और दस राज्यों में बँटने के बावजूद हमें हिन्दी भाषी’ कहा गया है. वैसे 2001 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार भोजपुरी बोलने वालों की संख्या लगभग 3,30,99497 ही है.

3. स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले सिर्फ हम भोजपुरी भाषी ही नहीं थे. देश भर के लोगों ने स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया था. वैसे स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले अब संयोग से बचे नहीं हैं. वर्नावे अपने उत्तराधिकारियों की माँग से कत्तई सहमत नहीं होते. उन्होंने तो अंग्रेजों की गुलामी से पूरे देश की मुक्ति के लिए लड़ाई लड़ी जबकि ज.भो.मं. के लोग अपना घर बाँटने के लिए लड़ रहे हैं.

4. ज.भो.मं. के अनुसार भोजपुरी देशी भाषा है तो क्या हिन्दी देशी #भाषा नहीं हैक्या वह किसी अन्य देश से आई है?

5. ज.भो.मं. ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय सहित देश के कुछ विश्वविद्यालयों में भोजपुरी के पठन पाठन का जिक्र किया है. यह सूचना भ्रामक है. भोजपुरी हिन्दी का अभिन्न अंग हैवैसे ही जैसे राजस्थानीअवधीब्रज आदि और हम सभी विश्वविद्यालयों के हिन्दी- पाठ्यक्रमों में इन सबको पढ़ते-पढ़ाते हैं. हिन्दी इन सभी के समुच्चय का ही नाम है. हम कबीरतुलसीसूरचंदबरदाईमीरा आदि को भोजपुरीअवधीब्रजराजस्थानी आदि में ही पढ़ सकते हैं. हिन्दी साहित्य के इतिहास में ये सभी शामिल हैं. इनकी समृद्धि और विकास के लिए और भी प्रयास किए जाने चाहिए.

6. ज.भो.मं. ने मारीशस में भोजपुरी को सम्मान मिलने का तर्क दिया है. मारीशस में भोजपुरी को सम्मान मिलने से हिन्दी भी गौरवान्वित हो रही है. इससे अपने देश में भोजपुरी को मान नहीं मिल रहा- यह कैसे प्रमाणित हो सकता हैक्या घर बाँट लेना ही मान मिलना होता हैवैसे 2011 की जनगणना की रिपोर्ट अनुसार मारीशस की कुल आबादी बारह लाख छत्तीस हजार है जिसमें से सिर्फ 5.3 प्रतिशत लोग भोजपुरी भाषी है. यानीकिसी भी तरह यह संख्या एक लाख नहीं होगी.

7. क्या ज.भो.मं.मेडिकल और इंजीनियरी की पढ़ाई भोजपुरी में करा पाएगातमाम प्रयासों के बावजूद आज तक हम इन विषयों की पढ़ाई हिन्दी में करा पाने में सफल नहीं हो सके. ऐसी मांग करने वाले लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाते हैंखुद हिन्दी की रोटी खाते हैं और #मातृभाषा के नाम पर भोजपुरी को पढ़ाई का माध्यम बनाने की माँग कर रहे हैंताकि उनके आस पास की जनता गँवार ही बनी रहे और उनकी पुरोहिती चलती रहे.

8. भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से करोड़ों भोजपुरी भाषियों में आत्मगौरव नहींआत्महीनताबोध पैदा होगा. घर बँटने से हिन्दी भी कमजोर होगी और भोजपुरी भी

9. ज.भो.मं. का कहना है कि भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से हिन्दी को कोई क्षति नहीं होगी. हिन्दी को होने वाली क्षति का बिन्दुवार विवरण हम यहाँ दे रहे हैं.:–

संविधान की आठवीं अनुसूची में भोजपुरी के शामिल होने से हिन्दी को होने वाली क्षति –

1. भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से हिन्दी भाषियों की जनसंख्या में से भोजपुरी भाषियों की जनसंख्या (ज.भो.मं. के अनुसार 20 करोड़) घट जाएगी. मैथिली की संख्या हिन्दी में से घट चुकी है. स्मरणीय है कि सिर्फ संख्या-बल के कारण ही हिन्दी इस देश की राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित है. यदि यह संख्या घटी तो #राजभाषा का दर्जा हिन्दी से छिनते देर नहीं लगेगी. भोजपुरी के अलग होते ही ब्रजअवधीछत्तीसगढ़ीराजस्थानीबुंदेलीमगहीअंगिका आदि सब अलग होंगी. उनका दावा भोजपुरी से कम मजबूत नहीं है. रामचरितमानस’, ‘पद्मावत’, या सूरसागर’ जैसे एक भी ग्रंथ भोजपुरी में नहीं है.

2. ज्ञान के सबसे बड़े स्रोत विकीपीडिया ने बोलने वालों की संख्या के आधार पर दुनिया के सौ भाषाओं की जो सूची जारी की है उसमें हिन्दी को चौथे स्थान पर रखा है. इसके पहले हिन्दी का स्थान दूसरा रहता था. हिन्दी को चौथे स्थान पर रखने का कारण यह है कि सौ भाषाओं की इस सूची में भोजपुरीअवधीमारवाड़ीछत्तीसगढ़ीढूँढाढीहरियाणवी और मगही को शामिल किया गया है. साम्राज्यवादियों द्वारा हिन्दी की एकता को खंडित करने के षड़्यंत्र का यह ताजा उदाहरण है और इसमें विदेशियों के साथ कुछ स्वार्थांध देशी जन भी शामिल हैं.

3. हमारी मुख्य लड़ाई अंग्रेजी के वर्चस्व से है. अंग्रेजी हमारे देश की सभी भाषाओं को धीरे धीरे लीलती जा रही है. उससे लड़ने के लिए हमारी एकजुटता बहुत जरूरी है. उसके सामने हिन्दी ही तनकर खड़ी हो सकती है क्योंकि बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से वह आज भी देश की सबसे बड़ी भाषा है और यह संख्या-बल बोलियों के जुड़े रहने के नाते है. ऐसी दशा में यदि हम बिखर गए और आपस में ही लड़ने लगे तो अंग्रेजी की गुलामी से हम कैसे लड़ सकेंगे?

4. भोजपुरी की समृद्धि से हिन्दी को और हिन्दी की समृद्धि से भोजपुरी को तभी फायदा होगा जब दोनो साथ रहेंगी. आठवीं अनुसूची में शामिल होना अपना अलग घर बाँट लेना है. भोजपुरी तब हिन्दी से स्वतंत्र वैसी ही भाषा बन जाएगी जैसी बंगलाओड़ियातमिलतेलुगू आदि. आठवीं अनुसूची में शामिल होने के बाद भोजपुरी के कबीर को हिन्दी के कोर्स में हम कैसे शामिल कर पाएंगेक्योंकि तब कबीर #हिंदी के नहींसिर्फ भोजपुरी के कवि होंगे. क्या कोई कवि चाहेगा कि उसके पाठकों की दुनिया सिमटती जाय?

5. भोजपुरी घर में बोली जाने वाली एक बोली है. उसके पास न तो अपनी कोई #लिपि है और न मानक व्याकरण. उसके पास मानक गद्य तक नहीं है. किस भोजपुरी के लिए मांग हो रही हैगोरखपुर कीबनारस की या छपरा की ?

6. कमजोर की सर्वत्र उपेक्षा होती है. घर बँटने से लोग कमजोर होते हैंदुश्मन भी बन जाते हैं. भोजपुरी के अलग होने से भोजपुरी भी कमजोर होगी और हिन्दी भी. इतना ही नहींपड़ोसी बोलियों से भी रिश्तों में कटुता आएगी और हिन्दी का इससे बहुत अहित होगा. मैथिली का अपने पड़ोसी अंगिका से विरोध सर्वविदित है.
7. संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को स्थान दिलाने की माँग आज भी लंबित है. यदि हिन्दी की संख्या ही नहीं रहेगी तो उस मांग का क्या होगा?

8. स्वतंत्रता के बाद हिन्दी की व्याप्ति हिन्दीतर भाषी प्रदेशों में भी हुई है. हिन्दी की संख्या और गुणवत्ता का आधार केवल हिन्दी भाषी राज्य ही नहींअपितु हिन्दीतर भाषी राज्य भी हैं. अगर इन बोलियों को अलग कर दिया गया और हिन्दी का संख्या-बल घटा तो वहाँ की राज्य सरकारों को इस विषय पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है कि वहाँ हिन्दी के पाठ्यक्रम जारी रखे जायँ या नहीं. इतना ही नहींराजभाषा विभाग सहित केन्द्रीय हिन्दी संस्थानकेन्द्रीय हिन्दी निदेशालय अथवा विश्व हिन्दी सम्मेलन जैसी संस्थाओं के औचित्य पर भी सवाल उठ सकता है.

मान्यवरभोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग भयंकर आत्मघाती है. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और स्व. चंद्रशेखर जैसे महान राजनेता तथा महापंडित राहुल सांकृत्यायन और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे महान साहित्यकार ठेठ भोजपुरी क्षेत्र के ही थे किन्तु उन्होंने भोजपुरी को मान्यता देने की मांग का कभी समर्थन नहीं किया. आज थोड़े से लोगअपने निहित स्वार्थ के लिए बीस करोड़ के प्रतिनिधित्व का दावा करके देश को धोखा दे रहे है.

अत: ‘#हिन्दी_बचाओ मंच’ के हम सभी सदस्य आपसे से विनम्र अनुरोध करते हैं कि-

कृपया हिन्दी की किसी भी बोली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल न करें और इस विषय में यथास्थिति बनाए रखें.
सधन्यवाद,

निवेदक : भारत के हम हिन्दी -लेखक :-
1. डॉ. अमरनाथप्रोफेसरक. वि. वि. तथा संयोजकहिन्दी बचाओ मंचकोलकातामो: 9433009898
2. प्रो. अच्युतानंद मिश्रपूर्व कुलपतिमा. च. पत्रकारिता विश्वविद्यालयभोपाल.
3. डॉ. अभिजीत सिंहआलोचक एवं संस्थापक सदस्यहिन्दी बचाओ मंचसिलीगुड़ी.
4. प्रो. अनंतराम त्रिपाठीप्रधानमंत्रीराष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समितिवर्धा.
5. प्रो. अरुण होताअध्यक्षहिन्दी विभागप.बं.रा.विश्वविद्यालयबारासात.
6. प्रो. अच्युतनपूर्व प्रोफेसरहिन्दी विभागकालीकट विश्वविद्यालयकालीकट.
7. प्रो. आलोक पाण्डेयप्रोफेसरहिन्दी विभागकेन्द्रीय विश्वविद्यालयहैदराबाद.
8. प्रो. आलोक गुप्ताप्रोफेसरहिन्दी विभागकेन्द्रीय विश्वविद्यालयगाँधीनगर.
9. डॉ. आशुतोषलेखक व संस्थापक सदस्यहिन्दी बचाओ मंचकोलकाता.
10. ओमप्रकाश पाण्डेयप्रतिष्ठित लेखक व संपादक, ‘नया परिदृश्य’, सिलीगुड़ी.
11. कविता वाचक्नवीप्रख्यात लेखिका व महासचिव, ‘विश्वंभरा’, हॉस्टन,टैक्सास.
12. प्रो.कमलकिशोर गोयनकाप्रख्यात लेखक व उपाध्यक्षके.हि.सं.आगरा.
13. कनक तिवारीप्रख्यात लेखकसामाजसेवी व वरिष्ठ अधिवक्ताहाई कोर्टबिलासपुर.
14. प्रो. करुणाशंकर उपाध्यायअध्यक्षहिन्दी विभागमुंबई विश्वविद्यालय.
15. डॉ. करुणा पाण्डेयप्रतिष्ठित लेखिकाकोलकाता.
16. प्रो. काशीनाथ सिंहसाहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात लेखकवाराणसी.
17. प्रो. कृष्णकुमार गोस्वामीप्रख्यात भाषावैज्ञानिक व लेखकदिल्ली.
18. डॉ.कैलाशचंद्र पंतप्रतिष्ठित लेखक व मंत्रीम.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समितिभोपाल.
19. प्रो.गंगाप्रसाद विमलप्रख्यात साहित्यकार व पूर्व प्रोफेसरजे.एन.यू. नई दिल्ली.
20. चित्रा मुद्गलव्यास सम्मान से सम्मानित कथाकारदिल्ली.
21. प्रो. चौथीराम यादवप्रख्यात लेखक व पूर्व प्रोफेसरबी.एच..यू.वाराणसी.
22. ज्योतिष जोशीप्रख्यात लेखक व संपादकललित कला अकादमीदिल्ली.
23. प्रो. जवरीमल्ल पारखप्रख्यात मीडिया समीक्षक व प्रोफेसरइग्नूनई दिल्ली.
24. डॉ. जवाहर कर्णावटप्रतिष्ठित लेखक व सहायक महाप्रबंधक (राजभाषा)मुंबई.
25. प्रो. जयप्रकाशप्रख्यात आलोचक एवं पूर्व प्रोफेसरचंडीगढ़ विश्वविद्यालय.
26. जय प्रकाश धूमकेतुप्रतिष्ठित लेखक व संपादक अभिनव कदम’, मऊनाथ भंजन.
27. जाबिर हुसेनबिहार विधान सभा के पूर्व अध्यक्ष व प्रख्यात लेखकपटना.
28. प्रो.जी. गोपीनाथनपूर्व कुलपतिम.गाँ.अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालयवर्धा.
29. जीवन सिंहसह सचिव अपनी भाषा’ एवं संस्थापक सदस्य हिन्दी बचाओ मंच’, कोलकाता.
30. प्रो.तंकमणि अम्मापूर्व हिन्दी विभागाध्यक्षकेरल विश्वविद्यालयतिरुवनंतपुरम.
31. डॉ. दामोदर खड़सेसाहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखकमुंबई.
32. प्रो. देवराजप्रख्यात लेखक तथा डीनम.गां.अं.हि.वि.विश्वविद्यालयवर्धा.
33. डॉ. देवेन्द्र गुप्तप्रसिद्ध लेखक व संपादक, ‘सेतु’ एवं विपाशा’, शिमला.
34. डॉ. देवसिंह पोखरियाप्रख्यात आलोचक एवं प्रोफेसरकुमायूं विश्वविद्यालयनैनीताल.
35. प्रो. नंदकिशोर पाण्डेयनिदेशककेन्द्रीय हिन्दी संस्थानआगरा.
36. डॉ. नरेश मिश्रप्रोफेसरहरियाणा केन्द्रीय विश्वविद्यालयमहेन्द्र गढ़.
37. डॉ. निर्मल कुमार पाटोदीलेखक व पूर्व निदेशक राजभाषामुंबई.
38. नीरज कुमार चौधरीशोधछात्रक.वि.वि. एवं संस्थापक सदस्यहिन्दी बचाओ मंचकोलकाता.
39. पंकज बिष्टप्रख्यात लेखक व संपादक समयांतर’, दिल्ली.
40. डॉ. परमानंद पांचालप्रसिद्ध लेखक व मंत्रीनागरी लिपि परिषददिल्ली.
41. पुष्पा भारतीप्रख्यात लेखिकाफ्लैट नं.-5शाकुन्तल साहित्य सहवासमुंबई.
42. डॉ. प्रकाशचंद्र गिरिप्रतिष्ठि कवि व एसो. प्रोफेसरएम.एल.के.कॉलेजबलरामपुरउ. प्र.
43. प्रो. प्रमोद कुमार शर्माअधिष्ठाताकला संकायनागपुर विश्वविद्यालय.
44. प्रेमपाल शर्माप्रख्यात भाषाविद्लेखक तथा पूर्व संयुक्त सचिवरेलवे बोर्डदिल्ली.
45. प्रभु जोशीप्रख्यात लेखक व चित्रकारइंदौर.
46. प्रो.पुष्पिता अवस्थीसुप्रसिद्ध लेखिका व कवयित्रीनीदरलैंड.
47. बलदेव बंशीप्रख्यात कवि – आलोचक व हिन्दी के योद्धाफरीदाबाद.
48. बीना बुदकीमंत्रीहिन्दी कश्मीरी संगमदिल्ली.
49. डॉ. बीरेन्द्र सिंहअसिस्टेंट प्रोफेसरस्काटिश चर्च कालेज व सदस्यहिन्दी बचाओ मंचकोलकाता.
50. बिजय कुमार जैनप्रख्यात पत्रकार व संयोजकहिन्दी वेलफेयर ट्रस्टमुंबई.
51. प्रो.बी.वै.ललिताम्बाप्रख्यात लेखिकाहिन्दी सेवी व पूर्व प्रोफेसरबंगलौर.
52. भारतेन्दु मिश्रप्रतिष्ठित लेखक व शिक्षाविद्दिल्ली.
53. प्रो.महावीर सरन जैनभाषाविद् व पूर्व निदेशकके. हि. सं. आगरा.
54. डॉ. महेश दिवाकरअध्यक्षअंतरराष्ट्रीय साहित्य कला मंचमुरादाबाद.
55. महेश जायसवालप्रख्यात नाटककार व संस्कृतिकर्मीकोलकाता.
56. महेश चंद्र गुप्तप्रख्यात हिन्दी सेवी व पूर्व निदेशक (राजभाषा)दिल्ली.
57. डॉ. एम. एल. गुप्ता आदित्यसंयोजकवैश्विक हिन्दी सम्मेलनमुंबई.
58. प्रो.एम.बेंकटेश्वरसमीक्षक व पूर्व प्रोफेसरउस्मानिया विश्वविद्यालयहैदराबाद.
59. प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंहप्रोफेसरहिन्दी विभागलखनऊ विश्वविद्यालयलखनऊ.
60. प्रो. रंजना अरगड़ेअध्यक्षहिन्दी विभागगुजरात विश्वविद्यालयअहमदाबाद.
61. रंजीत संकल्पसचिवबंगीय हिन्दी परिषद एव संस्थापक सदस्य हिन्दी बचाओ मंच’, कोलकाता.
62. प्रो. रमेश दवेप्रख्यात आलोचक एवं पूर्व प्रोफेसरभोपाल.
63. रमेश जोशीप्रतिष्ठित लेखक व प्रधान संपादक विश्वा’, ओहायो.
64. पद्मश्री रमेशचंद्र शाहव्यास सम्मान से सम्मानित प्रख्यात साहित्यकारभोपाल.
65. प्रो.रविभूषणप्रख्यात लेखक व पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्षराँची विश्वविद्यालयरांची.
66. प्रो. रवि श्रीवास्तवप्रख्यात आलोचक व पूर्व प्रोफेसरहिन्दीराजस्थान वि.वि. जयपुर.
67. रविप्रताप सिंहप्रतिष्ठित कवि व अध्यक्ष, ‘शब्दाक्षर’, कोलकाता.
68. डॉ. राजेन्द्रनाथ त्रिपाठीमंत्रीबंगीय हिन्दी परिषद्कोलाकाता.
69. राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेयप्रतिष्ठित लेखकवाराणसी.
70. डॉ. राजेन्द्र कुमारप्रख्यात लेखक व पूर्व प्रोफेसरइलाहाबाद विश्वविद्यालयइलाहाबाद.
71. प्रो. राजश्री शुक्लाअध्यक्षहिन्दी विभागकलकत्ता विश्वविद्यालयकोलकाता.
72. राजकिशोरप्रख्यात लेखक- पत्रकार एवं संपादक, ‘रविवार’, इंदौर.
73. डॉ. राजेन्द्रआलोचक व संस्थापक सदस्यहिन्दी बचाओ मंचकोलकाता.
74. राकेश पाण्डेयसंपादक, ‘प्रवासी संसार’, नई दिल्ली.
75. राहुल देवप्रख्यात पत्रकारदिल्ली.
76. डॉ. राधेश्याम शुक्लसंपादक, ‘भास्वर भारत’, हैदराबाद.
77. प्रो. रूपा गुप्ताप्रसिद्ध लेखिका व अध्यक्षहिन्दी विभागबर्दवान विश्वविद्यालय.
78. प्रो. रोहिणी अग्रवाललेखिका व अध्यक्षहिन्दी विभागम.द.विश्वविद्यालयरोहतक.
79. डॉ.ऋषिकेश रायप्रतिष्ठित कवि- आलोचक व उपनिदेशक(राजभाषा),टी.बोर्डकोलकाता.
80. प्रो.ऋषभदेव शर्माप्रतिष्ठित लेखक व संयुक्त संपादक, ‘भास्वर भारत’, हैदराबाद.
81. विश्वनाथ सचदेवप्रख्यात पत्रकारसंपादक नवनीत’ मुंबई.
82. विभूतिनारायण रायप्रख्यात लेखक व पूर्व कुलपति,म.गाँ.अं.हि.विश्वविद्यालयवर्धा.
83. प्रो.विजयकुमार मल्होत्राप्रख्यात लेखक व भाषाविद्दिल्ली.
84. डॉ. विजयबहादुर सिंहप्रख्यात आलोचक एवं पूर्व संपादक वागर्थ’, भोपाल.
85. विजय गुप्तप्रसिद्ध लेखक व संपादक साम्य’, अम्बिकापुरजिला- सरगुजाछ.ग.
86. डॉ. विमलेश कान्ति वर्माप्रख्यात भाषाविद व प्रोफेसरदिल्ली विश्वविद्यालय.
87. डॉ. विद्या विन्दु सिंहप्रतिष्ठित लेखिका व पू.सं.नि. उ. प्र. हिं. सं. लखनऊ.
88. डॉ. वेदप्रताप वैदिकप्रख्यात पत्रकारदिल्ली.
89. डॉ. वेद प्रकाश पाण्डेयप्रतिष्ठित लेखक व अवकाशप्राप्त प्राचार्यगोरखपुर.
90. डॉ.शंकरलाल पुरोहितप्रख्यात लेखक व अनुवादकभुवनेश्वर.
91. शकुंतला बहादुरप्रतिष्ठित लेखिकाकैलीफोर्निया.
92. शकुन त्रिवेदीसंपादक, ‘द वेक’, कोलकाता.
93. शची मिश्राभोजपुरी की प्रतिष्ठित लेखिकापुणे.
94. प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्माअध्यक्षहिन्दी विभागविक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन.
95. श्रीमती शान्ता बाईसचिवकर्णाटक महिला हिन्दी सेवा समितिबंगलौर.
96. श्रीधर बर्वेप्रतिष्ठित लेखक व पूर्व प्राचार्यइंदौर.
97. प्रो. श्रीभगवान सिंहप्रख्यात लेखक व प्रोफेसरभागलपुर विश्वविद्यालय.
98. डॉ. श्रीनिवास शर्माप्रख्यात आलोचक संस्थापक सदस्यहिन्दी बचाओ मंचकोलकाता.
99. प्रो. एस.एम. इकबालराष्ट्रपति द्वारा सम्मानित हिन्दी लेखकविशाखापत्तनम्
100. प्रो. सोमा बंद्योपाध्यायप्रतिष्ठित लेखिका एवं कुलसचिवकलकत्ता विश्वविद्यालय.
101. प्रो. संजीव कुमार दुबेअध्यक्षहिन्दी विभागकेन्द्रीय विश्वविद्यालय गाँधीनगर.
102. प्रो. एस. शेषारत्नम् पूर्व प्रोफेसरआंध्रा विश्वविद्यालयविशाखापत्तनम्.
103. प्रो.सुधीश पचौरीप्रख्यात लेखक व पूर्व प्रतिकुलपतिदिल्ली विश्वविद्यालय.
104. प्रो. सदानंद गुप्तप्रतिष्ठित लेखक व पूर्व प्रोफेसरगोरखपुर विश्वविद्यालय.
105. डॉ.सत्यप्रकाश तिवारीसंस्थापक सदस्यहिन्दी बचाओ मंचकोलकाता.
106. प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षितसंयोजक हिन्दीसाहित्य अकादमीदिल्ली.
107. प्रो. सुरेन्द्र दुबेप्रतिष्ठित लेखक व कुलपतिबुन्देलखंड विश्वविद्यालयझांसी.
108. स्नेह ठाकुरप्रतिष्ठित लेखिका व संपादक वसुधा’, टोरंटोकनाडा.
109. सुरेशचंद्र शुक्लप्रतिष्ठित लेखक व संपादक ‘Speil दर्पण’, नार्वे.
110. सुशील कुमार शर्माप्रोफेसरहिन्दी विभागमिजोरम विश्वविद्यालय.
111. प्रो. हरिमोहनकुलपतिजे. एस. विश्वविद्यालयशिकोहाबादफिरोजाबाद.
112. प्रो. हरिमोहन बुधौलियापूर्व हिन्दी विभागाध्यक्षविक्रम वि.वि.उज्जैन.
113. क्षमा शर्माप्रतिष्ठित लेखिकादिल्ली.

संपर्क : डॉ. अमरनाथ
प्रोफेसरहिन्दी विभागकलकत्ता विश्वविद्यालय एवं संयोजकहिन्दी बचाओ मंच
ईई-164/402सेक्टर-2साल्टलेककोलकाता-700091
ई-मेल : amarnath.cu@gmail.com, Mobile: 09433009898
साभार: हिंदी बचाओ मंच

हिंदी रिपोर्ताज साहित्य और कन्हैयालाल मिश्र का ‘क्षण बोले कण मुस्काए’

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हिंदी रिपोर्ताज साहित्य और कन्हैयालाल मिश्र का ‘क्षण बोले कण मुस्काए’

मनोज शर्मा

सारांश

रिपोर्ताज साहित्य की गणना हिंदी गद्य की नव्यतम विधाओं में की जाती है. द्वितीय विश्वयुद्ध के आसपास इस विधा का जन्म हुआ. रिपोर्ताज शब्द को अपने विदेशी (फ्रेंच) रूप में ही ज्यों का त्यों हिंदी में अपना लिया गया है. आरम्भ में इसे रिपोर्टाज लिखा जाता रहा है किन्तु धीरे-धीरे भारत में यह रिपोर्ताज के रूप में प्रयुक्त होने लगा. रिपोर्ताज पत्रकारिता की देन है. इसमें आँखों देखी या कानो सुनी सत्य घटनाओं को साहित्यिकता के साथ प्रस्तुत किया जाता है. वर्तमान में इसे साहित्य की महत्वपूर्ण विधा के रूप में देखा जाता है.कन्हैयालाल मिश्र’प्रभाकर’ हिंदी पत्रकारिता तथा हिंदी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार हैं. क्षण बोले कण मुस्काये कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का प्रसिद्ध रिपोर्ताज संग्रह है.जिसका रिपोर्ताज साहित्य में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण हिंदी साहित्य में उल्लेखनीय स्थान है.

बीज शब्द: रिपोर्ताज, गद्य ,क्षण, द्वितीय, विश्वयुद्ध ,नवीन, विधा, आधुनिक

मूल आलेख

हिंदी साहित्य का आधुनिक युग गद्य क प्रसव काल है जिसमें अनेक नयी विधाओं का चलन हुआ. इन विधाओं में कुछ तो सायास थीं और कुछ के गुण अनायास ही कुछ गद्यकारों के लेखन में आ गए थे. वास्तविक रूप में तो रिपोर्ताज का जन्म हिंदी में बहुत बाद में हुआ लेकिन भारतेंदुयुगीन साहित्य में इसकी कुछ विशेषताओं को देखा जा सकता है. उदाहरणस्वरूप, भारतेंदु ने स्वयं जनवरी, 1877 की ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ में दिल्ली दरबार का वर्णन किया है, जिसमें रिपोर्ताज की झलक देखी जा सकती है. रिपोर्ताज लेखन का प्रथम सायास प्रयास शिवदान सिंह चौहान द्वारा लिखित ‘लक्ष्मीपुरा’ को मान जा सकता है. यह सन् 1938 में ‘रूपाभ’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ. इसके कुछ समय बाद ही ‘हंस’ पत्रिका में उनका दूसरा रिपोर्ताज ‘मौत के खिलाफ ज़िन्दगी की लड़ाई’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ. हिंदी साहित्य में यह प्रगतिशील साहित्य के आरंभ का काल भी था. कई प्रगतिशील लेखकों ने इस विधा को समृद्ध किया. शिवदान सिंह चौहान के अतिरिक्त अमृतराय और प्रकाशचंद गुप्त ने बड़े जीवंत रिपोर्ताजों की रचना की.

रांगेय राघव रिपोर्ताज की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ लेखक कहे जा सकते हैं. सन् 1946 में प्रकाशित ‘तूफानों के बीच में’ नामक रिपोर्ताज में इन्होंने बंगाल के अकाल का बड़ा मार्मिक चित्रण किया है. रांगेय राघव अपने रिपोर्ताजों में वास्तविक घटनाओं के बीच में से सजीव पात्रों की सृष्टि करते हैं. वे गरीबों और शोषितों के लिए प्रतिबद्ध लेखक हैं. इस पुस्तक के निर्धन और अकाल पीड़ित निरीह पात्रों में उनकी लेखकीय प्रतिबद्धता को देखा जा सकता है. लेखक विपदाग्रस्त मानवीयता के बीच संबल की तरह खड़ा दिखाई देता है.

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के रिपोर्ताज लेखन का हिंदी में चलन बढ़ा. इस समय के लेखकों ने अभिव्यक्ति की विविध शैलियों को आधार बनाकर नए प्रयोग करने आरंभ कर दिए थे. रामनारायण उपाध्याय कृत ‘अमीर और गरीब’ रिपोर्ताज संग्रह में व्यंग्यात्मक शैली को आधार बनाकर समाज के शाश्वत विभाजन को चित्रित किया गया है. फणीश्वरनाथ रेणु के रिपोर्ताजों ने इस विधा को नई ताजगी दी. ‘ऋण जल-धन जल’ रिपोर्ताज संग्रह में बिहार के अकाल को अभिव्यक्ति मिली है और ‘नेपाली क्रांतिकथा’ में नेपाल के लोकतांत्रिक आंदोलन को कथ्य बनाया गया है.

अन्य महत्वपूर्ण रिपोर्ताजों में भंदत आनंद कौसल्यायन कृत ‘देश की मिट्टी बुलाती है’, धर्मवीर भारती कृत ‘युद्धयात्रा’ और शमशेर बहादुर सिंह कृत ‘प्लाट का मोर्चा’ का नाम लिया जा सकता है.

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि अपने समय की समस्याओं से जूझती जनता को हमारे लेखकों ने अपने रिपोर्ताजों में हमारे सामने प्रस्तुत किया है. लेकिन हिंदी रिपोर्ताज के बारे में यह भी सच है कि इस विधा को वह ऊँचाई नहीं मिल सकी जो कि इसे मिलनी चाहिए थी.

(1) रिपोर्ताज हिन्दी की ही नहीं, पाश्चात्य साहित्य की भी नवीनतम विधा है. (2) इसका जन्म साहित्य और पत्रकारिता के संयोग से हुआ है. (3) रिपोर्ताज घटना का आँखों देखा हाल होता है. (4) इसमें कुछ घटनाओं के सूक्ष्म निरीक्षण के आधार पर मनोवैज्ञानिक विवेचन तथा विश्लेषण होता है.

रिपोतार्ज: अर्थ एवं परिभाषा 

रिपोर्ताज शब्द फ्रेंच शब्द है यह हिंदी में उतना ही प्रचलित हो गया है जितना यूरोपीय समाज में रिपोर्ताज रिपोर्ट का ही विस्तार है. रिपोर्ताज में रिपोर्ट की भांति ही क्यों हुआ,कब हुआ,कैसे हुआ,क्या हुआ जैसे ही प्रश्नों के उत्तर है साथ ही विस्तार और विश्लेषण भी है.रिपोर्ट आज पढ़कर कल नहीं पढ़ी जाती उसमे नयापन या रोचकता नहीं होती लेकिन रिपोर्ताज में विश्लेषण विस्तार और कल्पनाशीलता के कारण रोचकता बनी रहती है इसलिए उसे बार बार पढ़ा जा सकता है. हिंदी साहित्यकोश में इसे परिभाषित किया है कि ‘रिपोर्ट के कलात्मक और साहित्यिक रूप को ही रिपोर्ताज कहते हैं. वास्तविक घटनाओं का ज्यों का त्यों रख देना रिपोर्ट है जबकि उन्हीं वास्तविक घटनाओं में कलात्मकता का रंग भरकर रचनाकार उसे रिपोर्ताज बना देता है.रिपोर्ताज घर पर बैठकर किसी घटना का अनुमान लगाकर नहीं लिखा जा सकता.इसके लिए रचनाकार का घटना का प्रत्यक्षदर्शी होना आवश्यक है जब वह उस वास्तविक घटना में अपनी गहन संवेदना,सजीवता रोमांच विश्वसनीयता और प्रभाव से जोड़ता है. तात्पर्य यह है कि रिपोर्ताज ऐसी ‘रिपोर्ट’ है जिसमें साहित्यिकता एवं कलात्मकता का समावेश हो.’रिपोर्ताज का स्वरूप’घटनापरक होते हुए भी सृजनात्मक एवं साहित्यिक है.

यह गद्य में लेखन की एक विशिष्ट शैली है. रिपोर्ताज से आशय इस तरह की रचनाओं से है जो पाठकों को किसी स्थान, समारोह, प्रतियोगिता, आयोजन अथवा किसी विशेष अवसर का सजीव अनुभव कराती हैं. गद्य में पद्य की सी तरलता और प्रवाह रिपोर्ताज की विशेषता है. अच्छा रिपोर्ताज वह है जो पाठक को विषय की जानकारी भी दे और उसे पढ़ने का आनन्द भी प्रदान करे. रिपोर्ताज की एक बड़ी विशेषता इसकी जीवन्तता होती है. गतिमान रिपोर्ताज पाठक को बांध लेता है. पाठक उसके प्रवाह में बंध कर खुद ब खुद विषय से जुड़ जाता है. इसलिए रिपोर्ताज लेखन में इस बात का खास ध्यान रखा जाना चाहिए कि उसमें दोहराव न हो और जानकारियों का सिलसिला बना रहे. रिपोर्ताज लेखक को विषय-वस्तु की बारीक जानकारी होनी चाहिए. विषय से जुड़ी छोटी-छोटी जानकारियां ही रिपोर्ताज को रोचक बनाती है.

रिपोर्ताज reportage की भाषा शैली में कथा-कहानी जैसा प्रवाह और सरलता होनी चाहिए. रिपोर्ताज मूलतः फ्रांसीसी भाषा का शब्द है जो अंग्रेजी के रिपोर्ट शब्द से विकसित हुआ है. रिपोर्ट का अर्थ होता है किसी घटना का यथातथ्य वर्णन. रिपोर्ताज इसी वर्णन का कलात्मक तथा साहित्यिक रूप है. रिपोर्ताज घटना प्रधान होते हुए भी कथा तत्व से परिपूर्ण होता है. एक तरह से रिपोर्ताज लेखक को पत्रकार और साहित्यकार, दोनों की भूमिकाएं निभानी होती हैं.

‘रिपोर्ताज’ का अर्थ एवं उद्देश्य

जीवन की सूचनाओं की कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए रिपोर्ताज का जन्म हुआ. रिपोर्ताज पत्रकारिता के क्षेत्र की विधा है. इस शब्द का उद्भव प्रफांसीसी भाषा से माना जाता है. इस विधा को हम गद्य विधाओं में सबसे नया कह सकते हैं. द्वितीय विश्वयुद्ध के समय यूरोप के रचनाकारों ने युद्ध के मोर्चे से साहित्यिक रिपोर्ट तैयार की. इन रिपोर्टों को ही बाद में रिपोर्ताज कहा गया. वस्तुतः यथार्थ घटनाओं को संवेदनशील साहित्यिक शैली में प्रस्तुत कर देने को ही रिपोर्ताज कहा जाता है.

रिपोर्ताज गद्य-लेखन की एक विधा है. रिपोर्ताज फ्रांसीसी भाषा का शब्द है. रिपोर्ट अंग्रेजी भाषा का शब्द है. रिपोर्ट किसी घटना के यथातथ्य वर्णन को कहते हैं. रिपोर्ट सामान्य रूप से समाचारपत्र के लिये लिखी जाती है और उसमें साहित्यिकता नहीं होती है.रिपोर्ट के कलात्मक तथा साहित्यिक रूप को रिपोर्ताज कहते हैं.वास्तव में रेखाचित्र की शैली में प्रभावोत्पादक ढंग से लिखे जाने में ही रिपोर्ताज की सार्थकता है.आँखों देखी और कानों सुनी घटनाओं पर भी रिपोर्ताज लिखा जा सकता है.कल्पना के आधार पर रिपोर्ताज नहीं लिखा जा सकता है. घटना प्रधान होने के साथ ही रिपोर्ताज को कथातत्त्व से भी युक्त होना चाहिये. रिपोर्ताज लेखक को पत्रकार तथा कलाकार दोनों की भूमिका निभानी पडती है. रिपोर्ताज लेखक के लिये यह भी आवश्यक है कि वह जनसाधारण के जीवन की सच्ची और सही जानकारी रखे.तभी रिपोर्ताज लेखक प्रभावोत्पादक ढंग से जनजीवन का इतिहास लिख सकता है.

रिपोर्ताज की परिभाषा

महादेवी वर्मा का कहना है – “रिपोर्ट या विवरण से संबंध रिपोर्ताज समाचार युग की देन है और उसका जन्म सैनिक की खाईयों में हुआ है.” रिपोर्ताज का विकास रूस में हुआ. द्वितीय विश्व युद्ध के समय इलिया एहरेन वर्ग को रिपोर्ताज – लेखक के रूप में विशेष प्रसिद्धि मिली.

डॉ.भागीरथ मिश्र ने रिपोर्ताज को परिभाषित करते हुए लिखा है – “किसी घटना या दृश्य का अत्यंत विवरणपूर्ण सूक्ष्म, रोचक वर्णन इसमें इस प्रकार किया जाता है कि वह हमारी आंखों के सामने प्रत्यक्ष हो जाए और हम उससे प्रभावित हो उठें.”

कोई भी निबंध, कहानी, रेखाचित्र या संस्मरण पत्रकारिता से संपृक्त होकर रिपोर्ताज का स्वरूप ग्रहण कर लेता है. साहित्यिकता इसका अनिवार्य तत्व है. रेखांकित एवं रिपोर्ट का समन्वित रूप रिपोर्ताज को जन्म देता है क्योंकि रेखाचित्र साहित्यिक विधा है.

रिपोर्ताज का विवेचन करते हुए शिवदान सिंह चौहान ने लिखा है – “आधुनिक जीवन की द्रुतगामी वास्तविकता में हस्तक्षेप करने के लिए मनुष्य को नई साहित्यिक रूप विधा को जनम देना पड़ा. रिपोर्ताज उन सबसे प्रभावशाली एवं महत्वपूर्ण विधा है.”

  1. रिपोर्ताज में तथ्यों के साथ भाव प्रवणता होती है.
  2. रिपोर्ताज का स्वरूप कलापूर्ण होता है. लेखक यथार्थ विषय को कल्पना के माध्यम से साहित्यिक परिवेश में प्रस्तुत करता है.
  3. रिपोर्ताज में मुख्य विषयवस्तु घटना होती है. घटना का काल्पनिक अथवा यथार्थपरक होना लेखक पर निर्भर करता है. घटना को कथात्मक रूप में प्रस्तुत किया जाता है.
  4. इस विधा की कोई सीमा नहीं होती.
  5. रिपोर्ताज में बाह्य स्वरूप की अभिव्यक्ति अधिक और आंतरिक स्वरूप की अभिव्यक्ति कम होती है.
  6. जन-जीवन की प्रभावकारी परिस्थिति का चित्रण होने के साथ ऐतिहासिकता के लिए प्रमाण भी अपेक्षित है.
  7. रिपोर्ताज लेखक का उद्देश्य वस्तुगत तथ्यों को प्रभावपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त करना होता है.
  8. रिपोर्ताज लेखक साहित्यिक लेखनी को हाथ में लेकर जागरूक बौद्धिकता के साथ यथार्थ जगत् से संपर्क किये रहता है.
  9. रिपोर्ताज का प्रभाव सीमित होता है. सम-सामयिक विषय और घटनाओं पर आधारित होने के कारण इसका प्रभाव सार्वजनीन नहीं रहता है.
  10. लेखक का दृष्टिकोण मनोविश्लेषणात्मक होता है.
  11. भाषा में सरलता, सहजता, सुबोधता, सजीवता एवं सरसता होना आवश्यक होता है.

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ के रिपोर्ताज

रिपोर्ताज लेखन में कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ को काफी सफलता मिली है.मिश्र जी कुशल पत्रकार के साथ-साथ साहित्यिक मर्मज्ञ भी थे. वो जैसा देखते हैं वैसा ही काग़ज़ पर उतारने की कला भी जानते हैं. हिंदी रिपोर्ताजकारो में डॉ रांगेय राघव के बाद यदि किसी रिपोर्ताजकार पर दृष्टि ठहरती है तो वे पं कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ही हैं. हिंदी रिपोर्ताज के जन्म से ही रिपोर्ताज लिखते चले जा रहें हैं और इतना ही क्यों, हिंदी रिपोर्ताज के एक तरह से वे जन्मदाता ही कहे जाएँ ,तो अत्युक्ति न होगी. रिपोर्ताज साहित्य में उनका प्रसिद्ध रिपोर्ताज संग्रह ‘क्षण बोले कण मुस्काए’ काफी उल्लेखनीय हैं जिसमें उनके 26 प्रसिद्ध रिपोर्ताज हैं. कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर की चुटीली भाषा रिपोर्ताज में नयी जान फूंक देती है जिसके कारण रिपोर्ताज में आरंभ से अंत तक रोचकता बनी रहती है. क्षण बोले कण मुस्काए रिपोर्ताज संग्रह में ’वे सुनते ही नहीं’, ‘कुंभ महान’,‘रोबर्ट नर्सिंग होम’, ‘ऊपर की बर्थ पर’,’अपने भंगी भाइयों के साथ’,’लाल किले की ऊँची दीवार से’,’मस्जिद की मीनारे बोली’ और ‘पहाड़ी रिक्शा’ आदि उनके प्रमुख रिपोर्ताज हैं.

बहुत कम कथा-कृतियाँ ऐसी होती हैं जो अपने यथार्थवादी स्वरूप एवं समाज की अनेक परतों को बारीकी से चित्रित करते हुए इतना कलात्मक, शैली और शिल्प के स्तर पर बहुबिध प्रयोगधर्मा एवं सर्जनशीलता का अनूठा स्वरूप रखती हों. प्रायः रचनाओं में यथार्थवादी आग्रह के कारण उनका रचनात्मक या साहित्यिक पक्ष गौण हो जाता है और वे यथार्थ का विवरण मात्र बनकर रह जाती हैं.दूसरी तरफ कलात्मक सृजनशीलता में यथार्थवादी पक्ष कमजोर हो जाता है.

प्रभाकर जी के रिपोर्ताजों में भारत के राष्ट्रीय संग्राम में, गांधी युग के सत्याग्रह काल की,अद्मय जिजीविषा मिलती है. वे राष्ट्रीय स्वाधीनता संघर्ष में सन 1930,1932 और 1942 में तीन बार जेल गए. सन 1930 से ही रिपोर्ताज लिखने की इच्छा उनमें जागी- और उनके अनेक ऐसे रिपोर्ताज हैं जिनमें देश की चिंता प्रधान है.मिश्र जी के रिपोर्ताज अपने समय के सांस्कृतिक, सामाजिक परिवेश के दर्पण है. रिपोर्ताज के तत्वों और विशेषताओं में यथातथ्यता ,जीवंतता तथा कलात्मकता को कन्हैयालाल मिश्र’प्रभाकर’ ने विशेष रूप से अपनाया है. किसी घटना को नितांत सत्य एवं निष्पक्ष रूप से चित्रित करने में प्रभाकर जी ने विशेष कौशल का परिचय दिया है.

इनकी रचनाओं में कलागत आत्मपरकता, चित्रात्मकता और संस्मरणात्म्कता को ही प्रमुखता प्राप्त हुई है. पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रभाकर जी को अभूतपूर्व सफलता मिली.पत्रकारिता को उन्होंने स्वार्थसिद्धि का साधन नहीं बनाया है, वरन उसका उपयोग उच्च मानवीय मूल्यों की स्थापना में ही किया. प्रभाकर हिन्दी के श्रेष्ठ रेखाचित्रों, संस्मरण एवं ललित निबन्ध लेखकों में हैं. यह दृष्टव्य है कि उनकी इन रचनाओं में कलागत आत्मपरकता होते हुए भी एक ऐसी तटस्थता बनी रहती है कि उनमें चित्रणीय या संस्मरणीय ही प्रमुख हुआ है- स्वयं लेखक ने उन लोगों के माध्यम से अपने व्यक्ति को स्फीत नहीं करना चाहा है. उनकी शैली की आत्मीयता एवं सहजता पाठक के लिए प्रीतिकर एवं हृदयग्राहिणी होती है. कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर की सृजनशीलता ने भी हिन्दी साहित्य को व्यापक आभा प्रदान की. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने उन्हें ‘शैलियों का शैलीकार’ कहा था. कन्हैयालाल जी ने हिन्दी साहित्य के साथ पत्रकारिता को भी व्यापक रूप से समृद्ध किया.

मिश्र जी की भाषा अद्भुत प्रवाह और स्वाभाविकता लिए हुए है. इनके वाक्य-विन्यास में भी विविधता है.इस कारण इनकी भाषा में कहीं-कहीं अंग्रेजी तथा उर्दू के बोलचाल के शब्द प्रयुक्त हुए है.शब्दों की चमत्कार प्रस्तुति,भावानुकूल वाक्य-विन्यास और सुंदर उक्तियाँ इनकी भाषा को अत्यंत आकर्षक बनाती है.जैसे

“घर पहंचते ही देखा. श्रीमतीजी प्रतीक्षा में खड़ी किवाड़ के पीछे झाँक रही है.मुझे यह बात कुछ अच्छी न लगी.रुपया लौंगा, तो दे ही दूंगा. इस तरह भूत बनकर पीछे पड़ने की क्या ज़रूरत? भीतर पैर रखते ही सवाल की टॉप मेरे सामने थी,” ले आये रुपये”मेरे सरे शारीर में आग लग गयी.न मेरे स्वास्थ की चिंता, न परेशानी की. मरता-मरता अभी आकर खड़ा भी नहीं हुआ कि वही रुपये का सवाल.सह्रदयता का तो इस दुनिया में जैसे दिवाला निकल गया है.”एक दिन की बात(पृष्ठ 37)

इन्होने शब्दों की लाक्षणिक शक्ति का प्रचुरता से प्रयोग किया है.साधारण शब्दों को भी इन्होने नया अर्थ, नई भंगिमा देकर भाषा पर अपना अधिकार जताया है.मिश्र जी की भाषा में मुहावरों तथा उक्तियों का सहज प्रयोग हुआ है. इनके छोटे-छोटे एवं सुसंगठित वाक्यों में सूक्ति की-सी संक्षिप्तता और अर्थ-गाम्भीर्य है.संक्षेप में मिश्र जी ने हिंदी की गद्य की नयी शैली प्रदान की है.

प्रभाकर हिन्दी के श्रेष्ठ रेखाचित्रों, संस्मरण एवं ललित निबन्ध लेखकों में हैं. यह दृष्टव्य है कि उनकी इन रचनाओं में कलागत आत्मपरकता होते हुए भी एक ऐसी तटस्थता बनी रहती है कि उनमें चित्रणीय या संस्मरणीय ही प्रमुख हुआ है- स्वयं लेखक ने उन लोगों के माध्यम से अपने व्यक्ति को स्फीत नहीं करना चाहा है. उनकी शैली की आत्मीयता एवं सहजता पाठक के लिए प्रीतिकर एवं हृदयग्राहिणी होती है. कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर की सृजनशीलता ने भी हिन्दी साहित्य को व्यापक आभा प्रदान की. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने उन्हें ‘शैलियों का शैलीकार’ कहा था. कन्हैयालाल जी ने हिन्दी साहित्य के साथ पत्रकारिता को भी व्यापक रूप से समृद्ध किया.

‘क्षण बोले कण मुस्काए’मिश्र जी की प्रमुख कृति है जिसमें मूलत: रिपोर्ताज संग्रह हैं.मानव मन में निरंतर चलते चिन्तन का वर्णन जितना अच्छा इस रचना में देखने को मिलता है उतना हिंदी में अन्यत्र देखने को नहीं मिलता.अत: ‘क्षण बोले कण मुस्काए’ नामक कृति हिंदी रिपोर्ताजों के विविध आयामों को समाहित किये हुए है. संग्रह के कुछ रिपोर्ताजों ‘अब हम स्वतंत्र हैं’, ‘मस्जिद की मीनारे बोली’ ,‘लाल किले की ऊँची दीवार से’ आदि जैसे ऐतिहासिक –राजनैतिक रिपोर्ताजों में लेखक की तत्कालीन राजनैतिक जागरूकता और इन सम्यक दृष्टिकोण का परिचय मिलता है. इस प्रकार की राजनैतिक उथल-पुथल को लेखक देखता है और उसे देखे गए को चिंतन से मथकर उसके मक्खन को पाठकों के सम्मुख उपस्थित कर देता है. इसे एक उदाहरण के माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है.

“अंग्रेजो के साथ ही वहां सैकड़ों हिन्दुस्तानी स्त्री-पुरुष भी थे. इनमें खद्दरवाला तो अकेला मैं ही था- बाकी सब अंग्रेजों के गोद लिए बेटे थे. ये सभी सुखी समृद्ध थे.इसका सुख और उनकी समृद्धि, उनकी वेश-भूषा और यहाँ उपस्थिति ही स्पष्ट थी.फिर भी उनमें अंग्रेजों-सी प्रसन्नता न थी.

अचानक मेरा ध्यान इस बात पर गया की यहाँ दो जातियों के मनुष्य हैं. एक वह,जिसमें अभी-अभी भारत में अपना राज्य खोया और एक वह जिसने अभी-अभी भारत में अपना राज्य पाया. मैं दोनों को गौर से देख रहा हूँ और सोच रहा हूँ की न तो खाने वाले में दीनता ही है,न पाने वाले में गौरव?”

‘अब हम स्वतंत्र हैं (पृष्ठ-10)

मिश्र जी के रिपोर्ताजों में व्यंग्य है जिसे पाठक अनुभव करता है. ‘पहाड़ी रिक्शा’ के रिक्शाचालकों के प्रति वो सच्ची संवेदना रखते हैं. मिश्र जी की दृष्टि इतनी सूक्ष्म है कि मेले की छोटी से छोटी बात भी उनकी दृष्टि से छिपी नहीं रही है. वह भंगड़ साधुओं की टोली का गुरमन्त्र ‘चिलम चमेली’ फूँक दे ठेकेदार की हवेली’ को भी ठहर कर बहुत ध्यान देकर सुनता है और कथावाचक पंडित जी के इर्दगिर्द चुपचाप खड़ी उस भीड़ को भी देखता है जो पंडित जी का एक भी शब्द न सुनने के वावजूद वहां से हटती नहीं है.

पंo कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि उन्होंने ऐतिहासिक, सामाजिक धार्मिक एवं सांकृतिक आदि विविध विषयों पर रिपोर्ताज लिखे हैं उसमें सामजिक जागरूकता भी है. एक और जहाँ इतिहास के प्रति लगाव है तो वहीँ दूसरी और उज्ज्वल भविष्य के प्रति दृढ आस्था परिलक्षित होती है. अपने रिपोर्ताजों में जहाँ उन्होंने बड़े-बड़े राजनैतिक नेताओं, महान धार्मिक संतों, प्रसिद्ध त्योहारों का वर्णन मिलता है वहीँ भंगियों, हरिजनों एवं अन्य पिछड़ी जाति के गुमनाम व्यक्तियों, छोटे से कस्बों के मेलों एवं अपने सहयात्रियों को भी अपना विषय बनाया है. लुच्चों, लफंगों,गवारों बंदरों तक पर उन्होंने रिपोर्ताज लिखे हैं. वस्तुत: जितनी विविधता उनकी विषयवस्तु में है, उतनी हिंदी के अन्य किसी रिपोर्ताजकार के साहित्य में नहीं.

निष्कर्ष कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’हिंदी रिपोर्ताज साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं. ‘क्षण बोले कण मुस्काये’में हर किस्म में रिपोर्ताज हैं जिनमें जीवन के हर रंग को देखा जा सकता है. रिपोर्ताज संग्रह में रचनाओं का रचना-काल भी दिया गया है.इनमें कुछ आज़ादी से पूर्व के रिपोर्ताज हैं तथा कुछ रिपोर्ताज बाद के हैं. रिपोर्ताजों में सर्वसुलभ भाषा का प्रयोग है.सभी रिपोर्ताज रोचक होने के साथ-साथ सार्थक सन्देश देने में सक्षम हैं. साहित्यिक दृष्टि से क्षण बोले कण मुस्काये काफी उल्लेखनीय कृति है.

संदर्भ सूची

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  2. वर्मा वीरपाल ,हिंदी रिपोर्ताज. कुसुम प्रकाशन ,1987 मुजफ्फर नगर
  3. वर्मा ,धीरेन्द्र ,हिंदी साहित्यकोश भाग-2
  4. चौहान शिवदान सिंह, साहित्यानुशीलन,अत्माराम & सन्स,1955, दिल्ली
  5. खन्ना शांति, आधुनिक हिंदी का जीवनीपरक साहित्य,सन्मार्ग प्रकाशन, 1973 दिल्ली
  6. चौहान रामगोपाल सिंह, हिंदी के गद्यकार और उनकी शैलियाँ,साहित्य रत्न भंडार, 1955 आगरा
  7. सिंहल ओमप्रकाश, गद्य की नई विधाएं,पीताम्बर पब्लिशिंग कम्पनी,1981 दिल्ली
  8. असद माजदा, गद्य की नइ विधाओं का विकास. ग्रन्थ अकादमी,1986, दिल्ली
  9. https://sarkariguider.com/kanhiyalal-prabhakar-mishra/
  10. https://bharatdiscovery.org/india/ कन्हैयालाल_मिश्र_प्रभाकर
  11. https://mycoaching.in/kanhiyalal-prabhakar-mishra-prabhakar
  12. http://govtjobmargdarshan.blogspot.com/2017/05/blog-post_92.html

शोधार्थी पी एच डी हिंदी

हिंदी विभाग-दिल्ली विश्वविद्यालय

सम्पर्क : 9868310402

ईमेल: mannufeb22@gmail.com

हरीश अरोड़ा कृत ‘महाप्रयाण’ एकांकी संग्रह : चेतना का नवीन स्वर

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हरीश अरोड़ा कृत ‘महाप्रयाण’ एकांकी संग्रह : चेतना का नवीन स्वर

डॉ. साक्षी

सत्यवती महाविद्यालय (सांध्य)

दिल्ली विश्वविद्यालय

ई.मेल- sakshi060188@gmail.com

शोध सार

‘महाप्रयाण’ भारतीय मनीषा की काल्पनिक और यथार्थ पृष्ठभूमि पर लिखा गया एक ऐसा एकाँकी संग्रह है जिसमें पौराणिक और ऐतिहासिक गाथाओं के माध्यम से भारत की राष्ट्रीय चेतना को अभिव्यक्ति दी गई है। इसे राष्ट्र की चिरंतन विचारणा को पौराणिक और ऐतिहासिक गाथाओं के उन पन्नों से उकेरा गया है जिसपर कुछ लिखा नहीं है। लेखन ने कथा की पृष्ठभूमि में उसी विचार को कल्पना द्वारा भारत की जीवंत चेतना का स्वरूपों प्रदान किया है। इस संग्रह के चारों एकाँकी भारत-बोध के एकाँकी हैं।

बीज शब्द : नाट्यशास्त्र, अखंड-राष्ट्र, मातृभूमि, जिजीविषा।

शोध आलेख

एकांकी का सम्बन्ध प्राचीन नाट्यशास्त्र से होते हुए भी वह स्वरुप में नाटक से भिन्न है। ‘एकांकी’ का अर्थ एक अंक वाला से है। अर्थात लेखक जिसमें एक अंक के अन्दर ही अपनी परिकल्पना को समावेशित करता है। “हिंदी एकांकी का उदय संस्कृत आदर्शों पर भारतेंदु युग में ही हो चुका था ….पर इसमें किसी सुनिश्चित शैली का पालन नहीं है … इसमें एक अंक के सम्बन्ध में कोई निश्चित धारणा नहीं मिलती, किन्तु एकांकी कला के कुछ महत्वपूर्ण तत्त्व अवश्य मिल जाते हैं।”1 “एक ही विचार (आइडिया) पर एकांकी नाटक की रचना हो सकी है। विचार के विकास के लिए जो संघर्ष (कनफ्लिक्ट)अनिवार्य है, उस संघर्ष के पूरे नाटक में कई पहलू दिखाए जा सकते हैं। पर एकांकी में सिर्फ एक पहलू।” 2

एक तरह से कहा जा सकता है की एकांकी में एक सुनिश्चित, सुकल्पित, एकलक्ष्य, संकलन-त्रय के साथ रंग संकेत, कथावस्तु, पात्र या चरित्र चित्रण, कथोपकथन, रस-भाव और उद्देश्य में पिरोया जाता है। “वर्तमान में एकांकी का शिल्प भिन्न है। स्वरुप, विषय और उद्देश्य सबमें परिवर्तन आया है।” 3

अभी तक के क्रम में एकांकी और नाटक संवेदना तथा शिल्प के कई आयाम तय कर चुका है। व्यष्टि-चेतना, समष्टि-चेतना, राष्ट्र-संस्कृति-राजनीति, लोकधर्मिता, मध्यवर्ग की विडम्बना और हास्य-व्यंग्य आदि – एक प्रकार से जीवन के लगभग सभी अंशों से जुड़ चुका है। इसी क्रम में हरीश अरोड़ा का एकांकी-लेखन राष्ट्रीय चेतना की खोई आवाज़ को पुनर्जीवित करने का कार्य करता है, विशेषकर- ‘महाप्रयाण’। ‘महाप्रयाण’ भारतेंदु के मुद्राराक्षस नाटक के विचार का विस्तार है । मुद्राराक्षस नाटक के केंद्र में राष्ट्र और समाज है इस एकांकी में इसी को लेकर बहस प्रस्तुत की गई है, एक असमाप्त-व्यापार (unfinished bussiness) । यह एक प्रकार का विस्तार है जो विचारधारात्मक विमर्श का आगामी पड़ाव है। आपने आर्यावर्त के स्वर्णिम इतिहास का पुनः स्मरण करवाया है, लेकिन जिसकी चेतना नवीन है। “कोई भी प्रतिभा संपन्न, प्राणवंत साहित्यकार अपने समय के ताप को अनुभव किये बिना रह नहीं सकता, और वह जो अनुभव करेगा तो उसके साहित्य में उसकी अभिव्यक्ति होगी ही।” 4 रचनाकार के कार्य से उसका समाज और समाज के कार्य से रचनाकार असम्पृक्त नहीं रह सकते । महाप्रयाण में इस बहस को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। रचनाकार के कृति का अंत कोई समाज से विलग नहीं हो सकता।

आज विचारों की जो टकराहट समाज और राजनीति में दिख रही है उसमें पूर्व व पश्चिम का सांस्कृतिक भेद स्पष्ट दृष्टव्य है । आज विकास के स्वरुप और धरातल पर चर्चा होती है। ऐसे में एक सजग विचारक अपनी अस्मिता और गौरव की खोज करे तो कुछ गलत नहीं। हमें परंपरा के किन अंशों को स्वीकारना है और किन विचारों को आयातित करना है यह गंभीर विषय है । हरीश अरोड़ा हमारे आदर्श इतिहास व मिथकों पर विचार कर संस्कृति के उन उज्जवल पक्ष की ओर पाठक का ध्यान केन्द्रित करना चाहते हैं जो भारतीय इतिहास का स्वर्णिम अध्याय रहा। वे इतिहास के माध्यम से मूल्यहीनता, विघटन, असंतोष को समसामयिक परिप्रेक्ष्य से समझने की कोशिश करते हैं। हर युग के परिवर्तन के पीछे एक घुटा हुआ इतिहास है जिससे मुक्ति दिलाकर मानवीय नैतिकता की स्थापना का लक्ष्य ही उन परिवर्तन की दिशा तय करता है। “राजनीतिक प्रगतिशीलता का काम नुस्खों से चल सकता है, पर साहित्यिक प्रगतिशीलता जीवन की गहराई में प्रवेश किये बिना नहीं आती।” 5

हरीश अरोड़ा ‘महाप्रयाण’ के अंतर्गत इतिहास से प्रेरणा स्रोत संगृहीत कर उनके उपेक्षित पक्षों तक के मंतव्यों में सन्निहित राष्ट्रीय दायित्व बोध की तरफ ध्यान इंगित करते हैं। इस संग्रह में कुल चार एकाँकी हैं- जिनकी विशेषता उनका राष्ट्रीय-सांस्कृतिक चेतना का स्वर है। ‘महाप्रयाण’ में मौर्य काल, ‘अर्धसत्य’ और ’त्यागपत्र’ में महाभारत काल, और ‘आत्मोत्सर्ग’ में रामायण काल और उनकी कथाओं के पीछे की मूल करवटों को लेकर मंथन किया गया है।

‘महाप्रयाण’ में गुप्त काल के स्वर्णिम इतिहास की परिपाटी दर्शायी गयी है । यह हमारे अतीत के गौरव गान का समय है। इसके अंतर्गत भारत का उदात्त जीवन-दर्शन, उन्नत भारतीय सभ्यता, धर्म के साथ दर्शन का श्रेष्ठ रूप, शीर्षस्थ राष्ट्र भक्ति जैसे भाव जिनका स्मरण मात्र भारतीय जन मानस में एक चिंगारी के सामान उर्जावान होता है, को आधारभूमि के रूप में प्रयोग किया गया है। राष्ट्रीय व जातीय स्वाभिमान के इतिहास को हरीश अरोड़ा ने अपने एकांकी का विषय चुना । इस काल में जड़ व्यवस्था का खंडन कर उचित लोकतांत्रिक-वरणीय-उर्जस्वित व्यवस्था का निर्माण हुआ। मानवीयता के साथ राष्ट्रीयता का स्वर तीव्र हुआ। एक विभक्त राजनीति के स्थान पर एकात्म की राजनीति का साक्षात्कार हुआ। “यदि व्यक्ति इतिहास बनाता है तो वहां मात्र व्यक्ति ही नहीं प्रत्युतर समष्टि की आकांक्षा का वह प्रतिनिधित्व भी होता है। समष्टि चाहे सुप्त दशा में ही क्यों न हो व्यक्ति उसके चरित्र की प्रेरिका होती है।” 6

‘महाप्रयाण’ में चाणक्य के अखंड-राष्ट्र के स्वप्न की पूर्ति हेतु नन्द वंश के अंत की रणनीति द्रष्टव्य है । अनुराग जो एकांकी का प्रमुख चरित्र है, जिसकी रचना का नाम है ‘महाप्रयाण’, उसकी रचना से आम जन जीवन में नवीन चेतना का संचार हुआ है। परन्तु स्वयं लेखक अनुराग इस ग्रन्थ के अंत को लेकर निश्चित व संतुष्ट नहीं है । एकांकी के अन्दर कई प्रश्न है । हिंसा-अहिंसा में कौन सी स्थिति वरणीय व उचित है, नैतिकता व मानवीयता की रक्षा कैसे हो – इसी मानसिक उद्वेलन से ग्रस्त है। वह यथार्थ और कल्पना के द्वंद्व में फंस जाता है। चन्द्रिका, सुकांत, सिद्धार्थक मानो उसे लक्ष्य तक ले जाने वाली कड़ी हैं। कल्पना की आधारभूमि हमारा देखा-सोचा-समझा यथार्थ ही है । यथार्थ और कल्पना का सापेक्षता सम्बन्ध है जिसका आभास अनुराग को समय-समय पर होता है। “महाकवि चेतो चेतो कल्पना ही जीवन है।” 7 और “मनुष्य का कर्म ही उसका यथार्थ है ।” 8

‘महाप्रयाण’ एकांकी में साहित्य का समाज व राजनीति से गहरा सम्बन्ध दर्शाया गया है। “सारा साहित्य अपने परिवेश में गढ़ा जाता है। यद्यपि कला के भक्त दावा करते हैं कि साहित्य विश्व की दिशा बदल सकता है, सच्चाई यह है राजनीति पहले आती है और साहित्य उसके अनुरूप बदलता है।” 9 हरीश अरोड़ा के इस संग्रह में भी राजनीति और साहित्य का यह सापेक्षता सम्बन्ध दिखता है जिसका स्वर आज का राजनीतिक परिप्रेक्ष्य भी है। विकल्प मौजूद है चयन दिशा निश्चित करेगा।

साहित्यिक और विचारधारात्मक मत अलग हो सकते है परन्तु उनमें लोक कल्याण व लोकचेतना का भाव अंतर्निहित होना चाहिए। वास्तव में साहित्य का यही उद्देश्य है। वे अनुराग को समझाते हैं कि उनकी रचना ‘महाप्रयाण’ “राष्ट्र की सम्पदा का एक अंश है और फिर तुमने जिन भावों को समाज में उनके हिताय बाँट दिया है, उन भावों को उनसे माँगने का अधिकार अब तुम्हें नहीं।” 10

एकांकी में राष्ट्रीय सुरक्षा, अखंड भारत, एकत्व की भावना मूल रूप में दृष्टिगत हुई है। विष्णुगुप्त का भी यही लक्ष्य था। “आचार्य मात्र नंदवंश का सर्वनाश नहीं करना चाहते …..वे नन्द वंश के साथ इस समाज में फलीभूत क्रूरता और निराशा को समाप्त करने का निश्चय कर चुके हैं।” 11 राष्ट्र भावना किसी भी अन्य निजी भावना से सर्वोपरि है। “देश की अखंडता का प्रश्न मनुष्य की इच्छाओं या उसकी समस्याओं से कहीं अधिक विशाल है।” 12 जन में राष्ट्र प्रेम का प्रसार और जीर्ण क्षीण भावनाओं से ऊपर उठाना, साथ ही सकारात्मक दिशा प्रेषित करना साहित्य का उद्देश्य है। ‘महाप्रयाण’ में हरीश अरोडा लिखते हैं- “राष्ट्र का हित जीवन जीने में नहीं जीवन समझने में है।” 13

हरीश अरोड़ा की दो एकांकी की पृष्ठभूमि भारतीय संस्कृति के महान ग्रन्थ ‘महाभारत’ पर सृजित है। ‘त्यागपत्र’ और ‘अर्धसत्य’ नामक दो एकांकी हैं जिसमें एक युद्ध से पहले और दूसरा युद्ध के बाद की स्थिति पर मत-मतान्तर प्रस्तुत किया गया है। ‘त्यागपत्र’ में एक ओर भीष्म और विदुर धृतराष्ट्र को कौरवों और पांडवों के विद्वेष से पैदा होने वाले भीषण जनसंहार व जान माल की हानि के प्रति सचेत कर रहे हैं । वह धृतराष्ट्र को चेता रहे हैं कि भविष्य की आधारशिला का बोझ राजा के कंधों पर ही होता है। एक राजा को राष्ट्र की चिंता पहले और स्व की चिंता बाद में होनी चाहिए। लोभ और स्वार्थ जनित महत्वाकांक्षा सम्पूर्ण राष्ट्र के नाश का कारण बनती है। “अपने कर्तव्यों से विचलित हुआ राजा नेत्रों के होते हुए भी नेत्रहीन होता है और अपने युग की विडंबनाओं का वही मूल आधार बनता है।” 14 विदुर समझाते हुए कहते है – “राजसिंहासन किसी की व्यक्तिगत सम्पदा नहीं है कि विनाशलीला के पश्चात मातृभूमि का सम्पूर्ण दायित्व युवराज दुर्योधन पर नहीं आप पर होगा।” 15 वहीँ दूसरी ओर दुर्योधन इन नीति वचनों से क्रुद्ध हो उनका विरोध करता है। दुर्योधन में बसा आत्माभिमान व कुंठा उसकी विचार दृष्टि को बाँध देता है।

एकांकी का आरम्भ ही अनहोनी की आशंका से होता है । “त्याग, पुण्य, सच- कोई नहीं बचा सकेगा कुरुवंश को……मैं केवल आशा करता हूँ , सत्य की आशा , पुण्य की आशा ,मानव धर्म के आदर्श का यथार्थ ।” 16 विदुर की नीति-बुद्धि इस अनहोनी को नही होने देना चाहती। वह इसकी संभावना को ही ख़त्म करना चाहते है और इसीलिए युवराज दुर्योधन के जीवन का अंत करने को तत्पर होते हैं । परन्तु राजा धृतराष्ट्र का अंधा मोह इसे अस्वीकार कर देता है। ऐसे में वह उस राजनीति तक का हिस्सा नहीं बनना चाहते जिसकी धुरी ही अनीति हो। “महाराज ! इस अमर्यादित जीवन जीने से कहीं अधिक उचित है, मैं अपने पद से त्यागपत्र दे दूँ। निर्णय आप पर है। युद्ध का प्रतिरोध, दुर्योधन की मेरे हाथों मृत्यु, अथवा महामंत्री का त्यागपत्र।” 17

ऐसे में कृष्ण का प्रवेश होता है और विदुर कृष्ण से निर्णय में सहयोग चाहते हैं। तब कृष्ण ही कहते हैं कि युद्ध एक अवश्यम्भावी सत्य है। वे युद्ध को रोकने का प्रयास भी कर चुके हैं लेकिन नियति उसी दिशा की ओर करवट ले चुकी हैं । “युद्ध तो अनिवार्य है क्यूंकि यही सत्य है, वही आदर्श है। युद्ध और कर्म की प्रतिबद्धता की प्रक्रिया से निकलने पर ही मनुष्य को यथार्थ की अनुभूति होती है।” 18

वह कहते हैं कि वह केवल आशा का एक रूप हैं ,सत्य का प्रकाश हैं जो आदर्श जीवन के स्थायित्व हेतु और अमर्यादित शक्तियों के क्षमन हेतु प्रयासरत हैं। देवता का अवतार लोकमंगल की स्थापना हेतु होता है। यही कर्म उनको देवत्व की स्थिति में पहुंचा महान बनाता है। प्रत्येक व्यक्ति में देवता व राक्षस दोनों का वास होता है । उसके कर्म उसकी वृत्ति का निर्धारण करते हैं ।

आज फिर से वही असुरक्षा का भाव, दानवी वृति, असंतोष -मानव व राष्ट्र में व्याप्त है, जो मानव को अपने सत्कर्म की और पुकार रहा है। आज भी संपत्ति हेतु अपनों में संघर्ष, लोभ, अहम्, भ्रष्टाचार,राजनीतिक असंतोष, सीमा सुरक्षा, लोकतंत्र का खतरे में होना, अवसरवाद, गिरती नैतिकता और मर्यादा, मानव समाज का बहुमुखी द्वंद्वात्मक संघर्ष -राष्ट्र के लिए प्रश्न बने हुए हैं। परन्तु इन सबसे बड़ी है मानव समाज की जिजीविषा जो संघर्ष का सामना कर शांति का पथ निर्माण करती है।

सन १९५५ में धर्मवीर भारती का सुप्रसिद्ध गीतिनाट्य ‘अँधा युग’ आया था और अब महाभारत के १८वे दिन के पश्चात की पृष्ठभूमि पर हरीश अरोड़ा का गीति एकांकी ‘अर्धसत्य’ साहित्य के क्षेत्र में आया है, एक नए आवरण में। हरीश अरोड़ा ने एकांकी साहित्य में एक नवीन प्रयोग किया है। अभी तक साहित्य की किसी भी विधा की आलोचना (समर्थन या विरोध) हेतु आलोचना या लेख विधा का उपयोग होता रहा है। अब इन्होंने कथा के उत्तर में इसकी आलोचना (समर्थन या विरोध) हेतु कथा-माध्यम का ही प्रयोग किया है। अतीत के नाटक के प्रसंग में एकांकी साहित्य का सृजन हिन्दी की परिपक्वता को बताता है। ‘अर्द्धसत्य’ में विभिन्न प्रसंग और संवाद में या शब्दावली की समानता के माध्यम से इसे सहज ही महसूस किया जा सकता है। यह एक प्रकार से अपनी ही परंपरा का पुनर्पाठ है।

हरीश अरोड़ा ने युद्धजनित अवसाद को एक सकारात्मक मानवीय जीजिविषा के रूप में ढाला है। संत्रास से ग्रसित पात्रों को एक सकारात्मक दिशा दी है । महाभारत एक ऐसा ग्रन्थ है जिसके प्रत्येक अंक में नैतिकता और अनैतिकता पर विचार के साथ संघर्ष व्याप्त है। महाभारत कोई एक दिन की घटना का नहीं अपितु इसके पार्श्व में क्रमशः उपजती कुंठा, अवसाद, द्वंद्व और प्रतिद्वंदिता का संघर्ष है जिसका प्रतिफलन युद्ध में हुआ। चाहे यह कुंठा पीढ़ियों की हो या समकालीनों से उपजी हुई, लेकिन टूटते मानवीय रिश्ते, आपसी द्वेष, नैतिकता और संस्कारों का विरोधाभासी स्वरुप, अधिकार भाव व शक्ति संचयन साथ में इन्हीं स्थितियों के चलते मतभेद का मनभेद में परिवर्तित होना-ही महाभारत है। ‘अर्धसत्य’ को युद्ध के बाद का शोक संवाद भी पुकार सकते हैं। गांधारी का केवल एक पुत्र युयुत्सु जीवित है लेकिन महाकाल की काली छाया से अपनों से घात करने के कारण उसे कोसती है। युयुत्सु के मन में बार-बार यही विचार उत्पन्न होता है कि इसका कारण क्या धर्म और नैतिकता का साथ देना था, जिस कारण स्वयं अपनी माँ तक की घृणा प्राप्त हो रही है । गांधारी उसे कुलनाशी व कुलघाती पुकारती स्वीकारती है।

“ घृणा मेरा फल है !

मेरे कर्मों का सार मिला क्या मुझे ?” 19

गांधारी की यह अवहेलना युयुत्सु में अपराधबोध के साथ अवसाद भर देती है जिससे वह आत्महनन की स्थिति तक पहुँच जाता है –

“तुम तो केवल कोख पले हो

पुत्र नहीं हो मेरे” 20

युयुत्सु अपने जीवन का अंत चाहता है, दुखद अंत –

“अभी इसी क्षण मृत्यु पाऊं

किन्तु मोक्ष मिले न मुझको

प्रेतयोनी के कुल में मुझको मिले स्थान

और भटकता रहूँ सदा ब्रह्माण्ड विविर में

मोक्ष मिले न

यही दंड होगा मेरा”

किसी व्यक्ति का संताप में अपने लिए दुरूह से दुरुह्तर दुःख माँगना उसके जीवन के संत्रास को दर्शाता है । मानव जिसकी पीठ पर युग का भविष्य टिका हो उसका जीवन संत्रास युक्त हो तो भविष्य का भी उन्मुक्त विकास नहीं होगा। ऐसे में कृष्ण स्वयं आकर युयुत्सु के इस अवसाद का अंत करते हैं। कृष्ण युयुत्सु को समझाते हुए कहते हैं-

“मृत्यु केवल अर्धसत्य है अनुज प्रिय

यह जीवन संत्रास

व्यर्थ की कुंठा और निराशा

नहीं शोभता तुमको

जीवन में लय है

गति है

तुम करो उसी का गान।” 21

आज का युवा भी भटकाव की स्थिति में हैं। सत्य-असत्य, नैतिकता-अनैतिकता, धर्म-अधर्म के संशय में है। यही संशय उसके तनाव का कारण बनता है। श्रीमद्भगवत गीता में कहा गया है ‘संशयात्मा विनश्यति’। नैतिक पथ सहज ग्राह्य नहीं और ना ही प्रशस्ति उसका अंत होता है। लेकिन मानव जब न्याय और धर्म के मार्ग पर चलता है तो उज्ज्वल भविष्य हेतु कष्ट उठाना ही होगा और सकारात्मक रहना होगा। तब हम जीवन के यथार्थ को बदल पाएंगे।

क्रोधजनित शब्द जो गांधारी के मुंह से निकले हैं वह केवल गांधारी के नहीं है बल्कि एक आहत माँ, एक आहत रानी और एक आहत स्त्री के हैं जिसने अपने यह तीनो रूप कुरुवंश की राजनीति में होम कर दिए । वह आहत स्त्री जो अपने शत पुत्रों, गुरुओं, कुल रक्षकों, सहयोगियों को खो चुकी है जिसे युद्ध के १८ दिन केवल हार मिली है, जिसकी नगरी रुदन से गूँज रही है । वह शोक से इतनी त्रस्त है कि नारायण कृष्ण भी उसकी क्रोधाग्नि से ना बच सके-

“जैसे मेरा पुत्र मरा पीड़ा से

और मरे कोटिक योद्धा

तुमको भी सहनी होगी वैसी पीड़ा

और मृत्यु को पाओगे” 22

परन्तु यहाँ भी नारायण द्वारा शाप की सहज स्वीकृति गांधारी में पश्चाताप भर देती है। उसके अंदर के क्रोध और अंधकार के घने बादल छांट देती है।

महात्मा विदुर जब नैतिक मार्गदर्शक समा न कौरवों और पांडवों के बीच हुई अनीति का वाचक बनते है तो कहते है कि मर्यादा और नैतिकता तो तभी ताक पर लग गयी थी जब एक सम्मानीय स्त्री और अपनी ही कुलवधू का चीरहरण भरी सभा में हुआ था। यह एक स्त्री की अस्मिता और गरिमा का प्रश्न नहीं अपितु अन्धकार, लोभ, अनैतिकता और अमर्यादा की पराकाष्ठा थी जिसने युद्ध की नींव रखी। उस समय मैंने(विदुर) बहुत रोकने और समझाने की कोशिश की लेकिन सभा के सभी विद्वत जन धर्म-अधर्म का भेद भूल गए।

“राजा चाहे जो भी हो

रक्षक थे वे कुरुवंश के”

कृष्ण, काल के उस चक्र समान है जो दिशा तो दिखाता है मगर दिशा का चयन पथिक के हाथ में होता है। वे दूत बने, अहिंसा का मार्ग दर्शाया, युद्ध का प्रतिफलन बताया, राजा का कर्तव्य और मर्यादा का मार्ग बताया । लेकिन लोभ, मोह, अहंकार, प्रतिद्वंद्विता की आँखें कहाँ होती है ।

“मैं स्वयं एक ऐसा धनु हूँ

जिसकी प्रत्यंचा साध नहीं पाता गर्वित” 23

वर्तमान में मनुष्य भी ऐसा ही असहज है। लेकिन उसे दिशा दिखाने हेतु कृष्ण नहीं। साथ ही राष्ट्र में शक्ति संग्रह और शक्ति प्रदर्शन वश निरंतर संघर्षमय स्थिति बनी रहती है । जो योद्धा इस संघर्ष को शांत करने का प्रयास करते हैं उनके घरवालों में भी युयुत्सु और गांधारी समान पीड़ा होगी। लेकिन यह कृष्ण रुपी राष्ट्र जो सब कुछ देखता है, धर्म का मार्ग सुझाता है, लेकिन परवश हो अपने ही धनुष में चढ़ी प्रत्यंचा से खुश नहीं क्योंकि दोनों ही पक्ष उसके है तो नुकसान भी उसी का हुआ। जबकि भारत सदैव से ही शांति को अग्रगण्य स्थान देता है।

“ राष्ट्र जातियों के संघर्षण से ही चलता है

किसे प्रिये था युद्ध

शांति के हम सेवक थे ।” 24

“मैं सबमे था

सब मुझमे थे

मैं सब में हूँ

सब मुझमे हैं

सब कृष्ण यहाँ” 25

लेखक अभी भी मानव के अंदर देवत्व का भाव होने की बात बताता है। यदि राक्षस वृत्ति वाले हम है तो देवात्मा भी हम में ही है। हमे अपने परिवेश को अपने कर्म से सकारात्मक निर्देश देना होगा। धर्म और न्याय की स्थापना में युद्ध भी हो तो वह धर्म युद्ध होगा ।

हरीश अरोड़ा जी का चौथा एकांकी ‘आत्मोत्सर्ग’ है। यह रामायण के राम राज्याभिषेक और राम वन गमन की पाशर्व भूमि पर निर्मित है। राम का अवतार जिस हितार्थ हुआ था उसी क्रम को आगे बढाने वाली यह नियति देव सृजित है । इसका माध्यम कैकयी व मंथरा बने। राम सर्व सनेही हैं। कैकयी को तो भरत से भी अधिक प्रिय हैं। परन्तु दूसरी ओर रावण की शक्ति के साथ राक्षसी प्रभाव से जन के साथ देवलोक भी चिंतित हैं। इस राक्षसी ताकत के अंत की नियति ही राम का वन गमन है। इसी प्रयोजन से देवर्षि नारद, चिंतित देवराज इंद्र को अपनी योजना बताते हैं कि कैकयी से इस सन्दर्भ मे उन्होंने बात की है। पहले तो कैकयी कुल के दीपक व अपने प्रिय राम के साथ यह अनीति करने को लेकर सहमत नहीं होती। वह राम के स्थान पर भरत को यह पीड़ा देने, यहाँ तक कि उसके जीवन पर्यंत वनवास तक की बात कहती है। वे कहती हैं कि भरत में भी सूर्यवंशियों का रक्त है वह भी वचन से डिगेगा नहीं। साथ ही वह राक्षसी साम्राज्य से निडर हो लोहा भी ले सकता है । तब देवर्षि समझाते हैं कि नारायण का मानव रूप में जन्म ही इसी ध्येय पूर्ति हेतु हुआ है। अमंगल का नश कर मंगल की स्थापना ही उनका लक्ष्य है। “देवी- यह युद्ध राम और रावण का नहीं – यह सत्य और असत्य का युद्ध है । अन्धकार और प्रकाश का युद्ध है । देवों और राक्षसों का युद्ध है।” 26

वे कैकयी को युग को नई चेतना देने की बात करते हैं। हर परिवर्तन से पहले गहरा अन्धकार छिपा होता है। किसी को उसके समूल नाश हेतु अग्रसर होना ही पड़ता है। “यह समय सोचने का नहीं है, इतिहास की नवीन चेतना के जन्म का है। अयोध्या के महागौरावशाली इतिहास की चेतना का, आर्य जाति की सांस्कृतिक चिंतनधारा की वैचारिक चेतना का,देव-जाति के सृष्टि को वितरित परम आनंदवाद की महामूर्ति का।” 27

देवर्षि कैकयी को पूरी रणनीति बताते हैं और सरस्वती के सहयोग द्वारा बुद्धि हरण और आगे होने वाले प्रसंगों के विषय में भी बताते हैं। कैकयी को सामाजिक अवहेलना तक का भय नहीं था। उनके लिए देव प्रयोजन और जन रक्षा सर्वोपरि है। “यदि देव और आर्य जातियों की राक्षसों से मुक्ति के लिए मुझे समाज और राज्य से बहिष्कृत भी होना पड़े तो कोई विकलता नहीं।” 28

सम्पूर्ण रामायण और लोक जीवन में कैकयी को जिस अवहेलना की दृष्टि से राम वन गमन विषय पर देखा जाता रहा है उस व्यक्तित्व को हरीश अरोड़ा ने एक नयी उंचाई पर पहुँचाया है। कैकेयी के लिए मातृत्व से भी ऊँचा राष्ट्र और राष्ट्रवासियों की रक्षा है। कैकयी सर्वप्रथम एक क्षत्राणी है जो अपने कर्म से डिगती नहीं। “मैं सूर्य वंश की क्षत्राणी रानी हूँ। क्षत्राणी होने के दायित्व से मुक्त होकर मैं स्वयं को अपने पूर्वजों के समक्ष लज्जित नहीं करना चाहती।…..देवराज सूर्यवंशियों का जीवन अपने लिए नहीं रहा……यदि राक्षस जाति की आसुरी शक्तियों की दुर्जेय अभिकल्पना को तोड़ना मेरे राम के हाथ में लिखा है तो अपने राम की शपथ इस अखंड राष्ट्र की वृहद् और सशक्त शिलाओं की जड़ों में शून्यता भर देने वाले इन आतताइयों की राम के हाथों मुक्ति अवश्य होगी।” 29

कैकयी के चरित्र को पराकाष्ठा तक ले जाना साहित्य का एक नवीन प्रयोग है। अखंड राष्ट्र व जाति की सुरक्षा हेतु एक क्षत्राणी स्त्री का सामाजिक बहिष्कार सहना बहुत बड़ा त्याग है। दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है कि राष्ट्र की अस्मिता और सुरक्षा में स्त्री का सामने आना । वर्तमान में स्त्री का सैन्य टुकड़ी में शामिल होना, राजनीतिक और वैचारिक मंच में अग्रसर होना स्त्री की शक्ति और सामर्थ्य का परिचायक है। स्त्री को केवल मातृत्व स्वरुप व्याख्यायित करना उसके भीतर के एकांगी रूप को दर्शाता है। उसका व्यक्तित्व इससे कहीं अधिक उपयोगी है। साथ ही समाज और राष्ट्र के पुनरुथान का जो प्रयास इस ‘महाप्रयाण’ एकांकी संग्रह में हैं उसमें स्त्री भी एक मत्वपूर्ण पक्ष है। हिंदी साहित्य में जिस प्रकार मैथिलीशरण गुप्त का प्रयोग ‘साहित्य में उर्मिला विषयक उदासीनता’ लेख में उपेक्षित उर्मिला के त्याग को दर्शा उसके चरित्र की महानता प्रस्तुत की गयी, उसी प्रकार यही प्रयास कैकयी और उसकी सामाजिक उपेक्षा के सन्दर्भ में हरीश अरोड़ा के एकांकी ‘आत्मोत्सर्ग’ में दिखा।

“साहित्य का क्षेत्र स्वस्थ और सबल भावनाओं के सृजन का क्षेत्र है……समय के प्रवाह के साथ नयी विचारधाराएं और नवीन जीवन दर्शन साहित्य में समाविष्ट होते हैं……साहित्यकार अपने युग की बहुमुखी सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याओं का प्रदर्शन करता है और उनके सम्बन्ध में सुप्रसिद्ध प्रतिक्रियाओं का निरूपण कर दिखाता है।” 30 हरीश अरोड़ा के एकांकी साहित्य में भी आज के समय की आवाज़ और चिंताएं प्रदर्शित होती हैं। एक सजग लेखक का अपनी समसामयिक परिस्थितियों से अलग रह पाना संभव नहीं। आज भारत में भी सुरक्षा, एकता, आतंकी गतिविधियों, आतंरिक संघर्ष व मतमतांतर के चलते विकट स्थितियां बनी हुई है। राष्ट्र को कमज़ोर करने के बहुत से प्रयास नज़र आते हैं। शांति स्थापना और लोकतंत्र की रक्षा एक चुनौती बनी हुई है।

हरीश अरोड़ा ने इतिहास और संस्कृति के उन पक्षों को उठाया जहाँ राष्ट्र और समाज खतरे की स्थिति में है। ऐसे में भारत के वीरों और वीरांगनाओं को अपना दायित्व समझ नीति के तहत सुरक्षा का प्रयास करना होगा। भारतीय जन मानस को उसका पुरुषार्थ और औदात्य स्मरण इस एकांकी संग्रह द्वारा हुआ है। आततायी शक्तियों का सामना करना ही होगा ताकि सुख-शांति, मूल्य, मर्यादा व नैतिकता का संचार समाज में हो सके। इस हेतु खंडित ताकत को एकात्म स्वरुप धारण करना होगा। चिंतको का लेखन आत्मगौरव और विश्वास को बढाने हेतु एक मनोवैज्ञानिक प्रयास हो सकता है। संघर्ष कई बार नियति बन जाता है। लेकिन भयमुक्त हो उसका सामना उज्ज्वल भविष्य की कामना हेतु करना पड़ता है। जान-माल की हानि अवश्य होती है लेकिन उन वीरों के संबंधियों में इससे अवसाद नही अपितु राष्ट्र गौरव का अभिमान हो, ताकि आगे की पीढ़ी भी ऐसे प्रेरणा वीरों की गाथाये सुन राष्ट्र स्वाभिमान के लक्ष्य की ओर बढे।

हरीश अरोड़ा के एकांकी संग्रह का कथानक और उद्देश्य जितना प्रेरणास्पद है उतनी ही उनकी रंगमंचीय कला भी एकांकी का सौंदर्य बढाती दिखती है। उनके एकांकियों की एक प्रमुख विशेषता चरित्रों का स्वगत कथन और फ्लैशबैक पद्धति है। जब कोई पात्र या स्थिति में अत्यधिक संघर्ष, विचार मंथन की आवश्यकता होती है तब लेखक उस स्थिति को और अधिक रोमांचक व नाटकीय दिखाने हेतु इस पद्धति को अपनाता है। ताकि पाठक में जिज्ञासा बनी रहे । जैसे पात्रों का अपने आप से बात करना या एक अदृश्य शक्ति से पात्र का वार्तालाप या कहें स्वयं के अन्दर चल रही उथल उथल स्वगत कथनों में दिखती है। ‘महाप्रयाण’ में अनुराग का आत्मालाप, एक काली घनी आकृति से युयुत्सु का ‘अर्धसत्य’ में सामना, इसी में गांधारी का मन ही मन पश्चाताप, ’त्यागपत्र’ में छाया से संवाद-वह घटना की गंभीरता दर्शाता है। वास्तव में यह लेखक द्वारा कथानक में गर्भित सन्देश होते हैं। वहीं इन्ही संकेतों को आरम्भ में दर्शा कर अंततः उसी नियति का परिणति तक पहुंचना एक प्रकार की पूर्वस्मृति पद्धति का आभास देती है। जैसे ‘महाप्रयाण’ में दिखता है। यह लेखन की विशेष शैली शिल्प एकांकी को और अधित दमदार बना देती है।

मंच सज्जा, ध्वनि, रौशनी का प्रयोग यह उनके एकांकियों की रंगमंचीय प्रतिभा दर्शाती है। कहा जाता है कि मंच सज्जा पश्चिम से प्रभावित है। परन्तु नाटकों का मंचन भारत में प्राचीन समय से होता रहा है। मोहन राकेश कहते हैं-“हमारे दैनंदिन जीवन के राग-रंग को प्रस्तुत करने के लिए, हमारे सम्वेदों और स्पंदनों को अभिव्यक्त करने के लिए जिस रंगमंच की आवश्यकता है, वह पाश्चात्य रंगमंच से कहीं भिन्न होगा। इस रंगमंच का रूप विधान नाटकीय प्रयोगों के अभ्यंतर से जन्म लेगा और समर्थ अभिनेयताओं और दिग्दर्शकों के हाथों उसका विकास होगा।” 31

रंगमंचीयता की दृष्टि से हरीश अरोड़ा ने मंच सज्जा, आवरण का उठाव और गिराव, रोशिनी का विशिष्ट स्थान, रंगों का कुशल प्रयोग, ध्वनियों द्वारा वातावरण उद्दीपन यह सभी मंचन के दृष्टि से लेखक की कुशलता तो दिखाते ही हैं वहीँ पाठक के समक्ष भी ऐसे बिम्ब उत्पन्न कर देते हैं जैसे कोई फीचर पाठक से समक्ष प्रस्तुत हो। भावाभिव्यन्जना में यही बिम्ब प्रेरक साबित होते हैं । अगर कथ्य और शिल्प की दृष्टि से डॉ हरीश अरोड़ा के एकांकियों को समर्थ एकांकी कहा जाये तो अति नही होगी ।

संदर्भ सूची

हिंदी एकांकी : उद्भव और विकास ,डॉ रामचरण महेंद्र,प्रदीप साहित्य प्रकाशन, पृष्ठ-भूमिका

हिंदी एकांकी ,डॉ सत्येन्द्र , साहित्य रत्न भण्डार ,आगरा, पृष्ठ-४०

हिंदी आलोचन की पारिभाषिक शब्दावली ,डॉ अमरनाथ,राजकमल प्रकाशन ,दिल्ली, पृष्ठ -९९

स्कन्दगुप्त : संवेदना और शिल्प, सिद्धनाथ कुमार,अनुपन प्रकाशन, पटना, पृष्ठ २५

जयशंकर प्रसाद-नन्द दुलारे वाजपेयी , कमल प्रकाशन , जबलपुर, पृष्ठ -११

स्कंदगुप्त –जय शंकर प्रसाद , अनीता प्रकाशन,दिल्ली, पृष्ठ- निवेदन

अरोड़ा, हरीश (2014), महाप्रयाण, सूर्यप्रभा प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ -२०

वही, पृष्ठ -३३

लेखक की साहित्यिकी,नंदकिशोर आचार्य,वाणी प्रकाशन,दिल्ली, पृष्ठ-१२४

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अरोड़ा, हरीश (2014), अर्धसत्य , महाप्रयाण, सूर्यप्रभा प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ -३६

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अरोड़ा, हरीश (2014), अर्धसत्य,महाप्राण, सूर्यप्रभा प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ-५२

अरोड़ा, हरीश (2014), अर्धसत्य , महाप्रयाण, सूर्यप्रभा प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ -५३-५४

अरोड़ा, हरीश (2014), अर्धसत्य,महाप्रयाण, सूर्यप्रभा प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ-५१

अरोड़ा, हरीश (2014), अर्धसत्य,महाप्रयाण, सूर्यप्रभा प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ-४८

अरोड़ा, हरीश (2014), अर्धसत्य,महाप्रयाण, सूर्यप्रभा प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ -५६

अरोड़ा, हरीश (2014), आत्मोत्सर्ग, महाप्रयाण, सूर्यप्रभा प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ -६९

अरोड़ा, हरीश (2014), आत्मोत्सर्ग,महाप्रयाण, सूर्यप्रभा प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ -७१

अरोड़ा, हरीश (2014), आत्मोत्सर्ग,महाप्रयाण, सूर्यप्रभा प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ-७५

अरोड़ा, हरीश (2014), आत्मोत्सर्ग,महाप्रयाण, सूर्यप्रभा प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ -७५

जयशंकर प्रसाद-नंददुलारे वाजपेयी,कमल प्रकाशन, जबलपुर, पृष्ठ – १७

आषाढ़ का एक दिन-मोहन राकेश, राजपाल एंड संस प्रकाशन,दिल्ली, पृष्ठ-दो शब्द

सामाजिक उत्तरदायित्व के बदलते स्वरूप

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सामाजिक उत्तरदायित्व

सामाजिक उत्तरदायित्व के बदलते स्वरूप

आशुतोष पाण्डेय

सारांश

सामाजिक उत्तरदायित्व एक व्यापक शब्द है जिसका प्रयोग आदिकाल से किसी न किसी रूप में किया जाता रहा है। अतीत काल में मानव ख़ानाबदोश जीवन व्यतीत करके अपना जीवन-यापन करता था, लेकिन जैसे-जैसे मानव सभ्यता का विकास हुआ सामाजिक उत्तरदायित्व के स्वरूप में भी बदलाव आने आरंभ हो गए। सामाजिक उत्तरदायित्व के जो स्वरूप आदिकाल, पशुचारण काल, कृषि काल और वैदिक काल में थे, वह वर्तमान समय में नहीं रहें, क्योंकि विगत काल में सामाजिक उत्तरदायित्व की ज़िम्मेदारी समाज के प्रत्येक व्यक्ति की थी और समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन समाज की आवश्यकता के अनुरूप करता था, लेकिन औद्योगिक क्रांति के बाद इसमें काफी बदलाव देखने को मिला। अतः इस काल में सामाजिक उत्तरदायित्व की ज़िम्मेदारी सिर्फ व्यक्ति तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि कार्पोरेट जगत के लोगों की भी यह ज़िम्मेदारी हो गयी कि वह अपने लाभांश का कुछ हिस्सा समाज के विकास में खर्च करें। इस प्रकार 19वीं और 20वीं शताब्दी के दशक में इस अवधारणा का व्यापक स्तर पर विकास हुआ और सरकार तथा कार्पोरेट जगत मिलकर समाज के विकास में अपनी सहभागिता को सुनिश्चित करने लगे। लेकिन इसके इतर 21वीं शताब्दी में सामाजिक उत्तरदायित्व के क्षेत्र में एक नई अवधारणा का विकास हुआ जिसे विश्वविद्यालय सामाजिक उत्तरदायित्व के नाम से जाना गया।

मुख्य बिंदु – सामाजिक उत्तरदायित्व, कार्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व

शोध आलेख

सामाजिक उत्तरदायित्व के संदर्भ में समय, काल और परिस्थिति के अनुरूप अलग-अलग मत प्रचलित हैं। दर्शनिकों के अनुसार सामाजिक उत्तरदायित्व एक नैतिक ज़िम्मेदारी है और इसका पालन समाज के प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी रूप में करनी होती है। सामाजिक उत्तरदायित्व दंड और जुर्माने से संबंधित है और यह ज़िम्मेदारी सचेतन मानव द्वारा किए गए कार्यों का हिस्सा है तथा जब कोई कार्य मानव द्वारा चेतन अवस्था में किया जाता है तब ऐसा कोई कार्य नहीं जिसके परिणाम के प्रति किसी अन्य को जिम्मेदार ठहराया जाए। सामाजिक उत्तरदायित्व व्यक्तिगत और सामाजिक विकास के साथ-साथ आध्यात्मिक और नैतिक गुणों के विकास पर भी बल देता है। सामाजिक उत्तरदायित्व, चेतना और व्यावहारिक मूल्यों की एक श्रेणी है जो मानव अस्तित्व की पहचान कर उसके आर्थिक जीवन का विश्लेषण करती है। इस प्रकार उपर्युक्त अवधारणाओं से यह स्पष्ट होता है कि सामाजिक उत्तरदायित्व एक नैतिक ज़िम्मेदारी है जो प्रत्येक व्यक्ति को समाज में अच्छे कार्य करने की प्रेरणा देती है। चूंकि मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है और इस नाते उसका यह उत्तरदायित्व होता है कि वह समाज द्वारा बनाए नियमों और मान्यताओं के अनुरूप ऐसा कार्य करें जिससे समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को विकास का समान अवसर प्राप्त हो। यहीं सामाजिक न्याय की भी अवधारणा है। इस प्रकार सामाजिक उत्तरदायित्व का सरोकार व्यक्ति एवं समाज के उत्तरदायित्वों से है, क्योंकि व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक हैं और एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती।

सामाजिक उत्तरदायित्व एक व्यापक शब्द है जो लोगों को बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देता है। लेकिन इसके संदर्भ में जब प्राचीन और नवीन अवधारणाओं को देखा जाए तो इसमें व्यापक बदलाव देखने को मिल रहें हैं। आदिकालीन मानव जब यायावर जीवन व्यतीत करता था तब वह छोटे-छोटे कबीलों में रहता था, पशुओं का शिकार करता था और किए गए शिकार का समूहिक वितरण प्रणाली द्वारा पूरे समूह को वितरित करता था। इस प्रकार व्यक्ति के अंदर अपने लोगों के प्रति समूहिता की भावना का विकास होना आरंभ हो गया। इतिहासकारों का मानना है कि इस काल में लोगों के अलग-अलग कार्य भी निर्धारित किए गए थे। जिसमें पुरुष का कार्य पशुओं का शिकार करना और महिलाएँ जंगल से लकड़ियाँ एकत्रित कर भोजन संग्रह का कार्य करती थी। इस प्रकार आदिकालीन समाज में मानव का एक साथ समूह में रहना, समूह के साथ पशुओं का शिकार करना, शिकार का एक समान रूप से वितरण करना, कबीले द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करना और अपने-अपने कार्यों का ज़िम्मेदारी पूर्वक निर्वहन करना यह स्पष्ट रूप से बया करता है कि आदिकालीन समाज में मानव अपने कार्यों के प्रति कितना जिम्मेदार था। इस प्रकार मानव अनेक दहलीजों को पार करते हुए उद्यानिकी तथा चारावाही, कृषक, औद्योगिक और उत्तर-औद्योगिक समाज में पहुँच गया।

सामाजिक उत्तरदायित्व की अवधारणा को प्राचीन काल से लेकर उत्तर-औद्योगिक काल तक देखा जाए तो उसमें कई तरह बदलाव सामने आए हैं। आदिकाल से लेकर कृषक काल तक सामाजिक उत्तरदायित्व के तरीके लगभग एक जैसे थे। क्योंकि इसमें व्यक्ति का महत्व अधिक था और लोग एक दूसरे की सहायता मानवीय भावना से प्रेरित होकर करते थे। लेकिन औद्योगिक और उत्तर-औद्योगिक समाज में सामाजिक उत्तरदायित्व के मायने अलग दिखाई पड़ते हैं। इसमें मानव की जगह पूँजी को अधिक महत्व दिया जाने लगा और सामाजिक उत्तरदायित्व से संबंधित जो कार्य व्यक्ति केंद्रित हुआ करते थे, वह अब संस्था और सरकार केंद्रित हो गए। चूँकि भारत एक विकासशील देश है और आजादी के इतने दशक बाद भी यहाँ गरीबी, कुपोषण, बेरोजगारी, भिक्षावृत्ति आदि तरह की अनेकों समस्याएँ व्याप्त हैं। इसे दूर करने के लिए सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं कई दशकों से प्रयासरत् है, लेकिन अभी भी इसका कोई समुचित समाधान नहीं मिल पाया है। सरकार अपने स्तर से इस प्रयास में है कि अधिक से अधिक लोगों को इस समस्या से मुक्त किया जाए। अतः बड़े पैमाने पर 1980 के दशक में सरकार ने बहुराष्ट्रीय कंपीनियों से यह अनुरोध किया कि वह अपने लाभांश का कुछ हिस्सा समाज के विकास पर खर्च करें। इस प्रकार यहीं से कार्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व की अवधारणा का उदय हुआ और सामाजिक उत्तरदायित्व से संबंधित जो कार्य व्यक्ति द्वारा किए जाते थे वह अब सरकार तथा कार्पोरेट घरानों द्वारा किए जाने लगे।

कार्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व एक नवीन अवधारणा है, जिस संदर्भ में विद्वानों का यह मानना है कि इसकी शुरुआत अमेरिकन उद्यमी एंड्रयूज कारनेगी के ‘द गस्पेल ऑफ वेल्थ’ (1989) पुस्तक से हुई मनी जाती है। इस पुस्तक में कारनेगी ने कहा कि किसी भी उद्यमी का उद्देश्य सिर्फ संपत्ति को एकत्रित करना नहीं है बल्कि उनकी यह नैतिक तथा सामाजिक ज़िम्मेदारी है कि वह अपनी संपत्ति का कुछ हिस्सा समाज के विकास हेतु खर्च करें। लेकिन कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि विश्व पटल पर CSR का उदय तब हुआ जब होवार्ड आर. बोवेन ने अपनी पुस्तक सोशल रिस्पोन्सिबिलिटी ऑफ बिजनेसमैन (1953) में व्यावसायिक नैतिकता के आधार पर अपनी बात को स्पष्ट करते हुए यह कहा कि ‘कार्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व एक व्यावहारिक नैतिकता है जो तकनीकों, सेवाओं और समस्याओं के क्षेत्र में प्रयुक्त होती है। इस प्रकार सामाजिक उत्तरदायित्व एक नवीन अवधारणा है और यह व्यवसायी को समाज में बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देता है। यह व्यवसाय के क्षेत्र में जहाँ एक तरफ शेयरधारकों के लाभ की बात करता है, वहीं दूसरी तरफ मानवाधिकार, पर्यावरण सुरक्षा, मानव विकास समाज कल्याण आदि की भी बात करता है। इस तरह वैश्विक स्तर पर कार्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व का उदय हुआ।

कार्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के परिप्रेक्ष्य में यदि भारत की बात की जाए तो यहाँ इसकी शुरुआत 1990 के दशक में हुई मानी जाती है।इस दौरान उद्योग तथा व्यापार के क्षेत्र में जहाँ एक तरफ क्रांतिकारी परिवर्तन हुए वहीं दूसरी तरफ बड़े पैमाने पर बहुराष्ट्रीय कंपीनियों का भी उदय हुआ। इन कंपनियों के आगमन से न सिर्फ उद्योग जगत को बढ़ावा मिला बल्कि रोजगार के क्षेत्र में भी आशातीत परिवर्तन देखने को मिले। वहीं सामाजिक विकास की दृष्टि से इस काल को देखा जाए तो इस समय बड़े पैमाने पर भारत में अशिक्षा, कुपोषण, भूखमरी आदि चहुओर व्याप्त थी और देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानव विकास सूचकांक, लिंग विकास सूचकांक और जेंडर सशक्तिकरण सूचकांक आदि में अन्य देशों की तुलना में काफी पीछे था। अतः इन समस्याओं को दूर करने के सरकार निरंतर विफल होती जा रही थी तब सरकार ने 1983 के दशक में एशियाई उत्पादकता संगठन के तर्ज पर कार्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व को लागू कर इनके कार्य क्षेत्र को निर्धारित किया।

भारत में कार्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के अंतर्गत केवल वहीं कंपनियाँ आती हैं जिसका वार्षिक टर्नओवर एक हजार करोड़ भारतीय मुद्रा या इससे अधिक का है अथवा जीसका निवल मूल्य पाँच सौ करोड़ रुपये या उससे अधिक का है या शुद्ध लाभ पाँच करोड़ रुपये या उससे अधिक है। अतः जिस कंपनी का वार्षिक लाभांश उक्त दायरे में आता है उस कंपनी को CSR नियम के तहत एक CSR नियम के तहत एक CSR समिति स्थापित करनी होगी। जिसमें कंपनी बोर्ड के सदस्य होंगे और एक निदेशक होगा। यह नियम कंपनियों को बीते तीन वर्षों में हुए उसके औसत शुद्ध लाभ का कम से कम 2 प्रतिशत CSR गतिविधियों में खर्च करने का उल्लेख करता है। इस प्रकार भारत में कार्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व का उदय हुआ और आज कई कंपनियाँ इनके अंतर्गत कार्य कर रहीं है।

भारत में कार्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के नियमों को लागू हुए आज लगभग तीन दशक हो गए, लेकिन यहाँ आज भी बड़े पैमाने पर समाज का एक बड़ा वर्ग गरीबी, अशिक्षा, भूखमरी आदि में अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। आखिर क्या कारण है कि आजादी के इतने दशक बाद भी लोग इस तरह का जीवन जी रहें है ? यह सरकार और कार्पोरेट जगत के लिए चुनौती का विषय बना हुआ है। तत्पश्चात विद्वानों का एक बड़ा वर्ग जो अकादमिक क्षेत्र से आते हैं उन्होंने यह सुझाव दिया कि भारत में यदि इन समस्याओं से निजात पाना है तो स्थानीय स्तर पर जो भी संस्थाएं कार्य कर रहीं है उन्हें भी इस परिपाटी में शामिल करना होगा। कहने का तात्पर्य यह है कि भारत में यदि इस समस्याओं को दूर करना है तो उच्च शैक्षणिक संस्थानों को इस मुहिम में शामिल करना होगा। आगे विद्वानों ने इसके पीछे यह तर्क दिया कि यह ऐसी संस्थाएँ होती हैं जिसमें सुदूर और स्थानीय क्षेत्रों के बच्चे पढ़ने के लिए आते हैं और यदि हम इन छात्रों को इस मुहिम में शामिल करते हैं तो अधिक से अधिक लोगों को इन संस्थानों से जुडने का अवसर प्राप्त होगा। इस तरह से समाज का एक वंचित तबका जो समाज की मुख्य धारा से एकदम अलग है उसे आसानी से इस मुहिम का हिस्सा बनाया जा सकता है। अतः इसी के तर्ज पर एक नवीन अवधारणा के रूप में विश्वविद्यालय सामाजिक उत्तरदायित्व का आविर्भाव हुआ।

विश्वविद्यालय सामाजिक उत्तरदायित्व एक नवीन अवधारणा है, जिसकी शुरुआत चिली विश्वविद्यालय के शोधार्थियों द्वारा किया गया। यहाँ के शोधार्थियों ने वैश्विक स्तर पर यह सुझाव दिया कि विश्वविद्यालय समाज का एक अभिन्न अंग है और इसका उद्देश्य सिर्फ ज्ञान देना और जिम्मेदार छात्रों को पैदा करना ही नहीं है बल्कि उनकी यह नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वह समाज के सतत विकास हेतु समाज के साथ मिलकर कार्य करें औए एक ऐसा मॉडल तैयार करें जिससे समाज के सभी लोगों को विकास का समान अवसर प्राप्त हो सके। भारत में विश्वविद्यालय सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास 12वीं पंचवर्षीय योजना में किया गया। इस योजना में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्च शैक्षणिक संस्थानों को यह सुझाव दिया कि संस्थान चाहे तो अपने स्तर से सामाजिक उत्तरदायित्व के क्षेत्र में कार्य कर सकते हैं। इसी क्रम में आगे चलकर कई संस्थानों ने इस क्षेत्र में कार्य करना आरंभ कर दिया। वर्तमान में यदि इन संस्थानों के उत्तरदायित्व को देखना है तो ‘उन्नत भारत अभियान’ एक महत्वपूर्ण योजना है। इस योजना के तहत भारत के तमाम उच्च शैक्षणिक संस्थानों को यह सुझाव दिया गया कि वह अपने आस-पास स्थित गांवों की समस्याओं को द्दोर करें। इसके लिए बड़े पैमाने पर IIT,NIT,IIIT आदि संस्थाओं को इस मुहिम में शामिल किया गया है। इस प्रकार सामाजिक उत्तरदायित्व के क्षेत्र में यह संस्थान निरंतर कार्य कर रहें हैं।

निष्कर्ष :

सामाजिक उत्तरदायित्व एक व्यापक अवधारणा है। इस अवधारणा का विकास आदिकाल से किसी न किसी रूप में देखने को मिलते रहें हैं। आदिकालीन समाज में मनुष्य की आवश्यकताएँ सीमित थी और लोग आपसी सहयोग के माध्यम से ही अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करते थे। लेकिन औद्योगिक और उत्तर-औद्योगिक समाज में सामाजिक उत्तरदायित्व की ज़िम्मेदारी सरकार, कार्पोरेट जगत और उच्च शैक्षणिक संस्थानों पर आ गयी है। इस दौरान सरकार ने कार्पोरेट और उच्च शैक्षणिक संस्थानों की यह ज़िम्मेदारी तय कर दी है वह अपने चहारदीवारी से बाहर निकल कर समाज के कल्याण हेतु कार्य करें।ऐसी स्थिति में कार्पोरेट जगत का एक बड़ा तबका लोगों के कल्याण हेतु स्कूल, अस्पताल, मनोरंजन केंद्र, पुनर्वास केंद्र आदि को स्वयं स्थापित कर रहा है या किसी अन्य संस्था को सहायता राशि देकर इस तरह के कार्यों को क्रियान्वित करा रहा है। इसी प्रकार जो उच्च शैक्षणिक संस्थान हैं वह अपने आस-पास के गाँवों के विकास हेतु आगे आ रहे हैं। इसमें कुछ संस्थान उन्नत भारत योजना के तहत लोगों का कल्याण कार्य कर रहें हैं तो कुछ संस्थान गाँव गोंद लेकर उनके उन्नति का मार्ग खोल रहें हैं। इस प्रकार समय दर समय सामाजिक उत्तरदायित्व का स्वरूप बदलता गया और एक परिपाटी के रूप में कार्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व और विश्वविद्यालय सामाजिक उत्तरदायित्व का उदय हुआ।

संदर्भ सूची :

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शोधार्थी, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा

ईमेल: ashukvp@gmail.com

मोबाईल: 7057300468

राजस्थान की प्रथम नगर परिषद का ऐतिहासिक महत्व एवं महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता का एक विश्लेश्णात्मक अध्ययन: राजस्थान की प्रथम नगर परिषद्, ब्यावर के संदर्भ में

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राजस्थान की प्रथम नगर परिषद का ऐतिहासिक महत्व एवं महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता का एक विश्लेश्णात्मक अध्ययन: राजस्थान की प्रथम नगर परिषद्, ब्यावर के संदर्भ में

कविता अटवाल

शोधार्थी, राजनीति विज्ञान,

महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर (राजस्थान)

धर्मदास अटवाल

विभागाध्यक्ष एवं पीजीटी भाषा (हिन्दी),

आर्मी पब्लिक विद्यालय, मथुरा छावनी, उ.प्र.

सारांश

प्रस्तुत शोध पत्र राजस्थान प्रदेश की प्राचीनतम और प्रथम नगर परिषद्, ब्यावर को केन्द्रित करके प्रणित किया गया है, इसका उद्देश्य ब्रिटीशकाल में निर्मित ब्यावर शहर की नगर परिषद में महिलाओं की राजनीतिक स्थिति को स्पष्ट करना और स्त्रियों की सहभागिता को प्रकाश में लाना है। आज तक स्त्रियों के जीवन में होने वाले राजनीतिक अधिकारों और उनकी विकास गति को भी उपलब्ध कराया जाना शोध का महत्वपूर्ण कारण रहा है। आज़ादी के 75 वर्ष पूर्ण होने के पश्चात् उन बदलावों को सूचीबद्ध किया जाना, जिससे महिलाओं के जीवन स्तर में सुधार हो सके, शोध का प्रधान उद्देश्य है।

बीज शब्द: महिला, सशक्तिकरण, राजनीतिक, मेरवाडा, ब्रिटीशकाल, सहभागिता

शोध प्रविधि: प्रस्तुत शोध पत्र में प्राथमिक एवं द्वितीय आंकड़ों का प्रयोग किया है इसमें साक्षात्कार, समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, पुस्तकों और इंटरनेट आदि का प्रयोग किया गया है।

शोध आलेख

प्रदेश का ब्यावर कस्बा सदैव ही अपनी प्राकृतिक सम्पदा और शौर्य बल के साथ ही साथ अपनी भौगोलिक स्थिति के लिए जाना जाता रहा है। यहा से पूरे प्रदेश के लिए मार्ग उपलब्ध होने के कारण राजस्थान पर आधिपत्य की दृष्टि से इस क्षेत्र पर अधिकार सबसे पहले आवश्यक है। इसी नजरिए से अजमेर क्षेत्र जिसके अंतर्गत ब्यावर क्षेत्र शामिल किया जाता है, पर अंग्रेज अपनी पहुंच और पकड़ बनाएं रखना चाहता थे। ब्रिटीशकाल में यही क्षेत्र केन्द्रशासित प्रदेश के रूप में था, जिस पर स्वतंत्र रूप से अंग्रेज अपना स्वतंत्र प्रशासन भी चलाते थे। इस क्षेत्र को वर्तमान राजस्थान राज्य के एकीकरण में अंतिम रूप से 01 नवम्बर 1956 को मिलाकर ही आधुनिक राजस्थान मूर्त रूप लेता है।

आज़ादी के पूर्व ब्रिटीश प्रशासकों ने अजमेर के इस क्षेत्र कोए अजमेर-मेरवाड़ा के अलग नाम से केन्द्रशासित प्रदेश बनाकर यहा अपनी शक्ति को केन्द्रीकृत किया। अजमेर तो मुख्य रूप से चला आ रहा वर्तमान जिला अजमेर शहर का नाम रहा है और मेरवाड़ा इसके आस-पास का क्षेत्र है। यह क्षेत्र मेरवाड़ा कहा जाने का भी विशेष कारण इस क्षेत्र में निवास करने वाली मेर नामक जाति है। यह पूरी दुनिया में हिन्दू और मुस्लिम एकता के लिए एक अनूठी कौम मानी जाती है, जो कि हिंदू-मुस्लिम रीति-रिवाजों को सयुक्त रूप से मानती है, तथा दोनों ही धर्मो के त्योहारों और उत्सवों को मनाती है। यह जाति अपने अदम्य शौर्य और बलिदान के लिए भी जानी जाती है। इस क्षेत्र में निवास करने वाली इस कौम में लगभग प्रत्येक परिवार अथवा घर का एक ना एक व्यक्ति सेना में अवश्य होगा। इस जाति के लोग देश सेवा के जज्बे से लबरेज होते है, तथा यहा के अधिकांश गांवों में सेना के शहीदों की छयाव चिह्न मिल जाते है। यहा का चप्पा-चप्पा भोमियां है और हर घर की फुलवारी वीरांगनाओं के पुष्पों से महकती है। इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और अवस्थिति के कारण अंग्रेजों ने देश में पैर जमा लेने के बाद अपने भविष्य की योजनाओं को मूर्त रूप इसी क्षेत्र से दिया। इस दृष्टि से यह क्षेत्र अंग्रेजों की प्रयोगशाला रहा है, जिस पर देश के प्रशासन और नियंत्रण के प्रथम प्रयोग यही पर किए गए। उत्तर भारत का प्रथम गिरजाघर भी ब्यावर का शूलबे्रड चर्च है, जो की यही पर अवस्थित है। यही पर अंग्रेजों द्वारा प्रथम डिस्पेंसरी (चिकित्सालय) मेवाड़ी गेट के पास स्थापित की गई थी, तथा यही पर वर्तमान में पांच बत्ती बाज़ार के कपडा मार्केट में पुलिस थाने की स्थापना भी अंग्रेज प्रशासन ने की थी।

इतिहास के आइने से :

ब्यावर का ऐतिहासिक वर्चस्व कभी कम नहीं रहा है। 01 फरवरी 1836 को दिन के प्रातः 10.10 पर ब्यावर की स्थापना की नींव का प्रथम पत्थर आधुनिक अजमेरी गेट पर कर्नल चाल्र्स डिक्शन के द्वारा रखा गया था। साल 1839 को 144 मेरवाड़ा बटालियन की उपस्थिति में ब्रिटीश सरकार ने मेरवाड़ा स्टेट की घोषणा के साथ ही ब्यावर के महत्व को स्पष्ट कर दिया था। 01 मई 1867 को अंगे्रज सरकार ने मेरवाड़ा स्टेट के ब्यावर में शासन की सरलता के लिए कमिश्नरी राज (प्रजातांत्रिक गणराज्य) की स्थापना की जो भारत की स्वतंत्रता अर्थात 14 अगस्त 1947 तक अक्षुण्ण कायम रहा। देश की आज़ादी के आंदोलन में भी इस शहर की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, राजपूताने की प्राचीनतम सैनिक छावनियों में से एक ब्यावर छावनी रही है और शहर के संस्थापक कर्नल डिक्सन इसी सैनिक छावनी के सदर थे, और उन्होंने इस शहर के सामरिक महत्व को जानकर ही एक आधुनिक शहर की स्थापना की थी। आज़ादी के पश्चात् अजमेर-मेरवाड़ा के इस केन्द्रशासित क्षेत्र को राजस्थान के एकीकरण के बाद अंतिम रूप से 01 नवम्बर 1956 को आज के राजस्थान का हिस्सा घोषित किया और अजमेर को जिला तथा ब्यावर को उपखण्ड का दर्जा दिया, जो कि आज भी जस का तस है।

ब्यावर नगर परिषद् और उसका वैभवशाली इतिहास :

1818 की सहायक संधियों के पश्चात् देश में अंग्रेजी राज्य की प्रगति में तीव्रोत्तर वृद्धि हुई और ब्रिटीश शासन महारानी के सीधे हस्तक्षेप में 1857 की क्रांति के बाद आ चुका था। ऐसे में अंग्रेजी राज इकाईयों में बांटकर एक नई व्यवस्था में विकसित होने लगा। शासन को सुविधा के नजरिये से बांटते हुए इनहे केन्द्रशासित प्रदेशों में बांटा जाने लगा। इस व्यवस्था में अजमेर-मेरवाडा एक केन्द्र शासित प्रदेश बना और अंग्रेजों ने इसका संचालन अपनी प्रयोगशाला के रूप में किया। किसी भी प्रकार की नई प्रयोग भूमि और योजनाओं के प्रारंभिक टेस्ट यही पर किए जाने लगे जैसे, उत्तर भारत का पहला प्रोटेस्टेट चर्च भी ब्यावर में बना, अंग्रेजों ने पुलिसिंग व्यवस्था की पहली चैकी और सिटी डिस्पेंसरी आदि योजनाओं के प्रथम प्रयोग इसी शहर में किए। लगभग 200 से अधिक वर्ष पुरानी अकबर-बीरबल की बादाशाह की सवारी इस शहर की अपनी ऐतिहासिक परंपरा है। अंग्रेज सेनाधिकारी कर्नल डिक्सन ने इस नए नगर को आधुनिक तकनीकि के साथ बसाया और उसे समकोण सड़कों से जोड़ा। ईसा मसीह के कू्रस के आधार पर शहर को बसाया गया और जातिवार बस्तियां बसाई गई। सम्पूर्ण विश्व में ब्यावर एकमात्र शहर है जो कि ईसाई धर्म के प्रतीक चिह्न कू्रस की आकृति पर ससुव्यवस्थित एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कर्नल चाल्र्स डिक्सन द्वारा स्थापित किया गया है। शहर के मध्य से गुजरता मार्ग जिस पर पाली बाजार बसाया गया और शहर की प्रत्येक सड़क से बाजार पहुचा जा सके ऐसी व्यवस्था के लिए समकोण सड़कों का विकास किया गया। शहर के परकोटे से लगी हुई नगर परिषद की भव्य इमारत, जिसके एक और बडा सा मिशन ग्राउण्ड और दूसरी ओर से अंग्रेजी शासन की सबसे बडी होलेंड स्कूल, जिसका नाम देश के प्रथम गृह मंत्री और उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के नाम पर बदलकर पटेल स्कूल कर दिया गया है। आज की नगर परिषद ब्यावरए जिस इमारत में चल रही है, वह इमारत कभी टाउन हाल के नाम से विख्यात थी। अंग्रेजी शासन की समस्त बागडोर इस क्षेत्र में इसी इमारत से चलती थी। देश को दिया गया सूचना का अधिकार कानून की आवाज पूर्व आईएएस अधिकारी एवं सामाजिक कार्यकत्र्ता अरूणा रॉय एवं उनके संगठन ने ब्यावर के हृदय स्थल चांगगेट से पहलीबार उठाई थी, जहा आजकल स्मारक भी बना हुआ है। प्रदेश के 150 उपखंडों में ब्यावर सबसे बडा उपखण्ड है। ब्यावर नगर परिषद की स्थापना 01 मई 1867 को 1850 ई. के अंग्रेज सरकार के 26वें एक्ट की अनुशंसा में हुई। इसके संचालन के लिए कुल 15 सदस्य होते थे, जिनमें 12 सदस्य जनता द्वारा चुने जाते तथा 03 सदस्यों का मनोनयन अंग्रेज सरकार करती थी। इस समय नगर परिषद का अध्यक्ष अर्थात् चेयरमैन का पद सरकार द्वारा नियुक्त एक्सट्रा असिस्टेंट कमिश्नर होता था, पहले गैर सरकारी अध्यक्ष बनने वाले एडवोकेट लक्ष्मीनारायण माथुर थे। सरकार द्वारा इसके प्रथम सचिव के पद पर बंगाली अखैकुमार को नियुक्त किया गया था।

महिला सशाक्तिकरण एवं नगर परिषद ब्यावर :

भारतवर्ष में महिलाओं के राजनीतिक अधिकार एवं नागरिक क्षेत्रों में कार्य का दौर 90 के दशक से वास्तविक रूप में आरम्भ हुआ। इससे पूर्व यदा-कदा ही महिलाएं राजनीतिक और सार्वजनिक कार्यो में कभी उभर कर आ भी जाती तो अपने प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण ही थी। इसमें भी कभी-कभी तो पुरूषों की अभिलाषाओं की पूर्ति के लिए एक रबर स्टांम्प बनकर ही रह जाती थी। 90 के दशक से पंचायती राज और स्वायत्तशाषी संस्थाओं में आरक्षण और कुछ महिलाओं की दृढ़ इच्छा शक्ति का बड़ा हाथ रहा है। ऐसी ही स्थानीय नगर परिषद ब्यावर में प्रशासन और परिषद के कार्यो की विधिवत शुरूआत प्रथम प्रशासक कैम्पटन डौक्स की नियुक्ति 1904-1905 से होती है। अंग्रेजी हुक्मरानों की नियुक्तियां ब्यावर नगर परिषद में होती रही है, पहले भारतीय ब्यावर नगर परिषद में प्रशासक के रूप में नियुक्त होने वाले सैयद हुसैन (1906-1907) है। किसी महिला की नियुक्ति आजादी के 34 साल बाद में पहलीबार दिनांक 01.03.1981 से 31.03.1981 को सुश्री मीरा सहानी के रूप में होती है। ब्यावर नगर परिषद में सभापति के रूप में नियुक्त होने वाली प्रथम महिलानेत्री तारा झंवर (23.07.2004 से 27.11.2004) थी, जिन्हे राज्य सरकार ने सभापति प्रमोद सांखला के निलंबन के बाद मनोनीत किया था। 21वी सदी में जो शुरूआत तारा झंवर ने की वह निरन्तर आगे बढ़ने लगी। इनके बाद जयश्री जयपाल (28.11.2004 से 30.05.2007), रेखा जटिया (कार्यवाहक सभापति 08.06.2007 से 03.07.2007), श्रीमती पार्वती जाग्रत (04.07.2007 से 05.03.2009) तथा दो बार सभापति बनने का श्रेय श्रीमती शांति डाबला को जाता है जो कि पहलीबार कार्यवाहक सभापति तथा थोडे ही दिनों बाद सभापति (20.05.2009 से 26.11.2009) बनी। महिलाओं की राजनीति में भागीदारी का ग्राफ निरन्तर बढ़ रहा है, ब्यावर नगर परिषद में सर्वोच्च पद सभापति के लिए सबसे लंबी पारी खेलने का अभी तक किसी महिला का रिकार्ड रहा है, तो वो रहा है श्रीमती बबीता चैहान का, वे प्रथमबार निर्वाचित 26.11.2014 को हुई थी।

महिला सहभागिता और जननांकिय स्थिति :

यह पूर्व में ही स्पष्ट किया जा चुका है कि इस शहर की प्राचीनता और वैभव अतिप्राचीन होने के साथ साथ ब्रिटीशकाल के सीधे हस्तक्षेप में होने के कारण यहा पर अंग्रेजियत का विस्तार रहा है। आधुनिक शहर के निर्माता कर्नल डिक्सन ने भी जनसंख्या के हिसाब-किताब और 450 से अधिक भूखण्डों के पट्टे जारी करके जातिवार लोगों को नए शहर में सुनियोजित तरीके से बसाया था। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार ब्यावर शहर एवं ग्रामीण भागों में इस तहसील को बांटा गया हैं और इसी अनुसार भी जनसंख्या आंकलन किया गया है। ब्यावर शहरी क्षेत्र की कुल आबादी 151152 है, जिसमें पुरूष आबादी 77616 तथा महिला 73536 है। यहा साक्षरता भी अच्छी है कुल 84.39 प्रतिशत साक्षरता है, जिसमें पुरूष साक्षरता 91.54 प्रतिशत तथा महिला साक्षरता 76.61 है। शहरी क्षत्र में लिंगानुपात भी संतोषप्रद है, प्रति हजार पुरूषों पर 948 महिलाएं है।

ब्यावर का शहरी जननांकिय आरेख –

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आजादी के समय ब्यावर नगर परिषद के अध्यक्ष एडवोकेट मुकुटबिहारी भार्गव थे, तथा वाइस चेयरमैन पंडित बृजमोहनलाल थे। इस समय वार्डो की संख्या आठ थी, तथा प्रत्येक वार्ड से तीन सदस्य चुनकर आते थे। इस तरह आजादी के बाद तक 24 सदस्य चुनकर और 03 सदस्य सरकार द्वारा मनोनीत होते थे। 1971 में वार्डों की संख्या 22 कर दी गई और प्रत्येक वार्ड से एक सदस्य चुनकर आने लगा। 1972 में नगर परिषद बोर्ड का भंग सरकार द्वारा कर दिया गया और नगर परिषद का संचालन उपखण्ड अधिकारी को प्रशासक लगाकर किया जाने, जिसके विरूद्ध शहर के जागरूक नागरिक द्वारका प्रसाद मित्तल ने राजस्थान उच्च न्यायालय में जनहित याचिका लगाकर पुनः वर्ष 1988 से आम चुनाव कराये जाने लगे और समय सीमा भी अब पांच वर्ष कर दी गई। इस तरह 1988 से 2004 तक 3 बार आम चुनाव हुए, जिसमें कुल 135 पार्षद 16 वर्षो में चुने गए।

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ब्यावर नगर परिषद का विहंगम दृश्य

संदर्भ सूची:

  1. खुली बहियां एवं संचित लेख सूचियां।
  2. साक्षात्कार – इतिहासकार वासुदेव मंगल, संस्थापक ब्यावर इतिहास, साईट।
  3. राजस्थान पत्रिका, 06 फरवरी 2019 राजस्थान नगरपालिका कानून – डाॅ. बसन्तीलाल बाबेल
  4. नगर निगम चुनाव कानून – एड. उद्दीन (युग निर्माता पब्लिकेशन)
  5. महिला सशक्तिकरण, मानचन्द खंडेला (पोइन्टर पब्लिशर्स, जयपुर)
  6. आधी आबादी को पूरा हक, सरोकार – इरा झा (दैनिक जागरण, 1 सिंतबर 2009)
  7. नारी सशक्तिकरण – आशा कौशिक
  8. राजस्थान पत्रिका – समाचार पत्र
  9. दैनिक भास्कर – समाचार पत्र
  10. दैनिक नवज्योति – समाचार पत्र
  11. इलेक्ट्रोनिक मीडिया एवं इंटरनेट
  12. www.urban.rajasthan.gov.in
  13. www.censussindia.gov.in
  14. www.beawarhistory.com

यौनिकता की बहस में मिथक

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kinner vimarsh sahitya

यौनिकता की बहस में मिथक (इला और नर-नारी /उर्फ : थैंकू बाबा लोचनदास नाटक )

-भावना मसीवाल

यौनिकता का आशय मनुष्य की यौनिक पहचान से जुड़ा है और यह पहचान आज व्यक्ति की बजाय समाज सापेक्ष्य है। यौनिकता अपने स्वभाव में परिवर्तनशील है । कभी वह एक यौनिक पहचान, कभी दो और कभी किसी भी पहचान को नहीं मानती है, क्वीयर लोगों की तरह । “90 के दशक की शुरुआत में नरसिंहराव और मनमोहन सिंह एंड कंपनी ने एडम स्मिथ के ‘इनविजीबल हैंड’ को जैसे ही खुली छुट दी”[1]। पहली बार तब यौनिकता, सेक्स जैसे विषयों पर बातचीत होना आरंभ हुआ । इसमें पत्रिकाओं की मुख्य भूमिका रही । मुंबई से प्रकाशित होने वाली डेबोनायर पत्रिका और उसके बाद ‘सेवी’ नामक महिला पत्रिका इसमें प्रमुख थी । यौन व्यवहार को लेकर जिसने पहली बार सर्वे कराया था। इस सर्वे का एक कारण 1983 में एड्स बीमारी का उभरना था । दूसरा कारण 1986 में भारत में इसके पहले रोगी की पहचान होना था । इस रोग के फैलने के कारणों में दो कारण प्रमुख थे, असुरक्षित समलैंगिक और विषमलैंगिक यौन संबंध। एड्स के डर से विश्व संस्थाओं ने देह व्यापार के दायरों और समलैंगिक दायरों की जाँच आरंभ की । इन्हीं कारणों से तीसरी दुनिया में यौनिकता पर बहस की शुरुआत होती है । 

यौनिकता का विषय आज भले ही हमें नया लगता है । परंतु वास्तविकता यह है कि इस पर बहस का एक लंबा सिलसिला परंपरा, इतिहास और पुराणों में मौजूद है जिन्हें हम मिथक कहते है । अंग्रेजी के शब्द मिथ का हिन्दी रूप मिथक है और इस शब्द का प्रयोग आधुनिक काल में हुआ । आधुनिक काल में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के लेखन से यह शब्द उभरता है । डॉ श्यामा चरण दुबे का मानना है कि “परंपरा में मिथक भी है, ऐतिहासिक तथ्य भी । मिथक सामाजिक तथ्य है, ऐतिहासिक तथ्य नहीं”[2]।’दिविक रमेश लिखते हैं कि “मिथ और मिथक अपनी अर्थगत संकल्पनाओं में समान नहीं हैं । मिथ को प्रायः तर्क के विपरीत कोरा कल्पनाधर्मी अधिक माना जाता रहा है । जबकि मिथक अलौकिकता का पुट रखते हुए भी लोकानुभूति का वाहक होता है”[3]। पश्चिम में मिथ शब्द यूनानी ‘मुथॉस’ से आया जिसका अर्थ था मौखिक कथा । अरस्तु इसके लिए गल्पकथा और कथाबंध का प्रयोग करते है । मिथक को लेकर कई अवधारणाए मौजूद है, कुछ इसे कल्पना मानते है । ‘मिथक संसार का तर्क सामान्य संसार पर लागू नहीं होता’[4] कुछ सामाजिक यथार्थ के निकट, कुछ का मानना है कि यह लोक की अभिव्यक्ति का माध्यम रहा है । इस तरह मिथक कल्पना होने के बावजूद समाज के बहुत नजदीक देखा जा सकता है ।

आधुनिक संदर्भों में नाटककार जिससे जुड़ने का प्रयास भी करता रहा है । 70 के दशक में जब वैश्विक पटल पर नारीवादी आंदोलन के दौरान जेंडर, सेक्स और यौनिकता पर बहस चल रही थी और माना जा रहा था एक समय पूर्व तक समाज में केवल एक ही जेंडर पहचान उपलब्ध थी और मनुष्य ने अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप इन पहचानों को बनाया है । भारत में भी उस समय इसका प्रभाव सामने आ रहा था । प्रसाद के नाटकों में यह बहुत छोटे रूप में देखा जा सकता है परंतु 90 के बाद के लेखन में इसका विशेष प्रभाव रहा । प्रभाकर श्रोत्रिय का नाटक इला और नाग बोडस का नाटक नर-नारी (उर्फ : थैंकू बाबा लोचनदास) मिथकीय आधार पर यौनिकता की इस बहस को मिथक के आधुनिक पाठ के रूप में सामने लाता है। इला नाटक की मूल कथा श्रीमद भागवत के नवम स्कंध के पहले अध्याय सुधुम्न की कथा है । यह नाटक स्त्री-पुरुष की जैविक संरचना से लेकर स्त्री-पुरुष के भीतर दोनों ही गुणों के मौजूद होने, स्त्री-पुरुष संबंधों और उनके व्यवहार, समाजीकरण की प्रक्रिया का हावी होना जैसे मुद्दों को उठाता है । यौनिकता पर चली आ रही लंबी-लंबी बहसों से एक बहस यह नाटक पैदा करता है सुद्युम्न के रूप में । सुद्युम्न जिसकी अपनी एक निश्चित पहचान नहीं है। समाज, राज्य और सत्ता ने अपने अनुरूप उसे बनाया है । दूसरी ओर नाग बोडस का ‘नर-नारी’ नाटक बाबा लोचनदास की लोककथा को आधार बनाकर लिखा गया । यह स्त्री और पुरुष संबंधों के साथ ही एक निश्चित यौनिक पहचान होने की संभावना के प्रश्न को उठाता है। दोनों ही नाटक मिथक को आधार बनाते हुए आज के तत्कालीन जेंडर और यौनिकता के प्रश्नों को उठाते है।

शासक अपना दायित्व अपनी सत्ता को बनाए रखने में चाहता है । इसी निहितार्थ व अन्य परस्पर संबंधों को भी ताक पर रखने से पीछे नहीं हटता । ‘इला’ नाटक के अंतर्गत मनु का चरित्र सत्ता के चरित्र के रूप में सामने आता है । जिसकी अपनी महत्वकांक्षा और सत्ता लोलुपता उसे मानवीय गुणों से दूर कर देती है । मनु के व्यक्तितत्व का कुछ ऐसा ही रूप जयशंकर प्रसाद की कामायनी में भी देखने को मिलता है । वहां भी मनु अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर श्रद्धा को छोड़कर चले जाते है और यहाँ भी प्रभाकर श्रोत्रिय मनु के उसी चरित्र को उभारते है जो ‘पुत्र’ की जगह ‘पुत्री’ इला के जन्म का दोषी श्रद्धा को मानता है और अपने आत्मसम्मान के हनन का कारण भी । ‘…..सारी दुर्घटना की जड़ है-महारानी ! अब तक मैं जिसे अपना संपूर्ण प्रेम देता रहा, वह सर्पिणी निकली ! स्त्री के चरित्र को देव भी नहीं जान सकते। कृतध्न नीच !’[5] यहाँ नीचता का संबंध बेटी पैदा करने से है । क्योंकि मनु के लिए श्रद्धा का अस्तित्व राज्य का उत्तराधिकारी पैदा करना था । आज भी हमारे समाज में महिलाएं बेटा पैदा करने की मशीन मानी जाती है । जिसके लिए महिलाओं के सारे अधिकार छीन लिए जाते है कि उनकी अपनी इच्छा क्या है? आज भी सवाल ही बनकर रह जाता है। फिर चाहे वह कितना ही बुद्धिवादी क्यों न हो ? वह तर्क के आधार पर स्वयं को सही साबित करने का सदैव प्रयास करता है जैसा कि मनु करते हैं “मांगती तो राज्य का उत्तराधिकारी मांगती, लड़की नहीं ”[6] और बहस करने पर वह खुद को सही साबित करते है कि ‘उसका क्या कसूर है ? उसे भी सत्ता और समाज को देखना है और उसका संचालन करना है । इसके लिए वंश परंपरा के निहितार्थ यदि वंश कामना भी की तो क्या गलत किया’ । मनु और श्रद्धा के माध्यम से लेखक समाज में स्त्री–पुरुष संबंधों और उनमें वर्चस्ववादी मूल्यों की गहरी पेठ को उभारते है।

मनु का अपनी पत्नी श्रद्धा द्वारा लिया गया केवल एक निर्णय उनके अस्तित्व को ही प्रश्नांकित कर देता है । इनके स्वतंत्र अस्तित्व को पुनः राजमाता, पत्नी धर्म में बांधने का प्रयास करता है । आज के संदर्भों में इसे देखे तो पाते है कि आज भी कन्याभूर्ण हत्या, पुत्र की चाहत की अपेक्षा महिलाओं से की जाती है । आज भी संतान को धारण करने से लेकर पैदा करने तक के सभी निर्णय पिता व परिवार द्वारा लिए जाते है । महिला की उपस्थिति केवल गर्भधारण करने और पैदा करने के दौरान उसके पालन पोषण तक सीमित रहती है । उससे जुड़े निर्णय लेने में वह आज भी अक्षम है । श्रद्धा के जिस मनोभाव को प्रभाकर श्रोत्रिय उठाते है यही कामायनी में प्रसाद उठाते है और यही स्थिति आज की आधुनिक महिला की भी है । मातृत्व के गुणों से तो जिसे भरा गया मगर अधिकार नहीं दिया गया । बल्कि समाज में आज दिखावा मौजूद है कि आप बेटियों के चाहते हैं उनके ही हितैषी है । मगर वास्तविकता समाज की आज मनु जैसी है जो कहतें हैं “दूसरों की कन्याओं से प्रेम करना और अपने लिए कन्या चाहना दो अलग बाते हैं, देवी ।”[7] यहाँ बौद्धिक वर्ग के व्यवहारिक और सैद्धांतिक मतों के अंतर को समझा जा सकता है इसके साथ ही महिलाओं की स्वतंत्रता की चाह रखने वालों की मानसिकता को भी ।

आज की तकनीकी क्रांति ने जहाँ टेस्ट ट्यूब बेबी, सेरोगेसी और शरीर में बदलाव से लेकर सेक्स बदलवाने तक की प्रक्रिया को सहज बना दिया गया । ऐसे में चुनाव का मसला आसान हो गया है । आप को किस सेक्स को अपनाना है और किसे छोड़ना है । अपना शरीर किस रंग, रूप और गुण के अनरूप चाहना है । इसे आप सेरोगेसी और टेस्ट ट्यूब के जरिए पा सकते है । यह तकनीक 21 वी सदी की है मगर नाटक में यह पहले से सुद्युम्न के रूप में मौजूद है । सुद्युम्न इला का ही दूसरा रूप है जिसे पितृसत्ता ने अपने हित के लिए इला से सुद्युम्न के रूप में उपचार के माध्यम से परिवर्तित किया । क्योंकि उसे उत्तराधिकारी की आवश्यकता थी और एक महिला राज्य की उतराधिकारी नहीं हो सकती इसके कारण इला को पुरुष बना कर मनु अपने अहम् और अपनी सत्ता को सुरक्षित रखते है । इला का अपना वजूद मनु के लिए कोई मायने नहीं रखता था कि वह किस यौनिक पहचान के साथ जीना चाहती है । समाज में जेंडर पहचान के अंतर्गत एक जेंडर को सक्षम और दूसरे को उससे कमतर माने जाने की सामाजिक प्रक्रिया का ही परिणाम, इला का सुद्युम्न में परिवर्तन था । इस तरह सुद्युम्न पितृसत्ता की मानसिकता से उभरा एक ऐसा पात्र है जो अपनी यौनिक पहचान की लड़ाई से जूझ रहा है । आखिर वह क्या है ? क्यों वह जैसा दिखता है उसके अनुरूप व्यवहार नहीं करता ? क्यों उसकी कल्पनाएँ इच्छाएं कही ओर ही उड़ान भरती है ? मगर हर तरह से वह दबाया जाता है । उसे क्रूर, कठोर, हत्यारा होने की परवरिश दी जाती है । परंतु भीतर से वह कोमल स्वभाव का है । उसकी कोमलता पिता, पत्नी और सत्ता द्वारा कुचली जाती है । उसका अस्तित्व समाजीकरण की प्रक्रिया में भीतर-भीतर ही घुटता रहता है । “ भीतर से खींचता था कोई मन / बाहर खींची जाती थी बांह ”[8]

यौनिकता का एक संदर्भ आज के आधुनिक युग में उन लोगों के लिए भी है जो किसी एक जेंडर पहचान को नहीं मानते। न स्त्री न पुरुष । उन्हें फिर समाज किस श्रेणी में शामिल करेगा । पुत्री नहीं चाहिए थी तो पुत्र में तब्दील कर दिया । मगर अब तो उसमें दोनों गुणों का समावेश है । ऐसे में समाज पुनः उसे स्वीकार करने से मना कर देता है । क्योंकि उसकी नजरों में पुरुषोचित और स्त्रियोचित गुणों का अपना एक खांका निर्मित है । उस खांके में जो भी फिट नहीं होता समाज उसे तुरंत बाहर कर देता है । यह स्थिति आज हमारे समाज में थर्ड जेंडर के सामने भी मौजूद है । जिनकी यौनिक पहचान समाज के तयशुदा खांचो में फिट नहीं होने के कारण समाज में अलग पहचान के रूप में उभरी। सुद्युम्न के समक्ष भी बार-बार खुद को एक खांचे में बनाए रखने का संघर्ष है । सुद्युम्न कहता है –‘क्या मैं बलिदान के लिए तैयार किया जाने वाला पशु हूँ ? यह राजसत्ता विकराल है ..यह पशुसत्ता कभी न थमनेवाली आंधी है महत्वकांक्षा..’[9]। इसी सत्ता ने उसकी पहचान को मिटा उसे दूसरे की पहचान के साथ जीने पर मजबूर किया । वह पहचान थी भावी सम्राट की। वह नहीं चाहता था इस पहचान को मगर उसपर जबरदस्ती इसे लादा जाता है । सुद्युम्न की पत्नी सुमति भी बार-बार सम्राट होने की इसी पहचान से उसे परिचित कराती है । जिस पर सुद्युम्न, सुमति से कहते है कि “कितना विरोधाभास है। जो बात तुम मुझसे कह रही हो, वह पिताजी माँ से कहते थे ! और जो मैं तुमसे कह रहा हूँ वह माँ पिताजी से कहती थी”[10]। सुद्युम्न का यह कथन समाज में निर्धारित स्त्री-पुरुष छवि और उनके निर्धारित कार्यों पर सवाल उठाते है । कि आवश्यक नहीं कि महिला होने से आप में स्त्रियोचित गुणों का भी समावेश स्वतः ही हो जाए और उसी तरह पुरुषों को भी कठोर होना आवश्यक नहीं । यह तो समाजीकरण की प्रक्रिया का एक हिस्सा है । क्यों हम मनुष्य को हमेशा ही ब्लेक और व्हाइट के चश्में से ही देखना पसंद करते है और भी रंग मौजूद है उन्हें देखने के । और रंगों की यही विविधता यौनिकता है ।

सुद्युम्न के प्रश्न मानवीयता के प्रश्न है कि आखिर शासक और सत्ता कठोरता को ही क्यों शासन का हथियार बनाती है ? जबकि वह केवल डर को जन्म देता है । क्यों क्रूरता उसका तत्व है ? क्यों प्रेम, कोमलता और स्नेह को अच्छे शासक की कमज़ोरी और शासक के योग्य गुण नहीं माना जाता । आधुनिक संदर्भो में जब भी महिलाएं सत्ता में आई उनके व्यवहार में वही कठोरता स्वतः ही मौजूद देखी गई । क्योंकि सामाजिक गढ़न में शासक के जिन गुणों को बताया गया वह धीरोदात्त होना था । यह अवधारणा नाट्यशास्त्र और रीतिकाव्यों में देखी जा सकती है । उसी धीरोदात्तता के गुणों से परिपूर्ण न होने पर सुद्युम्न पहले पिता, पत्नी और समाज में लांछित होता है और बाद में स्वयं को साबित करने के द्वंद्व से जूझता है । सुद्युम्न शखण वन पहुँचने पर खुद से सवाल करता है ‘मैं पूछता हूँ रानी कि क्या कठोरता और क्रूरता का नाम ही पुरुष है ?…क्या राजा की सत्ता स्नेह से नहीं चल सकती ?…अगर नहीं चलती तो ये जंगल के जीव ये लताएँ , ये निर्झर, ये पुष्प, ये पक्षी इतने मुक्त इतने स्नेहिल कैसे रहते ?[11]’। सुद्युम्न का प्रश्न केवल उसके अंतःकरण का नहीं है बल्कि आज भी समाज में ऐसे बहुत से लोग मौजूद है जो इसी मानसिक द्वंद्व से गुजर रहे है । या स्त्री और पुरुष गुणों के साथ आम मनुष्य की तरह जीना चाहते हैं । यदि राज्य अपनी निश्चित यौनिक पहचान से बाहर उन्हें स्वीकार कर भी लेता है मगर समाज उन्हें स्वीकार नहीं करता है ।

हम स्र्त्री–पुरुष और किसी विशेष जेंडर पहचान से बाहर आकर मनुष्यता की बात करते हैं तो मनुष्य वह होता है जिसमें संवेदना मौजूद हो । अर्थात उसमें स्त्री गुणों का होना आवश्यक है तभी वह सम्पूर्ण रूप से मनुष्य हो सकता है । क्योंकि समाज में संवेदना का संबंध महिलाओं से होता है । यह बात प्रभाकर श्रोत्रिय इला में गुरु वशिष्ठ और उनकी पत्नी अरुंधती के संवादों के माध्यम से सामने लाने का प्रयास करते है । वह कहते “स्त्री में पुरुष तत्व और पुरुष में स्त्री तत्व के विशेष समन्वय से ही सही अर्थ में स्त्री और पुरुष बनते हैं । पुरुष तत्व से रहित स्त्री मिट्टी की लोथ होती है; अनिर्णय, हीनता और पिलपिलेपन से ग्रस्त और अगर पुरुष स्त्री-तत्व से रहित हो, तो वह निरा राक्षस होता है –अंहकार, क्रूरता और संवेदनहीनता का पुतला”[12]। इला नाटक के माध्यम से प्रभाकर श्रोत्रिय स्त्री और पुरुष की सामाजिक परिकल्पना के आइने को तोड़ते है जहाँ स्त्रीत्व का संबंध केवल महिला और पुरुषत्व का संबंध पुरुष से होता है । वह स्त्री-पुरुष में दोनों ही गुणों के समावेश को उनकी संपूर्णता का मानक मानते है । प्रभाकर श्रोत्रिय की तरह ही नागबोडस अपने नाटक नर-नारी में में कांतीलाल उर्फ़ कांता के माध्यम से कहते हैं-“हर आदमी के अंदर अपने चाह की एक औरत होती है । अब ये अलग है कि वो चाह कभी पूरी नहीं होती”[13]…वैसे जो बारीकी से देखा जाय, तो आदमी औरत में अंदरूनी फरक बोहोत ज्यादा नहीं है । अब बदन की तो कुदरत की ज़रूरत है । उसे छोड़ो । वर्ना नजदीकी, बिछोह, डाह, पिरेम ये सब औरत आदमी में बराबर–बराबर ई होते हैं ”[14] । यह विचार उस दौर में आधुनिक रहा और आज भी यह किसी एक यौनिक पहचान की निश्चितता पर सवाल खड़ा करता है । क्योंकि यौनिकता अपने आप में बहुत बड़ा ‘टर्म’ है। जो मनुष्य के मानसिक व्यवहार से लेकर शारीरिक व्यवहार तक में देखी जा सकती है । ऐसे में कैसे उसे एक खांचे में देखा जा सकता है ? यह विचारणीय है ।

इला नाटक के माध्यम से नाटककार ने स्त्री और पुरुष मन के रहस्यों को उद्घाटित करने का प्रयास किया । क्योंकि स्त्री और पुरुष की निर्धारित छविओं में एक को कोमल दूसरे को कठोर बताया जाता रहा है । जबकि वास्तविकता में पुरुष में भी कोमल भावनाएं विद्यमान होती है । यहाँ इला और सुद्युम्न एक ही शरीर में दो आत्माएं है । जो एक दूसरे को जानते और समझते है । सुद्युम्न कहता भी है ‘स्त्री होकर मेरे पुरुष ने जहाँ कोमलता और सुंदरता का अमृत-कुंड पाया है, वही जाना है अग्नि धर्म और हिमानी जैसी शीतलता का रहस्य !”[15] इसी तरह सुद्युम्न आगे कहता है कि मेरी स्त्री ने पुरुष की देह में रहते हुए जाना है, कर्तव्य और प्रेम का ऐसा द्वंद्व जिसकी छाया भी नहीं है वह आत्मसंघर्ष जिसे अकेली स्त्री या अकेला पुरुष भोगता है । पुरुष देह में मेरी स्त्री ने पाया है कि स्त्री की रक्षा के अहंकार में पुरुष नारियल की खोल की तरह कठोर और सूखा होकर भी उसके रस, रूप और स्पर्श की रक्षा के लिए समर्पित है’[16]। दूसरी ओर वह अपने अकेलेपन, हीनता, विपन्नता और असहाय होने के आंतरिक द्वंद्व को स्त्री पर अधिकार के रूप में पूरा करने का प्रयास करता है । स्त्री न होकर पुरुष अपनी श्री हीनता और कठोरता में कितना, विपन्न, कितना अकेला और कितना असहाय है ! इन्हीं सब खाइयों को भरना चाहता है वह स्त्री को अर्जित करके उसका अतिक्रमण करके । इसीलिए वह कभी नहीं सह पाता स्त्री द्वारा अतिक्रमित होना, हावी होना”[17]। आज भी बलात्कार के जितनी घटनाएं हमारे सामने आती हैं । वह कुछ नहीं पुरुषसत्ता की इसी मानसिकता का परिचायक है । और बलात्कार उसके पौरुषत्व को साबित करने का एक हथियार ।

जेंडर स्त्री और पुरुष समानता की बात करता है । क्योंकि इस सिद्धांत का मानना है कि स्त्री और पुरुष दोनों ही संरचनाएं समाजीकरण का हिस्सा है । और दोनों की मानसिक बुनावटो को समझे बिना उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता है । इला नाटक के माध्यम से प्रभाकर श्रोत्रिय स्त्री और पुरुष की उसी मानसिक निर्मिती को सामने लाते है । जहाँ वह हिंसा के जरिए स्त्री पर अपना अधिकार स्थापित करता है और दार्शनिक बनकर उसके अस्तित्व से ही इनकार कर देता है । वास्तविकता में वह बौनेपन को छुपाने के लिए “स्त्री की सत्ता से ही इनकार कर देता है”। प्लेटो, अरस्तु से लेकर कबीर तुलसी तक सभी ने स्त्री की सत्ता को स्वीकार करने की अपेक्षा उसे इनकार किया है । जबकि स्त्री और पुरुष के बीच का यह अंतर प्रकृतिजन्य नहीं है बल्कि मनुष्य की लालसाओं की देन है । प्रभाकर श्रोत्रिय इसे महसूस करते है । वह सुद्युम्न के माध्यम से इस विचार को सामने भी लाते है । जहाँ वह कहता है कि “मैंने दोनों के अर्थ और संबंध को समर्पण और ग्रहण की संपूर्णता में पहचाना है । आज मैं कह सकता हूँ कि उनके बीच के तनाव प्रकृत नहीं है, वे मनुष्य के विकृत विधान से उपजे हैं”[18] । समाज में स्त्री-पुरुष असमानता और इनसे अलग थर्ड जेंडर समुदाय आज जिस पहचान के संकट से जूझ रहा है । उसका एक कारण पितृसत्तात्मक मानसिकता है जिसने समाज में दो सेक्स पहचान को सही ठहराया । और उससे अलग पहचान को समाज के दायरे से ही बाहर कर दिया । जबकि उनकी पहचान का संदर्भ इतिहास और पुराणों में मौजूद है । उस वक्त जो स्वीकृत था आज किस तरह उसे समाज में अस्वीकृत बना दिया गया । यह आज का उभरता प्रश्न है हमारे समक्ष ।

नर-नारी उर्फ (उर्फ : थैंकू बाबा लोचनदास) नाटक के माध्यम से नाग बोडस ने लोक में बाबा लोचनदास के मिथक के माध्यम से स्त्री-पुरुष संबंधों और उनमें भी पुरुष के स्त्री भेष में रहने की सामाजिक प्रथा के माध्यम से इन संबंधों की यथास्थिति पर प्रकाश डाला है । यह आवश्यक नहीं की स्त्री-पुरुष अपनी निर्धारित छवियों में ही समाज में मौजूद रहे । उनसे इत्तर छवि भी मौजूद है । जैसा कि गाँव में सभी पुरुषों का सात दिनों तक महिला बनकर रहना और उनकी तरह व्यवहार करना दूसरा कांतीलाल का कांता बनकर नौटंकी में महिला पात्र की भूमिका अदा करना । लोक में बाबा लोचनदास के मिथक के माध्यम से नागबोडस ने पुरुष और महिला के संबंधों में सखी भाव को जगह देने की बात की । ऐसे में कांतीलाल उर्फ़ कांता और गुल्लो का संबंध इसी सखी भाव से उपजा संबंध था । “कांता (गुल्लो) तेरी काया दिमाग में आई और अपनी पोशाक पे नजर गई और दोनों बेमेल लगे और फिर शर्म पे शर्म कि कैसे जाऊ तेरे सामने । और तब जिंदगानी में पहली दफ़ा जो बात समझी कि औरत का भेस रखना बहुत मुश्किल काम है”[19]। कांता, गुल्लो का यह वार्तालाप पुरुष का स्त्री को समझने की प्रक्रिया का पहला चरण रहा । गुल्लो की भी मानसिक स्थिति कांतीलाल जैसी ही थी । क्योंकि सामाजीकरण में हमने कभी महिला-पुरुष की एक वेशभूषा के संदर्भ में सोचा ही नहीं । मगर गुल्लों स्वीकारती है और सखी रूप में अपनाती है और खुश होती है पति को इस रूप में पाकर । क्योंकि आज समाज में पति-पत्नी संबंधों में मित्रता से अधिक सत्ता संबंध देखे जाते हैं ।

नागबोडस ने अपने समय में पश्चिम और भारत में चल रहे नारीवादी आंदोलन के दौरान उठ रहे महिला- पुरुष संबंध, लिंगभेद, यौनिकता जैसे सवालों को इस नाटक के माध्यम से उठाने का प्रयास किया । पूरे गाँव के पुरुषों का लोचनबाबा की पूजा में एक सप्ताह तक महिला के रूप में रहना और उस प्रथा के दौरान स्वयं को उसी रूप में ढालना । दर्शाता है कि एक समाज ऐसा भी है जहाँ पुरुष का महिला के रूप में रहना अपमान नहीं है । भले ही कारण लोचन बाबा का इस गाँव को श्राप रहा है । परंतु एक कारण स्त्री को समझना भी रहा है । दिलावर का गाँव पहुंचना और मज़बूरी में दिलवरी बनाए जाने के बाद, एक मिथकीय कल्पना को गढ़ना और कहना उसने एक बार सपने में भगवान् से महिला और पुरुष के बीच के अंतर के कारणों को जानना चाहा था । और भगवान उसे कहते है सुनो, आदमी औरत का फरक समझना बहुत मुश्किल ।…हमने खुद तजुर्बे से समझा ..मोहिनी के रूप में..संजोग की बात देखों कि तजुर्बे का मौका मिल गया : जै बाबा लोचनदास”[20]। यह तजुर्बा जेंडर भेद को समझने की एक प्रक्रिया या तकनीक के रूप में अपनाया जा सकता है ।

मगर एक सवाल यह नाटक ओर उठाता है वह स्वानुभूति और सहानुभूति का । क्योंकि भले ही गाँव के सभी पुरुष बाबा लोचन दास के श्राप के कारण महिलाओं की वेशभूषा धारण करते है परंतु उनकी मानसिकता व स्वभाव में उसका प्रभाव नहीं मिलता । चमेली के साथ पुरुषों ने आक्रामक व्यवहार किया । उसके “गाल छूकर अपनी उगलियों का चुंबन लेकर ..” जैसा दुर्व्यहार किया जाना । कांतीलाल इसका विरोध करते हैं “एक अबला के साथ ऐसा सुलूक ?..लोचन बाबा की तुम्हारी पूजा झूठी । तुम्हारा नेम झूठा । आज पूजा करी और आज ही एक देवी के संग ऐसा व्यवहार ”[21]। अपने आप में शर्मनाक घटना रही । इला नाटक में भी मनु का व्यक्तित्व इसी तरह का रहा जहाँ वह कहते हैं “दूसरों की कन्याओं से प्रेम करना और अपने लिए कन्या चाहना दो अलग बाते हैं”[22]। यहाँ यह सवाल भी समाज के समक्ष उभरकर आता है कि आज भी सैद्धांतिक तौर पर स्वयं को महिलावादी या महिला हितैषी कहने वाले कितने ही पुरुष व्यवहारिकता में पितृसतात्मक मानसिकता से ग्रसित देखें जाते हैं । महिला उनके लिए वहां भी एक कमोडिटी से अधिक कुछ नहीं होती है ।

नर-नारी नाटक उत्तर भारत में विशेष रूप से नौटंकी में पुरुषों की महिलाओं के रूप में सक्रिय भागीदारी को उजागर करता है । जहाँ संगीत नृत्य में पारंगत होने व आर्थिक रूप से सबल न होने के कारण बहुत से युवा इस पेशे को अपनाते है और समाज में यौन शोषण का शिकार होते हैं । उनके शोषण का सबसे बड़ा कारण उनके पुरुष रूप में स्त्री गुणों का होना था । जैसा कि दिलावर कांतीलाल उर्फ़ कांता के नौटंकी में काम करने के दौरान उससे रिश्ता कायम करने का प्रयास करना “तू जमीदार की साली नहीं, दिलावर की कांता है ।(कांता के गले में बाहे डालता है और उसे चूमने की कोशिश करता है । कांता अलग होकर उसमें एक चिंटा जड़ देती है”[23]। )’ दिलावर का चमेली, कांता और कांतीलाल की पत्नी गुल्लो के साथ का व्यवहार उसकी पितृसत्तात्मक मानसिकता को उद्घाटित करता है । जहाँ उसके लिए स्त्री –पुरुष दोनों ही यौन आनंद का माध्यम है उससे अधिक कुछ नहीं । यहाँ यौनिक शोषण किसी एक खांचे में बंधा नहीं है । बल्कि आज लडकियों, लड़को के साथ ही थर्ड जेंडर समुदाय तक को मानवतस्करी के दौरान यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है ।

कुल मिलाकर देखा जाए तो इला और नर-नारी उर्फ़ थैक्यू बाबा लोचनदास दोनों ही नाटक अपने समय में चल रहे महिला आंदोलन और ट्रांसजेंडर समुदाय के सवालों पर लेखन के जरिए बात करते हैं । और स्त्री-पुरुष संबंधो के अंतर के मूल कारणों को सामने लाने का प्रयास करते हैं । दोनों ही नाटककार लेखन के माध्यम से महिला और पुरुष के बीच खीची विभाजक रेखा को समाजीकरण का हिस्सा मानते हैं । क्योंकि स्त्री–पुरुष में शारीरिक संरचनात्मक भेद के अलावा जो सामाजिक भेद मौजूद है वह प्राकृतिक नहीं बल्कि मनुष्य द्वारा ही बनाया गया है । दोनों ही नाटक स्त्रीत्व और पुरुषत्व गुणों से पूर्ण व्यक्ति की कामना करते है । क्योंकि इन दोनों तत्वों में से एक की भी कमी उनकी मनुष्यता पर खतरा है । यहाँ मनुष्यता का आशय संवेदनाओं का होना है । यह दोनों ही नाटक पौराणिक और लोक में व्याप्त मिथकों के आधार पर यौनिकता के सवाल को भी उठाते है कि व्यक्ति की यौनिकता आवश्यक नहीं कि एक ही तरह की हो जैसे सुद्युम्न का चरित्र भले ही मनु की मानसिकता से उभरा परंतु उसका व्यक्तित्व स्त्री और पुरुष दोनों ही गुणों के साथ सामने आता है । नर-नारी नाटक में कांतीलाल का कांता के रूप में नौटंकी में काम करना उसे ख़ुशी देता है दूसरी ओर वह अपनी पत्नी गुल्लो से भी प्रेम करता है । यौनिकता अपने स्वभाव में परिवर्तनशील होती है । इस तरह श्रीमद भागवत के नवम स्कंध के पहले अध्याय से सुद्युम्न की कथा और लोक से बाबा लोचनदास की कथा को नाटकों में प्रयोग किया गया और इन मिथकों के जरिए आज के समय की ‘ट्रांसजेंडर’ बहस को उजागर करने का प्रयास किया गया। सुद्युम्न का चरित्र आज के ट्रांसजेंडर समुदाय की मानसिक स्थिति को उजागर करता है । यह वह समुदाय था जिसे समाज ने हाशिए पर रखा । क्योंकि वह उनसे अलग थे । किसी ने उनके मनोभावों को समझने का प्रयास नहीं किया । राज्य व सत्ता अपना हित देखती है और सुद्युम्न इन सबसे घिरा मगर फिर भी अकेला अपनी पहचान के प्रश्न से जूझता है । आज इनकी ‘पहचान’ बहस का केंद्र है । भले ही संविधान में इन्हें थर्ड जेंडर के अंतर्गत शामिल किया गया है । बावजूद समाज में इनकी क्या पहचान है ? यह भी एक सवाल है । क्योंकि आज भी उत्तरप्रदेश व अन्य बहुत से स्थानों पर नौटंकी में काम करने वाले पुरुषों को महिलाओं की भूमिका निभाने के कारण समाज में हाशियाकरण, शोषण और मज़ाक का पात्र बनने पर मजबूर होना पड़ता है । इसीलिए आज आवश्यकता है ‘डी-जेंडर’ होने की । अर्थात जेंडर की इस व्यवस्थित संरचना को तोड़ना, ताकि यह लोग भी समाज का हिस्सा बन सके । और खुद को एक जेंडर, सेक्स और यौनिक पहचान के रूप में साबित करने पर मजबूर न हो ।

विशेष संदर्भ

इला, प्रभाकर श्रोत्रिय, आकाशदीप पब्लिकेशन, संस्करण-1996, नई दिल्ली

  • नर-नारी, नाग बोडस,वाणी प्रकाशन, द्वितीय संस्करण-2005, नई दिल्ली
  • स्त्री मुक्ति का सपना, (अतिथि सं.) अरविंद जैन, लीलाधर मंडलोई, (सं.)कमला प्रसाद, राजेन्द्र शर्मा, वाणी प्रकाशन, आवृति संस्करण-2014, नई दिल्ली
  • परंपरा, इतिहास बोध और संस्कृति, डॉ श्यामाचरण दुबे, राधाकृष्ण प्रकाशन, संस्करण-2008, नई दिल्ली
  • भारतीय रंगकोश, संदर्भ हिंदी खण्ड-2 रंग व्यक्तित्व, (सं.) प्रतिभा अग्रवाल, अमिताभ श्रीवास्तव, नाट्य शोध संस्थान, कोलकाता
  • मोहन राकेश: रंग शिल्प और प्रदर्शन: डॉ. जयदेव तनेजा, राधाकृष्ण प्रकाशन,पहली आवृति-2002, नई दिल्ली
  • रंग प्रक्रिया के विविध आयाम, (सं.)प्रेम सिंह और सुषमा आर्य, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2007
  • हिंदी नाट्य परिदृश्य, (सं.)डॉ. धीरेन्द्र शुक्ल, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, संस्करण-2004
  • हिंदी नाटक, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, आवृति- 2008
  • http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2001/myth.htm
  1. स्त्री मुक्ति का सपना,(सं.)कमला प्रसाद, पृ-79

  2. परंपरा, इतिहास बोध और संस्कृति, डॉ श्यामाचरण दुबे, पृ-30

  3. http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2001/myth.htm

  4. परंपरा, इतिहास बोध और संस्कृति, डॉ श्यामाचरण दुबे,पृ-30

  5. इला, प्रभाकर श्रोत्रिय, पृ- 34

  6. इला, प्रभाकर श्रोत्रिय, पृ- 37

  7. इला, प्रभाकर श्रोत्रिय

  8. इला, प्रभाकर श्रोत्रिय, पृ- 47

  9. इला, प्रभाकर श्रोत्रिय, पृ- 57

  10. इला, प्रभाकर श्रोत्रिय, पृ- 60

  11. इला, प्रभाकर श्रोत्रिय, पृ- 66

  12. इला, प्रभाकर श्रोत्रिय, पृ- 100

  13. नर-नारी, नाग बोडस, पृ-51

  14. नर-नारी, नाग बोडस, पृ-52

  15. इला, प्रभाकर श्रोत्रिय, पृ- 114

  16. इला, प्रभाकर श्रोत्रिय, पृ- 114

  17. इला, प्रभाकर श्रोत्रिय, पृ- 114

  18. इला, प्रभाकर श्रोत्रिय, पृ- 115

  19. नर-नारी, नाग बोडस, पृ-38

  20. नर-नारी, नाग बोडस, पृ-18

  21. नर-नारी, नाग बोडस, पृ-34

  22. इला, प्रभाकर श्रोत्रिय

  23. नर-नारी, नाग बोडस, पृ-28

मनुष्य और पशु के साहचर्य जीवन को दर्ज करती रेणु की कहानी ‘तॅबे एकला चलो रे’

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renu kahani

मनुष्य और पशु के साहचर्य जीवन को दर्ज करती रेणु की कहानी ‘तॅबे एकला चलो रे’

डॉ. मणिबेन पटेल

8383805299

शोध सारांश

फणीश्वर नाथ रेणु अपने समाज, परिवेश, लोक संस्कृति और संवेदना के महान कथाकार हैं। उनकी कहानियों में बिहार क्षेत्र (विशेषतया; मैथिल अंचल तथा बिहार-बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों) का लोकजीवन, आंचलिक परिवेश दृष्टिगत होता है। स्थानीय रंग, रूप, गंध, स्पर्श – सभी को रेणु एक सूत्र में पिरोते हैं।‘तॅबे एकला चलो रे’ इनकी चर्चित कहानियों में से एक है। यह कहानी तमाम संवेदनाओं और भावनाओं से बुनी गई है। इसमें संवेदना का विस्तार मनुष्यों की भाव-भूमि से विस्तृत होकर पशु जगत तक दिखाई पड़ता है।

बीज शब्द: साहित्य, परिवेश, लोक संस्कृति, कथाकार, क्षेत्र

शोध आलेख

फणीश्वर नाथ रेणु अपने समाज, परिवेश, लोक संस्कृति और संवेदना के महान कथाकार हैं। उनकी कहानियों में बिहार क्षेत्र (विशेषतया; मैथिल अंचल तथा बिहार-बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों) का लोकजीवन, आंचलिक परिवेश दृष्टिगत होता है। स्थानीय रंग, रूप, गंध, स्पर्श – सभी को रेणु एक सूत्र में पिरोते हैं।‘तॅबे एकला चलो रे’ इनकी चर्चित कहानियों में से एक है। यह कहानी तमाम संवेदनाओं और भावनाओं से बुनी गई है। इसमें संवेदना का विस्तार मनुष्यों की भाव-भूमि से विस्तृत होकर पशु जगत तक दिखाई पड़ता है।

कहानी की शुरूआत लालबाबू की भैंस के बच्चे (पाड़ा) के जन्म से होता है। अनुपयोगी समझकर लोग उसकी उपेक्षा करते हैं। यहाँ तक कि उसके लिए अमंगल वचन बोलते हैं। मनुष्य के उपयोगितावादी नजरिए के कारण उसके साथ उचित न्याय नहीं होता। लेखक मनुष्यों में बेटी और पशु जगत में बेटा अर्थात नर के प्रति नकार के भाव की भारतीय कुरूप मानसिकता को बेहद सहजता के साथ उजागर करते हैं। कहानी में गाँव और परिवार के बड़े-बूढ़े षष्ठी माँ से प्रार्थना करते हैं – ‘‘जय मैया छठी! मानुस को दो बेटा, पसु को बेटी।… ले जा मैया पाड़ा, दे जा मैया पाड़ी। ’’1‘ले जा’ से अर्थ है उठा लो अथवा बलिदान लो। यह उपयोगितावादी दृष्टि मनुष्य समाज की विडंबना है। वह चीजों को तब तक स्वीकार नहीं करना चाहता जब तक कि उसमें स्वयं उसे अपना हित ना दिखे। पाड़ा (किसन महराज) के साथ भी यही होता है।

‘‘ किसन महराज को कौवे तंग करते … बेचारा शुभ दिन में धरती पर आया और जन्म से ही अपमान और लाँछना सह रहा है ! पाड़ी होती तो गले में कौड़ियों की माला के साथ एक टुनटुनी भी पड़ी होती। कोई आँख के कीचड़ पोछ जाती, हवेली से बाहर निकल कर कोई बड़ी जतन से दूध में जड़ी घिस कर पिलाती- चुचकार कर। घर की बड़ी बूढ़ी सदा तीर धनुष लेकर बथान को अगोरती। उड़ने वाले हर परेवा पंछी को कौवा समझ कर हाँकती।’’2

लालबाबू, किसन महराज (पाड़ा) के दुख से दुखी है। उसका डगमग करके चलना लेखक को जैसे बाल्यकाल के तुलसी के राम की याद दिला देता है।‘ठुमकि-ठुमकि प्रभु चलहिं पराई !’यह सौंदर्य बोध अद्भुत है। गाँव, परिवार की उपेक्षा के बाद भी बिना किसी की परवाह किये लेखक अपनी आत्मा की आवाज सुनता है और उसे अपने साहचर्य में रखता है। उसे स्नेह के साथ दुलारता पुचकारता है।‘‘उसे दिखलाकर मैंने पाड़े के मुँह के पास अपना मुँह लाकर चुचकार दिया। चु: चु: !… आदमी के उस पिद्दी बच्चे ने मेरी ओर घृणा भरी दृष्टि से देखा, फिर धरती पर थूकता हुआ आँगन की ओर भागा – राम! राम! तोबा, तोबा! बाबूजी निरघिन डोम भेल – पाड़ा क थुथनी में चुम्मा लेल… !’’3 दरअसल सामाजिक रूप से अत्यंत ही घृणित व्यक्ति को मिथिलांचल में ‘निरघिनडोम’ कहा जाता है। लेखक ने अपनी कहानियों में लोक भाषा का जबरदस्त प्रयोग किया है। भौगोलिक रूप से मिथिला और बांग्ला एक दूसरे से जुड़े भूभाग भी हैं। इसलिए भी कहानियों में बंगला और मैथिली शब्द ही ज्यादातर प्रयुक्त हैं।‘‘पूरब मुलुक से आए हुए व्यापारियों के दल का कोई ‘लबाना’(पाड़ा खरीदने वाला) इसके पुट्ठे पर हाथ रख कर परीक्षा करेगा– अभी तो एकदम बच्चा है। हल में लगाने के काबिल नहीं …लेबोना, एटा लेबोना!… शायद हर बात में लेबोना सुनकर ही लोगों ने इन व्यापारियों को लबाना कहना शुरू किया।’’4 ग्रामीण परिवेश, रहन-सहन, बोली- बानी, प्रकृति को सजीव रूप में इन्होंने अंकित किया है। देहात के सरल जीवन में आत्मीयता अधिक है। नफा-नुकसान से परे भी एक संबंध है जो ग्रामीण संस्कृति की धड़कन में बसता है। जीवन के विविध रूपों, उसकी सरल सहज वृत्ति, मनोदशा का हृदयस्पर्शी चित्रण रेणु ने किया है। किसन महाराज को परिवार के लोगों द्वारा मकदूम मियां के हाथ नब्बे रुपये में बेच देने के बावजूद लालबाबू गाँव लौटने पर एक सौ दस रुपये देकर पाड़ा को वापस लाता है। अपने मालिक के प्रति पशु का अद्भुत प्रेम प्रेमचंद की कहानी ‘दो बैलों की कथा’ के हीरा मोती की याद दिला देता है। इसका वर्णन लेखक अपनी पत्नी के द्वारा कुछ इस प्रकार से करवाते हैं- ‘‘कन्हाई बाबू ने रुपए गिन कर मकदूम के हाथ में पाड़े की रस्सी थमा दी, लेकिन पाड़ा रस्सी तुड़ाकर आँगन भाग आया, मेरे पास। मैं रसोई घर में थी। वहाँ पहुँचकर डिकरने लगा।… एह! आँख से लोर झहर-झहर झर रहे थे … आँचल में छिपने की कोशिश कर रहा हो मानो।’’5 मनुष्य और पशु के भावनात्मक रिश्ते, अपनेपन की गंध, सहज वृत्ति जैसे इस कहानी में मूर्त हो उठी है। लालबाबू पाँच-पंचों के बीच में कह आता है कि यह पाड़ा आज से सबका हुआ, गाँव का, इलाके का। धीरे धीरे यह सबका प्यारा हो जाता है। गाँव भर के बच्चे इस पर सवारी करते हैं। दरअसल गाँव में सुख शांति लेखक का सपना है और उसके द्वारा गढ़ा गया पात्र ‘किसन’ इस सपने को पूरा करने का जिम्मा अपनी आखिरी साँस तक उठाता है। कठिन समय में गाँव वालों की रक्षा करता है। ग्रामीण समाज की विडंबना रही है कि वह पूजा-पाठ, धर्म आडंबर में ही प्रसन्नता का अनुभव करता है। इस आवरण में वह अपना सब कुछ न्योछावर करने के लिए तैयार हो जाता है। जो ग्रामवासी किसन की उपेक्षा करते हैं वही उसे ‘देवहा’ पाड़ा कह कर पूजते भी हैं और उसकी प्रिय वस्तुएं खिलाकर खुद को सुरक्षित व संतुष्ट पाते हैं। इस कहानी में गाँव की विद्रूपताओं, विसंगतियों, ग्रामीण जन की पीड़ा के साथ ही लोकजीवन की सत्यानुभूति, सहज मन की सहज अभिव्यक्ति भी मुखरित हुई है। यह कहानी मनुष्य के निरंतर बदलते हुए व्यक्तित्व को भी परिभाषित करती है। इसमें सामाजिक समस्याओं के प्रति लेखक की चिंता को गहराई से महसूस किया जा सकता है। गौरतलब है कि उस दौरान जमीन हदबंदी एक बड़ी समस्या थी। भूमि सुधार को लेकर विभिन्न जनवादी पार्टियों द्वारा तरह-तरह की माँग भी की जा रही थी । कुछ लोगों का विचार था कि एक निश्चित अवधि तक जो खेत में अन्न उपजाये खेत उसी के नाम पर कर दिया जाए अर्थात् जमीन उसी की जो जमीन की जुताई करे, उसपर फसल उपजाए | चूँकि बड़े किसान, जमींदार अपनी जमीन गरीब बटाईदारों को दे दिया करते थे इसलिए उनके मन में अपना खेत हड़पे जाने का भय समा गया। गाँवों में किसान और गरीब बटाईदारों में हिंसा शुरू हो गई । रेणु लिखते हैं – ‘‘बिहार विधानसभा में जमीन हदबंदी के सवाल पर विचार होना अभी भी बाकी है। लेकिन जिस दिन यह प्रस्ताव सदन में पेश हुआ उसके दोमाह पहले से ही… जिले में किसान और गरीब बटाईदारों में कई जगह गुत्थम-गुत्थी भी हो गई।’’6 कहानी में लाल बाबू के गाँव में भी किसान, जमीदारों ने तय किया कि वे फसल बटाईदारों को नहीं काटने देंगे। योजनानुसार किसान शिव शंकर सिंह लठैतों के साथ जमीन पर आ धमके। बटाईदार वाक हो गए। चारों ओर कोहराम मच गया। अभागे बटाईदार लालबाबू के पास आकर गिड़गिड़ाने लगे पर लालबाबू अपने पसीजते हुए दिल को पत्थर बनाने की चेष्टा में व्यस्त होने की कोशिश करते रहे। दरअसल पारिवारिक, सामाजिक तमाम दबाव या कहें कि अपना स्वार्थ आड़े आने पर मनुष्य चाहते हुए भी उचित न्याय नहीं कर पाता। जहाँ उसका हित दिखता है वहाँ उसका रवैया कहीं ना कहीं पक्षपातपूर्ण हो ही जाता है। आखिर किसन महाराज मोर्चे पर पहुँच जाता है। गाँव वालों की लड़ाई अकेले लड़ता है और शहीद होता है। किसन के माध्यम से लेखक की घुटती हुई आत्मा को जैसे रास्ता मिल जाता है ।इसके बाद गाँव में सर्वत्र शांति विराजमान हो जाती है । लोग आपस में समझौता कर लेते हैं।

किसन की समाधि पर आसपास के कई गांव वालों ने शोक जताया। धूप दीप जलाया गया, शंख ध्वनि की गई, लाल शालू का झंडा गाड़ा गया। एक विद्यार्थी ने अपनी टूटी-फूटी भाषा में भाषण भी दिया कि ‘‘जब आदमी के दुख को आदमी ने नहीं समझा, किसन महराज ने पशु होकर आदमी का काम किया। आदमी का काम नहीं देवता का ।’’7दरअसल जो नैसर्गिक न्याय मनुष्य नहीं कर पाता, उसे कहानी में पशु के माध्यम से लेखक ने संपन्न करवाया है। पाड़ा जिस तनुक शाह के घर की चोर से रक्षा करता है उसी तनुक शाह को उसकी बेईमानी की सजा उसके दो बीघे तंबाकू को रौंद कर देता भी है। लेखक कहते हैं कि ‘‘तनुक शाह ने दो दर्जन केले खिलाए थे किसन महराज को… लेकिन दो दर्जन केले खिलाकर उसकी नीति भ्रष्ट नहीं कर सका तनुक शाह।’’8

जब गाँव का ही कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति लालच देकर संतोषी की बेवा से अपनी तृप्ति के लिए प्रेम निवेदन करता है तब भी पाड़ा वहाँ पहुँच जाता है और संतोषी की बेवा की रक्षा करता है। संतोषी की बेवा के शब्दों में -‘‘…सच कहती हूँ मालकिन, उस दिन किसन महराज नहीं आ जाता तो मैं डूब चुकी थी।’’9

इस कहानी में लेखक यह भी दर्शाने की कोशिश करता है कि न्याय बलिदान माँगता है, न्याय के लिए लड़ना पड़ता है, सजग रहना पड़ता है । किसन महराज लेखक के प्रतिनिधि के रूप में पूर्ण न्याय करता है। अकेले ही गरीबों के हक की रक्षा करता है। शारीरिक रूप से मर कर भी विचार दर्शन के रूप में जैसे सब में प्रवाहित हो उठता है। शायद इसलिए उसके समाधि पर विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर का गीत ‘जोदि तोर डाक सुने केउ ना आसे…’ भी गाया जाता है। कहानी में लेखक के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज है। तमाम आरोप उस पर लगे हैं। किसन के कृत्यों के लिए उसे दोषी ठहराया गया। किसन को समाधि देने के लिए एकत्रित लोगों से पुलिस प्रशासन के कान खड़े हो गए हैं। प्रशासन इस घटना को अपने नजरिए से देखता है। दरअसल चेतना के स्तर पर जागृत होता समाज हमेशा से ही सत्ता के लिए चुनौती रहा है। कहानी में लेखक से जवाब तलब किया गया है। लालबाबू कहते हैं -‘‘जानता हूँ, कचहरी में ऐसे बयान आजादी की लड़ाई के दिनों क्रांतिकारी लोग ही देते थे, जिन्हें तत्कालीन हाकिम न पढ़ते थे न सुनते थे। किंतु आप के संबंध में यह मशहूर हो चुका है कि आप किसी भी मुकदमे की राई-रत्ती तक पढ़ते हैं, सुनते हैं।’’10 लेखक का यह कथन हमारे प्रशासन पर व्यंग है चूँकि आजादी के बाद भी उसके स्वरूप में कुछ खास परिवर्तन नहीं हुआ है। हम आज 21वीं सदी की सत्ता, पुलिस, प्रशासन पर नजर डालें तो स्थितियाँ भयावह ही नजर आती हैं। लेखक सियासी दाव पेंच और उसके खतरे को बेहद गहराई से महसूस करता है। आज भी चालाक तंत्र, आम आदमी को अनेक ढंगों से व्यक्तित्वहीन बनाने की लगातार कोशिश कर रहा है। शासकों की मूर्खता ने जनता को बदहाल कर रखा है। आज हम शब्दरहित भय के साए में जी रहे हैं। लोग यथास्थिति से समझौता किए जा रहे हैं। दुनिया का इससे खतरनाक दौर और क्या हो सकता है जहाँ आजादी का मतलब महज सत्ता का बदल जाना हो गया है। खासकर ऐसे समय में जबकि मनुष्यता जैसे पद का भी अपहरण हो चुका है- यह कहानी हमें सचेत करती है।

कहानी में दरोगा किसन महराज की समाधि पर गाड़े गए लाल झंडे के प्रति सशंकित है। इस पर लालबाबू कहते हैं – ‘‘गाँव के किसी भी देव स्थल पर लाल शालू का झंडा फहराया जाता है। हनुमान जी का झंडा हो या मां चंडिका का – रंग लाल ही होता है।’’11 रिपोर्ट के आधार पर उससे तो यहाँ तक पूछ लिया जाता है कि आपके नाम लालबाबू का लाल किसी राजनैतिक लाल का संकेत है क्या?…यह सच है कि रेणु किसी विचार, दर्शन या आदर्श को अपनी कहानियों के केंद्र में रखकर नहीं चलते परंतु प्रकारांतर से उनकी पक्षधरता और विचारों की झलक उनके लेखन में सर्वत्र विद्यमान है । समकालीन कथाकारों की कहानियों से बिल्कुल अलग अपने आप में बेजोड़ उनकी कहानियाँ एक नया सौंदर्यशास्त्र निर्मित करने की माँग करती है। उनके लेखन को उनके जीवन से अलगाकर नहीं देखा जा सकता। ऐसा लगता है जैसे उनका लेखन हमारे अहसासों, संवेदनाओं की परत दर परत कुरेदता चल रहा हो। ग्रामीण समाज की तमाम समस्याओं, मनुष्य की अनेकानेक चिंताओं को इन्होंने एक लय में पिरोया है । अपने समाज, परिवेश के कोने-कोने से ये गहरे परिचित हैं। चीजों के तह तक कहानीकार की दृष्टि पहुँचती है। रेणु ने अपने हृदय की स्पंदन को इस कहानी में बड़ी कुशलता के साथ दर्ज किया है। स्वतंत्रता पश्चात का उत्तर भारतीय ग्रामीण जीवन, रीति-रिवाज, लोक विश्वास का यथार्थ इस कहानी में देखा जा सकता है।

कहानीकार अंत में लिखते हैं कि ‘‘गाँव के दर्जी ने झंडे पर पाड़े की आकृति बनाने की चेष्टा की है, सफेद कपड़े से। मुझे लगता है कि दरोगा साहब ने झंडे में अंकित किसन महाराज के सिंगों को हसिया समझा… पैर को हल… पूछ को चक्र… मुँह को हथौड़ा…! दोष उनकी दृष्टि का है।’’12 चूँकि सर्वहारा वर्ग का समाजवादी, वामपंथी विचारधारा पर विश्वास सत्ता को अपने लिए खतरा नजर आता है। हमेशा से ही चेतना के धरातल पर जनता को पंगु करना इनकी फितरत रही है। लेखक ने सत्ता और प्रशासन के चारित्रिक पतन को पहचाना है। पाड़ा एक विचार दर्शन के रूप में पूरे गाँव का प्रतिनिधित्व करता है। यह कहानी जनविरोधी स्थितियों की पहचान कराती है। राजनीतिक अव्यवस्था, सामाजिक कुरूपता, आपसी मतभेद पर चोट करती है और वैचारिक एकजुटता के लिए साहस का संचार भी करती है।

संदर्भ सूची:

1. रेणु, फणीश्वर नाथ : आदिम रात्रि की महक : अनुपम प्रकाशन, पटना, बिहार, प्रकाशन वर्ष –1997 : पृष्ठ संख्या – 6

2. वही, पृष्ठ संख्या – 7

3. वही, पृष्ठ संख्या – 9

4. वही, पृष्ठ संख्या – 8

5. वही, पृष्ठसंख्या – 11

6. वही, पृष्ठ संख्या – 14

7. वही, पृष्ठ संख्या – 20

8. वही, पृष्ठ संख्या – 12

9. वही, पृष्ठ संख्या – 14

10. वही, पृष्ठ संख्या – 10

11. वही, पृष्ठ संख्या – 20

12. वही, पृष्ठ संख्या – 20