का प्रयास किया गया है। यहाँ जिस साहित्य की बात की जा रही है वह 13-18 आयु वर्ग के बच्चों के लिए प्रयुक्त वास्तविक साहित्य
(समसामयिक समाज की समस्याओं, प्रश्नों, भावनाओं, त्रासदियों इत्यादि की बात करने वाला मुख्यधारा का साहित्य
न कि किसी साफ-सुथरी तस्वीर में बंधा बच्चों पर आदर्शवाद थोपने वाला कल्पना पर
आधारित साहित्य) है। आज के समाज में मीडिया के माध्यम से बच्चों व् किशोरों के
सामने इतनी विविध सामग्री बिखरी रहती है कि वह मानसिक परिपक्वता के तरफ तेजी से
बढ़ते जाते है और पुरानी पीढ़ी से कहीं अधिक मानसिक जटिलता के साथ बड़े हो रहे है।
ऐसे में यदि उन्हें आदर्शवादी, काल्पनिक साहित्य ही दिया जायेगा तो वह उनके लिए वास्तविकता
से अलग ,उबाऊ और निरर्थक होगा इसलिए ‘‘वास्तविक साहित्य’’ की गहन भूमिका है।
हालाँकि अपनी आवश्यकताओं के अनुसार उसमे
से चुनाव करना और उससे कोई अर्थ गढ़ पाना बेहद जटिल प्रक्रिया है। किशोरवय के बालक
यूँ भी शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक ‘‘बदलावों के तूफ़ान और दबाव’’ से गुज़र रहे होते
है। इसी कारण विद्यालयी शिक्षण में उचित मार्गदर्शन की भी अनिवार्य आवश्यकता है।
इस तरह का साहित्य किशोर बालकों को अपनी तरफ आकर्षित करता है और जुड़ने के विविध
आयाम देता है; जो उसके वास्तविक जीवन के ही आयामों से सम्बंधित होते है।
इस प्रकार के साहित्य से जुड़ाव बच्चों के भाषिक संकाय को प्रबल करता है। और उनकी
तरफ बढ़ने का मनोबल भी देता है। इस साहित्य की भाषा सामाजिक भाषा है और भाषा खुद भी
सामाजिक सरोकार का माध्यम है। अतःइस शोध पत्र में वास्तविक साहित्य शिक्षण से
किशोर बालकों के भाषा अधिगम और संकल्पनाओं
के संवर्धन पर प्रकाश डाला गया है।
तथ्यों में से एक है। हर विकसित समाज में
साहित्य की उपस्थिति इसका प्रमाण है, कम विकसित जनजाति समुदायों में भी लोकगीत,
लोककथाएँ आदि के रूप में उत्तम साहित्य मिल जाता है। इससे समाज के लिए साहित्य की
अनिवार्यता अपने आप ही सिद्ध हो जाती है। साहित्य समाज का सशक्त अंग होता है।
मनुष्य को बनाने एवं सँवारने में साहित्य का विशेष योगदान होता है। साहित्य
अर्थात् सबका हित। ’’साहित्य और समाज एक ही सिक्के के दो पहलू होते है। एक के बिना
दूसरे के अस्तित्व की परिकल्पना का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता है। (मुकुन्द
द्विवेदी )’’ [i]
बाल साहित्य के सन्दर्भ में एक समस्या तो यह है की बच्चों के विकास में साहित्य की भूमिका को हमारी
शिक्षा व्यवस्था में अनदेखा किया गया है। पाठ्यपुस्तकीय ज्ञान को ही हमारी शिक्षा
व्यवस्था, अभिभावक आदि सर्वोपरि मानते है। एक अन्य समस्या है बाल साहित्य की उपलब्धता से
संबंधित , बच्चों की आवश्यकता के अनुसार साहित्य की उपलब्धता नही हैं फिर भी औपचारिक शिक्षण
में साहित्य का भारांश बहुत अधिक होता है जिससे यह तो साबित होता है कि शिक्षण में
साहित्य को शिक्षाविद् प्रासंगिक तो मानते है। इस प्रासंगिगता के लिए तर्क दिए
जाते है-
है। साहित्य संसार के विषय में हमारी अवधारणा को आकार प्रदान करता है और मनुष्य
होने के लिए अनंत संभावनाओं व अंतदृष्टि प्रदान करता है।
(एस्थेटिक एक्सपीरियंस) प्रदान करना है, विचार व जीवन के अनुभवों को सन्तुष्टि स्तर पर ले जाना,
भाषा के माध्यम से रसानुभूति करवाना,
पठन से उभरी कल्पना/दृश्य/विचार/अवधारणा जनित भावनाओं व तर्क
के जटिल समावेश का अनुभव करना है।
प्रदान करता है कि वह अपने से भिन्न समय, घटना, स्थिति, देशकाल-वातावरण आदि का अनुभव प्राप्त कर सकें। पाठक इसके
माध्यम से अन्य लोगों के भावों और भूमिका को ग्रहण/खोज कर पाते है।
कुछ पलों के लिए हो सकता है कि पाठक अपनी वर्तमान स्थिति से अलग हो जाएँ,
पात्रों, घटना व कथानक की पहचना में स्वयं की पहचान को भूल जाएँ और
ऐसे संसार में प्रेवश कर जाएँ जो वास्तव में उनके लिए कभी था ही नहीं। इस प्रकार
वह यह नई विचारधारा, दर्शन को अपना सकते है या उनके प्रति रुझान दिखा सकते है।
उनके वातावरण, उनकी आयु, उनकी चिंताएँ, खुशी, विचार आदि साहित्य में उन्हें मिल सकतें हैं। साहित्य पाठक
को उनके जीवन को आकार देने व प्रतिभागी के रूप में हिस्सा लेने,
उन पर चर्चा करने या कहानी में खोकर अन्य लोगों तक पहुँचा
सकती है। ऐसी चर्चा पाठकों को नया कुछ खोजने में सहायता करती है। उदाहरण- दोस्ती,
प्रेम, भय, नफरत, बदला, ईमानदारी, वफादारी, मानवता, पहचान, एकता, विषमता भेदभाव आदि के उनके स्वयं के भाव,
विचार अन्य लोगों से किस प्रकार सामान और भिन्न है।
काल, आयु, प्रान्त, राष्ट्रीय, विदेशी, समसामयिक व प्राचीन साहित्य पाठक को इस बात को इंगित व
मूल्यांकित करने में सहायता करता है कि उनके स्वयं के भाव व विचार कितने स्पष्ट
है। यह उनके लिए साक्ष्य प्रदान करते है व आत्मविश्वास बढाता है। वृहत साहित्यिक
कृतियों का अध्ययन पाठक वर्ग के लिखित अभिव्यक्ति के लिए आदर्श माॅडल/प्रारूप का
काम करता है। पढ़ने के साथ ही पाठक द्वारा पाठ्य सामग्री की भाषिक संरचना,
ढाँचे, भाव आदि का आत्मसात होता रहता है। साहित्यिक कृतियों का
अध्ययन पाठकों में शब्द संरचना, प्रारुप व श्रोता वर्ग के महत्त्व को भी स्थापित करता है।
भाषा शिक्षण और साहित्य के सम्बन्ध की पड़ताल करने का प्रयास किया गया है। यहाँ जिस
साहित्य की बात की जा रही है वह 13-18 आयु वर्ग के बच्चों के लिए प्रयुक्त साहित्य है। आज के
समाज में मीडिया के माध्यम से बच्चों व् किशोरों के सामने इतनी विविध सामग्र्री
बिखरी रहती है कि वह मानसिक परिपक्वता के तरफ तेजी से बढ़ते जाते है और पुरानी पीढ़ी
से कहीं अधिक मानसिक जटिलता के साथ बड़े हो रहे है। ऐसे में यदि उन्हें आदर्शवादी,
काल्पनिक साहित्य दिया जायेगा तो वह उनके लिए वास्तविकता से
अलग उबाऊ और निरर्थक होगा इसलिए ‘‘वास्तविक साहित्य’’ की गहन भूमिका है। हालाँकि
अपनी आवश्यकताओं के अनुसार उसमे से चुनाव करना और उससे कोई अर्थ गढ़ पाना बेहद जटिल
प्रक्रिया है। किशोर वय के बालक यूँ भी शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक ‘‘बदलावों के तूफ़ान और दबाव’’ से गुज़र रहे होते
है। इसी कारण विद्यालयी शिक्षण में उचित मार्गदर्शन की भी अनिवार्य आवश्यकता है।
इस तरह का साहित्य किशोर बालकों को अपनी तरफ आकर्षित करता है और जुड़ने के विविध
आयाम देता है; जो उसके वास्तविक जीवन के ही आयामों से सम्बंधित होते है। इस प्रकार के
साहित्य से जुड़ाव बच्चों के भाषिक संकाय को प्रबल करता है। और उनकी तरफ बढ़ने का
मनोबल भी देता है। इस साहित्य की भाषा सामाजिक भाषा है और भाषा खुद भी सामाजिक
सरोकार का माध्यम है। अतः इस शोध पत्र में वास्तविक साहित्य शिक्षण से किशोर
बालकों के भाषा अधिगम और संकल्पनाओं के
संवर्धन पर प्रकाश डाला गया है। हम जानते है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है,
इसलिए समाज की यथार्थ तस्वीर कृतियों में अंकित करना
साहित्यकार का परम ध्येय होना चाहिए। साहित्य का उद्देश्य समाज की तस्वीर को रचना
के माध्यम से प्रस्तुत कर जनता को उसकी वास्तविकता का स्वाद कराना तथा सामाजिक
स्थिति पर सोचने को विवश करना है। प्रेमचंद जी के अनुसार- ‘‘साहित्य की बहुत-सी
परिभाषाएँ की गयी है, पर मेरे विचार से उसकी सर्वोत्तम परिभाषा ‘जीवन की आलोचना
और व्याख्या हैं… साहित्य उसी रचना को
कहेंगे। जिसमें कोई सच्चाई और अनुभूति प्रकट की गई हो, जिसकी भाषा प्रौढ़, परिमार्जित, सुंदर हो और जिसमें दिल-दिमाग पर असर डालने का गुण हो,
साथ ही जब जीवन की सच्चाइयों का दर्पण हो’’[ii] जहाँ तक बाल साहित्य के मानकों की बात है तो
सहज स्वीकृत यही है कि किसी भी कहानी , कविता या बच्चों के लिए लिखी गई कोई भी रचना कौतूहल ,
जिज्ञासा और आनंद से भरी नही होगी तो बच्चा उसमें दिलचस्पी
नहीे लेगा। सबसे पहले यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि बच्चों के साहित्य पर कभी
गंभीरता से नही सोचा जाता , बच्चों को विषय बनाकर लिखने की परंपरा तुलसी,
सूर के समय से लेकर आज तक है लेकिन बच्चों के लिए लिखने की
परंपरा लगभग गायब है। हम बच्चों के साथ रचनात्मक भागीदारी करने से बचते है। आखिर
ऐसा क्यों है ? हो सकता है कि हमारी परंपरा में ही ऐसा हो? हमारी मानसिक बनावट में तो नही है इसका कारण?
जिसमें वह सिर्फ एक आदर्ष बेटा या बेटी देखना चाहते है। एक
उत्तम बाल साहित्य अपनी कल्पनाषीलता से कमोवेष परंपरा को तोड़ने की ओर ले जाता है
क्योंकि बाल साहित्य के आधारभूत तत्व वही होते हैं जो कि श्रेष्ट साहित्य के। अब प्रश्न उठता है कि 21वीं शताब्दी के वैज्ञानिक युग में बच्चों के लिए (माध्यमिक
स्तर) साहित्य कैसा है? इसका उत्तर देते हुए निकोलस टकर कहते है-
दम साफ-सुथरा हो, उसकी कहानियाँ एकदम आदर्शपरक हों और उनका अन्त सदा सुखदायी
ही हो। यह तो वास्तव में अपने समयकाल से जुड़ा प्रश्न है। यदि बाल साहित्य में पाठक
यह समझ लेता है कि इसके पीछे एक सुदृढ़ आग्रह है कि जीवन की कठिनाईयों से जुझने और
जीवन जीने का वही फार्मूला अपनाओं जो हम बता रहे हैं तो वह तत्काल उसे छोड़ देता
है।’’
बदलते सांस्कृतिक मूल्यों ने इक्क्सवी शताब्दी के बाल
‘साहित्य में समयानुसार बदलाव लाए है। ‘‘मनौवैज्ञानिको, समाजशास्त्रियों ने भी अनुभव किया कि विश्व के सभी
क्षेत्रों में हो रहे बदलाव से बच्चे अछूते नहीं है और वे इनसे न केवल प्रभावित हो
रहे है, बल्कि इन्हें किसी न किसी रूप से ग्रहण भी करना चाहते है।’’ [iii]
इंटरनेट, फिल्में…. आदि उन्हें समय से पहले ही अनेक अनुभव प्रदान
कर रहे हैं। किशोरों के सामने इतनी विविध सामग्री बिखरी रहती है कि वह मानसिक
परिपक्वता की तरफ तेजी से बढ़ते जाते है और पुरानी पीढ़ी से कही अधिक मानसिक जटिलता
के साथ बड़े हो रहे है। ऐसे में यदि उन्हें आदर्शवादी, काल्पनिक साहित्य दिया जाएगा तो वह उनके लिए वास्तविकता से
अलग उबाऊ और निरर्थक होगा इसलिए ‘वास्तविक साहित्य’ की गहन भूमिका है। ‘वास्तविक
साहित्य’ का अर्थ है जीवन की सच्चाईयों से जुड़ा साहित्य। वह मात्र नैतिकता,
आदर्ष आदि को संप्रेषित करने के उद्देष्य से ही न लिखा गया
हो ।
पड़ा क्योंकि बच्चे कोरी कल्पना में विश्वास नहीं करना चाहते’’[iv] पिटी-पिटाई पटकथा आदर्शवादी,
त्याग भाव, राजा-रानी परियों की निर्मूल कल्पनावाली कहानियों के
विरुद्ध नई आधुनिक विचार पर बच्चे ज्यादा
विश्वास करते है।
Chall (1983) की पुस्तक Proposal for Reading Stages[v] में वह बताती है कि
पठन स्तर 3 के
बच्चे (आयु 9-14) ‘‘नए अधिगम’’ के लिए पठन करते है। जब पाठक तीसरे स्तर में प्रेवश
करता है तो वह ‘‘नए सीखने’’ की प्रक्रिया का हिस्सा बनता है- नया ज्ञान,
सूचना, विचार और अनुभव। प्राथमिक स्तर पर बालक ‘‘पढ़ना सीखता’’ है
लेकिन इस स्तर पर वह ‘‘सीखने के लिए’’ पढ़ता है। इसके साथ ही बालकों में
आत्मकेन्द्रीत उद्देश्य से इतर पढ़ने की क्षमता का विकास होने लगता है और वह संसार
के ज्ञान के सैद्धांतिक पक्ष के लिए भी पठन करता है। अतः यह कहा जा सकता है कि
मानसिक दृष्टि से माध्यमिक स्तर के बच्चे गंभीर विचार युक्त साहित्य सामग्री का
अध्ययन अवश्य ही कर सकते है। आज बच्चे अपने आस-पास घटित हो रही बातों से अनभिज्ञ
नहीं है। भ्रष्टाचार वोटों की राजनीति, आतंकवाद-हर बात से वे परिचित ही नहीं उसके प्रति सजग और सतक
भी है और अपनी तरह से उसके बारे में सोच भी रहे हैं। अनिता रामपाल बच्चों को दुनिया
की हकीकत बताते या छुपाने के विषय में विचार प्रकट करते हुए कहती है- ‘‘हमने यही
तय पाया कि जब हम फंतासी या कल्पना मे ये सारी चीजें दिखा सकते हैं तो हकीकत में
होने वाली मारकाट और आक्रमकता और ऐसी तमाम चीज़ों को भी क्यों न दिखाए। यही तो असली
सवाल है। ज्यादातर लोग अपने बच्चों को ऐेसे सामाजिक यथार्थ से बचाकर रखना चाहते है
जो बर्दाश्त के काबिल नहीं है। दूसरी तरफ लाखों बच्चे है जो इन चीजों को हट रोज
अपनी ज़िदगी में देखते है, भोगते है।’’ [vi]
विशेषताएँ- अधिगम से संबंद्धित
किशोरवय के बालक यूँ भी शारीरिक, मानसिक भावनात्मक ‘‘बदलावों के तूफान और दबाव’’ से गुज़र रहे
होते है।
दुनिया की समझ बनाना शुरु करते है तथा उसमें अपने स्थान, महत्त्व पर प्रश्न करना भी आरंभ करते हैं।
से ही आलोचनात्मक कौशलों का विकास करते है।
देते है।
रहती है।
तत्पर रहते है।
के छात्रों (11-16 वर्ष) हेतु प्रयुक्त साहित्य में निम्न विशेषताएँ देखते है-
हो।
निर्णय ले पाना, वैज्ञानिक प्रवृति आदि
जिज्ञासा, भाव को देख सके।
जीवन जीने की शिक्षा न थौपी जाए, वह चाहे तो सम्पूर्ण कथानक में वास्तविक स्वरूप में अवश्य
ही प्रकट हो सकती है। उन्हें बताया न जाए, उन्हें दिखाया व अनुभव करवाया जाए।
आप-पास की दुनिया की ख़बर रखते है।
विशिष्ट पाठ, लेखक व शब्दावली के ढाँचे के रूप में न हो कर एक जीवंत
परंपरा के रूप में हो जिसमें पाठक प्रवेश कर सकता है और उसे पुनः जीवित कर सकता
है। साहित्य एक अनुभव है, सूचना मात्र नहीं है और पाठक को इसमें प्रतिभागी बनने के
लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए। पाठक की भूमिका साधारण रूप में बाह्य अवलोकनकर्ता
मात्र की नहीं होनी चाहिए।
उन्हें अनुमति हो कि वह चित्रण करें,
पाठ्य सामग्री से जुड़े, महसूस करें, विचार-मंथन करें ताकि वह साहित्य के साथ सामंजस्य स्थापित
कर सके व अपने जीवन में साहित्य के महत्त्व को महसूस कर सकें। लेकिन समस्या तो यह
है कि हम यह मानकर चलते है बच्चों को कुछ समझ नही आएगा और यह हमारा दायित्व है की
हम पाठ की व्याख्या करें आवश्यक यह है कि छात्र कुछ सामग्री का विशिष्ट/गहन अध्ययन
खुद करें जो निर्देशित भी हो सकता है व कुछ सामग्री का चुनाव और अध्ययन स्वतंत्र
रूप से भी करें। छात्रों को ऐेसे अवसरों की आवश्यकता होती है जिसमें वह साहित्य के
विशेष मुद्दों पर विश्लेषण/मंथन कर सकें जो उनके जीवन के भी विशेष मुद्दे हों।
दोनों ही उन्हें आनंद देंगें व समझ का विस्तार करेंगे। कोई भी पाठ बच्चों के लिए
तब तक बोझिल नही होता जब तक उन्हें उस पाठ में स्वंय की छवि दिखती रहे।
नहीं है। भाषा के लक्षणों को पहचानना, साहित्यिक शब्दावली में वर्णन व वर्गीकरण कर देना तब तक
निराधार है जब तक यह कोई बड़ा उद्देश्य पूर्ण न करें। विधा, तकनीक का ज्ञान साहित्य की समझ के लिए आवश्यक हो सकता है
लेकिन अकेले उसका अस्तित्व अधूरा है। शिक्षकों को यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि
उनका उद्देश्य विधा आदि की तकनीक का शिक्षण मात्र नहीं है, उनका दायित्व छात्रों और पाठ्य को बौद्धिक और भावनात्मकता
स्तर पर उत्पादक रूप के एक साथ लाना है।
साहित्यिक अनुभवों का चयन किया जाए। भारतीय समाज/वैश्विक स्तर पर बाल जीवन को
केन्द्र में रखकर साहित्यिक रचनाएँ सुझाई जा सकती है। जिसमें 21वी सदी के परिप्रेक्ष्य में निर्णय लेने,
समयनियोजन, अन्वेषण, अपने व दुसरों के दृष्टिकोण को समझने की आवश्यकता,
समसामयिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, व नैतिक मुद्दों तथा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व घटना के पाठ
जिनका असर हमारी अवधारणा के निर्माण में किया जाता है। सामाजिक व पारिवारिक
संबंधों व दायित्वों , अंतर्राष्ट्रीय चिंता के विषयों को केन्द्र में रखा गया है
। साहित्य शिक्षण के जरिए आज के परिवेश में बच्चों को अपने अनुभवों को पाठ से
जोड़ने का मौका दिया जाए और उस पर उनके साथ चर्चा के अवसर दिए जाएँ तो यह बच्चों के
विकास का और साथ ही समझकर पढ़ने का नायाब माध्यम बन जाता है।
प्राप्त करने के विविध माध्यम है, वहाँ बच्चों के लिए विशेषता किशोरावस्था के बालकों के लिए
साहित्य का चयन व शिक्षण भी उनके वास्तविक जीवन, व संसार की अभिव्यक्ति वाला ही होना चाहिए। कहानियाँ उन
चीजों को कहने का रास्ता दिखाती है जिनके बारें में सामान्यता बोला नही जा सकता है,
और ये कहानियाँ
बच्चों को अपने आसपास की पेचीदगियों से निबटने में सहायता करने वाले औजार है।
बच्चें साहित्य के साथ तभी जुडंेगे जब उन्हें बहु-आयामी समझदारी से प्रस्तुत किया
जाए । बच्चों को पूर्व निर्धारित ढाँचे में उतार देना उनकी शक्तियों की संभावनाओं
का दमन है।
of Reading Development New York, Mc Craw- Hill Book Company pp.9-24














